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मजा पहली होली का, ससुराल में complete

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साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
अगले दिन पनघट पे जब मैने जिकर किया तो मेरी क्या ब्याही अन ब्याही ननदों और जेठानीयों की सासें रुकी रह गयी.

एक ननद बेला बोली, अरे भौजी आप मौका चूक गयी. फागुन भी था और रंगीला देवर का रिशता भी आपकी अच्छी होली की शुरुआत हो जाती.” फिर तो ..एक्दम खूल के एक ननद बोली,जो सब्से ज्यादा चालू थी गांव में, अरे क्या लंड है उसका भाभी एक बार ले लोगी तो..

.चंपा भाभी ( जो मेरी जेठानीयों में सबसे बड़ी लगती थीं और जिन्का ‘खुल के गाली देने में हर ननद पानी मांग लेती, दीर्घ स्तना, ४०डी साइज के चूतड) बोली हां हां ये एक दम सही कह रही है, ये इसके पहले बिना कुत्ते से चुदवाये इसे नींद नहीं आती थी लेकिन एक बार इसने जो सुनील से चुदवा लिया तो फिर उसके बाद कुत्तों से चुदवाने की आदत छूट गयी. बेचारी ननद वो कुछ बोलती उसके पहले ही वो बोलीं और भूल गयी, जब सुनील से गांड मरवायी थी सबसे पहले तो मैं ही ले के गयी थी मोची के पास ..सिलवाने.

तब तक हे भौजी की आवाज ने मेरा ध्यान खींचा, सुनील ही था अपने दो तीन दोस्तों के साथ मुझे होली खेलने के लिये नीचे बुला रह था.

मैने हाथ के इशारे से उसे मना किया. दरवाजा बंद था इस लिये वो तो अंदर आ नहीं सकता था. लेकिन मन तो मेरा भी कर रहा था, उसने उंगली के इशारे से चूत और लंड बना के चुदाई का निशान बनाया तो उसकी बहन गुडिया का नाम लेके मैंने एक गंदी सी गाली दी और साडी सुखाने के बहाने आंचल ठूलका के उसे अपने जोबन का दरसन भी करा दिया. अब तो उस बेचारे की हालत और खराब हो गयी. दो दिन पहले जब वह फिर मुझे खेतों के बीच मिला था तो अबकी उसने सिर्फ हाथ ही नहीं पकड़ा बल्कि सीधे बाहों में भर लिया था उर खींच के गन्ने के खेत के बीच में ...छेड़ता रहा मुझे, “अरे भौजी तोहरी कोठरिया हम झाडब, अरे आगे से झाडब, पीछे से झाडब, उखियों में झाडब रहरियो में झाडब, अरे तोहरी कुठरिया..”

अखिर जब मैने वायदा कर लिया की होली के दिन दूंगी सच मुच में एक दम मना नहीं करूंगी तो वो जाके माना. जब उसने नीचे से बहोत इशारे किये तो मैने कहा की अपने दोस्तों को टाओ तो बाहर आउंगी होली खेलने. वो मान गया. मैं नीचे उतर के पीछे के दरवाजे से बाहर । निकली. मैने अपने दोनो हाथों में गाढा पेंट लगाया और कमर में रंगों का पैकेट खोंसा.

सामने से वो इशारे कर रहा था. दोनो हाथ पीछे किये मैं बढी. तब तक पीछे से उसके दोनो दोस्तों ने, जो दीवाल के साथ छिप के खडे थे, मुझे पीछे से आके पकड़ लिया. मैं । छटपटाती रही. वो दोनो हाथों में रंगपोत के मेरे सामने आके खड़ा हो गया और बोला, क्यों डाल दिया जाय की छोड़ दिया जाय बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाय.

मैं बड़ी अदा से बोली, तुम तीन हो ना तभी...छोडो तो बताती हूं. जैसे ही उसके इशारे पे उसके साथियों ने मुझे छोडा, होली है कह के कस के उसके गालों पे रंग मल दिया.

अच्छा बताता हूं, और फिर उसने मेरे गुलाबी गालों को जम के रगड़ रगड के रंग लगाया. मुझे पकड के खींचते हुये वो पास के गन्ने के खेत में ले गया और बोली असली होली तो अब होगी. हां मंजूर है।

लेकिन एक एक करके पहले अपने दोस्तों को तो हटाओ. उसके इशारे पे वो पास मेंही कहीं बैटः गये. पहले ब्लाउज के उपर से और फिर कब बटन गये कब मेरा साडी उपर सरक गयी ...थोड़ी देर में ही मेरी गोरी रसीली जांघे पूरी तरह फैली थीं, टांगें उसके कंधे पे और वो अंदर. मैं मान गयी की जो चंपा भाभी मेरी ननद को चिढ़ा रही थीं वो ठीक ही रहा होगा. उसका मोटा कडा सुपाडा जब रगड के अंदर जाता तो सिसकी निकल जाती. वो किसी कुत्ते की गांठ से कम मोटा नहीं लग रहा था. और क्या धमक के धक्के मार रहा था, हर चोट सीधे बच्चे दानी पे. साथ में उसके रंग लगे हाथ मेरी मोटी मोटी चूचीयों पे कस

के रंग भी लगा रहे थे. पहली बार मैं इस तरह गन्ने के खेत में चुद रही थी मेरे चूतड कस कस के मिट्टी पे, मिट्टी के बडे बडे ढेलों से रगड़ रहे थे. लेकिन बहोत मजा आ रहा था और साथ में मैं उसके बहन का नाम ले ले के और गालियां भी दे रही थी,

 
* चोद साले चोद, अरे गुडीया के यार, बहन के भंडुये, देखती हूं उस साल्ली मेरी छिनाल ननद एन क्या कया सिखाया, उस चूत मरानो के खसम, तेरी बहन की बुर में...गदहे का लंड जाय” वो ताव में आके और कस कस के चोद रहा था. हम दोनों जब झडे तो मैने देखा की बगल में उसके दोनो दोस्त, “ भौजी हम भी...”

मैं कौन होती थी मना करने वाली, लेकिन उन दोनो ने मैने जो सुना था की गांव में कीचड़ की होली होती है, उसका मजा दे दिया. बगल में एक गड्ढे में कीचड था वहां से लाके कीचड पोता मुझे. मैं क्यों छोडती अपने देवरों को. मैने भी कुछ अपने बदन का कीचड रगड के उनकी देह पे लगाया, कुछ उनके हाथ से छीन के. फिर उन सबने मिल के मेरी डोली बना के कीचड में ही ले जा के पटक दिया. एक साथ मुझे मड रेस्लिंग का भी मजा मिला और चुदाइ का.

थोड़ी देर वो उपर था और फिर मैं उपर हो गयी और खूद उसे कीचड में गिरा गिरा के रगड़ के चोदा. बस गनीमत थी की उनके दिमाग में मुझे सैंडविच बनाने की आईडिया नहीं आयी इस लिये मेरी गांड बच गयी. उन सब से निपटने के बाद मैने साडी ब्लाउज फिर से पहना और खेत से बाहर निकली.

मैं घर की ओर मुड़ रही ही थी की कुछ का झुंड मिल गया. वो मुझे ले के चंपा भाभी के घर पहुंची जहां गांव भर की औरतें इक्ट्ठा होतीं थी और होली का जम के हुडदंग होता था. क्या हंगामा था. मेरे साथ जो औरतें पहुंची पहले तो बाकी सब ने मिल के उन के कपडेफाडे. मेरे साथ गनीमत ये थी की चंपा भाभी ने मुझे अपने आसरे ले लिया था और मेरे आने से वो बहोत खुश थीं. एक से एक गंदे गाने, कबीर जोगीडा...जो अब तक मैं सोचती सिर्फ आदमी ही गाते हैं, एक ने मुझे पकड़ा और गाने लगी

दिन में निकले सूरज और रात में निकले चंदा..

अरे हमरे यार ने... किसकी पकड़ी चूची और किसको चोदा.

.अरे हमरे यार ने..

भाभी की चूची पकडी ओ संगीता को चोदा..अरे कबीरा..सा...रा..रा..

चंपा भाभी ने सब को भांग मिली ठंडाई पिलाई थी इस लिये सब की सब खूब नशे में थीं. उन्होने कन्डोम में गुलाल भर भर के ढेर सारे डिल्डो भी बना रखे थे और चार पांच मुझे। भी दिये. तब तक एक ननद ने मुझे पीछे से पकडा,( वो भी शादी शुदा थी और जो स्थान भाभीयों में चंपा भाभी का था वही ननदों में उनका था). मुझे पकड के पटकते हुए वो । बोलीं, चल देख तुझे बताती हूँ होली की चुदाइ कैसे होती है. उनके हाथ में एक खूब लंबा और मोटा, निरोध में मोमबत्ती डाल के बनाया हुआ डिल्डो था.

तब तक चंपा भाभी ने मुझे इशारा किया और मैंने उन्हे उल्टे पटक दिया. उधर चंपा भाभी ने उनके हाथ से डिल्डो छीन के मुझे थमा दिया, और बोलीं, लगता है नन्दोइ अब ठंडे पड गये हैं जो तुम्हे इससे काम चलाना पड़ रहा है. अरे ननद रानी हम लोगों से मजे ले लो ना, फिर मुझे इशारा किया की जरा ननद रानी को मजा तो चखा दे.

मैं सिक्स्टी नाइन की पोज में उनके उपर चड गयी और पहले अपनी चूत फिर गांड सीधे उनके मुंह पे रख के कस के एक बार में ही ६ इंच डिल्डो सीधे पेल दिया, वो बिल बिलाती रही गोंगों करती रही लेकिन मैं कस कस के अपनी गांड उनके मुंह पे रगड के बोलती रही, “अरे ननद रानी जरा भौजी का स्वाद तो चख लो तब मैं तुम्हारे इस कुत्ते गधे के लंड की आदी भोंसडे की भूख मिटाती हूँ.”

चम्पा भाभी ने गुलाल भरा एक डिल्डौ ले के सीधे उनकी गांड में ठेल दिया.

वहां से निकल के चंपा भाभी के साथ और लडकियों के यहां गये. उनकी संगत में मैं पूरी तरह ट्रेन हो गयी. सुनील की बहन गुडीया मिली तो चंपा भाभी के इशारे पे मैने उसे धर दबोचा. वो अभी कच्ची कली थी ९ वें पढ़ती थी. लेकिन तब फ्राक के अंदर हाथ डाल के उसकी उठ रही चूचीयों को, कस कस के रगडा और चड्ढी में हाथ डाल के उस की चूत में भी जम के तब तक उंगली की जब तक वो झड नहीं गयी.

 
यहां तक की मैने उस से खूब गंदी गंदी गालियां भी दिलवायीं, उस के भाई सुनील के नाम भी. कोई लड़की, औरत बच नहीं पा रही थी. एक ने जरा ज्यादा नखड़ा किया तो भाभी ने उसका ब्लाउज खोल के पेड पे फेंक दिया और आगे पीछे दोनों ओर गुलाल भरे कंडोम जड तक डाल के छोड दिया और बोलीं, जा के अपने भाई से निकलवाना. और जिन जिन की हम रगडाई करते थे, वो हमारे ग्रुप में ज्वाइन हो जाती थीं और दूने जोश से जो अगली बार पकड़ में आती थी उसकी दुरगत करती थीं यहां तक की भाभी लड़कों को भी नहीं बख्सती थीं.

एक छोटा । लडका पकड में आया तो मुझसे बोलीं, खोल दे इस साल्ले का पाजामा. मैं जरा सा झिझकी तो बोलीं, अरे तेरा देवर लगेगा जरा देख अभी नूनी है की लंड हो गया. चेक कर के बता इस ने अभी गांड मरवानी शुरु की नहीं वरना तू ही नथ उतार दे साल्ले की. वो बेचारा भागने लगा लेकिन हम लोगों की पकड से कहां बच सकता था. मैने आराम से उसके पजामे का नाडा खोला, और लंड में टट्टे में खूब जम के तो रंग लगाया ही उसकी गांड में उंगली भी की और गुलाल भरे कंडोम से गांड भी मार के बोला, जा जा अपने बहन से चटवा के साफ करवा लेना. कई कई बार लड़कों का झुंद एक दो को पकड भी। लेता या वो खुद कट लेतीं और मजे ले के वापस. तीन चार बार तो मैं भी पकड़ी गयी और कई बार मैं खुद.

तिजहरिया के समय तक होली खेल के सब वापस लौट रहीं थी.चंपा भाभी और कई औरतें अपने घर रास्ते में रुक गयीं. हम लोग दो तीन ही बचे थे की रास्ते में एक मर्दो का झुंड दिखा, शराब के नशे में चूर, शायद दूसरे गांव के थे. एक तो हम लोग कम रह गये थे, दूसरा उनका भाव देख के हम डर के तितर बितर हो गये. थोडी देर में मैने देखा तो मैं अब गांव के एक दम बाहरी हिस्से में आ गयी थी. मुख्य बस्ती से थोडा दूर, चारो ओर गन्ने और अरहर के खेत और बगीचे थे. तभी मैने देखा की वहां एक कुआ और घर है. उसे पहचान के मेरी हिम्मत बढ गयी, वो मेरी कहाइन कुसमा का घर था. और उसका मरद कल्लू कूये पे पानी भर रहा था.

कुसुमा गांव में मेरी अकेली देवरानी लगती थी. उसकी शादी मेरी शादी के दो तींन । महीनेबाद ही हुयी थी. गोरी छुयी मुयी सी, छूरहरी लेकिन बहोत ताकत थी उसमें , छातियां छोती छोटी, लेकिन बहोत सख्त, पतली कमर भरे भरे चूतड. लेकिन मरद का हाथ लगते ही वो एक दम गदरा गई. कहते हैं की मरद का रस सोखने के बाद ही औरत की असली जवानी चढती है. घर में वो काम करती थी, नहाने के लिये पानी लाने से देह दबाने तक. पानी बाहर कुये पे उसका मरद भरता था और अंदर वो लाती थी. हम दोनों की लगभग साथ ही शादी हुयी थी इस लिये दोस्ती भी हो गयी थी. रोज तेल लगवाते समय मैं उसे छेड छेड के रात की कहानी पूछती, पहले कुछ दिन तो शर्मायी लेकिन्मैने सब उगलवा ही लिया. रात भर चढा रहता है वो वो बोली. मैने हंस के कहा हे मेरे देवर को कुछ मत कहना मेरी देवरानी का जोबन ही ऐसा है. क्यों दो बार किया या तीन बार. मेरी जांघे दबाती बोली,

अरे दो तीण की बात ही नहीं झडने के बाद वो बाहर ही नहीं निकालता मुआ, थोडी देर में फिर डंडे ऐसा और फिर चोदना चालू, कभी चार बार तो कभी पांच बार और घर में और कोयी तो है नहीं न पास पडोसी इस लिये जब चाहे तब दिन दहाडे भी. सुन के मैं गिन गिना गयी. उस को माला डी भी मैने ही दी. एक बार वो आंगन में मुझे नहला रही थी. मैने उसे छेडा, अरे अपने मर्द से बोल ना, एक बार उसके असली पानी से नहाउंगी. तो वो हंस के बोली, हां ठीक है मैं बोल दंगी, लेकिन वो सरमाता बहोत है.ठसके से वो बोली.

अरे मेरा देवर लगता है मेरा हक है क्या रोज रोज सिर्फ देवरानी को ही...और क्या फागुन लग गया हैपीठ मलते वो बोली. एक दम और उसको ये भी बोल देना इस होली में ना, तुम मेरी अकेली देवरानी हो परे गांव में तो मैं और भले सबको छोड़ दें, लेकिन उसको नहीं । छोडने वाली. सच में, उसने पूछा. एक दम साडी पहनते मैं बोली.सच बात तो ये थी की मैने उसे कई बार कुंये पे पानी भरते देखा था. था तो वो आबनूस जैसा, लेकिन क्या गठा बदन था, एक एक मसल नजर फिसल जाती थी. ताकत छलकती थी और उपर से जो कुसुमा ने उसके बारे में कहा की वो कैसे जबरदस्त चोदता था. मैं एक दम पास पहुंच, एक पेड की आड़ में खड़े होके देख रही थी.

लेकिन...लग रहा था जैसे होली उन लोगों के घर को बचा के निकल गयी. जहां चारो ओर फाग की धूम मची थी वहीं, उसके देह पे रंग के एक बूंद का भी निशान नहीं था. चारो और रंगों की बरसात और यहां एक दम सूखा. होली में तो कोई भेद भाव नहीं होता, कोयी छोटा बड़ा नहीं...लेकिन, मुझे बुरा तो बहोत लग पर मैं समझ गयी. फिर मैने दोनों हाथों में खूब गाढा लाल पेंट लगाया और पीछे हाथ छिपा के ...उसके सामने जा के खडी हो गयी और पूछा,

* क्यों लाला अभी से नहा धो के साफ वाफ हो के...”

“ नहीं भौजी अभी तो नहाने जा ही रहा था...” वो बोला.

* तो फिर होली के दिन इतने चिक्कन मुक्कन कैसे बचे हो रंग नहीं लगवाया...”

* रंग...होली ...हमसे कौन होली खेलेगा, कौन रंग लगायेगा...

* औरों का तो मुझे नहीं पता लेकिन ये तेरी भौजी आज तुझे बिना रंग लगाये नहीं छोड़ने वाली.” दोनो हाथों में लाल पेंट मैने कस के रगड़ रगड़ के उसके चेहरे पे लगा दिया.

 
मैं उससे अब एक दम सट के खडी थी. सिर्फ धोती में उसकी एक मसल्स साफ साफ दिख रही थीं, पूरी मर्दानगी की मूरत हो जैसे.

लेकिन वो अब भी झिझक रहा था.

मैने बचा हुआ पेंट उसकी छाती पे लगा के, उसके निपल्स को कस के पिंच कर दिया और चिढाते हुए बोली, “ देवरानी तो बहोत तारीफ काती है तुम्हारी. तो सिर्फ लगवाओगे ही या लगाओगे भी.

• भौजी, कहां लगाउं...” अब पहली बार मुस्करा के मेरी देह की ओर देखता वो बोला.

मैने भी अपनी देह की ओर देखा, सच में पहले तो मेरी सास, ननद ऐर फिर जो कुछ नन्दोई और ननद ने मिल के लगाया था, फिर सुनील और दोस्तों ने जिस तरह कीचड़ में रगड़ा था उसके बाद चंपा भाभी के यहां...मेरी देह का कोयी हिस्सा बचा नहीं था.

एक मिनट रुको...मैं बोली और फिर पेड के पीछे जा के मैने सब कुछ उतार के सिर्फ साडी लपेट ली, अपने स्तनों को कस के उसी में बांध के...गों और पेंट की झोली, कुये के पास रख दी और कुये पे जा के बैठ के बोली, रोज तो तुम्हारे निकाले पानी से नहाती थी. आज अपने हाथ से पानी निकालो और मुझे नहलाओ भी भी धुलाओ भी. थोड़ी ही देर में पानी की धार से मेरा सारा रंग वंघ धुल गया. पतली गुलाबी साडी अच्छी तरह देह से चिपक गयी थी. गदराये जोबन के उभार, यहां तक की मेरे इरेक्ट निपल्स एक दम साफ साफ झलक रहे थे. दोनो जांघे फैला के मैं बोली, अरे देवर जी जरा यहां भी तो डालो, साडी पाने आप सरक के मेरी जांघों के उपरी हिस्से तक सरक गयी थी. पूरे डोल भर पानी उसने सीधे वहीं डाला और अब मेरी चूत की फांक तक झलक रही थी. जवान मर्द और वो

भी इतना तगडा...धोती के अंदर अब उसका भी खूटा तन गया था.

* क्यों हो गयी न अब डालने के लायक, सीना उभार कर मैने पूछा...” और उस का । इंतजार किये बिना रंग उसके चेहरे छाती हर जगह लगाने लगी. अब वो भी जोश में आ गया था. कस कस के मेरे गाल पे चेहरे पे और जो भी रंग उस के देह पे मैं लगाती वो रगड़ रगड़ के मेरी देह पे...साडी के उपर से ही कस कस के मेरे रसीले जोबन पे भी...

लेकिन अभी भी उसका हाथ मेरी साड़ी के अंदर नहीं जा रहा था.

“अरे सारी होली बाहर ही खेल लोगे तुम दोनों अंदर ले आओ भौजी को.” अंदर से निकल के कुसुमा बोली. और वो मुझे गोद में उठा के अंदर आंगन में ले आया . कुसुमा ने दरवाजा बंद अक्र दिया. उसके बाद तो...

पूरे आंगन में रंग बरसने लगा,हर पेड टेसू का हो गया. बस लग रहा था की सारा गांव नगर छोड के फागुन यहीं आ गया हो. कुसुमा भी हमारे साथ, कभी मेरी तरफ से कभी उसकी. उसने अपने मरद को ललकारा, हे अगर सच्चे मर्द हो तो आज भौजी को पूरी ताकत दिखा दो. मैं भी बोली हां देवर जरा मैं भी देखी तो मेरी देवरानी सही तारीफ कर ती थी या..अगर अपने बाप के होतो ...और मैने उसकी धोती खींच दी. मैने अब तक जितने देखे थे सबसे ज्यादा लंबा और मोटा...फिर वो मेरी साडी क्यों छोड़ता. उसे मैने अपने उपर खींच के कहा देवर जरा आज फागुन में भाभी को इस पिचकारी का रंग तो बरसा के दिखाओ. पल भर में वो मेरे अंदर था. चुदाई और होली साथ साथ चल रही थी. कुसुमा ने कहा जरा हम लोगों का रंग तो देख लो और एक घड़े में गोबर और कीचड़ के घोल से बना ( और भी ‘ पता नहीं क्या क्या' पडा था) डाल दिया. मैने उसके मर्द को सामने कर दिया. क्या तबड तोड चुदाइ कर रहा था. मस्त हो कर मेरी चूत भी कस कस के उसके लंड को भींच रही थी. अब जितनी भी लंड से मैं चुदी थी उनसे ये २० नहीं २२ रहा होगा. जैसे ही वो झड़ के अलग हुआ मिअने कुसुमा को धर दबोचा और अरंग लगाने के साथ निहुर कर उस एपटक के सीधे उसकी चूत कस कस के चाटने लगी और बोली देखें इस ने कितना मेरा देवर का माल घोंटा है. जैसे दो पहलवान अखाड़े में लड़ रहे हों हम दोनो कस कस के एक दूसरे की चूचीयां रगड़ रहे रंघ गोबर और कीचड़ लगा रहे थे. उधर मौका देख के वो पीछे से ही कुतिआ की तरह मुझे चोदने लगा. मैं उसे कस के हुचुक हुचुक कर कुसुमा की चूत अपनी जीभ से चोद रही थी. वो नीचे से चिल्लाइ ये तेरी भौजी छिनाल ऐसे नहीं मानेगी, हुमच के अपना लंड इस की गांड में पेल दो. मैं दर गयी पर बोली और क्या अकेले तुम्ही देवर से गांड मराने का मजा लोगी. लेकिन जैसे ही उसने गांड में मूसल पेला, दिन में तारे दिख गये. मैं भी हार मानने वाली नहीं थी. मेरी चूत खाली हो गयी थी. मैं उसे कुसुमा की झांटो भरी बुर पे रगडनी लगी. कुछ ही देर में हम लोग सिक्स्टी नाइण की पोज में ते । लेकिन वो घचाघच मेरी गांड मारे जा रहा था. हम दोनो दो दो बार झड़ चुके थे. उसने जैसे गांड से झड़ने के बाड लंड निकाला सीधे मैने मुंह में गडप कर लिया. वो लाख मना करता रहा लेकिन चाट चूट के ही मैने छोडा.

तीन बार मेरी बुर चुदी.

मैं उठने की हालत में नहीं थी. किसी तरह साडी लपेटी, ब्लाउज देह पे टांगा और घर को लौटी. शाम को फिर सूखी होली, अबीर और गुलाल की और इस बार भी इनके दोस्त, देवर कइयों ने नम्बर लगाया. और मेरा भाई बेचारा ( हालांखि उसने भी सिरफ छोटी ननद की ही नहीं बल्की दो तीन और की सीळ तोडी)मेरी ननदों ने मिल के जबरन साडी ब्लाउज पहना पूरा श्रिंगार करके लडकी बनाया और मेरे सामने ही निहुरा के...मैं सोच रही थी आज दिन भर..शायद ही कोई लडका मर्द बचा हो जिसने मेरे जोबन का रस ना लिया. सारे के सारे नदीदे ललचाते रहते थे.. होली का मौका हो नयी भौजाई हो...लेकिन मैने भी अपनी ओर से छोडा थोडे ही सबके कपडे फाडै पाजामें में हाथ डाल के नाप जोख की और अंगुली किये बिना छोड़ा नहीं कम से कम चार बार मेरी गांड मारी गयी, ७-८ बार मैने बुर में लिया होगा और मुंह में लिया वो बोनस. ननदों के साथ जो मजा लिया वो अलग. मेरी बडी ननद और जेठानी अपने बारे में बता रही थी...

 
...जेठानी बोली की वो तो हाई स्कूल में थी की उनके के जीजा ने होली में अपने दो दोस्तों के साथ...सैंडविच बनाई, कोई छेद नहीं छोड़ा और यहां पे ससुराल में सबने मिलके उनको तो उनके सगे भाई के साथ ...ननद बोली की नन्दोई जी को होली में इअर एंड केचक्कर में छुट्टी नहीं मिली तो क्लब में ही सबने दारू पी.सब इंतजाम कंपनी की ही ओर से था और फिर खूब सामुहीक ...लेकिन सबसे २० मेरी ही होली थी. मैं कुछ और बोलती की मेरी ननद बोलीं अरे भाभी ये तो खाली ट्रेलर था, जब आप मायके से लौट के आइएगा ना...यहां असली होली तो रंग पंचमी को होती है, होली के पांच दिन बाद और सिर्फ कीचड़ और ' बाकी चीजों से मुझे आंख मार के बोली. जब तक मैं कुछ बोलतीं वो बोली और आपका एक देवर तो बचा ही रह गया है,

शेरू ( उनका कुता था जिसका नाम ले ले के मेरी शादी में ननदों को खूब गालियां दी गयीं थीं). उस दिन उसके साथ भी आपका...तब तक वो आये और बोले अरे जल्दी करो तुम्हारी गाडी का समय हो गया है. मैं तैयार हूँ मैं बोली. अच्छा मै ये सोच रहा था की अगर तुम । कहो तो होली के बाद छुटकी को भी ले आते हैं. अभी तो उसकी छुट्टीयां चलेंगी, अगले साल तो उसका भी हाइस्कूल का बोर्ड हो जायेगा और तुम्हारा भी मन बहल जायेगा.( मैं तो उनकी और नन्दोई जी की बात सुन के छुटकी के बारे में उन लोगों का इरादा जान ही चुकी थी). मुस्करा के मैं बोली अरे आपकी साल्ली है जो आप कहें.

स्टेशन पहुंच के वो अचानक बोले, की अरे मैं एक जरूरी चीज लगता है भूल गया हूँ. ये साला तो हुई है. मैं अगली गाडी से या बाई रोड सुबह पहुंच जाउंगा. मैं क्या बोलती. ट्रेन छूटने का समय हो रहा था. हम लोगों का रिजर्वेशन एक फर्स्ट क्लास के केबिन में था. मुझे खराब तो बहोत लगा लेकिन क्या बोलती. मेरी हालत जान के मेरे भाई के सामने मुझे कस के चूम के वो बोले अरे मैं जल्द ही तुम्हारे पास पहुंच जाउंगा और तब तो ये साल्ला है ही तुम्हारा ख्याल रखने के लिये और उससे बोले साले अपनी बहन का खआल रखना. किसी भी हाल में मेरी कमी महसूस मत होने देना वरना लौट के तेरी गांड मार लूंगा. वो हंस के बोला नहीं जीजा जैसा आपने कहा है एक दम वैसा ही करूंगा. तब तक ट्रेन ने

सीटी दे दी और वो उतर गये.

टीटी ने टिकट चेक करने के बाद कहा की आज ट्रेन खाली ही है और अब इस केबिन में और कोई नहीं आयेगा इस लिये हम लोग दरवाजा अंदर से बंद कर लें.

फर्स्ट क्लास की चौड़ी सीट...वो बैठ गया और मैं थोड़ी देर में मैं दिन की थकी, उसके जांघो पे सर रख के लेट गयी. खिडकी खुली थी. होली का पूनो का चांद अंदर झांक रहा था , मेरे गदराये रसीले जिस्म को सहलाता...फगुनाई हवा मन में तन में मस्ती भर रही थी. मेरी कजरारी आंखे अपने आप बंद हो गयी. आंचल मेरा लुढक गया था...कसे ब्लाउज में उभरे जोबन छलक रहे थे. मैने एक दो हुक खोल दिये. आंखे बंद थी लेकिन मन की आंखे खुली थीं और दिन भर का सीन चल रहा था. मैने सोचा होली हो ली, लेकिन ननद की बात याद आयी ...ये तो अभी शुरु आत है. कल घर पे जम के होली होगी. अब हम लोगों का बदला लेने का मौका होगा, मेरी बहने, सहेलियां, भाभीयां और जैसा मैं इनको समझ गयी थी ये भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ने वाले नहीं. आगे पीछे हर ओर से....और भाभी ने बोला था की वो मुझे भी सोच सोच के सिहरन हो रही थी. फिर लौट के ससुराल में ...ननद जिस तरह से शेरू के बारे में बात कर रही थीं और ननदोई ने भी कहा था की. तब तक जैसे अनजाने में उसका हाथ पड़ गया हो...मेरे ब्लाउज के उपर उसने हाथ रख दिया. मैने भी नींद में जैसे उसका हाथ खींच के खुले ब्लाउज के अंदर सीधे उरोज पे रख दिया. मस्ती से मेरे चूचीयां पत्थर हो रही थी. उसका असर उसके उपर भी. मेरे होंठ सीधे । उसके अकड़ते तन्नाते शिश्न पे...सुबह जब मैने पहले पहल ‘उसका’ देखा था...जब वो ननदोई और उनके साथ...मेरा मन कर रहा था, उसका गप्प से मुंह में ले लें. अब फिर वही बात मेरे होंठ गीले हो रहे थे मैं हल्के हल्के पाजामे के उपर से ही उसे रगड़ रही थी. मुलायम और कडा दोनो ही लग रहा था, मेरे लंबे नाखून उसके साईड से सहला रहे थे. हल्के से मैने उसका नाडा भी खोल दिया, उधर उसने भी मेरे ब्लाउज के बचे हुए हुक खोल दिये और कचाक से मेरा जोबन ब्रा के उपर से...तब तक खट खट की आवाज हुयी. कौन हो सकता है मैने सोचा, टीटी ने टिकट तो चेक कर लिया है और वो बोल के गया था की नहीं आयेगा. आंचल से खुला हुआ ब्लाउज मैने बिना बंद किये ढक लिया और उससे बोली हे देखो कौन है.

 
मैं दंग रह गयी. वही थे.

* अरे तुम सोचती थी इत्ते मस्त माल को छोड़ के मैं होली की रात बेकार करूंगा. मैं ट्रेन चलने के साथ ही चढ़ गया था और झांक के सब देख रहा था .” वो बोले और उसके सामने ही मुझ एकस कस के चूम लिया , फिर उसके पीछे जा के खडे हो गये और उसका पाजामा सलाकते बोले,

* लगे रहो साल्ले, होली में

और फिर रात भर हम लोगों की होली होती रही.

तो आप बताये कैसे लगी ये दास्तान और लौट के मैं बतांउंगी क्या हुआ रंग पंचमी में.

samaapt

 
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