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हमारा छोटा सा परिवार complete

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१७७

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"अब आप तीनों इस सुहागन के सुहाग को पूर्ण करने के लिए इसका शरीर सुहागरात के लिए स्वीकार कीजिये ," मम्मी बोलीं और नानू ने उनकी नथ उतार दी। हमेशा की वर्षगाँठ की तरह यह क्रिया सुहागरात शुरू होने का द्योतक थी।

एक भाई ने मम्मी की साड़ी उतारी तो दुसरे भाई ने उनका ब्लाउज़ खोल कर उतार दिया। उनके विशाल उन्नत को उनकी ब्रा मुश्किल से संभाल पा रही थी। नानू ने अपनी बेटी के दोनों भारी गुदाज़ उरोजों को मुक्त कर दिया ब्रा के बंधन से।

नानू ने नाड़ा खोल दिया मम्मी के पेटीकोट का और सिल्क का पेटीकोट सरसरा कर उनके तूफानी झांगों के ऊपर सरक कर फर्श पर गीत पड़ा। मम्मी की सिल्क की लाल सुहागवली कच्छी में से उनके घुंगराली झांटें उत्सुकता से दोनों ओर बाहर झाँकने लगीं।

मम्मी ने बारी बारी से नानू के और अपने भाइयों के वस्त्र उतार दिए।

सबसे पहला हक़ तो पिता का ही होता है अपनी बेटी के ऊपर। मम्मी ने अपने पापा का हाथ पकड़ा और बिस्तर की तरफ चल पड़ीं ,"पापा सुशी भाभी ने दस दिनों से मेरी चूत और गांड में वि-टाइट और सो-टाइट लगा कर वायदा लिया है की हमारी सुहागरात की चादर पर यदि मेरे कौमार्यभंग होने वाले जितना खून न दिखे तो वो बहुत नाराज़ होंगीं अपने बाबूजी, पति और जेठ जी से। "मम्मी की इस बात से तीनों का दानवीय लंड मानों एक दो इंच और लम्बा मोटा हो गया।

नानू ने मम्मी को चित्त लिटा कर उनके पहली रात की तरह उनके चूमते हुए उनकी घुंगराली झांटों ढकी चूत के सुहाने द्वार पे अपनी जीभ लगा कर उसके कसेपन का अहसास किया। मम्मी की सिसकारियां निकलीं बंद ही नहीं हुईं। आखिर कितनी भाग्यशाली वधुओं को तीन वृहत लण्डधारी पतियों से साथ सुहगरात मनाने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

नानू ने अपनी बेटी की भारी जांघें फैला कर चौड़ा दीं। उनके दोनों भाइयों ने अपनी इंद्र की परियों से भी सुंदर बहन की एक एक जांघ अपने हांथों में संभाल ली। दोनों बही अपनी बहन का दुसरे कौमार्यभंग का जहर क्षण देखना कहते थे।

नानू ने अपना बड़े सेब जैसा सुपाड़ा मम्मी की कसी चूत के द्वार में फंसा कर अपने दोनों बेटों की ओर इशारा किया। मम्मी के दोनों भाइयों ने अपने खाली हाथों से मम्मी के कंधे दबा कर उनके निस्सहाय कर दिया आगे आने वाले दर्द के सामने। नानू ने बेदरद निर्मम धक्का मारा और तीन इन्चें ठूंस दीं अपने चार इंच मोटे लंड की अपनी बेटी की 'कुंवारी ' चूत में। मम्मी की चीख में मर्मभेदी दर्द भरा था। नानू ने उतनी निर्ममता से अपनी बेटी के चुचकों को खींचते हुए डोर्स धक्का मारा और एक तिहाई मोटा लंड उन्स्की चूत में ठूंस दिया। दो और धक्के और नानू के लंड दो और तिहाई भाग मम्मी की चूत फाड़ते हुए जड़ तक फंस गए।

मम्मी बिलबिलाते हुए चीखीं। उनके आंसू बहने लगे। जो भी दवाई बुआ ने लगायी थी वास्तव में जादू जैसी थी। मम्मी मर्मभेदी दर्द से न केवल रो रहीं थीं पर नानू से रुकने की गुहार भी कर रहीं थीं। पर यह तो उनकी सुहागरात थी। और उनके पहले नंबर के 'पति 'कहाँ रुकने वाले थे उनके आंसू बहाने से। शीघ्र ही नानू ने अपना लंड बाहर खींचा और उनके लंड के साथ मम्मी की से भरभरा के लाल गाड़ा खून बहने लगा जैसे उनकी पहले कौमार्यभंग की रात हुआ था पच्चीस साल पहले।

नानू ने मम्मी की चूचियां मसलते जो छोड़ना शुरू किया उस निर्मम वासनामयी अगम्यगमनी प्रेम को देख मैं सिहर उठी। नानू ने आधे घंटे तक मम्मी की चूत को बिना रुके मारा। दस मिनटों के बाद मम्मी दर्दभरी हिचकियाँ बंद हो गयीं और ' नववधू ' की सिसकारियों से सुहागरात का कमरा गूँज उठा। नानू ने मम्मी को दस बारह बार झाड़ कर उनके दुसरे पति के लिए उनकी चूत निकाल लिया। बड़े मामू ने अपनी सिसकती 'सुहागन पत्नी 'की चूत के रस को उनके पेटीकोट से सूखा दिया और फिर नानू जैसे भीषण धक्के से अपना लंड ठूंस दिया चार धक्कों में, आखिर बेटे किसके थे बड़े मामू। मम्मी की चूत गाड़ा खून रिसने लगा। बड़े मामू ने भी आधे घंटे तक मम्मी की 'कुंवारी ' चूत का मर्दन कर उन्हें अनेकों बार झाड़ दिया। फिर बारी थी छोटे भैया की। वो सवा सेर नहीं तो पूरे सेर से कम भी नहीं थे। उन्होंने भी अपने बड़े भाई की देखा देखी अपनी बहन की चूत सूखा कर अपने लंड से उन्हें तिबारा 'कुंवारेपन ' दर्द से भर दिया।

उसके बाद मम्मी के तीनो ‘पतियों ‘ने उन्हें बारी बारी हर मुद्रा में चोदा। क्योकि तीनो रुक रुक कर चोद रहे थे । मम्मी की चुदाई कई घंटों तक चली। मम्मी न जाने कितनी बार झड़ चुकीं थीं। मम्मी अब थकने लगीं थीं। और उनके 'पतियों 'ने अपनी नव-वधु की थकान को देख कर इस बार दनादन चोदते हुए अपने वीर्य की गरम बारिश अपनी पत्नी के गर्भ के ऊपर न्यैछावर कर दी।

मम्मी हफ्ते हुए बिस्तर पे ढलक कर गिर गयीं। ऐसी सुहागरात का सुख तो किसी सौभाग्यशाली नव-वधु के भाग्य में ही लिखा होता है।

"बेटी अब तो इस सुहगरात की खास शैम्पेन बनाने का समय है ," नानू ने मम्मी को याद दिलाया। मम्मी जैसे ही उठने लगीं तो दर्द से कराह कर बिस्तर पे गिर गयीं।

नानू अपनी बेटी को सहारा देकर चांदी के विशाल कटोरे के ऊपर ले आये। मम्मी ने अपने होंठों को दांतों से भींच कर अपनी 'कुंवारी ' चूत में से उबलते दर्द को सहने का निरर्थक प्रयास किया। जैसे ही उनके सुनहरी शर्बत ी धार निकली तो एक तेज़ दर्द की लहर ने मम्मी को बेचैन कर दिया।

लेकिन आखिर सालों का नियमभंग थोड़े ही होने देतीं मेरी मम्मी। खास तौर पे पच्चीसवीं वर्षगाँठ की सुहगरात का। उनका सुनहरा अमृत छलछल करता चंडी के कटोरे को भरने लगा। मम्मी की धार बंद हुई तो उन्होंने सुबकते हुए अपनी दर्दीली चूत के भगोष्ठों को फैला कर आखिरी बूँद भी बाहर टपका दी। इस अमृत से भरे चांदी के कटोरे में मिलायी गयी पच्चीस साल पुरानी शैम्पेन, ठीक उसी दिन बनायीं गयी शैम्पेन। अब बारी थी मम्मी के 'पतियों 'की। दुसरे चांदी के कटोरे में उनके तीनो पतियों का सुनहरी शर्बत इकठ्ठा करके उसमे भी शैम्पेन मिलायी गयी। मम्मी ने भरा अपने गिलास अपने पतियों के अमृत से मिली शैम्पेन ने अपनी नव वधु के अमृत से रमणीय शैम्पेन को लालचीपन से पिया।जब चारों ने अपनी ख़ास शैम्पेन खत्म कर ली तो ना केवल मम्मी थोड़ी सी नशे में थीं पर उनके आगे आने वाले दर्द के लिया थोड़ा नशा शायद अच्छा था।

फिर शुरू हुआ मम्मी की गाड़ के दूसरे कुंवारेपन का हरण। नानू ने उतनी बेदर्दी से ही मम्मी की गांड का दूसरा उद्घाटन किया जैसा पच्चीस साल पहले किया था। उसके बाद दोनों भाइयों ने भी। हर बार मम्मी के तीनो पतियों ने मम्मी की गांड से ताज़ा खून की धाराएं बह कर उनकी सुहगरात को पूरा परवान चढ़ा रहीं थीं। मम्मी की गांड आखिरकार उनके तीनो पतियों के वीर्य से भर गयी।

हर वर्ष की तरह दोनों मामाओं ने मम्मी को उल्टा लटका दिया और नानू ने नयी शैम्पेन की बोतल के गर्दन को मम्मी की दर्दीली गांड में ठूंस कर शैम्पेन से उनकी गांड भर दी। मम्मी ने जितनी देर तक हो सकता था उतनी देर तक शैम्पेन को अपनी गांड में रोका फिर उनसे नहीं रहा गया।

इस बार नए चांदनी के कटोरे में भर गयी मम्मी की गांड सी निकली शैम्पेन की नदी और मम्मी की मथी हुई गांड का मथा हुआ मक्खन। मम्मी के तीनो पतियों ने दिल खोल कर इस अमृत का गिलास भर भर के जलपान किया। मम्मी के कई बार कहने के बाद ही नानू ने उन्हें एक-दो घूँट दिए अपने गिलास से।

उसके बाद सब कुछ खुला खेल था। मम्मी की सुहगरात सुबह तक चली। उनकी दोहरी चुदाई हुई बारी बारी से। आखिर कार मम्मी आनंद के अतिरेक से बेहोश हो गयीं। उनके तीनों पतियों ने अपने लंड के वीर्य की बारिश से उनका सुंदर चेहरा नहला कर उनकी नासिका, दोनों आँखें भर दीं। सुबह जागने पर मम्मी को बहुत जलन होगी।

फिर चारों सो गए सुहागरात मना कर। मैं अपनी मम्मी की सुहागरात के सफल समापन से ख़ुशी के आंसू बहतो अपने कमरे में जाकर बिस्तर पे ढलक कर गहरी नींद की बाँहों में समा गयी।

 


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१७८

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सुबह सब देर से आये नाश्ते के लिए। वास्तव में समय तो दोपहर के खाने का सा था। मम्मी के बबल बिखरे हुए थे। गले पे काटने के निशान मम्मी की छुपाने के बावजूद दिख रहे थे। और फिर मम्मी की बिगड़ी चाल। सुशी बुआ कहाँ छोड़ने वालीं थीं अपनी भाभी उर्फ़ ननंद को।

"क्या हुआ सुन्नी भाभी। क्या किसी सांप ने काट लिया कल रात ?" सुशी ने खिलखिला कर पूछा।

" मेरी आवारा ननंद रानी, तुम यदि अपने सांप को काबू में रखतीं तो यह हाल नहीं होता मेरा ,"मम्मी ने ताना मारा।

" अरे भाभी मेरी यह तो पच्चीस साल से लिखा था आपके भाग्य में। इसमें मेरा क्या कसूर। और कौन रोक पता तीनों सांपों को कर रात, भगवान् भी नहीं रोक पाते। "और फिर सुशी भाभी ने मम्मी के गले में हीरों की नाज़ुक लड़ियों का हार पहना दिया। फिर दादी उठीं और उन्होंने अपनी बहु को फुसफुसा कर आशीर्वाद दिया और फिर उनकी कलाइयों पर बाँध दीं बेशकीमती हीरों की चूड़ियाँ।

लम्बे खाने के बाद नानू ने आराम करने का निश्चय किया। मम्मी की आँखें अपने भाइयों की ओर लगीं थीं। दादी ने पापा का हाथ पकड़ा और उन्हें गोल्फ के खेल के लिए ले गयीं। दादू ने बुआ की ओर हलके से इशारा किया। और दोपहर की जोड़ियां बन गयी कुछ की क्षणों में। मैंने नानू को कुछ देर सोने दिया फिर लपक के उनके बिस्तर में कूद आकर उन्हें जगा दिया। नानू को मैंने तैयार करके टेनिस के खेल के लिए मना लिया। नानू सफ़ेद निक्कर और टी-शर्ट में बहुत सुंदर लग रहे थे। मैं भी कम नहीं थी सफ़ेद गोल गले के टी-शर्ट और निक्कर में।

मैं और नानू दोनों प्रतिस्पर्धात्मक खेल खेलते थे। लेकिन नानू की लम्बी पहुँच ने मेरे युवापन के सहन-शक्ति को हरा दिया। पांच सेट का खेल था मैं ३-२ से हार गयी। पर नानू ने मुझे बाहों में उठा कर गर्व से चूमा तो मैं झूम उठी। नानू मेरी तरह मेहनत के बाद कमोतेजित हो जाते थे। इसीलिए तो मैं उन्हें टेनिस के लिए खींच

लायी थी।

"नेहा बेटी घर तक चलना दूभर है। क्या ख्याल है पंडितजी के घर के पीछे के झुरमुट के बारे में ," मैं तो यही चाह रही थी। नेकी और पूछ पूछ। मैंने बेसब्री से सर हिला दिया। नानू से मैं छोटी बंदरिया जैसे चिपकी हुई थी। जिस झुरमुट की बात नानू कर रहे थे वो हमारे मुख्य बावर्ची रामप्रसाद के घर के पीछे था।

जब नानू और मैं वहां पहुंचे तो वहां से साफ़ साफ़ आवाज़ें आ रहीं थीं।

"हाय नानू कितना लम्बा मोटा है आपका लंड ," यह अव्वाज़ पारो की बेटी रज्जो की थी।

"मेरी प्यारी नातिन तीन साल से ले रही अपने नाना के लंड को अभी भी इठला कर शिकायत करती है तू ," रामु काका की आवाज़ तो घर का हर सदस्य पहचानता था।

मैंने नानू की आँखों में एक अजीभ चाहत देखी। रज्जो मुझसे तीन साल छोटी थी। उससे किशोरवस्था के पहले वर्ष में चार महीने ही हुए थे।मैंने फुसफुसा कर नानू अपनी योजना बताई। नानू ने लपक कर पहले मेरे और फिर अपने सारे कपडे उतार दिए। उनका महा लंड तनतना कर थरथरा रहा था।

जैसे मैंने कहा था वैसे ही नानू ने बेदर्दी से मेरी चूत को अपने लंड पे टिका कर मेरे वज़न से अपना सारा का सारा लंड ठूंस दिया। मैं चीखती नहीं तो क्या करती। नानू मुझे अपने लंड पे ठूंस कर झुरमुटे के अंदर चले गए। वहां पर चिकनी चट्टान के ऊपर कमसिन रज्जो झुकी हुई थी और उसके पीछे भरी भरकम उसके नाना उसकी चूत में अपना मोटा लम्बा लंड ठूंस कर उसे चोद रहे थे।

"क्षमा करना हम दोनों को रामू रुका नहीं गया हम दोनों से। यदि बुरा न लगे तो मैं भी चोद लूँ अपनी नातिन को तुम्हारे साथ।" नानू ने साधारण तरीके से पूछा जैसे यह रोज़मर्रा की बात है एक नाना दुसरे नाना के सामने अपनी कमसिन नातिन को चोदे।

पहले तो रामु काका चौंकें फिर उनकी स्वयं की वासना के सांप ने उनके हिचकने के ऊपर विजय प्राप्त कर ली। नानू ने मुझे खड़े खड़े और रामु काका ने रज्जो को निहुरा कर आधा घंटा भर चोदा। रामु काका का संयम भी बहुत असाधारण था।रज्जो और मैं अनेकों बार झड़ गए उस समय में। अब मैंने दूसरा तीर मारा ," रामु काका मेरा बहुत मन है आपके लंड से चुदने का यदि रज्जो को कोई समस्या नहीं मेरे नानू के लंड चुदने की। "

बेचारी रज्जो जो शुरू में शर्म से लाल हो गयी थी अब खुल गया ,"नहीं नेहा दीदी। मैं तैयार हुँ यदि नानू को आपत्ति न हो तो। "

रामू काका ने अपना लंड रज्जो की चूत में निकाल लिया और नानू ने मुझे भी चट्टान के ऊपर निहुरा दिया। फिर दोनों नानाओं ने नातिन बदल लीं। रामु काका का नौ इंच का तीन इंच मोटा लंड मेरी गरम चूत में घुस गया। रज्जो की चीख निकल गयी जब नानू का कम से कम तीन इंच ज़्यादा लम्बा और एक इंच और मोटा लंड उसकी अल्पव्यस्क चूत के घुसा तो।

नानू ने रज्जो के नींबू जैसे चूचियों को देदर्दी से मसलते हुए दनादन धक्कों से चोदा। रामू काका भी मुझ पर कोई रहम नहीं खा रहे थे। आधे घंटे के बाद भी दोनों नानाओं के लंड भूखे थे। जैसे दोनों नाना एक दुसरे के विचार जानते हों वैसे ही दोनों ने अपने लंड रज्जो और मेरी चूत से निकाल कर हमारी गांड में ठूंस दिया। रज्जो की चीख मुझसे बहुत ऊंचीं थी। पर दस मिनटों में हम दोनों फिर से सिसकने लगीं। इस बार दोनों नानाओं ने एक दुसरे की नातिन की गांड अपने वीर्य से भर दी। रज्जो ने अपने नानू का मेरी गांड से निकला और मैंने अपने नानू का रज्जो की गांड से निकले लंड को प्यार से चूस चाट के साफ़ कर दिया। दोनों को बहुत देर नहीं लगी फिर से तैयार होने में और इस बार नानू ने रज्जो को घास पर लेट कर अपने लंड ले लिटा लिया और उसके नानू ने उसकी गांड में अपना लंड ठूंस दिया। रज्जो की दर्द से हालत ख़राब हो गयी पर मैंने सुशी बुआ से सीख याद कर अपनी चूची ठूंस दी उसके मुँह में।

आधे घंटे में रज्जो अनेकों बार झड़ कर थक के ढलक गयी और अब मेरी बारी थी। इस बार रज्जो के नानू ने मेरी चूत मारी और मेरे नानू ने मेरी गांड। मेरे सबर का इनाम मुझे मिला जब दोनों ने मेरी चूत और गांड भर दी अपने गरम वीर्य से।

चुदाई के बाद रामू काका ने सच बताया। रज्जो वास्तव में रामू काका की बेटी थी। नानू ने उसी समय रज्जो को अपनी छत्रछाया में ले लिया और उसकी लिखाई पढ़ाई की ज़िम्मेदारी अब हमारे परिवार की थी।

उसके बाद रामू काका ने मेरी और नानू ने रज्जो के दोनों छेदों की घंटा भर चुदाई कर हम चारों की अकस्मत भोग-विलास का समापन किया। रज्जो को अब कम से कम दो नानाओं का ख्याल रखना पड़ेगा। वास्तव में वो बच्ची बड़ी भाग्यशाली थी।

उस रात के खाने के बाद मम्मी मुश्किल से चल पा रहीं थीं। उस रात उन्हें सिर्फ सोने की फ़िक्र थी। नानू को अपनी बेटी के सुनहरे शर्बत और हलवे की लालसा। मम्मी और नानू एक साथ सोये। नानू सुबह होते होते मम्मी के शरीर के हर मीठे द्रव्य और पदार्थ का भक्षण करने के लिए तत्पर थे।

दादी ने पकड़ा अपने बेटे को। दादू ने अपनी बेटी को ठीक नानू की इच्छा के इरादे से। और मैं फंस गयी अपने दोनों मामाओं के साथ।

बड़े और छोटे मामा ने पूरी रात मुझे रौंद कर रुला दिया फिर तरस खा कर एक शर्त पर सोने दिया। उन दोनों ने मुझसे वायदा लिया कि हफ्ते भर तक मेरे सुनहरे शर्बत और गांड के हलवे पर सिर्फ उनका हक़ था। और पहली किश्त उस रात ही लेली मेरे दोनों मामाओं ने। उन्होंने मुझे सिखाया कैसे गांड का हलवा खिलाया जाता है। मैं तेज़ी से सीख गयी और जब एक मामू का मुँह भर जाता तो तुरंत गुदा भींच कर दुसरे मामू का मुँह भर देती।

आखिर में मुझे सोने को मिल गया। बुरा सौदा नहीं था। खूब चुदाई , मामाओं का सुनहरी शर्बत और हलवा और आराम करने का मौका। नेहा तू अब होशियार होने लगी है , मैंने अपनी बड़ाई की बेशर्मी से।

 
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सुबह नाश्ते पर है किसी को मेरी गर्दन पर काटने के निशान, मेरे होंठों पर सूखे भूरे पदार्थ के निशान और मेरे बालों में सूखे वीर्य के थक्के साफ़ दिख रहे होंगें। दोनों मामाओं को जब नानू , दादी और दादू ने घूर कर देखा तो दोनों ऐसे भोले बन गए जैसे मक्खन भी न पिघले उनके मुँह में।

दादी ने मुझसे प्यार से पूछा , "नेहा बिटिया तुझे नहलाये हुए तो मुझे वर्ष बीत गए। चल आज तुझे बचपने जैसे नहला दूँ। "

मुझे चोरी चोरी दादी माँ के नंग्न सौंदर्य की याद बिलकुल ताज़ा थीं। उनके शरीर को पास से देखने और छूने का लालच से मैं बेचैन हो उठी।

दादू दौड़ने के लिए चले गए और नानू मम्मी के साथ गोल्फ खेलने चल दिए। पापा ने बुआ को खरीदारी और बाहर खाना खिलाने के लिए शहर चल पड़े। मेरे दोनों मामाओं ने पारो को बुलवाया मालिश के लिए। मैंने मन ही मन छोटी से प्रार्थना की पारो चाची के लिए। आजकल मेरे दोनों मामा बौराये सांड की तरह थे।

मैं दादी के साथ उनके सुइट की तरफ चल पड़ी। दादी ने मुझसे कोई भी सवाल नहीं पूछा। जैसे ही उन्होंने मेरी सोने वाली टी-शर्ट उतारी तो लाल नीले थक्के से मेरा बदन भरा हुआ था। दादी ने मुस्कुरा कर कहा ,"बेटी तेरे मामू तुझे देख कर सब्र खो देतें हैं। "

मैं शर्मा गयी, "दादी नानू भी। "

दादी ने अपना सोने वाला गाउन उतार फेंका। उनका उज्जवल सौंदर्य अब सिर्फ एक तंग सफ़ेद कच्छी में छुपा हुआ था। उनकी कांघें घने बालों से भरी थीं। और उनकी झांटें ना केवल उनकी कच्छी से बाहर झांक रहीं थीं बल्कि उनकी जांघों तक फैली थीं।

"नेहा बेटी नहाने से पहले कुछ करना है ?" दादी ने मुस्करा के पूछा

मैंने फुसफुसा कर मन की बात बता दी दादी को।दादी ने मेरे मुँह के ऊपर अपनी चूत लगा कर भर दिया मेरा मुँह अपने सुनहरी शर्बत से। मैं गटक गयी दादी के अमृत को। दादी ने दस बार भरा मेरा नदीदा मुँह और मैं सटक गयी हर बून्द दादी के कीमती सुनहरी शर्बत की। दादी ने मेरे सुनहरी शर्बत को भी उतने चाव से पिया तो मैं मानों स्वर्ग में पहुँच गयी।

फिर हुआ मेरे और दादी के बीच वोह आदान प्रदान जिसे काफी लोग विकृत कहें पर हम दोनों को तो वह बिलकुल प्राकृतिक और नैसगिक लगा। पर मैंने दक्षता से दादी को मन भर हलवा परोसा। दादी ने भी मुझे मेरा मन भर हलवा परोसा। फिर मुझे दांत साफ़ कर दादी ने टब भर के अपनी गोद में बिठा लिया। दादी ने पानी में सुगन्धित नमक और एलो-वीरा का तेल मिला दिया था। दादी के हाथ मेरे चूचियों के ऊपर मचल रहे थे। दादी के कहने पर मैंने शुरू से सारो अपनी संसर्ग की यात्रा सूना दी।बड़े मामू, सुरेश चाचू, अकबर चाचू, राजू काका और भूरा, रामू चाचू और रज्जो और बाकि सब कुछ।

दादी के हाथ मेरी जांघों के बीच मचल रहे थे, "बेटी पहली बार वाकई बहुत खास होती है।तेरे बड़े मामू बहुत ही सौभाग्यशाली हैं। "

मैं शर्मा के सर हिलने लगी ,"दादी आपका पहली बार किसने किया था ?"

"क्या किया था मेरी बेटी खुल कर बोलै न ,"दादी ने मेरे भग-शिश्न को मसलते हुए कहा।

"दादी माँ आपकी पहली चुदाई किसने की थी ,"मैंने खुल कर पूछा।

"नेहा याद है तुझे मेरी बड़ी बहन के पति यजुवेंद्र सिंह की। शांति दीदी मुझसे छह साल बड़ी थीं। उनकी शादी तो पन्द्रह साल होते ही तय हो गयी थी पर उनका स्कूल खत्म होने का इन्तिज़ार था,” दादी ने कहानी की शुरुआत की।

 


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दादी माँ ( निर्मला देवी ) की यादें

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जब शांति दीदी ने बीऐ पास कर ली तो उनके उन्नीस साल होते होते शादी की तारिख तय हो गयी। जीजू हमारे परिवार के करीब के दसौत थे और उनका बेरोकटोक आना जाना था। जीजू दीदी से एक साल बड़े थे। उन्होंने शादी तय हॉट ही अपने हक़ जाताना शुरू कर दिया था पानी सा;ली के ऊपर। मेरे बचपने को अनदेखा कर जब मौका मिलता जीजू मेरे आपके शरीर को मसलते नौचते। मैं भी ना चाहते हुए उनकी बढ़तीं इच्छाओं का इन्तिज़ार करती। शादी के एक महीने पहले होली थी और जीजू अब बीस साल के लम्बे चौड़े ऊंचे सुंदर जवान थे। होली पर उन्होंने मेरी आफत मुला दी। खूब मसला मेरी उगती चूचियों को। जीजू ने मेरी मम्मी पापा और दीदी और और घरवालों के सामने ही ही मेरी कुँअरि चूत को कुरेदने लगे। मैं बिलबिला कर गुस्सा हो गयी और चीख कर उन्हें दूर कर दिया। उनका चेहरा दुःख से एकदम उदास हो गया। शायद मेरा बचपना था या जीजू का बेसबरापन पर होली के आनंद में पत्थर फिंक गए। मैं पैर पटकती अपने कमरे में चली गयी। मुझे पता भी नहीं चला जीजू के आँखों में आंसूं आ गए। उन्होंने तुरंत मम्मी से माफ़ी मांगीं पर मेरे पीछे मम्मी ने उन्हें गले लगा कर कहा , "नन्ही है पर तुमने कुछ गलत नहीं किया। एक गलती की तो उसे छोड़ दिया। एक बार दबा लिया था तो चाहे चीखे चिल्लाये छोड़ने का ता सवाल ही नहीं होता। "

पापा ने भी उन्हें उत्साहित किया , "बेटे छोटी साली तो नखरे दिखाएगी ही। उसके नखरों से डरना थोड़े ही चाहिए। यदि मैं डर जाता तो तीन तीन छोटी सालियाँ हैं मेरी। तीनो की सील कौन तोड़ता ? एक तो निरमु से एक साल छोटी थी जब मैंने उसकी सील तोड़ी। "

मम्मी ने मेरे कमरे आ कर मुझे डांटा। मैं अब तक अपनी गलती समझ चुकी थी। मैं रुआंसी हो गयी। आखिर माँ तो माँ ही होती है मम्मी ने मुझे गले लगा कर मांफ कर दिया और ऊंच-नीच समझायी जीजू-साली के रिश्तों की।

मैं अब नए ज्ञान से परिचित हो कर बेधड़क हो गयी। रात के खाने के समय मैंने सिर्फ एक टी-शर्ट पहनी मम्मी के कहने से। ना नीचे कच्छी।

जब जीजू ने मुझे देखा तो तुरंत सॉरी कहने लगे मैं भड़क कर उनकी गोद में बैठ गयी, "सॉरी किसे कह रहे हैं जीजू। सॉरी कहना अपनी अम्मा को। मैं तो आपकी साली हूँ। यहाँ सॉरी की कोई जगह नहीं है। "

जीजू का सुंदर चेहरा खिल उठा। दीदी का सुंदर मुँह ने मुझे दूर से चुंबन भेजा। मम्मी और पापा मुस्करा दिए। मैंने जीजू की गोद नहीं छोड़ी। पापा ने जीजू को ख़ास स्कॉच दी और दोनों थोड़े टुन्न होने लगे। मुझे लगा की जीजू ज़्यादा स्कॉच न पीलें। मैंने मटकते हुए कहा ," जीजू आप मेरे कंप्यूटर को ठीक करो प्लीज़। "

मेरा बहन इतना ढीला था की मम्मी और दीदी की हंसी फूट पड़ी। पर जीजू ने दोपहर की गलती को याद करके मेरा मज़ाक नहीं उड़ाया और सबसे माफ़ी मांगने के बाद मुझे उठा कर मेरे कमरे में ले गए।

पहुँच कर जैसे जीजू शैतान बन गए। उन्होंने मुझे मेरे बिस्तर पे फेंक दिया और मेरी टी-शर्ट के चिट्ठड़े कर दिए। अब मैं पूरी नंगी जीजू के सामने कांप रही थी। जीजू ने अपने सारे कपडे उतार दिए और उनका लम्बा मोटा लंड तन्नाया हुआ था।

जीजू ने प्यार से मेरे थिरकते होंठों को चूमा फिर उनके होंठ मेरे अविकसित चूचियों को चुसते मेरे उभरे बचपने के पेट के ऊपर थे। उन्होंने मेरी नाभि को जीभ से खूब कुरेदा। मैं अब वासना के रोमांच से मचलने लगी।

जब जीजू ने मेरी कोरी चूत को जीभ से खोला तो मैं बिस्तर से उछल पड़ी। जीजू ने मुझे बिस्तर पर दबा कर खूब मन लगा कर मेरी चूत को चूसा और अचानक मैं अपनी कमसिन उम्र के पहले रतिनिष्पत्ति के कवर में जल उठी।

"जीजू अब मुझे चोदिये ,"ना जाने कहाँ से ऐसे अश्लील शब्द मेरे मुँह से फूट पड़े।

जीजू ने अपना लंड अपनी किशोरावस्था के पहले चार महीनों में लडखती साली की कुंवारी चूत के द्वार के ऊपर टिका दिया।

"साली जी थोड़ा दर्द होगा ,"जीजू ने हौले से कहा।

"हाँ जीजू मम्मी ने सब बता दिया है। मैं चीखूँ तो आप मेरा मुँह दबा देना ,"मैंने जीजू को विश्वास दिलाया अपने निर्णय का।

फिर क्या था। जीजू बिफर गए कामोत्तेजित सांड की तरह। उन्होंने मुझे अपने नीचे दबा लिया। काफी आसान काम था उनके लिए। कहाँ मैं चार चार दस इंच की बालिका कहाँ जीजू छह फुट दो इंच के भारी भरकम मर्द। उनका लंड मेरी कुंवारी चूत के द्वार के ऊपर दस्तक देने लगा। जीजू ने मेरा मुँह दबा लिया अपने चौड़े हाथ से, और भयंकर धक्का लगाया। मेरी चीख सारे घर में गूँज उठती यदि मेरा मुँह नहीं बंद होता जीजू के हाथ के नीचे। जीजू न मेरे बिबिलाने की परवाह की और न ही मेरे बहते आंसुओं की। एक के बाद एक भयंकर धक्के लगा लगा कर जड़ तक ठूंस दिया अपने विकराल लंड मेरी कुंवारी चूत में। मैं रो रो कर तड़पती रही पर जीजू ने पिशाचों की तरह बिना तरस खाये मेरी चूत का मर्दन करते रहे। मैं अब शुक्रगुज़ार हूँ जीजू की। आधे घंटे में मेरा दर्द काफूर हो गया और मैं अब सिसक रही और ज़ोर से चुदने के लिए। एक घंटे बाद जब मैं कई बार झड़ गयी तो जीजू ने मेरी कुंवारी चूत को अपने वीर्य से सींच दिया।

 
फिर क्या था। जीजू बिफर गए कामोत्तेजित सांड की तरह। उन्होंने मुझे अपने नीचे दबा लिया। काफी आसान काम था उनके लिए। कहाँ मैं चार चार दस इंच की बालिका कहाँ जीजू छह फुट दो इंच के भारी भरकम मर्द। उनका लंड मेरी कुंवारी चूत के द्वार के ऊपर दस्तक देने लगा। जीजू ने मेरा मुँह दबा लिया अपने चौड़े हाथ से, और भयंकर धक्का लगाया। मेरी चीख सारे घर में गूँज उठती यदि मेरा मुँह नहीं बंद होता जीजू के हाथ के नीचे। जीजू न मेरे बिबिलाने की परवाह की और न ही मेरे बहते आंसुओं की। एक के बाद एक भयंकर धक्के लगा लगा कर जड़ तक ठूंस दिया अपने विकराल लंड मेरी कुंवारी चूत में। मैं रो रो कर तड़पती रही पर जीजू ने पिशाचों की तरह बिना तरस खाये मेरी चूत का मर्दन करते रहे। मैं अब शुक्रगुज़ार हूँ जीजू की। आधे घंटे में मेरा दर्द काफूर हो गया और मैं अब सिसक रही और ज़ोर से चुदने के लिए। एक घंटे बाद जब मैं कई बार झड़ गयी तो जीजू ने मेरी कुंवारी चूत को अपने वीर्य से सींच दिया।

जीजू ने अपना लंड मेरी चूत से बाहर नहीं निकाला और फिर तीन बार चोदा मुझे। फिर जीजू ने मुझे सुनहरी शर्बत का खेल सिखाया। मैं थकान से टूट चुकी थी पर जीजू का मन नहीं भरा था अपने खिलौने से। अब उन्होंने मेरी गांड का कौमार्यभंग किया। मैं इतना रोई की मेरी नाक भी बहने लगी पर जीजू ने बिना तरस खाये मुझे घंटों चोदा मेरी गांड में।उस रात की आखिरी बात जो मुझे हमेशा याद रहेगी- जीजू ने इस बार मुझे गांड के मक्खन का स्वाद चखाया और मैं अब उनकी दासी बन गयी। दीदी की शादी के बाद जीजू ने मुझे हज़ारों बार चोदा। और फिर जब मेरी शादी तेरे दादू के साथ हो गयी तो जीजू और तेरे दादू ने अदल बदल कर दीदी और मुझे खूब चोदा।

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वर्तमान में

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मैंने दादी की होंठों को चूम कर पूछा ,"किसका लंड बड़ा है दादी आपके जीजू का या दादू का ?"

दादी ने मुस्कुरा कर कहा , "बेटा फ़िक्र मत कर इस घर के मर्दों से बड़े लंड कहीं नहीं हैं। मेरे जीजू का लण्ड खूब मोटा दस इंच का था पर तेरे दादू का लंड तो और भी मोटा और लम्बा है। "

मैं अब बहुत गरम हो चली थी, "दादी पापा का लंड कितना बड़ा है ?"मैं पूछते हुए शर्म से लाल हो गयी।

" नेहा बेटा बेटी के लिए उसके पापा का लंड बहुत ख़ास होता है। जब मैंने अपने पापा के लंड को पहली बार लिया था तो मुझे उनके लंड के सामने किसी और लंड की कामना भी नहीं थी। पर तेरे पापा का लंड तेरे दादू से बाइस है।" दादी ने मेरे भग-शिश्न को मसलते हुए कहा।

"क्या यह सिर्फ पोती और दादी के लिए है या दादू भी स्नान के लिए टब में आ सकतें हैं ," ना जाने कब दादू अपनी दौड़ के बाद पसीने से लथपथ घर आ गये थे।

"अरे इन्तिज़ार किसका कर रहें हैं कपड़े उतारिये और अंदर आ जाइये ," दाद ने दादू को उकसाया।

दादू ने अपना ट्रैक-सूट एक झटके में उतार दिया। उनका भारी भरकम भालू जैसा बालों से भरा शरीर पसीने से भीगा था। मैं कूद कर दादू की गोद में बैठ गयी बिना शर्म के। दादू ने मुझे दिल भर कोर चूमा फिर मैंने उनकी बालों भरीं पसीने से लथपथ कांखों को मन भर चूसा। मैंने मन लगा कर के पसीने की हर बूँद चाट ली उनके बालों भरे सीने से।

"नेहा बेटा तेरे दादू का लंड तैयार है अपनी पोती के लिए। चढ़ जा अपने दादू के घोड़े पर ," दादी के शब्दों के बची-कुची शर्म का पर्दा खींच कर फेंक दिया।

मैं बिना शर्म के दादू के विकराल लंड के ऊपर बैठ गयी ,"मुझसे नहीं डाला जायेगा आपका लंड अपनी चूत में। "

दादी ने मेरे कंधे दबाये दादू के लंड के ऊपर। मेरी चूत दादू ले लंड को निगलने लगी धीरे धीरे। दादू ने जड़ तक अपना लंड ठूंस कर मेरी चूत का मीठा मर्दन शुरू कर दिया। जब मैं दस बारह बार झड़ चुकी तो उन्होंने मुझे उठा कर टब में घोड़ी बना कर चोदा। मैं सिसक सिसक कर झड़ती रही। दादू का लंड फचक फचक की आवाज़ें पैदा करता मेरी चूत में पिस्टन की तरह अंदर बाहर आ जा रहा था।

बिना मुझे आगाह किये दादू ने अपना लंड मेरी चूत में से निकाल कर मेरी गांड में ठूंस दिया। मेरी चीखों ने दादू को और भी उत्साहित किया मेरी गांड को बेदर्दी से चोदने के लिए।

लम्बी चुदाई के बाद दादू ने मेरी गांड भर दी अपने गरम वीर्य से। फिर मुझे मिला दादू और दादी का सुनहरा शर्बत और दादू और दादी को मेरा।

फिर हम तीनो बिस्तर को ओर चल पड़े, मेरे आगे दिन भर की चुदाई थी दादी और दादू के साथ।

अब मेरा परिवार प्रेमग्रस्त था। शायद यह मेरी कल्पना है मेरे परिवार में तो प्रेम की बिमारी सालों से ही थी। बस मुझे ही ही देर से लगी यह जलन। लेकिन अब लग गयी तो बुझने का नाम ही नहीं लेती। सुशी बुआ मुझे चिढ़ातीं कि घर में एक लंड है जिसकी मैंने सेवा नहीं की है। मैं शर्म से लाल हो जाती। बुआ मेरे पापा की ओर इंगित कर रहीं थीं।

फिर अचानक मम्मी ने एक रहस्य खोला तो मेरा जीवन ही बदल गया।

 
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१८०

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एक शुक्रवार की शाम को जैसे जादू से सारे मर्द इकट्ठे क्लब चले गए। मुझे उस दिन घर में काफी ख़ामोशी सी भी लग रही थी। जब मैं पारिवारिक-कक्ष में गयी तो मम्मी चिंतित लग रहीं थीं। सुशी बुआ उन्हें अपने से लिपटा कर जैसे उन्हें साहस सा दे रहीं लग रहीं थीं। दादी मम्मी के बालों सो सहला रहीं थीं। जैसे बेटी समझ जाती है वैसे मुझे एक क्षण लगा समझने में कि मम्मी की समय हैं यह। मुझे मेरे हँसते मुस्कराते घर में गंभीरता बिलकुल नहीं सुहाई।

मुझे देख कर मम्मी के आँखें नुम हो गयीं। मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा। "सुन्नी, हमारी नेहा लाखों में एक है। उसे बता को तो देख ,"सुशी बुआ ने मम्मी को उकसाया।

दादी माँ ने सर हिला कर सम्मति दी। मैंने घबराते हुए पूछा ,"मम्मी क्या बात है? मुझे बतिये ना। मैंने क्या कोई गलती की है ?"

मैंने कालीन पे बैठ कर मम्मी की गोद में अपना मुंह छुपा लिया।

बुआ ने अब गंभीरता से कहा , "सुन्नी तू नहीं बताएगी तो मैं बता दूंगीं। पर नेहा को तुझसे ही पता चलना चाहिए। "

मम्मी के सुंदर चहरे पे दर्द की छाया मेरे ह्रदय में भले खोंप रही थी। आखिर कार मम्मी ने गहरी सांस ले कर मेरे बालों को चूमा ,"बेटी यदि तेरी माँ की बात से तू अपनी माँ से नाराज़ हो गयी या उस से घृणा करने लगी तो मैं मर जाऊंगी। "

मुझे रोना आ गया ,"मम्मी आपकी बेटी कभी आपसे नाराज़ कैसे हो सकती है। और घृणा आपकी ओर उस से पहले अपनी जीभ न काट लूंगी मैं। "

मम्मी ने मुझे गले लगा लिया और हम दोनों रोने लगीं। बुआ और दादी ने भी मुश्किल से सुबकियां रोकीं। बुआ ने वातावरण को हकला करने के लिए झूटे गुस्से से कहा ,"अभी किसी ने कुछ कहा भी नहीं और देखो हम चारों टसुए बहाने लगीं। चल अब मुँह खोल सुन्नी। वरना मैं तेरी चूत में दाल दूँगी बेलन। " मम्मी और दादी न चाहते हुए भी मुस्कुरा दीं। बुआ की जानबूझ कर फूहड़ सी बात से वातावरण वाकई हल्का हो गया।

"नेहा बेटा जब तू चार साल की थी तब मुझे लिंफोमा जिसमे ल्यूकीमिआ का मिश्रण था हो गया। "

मैं सन्न रह गयी। मेरी प्यारी मम्मी को कैंसर था और मुझे बताया भी नहीं किसीने। बुआ ने तुरंत मेरे चेहरे को देख कर कहा ," देख नेहा हत्थे से छूटने मत लग जाना। तेरी मम्मी का कैंसर बहुत ही जल्दी पकड़ लिया था डॉक्टरों ने। सुन्नी ने खून की जांच कराई थी दुबारा गर्भित होने से पहले। "

मम्मी ने बात संभाली , "सुशी बुआ सहीं कह रहीं हैं। इसीलिए हम सबने तुझ से यह बात छुपाई। मेरी स्टेज बहुत शुरुआत की थी और कीमो से सब ख़त्म हो गया। पर हमने घबराहट में एक गलती कर दी ," और मम्मी की हिचकियाँ बंध गयीं फिर से।

दादी ने बात संभाली अब ,"नेहा बेटा हम सब सुन्नी के स्वास्थ्य के लिए इतने परेशां थे कि सुन्नी के अण्डाणु को बैंक में बचाना भूल गए। तेरी माँ की तबसे इच्छा थी कि तेरे जैसी प्यारी बेटी या वैसा ही प्यारा बेटा की। लेकिन सुन्नी को तेरा बहन या भाई तेरे जैसा ही चाहिए। अंकु का वीर्य तो है पर सुन्नी के अण्डाणु जैसे अंडे तो सिर्फ तेरे पास हैं। "

मैंने लपक चूमा , "मम्मी मैं तैयार हूँ सब करने को पर आप उदास मत हो। "

"नेहा बेटा हम तेरे बचपन को छोटा नहीं करना चाहते पर तुझे सत्य का आभास तो देना ही पड़ेगा हमें। सुन्नी तैयार थी की तेरे अण्डाणु को अंकु के वीर्य से गर्भादान करके सुन्नी के गर्भाशय में स्थापित करने के लिए। पर हार्मोन्स इतने सारे देने पड़ेंगें की सुन्नी की बिमारी वापस आने का खतरा है। सुन्नी तो तैयार है पर हम सब नहीं। अंकु के लिए तेरी मम्मी को एक बार खोने का डर के बाद अंकु सुन्नी को कोई खतरा नहीं लेने देगा ," बुआ ने विस्तार से बताया।

मैंने सुबकते हुए कहा ,"बुआ मैं सब कुछ करूँगीं जो ज़रूरी है। पर मम्मी को खतरा नहीं लेने दूंगीं।आप मुझे बताइये मुझे क्या करना है ?"

बुआ बागडोर संभाली,"देक्झ मैं तेरी माँ को हरगिज़ नहीं उसकी ज़िन्दी खतरे में डालने दूँगी। चाहे मुझे उसे बांधना पड़े। सुन्नी मेरी ननद या भाभी ही नहीं मेरी छोटी बहन है।,"बुआ भावुक हो गयीं ,"देख नेहा तू हिसाब लगा कि क्या होना चाहिए। तेरे पापा के वीर्य के शुक्राणु तेरे अंडे जो सिर्फ तेरे गर्भ में पल सकते हैं। "

बुआ ने मुझे अध्यापिका की तरह देखा जैसे वो किसी मंदबुद्धि के छात्र का उत्साहन कर रहीं हों। मम्मी का चेहरा शर्म से लाल हो गया पर दादी मंद मंद मुस्कराने लगीं।

बुआ ने झल्ला कर कहा ,"अरे मेरी मेधावी नेहा बिटिया सिर्फ एक रास्ता है। तेरी शादी अंकु के साथ और जितने तेरी मम्मी चाहे उतने बेटी-बेटे ,समझी !" मैं भी शर्म से लाल हो गयी पर बुआ कहाँ पीछा छोडने वालीं थीं , "बोल क्या कहती है। "

मैंने मम्मी को ओर देखा फिर शर्म सर झुका कर ज़ोर से हाँ कर दी।

मम्मी ने मुझे गले लगा कर रो पड़ीं। दादी की आँखें भी बहने लगीं। बुआ अब वास्तव में सुबक रहीं थीं पर सुशी बुआ तो सुशी बुआ थीं ,"देख सुन्नी अभी भी सोच ले इस शैतान नेहा को अपनी सौतन बनाने से पहले।"

दादी माँ ने अपनी बेटी तो डांटा , "अरे सुशी सौतन होगी तेरी। मेरी नेहा बिटिया तो अब मेरी बहु की बेटी ही नहीं बहन भी हैं। "

बुआ ने कहा, "देखो सब लोग। यह शादी सिर्फ घर में ही रहेगी पर धूमधाम में कोई कस्र नहीं सहूंगीं मैं। मम्मी देखो नेहा के लिए सारे ज़ेवर नए होने चाहियें। "

मैंने शरमाते हुए कहा , "नहीं बुआ यदि मम्मी को कोई आपत्ति न हो तो मैं उनकी शादी का जोड़ा पहनूंगीं अपनी शादी पे। "

मेरी बात सुनकर तीनों फिर से सुबक उठीं एक दुसरे से लिपट कर । "स्त्रियां न समझी जाएँ, न संभाली जाएँ," मैंने सोचा और फिर मैं भी सुबकने लगी।

 
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१८९

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दो दिन में सारे परिवार के लोग इकट्ठे हो गए। नरेश भैया और अंजू भाभी तो उसी शाम आ गए अपनी निजी हवाई-जहाज से। मनु भैया और नीलम भाभी ने अपना मधुमास को तोड़ कर दुसरे दिन आ गए। सुरेश चाचू और नमृता चाची तो जैसे इसी दिन का इन्तिज़ार कर रहे थे। उनके बेटी बेटा , मीनू, संजू, ऋतू मौसी और राजन मामू शाम तक आ गए। घर भरने लगा धीरे धीरे। गंगा बाबा और जमुना दीदी ने संभाला खाने पीने का इंतिज़ाम। नमृता चची के पिता जी साथ साथ आये। अकबर चाचू, शब्बो बुआ , शानू , नसीम आपा , आदिल भैया,, अरे नहीं नहीं, आदिल जीजू और फिर अकबर चाचू की दोनों सालिया शन्नो और ईशा। राजू चाचू , रत्ना चाची, सुकि दीदी , रामु काका, पारो चाची और उनकी नन्ही रज्जो तो घर में ही थे। भूरा को कौन भूल सकता था।

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नमृता चाची, शब्बो बुआ और सुशी बुआ ने संभाला मुझे। यानि की मेरी हर पल हर दिन हालत ख़राब करने की ज़िम्मेदारी ले ली इन दोनों आफत की पूड़ियाओं ने। सब के सब जोड़ियां बना कर रात भर ( दिन में भी) चुदाई करते पर मेरे और पापा के लिए सब बंद था। मम्मी भी ख़ुशी मिल गयीं थीं। हर दिन सुशी बुआ और नमृता चाची मेरी चूत और गांड में सो-टाइट और वी - टाइट खूब मात्रा में लगाती जिस से मैं दस दिनों में कुंवारी होने से भी ज़्यादा कास जाऊं , "देख नेहा अंकु ने यदि सुहागरात की चादर को तेरे गाड़े खून से लाल नहीं किया तो शर्म की बात होगी,"और फिर दोनों खिलखिला कर हंस देतीं।

शादी का दिन तय था मेरे मासिक धर्म से। दस दिनों में मेरा पहला सबसे उर्वर दिन होगा और मेरे अंडे तरस रहे होंगे पापा के वीर्य से मिलने के लिए - यह मेरा नहीं नमृता चाची का विवरण है।

और फिर हर दिन बिना वजह के हल्दी-चन्दन के उबटन और गँवारुं गाने -यह मेरा विवरण है। ज़ोर से नहीं बोलै मैंने। मार थोड़े ही कहानी थी मुझे सुशी बुआ, शब्बो बुआ और नमृता चाची से।

शादी के दिन मुझे सजाया संवारा गया। मम्मी के शादी के जोड़े पहनते हुए साड़ी स्त्रियां रोने लगीं। मैने कहा नहीं था 'स्त्रियां समझ नहीं……. वगैरहा….. वगैरहा ।

मैं जेवरों के वज़न से झुकने लगी। एक नहीं चार नथें पहनाई गयीं मुझे , मम्मी की शादी , दादी की शादी की , नानी की शादी की और सुशी बुआ की शादी की। मैं अब सबकी बेटी भी तो बन गयी थी। फिर ऋतू मौसी, जमुना दीदी ,पारो चाची, रत्ना चाची, सुकि दीदी, शब्बो बुआ , नसीम दीदी, दादी माँ , सब रोने लगीं मुझे देख कर। सब सुबक सुबक कर मम्मी, दादी को गले लगा कर हँसते हुए रोने लगीं। मम्मी के आंसूं तो रुक ही नहीं रहे थे। ( "कितनी सुंदर है हमारी बेटी "-उन्ह इतने जेवरों में दबाओगे तो कोई भी सुंदर लगेगा नहीं ?- पर मैं बोली नहीं। पीटना थोड़े ही था मुझे शादी के दिन। )

सुशी बुआ ने ताना मारा "अरे रो क्यों रही हो रण्डियों। किस माओं को ऐसा सौभाग्य मिलता है की बेटी की शादी के बाद भी बेटी घर में रहे। "

नमृता चाची ने भी तीर छोड़ा ,"और क्या। मेरी रंडी बहन ऋतू किसी गधे से शादी करे तो मैं उस से पीछा छुड़ाऊं पर वो तो मेरे भैया के साथचिपकी रहेगी। "

शब्बो बुआ भी तो वहां थीं ,"सब रोना बंद करो खुदा के वास्ते। मेरी बेटी नेहा को आखों से दूर थोड़े की करूंगी मैं। "

और फिर तीनों औरों से भी ज़्यादा रोने लगीं।

मैं शर्म से लाल घूँघट में से अपने पापा को देखा।सोने की जरदारी की अचकन लखनवी पजामी में इतने सुंदर लग रहे थे कि मेरी सांड रुक सी गयी। अग्नि के सात फेरे। सारी स्त्रियों के बहते आंसूं। मैंने अपने पति के पैर छुए। पापा ने मेरी मांग में सिंदूर भर दिया।

फिर मुझे याद नहीं क्या हुआ। खाना कब खत्म हुआ। कब मुझे सुहागरात के बिस्तर पर बिठा दिया गया।मुझे याद रही तो बुआ की चेतावनी -"देख अंकु मैं दरवाज़े के बाहर ही हूँ। तेरी वधु की चीखें न सुनायीं दी तो दरवाज़ा तोड़ कर अंदर आ जाऊंगीं "शब्बो बुआ और नमृता चाची ने गंभीरता से समर्थन में सर हिलाया इस महत्वपूर्ण मसले के ऊपर।

पापा ने प्यार से मेरी नथें उतारी और फिर भारी सारी और सारे वस्त्र। पहले मेरे फिर अपने।

"मैंने पापा के चरण छू कर कहा ,"पापा मैं मम्मी जैसी पत्नी की छाया भी नहीं हूँ पर मैं पूरा प्रयास करूँगीं। "पापा ने मुझे अपने से चुपका लिया।

और फिर पापा ने ममेरे 'कौमार्य ' को फिर से तोड़ा उस रात। दादी सही थीं। पापा सबसे बीस नहीं टेइस थे। मेरी चीखें दरवाज़े के बाहर तो क्या सारे कसबे में सुनाई दी होंगीं। दरवाज़ा तो पास था बिस्तर के। किसी को भी शिकायत नहीं हुई सुहगरात की चादर से।

बाकि की कहानी तो अभी भी ज़ारी है पर संक्षेप में :

मधुमास के लिए पापा और मैं चार महीनों के लिए यूरोप में थे। तीसरे हफ्ते में मैं गर्भ से थी। जब हम वापस आये तो शब्बो बुआ हुए नसीम आपा के पेट निकले हुए थे। ऋतू मौसी ने अपने भैया से गन्धर्व विवाह किया और जुड़वां बेटों से फूल गयीं। सुशी बुआ भी गर्भ से थीं सालों की असफलता के बाद। मैं तो इसे अपनी मुट्ठ चुदाई की करामात कहती हूँ पर सब इसे मेरे और मेरी मम्मी पापा के स्वर्गिक प्रेम का प्रभाव कहतें हैं।

जमुना दीदी की कोख भर दी थी गंगा काका ने।

मेरी पढ़ाई थोड़ी धीरी हुई पर मैंने मम्मी को तीन बच्चों से पूरा व्यस्त कर दिया अगले चार सालों में। लंदन स्कूल ऑफ़ इक्नोमिक्स से बीऐ इकोनॉमिक्स करके पापा की तरह हार्वर्ड में एम बी ऐ में दाखिला मिल गया। पत्नी सही पर पापा की बेटी भी तो थी मैं। उनके पदचिन्हों पर भी तो चलना था मुझे यह अच्छे ‘बेटे’ की तरह ।

मेरे लम्बे बड़े फैले परिवार में कई कमियां हो शायद पर एक कमीं नहीं हैं और न होगी कभी - प्यार की।

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समाप्त

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