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.................................................खंड - 3
..............................................एक
वह घर जिसे राँची के प्रोफेसर राजीव सक्सेना ने रिटायर होने के बाद अपने रहने के लिए बनारस में बनवाया था और जिसे अपनी बेटी सोनल के नाम कर दिया था, वह 'अशोक विहार' में था।
बनारस में मुहल्ले थे, नगर, विहार और कालोनियाँ नहीं। इनका निर्माण शुरू हुआ 1980-1990 के आसपास जब पूर्वांचल और बिहार में भू-माफियाओं और बाहुबलियों का उदय हुआ! उन्होंने नगर के दक्खिन, पच्छिम और उत्तर बसे गाँव के गाँव खरीदे और उनकी 'प्लाटिंग' करके बेचना शुरू किया! देखते-देखते पंद्रह-बीस वर्षों के अंदर गाँव के वजूद खत्म हो गए और उनकी जगह नए-नए नामों के साथ नगर, कालोनियाँ और विहार बस गए!
यह नया बनारस था - महानगरों की तर्ज का।
मुहल्लों में रहनेवाले मुहल्लों और महलों में ही रहे - अपने पुश्तैनी काम-धंधों, दुकानों, रोजगारों और घाटों के साथ लेकिन इन कालोनियों में बसनेवाले ज्यादातर नए नागरिक थे!
ये बाहर से आए थे। आसपास के जनपदों से! जिलों से! सौ पचास किलोमीटर की दूरी से! इनके अपने गाँव थे, थोड़ी बहुत जमीन थी, खेती बारी थी। उन्हें समय-समय पर बनारस आना ही पड़ता था - कभी कोर्ट कचहरी के काम से, कभी अस्पताल के काम से, कभी तीरथ-बरत के लिए, कभी शादी ब्याह की खरीददारी के लिए, कभी बच्चों के ऐडमीशन और पढ़ाई के लिए। बार-बार आ कर लौटने से बेहतर था कि यहाँ ठहरने और रुकने का एक स्थायी ठिकाना हो, एक डेरा हो।
लेकिन ऐसा सिर्फ उन्हीं के लिए संभव था जिनके पास अपनी कोई छोटी मोटी नौकरी हो; और अगर वह नौकरी काफी न हो तो बेटों में से कम से कम एक बाहर कमा रहा हो जिसके बच्चे गाँव में बोर होते हों और वहाँ नहीं रहना चाहते, शहर के आदी हो गए हों और अपना हित उधर ही देखना चाहते हों।
हालाँकि गाँव में वह सब पहुँच रहा था धीरे धीरे, जो शहर में था - बिजली भी, नल भी, फ्रिज भी, फोन भी, टी.वी. भी, अखबार भी लेकिन वह मजा नहीं था जो शहर में था। मजा था भी तो उनके लिए जिनके पास ट्रैक्टर था, थ्रेशर था, पंपिंग सेट था, बोलेरो या सफारी थी, जो खेती पेट के लिए नहीं, व्यवसाय के लिए कर रहे थे, जो एक नहीं, एक ही साथ सभी राजनीतिक पार्टियों के हमदर्द और मददगार थे!
ऐसे लोगों की कालोनियाँ भी दूसरी-दूसरी थीं - लंबे चौड़े प्लाटोंवाली!
लेकिन 'अशोक विहार' उनकी कालोनी थी जो अध्यापक थे, बाबू थे, दोयम दर्जे के सरकारी गैर-सरकारी कर्मचारी थे और इससे भी खास बात यह कि जो या तो रिटायर हो चुके थे या निकट भविष्य में रिटायर होनेवाले थे!
न तो अखबारों में कोई विज्ञापन था, न किसी नुक्कड़ पर इस आशय की होर्डिंग कि इस कालोनी के प्लाट उन्हीं को बेचे जाएँगे जो पचास-पचपन से ऊपर के होंगे और जल्दी ही रिटायर होंगे लेकिन जाने यह कैसे हुआ कि जब कालोनी तैयार हुई तो पाया गया कि यह बूढ़ों की कालोनी है! ऐसे बूढ़े-बूढ़ियों की जिनके बेटे-बेटी अपनी बीवी और बच्चों के साथ परदेस में नौकरी कर रहे हैं - कोई कलकत्ता है, तो कोई दिल्ली, कोई मुंबई तो कोई बंगलौर और कइयों के तो विदेश में।
इनका दुःख अपरंपार था। इन्होंने बेटे-बेटियों के लिए अपने गाँव छोड़े थे - अपनी जन्मभूमि - कि यह हमारे लिए तो ठीक, चाहे जैसे रह लें लेकिन उनके लिए नहीं। न बिजली, न पानी, न लिखने-पढ़ने, न आने-जाने की सुविधा! घर हो तो ऐसी जगह जहाँ से खेती-बारी पर भी नजर रखी जा सके और बेटों-बेटियों को भी असुविधा न हो! वे अपनी जगह-जमीन, रिश्ते-नाते, संगी-साथी, बाग-बगीचे, ताल-तलैया छोड़ कर जिन संतानों के लिए आए, वे ही बाहर। इतने तक तो गनीमत थी। लेकिन अब हालत यह है कि जो जहाँ सर्विस कर रहा है, वह उसी नगर में रम गया है और वहाँ से लौट कर यहाँ नहीं आना चाहता। अगर वह आना भी चाहता है तो उसके बच्चे नहीं आना चाहते!
लीजिए यह नई मुसीबत!
जिनके लिए बेघर हुए उन्हीं के अपने अलग घर!
यह नई मुसीबत न उन्हें जीने दे रही थी, न मरने दे रही थी। गाँव पर पुश्तैनी जमीन-जायदाद। बाप-दादों की धरोहर। न देखो तो कब दूसरे कब्जा कर लें, कहना मुश्किल। पुरखों ने तो एक-एक कौड़ी बचा कर, पेट काट कर, जोड़-जोड़ कर जैसे-तैसे जमीनें बढ़ाई ही, चार की पाँच ही कीं - तीन नहीं होने दीं और यहाँ यह हाल! जरा-सा गाफिल हुए कि मेड़ गायब! महीने दो-महीने में कम से कम एक बार गाँव का चक्कर लगाते रहो। देख लें लोग कि नहीं हैं; ध्यान है। हाल-चाल लेते रहो, कुशल-मंगल पूछते रहो, खुशी-गमी में जाते रहो, सब से बनाए रखो। अधिया या बँटाई पर खेती करो तब भी। दिया-बाती और घर-दुआर की देख-रेख के लिए कोई नौकर-चाकर रखो तब भी!
उनके बेटों के बचपन गाँव में बीते थे। नगर में पढ़ाई के दौरान भी वे आते-जाते रहते थे गाँव पर। उन्होंने खेती भले न की हो लेकिन उन्हें इतना पता था कि उनके खेत कहाँ-कहाँ हैं, कौन-कौन से हैं - धान के, गेहूँ के, दलहन के? उन्हें थोड़ी-बहुत जानकारी थी। खेल या कुतूहल में ही सही, बाप-चाचा के साथ लगे रह कर उन्होंने अगोर की थी, बुआई-कटाई देखी थी। लोग भी जानते थे कि यह फलाने का बेटा या भतीजा है। गाँव-घर से माया-मोह के लिए इतना कम नहीं था लेकिन उनके बच्चे? वे तो दादा-दादी को छोड़ कर पहचानते ही किसको हैं? और दादा-दादी को भी कितना पहचानते हैं? चिंता उसकी होती है जिससे मोह होता है, प्रेम होता है; जिससे प्रेम ही नहीं, परिचय और संबंध ही नहीं, उसकी क्या चिंता? खेत भी उसे पहचानते हैं जो उनके साथ जीता- मरता है। वे खेतों को क्या पहचानेंगे, खेत ही उन्हें पहचानने से इनकार कर देंगे!
ये सारी बातें बेटों की नजर में 'बुढ़भस' थीं। आप माटी में ही पैदा हुए और एक दिन उसी माटी में मिल जाएँगे! कभी उससे छूटने या ऊपर उठने या आगे बढ़ने की बात ही आपके दिमाग में नहीं आई - क्योंकि उसमें भी गोबर नहीं तो माटी ही थी। क्या कर लिया खेती करके आपने? कौन सा तीर मार लिया? खाद महँगी, बीज महँगा, नहर में पानी नहीं, मौसम का भरोसा नहीं, बैल रहे नहीं, भाड़े पर ट्रैक्टर समय पर मिले, न मिले, हलवाहे और मजूरे रहे नहीं - किसके भरोसे खेती करो? और खेती भी तब करो जब हाथ में बाहर से चार पैसे आएँ? क्या फायदा ऐसी खेती से?
असल चीज पैसा है! अगर हाथ में पैसा हो तो वे सारे जिंस बिना कुछ किए बाजार में मिल जाते हैं जिनके लिए आप रात दिन खून पसीना एक करते हैं। बिना कुछ किए, बिना कहीं गए।
सारी जिच और सारा झगड़ा और सारा बवाल बेटों से उनका चल ही रहा था गाँव को ले कर, कि अब एक नई मुसीबत - 'अशोक विहार' के मकान का क्या होगा? वे जहाँ हैं, वहाँ से आना नहीं चाहते!
ये हैं कि इनसे न गाँव छूट रहा है, न अशोक विहार - दुनिया भले छूट जाए!
दो
इसी छोटे से-अशोक विहार के लेन नं. 4 के डी-1 में अमेरिका से आई सोनल सक्सेना रघुवंशी।
तीन साल बाद।
उसके डैडी आए थे सोनल की 'सैंट्रो' पहुँचाने और विश्वविद्यालय में ज्वाइन कराने। इतना ही नहीं किया उन्होंने, हफ्ते भर रह कर घर ठीक-ठाक किया, उसे सजाया, सँवारा, सुबह-शाम बेटी को चाय पिलाई, उसकी दिनचर्या निर्धारित की और विदा होने से पहले उसे सलाह दी - 'संजू के पापा-मम्मी को बुला लो, वे काम आएँगे। घर भी देखेंगे और तुम्हारी भी मदद होगी!'
यही कहा था संजय ने भी अमेरिका से विदा करते समय - 'हम दोनों भाई बाहर हैं, पापा-मम्मी गाँव पर अकेले हैं। इस उमर में उन्हें सहारे की जरूरत है, उन्हें साथ रखना!'
यह पहली रात थी जब वह घर में अकेली थी। देर तक वह अपने बेडरूम में संगीत सुनती रही - एक कैसेट के बाद दूसरा कैसेट। शास्त्रीय से ऊबती तो अर्धशास्त्रीय, इससे भी ऊबती तो फिल्मी गाने! पढ़ती भी रहती, सुनती भी रहती! बिजली गुल करके सोने की आदत थी! बेडरूम को छोड़ कर बाकी कमरों की बत्तियाँ जली छोड़ दीं और लेट गई।
सन्नाटे की भी अपनी आवाज होती है और वह सुहानी कम, डरावनी ज्यादा होती है! यही नहीं, ये आवाजें सुनाई ही नहीं, दिखाई भी पड़ती हैं। उसके घर के सामने ही पार्क था - बड़ा-सा। पूरे मुहल्ले या कह लो, कालोनी का। जब से आई थी, तब से सुबह-शाम देख रही थी! वह तीन साल से ऐसी दुनिया में रह कर आई थी जहाँ अँधेरा नहीं होता था, जहाँ बूढ़े नहीं रहते थे, जहाँ हर चीज दौड़ती-भागती उछलती-कूदती नजर आती थी, जिसमें लपक चमक और कौंध थी, जहाँ जवान और जवानियाँ और तरह-तरह के रंग थे, जहाँ कुछ भी अपनी जगह खड़ा और स्थिर नहीं दिखाई पड़ता था - और अब यह पार्क और यह कालोनी?
बूढों, अपंगों और विकलांगों का यह विहार!
फरवरी के इस महीने में खिड़कियों और दरवाजों पर थाप देती बसंती हवा और पार्क में घिसटते, उड़ते सूखे, झड़े, बेजान पत्तों की मरमर-चरमर!
मान लो, किसी के घर में कोई चोर घुस आए - किसी के क्या, मेरे ही घर में चोर घुस आए और वह भी अकेले, बिना किसी साथी के, औजार के; डाकू घुस आए बिना राइफल-बंदूक के अकेले, रात-बिरात तो छोड़ो, खड़ी दोपहर में; कोई बलात्कारी ही घुस आए दिन दहाड़े और मुझे उठा कर ले जाए पार्क में और मैं चिल्लाऊँ कि बचाओ! बचाओ! तो कौन सुनेगा? (ज्यादातर बूढ़े या तो बहरे हैं या ऊँचा सुनते हैं), कौन दौड़ेगा (ज्यादातर घुटनों और जोड़ों के दर्द से परेशान हैं), कौन देखेगा (ज्यादातर मोतियाबिंद का आपरेशन कराके आँख पर हरी पट्टी बाँधे हैं), यह सब न कर सकें तो खड़ा हो कर चिल्लाएँ तो सही (ज्यादातर की कमर झुकी है और मुँह में दाँत नहीं है, वे गुगुआ तो सकते हैं, चिल्ला नहीं सकते)।
इन खयालों से सोनल के रोंगटे खड़े हो गए! वह किसी अनजाने डर से सिहर-सी उठी!
फिर सहसा ध्यान गया कुत्तों की ओर! कुत्ते बहुत थे कालोनी में - हर सड़क पर, प्रायः गेट के बाहर बैठे या घूमते दिखाई पड़ते थे लेकिन - यहाँ भी एक 'लेकिन' था। इतने दिनों में उसने किसी को भूँकते हुए नहीं सुना। उसी के मकान डी-१ के गेट पर ही एक भूरा बैठा रहता है लेकिन जब भी आओ, कहीं से आओ - गेट से चुपचाप हट जाता है और दूसरी जगह थोड़ी दूर पर बैठ जाता है!
कालोनी के बाशिंदों के सिवा किराएदार भी हैं - प्रायः हर घर में! नीचे मालिक, ऊपर किराएदार! कुछ में देसी, कुछ में विदेशी - ज्यादातर जापानी, कोरियाई या थाई। विद्यार्थी या टूरिस्ट अपने काम से काम रखनेवाले। इनके सिवा वे सरकारी कर्मचारी हैं जिनका किसी भी समय तबादला हो सकता है! यानी वे जिनके दिमाग में मकान कब्जा करने की बात न आए! ऐसे लोगों को मुहल्ले के लोगों से क्या लेना-देना, उन्हें खुद से ही फुरसत नहीं।
इस तरह तो उसी का घर क्यों, कालोनी का कोई भी घर - यहाँ तक कि कालोनी की कालोनी दिन-दहाड़े लूट के कोई ले जाए, रोकने-टोकनेवाले नहीं मिलेंगे।
सोचते-सोचते उसे लगा कि यह सिर्फ एक खयाल नहीं है - एक 'हॉरर' फिल्म है जो उसकी आँखें देख रही हैं! वह खुद पार्क में फटते चिथड़ा होते जा रहे साड़ी ब्लाउज में इधर से उधर भाग रही है - चीख चिल्ला रही है लेकिन कोई भी अपने घर से नहीं निकल रहा है! किसी को सुनाई ही नहीं दे रहा है तो निकलेगा कहाँ से?
उठ कर झटके से उसने बत्ती जलाई और फिल्म खत्म। राहत की साँस ली उसने और कैसेट लगाया। बदकिस्मती से कैसेट वह निकला जिसे न वह सुनना चाहती थी, न सुने बगैर रहना चाहती थी -
वक्त ने किया , क्या हसीं सितम
तुम रहे न तुम , हम रहे न हम
यह कैसेट सोनल को समीर ने प्रजेंट किया था - तीन साल पहले। शादी के रिसेप्शन के दिन। तब उसने न इसे देखने की जरूरत महसूस की थी, न सुनने की! उसने हमेशा इसे अपने साथ रखा लेकिन कभी नहीं सुना। आज सुनते हुए उसे लगा कि कितना बदल गया है उसी गाने का मतलब आज? उसने संजय की कोई चर्चा नहीं की अपने डैडी से जान-बूझ कर। वे दिल के मरीज, उन्हें ठेस लगती! अगर विश्वविद्यालय की सर्विस न मिली होती और वह अमेरिका में ही रह गई होती तो क्या होता?
गलती कहाँ हुई और किससे हुई - वह समझ नहीं सकी!
आरती गुर्जर - उसके लैंडलार्ड की बेटी। उसी काल सेंटर में काम करती थी जिसमें संजय करता था! साथ आना-जाना उसी की कार से होता था। दिन-रात का साथ! आश्चर्य यह था कि आरती के माँ-बाप उन्हें एक दूसरे के करीब आते देख रहे थे फिर भी चुप थे! आश्चर्य यह भी था कि उसकी भी आँखों के सामने वे छेड़छाड़ करते थे - बेशर्मी की हद तक - और टोकने पर हँसने लगते थे। और इससे भी बड़ा आश्चर्य यह था कि आरती का पति जब कभी न्यू यॉर्क से आता था तो वह अपनी पत्नी से उसके 'ब्यायफ्रेंड' के बारे में बातें करता था और उन्हें डिनर पर ले जाता था! जाती तो साथ में वह भी थी - लेकिन उसे हमेशा लगता था कि न जाती तो ज्यादा अच्छा रहा होता!
वह एक ऐसे समाज में आ गई थी जिसमें डालर को छोड़ कर किसी और चीज जैसे प्यार के लिए ईर्ष्या करना पिछड़ापन और गँवरपन था!
वह जब भी संजय से उसकी हरकतों की शिकायत करती, वह खीझ उठता - 'तुम देश और काल के हिसाब से अपने को बदलना सीखो, चलना सीखो। न चल सको तो चुपचाप बैठो या लौट जाओ!'
'लौटूँगी तो अकेले क्यों? तुम्हें साथ ले कर!'
'मैं तो डियर, परदेस को ही अपना देस बनाने की सोच रहा हूँ!' मुसकराते हुए उसने आँख मार कर कहा - 'तुम भी क्यों नहीं ढूंढ़ लेती एक ब्यायफ्रेंड?'
'अच्छा लगेगा तुम्हें?' उसने सीधे संजय की आँखों में देखा!
'अच्छा की कहती हो? निश्चिंत हो जाऊँगा हमेशा के लिए! हा हा हा...'
सोनल ने संजय की आँखों में गौर से देखा - वे आँखे ही थीं या दिल? यह बात उसने जबान से कही थी या दिल से? वह कहीं सोनल से सचमुच की मुक्ति तो नहीं चाह रहा है? वह देख रही थी कि अमेरिका आने के बाद से उसमें तेजी से बदलाव आया है - एक-दो सालों के अंदर! यह उसकी तीसरी नौकरी है! वह एक शुरू करता है कि दूसरी की खोज में लग जाता है - पहले से उम्दा, पैसों के मामले में। उसमें सब्र नाम की चीज नहीं है। वह जल्दी से जल्दी ऊँची से ऊँची ऊँचाइयाँ छूना चाहता है! जैसे ही एक ऊँचाई पर पहुंचता है, थोड़े ही दिनों में वह नीची लगने लगती है! इसे वह महत्वाकांक्षा बोलता है! अगर यही महत्वाकांक्षा है तो फिर लालच क्या है?
लालच ? आरती गुर्जर के साथ संजय की दोस्ती के पीछे सिर्फ आरती गुर्जर है या उसके एन.आर.आई. माँ-बाप जिनका 'गुजराती हस्तशिल्प' का चमकदार व्यवसाय है, जिनकी वह इकलौती संतान है? आरती से संजय का रिश्ता उसकी समझ से बाहर था!
यहाँ रहते हुए सोनल भी कमाई कर सकती थी! किसी विश्वविद्यालय में, कालेज में, लाइब्रेरी में, कहीं भी! कंप्यूटर में भी अच्छी-खासी गति थी! लेकिन संजय ने जब भी सोचा, खुद के बारे में सोचा, सोनल के बारे में सोचने की फुरसत ही नहीं थी! उसने सोनल को 'हाउसवाइफ' से ज्यादा नहीं होने दिया और वह भी तो बनारस के इंतजार में 'आज कल परसों' करती रह गई थी।
सोनल की आँखें भर आई थीं। उसी दम उसने निर्णय लिया था कि अब नहीं रुकना यहाँ! वह बहाने की खोज में ही थी कि राँची से पापा का ई-मेल - तुरंत आ जाओ, 15 को तुम्हारा इंटरव्यू है! उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा! यह उसकी आत्मा की पुकार थी जो विश्वविद्यालय तक पहुँची थी!
आज भोर के उजाले में खिड़की से फिर पुकार आ रही थी सोनल की आत्मा - संजय को नहीं, समीर को - सुनो, और चले आओ!
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वह घर जिसे राँची के प्रोफेसर राजीव सक्सेना ने रिटायर होने के बाद अपने रहने के लिए बनारस में बनवाया था और जिसे अपनी बेटी सोनल के नाम कर दिया था, वह 'अशोक विहार' में था।
बनारस में मुहल्ले थे, नगर, विहार और कालोनियाँ नहीं। इनका निर्माण शुरू हुआ 1980-1990 के आसपास जब पूर्वांचल और बिहार में भू-माफियाओं और बाहुबलियों का उदय हुआ! उन्होंने नगर के दक्खिन, पच्छिम और उत्तर बसे गाँव के गाँव खरीदे और उनकी 'प्लाटिंग' करके बेचना शुरू किया! देखते-देखते पंद्रह-बीस वर्षों के अंदर गाँव के वजूद खत्म हो गए और उनकी जगह नए-नए नामों के साथ नगर, कालोनियाँ और विहार बस गए!
यह नया बनारस था - महानगरों की तर्ज का।
मुहल्लों में रहनेवाले मुहल्लों और महलों में ही रहे - अपने पुश्तैनी काम-धंधों, दुकानों, रोजगारों और घाटों के साथ लेकिन इन कालोनियों में बसनेवाले ज्यादातर नए नागरिक थे!
ये बाहर से आए थे। आसपास के जनपदों से! जिलों से! सौ पचास किलोमीटर की दूरी से! इनके अपने गाँव थे, थोड़ी बहुत जमीन थी, खेती बारी थी। उन्हें समय-समय पर बनारस आना ही पड़ता था - कभी कोर्ट कचहरी के काम से, कभी अस्पताल के काम से, कभी तीरथ-बरत के लिए, कभी शादी ब्याह की खरीददारी के लिए, कभी बच्चों के ऐडमीशन और पढ़ाई के लिए। बार-बार आ कर लौटने से बेहतर था कि यहाँ ठहरने और रुकने का एक स्थायी ठिकाना हो, एक डेरा हो।
लेकिन ऐसा सिर्फ उन्हीं के लिए संभव था जिनके पास अपनी कोई छोटी मोटी नौकरी हो; और अगर वह नौकरी काफी न हो तो बेटों में से कम से कम एक बाहर कमा रहा हो जिसके बच्चे गाँव में बोर होते हों और वहाँ नहीं रहना चाहते, शहर के आदी हो गए हों और अपना हित उधर ही देखना चाहते हों।
हालाँकि गाँव में वह सब पहुँच रहा था धीरे धीरे, जो शहर में था - बिजली भी, नल भी, फ्रिज भी, फोन भी, टी.वी. भी, अखबार भी लेकिन वह मजा नहीं था जो शहर में था। मजा था भी तो उनके लिए जिनके पास ट्रैक्टर था, थ्रेशर था, पंपिंग सेट था, बोलेरो या सफारी थी, जो खेती पेट के लिए नहीं, व्यवसाय के लिए कर रहे थे, जो एक नहीं, एक ही साथ सभी राजनीतिक पार्टियों के हमदर्द और मददगार थे!
ऐसे लोगों की कालोनियाँ भी दूसरी-दूसरी थीं - लंबे चौड़े प्लाटोंवाली!
लेकिन 'अशोक विहार' उनकी कालोनी थी जो अध्यापक थे, बाबू थे, दोयम दर्जे के सरकारी गैर-सरकारी कर्मचारी थे और इससे भी खास बात यह कि जो या तो रिटायर हो चुके थे या निकट भविष्य में रिटायर होनेवाले थे!
न तो अखबारों में कोई विज्ञापन था, न किसी नुक्कड़ पर इस आशय की होर्डिंग कि इस कालोनी के प्लाट उन्हीं को बेचे जाएँगे जो पचास-पचपन से ऊपर के होंगे और जल्दी ही रिटायर होंगे लेकिन जाने यह कैसे हुआ कि जब कालोनी तैयार हुई तो पाया गया कि यह बूढ़ों की कालोनी है! ऐसे बूढ़े-बूढ़ियों की जिनके बेटे-बेटी अपनी बीवी और बच्चों के साथ परदेस में नौकरी कर रहे हैं - कोई कलकत्ता है, तो कोई दिल्ली, कोई मुंबई तो कोई बंगलौर और कइयों के तो विदेश में।
इनका दुःख अपरंपार था। इन्होंने बेटे-बेटियों के लिए अपने गाँव छोड़े थे - अपनी जन्मभूमि - कि यह हमारे लिए तो ठीक, चाहे जैसे रह लें लेकिन उनके लिए नहीं। न बिजली, न पानी, न लिखने-पढ़ने, न आने-जाने की सुविधा! घर हो तो ऐसी जगह जहाँ से खेती-बारी पर भी नजर रखी जा सके और बेटों-बेटियों को भी असुविधा न हो! वे अपनी जगह-जमीन, रिश्ते-नाते, संगी-साथी, बाग-बगीचे, ताल-तलैया छोड़ कर जिन संतानों के लिए आए, वे ही बाहर। इतने तक तो गनीमत थी। लेकिन अब हालत यह है कि जो जहाँ सर्विस कर रहा है, वह उसी नगर में रम गया है और वहाँ से लौट कर यहाँ नहीं आना चाहता। अगर वह आना भी चाहता है तो उसके बच्चे नहीं आना चाहते!
लीजिए यह नई मुसीबत!
जिनके लिए बेघर हुए उन्हीं के अपने अलग घर!
यह नई मुसीबत न उन्हें जीने दे रही थी, न मरने दे रही थी। गाँव पर पुश्तैनी जमीन-जायदाद। बाप-दादों की धरोहर। न देखो तो कब दूसरे कब्जा कर लें, कहना मुश्किल। पुरखों ने तो एक-एक कौड़ी बचा कर, पेट काट कर, जोड़-जोड़ कर जैसे-तैसे जमीनें बढ़ाई ही, चार की पाँच ही कीं - तीन नहीं होने दीं और यहाँ यह हाल! जरा-सा गाफिल हुए कि मेड़ गायब! महीने दो-महीने में कम से कम एक बार गाँव का चक्कर लगाते रहो। देख लें लोग कि नहीं हैं; ध्यान है। हाल-चाल लेते रहो, कुशल-मंगल पूछते रहो, खुशी-गमी में जाते रहो, सब से बनाए रखो। अधिया या बँटाई पर खेती करो तब भी। दिया-बाती और घर-दुआर की देख-रेख के लिए कोई नौकर-चाकर रखो तब भी!
उनके बेटों के बचपन गाँव में बीते थे। नगर में पढ़ाई के दौरान भी वे आते-जाते रहते थे गाँव पर। उन्होंने खेती भले न की हो लेकिन उन्हें इतना पता था कि उनके खेत कहाँ-कहाँ हैं, कौन-कौन से हैं - धान के, गेहूँ के, दलहन के? उन्हें थोड़ी-बहुत जानकारी थी। खेल या कुतूहल में ही सही, बाप-चाचा के साथ लगे रह कर उन्होंने अगोर की थी, बुआई-कटाई देखी थी। लोग भी जानते थे कि यह फलाने का बेटा या भतीजा है। गाँव-घर से माया-मोह के लिए इतना कम नहीं था लेकिन उनके बच्चे? वे तो दादा-दादी को छोड़ कर पहचानते ही किसको हैं? और दादा-दादी को भी कितना पहचानते हैं? चिंता उसकी होती है जिससे मोह होता है, प्रेम होता है; जिससे प्रेम ही नहीं, परिचय और संबंध ही नहीं, उसकी क्या चिंता? खेत भी उसे पहचानते हैं जो उनके साथ जीता- मरता है। वे खेतों को क्या पहचानेंगे, खेत ही उन्हें पहचानने से इनकार कर देंगे!
ये सारी बातें बेटों की नजर में 'बुढ़भस' थीं। आप माटी में ही पैदा हुए और एक दिन उसी माटी में मिल जाएँगे! कभी उससे छूटने या ऊपर उठने या आगे बढ़ने की बात ही आपके दिमाग में नहीं आई - क्योंकि उसमें भी गोबर नहीं तो माटी ही थी। क्या कर लिया खेती करके आपने? कौन सा तीर मार लिया? खाद महँगी, बीज महँगा, नहर में पानी नहीं, मौसम का भरोसा नहीं, बैल रहे नहीं, भाड़े पर ट्रैक्टर समय पर मिले, न मिले, हलवाहे और मजूरे रहे नहीं - किसके भरोसे खेती करो? और खेती भी तब करो जब हाथ में बाहर से चार पैसे आएँ? क्या फायदा ऐसी खेती से?
असल चीज पैसा है! अगर हाथ में पैसा हो तो वे सारे जिंस बिना कुछ किए बाजार में मिल जाते हैं जिनके लिए आप रात दिन खून पसीना एक करते हैं। बिना कुछ किए, बिना कहीं गए।
सारी जिच और सारा झगड़ा और सारा बवाल बेटों से उनका चल ही रहा था गाँव को ले कर, कि अब एक नई मुसीबत - 'अशोक विहार' के मकान का क्या होगा? वे जहाँ हैं, वहाँ से आना नहीं चाहते!
ये हैं कि इनसे न गाँव छूट रहा है, न अशोक विहार - दुनिया भले छूट जाए!
दो
इसी छोटे से-अशोक विहार के लेन नं. 4 के डी-1 में अमेरिका से आई सोनल सक्सेना रघुवंशी।
तीन साल बाद।
उसके डैडी आए थे सोनल की 'सैंट्रो' पहुँचाने और विश्वविद्यालय में ज्वाइन कराने। इतना ही नहीं किया उन्होंने, हफ्ते भर रह कर घर ठीक-ठाक किया, उसे सजाया, सँवारा, सुबह-शाम बेटी को चाय पिलाई, उसकी दिनचर्या निर्धारित की और विदा होने से पहले उसे सलाह दी - 'संजू के पापा-मम्मी को बुला लो, वे काम आएँगे। घर भी देखेंगे और तुम्हारी भी मदद होगी!'
यही कहा था संजय ने भी अमेरिका से विदा करते समय - 'हम दोनों भाई बाहर हैं, पापा-मम्मी गाँव पर अकेले हैं। इस उमर में उन्हें सहारे की जरूरत है, उन्हें साथ रखना!'
यह पहली रात थी जब वह घर में अकेली थी। देर तक वह अपने बेडरूम में संगीत सुनती रही - एक कैसेट के बाद दूसरा कैसेट। शास्त्रीय से ऊबती तो अर्धशास्त्रीय, इससे भी ऊबती तो फिल्मी गाने! पढ़ती भी रहती, सुनती भी रहती! बिजली गुल करके सोने की आदत थी! बेडरूम को छोड़ कर बाकी कमरों की बत्तियाँ जली छोड़ दीं और लेट गई।
सन्नाटे की भी अपनी आवाज होती है और वह सुहानी कम, डरावनी ज्यादा होती है! यही नहीं, ये आवाजें सुनाई ही नहीं, दिखाई भी पड़ती हैं। उसके घर के सामने ही पार्क था - बड़ा-सा। पूरे मुहल्ले या कह लो, कालोनी का। जब से आई थी, तब से सुबह-शाम देख रही थी! वह तीन साल से ऐसी दुनिया में रह कर आई थी जहाँ अँधेरा नहीं होता था, जहाँ बूढ़े नहीं रहते थे, जहाँ हर चीज दौड़ती-भागती उछलती-कूदती नजर आती थी, जिसमें लपक चमक और कौंध थी, जहाँ जवान और जवानियाँ और तरह-तरह के रंग थे, जहाँ कुछ भी अपनी जगह खड़ा और स्थिर नहीं दिखाई पड़ता था - और अब यह पार्क और यह कालोनी?
बूढों, अपंगों और विकलांगों का यह विहार!
फरवरी के इस महीने में खिड़कियों और दरवाजों पर थाप देती बसंती हवा और पार्क में घिसटते, उड़ते सूखे, झड़े, बेजान पत्तों की मरमर-चरमर!
मान लो, किसी के घर में कोई चोर घुस आए - किसी के क्या, मेरे ही घर में चोर घुस आए और वह भी अकेले, बिना किसी साथी के, औजार के; डाकू घुस आए बिना राइफल-बंदूक के अकेले, रात-बिरात तो छोड़ो, खड़ी दोपहर में; कोई बलात्कारी ही घुस आए दिन दहाड़े और मुझे उठा कर ले जाए पार्क में और मैं चिल्लाऊँ कि बचाओ! बचाओ! तो कौन सुनेगा? (ज्यादातर बूढ़े या तो बहरे हैं या ऊँचा सुनते हैं), कौन दौड़ेगा (ज्यादातर घुटनों और जोड़ों के दर्द से परेशान हैं), कौन देखेगा (ज्यादातर मोतियाबिंद का आपरेशन कराके आँख पर हरी पट्टी बाँधे हैं), यह सब न कर सकें तो खड़ा हो कर चिल्लाएँ तो सही (ज्यादातर की कमर झुकी है और मुँह में दाँत नहीं है, वे गुगुआ तो सकते हैं, चिल्ला नहीं सकते)।
इन खयालों से सोनल के रोंगटे खड़े हो गए! वह किसी अनजाने डर से सिहर-सी उठी!
फिर सहसा ध्यान गया कुत्तों की ओर! कुत्ते बहुत थे कालोनी में - हर सड़क पर, प्रायः गेट के बाहर बैठे या घूमते दिखाई पड़ते थे लेकिन - यहाँ भी एक 'लेकिन' था। इतने दिनों में उसने किसी को भूँकते हुए नहीं सुना। उसी के मकान डी-१ के गेट पर ही एक भूरा बैठा रहता है लेकिन जब भी आओ, कहीं से आओ - गेट से चुपचाप हट जाता है और दूसरी जगह थोड़ी दूर पर बैठ जाता है!
कालोनी के बाशिंदों के सिवा किराएदार भी हैं - प्रायः हर घर में! नीचे मालिक, ऊपर किराएदार! कुछ में देसी, कुछ में विदेशी - ज्यादातर जापानी, कोरियाई या थाई। विद्यार्थी या टूरिस्ट अपने काम से काम रखनेवाले। इनके सिवा वे सरकारी कर्मचारी हैं जिनका किसी भी समय तबादला हो सकता है! यानी वे जिनके दिमाग में मकान कब्जा करने की बात न आए! ऐसे लोगों को मुहल्ले के लोगों से क्या लेना-देना, उन्हें खुद से ही फुरसत नहीं।
इस तरह तो उसी का घर क्यों, कालोनी का कोई भी घर - यहाँ तक कि कालोनी की कालोनी दिन-दहाड़े लूट के कोई ले जाए, रोकने-टोकनेवाले नहीं मिलेंगे।
सोचते-सोचते उसे लगा कि यह सिर्फ एक खयाल नहीं है - एक 'हॉरर' फिल्म है जो उसकी आँखें देख रही हैं! वह खुद पार्क में फटते चिथड़ा होते जा रहे साड़ी ब्लाउज में इधर से उधर भाग रही है - चीख चिल्ला रही है लेकिन कोई भी अपने घर से नहीं निकल रहा है! किसी को सुनाई ही नहीं दे रहा है तो निकलेगा कहाँ से?
उठ कर झटके से उसने बत्ती जलाई और फिल्म खत्म। राहत की साँस ली उसने और कैसेट लगाया। बदकिस्मती से कैसेट वह निकला जिसे न वह सुनना चाहती थी, न सुने बगैर रहना चाहती थी -
वक्त ने किया , क्या हसीं सितम
तुम रहे न तुम , हम रहे न हम
यह कैसेट सोनल को समीर ने प्रजेंट किया था - तीन साल पहले। शादी के रिसेप्शन के दिन। तब उसने न इसे देखने की जरूरत महसूस की थी, न सुनने की! उसने हमेशा इसे अपने साथ रखा लेकिन कभी नहीं सुना। आज सुनते हुए उसे लगा कि कितना बदल गया है उसी गाने का मतलब आज? उसने संजय की कोई चर्चा नहीं की अपने डैडी से जान-बूझ कर। वे दिल के मरीज, उन्हें ठेस लगती! अगर विश्वविद्यालय की सर्विस न मिली होती और वह अमेरिका में ही रह गई होती तो क्या होता?
गलती कहाँ हुई और किससे हुई - वह समझ नहीं सकी!
आरती गुर्जर - उसके लैंडलार्ड की बेटी। उसी काल सेंटर में काम करती थी जिसमें संजय करता था! साथ आना-जाना उसी की कार से होता था। दिन-रात का साथ! आश्चर्य यह था कि आरती के माँ-बाप उन्हें एक दूसरे के करीब आते देख रहे थे फिर भी चुप थे! आश्चर्य यह भी था कि उसकी भी आँखों के सामने वे छेड़छाड़ करते थे - बेशर्मी की हद तक - और टोकने पर हँसने लगते थे। और इससे भी बड़ा आश्चर्य यह था कि आरती का पति जब कभी न्यू यॉर्क से आता था तो वह अपनी पत्नी से उसके 'ब्यायफ्रेंड' के बारे में बातें करता था और उन्हें डिनर पर ले जाता था! जाती तो साथ में वह भी थी - लेकिन उसे हमेशा लगता था कि न जाती तो ज्यादा अच्छा रहा होता!
वह एक ऐसे समाज में आ गई थी जिसमें डालर को छोड़ कर किसी और चीज जैसे प्यार के लिए ईर्ष्या करना पिछड़ापन और गँवरपन था!
वह जब भी संजय से उसकी हरकतों की शिकायत करती, वह खीझ उठता - 'तुम देश और काल के हिसाब से अपने को बदलना सीखो, चलना सीखो। न चल सको तो चुपचाप बैठो या लौट जाओ!'
'लौटूँगी तो अकेले क्यों? तुम्हें साथ ले कर!'
'मैं तो डियर, परदेस को ही अपना देस बनाने की सोच रहा हूँ!' मुसकराते हुए उसने आँख मार कर कहा - 'तुम भी क्यों नहीं ढूंढ़ लेती एक ब्यायफ्रेंड?'
'अच्छा लगेगा तुम्हें?' उसने सीधे संजय की आँखों में देखा!
'अच्छा की कहती हो? निश्चिंत हो जाऊँगा हमेशा के लिए! हा हा हा...'
सोनल ने संजय की आँखों में गौर से देखा - वे आँखे ही थीं या दिल? यह बात उसने जबान से कही थी या दिल से? वह कहीं सोनल से सचमुच की मुक्ति तो नहीं चाह रहा है? वह देख रही थी कि अमेरिका आने के बाद से उसमें तेजी से बदलाव आया है - एक-दो सालों के अंदर! यह उसकी तीसरी नौकरी है! वह एक शुरू करता है कि दूसरी की खोज में लग जाता है - पहले से उम्दा, पैसों के मामले में। उसमें सब्र नाम की चीज नहीं है। वह जल्दी से जल्दी ऊँची से ऊँची ऊँचाइयाँ छूना चाहता है! जैसे ही एक ऊँचाई पर पहुंचता है, थोड़े ही दिनों में वह नीची लगने लगती है! इसे वह महत्वाकांक्षा बोलता है! अगर यही महत्वाकांक्षा है तो फिर लालच क्या है?
लालच ? आरती गुर्जर के साथ संजय की दोस्ती के पीछे सिर्फ आरती गुर्जर है या उसके एन.आर.आई. माँ-बाप जिनका 'गुजराती हस्तशिल्प' का चमकदार व्यवसाय है, जिनकी वह इकलौती संतान है? आरती से संजय का रिश्ता उसकी समझ से बाहर था!
यहाँ रहते हुए सोनल भी कमाई कर सकती थी! किसी विश्वविद्यालय में, कालेज में, लाइब्रेरी में, कहीं भी! कंप्यूटर में भी अच्छी-खासी गति थी! लेकिन संजय ने जब भी सोचा, खुद के बारे में सोचा, सोनल के बारे में सोचने की फुरसत ही नहीं थी! उसने सोनल को 'हाउसवाइफ' से ज्यादा नहीं होने दिया और वह भी तो बनारस के इंतजार में 'आज कल परसों' करती रह गई थी।
सोनल की आँखें भर आई थीं। उसी दम उसने निर्णय लिया था कि अब नहीं रुकना यहाँ! वह बहाने की खोज में ही थी कि राँची से पापा का ई-मेल - तुरंत आ जाओ, 15 को तुम्हारा इंटरव्यू है! उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा! यह उसकी आत्मा की पुकार थी जो विश्वविद्यालय तक पहुँची थी!
आज भोर के उजाले में खिड़की से फिर पुकार आ रही थी सोनल की आत्मा - संजय को नहीं, समीर को - सुनो, और चले आओ!