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अंतरवासना की कहानियाँ

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Guest
अंकल की बेटी की गर्म चूत

बात उस समय की है जब मैं आगरा अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए पहुंचा। जब मैं आगरा पहुंचा तो वहां

पर मेरे रहने की व्यवस्था पहले से ही थी। मेरे पिताजी के एक मित्र आगरा में रहते थे और उन्हीं ने अपने यहां पर

नीचे एक कमरा मेरे लिए व्यवस्थित करा दिया था। वो फस्ट फ्लोर पर रहते थे। वह कमरा तो सिर्फ मेरे लिए एक

नाम मात्र का था क्योंकि अंकल और आंटी मुझे अपने परिवार का एक सदस्य के रूप में मानते थे। मेरे लिए किसी भी

चीज की कोई रोक-टोक नहीं थी। मैं उनके बाथरूम से लेकर बेडरूम तक सभी चीजें उपयोग में लेता था। मतलब कि

नीचे का कमरा मेरे लिए एक स्टडी रूम की तरह था।

मकान मालिक के परिवार में मियां बीवी और दो बेटे और दो बेटियां थी। बड़ी बेटी की शादी हो गई थी। बड़े बेटे का

नाम विकास छोटे का नाम आकाश, बड़ी बेटी का नाम शीला और छोटी बेटी का नाम रश्मि था। विकास चेन्नई में

जॉब करता था और रश्मि ने इसी वर्ष बी एस सी के लिए गाजियाबाद में एडमिशन लिया था और छोटा बेटा घर

पर ही रहता था।

उनकी छोटी बेटी रश्मि मेरी हम उम्र थी। दिखने में एकदम आकर्षक थी… लम्बाई 5’7″ शरीर एकदम स्लिम… गोल

चेहरा… कजरारी आंखें मतलब कोई उसे देखकर दीवाना हो जाए। हम दोनों एक दूसरे को पहले से जानते थे क्योंकि

वह मेरे पिताजी के मित्र की बेटी थी। हम लोग घंटों एक दूसरे से बातें करते रहते थे। कभी वह मेरे रूम में आ जाती

थी और कभी मैं उसके बेडरूम में चला जाता था, परंतु ना तो कभी मेरे मन में गलत विचार आये और नहीं कभी

किसी को आपत्ति हुई।

मेरे आगरा पहुंचने के करीब 6 महीने बाद दिसंबर के महीने में बड़े बेटे की शादी हुई। शादी के बाद नई बहू घर में

आई परंतु रश्मि के फर्स्ट सेमेस्टर के एग्जाम होने की वजह से उसे शादी के तुरंत बाद गाजियाबाद जाना पड़ा। मेरा

भी ऊपर जाना कम हो गया क्योंकि मुझे नई भाभी के सामने जाने में शर्म लगती थी।

एक दिन अंकल ने मुझे ऊपर बुला कर पूछा- क्या बात है आजकल तुम दिखाई नहीं दे रहे हो? कोई परेशानी तो

नहीं है?

तो मैंने कहा- ऐसी कोई बात नहीं है अंकल, नई भाभी आई हैं तो कहीं मेरे बार-बार ऊपर आने से उन्हें अनकंफर्टेबल

फील हो।

यह बात सुनकर अंकल ने मुझ में डांट लगाई और कहा- तुम भी इस घर के एक सदस्य हो!

और उन्होंने नई भाभी अंजू को आवाज़ लगाई और मेरा परिचय करवाया कि यह भी इस घर का सदस्य है।

इसके बाद मेरा ऊपर आना एक मजबूरी बन गया। अब मैं कॉलेज से आने के बाद और शाम को ऊपर जाने लगा।

धीरे धीरे मेरी भाभी से बात होने लगी। उनका स्वभाव भी बहुत अच्छा था और उनके साथ जल्द ही घुल मिल गया।

उधर दो हफ्ते बाद रश्मि के एग्जाम खत्म हो गए और वह भी वापस आगरा आ गई।

कुछ दिन बाद एक दिन मैं अपने रूम में बैठकर पढ़ाई कर रहा था तभी रश्मि अपनी बुक्स लेकर नीचे मेरे रूम में आ

गई और बोली- मैं भी यहीं बैठ कर स्टडी करूंगी क्योंकि ऊपर ज्यादा डिस्टर्ब होता है।

मैंने ऐसे ही उससे पूछ लिया- ऊपर डिस्टर्ब क्यों होता है?

तो उसने मुझे अजीब से नजरों से देखा।

मैं कुछ समझ नहीं पाया तो मैंने उससे दोबारा पूछा- ऐसे क्यों रिएक्ट कर रही हो?

तो उसने कहा- नई भाभी को भी एकान्त चाहिए।

मैंने पूछा- उन्हें एकांत की क्या जरूरत है?

तो उसने कहा- भैया की 3 दिन की छुट्टी बची है इसलिए उन्हें एकांत की जरूरत है।

यह सुनकर मुझे हंसी आ गयी परंतु मैं मुस्कराकर रह गया। मेरी मुस्कुराहट से वह शरमा गई तो मैंने उससे शरारती

अंदाज में पूछा- वे एकांत में क्या करेंगे?

यह सुनकर वह बुरी तरह से शर्मा गई और अपनी किताब लेकर ऊपर भाग गई।

मेरे और उसके बीच में इस तरह की घटना पहली बार हुई थी। मैं समझ नहीं पाया कि वह क्यों भाग गई। मैं वापस

अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गया।

शाम को जब मैं ऊपर गया तो वह मुझे देख कर मुस्करायी और वहां से चली गई। यह मुझे कुछ अजीब लगा और मैं

भी अपने कमरे में नीचे आकर लेट गया। थोड़ी देर बाद रश्मि नीचे आई और बोली- तुम वापस क्यों चले आये?

तो मैंने उससे पूछा- तुम मेरे आने के बाद वहां से क्यों चली गई थी?

उसने कहा- ऐसी कोई बात नहीं थी.

मैंने उससे पूछा- तुम दोपहर में जब स्टडी करने नीचे आई थी तो ऊपर क्यों चली गई थी?

यह सवाल सुनकर वह शरमा गई और ऊपर जाने लगी परंतु मैंने उसे पकड़ कर बैठा दिया।

वह बोली- तुमने बात ही ऐसी पूछी थी।

मैंने कहा- तो इसमें भागने की क्या जरूरत थी… हर मियां बीवी यह काम करते हैं।

यह सुनकर वह बोली- तुम बहुत बदतमीज हो गए हो! और ऊपर चली गई।

पहली बार मुझे उसको लेकर गलत विचार आए और पूरे दिन की बातें दिमाग में घूमने लगी। धीरे धीरे मेरा मूड बन

गया और फिर बाथरूम में जाकर मुठ्ठी मारी और सो गया।

अगले दिन जब मैं कॉलेज से आया तो अंकल ने आवाज लगाई और कहा- शाम को हम सभी डिनर पर जाएंगे, तैयार

हो जाना।

हम सभी रात को डिनर पर गए। डिनर करते समय रश्मि मेरे दाएं तरफ बैठी थी। डिनर लगभग आधा हुआ था कि

रश्मि का पैर मेरे पैर से टकराया और तुरंत अलग हो गया।

मैंने उसको नजरअंदाज कर दिया, मुझे लगा कि पैर ऐसे ही टकरा गया होगा।

परंतु थोड़ी देर बाद पुनः उसका पैर मेरे पैर से टकराया लेकिन इस बार अलग नहीं हुआ। मैंने थोड़ा इंतजार किया

लेकिन उसका पैर अलग नहीं हुआ तो मैंने भी उसके पैर को अपने पैर के नीचे दबा दिया।

उसने तिरछी नजर से मेरी तरफ देखा और खाना खाना शुरू कर दिया।
 
यह घटना मेरे लिए बहुत ही आश्चर्यजनक थी। जिस लड़की के बारे में सोच कर पिछली रात मैंने मुट्ठी मारी हो वही

लड़की मुझे लाइन दे रही थी।

मैंने खुद पर कंट्रोल करते हुए जल्दी खाना खत्म किया और हाथ टेबल के नीचे कर लिए। मैंने अपना दाहिना हाथ

उसकी जांघ पर रख दिया. उसने धीरे से मेरे हाथ को हटा दिया और मेरी बगल को नोच लिया। उसके बाद मैंने कोई

और हरकत नहीं की।

अब मुझे यकीन हो गया था कि यह जल्द ही मेरे लंड को मजा देगी।

घर आकर मैं अपने रूम में पढ़ने लगा क्योंकि मेरी भी परीक्षा नजदीक आ रही थी।

रात को करीब 11:00 बजे मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने दरवाजा खोला तो सामने रश्मि अपनी किताबें लेकर

खड़ी हुई थी। दरवाजा खोलते ही वह मुस्कुरायी और बोली- मैं अपना प्रोजेक्ट तैयार करूंगी… प्लीज मेरी हेल्प कर

देना।

मैं समझ गया कि वह कौन सा प्रोजेक्ट बनाएगी। मैंने उसे कमरे के अंदर बुलाया और दरवाजा खुला छोड़ दिया।

खुला दरवाजा देख कर वह खुद खड़ी हुई और बंद कर दिया।

अब सिर्फ औपचारिकता ही बाकी रह गई थी। यहां उसकी तरफ से खुला आमंत्रण था कि मैं उसे चोद दूं। परंतु मैंने

औपचारिकताओं को पूरा करना उचित समझा क्योंकि मेरे सामने एक नवयौवना बैठी हुई थी। मैं उसकी प्रतिक्रिया

का इंतजार करने लगा।

परंतु वह अपनी किताबें खोलकर पढ़ने लगी तो मैंने पहल करते हुए उससे पूछा- तुमने डिनर पर मुझे क्यों नोचा

था?

तो वह बोली- अगर मेरी जांघ पर तुम्हारा हाथ कोई देख लेता तो क्या होता?

उसकी यह बात सुनकर मैंने उसे खींच कर अपनी गोदी में बिठा लिया और कहा- कुछ नहीं होता क्योंकि तुम मेरे

साथ हो।

वह मेरी गोदी से उठने की कोशिश करने लगी और बोली- कोई देख लेगा।

मैंने कहा- दरवाजा तुमने खुद बंद किया है तो कोई देखने के लिए कहां से आएगा।

यह सुनकर वह शरमा गई और मेरे सीने से लिपट गई।

उसने अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन से लपेट कर अपना सर मेरे सीने में छुपा लिया। उस समय मुझे पता चला कि शर्म

को औरत का गहना क्यों कहा जाता है।

मैंने अपने दोनों हाथों से उसके चेहरे को ऊपर किया तो उसके दोनों गाल शर्म से सुर्ख लाल हो गए थे… उसकी आंखें

एकदम नशीली हो गई थी… ऐसा लग रहा था कि वह पूरी बोतल पीकर आई है। उसकी सांस धीरे-धीरे तेज होती

जा रही थी।

मैंने भी वक्त की नजाकत समझते हुए अपने होंठ उसके सुलगते हुए होंठों पर रख दिए। उसने तुरंत मेरे होंठों से अपने

दोनों गर्म और नाजुक होंठों की गिरफ्त में ले लिया। मेरे होंठों के रस से वह अपने होंठों की तृष्णा को शांत करने

लगी।

जिस तरह से वह मेरे होंठों को चूस रही थी, ऐसा लग रहा था कि मानो मधु पान हो रहा है।

मेरे हाथ खुद ब खुद उसके जिस्म पर थिरकने लगे। मैंने अपना एक हाथ उसके गर्दन से होता हुआ चूची तक पहुंचा

दिया और धीरे-धीरे हाथ से सहलाने लगा। वह इस कदर जवानी के मजे में खोई हुई थी कि जैसे ही मैंने उसकी चूची

पर हाथ रखा तो उसने अपने आप को सीधा करते हुए अपनी पूरी छाती सामने कर दी।

बस इसी का तो मुझे इंतजार था। मैंने उसे गोदी में उठाया और बैड पर लिटा दिया। मैं उसके ऊपर लेट कर उसे

निहारने लगा। उसका अंडाकार चेहरा चांद के समान खिला हुआ था… उसकी आंखें शर्म से लाल हो रही थी… उसके

होंठ गुलाब की पंखुड़ियों के समान प्रतीत हो रहे थे।

मैंने उसके चांद जैसे चेहरे को अपने दोनों हथेलियों में लेकर उसके माथे को चूम लिया और उसके बाद उसकी आंखों

को और फिर उसके होंठों पर अपने होंठ टिका दिए।

वह एक जवानी की प्यासी मेरे होंठों को ऐसे चूसने लगी कि ऐसा लग रहा था कि मुझे जन्नत मिल गई हो।

करीब 5 मिनट तक होंठों को चूसने के बाद मैं उसके ऊपर से हटा और उसके टॉप में मैंने अपना हाथ डालकर उसकी

चूचियों को सहलाने लगा। धीरे धीरे वह मदहोश होने लगी और मुझसे लिपट गई। मैंने उसे एक प्यारा सा हग किया

और फिर उसका टॉप उतार दिया। टॉप के साथ साथ मैंने उसकी ब्रा को भी उतार दिया।

क्या नजारा था… उसकी चूचियां मध्यम आकार की थी परंतु एकदम गुम्म्द की तरह सीधी खड़ी हुई।

उन्हें देखते ही मैं एकदम वहशी बन गया और उसकी चूचियों पर टूट पड़ा, एक चूची को मुंह में लेकर चूसने लगा

और दूसरी को हाथ से मसलने लगा।

वह भी मजे में सिसकारियां ले रही थी। जब उसे मैं काट लेता तो उसे दर्द होता और वह कराहने लगती जिससे मैं

और ज्यादा तड़पाने लगता। वह भी पूरी तरह से आनंद ले रही थी और मेरा साथ दे रही थी।

करीब 15 मिनट की हैवानियत के बाद मैंने उसे निहारा तो उसकी दोनों चूची बुरी तरह से लाल हो रही थी और

जगह जगह मेरे दांतों के निशान पड़े हुए थे। जब उसने अपनी हालत देखी तो मैंने उसे सॉरी कहा तो वह बोली-

जानू, यह तो तुम्हारी तरफ से पहला तोहफा है।

उसकी यह बात सुनकर मुझे हंसी आ गई और वो शरमा गई।

मैंने उसे अपनी बांहों में लेकर सहलाना शुरू किया। वह धीरे-धीरे गर्म होने लगी। मैंने उसके लोअर को पेंटी सहित

उतार दिया। अब वह मेरी बांहों में पूर्ण नग्न रूप में समाई हुई थी। मैंने उसे बिस्तर पर सीधी लिटा दिया और उसे

निहारने लगा।

मैंने उससे कहा- जानू, तुम्हारा जिस्म खुदा ने बड़ी फुर्सत से बनाया है।

उसने अपनी आंखें खोली औरबड़े ही कातिलाना अंदाज में कहा- जानेमन यह जिस्म खुदा ने सिर्फ तुम्हारे लिए

बनाया है, जैसे चाहो वैसे इससे खेलो, यह तुम्हारी ही अमानत है।

यह सुन कर मेरा लंड सलामी देने लगा और मैंने उससे कहा- डार्लिंग, एक बार जन्नत के दरवाजे का दीदार तो

करवा दो.

वह बोली- मेरे राजा, पहले अपने कपड़े तो उतार लो, फिर उसके बाद दीदार ही नहीं जन्नत की सैर करवा दूंगी।

उसकी यह बात सुनकर मैंने उससे कहा- तुम खुद ही उतार दो।

वह तुरंत ही बैठ गई और उसने सबसे पहले मेरी टी-शर्ट उतारी, उसके बाद मेरी बनियान उतारी और फिर

अंडरवियर सहित मेरा लोवर भी उतार दिया। जैसे ही उसने मेरा लंड देखा तो वह बोली-जानू इतना बड़ा लंड चूत

में कैसे जाएगा। मेरी तो जान ही निकल जाएगी।
 
मैंने उसे लंड पकड़ाते हुए समझाया- मेरी रानी, जब इस चूत में से पूरा बच्चा निकल आता है तो लंड क्या चीज़ है।

यह बात सुनकर वह शर्मा गई और अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिये।

दोस्तो, यह जो अहसास होता है बहुत ही आनंददायक होता है, इसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। जब दो

जवान जिस्म आपस में चिपकते हैं तो ज्वालामुखी की तपिश भी हल्की पड़ जाती है।

उसके होंठ मेरे होंठों पर थे और उसके हाथ में मेरा लंड था और धीरे-धीरे वह मेरे लंड को सहला रही थी।

मैंने धीरे से उसके कान में कहा- मेरी जान, अब तो जन्नत के दरवाजे का दर्शन करवा दो?

तो वह तुरंत खड़ी हो गई और मेरे चेहरे के सामने अपनी दोनों टांगें फैला दी।

कसम से क्या नजारा था… चूत एकदम साफ थी। प्रतीत हो रहा था कि वह मेरे पास आने से पहले अपनी झांटें साफ

करके आई हो। मेरी आंखों के सामने बहुत ही मदहोश करने वाला नजारा था।

उसकी दोनों जांघों के बीच में 1 लंबी सी दरार और उस दरार में 1 गुलाबी रंग छोटा सा छेदऔर इसी दरार और

गुलाबी छेद के पीछे पूरी दुनिया पागल रहती है।

मैं अपने आप पर काबू नहीं कर सका और उसकी चूत को चूमने लगा। उसकी चूत से बहुत ही मादक खुशबू आ रही

थी। जैसे ही मैंने उसकी चूत पर जीभ फिरानी शुरू की तो वह लड़खड़ाकर गिर गई और लेट कर मेरे बिना कहे अपने

दोनों टांगें फैला दी।

मैं भी बिना देर किए उसके चूत पर अपना मुंह ले गया और उसकी चूत के ऊपर भाग को अपनी जीभ से सहलाने

लगा। धीरे धीरे मैं उसकी चूत के अंदर अपनी जीभ को ले गया और सहलाने लगा।

उसके लिए जिंदगी का पहला अनुभव था और वह उसका पूरा आनंद ले रही थी। उसकी सिसकारियां यह बयान कर

रही थी कि वह अपनी जवानी का पहला यौन सुख प्राप्त कर रही थी। करीब पांच मिनट के बाद उसका शरीर

अकड़नेलगा और उसने अपने जीवन के पहले स्लखन का सुख प्राप्त कर लिया।

वह कहने लगी- जानम मेरा तो दम निकल गया।

मैंने कहा- मेरी जान, अभी तो कुछ हुआ ही नहीं है, अभी तो बहुत कुछ होना बाकी है।

वह बोली- थोड़ा सा आराम करने दो… अभी तो पूरी रात अपनी है।

मैंने उसे कहा- चलो आराम करते करते तुम अपने काम पर लग जाओ।

वह कुछ समझ पाती… तब तक मैंने अपना लंड उसके होंठों पर लगा दिया और उसने भी तुरंत अपना मुंह खोलकर

लॉलीपॉप की तरह चूसना शुरु कर दिया। मैं धीरे-धीरे एक हाथ से उसकी चूत को सहलाने लगा और उसकी एक

चूची को मुंह में लेकर चूसने लगा।

पांच मिनट में वह फिर से गर्म हो गयी और बोली- जानू मुझे अपनी जान बना लो… मुझ में समा जाओ।

मैं उसकी हालत समझ गया, मैंने बिना देर किए उसे सीधा लिटा दिया और अपना लंड उसकी चूत पर सेट किया।

वह बोली- मेरे प्रियतम मेरा ख्याल रखना।

मैं उसके ऊपर झुका और उसके माथे को चूम कर बोला- रानी, बस 1 मिनट दर्द सहन कर लेना उसके बाद तुम्हें

जन्नत हासिल हो जाएगी।

वह मुस्कुराई और बोली- मुझे पता है, तुम डाल दो।

मेरा लंड उसके अस्तित्व में समाने के लिए बेकरार हो रहा था। मैंने लंड पर हल्का सा दबाव बनाया तो लंड के

सुपारे ने फक्क से उसकी चूत में प्रवेश किया। वह एकदम सिहर गई और बोली- जानू डर लग रहा है।

मैंने कहा- क्यों?

तो वह बोली- पहली बार चूत में कोई चीज जा रही है।

मैंने कहा- मेरी जान, आज के बाद तुम इसकी दीवानी हो जाओगी, बस 1 मिनट सहन कर लेना।

उसने सहमति में सिर्फ सिर ही हिला दिया।

मैंने अपने लंड को थोड़ा सा और अंदर खिसकाया और वहीं पर हिलाने लगा। करीब 2 मिनट हिलाने पर उसे मज़ा

आने लगा और वह बोली- मेरे बालम… मेरे साजन… पूरा अंदर डाल दो।

मैंने उसे कहा- दर्द होगा…

वह बोली- मैं सहन कर लूंगी।

मैं अपनी दोनों बाजू उसके गर्दन के दोनों ओर टिका कर उसके ऊपर झुक गया और एक झटके में 7 इंच का लोड़ा

नाजुक हसीना के जिस्म में घुसा दिया। वह दर्द से छटपटा गई।

मैंने तुरंत अपने होंठ उसके होंठों पर चिपका दिए और अपना पूरा वजन उसके ऊपर छोड़ दिया। मेरा लंड उसकी

चूत में फँस गया। गर्म गर्म खून लण्ड के ऊपर बहने लगा।

एक मिनट बाद मैंने उसके होंठों को आजाद किया। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे… मैंने उसके आंसू पोंछे और

कहा- मेरी रानी, आज मैं सदा के लिए तुम्हारा हो गया।

उसने मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों में लेकर मेरे माथे को चूमा और कराहते हुए बोली-आज से मैं तुम्हारी दासी हूं।

करीब 5 मिनट तक मैं उसी मुद्रा में उसके ऊपर लेटा रहा। उसके बाद मैंने धीरे धीरे हिलना शुरू किया। वह अपनी

आंखें बंद करके लेटी रही।

मैंने पूछा- रानी दर्द हो रहा है?

तो उसने कहा- राजा, अब दर्द बहुत कम है।

मैंने धीरे-धीरे लंड की स्पीड बढ़ानी शुरू कर दी। जैसे जैसे लंड की स्पीड तेज होती गई, वैसे-वैसे उसे मजा आना

शुरू हो गया और थोड़ी देर में वह खुलकर मजा लेने लगी। उसकी सिसकियां मजे वाली सिसकारियों में बदल गई,

वह भी नीचे से साथ देने लगी।

उसके मुंह से तरह तरह की आवाज आने लगी- मेरे राजा… अह्ह्ह्ह ऊऊऊऊं मेरे साजन… उईईई उउउऊ मर गयी

ईईई ओह्ह्ह्हो मेरे जानू आआह्ह उऊऊ ऊह्ह्ह ऊऊह्ह्ह मेरी जान लंड और तेज पेल दे उईई उऊह्ह हआअह्ह…

और तेज करो… मजा आ रहा है… उउह्ह् आअह रज्जज़्ज़ा मेरे स्वामी मेरी चूत को फाड़ दें उउईई आअह्ह् ह्ह्ह्म्म्म्म

और तेज और तेज मेरे राजा… उउह्ह्ह उउउईईई ह्ह्ह्हआ आआह्ह और तेज… अपने लंड को मेरी चूत में हमेशा के

लिए सेट कर दो… बहुत मजा आ रहा है।

उसकी ये बातें मुझे उत्तेजित कर रही थी और मैं लगातार अपने लंड की स्पीड बढ़ा रहा था। मेरे हर झटके के साथ

वह कराह उठती। अब मैं उसे एक औरत की तरह चोद रहा था। मैं अपना लंड पूरा बाहर निकालता और एक झटके

में अंदर डाल देता। मुझे महसूस हो रहा था कि लन्ड अंदर जाकर किसी चीज से टकरा रहा है।

करीब 20 मिनट की चुदाई के बाद वह बोली- मेरे साजन, मेरा शरीर अकड़ रहा है।

मैंने कहा- मेरी जान बस 2 मिनट सब्र करो… दोनों एक साथ परम यौन सुख को प्राप्त करेंगे।

मैंने अपनी स्पीड तेज कर दी और मेरा भी लंड पानी छोड़ने के लिए तैयार हो गया। मैंने उससे कहा- मेरी जान,

पानी कहां निकालूं?

वह बोली- मेरे राजा, जहां एक पति अपनी पत्नी को चोदते वक्त निकालता है।

उसकी यह बात सुनकर मैंने कहा- गर्भवती हो जाओगी.

तो उसने कहा- बाद में सोचेंगे यह बात… तुम अपने रस से मेरे शरीर की गर्मी को शांत कर दो।

यह कहकर वह मुझसे लिपट गई। अपने दोनों पैरों से मेरी कमर को जकड़ लिया।

मैंने अपना लंड उसके गर्भ तक पहुंचा कर पूरा पानी उसकी चूत में निकाल दिया और उससे लिपटकर लेट गया।

करीब आधा घंटा हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे। उसके बाद उसने मुझे चूमना शुरू किया। उसने मेरे शरीर के हर हिस्से

को… हर अंग को चूमा। मैंने उसे अपने आगोश में ले लिया। मैंने उसके बालों में हाथ फिराते हुए पूछा- जानू, एक

बात बताओ कि अचानक यह जवानी कैसे छा गई?

मेरी बात सुनकर वह शरमा गई और बोली- मैंने परसों भाभी से उनकी सुहागरात के बारे में पूछा तो उन्होंने चुदाई

के बारे में बताया कि कितना मजा आता है। और कल दिन में जब तुम्हारे पास आई थी तो भैया भाभी की चुदाई देख

कर आई थी। तभी से मेरा मन चुदने को कर रहा था।

मैंने पूछा- मेरे साथ ही क्यों?

वह बोली- मैं तुम्हें शुरू से ही पसंद करती हूं. जब तुम हमारे यहां रहने आए हो, तभी से मैं तुमसे दोस्ती करना चाह

रही थी। इसीलिए मैंने तुम्हें अपना सब कुछ लुटा दिया।

यह बात सुनकर मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया।

उस रात मैंने उसकी तीन बार भयंकर चुदाई की। सुबह जब वह मेरे कमरे से जा रही थी तो मेरे लंड को पकड़कर

बोली- इसने मेरा प्रोजेक्ट पूरा किया है।

उसके बाद मैं 4 साल उसके यहां रहा और 4 साल तक जब भी वह कॉलेज से छुट्टी लेकर आती तो रोज मेरे लंड का

भोग लगाकर अपनी जवानी को संतुष्ट करती।

उसके और मेरे बारे में नई भाभी को भी पता चल गया था जिसके बाद मैंने उन्हें भी अपने लंड का प्रसाद दिया।

samapt
 
अपनी बहन का प्रेमी

मेरा नाम रमन है और मैं अपनी बहन का प्रेमी हूँ. ये मेरी कहानी आप पसंद करेंगे अगर आप इन्सेस्ट में दिलचस्पी

रखते हैं. मेरी बहन आज मेरी पत्नी बन के रह रही है. मेरी कहानी आपको कैसी लगी इस बहन के यार को ज़रूर

लिखना.

मेरा नाम रमन है . मैं नीता दीदी को जब से नहाते हुए देख चुका हूँ, मेरी ज़िंदगी ही बदल गयी. नीता दीदी उस

वक्त साबुन मल के नहाने में लगी हुई थी जब मैने देखा की बाथरूम का डोर लॉक नहीं किया हुआ. दीदी अपनी चूत

को मल रही थी और बार बार उसकी कामुकता भरी सिसकी निकल जाती थी. मेरी दीदी का दूधिया जिस्म पानी की

बूँदों से चमक रहा था और उनकी चुचि मुझे दीवाना बना रही थी. दीदी की आँखें बंद थी क्यों कि उन्हों ने चेहरे पर

साबुन लगा रखा था. मैने देखा कि दीदी अब चूत में उंगली कर रही थी. मेरी दीदी मस्ती में आ कर मॅसर्बेशन कर

रही थी. मैने सोचा कि ज़रूर किसी मर्द के बारे कल्पना कर रही होगी. काश वो मर्द मैं होता!!! दीदी की साँसें तेज़ी

से चल रही थी. उसकी सिसकी मुझे सुनाई पड़ रही थी. तभी मेरा हाथ अपने आप मेरे लंड पर चला गया और मैं

उसको अप्पर नीचे हिलाने लगा. दीदी अचानक मूडी और अब उसकी गांड मेरी तरफ आ गयी. गोल गोल गोरे चूतड़

मेरी नज़र के सामने थे और दीदी अब शवर के नीचे खड़ी थी और शवर की धारा सीधी दीदी की चूत पर गिर रही

थी. मेरा हाल बुरा हो रहा था और मैने अपना लंड बाहर निकाल कर मूठ मारनी शुरू कर दी.

“ओह……….आआआअररर्रघ” की आवाज़ नीता दीदी के होंठों से निकली. मैं समझ गया कि दीदी झड़ गयी थी. मैं

सीधा अपने रूम में गया और मूठ मारता रहा. जब मेरा लंड पिचकारी छोड़ रहा था तो नीता दीदी का जिस्म मेरी

आँखों के सामने था. इतना लावा मेरे लंड से आज तक ना निकला था.

जब भी दीदी की शादी की बात चलती तो मैं उदास हो जाता. कई रिश्ते आए लेकिन राकेश जीजा जी का रिश्ता

फाइनल कर लिया गया. मम्मी के कहने पर जीजा जी ने सुहागरात हमारे घर पर मनाई. मैने सोचा कि अगर अपनी

बहन के साथ सुहागरात नहीं मना सका तो क्या हुआ, कम से कम अपनी बहन को सुहागरात मनाते हुए तो देख

सकता हूँ. बाथरूम का दरवाज़ा थोड़ा खुला था जिसको जीजा जी बंद करना भूल गये. मेरी किस्मत अच्छी थी. रात

के 10 बजे दीदी बेड पर जीजा जी की वेट कर रही थी. मेरी बहना रानी लाल जोड़े में सजी हुई किसी परी से कम

नहीं लग रही थी. तभी जीजा जी ने परवेश किया. लगता था कि उन्हों ने पी हुई थी. वो सीधा अपना पाजामा

खोलते हुए अपना लंड नीता दीदी के होंठों से लगाने लगे और बोले,”जानेमन, बहुत दिल कर रहा है लंड चुसवाने के

लिए, जल्दी से चूस कर झड़ दे इसको फिर चोदुन्गा तेरी चूत और गांड आज!!” दीदी ने नफ़रत से मूह दूसरी तरफ

मोड़ लिया. “ये क्या बद-तमीज़ी है? कितनी गंदी बात कर रहे हैं आप? पेशाब वाला…छ्ह्ही..और ये क्या बोल रहे

हैं आप?” लेकिन जीजा जी ने दीदी को बालों से खींचा और अपना सूपड़ा दीदी के कंठ तक धकेल दिया,”चल

हरामजादि, नखरे करती है? साली शादी की है तेरे साथ. अच्छी तरह चूस और फिर मेरे लंड के मज़े लूटना अपनी

चूत में” दीदी के मुख से गूऊव….गूऊव की आवाज़ आ रही थी और वो लंड को मुख से बाहर निकालने की कोशिस

कर रही थी. लेकिन जीजा जी ज़बरदस्ती अपने लंड की चुस्वाई करवा रहे थे. जीजा जी अपनी कमर हिला हिला

कर दीदी के मूह में लंड धकेल रहे थे. आख़िर दीदी के मूह में जीजा जी के लंड का फॉवरा छ्छूट पड़ा. दीदी के हलक

से एक चीख निकली और जीजा जी के लंड रस की धारा दीदी के होंठों से उनके चेहरे पर फैल गयी. दीदी के मूह से

लंड रस टपकने लगा और दीदी ने उल्टी करनी शुरू कर दी.

“ये क्या कर रहे थे? उफफफफ्फ़ मेरा मन खराब हो गया…..उफ़फ्फ़ कितना गंदा है……” दीदी बोल रही थी और

जीजा जी हैरानी से देख रहे थे. “साली क्या हुआ? लंड चूसना तो औरत को बहुत अच्छा लगता है…तुझे क्यों पसंद

नहीं? उल्टी क्यों कर दी? तुमने कभी लंड नहीं चूसा क्या?’ दीदी ने ना में सिर हिलाया. मैं समझ गया कि जीजा जी

एक चालू इंसान हैं और दीदी भोली भली लड़की थी. जीजा जी शायद रंडीबाजी करने वाले थे और मेरी दीदी को

भी एक रंडी की तरह चोदना चाहते थे. दीदी ने मूह सॉफ किया और बाथरूम की तरफ बढ़ी. मैं जल्दी से खिसक

गया. दीदी बाथरूम में पानी से अपना मूह सॉफ करती रही. मुझे जीजा जी पर बहुत गुस्सा आ रहा था और अपनी

दीदी पर प्यार. उस रात नीता दीदी बहुत चिल्लाई और चीखी. शायद जीजा जी ज़बरदस्ती दीदी को चोद रहे थे.

“बस करो…भगवान के लिए छोड़ दो मुझे…मैं नहीं ले सकती इतना बड़ा…….आआहह….ऊओह..नाआआअ….बहुत दर्द

होता है…..नाहीं…प्लीज़, छोड़ दो मुझे!!!!!” मैं दीदी की हालत देख कर सारी रात सो ना सका. आप लोग यह कहानी

चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

अगली सुबह दीदी का चेहरा उत्तरा हुआ था. मैने मम्मी को कहते हुए सुना,’नीता.मर्द सब कुछ करते हैं…..बस झेल ले

राकेश का…थोड़ी देर की बात है…आदत पड़ जाए गी…बेटी बड़ा तो किस्मत वाली को मिलता है….

मज़े करोगी..राकेश बहुत अमीर है..तेरी तो ऐश हो गी!!!” लेकिन मैने मन बना लिया. मेरी दीदी ऐश तो करेगी

लेकिन जीजा जी के पैसे से और अपने भाई के लंड से. जीजा जी अपने शहर चले गये और मैं जीजा जी की जासूसी

करने लग पड़ा. मुझे पता चला कि जीजा जी दीदी को प्यार नहीं करते. अगर चोद्ते भी हैं तो ज़बरदस्ती. जीजा जी

के ऑफीस में उनका चक्कर उनकी सेक्रेटरी के साथ चल रहा था. मुझे ये भी पता चला कि, जीजा जी की मौसी की

लड़की नीता भी उनके घर में रहती थी जो कि शादी के बाद अपने पति से अलग हो कर जीजा जी के साथ ही रहती

थी. जीजा जी के घर के नौकर ने बताया कि जीजा जी ने अपनी मौसेरी बहन को रखैल बना रखा था. औरत सब

कुछ बर्दाश्त कर लेती है लेकिन सौतन नहीं. अब मुझे अपनी दीदी को वापिस अपने पास बुलाना था. “जीजा जी,

अगर अपनी दीदी को आप से वापिस ना ले लिया तो मेरा नाम राकेश नहीं” मैने अपने आप से वादा किया.

अब मैने जीजा जी के नौकर को रिश्वत दे कर जीजा जी और उनकी बहन के साथ चुदाई की तस्वीरें खींचने के लिए

राज़ी किया. नौकर बड़ा हरामी था. फिर मैने जीजा जी के ऑफीस से पता लगाया कि जीजा जी हर शनि वार

अपनी सेक्रेटरी के साथ कब रंग रलियाँ मनाने जाते हैं. हर हफ्ते उनकी सेक्रेटरी मोना और जीजा जी बिज़्नेस ट्रिप का

बहाना बना कर सुबा चले जाते थे और रात को वापिस लौट आते थे. एक बार मैने पीछा किया और देखा कि शाहर

के बाहर एक होटेल संगम में उनका कमरा बुक होता था. कमरा नंबर था 439. मैं प्लान बना कर होटेल में गया

और एक दिन पहले मैने 439 रूम बुक कर लिया. रूम के अंदर कॅमरा फिट कर लिया और एक रिकोडर लगा दिया

और फिर होटेल के मॅनेजर से बोला,’ मुझे 440 नंबर कमरा भी चाहिए. मनेजर बोला,”सर, 439 नंबर आपको

खाली करना पड़ेगा. बस एक दिन के लिए. उसके बाद आप फिर कमरे रह सकते हैं” मैं भी यही चाहता था. कमरा

बिल्कुल बेड के सामने था और अपना काम ठीक करेगा. उस शनिवार को जब जीजा जी वापिस लौटे तो मैं 440

नुंबेर्र कमरे में बैठ कर जीजा जी की सारी फिल्म देख रहा था. अब वक्त था जीजा जी को 440 वॉल्ट का झटका देने

का.

उधर जीजा जी का नौकर भी मेरे पास जीजा जी और उनकी मौसेरी बहन की फोटो ले आया. मैने उसको पैसे दिए

और नीता दीदी को मिलने उनके घर चला गया. शाम का वक्त था. दीदी पिंक सारी पहने हुए थी. गुलाबी रेशमी

सारी में दीदी का गुलाबी जिस्म बहुत मस्त लग रहा था. डीप कट ब्लाउस से दीदी की चुचि का कटाव सॉफ दिखाई

पड़ रहा था. दीदी का जिस्म कुछ भर चुका था और उनके नितंभ बहुत सेक्सी हो चुके थे. मुझे देख कर दीदी मेरी

तरफ दौड़ कर चली आई. मैने दीदी को बाहों में भर लिया. लेकिन अब मैने दीदी को बाहों में लिया जैसे एक आशिक

बाहों में लेता है, भाई नहीं!! दीदी ने मेरे मूह चूम लिया और मुझ से लिपटने लगी,”राकेश, मेरे भाई!!इतनी देर से

मुझे क्यों नहीं मिलने आया? अपनी बहन से नाराज़ हो क्या? तेरी बहुत याद आ रही थी, भाई!!” मेरे हाथ दीदी के

बदन पर रेंग रहे थे और मैं भी दीदी को चूम रहा था. मेरे हाथ अचानक दीदी के नितंभों पर गये और मेरा लंड खड़ा

हो गया. दीदी के नितंभ मानो रेशम हों. आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

जब हम अलग हुए तो मैने जान बुझ कर पुछा,”दीदी जीजा जी कहाँ हैं?” नीता के माथे पर थोड़े बल पड़े लेकिन वो

मुस्कुराते हुए बोली,”ऑफीस में होंगे” मैं भाँप गया कि दीदी खुश नहीं है. दीदी शीशे के सामने अपने बॉल संवार

रही थी और मेरी नज़र दीदी की गांड पर थी. “दीदी, तुम खुश नहीं दिख रही. जीजा जी तेरा ख्याल भी रखते हैं या

नहीं. मुझे तो जीजा जी का चल चलन ठीक नहीं लगता.” कहते हुए मैं दीदी की पीठ के साथ सॅट कर खड़ा हो गया.

शीशे में दीदी की गोरी चुचि उप्पेर नीचे होती दिख रही थी. मेरी दीदी मालिका शेरावत लग रही थी. मैने दीदी को

पीछे से आलिंगन में ले लिया. मैने अपने होंठ दीदी की गर्दन में छुपाते हुए कहा,” कहीं जीजा जी तुमको धोखा तो

नहीं दे रहे? मैने सुना है कि जीजा जी बहुत अयाश किस्म के आदमी हैं. उनका अपनी सेक्रेटरी के साथ अफेर चल

रहा है और ……..” दीदी के होंठ काँप रहे थे “और क्या?’ मैने दीदी की चुचि पर हाथ रख दिया और बोला,”सुना है

कि जीजा जी का संबंध उनकी मौसेरी बहन के साथ भी है” दीदी मुझ से अलग होने लगी,” राकेश, क्या बक रहे हो?

और तुम मेरे जिस्म को क्यों छेड़ रहे थे? राकेश, मैं तेरी बहन हूँ!!! मेरे पति के बारे में झूठ मूठ मत बोलो!!!” मैने

दीदी को फिर से आलिंगन में ले लिया और इस बारी उनके होठों पर होठ रख दिए क्यों कि मैं अब उनके सामने आ

गया था. दीदी के जिस्म से भीनी भीनी इत्तर की खुश्बू मुझे पागल बना रही थी. उस वक्त अंधेरा सा हो रहा था और

मैं हल्के अंधेरे में दीदी की आँखों में एक अजीब सी चमक देख रहा था. शायद दीदी का जिस्म मेरे आलिंगन में

पिघलने लगा था और या फिर मेरे दिमाग़ का वेहम था. आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

“मैं नहीं मानती ये सब. रिंकी उनकी बहन है!!ये क्या बक रहे हो!!!” रिंकी जीजा जी की मौसेरी बहन का नाम था.

मैने जीजा जी की अपनी सेक्रेटरी के साथ नंगी तस्वीरें दीदी के सामने फेंक डाली. “ये क्या है, राकेश?” लेकिन

सवाल बे मतलब था. फोटोस में जीजा जी सेक्रेटरी की चुचि चूस रहे थे तो दूसरी फोटो में उसकी चूत चाट रहे थे.

जीजा जी की सेक्रेटरी थी बहुत ही मस्त. दीदी का चेहरा शरम और गुस्से से लाल हो गया. मैने दूसरा वार किया

और उनके नौकर ने जो फोटो जीजा जी और रिंकी के साथ खेंची थी सामने रख दी. एक फोटो में रिंकी जीजा जी को

रखी बाँध रही थी और दूसरे में उनका लंड चूस रही थी. फोटोस इतने क्लियर थे कि मेरा खुद का लंड खड़ा हो गया

और मैने दीदी की चुचि को ज़ोर से भींच दिया. अब मेरा लंड अकड़ कर दीदी के पेट से टकरा रहा था. दीदी खुद ब

खुद मुझ से लिपटने लगी. औरत के अंदर ईर्षा की आग कैसे भड़कती है मैं जानता था. मेरा मन बोल उठा,”मेरी दीदी

अब मेरी बन के रहेगी, राकेश बेटा!!” आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

तभी फोन बज उठा,”हेलो, कौन, क्या? नहीं आयोगे? क्या बात हुई? कहाँ हो तुम? अच्छा, ठीक है” दीदी ने फोन

रखा और कहा,”तेरे जीजा जी आज घर नहीं आ रहे. किसी मीटिंग में देल्ही गये हुए हैं” मैं जानता था कि मीटिंग

कौन सी है. मैने फोन में से वो नंबर पढ़ा जहाँ से फ़ोन आया था. जब मैने वो नंबर डाइयल किया ती एक लड़की की

आवाज़ आई,” होटेल संगम! प्रिया स्पीकिंग” मैने फोन रख दिया. “नीता दीदी, देखोगी कि जीजा जी कौन सी मीटिंग

में हैं? जीजा जी मीटिंग में नहीं रंग रलियाँ मना रहे हैं. दीदी तुम इनके साथ ज़िंदगी क्यों खराब कर रही हो? चलो

मेरे साथ और आप ही फ़ैसला कर लो” मैने दीदी को पहले तो बाहों में भर कर खूब प्यार किया. खूब चूमा, चॅटा.

हमारे होंठ भीग गये किस करते हुए. मैने दीदी को बेड पेर लिटा लिया और उसकी जांघों पर हाथ फेरता रहा. जब

मेरा हाथ दीदी की चूत पर गया तो उसने मुझे रोक दिया,’नहीं भैया, नहीं. ये ठीक नहीं है. तुम मेरे भाई हो, बस.

हम ये नहीं कर सकते” मैं बोला,”दीदी, लेकिन जीजा जी….” दीदी बोली,”नहीं कह दिया तो मतलब नहीं”

लेकिन मैं दीदी को अपने मोटर साइकल पर बिठा कर संगम होटेल की तरफ़ चल पड़ा. दीदी मेरे पीछे सॅट कर बैठी

थी और उसका हाथ बार बार मेरी जाँघ पर रेंग जाता था. मैने होटेल जा कर एक रूम बुक करवाया और अंदर जा

कर विस्की ऑर्डर कर डाली. दीदी पहले कुछ सक पकाई लेकिन उसके अंदर तनाव इतना था कि दो पेग एक साथ पी

गयी. “बहनचोद कहीं का!!! मैं उसको नहीं छोड़ूँगी अगर तेरी बात सच निकली!!! राकेश तू जो कहे गा करूँगी मेरे

भाई अगर तेरी बात साची हुई” मैने एक पेग और दिया दीदी को और उसको फिर चूमने लगा. दीदी भी अब गरम

हो चुकी थी. लेकिन जब मैने दीदी का हाथ अपने लंड पर रखा तो उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा,” राकेश अभी

नहीं!!पहले दिखायो राकेश बहन्चोद किसके साथ है साला रंग रलियाँ मना रहा है” मैं दीदी को ले कर जीजा जी के

रूम की तरफ ले गया और दरवाज़ा खोल दिया. किस्मत की बात थी कि उन लोगों ने लॉक नहीं किया था. बिस्तर

पर नीता नंगी जीजा जी के नीचे पड़ी थी और जीजा जी उसका जिस्म चूम रहे थे.” नीतू मेरी जान, जब से वो कुत्ति

नीता आई है, हम को तो च्छूप च्छूप कर चुदाइ करनी पड़ रही है!! मेरा दिमाग़ खराब हो गया था जो मैने उस से

शादी कर ली!! साली ढंग से चोदने भी नहीं देती और ना ही उसको चुदाई का कोई ज्ञान है. और उसके सामने तुझे

दीदी कहना पड़ता है, ये बात अलग है. असल में तो साली वो मेरी दीदी है और तू मेरा माल, नीतू मेरी रानी बहना

मैं तो तुझे अपनी पत्नी मान चुका हूँ,सच!!” नीता जीजा जी के लंड को थाम कर बोली,”और भैया मैं आपको अपना

पति मान चुकी हूँ. ऐसे छुप छुप कर कब तक मिलते रहेंगे भैया?” आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़

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“ओ बहन्चोद राकेश, तू इस मदारचोड़ रंडी को बना ले अपनी पत्नी!!! और नीता, तू इस बहन्चोद को बना लो अपना

पति!! राकेश मैं जा रही हूँ और तुमको देखूँगी कोर्ट में तलाक़ के केस में!!!” दीदी की आवाज़ काँप रही थी. मैं उसको

खींच कर रूम में ले गया और दीदी फिर से विस्की पीने लगी. इस हालत में दीदी को घर नहीं ले जा सकता था.

दीदी पी कर बेहोशी की हालत में सो गयी और अगले दिन मैं उसको घर ले आया. मा ने पुछा क्या बात हुई तो मैने

कहा बाद में बताउन्गा. दीदी सारा दिन सोती रही. दोपहर को मैने मा को सारी बात बताई,” मा, राकेश साला

दीदी को कोई सुख नहीं दे सकता. रिंकी ही उसकी पत्नी है उसके लिए, मा!! दीदी को तो एक खिलौना बना कर रखा

है उस कामीने ने. कल रात तो दीदी ने खुद देखा है …

उसको नीता के साथ बिस्तर में. अब मैं दीदी को राकेश के साथ नहीं रहने दूँगा. मेरी इतनी सुंदर बहन की ज़िंदगी

बर्बाद नहीं होने दूँगा. आख़िर मैं दीदी से प्यार करता हूँ!!” मा मुझे गौर से देखती रही. ज़रूर मेरे चेहरे से वो मेरे मन

को भाँप गयी थी. जिस तरह मैने दीदी को थाम रखा था मा से छुपा नहीं था.”राकेश, सच बता क्या बात है? तू

अपनी बहन का घर बर्बाद करने पर क्यों तुला हुया हो? तुम अपनी बहन के साथ लिपटाए हुए थे जब वो घर आई.

कहीं तुम खुद ही तो अपनी बहन से प्यार नहीं करते?” मैं मा की बात सुन कर बोला,”अगर मैं दीदी से प्यार करता

हूँ तो क्या फरक पड़ता है? राकेश ने तो पहले दिन ही दीदी को एक जानवर की तरह चोद डाला था. मा, तुम नहीं

जानती कि दीदी उस रात कितना रोई थी!! कितनी पीड़ा हुई थी मेरी बहन को!! मैं उसका भाई हूँ……उसको सुख

देना चाहता हूँ….मा मैं उसको प्यार करता हूँ और दीदी का अनुभव जो जीजा जी के साथ हुआ है दीदी पर बहुत बुरा

असर डाल चुका है…दीदी सभी मर्दों से नफ़रत करने लगी है…सेक्स भी उसको अच्छा नहीं लगता…मैं दीदी को सही

रास्ते पर ला सकता हूँ” मा मेरे पास आई और बोली”बेटा मैं तेरी बात समझती हूँ. लेकिन ये समाज नहीं समझेगा.

तुम अपनी दीदी के पति तो नहीं बन सकते? सभी जानते हैं कि तुम भाई बहन हो!!” मा की बात ठीक थी लेकिन

मेरी प्लान भी थी, मैं दीदी का तलाक़ करवाने वाला था. इस गेम में हम जीजा जी को ब्लॅकमेल करने वाले थे. मेरे

पास जीजा जी की फोटोस थी. हम जीजा जी से बड़ी रकम हासिल कर लेंगे और फिर हम तीनो इस शहर को छोड़

देंगे. मैं और दीदी प्यार से ज़िंदगी बसर करेंगे, मा मेरी बात सुन कर सोचने पर मज़बूर हो गयी. मा मेरे गले लग

गयी और बोली,”तुमने नीता से पूछ लिया है क्या? उसको पसंद है तेरा प्लान?” “मा, दीदी को अभी तक सेक्स का

मज़ा नहीं मिला…जब मिलेगा तो दीदी खिल उठेगी….और दीदी की सेक्स की शुरुआत मैं करूँगा…एक सुहावानी

सेक्स की शुरुआत…मुझे तुम सहयोग देने का वादा करो….मुझे और दीदी को अकेले छोड़ दो…मुझे दीदी को सेक्स का

सुखद अनुभव करने में मदद करो,…नीता दीदी ज़रूर पट जाएगी, मा”

मा ने खुश हो कर मुझे होंठों पर किस कर लिया और जब मैने मा को वापिस किस किया तो मेरी मा भी गरम हो

उठी और अपनी चूत मेरे खड़े लंड पर रगड़ने लगी. लेकिन मैने मा को अपने आप से अलग किया और दीदी के कमरे

की तरफ बढ़ गया. दीदी बिस्तर में थी लेकिन जाग रही थी. मैने उसको बाहों में भर कर ज़ोर से होंठों पर किस

किया और चुचि भी मसल डाली. अब नाटक करने का वक्त नहीं था. अब मेरी प्यारी दीदी को पता चल जाना

चाहिए था कि उसका भाई अब उसकी चूत का दिवाना है और अपने जीजा जी जगह लेना चाहता है. दीदी को खूब

चूमने के बाद मैं उतेज़ित हो गया. दीदी नहाने चली गयी. जब वो बाहर निकली तो एक सफेद नाइटी पहने हुई थी

और नीचे कोई ब्रा या पॅंटी नहीं थी. “आज रात अपने भाई के रूम में ही सोना, देखना कितना मज़ा आता है!!!” कह

कर मैं अपनी अलमारी से एक अडल्ट कहानी वाली बुक दीदी को देते हुए बोला,”इस किताब को पढ़ लेना. पता

चलेगा कि प्यार क्या होता है और कैसे किया जाता है. रात को विस्की ले कर आउन्गा…मम्मी से चोरी…हम थोड़ी

सी पी लेंगे अगर मेरी प्यारी दीदी चाहेगी तो…सच दीदी, बहुत सुंदर हो तुम….तेरा हुसन मेरे दिल का क्या हाल

बना रहा है, मुझ से पुछो!!!” दीदी शरम से लाल हो रही थी. जो किताब मैने दीदी को दी थी वो रमन की कहानियो

का एक भाई बहन की चुदाई का मस्त किस्सा था. अगर दीदी ने वो किताब पढ़ ली तो मेरे आने तक उसकी चूत

मचल रही होगी चुदने के लिए. बाहर जाते हुए मैने मा को सारा प्लान बता दिया और वो शरारती ढंग से मुस्कुराने

लगी.

=====

रात जब मैं वापिस लौटा तो दीदी मेरा इंतज़ार कर रही थी जैसे कोई पत्नी अपने पति का इंतज़ार करती हो. मुझ

पर हवस का भूत सवार था. मैने दीदी को बाहों में भर लिया और चूमने लगा. दीदी के जिस्म पर मेरे हाथों का स्पर्श

उस पर जादू कर रहा था. फिर मैने ग्लास में विस्की डाली और दीदी को ग्लास पकड़ा दिया. दीदी बिना कुछ बोले

पी गयी. थोड़ी देर में नशा होने की वजह से दीदी के अंदर वासना ने ज़ोर पकड़ लिया लगता था. मैने अपना हाथ

दीदी की चूत पर रखा और उसको रगड़ने लगा.”दीदी, मैं जानता हूँ की जीजा जी ने तुझे प्यार नहीं किया. इस वक्त

भी राकेश रिंकी के साथ चुदाई में व्यस्त है. तुम अपने पति से उसकी बे वफाई का बदला नहीं लोगि? और दीदी मेरी

किताब पढ़ी आपने कैसी लगी? ” दीदी मुस्कुराते हुए बोली ,”अच्छी थी लेकिन क्या भाई अपनी बहन के साथ ऐसा

करते हैं?” मैं भी मुस्कुराता हुआ बोला”ज़रूर करते हैं अगर बहन आप जैसी सेक्सी हो और भाई मुझ जैसा प्यार

करने वाला हो” आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

दूसरा पेग पी कर मैने दीदी को अपने आगोश में बिठाया और उसके जिस्म को नाइटी के उप्पेर से सहलाने लगा.

दीदी के मस्त चुट्टर बहुत गुदाज़ थे और मेरा लंड उनके चूतर में घुसने लगा,”राकेश मुझे तेरा….चुभ रहा

है….उई…..बस कर…” मैं आनी दीदी को लंड से प्यार करना सीखाना चाहता था. ‘दीदी, तुझे किताब वाली कहानी

कैसी लगी…कहानी में भाई का लंड,,,तुझे पसंद आया? कहानी में बहन अपने भाई के लंड को कितना प्यार करती है

ना? तुम मेरे लंड को प्यार करोगी? इसको सहलायोगी? दीदी मैं भी तेरे जिस्म को चुमुन्गा, चाटूँगा, इतने प्यार से

जितने प्यार से राकेश ने भीनही चूमा होगा” मैं अब नीता दीदी के जिस्म के हर अंग को प्यार से सहला रहा था.

और दीदी भी गरम हो रही थी.”राकेश कुत्ते का नाम मत लो, मेरे भाई. उसने मुझे इतना दर्द दिया है कि बता नहीं

सकती. मुझे इस प्यार से भी दूर लगने लगा है. राकेश मुझे दर्द ना पहुँचना, मेरे भाई”

मैने देखा कि दीदी गरम है और अब उसको तैयार करने का वक्त आ गया है. मैने दीदी की नाइटी उप्पेर उठाई और

उसके जिस्म नंगा कर दिया. मेरी बहन का गुलाबी जिस्म बहुत कातिलाना लगता था. नीता दीदी की जंघें केले की

तरह मुलायम थी और उसके नितंभ बहुत सेक्सी थे. सफेद ब्रा और पॅंटी में दीदी बिल्कुल हेरोयिन लग रही थी. मैने

अपना मुख दीदी के सीने पर रख कर उसकी चुचि को किस करने लगा. दीदी ने आँखें बंद की हुई थी और वो

सिसकियाँ भरने लगी, मैने दीदी का हाथ अपने दहक रहे लंड पर रख दिया. दीदी अपना हाथ खींचने लगी तो मैं

बोला,”दीदी, इसको मत छोड़ो. पकड़ लो अपने भाई के लंड को. ये तुझे दर्द नहीं देगा, सुख देगा. जिसस तरह

किताब में बहन अपने भाई की प्रेमिका बन कर मज़े लूटती है, उससी तरह तुम मेरी प्रेमिका बन जाओ और फिर

जवानी के मज़े लूट लो आज की रात. मेरा लंड अपनी बहन की प्यारी चूत को स्वर्ग के मज़े देगा. अगर मैने तुझे दर्द

होने दिया तो कभी मुझ से बात मत करना. मेरी रानी बहना ये लंड तुझे हमेशा खुश रखेगा!!” दीदी कुछ ना बोली

लेकिन उसने मेरा लंड पकड़े रखा. मेरा लंड किसी कबूतर की तर्रह फाड़ फाडा रहा था अपनी बहन के हाथ में. मैने

फिर दीदी की ब्रा को खोल दिया और उसकी चुचि मस्ती से भर के मेरे हाथों में झूल उठी. दीदी के स्तन बहुत मस्त

हैं,”अहह….ऊऊहह…राकेश क्या कर रहे हो?”वो सिसकी. “क्यों दीदी, अपने भाई का स्पर्श अच्छा नहीं लगा?”मैने

दीदी के गुलाबी स्तन पर काली निपल को रगड़ कर कहा. आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

“अच्छा लगा, राकेश, लेकिन ऐसा पहले कभी महसूस ना हुआ है मुझे. ऐसा अनुभव पहली बार हो रहा है!!!” मैने

हैरानी से पूछ लिया,”क्यों दीदी, क्या जीजा जी एस नहीं करते थे तुझे प्यार?”अब मेरा दूसरा हाथ दीदी की फूली

हुई चूत सहला रहा था और दीदी अपनी चूत मेरे हाथ पर ज़ोर से रगड़ रही थी.”तेरा जीजा मदर्चोद तो बस मेरे मूह

में डाल देता था अपना बदबू दार लंड और बाद में मेरी चूत में धकेल देता था. मेरे भाई मैं दर्द से चीखती रहती थी

और वो मेरे उप्पेर सवार हो जाता था. लेकिन तू तो प्यार करता है मेरे भाई…मुझे आनंद आ रहा है…तेरा लंड भी

बहुत खुश्बुदार है…बहुत सुंदर है..तेरा स्पर्श बहुत सेक्सी है..राकेश यार तेरे हाथ मेरे अंदर एक मज़ेदार आग भड़का

रहे हैं…तेरी उंगलियाँ मेरी चूत में खलबली मचा रही हैं….मेरी चूत से रस टपक रहा है…तेरा स्पर्श ही मुझे औरत

होने का एहसास करा रहा है…मैं तेरे अंदर समा जाना चाहती हूँ….चाहती हूँ कि तू मेरे अंदर समा जाए….मेरे जिस्म

का हर हिस्सा चूम लो मेरे भाई…मुझे अपने जिस्म का हर हिस्सा चूम लेने दो!!!!!”

मैं जान गया था कि दीदी अब तैयार है. मैने एक पेग और बनाया और हम दोनो ने पी लिया. मैं नहीं चाहता था कि

दीदी अपना फ़ैसला बदल ले. आज मैं दीदी को चोद कर सदा के लिया अपना बना लेना चाहता था. दीदी ने अपनी

पॅंटी अपने आप उतार डाली और मेरे लंड से खुलेआम खेलने लगी. एक हाथ दीदी अपनी चूत पर हाथ फेर रही थी.

मैने झुक कर दीदी के निपल्स चूसना शुरू कर दिया और दीदी मेरे बालों में उंगलियाँ फेरने लगी. दीदी की चुचि

कठोर हो चुकी थी और अब मैने अपने होंठ नीचे सरकने शुरू कर दिए. जब मेरे होंठ दीदी की चूत के नज़दीक गये

तो वो उतेज्ना से चीख पड़ी,” राकेश, मेरे भाई…क्यों पागल कर रहे हो अपनी बहन को? मुझे चोद डालो मेरे

भाई…तेरी बहन की चूत का प्यार मैने तेरे लंड के लिया संभाल रखा है…डाल दो इसको मेरी चूत में!!!” मैं अपने सारे

कपड़े खोलते हुआ दीदी के उप्पेर चढ़ गया. दीदी का नंगा जिस्म मेरे नीचे था और उसने बाँहे खोल कर मुझे

आलिंगन में भर लिया. दीदी की चूत रो रही थी, आँसू बहा रही थी. मैने प्यार से अपना सूपड़ा दीदी की चूत की

लंबाई पर रगड़ना शुरू कर दिया. हम भाई बहन की कामुकता हद पार कर गयी और दीदी ने बिनति की,”भैया, अब

रहा नहीं जाता..घुसेड दो मेरी चूत में…होने दो दर्द मुझे परवाह मत करो, पेलो मेरी चूत में अपना लंड!!”

लेकिन मैने अपना सूपड़ा चूत के मुख पर टिका कर हल्का धक्का मारा. चूत रस के कारण सूपड़ा आसानी से घुस गया

और दीदी तड़प उठी, जिस में दर्द कम और मज़ा अधिक था”है भैया…मर गई…आआआः…..है…बहुत मज़ा दे रहे हो

तुम….और धकेल दो अंदर…पेलते रहो भैया…ऊऊहह..मेरी चूत प्यासी है….आज पहली बार चुद रही है……बहुत प्यारे

हो तुम मेरे भाई………डाल दो पूरा!!!!” मैने लंड धीरे धीरे आगे बढ़ाना शुरू कर दिया. दीदी को तकलीफ़ नहीं देना

चाहता था मैं. दीदी का मन जीजा जी की ज़बरदस्ती से की गयी चुदाई से जो डर बन गया था उसको मज़े में बदल

देना चाहता था. चूत गीली होने से लंड ऐसे अंदर घुस गया जैसे माखन में च्छुरी. नीता दीदी की चूत क्या थी

बिल्कुल आग की भट्टी. मैं भी नशे में था. दीदी के निपल्स चूस्ते हुए मैने पूरा लंड थेल दिया अंदर. दीदी की

सिसकारियाँ उँची आवाज़ में गूँज रही थी. मुझे शक था कि मा ना सुन ले. लेकिन मेरे मन ने कहा,”अगर मा सुन

लेती है तो सुन ले..उसकी बेटी पहली बार चुदाई के मज़े लूट रही है…आख़िर मेरी दीदी को भी तो लंड का सुख

चाहिए ही ना!!अगर उसका पति नहीं दे सका तो भाई का फ़र्ज़ है उसको वो मज़ा देना!!”

फिर मैने धक्को की स्पीड बढ़ानी शुरू कर दी. दीदी भी अपने चूतड़ उप्पेर उठाने लग पड़ी. उसको लंड का मज़ा मिल

रहा था. दीदी ने अपनी टाँगें मेरी कमर पर कस दी और मुझ से पागलों की तरह लिपटने लगी. मेरा लंड तूफ़ानी

गति से चुदाई कर रहा था. दीदी के हाथ मेरे नितंभों पर कस चुके थे,” दीदी कैसा लगा ये चुदाई का मज़ा? मेरा

लंड? तेरी चूत में दर्द तो नहीं हो रहा? मेरी बहना तेरा भाई आज पहली बार चोद रहा है किसी लड़की को और वो

भी अपनी सग़ी बहन को!!” दीदी नीचे से धक्के मारती हुई बोली,”राकेश मुझे क्या पता था कि चुदाई ऐसी होती

है..इतनी मज़ेदार!!भाई मेरे अंदर कुछ हो रहा है…मेरी चूत पानी छोड़ने वाली है…मैं झड़ने को हूँ…ज़ोर से…और ज़ोर

से चोद मेरे भाई…उूउउफफफ्फ़…ज़ोर से भैय्ाआआ!!!” मैं भी तेज़ चुदाई कर रहा था. मेरा लंड चूत की गहराई में

जा कर चोद रहा था और मुझे भी झरने में टाइम नहीं लगाने वाला था”फ़चा फ़च “की आवाज़ें आ रही थी. तभी मेरे

लंड की पिचकारी निकल पड़ी”आआआआहह…..डिदीईईई…मैं भी गया…..मैं गयाआअ” दीदी की चूत से रस की धारा

गिरने लगी और हम दोनो झार गये. हम इस बात से अंजान थे कि दो आँखें हमारी चुदाई देख चुकी थी.

मा हम भाई बहन को देख रही थी. लेकिन हम इस बात से अंजान थे. मैं नीता दीदी के साथ लिपट कर सो गया.

चुदाई इतनी ज़ोरदार थी कि मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब तक सोता रहा. जब नींद खुली तो दोपहर के 12 बज

चुके थे. दीदी मेरे बिस्तर में नहीं थी. उठ कर कपड़े पहने और मैं नहाने चला गया. पिच्छले दिन की शराब का नशा

मुझे कुछ सोचने से रोक रहा था.. सिर भारी था. नहा कर जब बाहर निकला तो मैं चुस्त महसूस करने लगा. दीदी के

साथ चुदाई की याद मुझे अभी भी उतेज़ित कर रही थी. रात के बाद दीदी क्या अपना मन तो ना बदल लेगी? कहीं

मा इस संबंध से नाराज़ तो ना होगी? ये सवाल मेरे दिमाग़ में कौंध रहे थे. आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट

नेट पर पढ़ रहे है | जब में मा के रूम से गुज़र रहा था तो मुझे मा और दीदी की आवाज़ सुनाई पड़ी,” मा, राकेश ने

मुझे ज़िंदगी का असल आनंद दिया है कल रात. सच मा, राकेश ने तो जितना दर्द दिया सब भुला दिया भाई ने!!

चाहे दुनिया इस प्यार को जो चाहे नाम दे, या पाप कहे लेकिन मेरे लिए राकेश किसी भगवान से कम नहीं है. मैं तो

अपने भाई के साथ ये ज़िंदगी बिताने के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ. कल तक लंड, चूत चुदाई जैसे शब्द मुझे

गाली लगते थे, लेकिन आज ये सब मेरी ज़िंदगी हैं!! मा तू तो मेरी मा है. तुझे तो मेरी खुशी की प्रार्थना करनी

चाहिए. अब तो तुझे भी मर्द का सुख ना मिलने पर दुख हो रहा होगा. मा मुझे राकेश से मिला दो, प्लीज़. हमारी

शादी करवा दो!! भाई बहन को पति पत्नी बना दो, मा!!!!!!!!” मुझे खुशी थी कि नीता दीदी खुद मुझ से शादी करने के

लिए मा को मना रही थी. वाह!!बहन हो तो ऐसी!!!

नीता दीदी और मा को अकेले छोड़ कर मैं अपने रूम में चला गया. कपड़े चेंज किए और घर से निकल गया. शाम

को जब वापिस आया तो मा मुझे अजीब नज़रों से देख रही थी. मा ने भी आज लो कट गले वाली कमीज़ और

सलवार पहनी हुई थी. मेरे सामने मा आटा गूंधने लगी. जब वो आगे झुकती तो उसकी चुचि लग भाग पूरी झलक

जाती मेरी नज़र के सामने. मेरा लंड खड़ा होने लगा. सोचा कि चलो दीदी को कमरे में ले जा कर चोद्ता हूँ. तभी

मा फिर से आगे झुकी और मेरी तरफ देखने लगी. उसकी नज़र से नहीं छुपा था कि मैं मा की गोरी चुचियो को घूर

रहा हूँ. तभी उसकी नज़र मेरी पॅंट के सामने वाले उभार पर पड़ी. मेरी प्यारी मा मुस्कुरा पड़ी. मा की मुस्कुराहट को

देख कर मेरे मन में आया कि उसको बाहों में भर लूँ और प्यार करूँ. “मा, नीता दीदी कहाँ है? दिखाई नहीं पड़ रही

कहीं भी!!” आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

“अब सारा प्यार अपनी नीता दीदी को ही देता रहेगा या मा को भी कुछ हिस्सा देगा? बेटा, नीता तुझ से बहुत खुश

है. लेकिन हम लोगों को प्लान करना पड़ेगा. हम तीनो को किसी ना किसी चीज़ की ज़रूरत है. सब से बड़ी चीज़

पैसा है. जो हम को राकेश से लेना है. जमाई राजा ने जमाई का काम तो कुछ नहीं किया लेकिन उसको हम ब्लॅकमेल

ज़रूर कर सकते हैं….नीता के साथ संबंधों को लेकर…जब तक नीता का तलाक़ नहीं हो जाता तुझे भी समझदारी से

काम लेना होगा. मैने नीता को वकील से मिलने भेजा है. आज रात को आराम से बैठ कर प्लान बनाएँगे. ठीक है

ना? तुम ऐसा करो कि कुछ बियर वगेरा ले आयो और हम मिल कर रात को बियर पी कर बात करेंगे” मेरे मन में

मा के लिए इतना प्यार आया कि मैने उसको बाहों में ले कर चूम लिया. मा की साँस भी तेज़ हो गयी और उसके

सीने का उठान उप्पेर नीचे होने लगा. मा का सीना मेरी छाती से चिपक गया. मुझे वोही फीलिंग हो रही थी जो

नीता दीदी को किस करते हुए हो रही थी. मुझे लग रहा था कि मेरा प्यार मेरी बाहों में है. जब मैने मा के मुख में

अपनी ज़ुबान डाल दी तो मा उसको चूसने लगी. मुझे बहुत मज़ा आ रह आता और मेरा लंड अब मा के पेट से टकरा

रहा था. मैने अब हर हद पार करते हुए मा का हाथ अपने तड़प्ते हुए लंड पर रख दिया. मा ने पहले तो मेरा लंड

थाम लिया लेकिन फिर अचानक पीछे खींच लिया,’ नहीं राकेश बेटा…नहीं …ये ठीक नहीं है…..छोड़ दो मुझे!!” मैं भी

संभाल गया और मैने मा को छोड़ दिया और मा किचन में चली गयी. मैने सोचा कि शायद मा अपने बेटे के साथ

पहले नाजायज़ संपर्क से घबरा गयी थी. लेकिन चिंता की कोई बात ना थी. रात को बियर वाली बात मेरे लिए

फ़ायदेमंद होगी. शराब से आदमी की झिझक ख़तम हो जाती है. मैं बाज़ार से कुछ बियर और एक बॉटल वोद्का की

ले आया जिसको मैने फ्रिड्ज में रख दिया. नीता दीदी भी वापस आ चुकी थी. उसने एक सिल्क की हल्के नीले रंग की

पारदर्शी सारी पहनी हुई थी. मा और दीदी ड्रॉयिंग रूम में बैठे हुए थे. मैं दीदी के साथ सॅट कर छ्होटे सोफे पर बैठ

गया. दीदी के जिस्म से भीनी भीनी सुगंध उठ रही थी और उसका मखमली बदन मुझे उतेज़ित कर रहा था. “मा मैं

बियर लाया हूँ. क्यों ना थोड़ी सी हो जाए. आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

दीदी का मूड भी ठीक हो जाएगा और हम वकील से हुई बात भी डिसकस कर लेंगे” मा ने सिर हिला दिया और मैं

तीन ग्लास में बियर के साथ वोड्का मिक्स कर के ले आया. मा और नीता दीदी ने ग्लास पकड़ लिए और धीरे से

पीने लगी. शराब के अंदर जाते ही मेरे लंड में आग भड़क उठी. मुझे अपनी दीदी और मा बहुत ही कामुक लगने

लगी. एक प्लेट में मैने फ्राइड फिश और सॉस रखी हुई थी. दीदी ने जब चुस्की लेने के बाद फिश खाई तो उसके होंठों

पर सॉस फैल गयी.” नीता ध्यान से खा…देख अपना मुख गंदा कर लिया है तूने…मैं नॅपकिन ले कर आती हूँ” मा उठी

और बाहर चली गयी. मैने देखा कि दीदी के मुख पर सॉस लगी हुई थी. मैने दीदी को बाहों में लेते हुए उसके होंठों

से सॉस चाटनी शुरू कर दी,”मा तो पागल है…मेरे स्वीट दीदी के स्वीट होंठों से सॉस सॉफ करने के लिए जब उसका

भाई बैठा है तो नॅपकिन की क्या ज़रूरत…भाई है ना दीदी के होंठों को प्यार से सॉफ करने के लिए!!!” मैने दीदी को

कस कर आलिंगन में ले लिया और उसके चेहरे को चूमने लगा. दीदी भी उतेज़ित हो रही थी क्यों कि वो मुझे वापिस

किस कर रही थी. आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |जब मा वापिस आई तो हम भाई बहन

के मुख एक दूसरे से ऐसे जुड़े हुए थे जैसे की कोई प्रेमी हों. मा चुप चाप बैठ गयी.”राकेश बेटा, मैने तुझे यही सबक

दिया था कि जब तक तेरी दीदी का तलाक़ नहीं हो जाता तब तक ध्यान से. तू यहाँ अपनी दीदी से किस कर रहा है

और बाहर दरवाज़ा खुला है. अगर कोई अंदर आ जाता तो? मेरे बच्चो, मेरी खुशी तुम्हारी खुशी मैं ही है. मैने कल

रात सब कुछ देख लिया था और नीता ने मुझे सब कुछ बता दिया था. मैं तुम दोनो के साथ हूँ. राकेश बेटा, वकील ने

कहा है कि राकेश को उसकी बहन के साथ संबंध के साथ ब्लॅकमेल कर के अच्छा पैसा बनाया जा सकता है…खास

कर जब तेरे पास उनकी फोटोस के साथ. अगर हम उस से 3-4 करोड़ ले लेते हैं तो इस शहर को छोड़ कर किसी

दूसरी जगह जा सकते हैं. लेकिन तब तक बहुत ध्यान से रहना होगा. बेटा तू जवान है…पर थोड़ा ध्यान से!!!” आप

लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है | मैने दूसरा ग्लास बनाया जब सब ने पहला ग्लास खाली कर

दिया था. इस बारी मैने ग्लास में वोड्का की मात्रा बढ़ा दी ता कि सब को नशा जल्दी हो जाए. मेरी प्लान आज रात

को अपने परिवार की दोनो औरतों को चोद लेने की थी. नीता दीदी के साथ मैं रात बिता चुका था जिसका मा को

पता था. अब मा को छोड़ देना बेवकूफी होगी. आख़िर मा की भी कुछ ज़रूरतें थी. मेरी मा की भी लंड की भूख मुझे

ही मिटानी होगी. अपनी मा के गदराए जिस्म को देख कर मैं पागल हो रहा था. मैं दीदी को ग्लास पकड़ा कर मा के

साथ सॅट कर बैठ गया. मा ने घूँट भरा तो शराब उसके होंठों से नीचे बह गयी और उसकी गर्दन तक शराब के कारण

उसका जिस्म भीग गया. मैने जीभ से शराब चाटना शुरू कर दिया. मा ने अपने आप को छुड़ाने का प्रयास किया

लेकिन मैने उसको जाकड़ रखा था. कुछ हिस्सा मा की चुचि तक चला गया जिसको मैं चूम चूम कर चाटने लगा.

दीदी चुप चाप देख रही थी जब मेरे हाथ मा की चुचि पर कस चुके थे. मा की साँस ऐसे चल रही थी जैसे कोई

जानवर चुद्ते वक्त साँस लेता हो.

मैं थोड़ी देर में मा से अलग होता हुआ बोला”मा, आज से हम दोनो तेरी हर बात मानेगे, लेकिन मेरी एक बात तुम

दोनो को माननी होगी. तुम दोनो के साथ मेरा रिश्ता वैसा ही होगा जैसा तुमने कल रात दीदी के साथ देखा था.

आज से मेरा क़ब्ज़ा ना सिर्फ़ नीता पर होगा बल्कि मा, तुझ पर भी होगा. मैं जानता हूँ मा, की तुझे भी जिस्म की

भूख लगती है और दीदी के भी कुछ अरमान हैं. मैं घर का मर्द हूँ. आप दोनो का मेरे जिस्म पर पूरा हक है और मेरा

तुम दोनो पर. यानी पति एक पत्नियाँ दो. राकेश कल बना था बेह्न्चोद और आज बनेगा मदर्चोद!!! बोलो मज़ुर है

आपको?” कहते हुए मैं मा का हाथ अपने लंड पर रख दिया. इस बरी मा ने अपना हाथ नहीं खींचा. “नीता क्या तुम

मुझे मा के साथ बाँट सकती हो?” मैने पुछा तो नीता अपनी सीट से उठी और मा के होंठों पर होंठ रख कर किस

करने लगी. किसी जवाब की ज़रूरत ना थी. मा मेरे लंड से खेलने लगी और अपनी बेटी को किस करने लगी. आप

लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |मैने मा की जांघों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया और दीदी की

सारी खोल डाली. “राकेश बेटा, तू और नीता तो ठीक हो, मुझे इस काम में मत घसीतो. मैं अब जवान नहीं हूँ. यूँ

दोनो की शादी मैं करवा दूँगी. मेरा वादा रहा. मुझे तुम जैसा जमाई और नीता बेटी जैसी बहू कहाँ मिलेगी और मैं

तुम दोनो का प्यार अपनी आँखों के सामने देख सकूँगी” मैं मा की बात सुन कर खुश तो हुआ लेकिन बिना मा के मेरी

ग्रहस्ति पूरी होने वाली नहीं थी. आज रात को मेरी मा मेरे लिए मेरी प्यारी सुजाता बन जाएगी. बिल्कुल मेरी बहन

जैसी एक चोदने वाली औरत. मेरी एक और पत्नी!!! मैने अपनी ज़िप खोल दी और मा का हाथ अपने गरम लंड पर

रख दिया,” सुजाता, अपने बेटे का लंड पकड़ कर देखो कि आपके पति से बड़ा है या नहीं? मेरी प्यारी सुजाता, चाहे

ये लंड तेरी चूत से निकला हो, आज तेरी चूत को चोद कर तुझे औरत का सुख देगा, तुझे मेरे बाप की कमी महसूस

ना होने देगा!!!”

मा ने मेरा लंड सहलाया और वो और भी कड़ा हो गया. नीता दीदी ने अपना हाथ मा की कमीज़ में डाल कर उसकी

चुचि को सहलाना शुरू कर दिया. मेरी मा सुजाता का जिस्म आप वासना से गुलाबी होने लग चुका था. नीता दीदी

भी बहुत सेक्सी अंदाज़ से माँ को किस कर रही थी. “मा, राकेश तुझे भी उसी तरह प्यार करेगा जिस तरह मुझे कर

चुका है. बहुत प्यारा है मेरा भाई….तेरा बेटा…..हमारा ख्याल रखेगा….हमारा मर्द राकेश….हम दोनो इसकी बन के

रहेंगी…और ये हमारा….ना मेरा …ना तेरा…मा और बेटी का एक मर्द…एक यार..एक लंड…..जो मेरा भी है और तेरा

भी!!!!!”

मा का चेहरा और गुलाबी हो गया. शायद शरम और वासना का मिला जुला असर था.”हां बेटी, जिसको जमाई

बनाया था वो तो धोका दे गया. अब अपने खून पर ही भरोसा है मुझे. राकेश मेरा बेटा भी है और दामाद भी और

पति भी….हे भगवान मेरे प्यार भरे परिवार को किसी की नज़र ना लगे. हां राकेश, मेरे बेटे, तेरा लंड तेरे बाप से भी

बड़ा है और मोटा भी…मुझे यकीन है तुम इस से हम मा बेटी दोनो को संतुष्ट रखोगे. तेरे लंड का स्पर्श मेरे अंदर एक

जवाला भड़का रहा है. मेरे अंदर की औरत को जगा रहा है. मुझे कोई आपत्ति नहीं अगर नीता मुझे भी तेरा प्यार

बाँटने के लिए राज़ी है. मेरे बेटा जैसा मस्त जवान हमारे लिए बहुत है. जो मन मे आए कर ले तू बेटा!” आप लोग

यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |मैं उठ खड़ा हुआ और मा की कमीज़ उतारने लगा. मैने मा के बालों

का जुड़ा भी खोल दिया. नीता दीदी ने अपना ब्लाउस और पेटिकोट उतार दिया. नीता दीदी का गोरा जिस्म प्यार

और शराब के नशे से बहुत गुलाबी हो रहा था.”मा, नीता दीदी को चोद चुका हूँ मैं. तुझे चोद कर आज की रात

यादगार बनाना चाहता हूँ. सुजाता कहूँ तो कोई एतराज़ तो नहीं होगा? मुझे यकीन है कि नीता दीदी को भी जलन

ना होगी अगर मैं आप दोनो को चोदु!!!” नीता ने अपनी पॅंटी उत्तरते हुए कहा”राकेश, मेरे भाई, मा बेटी में कैसी

जलन? घर का माल घर में ही तो रहेगा. और वैसे भी सुजाता की मर्ज़ी से ही हमारा मिलन संभव होगा. तेरा

जितना हक अपनी बहन पर है, उतना ही अपनी मा सुजाता पर होगा. मैं तुम दोनो को चुदाई करते देख कर मा से

कुछ सीख लूँगी. क्यों मा?”

“ठीक है बेटी. मुझे भी आज 20 साल के बाद लंड नसीब हो रहा है और वो भी अपने बेटे का. सच बेटा, तेरा लंड

बिल्कुल तेरे बाप जैसा है, बस मोटा थोड़ा अधिक है. आज अपनी मा को वो सुख दे दो जो तेरा बाप देता था. नीता

बेटी, चुदाई का सब से पहला कदम है मर्द का लंड सहलाना, मुठियाना, इस से प्यार करना, इसको चूमना, चाटना.

जो मैं करती हूँ तू भी वैसे ही करना. जितना मज़ा राकेश को आएगा, उतना ही तुझे और मुझे भी आएगा.” मा ने

मेरा लंड अपने गरम हाथों में ले लिया और उप्पेर नीचे करने लगी. उसने मेरे सूपदे पर ज़ुबान फेरी तो नीता दीदी के

मूह से आह निकल गयी. नीता अब मा की हर हरकत गौर से देखने लगी. मेरा लंड बेकाबू हो रहा था. नीता दीदी ने

मा की नकल करते हुए मेरे लंड पर ज़ुबान फेरनी शुरू कर दी. ड्रॉयिंग रूम में ये सब करना मुझे आरामदायक नहीं

लग रहा था. मैने दोनो से कहा,”हमको बेड पर चलना चाहिए. यहाँ मज़ा नहीं आएगा. मुझे लगता है कि मा के बेड

पर चला जाए. उसी बेड पर जहाँ मा को पहली बार पापा ने चोद कर गर्भवती किया था, उसी बेड पर बेटा भी

अपनी प्यारी मा की चुदाई का महुरत करना चाहता है!!क्यों क्या विचार है सुजाता?” आप लोग यह कहानी

चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है | मा के चेहरे पर एक खास मुस्कान उभर आई. आज मा का चेहरा ऐसे चमक रहा

था जैसे किसी नई नवेली दुल्हन अपनी पहली चुदाई की प्रतीक्षा कर रही हो. हम तीनो पूरी तरह से नंगे हो कर मा

के बेडरूम की तरफ बढ़ गये. जब मा आगे आगे चल रही थी तो मुझे उसकी गांड बहुत उतेजक लग रही थी. सुजाता

मेरी मा के चूतड़ बहुत सेक्सी थे. “एक दिन सुजाता के मखमली नितंभों के बीच से उसकी गांड ज़रूर चोदुन्गा” मैने

अपने आप से वादा किया! “तुम दोनो बिस्तर पर चलो, मैं एक लास्ट पेग बना कर लाता हूँ” मैने कहा और पेग

बनाने लग पड़ा. शराब के नशे को वासना ने दोगुना बढ़ा दिया था. मैने तीन बड़े पेग बनाए और मा के रूम में जा

घुसा. बिस्तर पर जो नज़ारा था देख कर दिल खुश हो गया. मेरी मा और बहन दोनो एक लेज़्बीयन 69 की

पोज़िशन में साइड बाइ साइड लेटी हुई थी. सुजाता की चूत पर नीता के होंठ और नीता की चूत पर सुजाता के होंठ

थे. मैं समझ गया कि दोनो औरतें छुड़ासी हो रही हैं. नीता दीदी की जीभ सुजाता की चूत की फांकों को चूस रही थी

और मा अपनी बेटी की चूत का रस चाट रही थी. मैने ग्लास टेबल पर रखे और नज़दीक जा कर मुझ से ना रहा गया

और मैने एक उंगली मा की गांड में धकेल डाली. सुजाता को इस बात की कोई उम्मीद नहीं थी और हाड़ बदाहट में

उसने नीता की चूत को काट खाया. ‘उई…मा ये क्या…मर गयी!!!!” नीता दीदी छुट पटा पड़ी. आप लोग यह कहानी

चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है | मा ने अपना मूह नीता दीदी की चूत से हटा लिया और बनावटी गुस्सा दिखाती

हुई बोली,”सॉरी बेटी, ये साला राकेश मदर्चोद शरारत कर रहा था. इसने मेरी गांड में उंगली डाल दी थी जिसस के

लिए मैं तैयार नहीं थी” मैने मा के नितंभ पर किस किया और बोला” कोई बात नहीं सुजाता रानी, अब गांड तो

तभी स्पर्श करूँगा जब तू तैयार होगी, अपने मदर्चोद बेटे से गांड मरवाने के लिए. तब तक नीता दीदी को भी तैयार

करो. सच कहूँ तो मेरा विचार तुम दोनो को अपनी पत्नी बनाने का है, अगर तुम दोनो चाहो तो! मैं जीजा और बाप

दोनो का फ़र्ज़ निभाना चाहता हूँ. तुम्हारी दोनो की गांड है है ही बहुत सेक्सी!!!”

=====

नीता दीदी ने झट से अपना ग्लास उठाया और एक ही साँस में गटक गयी. मैं सुजाता से लिपट कर उसको चूमने

लगा और उसकी चुचि को मसल्ने लगा. नीता दीदी ने मेरा लंड चूसना शुरू कर दिया. अब उसको अपने भाई के लंड

से प्यार हो गया था,और होता भी क्यों नहीं. मैं अपने लंड को साबुन से धो कर रखता हूँ और वो भी खुश्बुदार

साबुन से.

नीता दीदी ने पहले तो अपने गालों पर मेरा सूपड़ा फेरा और फिर प्यार से उसको किस किया. मैं किस करते हुए एक

हाथ से मा की चुचि मसल रहा था और दूसरे से उसकी चूत स्पर्श कर रहा था. तीन जिस्म अब हवस की आग में जल

रहे थे. रुकना मुनासिब ना था. नीता ने अब मेरा लंड हाथ में ले लिया था और मेरे अंडकोष चूसने शुरू कर दिए थे.

‘बेटा, अब जल्दी से डाल दो मेरी चूत में अपना लंड. बहुत तर्सि हूँ मैं लंड के लिए. कल रात जब मैने तेरा लंड नीता

की चूत में जाते हुए देखा था, तब से मेरी निगोडी चूत भी इसकी कामना कर रही है. तेरे लंड की चमक अभी तक

मेरे दिलो दिमाग़ में बसी हुई है. बस देरी ना करो, राकेश बेटा. ठोक दो अपनी मा को, अपनी सुजाता को चोद कर

निहाल कर दो. हम मा बेटी के स्वामी बन जाओ. ओह बेटा, मेरी चूत में आग लगी हुई है!!! आप लोग यह कहानी

चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है | मैने मा को लिटा लिया और उसकी जांघों को खोलते हुए उसकी चूत को प्यार

से सूँघा. मा की चुदसी चूत रो रही थी खुशी के मारे. फिर मैने अपना सूपड़ा सुजाता की चूत पर टीकाया और चूत

पर रगड़ने लगा. “उफफफफफ्फ़ राकेश!!!! क्यों तरसा रहे हो? डाल दो ना!!” नीता दीदी मेरी पीठ से सॅट कर मुझ से

लिपटने लगी.”भाई, पेल डालो अपनी सुजाता को. फिर मेरी बारी आएगी अपने प्यारे भाई के लंड से चुदवाने की.

राकेश, सुजाता की चूत मस्ती से भरी पड़ी है. मसल डालो इसको अपनी मा की प्यासी चूत को. जो काम पापा ने

किया था आज उनका बेटा भी कर डाले. भैया मा के बाद फिर मुझे कल वाली जन्नत दिखा देना. मैं महसूस कर रही

हूँ कि आज तेरा लंड कल से भी अधिक उतावला हो रहा है. और मेरा राजा भैया का लंड उतावला हो भी क्यो ना?

आज बहन के साथ साथ मा भी मेरे भाई की हमबिस्तर हो रही है. शाबाश भाई, चोदना शुरू करो, तब तक मैं मा से

अपनी चूत चुस्वाति हूँ. मेरी चूत भी जल रही है!!!” फिर नीता दीदी ने मेरा लंड पकड़ कर मा की चिुत के अंदर

धकेल दिया. मेरी मा की चूत से इतना पानी बह रहा था कि लंड आसानी से चूत की गहराई में उत्तर गया. मा की

टाँगों ने मेरी कमर को कस लिया और वो अपनी गांड उच्छालने लगी.

नीता दीदी ने अपनी टाँगों को फैला कर अपनी चूत मा के मुख पर रख दी और सुजाता ने अपनी ज़ुबान उसकी चूत

में घुसा डी. नीता अब मा की ज़ुबान पर चूत हिलाने लगी. नीता की साँस भी बहुत भारी हो चुकी थी. मा और दीदी

दोनो कामुक सिसकारियाँ भर रही थी. मैने सुजाता की चुचि को ज़ोर से मसल्ते हुए धक्कों की स्पीड बढ़ा डाली. लंड

फ़चा फ़च चूत के अंदर बाहर होने लगा. जब मैने मा के निपल्स चूसना शुरू किया तो वो बेकाबू हो गयी और पागलों

की तरह चुदवाने लगी. सुजाता ने अपना मुख मेरी बहन की चूत से अलग करते हुए कहा,” वाह बेटा, वाह, चोद

मुझे….चोद अपनी मा की चूत….चोद मेरी चूत!!….अपनी मा की चूत से पैदा हो कर आज उसको चोद, मदर्चोद….तू

अपनी मा को जो आनंद दे रहा है, उसका का कोई मुकाबला नहीं…आआआहह….राकेश!!!!! ओह्ह्ह्ह

मदर्चोद………नीता…तेरा भाई वाकई ही बहुत दमदार है…तुझे हमेशा खुश रखेगा…हम दोनो को खुश रखेगा…खूब

चोदेगा हम दोनो को!!!!”

नीता अब उठ कर आई और मेरे अंडकोष से खेलने लगी और मा की गांड में उंगली करने लगी. लगता था कि अब

मेरी बहना चुदाई में अधिक दिलचस्पी लेने लगी थी. जिओं ही नीता की उंगली मा की गांड में गयी तो मा का जिस्म

ऐंठने लगा. उसकी गांड तूफ़ानी गति से उप्पेर उठने लगी. मा अब झड़ने वाली थी. मैने भी चुदाई और तेज़ कर दी

लेकिन मुझ से पहले मा झड़ गयी.” ऑश बेटा….मैं गयी….राकेश…तेरी सुजाता झारीईए…तेरी माआ झार रही

है…आआअहह!!” सुजाता की चूत का रस उसकी जांघों से होता हुआ बिस्तर पर गिरने लगा. कोई 2 मिनिट छुट

पटाने के बाद सुजाता शांत हो गयी. लेकिन मैं अभी नहीं झारा था. मैने अपना भीगा हुआ लंड सुजाता की चूत से

निकाला और मा की बगल में ही नीता दीदी को लिटा दिया. दीदी मेरे लंड को भूखी नज़रों से देख रही थी. वो आगे

झुकी और मेरे लंड को चूसने लगी, चाटने लगी. नीता दीदी मकी आँखें उतेज्ना कारण बंद थी और वो किसी रांड़ की

तरह अपने भाई का लंड चूस रही थी. मुझे खुशी थी कि वो नीता जिसको अपने पति का लंड गंदा लगता था, आज

अपने भाई के लंड को किस तरह प्यार से चूम रही थी. आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

मैने दीदी को बालों से खींच कर घोड़ी बनाया और लंड घुसेड दिया एक ही झटके में,”उम्म्फफफ्फ़… उम्म्फहफ़फ

इन्न्ननननननन्‍न्‍नममममममम……म्‍म्म्मफफफ्फ़…इट…आआहह…

… म्‍म्म्फह…भैयाआअ….धीरे….माआआ….मर गइई” नीता बिलबिलाने लगी. मैं अब दीदी को बेरेहमी से चोदने लगा.

“नीता…कैसा लग रहा है? मेरा लंड तेरी चूत में घुस चुका है…बहुत टाइट है तेरी चूत…..मुझे बहुत मज़ा दे रही है ये”

उधर मा हम दोनो को देख कर मुस्कुरा रही थी और मुस्कुराती भी क्यों ना. आख़िर घर का मर्द घर की औरत को

चोद कर आनंदित कर रहा था. आप लोग यह कहानी चुनमुनिया डॉट नेट पर पढ़ रहे है | मेरा हाथ कई बारी नीता

दीदी की चुचि मसल देता और कई बार उसके चूतर पर चपत मार देता जिस से मेरी दीदी की कामुकता और तेज़ हो

जाती. दीदी आगे की तरफ झुकी हुई थी और मैं उसको घोड़ी बना कर चोद रहा था. घोड़ी बना कर चोदने का मज़ा

ही कुछ और होता है. कमरे के अंदर सेक्स की खुश्बू फैली हुई थी. मुझे दीदी के नंगे जिस्म की तस्वीर और भी कामुक

बना रही थी. धक्के तूफ़ानी हो चुके थे और दीदी अपने चूतर पीछे धकेल कर मेरे मज़े को दोगुना कर रही थी.”राकेश

मेरे भाई, तेरी बहन जा रही है…मेरी चूत पानी छोड़ रही है…..आआहह मैं झड़ रही हूँ…ज़ोर से….चोदो भाई……मैं

मर गयी….चोदो भैयाआ!!!” मेरा लंड भी चोद रहा था. मैं अपना रस दीदी की चूत के अंदर छोड़ने वाला था. मैने

नीता को कस के पकड़ रखा था और तबाद तोड़ चोद रहा था.”

ऊऊऊहह……उूुउऊहह…म्‍म्म्ममममंणणन्………..आआआआमम्म्ममम!!!!!!!!” मेरा लंड अपना फॉवरा छोड़ने लगा. मैं

कुत्ते की तरह हाँफ रहा था. नीता दीदी का भी हाल बुरा हो रहा था. मैं दीदी की चूत में लंड डाल कर सो गया.

अगले दिन जब मैं उठा तो दीदी और मा दोनो कमरे में नहीं थी. सवेर के 8 बज रहे थे. मैं उठ कर बाथरूम में गया.

नहा धो कर जब बाहर निकला तो देखा कि मा पूजा कर रही थी और दीदी उसके साथ बैठी हुई थी. जब मैं वहाँ

पहुँचा तो पहले दीदी ने और फिर मा ने झुक कर मेरे पैरों को स्पर्श किया. जब मैने उनको ऐसा करने से रोका तो वो

शर्मा कर बोली,” राकेश तुम आज से हमारे पति हो और हम तेरी पत्नियाँ. दुनिया हमारे रिश्ते को कुछ भी समझे,

लेकिन तुम हमारे स्वामी हो”
 
आवारगी

मैं कान्वेंट स्कूल में पढ़ती थी, जब मैं अठारहवें वर्ष मैं पहुंची, उस समय मैं ग्यारहवीं कक्षा में थी | मैं

विज्ञान के विषय में जरा कमजोर थी, विज्ञान के टीचर मिस्टर डबराल मुझे तथा एक अन्य लड़की श्वेता

को हमेशा डांटा करते थे। श्वेता तो मुझसे भी ज्यादा कमज़ोर थी, वह भी एक सन्पन्न परिवार से थी,

अच्छी खासी सुंदर थी।

परिक्षाएँ निकट आ रही थी, मुझे डबराल सर की वार्निंग रह रह कर सता रही थी।

उन्होंने कहा था- रजनी और श्वेता तुम दोनों ने अगर विज्ञान में ध्यान नहीं दिया तो तुम दोनों का रिजल्ट

बहुत खराब आएगा !

मैं चिंताग्रस्त हो उठी थी।

लेकिन एक दिन जब मैं स्कूल पहुंची, तो मैने श्वेता को बहुत ही प्रसन्न अवस्था में पाया। मैने श्वेता से

पूछा," क्या बात है श्वेता, तुम कैसे इतनी प्रसन्न हो, क्या तुम्हे डबराल सर की बात याद नहीं है?"

" अरे छोड़ो डबराल सर का खौफ और भूल जाओ विज्ञान में फेल होने का भय.... !" श्वेता ने लापरवाही से

कहा।

मुझे सख्त हैरानी हुई। मैने गौर से उसके चेहरे को देखा, उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों में चंचलता

विराजमान थी और गुलाबी अधरों पर मुस्कराहट !

उसके ऐसे तेवर देख कर मैने पूछा- क्या बात है, ऐसी बातें कैसे कर रही है तू... क्या अपने विज्ञान को

सुधार लिया है या फिर विज्ञान में पास होने जाने की गारण्टी मिल गई है?

ऐसा ही समझ रजनी डार्लिंग ! श्वेता ने मेरी कमर में चिकोटी काटी।

मैं तो हतप्रभ रह गई,

क्या मतलब...? ..मैने स्वाभाविक ढंग से पूछा।

मतलब जानना चाहती है तो एक वादा कर कि तू किसी को यह बात बताएगी नहीं ! जो मैं तुझे बताने जा

रही हूँ ! श्वेता धीमे स्वर में बोली।

ठीक है नहीं बताउंगी ! मैं बोली।

और हाँ.....अगर तुझे भी विज्ञान में अच्छे नंबर लेने है तो तू भी वो तरकीब अपना सकती है जो मैने

आजमाई है ! श्वेता बोली।

अच्छा .....ऐसी क्या तरकीब है? मैने पूछा।

सुन....... ! डबराल सर ने ही मुझे बताया था और मैने उन्होंने जैसा कहा था वैसा ही किया ....बस मेरे

विज्ञान में पास होने की गारण्टी हो गई.....श्वेता बोली।

अच्छा ...अगर तूने वह तरकीब आसानी से अपना ली है तो फिर मैं भी आजमा सकती हूँ, ज्यादा कठिन

थोड़े ही होगी...! मैं बोली।

कठिन.....? अरे कठिन तो बिलकुल भी नहीं है.... बल्कि इतनी आसान है कि पूछ मत.... लेकिन थोड़ी

अजीब जरूर है......! श्वेता बोली।

अच्छा.....फिर बता....मेरी जिज्ञासा बढ़ गई थी।

अपने डबराल सर हैं न ......उन्हें डांस देखने का बहुत शौक है......अकेले रहते हैं न अपने फ्लेट में....बस

उनके सामने डांस करना होता है......श्वेता बोली।

क्या..... डांस.........कैसा डांस.....? और फिर डांस से विज्ञान में पास होने का क्या सम्बंध ? मैने उलझते

हुए कहा।

अरे......डांस तो डांस होता है....बस ये है कि थोड़ा थोड़ा कैबरे करना होता है...... वो तो मैं तुझे करवा दूंगी,

और इसका पास फेल से सीधा संम्बंध है, क्योंकि डबराल सर ने ही पिछले साल छः स्टूडेंट्स को उनके डांस

से खुश होकर ही पास करवा दिया था, अब मैं भी पास हो जाउंगी क्योंकि वे मेरे डांस से भी खुश हो गए

हैं.... श्वेता बोली।

डांस कैसे करना होता है? मेरा मतलब है कि कपड़े पहन कर करना होता है या बिन कपड़ों के..... ? मैने

सशंकित स्वर मैं पूछा, क्योंकि कैबरे तो लगभग नंगा ही होता है।

अरे पागल....कपड़े पहन कर...ये अपनी शर्ट और स्कर्ट की ड्रेस पहने हुए ही.....बस कुछ इस तरह के स्टेप्स

लेने पड़ते है कि स्कर्ट के ऊपर उठने से जांघों की झलक दिखाई दे और शर्ट के अन्दर स्तन हिलें......

श्वेता ने कहा।

क्या.....? मैं चौंकी और फिर बोली...ऐसा क्यों....?

तू तो बिलकुल अनाड़ी है....अरे डबराल सर को ऐसा अच्छा लगता है बस, इसलिए ! अब ज्यादा ना सोच

!अगर तुझे विज्ञान में पास होना हो तो मुझे कल बता देना... ! इतना कह कर श्वेता मेरे निकट से उठ

गई।

मैं उसके बाद सारा दिन और रात को सोते समय तक सोचती रही। अगले दिन मैने श्वेता से कह दिया कि

मुझे मंजूर है, पर मेरे साथ तू भी डांस के लिए चलेगी डबराल सर के घर पर !वह तैयार हो गई।

बस फिर क्या था, हम दोनों उसी शाम डबराल सर के फ्लैट पर पहुँच गये। डबराल सर ने दरवाजा खोला,

सामने हम दोनों लड़कियों को पाकर उनकी छोटी--छोटी आँखें चमक उठीं, मेरे मन में ख्याल आया कि मैं

कहीं कुछ गलत तो नहीं करने जा रही ? लेकिन श्वेता के चेहरे पर छाये आत्मविश्वास ने मुझे भय मुक्त

कर दिया। हम दोनों को अन्दर करके डबराल सर ने द्वार बन्द कर दिया।

डबराल सर ने कुर्ते के नीचे लुंगी बाँध रखी थी, आओ श्वेता.......अन्दर चलो..... वहाँ कालीन बिछा है, वहीं

बठेंगे ! डबराल सर ने कहा।

श्वेता मेरे हाथ को थामे एक दूसरे कमरे में घुस गई, मैने उस कमरे का वातावरण देखा तो चिहुंक उठी,

कमरे में ट्यूब लाइट की रौशनी बिखरी हुई थी, दीवारों पर हालीवुड की सेक्सी हिरोइनों के अत्ति उत्तेजक

पोस्टर चिपके हुए थे। तीन पोस्टरों में से एक पर एक बहुत ही सेक्सी शरीर वाली हीरोईन ने मात्र निक्कर

और छोटा सा टॉप पहना हुआ था, जिसके दोनों पल्ले उसने अपने हाथों से खोल कर पकड़े हुए थे, उसके

बिलकुल गोलाई में तने स्तन अनावृत थे, दूसरे पोस्टर की हीरोईन ने अपने नितंब ताने हुए थे, वह आगे

को झुकी हुई थी, उसके चिकने नितंबों के मध्य बिकनी की बारीक सी पट्टी जाकर खो गई थी, तीसरे

पोस्टर में हीरोईन ने अपने कमनीय शरीर पर मात्र एक पारदर्शी गाउन पहना हुआ था, उसका शरीर उसमें

से पूरी तरह झलक रहा था, उसने अजीब से ढंग से आँखें बंद करके एक खंबे को पकड़े हुआ था, फर्श पर

दीवा एसे दीवार तक कालीन बिछा हुआ था, एक कोने में एक म्यूजिक सिस्टम रखा था।

इससे पहले कि मैं कमरे की डेकोरेशन पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करती, श्वेता ने मेरा हाथ छोड़ कर

म्यूजिक सिस्टम पर एक तेज रफ़्तार के संगीत का अंग्रेजी गानों का कैसेट चढ़ा दिया, कमरे में स्वर

लहरियां गूंजने लगी और श्वेता बिना किसी पूर्व सूचना के थिरकने लगी। मैने गौर किया कि वह अश्लील

ढंग से मटक रही थी और भांति-भांति का चेहरा बना रही थी।

अरे...तू खड़ी क्यूँ है ?..... शुरू हो जा....! श्वेता ने मटकते हुए कहा।

मैं चुप रही और उसके अंदाज देखने लगी। उसकी घुटनों से ऊँची स्कर्ट बार-बार ऊपर उड़ती थी और उसकी

केले के तने जैसी चिकनी और गोरी जांघें बार-बार चमक रही थी, उसके चौड़े कूल्हे भी उत्तेजक ढंग से

संचालित हो रहे थे, शर्ट में कैद अर्ध-विकसित स्तन जो कि अमरुद के आकार के थे, बार-बार हिल रहे थे।

उसने शर्ट के तीन बटन भी खोल रखे थे, जहां से गोरे चिट्टे सीने का गुलाबी रंग स्पष्ट नजर आ रहा था।

उसी समय डबराल सर कमरे में आये, उनके हाथों में दो बीयर थी और तीन ग्लास थे।

वे श्वेता से बोले- श्वेता ....! पहले कुछ पी लो ! फिर नाचना, कम..आन.......बैठो रजनी तुम भी बैठो !

डबराल सर ने कहा।

श्वेता ने नाचना बंद कर दिया और मेरा हाथ पकड़ कर बैठती हुई बोली- बैठ ना यार ! कैसे अजनबी की

तरह खड़ी है .... भूल जा सब कुछ......इस समय डबराल सर हमारे टीचर नहीं बल्कि हमारे फ्रेन्ड हैं....

कम.... आन.....

मैं उसके साथ बैठ गई।

श्वेता ने एक टांग पूरी फैला ली थी, दूसरी का घुटना ऊपर को मोड़ लिया था और एक हाथ को कालीन पर

टिका दिया था, टांगों की विपरीत मुद्रा के कारण उसकी स्कर्ट उसकी चिकनी जाँघों से काफी ऊपर तक हट

गई थी यहाँ तक कि उसकी आसमानी रंग की पेंटी की किनारी भी दिख रही थी, मगर उसे इस बात की

खबर ही नहीं थी।

डबराल सर ने तीनों ग्लासों में बीयर डाली और हम दोनों से कहा- उठाओ भई अपने ग्लास !

उन्होंने खुद भी एक ग्लास उठा लिया था, श्वेता ने भी एक ग्लास उठाया तो मैने भी ग्लास उठा लिया।

मैं पालथी मारकर बैठी थी इसलिए मेरी स्कर्ट में मेरी टाँगे छुपी हुई थी, मेरी शर्ट के भी सभी बटन लगे

हुए थे, बीयर मेरे लिए नई चीज नहीं थी, मैं पहले कह चुकी हूँ कि मैं एक धनी परिवार से हूँ, इसलिए कई

बार कई पार्टियों में मैं बीयर चख चुकी हूँ।

डबराल सर ने हमारे ग्लासों से अपना ग्लास टकराकर कहा- चियर्स..... ! तुम दोनों के विज्ञान में पास हो

जाने की गारंटी की ख़ुशी में......यह कह कर उन्होंने अपना ग्लास अपने मुख से ना लगाकर श्वेता के मुख

से लगा दिया तो श्वेता ने उसमें से एक घूंट भर लिया। श्वेता ने अपना ग्लास मेरे होठों से लगा दिया, मैंने

असमंजस की स्थिति में उसमे से एक घूंट भर लिया और यंत्रवत अपने ग्लास को डबराल सर के होंठों से

लगा दिया, डबराल सर ने एक घूंट भर लिया और फिर हम अपने-अपने ग्लासों से बीयर पीने लगे।

डबराल सर पैंतीस छत्तीस साल के आकर्षक व्यक्ति थे। उनका कद साढ़े पांच फुट या उससे दो एक इंच

ज्यादा था, शरीर गठीला था इसलिए हरेक ड्रेस में जंचते थे। इस समय उन्होंने कुर्ते के नीचे लुंगी पहनी हुई

थी, कुर्ते के चांदी के बटन खुले हुए थे, जहां से उनके चौड़े सीने के काले-काले घुंघराले बाल दिख रहे थे। यूँ

तो मैंने इससे पहले अपने पिता के सीने के बाल देखे थे पर जैसी फिलिंग मुझे इस समय हुई वैसी फिलिंग

पहले कभी नहीं हुई थी। उन्होंने भी एक घुटने की पालथी मारी हुई थी और दूसरे को ऊपर उठाया हुआ था।

ऊपर उठे घुटने से लुंगी नीचे ढलक गई थी, इस कारण उनकी जांघ भी अंतिम छोर तक दिख रही थी। यूँ

तो पूरी टांग पर ही घुंघराले बाल थे पर जांघ पर कुछ ज्यादा ही थे। वयस्क पुरुष की जांघ इस हद तक

नंगी मैं पहली बार देख रही थी।

कैसे चुप हो रजनी..... क्या कुछ सोच रही हो? डबराल सर ने कहा।

जी....जी.....नहीं तो ......! मैंने अपनी नजर उनकी जांघ से हटा कर कहा और ग्लास में से अंतिम घूंट भर

कर ग्लास खाली किया।

हालांकि सीलिंग फेन चल रहा था फिर भी मुझे कुछ गर्मी महसूस हुई, बगलों में पसीना भी महसूस हो रहा

था, ऐसी ही स्थिति शायद श्वेता ने भी महसूस की, तभी तो उसने अपनी शर्ट का एक बटन और खोल कर

कहा- उफ ! ज़रा से स्टेप्स में ही कितनी गर्मी लग रही है ! एक और बटन के खुल जाने से उसकी शमीज

का जरा सा हिस्सा प्रकट हो गया और स्तनों का ऊपरी भाग जहां शमीज नहीं थी उजागर हो गया।

अब नाचो भई ! जब थोड़ा थक जाओ तो फिर बीयर का दौर चल जाएगा !.... सर ने कहा।

श्वेता तुरंत खड़ी हो गई और उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे भी उठा लिया, मैं यंत्रवत सी उठ गई।

श्वेता ने म्यूजिक सिस्टम की आवाज जरा बढ़ा दी और फिर थिरकने लगी, वह मुझे भी अपने साथ नचाने

लगी, मेरे भी पांव उठ गए, कमरे में गूंजती अंग्रेजी संगीत की स्वर लहरियां कामुकता के स्वर में डूबती जा

रही थी और मेरे साथ थिरकती श्वेता की हरकतें शरारतों का रूप लेती जा रही थी। वह जब-तब मेरी कमर

में हाथ डाल कर उसे मेरे सुडौल नितंबों तक ले जाती, वहाँ से स्कर्ट को उपर सरका कर अपने हाथ उपर ले

आती, कभी स्कर्ट को कमर तक घसीट लाती और मेरी जांघें पूरी की पूरी नग्न हो जाती या फिर मेरे गालों

पर चुम्बन ही जड़ देती या मेरी बगल में हाथ डाल कर मेरे उन्नत व कठोर स्तनों को ही दबा जाती।

मेरे युवा शरीर में उसकी इन छेड़खानियों से एक रस सा घुलता जा रहा था, उसी रस के नशे में डूब कर मैं

उसकी किसी भी हरकत का विरोध नहीं कर रही थी बल्कि स्वयं भी कई बार उसकी हरकतों का अनुसरण

करते हुए उसके घुटनों पर हाथ ले जाकर हाथ को उसकी स्कर्ट में डाल देती या फिर उसकी कमर में हाथ

डाल कर उसके हिलते स्तनों को पुश कर देती, हम दोनों के इस डांस का डबराल सर आँख फाड़-फाड़ आनंद

ले रहे थे।

पन्द्रह मिनट तक लगातार नाच कर श्वेता ने मेरा साथ छोड़ दिया और डबराल सर के पास जाकर बैठ

गई, मैं भी रुक गई और उसके पास जाकर बैठ गई।

उफ.... यार डबराल ! .... गर्मी बहुत है ! .... शर्ट उतारनी पड़ेगी !..... तुम बीयर डालो.... ! श्वेता ने

लापरवाही से यह कहते हुए शर्ट के सारे बटन खोल कर उतार दिया और एक कोने में डाल दिया।

उसके तने हुए स्तनों पर एक मात्र पारदर्शी शमीज रह गई, शमीज में से स्तनों के गुलाबीपन का पूरा

नजारा हो रहा था, स्तनों की कठोर घुन्डियाँ शमीज में उभरी हुई थी।

डबराल सर तीनों ग्लासों में बीयर डाल रहे थे, पसीना मुझे भी आ रहा था, मेरी कनपटियाँ बगलें और सीना

पसीने से भीग रहे थे।

श्वेता ने अचानक ही मुझसे कहा- अरे पसीने में तो तू भी नहा रही है, उतार दे ये शर्ट ! ...... थोड़ी हवा

लगने दे बदन को ! ........ यह कहते हुए उसने अपने हाथ बढ़ाये और फुर्ती से मेरी शर्ट के बटन खोलती

चली गई।

मैं गुमसुन की स्थिति में उसे रोक न पाई और देखते ही देखते उसने मेरी शर्ट मेरे बाजुओं से निकाल कर

अपनी शर्ट के पास फेंक दी, मेरे स्तन श्वेता से जरा भारी थे, उनका रंग भी शमीज से बाहर झाँक रहा था,

दोनों स्तनों के अनछुए मगर कठोर निप्पल शमीज में अलग से ही उभर रहे थे, मुझे यह इतना बुरा नहीं

लग रहा था कि मैं श्वेता और डबराल सर से विदा ले लेती, अब सवाल विज्ञान में पास या फेल होने का

नहीं रह गया था बल्कि अब तो मेरा युवा शरीर अपनी सामयिक आवश्यकता के हाथों मुझे विवश कर चुका

था और मैं श्वेता और डबराल सर का साथ ना चाह कर भी दे रही थी।

डबराल सर ने भी अपना कुर्ता उतार दिया, उनका चौड़ा सीना अनावृत हो गया, उनके सीने के दोनों छोटे-

छोटे निप्पल अनायास ही मुझे आकर्षित कर गये थे, सीने से मेरी नजर फिसली तो फिसलती चली गई,

उनके सपाट पेट के नीचे गहरी नाभि और फिर नाभि से काले-काले बालों का क्षेत्र आरंभ हुआ तो लुंगी के

ढीले बंधन के नीचे जाकर ही लुप्त हो रहा था। मेरे मन में तीव्र उत्कंठा उत्पन्न हुई यह जानने की कि

लुंगी के नीचे ये बालों का क्षेत्र कहाँ तक गया है ! उन्होने लुंगी के नीचे कुछ पहना भी नहीं था अगर अंडर

वीयर पहना होता तो उसका नेफा तो दिखाई देता ही !

हम तीनों ने बीयर का एक-एक ग्लास और पिया, ठंडी बीयर मेरे सीने में ठंडक बिछाती चली गई।

तूने देखा रजनी .... अपने डबराल सर का सीना कैसा फौलादी है और बाल कैसे घुंघराले हैं ! किसी भी

लड़की का ईमान डिगा देने वाली कठोर छातियाँ हैं इनकी ! श्वेता ने उन्मुक्त शब्दों का प्रयोग किया।

मुझे तनिक अचरज हुआ, मैने चौंकती नजर से डबराल सर के चेहरे को देखा कि शायद श्वेता के उन्मुक्त

शब्दों पर कुछ कठोर प्रतिक्रया करें पर वहाँ तो प्रसन्नता के भाव थे, उल्टे डबराल सर ने श्वेता की नंगी

जांघ पर हाथ की थपकी देकर रंगीन से स्वर में कहा- इन मरमरी जाँघों से तो हार्ड नहीं है मेरा सीना !

उनके स्वर में मजाक का पुट था, श्वेता तुंरत उठ खड़ी हुई और संगीत की स्वर लहरियों पर थिरकने लगी।

अचानक उसने उस कैसेट को निकाल कर एक अन्य कैसेट लगा कर स्विच ऑन कर दिया, इस कैसेट मैं

फिमेल सिंगरों की कामुक आवाजों में उत्तेजक गाने थे। मेरी अंग्रेजी अच्छी थी, गानों के बोल मेरी समझ में

आ रहे थे, कुछ लड़कियां लड़कों के शारीरिक सौन्दर्य के बारे में अपनी बे-बाक राय को गीत की शक्ल में

गा रही थी, मैं भी उस माहौल की गिरफ्त में आती जा रही थी।

श्वेता ने देखा कि मैने अपना ग्लास खाली कर दिया है तो उसने मेरी और हाथ बढ़ाया, मैने उसके हाथ को

थाम लिया और उठ खड़ी हुई, हल्का-हल्का सुरूर मेरी नसों में घुलने लगा था, श्वेता की भांति मेरी आँखों

में भी सुर्ख डोरे उभरने लगे थे, मैं भी नाचने में उसका सहयोग करने लगी थी, संगीत की स्वर लहरियां

यौनोत्तेजना को बढ़ाती जा रही थी।

अचानक श्वेता ने अपनी स्कर्ट का हुक ओर जिप खोल कर उसे टांगों से निकाल दिया, उसकी चिकनी ओर

गोरी जांघें ट्यूब लाइट के दूधिया प्रकाश में रौशन हो उठी, वह बड़े ही उत्तेजक ढंग से अंग संचालन हर रही

थी, आसमानी रंग की पेंटी उसके नितंबों पर मढ़ी हुई सी प्रतीत हो रही थी, उसने मेरी बगल में हाथ डाल

कर मेरी शमीज को जरा उपर सरका कर मेरा सपाट पेट अनावृत करके उसे आहिस्ता-आहिस्ता सहलाना

शुरु कर दिया था। उसके स्पर्श ने मेरे शरीर में एक विशेष प्रकार की अग्नि भड़का डाली थी, जिसे मैंने

पहली ही दफा महसूस किया था और मेरी दीवानगी यह थी कि मैं खुद उस अग्नि में जल जाने को बेताब

हुई जा रही थी, मेरा हाथ स्वतः ही उसके चिकने नितंबों पर फिसल रहा था, मेरा हलक सूखने लगा था

और बजाय रुकने के मेरे पांवों में और तेजी आती जा रही थी।

अचानक श्वेता मेरे साथ नाचना छोड़ कर डबराल सर के पास जाकर लहराई और डबराल सर को हाथों से

पकड़ कर अपने साथ नाचने के लिए उठा लिया, डबराल सर जैसे ही खड़े हुए उनकी लुंगी नीचे गिर गई,

वह बंधी हुई नहीं थी बस ऐसे ही उनकी जाँघों के जोड़ पर लिपटी हुई थी शायद और उनकी जाँघों के मध्य

लटकते उनके काले रंग के काफी लंबे अंग को देख कर मैं ठिठक सी गई। मैं जानती थी कि यह उनका

लिंग है मगर किसी पुरुष का लिंग इतना बड़ा हो सकता है, यह मेरे लिए आश्चर्य का विषय था।

श्वेता और डबराल सर एक दूसरे के शरीर पर हाथों से संवेदनशील स्पर्श देते हुए नाचने लगे, उनका नृत्य

धीमा था लेकिन था अति-कामुक !

उनके स्टेप्स देख कर मेरे शरीर में चींटियाँ सी दौड़ने लगी, मैं नाचना भूल गई थी और चुपचाप आश्चर्य

और अजीब से आकर्षण में बंधी उन दोनों के क्रियाकलाप देखने लगी।

डबराल सर ने देखते ही देखते श्वेता की शमीज की जिप खींच कर उसे उसके गोरे शरीर से अलग कर

दिया, श्वेता के स्तन किसी फ़ूल की भाँति खिल उठे। डबराल सर ने उन्हें अपने हाथों में संभाल लिया, वे

उन्हें बड़े प्रेम से सहलाने लगे, श्वेता उनके पुष्ट नितंबों पर हथेलियाँ टिका कर आँखें बंद किये धीरे-धीरे

नाच रही थी, डबराल सर भी हल्के-हल्के थिरकते हुए उसके स्तनों को तो कभी गहरे गुलाबी रंग के निप्पलों

को चुटकियों से मसल रहे थे, श्वेता के होंठ बार-बार खुल रहे थे और उसके कंठ से मादक सिसकारियां उभर

रही थी।

अचानक ही डबराल सर ने अपना सर झुका कर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उसके अधरों का

रस पान करने लगे। श्वेता का शरीर हल्के-हल्के कंपन से भरने लगा था, उसका हाथ अभी भी डबराल सर

के नितंबों पर गर्दिश कर रहे थे। सर का लगभग बारह इंच का लिंग अपने पूरे आकार में तन गया था, वह

बार - बार झटके लेकर श्वेता की पेंटी के उस स्थान से टकरा रहा था जिसके नीचे उसकी योनि छिपी थी।

मैं भी उत्तेजना के भंवर में फंसती जा रही थी, मेरे हाथ अपनी शमीज में घुस गए थे और अपने कठोर

स्तनों को मैं स्वयं ही मसलने लगी थी, इस क्रिया ने मेरे मस्तिस्क को झंकृत कर दिया था, मैं उन्मादित

हुई जा रही थी, जाने कब मेरे हाथों ने मेरी शमीज को शरीर से निकाल दिया था, मैं अपने स्तनों को

मसलते हुए बार-बार आनंद की हिलोरों में अपनी आँखें बंद कर लेती थी, मेरा हलक प्यास के कांटों से भर

गया था, मैं कामोत्तेजना की तरंग के घूंट से पी रही थी, मेरी आँखें खुली तो देखा की अब डबराल सर ने

अपने होंठ श्वेता के स्तनों पर लगा दिए थे, वे बारी-बारी से दोनों काम पुष्पों का मानो रस पी रहे थे, श्वेता

उनके सर को सहला रही थी और मादक सिसकारियों से उसका कंठ भर गया था, अब उसके हाथों में सर

का काफी लंबा और काफी मोटा लिंग मानो एक नई शक्ल पाने जा रहा था।

मैं अपने आप को रोक ना सकी और आगे बढ़ कर श्वेता से लिपट सी गई, मैने भी उसके एक स्तन को

थाम लिया और निप्पल को चूसने लगी, अब डबराल सर ने मेरे भारी स्तन थाम लिए और उन्हे मसलते

हुए मेरे अधरों को चूसने लगे। श्वेता का एक हाथ मेरी स्कर्ट को नीचे खिसकाने की असफल कोशिश करने

लगा तो मैने स्वयं ही अपनी स्कर्ट उतार दी। अब वह मेरी गुलाबी रंग की पेंटी को नीचे खिसकाते हुए मेरे

नितंबों में आग जैसी भरने लगी।

डबराल सर ने मुझे नीचे झुकाया तो झुकाते चले गए, मैं पेट के बल झुक गई, श्वेता मेरे बीच पीठ के बल

लेट गई, मेरे हाथ कालीन पर टिक गए, मैने अपने नितंब नीचे करने चाहे तो डबराल सर ने उन्हें उपर ही

रोक दिया, मेरे घुटने कालीन में जम गए तो डबराल सर मेरे नितंबों को सहलाने लगे, उन्होंने पेंटी पहले ही

नीचे कर दी थी जिसे मैने टांगों से निकाल दिया, डबराल सर अपनी जीभ से मेरी योनि चाटने लगे थे, मेरे

शरीर में बिजलियाँ दौड़ने लगी थी, श्वेता मेरे नीचे लेटी मेरे स्तनों को मसले जा रही थी, मैं कामुक सीत्कार

कर रही थी।

मेरी योनि में मौजूद भंगाकुर को मानो चूस-चूस समाप्त कर देने की कसम ही खा ली थी डबराल सर ने !

उनकी इस क्रिया ने मेरी नस-नस सुलगा दी थी।

अचानक उन्होंने मेरी योनि में ढेर सारा थूक लगाया और अपने चिकने लिंग मुंड को योनि द्वार पर टिका

कर धक्का मारा, मुझे भारी दर्द महसूस हुआ, लेकिन लिंग-मुंड के फिसल जाने के कारण ज्यादा पीड़ा नहीं

हुई।

डबराल सर ने अपने हांथों से मेरी जाँघों को चौड़ा किया और अपनी दो उंगुलियों से योनि को चौड़ा कर

लिंग-मुंड को फिर से फंसा कर धक्का मारा तो मैं धम्म से श्वेता पर गिर पड़ी, श्वेता भी चीख पड़ी, लिंग

मुंड फिर भी नहीं घुस पाया।

ओफ्फो.......तुम जरा अपना वजन अपने हाथों पर नहीं रोक सकती ?..... श्वेता इसकी हेल्प करो जरा !

..... डबराल सर ने मेरे नितंबों को पकड़ कर फिर से उठाते हुए कहा।

मैं भी परेशान सी हो गई थी, शरीर में आग लगी थी और अभी तक लिंग भी प्रवेश नहीं हुआ था।

जरा आराम से करो !..... श्वेता मेरे कन्धों को थाम कर बोली।

डबराल सर ने इस बार फिर योनि के द्वार को चौड़ा कर लिंग मुंड फंसाया और मेरी पतली कमर पकड़ कर

हल्का सा धक्का दिया, लिंग मुंड योनि को लगभग फाड़ते हुए उसमें उतर गया।

दर्द के मारे मेरी चीख निकल गई ..... आ ई ई ई ऊई मां मर गई मैं तो !..... लिंग है या जलता हुआ

लोहा !.... प्लीज.... निकालो इसे ! ... मैं टूटे शब्दों में इतना ही कह पाई थी कि डबराल सर ने मेरी पतली

कमर पकड़ कर थोड़ा पीछे हट कर एक धक्का और मारा, मैं बुरी तरह चीखी- उफ ..... आई... मां प्लीज

... सर प्लीज ओह....

और दर्द के मारे मैं आगे कुछ नहीं कह पाई, और अपने सर को कालीन से सटा लिया, मेरी आँखों के आगे

तारे से नाच गए थे।

श्वेता मेरे नीचे से निकल गई थी उसने मेरी पीठ को सहलाते हुए कहा- बस .... यार... ! हो गया काम !

.... तू तो बड़ी हिम्मत वाली है ! पूरा का पूरा अन्दर ले गई ! इतनी हिम्मत तो मुझमें भी नहीं थी।

पूरा चला गया....? मैं कराहती सी बोली।

हाँ बस एक दो इंच बचा है......! श्वेता मेरे नितंबों को चूमते हुए बोली।

ओह्ह....उफ...अब इतना दर्द नहीं है..... सर ... एक दो इंच ही रह गया है तो ..... उसे भी अन्दर कर

दीजिये ... मैं झेल लूंगी .... मैने कहा।

अब मुझे क्या पता था कि श्वेता झूठ बोल रही है, लिंग अभी आधा बाहर ही है, मैने इसलिए पूरे के लिए

कह दिया था कि उसके द्बारा मिला दर्द अब अनोखी सी ठण्डक में बदल गया था।

गुड... तुम तो बहुत ताकतवर हो रजनी .... आई लव यू ... इतना कह कर डबराल सर ने मेरे नितंब

थपथपाये और लिंग को दो तीन इंच पीछे खीच कर एक जोर का धक्का मारा, मेरा चेहरा कालीन पर

घिसटता हुआ सा आगे सरक गया, मुझे लगा लिंग मुंड मेरी पसलियों से टकरा गया है, मेरे हलक से

मर्माहत चीख निकली, मेरा हाथ मेरे पेडू पर पहुँच गया, सपाट पेट में एक राड सी चीज का सहज ही

आभास हो रहा था, पसलियों से चार छः अंगुल ही दूर रह गया था शायद वह जलता हुआ मांस-दंड !

उफ..... ओह्ह ... सर मैं मर जाउंगी ! ...आपने झूठ कहा था.....कि....उफ.....ज़रा सा रह गया है........यह

तो पूरा फुटा है.....उफ...मेरी योनि में इतनी जगह कहाँ है ! ....उफ...निकालिए इसे..... मैं रोती हुई कह रही

थी, मेरा हाथ मेरी दर्द से बिलबिलाती योनि पर चला गया, हाथ चिपचिपे से द्रव्य से सन गया। मैने हाथ

को आँखों के सामने ला कर देखा तो और डर गई अंगुलियाँ रक्त से लाल थी, उफ.....मेरी योनि तो जख्मी

हो गई....अब क्या होगा.......उफ !

अचानक डबराल सर के हाथ मेरे पेट पर होकर उरोज पर आये और उन्होंने मुझे उठा लिया, अब मैं उनकी

गोद में बैठी थी।

उनका मीठा स्वर मेरे कानों में पड़ा- अब तो वाकई पूरा अन्दर चला गया है.... ये तो थोड़ी सी ब्लीडिंग

कुमारी छिद्र फटने से होती है ..... अब तुम्हें आनंद ही आनंद आएगा !

उनके हाथ मेरे पेट और उरोज को सहला रहे थे, उनकी बात सच ही थी- अब मेरा दर्द आनंद में बदलने

लगा था। मैने अपने हाथ उनकी जाँघों पर टिका कर ऊपर नीचे उठना बैठना शुरू किया तो इसी क्रिया में

इतना आनंद आया कि मेरे कंठ से ही नहीं बल्कि डबराल सर के होंठों से भी कामुक ध्वनियाँ फ़ूट रही थी,

मैंने अपनी टांगों को पूरी तरह फैला लिया था।

श्वेता भी लगी पड़ी थी, वह पूरी तन्मयता से मेरे स्तनों को चूस रही थी, मैं तो हांफने लगी थी, डबराल सर

भी हांफ रहे थे, बस श्वेता कुछ संयत थी।

कुछ देर बाद डबराल सर ने मुझे अपने आगे चित्त लिटा दिया और मेरी एक जांघ पर अपना घुटना रख कर

दूसरी जांघ अपने कंधे पर रख ली और संगीतमय अंदाज में अपने लंबे लिंग को अन्दर-बाहर करने लगे। मैं

बुरी तरह कांपने लगी थी, मेरे मुख से कामुक आवजें फ़ूट रही थी, श्वेता ने मुद्रा बदल ली थी, उसने मेरे

मुख के आगे अपनी योनि कर ली थी और मेरी योनि पर अपना मुख लगा लिया था, वह लंबे से लिंग को

झेलती मेरी योनि को चूमने लगी थी, मैं भी पीछे नहीं रही मैने उसकी जाँघों को कस कर पकड़ लिया और

उसकी योनि को चूसने लगी।

श्वेता मचल उठी उसने एक टांग मेरी कनपटी पर रख ली, मैं उसके नितंबों की गहराई में छुपी उसकी गुदा

(गांड) को भी चाटने लगी।

सर ! ज़रा जोर-जोर से कीजिये ! उफ....उफ... ! मैं टूटे शब्दों में बोली।

डबराल सर ने रफ़्तार बढ़ा दी, मेरी सिसकारियां और भी कामुक हो गई, वो जैसे निर्दयी हो गए थे, उनके

नितंबों के मेरे नितंबों से टकराने पर एक अजीब सी थरथराहट होने लगी थी, उत्तेजना में मैंने कालीन में

मुट्ठी सी भरी, श्वेता ने पुनः अपनी मुद्रा बदली, उसने मेरे स्तनों को और मेरे अधरों को चूसना शुरु कर

दिया, मैं हुच.. हुच. की आवाजों के साथ कालीन पर रगड़ खा रही थी, डबराल सर अपने पूरे जोश में थे,

वह मेरे नितंबों को सहलाते तो कभी मेरे पेडू को सहलाते हुए आगे पीछे हो रहे थे।

श्वेता..... किचन में गोले का तेल है जरा लाकर मेरे लिंग पर डाल दो ! डबराल सर ने श्वेता से कहा।

श्वेता तुंरत रसोई में गई और गोले का तेल एक कटोरी में ले आई और उसने तेल की कुछ बूंदें डबराल सर

के पिस्टन की तरह चलते लिंग पर डाल दी, अब उसकी गति में और तेजी आ गई, मैं दांतों तले होंठों को

दबाये उनके लिंग द्वारा प्राप्त आनंद के सागर में हिलोरें ले रही थी।

डबराल सर चित्त लेट गए और मुझे अपने लिंग पर बिठा लिया मैं स्वयं उपर नीचे होने लगी, हम तीनों को

ही पसीना आ गया था, श्वेता ने अपनी योनि डबराल सर के मुख पर लगा दी थी और खुद उनके शरीर पर

लेट कर मेरी योनि चाट रही थी, डबराल सर उसकी योनि को अपने हाथों से चौड़ा कर चाट रहे थे।

अचानक डबराल सर का तेवर बदला और उन्होंने बैठ कर मुझे फिर पीठ के बल लिटा दिया और जोर जोर

से धक्के मारने लगे, मैं अपने चरम पर आ चुकी थी, अचानक उन्होंने अपना लिंग मेरी योनि से निकाल

लिया और श्वेता के मुख में देकर जोर जोर से धक्के मारे और फिर श्वेता के सर को थाम कर ढेर से होते

चले गए, वह श्वेता के मुख में ही स्खलित हो गए,

मेरी योनि में अपार आनंद के साथ साथ एक कसक सी रह गई।

श्वेता ने उनके लिंग को छोड़ा नहीं बल्कि उसे चूस चूस कर दोबारा उत्तेजित करने लगी।

डबराल सर ने मेरे स्तनों से खेलना शुरू कर दिया और बोले- क्यों रजनी कैसा रहा.....?

बहुत मजा आया सर ! .... लेकिन मेरी जाँघों का जोड़ तो जैसे सुन्न हो गया है ..... मैंने उनके बालों को

सहलाते हुए कहा।

यह सुन्नपन तो ख़त्म हो जायेगा थोड़ी देर में, पहली बार में तो थोड़ा कष्ट उठाना ही पड़ता है, अब तुम

श्वेता को देखना इसके साथ इतनी परेशानी नहीं होगी और अगली बार से तुम्हें भी परेशानी नहीं होगी

बल्कि सिर्फ मजा आएगा, डबराल सर ने मेरे स्तन को चूसते हुए कहा।

उफ सर.......इन्हें आप चूसते हैं तो कैसी घंटियाँ सी बजती है मेरे शरीर में ! ..... प्लीज सर चूसिये इन्हें !

.......... मैं कामुक तरंग में खेलती हुई बोली।

अच्छा लो में जब तक तुम चाहो, तब तक चूसता हूँ...... यह कह कर डबराल सर मेरे गहरे गुलाबी रंग के

निप्पलों को बारी बारी चूसने लगे, मैं आनंदित होने लगी।

उधर श्वेता ने उनके लिंग को फिर लोहे की गर्म रॉड की शक्ल दे दी थी और अब स्वयं ही अपनी योनि

उस पर टिका कर धीरे धीरे धक्के देने लगी थी। लिंग-मुंड के उसकी योनि में प्रवेश करते ही वह सिसक

उठी- उफ....माई डीयर.........डबराल ! ..... उफ ............ ! कम आन रजनी ! तू इधर आकर मेरे स्तनों

को संभाल... ज़रा ! डबराल यार को दूसरा काम करने दे.... श्वेता ने मुझसे कहा।

मैंने तुंरत उसके स्तनों को अपनी हथेलियों में संभाला और उसके अधरों का रसपान करने लगी, डबराल सर

की मशीन आन हो गई थी, कमरे में अब श्वेता की कामुक चीखें गूंजने लगी थी।

मैंने देखा कि श्वेता की योनि में डबराल सर का लिंग आसानी से आगे पीछे हो रहा था लेकिन फिर भी

लिंग की मोटाई के आगे उसकी योनि भी एक तंग सुरंग थी।

थोड़ी देर में ही डबराल सर पुनः चरम सीमा पर आ गये और इस बार उन्होंने जब श्वेता की योनि से लिंग

निकाला तो मैने उसे अपने मुँह में ले लिया, लिंग कई बार मेरे हलक से टकराया और फिर कुछ गर्म बूंदें

मेरे हलक में गिरी, मैं उस स्वादिष्ट पदार्थ को पी गई, इस तरह मेरे विज्ञान में पास होने के बहाने से मैने

प्रथम यौनसंबंध का सुख पाया।

कई दिनों तक मैं लंगडा कर चलती रही, श्वेता मेरी इस हालत को देख कर मुस्करा देती। डबराल सर ने

अब किसी भी बात पर हम दोनों को क्लास रूम में डांटना छोड़ दिया था। मेरे घर में मेरी मां ने मेरी

लंगडाहट पर एक बार प्रश्न उठाया तो मैंने सीढ़ियों से गिर जाने का बहाना कर दिया। उन्होंने फिर नहीं

पूछा।

इस घटना के पन्द्रह दिनों के बाद जब मेरी हालत ठीक हो गई थी।

स्कूल हाफ में मैं लंच कर रही थी, तब श्वेता ने बताया कि तुझे चपरासी पूछ रहा था। तुझे प्रिंसीपल साहब

ने बुलाया है।

मैंने प्रश्न किया- क्यों....?

तो उसने अनजाने पन का ढोंग कर दिया, मैं जल्दी-जल्दी लंच निपटा कर प्रिंसीपल साहब के ऑफिस पहुंची

तो वहां अधेड़ उम्र के प्रिंसीपल को अपने इन्तजार में पाया।

रजनी..... दरवाजे की सिटकनी चढ़ा दो, मुझे तुमसे कुछ स्पेशल बात करनी है ! ...प्रिंसीपल ने कुर्सी पर

बैठे बैठे कहा।

मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया।

इधर आओ हमारे पास !...... प्रिंसीपल ने दूसरी आज्ञा दी।

मैं उनके निकट पहुँच गई।

हमें पता है तुमने मिस्टर डबराल को केवल इस लिये खुश किया है कि उसने तुम्हारे विज्ञान में पास होने

का वादा किया है, लेकिन हम भी तो कुछ अहमियत रखते हैं, क्या हमें तुम्हारा हुस्न देखने का हक़ नहीं है

! प्रिंसीपल ने ऐसा कहा तो उनकी आँखें चमक उठीं और भद्दे होंठों पर मुस्कान दौड़ गई।

जी.....मैं पीछे को सिमटी, मेरे जेहन में खतरे की घण्टियाँ बज उठीं और यही विचार दिमाग में आया कि

यहाँ से तुंरत भाग लेना चाहिये, इसी विचार के तहत मैं पलटी मगर प्रिंसीपल के शक्तिशाली हाथों ने मेरी

कमर पकड़ ली और मुझे खींच कर अपनी गोद में बिठा लिया, मैं चीखने को हुई तो उनकी एक हथेली मेरे

खुले मुँह पर आ जमी, उनके ठंडे से स्वर में ये शब्द मुझे खामोश कर गये कि अगर तुमने हमारा सहयोग

नहीं किया तो हम तुम्हारे करेक्टर को गलत साबित करके तुम्हारा रेस्टीकेशन कर देंगे।

मैं विवश हो गई, इस विवशता में एक बात का हाथ और था वह यह कि प्रिंसीपल के हाथ ने मेरी शर्ट में

छुपे मेरे स्तनों को क्षण भर में ही मसल डाला था और उस मसलन ने मुझे आनंद से झंकृत कर दिया था,

पन्द्रह दिन बाद आज फिर एक प्यास महसूस हो गई थी।

मुझे शान्त जान प्रिंसीपल मेरी शर्ट के बटन खोलते चले गये, उन्होंने मेरी शर्ट के पल्लों को इधर उधर कर

के मेरी समीज को स्तनों के ऊपर कर दिया और मेरे तने हुए स्तनों को मसलने लगे, मैं हल्के हल्के

सिसकारने लगी, मैने उनकी गोद में ही मुद्रा बदली और अब मेरे स्तन उनके सीने से भिड़ने लगे, प्रिंसीपल

मेरे कांपते लरजते अधरों को भी चूसने लगे थे, मेरे हाथ उनकी पीठ पर चले गये थे, मेरा युवा शरीर तो

जैसे पुरुष शरीर के स्पर्श को तलाश ही रहा था, उनके हाथ मेरी स्कर्ट के भीतर मेरे नितंबों और जाँघों को

सहला रहे थे, उनकी साँसें गर्म होने लगी थी और फिर उन्होने अपने होंठों को मेरे अधरों से हटा कर मेरी

गर्दन को चूमते हुए मेरे स्तनों पर ले आये, उनकी इस क्रिया ने मुझे और अधिक उत्तेजित कर डाला।

ओह सर ! ...... क्यों तड़पा रहे हैं ! ...... ऐसे कुर्सी पर कैसे कुछ होगा? उफ...ओह....आह ! मैं उनके कान

मैं सरसराई।

ओह.... ! तुम ऐसा करो ! टेबल पर लेट कर अपनी टांगें नीचे लटका लो.....उठो.....! प्रिंसीपल ने कहा।

तो मैं उनकी गोद से उतर कर टेबल पर अधलेटी सी हो गई।

प्रिंसीपल ने खडे होकर मेरी स्कर्ट ऊपर करके मेरी पेंटी को भी जरा ऊपर को करके मेरी योनि को सहलाया

और भंगाकुर को भी छेड़ दिया, मैं मचल उठी, मेरे मुख से कामुक ध्वनि फूटी और मैंने खड़े होकर उनके

हाथों को पकड़ कर अपने स्तनों पर रख लिया, उनके हाथों ने मेरे स्तनों को मसलते हुए मुझे पीछे को ही

लिटा दिया और पेंटी को जरा सा योनि छिद्र से हटा कर अपने लिंग-मुंड को योनि के मुख में फंसा कर

धक्का दिया तो मुझे ऐसी पीड़ा हुई जैसे मेरी जांघें फट जायेंगी।

मैं चीख पड़ी, मैने दर्द के मारे फिर उठने का प्रयास किया तो उन्होंने हाथों के दबाव से मुझे उठने नहीं

दिया और एक और धक्का मारा, मुझे दर्द तो हुआ पर गजब का आनंद भी आया, उनका लिंग दो तीन इंच

तक मेरी योनि में उतर गया था।

सर..... ! उफ.... ! लगता है.... ! ओह........ ! लगता है कि आपका लिंग बहुत मोटा है...... क्या लंबा भी

ज्यादा है.....? मैने अपने स्तनों पर जमे उनके हाथों को दबा कर कहा।

नहीं....हाँ मोटा तो काफी है, लेकिन लंबाई आठ इंच से ज्यादा नहीं है, उन्होंने लिंग को और आगे ठेल कर

पीछे करके फिर ठेलते हुए कहा।

बस.....आठ इंची....तब तो आप खूब जोर जोर से धक्के मारिये..... ! ऑफ़.... ! तभी मजा आयेगा ! मैं

उत्तेजना के वशीभूत होकर बोली।

अच्छा.... ! तुम्हें तेज तेज शॉट पसंद है ! तब तो यहाँ से हटो और दीवार से हाथ टिका कर खड़ी हो जाओ

.... ! यहाँ तो टेबल गिर जायेगी, उन्होंने अपना लिंग मेरी योनि से निकाल कर कहा।

मैं मेज से उठ कर दीवार पर पंजे जमाकर उनकी और पीठ करके खड़ी हो गई तो उन्होंने मेरे नितंबों को

सहलाते हुए अपने मोटे ताजे लिंग को मेरी योनि में डाल दिया और फिर तेज तेज धक्के मारने लगे, मेरा

पूरा शरीर जोर जोर से हिल रहा था, उनकी जांघें मेरे नितंबों से आवाज के साथ टकरा रही थी, वे धक्के

मारते मारते हांफने लगे, लेकिन खूब धक्के मारने पर भी वे स्खलित नहीं हो रहे थे, यहाँ तक कि वो आगे

को शाट मारते तो मैं पीछे को हटती, मुझे लिंग के योनि में होते घर्षण से और लिंग की संवेदनशील नसों

से भंगाकुर पर होते घर्षण से मैं आनंद की चरम सीमा तक पहुच गई थी। मैं उन्हें और प्रोत्साहित कर रही

थी, और अन्दर तक करो सर...... ! और अन्दर तक...... ! और जोर से....! उफ... उफ... ओह.....यस्.... !

आई लव इट.... ओ... मैं हर तरह से उनके साथ सहयोग करते हुए बोली।

मेरी साँसें भी तूफानी हो चकी थी।

और फिर प्रिंसीपल सर अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गये, मेरे गर्भाशय में एक शीतलता सी छाती चली गई,

तब पता चला मुझे की पुरुष के खौलते वीर्य की धार जब स्त्री के गर्भ से टकराती है तो कैसा अदभुत

आनंद प्राप्त होता है ! मैं पागलों की भांति प्रिंसीपल से लिपट गई और उनके लिंग को भी बेतहाशा चूमा।

कुछ देर बाद अपने वस्त्र ठीक करके मैं प्रिंसीपल रूम से निकल गई।

जब तक उस स्कूल में रही तब तक प्रिंसीपल और डबराल सर के साथ मैने अनेक बार सम्बन्ध बनाये,

किसी नये व्यक्ति से संबंध बनाने की जिज्ञासा तो मुझे रहती थी किन्तु मैं नये व्यक्ति से जुड़ने की पहल

नहीं करती थी, हालांकि कई हम-उम्र लड़के कई बार मुझसे फ्रेंडशिप करने का प्रयास कर चुके थे, लेकिन जो

परिपक्व अनुभव मुझे डबराल सर और प्रिंसीपल से मिला था उसकी तुलना में ये लड़के बिलकुल मूर्ख लगते

थे।

एक लड़का जो कि काफी हेंडसम और अच्छी शक्ल सूरत का था, उसका नाम राजेन्द्र था, उसने कई बार

मुझे अनेक प्रकार से अप्रोच किया कि मैं उससे एकांत में सिर्फ एक बार मुलाक़ात कर लूँ ! अंततः एक

दिन मैने उससे मिलने का फैसला कर ही लिया और मौका देख कर स्कूल की काफी बड़ी बिल्डिंग के उस

कमरे में उसे बुला लिया जो हमेशा ही सूना पड़ा रहता था।

राजेद्र ठीक समय पर कमरे में पहुँच गया, उसके चेहरे पर प्रसनत्ता के भाव टपक रहे थे। उसने मुझे पहले

ही से वहाँ पाया तो एकदम घबरा कर बोला- हेलो.... ! हेलो.....रजनी ! ........सोरी .... ! मुझे आने में जरा

देर ही गई।

मैं उसकी घबराहट को देख कर मुस्कुराई, मुझे डबराल सर और प्रिंसीपल सर के अनुभव ने मेरी उम्र से

काफी आगे निकाल दिया था।

कमरे का दरवाजा बंद करके सिटकनी चढ़ा दो ! मैने कहा।

मैं एक मेज़ से नितंब टिकाये खड़ी थी, राजेन्द्र ने दरवाजा बंद करके सिटकनी चढ़ा दी और मेरे पास आ

खड़ा हुआ।

हाँ.... ! अब बताओ राजेन्द्र कि तुम मुझसे अकेले में क्यों मिलना चाहते थे? मैं उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में

झाँक कर बोली।

राजेन्द्र एक उन्नीस बीस की उम्र का अच्छे शरीर का लड़का था, उसने स्कूल ड्रेस वाली पेंट शर्ट पहन रखी

थी।

वो क्या है कि ..... मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ ..... राजेन्द्र बोला।

दोस्ती... ? वो किसलिए.......? मैंने प्रश्न किया।

अं.... मेरे प्रश्न पर वो थोड़ा चौंका और फिर बोला - जिस लिए की जाती है उस लिये.. !!.

यही तो मैं भी जानना चाहती हूँ कि दोस्ती किस लिए की जाती है और वो दोस्ती ख़ास कर जो तुम जैसे

हेंडसम और स्मार्ट लड़के मेरी जैसी भारी सेक्स अपील वाली लड़की से करते हैं ..... मैंने होठों पर एक

रह्स्यमयी मुस्कान सजा कर कहा।

क्या .... क्या मतलब है तुम्हारे कहने का .... ! उसने बिगड़ने का अभिनय किया।

मैंने कहा- मतलब तो आइने की भाँति बिलकुल साफ़ है ! हाँ यह बात अलग है कि तुम आसानी से उसे

स्वीकार नहीं करोगे ..... इसलिए तुम्हारे मुझसे दोस्ती करने के उद्देश्य को मैं ही बता देती हूँ- तुम या

स्कूल के कई अन्य लड़के मुझसे इसलिए दोस्ती करना चाहते हो ताकि वो मेरी उभरती जवानी का मजा

लूट सकें, मेरे उफनते यौवन के समुद्र में गोते लगा सकें !

मैंने आगे कहना जारी रखा- केवल हाँ या नहीं में उत्तर देना .... क्या मैंने गलत कहा है ....... ! क्या

तुम्हारी नजरें मेरी शर्ट में से उत्तेजक ढंग से उभरते भारी स्तनों को ताकती नहीं रहती? क्या तुम स्कर्ट में

ढके मेरे नितंबों पर दृष्टि टिका कर यह हसरत नहीं महसूस करते कि काश यह सुडौल ढलान हमारे सामने

साक्षात प्रकट हो जाएँ !

मैंने ऐसा कहा तो वह चुप होकर दृष्टि चुराने लगा।

मैंने मन ही मन उसकी मनःस्थिति का मजा सा चखा !

फिर बोली- चुप क्यों हो गए? अरे भई, ये तो एक कॉमन सी बात है .. जैसे तुम मुझसे सिर्फ इसलिए

दोस्ती करना चाहते हो कि मेरे यौवन को चख सको, वैसे ही मैंने भी तुम्हें आज अकेले में इस लिए बुलाया

है कि मैं भी देख सकूँ कि तुम्हारे जैसे लड़के में कितना दम है! क्या तुम मुझे वो आनंद दे सकते हो

जिसकी मुझे जरुरत है ! कम-ऑन ! जो तुम देखना चाहते हो मैं स्वयं ही दिखा देती हूँ।

यह कहते हुए मैंने अपनी शर्ट को स्कर्ट में से निकाल कर उसके सारे बटन खोल दिये।

अब मेरे स्तन पहले से काफी भारी हो गये थे, इसलिए जालीदार ब्रा पहनने लगी थी।

शर्ट के खुलने से मेरी गुलाबी रंग की ब्रा दिखने लगी, उसकी झीनी कढ़ाईदार जाली में से भरे भरे गुलाबी

स्तन झाँक रहे थे, गहरे गुलाबी रंग की उनकी चोटियाँ थोड़ी और ऊँची उठ आई थी, कारण था डबराल

द्बारा इनका अत्यधिक पान, यानी मेरी योनि से ज्यादा वे मेरे स्तनों को चूसा करते थे, इस कारण चोटियाँ

भी नुकीली हो गई थी और स्तन भी वजनी हो गये थे।

राजेन्द्र की आँखें फटे फटे से अंदाज में मेरे ब्रा से ढके स्तनों पर जम गई, उसने अपने शुष्क होते होठों पर

जीभ फिराई।

कम-ऑन .... तुम्हें पूरी छूट है ..... जो करना है करो ..... मैंने उससे कहा और शर्ट को बाजुओं से निकाल

कर मेज़ पर रख दिया।

ओह रजनी ....... ! यू आर सो ग्रेट ! यह उद्दगार व्यक्त करता हुआ राजेन्द्र बढ़ा और उसने मेरे स्तनों को

हाथों में संभालते हुए अपने शुष्क होंठों को मेरे लरजते नर्म अधरों पर रख दिये। मैंने उसकी कमर में हाथ

डाल दिये और उसकी शर्ट का हिस्सा उसकी पेंट में से खींच कर उसकी टी शर्ट में हाथ डाल उसकी पीठ को

सहलाने लगी, मेरी पतली अंगुलियां उसकी पेंट की बेल्ट के नीचे जाकर उसके नितंबों को छू आती थी।

राजेन्द्र ने काम-प्रेरित होते हुए मेरी ब्रा के हूक खोल दिये, मेरी ब्रा ढीली हो गई, राजेन्द्र ने दोनों कपों को

स्तनों से नीचे कर दिये, मेरे गुलाबी रंग के दोनों काम पर्वत इधर उधर तन गये, राजेन्द्र उन्हें मसलने लगा

तो मैं बोली- उफ.... ओह्ह ..... इनके निप्पलों को चूसो .....! चूसो राजेन्द्र ! ..... हाथ की जगह अपने होंठों

से काम लो ..... उफ .....

यह कहते हुए मेरे हाथों ने उसकी पेंट की बेल्ट खोल कर उसकी पेंट को नीचे सरका दिया, पेंट उसकी

मजबूत जांघों में फंस कर रुक गई, उसने एक टाईट फ्रेंची अंडरवियर पहन रखा था, मैं उसकी फ्रेंची को भी

नीचे सरकाने लगी।

राजेन्द्र भी पीछे नहीं रहा था, उसने मेरे स्तनों को दुलारते दुलारते मेरी स्कर्ट को ऊपर करके मेरी पेंटी नीचे

सरका दी थी जिसे मैंने पैरों से बिलकुल निकाल दिया, उसके हाथ अब मेरी जाँघों को सहलाते सहलाते मेरी

फड़फड़ाती योनि से भी अठखेलियाँ कर आते थे, मैं बार बार मचल उठती थी, मेरे शरीर में कामुक प्यास

जागृत हो चुकी थी।

उसी प्यास ने मुझे बुरी तरह झुलसाना शुरू कर दिया था, राजेन्द्र के अंडरवीयर को नीचे करके मैंने उसके

लिंग को अपने हाथों में ले लिया, लिंग तप रहा था मानो जैसे मेरे हाथों में जलती हुई लकड़ी आ गई हो।

लेकिन यह क्या मैं चिहुंक उठी !

राजेन्द्र का लिंग तो मुश्किल से छः साढ़े छः इंच का था वह भी पूरी तरह उत्तेजित अवस्था में, मोटाई भी

कोई ख़ास नहीं थी, इतने छोटे आकार प्रकार के लिंग से मेरी योनि क्या खाक संतुष्ट होनी थी, मुझे तो

कम से कम आठ नौ इंच का लण्ड चाहिए था और अगर डबराल सर के जैसा बलिष्ठ हो तब तो कहना ही

क्या ! इतने छोटे लिंग से ना तो मुझे ही कुछ मज़ा आना था और ना ही राजेन्द्र को !

मैं उसके लिंग-मुंड को सहला कर बोली- राजेन्द्र ये क्या ! तुम्हारा लिंग तो बहुत ही छोटा है, मुझे तो

उम्मीद थी कम से कम नौ इंच का लिंग तो होगा ही ! इसीलिए तो मैने तुम्हें यहाँ बुलाया !

क्या ? ....राजेन्द्र चौंक उठा, उसने मेरे स्तनों से अपना मुख हटा लिया, उसकी आँखों में अपमान के से

भाव थे, उसे मेरे शब्दों पर सख्त हैरानी हुई थी।

क्या...... क्या ? तुम अपने लिंग को मेरी योनि में डाल कर देख लो, ना तो तुम्हे मज़ा आएगा और ना ही

मुझे, तुम्हें तो मज़ा मैं मज़ा फिर भी दे दूंगी.......लेकिन मेरे क्या होगा, मैंने उसके लिंग को सहलाना नहीं

छोड़ा था।

तो क्या इतनी बड़ी है तुम्हारी योनि.....? उसने हैरत से प्रश्न किया।

तुम डाल कर स्वयं देख लो..... ! मैंने कहा।

मेरे उकसाने पर राजेन्द्र नें अपना लिंग मेरी योनि में लगा कर एक हल्का सा सा ही धक्का दिया था की

उसका पूरा का पूरा लिंग मेरी योनि में ऐसे समा गया जैसे वह किसी पुरुष का लिंग ना हो कर कोई पैन

हो, मुझे कुछ अहसास भी नहीं हुआ।

हैं..... !!! राजेन्द्र चौंका, उसने लिंग बाहर निकाल लिया।

क्यों....? क्या हुआ....? मैंने कहा, तो वह शरमा गया, उसे अपने लिंग के छोटे आकार पर शर्म आ रही थी।

इधर आओ.... ! मैंने उसका हाथ पकड़ कर दीवार की और बढ़ते हुए कहा- तुम्हें तो मज़ा आ जायेगा ! मैं

अपनी जाँघों को बिलकुल भींच कर दीवार से पीठ लगा कर कड़ी हो जाउंगी तब तुम अपने लिंग को मेरी

योनि में डाल कर घर्षण करना ! लेकिन हाँ.... शाट ऐसे जबरदस्त होनें चाहिए कि पता लगे कुछ....... !

दूसरी बात, मेरे स्तनों को चूसते रहना........... ! मुझे स्तन पान में बहुत मज़ा आता है...... !

यह कहते हुए मैं दीवार से पीठ लगा कर खड़ी हो गई और मैंने अपनी जांघें भींच ली और राजेन्द्र के लिंग

को अपनी टाईट हो गई योनि के मुख पर लगा लिया, अब कुछ पता लगा कि योनि में कुछ प्रविष्ट हुआ

है।

राजेन्द्र ने अपने हाथों से मेरी कमर पकड़ कर मेरे स्तनों को चूसना भी शुरू कर दिया था, वह कामुक

ध्वनियाँ छोड़ने लगा था, उसकी साँसें भभकने लगी थी।

वह तेज तेज शाट मारने लगा तो मैं भी सिसकारियों के भंवर में फंस गई, उसका लिंग बेशक छोटा था

किन्तु उसके शाट इतने बेहतरीन होते जा रहे थे कि मैं उस पर फ़िदा हो गई, मुझे आनंद आने लगा था,

मेरे हाथ राजेन्द्र के कन्धों पर जम गए थे और राजेन्द्र ने उत्तेजना के वशीभूत मेरे स्तनों पर अपने दांत के

निशान तक डाल दिए थे।

चरम सीमा पर पहुँच कर राजेन्द्र के धक्के इतने शक्तिशाली हो गए थे कि मुझे अपनी हड्डियाँ कड़कडाती

महसूस होने लगी, मेरे कंठ से कामुक ध्वनियाँ तीब्र स्वर में फूटने लगी, अचानक ही मैंने अपनी जांघें खोल

दी, राजेन्द्र का तपता लिंग बाहर निकाल कर अपने मुंह में डाल लिया।

राजेन्द्र ने मेरे मुंह में ही अंतिम धक्के मारे और स्खलित हो गया, उसका उबलता वीर्य मेरे कंठ में उतर

गया, वह मेरे ऊपर निढाल सा हो गया, मैं उसके लिंग को चाटने लगी।

फिर जब दो चार क्षणो में उसकी चेतना लोटी तो मैंने उससे कहा- राजेन्द्र, वो उस कोने में जो फावड़े का

लकड़ी का दस्ता पड़ा है वो उठा लाओ.....

इस कमरे में ऐसी छोटी-मोटी अनेक चीजें पड़ी रहती थी, जैसे फावड़ा, तसला, रस्सी, टूटी बेंचें या चटकी

टेबल, उन्हीं चीजों में से एक फावड़े का लकड़ी का दस्ता मुझे दिखाई दे गया था, मेरी आँखें उसे देखते ही

चमक उठी थी।

क्यों..... ? राजेन्द्र ने पूछा।

लेकर तो आओ..... ! मैं बोली।

मैंने अपने नग्न तन को ढकने का प्रयास नहीं किया, शरीर पर मात्र स्तनों के नीचे फंसी ब्रा थी और

नितंबों पर स्कर्ट थी जिसके नीचे पेंटी नहीं थी।

राजेन्द्र अपनी पेंट ऊपर कर चुका था, वह फावड़े का दस्ता ले आया, यह ढाई तीन फुट का गोलाई वाला

डंडा था, एक ओर की मोटाई दो-ढाई इंच थी, दूसरी ओर की तीन चार इंच थी,

मैंने उसके हाथ से डंडा ले लिया और गंदे फर्श पर ही चित्त लेट गई, मैंने स्कर्ट पेट पर चढ़ा कर डंडे के

पतले वाले सिरे को अपने ढेर सारे थूक में भिगो कर अपनी योनि पर लगाया और हल्के से दबाव से ही डेढ़

दो इंच तक योनि में समां गया, मुझे उसकी कठोर मोटाई के कारण अपनी जांघें पूरी खोलनी पड़ी।

राजेन्द्र ! इसे धीरे धीरे आगे पीछे करते हुए मेरी योनि में घुसाओ..... ! मैंने राजेन्द्र से कहा।

राजेन्द्र हैरत से मुझे देख रहा था, वह मेरे निकट बैठ गया और उसने डंडा पकड़ लिया और मेरे कहे

अनुसार उसे आगे पीछे करने लगा, वह बड़े ही संतुलन के साथ यह क्रिया कर रहा था, उसे मालूम था कि

डंडे के टेढे मेढे होने से मेरी नाजुक योनि को नुकसान पहुँच सकता है इसलिए वो बहुत एहतियात के साथ

डंडे को आगे बढ़ा रह था।

मैं अब सिसकारी भरने लगी थी, मुझे जांघें और ज्यादा या यूँ कहिये की संपूर्ण आकार में खोलनी पड़ रही

थी, मैं अपने हाथों से ही अपने स्तनों को मसले डाल रही थी, डंडे के कठोर घर्षण ने मुझे शीघ्र ही चरम

पर पहुंचा दिया और मैं स्खलित हो कर शांत पड़ती चली गई।

राजेन्द्र ने डंडे को योनि से निकाल कर उसके उतने हिस्से को जितना कि मेरी योनि में समाने में सफल हो

गया था उसे देख कर कहा........ग्यारह बारह इंच.....माई गाड.....रजनी डार्लिंग तुम्हारे आगे कौन पुरुष

ठहरेगा ! तुम तो पूरी कलाई डलवा सकती हो अन्दर....क्या तुम्हें दर्द नहीं होता इतनी लंबाई से?

उफ...मैं बैठ गई और बोली- कैसा दर्द डीयर...... ! मेरा तो वश नहीं चलता वरना ऐसे कई डंडे अन्दर कर

लूँ ..... ! मेरी योनि में जितनी लंबी और जितनी मोटी चीज जाती है मुझे उतना ही ज्यादा मजा आता है,

चलो अब.... ! काफी देर हो गई !

मेरे शब्दों पर वह मुझे आश्चर्य से घूरता रह गया था, उसके बाद हम वहाँ से चले आये थे।

इस प्रकार अपनी योनि के साथ भाँति भाँति के अजीब ढंग के प्रयोग करते करते मेरा समय निकल हो रहा

था कि विदेश से मेरी दोनों भाभी आ गई, वे अंग्रेज थीं, वे एक माह के लिए हिन्दुतान घूमने आई थी।

इस प्रकार अपनी योनि के साथ भाँति भाँति के अजीब ढंग के प्रयोग करते करते समय निकल रहा था कि

विदेश से मेरी दोनों भाभियाँ आ गई, वे एक माह के लिए हिन्दुस्तान घूमने आई थी, उन दोनों से मेरी खूब

पटी।

मेरी बड़ी भाभी का नाम मार्टिना और छोटी भाभी का नाम मोनिका था, दोनों ही मुझसे लंबी चौड़ी थी, हाँ

उनकी फिगर में कसाव था। वो साड़ी कभी कभी ही बांधा करती थी, अधिकतर ढीले ढीले पेंट शर्ट या टी-

शर्ट के नीचे घुटनों तक की स्कर्ट पहनती थी, हिंदी भी उन्हें अच्छी आती थी।

उन दोनों के आ जाने से घर में काफी चहल पहल रहने लगी थी, हम सभी लोग ग्यारह बारह बजे तक

बैडरूम में जागते रहते थे। रात में बंगले में हम पांच सदस्य ही रह जाते थे, माता-पिता, मैं और मेरी दोनों

भाभियाँ, नौकर नौकरानी पति पत्नी ही थे, दोनों ही सर्वेण्ट क्वार्टर में चले जाते थे।

पिताजी को किसी सरकारी काम से मारिशस जाना पड़ गया तो मम्मी भी उनके साथ चली गई, उनका दो

दिन का ट्रिप था, घर में हम तीनों महिलाएँ अकेली रह गई।

मम्मी पापा चार बजे गए थे, छः बजे मार्टिना भाभी ने नौकर को भेज कर एक फाइव स्टार होटल से खाना

मंगा लिया और उसको तथा उसकी नौकरानी पत्नी को सुबह तक के लिए छुट्टी दे दी।

मार्टिना भाभी ने खाना किचन में रखा और अपने बैग में से कुछ कपड़े लेकर बाथरूम चली गई, मोनिका

भाभी और मैं टी. वी. देख रहे थे, केबल पर हिंदी फिल्म आ रही थी।

मोनिका भाभी अलग सोफे पर बैठी थी मैं दूसरे पर ! मैंने घुटनों तक की स्कर्ट और ढीली ढाली शर्ट पहन

रखी थी, शर्ट के भीतर गुलाबी रंग की जालीदार ब्रा थी, मोनिका भाभी ने ढीली ढाली सूती पेंट शर्ट पहन

रखी थी, शर्ट के ऊपर के तीन बटन खुले हुए थे जहां से उनका मुझसे कहीं ज्यादा गोरा रंग झलक रहा

था, उनके भारी स्तन थोड़े लटके हुए से थे जिनके निप्पलों का आभास शर्ट में से हो रहा था, निप्पलों से

लटक कर शर्ट में सलवटें बन रही थीं, वह सोफे पर अधलेटी मुद्रा में बैठी थी और एक इंगलिश मैगजीन

को देखते देखते टी. वी. भी देख लेती थी।

हल्लो रजनी.... आओ तुम भी नहा लो.... गुनगुने पानी में मजा आ जायेगा.... मार्टिना भाभी का स्वर मेरे

कानों में पड़ा।

मैंने स्वर की दिशा में देखा तो देखती रह गई, मार्टिना भाभी ने अपने आकर्षक शरीर पर केवल एक छोटा

सा वह भी बिलकुल पारदर्शी वस्त्र पहन रखा था, जिससे न तो उनके वजनी और उन्नत स्तन छुप रहे थे

और न ही गदराई जाँघों के मध्य गोरी सी दो फांकों में बंटी उनकी खूबसूरत योनि। यह वस्त्र शमीज की ही

भाँति था जो स्तनों के ऊपर से शुरु होकर उनकी जाँघों के जोड़ से जरा ही नीचे तक आ रहा था,

मोनिका...तुम नहीं लोगी बाथ ?.... मुझसे कहने के बाद मार्टिना भाभी ने मोनिका भाभी से कहा।

ओह्ह... यस्... ! कह कर मोनिका भाभी नें सोफे पर ही अंगड़ाई ली और उठ कर मेरी ओर अपना हाथ

बढ़ा कर बोली- आओ....रजनी हम दोनों साथ साथ नहा कर आते हैं !

जी...? मैं आपके साथ नहाऊं ? मैंने शर्माने का अभिनय करते हुए कहा, हालांकि मेरा स्वयं ही मन कर रहा

था कि मैं उनके साथ ही नहा लूँ।

तो क्या हुआ ... ? कम..ऑन... ! मोनिका भाभी नें दोबारा कहा तो मैं उठ कर उनके साथ हो ली, मोनिका

भाभी बिना कपड़े लिए ही मेरा हाथ पकड़े मुझे बाथरूम में ले गई।

मोनिका जरा जल्दी आना.... ! डिनर तैयार है ! मार्टिना भाभी का स्वर हमारे पीछे से गूंजा !

हमारे बंगले के हर बैडरूम के साथ बाथरूम अटैच्ड है, हरेक बाथरूम हर सुविधा से संपन्न है, बड़ा सा

बाथटब, गीजर, कमोड, शावर या दो तीन प्लास्टिक के स्टूल जो डब्बे की शक्ल के हैं।

बाथरूम में हम दोनों प्रविष्ट हो गए तो मैंने दरवाजे की सिटकनी लगानी चाही तो मोनिका भाभी ने मुझे

रोक दिया, बोली- क्या जरुरत है इसकी.... यहाँ कौन आएगा !

मैंने सिटकनी से हाथ खीच लिया।

मोनिका भाभी ने बिना कपड़े उतारे ही गुनगुने पानी वाला शावर खोल दिया और पानी की फुहार के नीचे

खड़ी हो गई, पानी उनको भिगोने लगा, मैंने भी कपड़े उतारने में शर्म का अभिनय किया और टब की ओर

जाने लगी तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खींच लिया, मैं उनसे जा टकराई, भाभी ने मेरी पीठ पर हाँथ

बाँध लिए और बोली- क्या तुम शरमाई-शरमाई सी रहती हो...! हमसे क्या पर्दा...! तुम्हारे होंठ कितने रसीले

हैं ! कब से इन्हें चूमने का मन कर रहा था ! अब मौका मिला है.....

यह कह कर उन्होंने अपने तपते होंठ मेरे होंठों पर ही जो रख दिये, हम दोनों की महकती साँसे नाकों से

गुजर कर एक दूसरे से टकराने लगी, मेरी बाँहें भी उनकी पीठ पर जाकर बंध गई थी, वे मेरा नीचे का होंठ

चूसने लगी तो मैं ऊपर का, उनकी इस क्रिया में एक लय थी, उनके हाथ भी शरारत करने लगे थे, वे मेरी

स्कर्ट को खोल चुकी थी और मेरे चिकने नितंबों को अपनी अँगुलियों के स्पर्श से और अधिक गोल कर रही

थी जैसे, वो तो मैंने पेंटी पहनी हुई थी वर्ना अब तक उनकी अंगुलियाँ जाने क्या कर बैठती।

मैं भी पीछे नहीं रही थी, मैंने भी उनकी पेंट खोल कर उसे नीचे खिसका दिया था। मेरे हाथ उनके चिकने

और मेरे से ज्यादा सुडौल नितंबों पर पहुंचे तो पाया कि उन्होंने पेंटी नहीं पहनी हुई है, मेरी अंगुलियाँ उनके

नितंबों की कसी हुई चिकनी त्वचा पर फिसल रही थीं, जो उनके नितंबों की गहराई में छुपी उनकी गुदा

(गांड) और केश विहीन योनि-प्रदेश तक हो आती थी।

हम दोनों की शर्टें और मेरी ब्रा भी उतर गई, मोनिका भाभी के स्तन कितने गोरे थे निप्पल तो बिलकुल

गुलाबी रंग के थे, मैं अपने आप को नहीं रोक पाई और उन निप्पलों को चूसने लगी, मोनिका भाभी मेरी

पीठ और बालों पर हाथ फिराने लगी, उन्होंने अपना सीना मेरी दिशा में और अधिक तान दिया था, मैं कभी

दायें स्तन की गोलाई को हाथ से थाम कर उसके निप्पल से काम-रस का पान करती तो कभी बाएँ स्तन

के निप्पल को चूसती। मुझे पहली बार स्तन-पान में इतना मजा आ रहा था, पहले भी मैंने श्वेता के स्तनों

को कई बार चूसा था पर ऐसा अनोखा आनन्द कभी नहीं आया।

ओह...रजनी...यू आर ए लवली गर्ल.....! पियो ! खूब काम-रस पियो.... ! आई लाइक इट... ! मोनिका भाभी

ने मेरे बालों को सहलाते हुए कहा।

स्तनों में ही इतना मजा आया कि मैं उनकी योनि की ओर जा ही नहीं पाई।

अब बाहर चलते हैं....पहले डिनर ले लेते हैं.... उसके बाद करना यह सब..... वैसे मार्टिना के स्तन भी

लाजवाब हैं....उन्हें चूसने में मुझे बहुत मज़ा आता है....., मोनिका भाभी मेरा मुख अपनें स्तनों से हटा कर

प्यार से बोली, मैं आज्ञाकारी बच्चों की तरह मान गई।

हम दोनों तौलिए से बदन पोंछ कर बिना किसी कपड़े के ही डायनिंग रूम में पहुँच गये, वहाँ बड़ी सी

डायनिंग टेबल पर मार्टिना भाभी नें खाना सजा दिया था, तीन चांदी के ग्लास और एक शेंपेन की बोतल

भी रखी थी। उन्होंने हम दोनों की नग्नता पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, हाँ मेरी बढ़िया फिगर देख कर जरुर

टिप्पणी की- ...गुड... ! अच्छी फिगर बना रखी है....!

खाना खाते-खाते ही मेरे पेट में तीन पैग जा चुके थे, मेरे सर पर सुरूर सवार हो गया था, भाभियों को कोई

फर्क नहीं पड़ा था, मैं तो झूमने ही लगी थी।

मार्टिना भाभी ने हंसते हुए मुझे सहारा दिया और मुझे कंधों से पकड़ कर बैडरूम में ले जाकर बेड के नर्म

गद्दे पर लिटा दिया, मैं पीठ के बल फ़ैल गई, मैंने अपनी टांगें चौड़ा दी और हथेली फैला दी- मोनिका

भाभी आइये ना......! मुझे पिलाइये न अपना दूध ! मैं नशे में बोली।

मोनिका भाभी हंसते हुए बेड पर आ गई और मेरे मुख के पास अपना सीना करके लेट गई, मैं उनके स्तन

चूसने लगी, उनके हाथ मेरी पीठ और सीनें पर मचलने लगे, मुझे उनके स्तन चूसने के लिए उनकी ओर

करवट लेनी पड़ी थी, मैंने आँखें बंद कर ली थी।

तभी मार्टिना भाभी ने मेरी उपरी टांग ऊपर उठाई और अपना मुंह मेरी योनि पर लगा दिया, वो मेरे

भंगाकुर को मानो अपने होंठों से नोचने लगी, मेरी जांघें और खुल गई और मैं तड़पने लगी, बैडरूम में तीन

सुन्दर युवतियां सामूहिक यौनाचार में लिप्त हो गई थी।

तभी मुझे महसूस हुआ कि मेरी योनि में कोई लचीली चीज घुसेड़ी जा रही है लेकिन जिसकी गोलाई और

चिकनाई लिंग की भाँति है, मैंने नजर डाल कर देखा तो प्रसन्न हुई और चौंक भी पड़ी, मार्टिना भाभी एक

फुटे रबड़ के लिंग को मेरी योनि में आगे पीछे कर रही थी, मुझे अब मजा आने लगा और कंठ से कामुक

ध्वनियाँ फूटने लगी, मैं मोनिका भाभी के स्तनों को चूसते चूसते ही मचलने लगी।

मार्टिना भाभी एकदम कह उठी .... कमाल है .... मोनिका जरा देखो तो.... एक फुट में से मुश्किल से एक

इंच या डेढ़ इंच बाहर रह गया है ये रबड़ का लिंग..... उफ़ कितनी गहरी है रजनी की योनि.....! हमारी

योनियों में तो नौ इंच भी नहीं आ सकता, रजनी ये कैसे है इतनी गहरी....उन्होंने मुझसे पूछा।

भाभी इन बातों को उफ़ ... ओह ... इन बातों को बाद में करना, पहले ये काम तो पूरा कर लो .. उफ़...

इसे जोर जोर से चलाओ...... मैंने अपने पेट को सहला कर कहा।

मार्टिना भाभी उसे आगे पीछे करने लगी और मैं मोनिका भाभी और मार्टिना भाभी की योनियों का बारी

बारी से स्वाद लेने लगी।

हम तीनों तीन विक्षिप्त नदियों की तरह एक दूसरे में तब तक समाती रहीं जब तक थक कर सो नहीं गईं।

और फिर जब तक माता पिता मारिशस से आये तब तक हम तीनों ने खूब अय्याशी की, उसके बाद भी

जब तक भाभियाँ हिन्दुस्तान में रही तब तक ज्यों मौका मिला त्यों ही हम तीनों ने मजे लिए।

भाभियाँ जब विदेश वापस गई तो मुझे रबड़ का लिंग दे गई, मैंने उसे छुपा लिया और अपना विवाह होने

तक प्रयोग किया।
 
आशिया कौन थी

रास्ता भूल गये हैं क्या साहब आवाज़ सुनकर मैं पलटा वो एक छोटे से कद की लड़की थी, मुश्किल से 5 फुट, रंग

सावला और आम सी शकल सूरत. देखने में उसमें कोई भी ख़ास बात नही थी जो एक लड़के को पसंद आए. उसने

एक सफेद रंग की सलवार कमीज़ पहेन रखी थी. मुझे अपनी तरफ ऐसे देखते पाया तो हँस पड़ी. “मैने यहीं रहती हूँ,

वो वहाँ पर मेरा घर है” हाथ से उसने पहाड़ के ढलान पर बने एक घर की तरफ इशारा किया “अक्सर शहर से लोग

आते हैं और यहाँ रास्ता भूल जाया करते हैं. गेस्ट हाउस जाना है ना आपने?” “हां पर यहाँ सब रास्ते एक जैसे ही

लग रहे हैं. समझ ही नही आता के कौन से पहाड़ पर चढ़ु और किस से नीचे उतर जाऊं” मैने भी हँसी में उसका साथ

देते हुए कहा. मैं देल्ही से सरकारी काम से आया था. पेशे से मैं एक फोटोग्राफर हूँ और काई दिन से अफवाह सुनने में

आ रही थी के यहाँ जंगल में एक 10 फुट का कोब्रा देखा गया है. इतना बड़ा कोब्रा हो सकता है इस बात पर यकीन

करना ही ज़रा मुश्किल था पर जब बार बार कई लोगों ने ऐसा कहा तो मॅगज़ीन वालो ने मुझे यहाँ भेज दिया था के

मैं आकर पता करूँ और अगर ऐसा साँप है तो उसकी तस्वीरें निकालु. उत्तरकाशी तक मेरी ट्रिप काफ़ी आसान रही.

देल्ही से मैं अपनी गाड़ी में आया था जो मैने उत्तरकाशी छ्चोड़ दी थी क्यूंकी वान्हा से उस गाओं तक जहाँ साँप देखा

गया था, का रास्ता पैदल था. कोई सड़क नही थी, बस एक ट्रॅक थी जिसपर पैदल ही चलना था. मुझे बताया गया

था के वहाँ पर एक सरकारी गेस्ट हाउस भी है क्यूंकी कुछ सरकारी ऑफिसर्स वहाँ अक्सर छुट्टियाँ मनाने आया करते

थे.

मैं गाओं पहुँचा तो गाओं के नाम पर बस 10-15 घर ही दिखाई दिए और वो भी इतनी दूर दूर के एक घर से दूसरे

घर तक जाने का मातब एक पहाड़ से उतरकर दूसरे पहाड़ पर चढ़ना. ऐसे में मैं गेस्ट हाउस ढूंढता फिर ही रहा था

के मुझे वो लड़की मिल गयी. यूँ तो उसमें कोई भी ख़ास बात नही थी पर फिर भी कुछ ऐसा था जो फ़ौरन उसकी

तरफ आकर्षित करता था. उसके सफेद रंग के कपड़े गंदे थे, बाल उलझे हुए, और देख कर लगता था के वो शायद कई

दिन से नहाई भी नही थी. “आइए मैं आपको गेस्ट हाउस तक छ्चोड़ दूं”

और तब मैने पहली बार उसकी आँखो में देखा. नीले रंग की बेहद खूबसूरत आँखें. ऐसी के इंसान एक पल आँखों में

आँखें डालकर देख ले तो बस वहीं खोकर रह जाए. वो मेरे आगे आगे चल पड़ी. शाम ढल रही थी और दूर हिमालय

के पहाड़ों पर सूरज की लाली फेल रही थी. चारों तरफ पहाड़, नीचे वादियों में उतरे बदल, आसमान में हल्की

लाली, लगता था कि अगर जन्नत कहीं है तो बस यहीं हैं. “ये है गेस्ट हाउस” कुछ दूर तक उसके पिछे चलने के बाद

वो मुझे एक पुराने बड़े से बंगलो तक ले आई.

“थॅंक यू” कहकर मैने अपना पर्स निकाला और उसे कुछ पैसे देने चाहे. वो देखने में ही काफ़ी ग़रीब सी लग रही थी

और मुझे लगा के वो शायद कुछ पैसो के लिए मुझे रास्ता दिखा रही थी. मेरे हाथ में पैसे देख कर उसको शायद

बुरा लगा. “मैने ये पैसे के लिए नही किया था” और वो खूबसूरत नीली सी आँखें उदास हो गयी. ऐसा लगा जैसे मेरे

चारो तरफ की पूरी क़ायनात उदास हो गयी थी.

“आइ आम सॉरी” मैने फ़ौरन पैसे वापिस अपनी जेब में रखे “मुझे लगा था के…..” “कोई बात नही” उसने मुस्कुरा

कर मेरी बात काट दी. मैने गेस्ट हाउस में दाखिल हुआ. मैने अंदर खड़ा देख ही रहा था के वहाँ के बुड्ढ़ा केर टेकर

एक कमरे से बाहर निकला.

“मेहरा साहब?” उसने मुझे देख कर सवालिया अंदाज़ में मेरा नाम पुकारा | “जी हान” मैने आगे बढ़कर उससे हाथ

मिलाया “आपसे फोन पर बात हुई थी” “जी बिल्कुल” उसने मेरा हाथ गरम जोशी से मिलाया “मैने आपका कमरा

तैय्यार कर रखा है”

उसने मेरे हाथ से मेरा बॅग लिया और एक गेस्ट हाउस से बाहर आकर एक गार्डेन की तरफ चल पड़ा. वो लड़की भी

हम दोनो के साथ साथ हमारे पिछे चल पड़ी. “तुमने घर नही जाना” मैने उसको आते देखा तो पुछा उसने इनकार

में गर्दन हिला दी. “मुझसे कुछ कहा साहब” केर्टेकर ने आगे चलते चलते मुझसे पुछा

“नही इनसे बात कर रहा था” मैने लड़की की तरफ इशारा किया | हम तीनो चलते हुए गार्डेन के बीच बने एक

कॉटेज तक पहुँचे. मुझे लगा था के एक पुराना सा गेस्ट और एक पुराना सा रूम होगा अपर जो सामने आया वो

उम्मीद से कहीं ज़्यादा था. गेस्ट हाउस से अलग बना एक छ्होटा सा कॉटेज जो पहाड़ के एकदम किनारे पर था.

दूसरी तरफ एक गहरी वादी और सामने डूबता हुआ सूरज. “कोब्रा मिले या ना मिले” मैं दिल ही दिल में सोचा “पर

मैं यहाँ बार बार आता रहूँगा”

“आप आराम करिए साहब” केयरटेकर ने मेरे कॉटेज का दरवाज़ा खोला और समान अंदर रखते हुए कहा “वैसे तो

यहाँ हर चीज़ का इंटेज़ाम है, बाकी और कुछ चाहिए हो तो मुझे बताईएएगा” कहकर उसने हाथ जोड़े और वापिस

गेस्ट हाउस की तरफ चला गया. पर वो लड़की वहीं खड़ी रही. मैं कॉटेज के अंदर आया तो वो भी मेरे साथ साथ ही

अंदर आ गयी. “क्या हुआ?” मैने उसको यूँ अंदर आते देखा तो पुछा जवाब में उसने सिर्फ़ कॉटेज का दरवाज़ा बंद

कर दिया और पलटकर मेरी तरफ देखा. इससे पहले की मैं कुछ और समझ पाता, उसने अपने गले से दुपट्टा निकाल

कर एक तरफ फेंक दिया. ओहो हो हो ” मैं उसकी इस हरकत पर एकदम घबरा कर पिछे को हट गया “क्या कर रही

हो?”

तभी मुझे केर्टेकर की 2 मिनट पहले कही बात याद आई के यूँ तो यहाँ सब इंटेज़ाम है, पर कुछ और चाहिए हो तो मैं

उसको बता दूं. “देखो अपना दुपट्टा प्लीज़ उठा लो. मेरी इस तरह की कोई ज़रूरत नही है. अगर तुम पैसो के लिए ये

सब कर रही हो तो वो मैं तुम्हें ऐसे ही दे दूँगा” वो मेरे सामने एक सफेद रंग की कमीज़ में बिना दुपट्टे के खड़ी थी.

कमीज़ के पिछे से सफेद ब्रा ब्रा की स्ट्रॅप्स नज़र आ रही थी. जैसे ही मैने फिर पैसे की बात की, उसकी वो नीली आँखें

फिर से उदास हो चली.

“आपको लगता है ये मैं पैसे के लिए कर रही हूँ? किस तरह की लड़की समझ रहे हैं आप मुझे?”

कहते हुए उसकी आँखों में पानी भर आया. मेरा दिल अचानक ऐसे उदास हुआ जैसे मेरा जाने क्या खो गया हो, दिल

किया के छाती पीटकर, दहाड़े मारकर रो पडू, अपने कपड़े फाड़ दूं, इस पहाड़ से कूद कर अपनी जान दे दूं. “नही

मेरा वो मतलब नही था” मैने फ़ौरन बात संभालते हुए कहा “मुझे समझ नही आया के तुम ऐसा क्यूँ कर रही हो.

मेरा मतल्ब…..” मैं कह ही रहा था के वो धीरे धीरे चलती मेरे नज़दीक आ गयी. “ष्ह्ह्ह्ह्ह” कहते हुए उसने अपनी

अंगुली मेरे होंठों पर रख दी “यूँ कहिए के ये मैं सिर्फ़ इसलिए कर रही हूँ क्यूंकी आप पसंद हैं मुझे” बाहर हल्का

हल्का अंधेरा हो चला था. कमरे के अंदर भी कोई लाइट नही थी. उस हल्के अंधेरे में मैने एक नज़र उस पर डाली तो

मुझे एहसास हुआ के वो गंदी सी दिखने वाली लड़की असल में कितनी सुंदर थी. वो दुनिया की सबसे सुंदर लड़की

थी. मैने बेधड़क होकर अपने होंठ आगे किए और उसके होंठों पर रख दिए. उन होंठों की नर्माहट जैसे मेरे होंठों से

होती मेरे जिस्म के रोम रोम में उतर गयी. हम दोनो दीवाना-सार एक दूसरे को चूम रहे थे. वो कभी मेरे चेहरे को

सहलाती तो कभी मेरे बालों में उंगलियाँ फिराती. कद में मुझसे काफ़ी छ्होटी होने के कारण उसको शायद मुझे

चूमने के लिए अपने पंजों पर उठना पड़ रहा था और मुझको काफ़ी नीचे झुकना पड़ रहा था. अपने हाथों से मैने

उसकी कमर को पकड़ रखा था और उसको ऊपर की तरफ उठा रहा था. और तब मुझे एहसास हुआ के उसको चूमते

चूमते अब मैं पूरी तरह सीधा खड़ा था. उसका चेहरा अब बिल्कुल मेरे चेहरे के सामने था और उसकी बाहें मेरे गले

में थी. मैने हैरत में एक नज़र उसके पैरों की तरफ डाली तो पता चला के मैने उसको कमर से पकड़ कर ऊपर को

उठा लिया था और उसकी पावं हवा में झूल रहे थे. वो किसी फूल की तरह हल्की थी. मुझे एहसास ही नही हो रहा

था के मैने एक जवान लड़की को यूँ अपने हाथों के बल हवा में पकड़ रखा है. ज़रा भी थकान नही. अगर वो उस

वक़्त ना बोलती तो पता नही मैं कब तक उसको यूँ ही हवा में उठाए चूमता रहता.

“बिस्तर” उसने मुझे चूमते चूमते अपने होंठ पल भर के लिए अलग किए और उखड़ती साँसों के बीच बोली. इशारा

समझ कर मैं फ़ौरन उसको यूँ उठाए उठाए रूम के एक कोने में बने बेड तक लाया और उसको नीचे लेटाकार खुद

उसके ऊपर आ गया.

मैं इससे पहले भी कई बार कई अलग अलग लड़कियों के साथ बिस्तर पर जा चुका था इसलिए अंजान खिलाड़ी तो

नही था. जानता था के क्या करना है पर उस वक़्त जैसे दिमाग़ ने काम करना ही बंद कर दिया था. जितना मज़ा

मुझे उस वक़्त उसको चूमने में आ रहा था उठा तो कभी किसी लड़की को छोड़ कर भी नही आया था. “एक मिनट”

मैं एक पल के लिए अलग होता हुआ बोला “किस हद तक तुम्हारे लिए ठीक है”

आख़िर वो एक छोटे से गाओं की लड़की थी. पहली बार में सब कुछ शायद उसको ठीक ना लगे. “मैं पूरी तरह से

आपकी हूँ” उसने हल्की सी आवाज़ में कहा और फिर मुझे अपने ऊपर खींच लिया. कमरे में अब पूरी तरह अंधेरा

था. बस हम दोनो के चूमने की आवाज़, कपड़ो की सरसराहट और भारी साँसों के अलावा और कोई आवाज़ नही थी.

पहाड़ों में शाम ढल जाने के बाद एक अजीब सा सन्नाटा फेल जाता है. दूर दूर तक सिर्फ़ हवा और किसी जानवर के

चिल्लाने की आवाज़ को छ्चोड़कर और कुछ सुनाई नही पड़ता. कुछ को ये सन्नाटा बड़ा आरामदेह लगता है और

कुछ को ये सन्नाटा रुलाने की ताक़त भी रखता है. उस वक़्त भी यही आलम था. बाहर पूरी तरह अजीब सी खामोशी

थी, जैसे पूरी क़ायनत खामोश खड़ी हम दोनो के मिलन की गवाह बन रही हो. दिल की धड़कन इस तरह तेज़ हो

चली थी के मुझे लग रहा था के कहीं कोई शोर ना सुन ले. मेरा दिमाग़ कुन्द पड़ चुका था. आगे बढ़ने का ख्याल भी

मेरे दिमाग़ में नही आ रहा था.

उस पर चढ़ा बस उसको चूमे जा रहा था. तभी उसने मेरा एक हाथ पकड़ा और अपने गले से हटाते हुए धीरे से नीचे

लाई और अपनी एक छाती पर रख दिया. एक बड़ा सा नरम गुदाज़ अंग मेरी हथेली में आ गया. “इतने बड़े” ये

पहला ख्याल था जो मेरे दिमाग़ में आया था. उसको पहली बार देख कर ये अंदाज़ा हो ही नही सकता था के उसकी

चूचियाँ इतनी बड़ी बड़ी हैं.

“बड़ी पसंद है ना आपको?” उसने धीरे से मेरी कान में कहा और ये सच भी था. अपनी लाइफ में कई ऐसी लड़कियाँ

जो मुझपर फिदा थी उनको मैने इसलिए रिजेक्ट किया था क्यूंकी उनकी चूचियाँ बड़ी बड़ी नही थी. मेरे हिसाब से

एक औरत की सबसे पहली पहचान थी उसकी चूचियाँ और अगर वो ही औरत होने की गवाही ना दें तो फिर क्या

फायडा. “हां” मैने हाँफती हुई आवाज़ में कहा और अपने हाथ में आए उस बड़े से अंग को धीरे धीरे दबाने लगा. तब

भी मेरे दिमाग़ में ये नही आया के दूसरी चूची भी पकड़ लूँ और वो जैसे मेरा दिमाग़ पढ़ रही थी. उसने मेरा दूसरा

हाथ भी पकड़ा और अपनी दूसरी चूची पर रख दिया. “ज़ोर ज़ोर से दबाओ. मसल डालो” और मेरे लिए शायद

इतना इशारा ही काफ़ी था. मैने उसकी चूचियों को जानवर की तरह मसलना शुरू कर दिया और उसके गले पर

बेतहाशा चूमने लगा. कोई और लड़की होती तो शायद इस तरह चूची दबाए जाने पर दर्द से बिलबिला पड़ती पर

उसने चूं तक नही करी. जब उसने देखा के मैं बस उसकी गले पर चूम रहा हूँ तो उसने मेरा सर पकड़ा और अपनी

चूचियों की तरफ धकेला. दबाए जाने के कारण दोनो चूचियो का काफ़ी हिस्सा कमीज़ के ऊपर से बाहर को निकल

रहा था और मेरे होंठ सीधा वहीं जाकर रुके. मैने नीचे से चूचियों को ऊपर की ओर दबाया ताकि वो और कमीज़ के

बाहर आएँ और उनके ऊपर अपने होंठ और अपनी जीभ फिराने लगा. उसको इस बात का एहसास हो चुका था के मैं

दबा दबा कर उसकी कमीज़ के गले से उसकी चूचियाँ जितनी हो सकें बाहर निकलना चाह रहा हूँ. “चाहिए?” उसने

पुछा हां?” मैने चौंकते हुए पुछा |

“ये चाहिए?”

कमरे में पूरा अंधेरा था और मैं उसको बिल्कुल देख नही सकता था, बस उसके जिस्म को महसूस कर सकता था पर

फिर भी उसके पूछने के अंदाज़ से मैं समझ गया के वो अपनी चूचियों की बात कर रही थी.

इससे पहले के मैं कोई जवाब देता, उसने मुझे पिछे को धकेला और उठकर बैठ गयी. उसके जिस्म की सरसराहट से

मैं समझ गया था के वो अपनी कमीज़ उतार रही थी. जब उसने फिर मेरे हाथ पकड़ कर अपनी चूचियों पर रखे तो

इस बार मेरे हाथ को उसके नंगेपन का एहसास हुआ. उसने अपनी ब्रा भी उतार दी थी. “किस रूप में चाहोगे मुझे?”

उसने पुछा

मुझे सवाल समझ नही आया और इस बार भी उसने शायद मेरा दिमाग़ पढ़ लिया. इससे पहले के मैं उससे मतलब

पुछ्ता वो खुद ही बोल पड़ी. “किसे चोदना चाहोगे आज? जो चाहो मैं वही बनने को तैय्यार हूँ” मुझे अब भी समझ

नही आ रहा था. “कहो तो तुम्हारी पड़ोसन, तुम्हारे दोस्त की बीवी, एक अंजान लड़की” मुझे अब उसकी बात समझ

आ रही थी. शहेर में हम इसे रोल प्लेयिंग कहते थे. “कहो तो मैं एक रंडी बन जाऊं” वो बोले जा रही थी. “या कोई

गंदी ख्वाहिश है तुम्हारी.

अपनी माँ, या बहेन, या भाभी को चोदने की ख्वाहिश?” मैने फ़ौरन उसकी बात काटी.

“मेरी बीवी” पता नही कहा से मेरे दिमाग़ में ये ख्याल आया.

इसके आगे मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नही पड़ी. “मेरे साथ आपकी पहली रात है पतिदेव. आपकी बीवी पूरी तरह

आपकी है. जैसे चाहिए मज़ा लीजिए” कहते हुए उसने मेरी कमीज़ के बटन खोलने शुरू कर दिए. मेरा दिमाग़ अब

भी जैसे काम नही कर रहा था. जो कर रही थी, बस वो कर रही थी. लग रहा था जैसे वो मर्द हो और मैं औरत.

धीरे धीरे उसने मेरे सारे कपड़े उतार दिए और उस अंधेरे में उसकी बाहों में मैं पूरी तरह से नंगा हो गया. “काफ़ी

बड़ा है” उसके हाथ मेरे लंड पर थे. वो उसको सहला रही थी. इस बार जब उसने मुझे अपने ऊपर खींचा तो मैं

सीधा उसकी टाँगो के बीच आया. उसने अब भी सलवार पहेन रखी थी पर मेरा पूरी तरह से खड़ा हो चुका लंड

सलवार के ऊपर से ही जैसे उसकी चूत के अंदर घुसता जा रहा था.

एक हाथ से वो अब भी कभी मेरे लंड को सहलाती तो कभी मेरे टट्टो को. “ओह” मेरे लंड का दबाव चूत पर पड़ते ही

वो कराही “चाहिए?” फिर वही सवाल. “बोलो ना. चाहिए? मुझे तो चाहिए” फिर से एक बार वो उठकर बैठी.

अंधेरे में फिर कपड़ो के सरसराने की आवाज़. मैं जानता था के वो सलवार उतार रही है. “आ जाओ. चोदो मुझे”

उस वक़्त उसके मुँह से वो गंदे माने जाने वाले शब्द भी कितने मीठे लग रहे थे. उसने मुझे अपने ऊपर खींच लिया.

मैं फिर उसकी टाँगो के बीच था. मेरे अंदाज़ा सही निकला था. उसने अपनी सलवार उतार दी थी और अब नीचे से

पूरी नंगी थी. मेरा लंड सीधा उसकी नंगी, भीगी और तपती हुई चूत पर आ पड़ा. मैं ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे ये

मेरा पहली बार हो. अपनी कमर हिलाकर मैं उसकी चूत में लंड घुसाने की कोशिश करने लगा. “रूको मेरे सरताज”

वो ऐसे बोली जैसे सही में मेरी बीवी हो “पहले अपनी बीवी को अपने पति का लंड चूसने नही दोगे” किसी बच्चे की

तरह मैं उसकी बात मानता हुआ बिस्तर पर सीधा लेट गया. वो घुटनो के बल उठकर बिस्तर पर बैठ गयी. अंधेरे में

मुझे वो बिल्कुल नज़र नही आ रही थी. बल्कि नीचे ज़मीन पर पड़े उसके सफेद कपड़ो की सिवाय कुछ भी नही दिख

रहा था. मेरे लंड पर मुझे कुछ गीला गीला सा महसूस हुआ और मैं समझ गया के ये उसकी जीभ गयी. वो मेरा लंड

चाट रही थी. कभी लंड पर जीभ फिराती तो कभी टट्टो पर. उसके एक हाथ ने जड़ से मेरा लंड पकड़ रखा था और

धीरे धीरे हिला रहा था. और फिर मुझे वो एहसास हस जो कभी किसी लड़की को चोद्ते हुए नही हुआ था. उसने

जब मेरा लंड अपने मुँह में लिया तो वो मज़ा दिया जो किसी लड़की की चूत में भी नही आया था.

बड़ी देर तक वो यूँ ही मेरा लंड चूसती रही. कभी चूसती, कभी चाटने लगी तो कभी बस यूँ ही बैठी हुई हाथ से

हिलाती.

“बस” मैने बड़ी मुश्किल से कहा “मेरा निकल जाएगा” वो फ़ौरन समझ गयी. अंधेरे में वो हिली, उसका जिस्म मुझे

अपने ऊपर आते हुए महसूस हुआ और मेरा लंड एक बेहद गरम, बेहद टाइट और बेहद गीली जगह में समा गया.

“चोदो अपनी बीवी को. जैसे चाहो चोदो. लिटाकर चोदो, झुका कर चोदो, कुतिया बनाकर चोदो”

वो और भी जाने क्या क्या बोले जा रही थी और मेरे ऊपर बैठी अपनी गांद हिलाती लंड चूत में अंदर बाहर कर रही

थी. मुझे समझ नही आ रहा था के ये कोई सपना है या हक़ीकत. पर जो कुछ भी था, मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन

पल था.

वो यूँ ही मेरे ऊपर बैठी हिल रही थी. मेरी आँखें भारी हो चली थी. मैं सोना नही चाहता था. मैं तो उसके साथ पूरी

रात प्यार करना चाहता था पर अपने आप पर जैसे मेरे काबू नही रहा. पलके ऐसे भारी हो गयी थी जैसे मैं कब्से

सोया नही था और आज की रात मुझे अपनी ज़िंदगी में पहली बार सुकून हासिल हुआ था.

अपनी गांद ऊपर नीचे हिलाती वो झुक कर मेरे ऊपर लेट गयी. उसकी छातियाँ मेरे सीने से आकर दब गयी. उसके

होंठ मेरे कान के पास आए और वो बहुत धीरे से बोली. फ़ाक़ात एक तेरी याद में सनम, ना सफ़र के रहे, ना वाटन

के रहे, बिखरी लाश के इस क़दर टुकड़े हैं, ना क़ाफ़ान के रहे, ना दफ़न के रहे. और उसकी आवाज़ सुनते ही एक

अजीब सी ठंडक और बेचैनी जैसे एक साथ मेरे दिल में उतर गयी. पता नही मैं बेहोश हो गया या नींद के आगोश में

चला गया पर उसके बाद कुछ याद नही रहा.

अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो वो जा चुकी थी. मैं खामोशी से उठा तो मन अजीब तरह से भारी था. समझ

नही आ रहा था के ये इसलिए था के मैं अपनी बीवी को धोखा देते हुए एक अजनबी लड़की के साथ सोया था जो

एक पाप था या इसलिए के वो लड़की अब मेरे साथ नही थी और मैं उसको फिर से देखना चाहता था. फिर वही

पाप करना चाहता था. सिर्फ़ ये एहसास के वो अब मेरे पास नही है जैसे मेरी जान निकल रही थी. पहाड़ों में अब

भी अजीब सा सन्नाटा था.

बाहर सूरज अब भी नही निकला था. चारो तरफ बदल फेले हुए थे. मैने उठकर अपने कपड़े पहने और बाहर आकर

फिर अंदाज़े से उस जगह की तरफ चल दिया जहाँ मैने उसको पहली बार देखा था. ना कुछ खाया, ना मुँह धोया,

बस दीवानो की तरह उठा और उसकी तलाश में चल पड़ा. वो घर जहाँ की उसने बताया था के वो रहती थी अब भी

वहीं था. मेरी जान में जान आई. घर के बाहर पहुँच कर मैने कुण्डा खटखटाया. एक बुद्धि औरत ने दरवाज़ा खोला.

हाथ में एक डंडा जिसके सहारे वो झुक कर चल रही थी. दूसरे हाथ में एक माला जिसका वो जाप कर रही थी.

“कहिए”उसने मुझसे पुछा मैने उसको बताया के मैं एक लड़की को ढूँढ रहा था. हुलिया बताया और तब मुझे

एहसास हुआ के मैने कल रात उसका नाम तक नही पुछा था.

“मेरी बेटी आशिया?” बुद्धि औरत ने बोली मैने बताया के मैं नाम नही जानता पर फिर से लड़की का हुलिया

बताया.

“हां मेरी बेटी आशिया. एक साल पहले आते तो शायद मिल लेते”

मैं मतलब नही समझा. “उसको मरे तो एक साल हो गया” मैं फिर भी मतलब नही समझा और हैरानी से उस औरत

को देखने लगा. उसने मुझे वहीं एक पेड़ की तरफ इशारा किया और दरवाज़ा मेरे मुँह पर बंद कर दिया. मैं किसी

बेवकूफ़ की तरफ चलता उस पेड़ तक पहुँचा. पेड़ के नीचे एक कब्र बनी हुई थी. एक पत्थर पर हिन्दी और उर्दू में

लिखा था, “आशिया” और नाम के नीचे लिखी थी वो शायरी जो उसने कल रात मुझे सुनाई थी.

फ़ाक़ात एक तेरी याद में सनम,

ना सफ़र के रहे, ना वाटन के रहे,

बिखरी लाश के इस क़दर टुकड़े हैं,

ना क़ाफ़ान के रहे, ना दफ़न के रहे.

मौत की तारीख आज से ठीक एक साल पहले की लिखी हुई थी. जब मैं वापिस गेस्ट हाउस पहुँचा तो बाहर मुझे

केयर टेकर मिला. मैने उसको उस लड़की के बारे में बताया जो कल मेरे साथ आई थी. कौन सी लड़की साहब” वो

हैरत से मेरी तरफ देखता बोला “आप तो अकेले आए थे”.

मैने उसको बताया के वो लड़की जिससे मैं बात कर रहा था. “मैं तो समझा था के आप वो हनुमान जी से बात कर

रहे हैं” उसने मेरे कॉटेज के थोड़ा आगे बनी एक हनुमान जी की मूर्ति की तरफ इशारा किया. “आप कल अकेले आए

थे साहब” वो फिर बोला हवा में एक अजीब सी खामोशी थी जैसे कहीं कोई मर गया हो और सारे पेड़, सारी

वादियाँ, सारे पहाड़ उसका मातम कर रहे हों. मेरी आँखें भर गयी और कलेजा मुँह को आ गया. मैं रोना चाहता था.

दहाड़े मार मार कर रोना चाहता था | मैं उसको हासिल करना चाहता था. फिर उसको प्यार करना चाहता था. मैं

उसके साथ होना चाहता था. फिर वही पाप करना चाहता था. “उसको तो मरे एक साल हो गया” बुधिया की

आवाज़ मेरे कानों में गूँज रही थी.

“आप कल अकेले आए थे साहब” केयरटेकर की आवाज़ दिमाग़ में घंटियाँ बजा रही थी. मेरा दिल ऐसे उदास था जैसे

मेरा जाने क्या खो गया हो, दिल किया के छाती पीटकर, दहाड़े मारकर रो पडू, अपने कपड़े फाड़ दूँ, इस पहाड़ से

कूद कर अपनी जान दे दूं. अपनी जान दे दूं.

और मदहोशी के से आलम में मेरे कदम पहाड़ के कोने की तरफ चल पड़े, खाई की तरफ.

दुनियाँ मे कुछ घटनाए इस तरह की भी होती है।
 
एक कहानी ऐसी भी भाई बहन की

फ़िरोज़ : पापा , उम्र 47 वर्ष

यास्मीन : मम्मी , उम्र 37 वर्ष

समीर &; आयशा : जुड़वाँ भाई बहन

शनिवार का दिन था . आज आयशा को स्विमिंग की प्रैक्टिस के लिए जाना था . लेकिन जब उसने स्विमिंग सूट पहन

कर अपने को आईने में देखा तो पाया कि उसकी झांट के बाल सूट में से दिख रहे हैं . आयशा परेशान हो गयी . उसके

पास हेयर रिमोविंग क्रीम नहीं थी . उसने कभी भी अपनी चूत की शेव नहीं की थी . अचानक उसके दिमाग में अपने

जुड़वाँ भाई समीर की रेजर यूज़ करने का ख्याल आया .

समीर और आयशा दोनो के बेडरूम अलग अलग थे पर बाथरूम एक ही था. आयशा ने समीर के कमरे में जाकर

देखा वो कमरे में नही था. वो खुश होकर बाथरूम में गयी और समीर के सेविंग बॉक्स में से रेज़र निकाल लिया.

फिर अपने कपड़े खोलकर उसने अपनी चूत को देखा जो काले बलों से ढकी हुई थी. आयशा एक खूबसूरत लड़की थी.

नुकीली चूचियां , पतली कमर और गोल सुडोल नितंब से उसका बदन आकर्षक लगता था.

आयशा ने अपनी चूत के बालों पर समीर की सेविंग क्रीम लगाई और रेज़र से बाल साफ करने लगी. वो पहली बार

रेज़र यूज़ कर रही थी इसलिए बहुत सावधानी से धीरे धीरे उसने शेविंग करनी शुरू की. अपनी चूत में शेविंग के

दौरान क्लिट पर उंगलियाँ टच होने से उसे उत्तेजना भी महसूस हो रही थी. आयशा अपनी चूत की शेविंग में मगन

थी तभी समीर ने बाथरूम का दरवाज़ा खोल दिया .

“ तुम मेरे रेज़र से क्या कर रही हो ?”

“क…कुछ नही…” दरवाज़ा खुलने से सामने समीर को देखकर आयशा सन्न रह गयी. उसके हाथ अपने आप ही चूत के

आगे आ गए.

शेविंग की जल्दबाज़ी में उसने दरवाज़ा बंद तो किया था पर कुण्डी लगाना भूल गयी थी.

समीर ने जैसे ही आयशा की चूचियां देखी तो वो अपना गुस्सा भूल गया. आयशा की चिकनी चूत की एक झलक भी

उसने देख ली थी .

अब तक आयशा थोड़ा संभल चुकी थी, उसने झट से अपने ऊपर टॉवल डाल लिया.

समीर को अपने को देखता पाकर उसने कहा, “ तुम बाहर जाओ , प्लीज़.”

समीर मुस्कुराते हुए बोला, “ पहले ये बताओ तुम मेरे रेज़र से क्या कर रही थी ?”

वो समझ गया था फिर भी आयशा को चिढ़ा रहा था.

आयशा की कुछ समझ में नही आया कि वो क्या बोले.

फिर उसने कहा, “ बाहर जाओ नही तो मैं मम्मी से कह दूँगी.”

समीर बोला, “ क्या कहोगी मम्मी से कि तुम क्या कर रही थी ?”

“प्लीज़ समीर, मैं तुम्हारी बहन हूँ. तुमको मुझे बिना कपड़ो के देखकर खुद ही बाहर चले जाना चाहिए था.”

“ठीक है , मैं जाता हूँ. लेकिन तुम मुझे शाम को बताओगी कि तुम क्या कर रही थी.”

“अभी तो बाहर जाओ वरना कोई आ जाएगा हमें ढूंढते हुए.”

समीर अपने पैंट में बने तंबू को सम्हालता हुआ बाथरूम से बाहर चला गया.

सुबह हुई घटना से आयशा दिन भर परेशान रही. किसी भी चीज़ में उसका मन नही लग रहा था. स्विम्मिंग को

लेकर जो उसका उत्साह था वो भी ठंडा पड़ गया था. जो हुआ उसके बारे में सोचकर उसके जवान जिस्म में झुरजुरी

सी दौड़ जा रही थी. पहली बार किसी ने उसके नंगे बदन को देखा था और देखने वाला उसका अपना जुड़वा भाई

था. इससे उसे उत्तेजना भी महसूस हो रही थी और साथ ही साथ उसे ये भी लग रहा था की ये ग़लत है. आख़िर वो

उसका सगा भाई था.

आयशा को कुछ समझ नही आ रहा था की वो क्या करे. उसने देखा था की समीर उसके नंगे बदन को देख रहा था

और जब आयशा ने टॉवल लपेट लिया था तो उसे निराशा हुई थी. लेकिन समीर की आँखो में अपनी खूबसूरती के

लिए प्रसंशा के भाव देखकर उसे अच्छा भी लगा था. आयशा के कहने पर भी समीर बाथरूम से बाहर नही गया था

, उसने भी पहली बार किसी लड़की के नंगे बदन को देखा था. आयशा सोचने लगी की समीर क्या चाहता था , क्या

वो उसके बदन को छूना चाह रहा था. ये सोचकर आयशा रोमांचित हो गयी. उसे भी समीर के नंगे बदन को देखने

की इच्छा होने लगी. लेकिन उसके मन में ये भी डर था कि भाई बहन के बीच ये सब ग़लत है.

वैसे तो दोनो जुड़वा थे पर स्वभाव दोनो का अलग था. समीर डॉमैनेटिंग नेचर का होने के कारण उस पर अक्सर

हावी रहता था और आयशा का नेचर submissive होने की वजह से वो उससे दब जाती थी.

रात में डिनर टेबल पर आयशा ने देखा समीर भी किसी सोच में पड़ा है.

उनके पापा फ़िरोज़ ने जब दोनो को चुपचाप खाते देखा तो उसने पूछा, “ समीर क्या तुम्हारा और आयशा का

झगड़ा हुआ है ?”

“नही”, समीर ने छोटा सा जवाब दिया.

“फिर तुम दोनो आपस में बोल क्यूँ नही रहे हो ?”

फ़िरोज़ को समीर की बात का भरोसा नही हुआ, उसने फिर आयशा से पूछा,” तुम बताओ , क्या बात है ?”

“कुछ नही पापा, आज स्विम्मिंग प्रॅक्टीस की वजह से मैं थक गयी हूँ और कोई बात नही है.”

फ़िरोज़ को उसकी बात सही लगी , उसने कहा,” ठीक है, कल तो सनडे है, तुम देर तक सो सकती हो.”

खाना खाने के बाद गुडनाइट बोलकर दोनो अपने अपने कमरे में चले गये.

करीब 1 घंटे बाद आयशा के दरवाजे में खटपट हुई, वो जानती थी बाहर कौन है. कुछ पल तक वो बेड पर बैठी

निर्णय नही कर पायी कि दरवाज़ा खोलू या नही , फिर काँपते हाथों से उसने दरवाज़ा खोल ही दिया.

बाहर समीर नाइट ड्रेस में खड़ा था.

“मुझे अंदर आने दो.” समीर धीरे से बोला.

आयशा कुछ नही बोली, दरवाज़े से हट गयी.

कमरे के अंदर आते ही समीर ने लाइट ऑफ कर दी और बेड के किनारे स्टडी टेबल की छोटी लैंप ऑन कर दी. अब

बाहर से ऐसा लग रहा था की कमरे में अंधेरा है पर बेड के पास स्टडी लैंप से बहुत हल्की सी रोशनी थी.

“ये तुम क्या कर रहे हो समीर ?” आयशा थोड़ा घबराते हुए तेज आवाज़ में बोली.

“मम्मी पापा को लगे की हम सो रहे हैं इसलिए मेने लाइट ऑफ कर दी है.” समीर ने मुँह पर उंगली रखकर उसे

थोड़ा धीमे बोलने का इशारा किया.

दोनो बेड में एक दूसरे की तरफ मुँह करके बैठ गये.

“तुम चाहते क्या हो ? ” आयशा को कुछ समझ नही आ रहा था. वो अभी भी कुछ घबराई हुई सी थी.

“देखो आयशा मैं तुम्हारा भाई हूँ. मैं कुछ भी ऐसा नही करूँगा जिससे तुम्हे बुरा लगे. ठीक है ? इसलिए तुम घबराओ

मत और बिल्कुल रिलॅक्स हो जाओ.”

समीर की बात सुनकर आयशा की थोड़ी घबराहट कम हुई और उसके चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट आ गयी.

“तुम इस नाइट ड्रेस में अच्छे लग रहे हो “ आयशा ने समीर की आँखो में देखते हुए कहा.

“थैंक यू आयशा, तुम भी बहुत सुंदर दिखती हो ख़ासकर बिना कपड़ो के,”

समीर की बात से आयशा को झटका लगा.

“समीर प्लीज़ , अब उस बारे में बात मत करो.”

“ओके , लेकिन मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ , पूछूँ क्या ?”

“पूछो “

“गुस्सा तो नही होगी ?”

“गुस्सा आने वाली बात होगी तो गुस्सा आएगा ही.” आयशा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा की समीर उससे क्या

पूछना चाहता है जो इतना झिझक रहा है.

“ वो ….वो तुम्हारे बूब्स का साइज़ क्या है ?”

समीर के इस सवाल से आयशा शर्मा कर सर झुका लेती है.

और फिर सर झुकाए ही जवाब देती है, “34B”

उसके जवाब देने से समीर की हिम्मत बढ़ जाती है और वो अगला सवाल पूछता है.

“तुम्हारे निपल्स का कलर क्या है ?”

“तुमने देख तो लिया था सुबह, फिर अब क्यूँ पूछ रहे हो ?” आयशा भी अब समीर की बातों से मज़ा लेने लगी थी.

समीर की अपने शरीर के प्रति जिज्ञासा से उसे कुछ रोमांच सा भी महसूस हो रहा था.

“सुबह तो तुमने एकदम से ढक लिया था , मेने तो एक झलक ही देखी थी बस.”

“हल्का भूरा ” शर्मीली मुस्कान के साथ आयशा ने निपल का कलर बताया.

“क्या तुमने अभी ब्रा पहनी है ?”

“नही. मैं सोते समय ब्रा नही पहनती.”

“क्या मैं तुम्हारे बूब्स को छू सकता हूँ ?”

“बिल्कुल नही, मैं नही छूने दूँगी.”

समीर की इन बातों का आयशा के बदन पर असर होने लगा था. उसे एक अजीब सी सेन्सेशन हो रही थी. अपनी

पैंटी में उसे गीलापन महसूस हो रहा था. उसकी नाइट ड्रेस में निपल तनकर कड़े हो गये थे.

आयशा ने मन ही मन कमरे की लाइट ऑफ होने का शुक्र मनाया वरना समीर से ये सब छुपाना बहुत मुश्किल होता.

“प्लीज़ , दिखा दो ना” समीर धीरे से फुसफुसाया.

“ठीक है , मैं तुमको अपना एक बूब दिखाऊंगी, लेकिन तुमको भी मेरे सवाल का जवाब देना होगा और पहले वादा

करो की तुम मेरे साथ कुछ नही करोगे.”

“मैं वादा करता हूँ . अब तो दिखा दो.”

आयशा ने सलवार कमीज़ पहना हुआ था. उसने बायीं तरफ से अपनी कमीज़ धीरे धीरे उपर को उठाई. अब उसकी

बायीं चूची नग्न थी लेकिन दायी चूची कमीज़ से ढकी हुई थी.

पहली बार समीर इतनी नज़दीक़ से चूची देख रहा था. बिल्कुल अपनी आँखो के सामने. अपनी चाची की चूचियां

उसने देखी थी जब वो अपने बेटे रेहान को दूध पिलाती थी. लेकिन ये दृश्य तो उसके लिए बिल्कुल नया था.

“ऐसे क्या देख रहे हो ? क्या ये सुंदर है ?” आयशा ने समीर से थोड़ी मादक आवाज़ में पूछा.

“बहुत सुंदर” समीर मंत्रमुग्ध होकर बोला.

“प्लीज़, मुझे छूने दो ना अपनी चूची को.”

“ठीक है. लेकिन सिर्फ़ छूना और कुछ मत करना.”

समीर ने हाथ बढ़ाकर आयशा की चूची को छुआ. चूची का स्पर्श उसे बहुत नरम लगा. फिर उसने चूची के बीच में

निपल को छुआ. आयशा के मुँह से हल्की सिसकारी निकली.

“क्या हुआ ? मेरे हाथ लगाने से दर्द हुआ क्या ?”

“नही……बहुत अच्छा लगा. एक बार और छुओ ना.” पहली बार किसी ने आयशा के निपल को छुआ था.

आयशा के मुँह से ये शब्द सुनकर समीर की हिम्मत बढ़ गयी. वो समझ गया की निपल पर हाथ लगाने से आयशा को

बहुत अच्छा फील हो रहा है.

समीर ने दोनो हाथ से आयशा की कमीज़ के कोने पकड़े और एक झटके में उसके सर के उपर से उतार दी. आयशा के

बदन का उपरी हिस्सा अब बिल्कुल नग्न था.

“तुमने वादा किया था की तुम कुछ नही करोगे.” उततेज़ना से काँपती हुई आयशा बोली.

“आई आम सॉरी. मुझे दोनो चूचियों को देखने की इच्छा हुई, इसलिए मैंने तुम्हारी कमीज़ उतार दी.”

“चलो कोई बात नही. अब तो देख ली दोनो.”

समीर अपना मुँह नज़दीक़ लाया और बायीं चूची के निपल को अपने मुँह में भर लिया. आयशा के जिस्म को एक

झटका सा लगा. उत्तेजना से उसकी आँखे बंद होने लगी.

“ओह ...बहुत अच्छा लग रहा है…….प्लीज़ समीर, जैसे रेहान, चाची के निप्पल चूसता है, वैसे ही चूसो.” अपनी

चूची को समीर के मुँह में ठूँसते हुए आयशा बोली.

आयशा के बढ़ावा देने से समीर भी उत्साह में आ गया. वो बारी बारी से दोनो चूचियों को मुँह में भरकर चूसने लगा.

कुछ देर बाद आयशा का बदन अकड़ गया , एक हल्की चीख उसके मुँह से निकली और फिर उसका बदन ढीला पड़

गया. ये आयशा की जिंदगी का पहला ओर्गास्म था. झड़ने से उसे अपनी चूत से रस निकलकर पैंटी गीली महसूस हुई.

आयशा को कुछ समझ नही आया की ये क्या हुआ , पैंटी गीली होने से उसे एंबॅरसमेंट हुई.

समीर ने जब आयशा के चेहरे के भाव देखे वो समझ गया कि उसकी बहन झड़ चुकी है.

“ओर्गास्म आया ना तुमको ?”

“हाँ ” धीमी आवाज़ में शरमाते हुए आयशा बोली.

फिर उसने नीचे अपने सलवार को देखा. उसे गीलापन महसूस हो रहा था. और वो वहाँ देखना चाहती थी पर भाई

के सामने शर्मा रही थी.

“बहुत मज़ा आया तुमको ओर्गास्म से ?”

“हाँ ” शरमाते हुए आयशा ने जवाब दिया.

“मैं तुम्हारी चूत देखना चाहता हूँ.”

समीर ने अपना हाथ आयशा की जाँघ पर रख दिया. अपनी जाँघ पर समीर के हाथ के स्पर्श से आयशा के बदन में

झुरजुरी सी दौड़ गयी. उसने समीर की बात का कोई जवाब नही दिया.

समीर ने इसे आयशा की हाँ समझा. उसकी हिम्मत बढ़ गयी और उसने आयशा की सलवार का नाड़ा खोलकर

सलवार घुटनो से थोड़ा नीचे तक कर दी.

आयशा की पैंटी में एक गीला धब्बा सॉफ दिख रहा था.

समीर ने पैंटी के दोनो सिरो पर उंगलियाँ डालकर पैंटी को घुटनो तक खींच लिया.

अब आयशा की बिना बालों की , चूतरस से गीली , चिकनी चूत समीर के सामने थी.

समीर ने हाथ लगाकर चूत को छू लिया.

तभी आयशा ने उसे रोक दिया,“ नही . प्लीज़ समीर . वहाँ पर नही.”

समीर का मन हाथ हटाने का नही हो रहा था पर उसे हटाना ही पड़ा.

समीर के हाथ हटाते ही आयशा ने अपनी पैंटी और सलवार उपर को खींच लिए. सलवार का नाड़ा बांधकर उसने

अपनी कमीज़ पहनने के लिए हाथ बढ़ाया . लेकिन समीर ने कमीज़ पकड़ ली.

“तुम ऐसे बहुत खूबसूरत लग रही हो. अभी कमीज़ मत पहनो.”

आयशा ने कमीज़ छुड़ाने की कोशिश की पर जब समीर ने कमीज़ पकड़े रखी तो उसने हार मान ली और कमीज़ से

अपने हाथ हटा लिए.

“ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा . लेकिन अब तुम मेरे सवालों का जवाब दो”

“पूछो. जो भी पूछना चाहती हो.”

“तुम्हारा साइज़ कितना है ?”

“क्या साइज़ ?”

“तुम्हे मालूम है , मैं किसका साइज़ पूछ रही हूँ”

समीर हंसा.

“7 इंच के आस पास है. तुम देखना चाहोगी ?”

आयशा ने शरमाते हुए ‘हाँ ’ में सर हिला दिया.

समीर ने अपना पाजामा नीचे करके खड़ा लंड बाहर निकल लिया.

आयशा ने पहली बार लंड को देखा था. अपनी सहेलियों से उसने लंड के बारे में सिर्फ़ बातें ही सुनी थी. समीर के 7

इंच के मोटे लंड को देखकर आयशा का उसे छूने का मॅन हुआ. लेकिन वो चाहती थी की समीर उससे छूने को कहे.

“आयशा , तुम्हे अच्छा लगा मेरा लंड ?”

“मुझे नही मालूम.”

“तुमने पहले भी देखा है किसी का ?”

“तुम्हे पता तो है की मेरा कोई BF नही है. फिर मुझे कौन दिखाएगा ?”

“मैने तो ऐसे ही पूछ लिया. चलो पहली बार लंड देख रही हो तो इसे छूना चाहोगी ?”

आयशा ने बिना कोई जवाब दिए अपनी कांपती उंगलियाँ धीरे से समीर के लंड के उपर फिराई . धीरे धीरे लंड की

पूरी लंबाई पर वो अपना हाथ फेरने लगी. उसकी उंगलियों के स्पर्श से लंड ने एक झटका मारा. समीर के लंड को

पहली बार किसी लड़की ने छुआ था. इसलिए वो उत्तेजित होने लगा.

आयशा बड़े ध्यान से लंड का निरीक्षण कर रही थी. उंगलियों के स्पर्श से लंड के झटका मारने पर उसने समीर की

और प्रश्नावाचक नज़रों से देखा की ऐसा क्यूँ हुआ. समीर गहरी साँसे लेते हुए किसी और ही दुनिया में था. अपने लंड

पर आयशा की नाज़ुक उंगलियों के स्पर्श से उसे बहुत मज़ा मिल रहा था. उसे लगा थोड़ी देर ये ऐसे ही उंगलियाँ

फिराती रहेगी तो मेरा पानी निकल जाएगा.

फिर आयशा का ध्यान समीर के लंड से नीचे लटकती गोलियों पर गया. दूसरे हाथ से उसने गोलियों को सहलाया.

कड़े लंड की तुलना में गोलियाँ बहुत नरम थी. आयशा को कुछ अजीब सा लगा. उसने लंड से हाथ हटाकर गोलियों

को नीचे से हाथ लगाकर उनका वजन तौलने की कोशिश की.

आयशा अपनी जिज्ञासा शांत कर रही थी , समीर के बदन को नंगा देखने की उसकी बहुत इच्छा थी जो आज पूरी

हो रही थी. लेकिन लंड से आयशा के हाथ हटाने से समीर के आनंद में खलल पड़ गया.

“आयशा , तुमने हाथ क्यूँ हटा लिया ? अपनी मुट्ठी में पकड़ कर उपर नीचे हिलाओ ना , प्लीज़. “

“क्यूँ ? मेरे ऐसा करने से क्या होगा ?”

“तुम्हारे हाथ के स्पर्श से मुझे बहुत अच्छा लग रहा है .”

समीर का मॅन रखने के लिए आयशा ने लंड को मुट्ठी में पकड़ लिया और उपर नीचे करके मूठ मारने लगी.

समीर का लंड मूठ मारने से और भी तनने लगा , आयशा ने भी लंड को बढ़ते देखा. समीर की उत्तेजना चरम पर

पहुँच गयी , वो समझ गया अब सिर्फ़ दो चार स्ट्रोक के बाद पानी निकल जाएगा.

“आयशा थोड़ा तेज तेज हाथ चलाओ , प्लीज़.” उखड़ती सांसो के बीच समीर बोला.

समीर के चेहरे के भाव बदलते देखकर आयशा समझ रही थी की मेरे हाथ चलाने से समीर को बहुत आनंद मिल रहा

है. उसका हाथ थकने लगा था लेकिन समीर के कहने पर उसने थोड़ा ज़ोर लगाकर तेज तेज हाथ चलाया.

आयशा बेड के कोने में बैठी हुई थी और समीर ठीक उसके मुँह के सामने खड़ा था . आयशा के तेज तेज हाथ चलाने

से अब समीर से रुका नही गया. आयशा की नज़रे उपर को समीर के चेहरे पर थी जो आँखे बंद किए हुए चरम आनंद

में था. आयशा के लिए ये सब नया था , समीर को मदहोश देखकर उसे कुछ आश्चर्य और हैरानी भी हो रही थी और

थोड़ा अपने उपर गर्व भी हो रहा था की मेरे हाथ चलाने से समीर को इतना मज़ा मिल रहा है.

तभी समीर के लंड से एक वीर्य की धार छूटी जो ठीक आयशा की नाक और होठों से टकराई , इससे पहले की वो

कुछ समझ पाती , दो तीन बार और वीर्य की धार उसकी आँख , मुँह, छाती सब जगह पड़ गयी. अब आयशा के होठ

और नाक से वीर्य बहकर उसकी चूचियों पर गिरने लगा. झड़ने के बाद समीर ने आँख खोली और आयशा के होंठ

वीर्य से भरे हुए पाए.

“थैंक यू .” समीर ने आगे झुककर आयशा के गाल पर चुंबन ले लिया.

आयशा की कुछ समझ में नही आ रहा था.

“तुमने मुझे सब गंदा कर दिया समीर. तुमने मुझे निकलने से पहले बताया क्यूँ नही.” आयशा थोड़े नाराज़ स्वर में

बोली.

“आई ऍम रियली सॉरी आयशा. मुझे इतना मज़ा आ रहा था की मुझे ध्यान ही नही रहा.” आयशा का चेहरा देखकर

समीर को हँसी आ गयी.

उसके हंसने से आयशा और भी नाराज़ हो गयी.

“मैं अभी सब सॉफ कर देता हूँ आयशा . गुस्सा क्यूँ होती हो.”

समीर ने झट से एक कपड़ा उठाया और उससे आयशा की नाक और होठ सॉफ कर दिए , फिर नीचे छाती पर गिरे

वीर्य को भी पोछ दिया.

“ लो अब सब सॉफ हो गया.” कहते हुए समीर ने आयशा की दायी चूची के निपल को मुँह में भरकर चूस लिया.

समीर को अपने ही वीर्य का स्वाद आया. फिर उसने दूसरी चूची को भी चाट लिया. उसके बाद आयशा के होठ और

नाक को भी समीर ने चाट लिया.

“ लो अब तो मेने चाट के भी सब सॉफ कर दिया. अब खुश ?”

समीर के प्यार करने से आयशा के होठों में मुस्कुराहट आ गयी.

“कैसा लगा तुम्हे मेरे वीर्य का स्वाद आयशा ?”

“कुछ अजीब सा. “

“देखो मेने तुम्हारा चेहरा और छाती चाट के सॉफ कर दी. अब तुम भी मेरा एक काम कर दो.”

“कैसा काम ?”

“मेरे लंड को अपने मुँह में लेकर चाट के सॉफ कर दो, देखो अभी इसकी टिप पर वीर्य लगा हुआ है.”

“ची ! ये भी कोई मुँह में लेने की चीज़ है . ची ! गंदा!”

“ अरे.. कोई गंदा नही है. रोज़ नहाते समय रगड़ के धोता हूँ इसको. वैसे भी सारी औरतें अपने मर्दों का लंड मुँह में

लेती हैं.”

“तुम्हे सब कुछ पता है . शादी हो गयी क्या तुम्हारी ?”

“ अरे बेवकूफ़, इन बातों को जानने के लिए शादी होना ज़रूरी नही है. लड़को को सब मालूम रहता है.”

“ और अब तुमसे मुझे भी पता चल रहा है. है ना ? “

“अब बातें मत बनाओ. प्लीज़ एक बार मुँह में लेके तो देखो . तुम्हे बहुत अच्छा लगेगा फिर तुम खुद ही मुँह में लेने

की ज़िद करोगी.”

“ऐसा क्या ? “

“हाँ ! सच्ची ! ”

आयशा ने एक नज़र लंड पर डाली और फिर उपर समीर को देखकर मुस्कुराइ. वो अभी भी लंड मुँह में लेने में

हिचकिचा रही थी.

“अरे यार, एक बार ट्राइ तो करो.” उसे हिचकिचाते देखकर समीर ने ज़ोर डाला.

झिझकते हुए आयशा ने लंड के सुपाड़े को मुँह में लिया. तुरंत उसको लंड की टिप मेंलगे वीर्य का स्वाद महसूस हुआ.

उसने फिर लंड को मुँह से बाहर निकाल लिया. लंड आयशा के मुँह की लार के साथ बाहर आया.

“क्या हुआ ? बाहर क्यूँ निकाल लिया ?”

आयशा ने समीर के चेहरे की ओर देखा लेकिन कोई जवाब नही दिया. फिर थोड़ा थूक गटककर लंड को धीरे धीरे

फिर से मुँह में ले लिया.

“लॉलिपोप के जैसे चूसो धीरे धीरे.”

आयशा धीरे धीरे लंड चूसने लगी. उसके चूसने से झड़ चुका लंड फिर से खड़ा होकर बड़ा होने लगा. आयशा ने अपने

मुँह के भीतर लंड को बढ़ते और सख़्त होते महसूस किया . अब वो आँख बंद करके लॉलिपोप के जैसे लंड को चूसने

लगी.

आयशा को आँखे बंद करके लंड चूसते देखकर समीर समझ गया अब इसको चूसने में मज़ा आने लग गया है.

“मेने कहा था ना की तुम्हे चूसने में मज़ा आएगा. “

“मेने कब कहा की मुझे मज़ा आ रहा है ? मैं तो तुम्हारा दिल रखने को चूस रही हूँ.”

“ चलो जो भी हो, लेकिन आयशा वादा करो हम फिर से ऐसा करेंगे , प्लीज़”

आयशा मुस्कुरायी , “ देखो समीर , मैं सच सच बता देती हूँ. मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा है और तुम्हारे मज़े तो मेने

खुद अपनी आँखो से देख लिए. लेकिन ज़रा ये भी तो सोचो की हम दोनो भाई बहन है. क्या हमारा बार बार ऐसा

करना ठीक होगा?”

“किसी को पता नही चलेगा की हम दोनो ये सब करते हैं. ये तो तुम्हारे और मेरे बीच की बात है फिर तुम क्यूँ डर

रही हो.”

“ अरे पागल, मैं दूसरे को पता चलने या ना चलने की बात नही कर रही हूँ. मैं तो ये कह रही हूँ की भाई बहन के

बीच ऐसा करना हमारे धर्म के हिसाब से ग़लत है.”

“ अरे धर्म वरम की बात छोड़ो. देखो तुम्हे अच्छा लग रहा है और मुझे भी अच्छा लग रहा है , इसमे कोई भी बुराई

नही है. मैं तो तुम्हे नग्न देखना चाहता हूँ, बिल्कुल नंगी, और फिर उसके बाद तुम्हारे साथ प्यार करना चाहता हूँ.

अभी तो हमने कुछ भी नही किया है.”

आयशा उसकी बात सुनकर बहुत शर्मा जाती है.

“ समीर तुम बहुत ही जल्दबाज़ी कर रहे हो. मैं अभी ऐसी बातों के लिए बिल्कुल तय्यार नही हूँ.”

“मेने तुम्हारी चूचियां भी देख ली और चूत भी. देखी की नही देखी.”

“सिर्फ़ देखी समीर. मेने तुम्हे कुछ करने तो नही दिया. अगर मेने तुम्हे रोका नही होता तो तुम ना जाने क्या क्या कर

चुके होते मेरे साथ अब तक.”

आयशा को ना नुकुर करते देखकर समीर उदास होते हुए बोला,” देखो आयशा, मैं तुम्हे बहुत चाहता हूँ , लेकिन तुम

मुझे ठुकरा रही हो.”

आयशा ने समीर की आँखो में देखा. समीर के उदास चेहरे को देखकर उसे प्यार उमड़ आया. आयशा ने अपनी बाँहे

फैला दी और समीर को अपनी बाँहो में समेट लिया.

“ मैं तुम्हे ठुकरा नही रही समीर . मैं भी तुम्हे बहुत चाहती हूँ. बस फरक सिर्फ़ ये है की तुम ज़माने की परवाह नही

करते और मैं ज़माने से डरती हूँ.”

“अगर तुम वाक़ई मुझे चाहती हो तो वादा करो की हम फिर से ऐसा करेंगे.”

“ओके , हम फिर से ऐसा करेंगे. अब खुश ?”

“आयशा एक बात और है.”

“अब क्या है ?”

“आयशा मैं तुम्हे आज बिना कपड़ो के देखना चाहता हूँ, बिल्कुल नंगी.”

“ अब फिर से ? समीर ये क्या है ?”

“ नही… घबराओ मत. मैं कुछ नही करूँगा . बस एक बार मैं तुमको तसल्ली से पूरी नंगी देखना चाहता हूँ.”

आयशा का मॅन नही हो रहा था लेकिन वो समीर का दिल भी नही तोड़ना चाहती थी. उसने समीर को अपने

आलिंगन से अलग किया और बेड से थोड़ी दूर जाकर खड़ी हो गयी. उपर तो उसने कुछ पहना नही था.

उसने धीरे से अपने सलवार का नाड़ा खोला और उसे नीचे फर्श पर गिरने दिया. फिर दोनो हाथ पैंटी के कोनो में

फंसकर पैंटी भी नीचे गिरा दी. और फिर नीचे कालीन में बैठ गयी.

“ लो अब जो देखना चाहते थे , देख लो समीर.”

“ऐसे नही आयशा. ऐसे तो मुझे कुछ भी सॉफ नही दिख रहा. तुम थोड़ी अपनी टाँगे फैलाओ.”

आयशा ने बैठे हुए ही धीरे धीरे अपनी टाँगे फैला दी . अब समीर को आयशा की चूत सॉफ सॉफ दिख रही थी.

समीर को एकटक अपनी चूत पर नज़रें गड़ाए देखकर आयशा को शरम आई. लेकिन फिर उसने कुछ सोचा और

अपने दोनो हाथ चूत के होठों पर रखकर चूत फैला दी और मुस्कुराने लगी.

समीर को अपनी आँखो पर विस्वास ही नही हुआ. उसकी प्यारी बहन उसके सामने नंगी बैठी थी और दोनो हाथ से

फैलाकर उसे अपनी गुलाबी चूत दिखा रही थी.

“ नज़ारा पसंद आया तुमको.” आयशा चिढ़ाते हुए बोली.

“आयशा मेरा मूठ मारने का मॅन हो रहा है. तुम ऐसे ही अपनी चूत फैलाए रखो.”

“तुम्हे जो करना है करो लेकिन अपने साथ. अब मेरे साथ कुछ मत करना.”

समीर ने अपने लंड को हाथ में लिया और आयशा की गुलाबी चूत को देखते हुए फटाफट मूठ मारने लगा. थोड़ी देर

बाद वो झड़ने को हुआ. आयशा अब समझदार हो चुकी थी. समीर के चेहरे को देखकर वो समझ गयी इसका पानी

अब निकलने वाला है. खुद उसकी चूत में गीलापन बढ़ने लगा था. वो समीर के लंड को ध्यान से देखने लगी , अब

निकलेगा पानी …अब निकलेगा….

तभी समीर के लंड से वीर्य की धार निकली और थोड़ी दूरी पर बैठी आयशा की जाँघो पर गिरी. समीर को झड़ते

देखकर आयशा भी रुक नही पाई. उसका हाथ खुद ब खुद उसकी क्लिट को तेज़ी से मसलने लगा. थोड़ी देर में ही वो

भी झड़ गयी. और कालीन पर पीछे को लेट गयी.

दोनो भाई बहन कुछ देर तक लेटे रहे, समीर आयशा के बेड पर और आयशा नीचे कालीन पर.

थोड़ी देर बाद आयशा उठी और अपने कपड़े पहनने लगी. कपड़े पहनकर वो अपने भाई के पास बेड में आई और

उसके मुरझाए हुए लंड को हाथ से थोड़ा दबा दिया. लंड में थोड़ी हरकत हुई. आयशा हंस पड़ी और समीर से कपड़े

पहनने को कहा. समीर उठा और अपने कपड़े ठीक किए. फिर आयशा के गाल पर एक प्यार भरा चुंबन लेकर

गुडनाइट कहकर अपने रूम में चला गया.

दोनो भाई बहन रात में खूब गहरी नींद सोए , उनकी जिंदगी अब बदल चुकी थी.

*****

कुछ दिन बाद फ़िरोज़ के एक रिश्तेदार के यहाँ से शादी का निमंत्रण आया. वो पास ही के शहर में रहता था. फ़िरोज़

और यासमीन ने शादी में सुबह जाकर शाम को लौट आने का फ़ैसला किया. शादी के दिन सुबह उठकर दोनो चले

गये.

आयशा सुबह देर से उठी. अंगड़ाई लेते हुए बेड से उठकर उसने खिड़कियों के पर्दे हटाए , सूरज की सुबह की हल्की

किरणों से कमरे में रोशनी आ गयी. अपने कमरे से बाहर आकर वो ड्रॉयिंग रूम में गयी.घर में कोई नही था, सिर्फ़

आया थी . आयशा को ध्यान आया कि मम्मी पापा को आज शादी में जाना था. आयशा अपने कमरे में वापस आ

गयी . धीरे धीरे उसने अपने सारे कपड़े उतारे और अपने बदन को आईने में देखने लगी. उसके होठों पर मुस्कुराहट

आ गयी. आयशा जानती थी कि वो खूबसूरत दिखती है. नहाने के बाद उसने लेस वाली ब्रा और पैंटी पहनी. उपर से

फूलों की कढ़ाई वाली कमीज़ और सलवार पहन लिया.

आयशा समीर के कमरे में गयी. दरवाज़े को उसने हल्का सा पुश किया. अंदर से चिटकन नही लगी थी दरवाज़ा खुल

गया.

समीर बेड पर गहरी नींद में सोया था. आयशा ने शरारती मुस्कुराहट के साथ समीर के उपर से पतले कंबल को धीरे

से उठाया.

कंबल के हटने पर आयशा एक पल को शरमा गयी , समीर के बदन पर कोई कपड़ा नही था. आयशा की नज़र समीर

के मुरझाए हुए लंड पर पड़ी. उसने समीर का 7 इंच का खड़ा हुआ लंड देखा था. पर सिकुड़े हुए छोटे लंड को देखकर

उसे जिज्ञासा हुई. आयशा ने लंड को धीरे से छुआ, अभी वो बहुत नरम लग रहा था. फिर उसने धीरे से समीर की

गोलियों को छुआ. समीर की झांटों को देखकर उसने मन ही मन सोचा की वो समीर से उन्हे साफ़ करने को कहेगी.

तभी समीर के बदन में थोड़ी हरकत हुई. आयशा चुपचाप उठी और धीरे से कमरे से बाहर निकल गयी.

कुछ समय बाद आयशा अपने कमरे से निकालकर ड्रॉयिंग रूम में गयी. वहाँ समीर सोफे में बैठकर टीवी देख रहा

था. समीर को देखकर आयशा मुस्कुरायी और सोफे पर बैठ गयी.

मेरे पास बैठो , आयशा.

नहीं, कोई देख लेगा, मैं यहीं पर ठीक हूँ.

कौन देखेगा ? मम्मी पापा शादी में चले गये हैं और रात को ही लौटेंगे.

आया तो यहीं है.

मैंने आया को आज के लिए छुट्टी दे दी है. अब तुम्हारे और मेरे सिवाय घर में कोई नही है.

बदमाश. हम्म्म्म .तुम्हारे दिमाग़ में कुछ चल रहा है .

मेरे नज़दीक़ आओ यार और अपना ये शॉल हटा दो .

आयशा मुस्कुरायी और शॉल अपने कंधों से हटाकर सोफे पर रख दिया. फिर नज़दीक बैठकर समीर के कंधे पर

अपना सर रख दिया. समीर , तुमको एक बात बताऊँ ? मुझे ऐसा लगता है कि मैं तुम्हारी बीवी हूँ.

लेकिन मैंने अपनी बीवी से प्यार तो नही किया.

जल्दी क्या है. हमको शादी किए हुए कुछ ही दिन तो हुए हैं. आयशा मुस्कुराते हुए बोली.

अच्छा ! कब हुई हमारी शादी ?जिस रात को तुम मेरे कमरे में आए थे.

आयशा तुम्हें अच्छा लगा जो हमने किया उस रात को ?

हाँ समीर , मुझे बहुत अच्छा लगा. अब तुम्हारे लिए मेरा प्यार ओर भी बढ़ गया है. मैं हर वक़्त तुम्हारे ही बारे में

सोचती रहती हूँ. फिर आगे बोली,मैंने तुम्हें अपना शौहर मान लिया है. अब मैं किसी और से शादी नही कर

सकती.

समीर कुछ नही बोला, आयशा की प्यार भरी बात सुनता रहा. उसे भी आयशा बहुत पसंद थी.

आज सुबह मैं तुम्हारे कमरे में आई थी.

मेरे कमरे में ! कब आई ? मुझे तो पता नही चला .

एक बात बताओ. क्या तुम रोज़ ऐसे ही नंगे सोते हो ?

अच्छा तो तुमने ही मेरा कंबल उठाया था. मैं समझा अपनेआप गिर गया होगा.

हाँ , मैंने उठाया था कंबल. और तुम्हारे छोटे लंड को भी देखा था.

तुम्हें लगता है मेरा लंड छोटा है ?

सुबह तो छोटा ही था.

और उस रात को ?

उस रात को तो बहुत बड़ा था. ये अपनेआप बड़ा छोटा कैसे हो जाता है ?

तुम्हें देखकर

आयशा समीर की छाती में एक मुक्का मारती है.

समीर एक काम करोगे ?

बताओ , क्या काम करना है ?

तुम प्लीज़ अपने बाल साफ़ कर लो, नीचे के.

ठीक है , मैं साफ़ कर लूँगा.

आयशा ने देखा समीर के पैंट में लंड खड़ा होने लगा है. आयशा मुस्कुरायी और अपना हाथ लंड के उपर रख दिया.

समीर , ये फिर खड़ा हो रहा है.

समीर ने पैंट की ज़िप खोलकर खड़े लंड को बाहर निकाल लिया.

समीर तुमने मेरी बात का जवाब नही दिया.

कौन सी बात ?

रात में नंगे सोने वाली

नंगा नही, नाइट ड्रेस में सोता हूँ. वो तो कल रात मैंने मूठ मारी थी तो फिर नंगा ही सो गया.

तुम रोज़ मूठ मारते हो ?

किसी किसी दिन को छोड़कर लगभग रोज़ ही .

किसी के बारे में सोचकर मूठ मारते हो या ऐसे ही ?

किसी को इमॅजिन करके .

मुझे बताओ. किसको इमॅजिन करते हो ?

कभी तुमको इमॅजिन करके , कभी किसी ओर को.

किसी ओर को ? ये दूसरी कौन है ?

है कोई. मैं तुम्हें नही बता सकता.

प्लीज़ समीर मुझे उसका नाम बताओ. मैं किसी को नही बताऊँगी . प्रॉमिस.

नही

अपनी बीवी से क्यूँ छुपा रहे हो ? बताओ ना प्लीज़.

तुम सिर्फ़ नाम की बीवी हो. करने तो कुछ देती नही.

जब तक तुम नाम नही बताओगे मैं तुम्हारा पीछा नही छोड़ूँगी. आख़िर ये मेरी सौतन कौन है ?

आयशा की मासूम सी बात पर समीर को ज़ोर से हँसी आ जाती है.

मैं अक्सर यासमीन के बारे में सोचकर मूठ मारता हूँ. समीर आयशा की आँखो में झांकते हुए बोला. उसने सोचा अब

आयशा भड़क जाएगी. लेकिन आयशा के चेहरे पर गुस्से के बजाए हैरानी और आश्चर्य के भाव थे .

यासमीन ???? तुम मम्मी को इमॅजिन करके मूठ मारते हो ?

हाँ , आयशा

तुमने मम्मी को कभी नंगी देखा है क्या ?
 
नंगी तो नहीं देखा. लेकिन मम्मी की चूचियां देखी हैं. एक बार वो नहाकर अपने बाल तौलिए से झटक रही थी .

उसने नीचे सलवार पहनी थी लेकिन ऊपर कुछ नही पहना था. तब मैंने उसकी दूध जैसी गोरी बड़ी बड़ी चूचियां

देखी थी.

तुम मूठ मारते समय मम्मी के बारे में क्या इमॅजिन करते हो समीर ?

मैं मम्मी की बड़ी बड़ी चूचियों को अपने मुँह में भर लेता हूँ. उसकी चूचियों के अेरोला के बीच में खड़े निपल को मुँह

में भरकर चूसता हूँ. फिर दोनो हाथों से मम्मी की चूचियों को खूब मसलता हूँ. उसके बाद..

उसके बाद, क्या समीर ? आयशा उत्तेजित होने लगी थी.

मेरे निपल को चूसने से मम्मी गीली हो जाती है. उसके बाद मैं मम्मी की चूत में जीभ डालकर चूत के अंदर से

निकलता चूत रस पी लेता हूँ. और मम्मी की क्लिट को जीभ से खूब छेड़ देता हूँ. और फिर

और फिर , क्या समीर ? आयशा से अब सब्र नही हो रहा , वो खुद भी गीली होने लगी .

फिर मैं मम्मी की चूत में अपना लंड डाल देता हूँ और उसे बुरी तरह से चोद देता हूँ.

समीर की फॅंटेसी सुनकर आयशा उत्तेजित हो गयी.

तुम मेरे साथ सेक्स करना चाहते हो , समीर ?

ये तो मेरे सपने के सच होने जैसा होगा. पर तुम मुझे सेक्स करने दोगी ?

आयशा ने मादक मुस्कान के साथ समीर की आँखो में देखा और फिर सर झुकाकर उसके खड़े लंड के सुपाड़े को चूम

लिया. फिर मुँह खोलकर लंड को मुँह में ले लिया. वो समीर को खुश करना चाहती थी. जितना हो सके उतना मुँह में

भरकर आयशा लंड चूसने लगी.

थोड़ी देर बाद समीर बोला, ओह आयशा , मैं झड़ने वाला हूँ. प्लीज़ थोड़ा तेज तेज चूसो .

आयशा लंड को तेज तेज चूसने लगी . उसे पता था की अब जल्दी ही समीर का वीर्य निकल जाएगा लेकिन उसने

लंड को मुँह से नही निकाला . आयशा वीर्य को अपने मुँह में ही निगलकर समीर को दिखाना चाहती थी की वो

उससे कितना प्यार करती है. कुछ समय के बाद उसे अपने मुँह में वीर्य की पहली धार महसूस हुई . वो लंड को

चूसते रही और लंड से वीर्य निकल निकलकर उसके गले में जाता रहा. जब वीर्य निकलना बंद हो गया तो आयशा ने

लंड को मुँह से बाहर निकाल लिया और नज़रें उठाकर समीर को देखा.

समीर ने आयशा के होठों पर अपने होठ रखकर एक गहरा चुंबन लिया. उसे आयशा के होठों में अपने ही वीर्य का

स्वाद आया.

आयशा ने अपना मुँह खोल दिया और दोनो की जीभ एक दूसरे से मिली. दोनो एक दूसरे को कुछ देर चूमते रहे.

थैंक यू आयशा.

मुझे थॅंक्स कहने की ज़रूरत नही समीर , भूल गये मैं तुम्हारी बीवी हूँ.

वो तो तुम मुझे खुश करने के लिए कह रही हो.

नहीं सच में समीर, मैं तुमसे ही शादी करना चाहती हूँ और मेरे बच्चे भी तुमसे ही होंगे.

मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ आयशा. लेकिन हम इस बारे में बाद में बात करेंगे. अभी मेरे कमरे में चलते हैं.

समीर ने आयशा का हाथ पकड़ा और दोनो ड्रॉयिंग रूम से समीर के बेडरूम में चले गये. बेडरूम में पहुँचकर समीर

ने आयशा को अपने आलिंगन में कस लिया और अपने होठ आयशा के रसीले होठों पर रख दिए. दोनो कुछ देर तक

चुंबन लेते रहे. फिर समीर ने अपने कपड़े उतारने शुरू किए और आयशा से भी कपड़े उतारने को कहा. कुछ पलों में

दोनो बिल्कुल नंगे एक दूसरे के सामने खड़े थे.

फिर समीर ने आयशा को बेड में लिटा दिया और आयशा की चूची के निपल को मुँह में भरकर चूसने लगा. ऐसे ही

दूसरी चूची की निप्पल को भी चूसा. फिर नीचे को खिसकते हुए आयशा की मुलायम चिकनी जाँघो को चूमने लगा.

कुछ देर तक दोनो जाँघो को चूमने के बाद आयशा की गीली हो चुकी चूत के होठों पर मुँह लगा दिया. और जीभ से

उसकी क्लिट को छेड़ दिया.

आयशा के मुँह से सिसकारी निकल गयी. और उसने अपनी गांड उपर को उछालकर समीर के मुँह पर एक झटका

दिया. आयशा की कुँवारी चूत को पहली बार किसी जीभ ने छुआ था.

अब अंदर डालो समीर. आयशा से अब देरी बर्दाश्त नही हो रही थी.

समीर ने अपने लंड के सुपाड़े को आयशा की कुँवारी चूत के छेद पर लगाया और बोला,आयशा शुरू में थोड़ा दर्द

होगा लेकिन बाद में तुम्हे मज़ा आएगा.

मैं अपना कुँवारापन तुमको सौंप रही हूँ. तुम दर्द की चिंता मत करो समीर . मैं सहन कर लूँगी.

समीर ने लंड से एक धक्का लगाया और सुपाड़ा अंदर घुस गया. आयशा की जैसे सांस ही रुक गयी. उसे ऐसा लगा की

लंड से उसकी हाइमेन फट गयी है. दर्द से उसकी आँखो से आँसू बहने लगे. उसके आँसू देखकर समीर रुक गया. समीर

को हिचकिचाते देखकर आयशा ने अपने नितंबों को उपर को झटका दिया और पूरा लंड आयशा की चूत में घुस गया.

कुछ देर तक वो दोनो ऐसे ही रुके रहे. फिर समीर ने धीरे धीरे स्ट्रोक लगाने शुरू किए.

देखो आयशा , ये मेरा पहला अनुभव है . मैं ज़्यादा देर तक रोक नही पाऊंगा .

तुम उसकी चिंता मत करो , सिर्फ़ मुझे चोदो .

आयशा के मुँह से ऐसे शब्द सुनकर समीर को जोश आ गया और वो चूत पर तेज तेज धक्के लगाने लगा. थोड़ी ही देर

बाद उसे लगा की वो अब झड़ने वाला है. आयशा मेरा वीर्य अब निकलने वाला है.

तुम सारा वीर्य मेरे अंदर ही डाल दो समीर.

कुछ पलों बाद समीर ने आयशा की चूत को अपने वीर्य से भर दिया. आयशा बहुत खुश थी. उसके शौहर ने आज

उसकी सील तोड़कर उसकी चूत में अपने बीज डाल दिए थे.

फिर समीर ने अपना लंड आयशा की चूत से बाहर निकाल लिया. लंड पर आयशा की चूत की हाइमेन फटने से खून

लगा हुआ था. आयशा ने भी लंड पर लगा खून देखा. फिर आयशा ने नीचे झुककर अपनी चूत को देखा उस पर भी

थोड़ा खून लगा हुआ था और नीचे बेड शीट पर खून का लाल धब्बा लग गया था. फिर दोनो ने एक दूसरे को देखा

और हॅसने लगे. दोनो भाई बहन ने पहली बार चुदाई का मज़ा लिया था. फिर दोनो ने बाथरूम जाकर नहाया और

बेडशीट को धो दिया.

आयशा तुम्हे तकलीफ़ हुई , शायद ज़्यादा मज़ा नही आया तुम्हे ?

पहली बार तो तकलीफ़ होनी ही थी. लेकिन मुझे इस बात की खुशी है की मैंने अपने शौहर को बहुत मज़ा दिया. मैं

अगली बार मज़े कर लूँगी.

आयशा तुम बार बार मुझे शौहर मत कहो. इससे तुम्हारी आदत बन जाएगी और लोगों को पता चल जाएगा.

मैं सिर्फ़ तुम्हारे सामने कहूँगी. और लोगों के सामने तो मैं ध्यान रखूँगी.

ठीक है. अब चलो थोड़ा बाहर घूम आयें .

नहीं , मेरी चूत में दर्द हो रहा है. मुझे आराम की ज़रूरत है. थोड़ी देर में मम्मी पापा भी शादी से वापस आ जाएँगे.

तो फिर ड्रॉयिंग रूम में टीवी देखते हैं , तुम वहीं सोफे पर लेटकर आराम भी कर लेना. और दोनो भाई बहन ड्रॉयिंग

रूम में टीवी देखने लगे.

समीर और आयशा के दिन मज़े में बीत रहे थे. घर में जब भी वो अकेले होते तो चुदाई कर लेते थे. और बाकी दिनों

में ओरल सेक्स से काम चला लेते थे.

एक दिन जब समीर आयशा के कमरे में गया तो वो बहुत चिंतित दिखाई दे रही थी.

क्या हुआ , इतनी परेशान क्यूँ हो ?

मेरे पीरियड लेट हो गये हैं . मुझे लगता है मैं प्रेग्नेंट हो गयी हूँ. अब हम क्या करें ?

तुम अपनी किसी फ्रेंड से पूछ लो.

नहीं, उससे तो बात फैल जाएगी.

किसी बहाने से पूछ लेना. अपने बारे में मत बताना.

उनको शक़ हो जाएगा कि ये प्रेग्नेन्सी के बारे में क्यूँ पूछ रही है.

फिर तो एक ही चारा है . तुम मम्मी से बात कर लो.

मम्मी तो मुझे मार ही डालेगी अगर उसे ये सब बातें पता चली तो.

मम्मी गुस्सा तो होगी लेकिन घर की बात घर में रहेगी. उसे मालूम होगा कि अब क्या करना है.

तो फिर मैं मम्मी को बता दूं ?

हाँ बता दो.

समीर ने कह तो दिया पर उसे खुद कोई आइडिया नही था कि उन दोनो भाई बहन के बीच हुए सेक्स के बारे में

जानकर यासमीन कैसे रियेक्ट करेगी.

अगले दिन स्कूल जाते समय आयशा ने सरदर्द का बहाना बना दिया और स्कूल ना जाकर अपने कमरे में ही रही.

कुछ समय बाद यासमीन उसके कमरे में आई. जब आयशा ने मम्मी को देखा तो वो डर से रोने लगी.

यासमीन ने आयशा को रोते देखा तो वो घबरा गयी. उसने सोचा आयशा के सर में तेज दर्द हो रहा है, सहन ना कर

पाने के कारण वो रो रही है.

यासमीन आयशा के पास बेड में बैठ गयी और उसके सर पर हाथ फेरती हुई बोली,रो क्यूँ रही हो ? क्या सरदर्द

बहुत तेज है.

आयशा ने आँसू भरी आँखो से यासमीन को देखा. फिर सर झुका लिया. यासमीन समझ गयी कुछ ना कुछ गड़बड़ है.

आयशा मुझे बताओ. क्या बात है ?

आयशा ने अपना मन कड़ा कर लिया. जो भी होगा देखा जाएगा वो मम्मी को सच सच बता देगी.

मम्मी मेरे पीरियड लेट हो गये हैं और मुझे लगता है कि मैं प्रेग्नेंट हूँ.

आयशा की बात सुनकर यासमीन अवाक रह गयी. उसकी 18 साल की लड़की कह रही थी कि मैं प्रेग्नेंट हूँ. थोड़े समय

तक उसका दिमाग़ सुन्न हो गया और वो कुछ बोल नही पाई. यासमीन ने आयशा का चेहरा देखा, वो रो रही थी

और बहुत मासूम और सुंदर लग रही थी. यासमीन सोचने लगी , ये ऐसा काम कैसे कर सकती है. फिर अपना

दिमाग़ दौड़ाने लगी. सबसे पहले तो प्रेगनेंसी को टर्मिनेट करने के लिए पिल्स देनी होंगी. इससे सवाल जवाब तो मैं

बाद में कर लूँगी.

फिर कुछ देर बाद उसने चुप्पी तोड़ी,देखो आयशा मैं तुम्हे एक गोली दूँगी जो उम्मीद है कि काम कर जाएगी.

लेकिन मुझे बहुत निराशा हुई है तुम्हारी इस हरकत से. और फिर कमरे से बाहर चली गयी.

कुछ देर बाद यासमीन एक गोली और एक ग्लास पानी आयशा को पिलाने के लिए ले आई.

अब मुझे सब कुछ सच सच बताओ, कुछ भी छुपाना नही.

मम्मी आप को सच्चाई पता चलेगी तो आप मुझे मार ही डालोगी .

नहीं मैं ऐसा कुछ नही करूँगी. जो होना था वो हो चुका है. अब उसको बदला तो नही जा सकता इसलिए तुम मुझे

सच सच बता दो कि कौन लड़का था जिसके साथ तुमने ये सब किया.

समीर

क्या ? समीर ? अब ये यासमीन के लिए दूसरा झटका था.

हाँ मम्मी, मेने समीर के साथ ये सब कुछ किया. और ये सब मेरी ही ग़लती थी क्यूंकी मैं उससे प्यार करती हूँ.

आयशा एक ही सांस में बोल गयी.

अब यासमीन का सर घूमने लगा. समीर ने अपनी ही बहन के साथ सेक्स किया और ये कह रही है कि मैं उससे प्यार

करती हूँ. यासमीन को कुछ समझ ही नही आया की वो क्या बोले. वो बस एकटक आयशा को देखती रही. आयशा

सर झुकाए बैठी रही. मम्मी से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नही थी.

यासमीन को एकदम चुप देखकर आयशा बोली, ओह मम्मी , आई आम सॉरी लेकिन प्लीज़ आप समीर से कुछ मत

कहना. हम दोनो भाई बहन एक दूसरे को इतना प्यार करते हैं कि हमको एक दूसरे के साथ सेक्स करने में कुछ भी

ग़लत नही लगा. अगर समीर मेरा भाई नही होता तो मैं उससे शादी कर लेती.

यासमीन कुछ नही बोली. सिर्फ़ गहरी साँसे लेती रही. उसका दिमाग़ काम नही कर रहा था.

फिर थोड़े शांत स्वर में बोली,जब समीर स्कूल से आ जाए तो मैं उससे बात करूँगी. और तुम अब थोड़ा आराम

करो.

तुम समीर को मारोगी तो नही ? पापा को बता तो नही दोगी ?

नहीं तुम्हारे पापा को कुछ भी पता नही चलना चाहिए. और तुम अब आराम करो. कहते हुए यासमीन अपने कमरे

में चले गयी.

अपने कमरे में आकर यासमीन बेड पर लेट गयी. खड़े होने की सामर्थ्य उसकी टाँगों में नही थी. यासमीन सोचने

लगी कि अब वो क्या करे. समीर और आयशा ने सेक्स का मज़ा ले लिया था और अब उनको रोक पाना मुश्किल था.

वो उनके कमरे के बाहर पहरा तो नही दे सकती थी.

सोचते सोचते यासमीन को अपने पुराने दिनों की याद आ गयी जब वो आयशा की उमर की थी.

यासमीन 18 साल की थी जब पहली बार उसने सेक्स का मज़ा लिया था. तब वो अपनी कज़िन लुबना के घर गयी

हुई थी. रात में उसकी नींद खुल गयी , कोई उसकी चूची दबा रहा था. खिड़की से आती हल्की रोशनी में यासमीन ने

देखा , लुबना बिल्कुल नंगी थी. और उसका एक हाथ यासमीन की चूचियों पर था. यासमीन की नींद खुलने पर

लुबना मुस्कुरायी और अपने होठ यासमीन के होठों पर रख दिए. यासमीन ने पहले कभी लुबना को नंगी नही देखा

था. उसे नंगी देखकर यासमीन को भी कुछ कुछ होने लगा.

चलो अब तुम भी कपड़े उतारो लुबना बोली और बिना कोई जवाब सुने खुद ही यासमीन के कपड़े उतारने लगी.

यासमीन ने लुबना का कोई विरोध नही किया. ये उसके लिए पहला अनुभव था और उसको भी उत्तेजना आ रही थी.

यासमीन ने अपने अलावा किसी और लड़की की चूत नही देखी थी और उसके सामने लुबना नंगी खड़ी थी. यासमीन

को नंगी करने के बाद दोनो बहनो ने एक दूसरे की चूत का निरीक्षण किया. फिर लुबना ने यासमीन की चूत पर

जीभ लगा दी और चाटने लगी.

यासमीन को पहली बार ऐसा मज़ा मिल रहा था जबकि लुबना पहले भी अपनी फ्रेंड्स के साथ मज़ा ले चुकी थी.

कुछ देर बाद यासमीन की चूत से रस बहने लगा और वो झड़ गयी. फिर लुबना लेट गयी और यासमीन से अपनी

चूत चाटने को कहा.

यासमीन ने भी वैसे ही लुबना की चूत चाटी और लुबना भी झड़ गयी.

उस घटना के कुछ महीने बाद ही यासमीन की फ़िरोज़ से शादी हो गयी जो उससे 10 साल बड़ा था. उन दोनो

बहनो का लेस्बियन अफेयर शादी के बाद भी चलता रहा और जब भी वो एक दूसरे के घर जाती तो सेक्स ज़रूर

करती थी.

यासमीन अब 37 साल की थी लेकिन खूबसूरत दिखती थी. वो सोचने लगी मेरी बेटी आयशा ना केवल दिखने में

बल्कि सेक्स करने में भी मेरी ट्रू कॉपी निकली. अंतर सिर्फ़ ये था की यासमीन ने अपनी बहन के साथ सेक्स किया था

और इसमे प्रेग्नेंट होने का कोई डर नही था. जबकि आयशा ने सगे भाई के साथ ही संबंध बना लिया था.

समीर के स्कूल से आने के बाद आयशा ने उसे सब बता दिया की मम्मी तुमसे बात करने वाली है. समीर के पूछने पर

आयशा ने बताया की मम्मी को बहुत शॉक लगा लेकिन उन्होने उसे ज़्यादा डांटा नहीं. और शांत मन से काम लिया.

कुछ देर बाद समीर अपने कमरे से बाहर आया और ड्रॉयिंग रूम में गया.

आपने मुझे बुलाया मम्मी ?

हाँ तुमसे कुछ बात करनी है. मेरे कमरे में चलो.

समीर यासमीन के पीछे पीछे उसके बेडरूम में चला गया. वो सोच रहा था ना जाने मम्मी उसको क्या कहेगी .

बेडरूम में पहुँचकर यासमीन ने दरवाज़ा बंद कर दिया और चिटकन लगा दी. यासमीन बेड पर बैठ गयी और समीर

से सामने रखी कुर्सी पर बैठने को कहा.

देखो समीर मैं तुम्हारी माँ हूँ और ये मेरी ज़िम्मेदारी है की सही ग़लत क्या है ये मैं तुम्हें बताऊँ. जो तुमने किया वो

बिल्कुल ग़लत किया.

लेकिन मैं आयशा से प्यार करता हूँ.

अगर तुम किसी से प्यार करते हो तो इसका मतलब ये नही की तुम उससे सेक्स करो. मैं जानती हूँ की तुम मुझसे

प्यार करते हो पर इसका ये मतलब नही की तुम मुझसे सेक्स करोगे. बोलने के बाद यासमीन को एहसास हुआ की

वो अपने बेटे से क्या बोल गयी है.

मम्मी मैं जानता हूँ की जो कुछ मैंने किया वो सब जानकर आप मुझे घर से बाहर निकाल सकती थी. पर आपने ऐसा

नही किया इसके लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ. हमारे समाज में ये संबंध अमान्य है. लेकिन मैं ये स्वीकार करना

चाहता हूँ की आयशा और मेरे बीच सेक्स को लेकर मुझे कोई गिल्टी फीलिंग नही है क्यूंकी मुझे इसमे कुछ भी ग़लत

नही लगता. जब हम दोनो एक दूसरे को प्यार करते हैं तो इसमे किसी को क्या परेशानी है.

यासमीन ने अपने बेटे को देखा. उसे लगा की उसका जवान बेटा अपने मन की भावनाओ को कितने बोल्ड तरीके से

उजागर कर रहा है. यासमीन को महसूस हुआ की उसकी चूत गीली होने लगी है. कहाँ तो उसने समीर को समझाने

को बुलाया था लेकिन अब तो उसे भी कुछ कुछ होने लगा था. यासमीन की सेक्स लाइफ शादी के 19 साल बाद

एक्टिव नही रह गयी थी. हालाँकि वो अब भी सिर्फ़ 37 साल की ही थी लेकिन अब फ़िरोज़ उसकी तरफ ध्यान नही

देता था और कभी कभार सेक्स कर लिया करता था.

यासमीन अपने मन में अपने जवान बेटे की तुलना उसके बाप से करने लगी. समीर में जवानी का जोश था , उसकी

बातों में उसके कॉन्फिडेन्स की झलक मिलती थी. वो अपनी मम्मी के सामने अपने मन की बात रखने में बिल्कुल भी

नही डरा था ना ही झिझका था. यासमीन के मन में अपने बेटे के लिए वासना उमड़ने लगी.

समीर ने यासमीन को ख़यालो में डूबे देखा. वो समझने का प्रयास करने लगा की मम्मी के दिमाग़ में क्या बातें चल

रही होंगी.

यासमीन ने समीर को अपनी तरफ कुछ कन्फ्यूज़ सा होकर देखते पाया, वो समीर को देखकर मुस्कुरायी.

समीर तुम बहुत बोल्ड हो. तुम्हें डर नही लगा मेरे सामने अपनी बात रखते हुए ?

फिर उसके जवाब का इंतज़ार किए बिना बोली, यहाँ आओ, मेरे पास.

समीर बेड में बैठी यासमीन के सामने जाकर खड़ा हो गया.

बिना किसी झिझक के यासमीन ने समीर की पैंट की ज़िप खोली और उसका लंड बाहर निकाल लिया. समीर को

ऐसा शॉक लगा की उसका लंड सिकुड गया.

यासमीन ने मुरझा चुके लंड को हाथ में पकड़ा और थोड़ा हिलाया. यासमीन के हाथ के स्पर्श से लंड बढ़ने लगा.

यासमीन ने मुस्कुराकर ऊपर समीर को देखा,तुम्हारा प्यारा सा लंड है.

समीर अभी भी सदमे में था पर उसे अपने लंड पर यासमीन के नरम हाथ का स्पर्श बहुत अच्छा लग रहा था.

यासमीन अपने हाथ से लंड को ऊपर नीचे करके मूठ मारने लगी. कुछ ही देर में लंड अपनी पूरी लंबाई का हो गया.

यासमीन उत्तेजना से काँपने लगी. उसकी पैंटी चूत रस से गीली हो गयी. फ़िरोज़ के 5 इंच के लंड की तुलना में उसके

बेटे का 7 इंच का लंड बहुत बड़ा लग रहा था. यासमीन सोचने लगी ये लंड फ़िरोज़ से लंबा भी है और मोटा भी.

यासमीन ने फ़िरोज़ के अलावा आजतक किसी और का लंड नही देखा था.

तुम्हें अच्छा लग रहा है, जो मैं कर रही हूँ ? लंड में मूठ मारते हुए यासमीन बोली.

हहाँ .. शरमाते और हकलाते हुए समीर बोला.

अपने डॉमैनेटिंग नेचर की वजह से वो आयशा से अपनी बात मनवा लेता था पर यहाँ पहल यासमीन ने कर दी थी.

वो समझ नही पा रहा था मम्मी के सामने कैसे रियेक्ट करे. कहाँ तो वो मम्मी से डांट खाने के लिए तैयार हो रहा

था और यहाँ जो हो रहा था उससे वो भौंचक्का रह गया था.

तभी यासमीन ने उसका पैंट उतारकर नीचे फर्श पर गिरा दिया. फिर उसने समीर की शर्ट की तरफ इशारा किया.

समीर ने ऊपर के दो बटन खोलकर सर से ऊपर शर्ट निकाल दी.

यासमीन ने अपने बेटे को नग्न देखा और जवान जिस्म को देखकर ममतामयी गर्व से मुस्कुरायी .

समीर की छाती पर हाथ फिराते हुए बोली,तुम अब वाक़ई जवान हो चुके हो समीर.

फिर समीर के खड़े लंड पर हाथ फिराती हुई बोली, तुम्हारा लंड भी शानदार है. फिर हाथ को नीचे खिसकाकर धीरे

से उसकी गोलियों को पकड़ा. अब मुझे पता चला की आयशा क्यूँ तुम पर फिदा है. एक औरत को खुश करने के लिए

तुम्हारे पास सब कुछ है.

अपनी मम्मी की कामुक बातों से निर्वस्त्र समीर का गला सूख गया. उसने मुश्किल से थूक निगला और यासमीन के

चेहरे को देखने लगा , ये सोचते हुए की अब मम्मी क्या करने वाली है.

क्या तुम मुझे बिना कपड़ो के देखना चाहते हो समीर ? जैसे तुम हो अभी , बिल्कुल नग्न.

समीर को अपने कानो पर विश्वास ही नही हुआ. यासमीन अपने बेटे को नंगा देख चुकी थी. उसे मालूम था की उसके

खूबसूरत बदन को समीर ज़रूर देखना चाहेगा. वो समीर को अपने बेटे की तरह नही बल्कि एक मर्द की तरह अपने

जिस्म से लुभाना चाह रही थी.

ज..ज़रूर देखना चाहूँगा.

उसको नंगी देखने के लिए समीर उतावला हो रहा है, ये देखकर यासमीन के होठों पर मुस्कुराहट आ गयी.

उसने अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए.

समीर ने अपने सामने नंगी खड़ी मम्मी को देखा. यासमीन की बड़ी बड़ी चूचियों पर उसकी नज़र गयी. फिर नीचे

नज़र पड़ी तो वहाँ काले घने बाल थे और उनके बीच चूत दिख रही थी.

कैसा लगा समीर ? जो तुमने देखा. यासमीन अपने बेटे के मुँह से अपने जिस्म की तारीफ सुनना चाह रही थी.

बहुत खूबसूरत मम्मी.

समीर अपनी मम्मी के पास बेड में बैठ गया. कुछ पल दोनो एक दूसरे को देखते रहे. फिर यासमीन ने समीर का सर

थोड़ा अपनी तरफ नीचे को झुकाया.

समीर समझ गया , उसने अपना मुँह मम्मी की चूचियों पर लगा दिया. और निपल को मुँह में भरकर चूसने लगा.

चूचियों को हाथ से दबाकर , दोनो निपल्स को बारी बारी से चूसता रहा. बेटे के निपल चूसने से मम्मी की उत्तेजना

बढ़ती जा रही थी.

उसने हाथ बढ़ाकर समीर का लंड पकड़ लिया और ऊपर नीचे हिलाने लगी. जब समीर ने मम्मी की चूचियों से मुँह

हटाया तो मम्मी ने झुककर उसके सुपाड़े की टिप से निकलते प्रिकम को जीभ लगाकर चाट लिया. फिर लंड अपने

मुँह में ले लिया और चूसने लगी. कुछ देर बाद उसे एहसास हो गया की उसका बेटा अब झड़ने वाला है.

मैं चाहती हूँ की तुम मेरे मुँह में ही गिरा दो कहते हुए मम्मी तेज़ी से लंड चूसने लगी. समीर ज़्यादा देर तक रोक

नही पाया और उसने अपनी मम्मी के गले को वीर्य से भर दिया. मम्मी वीर्य की अंतिम बूँद निकलने तक लंड चूसते

रही और सारा वीर्य खुशी खुशी निगल गयी.

जब समीर का लंड सिकुड गया तो मम्मी ने उसे मुँह से बाहर निकाल लिया.

तुम्हें अच्छा लगा समीर ? अपना चेहरा ऊपर करते हुए मम्मी बोली.

समीर ने मम्मी को आलिंगन में भरकर उसके रसीले होठों पर अपने होंठ रख दिए और उन्हे चूमकर बोला,बहुत

अच्छा, मम्मी ! आपको भी मज़ा आया ?

माँ बेटे का ये पहला होठों पर चुंबन था.

हाँ , मज़ा आया मम्मी ने जवाब दिया.

थोड़ी देर तक दोनो एक दूसरे के होठों को चूमते रहे. फिर समीर ने अपने होंठ मम्मी के होठों से अलग किए. अब

उसकी नज़रें मम्मी के पेट के नीचे पड़ी.

समीर ने अपना हाथ मम्मी की नंगी जाँघो पर रख दिया. अपनी जाँघो पर बेटे के हाथ के स्पर्श से यासमीन सिहर

उठी.

कामोत्तेजना से उसकी चूत से रस बहने लगा. जांघों पर हाथ फिराते हुए समीर ने हाथ आगे को बढ़ाया और चूत के

ऊपर के घने काले बालों को छुआ. चूतरस से बाल भीगे हुए थे.

मम्मी ने अपनी टाँगे थोड़ी खोल दी और उसकी चूत के गीले होठों को समीर की उंगली का स्पर्श हुआ.

मम्मी, मैं आपकी चूत देखना चाहता हूँ समीर चूत के ऊपर उंगली फिराता हुआ बोला.

यासमीन बेड पर पीछे को लेट गयी और अपनी टाँगे फैला दी. समीर उसकी टांगों के बीच फर्श पर पंजो के बल बैठ

गया. और दोनो हाथ से चूत के होठों को फैलाकर अंदर से मम्मी की गुलाबी चूत को देखने लगा. फिर मुँह आगे ले

जाकर क्लिट को जीभ से छेड़ने लगा. अपनी क्लिट पर बेटे की जीभ का स्पर्श पाते ही यासमीन ने उत्तेजना से अपने

मोटे नितंब ऊपर को उछालकर समीर के मुँह पर झटका दिया. मम्मी के रिएक्शन से समीर का जोश बढ़ गया.

समीर चूत के अंदर जीभ घुसाकर मम्मी की गीली चूत से चूतरस चाटने लगा. यासमीन ने अपनी बहन लुबना के

साथ चूत चाटने का मज़ा लिया था. लेकिन उसका बेटा उसकी चूत चाट रहा था , ये बहुत ही उत्तेजित कर देने वाला

एहसास था. उसके मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगी.

मम्मी का बेडरूम आहहहह.ओहहह.उन्न्नननगगग की आवाज़ों से गूंजने लगा. कुछ ही देर में मम्मी को जबरदस्त

ओर्गास्मआ गया . अपने बेटे के सर को अपनी चूत में दबाते हुए वो सिसकारियाँ लेते हुए झड़ गयी.

उसने समीर का मुँह चूतरस से भर दिया. ऐसा ओर्गास्म यासमीन को कबसे नही आया था. उसका जिस्म शांत पड़

गया और वो बेड पर लेटी हुई गहरी साँसे लेने लगी.

जब उसकी मदहोशी टूटी तो वो बेड पर उठ बैठी . उसने समीर को अपनी टाँगों के बीच फर्श पर बैठकर मुस्कुराते

हुए पाया.

अपनी मम्मी को जबरदस्त ओर्गास्म दिलाकर समीर गर्व महसूस कर रहा था.

बेटे को मुस्कुराते देखकर एक पल के लिए मम्मी शरमाई . फिर उसने समीर के सर को पकड़कर , अपना चेहरा आगे

बढ़ाकर समीर के होठों को चूम लिया. बेटे के होठों से उसको अपने ही चूतरस का स्वाद आया.

फिर चुंबन ख़तम करके समीर उठ खड़ा हुआ. मम्मी समझ गयी और अपनी टाँगे उठाकर बेड पर सीधी लेट गयी.

समीर बेड पर मम्मी की टाँगों के बीच आ गया. अपने तने हुए लंड को मम्मी की चूत के फूले हुए होठों के बीच

फंसाकर समीर ने एक झटका मारा और पूरी तरह से चूतरस से गीली चूत में सुपाड़ा अंदर घुसता चला गया. एक दो

धक्कों के बाद लंड जड़ तक मम्मी की चूत में घुस चुका था. यासमीन की चूत में फ़िरोज़ के 5 इंच के लंड के सिवाय

कोई और लंड नही घुसा था. बेटे के 7 इंच के लंड से मम्मी की चूत की दीवारें पूरी तरह स्ट्रेच हो गयी. लंड के पूरी

तरह अंदर घुसने के बाद समीर ने मम्मी की चूत में धक्के लगाने शुरू किए. मम्मी ने अपनी टाँगे बेटे की कमर के इर्द

गिर्द लपेट दी. समीर अब मम्मी की चूत पर ताबड़तोड़ धक्के मारने लगा. मम्मी का पूरा बदन धक्कों से हिलने लगा

और उसकी चूचियां आगे पीछे को हिलने लगी. समीर आगे को झुककर मम्मी की चूचियां चूसते हुए उसे चोदते रहा.

मम्मी की आनंद से भरी सिसकारियाँ कमरे में गूंजने लगी .अहहहह..ओहहह.उन्न्ननगगगघह.

समीर के बड़े लंड से मम्मी की चूत की रगड़कर चुदाई हो रही थी. कुछ देर बाद मम्मी का बदन अकड़ गया और

उसको दूसरा ओर्गास्मआ गया . मम्मी की चूत से रस निकल निकल कर बहने लगा. मम्मी को झड़ते देखकर समीर

भी तेज तेज धक्के लगाते हुए झड़ गया और मम्मी की चूत बेटे के वीर्य से भर गयी. झड़ने के बाद समीर मम्मी के

बदन के ऊपर ही लेट गया.

दोनो माँ बेटे कुछ देर तक ऐसे ही पड़े गहरी साँसे लेते रहे.

फिर एक हाथ से मम्मी की चूची को दबाते हुए समीर ने मम्मी के होंठ चूम लिये और बोला,आप आयशा को हमारे

बारे में बता दोगी ?

हाँ , लेकिन तुम कुछ मत बताना. मैं उसे खुद बताऊँगी.

फिर बोली, अब तुम जाओ . तुम्हारे पापा आते होंगे. मैं नही चाहती हूँ की उनको कोई शक़ हो.

समीर मम्मी के बदन से उठा और अपने कपड़े पहनने लगा.

तुम्हारे स्कूल की छुट्टियाँ कब से हैं ?

अगले सनडे से.

तुम्हारे पापा 2 महीने की ट्रेनिंग के लिए अगले हफ्ते बाहर जा रहे हैं. अगले मंडे से हम कुछ भी करने के लिए फ्री

हैं. कपड़े पहनती हुई , बेटे की ओर देखकर शरारत से मुस्कुराती हुई यासमीन बोली.

खुशखबरी सुनकर समीर के होठों पर भी मुस्कान आ गयी. लेकिन तुम एक हफ्ते तक आयशा से दूर ही रहना. समझे

?

हाँ ठीक है. मैं अगले मंडे का इंतज़ार करूँगा. कहते हुए समीर मम्मी के बेडरूम से बाहर चला गया.

यासमीन के चेहरे पर कामतृप्ति की चमक थी. उसकी डल सेक्स लाइफ में नया एक्साइट्मेंट आ चुका था.

अपने बेडरूम में बैठी हुई यासमीन अगले मंडे से आने वाले खुशनूमा दिनों के बारे में सोचने लगी.

यासमीन का पति फ़िरोज़ सैटरडे को ही 2 महीने की ट्रेनिंग पर चला गया. समीर और आयशा स्कूल गये हुए थे.

यासमीन ड्रॉयिंग रूम में सोफे पर बैठकर टीवी देखने लगी.

टीवी देखते हुए वो एक हफ्ते पहले हुई घटना के बारे में सोचने लगी की कैसे उसने अपने ही बेटे के साथ सेक्स

सम्बन्ध बना लिए थे. लेकिन उसको अपने ऊपर ही आश्चर्य हो रहा था की उसे इस बात का ज़रा भी अफ़सोस नही

था. बल्कि अपने बेटे के लंड की याद आते ही उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी और उसको अपनी पैंटी गीली होती महसूस

हुई. उसके होठों पर हल्की मुस्कुराहट आ गयी की कैसे उसने समीर के लंड को चूसा था और सारा वीर्य निगल गयी

थी. यासमीन ने आँखे बंद करके दुबारा उन पलों को याद किया जब उसके बेटे के लंड को अड्जस्ट करने के लिए

उसकी चूत फैल गयी थी. समीर के उसकी चूत पर पड़ते धक्के और फिर मम्मी की चूत को बेटे ने अपने गाड़े वीर्य से

भर दिया थायासमीन से अब रहा नही गया वो अपनी पैंटी में हाथ डालकर तेज तेज उंगलियाँ चलाने लगी .थोड़ी

देर बाद उसका बदन अकड़ गया और वो झड़ गयी और आँखे बंद किए सोफे पर वैसे ही लेटी रही.

दिन बहुत धीरे धीरे बीत रहा था. यासमीन समीर और आयशा के घर आने का इंतज़ार करने लगी.

स्कूल से आकर आयशा ने मम्मी को किचन में देखा. आयशा अभी भी यासमीन से झिझक और शर्मा रही थी. वो

सीधे अपने कमरे में चली गयी. बाथरूम में जाकर उसने नहाया फिर कपड़े बदलकर सलवार कमीज़ पहन ली.

यासमीन ने गौर किया की आयशा उस दिन के बाद से उससे शर्मा रही है और कुछ बोल नही रही , सिर्फ़ हाँ हूँ में

जवाब दे रही है.

यासमीन ने आयशा को नहाकर बाथरूम से बाहर आते देखा. आयशा इधर आओ, मेरे पास बैठो.

आयशा आई और सर झुकाकर मम्मी के बगल में बैठ गयी.

मम्मी, आप अभी भी मुझे नाराज़ हो ?

नही आयशा. मैं तुमसे नाराज़ नही हूँ. लेकिन तुमने सोचा उस बारे में ?

हाँ मम्मी. लेकिन मुझे कुछ भी ग़लत नही लगा. मैं समीर से प्यार करती हूँ. और ये कहते हुए आयशा रोने लगी.

रो क्यूँ रही हो. मैं तुम्हारी फीलिंग्स समझती हूँ. मुझे ऐसा लग रहा है की तुम समीर से बहुत प्यार करती हो.

फिर कुछ देर रुककर बोली,वैसे सच कहूँ तो अब मुझे इस बात का अफ़सोस नही है, जो तुमने किया अपने भाई के

साथ.

आयशा रोना बंद करके आँसू भरी आँखो से हैरानी से मम्मी का मुँह देखने लगी. मेरे कानो ने सही सुना या ये मेरा

वहम है ?

क्या मतलब मम्मी ?

मतलब ये की मैं तुम दोनो को नही रोकूंगी लेकिन तुम्हें ध्यान रखना होगा की कहीं फिर से प्रेग्नेंट ना हो जाओ. सेक्स

का मतलब सिर्फ़ एक दूसरे से मज़े लेना नही है. इसके साथ बहुत सी और बातें भी जुड़ी रहती हैं , जिनका ख़याल

रखना पड़ता है. समझी ? वरना फिर रोते हुए मेरे पास आओगी.

आयशा ने सहमति में सर हिलाया. यासमीन को अपनी रोती हुई बेटी पर प्यार आ गया. उसने आयशा को आलिंगन

करके उसके माथे को चूम लिया और अपने हाथों से उसके आँसू पोंछ दिए.

चलो अब मुस्कुराओ. जब तक तुम्हारे पापा नही आ जाते हम मिलकर मज़े करेंगे.

हम ?? आयशा ने हैरानी से पूछा.

हाँ हम. तुम ये क्यूँ सोचती हो की टाँगे फैलानी सिर्फ़ तुम्हें आती हैं. मैं भी अभी जवान ही हूँ.

आयशा की कुछ समझ नही आया, ये आज मम्मी कैसी बातें कर रही है.

तुम्हें एक राज की बात बताऊँ, समीर का मैंने भी चूसा.

क्या ? आपका मतलब आपने समीर का लंड चूसा ? आयशा सन्न रह गयी.

हाँ . और मेरे मुँह में ही गिरा दिया उसने. मुस्कुराते हुए यासमीन बोली.

कब ? कब किया ये आपने ? आयशा को अभी भी विश्वास नही हो रहा था.

पिछले हफ्ते, जब मैंने उसे अपने बेडरूम में बुलाया था, तुम दोनो के कारनामे के बारे में बात करने के लिए. मैं अपने

ऊपर काबू नही रख पाई.

फिर कुछ रुककर बोली, मुझे भी सेक्स की ज़रूरत थी क्यूंकी तुम्हारे पापा कुछ करते ही नही.

उसने आपके साथ सेक्स भी किया ?

हाँ , एक बार शुरू हुए तो फिर कहाँ रुकते.

आयशा अपनी मम्मी की बातें सुनकर उत्तेजित होने लगी. समीर ने अपनी मम्मी के साथ सेक्स किया ये सुनकर

उसकी पैंटी गीली हो गयी.

आपने नीचे शेविंग की है या नही ? समीर को क्लीन शेव पसंद है.

ये समीर ही बताएगा उसे मुझमें क्या पसंद है क्या नही. अभी तुम मेरे बेडरूम में चलो. मेरे पास तुम्हारे लिए एक

सरप्राइज है.

यासमीन आयशा को अपने बेडरूम ले गयी और वहाँ अपने वॉर्डरोब से एक सुंदर सी वेडिंग ड्रेस निकाली.

देखो आयशा , मैं तुम्हारे लिए ये गिफ्ट लाई हूँ. तुम इसे समीर के लिए पहनोगी. चलो पहन के दिखाओ .

आयशा गिफ्ट देखकर खुश हो गयी. ड्रेस पहनने के लिए उसने अपनी कमीज़ उतारी. कमीज़ के अंदर उसने ब्लैक ब्रा

पहनी हुई थी. यासमीन ने अपनी बेटी की जवान चूचियां देखी. उसको ब्रा कुछ टाइट लगी.

आयशा ये ब्रा तो तुम पर टाइट लग रही है . दूसरा साइज़ लेना पड़ेगा.

हाँ कुछ समय से मेरी ब्रा टाइट हो गयी हैं.

इसको उतारो ज़रा. मुझे दो.

आयशा शर्मा गयी. फिर उसने हुक खोलकर ब्रा उतार दी और मम्मी को दे दी.

यासमीन ने ब्रा का साइज़ देखा . अब इससे बड़ा साइज़ लाना होगा.

आयशा की नंगी चूचियां खुली हवा में सांस ले रही थी. उसको देखकर यासमीन को अपनी बहन लुबना की याद आ

गयी. इतनी ही उमर की तो थी तब हम दोनो भी, वो सोचने लगी.

यासमीन ने आगे हाथ बढ़ाकर आयशा की चूचियों को छुआ. मम्मी के हाथ लगाने से आयशा के निप्पल कड़े होकर

तन गये.

यासमीन ने निपल को कड़े होते देखा तो वो मुस्कुराने लगी. फिर यासमीन ने सर झुकाकर एक निपल को मुँह में भर

लिया और जीभ लगाकर चूस लिया. आयशा अवाक रह गयी. यासमीन ने आयशा को टेन्स होते देखा. आयशा को

अपनी मम्मी और लुबना आंटी के लेस्बियन संबंधों का पता नही था. तुम बहुत खूबसूरत हो आयशा. मैं तो बस

तुम्हारी मिठास चख रही थी. यासमीन बोली और फिर खिलखिला पड़ी.

मम्मी के हॅसने से आयशा भी रिलैक्स हो गयी. उसकी नज़र अपनी मम्मी की कमीज़ के भीतर बड़ी बड़ी चूचियों पर

पड़ी. उसने ख़याल किया मम्मी ने ब्रा नही पहनी है. यासमीन ने अपनी बेटी की नज़रें अपनी छाती पर देखी. उसने

अपनी कमीज़ के सिरे पकड़े और सर के ऊपर से कमीज़ निकाल दी.

आयशा ने देखा उसकी मम्मी की चूचियां उसकी तरह सुडौल तो नही है लेकिन बड़ी बड़ी हैं. और निपल भी बड़े हैं.

आयशा ने मम्मी की चूचियों को हाथ से छुआ और थोड़ा सा दबाया. यासमीन ने आयशा का सर पकड़ा और अपनी

चूचियों पर उसका मुँह लगा दिया.

फिर धीरे से फुसफुसाई, चूसो इन्हे आयशा.

आयशा ने एक एक करके दोनो चूचियों के निपल मुँह में लेकर चूसे. आयशा के निपल चूसने से यासमीन की चूत

गीली हो गयी. उसने एक हाथ अपने सलवार के ऊपर से चूत पर लगाया और उसे रगड़ने लगी. निपल चूसते हुए

आयशा ने मम्मी को अपनी चूत रगड़ते देखा. उसने निपल छोड़कर मम्मी के सलवार का नाड़ा खोल दिया और

सलवार पैंटी के साथ पकड़कर पैरो से उतार दिया.

यासमीन के बदन में उत्तेजना से आग लगी हुई थी. आयशा ने मम्मी की बालों से ढकी हुई चूत देखी. ये पहला मौका

था जब उसने अपने अलावा किसी और की चूत देखी थी. उसने मम्मी की चूत के बालों पर हाथ फिराया और चूत के

होठों को छुआ जो चूतरस बहने से गीले हो चुके थे. फिर वो मम्मी की टाँगों के सामने बैठ गयी और चूत के होठों को

हल्का सा किस किया.

फिर जीभ लगाकर होठों को चाट लिया. यासमीन की चूत के इतने ज़्यादा गीलेपन से उसे हैरानी हुई. बेटी के चूत

को चाटने से यासमीन का और ज़्यादा चूतरस निकालने लगा. और उसकी क्लिट भी फूल गयी. कामोत्तेजना से

यासमीन ने आयशा के सर के बाल पकड़ कर उसका मुंह अपनी चूत से सटा दिया.

कुछ देर बाद आयशा उठ खड़ी हुई और मम्मी के होठों का चुम्बन ले लिया. ये कोई माँ बेटी का चुंबन नही था. ये

उत्तेजना से काँपती, दो औरतों का काम चुंबन था. दोनो ने एक दूसरे के लवर की तरह से होठों को चूमा.

फिर यासमीन ने आयशा की सलवार का नाड़ा खोलकर उसकी सलवार और पैंटी उतार दी. आयशा की चूत क्लीन

शेव्ड थी जो गीली होने से चमक रही थी. यासमीन बेड पर लेट गयी और आयशा से भी बेड पर आने को कहा. बेड

पर आने के बाद 69 की पोज़ में आकर आयशा ने मम्मी की चूत के होठों को फैलाकर अपनी जीभ अंदर डाल दी.

उसे कुछ नमकीन सा स्वाद आया.

यासमीन ने अपने मुँह पर आयशा की चूत रखकर अपनी जीभ अंदर डाल दी. आयशा आनंद से भर उठी. उसकी

मम्मी की जीभ उसकी चूत में गुदगुदी कर रही थी. कुछ देर तक दोनो माँ बेटी इसी तरह एक दूसरे की चूत चाटती

रही. फिर यासमीन को आयशा के बदन में कुछ अकड़न महसूस हुई. वो और तेज़ी से जीभ चलाने लगी, उसको

अपना भी ओर्गास्म आने को हो रहा था. कुछ देर बाद दोनो ने एक दूसरे के मुँह को चूतरस से भर दिया. और वो

दोनो झड़ गयी. कुछ देर तक ऐसे ही लेटे रहने के बाद दोनो अलग हुई.

यासमीन बोली, ये तुम्हारा पहला अनुभव था ना ?

हाँ और आपका ?

मैंने तो पहले भी कई बार किया है, तुम्हारी लुबना आंटी के साथ. लेकिन तुम्हारे साथ कुछ ज़्यादा ही मज़ा आया.

शायद इसलिए की तुम मेरी अपनी बेटी हो.

फिर बोली,चलो अब बाथरूम में जाकर साफ़ कर लेते हैं. फिर तुम्हें अपनी ड्रेस भी तो पहन कर दिखानी है. आज

रात के सेलिब्रेशन के लिए अभी हमें बहुत सा काम करना बाकी है.

*****

समीर स्कूल से आकर अपने रूम में सो गया था. सोकर उठने के बाद उसने बाथरूम में हाथ-मुँह धोया और ड्रॉयिंग

रूम में आया. वहाँ कोई नही था. आया ने बताया की आयशा और उसकी मम्मी शॉपिंग के लिए गये हुए हैं. थोड़ी देर

बाद माँ बेटी मार्केट से वापस आ गयीं. दोनों बहुत खुश लग रही थीं लेकिन समीर को उन्होने कुछ नही बताया.

डिनर के बाद यासमीन ने दोनों से अपने बेडरूम में आने को कहा.

समीर तुम्हें मालूम है आयशा की शादी होने वाली है ?

समीर आश्चर्य से उन दोनों का मुँह देखने लगा.

ये कैसे हो सकता है ? किससे हो रही है ?

बेवकूफ़ तुमसे हो रही है . आयशा आज रात को तुमसे शादी करने वाली है. असली शादी नही लेकिन तुम उसके बाद

एक दूसरे को एन्जॉय कर सकते हो.

समीर मम्मी की बात सुनकर मुस्कुराया. उसने आयशा को देखा , आयशा सचमुच की दुल्हन की तरह शरमा गयी.

ठीक है अब तुम दोनों अपने अपने कमरे में जाओ और एक घंटे में तैयार होकर आओ. समीर तुम ये नया सूट ले जाओ

और इसे ही पहनकर आना. आयशा तुम भी अपनी वेडिंग ड्रेस पहन लो. और हाँ, ये शादी जल्दबाज़ी में हो रही है

इसलिए मैं किसी मेहमान को नही बुला पाई.

मम्मी के जोक पर तीनों खुलकर हँसे. और फिर आयशा और समीर अपने अपने कमरे में तैयार होने चले गये.

सूट पहनकर समीर ड्रॉयिंग रूम में आया तो वहाँ देखा यासमीन भी नये सूट में सज धज के बैठी थी. बेटे को देखकर

बोली,तुम बहुत अच्छे दिख रहे हो समीर. और फिर समीर के होठों में होंठ लगाकर एक चुंबन ले लिया.

तभी वहाँ आयशा भी अपनी लाल रंग की वेडिंग ड्रेस में आ गयी. उसने थोड़ी ज्वेलरी भी पहन रखी थी. आयशा

बहुत खूबसूरत लग रही थी. उसके चेहरे पर एक शर्मीली सी मुस्कुराहट थी.

यासमीन ने आयशा के गालों का चुंबन लिया. और समीर के बगल में सोफे पर बैठा दिया. फिर एक अंगूठी समीर को

देते हुए बोली, ये अंगूठी मेरी बहू के लिए थी पर मेरी बेटी ही इसे पहन रही है. समीर ये अंगूठी आयशा को

पहनाओ.

समीर ने आयशा का कोमल हाथ पकड़ा और अंगूठी उसकी उँगुली में पहना दी. यासमीन ने दोनों के गालों का चुंबन

ले लिया.

अब तुम दोनों समीर के कमरे में जाओ और एन्जॉय करो.

मम्मी आप भी हमारे साथ आओ. क्यूँ आयशा ठीक है ना ?

हाँ मम्मी , आप भी आओ.

देखो आज तुम्हारी स्पेशल नाइट है. मैं तुमको डिस्टर्ब नही करना चाहती.

फिर वो तीनों समीर के बेडरूम में चले गये. रूम में जाने के बाद कुछ देर तक तीनों चुपचाप बैठे रहे क्यूंकी किसी की

समझ में नही आ रहा था की अब क्या करना है.

फिर समीर ने चुप्पी तोड़ी और आयशा के नज़दीक़ बैठकर उसके होठों का चुंबन ले लिया. आयशा ने अपने होंठ खोल

दिए और समीर की जीभ को अपने मुँह में अंदर आने दिया. थोड़ी देर तक दोनों एक दूसरे को चूमते रहे. अपनी

मम्मी के सामने आयशा को चूमने में समीर को ज़्यादा उत्तेजना महसूस हो रही थी. वो अपनी मम्मी को देखते हुए

आयशा के रसीले होंठ चूमता रहा.

कुछ देर बाद दोनों अलग हुए और अपने कपड़े उतारने लगे. दोनों भाई बहन ने कपड़े उतारकर नंगे होने के बाद

मम्मी की ओर देखा.

चलो तुम दोनों मज़े करो, सुबह मिलते हैं कहकर मम्मी उठी और कमरे से बाहर चली गयी.

समीर ने अपनी बहन को गोद में उठाया और बेड पर लिटा दिया. फिर अपने होंठ आयशा के रसीले होठों पर रख

दिए. दोनों चुंबन लेने लगे और हाथों से एक दूसरे के बदन को फील करने लगे. समीर ने अपने दोनों हाथों में आयशा

के नरम नितंबों को पकड़ कर दबा दिया. आयशा ने समीर की पीठ पर हाथ फिराते हुए उसके खड़े लंड को अपने नंगे

बदन पर महसूस किया. उसने लंड को अपने हाथ में पकड़ लिया और ऊपर नीचे हिलाने लगी.

फिर समीर आयशा की टाँगों के बीच आ गया और आयशा की चूत के होठों का चुंबन लिया. फिर उसने क्लिट को

जीभ से छेड़ा और चूत के अंदर जीभ डाल दी. आयशा के मुँह से सिसकारी निकल गयी और उसने अपनी टाँगे थोड़ी

और फैला दी.

आयशा की चूत में जीभ घुमाते हुए समीर ने गीलापन महसूस किया. उत्तेजना से आयशा ने समीर के सर को अपनी

चूत में दबा दिया और अपने नितंबों को ऊपर उछालकर चूत से समीर के मुँह पर धक्का दे दिया और ज़ोर ज़ोर से

सिसकारियाँ लेने लगी. आहहऊओहउन्न्नफफफफफफफफ्फ़.

समीर ने आयशा के दोनों नितंबों को कसकर पकड़ लिया और चूत में तेज़ी से जीभ चलाने लगा. आयशा के बर्दाश्त

से बाहर हो गया वो अपने नितंबों को झटककर अपनी चूत से जीभ हटाने की कोशिश करने लगी. लेकिन समीर ने

उन्हे कसकर पकड़ा हुआ था. कुछ पलों बाद आयशा को जबरदस्त ओर्गास्म आ गया और समीर के मुँह को अपने

चूतरस से भरते हुए उसका बदन अकड़ गया और वो झड़ गयी. फिर उसने समीर के सर को पकड़कर अपनी चूत से

उसका मुँह हटा दिया. और अपनी बांहें फैलाकर ऊपर आने का इशारा किया. समीर अपनी बहन की बाहों में आ

गया और दोनों एक बार फिर से एक दूसरे का चुंबन लेने लगे. आयशा की आँखें ओर्गास्म के आनंद से बंद थी.

कुछ देर बाद उसने अपनी आँखें खोली और बोली, समीर मुझे इतना तेज ओर्गास्म आया. कितना ज़्यादा मज़ा आया

मुझे. लेकिन अगर मैं तुम्हें हटाती नही तो मैं मर ही जाती. आई लव यू सो मच समीर.

थोड़ी देर तक दोनों एक दूसरे की बाँहों में लेटे रहे. आयशा अपनी गर्दन उठाकर समीर का चुंबन लेती रही.

आयशा तुम मेरे लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हो. मैं भी तुम्हें उतना ही प्यार करता हूँ जितना तुम मुझसे

करती हो.

मैं जानती हूँ समीर, ये मैंने महसूस किया है.

ओह आयशा , हम भाई बहन क्यूँ हुए ? तुम्हें मालूम नही तुम्हारी खूबसूरती मेरे ऊपर क्या कयामत ढाती है. जी

चाहता है तुम्हें चूमकर ऐसे ही तुम्हारा मीठा रस पीते रहूं.

समीर की बात से आयशा की आँखों में प्यार के आँसू आ गये.

समीर मैंने तुम्हें अपना कुंवारापन सौंप दिया, इससे ज़्यादा मैं तुम्हें क्या दे सकती हूँ मेरे प्यारे भाई. अब मुझे और

ज़्यादा इंतज़ार मत करवाओ. मुझसे प्यार करो समीर.

समीर ने अपनी बहन की आँसुओं से भरी आँखों को चूम लिया. उन आँखों में उसे सच्चा प्यार दिखा. आयशा सिर्फ़ और

सिर्फ़ अपने भाई से प्यार करती थी. उन दोनों भाई बहन के प्यार में कोई वासना नही थी. वो एक दूसरे से सच्चा

प्यार करते थे.

दोनों ने एक दूसरे की आँखों में झाँका. फिर समीर ने झुककर एक बार फिर आयशा के होठों का चुंबन ले लिया.

फिर समीर ने आयशा की चूचियों को हाथ से सहलाया और निपल को मुँह में ले लिया और बारी बारी से दोनों

निपल्स को चूसने लगा . आयशा प्यार से समीर के बालों को सहलाने लगी और हल्की हल्की सिसकारियाँ लेने लगी.

फिर आयशा ने हाथ बढ़ाकर समीर का लंड पकड़ लिया और उसे हिलाने लगी.

समीर अपना प्यार दो मुझे. अब और देर मत करो.

फिर अपनी टाँगें थोड़ी फैलाकर आयशा लंड को अपनी चूत के होठों पर रगड़ने लगी. और अपनी चूतरस से सुपाड़े

को गीला कर दिया. फिर आयशा ने लंड को अपनी चूत के छेद में लगा दिया. समीर ने एक धक्का लगाया और सुपाड़ा

गीली चूत के अंदर घुसता चला गया. आयशा की टाइट पर गरम चूत ने फैलकर सुपाड़े को अंदर आने दिया. फिर

धीरे धीरे पूरा लंड आयशा की चूत में घुस गया.

थोड़ा रूको समीर. अभी हिलो मत , ऐसे ही रहो. लंड पूरा घुसने के बाद दर्द से कराहती हुई आयशा बोली.

आयशा की टाइट चूत ने समीर के लंड को जकड़ रखा था.

कुछ पल ऐसे ही रहने के बाद आयशा मुस्कुरायी और बोली, भाई, मैं तुमको अपने अंदर महसूस कर रही हूँ. मुझे

बहुत अच्छा लग रहा है. क्या तुम्हें भी उतना ही अच्छा लग रहा है ?

हाँ आयशा मेरे प्यारी बहन, तुम्हारी टाइट चूत ने मेरे लंड को बुरी तरह से जकड़ रखा है. मुझे भी बहुत अच्छा लग

रहा है.

तो ठीक है फिर, अब शुरू करो भाई. मैं तुमसे गंदी बातें बोलना चाहती हूँ समीर. मेरी चूत को अपने वीर्य से भर दो.

चोदो मुझे समीर . चोदो अपनी बीवी को.

आयशा की कामुक बातों से समीर का जोश दोगुना हो गया. उसने अपने लंड को आधा बाहर निकाला और फिर

अंदर घुसा दिया. आयशा ने ज़ोर से सिसकारी ली. समीर ने चूत पर धक्के लगाने शुरू कर दिए. आयशा का जवान

जिस्म अपने भाई के धक्कों से हिलने लगा. उसकी चूचियां आगे पीछे को एक लय में हिलने लगी. आयशा ने अपनी

गोरी टाँगों को समीर की कमर में लपेट दिया. और अपना सर उत्तेजना से इधर उधर हिलाने लगी

आहह.ऊऊहह..उंग़ग्गफफफफफ्फ़..

कुछ देर बाद आयशा को एक और ओर्गास्म आने को हुआ. उसने अपनी चूचियां अपने हाथों में पकड़ ली.

हाँ समीर, चोदते रहो ऐसे ही मुझेमैं झड़ने ही वाली हूँ.आहह..

फिर आयशा अपने नितंबों को ऊपर को उछालकर समीर को नीचे से चोदने लगी. समीर को भी अपने अंदर प्रेशर

बनता महसूस हुआ.

आयशा , मैं भी झड़ने वाला हूँ..तुम्हारी प्यारी चूत को अभी अपने वीर्य से भर देता हूँ

मेरे लिए रूको भाई. मुझसे पहले मत झड़ जाना.

आयशा की चूत की गहराईयों में समीर का लंड घुसा हुआ था , तभी आयशा ने समीर का सर झुकाकर उसके होठों के

अंदर अपनी जीभ डाल दी और चूमने लगी. कुछ ही पलों बाद उसको ओर्गास्म आ गया और वो झड़ गयी. उसी के

साथ झड़ते हुए समीर ने अपनी बहन की चूत को गाड़े वीर्य से भर दिया.

गहरी साँसे लेती हुई आयशा बोली, आई लव यू भाई.

आई लव यू टू आयशा.

आयशा ने अपने आलिंगन में भाई को भर लिया. कुछ देर तक दोनों ऐसे ही लेटे रहे.

फिर समीर आयशा के बगल में लेट गया. दोनों ने एक दूसरे की तरफ करवट ली और एक दूसरे की बाँहों में सो गये.

मम्मी की मंज़ूरी के बाद अब उनके प्यार में कोई रोक टोक नही थी और वो दोनों खुलकर मज़ा ले सकते थे.

समाप्त
 
कच्ची कली मसल डाली

मेरा नाम दिलदार सिंह है, मैं दिल्ली में किराए के मकान में रहता हूँ. मेरी उम्र 28 साल है. मैं शादीशुदा हूँ और मेरी

एक 2 साल की बेटी भी है. ये कहानी मेरी और मेरे पड़ोस में रहने वाली एक जवानी की दहलीज पर कदम रखती हुई

18 साल की कमसिन लड़की के बीच की चुदाई की है.

बात एक साल पुरानी है मेरी बीवी और बेटी सर्दियों में छह महीने मेरे साथ रहने के लिए गांव से दिल्ली आए हुए थे.

मेरी बेटी जब से दिल्ली आयी, तो गली में हमउम्र लोगों से घुलमिल गयी.मेरे किराए के मकान में नीचे का फ्लोर मेरा

और ऊपर के फ्लोर में मकान मालिक की फैमिली रहती है. मेरे रूम का दो तरफ को दरवाजा है. पीछे का दरवाजा

पीछे की ओर आठ फुट की गली में खुलता है. ये गली लगभग सुनसान ही रहती है, क्योंकि उसके नीचे सीवर की

पाइप लाइन डली है, तो लोग उस गली का कम ही यूज करते हैं. आगे की तरफ से 16 फुट की गली से ही सभी का

आना जाना होता है.

मेरे मकान मालिक के वहां जो औरत झाड़ू पौंछा लगाने आती थी, उसने भी हमारी ही गली में किराए पर मकान

लिया हुआ था. काम करने वाली औरत की 3 बेटियां और एक बेटा था. उसका पति दिन भर रिक्शा चलाता था. वो

खुद चार घरों में झाड़ू पौंछा लगाती थी. उसकी दोनों बड़ी लड़कियां कहीं बड़ी कोठियों में घर का काम करती थीं

औऱ वहीं पर कोठी के सर्वेंट क्वाटर में रहती थीं. वे हफ्ते में एक बार ही घर माँ बाप से मिलने आती थीं. बाकी अपने

लड़के को उसने स्कूल डाला हुआ था.

उसी कामवाली की तीसरी लड़की की मैंने चुदाई की, उसका नाम था सरिता … वो 5वीं के बाद स्कूल गयी ही नहीं,

दिन भर माँ के साथ या गली में बच्चों के साथ घूमती रहती थी. माँ बाप को तो पैसे कमाने से ही फुर्सत नहीं थी, तो

सरिता आवारा सी हो गयी. वो मेरी बेटी के साथ भी खेलने आती और उसे बहुत पसंद करती थी.

मेरी बीवी भी उसे कभी कभी खाना खिला देती. कुछ दिनों में ही उसका मेरे घर आना जाना बढ़ गया.

एक दिन की बात है. मेरी बीवी छत पर कपड़ा सुखाने गयी थी और मैं बिस्तर पर लेटा टीवी देख रहा था. सरिता

और मेरी बेटी फर्श पर नीचे खेल रहे थे. अचानक मैंने सरिता पर ध्यान दिया. वो जवान हो गई थी. उसके छोटे छोटे

संतरे उग आए थे. पर मैंने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया था. आज वो स्कर्ट पहन कर आई थी, पता नहीं कैसे

खेलते खेलते उसकी स्कर्ट जरा ऊंची हो गयी. जब उसने जरा टांगें फैलाईं, तो मुझे उसकी चूत दिखाई देने लगी. वो तो

पेंटी पहन कर ही नहीं आयी थी. चूत छोटी सी थी, दूर से उसमें कोई बाल भी नजर नहीं आ रहे थे. मैं तो उसकी चूत

ही देखता रह गया.

वो खेलने में मगन थी औऱ मेरा सारा ध्यान उसके संतरों और चूत में था. मैं सोचने लगा कि इस लड़की की चूत में लंड

डालने में कितना मजा आएगा. बस मेरा मन अब उसकी चूत मारने को करने लगा. पर वो चूत देने को पटेगी कैसे, ये

मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था.

मैंने उससे पूछा- तुम्हारा क्या नाम है.

वो बोली- सरिता.

“तुम पढ़ने नहीं जाती हो?”

“नहीं.”

“क्यों नहीं जाती हो.”

“माँ जाने ही नहीं देती है.”

“तुम्हें खाने में क्या पसन्द है?”

वो बोली- आइसक्रीम.

“तुम्हारे आइसक्रीम के लिए पैसे कौन देता है?”

“कभी कभी पापा दे देते हैं.”

“अच्छा चल मैं भी कभी कभी तुझे आइसक्रीम को पैसे दे दूंगा, पर तू किसी को बताएगी तो नहीं. वरना तेरी मम्मी

मुझे डांटेगी.

“मैं क्यों किसी को बताने लगी.”

मैंने उसे 10 का नोट दिया, जिसे उसने अपनी स्कर्ट में कहीं छुपा लिया. फिर मेरी बीवी वापस आ गयी, तो मैंने

अपना ध्यान उसके संतरों से वापस टीवी पर लगा लिया. अब मैं कभी कभी चुपके से उसे पैसे देने लगा, वो भी ले

लेती.

एक दिन मेरी बीवी ऊपर मकान मालकिन से बात कर रही थी. मेरी बेटी और सरिता दोनों खेल रहे थे. तो मैंने

अपनी बेटी को अपनी गोद में बैठा लिया और उसके गालों पर किस किया. तो मेरी बेटी ने भी मेरे गालों पर किस

किया. फिर मैंने अपनी बेटी को जहाँ जहाँ किस किया, उसने भी मुझे वहां वहां किस किया. वो बड़े गौर से हम दोनों

को देख रही थी.

मैंने उससे कहा- तू भी करेगी मुझे किस?

वो बोली- नहीं.

“तुझे कभी किसी ने किस किया?”

वो बोली- नहीं.

“तो आ न … बहुत अच्छा लगता है किस करने में.”

वो पास आ गयी. मैंने एक जांघ पर अपनी बेटी को बिठाया औऱ दूसरी जांघ पर उसे बैठा लिया. फिर मैंने उसके माथे

पर किस किया और बोला- अब तुम मुझे करो.

सरिता बोली- कोई देख लेगा.

मैंने कहा- कोई भी तो नहीं है यहां. चल अब जल्दी किस कर … आज भी तुझे पैसे दूंगा.

उसने भी मेरे माथे पर किस किया. फिर मैंने उसके गालों पर किस किया, तो उसने भी मेरे गालों पर किस किया.

मैंने कहा- अब मैं तेरे होंठों पर किस करूंगा और मैं उसे चूसूंगा. फिर तुम भी जैसे मैंने किया है, वैसे ही मेरे होंठ

चूसना. ठीक है मजा आएगा.

उसने हां में सिर हिलाया. मैंने उसे और करीब खींचा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए. पहले एक किस दिया

और फिर उसके होंठ चूसने लगा.

पहले तो वो हटने लगी, पर जैसे ही मैंने उसके हाथ पर पैसे रखे, वो मेरा साथ देने लगी. उसने भी वैसे ही मेरे होंठ

चूसे. उसके छोटे से नर्म होंठ चूसने में बहुत मजा आ रहा था. मेरा एक हाथ उसके सर के पीछे था, दूसरा हाथ अपने

आप ही उसकी जांघों में चला गया. मैं होंठ चूसते चूसते उसकी जांघ सहलाने लगा.

मुझे बहुत मजा आ रहा था. मैंने जैसे ही हाथ थोड़ा अन्दर डाला, तो आज उसने पैंटी पहनी थी. मैंने पैंटी के ऊपर से

ही उसकी चूत सहलानी चाही, तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली- अंकल वहां हाथ क्यों डाल रहे हो. बात

तो सिर्फ किस करने ही हुई थी.

“सॉरी सरिता … वो गलती से हाथ वहां चला गया था. चल अब हो गया जाओ दोनों नीचे खेलो.”

वो दोनों नीचे खेलने लगी.

मैंने उससे कहा- सरिता अच्छा लगा.

वो “हां..” बोली.

“तो घर पर और आंटी को मत बताना. नहीं तो आगे से पैसे मिलने बन्द.”

वो बोली- अंकल मैं नहीं बताऊंगी किसी को भी.

इस तरह कभी कभी मैं उसकी किस ले ही लेता था. अब वो मेरे से पूरी तरह घुल मिल गयी थी. देखते ही देखते मेरी

बीवी व बच्ची का गांव वापस जाने का टाइम आ गया. मैं उन्हें गांव वापस छोड़ आया.

एक दिन वो मुझे गली में मिली और बोली- अंकल, अब आंटी और बाबू कब वापस आएंगे?

मैंने कहा- अभी तो टाइम लगेगा.

“तो अंकल फिर मैं किसके साथ खेलूंगी?”

मैंने कहा- मेरे साथ खेल लेना. पर छुप छुप कर … मैं पैसे भी दूंगा खेलने के.

वो बोली- अच्छा तो कब आऊं अंकल?

मैंने उससे कहा- जब तेरे मम्मी पापा काम पर चले जाएं, तब आना. … पर आज नहीं. और हां वो भी पीछे के रास्ते

से आगे से नहीं. तीन बार धीरे से दरवाजा खटखटाना, मैं खोल दूंगा पर देख लेना, कोई तुझे देख न रहा हो.

वो बोली- ठीक है अंकल मैं कल आती हूं.

मैंने अगले दिन का ऑफ ले लिया और आगे के लिए एक महीने अपनी नाईट ड्यूटी लगा ली.

अगले दिन सरिता दिन के करीब 2 बजे पीछे के दरवाजे से आ गयी.

“किसी ने तुझे देखा तो नहीं न?”

“नहीं कोई नहीं था.”

वैसे भी दिन के समय सभी या तो आराम के लिए सोये होते हैं या डयूटी पर होते हैं. वैसे भी पीछे की गली में कौन

आता जाता है. लाइन साफ थी. मैंने उसे अन्दर करने के बाद सभी खिड़की दरवाजे बंद किए और पर्दे लगा लिए. रूम

की लाइट जला कर उसे अपने बेड पर ले आया.

मैंने उससे कहा- देख सरिता अब किस वाला खेल बहुत खेल लिया, आज हम दूसरा खेल खेलेंगे. हां और पैसे भी 20

रुपये मिलेंगे. पर शर्त एक ही है, जो भी मैं करूँ, तुम मना नहीं करोगी व तुम कभी किसी को नहीं बताओगी कि तुम

अब भी मेरे कमरे में आती हो. बोलो मंजूर है?

“ठीक है.”

“तो खेल खेलें?”

“मुझे सब मंजूर है … पर पैसे मिलेंगे न?”

“वो तो तुम पहले ले लो.”

मैंने उसे 20 का नोट पकड़ा दिया. वो खुश हो गयी.

वो बोली- बोलो अंकल क्या करना है?

“करना वही है, जैसे मैं करूँ, तुम्हें भी वैसा ही करना है और मना नहीं करना है. ठीक है समझ गयी ना.”

“हां अंकल समझ गयी आप शुरू करो.”

मैंने उसे बेड पर आपने सामने बिठाया और पहले उसके होंठ चूसे. उसने भी वही किया.

फिर हाथों से उसके गाल सहलाये, वो भी वही करती गयी. फिर मैंने उसकी छाती पर हाथ रख दिया, उसने भी मेरी

छाती पर हाथ रख दिए. मैंने उसके संतरे सहलाने शुरू किए. उसने भी मेरी छाती पर हाथ फेरा. मैंने धीरे धीरे उसके

संतरे दबाने शुरू किए. उसने भी मेरे निप्पल पर हाथ फिराया, पर मजा नहीं आ रहा था. मैंने उसकी जांघें सहलाईं,

तो उसने भी वही किया.

मैंने उसकी चूत पर हाथ रखा, तो उसने भी मेरी टांगों के बीच में हाथ डाल दिया. उसका हाथ मेरे खड़े लंड पर चला

गया तो हैरानी से बोली- अंकल यहां ये क्या है डंडा जैसा?

“सरिता ये वही है, जैसे तेरे भाई का है जिससे वो सुसु करता है.”

“पर अंकल वो तो छोटा है. एक बार मैंने उसे नहाते वक्त देखा था.”

“अरे अभी वो छोटा है, जब बड़ा होगा तो ऐसा ही होगा.”

वो शरमा गयी. “सरिता ऐसे मजा नहीं आ रहा है ना खेलने में … चल कुछ और करते हैं.”

“हां अंकल कुछ और करते हैं.”

“चल तू अपनी टॉप उतार दे, मैं भी अपनी टी-शर्ट उतारता हूं.”

“नहीं मैं ये नहीं करूंगी.”

“अरे तेरे मेरे अलावा और कौन है यहां. मैं भी किसी को कुछ नहीं बताऊँगा … कर ना. मैंने कहा भी था तू मना नहीं

करेगी.”

यह सुन कर उसने अपनी टॉप उतार दी. अब वो बिना ब्रा के ऊपर से नंगी हो गयी. उसके छोटे छोटे संतरे बहुत टाइट

लग रहे थे. मैंने उन पर हाथ लगा कर हल्के से दबाया औऱ अपनी टी-शर्ट भी उतार डाली. मैंने एक चूची हाथ से

सहलाते हुए निपल्स दबाना शुरू किया और दूसरे को अपने मुँह में लेकर चूसने लगा. संतरे छोटे छोटे से थे, जो पूरे

मुँह में भी नहीं आ रहे थे. मैंने ऐसे ही चाटना जारी रखा और धीरे धीरे उसे दबाता भी रहा. उसे अभी अब मजा आ

रहा था.

मैंने उससे पूछा- इस खेल में तो मजा आ रहा है ना.

“हां अंकल इस में बहुत मजा आ रहा है.”

उसकी नजर मेरे निक्कर में बने तम्बू में ही थी. जो बार बार अन्दर से ही बाहर आने को उछाल मार रहा था.

“क्या देख रही हो सरिता?”

“अंकल वहां और फूल गया है. दिखाओ न क्या है वो … और कितना बड़ा है.”

“ठीक है दिखाता हूं, पर तुझे भी अपनी दिखानी पड़ेगी.”

वो बोली- मैं क्या दिखाऊं … मेरे पास तो कुछ भी नहीं है.

मैं बोला- वो जो तेरी स्कर्ट के नीचे है तेरी सुसु वाली जगह. मैं अपना सुसु करने वाला दिखाऊंगा, तू अपनी दिखा दे.

“नहीं अंकल मैं नहीं दिखाऊंगी, मुझे बहुत शरम आ रही है.”

“अरे कैसा शरमाना … तू और मैं ही तो हैं. मैं भी तो तुझे अपना दिखा रहा हूँ. चल ऐसा करते हैं, दोनों एक साथ

अपने कपड़े उतारते हैं. तू अपनी स्कर्ट उतार, मैं अपना निक्कर उतारता हूं.”

वो मान गयी और हम दोनों एक साथ नंगे हो गए.

आज फिर एक बार उसकी कुंवारी चूत मेरे आंखों के सामने थी.

मैंने पहली बार उसकी चूत इतनी नजदीक से देखी थी. उसकी बुर पर हल्के हल्के सुनहरे बाल आए हुए थे. उसकी बुर

देखकर तो मेरा दिल खुश हो गया.

वो मेरा लंड को देखकर बोली- अंकल, ये तो मेरे भाई से बहुत बड़ा है.

मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपने लंड पर रखा और बोला- अब ले … इसे छू कर भी देख और बता कैसा है ये?

उसने लंड को अपने हाथ में पकड़ा और बोली- अंकल ये तो बहुत गर्म है.

मैं- हां, ऐसे ही तेरी भी तो गर्म है यह देख न.

यह कहकर मैंने उसकी चूत पर हाथ रख दिया. मेरे हाथ का स्पर्श पाकर वो जरा सिहर सी उठी. लेकिन मैंने उसकी

चूत को सहलाना शुरू कर दिया. उसकी चूत के दाने को रगड़ने लगा. उसकी आह निकलने लगी.

मैंने उसके हाथ का दबाव अपने लंड पर बनाते हुए कहा- अब ऐसे तुम भी आगे पीछे करो.

वो मेरे लंड की मुठ मारने लगी औऱ मैं उसका दाना सहलाने लगा. धीरे धीरे वो गीली होने लगी. उसकी आंखें लाल

होने लगीं.

मैंने उससे कहा- मजा आ रहा है ना!

वो- हां अंकल बहुत मजा आ रहा है … और करो.

मैं- रुक … फिर तुझे और मजा देता हूं … तू बिस्तर पर टांगें फैला कर लेट जा.

वो लेट गयी, अब उसकी चिकनी चूत मेरे सामने थी. मैंने झुक कर अपना चेहरा उसके पास किया तो उसमें से साबुन

की खुशबू आ रही थी.

मैंने उसे पूछा- अभी नहा कर आई हो?

तो उसने कहा- हाँ अंकल, बस नहा कर सीधे आपके पास आई हूँ.

मैंने उसकी अनछुई चूत पर अपनी जीभ लगा दी और उसे चाटने लगा. वो तो उछलने लगी. उसे और ज्यादा मजा देने

के लिए मैं उसके संतरे भी निचोड़ने लगा. वो सिसकारी लेने लगी- आहह अंकल बहुत मजा आ रहा है … और जोर से

चाटिए न. मेरे दूध भी आराम से दबाइए ना … मुझे दर्द हो रहा है … आह हहहह … क्या कर दिया आपने अंकल

… बहुत अच्छा लग रहा है.

थोड़ी देर बुर चाटने के बाद ही उसका बुरा हाल था. वो अपनी चूत को बार बार उठाते हुए मेरे मुँह पर दबा रही थी.

कुछ ही देर में वो मेरे मुँह में झड़ गयी.

उसका थोड़ा सा ही पानी निकला था जिसे मैं पूरा चाट गया. एक कुंवारी चूत का निकला हुआ पहला अमृत चखकर

मन तृप्त हो गया. वो तो निढाल होकर मेरी बांहों में गिर गई. उसने मुझे जोर से जकड़ रखा था. कुछ देर मैंने उसे वैसे

ही रहने दिया उसने भी अपने जीवन का पहले स्खलन का मजा लिया था. मैंने उसके होंठ चूसे, चूचियां दबाईं. तो

थोड़ी ही देर में वो शांत हो कर बिस्तर में लेट गई.

मैंने उससे पूछा- कैसा लगा सरिता?

सरिता- बहुत ज्यादा मजा आया अंकल.

मैं- चल अब तू भी जैसे मजा तुझे आया वैसा ही मजा मुझे भी दिलवा.

सरिता- कैसे अंकल मैं आपको मजा दिलवाने के लिए क्या करूं.

मैंने उसे उठाकर अपना लंड उसके मुँह के सामने कर दिया.

मैं- अब तू भी इसे चूस और चाट जैसे मैंने तेरी चाटी थी.

सरिता- नहीं मैं नहीं करूंगी, इसमें से सुसु आता है … ये गंदी जगह है.

मैं- अरे मैंने तेरी नहीं चाटी क्या? तुझे मजा नहीं आया क्या? चल अब नखरे मत कर … आजा ले ले मुँह में इसे.

उसने एक बार लंड मुँह में लिया और फिर बाहर निकाल लिया.

सरिता- अंकल अजीब सा लग रहा है … मैं नहीं करूंगी.

मैंने सोचा कि अब ये ऐसे नहीं मानेगी. मैंने एक दस का नोट और निकाला और उसे दिया और किचन में से शहद

लेकर आया और उसे अच्छे से अपने लंड पर चुपड़ लिया. फिर उसके आगे लंड ले जाकर बोला- ले अब चूस अब मीठा

लगेगा … जिस तरह तू आइसक्रीम को मजे से चटखारे लेकर चूसती है इसे भी एक आइसक्रीम ही समझ कर चूस.

फिर उसने लंड अपने हाथ में ले लिया. इस बार अब उसे चूसने में परेशानी नहीं हुई. शहद के स्वाद ने मेरा काम

आसान कर दिया. वो धीरे धीरे लंड को अपने मुँह के अन्दर बाहर करने लगी. अब उसे भी लंड चूसना अच्छा लगने

लगा. अब वो बड़े मजे से लंड अन्दर बाहर ले रही थी.

मेरा तो बुरा हाल था एक कमसिन लड़की मेरा लंड चटकारे ले लेकर चूस रही थी. मैं उसके मुँह की गर्मी सहन नहीं

कर पाया. मैंने उसका सर पकड़ लिया और उसके मुँह के अन्दर जोर जोर से घस्से लगाने लगा. कुछ ही देर में मैंने

अपना माल उसके मुँह में भर दिया.

वो मेरा लंड अपने मुँह से बाहर निकालने की कोशिश करने लगी, पर मैंने भी जब तक उसने मेरा सारा माल नहीं

निगल लिया, उसे छोड़ा नहीं.

जब मुझे लगा वो सारा माल पेट के अन्दर ले चुकी है, तभी मैंने लंड बाहर निकाला.

लंड बाहर निकलते ही वो बुरा से मुँह बना कर बोली- अंकल ये आपने क्या कर दिया … आपने तो मेरे मुँह में ही सुसु

कर दिया. मैं- अरे मेरी रानी वो सुसु नहीं था … जब तुझे बहुत मजा आया था, तेरा भी तो नीचे से निकला था, जिसे

मैंने चाट लिया था. ऐसे ही ये भी इसका घी था. सुसु थोड़े ही था, इसे पीने से ताकतवर होते हैं. जब तू इसे रोज

पीएगी तो तू भी आंटी जैसी ही मस्त हो जाएगी.

सरिता- लेकिन बड़ा अजीब सा स्वाद था.

मैं- पहले पहली बार जरा अजीब लगता है, आदत पड़ने के बाद तो तू रोज मेरे इस लंड को चूसने और उसके घी को

पीने की जिद करेगी.

सरिता- हम्म …

मैं- वैसे बता … मजा तो आ रहा है ना इस नए खेल में.

सरिता- हां अंकल बहुत मजा आ रहा है. अब तो मैं रोज ये खेल खेलूंगी.

मैं- पर एक बात का ध्यान रखना, ये बात किसी को भी पता नहीं लगनी चाहिए और न तुझे मेरे कमरे में आते किसी

को दिखना चाहिए. जिस दिन भी किसी को जरा भी खबर लग गयी, उसी दिन से खेल और पैसे मिलने दोनों बंद हो

जाएंगे.

उसे मेरे दिए पैसों से रोज आइसक्रीम खाने को मिल रही थी. तो उसने किसी को नहीं बताया. रूम में आते वक्त भी

वो खूब ख्याल रखती थी कि कोई उसे देख न ले.

इस तरह मैंने उसे लंड चुसाई के काबिल बना दिया. जिस समय भी मौका मिलता, मैं उसकी चूत चाट कर उसे मजा

देता और वो मेरा लंड चूस कर मुझे मजे करवाती. अब तो वो लंड चूसने के मामले में मेरी बीबी को भी फेल करने

लगी. अब हम दोनों एक दूसरे को ऐसे ही मजे देने लगे. पर असली मजा तो अभी बाक़ी था.

आगे जब भी उसकी चूत में उंगली डालने की कोशिश करता, तो वो चिंहुक जाती और दर्द होने के बारे में बताती. तो

मुझे उसकी चूत चाट कर ही संतोष करना पड़ता. इधर मेरा लंड तो मेरी बात मान ही नहीं रहा था. उसकी चूत देखते

ही उसमें घुसने की जिद करता, पर करूँ क्या … लौंडिया सील पैक कमसिन माल थी और अभी पूरी तरह पकी भी

नहीं थी. जल्दबाजी मुझे ही महंगी पड़ सकती थी, जो मैं बिल्कुल भी नहीं चाहता था.

सरिता मेरे से अब बिल्कुल खुल चुकी थी. अब जब भी वो मेरे कमरे में आती तो मुझे उसे कपड़े खोलने को भी नहीं

कहना पड़ता था. वो खुद ही अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी ही मेरे बिस्तर पर बैठ जाती थी और मेरे लंड को मजे

ले ले कर चूसती थी.

एक दिन मैंने फिर आगे बढ़ने को सोचा और उसे बोला- चल सरिता आज फिर कुछ नया करते हैं.

सरिता- अंकल और कुछ भी कर सकते हैं क्या?

मैं- अरे अभी तो बहुत कुछ है करने को … अभी तो मुझे बहुत सारे खेल आते हैं. वक्त तो आने दे, मैं तुझे देख कैसे कैसे

खेल सिखाता हूं. चल आज का खेल तो सीख ले.

वो झट से राजी हो गई.

पहले थोड़ी देर मैंने उसके शरीर के साथ खेला, होंठ चूसे, निप्पल चूसे व सहलाये. पेट व जांघों पर हाथ फेरा औऱ

उसकी चूत के दाने को कुरेद कुरेद कर चाटा. जब वो गर्म हो गयी. थोड़ी देर उसे अपना लंड चुसवाया. फिर मैंने उसे

बिस्तर पर लिटा दिया और उसके ऊपर आ गया.

मैंने अपना लंड उसकी चूत के मुहाने पर रखा और उसके दाने पर अपना लंड रगड़ने लगा. उसकी चूत गर्म होकर

बिल्कुल चिकनी हो गयी थी और गीली हुई पड़ी थी. मेरा लंड भी गीला ही था. पहली बार जब उसकी चूत पर मैंने

अपना लंड छुआया, वो एहसास ही अलग था.

मैं धीरे धीरे अपने लंड को उसकी चूत पर रगड़ने लगा. इस रगड़ाई से ही हम दोनों को बहुत मजा आ रहा था. मेरी

रगड़ाई में कभी लंड उसकी चूत पर जोर से लग जाता, तो वो कराहने लगती.

सरिता- अंकल धीरे करो लग रही है.

मेरी समझ में आ गया कि इसे पहली चुदाई में बहुत दर्द होना है और ये समय अभी ठीक नहीं था. इसके लिए एकांत

की जरूरत थी, जिसके लिए मकान मालिक का घर पर नहीं रहना जरूरी था.

मैंने उससे कहा- ठीक है अब मैं ऊपर ऊपर से ही करुंगा. तुम्हें अब नहीं दुखेगा.

मैं अब धीरे धीरे उसकी चूत के ऊपर अपना लंड रगड़ने लगा. अब दोनों को मजा आ रहा था. मैंने ऐसे ही रगड़ रगड़

कर अपना माल उसके पेट पर और चुचियों पर गिरा दिया. वो भी झड़ चुकी थी.

इसी तरह पूरा महीना निकल गया, मैं उसकी चूत पर अपना लंड रगड़ कर ही पानी निकाल पा रहा था या कभी

उसके मुँह में लंड डालकर पानी छुड़ा देता था. पर अब रहा ही नहीं जा रहा था. मैं उसे जल्द से जल्द चोदना चाहता

था. पर मौका ही नहीं मिल पा रहा था.

आखिर एक दिन वो दिन भी आ ही गया. जिस दिन उसकी कुंवारी चूत मुझे फाड़नी थी.

मेरे मकान मालिक को कुछ दिन बाद अपने पूरे परिवार के साथ 3 दिन के लिए अपनी बेटी के वहां किसी कार्यक्रम में

जाना था. उन्होंने अपने मकान की पूरी देखरेख की जिम्मेदारी मुझे देखने को दी और चले गए. मैंने सरिता को बता

दिया कि उस दिन वो 10 बजे अपनी माँ के जाते ही आ जाए.

मैंने उस दिन की छुट्टी ले ली. अब वो समय बिल्कुल नजदीक था, जब मुझे मेरी ही पकाई हुई खीर को खाने का मौका

मिलने वाला था. मेरा लंड तो अभी से हिचकोले खाने लगा था. कुंवारी चूत जो मिलने वाली थी उसे.

आखिर वो दिन भी आ ही गया, जिसका मैंने महीनों इंतजार किया था. आज मेरे लंड को उसकी चूत में जाकर सुकून

जो मिलने वाला था.

मकान मालिक सुबह ही जा चुके थे. मैंने उसकी चुदाई की सारी तैयारियां पूरी कर ली थीं. बस अब उसके आने का

इंतजार था.

सरिता दस बजे ही मेरे रूम में अपनी माँ के जाते ही आ गयी. आते ही वो अपने कपड़े उतारने लगी.

मैंने उससे कहा- सरिता जा पहले नहा कर आ. फिर चाहे बिना कपड़ों के ही नंगी अन्दर आ जाना. आज ऊपर कोई

नहीं है इसलिए डरने की कोई बात नहीं है, आज हम जो भी करेंगे, खुल कर करेंगे.

वो नहा कर नंगी ही मेरे पास आ गयी. मैंने पहले से ही खाना बना कर रखा था. मैंने उसे और खुद पहले थोड़ा थोड़ा

नाश्ता किया. फिर में असली मुद्दे पर आ गया.

मैंने उससे कहा- आज हम अलग खेल खेलेंगे और इस खेल के तुम्हें 100 रुपये मिलेंगे.

सरिता- क्या कहा अंकल … 100 रुपये?

मैं- हां पूरे 100 रुपये, पर इस बार शर्त भी बहुत कठिन होगी. तुझे मंजूर है तो बोल वरना रोज वाला ही खेल शुरू

करते हैं.

सरिता- अंकल 100 रुपये के लिए तो मैं कोई भी खेल खेल सकती हूं. मुझे आपकी सारी शर्त मंजूर हैं.

मैं- तो ठीक है आज जिंदगी के असली मजे लेने के लिए तैयार हो जा. आज तुझे ऐसा खेल सिखाऊंगा कि तू रोज उस

खेल को खेलने मेरे पास भागी चली आएगी.

मैंने अपने भी फटाफट कपड़े जिस्म से अलग किए और नंगा उसके सामने आ गया.

मैंने रोज की तरह उसे बुर चाट कर गर्म किया और जैसे ही वो झड़ने को हुई उससे पहले उसकी बुर चाटना छोड़

दिया. वो बोली- अंकल जल्दी कुछ करो न … मेरे नीचे कुछ हो रहा है या तो उसे रगड़ो या मेरी उसको चाटो.

मैं- एक बात सुन ले, मेरे इसे लंड कहते हैं और तेरी इसे बुर …

उसकी बुर पर मैं हाथ घुमाते हुए बोला “और हां आज तुझे मजा मैं नहीं … मेरा ये लंड देगा. देख इसमें बहुत मजा

आता है चाटने से भी बहुत ज्यादा मजा. पर पहले दिन थोड़ा सा दर्द भी होता है. तुझे वो दर्द सहन करना पड़ेगा, वो

भी सिर्फ आज ही बस … कल से तो तुझे बिल्कुल भी दर्द नहीं होगा, सिर्फ मजा ही मजा आएगा.

सरिता बड़े ध्यान से मेरी बात सुन रही थी.

मैं- एक बात और इस बारे में तो किसी को भी किसी भी हालत में नहीं बताना है. बोल सह लेगी थोड़ा सा दर्द?

सरिता- हां सह लूँगी … पर मजा तो दिलवाओ और बताओ आजतक मैंने किसी को नहीं बताया है, जो अब क्यों

बताऊंगी? आप चिंता न करो, बस खेल शुरू करो.

मैं- तो आज मैं अपने लंड को तेरी इस बुर में घुसाउंगा.

सरिता- पर अंकल वहां तो उंगली भी नहीं जा रही थी, इतना बड़ा लंड कैसे जाएगा?

मैं- सब चला जाएगा. बस थोड़ा सा दर्द सहन करना और चाहे कुछ भी हो जाए चिल्लाना नहीं. नहीं तो 100 रुपये

जैसे ही तू चिल्लाई … नहीं दूंगा.

सरिता- नहीं नहीं अंकल मैं नहीं चिल्लाऊंगी, पर जरा आराम से अन्दर डालना. मुझे डर लग रहा है.

मैं- आज तक हमने जो भी किया है. तुझे डर लगा क्या? डर मत मैं हूँ न तेरे साथ. बस थोड़ी देर के दर्द के बाद जिंदगी

भर मजे ही मजे हैं. तू जरा भी चिंता मत कर. अब जरा इसे चूस दे ये आज तुझे बहुत मजे करवाएगा.

उसने मेरे लंड को चूस कर और सख्त कर दिया. मैंने अपने लंड पर ऊपर तक तेल चुपड़ लिया और उसकी बुर में भी

जहां तक तेल जा सकता था, उतना तेल से तर कर लिया. फिर मैंने उसकी कमर के नीचे एक तकिया रखा, जिससे

उसकी बुर जरा ऊपर को उठ गई.

मैंने उसकी टांगों के बीच एक पुराना तौलिया बिछा दिया, ताकि मेरा बिस्तर खराब न होने पाए. सारी तैयारी करने

के बाद मैंने अपने लंड का सुपारा उसकी कोमल सी बुर के मुहाने पर रखा और उस पर उसे रगड़ने लगा.

बड़ी फिसलन थी, लंड सेंटर पर लग ही नहीं रहा था. मैंने एक हाथ से लंड पकड़ कर उसकी टांगें फैलाकर लंड को

निशाने पर रखा और उसके होंठों से होंठ मिलाकर एक हल्का सा झटका मारा तो लंड का टोपा अन्दर घुस गया था,

पर वो छटपटाने लगी.

मैंने उसके होंठों पर हाथ रखकर कहा- बस यही दर्द है, थोड़ा सा सहन करो बस अभी थोड़ी देर में ही दर्द सही हो

जाएगा.

मैंने लंड को वैसे ही फंसे रहने दिया और उसे सहलाने चाटने लगा. उसकी चुचियों को सहलाने से उसका ध्यान दर्द से

हटकर उस तरफ हो गया, जिससे थोड़ी ही देर में वो नार्मल हो गयी.

मैं- अब दर्द कम है न सरिता?

उसने हां में सर हिलाया.

मैंने उसे सहलाते सहलाते ही एक झटका और मारा तो लंड थोड़ा सा अन्दर और घुस गया. उसकी बुर तो बहुत ज्यादा

टाइट थी, लंड को उसकी बुर के अन्दर जाने में बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी.

मैंने लंड पेलने के बाद जैसे ही उसका मुँह खोला, वो रोने लगी- अंकल नहीं, निकाल लो इसे, मैं नहीं सह पाऊंगी. मुझे

बहुत दर्द हो रहा है.

मैं- तो ठीक है 100 रुपये कैंसिल. दर्द सहने के ही तो 100 रुपये मिल रहे हैं. वो ही तू सहन नहीं कर पा रही है. मैंने

कहा भी था कि थोड़ी देर का दर्द है, थोड़ा औऱ दर्द होगा, फिर कभी नहीं होगा अभी मजा आने लगेगा. फिर भी नहीं

करना तो ठीक है, मैं निकाल लेता हूं. कल से अब यहां आना भी मत.

वो रोने लगी- अंकल मैं क्या करूँ मुझे बहुत दर्द हो रहा है … ऐसा लग रहा है आपका लंड नहीं, चाकू अन्दर गया है.

मेरी बुर फट सी रही है.

बात तो उसकी सही थी इतनी छोटी सी बुर में इतना मोटा लंड जाएगा, तो उसने फटना ही था. पर मैंने उसे

समझाया- देख आधा दर्द तो तूने सह भी लिया है … बस और थोड़ा सा दर्द होगा फिर 100 रुपये भी तेरे और मजा

भी आएगा. थोड़ी देर की बात है.

मैंने उसकी पैंटी को उसके मुँह के अन्दर डाला और उसका मुँह हाथ से दबा लिया. लंड को थोड़ा सा बाहर निकाला

और फिर एक जोरदार झटका मारा लंड उसकी बुर फाड़ता हुआ आधा अन्दर घुस गया. उसकी सील टूट चुकी थी.

उसका गर्म गर्म निकलता हुआ खून मुझे लंड पर महसूस हो रहा था. मेरा लंड भी उसकी बुर पर बुरी तरह फंसा हुआ

था. उसका तो बुरा हाल था. उसके मुँह में पेंटी डाली होने के कारण गूं गूं की ही आवाज बाहर आ रही थी. उसकी

आंखें दर्द की अधिकता से बाहर को आने लगी थीं. वो मुझे अपने ऊपर से हटाने की असफल कोशिश कर रही थी.

करीब 5 मिनट तक मैं उसके ऊपर ऐसे ही पड़ा रहा, लंड को जरा भी हरकत नहीं दी. जब वो फिर से जरा सा नार्मल

सी लगी, तो मैंने उससे कहा- बस हो गया सरिता, अब मजा आएगा.

मैंने उसकी पैंटी उसके मुँह से निकाल दी औऱ फिर उसके होंठ अपने होठों से दबाकर मैंने फिर से एक जोरदार झटके

के साथ ही पूरा लंड उसकी बुर में उतार दिया. वो तो बेहोश हो गयी. थोड़ी देर के लिए तो मैं भी डर गया. बुर खुल

चुकी थी लंड बाहर निकालते ही उसमें से खून की धार बाहर आने लगी. पर मुझे पता था ये कमसिन लड़की आराम

से लंड ले लेगी. क्योंकि बाहर के देशों में इससे भी कम उम्र की लड़कियां लंड का मजा ले चुकी होती हैं.

मैंने पास रखे कपड़े से उसकी बुर से निकल रहे खून और अपने लंड पर लगे खून को साफ किया और फिर उसकी बुर

पर आराम से लंड घुसा दिया. इस बार भी लंड टाइट ही अन्दर गया था, पर वो तो बेहोश पड़ी थी. मैं धीरे धीरे लंड

अन्दर बाहर करने लगा ताकि उसके होश में आने से पहले लंड उसकी बुर को थोड़ा और खोल सके.

थोड़ी देर बाद वो होश में आने लगी, तो मैंने धक्के लगाने बंद कर दिए. मैंने उसे अपनी गोद में बिठा लिया, पर लंड

नहीं निकाला. फिर पास में रखी पानी की बोतल से उसे पानी पिलाया और पहले से ही लाई हुई दर्द निवारक गोली

भी खिला दी. क्योंकि असली दर्द तो उसे चुदाई के बाद पता चलने वाला था.

वो रोने लगी- अंकल मैं मर जाऊंगी … निकाल लो अपना लंड मेरी बुर से. सहन नहीं हो रहा है. मेरी बुर फाड़ दी

आपने. इतना दर्द होगा पता होता तो कभी नहीं करवाती. अंकल 100 रुपये के लालच ने तो मेरी जान ही ले ली.

मैं- सरिता आज तक चुदाई से कोई भी नहीं मरा है … सभी लोग चुदाई करते हैं. इससे ज्यादा मजा किसी खेल में

नहीं आता है. वैसे भी जो होना था सब हो गया. देख मेरा पूरा लंड तेरी बुर ने निगल लिया है. अब दर्द नहीं सिर्फ मजे

ही मजे हैं. इस खेल में तुझे लगता है 100 रुपये में तेरी हालत खराब हो गयी है … तो ये ले 100 रुपये तेरे दर्द सहने

के और 100 रुपये और दूंगा खेल खत्म होने के बाद.

अब लालच से उसकी आंखें चमकने लगीं. मैंने भी समझ लिया मेरा काम बन गया. पैसों के लिए तो अब ये मेरा पूरा

लंड उछल उछल कर लेगी.

मैं- चलो अब दर्द से ध्यान हटाओ औऱ मजे में ध्यान लगाओ, फिर तुम्हें दर्द महसूस नहीं होगा.

मैंने उसकी चूचियां मसलीं और होंठ चूसे तो वो नार्मल होने लगी. मैंने उसे फिर लिटा दिया औऱ लंड को धीरे धीरे

उसकी बुर के अन्दर अन्दर बाहर करने लगा. मेरे लंड के हर चोट पर उसकी कराह उम्म्ह… अहह… हय… याह…

निकल रही थी. मेरा मजा और बढ़ रहा था. लंड तो खुशी से और बढ़ा हो गया था, जो इस उम्र में भी कमसिन कुंवारी

बुर फाड़ रहा था. जिस बुर में अभी अभी बाल आने शुरू ही हुए थे, उसमें मेरा मोटा लंड अन्दर तक घुस कर सवारी

कर रहा था.

धीरे धीरे उसकी पूरी बुर गीली हो गयी, शायद उसे भी मजा आने लगा था. अब लंड आराम से अन्दर बाहर हो रहा

था. मैंने रफ्तार बढ़ा दी. मेरा पूरा लंड पिस्टन की भांति उसकी बुर में अन्दर बाहर हो रहा था. मेरे हर धक्के में उसकी

कराह निकल रही थी, पर आज किसी बात का डर नहीं था. पूरा मकान खाली पड़ा था. मैं उसे पूरी मस्ती में चोद

रहा था. कुछ मिनट तक मैंने उसे अलग अलग आसनों में चोदा.

उसका भी बुरा हाल था. न जाने कितनी बार वो झड़ चुकी थी. उसकी मस्त बुर मारते मारते मेरे लंड ने भी अब

जवाब दे दिया. मैंने उसकी बुर में लगातार पिचकारी मारनी शुरू कर दी. ऐसा लग रहा था, उसकी बुर मेरे लंड को

औऱ अन्दर तक खींच रही थी और मैंने अपनी पूरी जान अपने लंड के रास्ते उसकी बुर में जैसे लबालब भर दी. मैं

निढाल होकर उसके ऊपर ढेर हो गया.

थोड़ी देर बाद मैंने जब लंड को उसकी वीर्य से लबालब भरी बुर से बाहर निकाला, तो उसमें से वीर्य और खून की

धार बहने लगी. मैंने उसकी ही पैंटी से अपना और उसका मिक्स वीर्य के साथ निकला खून साफ किया. थोड़ी देर बाद

मैं उसे बाथरूम ले गया औऱ अच्छे से उसकी बुर गर्म पानी से साफ की ताकि उसकी बुर की अच्छी सिकाई हो सके.

उसकी पूरी बुर फूल चुकी थी. मैंने उसे उठाकर बिस्तर में लिटा दिया औऱ एक दर्दनिवारक गोली और आईपिल उसे

खिला दी.

उसे बहुत दर्द हो रहा था, पर पैसों के लालच में पट्ठी अपनी बुर फड़वा ही चुकी थी. मैंने उठाए थोड़ी देर आराम करने

को कहा. वो मेरे ही बिस्तर में थोड़ी देर बाद सो गई. शाम को जब वो जागी, तो अब उसका दर्द थोड़ा कम था. पर

उसकी चाल लंगड़ा रही थी. आखिर चाल बिगड़ती भी क्यों नहीं, जिस बुर में कभी उंगली तक नहीं गयी थी, आज

उसमें वो पूरा का पूरा लंड लेकर बैठी थी.

मैंने उसे रूम पर ही थोड़ी देर चलाया जब उसकी चाल थोड़ा ठीक हुई, तो मैंने उससे कहा- सरिता अगर मम्मी ने

पूछ लिया लंगड़ा क्यों रही है, तो बात देना आज गली में फिसल गई थी, पर ये चुदाई की की बात बिल्कुल भी मत

बताना.

उसने हां में सर हिलाया. मेरा एक बार और उसे चोदने का मन था, पर उसकी हालत बहुत खराब थी. उसकी बुर

आंसू रो रही थी.

मैंने उसे कपड़े पहनाये और उसकी पैंटी यादगार के रूप में अपने पास रख ली. मैंने उसे 100 रुपये देते हुए घर जाकर

आराम करने को बोला.

वो लड़खड़ाते हुए अपने रूम में चली गयी.

मैं आज बहुत खुश था. जैसे मैंने आज जन्नत पा ली हो. वो रात मुझे बहुत मस्त नींद आयी. मेरे लंड को भी उसकी बुर

फाड़कर बड़ा सुकून मिला था.

अगले पूरे दिन तो वो नजर ही नहीं आयी. तीसरे दिन वो मेरे कमरे में आई.

मैं- कैसी है सरिता. अब कैसा है दर्द तेरा?

सरिता- अंकल परसों और कल तो बहुत दर्द था. आपने तो मेरी बुर का भुरता ही बना दिया. मेरा लालच मेरी बुर

फाड़ गया. पर आज दर्द कम है.

मैं- इस दर्द को भी मिटाने का एक ही उपाय है … फिर से चुदाई. अब इस बार बिल्कुल भी दर्द नहीं होगा, जो है वो

भी जाता रहेगा और आज इतना मजा आएगा पूछ मत. कल से तू रोज भाग भाग कर चुदने को आएगी.

वो मेरी तरफ देखने लगी.

मैं- चल अब फटाफट कपड़े उतार और लेट जा … मेरा लंड देख तुझे देखते ही खड़ा हो गया.

थोड़ी देर की न नुकर के बाद वो आखिर चुदने को मान ही गई. मैंने आज उसे मजे दे देकर चुदाई की. उसे भी बहुत

मजा दिलाया. आज भी अंत में मैंने अपना सारा माल उसकी बुर में भर दिया. जाने के वक्त मैंने उसे दर्द की दवा और

गर्भनिरोधक दवा खिलाई और घर भेज दिया. अब तो ये हमारा रोज का नियम हो गया, उसे भी अब चुदाई की लत

लग गई थी. हम मौका मिलने पर रोज चुदाई करते.

पूरे छह महीने मैंने उसकी हर तरीके से चुदाई की, उसकी गांड भी मार ली. अब वो फैलने लगी थी. उसकी चूचियां

बड़ी होने लगी थीं. गांड चौड़ी होने लगी थी. उसका शरीर भी खिलने लगा, तो उसकी मां को उस पर शक होने लगा

था कि शायद उसकी लड़की बिगड़ने लगी है. पर बहुत पूछने पर भी उसने मेरा नाम नहीं बताया.

थक हार कर उसकी माँ ने पता नहीं किधर दूसरी जगह रूम चेंज कर लिया.

इस तरह एक जवानी दहलीज पर कदम रखती कमसिन लौंडिया मेरे हाथ से निकल गयी, पर जाने से पहले वो मुझे

मेरी जिंदगी के सारे मजे करा गयी. अब तो उसकी बुर पर काले बाल आने लगे थे. उसके नींबू, संतरे में बदल चुके थे.

बुर भी कुछ खुल गयी थी, पर मेरी बीबी से तो बहुत टाइट थी.

जो भी हो ऐसी लड़की सबको चोदने को मिले. उसने कभी मेरा माल बर्बाद नहीं होने दिया. या तो अपने मुँह में लिया

या अपनी बुर व गांड के अन्दर भरा लिया था. पता नहीं अब वो किस से चुदवाती होगी क्योंकि मैंने उसे ऐसा चस्का

लगा दिया था कि वो बिना चुदे रह ही नहीं सकती थी. चलो जिससे भी चुदती होगी उसके तो मजे ही आ गए होंगे.

samapt
 
कट्टो रानी

बात अक्टूबर, 2012 की है जब मैं अपनी बुआ की लड़की की शादी मैं गाज़ियाबाद गया हुआ था।

मुझे शादी का माहौल बहुत पसन्द है, जी भर के मौज-मस्ती, खाना-पीना, नए लोगों से मिलना

और सबसे खास चीज़... कट्टो

मेरे मम्मी-पापा भी साथ में थे। हम रेलगाड़ी से गाज़ियाबाद पहुँचे, फिर हमने घर जाने के लिये

ऑटो लिया और घर की तरफ़ रवाना हुए। जब हम गली के सामने पहुँचे तो हमने देख़ा कि बुआ

का लड़का संजू हमारे स्वागत के लिये गली के मोड़ पर ख़ड़ा है। उसने ऑटो को रुकवा लिया

और कहने लगा- अभी आप घर नहीं जा सकते।

तभी बुआ और फ़ूफ़ा भी वहाँ पहुँच गये, उनके साथ एक आन्टी भी आई थी। उस आन्टी को मैंने

पहले कभी नहीं देख़ा था, क्या मस्त माल थी यार, एकदम गोरी-चिट्टी, भरा-पूरा बदन और

एकदम कातिल मुस्कराहत और साड़ी में एकदम कयामत लग रही थी।

पर यह हमारी कहानी की कट्टो नहीं है, उसके लिये ज़रा इन्तजार कीजिये। फिर मैं अपने सोच

के सागर से बाहर आया...

मैंने बुआ-फ़ूफ़ा के पैर छूकर नमस्ते की और आन्टी को भी नमस्ते की।

बुआ ने कहा- अभी आप सब घर नहीं जा सकते, पहले भात की रस्म होगी उसके बाद ही घर जा

सकते हो।

मैंने कहा- बुआ जी, फिर क्या तब तक हमें सड़क पर ही खड़ा रख़ोगी?

बुआ- नहीं बेटा, रस्म तो शाम को होगी। तब तक आप सब इनके घर पर रुकोगे, बुआ ने आन्टी

की तरफ़ इशारा किया।

फिर हम सब बुआ के साथ आन्टी के घर की तरफ़ चल पड़े। आन्टी का घर बुआ के घर से

थोड़ा पहले उसी गली में था। हम आन्टी के घर पहुँचे, आन्टी ने हमे गैस्ट रूम में बिठाया। कमरे

में एक सोफ़ा सैट, एक पलंग, एक डाईनिंग टेबल और कुछ कुर्सियाँ रखी हुई थी। हम सभी उसी

कमरे में बैठ गये और आपस में बातें करने लगे।

आन्टी अन्दर चली गई और थोड़ी देर बाद नाश्ता लेकर आईं, जब वो आई तो मेरी आँख़ें फ़टी की

फ़टी रह गई। अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने ऐसा क्या देख़ा...

आन्टी के साथ एक लड़की थी जो कि चाय की ट्रे लिये हुए हमारी तरफ़ आ रही थी। मम्मी के

पूछने पर आन्टी ने बताया कि वो उनकी बेटी है...पूजा !

हमारी कहानी की कट्टो !

पूजा 18 साल की कमसिन जवान लड़की थी, वो 'बी सी ए' प्रथम वर्ष में थी। उसकी आँख़ें बड़ी

शरारती थी, बालों को बांध कर जूड़ा बनाया हुआ था जिससे वो बहुत कामुक लग रही थी, उभरे

हुए स्तन, गुलाबी होंठ, आँख़ों में सुरमा। उसने गुलाबी रंग का सूट पहना हुआ था और उस पर

जालीदार दुपट्टा, एकदम परी लग रही थी।

मैं काफ़ी देर तक उसे देख़ता रहा, मेरा ध्यान तब टूटा जब उसने मुझे चाय लेने को कहा, तब

जाकर मुझे होश आया कि वहाँ सभी बैठे हुए थे।

मैंने एक मुस्कान के साथ चाय का कप पकड़ा और उसने भी एक कातिल मुस्कराहट दी। फिर

पूजा वहाँ से चली गई। नाश्ते के बाद पापा, फ़ूफ़ा जी के साथ बाहर चले गये, बुआ-मम्मी-आन्टी

आपस में बातें करने लगीं। मैं वहाँ बैठा-बैठा बोर हो रहा था, मेरे दिमाग में तो पूजा नाम की परी

घूम रही थी।

तभी आन्टी ने मुझे देखकर एक कातिल मुस्कान के साथ कहा- क्या हुआ बेटा? तुम्हारा मन नहीं

लग रहा क्या, मैंने भी एक मुस्कान दी पर कुछ नहीं बोला।

तभी आन्टी ने आवाज़ लगाई- मोनू... मोनू...!

एक करीब 13-14 साल का लड़का कमरे में आया।

आन्टी- यह मेरा बेटा है...मोनू !

मम्मी- आपके कितने बच्चे हैं?

आन्टी- दो... एक लड़का और एक लड़की मोनू और पूजा।

फिर आन्टी ने मोनू से कहा- जाओ भईया, को अपने कमरे में ले जाओ !

मोनू ने मुझसे कहा- आईए भईया !

मैं उसके पीछे-पीछे चल दिया। हम सीढ़ियों से होते हुए ऊपर वाली मंजिल पर पहुँच गये। वहाँ

आमने-सामने दो कमरे बने हुए थे, बीच में थोड़ी जगह खाली थी, और एक तरफ़ तीसरा कमरा

था। उससे उपर वाली मन्जिल पर सिर्फ़ एक ही कमरा था। यह सब मैं आप सब को इसलिए

बता रहा हूँ ताकि आप लोग अपनी कल्पना को अच्छी तरह उभार कर कहानी का पूरी तरह मज़ा

ले सको।

तो बीच वाली मन्जिल पर जो आमने-सामने के कमरे थे, उनमे से एक मोनू का था और उसके

सामने वाला उसकी बहन पूजा का। मोनू मुझे अपने कमरे में ले गया और मुझे बैठने को कहा,

उसने टीवी ऑन किया और म्यूज़िक चैनल पर लगा दिया। मैंने देखा कि टीवी के पास में प्ले-

स्टेशन (विडियो गेम) रखा हुआ था, तो मैंने उससे पूछ लिया- मोनू तुम्हें गेम्स पसंद हैं क्या?

मोनू- हाँ... मुझे विडियो गेम्स खेलना बहुत अच्छा लगता है, क्या आप खेलेंगे मेरे साथ?

मैं- नहीं मोनू, मैं तो बस यूँ ही पूछ रहा था।

फिर मोनू बच्चों की तरह ज़िद करने लगा- प्लीज भईया एक-एक मैच, मैं फ़ाइटिंग की डी-वी-डी

लेकर आता हूँ, इतन कहकर वो नीचे चला गया। तभी मैंने सामने पूजा के कमरे की ओर देखा

जिसका दरवाज़ा बंद था। मैंने सोचा कि पूजा के कमरे में जाकर उससे मिलना चाहिए, अब वो

अकेली भी है, फिर मुझे लगा कि कहीं उसे इस तरह बुरा ना लगे।

तभी मुझे मोनू के ऊपर आने की आवाज़ आई, मैं टी-वी की तरफ मुँह करके बैठ गया। तभी

मोनू कमरे में आया और मुझे डी-वी-डी दिखाने लगा, फिर उसने प्ले-स्टेशन ऑन किया और डी-

वी-डी लगा दी। वो ड्ब्लू-ड्ब्लू-ई की डी-वी-डी थी, हमने अपने-अपने प्लेयर चुने और शुरु हो गये।

उसने प्ले-स्टेशन के साथ कम्प्यूटर के स्पीकर जोड़ दिये थे, जिससे बहुत तेज़ आवाज आ रही

थी। हम दोनों बड़े उत्साह के साथ खेल रहे थे, और मोनू जोर-जोर से चिल्ला रहा था। पूजा का

कमरा पास होने के कारण उस तक बहुत शोर जा रहा था।

थोड़ी देर के बाद पूजा ने कमरे का दरवाज़ा खोला और कमरे में घुसते ही मोनू पर चिल्लाई-

इतना शोर क्यो कर रहे हो, तुम्हारे इस शोर की वजह से मैं पढ़ नहीं पा रही हूँ।

मोनू ने पूजा और मेरा परिचय करवाया...

मोनू- आप भी हमारे साथ खेलो ना दीदी, बहुत मज़ा आ रहा है।

मैं पूजा से- जी बिल्कुल, अगर आप भी हमारे साथ खेलेंगी तो और भी मज़ा आएगा।

...इससे पूजा का गुस्सा कुछ कम हुआ।

पूजा मुस्कराती हुई- जी नहीं... मुझे पढ़ाई करनी है।

मोनू- प्लीज़ दीदी, थोड़ी देर के लिये खेलो ना।

पूजा- ठीक है बाबा लेकिन सिर्फ़ थोड़ी देर के लिये ही खेलूँगी।

मोनू- तो दीदी तैयार रहिये, अगली बारी आपकी है।

मोनू हम दोनों के बीच में बैठा हुआ था, मोनू और मैं खेल रहे थे लेकिन मेरा ध्यान गेम की

तरफ़ कम और पूजा की तरफ़ ज्यादा था। मेरा प्लेयर बुरी तरह पिट रहा था, पूजा खिलखिला

कर हंस रही थी।

फिर उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा- समीर जी, आपको तो खेलना ही नहीं आता।

मैंने कहा- मोनू बहुत अच्छा खेल रहा है, इसलिए मैं हार रहा हूँ, उसे क्या पता था कि मैं उसी

की वजह से हार रहा हूँ।

तभी किसी ने कमरे का दरवाज़ा खटखटाया, पूजा ने जाकर देखा।

पूजा- मोनू, तुम्हारा दोस्त आया है।

मोनू- मैं अभी आता हूँ।

मोनू ने अपने दोस्त से कुछ बातें की, फिर कहा- मैं अपने दोस्त के साथ जा रहा हूँ, आप दोनों

खेलो। इतना कह कर वो दरवाज़ा बंद करके चला गया।

इतनी जल्दी हुई इस गतीविधि से मेरी तो बांछें खिल गईं थी, मुझे कहाँ पता था कि मुझे इतनी

जल्दी मौका मिल जाएगा पूजा से अकेले में मिलने का। मैंने पूजा की तरफ़ देखा तो उसने शरमा

कर मुँह नीचे कर लिया और मुस्कराने लगी।

उसकी ये अदायें देखकर मैंने धीरे से अपने आप से कहा- बेटा समीर...अब तो लौंडिया फ़ंसी

समझो।

पूजा- कुछ कहा आपने...

मैं झिझकते हुए- नहीं... नहीं तो, कुछ भी तो नहीं।

मैं फ़िर से- बड़े तेज़ कान हैं साली के।

पूजा- आपने फिर कुछ कहा...

मैं- मैं... वो मैं कह रहा था कि खेल शुरु करते हैं।

पूजा- प्लीज़ रहने दीजिये ना मेरा मन नहीं है, चलिये ना कोई मूवी देखते हैं।

मैं- ठीक है, जैसी आपकी मर्ज़ी...

पूजा ने टी-वी ओन किया और चैनल बदल-बदल कर देखने लगी, कुछ देर बाद उसने टीवी बंद

कर दिया।

मैं- क्या हुआ...?

पूजा- कोई भी ढंग की फ़िल्म ही नहीं आ रही, चलो, मैं आपको अपने लैपटोप पर फ़िल्म दिखाती

हूँ।

मैं- ठीक है, आप यहीं पर ले आओ।

पूजा- आइये ना मेरे कमरे में ही चलते हैं।

मैं फ़िर खुद से- लगता है साली चुदने के लिए बड़ी उतावली हो रही है..!!

पूजा- आपने फिर कुछ कहा...

मैं- कुछ नहीं चलिए...

फ़िर हम दोनों पूजा के कमरे में गये, कमरे में बहुत अच्छी खुशबू फ़ैली हुई थी। गद्देदार बैड...

मानो हम दोनों को सम्भोग के लिए बुला रहा हो। कमरे में एक ओर पढ़ाई की मेज और दो

कुर्सी रखी हुई थीं, एक कोने में किताबों का रैक रखा हुआ था, एक कपड़ों की अलमारी और बैड

के साथ में एक सोफ़ा चेयर रखा हुआ था। पूजा ने मेज पर रखी किताबों को रैक में रख दिया

और अलमारी का लॉक खोल कर उसमें से लैपटोप निकाला।

मैं- आप लैपटोप को अलमारी में क्यों रखती हो?

पूजा- मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है कि कोई मेरी चीज़ों को हाथ लगाये, खास कर के मेरे

लैपटोप को, मैं इसे कभी भी किसी के साथ साँझा नहीं करती इसीलिए मैं इसे अलमारी में रखती

हूँ।

मैं- फ़िर आप मुझे क्यों दिखा रहीं हैं?

पूजा- आप तो...हमारे खास मेहमान हैं !

इतना कहकर वो कातिल मुस्कान बिखेरने लगी।

मैं भी मुस्कराकर- फ़िर... चलो ना अब दिखा भी दो।

पूजा चौंकते हुए- क्या....

मैं- वही... जिसके लिये आप मुझे अपने कमरे में लाई हो।

पूजा- मैं तो आपको फ़िल्म दिखाने लाई हूँ।

मैं- तो... मैं भी तो फ़िल्म दिखाने के लिए ही तो कह रहा हूँ।

पूजा- आपकी हंसी तो कुछ और ही बयान कर रही है।

मैं- हंस तो आप भी रही हो मैडम, आपकी हंसी का क्या राज़ है?

पूजा- मैं तो... बस यूं ही।

तभी नीचे से आंटी की आवाज़ आई- पूजा...॥

पूजा कमरे से बाहर निकलकर- हाँ मम्मी...?

आंटी- नीचे आ... थोड़ा काम है।

पूजा- मैं अभी थोड़ी देर में आती हूँ।

इतना कहकर वो नीचे चली गई।

पूजा के जाने के बाद मैंने सोचा क्यों न जब तक पूजा आती है तब तक लैपटोप की जांच-

पड़ताल कर ली जाए। दूसरों के कम्प्यूटर की खोजबीन करने में मुझे बड़ा मज़ा आता है। मैंने

लैपटोप ऑन किया लेकिन पूजा ने लैपटोप पर पासवर्ड लगा रखा था। मैंने पासवर्ड खोलने की

कोशिश की, सबसे पहले मैंने पूजा का नाम डाला फिर पूजा रानी और तरह-तरह के शब्दों का

प्रयोग किया लेकिन मेरा डाला गया कोई भी पासवर्ड सही नहीं निकला।

फिर मेरे दिमाग में एक शब्द आया- 'शोना'

लड़कियों को यह शब्द बहुत पसंद है तो मैंने पासवर्ड में शोना डाला और लैपटोप का पासवर्ड

खुल गया। मैंने अपने आप को शाबाशी दी और लगा लैपटोप का मुआयना करने।मैंने सोचा कि

पूजा एक कामुक लड़की है, अभी-अभी उसने जवानी में कदम रखा है, अपना लैपटोप सबसे छुपा

कर रखती है तो पक्का उसके लैपटोप में रेलगाड़ी होगी। अब आप लोग सोच रहे होगें कि

लैपटोप में कौन-सी रेलगाड़ी होती है, दोस्तों मैं सैक्सी फ़िल्म की बात कर रहा हूँ। मैं और मेरे

दोस्त इसे रेलगाड़ी कहते हैं। हम लोगों ने शाहिद कपूर की फ़िल्म "इश्क विश्क" देखी थी, उसमे

सैक्सी फ़िल्म को रेलगाड़ी की संज्ञा दी गई थी, बस तभी से हम लोग भी इसे रेलगाड़ी कहने

लगे।

मैं लैपटोप में पड़ी फ़ाइलों के विशाल संग्रह में रेलगाड़ी ढूँढने लगा लेकिन काफ़ी कोशिशों के बाद

भी मुझे सफ़लता नहीं मिली। फिर मेरे दिमाग की बत्ती जली और मैंने पहले खोली गई फ़ाईलों

का संग्रह निकाला, पहले खोली गई फ़ाईलों की सूची मेरे सामने थी। तभी मैंने एक फ़ाईल को

खोला तो मेरे होश उड़ गये, मेरे सामने रेलगाड़ी चलने लगी।

फ़िल्म चलते ही उसमें से कामुक आवाज़ें आने लगी तो मैंने घबरा कर उसे बंद कर दिया कहीं

कोई सुन न ले। मैं बहुत खुश था और साथ में आश्चर्य चकित भी। पूजा ने उन फ़ाइलों को बड़ी

ही चालाकी से छुपा रखा था, उसने उन फ़ाइलों को विंडोज वाली जगह पर डाल रखा था और

उनके नाम की जगह गिनती (1,2,3,4...) डाल रखी थीं।

पर उसने एक बहुत बड़ी गलती की थी कि पिछली फ़ाइलों को ना देख पाने का विकल्प नहीं

चुना जिसके कारण उसका राज़ खुल गया और मुझे रेलगाड़ी ढूँढने में सफ़लता हासिल हुई।

और आप लोगों को भी यह जानकर हैरानी होगी कि उस लैपटोप में फ़िल्मों का संग्रह 35 जी-बी

का था, मैंने इतना बड़ा संग्रह पहले कभी नहीं देखा था।

इतना बड़ा संग्रह देखकर मेरे अंदर रेलगाड़ी देखने की तीव्र इच्छा होने लगी। पहले मैंने कुछ

सावधानी बरतने की सोची, मैं कमरे से बाहर निकला और सीढ़ियों से नीचे की ओर देखा के कोई

आ तो नहीं रहा, फिर मैंने सोचा के नीचे चल कर देखता हूँ कि पूजा क्या कर रही है और उसे

कितना वक्त लगेगा आने में। मैं पानी पीने के बहाने से नीचे गया, सीढ़ियों से उतर कर मैं अंदर

की तरफ गया।

मैंने आंटी को आवाज़ दी तो सामने वाले कमरे में से आंटी की आवाज़ आई- आओ समीर अंदर

आ जाओ।

मैं कमरे के अंदर गया तो मैंने देखा कि आंटी बैड की चादर बदल रही थीं, उन्होंने चुन्नी नहीं

डाली थी और झुकने से उनकी चूचियाँ साफ-साफ दिख रही थीं, एक दम गोरी-गोरी, मोटी-मोटी

और रसीली।

मैं कुछ देर तक उनकी चूचियों को ही निहारता रहा।

आंटी एक शरारती मुस्कान के साथ बोली- बोलो समीर कुछ चाहिए क्या?

शायद उन्होंने मेरी हरकत को देख लिया था।

मैं (मन में)- चाहिए तो बहुत कुछ, आप क्या-क्या दे सकती हैं।

आंटी- क्या...

मैं- वो... आंटी जी मुझे पानी चाहिए।

आंटी- तो इतनी सी बात के लिए झिझक क्यों रहे हो बेटा, इसे अपना ही घर समझो, जाओ रसोई

में फ़्रिज रखा है वहाँ से पी लो।

मैं (मन में)- आंटी जी, मैंने जिस चीज़ के नजारे लिए हैं उसे देखकर तो कोई भी झिझकने

लगेगा।

मैं- ठीक है आंटी जी...॥

मैं रसोई की तरफ़ जाते हुए (अपने आप से) - अबे कमीने...या तो माँ को पटा ले या बेटी को,

किसी एक की तरफ ध्यान दे। भाई समीर हमें तो चूत चाहिए, जो खुश होकर दे देगी उसी की ले

लेंगे चाहे फिर माँ हो या बेटी हमे क्या फर्क पड़ता है। अबे यार... तू बड़ा कमीना इन्सान है।

रसोई में जाकर देखा तो पूजा बर्तन धो रही थी।

पूजा- अरे समीर आप, कुछ चाहिए क्या।

मैं- हाँ वो... मैं पानी पीने के लिए आया हूँ।

पूजा- फ़्रिज से निकाल कर पी लो।

मैं फ़्रिज से पानी की बोतल निकाल कर पानी पीने लगा, फिर उसे वापस फ़्रिज में रख दिया।

पूजा- सॉरी समीर, मैं तुम्हें अकेला छोड़ कर आ गई, मम्मी ने रसोई का काम दे दिया, तुम बोर

हो गए होगे ना।

मैं- नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।

पूजा- मुझे अभी शायद आधा घण्टा और लगेगा, तुम लैपटोप चला लो, उसका पासवर्ड शोना है।

मैं- थैंक्स...।

उस बेचारी को क्या पता था कि समीर द ग्रेट ने उसके लैपटोप का पासवर्ड पहले ही खोल दिया

है और उसके सारे राज़ मेरे सामने आ चुके हैं। फिर मैं ऊपर कमरे में आ गया और दरवाज़ा बंद

कर लिया लेकिन कुंडी नहीं लगाई क्योंकि अगर पूजा को इस तरह दरवाज़ा बंद मिलता तो उसे

शक हो सकता था कि कुछ गड़बड़ है।

मैंने लैपटोप को मेज पर रखा और कुर्सी पर बैठ गया। मैं उन फ़िल्मों को खोल-खोलकर देखने

लगा कि उनमें से कौन सी सबसे अच्छी है। फिर मैंने उनमें से एक फ़िल्म चुनी देखने के लिए।

यह फ़िल्म एक लड़की और उसके ट्यूशन मास्टर की थी, लड़की की उम्र करीब 18 साल और

मास्टर की उम्र करीब 35 साल की थी। लड़की सोफे पर बैठी हुई थी और उसके बगल में उसका

मास्टर। मास्टर एक किताब में से उसे कुछ पढ़ा रहा था पर लड़की का ध्यान किताब में नहीं था

वो अपने मास्टर की तरफ़ कामुक नज़रों से देख रही थी।

कुछ देर बाद लड़की उठी और मास्टर की तरफ़ पीठ करके खड़ी हो गई और अपनी छोटी सी

स्कर्ट को ऊपर उठा कर मास्टर को अपनी गांड दिख़ाने लगी। मास्टर किताब को एक तरफ फेंक

कर उसकी गांड पर हाथ फ़ेरने लगा। क्या मस्त गांड थी दोस्तों उस लड़की की, मेरा लंड जो कि

काफ़ी देर से झटके मार रहा था अपने पूरे रंग में आ गया।

जीन्स में लंड काफ़ी तंग लग रहा था मानो मेरा लंड मुझसे कह रहा हो, यार समीर अंदर मेरा

दम घुट रहा है प्लीज मुझे बाहर निकाल। मुझसे भी रहा नहीं गया और मैंने अपनी जीन्स की

चैन खोल कर अपना लंड बाहर निकाला तब जाकर मेरे लंड ने चैन की सांस ली अब वो आज़ादी

के साथ झटके लगा रहा था।

उधर मास्टर ने लड़की को पेट के बल सोफे पर लिटा दिया और उसकी गांड को जोर-जोर से

मसलने लगा और कभी उसकी गांड के गोल-गोल उभारों को चाटता तो कभी मुँह में लेने की

कोशिश करता जैसे कि उन्हें खा ही जाएगा। और मास्टर ही क्या अगर किसी को भी इतनी

सुन्दर गांड मिलती तो वो भी कोई कसर नहीं छोड़ता। फिर मास्टर सोफे पर बैठ गया और

लड़की घुटनों के बल बैठ कर उसकी पैंट की चैन खोलने लगी, मास्टर ने उसकी मदद की और

अपने लंड को बाहर निकाल लिया।

लड़की लंड को देखकर बहुत खुश हुई और लंड को पकड़ कर हिलाने और मसलने लगी। तभी

मास्टर ने अपने लंड की खाल को पीछे करके लंड की टोपी को बाहर निकाला और लड़की को

चूसने के लिए इशारा किया।

पहले तो लड़की ने लंड की टोपी पर अपनी जीभ फिराई और फिर लंड को पूरा मुँह में लेकर

चूसने लगी, और मास्टर असीम आनन्द का मज़ा ले रहा था।

मेरा एक हाथ मेरे लंड महाराज का मन बहला रहा था तो दूसरा लैपटोप के माउस पैड पर था।

फिर मास्टर ने लड़की के सारे कपड़े उतार कर उसे पूरी तरह नंगी कर दिया और फिर सोफ़े पे

लिटा कर उसके होठों का रस पीने लगा। फिर उसकी चूची चूसने लगा, वो चूचियों को जोर-जोर

से मसल-मसलकर उसके चूचकों को चूस रहा था।

लड़की की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मैं बस फ़िल्म का अधूरा मज़ा ले पा रहा था क्योंकि मैं

फ़िल्म कि आवाज़ नहीं सुन पा रहा था। वहाँ हैडफ़ोन भी नहीं था और मैं कोई जोखिम नहीं

उठाना चाहता था।

फिर मास्टर ने अपनी जीभ लड़की की चूत पर लगा दी और उसकी चूत चाटने लगा। कभी वो

अपनी जीभ को चूत के अन्दर-बाहर करके लड़की की चूत को चोदता, तो कभी चूत के दाने को

अपने होठों से पकड़ कर खींचता। फिर वो दोनों 69 की अवस्था में आ गये और जोर-जोर से एक

दूसरे को चूसने लगे। मास्टर अपनी जीभ से लड़की की चूत चोद रहा था और लड़की मास्टर के

लंड की जोरदार चुसाई कर रही थी जैसे उसे निगल ही जाएगी।

कुछ देर बाद दोनों अलग हुए।

मास्टर सोफे पर अपनी टांगें नीचे लटका कर बैठ गया और लड़की सोफ़े पर अपने घुटने मोड़कर

उसके लंड पर बैठ गई। लड़की का मुँह मास्टर की तरफ था और उसने मास्टर का लंड पकड़ कर

अपनी चूत से लगाया और लंड पर बैठकर उसे अपनी चूत में ले लिया।

लड़की लंड पर उछल-उछलकर अपनी चूत मरवा रही थी और मास्टर नीचे से झटके लगा रहा

था। मेरे सामने उस लड़की की जबरदस्त चुदाई हो रही थी जिससे मेरे सर पर सेक्स का भूत

चढ़ता जा रहा था। मैं अपने लंड को जोर-जोर से सहला रहा था, मेरा मुठ मारने का मन कर रहा

था पर मैं डर रहा था कि कहीं मेरी पिचकारी से लैपटोप, मेजपोश या कुछ भी गन्दा हो गया तो

मैं फस जाऊंगा। मेरी टांगें अकड़ने लगी थीं।

फिर मैं कुर्सी से उठा और लैपटोप लेकर बैड पर रख दिया। फिर एक तकिये को लंड के नीचे

लगा कर लेट गया। फिर मैंने एक दूसरी फ़िल्म चलाई। उसमे शुरु में ही एक लड़का एक मस्त

गांड को चोद रहा था, लड़की घुटनों के बल झुकी हुई थी और लड़का उसकी चिकनी गांड को ठोक

रहा था। मैंने भी एक हल्का सा धक्का लगाया तो मेरे लंड के नीचे मुलायम तकिया होने के

कारण मुझे कुछ मज़ा आया, तो मैं उस तकिये को लड़की मानकर धीरे-धीरे उसे चोदने लगा।

फ़िल्म में जोरदार चुदाई चल रही थी...॥ मैं पूजा के बारे में सोचते-सोचते तकिये को रगड़ रहा

था कि अभी पूजा आ जाये तो मैं उसकी जोरदार चुदाई कर दूँगा। मैं यह सोच कर निश्चिंत था

कि अगर पूजा आएगी तो उसके आने की आवाज़ सुनकर मैं अपनी स्थिति ठीक कर लूँगा, तभी

किसी ने एकदम से दरवाज़ा खोल दिया।

मैं अपने आप को संभाल नहीं सका और जैसा था वैसा ही लेटा रहा, मैंने फ़िल्म को बंद कर

दिया और तकिये को लंड के नीचे से खिसका कर अपनी छाती के नीचे लगा लिया। मैंने देखा

कि वो पूजा थी और मेरी हरकतों से मुझे शक भरी निगाहों से देख रही थी।

फिर वो मेरे पास आकर बैठ गई और अपनी भौंहे हिलाकर कहने लगी- क्या कर रहे हो समीर

जी?

मैं बुरी तरह घबरा गया था, पूजा को क्या पता था कि मैं किस हालत में लेटा हुआ था। आप

लोगों को तो पता ही होगा कि छुप कर सेक्स करने से घबराहट के कारण गला कुछ सूख सा

जाता है और आवाज़ दबी-दबी सी निकलती है।

मैं- कुछ नहीं यार, आपके लैपटोप में कोई खास फ़िल्म ही नहीं है।

पूजा- क्या हुआ समीर, आपकी आवाज़ कुछ...

मैं- ऊँ...ऊँह, वो... मेरा गला कुछ सूख गया है इसलिए... एक गिलास पानी मिलेगा?

पूजा- मैं अभी लाती हूँ।

पूजा कमरे से बाहर निकली और उसके दरवाज़ा बंद करते ही मैं जल्दी से उठा और अपने खड़े

लंड को मुश्किल से अंदर डाला, तभी पूजा ने झटके से दरवाज़ा खोलकर कहा कि पानी मटके का

पियोगे या फ़्रिज का। उसने मुझे पैंट की चैन बंद करते देख लिया था, फिर वो मेरे जवाब का

इंतजार किए बिना मुस्कराकर नीचे भाग गई।

मैं काफ़ी घबरा गया था... फिर मैं सोचने लगा कि जब उसे पता था कि मैं फ़्रिज का पानी पीता

हूँ, मैंने उसके सामने फ़्रिज से ही पानी निकालकर पीया था तो उसने फिर क्यों पूछा था मुझसे...

शायद वो सब जानती थी कि मैं अकेले में क्या कर रहा था उसके कमरे में, तभी तो वो मुस्करा

रही थी, लगता है मुर्गी फ़ंस चुकी है। तभी पूजा पानी लेकर आ गई और मुझे पानी दिया। मैंने

पानी पीया तो वो फ़्रिज का था, वो सब जानती थी कि मुझे कैसा पानी चाहिए, उसने तो मेरी

हरकतें देखने के लिए पानी के बारे में पूछा था।

मैंने अपने लंड की तरफ ध्यान किया तो वो अभी भी अपने रंग में था, फिर मैंने सोचा कि पेशाब

कर आता हूँ जिससे यह शांत हो जायेगा।

मैं पूजा को बोलकर चला गया कि मुझे बाथरुम जाना है। उसी मंजिल वाले बाथरुम में चला गया

और पेशाब करने लगा। पर यह इतना आसान नहीं था, ये मेरे पुरुष मित्र भली भांती समझ

सकते हैं कि खड़े लंड से पेशाब करना कितना मुश्किल होता है।

जैसे-तैसे मैंने पेशाब किया जिससे मेरा लंड कुछ शांत हुआ। फिर मैं बाथरुम से निकलकर पूजा

के कमरे की ओर बढ़ा।

मैं सोचने लगा कि पूजा मेरे बारे में क्या सोच रही होगी और इस वक्त क्या कर रही होगी, मैंने

छुप कर पूजा को देखने की सोची। मैं दरवाज़े के पास गया और धीरे से थोड़ा-सा दरवाज़ा खोल

कर अंदर झांकने लगा तो मैं दंग रह गया। जो तकिया मैंने अपने लंड के नीचे लगाया था, पूजा

उसे बड़ी मदहोश होकर सूंघ रही थी और अपने एक हाथ से कभी अपनी चूची तो कभी अपनी

चूत को मसल रही थी। मैं समझ गया कि माल एकदम तैयार है। मैंने भी झटके से दरवाज़ा

खोला तो पूजा उसी तरह घबरा गई जैसे मैं घबरा गया था। उसने तकिया एक तरफ फ़ेंका और

खड़ी हो गई।

पूजा- अरे...समीर तुम आ गए।

मैं- जी हाँ, मगर तुम इतनी घबराई हुई क्यों लग रही हो, क्या तुम्हारा भी गला सूख गया है

क्या...?

पूजा ने शरमाकर अपना मुँह नीचे कर लिया।

पूजा- नहीं ऐसा कुछ नहीं है।

मैं- तुम मुझे फ़िल्म दिखाने वाली थी।

पूजा- इतना कुछ तो तुमने देख लिया अब क्या बाकी रह गया।

दोनों का सच एक-दूसरे के सामने आ चुका था, पूजा अब खुल कर बात करने लगी थी। तो मैंने

भी थोड़ी हिम्मत की और जाकर दरवाज़े की कुंडी लगा दी।

पूजा- यह क्या कर रहे हो समीर, अगर कोई आ गया तो...?

मैं- कोई नहीं आएगा यार, डरो मत।

हम दोनों कुर्सी पर बैठ गए, और लैपटोप को मेज पर रख दिया। फिर मैंने सेक्सी फ़िल्मों की

लिस्ट निकाली तो पूजा कुर्सी से उठने लगी, मैंने पूजा का हाथ पकड़ कर उसे दोबारा बिठा दिया।

मैं- क्या हुआ पूजा, कहाँ जा रही हो?

पूजा- नहीं समीर, हम ये फ़िल्में साथ में नहीं देख सकते।

मैं- मगर क्यों यार?

पूजा- यह बहुत गंदी फ़िल्म हैं, मैं इन्हें अकेले में देखती हूँ, तुम्हारे साथ नहीं देख सकती, मुझे

शर्म आती है।

मैं- और जब तुम उस तकिये को इतनी मदहोशी से सूंघ रही थी तब तुम्हारी शर्म कहाँ थी।

पूजा शर्म से लाल हुई जा रही थी...॥

मैंने पूजा का चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर कहा- देखो पूजा, तुम मुझे बहुत पसंद हो, मैं तो

तुम्हें पहली बार देखते ही तुम पर फ़िदा हो गया था। यह कहकर मैंने अपने होंठ पूजा के रसीले

होठों से लगा दिए और उनका रस पीने लगा। पूजा ने मुझे बीच में ही अपने से अलग किया,

उसके चेहरे पर उसके अंदर की खुशी साफ झलक रही थी।

मैं- कैसा लगा...?

पूजा- समीर... बहुत अच्छा-अच्छा महसूस हो रहा है, यह मेरी ज़िंदगी का पहला चुम्बन है।

मैं- तो बीच में ही क्यों रोक दिया मेरी जान, आज मुझे अच्छी तरह अपने होठों का रस पीने दो।

पूजा- यह मेरा पहली बार है इसलिए मुझे लंबा चुम्बन लेने का अनुभव नहीं है।

मैं- तो अनुभव ले लो ना... इतना कहकर मैंने फिर से उसके होंठ अपने होठों से पकड़ लिये।

हम दोनों एक दूसरे के होठों को चूसने लगे, कभी मैं उसकी जीभ को पकड़ कर चूसता तो कभी

वो मेरी जीभ को। उसके गालों पर रखे मेरे हाथ अब धीरे-धीरे नीचे खिसकने लगे और उसके

कंधों से होते हुए उसकी कामुक, मोटी-मोटी और रसदार चूचियों पर आ गये, तो वो एकदम से

सिहर उठी।

मैं उसके चूचों को धीरे-धीरे सहलाने व दबाने लगा, वो कसमसाती हुई मुझे चूम रही थी। हम

काफ़ी देर तक एक दूसरे को चूमते रहे, हमारी सांसें तेज होती जा रही थी, पूजा की गर्म-गर्म सांसें

मेरे चेहरे से टकरा रही थी, हम एक-दूसरे से लिपट कर जाने कहाँ खो गये थे।

तभी किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी तो हमारा सारा नशा उड़ गया और हम दोनों बुरी तरह

घबरा गए। पूजा ने फ़ुर्ती से उठ कर अपना दुपट्टा ठीक किया और दरवाज़े की ओर बढ़ी। मैंने

लैपटोप को संभाला और उसमें जल्दी से एक विडियो गाना चला दिया। पूजा ने दरवाज़ा खोला तो

देखा कि बाहर मोनू खड़ा है।

पूजा- अरे मोनू तुम...

मोनू- समीर भईया, को नीचे बुलाया है।

और इतना कहकर वो नीचे चला गया।

हमारी तो जान में जान आई कि मोनू ने हमसे कोई सवाल नहीं किया, अगर कोई बड़ा होता तो

हम बुरी तरह फ़ंस जाते क्योंकि दरवाज़ा अंदर से बंद था और जवान छोरा-छोरी अकेले...॥

पूजा हंसते हुए बोली- बच गए यार... मेरी तो सांस ही अटक गई थी।

मैंने भी हंसते हुए कहा- तो फिर दोबारा से शुरु करें।

पूजा- जी नहीं, तुम्हें नीचे बुलाया गया है।

मैं- तो मैडम, फिर यह अधूरा काम कब पूरा होगा?

पूजा- इतनी भी क्या जल्दी है, अभी तो हम मिले हैं, सही वक्त आने पर इस अधूरे काम को पूरा

करेंगे, अभी तुम जाओ, नहीं तो फिर से कोई आ जायेगा।

मैं- ठीक है... अभी तो मैं जा रहा हूँ लेकिन मौका मिलते ही इस अधूरे काम को पूरा करुँगा।

इतना कहकर मैंने उसे कस कर अपनी बाहों में जकड़ लिया और एक लंबा व गहरा चुम्बन लिया

और नीचे चला गया।

नीचे पहुँच कर मैंने देखा कि भात की रस्म की तैयारी चल रही थी, काफ़ी सारी औरतें इकटठी हैं,

मेरी गाँव वाली बुआ भी आई हुई थीं।

कुछ देर बाद हम बुआ के घर पहुँचे और भात की रस्म पूरी की। घर पहुँच कर मैं अपने सारे

रिश्तेदारों से मिला और फिर मैं औरतों वाले कमरे में गया अपनी प्यारी-प्यारी भाभियों से

मिलने।

अंदर जाकर देखा तो मेरी सभी भाभियाँ वहाँ इक्ट्ठि थीं और उनके बीच एक ऐसा चेहरा था

जिसे देख कर मैं हैरान रह गया और साथ ही साथ मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहा। मेरी

खुशी की वजह सुलेखा भाभी थीं, वो मेरी गांव वाली बुआ के साथ शादी में आई थीं। मैंने सभी

भाभीयों को नमस्ते की, मुझे देख कर मेरी सारी भाभियाँ बहुत खुश हुईं और एक ने मुझे हाथ

पकड़ कर अपनी बगल में बिठा लिया और हम सभी आपस में हंसी-मजाक करने लगे।

मेरी बगल वाली भाभी बोली- देवर जी, अब आप आ गये हो तो शादी में और भी मज़ा आएगा।

तो मैंने उन्हें खोआ मारते हुए कहा- क्यों नहीं भाभी जी, आपको तो पूरा-पूरा मज़ा दूंगा !

और इस पर सभी भाभियाँ जोर से हंस पड़ीं।

सुलेखा भाभी भी मेरे एक तरफ बैठी हुई थीं, फिर मैंने सुलेखा भाभी को छेड़ने के लिए अपनी

एक भाभी से पूछा- भाभी, ये कौन हैं?

तो उन्होंने बताया कि ये बुआ के गांव से आई हैं, बुआ की पड़ोसन हैं और उनके साथ आई है, ये

भी तुम्हारी भाभी लगती हैं।

मैंने कहा- अच्छा... तो ये बुआ के साथ आई हैं, तभी तो कहूँ इन्हें पहले कभी नहीं देखा।

सुलेखा भाभी ने मेरी बाजू पर चुटकी काटी और मेरी तरफ आँख निकालते हुए बोली- अच्छा जी,

इतनी जल्दी भूल गये... ये मुझे 2 साल पहले से जानते हैं, जब गांव आए थे तब इनसे मुलाकात

हुई थी और अब देखो कैसे बातें बना रहे हैं।

थोड़ी देर बाद सब भाभियाँ कमरे से बाहर चली गईं, अब कमरे में सिर्फ़ मैं और सुलेखा भाभी

थी।

अब हम दोनों अकेले थे तो मैंने कहा- हमारा बेटा कहाँ है?

तो उन्होंने बताया कि वो बाहर बाकी बच्चों के साथ खेल रहा है। मैंने मोका देखकर सुलेखा

भाभी के गाल पर एक चुम्बन ले लिया।

भाभी- यह क्या कर रहे हो समीर? कोई देख लेगा तो, दरवाज़ा भी खुला हुआ है।

मैं- तो लो दरवाज़ा बंद किए देता हूँ...

यह कहकर मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया।

भाभी- अरे नहीं, कोई आ गया तो उसे शक हो जाएगा कि दरवाज़ा बंद क्यों है।

मैं- किसी को शक नहीं होगा मेरी जान, मैंने कुंडी नहीं लगाई है बाकी मैं सब संभाल लूँगा।

भाभी- तुम भी ना ! एकदम बेशर्म हो, तुम्हें पकड़े जाने का भी कोई डर नहीं है...।

मैं- अब तुम्हारे सामने भी कैसी शर्म...

इतना कहकर मैं सुलेखा भाभी के रस भरे होठों को रगड़ने लगा और उनका रस चूसने लगा। मैं

यह देखकर बहुत खुश हुआ कि भाभी मुझसे भी ज्यादा उतावली थी मेरे होठों को चूसने के लिए,

वो मेरे होठों को जोर-जोर से अपने होठों में पकड़ कर चूस रही थी और अपने दांतों से भी काट

रही थी। जिससे मेरे होठों में दर्द होने लगा।

मैं भाभी से अलग हुआ- क्या कर रही हो यार? खा जाओगी क्या मेरे होंठों को !

तो भाभी मेरी तरफ देखकर हंसने लगीं।

मैंने पूछा- अब क्या हुआ? हंस क्यों रही हो तुम?

भाभी ने मुझे उठाया और शीशे के सामने ले गईं, शीशे में देखकर मेरा माथा ठनका। मेरे होंठ,

गाल, माथा लगभग पूरा चेहरा भाभी के होंठों की लाली से गुलाबी हो गया था।

मैंने कहा- अब क्या होगा भाभी? मेरे चेहरे का तो तुमने पोस्टर बना दिया है, यह तो आसानी से

साफ भी नहीं होगा, किसी ने देख लिया तो?

भाभी ने कहा- पहले किसी कपड़े से पौंछ लो फिर साबुन से धो लेना, आसानी से साफ हो

जायेगा।

भाभी ने एक रुमाल लेकर बड़े प्यार से मेरे चेहरे को पौंछा, जिससे मेरा चेहरा कुछ साफ हुआ।

फिर मैं कमरे से बाहर निकला और बड़ी मुश्किल से सभी से अपना मुँह छुपा कर बाथरुम में

घुस गया। मैंने अपने चेहरे पर साबुन लगाया और फिर पानी से अच्छी तरह धोया, जिससे चेहरा

एकदम साफ हो गया। मैंने तौलिए से अपना मुँह पौंछा और फिर वापस कमरे में चला गया।

भाभी हंसते हुए- आ गए देवर जी, अब मुझसे कभी पंगा मत लेना, नहीं तो इससे भी बुरा हाल

करुंगी।

मैं- वो तो यहाँ इतनी भीड़भाड़ है वरना अकेले में मैंने तुम्हारा क्या हाल किया था भूल गईं क्या।

इस पर भाभी मुझे कातिल मुस्कान देने लगी।

भाभी- और सुनाओ समीर, कोई मिली या नहीं?

मैंने भाभी को अपने पेशे के बारे में कुछ भी नहीं बताया कि मैं एक जिगोलो बन गया हूँ, उनकी

नज़रों में मैं अब भी एक सीधा-सादा इंजीनियरिंग का छात्र था।

मैं- नहीं भाभी... मेरी तो कहीं दाल ही नहीं गलती।

भाभी- दाल यूं ही नहीं गलती देवर जी, थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है, कभी कोशिश भी की है?

मैं- बहुत कोशिशें की मगर कोई मछ्ली नहीं फ़ंसी कांटे में... पर...

भाभी- पर क्या...?

मैंने भाभी को पूजा के बारे में सब कुछ बता दिया।

भाभी- ओ... तो मामला एकदम फिट है तो फिर दिक्कत किस बात की है।

मैं- पूजा तो एकदम तैयार है पर भाभी मौका ही नहीं मिल रहा है और शायद कल मैं यहाँ से

चला जाऊँगा, पता नहीं हमारा मिलन हो पाएगा या नहीं। कुछ तो करो भाभी प्लीज...

भाभी ने थोड़ी देर सोचने के बाद कहा- मैंने सोच लिया देवर जी कि आपका पूजा के साथ मिलन

करवा के रहूँगी वो भी आज रात ही।

मैं- भाभी मैं तुम्हारा बहुत आभारी रहूँगा, पर यह सब होगा कैसे? दोनों ही घरों में काफ़ी लोग

जमा हैं।

भाभी- अभी तो भीड़ है पर रात को सब शादी में शरीक होने के लिए बैंक्वेट हाल जायेंगे, तब

यहाँ तो कोई ना कोई रुकेगा क्योंकि शादी वाला घर है पर उस वक्त पूजा के घर कोई नहीं

होगा।

वो समय ही तुम दोनों के मिलन के लिए एकदम सही रहेगा।

भाभी की यह योजना सुन कर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा और मैंने उनके गाल को चूम कर

उनका धन्यवाद किया। धीरे-धीरे समय बीत गया और शाम को 8 बजे के करीब सभी लोग

बैंक्वेट हाल चले गये। मैं भी संजू (बुआ का लड़का) के बैंक्वेट होल की तरफ रवाना हुआ, घर से

5 मिनट की दूरी पर ही था।

जैसा कि भाभी ने कहा था हमारे घर पर एक-दो बंदे रुके थे घर की देखभाल के लिए, पर पूजा

के घर के बाहर मैंने ताला लगा हुआ देखा तो सोचा कि सब भाभी की योजना के मुताबिक चल

रहा है।

बैंक्वेट होल पहुँच कर मैं सभी मेहमानों से मिला।

वहाँ मैंने पूजा को देखा तो मेरा चेहरा खिल उठा और हम खाना खाते-खाते एक दूसरे को दूर से

ही प्यासी निगाहों से देख रहे थे और मुस्करा रहे थे।

तभी किसी ने पीछे से मेरी पीठ थपथपाई, मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वो सुलेखा भाभी थीं।

भाभी ने बताया कि उन्होंने पूजा को सब कुछ समझा दिया है कि क्या करना है और मुझे भी

आगे की योजना बताई।

करीब 11 बजे तक लगभग सभी अन्य मेहमान सोने के लिए खिसक चुके थे, सिर्फ कुछ लोग ही

बचे थे जिन्हें सारी रात वहीं रुकना था।

मैं बुआ के पास गया, वहाँ मम्मी और आंटी भी बैठी हुई थीं, मैंने बुआ से कहा- मुझे जोरों की

नींद आ रही है। बताइए सोना कहाँ है? घर में तो काफी भीड़ होगी।

मैंने ये सब आंटी को सुनाने के किए किया था, उसका असर यह हुआ कि आंटी ने कहा- हाँ

समीर, तुम वहाँ परेशान हो जाओगे, तुम हमारे घर जाकर सो जाओ, वहाँ कोई नहीं है !

और यह कहकर उन्होंने घर की चाबी मेरे हाथ में दे दी। मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे मुझे

किस्मत की चाबी मिल गई हो।

मैं पूजा के घर का ताला खोलकर अंदर गया और पूजा का इंतजार करने लगा।

योजना के अनुसार पूजा ने घर आने के लिए सुलेखा भाभी का सहारा लिया। उसने आंटी से

कहा- मम्मी... भाभी और मैं सोने जा रहें हैं, घर की चाबी दे दो।

आंटी ने कहा - चाबी समीर ले गया है वो हमारे ही घर पे सो रहा है, तुम भाभी के साथ जाओ

और मोनू को भी ले जाना उसको कल स्कूल भी तो जाना है।

थोड़ी देर में पूजा, भाभी और मोनू आ गए, पूजा ने मोनू से कहा- तू जाकर अपने कमरे में सो

जा, हम तीनों नीचे ही सोएगें, अगर कोई आएगा तो दरवाज़ा भी तो खोलना है।

मोनू ऊपर चला गया और पूजा ने जीने का दरवाज़ा बंद कर दिया।

फिर हमारा खेल शुरु हुआ...

मैंने पूजा को गोद में उठाया और अंदर कमरे में ले जाकर बैड पर पटक दिया। मैं उसे बेतहाशा

चूमने लगा और उसके कपड़े उतारने लगा, तो पूजा ने शरमाते हुए कहा- समीर... भाभी देख रहीं

हैं।

मैंने भाभी की तरफ देखा तो भाभी मुस्कराकर बोली- देवर जी बड़ी जल्दी में हो, भाभी को तो

भूल ही गये।

मैंने कहा- आप भी आ जाओ भाभी सब मिल कर मज़ा करेगें। भाभी ने पास आकर कहा- तुम

दोनों मज़े करो, मैं तो बस तुम्हें देख कर ही काम चला लूंगी और मुझे पहरा भी तो देना है कहीं

कोई आ गया तो?

इतना कहकर मेरे होठों पे चुम्बन दिया और बाहर की तरफ चली गईं।

फिर मैंने झटाक से पूजा के सारे कपड़े उतार दिए सिर्फ़ पैंटी को छोड़कर और उसे बिस्तर पर

लिटाकर चूमने लगा। मेरे सामने एक कच्ची कली नंगी पड़ी थी और मुझे यह सब एक हसीन

सपने की तरह लग रहा था। कमरे में पूरी तरह उजाला था और पूजा का गोरा बदन सोने की

तरह चमक रहा था। मैंने पूजा की रसीली चूचियों को मसलना शुरु किया और उसके चूचुकों से

रस पीने लगा।

पूजा की सीत्कारें पूरे कमरे में गूंज रहीं थी, घर में कोई नहीं था तो हम दोनों ही कामुक आवाज़ें

निकाल कर सेक्स का पूरा मज़ा ले रहे थे।

पूजा- आह्... ओह्ह्ह... आह्ह्ह आऊच... समीर ! मैं कहीं भागी थोड़ी ना जा रही हूँ बाबा, ज़रा

आराम से करो ना।

मैं- ओह मेरी रानी, तू तो मेरी है पर कमबख्त यह वक्त तो भागा जा रहा है ना, फिर ये मौका

मिले न मिले।

फिर मैंने पूजा की पैंटी भी उतार फ़ेंकी। क्या बताऊँ यार, एकदम गोरी और लाल-लाल चूत थी

उसकी एकदम अंग्रेजन की तरह। उसकी चूत ही इतनी प्यारी थी कि बिना हाथ लगाए ही मैंने

अपनी जीभ उसकी चूत पर लगा दी।

पूजा बिस्तर पर सिकुड़ने लगी और खिलखिलाते हुए कहने लगी- यह क्या कर रहे हो समीर,

मुझे तो गुदगुदी सी हो रही है।

मैंने कहा- मेरी जान तेरी चूत पहली बार चुदते हुए शरमा रही है, आज इसकी सारी शर्म निकाल

दूँगा।

फिर मैं पूजा की चूत चाटने लगा, अपनी जीभ को उसकी चिकनी चूत में डालने लगा लेकिन

उसकी चूत की सील बंद होने के कारण सिर्फ़ जीभ का अग्र भाग ही पूजा की चूत में जा पा रहा

था। फिर मैं उसकी चूत को अपने होठों में भर-भर कर चूसने लगा और उसके चूत के दाने को

धीरे-धीरे अपने दांतों से मसलने लगा।

पूजा बुरी तरह छ्टपटा रही थी और जोर जोर से सीत्कार रही थी- आआ...ह्ह्ह्ह ऊओह्ह्ह्ह

समीर ! बहुत अच्छा लग रहा है, मज़ा आ रहा है... आआऊच आह्ह !

मैंने कहा- मेरी जान ये तो शुरुवात है असली मज़ा तो तुझे चुदाई में आएगा।

तभी मेरा ध्यान कमरे के दरवाज़े की तरफ़ गया तो मेरी आँखें हैरानी से फ़टी रह गईं, मेरे

सामने चौंका देने वाला नज़ारा था।

सुलेखा भाभी दरवाज़े के सामने कुर्सी पर बिल्कुल नंगी बैठी हुई थी और अपनी टांगों को फ़ैला

कर अपनी चूत को उंगली से चोद रही थी। पूजा और मैं इतनी मदहोशी में थे कि हमें पता ही

नहीं चला कि भाभी कब से वहाँ बैठी थी, इतने दिनों बाद भाभी की कंटीली जवानी देख कर मेरी

आँखों में चमक आ गई।

भाभी ने मुझे अपनी ओर आने का इशारा किया तो मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और पूजा

को छोड़कर भाभी के पास चला गया। भाभी ने अपनी टांगें और फ़ैलाकर ऊपर उठा लीं, मैं समझ

गया कि वो मुझे अपनी चूत चूसने का निमंत्रण दे रहीं हैं। तो मैं देर ना करते हुए भाभी की चूत

को अपने होठों से पकड़-पकड़ कर चूसने लगा। भाभी अपनी चूत की चुदाई पहले ही उंगली से

कर चुकी थीं, इसलिए उनकी चूत से काम रस बह रहा था जिसे मैं बड़े मज़े से चाटे जा रहा था।

भाभी अपनी चूत को पहले ही मसल चुकी थीं, इसलिए ज्यादा देर तक नहीं टिक सकीं और मेरे

सिर को पकड़ कर अपनी चूत पर दबाने लगीं।

मैं समझ गया कि भाभी अपने काम रस से मेरा मुँह धोने वाली हैं। पर मैं उनका काम रस पीने

के मूड में नहीं था इसलिए मैंने अपना मुँह उनकी चूत से हटाया और अपनी दो उंगलियों से

उनकी चूत चोदने लगा। कुछ ही देर में भाभी जोर-जोर से आह्ह्ह ओ... ओ... ह्ह्ह ऊउफ़्फ़

ह्हाआए एएए सी... आह्ह करती हुई झड़ने लगीं। सारा पानी झड़ने के बाद मैंने भाभी की चूत

को एक कपड़े से अच्छी तरह साफ़ किया और खड़ा हो गया।

भाभी मेरे लंड पर हाथ फ़िराने लगी, फिर पैंट से बाहर निकाल कर चूसने लगीं। कुछ देर बाद

भाभी खड़ी हुई और मेरा लंड पकड़ कर मुझे पूजा के पास ले गईं, और पूजा से मेरा लंड चूसने

को कहा।

पूजा मना करने लगी तो भाभी ने उसे समझाया कि लंड चूसने में बड़ा मज़ा आता है और बिना

लंड चूसे तो चुदाई का मज़ा ही नहीं है। पूजा फिर भी नहीं मानी तो भाभी मेरा लंड चूस-चूस कर

पूजा को चुम्बन देकर मेरे लंड का स्वाद पूजा को देने लगी।

ऐसा करने से पूजा की जीभ को मेरे लंड का स्वाद लग गया और उसकी शर्म जाती रही। अब

उसने मेरा लंड थाम लिया और उसे नीचे से ऊपर तक चाटने लगी, मेरे टट्टों को मसलने लगी।

फिर उसने मेरा लंड चूसना शुरु किया, वो मेरे लंड को गपागप चूस रही थी और मेरे मुँह से

कामुक आवाज़ें निकल रही थीं... आअह्ह्ह ओह्ह्हा आह्ह और चूस मेरी जान मेरे लंड को पूरा

मुँह में ले।

ऐसा कहकर मैंने अपना लंड उसके मुँह में पूरा अंदर तक ठूँस दिया और उसका मुख चोदन करने

लगा।

फिर भाभी ने कहा- चल अब देर ना कर ! जल्दी से इस बेचारी की सील तोड़ दे ! अगर कोई आ

गया तो बेचारी तड़पती रह जाएगी। मैंने अपना लंड पूजा के मुँह से बाहर निकाल लिया, भाभी ने

पूजा को लिटाया और उसकी चूत को चूस कर कहा- ले समीर, जल्दी कर ! इसकी चूत चुदने के

लिए तैयार है !

और इतना कहकर भाभी ने पूजा की चूत पर ढेर सारा थूक डाल दिया। मैंने पूजा की टांगों को

अच्छी तरह फ़ैलाया और अपना लंड पूजा की चूत पर रगड़ने लगा जिससे वो बिस्तर पर नागिन

की तरह कसमसाने लगी। भाभी ने मेरी पीठ पर एक चांटा मारा- क्यूँ तड़पा रहा है बेचारी को,

जल्दी से इसकी चूत की सील तोड़...

फिर मैंने लंड को चूत के द्वार पर रखा और झटके से लंड को अंदर करने की कोशिश की

लेकिन नाकाम रहा, पूजा की चूत भाभी के थूक से बहुत चिकनी हो चुकी थी इस कारण मेरा लंड

फिसल गया। मैंने फिर से निशाना साधा और शॉट लगाया और इस बार मेरे झटके से लंड पूजा

की चूत में घुस गया।

पूजा की चूत की सील खुल चुकी थी लेकिन अभी मेरा लंड पूजा की चूत में आधा ही घुस पाया

था। पूजा की आँखों में खुशी के आँसू छलक आये और वो जोर-जोर से सिसक रही थी, फिर मैंने

पूजा की हालत देखकर अपना लंड पूजा की चूत से बाहर निकाला।

पूजा ने अपनी चूत का हाल देखने के लिए अपना हाथ चूत की तरफ उठाया लेकिन भाभी ने

उसका हाथ पकड़ लिया और उसके हाथ से अपने चूचे दबवाने लगीं, अगर पूजा अपनी चूत में

आए खून को देख लेती तो वो बहुत ज्यादा घबरा जाती।

भाभी और मैं पूजा के चूचों को मसल रहे थे और मैं कभी पूजा को तो कभी भाभी को चूम रहा

था। थोड़ी देर बाद जब पूजा सामान्य हुई तो मैंने फिर से अपना लंड पूजा की चूत में डाल दिया

और धीरे-धीरे झटके लगाने लगा।

अब पूजा को भी मज़ा आने लगा तो उसने अपनी टांगे उठाकर मेरी कमर पर लपेट लीं और

अपनी कमर हिला-हिलाकर अपने आनंद का सिगनल देने लगी। हम काफ़ी देर तक इसी मुद्रा में

सम्भोग के आनंद में डूबे रहे।

भाभी हमारे बगल में लेटी हुई थी और हमें देखकर अपनी चूत को मसल रही थी और मैं भाभी

के चूचों को दबोच रहा था। तभी पूजा का शरीर अचानक से सिकुड़ने लगा, उसकी आँखें बंद होने

लगीं और पूजा मुझे अपनी टांगों के बीच में कसने लगी। मैं समझ गया कि अब पूजा झड़ने

वाली है, मैंने भी अपनी गति को बढ़ाया और तेज़ी से धक्के देकर पूजा की चूत को चोदने लगा।

थोड़ी देर बाद पूजा ने अपनी आँखें बंद कर ली और आंह्ह ऊउह्ह्ह्ह ओह्ह्ह सी...सी... करके

झड़ने लगी। उसके कामरस में इतना उबाल था कि मैं भी पिंघल गया और पूरी तेज़ी के साथ

चोदते हुए उसकी चूत में ही झड़ने लगा।

मैं पूजा की चूत में लंड फ़साये उसके ऊपर ही पड़ा हुआ था। भाभी मेरे सिर पर हाथ फ़ेरते हुए

कहने लगी- उठो ना देवर जी, अब छोड़ भी दो बेचारी को और इसकी चूत को थोड़ा सांस तो लेने

दो, मेरी चूत पर भी कुछ तरस खाओ और अब इसका भी बाजा बजा दो।

मैं पूजा के उपर से उठा तो उसकी चूत से ढेर सारा कामरस बाहर निकला और उसके चूतड़ों से

होता हुआ चादर पर गिर गया। भाभी ने पूजा से पेशाब कर आने को कहा ताकी उसका गर्भ ना

ठहरे और पूजा बाथरुम चली गई।

मैंने चादर पर गिरा हुआ कामरस कपड़े से साफ़ किया और फिर से बिस्तर पर लेट गया। अब

भाभी मेरे ऊपर आ गई और मुझे चूमने लगी, मैं भी भाभी के होंठों का रसपान करने लगा।

भाभी कहने लगी- समीर, तुम मुझे इतने दिनों बाद मिले हो, आज तो मुझे जन्नत की सैर करा

दो मेरे राजा।

मैंने कहा- क्यों नहीं भाभी, आप इतने दिनों बाद मिली हो तो आपकी खातिर तो करनी ही पड़ेगी!

इतना कहकर मैं भाभी को चोदने के लिए उठने लगा, तो भाभी ने मुझे धक्का देकर लिटा दिया।

भाभी- तुम्हें उठने की ज़रुरत नहीं है, जो मुझे चाहिए मैं अपने आप ले लूँगी।

भाभी मुझे चूमती हुई नीचे लंड तक पहुँच गई और बड़े प्यार से मेरे लंड को सहलाने लगी

जिससे मेरा लंड अपने विशाल रूप में आने लगा। फिर भाभी ने मेरा लंड पूरा का पूरा अपने मुँह

में ले लिया और चुप्पे लगाने लगी।

मेरे मुँह से आह्ह्ह ओह्ह्ह भाभी... मेरी रानी, क्या मस्त चुस्क्कड़ है तू ! निकल रहा था और मैं

अपनी कमर उछालने लगा।

इतने में पूजा वहाँ आ गई- ओ... तो देवर-भाभी की रास लीला शुरु हो गई, मेरी प्यारी सी चूत

का भौंसड़ा बना दिया और अब दोनों मिल कर ऐश कर रहे हो।

पूजा मेरे मुँह के उपर टांगें चौड़ी करके अपनी चूत दिखाने लगी- देखो समीर, तुमने मेरी चूत का

क्या हाल बना दिया है, बेचारी कितनी रो रही है अब इसे पुचकार तो दो...

इतना कहकर पूजा ने अपनी चूत मेरे मुँह पर रख दी और रगड़ने लगी। मैं पूजा की चूत में

अपनी जीभ घुमाने लगा, उसकी चूत एकदम फ़्रैश लग रही थी शायद वो धोकर आई थी। अब

पूजा की चूत खुल चुकी थी तो मेरी जीभ उसकी चूत में पूरी अंदर जा रही थी।

उधर... भाभी चूस-चूस कर मेरे लंड़ का पानी निकालने पर तुली थी पर मैंने अपने आप को

संभाला हुआ था ताकी भाभी की जोरदार चुदाई कर सकूँ।

फिर पूजा ने भाभी को हटा दिया और हम 69 की मुद्रा में आ गए। अब पूजा मेरे लंड के चुप्पे

लगाने लगी और साथ-साथ अपनी चूत को जोर-जोर से हिलाकर मेरे मुँह पर रगड़ रही थी। थोड़ी

देर के बाद पूजा ने मुझे संभलने तक का मौका ना देते हुए अपनी चूत का सारा पानी मेरे मुँह

पर झाड़ दिया। मैंने पूजा को अपने ऊपर से हटाने की कोशिश की पर नाकाम रहा, उसने मेरे मुँह

को अपनी टांगों के बीच कस कर जकड़ा हुआ था और लगातार अपनी चूत मेरे मुँह पर रगड़े जा

रही थी। जब मेरी सांस रुकने लगी तो मैंने पूजा की चूत के दाने को दांतों से काट लिया, तब

जाकर पूजा ने मुझे अपने चुंगल से आज़ाद किया, तब मुझे एक जवान लड़की की ताकत का

अंदाज़ा हुआ।

भाभी जोर-जोर से हंसने लगी- समीर, दिन में तो मैंने अपनी लिप्सटिक से तुम्हारा मुँह लाल

किया था लेकिन पूजा ने तो अपने काम रस से तुम्हारा मुँह एक दम से सफेद बना दिया है,

शाबाश पूजा...

मैं बाथरुम में गया और अपना मुँह अच्छी तरह साबुन से धोया, कुल्ला किया और वापस कमरे

में गया।

पूजा- क्यों समीर... मेरे रस को पीने से कुछ ताकत आई या नहीं...?

यह कह कर पूजा और भाभी हंसने लगीं।

मैं- अब देखो... मैं तुम दोनों का क्या हाल करता हूँ।

भाभी- मैं तो कब से तड़प रही हूँ राजा, कर दे मेरा काम तमाम।

मैं जैसे ही बैड के नजदीक गया, भाभी ने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया और मेरे ऊपर चढ़ गई,

भाभी ने मेरा लंड अपनी चूत से लगाया और झटके से बैठ गई। एक ही बार में मेरा पूरा का पूरा

लंड भाभी की चूत में चला गया और भाभी की आह निकल गई। भाभी उछल उछल कर अपनी

चूत चुदवा रही थी और मैं भी नीचे से झटके लगा रहा था।

कुछ देर बाद मैंने भाभी को अपने नीचे लिटा लिया और भाभी की जबरदस्त चुदाई की और

भाभी के सारे कस-बल निकाल दिए।

हम तीनों ने मिलकर सुबह के 4 बजे तक सैक्स का जी भर कर लुत्फ़ उठाया, मैंने अपने काम

रस से भाभी और के मुँह का मेकअप भी किया ठीक उसी तरह जैसे पूजा ने मेरा किया था।

तो दोस्तो, यह थी... कुंवारी चूत के साथ मेरे संभोग की कहानी।
 
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