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वह कमर उचकाकर मेरे सिर को अपनी गोद में दबा रही थी। अब मैं चाहता तो चुदाई शुरु कर सकता था। झड़ती हुई योनि में लिंग प्रवेश पागल कर देने वाला होता है लेकिन मैं चाहता था मुख-रति का सुख वह देर तक पाए। मैंने गति धीमी कर दी, सिर्फ भगनासा (क्लिटोरिस) को धीरे-धीरे जीभ से छेड़ने लगा।
पिंकी को मेरा पहला उपहार – पहले स्खलन का, कठोर लिंग की अपेक्षा कोमल जीभ से। उसके प्रति मेरे मन में बेहद कोमल भाव का प्रतिदान। मैं उठा और उसे जीत लेने के गर्व से सीधे उसके मुँह को चूमा। चरम सुख पाने की कृतज्ञता में उसने योनि के रस लगे मेरे मुँह का बुरा नहीं माना, मेरे चुम्बनों को बिल्कुल औरत की तरह विनम्रता से, मान जाने के भाव से ग्रहण किया। मैंने उसे गले लगा लिया।
सुमन आकर हमारे पास बैठ गई। मैंने उसे अपने पास खींचा और एक गाढ़ा चुम्बन दिया। उसी ने मुझे यह अनमोल उपहार दिया था। मुझे आश्चर्य हुआ कि उसने मेरे मुँह पर लगे पिंकी के रस की परवाह नहीं की और उत्तर दिया।
पुनः पिंकी की ओर मुड़ा तो वह मुँह घुमाने लगी। आलिंगन में लेने लगा तो बदन सख्त करने लगी। शायद सुमन को चूमने पर फिर उसे अपनी उपेक्षा याद आ गई थी। वह बहन से प्रतियोगिता महसूस कर रही थी। मैंने उसे जलाने के लिए सुमन को और देर तक गले से लगाए रखा।
सुमन ने मेरा लिंग टटोला, “इतनी जल्दी खड़ा हो गया?”
“Ever ready for Pinki.”
इस बार सुमन नहीं सकुचाई। उसने हँसकर लिंग को सहला दिया और उसे थपथपाकर मुझे पिंकी की ओर ठेल दिया। मैं निहाल हो गया।
पिंकी दूसरी तरफ करवट ले रही थी, मैं उसे पकड़कर उसके ऊपर चढ़ गया। इस लड़की में जो भी अकड़ बची है, ठुकाई से ही जाएगी। एक बड़े इंजेक्शन की सुई की तरह लिंग को हाथ में पकड़ा और उसकी जांघों के बीच घुसाने लगा। अच्छा लगता यदि वह स्वेच्छा से, सहयोग करती हुई संभोग में उतरती। लेकिन चलो यही सही।
“ना-ना-ना…” वह जाँघें कसने लगी। हालाँकि बड़ी बहन का लिहाज करती हुई आवाज धीमी रखी।
“हाँ-हाँ-हाँ…” मैंने उसी लय में उत्तर दिया। “फिर से जबरदस्ती करवाकर ज्यादा मजा लेने का मन है क्या?”
वह शरमा गई। उसी क्षण की कमजोरी का फायदा उठाते हुए मैंने उसके पाँव अलगा दिए और अपना घुटना बीच में अड़ा दिया। मुझसे संघर्ष का परिणाम अभी कुछ देर पहले भी देख चुकी थी। मैंने दूसरा घुटना भी बीच में डाला तो वह ज्यादा जोर नहीं लगा पाई।
अब कील को ठोकने के लिए स्थिति अनुकूल थी। मैंने उसकी धड़ के दोनों तरफ हाथ टिकाए और उस पर झुकने लगा। लिंग सीधे भग-होठों के बीच जा लगा। अभी ऊपर सूखा था, इसलिए चिपक कर अटक रहा था। मैंने थोड़ा थूक निकालकर होठों पर लगा दिया। चिकना होते ही लिंग फिसलकर होंठों के पार हो गया।
मैं झुकता हुआ पिंकी के सीने पर सो गया। पिंकी की चंचलता और उसके भग होठों के अंदर की चिकनाई ने स्वतः ही लिंग को द्वार पर पहुँच गया और वह एक कुशल गोताखोर की तरह नीचे उतरने लगा।
“ओफ्फ, नो…!”
धीरे धीरे पेट से पेट, पेड़ू से पेड़ू सट गए। देख कर अंदाजा करना मुश्किल था दोनों के बीच कोई मोटी और लम्बी चीज घुसी हुई है। वह अचकचाई सी मुझे देख रही थी। उसकी नजर वहीं चली गई जहाँ हम एक-दूसरे से जुड़े थे।
“बोलो, कैसा लग रहा है?” मैंने हँसते हुए पूछा।
मुझे देखती देखती उसकी आँखें मुंद गईं। हालाँकि मुँह से अस्फुट ना-ना-ना निकल रही थी। मैं मुग्ध-सा उसके चेहरे को देख रहा था। योनि तंग थी और लिंग चौड़ा। मिलनेवाले आनन्द को इन्कार कर सकने की गुंजाइश नहीं थी।
पिंकी को मेरा पहला उपहार – पहले स्खलन का, कठोर लिंग की अपेक्षा कोमल जीभ से। उसके प्रति मेरे मन में बेहद कोमल भाव का प्रतिदान। मैं उठा और उसे जीत लेने के गर्व से सीधे उसके मुँह को चूमा। चरम सुख पाने की कृतज्ञता में उसने योनि के रस लगे मेरे मुँह का बुरा नहीं माना, मेरे चुम्बनों को बिल्कुल औरत की तरह विनम्रता से, मान जाने के भाव से ग्रहण किया। मैंने उसे गले लगा लिया।
सुमन आकर हमारे पास बैठ गई। मैंने उसे अपने पास खींचा और एक गाढ़ा चुम्बन दिया। उसी ने मुझे यह अनमोल उपहार दिया था। मुझे आश्चर्य हुआ कि उसने मेरे मुँह पर लगे पिंकी के रस की परवाह नहीं की और उत्तर दिया।
पुनः पिंकी की ओर मुड़ा तो वह मुँह घुमाने लगी। आलिंगन में लेने लगा तो बदन सख्त करने लगी। शायद सुमन को चूमने पर फिर उसे अपनी उपेक्षा याद आ गई थी। वह बहन से प्रतियोगिता महसूस कर रही थी। मैंने उसे जलाने के लिए सुमन को और देर तक गले से लगाए रखा।
सुमन ने मेरा लिंग टटोला, “इतनी जल्दी खड़ा हो गया?”
“Ever ready for Pinki.”
इस बार सुमन नहीं सकुचाई। उसने हँसकर लिंग को सहला दिया और उसे थपथपाकर मुझे पिंकी की ओर ठेल दिया। मैं निहाल हो गया।
पिंकी दूसरी तरफ करवट ले रही थी, मैं उसे पकड़कर उसके ऊपर चढ़ गया। इस लड़की में जो भी अकड़ बची है, ठुकाई से ही जाएगी। एक बड़े इंजेक्शन की सुई की तरह लिंग को हाथ में पकड़ा और उसकी जांघों के बीच घुसाने लगा। अच्छा लगता यदि वह स्वेच्छा से, सहयोग करती हुई संभोग में उतरती। लेकिन चलो यही सही।
“ना-ना-ना…” वह जाँघें कसने लगी। हालाँकि बड़ी बहन का लिहाज करती हुई आवाज धीमी रखी।
“हाँ-हाँ-हाँ…” मैंने उसी लय में उत्तर दिया। “फिर से जबरदस्ती करवाकर ज्यादा मजा लेने का मन है क्या?”
वह शरमा गई। उसी क्षण की कमजोरी का फायदा उठाते हुए मैंने उसके पाँव अलगा दिए और अपना घुटना बीच में अड़ा दिया। मुझसे संघर्ष का परिणाम अभी कुछ देर पहले भी देख चुकी थी। मैंने दूसरा घुटना भी बीच में डाला तो वह ज्यादा जोर नहीं लगा पाई।
अब कील को ठोकने के लिए स्थिति अनुकूल थी। मैंने उसकी धड़ के दोनों तरफ हाथ टिकाए और उस पर झुकने लगा। लिंग सीधे भग-होठों के बीच जा लगा। अभी ऊपर सूखा था, इसलिए चिपक कर अटक रहा था। मैंने थोड़ा थूक निकालकर होठों पर लगा दिया। चिकना होते ही लिंग फिसलकर होंठों के पार हो गया।
मैं झुकता हुआ पिंकी के सीने पर सो गया। पिंकी की चंचलता और उसके भग होठों के अंदर की चिकनाई ने स्वतः ही लिंग को द्वार पर पहुँच गया और वह एक कुशल गोताखोर की तरह नीचे उतरने लगा।
“ओफ्फ, नो…!”
धीरे धीरे पेट से पेट, पेड़ू से पेड़ू सट गए। देख कर अंदाजा करना मुश्किल था दोनों के बीच कोई मोटी और लम्बी चीज घुसी हुई है। वह अचकचाई सी मुझे देख रही थी। उसकी नजर वहीं चली गई जहाँ हम एक-दूसरे से जुड़े थे।
“बोलो, कैसा लग रहा है?” मैंने हँसते हुए पूछा।
मुझे देखती देखती उसकी आँखें मुंद गईं। हालाँकि मुँह से अस्फुट ना-ना-ना निकल रही थी। मैं मुग्ध-सा उसके चेहरे को देख रहा था। योनि तंग थी और लिंग चौड़ा। मिलनेवाले आनन्द को इन्कार कर सकने की गुंजाइश नहीं थी।