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रुक्मिणी ने निर्मला से त्यौरियां बदलकर कहा- क्या नंगे पांव ही मदरसे जाएेगा?
निर्मला ने बच्ची के बाल गूंथते हुए कहा- मैं क्या करुं? मेरे पास रुपये नहीं हैं।
रुक्मिणी- गहने बनवाने को रुपये जुड़ते हैं, लड़के के जूतों के लिए रुपयों में आग लग जाती है। दो तो चले ही गये, क्या तीसरे को भी रुला-रुलाकर मार डालने का इरादा है?
निर्मला ने एक सांस खींचकर कहा- जिसको जीना है, जियेगा, जिसको मरना है, मरेगा। मैं किसी को मारने-जिलाने नहीं जाती।
आजकल एक-न-एक बात पर निर्मला और रुक्मिणी में रोज ही झड़प हो जाती थी। जब से गहने चोरी गये हैं, निर्मला का स्वभाव बिलकुल बदल गया है। वह एक-एक कौड़ी दांत से पकड़ने लगी है। सियाराम रोते-रोते चहे जान दे दे, मगर उसे मिठाई के लिए पैसे नहीं मिलते और यह बर्ताव कुछ सियाराम ही के साथ नहीं है, निर्मला स्वयं अपनी जरुरतों को टालती रहती है। धोती जब तक फटकनर तार-तार न हो जाएे, नयी धोती नहीं आती। महीनों सिर का तेल नहीं मंगाया जाता। पान खाने का उसे शौक था, कई-कई दिन तक पानदान खाली पड़ा रहता है, यहां तक कि बच्ची के लिए दूध भी नहीं आता। नन्हे से शिशु का भविष्य विराट् रुप धारण करके उसके विचार-क्षेत्र पर मंडराता रहता ।
मुंशीजी ने अपने को सम्पूर्णतया निर्मला के हाथों मे सौंप दिया है। उसके किसी काम में दखल नहीं देते। न जाने क्यों उससे कुछ दबे रहते हैं। वह अब बिना नागा कचहरी जाते हैं। इतनी मेहनत उन्होंने जवानी में भी न की थी। आंखें खराब हो गयी हैं, डॉक्टर सिन्हा ने रात को लिखने-पढ़ने की मुमुनियत कर दी है, पाचनशक्ति पहले ही दुर्बल थी, अब और भी खराब हो गयी है, दमें की शिकायत भी पैदा ही चली है, पर बेचारे सबेरे से आधी-आधी रात तक काम करते हैं। काम करने को जी चाहे या न चाहे, तबीयत अच्छी हो या न हो, काम करना ही पड़ता है। निर्मला को उन पर जरा भी दया आती। वही भविष्य की भीषण चिन्ता उसके आन्तरिक सद्भावों को सर्वनाश कर रही है। किसी भिक्षुक की आवाज सुनकर झल्ला पड़ती है। वह एक कोड़ी भी खर्च करना नहीं चाहती ।
एक दिन निर्मला ने सियाराम को घी लाने के लिए बाजार भेजा। भूंगी पर उनका विश्वास न था, उससे अब कोई सौदा न मांगती थी। सियाराम में काट-कपट की आदत न थी। औने-पौने करना न जानता था। प्राय: बाजार का सारा काम उसी को करना पड़ता। निर्मला एक-एक चीज को तोलती, जरा भी कोई चीज तोल में कम पड़ती, तो उसे लौटा देती। सियाराम का बहुत-सा समय इसी लौट-फेरी में बीत जाता था। बाजार वाले उसे जल्दी कोई सौदा न देते। आज भी वही नौबत आयी। सियाराम अपने विचार से बहुत अच्छा घी, कई दूकारन से देखकर लाया, लेकिन निर्मला ने उसे सूंघते ही कहा- घी खराब है, लौटा आओ।
सियाराम ने झुंझलाकर कहा- इससे अच्छा घी बाजार में नहीं है, मैं सारी दूकाने देखकर लाया हूं?
निर्मला- तो मैं झूठ कहती हूं?
सियाराम- यह मैं नहीं कहता, लेकिन बनिया अब घी वापिस न लेगा। उसने मुझसे कहा था, जिस तरह देखना चाहो, यहीं देखो, माल तुम्हारे सामने है। बोहिनी-बट्टे के वक्त में सौदा वापस न लूंगा। मैंने सूंघकर, चखकर लिया। अब किस मुंह से लौटने जाऊ?
निर्मला ने दांत पीसकर कहा- घी में साफ चरबी मिली हुई है और तुम कहते हो, घी अच्छा है। मैं इसे रसोई में न ले जाऊंगी, तुम्हारा जी चाहे लौटा दो, चाहे खा जाओ।
घी की हांड़ी वहीं छोड़कर निर्मला घर में चली गयी। सियाराम क्रोध और क्षोभ से कातर हो उठा। वह कौन मुंह लेकर लौटाने जाएे? बनिया साफ कह देगा- मैं नहीं लौटाता। तब वह क्या करेगा? आस-पास के दस-पांच बनिये और सड़क पर चलने वाले आदमी खाड़े हो जाएेंगे। उन सबों के सामने उसे लज्जित होना पड़ेगा। बाजार में यों ही कोई बनिया उसे जल्दी सौदा नहीं देता, वह किसी दूकान पर खड़ा होने नहीं पाता। चारों ओर से उसी पर लताड़ पड़ेगी। उसने मन-ही-मन झुंझलाकर कहा- पड़ा रहे घी, मैं लौटाने न जाऊंगा।
मातृ-हीन बालक के समान दुखी, दीन-प्राणी संसार में दूसरा नहीं होता और सारे दु:ख भूल जाते हैं। बालक को माता याद आयी, अम्मां होती, तो क्या आज मुझे यह सब सहना पड़ता? भैया चले गये, मैं ही अकेला यह विपत्ति सहने के लिए क्यों बचा रहा? सियाराम की आंखों में आंसू की झड़ी लग गयी। उसके शोक कातर कण्ठ से एक गहरे नि:श्वास के साथ मिले हुए ये शब्द निकल आये- अम्मां! तुम मुझे भूल क्यों गयीं, क्यों नहीं बुला लेतीं?
सहसा निर्मला फिर कमरे की तरफ आयी। उसने समझा था, सियाराम चला गया होगा। उसे बैठा देखा, तो गुस्से से बोली- तुम अभी तक बैठे ही हो? आखिर खाना कब बनेगा?
सियाराम ने आंखें पोंड डालीं। बोला- मुझे स्कूल जाने में देर हो जाएेगी।
निर्मला- एक दिन देर हो जाएेगी तो कौन हरज है? यह भी तो घर ही का काम है?
सियाराम- रोज तो यही धन्धा लगा रहता है। कभी वक्त पर स्कूल नहीं पहुंचता। घर पर भी पढ़ने का वक्त नहीं मिलता। कोई सौदा दो-चार बार लौटाये बिना नहीं जाता। डांट तो मुझ पर पड़ती है, शर्मिंदा तो मुझे होना पड़ता है, आपको क्या?
निर्मला- हां, मुझे क्या? मैं तो तुम्हारी दुश्मन ठहरी! अपना होता, तब तो उसे दु:ख होता। मैं तो ईश्वर से मानाया करती हूं कि तुम पढ़-लिख न सको। मुझमें सारी बुराइयां-ही-बुराइयां हैं, तुम्हारा कोई कसूर नहीं। विमाता का नाम ही बुरा होता है। अपनी मां विष भी खिलाये, तो अमृत हैं; मैं अमृत भी पिलाऊं, तो विष हो जाएेगा। तुम लोगों के कारण में मिट्टी में मिल गयी, रोते-रोत उम्र काटी जाती है, मालूम ही न हुआ कि भगवान ने किसलिए जन्म दिया था और तुम्हारी समझ में मैं विहार कर रही हूं। तुम्हें सताने में मुझे बड़ा मजा आता है। भगवान् भी नहीं पूछते कि सारी विपत्ति का अन्त हो जाता।
यह कहते-कहते निर्मला की आंखें भर आयी। अन्दर चली गयी। सियाराम उसको रोते देखकर सहम उठा। ग्लानिक तो नहीं आयी; पर शंका हुई कि ने जाने कौन-सा दण्ड मिले। चुपके से हांड़ी उठा ली और घी लौटाने चला, इस तरह जैसे कोई कुत्ता किसी नये गांव में जाता है। उसे देखकर साधारण बुद्वि का मनुष्य भी आनुमान कर सकता था कि वह अनाथ है।
सियाराम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता था, आनेवाले संग्राम के भय से उसकी हृदय-गति बढ़ती जाती थी। उसने निश्चय किया-बनिये ने घी न लौटाया, तो वह घी वहीं छोड़कर चला आयेगा। झख मारकर बनिया आप ही बुलायेगा। बनिये को डांटने के लिए भी उसने शब्द सोच लिए। वह कहेगा- क्यों साहूजी, आंखों में धूल झोंकते हो? दिखाते हो चोखा माल और और देते ही रद्दी माल? पर यह निश्चय करने पर भी उसके पैर आगे बहुत धीरे-धीरे उठते थे। वह यह न चाहता था, बनिया उसे आता हुआ देखे, वह अकस्मात् ही उसके सामने पहुंच जाना चाहता था। इसलिए वह चक्कार काटकर दूसरी गली से बनिये की दूकान पर गया।
बनिये ने उसे देखते ही कहा- हमने कह दिया था कि हमे सौदा वापस न लेंगे। बोलों, कहा था कि नहीं।
सियाराम ने बिगड़कर कहा- तुमने वह घी कहां दिया, जो दिखाया था? दिखाया एक माल, दिया दूसरा माल, लौटाओगे कैसे नहीं? क्या कुछ राहजनी है?
साह- इससे चोखा घी बाजार में निकल आये तो जरीबाना दूं। उठा लो हांड़ी और दो-चार दूकार देख आओ।
सियाराम- हमें इतनी फुर्सत नहीं है। अपना घी लौटा लो।
साह- घी न लौटेगा।
बनिये की दुकान पर एक जटाधारी साधू बैठा हुआ यह तमाश देख रहा था। उठकर सियाराम के पास आया और हांड़ी का घी सूंघकर बोला- बच्चा, घी तो बहुत अच्छा मालूम होता है।
साह सने शह पाकर कहा- बाबाजी हम लोग तो आप ही इनको घटिया माल नहीं देते। खराब माल क्या जाने-सुने ग्राहकों को दिया जाता है?
साधु- घी ले जाव बच्चा, बहुत अच्छा है।
सियाराम रो पड़ा। घी को बुरा सिद्वा करने के लिए उसके पास अब क्या प्रमाण था? बोला- वही तो कहती हैं, घी अच्छा नहीं है, लौटा आओ। मैं तो कहता था कि घी अच्छा है।
साधु- कौन कहता है?
साह- इसकी अम्मां कहती होंगी। कोई सौदा उनके मन ही नहीं भाता।
बेचारे लड़के को बार-बार दौड़ाया करती है। सौतेली मां है न! अपनी मां हो तो कुछ ख्याल भी करे।
साधु ने सियराम को सदय नेत्रों से देखा, मानो उसे त्राण देने के लिए उनका हृदय विकल हो रहा है। तब करुण स्वर से बोले- तुम्हारी माता का स्वर्गवास हुए कितने दिन हुए बच्च?
सियाराम- छठा साल है।
निर्मला ने बच्ची के बाल गूंथते हुए कहा- मैं क्या करुं? मेरे पास रुपये नहीं हैं।
रुक्मिणी- गहने बनवाने को रुपये जुड़ते हैं, लड़के के जूतों के लिए रुपयों में आग लग जाती है। दो तो चले ही गये, क्या तीसरे को भी रुला-रुलाकर मार डालने का इरादा है?
निर्मला ने एक सांस खींचकर कहा- जिसको जीना है, जियेगा, जिसको मरना है, मरेगा। मैं किसी को मारने-जिलाने नहीं जाती।
आजकल एक-न-एक बात पर निर्मला और रुक्मिणी में रोज ही झड़प हो जाती थी। जब से गहने चोरी गये हैं, निर्मला का स्वभाव बिलकुल बदल गया है। वह एक-एक कौड़ी दांत से पकड़ने लगी है। सियाराम रोते-रोते चहे जान दे दे, मगर उसे मिठाई के लिए पैसे नहीं मिलते और यह बर्ताव कुछ सियाराम ही के साथ नहीं है, निर्मला स्वयं अपनी जरुरतों को टालती रहती है। धोती जब तक फटकनर तार-तार न हो जाएे, नयी धोती नहीं आती। महीनों सिर का तेल नहीं मंगाया जाता। पान खाने का उसे शौक था, कई-कई दिन तक पानदान खाली पड़ा रहता है, यहां तक कि बच्ची के लिए दूध भी नहीं आता। नन्हे से शिशु का भविष्य विराट् रुप धारण करके उसके विचार-क्षेत्र पर मंडराता रहता ।
मुंशीजी ने अपने को सम्पूर्णतया निर्मला के हाथों मे सौंप दिया है। उसके किसी काम में दखल नहीं देते। न जाने क्यों उससे कुछ दबे रहते हैं। वह अब बिना नागा कचहरी जाते हैं। इतनी मेहनत उन्होंने जवानी में भी न की थी। आंखें खराब हो गयी हैं, डॉक्टर सिन्हा ने रात को लिखने-पढ़ने की मुमुनियत कर दी है, पाचनशक्ति पहले ही दुर्बल थी, अब और भी खराब हो गयी है, दमें की शिकायत भी पैदा ही चली है, पर बेचारे सबेरे से आधी-आधी रात तक काम करते हैं। काम करने को जी चाहे या न चाहे, तबीयत अच्छी हो या न हो, काम करना ही पड़ता है। निर्मला को उन पर जरा भी दया आती। वही भविष्य की भीषण चिन्ता उसके आन्तरिक सद्भावों को सर्वनाश कर रही है। किसी भिक्षुक की आवाज सुनकर झल्ला पड़ती है। वह एक कोड़ी भी खर्च करना नहीं चाहती ।
एक दिन निर्मला ने सियाराम को घी लाने के लिए बाजार भेजा। भूंगी पर उनका विश्वास न था, उससे अब कोई सौदा न मांगती थी। सियाराम में काट-कपट की आदत न थी। औने-पौने करना न जानता था। प्राय: बाजार का सारा काम उसी को करना पड़ता। निर्मला एक-एक चीज को तोलती, जरा भी कोई चीज तोल में कम पड़ती, तो उसे लौटा देती। सियाराम का बहुत-सा समय इसी लौट-फेरी में बीत जाता था। बाजार वाले उसे जल्दी कोई सौदा न देते। आज भी वही नौबत आयी। सियाराम अपने विचार से बहुत अच्छा घी, कई दूकारन से देखकर लाया, लेकिन निर्मला ने उसे सूंघते ही कहा- घी खराब है, लौटा आओ।
सियाराम ने झुंझलाकर कहा- इससे अच्छा घी बाजार में नहीं है, मैं सारी दूकाने देखकर लाया हूं?
निर्मला- तो मैं झूठ कहती हूं?
सियाराम- यह मैं नहीं कहता, लेकिन बनिया अब घी वापिस न लेगा। उसने मुझसे कहा था, जिस तरह देखना चाहो, यहीं देखो, माल तुम्हारे सामने है। बोहिनी-बट्टे के वक्त में सौदा वापस न लूंगा। मैंने सूंघकर, चखकर लिया। अब किस मुंह से लौटने जाऊ?
निर्मला ने दांत पीसकर कहा- घी में साफ चरबी मिली हुई है और तुम कहते हो, घी अच्छा है। मैं इसे रसोई में न ले जाऊंगी, तुम्हारा जी चाहे लौटा दो, चाहे खा जाओ।
घी की हांड़ी वहीं छोड़कर निर्मला घर में चली गयी। सियाराम क्रोध और क्षोभ से कातर हो उठा। वह कौन मुंह लेकर लौटाने जाएे? बनिया साफ कह देगा- मैं नहीं लौटाता। तब वह क्या करेगा? आस-पास के दस-पांच बनिये और सड़क पर चलने वाले आदमी खाड़े हो जाएेंगे। उन सबों के सामने उसे लज्जित होना पड़ेगा। बाजार में यों ही कोई बनिया उसे जल्दी सौदा नहीं देता, वह किसी दूकान पर खड़ा होने नहीं पाता। चारों ओर से उसी पर लताड़ पड़ेगी। उसने मन-ही-मन झुंझलाकर कहा- पड़ा रहे घी, मैं लौटाने न जाऊंगा।
मातृ-हीन बालक के समान दुखी, दीन-प्राणी संसार में दूसरा नहीं होता और सारे दु:ख भूल जाते हैं। बालक को माता याद आयी, अम्मां होती, तो क्या आज मुझे यह सब सहना पड़ता? भैया चले गये, मैं ही अकेला यह विपत्ति सहने के लिए क्यों बचा रहा? सियाराम की आंखों में आंसू की झड़ी लग गयी। उसके शोक कातर कण्ठ से एक गहरे नि:श्वास के साथ मिले हुए ये शब्द निकल आये- अम्मां! तुम मुझे भूल क्यों गयीं, क्यों नहीं बुला लेतीं?
सहसा निर्मला फिर कमरे की तरफ आयी। उसने समझा था, सियाराम चला गया होगा। उसे बैठा देखा, तो गुस्से से बोली- तुम अभी तक बैठे ही हो? आखिर खाना कब बनेगा?
सियाराम ने आंखें पोंड डालीं। बोला- मुझे स्कूल जाने में देर हो जाएेगी।
निर्मला- एक दिन देर हो जाएेगी तो कौन हरज है? यह भी तो घर ही का काम है?
सियाराम- रोज तो यही धन्धा लगा रहता है। कभी वक्त पर स्कूल नहीं पहुंचता। घर पर भी पढ़ने का वक्त नहीं मिलता। कोई सौदा दो-चार बार लौटाये बिना नहीं जाता। डांट तो मुझ पर पड़ती है, शर्मिंदा तो मुझे होना पड़ता है, आपको क्या?
निर्मला- हां, मुझे क्या? मैं तो तुम्हारी दुश्मन ठहरी! अपना होता, तब तो उसे दु:ख होता। मैं तो ईश्वर से मानाया करती हूं कि तुम पढ़-लिख न सको। मुझमें सारी बुराइयां-ही-बुराइयां हैं, तुम्हारा कोई कसूर नहीं। विमाता का नाम ही बुरा होता है। अपनी मां विष भी खिलाये, तो अमृत हैं; मैं अमृत भी पिलाऊं, तो विष हो जाएेगा। तुम लोगों के कारण में मिट्टी में मिल गयी, रोते-रोत उम्र काटी जाती है, मालूम ही न हुआ कि भगवान ने किसलिए जन्म दिया था और तुम्हारी समझ में मैं विहार कर रही हूं। तुम्हें सताने में मुझे बड़ा मजा आता है। भगवान् भी नहीं पूछते कि सारी विपत्ति का अन्त हो जाता।
यह कहते-कहते निर्मला की आंखें भर आयी। अन्दर चली गयी। सियाराम उसको रोते देखकर सहम उठा। ग्लानिक तो नहीं आयी; पर शंका हुई कि ने जाने कौन-सा दण्ड मिले। चुपके से हांड़ी उठा ली और घी लौटाने चला, इस तरह जैसे कोई कुत्ता किसी नये गांव में जाता है। उसे देखकर साधारण बुद्वि का मनुष्य भी आनुमान कर सकता था कि वह अनाथ है।
सियाराम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता था, आनेवाले संग्राम के भय से उसकी हृदय-गति बढ़ती जाती थी। उसने निश्चय किया-बनिये ने घी न लौटाया, तो वह घी वहीं छोड़कर चला आयेगा। झख मारकर बनिया आप ही बुलायेगा। बनिये को डांटने के लिए भी उसने शब्द सोच लिए। वह कहेगा- क्यों साहूजी, आंखों में धूल झोंकते हो? दिखाते हो चोखा माल और और देते ही रद्दी माल? पर यह निश्चय करने पर भी उसके पैर आगे बहुत धीरे-धीरे उठते थे। वह यह न चाहता था, बनिया उसे आता हुआ देखे, वह अकस्मात् ही उसके सामने पहुंच जाना चाहता था। इसलिए वह चक्कार काटकर दूसरी गली से बनिये की दूकान पर गया।
बनिये ने उसे देखते ही कहा- हमने कह दिया था कि हमे सौदा वापस न लेंगे। बोलों, कहा था कि नहीं।
सियाराम ने बिगड़कर कहा- तुमने वह घी कहां दिया, जो दिखाया था? दिखाया एक माल, दिया दूसरा माल, लौटाओगे कैसे नहीं? क्या कुछ राहजनी है?
साह- इससे चोखा घी बाजार में निकल आये तो जरीबाना दूं। उठा लो हांड़ी और दो-चार दूकार देख आओ।
सियाराम- हमें इतनी फुर्सत नहीं है। अपना घी लौटा लो।
साह- घी न लौटेगा।
बनिये की दुकान पर एक जटाधारी साधू बैठा हुआ यह तमाश देख रहा था। उठकर सियाराम के पास आया और हांड़ी का घी सूंघकर बोला- बच्चा, घी तो बहुत अच्छा मालूम होता है।
साह सने शह पाकर कहा- बाबाजी हम लोग तो आप ही इनको घटिया माल नहीं देते। खराब माल क्या जाने-सुने ग्राहकों को दिया जाता है?
साधु- घी ले जाव बच्चा, बहुत अच्छा है।
सियाराम रो पड़ा। घी को बुरा सिद्वा करने के लिए उसके पास अब क्या प्रमाण था? बोला- वही तो कहती हैं, घी अच्छा नहीं है, लौटा आओ। मैं तो कहता था कि घी अच्छा है।
साधु- कौन कहता है?
साह- इसकी अम्मां कहती होंगी। कोई सौदा उनके मन ही नहीं भाता।
बेचारे लड़के को बार-बार दौड़ाया करती है। सौतेली मां है न! अपनी मां हो तो कुछ ख्याल भी करे।
साधु ने सियराम को सदय नेत्रों से देखा, मानो उसे त्राण देने के लिए उनका हृदय विकल हो रहा है। तब करुण स्वर से बोले- तुम्हारी माता का स्वर्गवास हुए कितने दिन हुए बच्च?
सियाराम- छठा साल है।