• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

कविता भार्गव की अजीब दास्ताँ complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
S

StoryPublisher

Guest
कविता अपने आप को निहार रही थी आईने में के तभी उसकी नज़रें अपने ३५ साल पुराने शादी की तस्वीर पर टिक गयी l शादी के दौरान वह दुबली थी और खूबसूरती बेइंतेहा थी, लेकिन फिर उम्र के साथ उसकी जिस्म भर्ती गयी और अब ५४ साल के उम्र में वह थी एक सुडौल और मदमस्त भारी जिस्म की मालकिन l

कविता को अपनी एक अंग से बहुत परेशानी थी और वोह थी उसकी विशाल भरी भड़कम गांड l उसे मालूम थी की उसकी थिरकन बच्चो से लेके बुधो तक कामुकता लाती हैं , और इस पे नमक मिर्च लगाने के लिए उसकी दो बड़े बड़े मोटे मोटे तरबूज़ जैसी स्तन तो जैसे जीते जी लोगो को घायल के लिए काफी थी l उसकी एक पक्की सहेली रेखा अक्सर कहती थी "उफ्फ्फ कवी अगर तू इस मांसल जिस्म पर पश्चिमी कपड़े पहनने लगी न तो तेरी खैर नहीं" l

इन सब बातों को वह दिल से याद ही कर रही थी के उसकी सेल पे रेखा की ही कॉल आजाती हैं l

रेखा : हैई डार्लिंग कैसी है और मममम किस ख्याल में खोई हुई थी???

कविता : चुप पागल कहीं की! यह बता फ़ोन किस लिए किया

रेखा :अब तुझे मममम क्या बताऊँ! शर्म आरही है मुझे कवी!

कविता : अरे क्या हुआ??? कुछ बोलेगी की नहीं!

रेखा : कवी ममम मुजहे पप्यार हो गया है

कविता : क्या मतलब है तेरा???

रेखा ; हआ री (आवाज़ में कामुकता लाती हुई) वोह भी अपने ही बेटे से!

यह सुनना था और कविता की होश उड़ जाती है l

कविता : क्याआ??? क्या बकवास कर रही है तू!!! पागल तो नहीं हो गयी है तू!

रेखा : देख तू भी ऐसा करेगी तो मैं किसे अपनी बातें सुनाऊँगी!

कविता : तू बता फिर ऐसे कैसे हुआ!

रेखा : तू एक काम कर,, फटा फट मेरे घर आजा!

कविता : ठीक हैं

---------------

अगले अपडेट जल्द आएगा दोस्तों, साथ बने रहे l
 
कविता निकल ही रही थी की हरबारी में उसकी विअहाल स्तन किसी और औरत के मोटे मोटे स्तनों से टकरा जाती हैं l वह और कोई नहीं बल्कि उसकी बहू मनीषा थी l ३२ साल की मदमस्त बदन और वैसे ही खिला हुआ एक एक अंग और शरारत में तो बस पूछिए मत l

मनीषा : अरे मुम्मीजी, यूँ लेहरके कहाँ चल दिए? मममम लगता हैं कोई बेसब्री से इंतज़ार कर रही है

कविता : चुप कर बेशरम! कुछ भी कहती हैं, सहेली के वहा जा रही हूँ

मनीषा : (रास्ता छोड़ देती हैं) मममम ठीक हैं (थोड़ी अजीब ढंग से चल देती हैं)

कविता : अरे ऐसे क्या चल रही है?

मनीषा : अरे मम्मीजी, आपके बेटे से पूछिये जाके! (चल लेती हैं)

कविता कुछ पल तक सांस रोकके फिर रेखा के घर की ओर चल पड़ती हैं l

......

रेखा के घर पर

रेखा और कविता गले मिलते हैं। दोनों औरतें हमउम्र थे और ४० साल की दोस्ती थी उन दोनों की। रेखा कविता सामान सुडोल तो नहीं थी लेकिन कहीं कहीं भर ज़रूर गयी थी उम्र के रफ़्तार के साथ। आज वोह एक हरी रंग की साड़ी और सफ़ेद ब्लाउज पहनी थी।

कविता : अब बता! फ़ोन पे क्या बकवास कर रही थी तू????

रेखा : (गहरी आहें भरती हुई) हीी मत पुछ कवी! यह सब राहुल का किया धरा ह उफ्फ्फ मुझसे और सहन नहीं होता l मैं किसी दिन नंगी घुस जाऊंगी उसके कमरे में!

कविता अपनी सहेली की बातों से सिसक उठी "नंगी घुस जाऊंगी" यह कहना क्या एक माँ के लिए आसान थी?

कविता : रेखा यह सबब कक्काइसे मतलब कब? और ज्योति (राहुल की बीवी) को मालूम ????

रेखा : वोह तो मैके गयी हुई हैं आज २ हफ्ते हो गए!

कविता : समझ गयी कलमुही! और राहुल का अकेलापन तुझसे देखि नहीं गयी है न?????

रेखा बस आहें भरती हैं और कामुक अंदाज़ से बैठ जाती हैं l

रेखा : तू नहीं जानती कवी, इस उम्र में प्यास कितनी बढ़ती हैं और ममम यह जिस्म जितनी चौड़ी होती जाती हैं उतनी इसे रगड़ाई और समंहोग चाहिए होता हैं!!! तू तो पत्थर दिल औरत है! तुझे क्या मालुम भला! चल जा यहाँ से! बात नहीं करती मैं तुझसे!

कविता : अरे मेरी बिन्नो!!! इसमें नाराज होने वाली कोनसी बात हैं (पास बैठ के गाल दबाती हैं)

रेखा : हम्म्म्म मस्का एक्सपर्ट कहीं की! कॉलेज में भी तू ऐसी ही करती थी!

कविता और रेखा बात ही कर रहे थे के रेखा की सेल बजने लगी और उसपर राहुल का नाम देखके रेखा की साँस ही चढ़ गयी वोह फ़ोन तो उठै नहीं बल्कि लम्बे लम्बे हे भरने लगी मानो किसी कमसिन लड़की को अपने प्रीतम का पहला ख़त मिला हो l

उसकी यह चाल देखके कविता हैरान रह जाती हैं और धीरे से कहती हैं "बेटे का फ़ोन है!"

हरबारी में रेखा फ़ोन उठा के बात करने लगती हैं l कविता बस रेखा की बातों पर गौर कर रही थी l

रेखा :

"हाँ बेटा, हाँ मैं हूँ न!

"हाँ हाँ सारे ले लूंगी! सब के सब!

"तू मुझे एक मौका तो दे बेटा!"

"ठीक है बेटा, जैसा तू चाहे, बाई!"

रेखा के फ़ोन रखते ही कविता उसे हैरानी से बस देखती रहती हैं

रेखा : ऐसी क्या देख रही है कवी?

कविता : मुँह पर हाथ लहराती हुई! तू क्या इस हद तक जा चुकी है बेटे के साथ???? चीई रेखु! तुझे रेखा नहीं रखेल बुलाना चाहिए मुझे!!! छी

रेखा हंस पड़ती हैं सहेली की बातों से। कविता सोचने लगी कि कितनी बेशर्म हो गयी उसकी सहेली "अरे बिन्नो! हंस क्यों रही है बेशरम!"

रेखा : अरे मेरी प्यारी प्यारी कवी! वोह तो राहुल अपने एक डिलीवरी पार्सल के बारे में बात कर रहा था!!!

कविता : क्या????

रेखा : अरे हाँ रीए! वोह तो पिछली बार मैं नहा रही थी जब वोह सौरीवाला घंटी बजा बजा के चला गया था l

कविता अपनी सर पर हाथ पटक देती हैं और खुद भी हंस पड़ती हैं l

रेखा : हैई राम तुझे क्या लगा??? मैं इतनी जल्दी टूट पड़ूँगी अपनी बेटी पर! ???

कविता एक राहत की सांस लेती हैं और दोनों एक एक कप चाय की चुस्की लिए हुए बैठ जाते हैं।

कविता : क्या राहुल को इसकक....

रेखा : नही!! भले में माँ होक उसे कैसे केहड़ू??? है रम्म नाहीइ मुझसे नहीं होगा यह सब!

कविता को रेखा की कही गयी हर एक बात बहुत उकसाने लगी। फिर उसे ऐसा कुछ सुझा जो उसकी कल्पना से अब तक परे थी l

कविता बस सुनती गयी l

रेखा : वैसे कवी! क्या तुझे कभी किसी जवान आदमी के प्रति कोई भावनाये नहीं आयी?? क्या (थूक घोंट के) क्या तुझे कभी अजय के प्रति कुछःह मतलबब समझ रही है न???

रेखा की कही गयी हर हर एक शब्द कविता के दिल में कामदेव की तीर फ़ेंक रही थी पर थी वोह एक सुलझी हुई औरत, घुसा तो आने ही थी l

कविता : क्क्क्य बकवास कर रही है तू????

रेखा : अरे बाबा ऐसे ही पूछ रही थी

"क्या मेरा और मेरे बेटे के बीच में भी ऐसा" यह ज़रा सी सोच से वह चौंक उठी और स्तन थे कि ऊपर नीचे होने लगे। माथे से पसीने के एक एक बूँद टपकती हुई उसकी गैल से होके स्तन के दरार में घुस गयी हो मनो l

रेखा अपनी सहेली की तरफ चुप चाप देखती गयी l

______________________
 
कविता : नहीं नहीं रेखा तुझे अपने आप पर काबू करनी ही होगी (एक लम्बी आह भरती हुई) तू माँ हैं राहुल की!

यह बात सुनते ही एक लम्बी सी आह निकल पड़ती हैं रेखा की मूह से, एक अजीब सी आवाज़ जैसे कोई अपने दिल में छिपे कामुकता का बयां कर रही हो l

रेखा की पपीते जैसे स्तन ऊपर नीचे होने लगे और अपनी सेल पर राहुल की एक तस्वीर लेके जी भर के स्क्रीन पर चूमने लगी यह दृश्य देखके कविता भी गरम होने लगी l

रेखा : (चूमती हुई) हाआआ माँ हूँ उसका! (चुम चुम) हां मालूम हीई (चूम चूम) पर अगर मैं (फ़ोन हाथों से पटकती हुई) ममाशूका बनना चहु तो??? उफ्फफ्फ्फ़ कविई कुछ होने लगा मुझे l

कविता जो खुद गरम हो रही थी बिना सोचे अपनी एक तरबूज़ जैसे एक स्तन को हल्का दबोच लेती हैं "ओह्ह्ह मम दरअसल एक कीड़ा काट रही थी" अपनी हाथ को फिर नीचे लाती हैं l

रेखा : कविई तू तो एक थेरेपिस्ट हैं मनुष्य विज्ञानं में कुछ सलाह दे मुझे आगे कैसे बढ़ना चाहिए, अगर राहुल नहीं मिला तो मैं कुछ भी कर जाऊंगी l

कविता : मम मैं क्या कहूँ रेखु! मैं नार्मल परिस्थितियों पे सलाह देती हूँ! एक माँ और एक बेटे में कैसे??? नहीं नहीं l

रेखा : देख मैं माँ बाद में और पहले एक औरत हूँ! भाई साहब से डाइवोर्स के बाद मैं पागल सी होने लगी हूँ! तू तो जानती हैं न आज ५ साल बीत गए मैं कितनी अकेली हूँ!

कविता : लेकिन ज्योति की तो सोच! तू क्या दोनों की रिश्ता तोडना चाहती हैं अपनी हवस के लिए??? क्या तू ऐसा कर पायेगी???

रेखा इस बार बहुत शर्मिंदा हो गयी और नीचे की और देखने लगी, कविता उसकी पीठ पर हाथ मलने लगी l

रेखा : कवी तेरे लिए यह कहना आसान है क्योंकि तेरी इस जिस्म पे अब तक कोई प्यास की चेतावनी नहीं मिली, पर देख तू भी मेरी ही तरह एक औरत हैं! जब तेरी इस मदमस्त जिस्म पर आग फड़केगी एक जवान मर्द के लिए तब तुझे समझ में आएगी l

कविता की साँसें फिर से चढ़ गयी और "मम मैं अब चलती हूँ, बहुत देर हो गयी" तुझसे फ़ोन पर कुछ सलाह दे दूँगी!"

रेखा : फ़ोन पर नहीं!!!! कविई!!! तू मुझे बता मैं आगे कैसे बरु

कविता : (कुछ सोचती हुई) देख! पहले तो तू कोशिश कर राहुल की दिल की बात जान्ने के लिए क्या वोह भी तुझे उफ्फफ्फ्फ़ यह मैं क्या बोले जा रही हूँ!

रेखा : (कामुक आवाज़ में) गीली हो रही है क्या तू???? ममम?

कविता बड़ी शर्मीली सी सूरत लेके अपनी साड़ी से ढके जांगों के बीच देखने लगी और दाँत दबे होंट लिए यहाँ वह देखने लगी, रेखा समझ गयी कि उसकी सहेली उत्तेजित हो रही थी l

रेखा : हम्म्म तो हाँ! तू क्या बोल रही थी मुझे?

कविता : एहि के तू राहुल के मनन को जानने की कोशिश कर पहले और धीरे धीरे करीब जा!

रेखा : मममम और?

कविता : देख तू एक काम कर सबसे पहले तो उसे अपनी अकेलपन का इज़हार कर! उसे समझ ने दे तेरी प्यास क्या हैं, तू किस कदर एक मर्द के साये के लिए तड़प रही हैं l

रेखा बस लंबी लंबी साँसें लेती हुई सुनती गयी l

कविता : और फिर धीरे से उसे अपनी आगोश में करले l(खुद भी जैसे बेचैन हो रही थी)

रेखा और कविता बस एक दूसरे को देखते गए। दोनों महिलाएं लम्बे लम्बे आहें भर रही थी जैसे वक़्त वाही का वही रुक गया हो l

रेखा : वाह कवी! तेरी बातों ने मेरे सोये हुए ार्मन और भरका दिए और तू तो मानो कोई मैट्रीमॉनियल संगस्था से आई हैं, ऐसे मेरा चक्कर चला रही है, सच कवी! तू किसी भी माँ को कामुक बना सकती हैं अपनी इन मीठी बातों से!

कविता फिर से अपनी एक स्तन मसल देती हैं, यूँही अनजाने में l

रेखा समझ गयी उसकी दोस्त गरम होने लगी थी "क्या फिर से कोई कीड़ा काट रही है??"

कविता बस दांतो तले होंट दबा गयी और एक मासूम सी मुस्कान देने लगी l

_________
 
Back
Top