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जालिम है बेटा तेरा

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हॉस्पिटल में बैठी सुनीता के साथ साथ फातिमा , राजू, और अनीता चुप थे।

सुनीता की हालत तो समझ में ही नहीं आ रही थी दीवार के सहारे अपना सर टिकाए लगातार उपर ताक रही थी..... उसे सोनू के बचपन के दिन याद आ गए... वो सोचने लगी कि एक बच्चे के लिए मै पूरी पांच साल तड़पती रही कहा कहा नहीं गई मंदिरों में हर जगह और जब भगवान ने मुझे एक बच्चा दिया तो मुझे उसकी कद्र ही नहीं.... यही सोचते सोचते उसकी आंखे भर आती है......

सुगंधा को बहुत जोरों से पेशाब लगी हुई थी वह अपने आप पर बहुत ज्यादा संयम रखने की कोशिश कर रही थी लेकिन u उसके लिए इस समय मोचना बेहद आवश्यक हो चुका था। क्योंकि ज्यादा देर तक वह अपनी पेशाब को रोक नहीं पा रही थी पेट में दर्द सा महसूस होने लगा था। सुगंधा खाट पर से उठी और कुछ देर तक इधर-उधर चहल कदमी करते हुए अपने पेशाब को रोकने की कोशिश करने लगी लेकिन कोई भी इंसान ज्यादा देर तक पेशाब को रोक नहीं सकता था इसलिए सुगंधा को भी मुतना बेहद जरूरी था। इसलिए वह ना चाहते हुए भी अंगूर की डालियों के नीचे से होकर धीरे-धीरे पेशाब करने के लिए जाने लगी और एक जगह पर पहुंच कर वह इधर उधर नजरे दौरा कर देखने की कोशिश करने लगी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है लेकिन उस अंगूर के बागान में दूसरा कोई नजर नहीं आ रहा था सुगंधा जहां पर खड़ी थी वहां पर कुछ ज्यादा ही झाड़ियां थी और वहां पर किसी की नजर पड़ने की आशंका बिल्कुल भी नहीं थी और वहीं पास में ही एक छोटी सी झुग्गी बनी हुई थी।

दूसरी तरफ रोहन हेड पंप के पास पहुंचकर वही पर रखे बर्तन में पानी भरने लगा और खुद भी पानी से हाथ मुंह धो कर अपने आप को ठंडा करने की कोशिश करने लगा जब वह वहां से चलने को हुआ तभी उसकी आंखों के सामने से एक खरगोश का बच्चा भागता हुआ नजर आया और रोहन उसके पीछे पीछे जाने लगा रोहन उसे पकड़ना चाहता था उसके साथ खेलना चाहता था इसलिए जहां जहां खरगोश जा रहा था रोहन उसके पीछे पीछे चला जा रहा था।

दूसरी तरफ से सुगंधा अपने चारों तरफ नजर दौड़ा कर संपूर्ण रूप से निश्चिंत होने के बाद धीरे-धीरे अपनी सारी ऊपर की तरफ उठाने लगी और ऐसा करते हुए वह बार-बार अपने चारों तरफ देख ले रही थी लेकिन चारों तरफ सिर्फ सन्नाटा ही नजर आ रहा था लेकिन उसे इस बात का डर भी लगा था कि कहीं रोहन उसे ढूंढता हुआ यहां तक ना पहुंच जाए इसलिए वह इससे पहले पेशाब कर लेना चाहती थी वैसे भी पेशाब की तीव्रता उसके पेट में ऐठन दे रही थी सुगंधा धीरे-धीरे अपनी साड़ी को कमर तक उठा दी यह नजारा बेहद ही कामुकता से भरा हुआ था लेकिन इस नजारे को देखने वाला वहां कोई नहीं था धीरे-धीरे सुगंधा पूरी तरह से अपनी कमर तक अपनी साड़ी को उठा दी थी उसकी नंगी चिकनी मोटी मोटी जांगे पीली धूप में स्वर्ण की तरह चमक रही थी बेहद खूबसूरत और मादकता से भरा हुआ यह नजारा देखने वाला वहां कोई नहीं था और वैसे भी सुगंधा यही चाहती थी कि कोई उसे इस अवस्था में ना देख ले सुगंधा साड़ी को अपनी कमर तक उठा कर एक हाथ से अपनी पीली रंग की पैंटी को नीचे की तरफ सरकाने लगी धीरे धीरे सुगंधा अपनी पैंटी को अपनी मोटी चिकनी जांघों तक नीचे कर दी और तुरंत नीचे बैठ गई मुतने के लिए।

 
दूसरी तरफ रोहन लड़कपन दिखाते हुए खरगोश के पीछे पीछे भागता चला जा रहा था और तभी खरगोश उसकी आंखों के सामने एक घनी झाड़ियों के अंदर चला गया रोहन उस खरगोश को पकड़ लेना चाहता था इसलिए दबे पांव वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा उसके सामने घनी झाड़ियां थी। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था उसे मालूम था कि इसी झाड़ियों के अंदर खरगोश दुबक कर बैठा हुआ है इसलिए वह घनी झाड़ियों के करीब पहुंचकर धीरे धीरे पत्तों को हटाने लगा लेकिन उसे खरगोश नजर नहीं आ रहा था वह अपनी चारों तरफ नजर दौड़ाने लगा लेकिन वहां खरगोश का नामोनिशान नहीं था वह निराश होने लगा वह समझ गया कि खरगोश भाग गया है और अब उसके हाथ में नहीं आने वाला लेकिन फिर भी अपने मन में चल रही इस उथल-पुथल को अंतिम रूप देते हुए वह अपने मन की तसल्ली के लिए अपना एक कदम आगे बढ़ाकर घनी झाड़ियों को अपने दोनों हाथों से हटाकर देखने की कोशिश करने लगा लेकिन फिर भी परिणाम शून्य ही आया वह उदास हो गया वह अपने दोनों हाथों को झाड़ियों पर से हटाने ही वाला था कि उसकी नजर थोड़ी दूर की घनी झाड़ियों के करीब गई और वहां का नजारा देखकर एकदम सन्न रह गया।

रोहन को एक बार फिर से अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि उसकी आंखों के सामने उसकी मां की बड़ी बड़ी नंगी गांड थी उसका दिमाग काम करना बंद है कर दिया क्योंकि मैं जा रहा है उसके सामने इतना गरमा गरम था कि उसकी सोचने समझने की शक्ति ही खत्म होने लगी थोड़ी देर में उसे इस बात का अहसास हो गया कि उसकी मां वहां पर बैठकर मुत रही थी।

रोहन बार-बार अपनी आंखों को मलता हुआ उस नजारे की हकीकत को समझने की कोशिश कर रहा था।

उसे अपनी किस्मत पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हो रहा था कि अब तक तो अपनी मां को नंगी देख चुका था लेकिन उसे बिल्कुल भी विश्वास नहीं हो रहा था कि वह अपनी मां को अपनी आंखों से पेशाब करता हुआ देख रहा है। रोहन के मुंह में पानी आने लगा उसकी लार टपकने लगी खुशी अपनी किस्मत पर नाज होने लगा क्योंकि कुछ दिनों से उसकी किस्मत उसके पक्ष में चल रही थी जो वह सोचता था उसकी आंखों के सामने वैसा ही होता जा रहा था इस समय रोहन की आंखों के सामने उसकी मां की बड़ी-बड़ी गोरी गांड थी। जिसे सुगंधा हल्के से उठाए हुए थे और सुगंधा की इस हरकत का उसके बेटे पर बुरा असर पड़ रहा था पलभर में ही उसका लंड पजामे के अंदर तन कर लोहे के रोड की तरह हो गया था। जिसे रोहन अपने हाथों से मसलने लगा था सुगंधा की गुलाबी पुर के गुलाबी छेद में से पेशाब की धार बड़ी तेजी से निकल रही थी जिसकी वजह से उसमें से एक सीटी सी बजने लगी थी और इस समय सुगंधा की बुर से निकल रही सीटी की आवाज रोहन के लिए किसी बांसुरी के मधुर धुन से कम नहीं थी रोहन उस मादकता से भरे नजारे और बुर से आ रही है मधुर धुन में खोने लगा सुगंधा अपनी तरफ से पूरी एहतियात बरतते हुए अपनी चारों तरफ देख ले रही थी लेकिन अपने पीछे नजर नहीं बढ़ा पा रही थी वह इस बात से पूरी तरह से निश्चिंत थी कि उसे इस समय पेशाब करते हुए कोई नहीं देख रहा है लेकिन इस बात से अनजान थी कि उसका ही बेटा झाड़ियों के पीछे से चुपके से खड़ा होकर उसे पेशाब करते हुए देख रहा था। थोड़ी देर में सुगंधा पेशाब कर ली लेकिन उठते उठते वह अपनी गुलाबी पुर की गुलाबी पतियों में से पेशाब की बूंद को गिराते हुए हल्के हल्के अपने नितंबों को झटकने लगी।

लेकिन सुगंधा की यह हरकत बेहद ही कामुकता से भरी हुई थी क्योंकि रोहन खुद अपनी मां की इस हरकत को देखकर एकदम से चुदवासा हो गया था और जोर से अपने लंड को मसलने लगा था।

सुगंधा पेशाब करके खड़ी हो गई और एक हाथ से अपनी पीली रंग की पैंटी को ऊपर चढ़ाने लगी रोहन तो यह नजारा देखकर एकदम कामुकता से भर गया थोड़ी ही देर में सुगंधा अपनी साड़ी को नीचे गिरा दी और अपने कपड़े ठीक कर के जाने को हुई ही थी कि झुग्गी मैं से आ रही खिलखिला ने की आवाज सुनकर उसके कदम रुक गए वह एक पल के लिए झुग्गी की तरफ देखने लगी। तुरंत उसकी आंखों में चमक आ गई उसे वह दिन याद आ गया जब वह गेहूं की कटाई वाले दिन खेतों में आई थी और इसी तरह से झुग्गी मैं से आ रही हसने की आवाज सुनकर उत्सुकतावस अंदर झांकने की कोशिश की थी और अंदर का नजारा देखकर एकदम से सन में रह गई थी। उसे उस समय इस बात का बिल्कुल भी यकीन नहीं था कि झुग्गी के अंदर उनके खेतों में काम कर रहा मजदूर किसी औरत के साथ चुदाई का खेल खेल रहा है और आज ठीक उसी तरह की आवाज सुनकर एक बार फिर से सुगंधा का दिल जोरो से धड़कने लगा।

दूसरी तरफ रोहन अपनी मां को देखते हुए अपने लंड को मसल रहा था लेकिन उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां आखिर वापस जाते जाते वहीं रुक क्यों गई उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और वह उन्हीं झाड़ियों के पीछे छुप कर देखने लगा

 
सुनीता एक दम से बेसुध अपने बेटे के बारे में ही सोच रही थी कि तभी उसे किसी ने झिंघोडा वो तुरंत ही सकपका कर उठ गई,

राजू-- चाची बहुत देर हो गई है.... आप घर जाओ मैं यहां हॉस्पिटल में हूं भईया के साथ,

पारुल--- हा सुनीता जी , राजू ठीक क रहा है,, आप घर जाओ और वैसे भी आप ज्यादा टेंशन लोगे तो आप की भी तबियत बिगड़ जाएगी.....।

सुनीता... को तो जैसे कुछ होश ही नहीं था वो तो जैसे सोनू को छोड़ के जाने वाले बात पर ही मुंह उधर कर ली...।

सुनीता-- नहीं मै कहीं नहीं जाऊंगी अपने बेटे को छोड़ कर...।

पारुल-- देखिए सुनीता जी आप बेवजह परेशान हो रही हैं। सोनू एकदम ठीक हैं, और वैसे भी हॉस्पिटल में राजू हैं ना....।

पारुल की बात सुनकर वहां पर खड़ी फातिमा, और अनीता भी ज़ोर देने लगी ।

आखिरकार सुनीता को घर आने के लिए मानना ही पड़ा.... सुनीता अनीता और फातिमा के साथ घर लौट आईं......।

रात के करीब 8 बज गए थे.... सुनसान रास्ते पर सुनीता के साथ अनीता और फातिमा चली आ रही थी।

फातिमा (अनीता से)-- अनीता ये सब कैसे हुआ?

अनीता ने भी फातिमा से पूरी आप बीती सुना डाली.....।

ये सुन फातिमा का चेहरा गुस्से में लाल हो गया हालांकि रात के अंधेरे में फातिमा का चेहरा ना तो सुनीता देख सकती थी और ना ही अनीता....।

सुनीता (गुस्से में)-- जब चुदाने की उसके गांड़ में ताकत नहीं थी तो क्यूं चूद्वाने गई थी साली और तू सुनीता अपने ही बेटे को... छी। कैसी मा हैं तू, भला इसमें सोनू की क्या गलती हैं....।

ये सुन सुनीता रोने लगती है.....।

सुनीता (रोते हुए)-- हा री.... फातिमा ... लेकिन मै क्या करती उस वक़्त मुझे कुछ सूझा नहीं और मैंने ये सब अनजाने में..... और फिर उसकी मूसलाधार आंसुओ कि बारिश होने लगती है....।

फातिमा और अनीता ने सुनीता को संभाला और घर पर ले आई....।

घर पर जैसे ही वो तीनो पहुंचते है .... कस्तूरी अपनी गांड़ टेढ़ किए हुए चल कर आती है..... उसे देख कर ही लग रहा था कि कस्तूरी की गांड़ बड़ी बेरहमी से सोनू ने मारी है। क्युकी उसकी चाल एकदम से बदल गई थी।

कस्तूरी--- .... कैसा है सोनू बेटा?

फातिमा गुस्से में जैसे ही कुछ बोलने जा रही थी कि सुनीता ने फातिमा का हाथ पकड़ लिया और बोली।

सुनीता-- अब ठीक है।

ये सुन कस्तूरी के भी जान में जान आती है....।

कस्तूरी--- हे भगवान तेरा लाख लाख शुक्र है.... जो सोनू सही सलामत है.... वरना मै अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाती।

उस रात सुनीता ने बेमन से खाना खाया वो भी फातिमा के इतना कहने पर.... और फिर जैसे तैसे रात काटने के इंतजार में सुनीता खाट पर लेट गई.... नींद तो उसके आंखो से कोषों दूर था, वो तो बस सुबह का इंतज़ार कर रही थी और भगवान से इतना ही प्रार्थना कर रही थी कि मेरा बेटा मुझसे रूठे ना..... खैर जैसे तैसे पूरी रात काट ली सुनीता ने एक झपकी भी नहीं ली सुनीता ने पूरी रात.... सुबह के ६ बज रहे थे।

सुनीता फाटक से खाट पर से उठी और अनीता को जागते हुए....।

सुनीता-- अनीता.... ऐ अनीता।

अनीता नींद से जागती हुई अपनी आंखे खोलते है....।

अनीता-- अरे दीदी क्या हुआ?

सुनीता-- चल हॉस्पिटल चलना है.... मुझे।

अनीता-- हा दीदी वो तो ठीक है.... कुछ खाना पीना भी तो बना कर ले चलना है.... हॉस्पिटल में राजू और सोनू क्या खाएंगे?

सुनीता-- हा... हा तूने सही कहा चल उठ खाना बनाते हैं.....।

सुनीता , अनीता के साथ फटाफट खाना तैयार करती है दिन अब ८ बज गए थे.... इतनी कड़ाके की ठंडी कोहरे की चादर ओढ़े ओश की बूंदे बनकर टपक रही थी.... हालत खराब कर देने वाली थी ये ठंडी।

सुनीता और अनीता कम्बल ओढ़े अस्पताल की तरफ निकल पड़ते है....।

 
रास्ते में अनीता-- कितनी कड़ाके की ठंडी हैं दीदी, जान ना निकल जाए ऐसी ठंडी में।

सुनीता-- अरे, अनीता जान तो मेरी तब निकाल जाएगी जब मेरा बेटा अगर मुझे देख कर नजरअंदाज करने लगेगा।

अनीता-- अरे दीदी आप भी ना.... ऐसा कुछ नहीं होगा भला एक बेटा अपनी मां से कब तक नाराज़ rahega।

सुनीता-- भगवान करे तेरी बात सच निकले.... क्युकी कल से ही मेरी ममता उजड़ती हुई दिख रही है.... अगर कहीं ऐसा हुआ ना की मेरा बेटा मुझसे अगर नाराज़ रहेगा तो मैं तो जहर खा लूंगी।

अनीता--- तुम भी कैसी बात कर रही हो दीदी ऐसा कुछ नहीं होगा.... सब फिर पहले जैसा हो जाएगा....।

और यही कहते हुए वो दोनो रास्तों पर तेजी से चलने लगते है.....।

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सुबह सुबह.... कल्लू उठा तो देखा उसकी मां मालती अभी भी उसके बगल में नंगी लेटी थी.... क्युकी रात भर कल्लू ने मालती की जम कर चुड़ाईई की थी....।

मालती की बड़ी बड़ी चूचियां देख एकबार फिर से कल्लू की लंड में खून की लहर दौड़ती है..... और उसके हाथ सीधा मालती की बड़ी बड़ी चूचियों पर कसते

और इधर मालती भी जैसे ही उसके चूचियों पर कुछ महसूस होता है उसकी आंख खुल जाती है....।

मालती--- आह.... बेशरम। रात भर तो किया अभी मन नहीं भरा तेरा।

कल्लू-- तू चाहती है कि मेरा मन तुझसे भर जाए.... और फिर उसने मालती की चूचियों को कस कर दबा दिया।

मालती--- आ..... नहीं.. रे लेकिन अभी रात भर आई... अम्मा.... तो फाड़ दिया चोद चोद कर।

कल्लू-- तेरी तो मै ऐसे ही फादुंगा.... और जब मन करेगा तब चोदूंगा साली...।

मालती--- आ... मै मना कहा... आ... कर रही हूं, लेकिन थोड़ा आ..... नहीं... नहीं... बेटा दर्द हो... रहा है....।

ये मालती की जो चिखे थी , कल्लू ने अब तक अपना लन्ड उसकी बूर में पेल चुका था और उछल उछाल कर मालती को चोद रहा था।

कल्लू--- साली मुझे पता है, तुझे कोई दर्द वर्द्द नहीं होता.... तू सिर्फ नाटक करती है... ले madarchod अपने बेटे का लंड कूतिया.... फाड़ डालूंगा तेरी बूर चोद चोद कर...।

मालती भी खेली खाई हुई औरत..... दे , बेटा और अन्दर दे अपना लंड मेरी बूर... अा.... ह... चोद दे... बड़ा मज़ा आता है.... जब खुद का बेटा .... आह वहीं बूर में लंड पेले जिसमें से वो निकला है.... आह बेटा... चोद दे जोर जोर से चोद बेटा।

ऐसी बाते सुन कर कल्लू का तो जैसे खून ही गरम हो गया और वो ऐसे झटके देने लगा की मालती की बूर से फाच्च फाच फच की आवाज़ से पूरा कमरा गूंजने लगा....।

कल्लू--- कुति या..... सली तेरी बूर को चोद चोद कर इसका बड़ा भोसड़ा ना बना दिया तो मै असली madarchod nahi सल ई..... गया मै.....।

मालती...- हा ... हा मै भी गई।

और फिर कल्लू का एक जोर का धक्का फिर दोनों जन्नत की सैर करके वापस ज़मीन पर अा गिरते है.... और हाफ्ते हुए एक दूसरे से लिपटे रहते है.....

थोड़ा समय बीतने के बाद........

मालती--- उठिए जनाब.... घर का पूरा काम बचा हैं.... आपको तो सिर्फ चोदना है मुझे दिन रात..... काम तो पूरा मै करू।

कल्लू कुछ बोलता इससे पहले ही उसे बाहर किसी ने आवाज़ दी...।

कल्लू अरे वो कल्लू........।

कल्लू और मालती हड़बड़ आहत में उठ कर अपने कपड़े पहनते हैं और फिर घर का दरवाज़ा खोलते हैं.....।

कल्लू--- अरे, पप्पू तू क्या हुआ...।

पप्पू कल्लू का दोस्त है जो उसके साथ कपड़े विपदे धोने का काम करता है.....

पप्पू-- अरे तेरे लिए खुसखबरी लाया हूं...।

कल्लू-- कैसी खुस्खबरी जल्दी बता...?

पप्पू--- अरे तेरा दुश्मन... जो कभी तेरा जिग्री यार था।

कल्लू-- कौन सोनू?

पप्पू--- हा सोनू।

कल्लू-- क्या बात है बोल?

पप्पू-- बात क्या है.... पड़ा है अस्पताल में....।

ये सुन मालती और कल्लू दोनों की हालत खराब हो जाती हैं....।

 
कल्लू--- के.. क्या हुआ उसे?

पप्पू-- अरे कुछ भी हो... है तो तेरे लिए खुशी की बात ना....।

कल्लू को इतना सुनना था कि वो गुस्से में लाल एक जोर का तमाचा पप्पू के गाल पे जड़ देता है और अपनी साइकिल उठा कर अस्पताल की तरफ चल देता है.........

इधर सुनिता अनिता के साथ अस्पताल पहुचं चुकी थी, वो सिधा सोनू के वार्ड में जाती जहां सोनू के पास पहले से ही पारूल बैठी उससे बात कर रही थी।

पारुल-- अरे सुनीता जी इतनी सुबह सुबह आ गयी आप?

सुनीता-- जी डाक्टर साहीबा, वो खाना ले कर आना था ना इसलीये।

पारुल-- अच्छा कीया, क्यूकीं सोनू का दवा खाने का टाइम भी हो गया।

सुनीता खाने का डीब्बा खोल कर सोनू को दे देती है, सोनू अपनी मुडीं निचे कीये खाना खाने लगता है, अनीता राजू को खाना देने वार्ड से बाहर राजू के पास थी और पारुर पेशेंट को देखने दुसरे वार्ड में चली जाती है।

सोनू चुपचाप खाना खा रहा था और सुनीता उसके बगल में बैठी उसे निहारे जा रही थी......

सुनीता-- वो.....मुझे लगा तुम्हे आलू के पराठे बहुत पसदं है तो आज यही बना कर लायी......अब पता नही ठीक से बना भी है या नही।

सुनिता अनायास ही ऐसे बोली जबकी खाने में आलू का पराठा था ही नही...

सोनू-- पता नही लोग मुझे चुतीया क्यूं समझते है, शायद मैं हू इसलिये।

सुनीता-- क.....कौन समझता है तुम्हे चुतीया?

सोनू-- अभी तो तू ही समझ रही है।

सुनीता-- हाय रे दइया...भला मैं क्यूं तुम्हे चुतीया समझने लगी?

सोनू-- आलू का पराठा कहां है खाने में दीखा मुझे...अब तू चुतीया नही तो क्या समझ रही है मुझे?

सुनिता-- वो....तो मैं ऐसे ही बोल दीया क्यूंकी तुम मुझसे बात नही कर रहे थे।

सोनू-- क्यूं मैं तेरा मरद हूं क्या जो तुझसे बात करु।

सुनीता-- क्यू क्या एक औरत से उसका मरद ही रुठता है क्या बेटा भी तो रुठ जाता है, तो मनाना तो पड़ता ही है ना..।

सोनू कुछ नही बोलता और चुपचाप खाना खाता है.....

सुनीता-- मुझे पता है मैने गलती की है...और मैने जानबुझ कर नही कीया वो थोड़ा गुस्से में हो गया।

सोनू कुछ नही बोलता और चुपचाप खाना खाता है....खाना खतम कर सोनू वापस बेड पर लेट जाता है तभी पारुल आ जाती है...

पारुल--अरे सोनू पहले दवा खा लो फीर आराम से सोना।

सोनू दवा खाता है और फीर बेड पर लेट जाता है।

सुनीता-- डाक्टर साहीबा सोनू को घर कब ले जा सकते है...

पारुल-- सुनीता जी वैसे तो सोनू अब ठीक है, लेकीन आज यही रहने दो कल सुबह डीसचार्ज कर दुगीं॥

सुनीता-- ठीक है डाक्टर साहीबा...अरे लेकीन आज तो सरपंच के यहा उनकी तेरही है आप नही गयी भोज में॥

पारूल-- अरे सुनीता जी कार्यक्रम तो शाम को है तो शाम को जाउगीं॥

सुनीता-- जी डाक्टर साहीबा.......

अब तक सोनू आराम से सो चुका था। उसका भोला चेहरा देखते हुए सुनीता ने मन ही मन कहा हे भगवान तेरा लाख लाख शुक्र है जो मेरा बेटा मुझसे नाराज नही है.....और फीर वार्ड से बाहर चली जाती है क्यूकीं सोनू सो चूका था......।

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