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चुद गई बहना भाभी के चक्कर में

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चुद गई बहना भाभी के चक्कर में

नमस्कार दोस्तो, मेरा नाम जय कुमार है, मैं सरकारी नौकरी करता हूँ। मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ कि मेरी सभी कहानियाँ काल्पनिक हैं जिनका किसी से भी कोई सम्बन्ध नहीं है अगर होता भी है तो यह मात्र एक संयोग ही होगा।

मैं डेढ़ महीने से ज्यादा गाँव में रहा और पायल भाभी के साथ काफी मजा किया। मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो गई थी इसलिए मैं वापस अपने घर आ गया।

मैं घर आया तब तक मेरे भैया छुट्टियाँ समाप्त करके अपनी ड्यूटी पर जा चुके थे इसलिये अब मैं अपनी पायल भाभी के साथ उनके कमरे में सोने लगा और मेरे व भाभी के शारीरिक सम्बन्ध बनने फिर से चालू हो गये।

मुझे गाँव से आये हुए अभी दस दिन ही हुए थे कि एक दिन शाम को जब मैं क्रिकेट खेलकर घर आया तो देखा कि ड्राईंगरूम में रामेसर चाचाजी बैठे हुए थे। उनको देखकर मैं थोड़ा सा डर गया कि कहीं उनको मेरे और पायल भाभी के बारे में पता तो नहीं चल गया और वो उसी की शिकायत करने के लिये यहाँ आये हों?

खैर मैं उनके चरण स्पर्श करके सीधा अन्दर चला गया और जब अन्दर गया तो देखा की डॉली (रामेसर चाचा जी की बेटी) भी आई हुई थी, बाद में मुझे पता चला कि डॉली को नौकरी के लिये कोई परीक्षा देनी है, उसी के लिये रामेसर चाचाजी डॉली को शहर लेकर आये हैं।

डॉली की परीक्षा अगले दिन थी इसलिये वो दोनों उस रात हमारे घर पर ही रहे। अगले दिन परीक्षा के बाद वो जाना चाहते थे मगर मेरे मम्मी पापा डॉली को हमारे घर कुछ दिन रुकने के लिये कहने लगे।

वैसे तो डॉली की छुट्टियाँ ही चल रही थी मगर वो अपने कपड़े लेकर नहीं आई थी इसलिए वो मना करने लगी।

इसके लिये मेरी मम्मी ने उनहें पायल भाभी के कपड़े पहनने के लिये बताया और आखिरकार डॉली रुकने के लिये मान गई। डॉली को हमारे घर पर ही छोड़कर रामेसर चाचाजी वापस गाँव चले गये।

डॉली के रूकने से मेरे मम्मी पापा तो खुश थे मगर इसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा क्योंकि डॉली मेरी भाभी के साथ उनके कमरे में सोने लगी और मुझे फिर से ड्राईंगरूम में बिस्तर लगाना पड़ा जिससे मेरे और मेरी भाभी के शारीरिक सम्बन्ध होने बन्द हो गये, हमारे सम्बन्ध बस चूमने चाटने और लिपटने तक ही सीमित होकर रह गये थे, और वो भी तभी होता जब भाभी रात को घर का मुख्य दरवाजा बन्द करने के लिये ड्राईंगरूम से होकर आती जाती थी।

हमारे घर का मुख्य दरवाजा मेरी भाभी ही खोलती और बन्द करती थी क्योंकि रात को भाभी ही घर के काम निपटा कर सबसे आखिर में सोती और सुबह जब दूधवाला आता तो भाभी ही दूध लेने के लिये सबसे पहले उठकर दरवाजा खोलती थी, इसके लिये उन्हें ड्राईंगरूम से होकर गुजरना पड़ता था।

मैं उन्हें कभी कभी वहीं पर पकड़ लेता था मगर अब तो भाभी उसके लिये भी मना करने लगी क्योंकि एक बार जब मैं भाभी को ड्राईंगरूम में पकड़ कर चूम रहा था तो अचानक से डॉली आ गई, उसने हमे देख लिया था। इसके बारे में डॉली ने किसी से कुछ कहा तो नहीं मगर उसको हमारे सम्बन्धों का शक हो गया था इसलिये वो अब हम दोनों पर नजर रखने लगी, मगर वो जाहिर ऐसा करती जैसे कि उसे कुछ पता ही नहीं हो।

मुझे डॉली से चिढ़ सी होने लगी थी, मैं सोचता रहता कि आखिर यह कब हमारे घर से जायेगी और इसी तरह हफ्ता भर गुजर गया।

एक बार रात में बिजली नहीं थी क्योंकि शाम को काफी जोरो से आँधी और बारिश होने के कारण लगभग पूरे शहर की ही बिजली गुल थी। बिजली नहीं होने के कारण सभी ने जल्दी ही खाना खा लिया। मेरे मम्मी पापा तो खाना खाते ही सो गये और मेरी भाभी व डॉली घर के काम निपटाने लगी।

बिजली के बिना पूरे घर में अन्धेरा था, बस मोमबत्ती की रोशनी से ही काम चल रहा था, मैं मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई तो कर नहीं सकता था, इसलिये खाना खाने के बाद ऐसे ही ड्राईंगरूम में लेट रहा था और भाभी के बारे में ही सोच रहा था।

तभी ड्राईंगरूम के अन्दर कोई आया और बाहर की तरफ चला गया। ड्राईंगरूम में इतना अन्धेरा था कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था बस दोनों तरफ के दरवाजे ही बाहर से आने वाली थोड़ी सी रोशनी की वजह से अन्धेरे में दिख रहे थे।

मैं समझ गया कि भाभी घर का मुख्य दरवाजा बन्द करने के लिये गई हैं, तभी मेरे शैतानी दिमाग में एक योजना आई, मैं सोचने लगा कि आज चारों तरफ अन्धेरा है और ड्राईंगरूम में तो कुछ भी दिखाई देना मुश्किल है इसलिये क्यों ना आज अन्धेरे का फायदा उठा लिया जाये।

वैसे भी मुझे भाभी के साथ सम्बन्ध बनाये हफ्ता भर हो गया था इसलिये मेरी हवश भी काफी जोर मार रही थी। इस मौके का फायदा उठाने की सोचकर मैं तुरन्त बिस्तर से उठकर खड़ा हो गया और भाभी के वापस आने का इन्तजार करने लगा।

जैसे ही भाभी घर का मुख्य दरवाजा बन्द करके ड्राईंगरूम से होकर वापस जाने लगी, मैंने उन्हें पकड़ लिया और उनकी गर्दन व गालों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी।

अन्धेरे में अचानक हमले से भाभी सकपका गई और जब तक वो कुछ समझ सकें तब तक मैंने उनके दोनों होंठों को अपने मुँह की गिरफ्त में ले लिया ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ मजा आ गया।

भाभी ने अपने होंठों को छुड़ाने की भी कोशिश की मगर मैंने एक हाथ से उनकी गर्दन को पकड़ लिया और उनके होंठों को जोर से चूसने लगा।

भाभी काफी डर रही थी, वो मेरा विरोध तो नहीं कर रही थी मगर काफी कसमसा रही थी।

भाभी के होंठों को चूसते हुए ही मैंने अपना दूसरा हाथ उनके शर्ट के अन्दर भी डाल दिया और उनके पेट को सहलाते हुए धीरे धीरे उरोजों की तरफ बढ़ने लगा जिससे उनका पूरा बदन कांपने लगा, पता नहीं उन्हें ये कंपकपी डर के कारण हो रही थी या फ़िर उत्तेजना के कारण, मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था…

भाभी ने मेरे हाथ को रोकने के लिये पकड़ना भी चाहा मगर तब तक मेरा हाथ उनके उरोजों तक पहुँच गया था। शर्ट के नीचे भाभी ने ब्रा पहन रखी थी इसलिये मैं ब्रा के उपर से ही उनके उरोजों को मसलने लगा मगर आज उनके उरोज मुझे कुछ छोटे व काफी कसे हुए से महसूस हुए।

और फिर तभी मेरे दिमाग में एक सवाल सा कौन्ध गया…कही यह डॉली तो नहीं?

क्योंकि आज मुझे भाभी का व्यवहार भी कुछ अजीब ही लग रहा था, पहले जब कभी मैं भाभी को चुम्बन करता था तो वो हमेशा मेरा साथ देती थी मगर आज वो साथ देने की बजाय कसमसा रही थी और काफी घबरा भी रही थी।

यह बात मेरे दिमाग में आते ही मेरा हाथ जहाँ था वहीं का वहीं रूक गया और मैं बुरी तरह से घबरा गया। मेरी भाभी की व डॉली की लम्बाई समान ही थी और उस दिन दोनों ने ही सलवार सूट पहन रखा था इसलिये अन्धेरे में मैं पहचान नहीं सका कि ये मेरी भाभी है या डॉली?

मैंने गलती से आज डॉली को पकड़ लिया था। डॉली भी डर व शर्म के कारण कुछ बोल नहीं रही थी। शायद वो इस वजह से शर्मा रही थी कि अगर वो कुछ कहेगी तो मैं ये जान जाऊँगा कि उसे मेरे और मेरी भाभी के सम्बन्धों के बारे में पता है और उस दिन उसने मुझे व भाभी को देख लिया था, ऊपर से डॉली बहुत डरपोक भी थी।

अब तो मुझे पता चल गया था कि ये पायल भाभी नहीं है बल्लि डॉली है मगर फिर भी मैंने डॉली को छोड़ा नहीं और उसे वैसे ही पकड़े रखा, क्योंकि इतना सब करने के बाद मैं अब अगर डॉली को छोड़ देता हूँ तो वो भी समझ जायेगी कि मैंने उसे क्यों छोड़ दिया, अब डॉली के जैसी स्थिति में ही मैं भी फँस गया था!

मेरे दिमाग में अब एक साथ काफी सवाल चल रहे थे।

डॉली को छोड़ दूँ या फिर पकड़े रहूँ? यह मालूम होने के बाद कि ये डॉली है और डर व शर्म के कारण कुछ बोल नहीं रही है तो ना जाने क्यों मुझे बहुत रोमाँचित सा भी लग रहा था और रह रह कर डॉली के प्रति मेरी वासना भी जोर मार रही थी।

मेरे दिमाग में एक साथ अनेक विचारों का भूचाल सा मच रहा था, मैं सोच रहा था कि अगर डॉली डर व शर्म की वजह से कुछ बोल नहीं रही है तो क्यों ना मैं भी इसका फायदा उठा लूँ!

आखिरकार वासना मेरे विचारों पर भारी पड़ने लगी और अपने आप ही मेरे हाथों की पकड़ डॉली के उरोजों पर फिर से कसती चली गई।

मैं डॉली के होंठों को कसकर चूसने लगा और साथ ही धीरे धीरे उरोजों को भी मसलता रहा जिसका वो विरोध तो नहीं कर रही थी मगर अब भी कसमसाये जा रही थी।

कुछ देर उरोजों को दबाने के बाद मैंने अपना हाथ डॉली के शर्ट से बाहर निकालकर धीरे से उसकी जाँघों की तरफ बढ़ा दिया और सलवार के ऊपर से ही एक बार उसकी बुर को मसल दिया जिससे डॉली चिहुँक पड़ी, उसने मेरे हाथ को वहाँ से हटाकर अपनी दोनों जाँघो को भींच लिया।
 
तभी बाहर किसी की आहट सी सुनाई दी, शायद ये मेरी भाभी थी। अब डॉली भी मुझसे छुटाने का जोरों से प्रयास करने लगी इसलिये मैं उसे छोड़ कर अलग हो गया, मैं नहीं चाहता था कि डॉली को पता चले कि मैं उनके साथ ये सब जानबूझ कर कर रहा था। मुझसे छुटते ही डॉली जल्दी से ड्राईंगरूम से बाहर चली गई।

डॉली तो जा चुकी थी मगर मेरे अन्दर हवस का एक तूफान सा उमड़ रहा था इसलिये उस रात मैंने दो बार हस्तमैथुन किया तब जाकर मुझे नींद आ सकी।

मेरी चचेरी बहन तो चली गई पर मेरे अन्दर वासना का तूफान उमड़ रहा था, रात में मैंने दो बार हस्तमैथुन किया तब जाकर मैं सो पाया।

अगले दिन सुबह मैं बिना नाश्ता किये जल्दी ही स्कूल चला गया इसलिये घर में मेरी किसी से भी बात नहीं हुई मगर दोपहर को जब मैं स्कूल से आया तो मेरे दिल में हल्का सा डर था, कहीं डॉली ने रात वाली बात किसी को बता ना दी हो?

मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ, सब कुछ सामान्य ही रहा और डॉली का व्यवहार तो ऐसा था जैसे कल रात के बारे में उसे कुछ पता ही नहीं।

इसी तरह तीन दिन गुजर गये जो बिल्कुल सामान्य ही रहे मगर पता नहीं क्यों डॉली के प्रति मेरी सोच को क्या होता जा रहा था, अब वो मुझे बहुत खूबसूरत लगने लगी थी।

डॉली को गाँव से आये हुए अभी एक हफ्ता ही हुआ था और हफ्ते भर में ही डॉली का रंग रूप काफी निखर गया था, ऊपर से वो मेरी भाभी के सलवार सूट पहनती थी जो उस पर इतने खिलते थे उनको देखकर कोई कह ही नहीं सकता कि यह गाँव की वही सामान्य सी दिखने वाली लड़की है।

बिल्कुल गोल चेहरा, बड़ी बड़ी भूरी आँखें, पतले और सुर्ख गुलाबी होंठ, लम्बी सुराहीदार गर्दन, हाँ उनका वक्षस्थल मेरी भाभी के मुकाबले में कुछ छोटा था मगर उसमें काफी कटाव व कसाव था, लम्बा कद, बिल्कुल पतली सी कमर और उसके नीचे भरे हुए माँसल गुदाज नितम्ब व जाँघें!

उस समय भी डॉली के शरीर का कटाव किसी फिल्मी अभिनेत्री से कम नहीं था बस कुछ समय की ही दरकार थी। अभी तक मैंने डॉली को कभी ऐसे नहीं देखा था। डॉली सही में इतनी खूबसूरत हो गई थी, या फिर पता नहीं उस रात के बाद मुझे ही ऐसा लगने लगा था।

डॉली के परिवार और हमारे परिवार के बीच काफी करीबी सम्बन्ध थे, उसके पापा को मैं चाचा ही मानता था मगर फिर भी पता नहीं क्यों मैं डॉली के प्रति आसक्त सा होता जा रहा था और दिल ही दिल में उसको हासिल करने कल्पना करने लगा था।

मैंने अपने आप को समझाने की काफी कोशिश भी की मगर जब मुझसे रहा नहीं गया तो आखिरकार मैंने डॉली को पाने के लिये एक योजना बना ली और इसके लिये सबसे पहले तो मैंने अपनी भाभी को सारी बात बता दी।

मेरी बात सुन कर पहले तो भाभी गुस्सा हुई मगर फिर मान गई और मेरा साथ देने के लिये भी तैयार हो गई।

करीब दो दिन बाद ही मुझे मौका मिल गया, उस दिन हल्की सी बारिश होने के कारण मौसम थोड़ा सा खराब था इसलिये शाम को मौका देखकर मैंने शार्ट-सर्किट का बहाना करके जान बूझ कर हमारे घर की बिजली खराब कर दी जिससे हमारे पूरे घर में अन्धेरा हो गया।

मैं उस दिन की तरह ही अन्धेरे का फायदा उठाना चाहता था और इसके लिये मैंने अपनी योजना पहले ही भाभी को बता दी थी।

बिजली ना होने के कारण रात को सभी ने जल्दी खाना खा लिया और सोने की तैयारी करने लगे। मेरे मम्मी पापा तो खाना खाते ही अपने कमरे में जाकर सो गये और मैं ड्राईंगरूम में आ गया।

अब बर्तन साफ करना और बचे हुए काम मेरी भाभी व डॉली को करने थे।

मेरी योजना के अनुसार भाभी ने पहले ही तबियत खराब होने का बहाना बना लिया और बचे हुए काम डॉली को खत्म करने के लिये बोल कर अपने कमरे में जाकर सो गई।

डॉली ने करीब आधे घण्टे में ही सारे काम निपटा लिये और अब बस उसे घर का मुख्य दरवाजा बन्द करने के लिये आना था, मगर डॉली शायद दरवाजा बन्द करने के लिये आना नहीं चाहती थी क्योंकि काम खत्म होने के बाद भी काफी देर तक वो रसोईघर में ही खड़ी रही, वो असमन्जस में थी कि दरवाजा बन्द करने के लिये जाये या ना जाये!

इसके लिये वो अब भाभी को बता भी नहीं सकती थी, आखिर वो करे तो क्या करे?

कुछ देर तक तो डॉली ऐसे ही रसोईघर में खड़ी रही और फिर दरवाजा बन्द करने की बजाय सीधा भाभी के कमरे में चली गई, शायद आज वो दरवाजा बन्द करना ही नहीं चाहती थी, इससे तो मेरी सारी योजना विफल होने वाली थी, मगर फ़िर भगवान ने मेरी सुन ली क्योंकि कुछ देर बाद ही मोमबत्ती जलाये हुए कोई ड्राईंगरूम की तरफ आने लगा।

मैं समझ गया कि यह डॉली ही है, वो मोमबत्ती जलाकर इसलिए आ रही है ताकी मोमबत्ती की रोशनी में मैं उसे पहचान लूँ और उस दिन की तरह कोई हरकत ना करूँ मगर आज तो यह सारी योजना मेरी ही बनाई हुई थी।

मैं तुरन्त ड्राईंगरूम के दरवाजे के साथ चिपक गया और जैसे ही डॉली ने दरवाजे में पैर रखा सबसे पहले मैंने मोमबत्ती को ही झपटा मारकर नीचे गिरा दिया।

मोमबत्ती नीचे गीरते ही बुझ गई और बिल्कुल अन्धेरा हो गया।

अचानक हमले से डॉली घबरा गई और तुरन्त वापस मुड़ने लगी मगर मैंने उन्हें पकड़ कर ड्राईंगरूम के अन्दर खींच लिया और वो कुछ बोले उससे पहले ही उनके होंठों को अपने मुँह में भरकर बन्द कर दिया। अब डॉली के दोनों होंठ मेरे मुँह में थे इसलिये वो कुछ बोल तो नहीं सकती थी मगर कसमसाते हुए पीछे की तरफ हटने लगी।

मैंने भी उसे छोड़ा नहीं और उसके साथ साथ पीछे होता रहा मगर वो ज्यादा पीछे नहीं जा सकी क्योंकि थोड़ा सा पीछे होते ही दीवार आ गई इसलिये अब वो अपने दोनों हाथों से मुझे धकेलने लगी मगर आज मैं कहाँ मानने वाला था, मैंने उसे दीवार से सटा लिया और जोरो से उसके होंठों को चूसता रहा।

डॉली के होंठों को चूसते हुए ही मैंने अपना एक हाथ उसके शर्ट के अन्दर डाल दिया, नीचे उसने ब्रा पहन रखी थी इसलिये मैंने ब्रा के ऊपर से ही उसकी चूचियों पर अपना हाथ रख दिया।

डॉली के उरोजों को मैं चूचियाँ इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि वो काफी छोटी थी और मेरी भाभी के उरोजों के मुकाबले में तो वो चूचियाँ ही थी।

मैंने बस एक बार उन्हें हल्का सा सहलाकर ब्रा के किनारे को पकड़ लिया और आहिस्ता आहिस्ता उसको ऊपर खींचते हुए उसकी दोनों चूचियों को शर्ट के अन्दर ही ब्रा की कैद से आजाद कर लिया।

अब उसकी दोनों नँगी चूचियाँ मेरी मुट्ठी में थी जिनको मैं धीरे धीरे सहलाने लगा।

डॉली की चूचियाँ मेरी भाभी से छोटी थी मगर भाभी के मुकाबले में काफी सख्त और मुलायम थी, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरे हाथ में रबड़ की कोई गेंद आ गई हो।

मैं ऐसे ही डॉली की दोनों चूचियों को मसलता रहा और ऊपर उनके होंठों को चूसते हुए अपनी ज़ुबान को भी उनके होंठों के दरम्यान में धकेलने की कोशिश करने लगा, मगर उसने दाँतों को बन्द कर रखा था जिसके कारण मेरी जीभ अन्दर नहीं जा सकती थी इसलिये मैं उनके होंठों को ही अन्दर से चाटने लगा, फिर कुछ देर बाद ही आहिस्ता आहिस्ता डॉली के दाँत अपने आप थोड़ा सा अलग हुए जिससे मेरी ज़ुबान को अन्दर जाने की इजाज़त मिल गई और अगले ही पल मेरी ज़ुबान डॉली की ज़ुबान से टकराने लगी!

कुछ देर तक मैं ऐसे ही डॉली के होंठों व जुबान के रस को चूसता रहा और एक हाथ से उसकी दोनों चूचियों को भी गूँथता रहा जिससे जल्द ही उसकी चूचियों के छोटे छोटे दोनों निप्पल कठोर हो गये और साँसें गर्म व गहरी होने लगी।

डॉली के होंठों का जी भर कर रसपान करने के बाद मैंने होंठों को छोड़ दिया और उसकी गर्दन पर से चूमते हुए धीरे से नीचे उसकी चूचियों पर आ गया। डॉली के होंठ अब आजाद थे मगर फिर भी डर के कारण वो कुछ बोल नहीं रही थी बस उसके मुँह से गहरी गहरी साँसें फूट रही थीं और कसमसाये जा रही थी।

वो आज भी यही सोच रही थी की मैं उसे पायल भाभी समझ कर ये सब कर रहा हूँ।

तब तक मैंने डॉली के शर्ट के निचले सिरे को पकड़ कर ऊपर की तरफ खींच लिया, शर्ट ढीला ही था इसलिये वो आसानी से चूचियों के ऊपर तक उठता चला गया और अब उनकी दोनों चूचियाँ निर्वस्त्र थी जिन पर मेरी गर्म साँसें पर पड़ रही थी। डॉली भी लम्बी लम्बी साँसे ले रही थी जिससे उनकी दोनों चूचियाँ जोरो से उपर नीचे हो रही थी, यहाँ तक की उनके दिल की धड़कन तक मुझे सुनाई दे रही थी।

और जैसे ही मैंने अपने होंठों के हल्के स्पर्श से चूची को छुआ… उम्म्ह… अहह… हय… याह… डॉली के जिस्म में एक तनाव सा पैदा हो गया और उसके जिस्म ने एक झुरझुरी सी ली मगर मैं रूका नहीं और अपने होंठों से उसकी छोटी छोटी चूचियों को एक बार प्यार से चूम लिया जिससे डॉली के पूरे बदन में झनझनाहट सी दौड़ गई जिसको मैंने स्पष्ट महसूस किया।

मैंने डॉली की चूचियों को बस एक बार चूमा और फिर अपने होंठों को उनके निप्पलों के पास ले आया और आहिस्ता से अपनी ज़ुबान को बाहर निकाल कर उसके एक निप्पल को अपनी ज़ुबान से सहलाने लगा।

जैसे जैसे मेरी ज़ुबान उसके नर्म निप्पल को सहला रही थी, वैसे वैसे डॉली के जिस्म में बेचैनी बढ़ने लगी। डॉली एक कुँवारी लड़की थी जिसके लिए यह सब कुछ पहली बार हो रहा था।

अपने जिस्म के साथ हो रही इस छेड़-छाड़ को वो बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी मगर डर और शर्म के कारण वो कुछ बोल भी नहीं पा रही थी।

मैंने आहिस्ता से उसके एक निप्पल को अपने होंठों के बीच ले लिया और उसे हौले हौले से चूसने लगा जिससे उसकी चिकनाहट मेरे मुँह में घुलने लगी। मैं चूसते हुए उनके निप्पलों को अपनी ज़ुबान से सहला भी रहा था, वो पहले ही काफी कठोर हो गये थे मगर अब तो वो तन कर पत्थर हो गये।

डॉली मेरा विरोध तो नहीं कर रही थी मगर वो बड़ी जोर से कसमसाते हुए बस मेरी हरकतों से बचने का प्रयास कर रही थी जिसका मुझ पर कोई असर नहीं हो रहा था।

मैं जिस हाथ से डॉली दीदी की चूचियों को सहला रहा था उसे अब डॉली के नँगे पेट पर ले आया था जहाँ पर उन्होंने सलवार बाँध रखी थी। वैसे तो मैं डॉली की सलवार में हाथ डालना चाहता था मगर सलवार का नाड़ा काफी सख्त बाँधा हुआ था जिस कारण मेरा हाथ अन्दर नहीं गया, इसलिये मैं धीरे धीरे उनके पेट को ही सहलाने लगा।

डॉली की साँसें बड़ी जोर से चल रही थी जिससे उनका पेट फैल और सिकुड़ रहा था।
 
कुछ देर तक मैं ऐसे ही उनके मखमली पेट व नाभि को सहलाता रहा और अबकी बार डॉली के साँस लेने पर जैसे ही उनका पेट थोड़ा सा सिकुड़ा… मैंने धीरे से अपने हाथ की उंगलियाँ सलवार के अन्दर घुसा दी जो उसकी पेंटी से टकराई।

डॉली मेरे हाथ को पकड़ना चाहती थी मगर जब तब तक वो मेरे हाथ को पकड़ती तब तक मेरा पूरा हाथ उनकी सलवार व पेंटी में उतर गया।

और जैसे जैसे मेरा हाथ उनकी पेंटी में उतरता गया, वैसे वैसे ही डॉली का बदन में कंपकपी सी चढ़ती गई, उस‌ने अपने दोनों हाथों से मेरा हाथ पकड़ लिया और अपनी दोनों जाँघों को भी भींचकर बन्द कर लिया। शायद डॉली का यह पहला अवसर था कि उसकी बुर को कोई छू रहा था इसलिये उसका इस तरह से डरना और शर्माना लाजमी ही था।

मेरा हाथ अब डॉली की पेंटी में दोनों जाँघों के बीच उसकी बुर पर था जिस पर बिल्कुल छोटे छोटे और नर्म मुलायम बाल महसूस हो रहे थे, शायद डॉली ने उन्हें हफ्ते भर पहले ही साफ किया होगा, तभी मुझे पेंटी में हल्की सी नमी भी महसूस हुई और इसका मतलब था कि मेरी हरकत से डॉली को भी मजा आ रहा था।

अब तो मेरा हौसला और अधिक बढ़ गया, मेरा हाथ डॉली की दोनों जाँघों के बीच फंसा हुआ था जिसे मैं हिला तो नहीं सकता था मगर मैंने अन्दर ही अन्दर धीरे धीरे अपनी उंगलियों से उनकी बुर को मसलना शुरु कर दिया जिससे डॉली अपनी जाँघों को एक दूसरी के साथ रगड़ कर अपनी बुर को मेरी उंगलियों से बचाने का प्रयास करने लगी और साथ ही मेरे हाथ को भी अपनी सलवार से बाहर खींचने लगी।

मगर मैं कहाँ रुकने वाला था, मैं अन्दर ही अन्दर उसकी बुर को मसलता रहा जिससे अपने आप ही धीरे धीरे डॉली की जाँघें खुलने लगी और मेरा हाथ स्वतन्त्र हो गया, अब मैं पूरे हाथ को फैला कर धीरे धीरे उसकी बुर को सहलाते हुए उसकी रूपपायल का मुआयना कर रहा था।

डॉली की बुर बिल्कुल छोटी सी थी मगर काफी फ़ूली हुई लग रही थी, ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मिट्टी के एक बड़ी सी ढेरी के बीचोंबीच उंगली से एक छोटी सी पायल खींच रखी हो।

मैंने धीरे से अपने अँगूठे व बीच वाली उंगली से बुर की कोमल फाँकों को थोड़ा सा फैलाया और आहिस्ता से एक उंगली को बुर की दरार के बीच में रख दिया जिससे डॉली का पूरा बदन झनझना गया और उसके मुँह से बहुत ही धीमी एक आह निकल गई।

धीरे धीरे मैंने बुर की दरार को सहलाना शुरू कर दिया जिससे डॉली के मुँह से धीमी धीमी सिसकारियाँ सी निकलने लगी और दोनों जाँघो के बीच का दायरा भी बढ़ने लगा। मेरी उंगली बुर की दोनों फाँको के बीच बुर के उपरी भाग से लेकर नीचे बुरद्वार तक चल रही थी और ऐसे करते हुए जब भी मेरी उंगली उसकी बुर के अनारदाने को छूती तो डॉली का पूरा बदन ऐसे झटका सा खाता जैसे उन्हें कोई करेंट लगा हो, और ना चाहते हुए भी उसके मुँह से दबी जुबान में एक हल्की सी कराह फ़ूट पड़ती।

कुछ देर तक मैं ऐसे ही डॉली की बुर के साथ खेलता रहा जिससे जल्द ही मेरी उंगलियाँ बुर रस से भीग गई। डॉली अब भी कसमसाये जा रही थी मगर अब वो मेरे हाथ को हटाने का प्रयास नहीं कर रही थी क्योंकि उसे भी अब मजा आ रहा था और वो काफी उत्तेजित हो गई थी।

मुझे तो लग रहा था कि कुछ ही देर में वो अपनी ज़िंदगी में पहली बार बुर रस छोड़ने के मुकाम तक पहुँच जाने वाली थी। मैं भी यही चाह रहा था कि ऐसे ही उसकी बुर का पहला पानी निकाल दूँ जिससे उसे भी इस खेल का थोड़ा बहुत स्वाद तो मिल सके!

मैंने अपने हाथ के साथ साथ उसके निप्पलों पर अपने होंठों का दबाव भी बढ़ा दिया, बल्कि अब मैं उसके निप्पलों को अपने दांतों से हौले हौले काटने भी लगा था जिससे तेज-तेज सांसों के साथ डॉली के मुँह से हल्की हल्की सिसकारियाँ भी निकलने लगी… वो अपनी सिसकारियो को रोकना चाह रही थी मगर फिर भी वो मुझे सुनाई दे रही थी।

चंद लम्हों के बाद ही डॉली के जिस्म ने जैसे ज़ोरदार झटका सा खाया और उसके बदन का तापमान अचानक से बढ़ गया, डॉली का पूरा जिस्म अकड़ गया और उसकी बुर मेरे हाथ पर ही रह रह कर पानी उगलने लगी।

मैं समझ गया कि डॉली की बुर पहली पहली बार पानी छोड़ रही है इसलिये मैंने उसकी बुर को अपने हाथ से जोर से दबा लिया और उसके जिस्म को अपने जिस्म के साथ भींच लिया।

थोड़ी ही देर में डॉली की बुर ने अपना सारा रस मेरे हाथ पर ही उगल दिया जिससे मेरा पूरा हाथ और डॉली की पेंटी यहाँ तक कि सलवार भी गीली हो गई, डॉली का जिस्म अब मेरी बांहों की गिरफ्त में बिल्कुल ढीला हो गया था।

डॉली अब निढाल हो गई थी मगर मेरा हाथ अभी तक उसकी पेंटी में बुर पर ही था जो अभी तक धीरे धीरे उसकी बुर को सहला रहा था, बुर रस से मेरा पूरा हाथ लिस गया था इसलिये अब वो और भी आसानी से बुर पर फिसल रहा था।

मैंने धीरे से डॉली के गर्दन को अपनी तरफ घुमाकर उसके होंठों को चूम लिया, तभी डॉली जैसे अभी अभी नीन्द से जगी हो, उसने चेहरे को घुमाकर अपने होंठों को मेरे होंठों से अलग कर लिया मगर मैं ऐसे कहाँ छोड़ने वाला था मैंने उसकी गर्दन को पकड़कर फिर से उनके होंठों को मुँह में ले लिया और अपनी जीभ उसके होंठों के बीच घुसा दी जिससे वो कसमसाने लगी और मुझसे छुटाने का प्रयास करने लगी मगर मैंने उसे वैसे ही पकड़े रखा और उसके होंठों को चूसता रहा, साथ ही उसकी बुर को भी धीरे धीरे मसलता रहा।

कुछ देर तक तो डॉली कसमसाती रही और मुझसे छुटाने का प्रयास करती रही मगर धीरे धीरे उसकी बुर में फिर से तरावट आने लगी। डॉली अब धीरे धीरे फिर से उत्तेजित होने लगी थी।

अभी तक मैंने डॉली की पूरी बुर को मसल दिया था मगर बुर द्वार को अभी तक नहीं छुआ था इसलिये अबकी बार मैं धीरे से अपने हाथ को थोड़ा सा नीचे उसके बुर द्वार पर ले गया और आहिस्ता से बुर की दोनों फांकों को फैला कर एक उंगली को पहले तो बुर द्वार पर गोल गोल घुमाया और फिर धीरे से बुर द्वार पर रख कर हल्का सा दबा दिया।

मेरी उंगली का एक पौर ही अन्दर गया होगा कि ना चाहते हुए भी डॉली के मुँह से हल्की सी कराह फ़ूट पड़ी और उसने अपनी जांघों को भींच कर मेरे हाथ को अपनी दोनों जांघों के बीच में दबा लिया।

मेरा हाथ तो अब हिल नहीं सकता था मगर मेरी उंगली अब भी उसके बुरद्वार पर ही थी जिसे धीरे धीरे मैं बुरद्वार पर घिसने लगा जिससे कुछ ही देर में वो बुर रस से सराबोर हो गई और डॉली की जांघों की पकड़ अब ढीली पड़ने लगी और धीरे धीरे वो फिर से अलग हो गई।

डॉली अब पूरी तरह से उत्तेजित हो गई थी, उसके होंठ मेरे मुँह में थे मगर फिर भी उसके मुँह से उहुहुह… उहुहुह… उहुहुह… की आवाज निकल रही थी।

तभी मैंने अपनी उंगली को बुर द्वार में थोड़ा जोर से दबा दी… बुर रस निकलने से बुर मार्ग बिल्कुल चिकना हो गया था और साथ ही मेरी उंगली भी… इसलिये मेरी आधे से ज्यादा उंगली बुर द्वार में चली गई जिससे डॉली जोर से ऊऊऊ… हूहूहू हूहूहू… की आवाज निकालते हुए ऊपर की तरफ उचक गई और दोनों हाथों से मेरे हाथ को पकड़ कर बाहर खींचने लगी।

शायद मैंने उंगली डालकर जल्दबाजी कर दी थी जिससे डॉली को दर्द हो गया था।

मैंने उसके कौमार्य का ख्याल करते हुए अपना हाथ उनकी सलवार से बाहर निकाल लिया मगर हाथ निकाले हुए मैंने उसकी सलवार का नाड़ा उंगली में फंसा लिया जिससे मेरे हाथ के खिंचने से उसकी सलवार का नाड़ा भी खिंचने लगा। मैंने अपना हाथ डॉली की सलवार से बाहर निकाल कर एक ही झटके में नाड़े को पूरा खींच दिया जिससे वो टक की आवाज के साथ खुल गया और डॉली जब तक कुछ समझ पाती, तब तक सलवार उसके पैरों में गिर गई।

डॉली दीदी उसे झुककर वापस उठाना चाहती थी मगर मैंने अपने बदन का भार डालकर उसे वहीं दीवार से लगाये रखा और फिर से उसके एक निप्पल को मुँह में भरकर चूसने लगा। तब तक मेरा हाथ भी उसकी नंगी जांघों और मासंल भरे हुए नितम्बों पर रेंगने लगा गया था।

डॉली की जांघें काफी भरी हुई और केले के तने की तरह बिल्कुल चिकनी थी जिन पर मेरा हाथ अपने आप ही फिसल रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे मेरा हाथ किसी मखमल पर चल रहा हो।

कुछ देर तक तो मैं डॉली की चूचियों को चूसता रहा फिर आहिस्ता आहिस्ता अपने होंठों से डॉली के नंगे बदन को चूमते हुए नीचे उतरने लगा और साथ ही धीरे धीरे अपने घुटने मोड़ते हुए नीचे बैठने लगा, पेट पर से आते हुए कुछ देर मैंने अपने होंठों को उसकी नाभि पर हल्का सा विराम दिया और फिर नीचे की तरफ बढ़ गया।

मगर जब मैं उसकी बुर पर पहुँचा तो डॉली ने मेरे सर को पकड़ कर वहाँ से हटा दिया। मैंने भी इसके लिये जबरदस्ती नहीं की और बिना उसकी बुर को छुये सीधा ही नीचे की तरफ बढ़ गया।

मैं अब घुटनों के बल बैठ गया था, मेरे होंठ उसके घुटनों पर थे और मेरे दोनों हाथ भी डॉली की पीठ व कमर पर से होते हुए उनके चूतड़ों पर आ गये।

मैंने डॉली के घुटनों को चूमना शुरू कर दिया और धीरे धीरे ऊपर उसकी जांघों की तरफ बढ़ने लगा मगर इस बार डॉली कुछ ज्यादा ही कसमसा और हिल डुल रही थी, जैसे वो अपने पैरों को हिलाकर मेरे चूमने से बचने का प्रयास कर रही हो।

मगर इस बार मैंने जबरदस्ती उसके चूतड़ों को दोनों हाथों से पकड़ कर उन्हें थाम लिया और धीरे धीरे चूमते हुए ऊपर की तरफ बढ़ता रहा जहाँ उसकी पेंटी से यौवन की मादक महक फ़ूट रही थी और फिर कुछ ही पल बाद मेरे होंठ डॉली की जांघों के जोड़ के पास उसकी पेंटी पर थे जिसमें से बहुत ही तेज मादक गंध आ रही थी।

डॉली की पेंटी बुर रस से बिल्कुल तर हो चुकी थी और अब वो पेंटी के किनारों से रिसकर हल्का सा जांघों पर भी फैलने लगा था। बुर रस की गंध पाकर मैं अपने आप को रोक नहीं सका और पेंटी के उपर से ही मैंने उसकी बुर को एक बार जोर से चूस लिया जिससे डॉली के मुँह से हल्की सीत्कार फ़ूट पड़ी और उसने मेरे सर को पकड़ कर अपनी बुर से दूर हटा दिया।

डॉली की बुर रस से लबालब पेंटी को चूमने से मेरे होंठों व मुँह का स्वाद नमकीन हो गया। एक बार बुर रस का स्वाद चखने के बाद तो मैं बेताब सा हो गया इसलिये मैंने फिर से अपने होंठ डॉली की पेंटी पर लगा दिये और पेंटी के ऊपर से ही धीरे धीरे बुर को चूसने लगा।

इस बार डॉली ने मुझे हटाने की कोशिश तो नहीं कर रही थी मगर अब भी उसके दोनों हाथ मेरे सिर पर ही थे। डॉली की पेंटी को चूमते हुए मैं धीरे धीरे अपने दोनों हाथ उसकी कमर पर ले आया और फिर धीरे से पेंटी के किनारों को पकड़ कर एक ही झटके में उसे नीचे खींच लिया, पेंटी गीली होने के कारण एक दो जगह डॉली की जांघों में फंसी भी मगर फिर भी मैंने उसे घुटनों तक उतार दिया।

डॉली अपनी पेंटी को वापस पहनना चाहती थी मगर जब तक वो कुछ करे, तब तक मैंने उसकी दोनों जांघों को अपनी बांहों में भर लिया और धीरे धीरे उसकी जांघों को चूमते हुए बुर की तरफ बढ़ने लगा।

जैसे जैसे मैं बुर की तरफ बढ़ रहा था वैसे वैसे डॉली के पैर कांपने लगे, मुँह से हल्की हल्की सिसकारियाँ फ़ूटने लगी और डॉली ने मुझे आगे बढ़ने से रोकने के लिये दोनों हाथों से मेरे सिर को कस कर पकड़ लिया मगर फिर भी मैं धीरे धीरे आहिस्ता आहिस्ता जांघों को चूमते हुए उसकी बुर तक पहुँच गया।

और जैसे ही मेरे होंठों ने नंगी बुर को स्पर्श किया…

डॉली के मुँह से इईईई… श्श्श्शशश… अअ… उम्म्ह… अहह… हय… याह… आआआ… ह्ह्ह्…हाहाहाआआआ… की कराह फ़ूट पड़ी और वो अपनी दोनों जांघों को भींच कर बुर को छुपाने की कोशिश करने लगी मगर तब तक मैंने अपना सिर उसके पैरो के बीच फंसा दिया था।

मैंने अपने होंठो से बुर के अग्र भाग को चूमना शुरू किया और फिर धीरे से बुर की नाजुक फांकों पर आ गया। मैंने यौवन रस से भीगी बुर की फांकों को अपने होंठों में हल्का सा दबाया ही था कि डॉली जोर से इईईई… श्श्श्शशशश… की आवाज करके पीछे हो गई मगर मैंने अपने दोनों हाथों से उसके चूतड़ों को पकड़कर उसे फिर अपनी तरफ खींच लिया और धीरे से अपनी जीभ निकाल कर बुर की दरार में घुसा दी जिससे वो जोर से सिसिया उठी और अपने दोनों हाथों से मेरे सिर को पकड़ कर धकेलने लगी।

मगर अब मैं कहाँ हटने वाला था, मैं धीरे धीरे जीभ से बुर की दरार को सहलाने हुए बुर के अनारदाने को तलाश करने लगा और जैसे ही मेरी जीभ ने उस अनारदाने को स्पर्श किया…

डॉली ने एक सुबकी सी ली और उसके पूरे बदन में झनझनाहट सी दौड़ गई। डॉली मेरे सिर को पकड़कर मुझे वहाँ से हटाना चाह रही थी मगर मैंने उसके चूतड़ों को पकड़े रखा और कुछ देर अनारदाने को सहलाने के बाद नीचे उसके बुर द्वार की तरफ बढ़ गया।

थोड़ा सा नीचे बढ़ते ही मैं डॉली की दोनों जांघों के जोड़ के बिल्कुल बीचोंबीच बुर के अन्तिम छोर पर पहुँच गया जहाँ से डॉली के यौवन रस का झरना बह रहा था, मैंने उस झरने की हिफाजत करने वाली बुररस से भीगी हुई नाजुक कलियों को एक बार जोर से चूस लिया जिससे डॉली जोर से कराह पड़ी, उसने दोनों हाथों से मेरे सिर के बालों को मुट्ठी में भर लिया।

मैंने अब धीरे से जीभ निकाल कर बुर मार्ग को सहलाना शुरू कर दिया था जिससे डॉली के मुँह से हल्की हल्की सिसकारियाँ फ़ूटने लगी।

डॉली के साथ ये सब पहली बार हो रहा था और उसके लिये यह सहन के बाहर हो रहा था, उसे तो पता ही नहीं था कि कोई उसकी बुर के साथ ऐसा भी कर सकता है।
 
मुझे डॉली को ज्यादा तड़पाना ठीक नहीं लगा इसलिये अपनी जीभ को नुकीला करके आहिस्ता से बुरमार्ग में थोड़ा सा घुसा दिया जिससे डॉली की जोरो से सिसकी, सिसकी नहीं बल्कि चीख ही निकल गई और मेरी जीभ से बचने के लिये वो अपने पंजों के बल पर ऊपर की तरफ उठ गई मगर मैंने भी उसके चूतड़ों को अपनी हथेलियों में भर कर उसे अपनी तरफ दबा लिया और धीरे धीरे अपनी जीभ को बुर मार्ग पर घिसने लगा जिससे डॉली की सिसकारियाँ तेज होने लगी।

डॉली की बुर से इतना बुररस बह रहा था कि शायद वो अब फिर से स्खलित होने वाली थी और इस तरह का वो अपनी ज़िंदगी में पहली बार महसूस कर रही थी जो उसके सहन के बिल्कुल बाहर था इसलिये वो मुझे अपनी बुर से हटाने की कोशिश कर रही थी।

डॉली ने दोनों पैर ऊँचे उठा रखे थे, वो पूरी कोशिश कर रही थी कि मैं अपना मुँह वहाँ से हटा लूँ, उसके लिए डॉली ने अपने दोनों पैरों को नीचे से जोड़ने की भी कोशिश की मगर मैंने अपना सिर उसके पैरों के बीच फंसा रखा था इसलिये उसकी यह कोशिश भी बेकार हो गई।

तभी डॉली ने अपने दोनों हाथों से मेरे सिर के बाल इतनी सख्ती से नौच डाले कि मैं भी दर्द से कराह उठा मगर मैंने भी अपना मुँह बिना हटाए अपने दोनों हाथ डॉली के चूतड़ों से उठा कर उसके दोनों हाथों को सख्ती से मेरे सर पर ही दबाकर पकड़ लिया, अब डॉली लाचार हो गई और छटपटाने लगी।

मेरी जीभ पर भी डॉली के बुररस का स्वाद छा गया था इसलिये धीरे धीरे मैंने अपनी जीभ की हरकत को तेज कर दिया और अब जीभ को बुरमार्ग के अन्दर की तरफ भी ले जाने लगा जिससे डॉली की सिसकारियाँ और अधिक तेज हो गई।

डॉली पर भी अब उत्तेजना का खुमार चढ़ता जा रहा था, वो खुद को रोक नहीं पा रही थी क्योंकि अब अपने आप ही उसकी कमर धीरे धीरे मेरी जीभ की ताल पर थिरकने लगी थी।

डॉली का अपने आप पर जोर नहीं चल रहा था इसलिये उसने भी समर्पण कर दिया और खुद ही कमर को थोड़ा सा आगे बढ़ा कर अपनी बुर को मेरे मुँह पे घिसने लगी ताकि यह खेल जल्दी से समाप्त हो जाये।

डॉली अपनी जांघों को पूरी तरह से फैलाना चाह रही थी मगर उसके पैरों में पेंटी व सलवार फंसी होने के कारण वो अपने पैरों को ज्यादा नहीं खोल पा रही थी। मगर तभी उसने अपने घुटने मोड़ लिये और थोड़ा सा पीछे की तरफ झुककर पीठ को दीवार के सहारे लगा लिया ताकि उसकी जांघें फैल जाये और मेरी जीभ अधिक से अधिक उसकी बुरमार्ग में जा सके।

डॉली की यह हालत देख कर मैं भी जोश में आ गया, मैंने अपनी जीभ की हरकत को और तेज कर दिया, साथ ही अपने नाक को बुर की लाईन में उसके अनार दाने पर घिसने लगा।

अब तो डॉली की हालत पागलों की सी हो गई, उसने मेरे सिर को जोरों से अपनी बुर पर दबा लिया और जोर जोर से सिसकारियाँ भरते हुए तेजी से अपनी बुर को मेरे मुँह पर घिसने लगी मानो मेरे सिर को अपनी बुर में ही समा लेगी।

उसके मुँह से लगातार ऊऊहह… अआआआ… अहहन्न न्न्न्न्ना… आआ… आह्ह्ह ह्ह्ह्ह्हीईईई… ऊओहन्न्न नाह्ह्ह्ह्ही ईईइ जैसी आवाज़ें सिसकारियों के साथ निकल रही थी, डॉली अब अपने होश में नहीं थी, उसे पता ही नहीं चल रहा था कि वो क्या कर रही है और मेरी जीभ लगातार उसकी भीगी हुई बुर पर अपना काम कर रही थी।

और आख़िर डॉली की आखिरी घड़ी आ पहुँची… उसकी सिसकारियाँ गले में ही अटकने लगी और दोनों पैर एक दूसरे से कसमसाने लगे। डॉली ने गले से भारी चीख निकालते हुए अपनी पूरी ताकत से मेरे सर को बुर पर दबा लिया और उसकी बुर ने पूरा यौवन रस चार पांच किश्तों में बाहर उबाल दिया जिससे मेरा पूरा चेहरा भीग गया।

अचानक आये इस फव्वारे की वजह से मेरे होंठ डॉली की बुर से दूर हो गये और डॉली अपने पैर समेटकर आधी खड़ी होकर दीवार तक सिमट गई।

लगातार दो बार यौवन रस खाली होने से डॉली के दोनों जांघें रिक्त सी हो गई और उसके पैर थरथराने लगे। डॉली बड़ी जोर से हांफती हुई दीवार के सहारे खड़ी रहने का प्रयास कर रही थी मगर उसके पैरो की कंपकपी थम ही नहीं रही थी। उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि सेक्स की पराकाष्ठा क्या होती है। आज ज़िंदगी में पहली बार किसी ने उसे इस तरह से स्खलित किया था।

डॉली गिरने ही वाली थी कि तभी मैंने उठकर उसे सहारा दिया और डॉली ने भी मेरे ऊपर अपने शरीर का पूरा भार डाल दिया।

डॉली अब बिल्कुल बदहवास सी हो गई थी।

दो बार स्खलित होने से डॉली के पैर थरथराने लगे, डॉली हांफती हुई दीवार से टिक कर खड़ी रहने की कोशिश कर रही थी मगर उसके पैर कांप रहे थे। उसे तनिक भी आभास नहीं था कि सेक्स की पराकाष्ठा क्या होती है। पहली बार वो उसे इस तरह से स्खलित हुई थी।

डॉली गिरने को थी कि तभी मैंने उठकर उसे सहारा दिया और डॉली ने भी मेरे ऊपर अपने शरीर का पूरा भार डाल दिया।

डॉली अब बिल्कुल बदहवास सी हो गई थी, डॉली की हालत का फायदा उठाकर मैं उसे अपने बिस्तर पर ले आया और उसके पैरों में फंसी सलवार व पेंटी को भी उतार कर अलग दिया।

मैं भी अब अपने सारे कपड़े उतारकर बिल्कुल नंगा हो गया और मैंने धीरे धीरे डॉली के गालों पर फिर से चूमना शुरू कर दिया जिससे डॉली के बदन में पहले तो हल्की सी चेतना आई और फिर अचानक से वो से उठकर बिस्तर पर बैठ गई, तभी शायद उसे अपनी नंगी अवस्था का अहसास हुआ और वो अपने कपड़े तलाश करने के लिये बिस्तर पर इधर उधर अपना हाथ चलाने लगी, मगर उसके कपड़े तो मुझे ही नहीं पता था कि उतारकर मैंने कहाँ डाल दिये थे इसलिये इतनी आसानी से डॉली को कैसे मिल जाते, ड्राईंगरूम में इतना अन्धेरा था कि हाथ तक दिखाई नहीं दे रहा था फिर डॉली को उसके कपड़े कैसे मिल सकते थे।

डॉली अन्धेरे में ऐसे ही बिस्तर अपना हाथ चला रही थी कि डॉली का हाथ मेरे उत्तेजित लिंग पर लग गया, मेरे लिये तो यह काफी सुखद था मगर डॉली ने अपने हाथ को ऐसे झटका जैसे उसने कोई बिजली की तार को छू लिया हो और वो मुझसे दूर एक तरफ होकर बैठ गई।

डॉली को भी पता चल गया था कि मैंने उसके साथ ये सब जानबूझकर किया है मगर फिर भी वो कुछ बोल नहीं रही थी, शायद अभी जो कुछ हमारे बीच हुआ था, उसकी वजह से वो शर्मा रही थी।

अन्धेरे में कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा था बस डॉली का साया ही नजर आ रहा था जो मुझसे थोड़ी सी दूर बिस्तर पर ही बैठी हुई थी। डॉली ना तो कुछ बोल नहीं रही थी और ना ही कोई हरकत कर रही थी, बस चुपचाप बैठी हुई थी।

जब काफी देर तक डॉली ऐसे ही बैठी रही तो मैं ही खिसक कर धीरे से उसके पास चला गया, पहले तो मैंने उसका हाथ पकड़कर थोड़ा सा उसे अपनी तरफ खींचा, फिर धीरे से अपनी बाँहों में भर कर बिस्तर पर लुढ़क गया। अब डॉली मेरे ऊपर थी और मैं उसके नीचे था। मेरे शरीर पर तो एक भी कपड़ा नहीं था और डॉली के बदन पर भी बस एक ढीला सा कुर्ता व ब्रा ही थे और वो भी अस्त-व्यस्त हो गए थे।

नीचे से तो वो बिल्कुल ही नंगी थी इसलिये डॉली की मखमली नर्म मुलायम जाँघें सीधे मेरी नंगी जाँघों पर लग रही थी और मेरे उत्तेजित लिंग ने भी एक बार उसकी नंगी जांघों को अपनी कठोरता का अहसास करवा दिया था, तभी डॉली पलटकर मुझ पर से नीचे उतर गई और उठने की कोशिश करने लगी मगर मैंने उसे पकड़कर अपनी बगल में खींच लिया और अपना एक पैर उसकी नंगी जांघों पर रखकर उसे दबा लिया।

इस बार डॉली का मुँह दूसरी तरफ था और मैं उसके पीछे आ गया था, अब मेरा लिंग डॉली के नितम्बों के ठीक बीच में था जिससे वो कसमसाने लगी। डॉली अब भी कुछ नहीं बोल रही थी बस थोड़ा बहुत कसमसा ही रही थी।

मैंने अपना एक हाथ डॉली के शर्ट के अंदर डाल दिया और उसकी दोनों चूचियों को मसलना शुरू कर दिया, साथ ही दूसरे हाथ से धीरे धीरे उसके शर्ट को भी ऊपर खिसकाने लगा जिससे डॉली जोर से कसमसाने लगी और मेरे हाथ से अपने आप को बचाने के लिये थोड़ा सा झुक गई।

झुकने से डॉली के नितम्ब ऊपर हो गये और मेरा लिंग पीछे से उसकी दोनों जांघों के बीच सीधा बुर द्वार पर ही लग गया, अब तो डॉली और भी जोरो से कसमसाई और तुरंत सीधी हो गई मगर तब तक मैंने शर्ट को ऊपर खिसका कर उसकी पीठ को भी नंगा कर लिया था और उसकी मखमली नंगी पीठ को चूमना शुरू कर दिया।

डॉली मेरे होठों के स्पर्श से बचने के लिये इधर उधर हिलने लगी, डॉली ना तो कुछ बोल रही थी और ना ही मेरा विरोध कर रही थी बस कसमसा ही रही थी।
 
कुछ देर तक डॉली की नंगी पीठ को चूमने के बाद मैं उसकी गर्दन पर से होते हुए गालों पर आ गया और साथ ही धीरे से मैंने अपना दूसरा हाथ उसकी बुर की तरफ भी बढ़ा दिया मगर मेरे छूने से पहले ही डॉली ने दोनों जांघों को भींच कर अपनी बुर को छुपा लिया, अब मैं उसकी बुर को तो नहीं छू सकता था इसलिये दोनों जांघों को व जांघों के बीच बुर के ऊपरी भाग को ही रगड़ने लगा और साथ ही धीरे धीरे उंगलियों को जांघों के बीच में घुसाने की भी कोशिश कर रहा था।

मेरा एक हाथ डॉली की चूचियों को मसल रहा था तो दूसरा उसकी जांघों व जांघों के बीच बुर के ऊपरी भाग को सहला रहा था, साथ ही मेरी जीभ डॉली की गर्दन व गालों पर चल रही थी और पीछे से मेरा उत्तेजित लिंग भी उसके नितम्बों को रगड़ रहा था।

इस चौतरफा हमले को डॉली ज्यादा देर तक सहन नहीं कर सकी और जल्द ही उसकी सांसें गर्म व गहरी होने लगी, चूचियों के निप्पल तन कर सख्त हो गये और जांघों की पकड़ ढीली होने लगी।

डॉली अब फिर से उत्तेजित होने लगी थी।

डॉली के ढीली पड़ते ही मेरी उंगलियाँ धीरे धीरे उसकी जांघों के बीच जगह बनाने लगी, पहले तो मैंने थोड़ा थोड़ा करके उंगलियों से दोनों जांघों के बीच जगह बनाई और फिर धीरे धीरे करके अपना हाथ ही उसकी दोनों जांघों के बीच घुसाकर पूरी बुर पर कब्जा जमा लिया जो अब तक काफी गीली हो चुकी थी।

डॉली की बुर पर अब मेरा पूरा अधिकार हो गया था इसलिये मैं पूरा हाथ फैलाकर उसकी बुर को मसलने लगा जिसका डॉली भी कोई विरोध नहीं कर रही थी।

ऐसे ही कुछ देर तक मैं डॉली की बुर को मसलता रगड़ता रहा जिससे धीरे धीरे उसकी जांघों का दायरा बढ़ने लगा और मुँह से हल्की हल्की सिसकारियां भी फ़ूटनी शुरु हो गई। डॉली अब पुरी तरह मेरे वश में थी इसलिये मैंने उसकी बुर को सहलाते हुए धीरे धीरे उसे अपनी तरफ घुमा लिया और अपनी बाहों में भर कर उसके गालों को जोर से चूमने चाटने लगा जिसका डॉली ने कोई विरोध नहीं किया।

डॉली के गालों को चूमते हुए मैं उसके होंठों पर आ गया और धीरे से उसके रसीले होंठों को मुँह में भर लिया। डॉली के होंठों को मुँह में भरने से एक बार तो वो थोड़ा सा कसमसाई मगर फिर वो खुद ही धीरे धीरे मेरे होंठों को चूसने लगी।

मैंने भी अब तुरन्त करवट बदलकर डॉली को नीचे गिरा लिया और खुद उसके ऊपर आ गया। डॉली का मखमली बदन अब मेरे नीचे था और मेरा उत्तेजित लिंग सीधा डॉली की नंगी बुर को छू रहा था।

मैं पहले ही काफी उत्तेजित हो चुका था और अब अपने लिंग पर डॉली की नंगी बुर की गर्माहट पाकर तो मैं अपने आप में नहीं रहा, मैंने डॉली के पूरे चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी और साथ ही एक हाथ से उसकी नंगी चूचियों को भी मसलना शुरू कर दिया।

डॉली अपनी बुर को मेरे लिंग के स्पर्श से बचाने के लिये कमर को इधर उधर हिलाकर कसमसा रही थी मगर मैंने उसको ऐसे ही दबाये रखा और उसकी गर्दन पर से चूमते हुए उसकी चूचियों पर आ गया।

मैं अब बारी बारी से उसकी दोनों चूचियों को चूम चाट रहा था, डॉली पहले ही काफी उत्तेजित थी और अब तो मैं उसके पूरे बदन को मैं रगड़ मसल रहा था इसलिये धीरे धीरे वो फिर से शांत हो गई।

कुछ देर डॉली की चूचियों का रस पीने के बाद मैं उसके पेट पर से चूमते हुए नीचे उतर गया और सीधा अपना सिर उसकी दोनों जांघों के बीच घुसा दिया।

डॉली ने अपनी जांघें बन्द करने की कोशिश भी की मगर तब तक मैंने अपने हाथ दोनों जांघों के बीच घुसाकर उन्हें फैला दिया और एक बार फिर मैंने अपने होंठों को उसकी गीली बुर पर रख दिया जिससे डॉली अपने पैरों को समेटकर दोहरी हो गई और इईईई…

श्शशश… अआआ… हहहह… की आवाज करके मेरे सिर को दोनों जांघों के बीच दबा लिया।

डॉली ने मेरे सिर को पकड़ कर अपनी बुर पर से हटाने का प्रयास भी किया मगर तब तक सेन्ध लग चुकी थी और मेरे होंठों ने उसकी बुर की कोमल फांकों को चूमना भी शुरू कर दिया… डॉली का प्रयास हल्का पड़ गया और वो कसमसाकर रह गई।

मैं डॉली की बुर को ऊपर से चूमते हुए धीरे धीरे नीचे बुर द्वार की तरफ बढ़ रहा था जिससे डॉली के मुँह से हल्की हल्की सिसकारियां फ़ूटने लगी और धीरे धीरे उसकी दोनों जांघें भी फिर से फैलने लगी।

मैंने भी अब डॉली की बुर को जीभ निकाल कर चाटना शुरू कर दिया जिसका वो बिल्कुल भी विरोध नहीं कर रही थी बल्कि अब तो उसने खुद ही अपनी जांघों को पूरी तरह से फैला दिया, मैं अब खुलकर उसकी बुर के साथ खेलने लगा, कभी उसे होंठों से चूम रहा था, तो कभी जीभ निकाल कर पूरी बुर को ही चाट ले रहा था, और कभी कभी तो मैं जीभ को नुकीला करके बुर द्वार में हल्का सा घुसा देता जिससे डॉली जोर से सिसकार पड़ती और अपने नितम्बों को ऊपर हवा में उठाकर बुर को मेरे मुंह पर दबा लेती।

डॉली पुरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी इसलिये अब वो खुद ही अपनी बुर को मेरे मुँह पर घिसने लगी थी। डॉली तो शायद यही सोच रही थी कि मैं पहले की तरह मुँह से ही उसका रस स्खलित कर दूँगा मगर डॉली की बुर के साथ खेलने हुए पहले तो मैं उसको धीरे धीरे धकेल कर बिस्तर के बीचोंबीच ले आया और फिर उसकी दोनों जांघों को फैलाकर धीरे से उसके ऊपर लेट गया जिसका उसने विरोध तो नहीं किया बस हल्का सा कसमसाई और फिर शांत हो गई।

मैंने भी अपने लिंग को डॉली की बुर में घुसाने के लिये एक हाथ से लिंग को बुर द्वार पर लगाकर जोर से धक्का लगा दिया।

जिससे डॉली अआआ..हहह उम्म्ह… अहह… हय… याह… अआउऊच… करके जोर से चीख पड़ी और मेरा लिंग भी बुर द्वार से फिसल कर बुर पायल में ऊपर की तरफ निकल गया।

डॉली इतनी जोर से चिल्लाई थी कि अगर बाहर बारिश का शोर नहीं होता तो शायद डॉली की चीख मेरे मम्मी पापा को भी सुनाई दे जाती, इसलिये मैंने जल्दी से एक हाथ से डॉली का मुँह दबा लिया और कुछ देर के लिये कोई हरकत नहीं की।

मुझे यह तो पता था कि कुँवारी बुर सख्त होती है और उसमें पहली बार जब लिंग प्रवेश होता है तो दर्द भी होता है, मगर यह नहीं पता था कि इतना अधिक दर्द होगा कि डॉली इतनी जोर से चीख पड़ेगी और उसमें मेरा लिंग भी इतनी आसानी से नहीं जायेगा।

मैंने मेरी भाभी व पायल भाभी के साथ काफी बार सम्बन्ध बनाये थे मगर किसी कुँवारी लड़की के साथ यह मेरा पहला अनुभव था।

डॉली का मुँह मैंने दबा रखा था मगर वो अब भी गुगुँगुँ… गूँगूँगूँ… कर रही थी, मैं वैसे ही डॉली के बदन पर लेटा रहा और फिर से उसके गालों को चूमने चाटने लगा, साथ ही अपने लिंग को भी दूसरे हाथ से पकड़कर बुरद्वार पर घिसने लगा।

डॉली की बुर प्रेमरस से भीग कर इतनी चिकनी हो गई थी कि अपने आप ही मेरा लिंग बुर की दरार में फिसल रहा था।

कुछ देर तक मैं ऐसे ही डॉली को चूमता चाटता रहा और अपने लिंग को भी बुर की दरार में घिसता रहा जिससे डॉली के मुँह से हल्की-हल्की आहें फ़ूटने लगी।

डॉली काफी उत्तेजित थी और उसकी बुर तो मुझे सुलगती सी महसूस हो रही थी, शायद वो स्खलित होने की कगार पर पहुंच गई थी क्योंकि अब वो खुद ही अपनी कमर को हिलाकर अपनी बुर को मेरे लिंग पर घिसने लगी थी, शायद वो जल्दी से चरम पर पहुँचना चाहती थी और उसके इन्हीं पलों का फायदा उठाकर एक बार फिर मैंने अपने लिंग को बुर के मुहाने पर रखकर जोर दार धक्का लगा दिया।

डॉली काफी उत्तेजित थी, उसके मुँह से हल्की-हल्की आहें फ़ूटने लगी। वो खुद अपनी कमर को हिलाकर अपनी बुर को मेरे लिंग पर घिसने लगी थी और उसके इन्हीं पलों का फायदा उठाकर एक बार फिर मैंने अपने लिंग को बुर के मुँह पर रखकर जोरदार धक्का लगा दिया।

और अबकी बार उम्म्ह… अहह… हय… याह… मुझे सफलता मिल गई क्योंकि एक तो डॉली का बुर द्वार प्रेमरस से भीग कर बिल्कुल चिकना हो गया था और दूसरा डॉली स्खलित होने की कगार पर थी जिससे उसका बुर द्वार काफी फैल व सिकुड़ रहा था इसलिये अबकी बार मेरे लिंग का सुपारा डॉली की कौमार्य झिल्ली को भेद कर बुर में प्रवेश कर गया।

डॉली के मुँह को मैंने एक हाथ से दबा रखा था, फिर भी वो उऊऊऊ… ह्हुहुहु… उऊऊ… उऊऊऊ… ऊऊ… उऊऊ… उऊऊऊ… कर के कराह पड़ी और दोनों हाथों से मेरी कमर को जोर से पकड़ लिया।
 
डॉली का ध्यान किये बैगर ही मैंने उसी हालत में एक और धक्का लगा दिया जिससे ज्यादा तो नहीं मगर लगभग मेरा एक चौथाई लिंग बुर में समा गया और डॉली छटपटाने लगी, उसके दोनों हाथ मेरी कमर में जैसे धंस ही गये थे और वो मुझे जोर से पीछे धकेलने लगी।

डॉली के धकेलने से एक बार मैंने भी अपने लिंग को थोड़ा सा बाहर खींच लिया जिससे उसे कुछ राहत मिली और उसके हाथों की पकड़ कुछ हल्की हो गई मगर लिंग के पूरा बाहर निकलने से पहले ही मैंने फिर से जोरदार झटका लगा दिया और इस बार मेरा करीब आधे से ज्यादा लिंग डॉली की बुर में समा गया जिससे वो जोर से उऊऊऊ… हहूहूहूहू… अँगुगुगु… गूऊगूऊगूऊऊ… करके बुरी तरह छटपटाने लगी।

सही में डॉली की कुंवारी बुर इतनी तंग व सख्त थी कि मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरे लिंग को किसी ने अपनी पूरी ताकत से मुट्ठी में भींच रखा हो, मुझे भी अपने लिंग के सुपारे में दर्द का अनुभव हो रहा था।

तभी मुझे अपने लिंग के पास व जांघों पर काफी गीलापन सा महसूस हुआ, मैं तो यह समझ रहा था कि यह डॉली का बुर रस होगा मगर बाद में मुझे पता चला कि यह तो डॉली का कौमार्य था जो टूट कर खून के रूप में बह रहा था।

डॉली की छटपटाहट देखकर मुझे उस पर तरस तो आ रहा था मगर ये सब उसे कभी ना कभी तो सहना ही था। डॉली बुरी तरह से छटपटा रही थी इसलिये मैंने अपने लिंग को ज्यादा घुसाने की कोशिश नहीं की मगर जितना मेरा लिंग बुर में गया था, मैं उतनी ही दूरी के धीरे धीरे धक्के लगाने लगा जिससे डॉली और ज्यादा छटपटाने लगी।

मैं धक्के लगाते हुए ही डॉली के गालों को चूम चाट कर और हाथ से उसके बदन को सहलाकर उसे सांत्वना भी दे रहा था मगर फिर भी डॉली काफी छटपटा रही थी और मुझे रोकने की भी पूरी कोशिश कर रही थी, उसने मेरी कमर को अपनी पूरी ताकत से पकड़ रखा था ताकि मैं धक्के ना लगा सकूँ मगर फिर भी मैं धीरे धीरे धक्के लगाता रहा जिससे कुछ देर में ही मेरे लिंग ने धीरे धीरे करके उसकी संकरी बुर में अपनी जगह बना ली।

डॉली का दर्द भी अब कुछ कम होने लगा था इसलिये वो भी अब कुछ शांत पड़ने लगी थी। डॉली के थोड़ा सा शांत होने पर मैंने अपना हाथ उसके मुँह पर से हटा लिया और उसकी जगह उसके होंठों को मुँह में भरकर बन्द कर लिया, उसने अपनी गर्दन हिला कर अपने होंठों को छुड़ाने की कोशिश तो की मगर मैंने जिस हाथ से उसके मुँह को दबा रखा था, उसी हाथ से उसके सिर को पकड़ लिया और जबरदस्ती अपनी जुबान उसके होंठों के बीच घुसा दी जिससे डॉली फिर से कसमसाने लगी।

मैंने अपनी जीभ को डॉली के होंठों के बीच घुसा तो दिया था मगर दर्द के मारे उसने अपने दाँत भींच रखे थे इसलिये मेरी जीभ उसके मुँह में अन्दर नहीं जा पा रही थी, मैं भी उसके होंठों को ही चूमने चाटने लगा। कुछ देर तक मैं ऐसे ही डॉली के होंठों को चूमता चाटता रहा और साथ ही दूसरे हाथ से उसके बदन को भी सहलाता रहा जिससे धीरे धीरे करके उसका यौन तन्त्र प्रभावित होने लगा और दर्द की अवहेलना करते हुए वो फिर से उत्तेजित होने लगी।

अब वो मेरा इतना विरोध नहीं कर रही थी बस थोड़ा बहुत कसमसा ही रही थी, फिर कुछ देर बाद वो भी बन्द हो गया और उसने अपना बदन ढीला छोड़ दिया।

डॉली को भी शायद अब मजा आने लगा था क्योंकि उसकी सांसें अब गर्म व गहरी होने लगी थी और पहली बार अब वो मेरी जीभ को हल्का हल्का अपने होंठों के बीच दबाने भी लगी थी।

मैंने भी अपनी जुबान को थोड़ा जोर से उसके मुँह में दबा दिया, पहले तो डॉली थोड़ा सा कसमसाई मगर फिर धीरे से उसके दांत थोड़ा सा खुल गये और अब मेरी जुबान उसके मुँह के अन्दर तक का सफर करने लगी जिसे डॉली भी अब कभी कभी हल्का सा चूस ले रही थी।

डॉली पर भी अब उत्तेजना चढ़ने लगी थी क्योंकि डॉली के हाथ जो अभी तक मेरी कमर को पकड़े हुए थे वो मेरी पीठ पर आ गये थे और धीरे धीरे मेरी पीठ पर रेंगने रहे थे। मैंने भी अब अपने धक्कों की गति को थोड़ा सा बढ़ा दिया जिससे डॉली के मुँह से हल्की हल्की कराह फ़ूटने लगी, डॉली के नितम्ब भी अब हल्की हल्की हरकत करने लगे थे।

डॉली ने अपनी टांगें उठाकर मेरे पैरों पर रख ली और मेरे साथ साथ वो भी अपनी कमर को धीरे धीरे हिलाने लगी थी। डॉली अब पूरी तरह से उत्तेजित हो गई थी इसलिये धीरे धीरे मैंने भी अपने धक्कों का माप बढ़ा दिया क्योंकि मेरा आधे से ज्यादा लिंग डॉली की बुर में था मगर अब भी एक चौथाई बाहर ही था इसलिये प्रत्येक धक्के के साथ धीरे धीरे मैं उसे भी अन्दर घुसाने लगा, हर बार मेरा लिंग पूरा बाहर आता और पूरे वेग से अन्दर प्रविष्ट होने लगा, हर प्रहार में पिछली बार के मुकाबले ज़्यादा अन्दर जा रहा था और मेरे हर धक्के के साथ डॉली उऊऊ… हूहूहूहू… उऊऊ… हूहूहूहूहू… कर रही थी।

वैसे तो इतनी देर में मेरा लिंग डॉली की बुर में पूर्णतया घर कर गया होता पर डॉली की नई नवेली बुर बहुत अधिक तंग थी जो मेरे लिंग को कुछ ज्यादा ही घर्षण प्रदान कर रही थी, मगर उस समय मुझे जो मजा मिल रहा था उस आनन्द की कोई चरम सीमा नहीं थी।

डॉली भी अब खुलकर मेरा साथ दे रही थी, उसकी टांगें जो मेरे पैरों पर थी वो अब मेरी कमर पर आ गई थी, उसने अपनी टांगों से मेरी कमर को घेर लिया और मेरे लिंग की ताल पर वो भी अपनी कमर को जोर जोर से हिला कर मुँह से अद्भुत आवाजें निकालने लगीं।

डॉली की सांसें काफी तेज हो गई थी और अब तो वो मेरे होंठों व जुबान को भी जोर से चूस चाट रही थी। डॉली का साथ पाकर मैंने भी अपना पौरुष दिखाने के लिये अपनी गति बढ़ा दी और तेजी से धक्के लगाने लगा।

मेरे साथ साथ डॉली भी अब तेजी से अपने कूल्हे उचका रही थी, एक निश्चित लय और ताल के साथ हम दोनों ही धक्कमपेल कर रहे थे जैसे हम दोनों में कोई होड़ लगी हो।

डॉली के मुँह को मैंने अपनी जुबान व होंठों से बन्द कर रखा था मगर फिर भी वो उहऊऊ… उहऊऊ… उहऊऊ… उहऊऊ… करके जोर से कुहक रही थी जिससे पूरा कमरा गुँज रहा था।

बाहर बारिश से मौसम सर्द हो गया था मगर फिर भी हम दोनों के शरीर पसीने से भीग गये और सांसें फ़ूल गई थी, ऐसा लग रहा था जैसे कोई तूफान आ गया हो।

अब मेरा आत्म नियंत्रण अपनी सीमा के समीप पहुँच रहा था क्योंकि बहुत देर से मैंने अपने आप को संभाला हुआ था, मगर अपने स्खलन के पहले मैं डॉली को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाना चाहता था इसलिये तेजी से धक्के लगाते हुए मैं अपने दोनों हाथों से उसके संवेदनशील अंगों को भी रगड़ने मसलने लगा।

मैं अपने दोनों हाथ डॉली के चूतड़ों पर ले आया और उन्हें कूल्हों के नीचे घुसाकर डॉली को थोड़ा सा ऊपर उठा लिया, अब तेजी से धक्के लगाते हुए मैं डॉली के कूल्हों को भी मसल रहा था, साथ ही नीचे से उसके गुदा द्वार को भी उंगलियों से सहलाने लगा।

अब तो डॉली जैसे पागल ही हो गई, मेरे साथ जोरों से अपने कूल्हे उचकाते हुए वो मेरी जीभ व होंठों को नोचने काटने लगी और फिर कुछ ही देर में अचानक से डॉली का शरीर थरथरा गया, डॉली बड़ी जोर से इईईई…श्शशश… अअआआ… ह्हहाहाँ… इईईई… श्शशश…

अअआआ… ह्हहाहाँहाँ… इईईई… श्शशश… की किलकारियां मारते हुए किसी बेल की तरह मुझसे लिपट गई, उसका जिस्म अकड़ उठा और उसकी बुर से एक धारा सी फूटी जिसने मेरे लिंग को नहला दिया।

कुछ देर तक डॉली ऐसे ही मुझसे लिपटी रही और फिर धम्म से बिस्तर पर गिर गई जैसे वह मूर्छित हो गई हो।

मेरा लिंग डॉली के बुर रस से गीला होकर और भी चपल हो गया और अब बुर के अन्दर बाहर आसानी से फिसलने लगा। डॉली के कामोन्माद को देख कर मेरा नियंत्रण भी टूट गया और तीन चार संपूर्ण वार के साथ ही मैंने भी मोक्ष की प्राप्ति कर ली।

एक आह के साथ मैंने अपनी कामनाएं डॉली की बुर में ही उड़ेल दी और फिर थक कर खुद भी उस पर गिर गया।

काफी देर तक हम दोनों ऐसे ही पड़े रहे फिर धीरे धीरे डॉली में हल्की सी चेतना आई, उसने दोनों हाथों से धकेल कर मुझे अपने ऊपर से नीचे गिरा दिया और उठ कर बिस्तर पर बैठ गई।

मैं समझ गया कि डॉली को अब क्या चाहिए, अन्धेरे में कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा था फिर भी धीरे धीरे हाथों की सहायता से मैं अलमारी तक पहुंचा और टॉर्च निकाल कर जला ली।

टॉर्च की रोशनी होते ही डॉली जल्दी से अपने हाथ पैर समेट कर बैठ गई मगर फिर भी उसकी हालत स्पष्ट नजर आ रही थी, उसकी दोनों जांघें खून से लथपथ थी और बिस्तर पर भी काफी खून गिरा हुआ था।

खैर टॉर्च की सहायता से मैंने डॉली के कपड़े तलाश कर उसे दिये, डॉली ने कपड़े तो ले लिये मगर फिर भी वो ऐसे ही बैठी रही और मैंने जब पूछा तो उसने कुछ बताया तो नहीं मगर मेरे हाथ से टॉर्च लेकर उसे बन्द करके रख दिया और फिर जल्दी जल्दी कपड़े पहनने लगी।

मैं समझ गया कि डॉली कपड़े क्यों नहीं पहन रही थी, वो नंगी थी इसलिये शर्मा रही थी।

डॉली को नंगी देखने के लिये मैंने एक बार फिर से टॉर्च जला दी और टॉर्च की रोशनी को सीधा डॉली की जांघों पर ही डाला, डॉली ने बस पेंटी पहनी थी और सलवार पहन ही रही थी, टोर्च के जलते ही डॉली जल्दी से नीचे बैठ गई, उसने फिर मेरे हाथ से टॉर्च छीन कर बन्द कर दी और फिर जल्दी से कपड़े पहनकर बाहर चली गई।

डॉली के जाने के बाद मैं भी सो गया।

इसके बाद तो डॉली जब तक हमारे घर में रही तब तक मैंने काफी बार सम्बन्ध बनाये। पहले तो एक दो बार उसने मना किया मगर फिर वो खुद ही मौका पाकर मेरे पास आ जाती थी और इसमे मेरी भाभी ने हमारा बहुत साथ दिया।

मेरा व डॉली का रिश्ता इतना गहरा हो गया था कि डॉली जब वापस गाँव जाने लगी तो जोर से रो पड़ी, हालत तो मेरी भी कुछ ऐसी ही थी मगर…
 
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