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असली या नकली

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असली या नकली



लेखक-रोकी

ये कहानी शुरू होती है 60 के दशक के भारत से

सन 1960 , विभाजन की मार झेल चुका भारत देश धीरे धीरे फिर से अपने आपको संवारने में लगा हुआ था, अमीरी गरीबी का फर्क उस समय बहुत ज्यादा था, वो भी खासकर बम्बई जैसे बड़े शहर में

जी हां कहानी शुरू होती है भारत की औद्योगिक नगरी मुम्बई जिसका नाम उस समय बम्बई था, ऊंची ऊंची इमारतों ने शहर की आबादी को बढ़ाना शुरू कर दिया था, लाखो की तादाद में मिडिल क्लास फैमिली के लोग किसी तरह इस चकाचोंध वाले शहर में अपनी गुज़र बसर कर रहे थे, कुछ किस्मत वाले ऐसे भी थे जिनके पास बेशुमार दौलत थी, जिनके लिए पैसा सिर्फ हाथ का मैल था, परन्तु सबसे बुरी हालत थी छोटी छोटी बस्तियों में रहने वाले गरीब लोगों की, जो बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा कर पा रहे थे, दिन भर घर का मुखिया जी तोड़ मेहनत करता तब कहीं जाकर 2 वक्त की सूखी रोटी का इंतेज़ाम हो पाता, उन गरीबो के लिए दिन भर में मुश्किल से 2 रुपये ही कमाना बड़ा मुश्किल होता था, उन 2 रुपयों में ही उनके दिन भर का खर्चा चलाना पड़ता था, (हालांकि उस समय के 2 रुपये की कीमत आज से ज्यादा है)

परन्तु भगवान गरीबी के साथ सब्र बिल्कुल मुफ्त देता है, भले ही वो लोग गरीब थे पर उनके मन मे हमेशा सब्र रहता था, उन्हें पैसो का लालच नही होता था बस 2 वक्त के गुजारे की चिंता होती थी

ऐसी ही एक गरीब बस्ती में मैं आप लोगो को ले जा रहा हूँ, इस बस्ती के भी बाकी जगह की तरह गरीब लोग ही रहते थे, बेचारे किसी तरह अपने परिवारों का पालन पोषण करते और अपनी ज़िंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते, ज्यादातर लोग मजदूरी करके ही अपना पेट भरते थे , कुछ मैकेनिक थे, तो कोई इक्का दुक्का लोग कहीं ठेला लगाकर अपना जीवन काट रहे थे,

सब लोग दिन भर जमकर मेहनत करते तब कहि जाकर रात को खाने का गुजारा होता, पर उनके मन मे संतोष रहता था, रात को अक्सर आपस मे बैठकर गप्पे मारते और कभी कभी रात को भजन भी कर लेते

इसी बस्ती में एक छोटा सा घर मोहन का भी था, मोहन एक 25 साल का मेहनती इंसान जिसके मा बाप बचपन मे ही चल बसे थे, पीछे रह गयी थी उसकी एक बहन माला , जिसे पाल पोष कर उसी ने बड़ा किया था, माला लगभग 19 साल की थी, मिज़ाज़ की ज़रा गरम थी, अक्सर मोहन को भी किसी बात के लिए डांट दिया करती थी, पर थी दिल की बड़ी साफ, दोनों भाई बहन किसी तरह अपने जीवन को काट रहे थे

अब कहानी के कुछ और किरदारों की तरफ बढ़ते हैं

गरीबों और मिडिल क्लास के लाखों परिवारों की तरह यहां कुछ ऐसे खुश नसीब परिवार भी थे, जिन्हें अमीरी में जीने का सुख मिल रहा था, ऐसा ही एक धनी और अमीर परिवार सेठ बद्री प्रसाद का भी था,

बद्री प्रसाद, एक 65 साल का बूढ़ा आदमी, जिसने अपनी मेहनत से सपनों के इस शहर में खुद के सपने को पूरा किया था, यह उसी की मेहनत का नतीजा था कि आज उसकी गिनती शहर के सबसे अमीर खान दानों में होती थी, उससे एक बार मिलने के लिए मंत्री भी लाइन लगाने को तैयार रहते थे,

बद्रीप्रसाद 65 साल

बेशुमार दौलत, बेहिसाब हीरे-जवाहरात, कई गाड़ियां, सैंकड़ो फैक्ट्रियां और भी ना जाने क्या-क्या, पग पग पर सिर्फ पैसा ही पैसा , इतनी धन दौलत की अगर गिनने बैठे तो कई दिन लग जाये

बद्री प्रसाद के 2 बेटे थे - बड़ा महेश (45 साल ) और दूसरा जगदीश (43 साल )

दोनों बेटे बाप की तरह ही बहुत मेहनती थे और काम में अपने पिता का हाथ बटाते थे, सारे काम काज का मुखिया अभी भी बद्री प्रसाद खुद ही था,

कहते हैं ना भगवान पैसे के साथ घमंड और लालच फ्री में देता है, यही बद्री प्रसाद और उसके बेटों के साथ भी था, अनगिनत पैसों ने उन्हें और भी ज्यादा लालची और अहंकारी बना दिया था, किसी से सीधे मुंह बात तक नही करते , दिन रात बस पैसे बनाने में लगे रहते, अपने वर्कर्स से जितना ज्यादा हो सकता उतना काम करवाते और जितनी कम हो सके उतनी पगार देते, गरीबो को वो लोग अपने पैर की जुती समझते थे , पैसो के लालच ने उन्हें पूरी तरह अँधा बना दिया था

अब हम बद्री प्रसाद के बेटों के परिवार के बारे में जानते हैं

बद्री प्रसाद के बड़े बेटे महेश की शादी रमा से हुई थी,

रमा 42 साल

रमा भी एक अमीर खानदान की लड़की थी, उसका जीवन भी सारे एशो आराम से गुजरा था, रमा 42 साल की एक गृहिणी थी , कसा हुआ बदन, तीखे नैन नक्श, कजरारी आंखे, सांचे में ढली हुई कमर, भारी नितम्ब और सुडौल जाँघे , जिन्हें देखकर कोई भी दीवाना हो जाये

उसका पूरा दिन बस घर के काम काज में ही गुजरता था, पहले के जमाने में वैसे भी बहुत कम लडकियों को जॉब करने की इज़ाज़त मिलती थी , और वो भी तब जब घर में कोई और कमाने लायक न हो ,

रमा जब पहली बार बहु बनकर उनके घर आई थी, तो उनके घर की चका चोंध देखकर उसकी आँखे भी बड़ी हो गयी थी , भले ही वो खुद भी एक आमिर खानदान से ताल्लुक रखती थी , परन्तु सेठ बद्रीप्रसाद का बंगला तो किसी महल से कम ना था ,

रमा को लगा था कि उसके पिता ने उसके लिए सबसे अच्छा रिश्ता ढूँढा है, पर जल्द ही उसकी ये गलत वहमी दूर हो गयी , शादी के कुछ दिन तक तो महेश उसे समय देता था , परन्तु बाद में वो अपने कामो में इतना खो गया था कि रमा के लिए समय भी नही निकाल पाता था, रमा हमेशा से ही एक सेक्सी और चुदाई की शौक़ीन लडकी रही थी, पर शादी से पहले उसने अपने आपको बिलकुल अछुता रखा था, ये उसकी तमन्ना थी कि उसका पति उसकी जवानी को हमेशा रोंदे, और उसे हमेशा काम सुख का आनद दे,

 
सुहागरात की रात महेश ने अपने 7 इंच के लंड से रमा की चुत की धज्जियाँ उड़ा दी थी और उसे जन्नत की सैर करवा दी थी , कुछ महीनों तक तो उसकी जिंदगी में सब कुछ मजे में रहा, उसने अपने पति के साथ चुदाई का हर सुख भोगा, परन्तु धीरे धीरे उसके पति ने उसकी तरफ ध्यान देना कम कर दिया, रोजाना सेक्स का आनंद उढ़ाने वाली रमा को अब सेक्स हफ्ते में एक बार ही नसीब होता था, धीरे धीरे ये महीने में एक हो गया, और जब रमा को पहली सन्तान हुई तो उसके बाद तो जैसे उनका सेक्स करना बिलकुल बंद हो चूका था, रमा ने भी इसे अपनी तकदीर समझ कर अपना लिया,

महेश और रमा को 3 संतान हुई थी,

सबसे बड़ी बेटी मोहिनी ,

मोहिनी 24 साल

मोहिनी 24 साल की एक जवान लड़की थी, उसका बदन भी उसकी माँ की तरह बिलकुल गोरा और दुधिया था, और दिखने में वो रमा की तरह ही खूबसूरत थी, वही तीखे नैन नक्श, दमकता गोरा चिट्टा चेहरा और गुलाबी रसीले होंठ, छोटे छोटे अमरूद जैसी सुंदर सुंदर चुचियाँ, पतली गोरी कमर, उभरी हुई गांड, भरी मांसल जाँघे और उसके कच्चे यौवन की मादक खुशबू जो किसी भी मर्द का लंड खड़ा कर सके , मोहिनी पर भी अपने पिता की तरह पैसो का घमंड सवार रहता था, वो नए जमाने की विचार धाराओ को मानने वाली लड़की थी, उसकी सहेलीया भी ऊँचे खानदानो से ताल्लुक रखती थी, मोहिनी को अपनी सुन्दरता पर बड़ा गर्व था, वो तो अपने शरीर पर मक्खी भी नही बैठने देती थी, चूँकि खुद को मॉडर्न कहलाना पसंद करती थी तो ड्रेस भी वैसी ही पहनती थी, घुटनों से निचे तो कभी कोई ड्रेस पहनी ही नही थी उसने , पढाई लिखाई में ध्यान कम ही रहता था उसका,

दूसरी बेटी का नाम राखी था,

राखी 23 साल

राखी 23 साल के कच्चे योवन की मालकिन थी, उसका शरीर भी अपनी बड़ी बहन की तरह ही खुबसूरत था, दिखने में वो मोहिनी की कार्बन कॉपी लगती थी, पर व्यवहार में वो उसकी बिल्कुल उलट थी, यानि जहाँ एक तरफ मोहिनी को हमेशा मॉडर्न तरीके से लाइफ जीना पसंद था वहीं राखी को हमेशा से सादा और संस्कारी तरीके से रहना पसंद था, और इसी वजह से वो अपने परिवार की लाडली भी थी, हमेशा अपने बदन को पूरी तरह ढककर रखती थी, शायद खुद ने भी अपने बदन को आज तक पूरी तरह से नहीं देखा था, पर उसके कसे बदन को देखकर किसी भी मर्द का लंड पल भर में खड़ा हो जाये

महेश और रमा की तीसरी और आखिरी संतान थी उनका और इस खानदान का एकमात्र वरिश और अपनी कहानी का हीरो – आनन्द ,

आनन्द 22 साल का एक हैण्डसम नोजवान था, दिखने में वो किसी हीरो की तरह ही था, बचपन से ही उसे कसरत करने की आदत थी इसलिए उसका बदन बिलकुल सांचे में ढला हुआ और बिलकुल फिट था, लडकियाँ भी उसे देखकर अक्सर लट्टू हो जाया करती थी, आनन्द अपने बाप पर गया था पर सिर्फ और सिर्फ एक मामले में, वो था उसका लंड, दरअसल उसका लंड उसके बाप से भी थोडा बड़ा और मुसल था, लगभग 8 इंच लम्बा और 3 इंच मोटे लंड से वो चाहे तो किसी की भी चीखे निकल दे, पर बाकि चीजों में वो अपने बाप से बिलकुल उलट था , यानि की उसे काम काज और बिजनेस से नफरत थी, उसे मेहनत करना बिलकुल पसंद नही था , वो तो बस पैसे उड़ाने में यकीन रखता था, और इसलिए हमेशा बस पार्टियों में जाना, मोज मस्ती करना ,पैसे को पानी की तरह बहाना यही सब उसका शौक था, हाँ एक और बात उसे घोड़ो की रेस देखना और उसमे पैसे लगाने का बड़ा शौक था , और अपने इसी शौक के चलते वो महीने में बीस से पचीस हज़ार रूपये तो बस घोड़ो की रेस में ही उड़ा देता था, उसकी फ़िज़ूल खर्ची बहुत ज्यादा थी, अपने आपको को किसी राजकुमार से कम नही समझता था , लेट से उठाना, उठते ही बिस्तर में चाय पीना, फिर तैयार होकर अपने लफंगे दोस्तों के साथ चले जाना और रात को देर से घर आना यही सब उसकी दिनचर्या का हिस्सा था,

उसकी इस फ़िज़ूल खर्ची से बद्री प्रसाद और महेश बहुत परेशान थे, क्यूंकि उन्हें लगने लगा था कि आनन्द जीवन में कुछ नही कर पायेगा, कभी कभी बद्री प्रसाद को गुस्सा आता तो वो उसे बुरी तरह डांटता , जिससे आनन्द नाराज़ होकर अपने दोस्तों के पास चले जाता और फिर 2-3 दिन घर नही आता , पर जब पैसे खत्म होते हो हारकर वापस घर आना ही पड़ता,

बद्री प्रसाद को समझ नही आता की आखिर आनन्द को कैसे सही रस्ते पर लाया जाये क्यूंकि वो उसके खानदान का इकलोता वारिस था

अब हम बद्री प्रसाद के दुसरे बेटे जगदीश के परिवार के बारे में जानते है

जगदीश की शादी प्रभा से हुई थी,

प्रभा 40 साल

प्रभा भी दिखने में बड़ी खुबसूरत थी , 40 साल की उम्र में भी उसने अपने बदन को पूरा मेन्टेन किया हुआ था, उसके भरी भरकम बूब्स और गुदाज़ गांड उसके शरीर का आकर्षण बिंदु थे , पर रमा की तरह वो भी अपनी लाइफ बिना सेक्स का आनन्द लिए गुज़र रही थी क्यूंकि जगदीश भी अपने बड़े भाई और बाप की तरह दिन रात बस पैसे बनाने में लगा रहता था

जगदीश और प्रभा के 2 बेटियां थी

पहली रूपा ,

रूपा 23 साल

जो 23साल की खुबसूरत लडकी थी, मोहिनी की तरह वो भी मॉडर्न तरीके से जिंदगी जीना पसंद करती थी , और इसी वजह से उसकी मोहिनी से बहूत पटती भी थी, कम उम्र से ही चुदाई का ज्ञान उसे अपनी मॉडर्न सहेलियों से मिल चूका था और इसिलए दिन रात चुदाई के ख्यालो में ही बनी रहती

दूसरी बेटी का नाम था निशा ,

निशा 22 साल

निशा भी मोहिनी और रूपा से ज्यादा अलग नही थी , और आधुनिक तरीके से जीवन जीना पसंद करती थी ,निशा की सबसे बड़ी खासियत थी उसके खुबसूरत मम्मे, निशा के मम्मे बरसों से पिंजरे में क़ैद कबूतर की तरह थे जो आज़ाद होने के लिए फडफडा रहे थे, निशा सचा में सेक्स की देवी लगती थी, उसका यौवन उसकी समीज में से ही कहर ढाता था,उसकी छतियो के बीच की घाटी जानलेवा थी, उसका नव यौवन कयामत ढाता था ,जाने अंजाने वो किसी की भी साँसों में उतरने का माद्दा रखती थी, अक्सर मोहिनी और रूपा भी उसके इस खुबसूरत बदन को देखकर जल उठती थी

तो ये था बद्री प्रसाद का खानदान

 
बम्बई शहर के पोर्श इलाके में सबसे बड़े और सबसे शानदार बंगले का मालिक था बद्रीप्रसाद , उनके बंगले को देखकर कुबेर को भी एक बार शर्म आ जाये, उस समय की सभी आधुनिक सुख सुविधाओ से सम्पन्न उस बंगले की छटा देखते ही बनती थी, बंगला २ मंजिला था , और सभी के सभी कमरे शाही थे, बंगले में जब मुख्य द्वार से घुसते तो बाहर सबसे पहले एक बड़ा विशाल गार्डन था , जिसमे घर के सभी लोग सुबह सुबह धुप का आनन्द लेते थे, गार्डन के अंत में एक ओर शानदार स्विमिंग पूल था ,जो बेहद आधुनिक तरीके से बनाया गया था, घर के पास ही गाडियों की पार्किंग के लिए एक बड़ा सा स्पेस था जिसमे उस समय की लगभग हर बड़ी गाड़ी मोजूद थी, बंगले से बाहर पास में चोकिदारो के लिए भी एक छोटी सी जगह बनाई हुई थी,

बंगले के अंदर जब प्रवेश करते तो एक बड़ा सा शानदार हॉल था, जो बहूत सुंदर दिखाई पड़ता था, बैठने के लिए बड़े बड़े सोफे रखे थे वहां , घर के एक कोने में एक बड़ी सी डाइनिंग टेबल भी रखी थी ,

बीचो बिच शानदार शाही रुबाब वाली सीढियां थी जो पहली मंजिल को दूसरी मंजिल से जोडती थी,दोनों ही मंजिलो पर सीढियों के दोनों और 3-3 रूम थे

निचे वाली मंजिल में कोने के सबसे पहले रूम में खुद बद्रीप्रसाद रहता था, बद्रीप्रसाद के पास वाले रूम में उसका बड़ा बेटा महेश और उसकी पत्नी रमा रहती थी, फिर एक कमरा बद्रीप्रसाद ने काम काज के लिए बना रखा था,

सीढियों के दूसरी तरफ सबसे पहले किचन था, किचन के पास वाला रूम अक्सर खाली ही रहता था, और वो तभी खुलता था जब घर में कोई पार्टी होती थी, उससे अगले कमरे में जगदीश और उसकी पत्नी प्रभा रहती थी,

उपर वाली मंजिल में बाये तरफ का सबसे पहला रूम आनन्द का था, आनंद का कमरा इस घर का सबसे शानदार कमरा था, आनंद के पास वाला रूम उसकी छोटी बहन और घर की सबसे संस्कारी लडकी रेखा का था, रेखा अपने रूम को भी बहुत सजा के रखती थी,

रेखा के बाजु में स्टोर रूम था , सीढयो की दाहिनी तरह सबसे पहले रूपा फिर मोहिनी और लास्ट वाला रूम निशा का था

उस जमाने में लेट बाथ अटेच नही होते थे, इसलिए घर के बाहर ही एक तरफ 3 – 3 बाथरूम और टॉयलेट थे,

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रात के तकरीबन 8:00 बजने वाले थे, घर के सभी लोग डाइनिंग टेबल पर पहुंच चुके थे, बद्रीप्रसाद का ये सख्त आदेश था कि हफ्ते में कम से कम एक बार तो सब लोग मिलकर साथ में डिनर करेंगे, क्यूंकि बाकि दिन तो तीनो बाप बेटे काम काज की वजह से लेट ही घर आते थे, डिनर के लिए उन्होंने इतवार (सन्डे ) का दिन फिक्स किया हुआ था और बद्री प्रसाद के रूल को कोई तोड़ सके ऐसी उस घर में किसी की भी हिम्मत नही थी सिवाय एक इंसान के , और वो था अपना आनन्द , जी हाँ घर में वो ही एकमात्र शख्स था जो बद्रीप्रसाद की बात को टालने की हिम्मत रखता था, बाकि लोग तो बद्रीप्रसाद की एक आवाज़ से भी खोंफ खा जाते थे, आखिर रुबाब ही कुछ ऐसा था उनका

बद्रीप्रसाद घर के बाकि लोगो के साथ डाइनिंग टेबल पर पहुंच चूका था, पर आनंद का कोई नमो निशान नजर नही आ रहा था,

बद्रीप्रसाद – “ये आनंद कहाँ रह गया महेश” बद्रीप्रसाद ने हल्के गुस्से में कहा

महेश – “जी पिताजी , वो ....वो....मुझे भी नही पता ....शायद अपने रूम में होगा” महेश ने थोडा डरते हुए कहा

इससे पहले कि कोई कुछ बोलता मोहिनी बिच में ही बोल पड़ी

मोहिनी – दादाजी , आनंद तो अपने कमरे में नही है, मै खुद देखकर आई थी

मोहिनी की बात सुनकर बद्रीप्रसाद को समझ आ गया था की आनंद ओरों दिनों की तरह आज भी अपने लफंगे दोस्तों के साथ बाहर घुमने चला गया है, दरअसल मोहिनी और आनंद की जरा भी नही बनती थी , वो दोनों हमेशा झगड़ा करते रहते थे, और चूँकि रूपा और निशा की मोहिनी से बनती थी इसलिए वो दोनों भी उसी का साथ दिया करती थी, बस एक रेखा ही थी जो आनंद का पक्ष लेती थी,

इधर बद्रीप्रसाद गुस्से से आग बबूला हो गया था,

बद्रीप्रसाद – रामलाल(नोकर) ,आज जब आनंद घर आये तो उसे मेरी इज़ाज़त के बिना कोई खाना न दे पाए

रामलाल – जी मालिक

बद्रीप्रसाद का गुस्सा देखकर बाकि लोग भी घबरा गये थे, सब चुपचाप किसी तरह अपना खाना खत्म करने में लगे हुए थे, उन्हें समझ आ गया था कि आज तो आनंद फिर से डांट खायेगा

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सभी लोग अभी खाना खा ही रहे थे कि तभी बाहर से गाड़ी की आवाज़ आती है, सब समझ चुके थे कि आनंद आया है, मोहिनी , रूपा और निशा के चेहरे पर शातिर हंसी आ रही थी, क्यूंकि उन्हें पता था कि अब दादाजी जरुर आनंद को डांटेंगे और उन्हें इसमें बड़ा मज़ा आता था,

इधर आनंद धीरे धीरे चलता हुआ हॉल की तरफ बढ़ रहा था , उसे समझ आ गया था कि आज उसकी खैर नही, दरअसल उसने कोशिश तो बहुत कि थी किसी तरह जल्द से जल्द 8 बजे से पहले पहुंचे पर फिर भी वो लेट हो ही गया था,

आनंद जैसे ही डाइनिंग टेबल की और बढ़ा , उसने देखा कि दादाजी उसकी ओर गुस्से से देख रहे है, उसने तुरंत नज़रे निचे कर ली, और चुपचाप जाकर कुर्सी पर बैठ गया

बद्रीप्रसाद – “कहाँ से आ रहे हो तुम ?” बद्रीप्रसाद ने गुस्से से कहा

आनंद – “वो दादाजी ..वो मै अपने दोस्तों के साथ था”

बद्रीप्रसाद – “ दोस्तों के साथ इतनी रात गये क्या कर रहे थे”

आनंद – “जी, वो ....वो ...किसी दोस्त की जन्मदिन की सालगिरह थी तो वहीं पर गया था”

बद्रीप्रसाद –“ तुम्हे पता नही कि आज संडे है, और संडे को हम रात का खाना साथ खाते है

आनंद – “जी दादाजी पता था, पर पार्टी में थोड़ी देर हो गयी,इसलिए .........”

वो अभी बात कर ही रहे थे कि पास बैठी निशा चिल्लाकर बोली

निशा - दादाजी, भैया के मुंह से शराब की बदबू आ रही है

निशा की बात सुनकर तो जैसे आनंद के पैरो तले जमीन खिसक चुकी थी, उसे समझ नही आ रहा था कि वो क्या बोले, दरअसल आज अपने दोस्त की पार्टी में उसने पहली बार बहुत थोड़ी सी शराब पी थी, और कहते है ना कि अगर किस्मत ख़राब हो तो घर के अंदर बैठे आदमी के सर पर भी ओले गिर सकते है

आनंद की तो सिट्टी पिट्टी गुम हो चुकी थी ,उसे समझ आ चूका था कि आज तो उसकी खैर नही ,

निशा की बात सुनकर बद्रीप्रसाद का मुंह गुस्से से लाल पीला हो गया था,

बद्रीप्रसाद (चिल्लाते हुए ) –“ आनंद ..........निशा जो बोल रही है वो सच है या नही ?”

आनंद बेचारा क्या बोलता , उसकी तो वैसे ही फट के चार हो गयी थी, वो तो मन ही मन निशा को गाली दे रहा था और भगवान् से प्रार्थना कर रहा था कि हे भगवान आज किसी तरह बचा लो फिर कभी शराब के हाथ भी नही लगाऊंगा,

बद्रीप्रसाद – “तुमने सुना नही कि मैंने क्या पूछा ?”

आनंद – “जी जी .....वो....वो.....दादाजी .....वो...मै .....आज...पहली बार ही बस.....”

आनंद की बात सुनते ही बद्रीप्रसाद के गुस्से का तो ठिकाना न रहा,वो जोर से चिल्लाकर बोला

बद्रीप्रसाद – “मुझे तुझसे ये आशा बिलकुल न थी आनंद, मैंने तुझे जो आजादी दी है तूने उसका गलत फायदा उठा लिया है, लेकिन बस अब और नही .......”

आनंद – “मुझे माफ़ कर दीजिये दादाजी....वो मैंने दोस्त की बातो में आकर ......”

बद्रीप्रसाद – “मैं देख रहा हूँ तुम दिनों दिन उद्दंडी होते जा रहे हो, अब समय आ गया है तुम मेरे साथ ऑफिस आना शुरू कर दे, अब तो तेरी कॉलेज भी खत्म हो गयी है”

आनंद –“नही दादाजी ,अभी नही , अभी से मैं ऑफिस आकर क्या करूंगा, वैसे भी आप,पिताजी और चाचाजी तो जाते ही है, तो घर पर तो कोई आदमी होना चाहिए ना”

बद्रीप्रसाद – “पर तुम घर पर रहते कब हो, हमेशा अपने आवारा दोस्तों के साथ घूमते रहते हो, नही अब मैं तुम्हारी एक नही सुनने वाला, तू कल से मेरे साथ ऑफिस चल रहा है, बस ....” बद्रीप्रसाद ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा

आनंद – “पर दादाजी..........”

आनंद इतना ही बोल पाया था कि बद्रीप्रसाद ने उसकी बात बिच में काट दी और बोले

बद्रीप्रसाद- “मैंने एक बार कह दिया तो कह दिया, कल सुबह जाने के लिए तैयार रहना , वरना मुझसे बुरा कोई नही होगा.....”

आनंद भी समझ चूका था कि अब बहस करने से कोई फायदा नही होने वाला , इसलिए उसने गर्दन निचे की और चुपचाप खाना खाने लगा

उधर 6 आँखे ऐसी थी जिनमे खुशी के मारे चमक आ गयी थी, जी हाँ मोहिनी ,निशा और रूपा दादाजी के इस फैसले से बड़ी खुश हो रही थी, और नज़रे बचाकर आनंद की तरफ इशारे करके उसका मजाक उड़ा रही थी,

आनंद को उनकी इस हरकत पर गुस्सा तो बहूत आ रहा था और खास कर निशा पर, परन्तु दादाजी के सामने वो कर भी कुछ नही सकता था, इसलिए बस चुपचाप खाना खाता रहा

खाना ख़त्म होते ही सब लोग अपने अपने कमरों में चले गये ,घर के नोकर भी जा चुके थे, बस रामलाल ही घर के बाहर बने छोटे से मकान में रहता था, बाकि चोकीदारो के साथ ,क्यूंकि उसे सुबह जल्दी उढ़कर बाकि सब लोगो के लिए नाश्ता बनाना होता था, दोनों बहुओ के साथ मिलकर

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इधर आनंद की ये सोच सोच कर ही जान निकली जा रही थी कि कल उसे अपने दादा के साथ ऑफिस जाना होगा, जबकि उसे तो काम करना बिलकुल भी पसंद नही था, वो तो बस पुरे दिन मौज मस्ती में काट देता था, पर अब तो उसके पास और कोई विकल्प भी नही था, एक बार उसने सोचा कि क्यों न बीमारी का बहाना बनाया जाये, पर अगले ही पल उसने ये विचार दिमाग से निकाल दिया क्यूंकि अगर वो बीमारी का बहाना बनाता तो कई दिनों तक उसका घर से निकलना ही बंद हो जाता , इसलिए हारकर उसने सोचा की अब शायद उसके पास और कोई तरीका नही है बचने के लिए, अब तो उसे हर हाल में ऑफिस जाना ही होगा, पूरी रात आनंद इसी कसमकश में लगे रहा था, पर कोई रस्ता ना निकलता देख हारकर सो गया था

सुबह के लगभग 8 बजने को आये थे, पर अपना आनंद तो मस्ती में सोया पड़ा था, वो तो अक्सर 10 बजे से पहले उठता ही नही था,और आज भी गहरी नींद में सोया सपनों की वादियों में गुम था, उसे तो ये भी ध्यान नही था कि उसे अपने दादाजी के साथ उनके ऑफिस 7.30 बजे जाना था,

वो अभी मस्ती में सो ही रहा था कि उसके ऊपर धम्म्म्म से पानी आ गिरा, ये मोहिनी थी जिसे बद्रीप्रसाद ने आनंद को उठाने की ज़िम्मेदारी सोंपी थी

आनंद (घबराता हुआ ) – “कौन है.....कौन है.....?”

मोहिनी – “ओये बेवकूफ ,चल खड़ा होजा, रात वाली बात भूल गया क्या”

आनंद – “कौनसी बात,मुझे कुछ याद नही, और तूने मुझ पर पानी क्यों फेंका, मैं तुझे आज नही छोडूंगा “

मोहिनी – “अबे भुलक्कड़ ,तू इतनी जल्दी भूल गया, रात को दादाजी ने तुझे ऑफिस जाने के लिए कहा

था न”

ये सुनकर तो जैसे आनंद आसमान से सीधे जमीन पर आ गिरा, उसने तुरंत पास में रखी घड़ी उठाई और जैसे ही टाइम देखा उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी,

आनंद (घबराते हुए )- पर दीदी ,अभी तो 8:00 से ज्यादा हो चुके , अब तक तो दादाजी,पिताजी और चचाजी ऑफिस जा चुके होंगे

मोहिनी – हाँ वो लोग तो कब के ऑफिस जा चुके है, पर दादाजी ने कहा है कि अगर तू 9 बजे से पहले ऑफिस नही पहुचा तो तेरी खैर नही, तो जल्दी से खड़ा हो और फटाफट तैयार हो जा ,

अब तो आनंद को सच में टेंशन होने लगी थी, और वो तुरंत अपनी चद्दर से बाहर निकला,और दरवाजे की तरफ जाने लगा, पर उसकी ख़राब किस्मत कि टेंशन में वो ये भी भूल चूका था कि उसने नीचे सिर्फ एक अंडरवियर पहनी हुई है, और उसका नागराज उस छोटी सी अंडरवियर में सुबह सुबह बुरी तरह फुंकार रहा था,

मोहिनी ने जैसे ही आनंद को इस हालत में देखा उसका चेहरा बुरी तरह लाल हो गया, उसकी सांसे उपर की उपर और निचे की निचे ही रह गयी, उसके गले का थूक गले में ही अटक गया था, आनंद के लंड को उसकी अंडरवियर के उपर से इस तरह फुंकारते देख उसके कान गरम होने लगे, आज उसने अपनी लाइफ में पहली बार लंड के शेप को इतने करीब से देखा था,

मोहिनी लंड का उभार देखने के बाद आनंद ने जब मोहिनी को इस तरह अपनी तरफ घूरता पाया तो तुरंत उसकी नजरो का पीछा किया, और जैसे ही उसे पता चला की वो तो जल्दी जल्दी में अपनी अंडरवियर में ही चद्दर से बहार निकल गया है जिसमे उसका बड़ा सा मुसल लंड सुबह सुबह ही फन उठाये खड़ा है तो वो शर्म के मारे तुरंत पलट गया,

“आई ऍम सॉरी ........” आनंद के मुंह से बस इतना ही निकल पाया था, और उसने भागकर अपना पजामा उठाया और तुरन्त पहन लिया

मोहिनी को भी समझ नही आ रहा था कि वो क्या बोले, पर जब उसने आनंद को इस तरह भागकर अपना पजामा पहनते देखा तो उसके चेहरे पर हंसी आ गयी, और वो खिल खिलाकर हंसने लगी,

उसे इस तरह हँसता देख आनंद को तो और भी ज्यादा शर्म आने लगी, उसने भागकर अपना तोलिया लिया और सीधा बाथरूम की ओर चल पड़ा

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बाथरूम के अंदर पहुंचते ही आनंद ने अपने मुसल लंड को अपनी अंडरवियर की कैद से आजाद किया , उसका लंड तो जैसे खुली हवा में साँस लेने के लिए ही तड़प रहा था, जैसे ही आनंद ने अंडरवियर नीचे की, उसका लंड स्प्रिंग की तरह उछलकर हवा में कलाबजिया दिखाने लगा, दरअसल ये आनंद के साथ लगभग रोज़ ही होता था, जब भी सुबह वो सोकर जगता उसका लंड भी उसके साथ ही जगा मिलता , जिसे वो छुपता छुपाता बाथरूम में जाकर मुठ मारकर शांत करता

पर आज आनंद को इस हालत में मोहिनी ने देख लिया था , और उसे इस बात से बड़ी शर्म महसूस हो रही थी, पर उसके लंड को तो जैसे कोई शर्म नही थी, वो तो अभी भी पूरी तरह तनकर सलामी दिए जा रहा था, आनंद को ऑफिस भी जाना था, इसलिए वो मुठ मारने में वक्त बर्बाद नही कर सकता था, क्यूंकि अक्सर उसका पानी बहुत देर से निकलता था,

इसलिए वो फटाफट नहाने धोने लगा, लगभग २० मिनट में ही वो पूरी तरह तैयार था, उसका पप्पू भी अब थोडा शांत था, वो अब बाथरूम से निकलकर रूम की तरफ जाने लगा, उसने अपने बदन पर सिर्फ एक टॉवल लपेटा था,

वो अभी जस्ट अपने रूम में पहुंचा ही था ,कि तभी मोहिनी दोबारा उसके सामने आकर खड़ी हो गयी,

मोहिनी ने अब एक लेग्गिंग्स पहन ली थी , लेग्गिंग्स एक प्रकार की पजामी होती है जो बदन से बिलकुल चिपकी रहती है सो लड़कियां उन्हें लम्बे कुर्तों के साथ पहना करती हैं,

उस जमाने में भी ये ट्रेंड चलता था , इस ट्रेंड को शुरू करने में एक बॉलीवुड की एक्ट्रेस का नाम शुमार किया जाता है, वो थी मुमताज़, जिसने उस जमाने में भी बदन से चिपकी कुर्ती पाजामी का चलन शुरू किया था,

लेग्गिंग्स में ढंके मोहिनी के जवान बदन के उभार आज पूरी तरह से नज़र आ रहे थे. उसकी कुर्ती भी स्लीवेलेस और गहरे गले की थी, आनंद अपनी बहन को इस रूप में देखकर बुरी तरह झेंप गया और उनसे तुरंत नज़रे घुमा ली,

भले ही उसने नज़रे घुमा ली हो पर उसके नागराज ने तो नजरें गडाना शुरू कर दिया था, मतलब अब उसका लंड दोबारा धीरे धीरे सर उठाने लगा, उसके टॉवल में अब हल्का सा तम्बू बनने लगा , पर इससे पहले की ये तबू का उभार मोहिनी को नज़र आता , आनंद तुरंत दूसरी तरफ पलट कर बैठ गया,

“ओय बच्चू, अभी तक तैयार नही हुआ क्या तू, 8:30 बजने वाले है, और ये जनाब अभी तक टॉवल लपेटे घूम रहे है, भूल मत तुझे 9 बजे ऑफिस पहुंचना ही है, वरना तू दादाजी को जानता ही है,समझा” मोहिनी इढ्लाते हुए बोली

“ठिक्क्क्क ....है.....मैं ..समझ गया तू जा यहाँ से , मुझे कपड़े पहनने दे” आनंद हिचकिचा के बोला

“नही,,,,,तेरा कोई भरोसा नही , तू लेट कर देगा, दादाजी ने तुझे तैयार कर ऑफिस भेजने की जिम्मेदारी मुझे दी है, और मैं नही चाहती कि तेरी वजह से से मुझे भी दादाजी की डांट खानी पड़े” मोहिनी ने कहा और वहीं पास पड़ी कुर्सी पर धम्म से बैठ गयी

“परर......मैं.....कपडे .....मेरा मतबल तू यहाँ है ना तो ....तेरे सामने....” आनंद झिझकते हुए बोला

“मुझे कुछ नही पता ,तू बस फटाफट तैयार होजा, तुझे लिए बिना मैं कही नही जाने वाली” अब मोहिनी भी मजाक के मूड में आ चुकी थी, वो तो बस आनंद के मजे लेना चाहती थी

इधर अब आनंद को कुछ सूझ नही रहा था कि वो क्या करे , क्यूंकि अगर वो खड़ा हुआ और पलटा तो उसका तम्बू साफ नजर आ जाने वाला था

इससे पहले की आप लोग सोचे कि कहानी के मुख्य किरदार ये दोनों भाई बहन है तो आप गलत है , कहानी का असली हीरो कोई और है जिसके बारे में आपको जल्द ही पता चलेगा

बस्ती में ही एक और किरदार है- बंशी, ये इस बस्ती में इकलौता मैकेनिक था, बंशी कोई 35 साल का आदमी था, इसके घर मे इसकी बीवी रूपा और एक प्यारी सी छोटी सी बेटी और एक छोटा बेटा है, बंशी और मोहन एक दूसरे के पक्के दोस्त थे, ओर साथ ही साथ पड़ोसी भी, बंशी थोड़ा अंध विश्वासी इंसान था पर भगवान में भरोषा भी बहुत था

इधर अब आनंद को कुछ सूझ नही रहा था कि वो क्या करे , क्यूंकि अगर वो खड़ा हुआ और पलटा तो उसका तम्बू साफ नजर आ जाने वाला था, पर उसके पास कोई और चारा भी तो नही था , उसे हर हालत में 9 बजे से पहले पहले ऑफिस पहुंचना था,

इसलिए आनंद ने भी अब शर्म छोड़ कर तुरंत तैयार होने का फैसला किया, वो मोहिनी की तरफ पीठ किये हुए ही धीरे धीरे चलकर वार्डरॉब (अलमारी ) की तरफ गया, वो जान बुझकर धीरे धीरे चल रहा था क्यूंकि उसके टॉवल में उसका लंड बड़ा सा तम्बू बनाये था और उसे डर था कि अगर वो थोडा सा भी और तेज़ चला तो उसका टॉवल खुल सकता था

धीरे धीरे सम्भलते हुए आखिर वो किसी तरह अलमारी तक पहुंच ही गया, और उसने झटपट अलमारी खोल अपनी अंडरवियर बनियान और बाकि कपडे भी निकल लिए, पर असल समस्या तो अब शुरू होनी थी, दर असल आज से पहले आनंद हमेशा टॉवल निकाल कर ही अंडरवियर पहनता था, और उसे डर लग रहा था कि कही टॉवेल के उपर से चड्डी पहनने के चक्कर में टॉवेल ही न निचे गिर जाये, पर मरता क्या न करता

इधर मोहिनी सोफे पर बैठी आनंद को ही देखे जा रही थी, क्यूंकि वो चाहती थी कि आनंद जल्द से जल्द तैयार हो जाये , पर उसे इस बात का जरा भी एहसास नही था कि आनंद बेचारा उससे शर्माता ही दूसरी तरफ मुंह करके खड़ा है

अब आनंद भी बेचारा परेशान था, कि आखिर तोलिये के उपर से अंडरवियर कैसे पहने, पर जल्दी ही उसे समझ आ गया कि ये कलाबाजी उसके बस की बात नही है, उसे मोहिनी को ही थोड़ी देर के लिए दूसरी तरफ मुंह करके बैठने को बोलना होगा

“अम्म्म......दीदी.........” आनंद थोडा झिझकता हुआ बोला

“मुझे तू दीदी बोल रहा है मतलब जरुर कुछ काम है तुझे मुझसे ...”मोहिनी उसकी तरफ आश्चर्य से देखते हुए बोली

दरअसल आनंद मोहिनी को दीदी तभी बोलता था जब उसे कुछ काम हो वरना तो वो उसे सिर्फ मोहिनी या कभी कभी मोहि कहकर ही बुलाता था,

“हम्म्म्म .....दीदी.....वो ....मैं......वो.....मुझे टॉवेल के उपर से ......वो ..पहनने में दिक्कत हो रही है..आप प्लीज़ थोड़ी देर उस तरफ मुंह कर लो ना..” आनंद ने आखिर झिझकते हुए कहा

आनंद की बात सुनकर मोहिनी को जोर से हंसी आ गयी

“अरे तू इतना बड़ा हो गया और तुझे चड्डी पहननी भी नही आती, बेवकूफ” मोहिनी हँसते हुए बोली

आनंद को मोहिनी पर बड़ा गुस्सा आया

“अगर तुझे टॉवेल के उपर से चड्डी पहननी आती है तो तू पहना दे ना मुझे , आयी बड़ी” आनंद गुस्से में बोल तो गया पर उसे पता ही नही चला कि वो बोला क्या है

इधर मोहिनी आनंद की बात सुनकर बिलकुल सुन्न हो गयी, उसकी आंखे फैलकर बड़ी हो गयी

“तू....तूने क्या अभी....”मोहिनी हैरान होते हुए बोली, मोहीनी के चेहरे की हंसी अब बंद हो चुकी थी और उसकी जगह हैरानी के भाव आ गये थे

 
मोहिनी हैरानी से आनंद को देखते हुए

इधर आनंद को भी जल्दी ही समझ आ गया कि उसने क्या बोल दिया है,

“नही...दीदी.. मैंने तो कुछ नही कहा...”आनंद झिझकते हुए बोला

“नही तू बोला है ,जरुर बोला है...अब जल्दी बता क्या बोला है वरना मैं दादाजी से तेरी शिकायत कर दूंगी” मोहिनी को पता तो था कि आनंद ने क्या बोला है पर वो ये कन्फर्म करना चाहती थी कि कही ये उसकी गलत वहमी तो नही थी

दादाजी का नाम सुनते ही आनंद की गांड में पटाखे छुटने लगे, उसे समझ नही आ रहा था कि उसके साथ ये हो क्या रहा है, दो दिन में ही उसकी ज़िन्दगी में इतने सारे झटके कैसे लग रहे थे, आनंद ने एक बार और बात टालने की कोशिश की

“नही दीदी मैंने तो ...कुछ नही कहा” आनंद बोला

“देख आनंद मैं कोई बहरी नही जो मुझे सुनाइ ना दे,तू बता दे वरना तू मुझे जानता ही है कि मैं क्या कर सकती हूँ” मोहिनी ने थोड़ी धमक के साथ कहा

अब कोई और रास्ता न निकलते देख आनंद ने सच बोलने में ही भलाई समझी

“वो दीदी मैंने बोला था कि अगर आपको टॉवेल के उपर से अंडरवियर पहननी आती है तो आप ही पहना दो मुझे, पर दीदी वो मैं ऐसे ही गुस्से में बोल पड़ा, आपको उस तरह हँसते देख मुझे गुस्सा आ गया था, और फिर पता नही कैसे मैं वो बोल पड़ा , प्लीज़ दीदी मुझे माफ़ कर दो” आनंद ने भोली सी सूरत बनाते हुए कहा

“तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ये बोलने की कि मुझे टॉवेल के उपर से पहननी नही आती, मैं तेरी तरह बच्ची नही की कि जिसे 23 साल की उम्र में भी टॉवेल पहने हुए अपनी अंडरवियर पहननी न आती हो, समझा” मोहिनी गुस्से में बोली

इधर मोहिनी की बात सुनकर आनंद को अपने गांड के पटाखे थोड़े बुझते हुए नज़र आने लगे,

“ बच गया आज तो, दीदी तो इस बात से खफा है कि मैंने उन्हें ये बोला कि उन्हें पहनना नही आता, कम से कम इस बात से नाराज़ नही कि मैंने उन्हें ये भी बोला था कि मुझे पहना दो” आनंद अपने मन में खुश होते हुए बोला

पर इधर मोहिनी के गुस्से का पारा अभी भी चढ़ा हुआ था,

“तुझे लगता है ना कि मुझे ये नही आता, तो तू देख, मैं अभी तुझे टॉवल के उपर से तेरी अंडरवियर पहना कर तुझे साबित कर दूंगी कि मुझे सब आता है, और तू ही एक बच्चा है,समझा” मोहिनी गुस्से से बोली

दोस्तों कहते है न कि गुस्सा आदमी के विवेक को खा जाता है, यही शायद मोहिनी के साथ भी हो रहा था, पर सिचुएशन थोड़ी गंभीर हो गयी है, आपको क्या लगता है

मोहिनी की बात सुनकर तो जैसे आनंद को सांप सूंघ गया था, उसे तो जैसे कुछ कहते ही नही बन रहा था ,

“अगर मोहि ने मुझे अंडरवियर पहनाने की कोशिश की तो उसे साफ पता चल जायेगा कि मेरा लंड बुरी तरह फुंकार मार रहा हैं और अगर उसने मेरे लंड के उभार को महसूस कर लिया तो आफत आ जानी है,वो पक्का घर में किसी से शिकायत कर देगी और अगर उसने दादाजी से शिकायत कर दी तो वो तो मेरी गांड कुटाई जरुर कर देंगे” आनंद मन ही मन सोचे जा रहा था, उसकी हालत पतली हो चुकी थी

“ओये इडियट, क्या हुआ अब, चुप क्यों हो गया, तुझे शक है न मुझ पर, कि मैं तुझे टॉवल के उपर से अंडरवियर नही पहना सकती तो आज मैं तेरा ये शक जरुर दूर करके रहूंगी” मोहिनी ने कहा ,वो अभी भी हल्के गुस्से में थी

पर बेचारा आनंद क्या कहता उसकी तो फट के चार हो चुकी थी, पर फिर भी उसने बात सम्भालने की थोड़ी कोशिश की

“नही दीदी, आपको कोई जरूरत नही,.......मैं....मैं,,,,खुद पहन लूँगा, मुझे यकीन है कि आपको आता है, मैंने मान लिया है” आनंद आखिरी बार कोशिश करते हुए बोला , क्यूंकि यकीन तो उसे भी था कि मोहिनी बहुत जिद्दी किस्म की लडकी है और उसने एक बार कुछ ठान लिया तो फिर तो वो किसी सूरत में पीछे नही हटती, बैसे भी आनंद से उसका छतीस का आंकड़ा रहता था तो वो उससे तो किसी सूरत में नही हारती थी

और हुआ भी बिलकुल आनंद की सोच के मुताबिक ही

“नही , मुझे कुछ नही सुनना, तू चुपचाप इधर आकर खड़ा हो जा, मैं आज तुझे तेरी अंडरवियर पहना कर ही दिखाउंगी” मोहिनी ने लगभग धमकाते हुए कहा

कुछ और टॉपिक होता तो आनंद भी बराबर के जवाब दिया करता था और दोनों में अक्सर तीखी नोंक झोंक हुआ करती थी, पर यहाँ आनंद की हालत ख़राब थी, क्यूंकि उसका लंड आज उससे बगावत करने पर उतारू था,

“जल्दी कर मेरे पास पूरा दिन नही है, और वैसे भी तुझे जल्द से जल्द ऑफिस पहुंचना है” मोहिनी आनंद को डराते हुए बोली

मरता क्या न करता, आखिर आनंद धीरे से मोहिनी की और पलटा, उसके अंडरवियर का उभार इतना तो अभी भी था की टॉवल में से मोहिनी को दिखाई दे सके, इसलिए आनंद ने अपने लंड के उभार के सामने अपनी अंडरवियर कर ली ताकि मोहिनी को उसका उभार न दिख सके, अब आनंद धीरे धीरे चलता हुआ मोहिनी की ओर चलने लगा, डर के मारे उसके पांव भी कांप रहे थे,

आखिर कार वो चलता हुआ मोहिनी के पास आ ही पहुंचा

अब सिन कुछ इस प्रकार का था कि मोहिनी सोफे पर बैठी थी और आनंद उसके ठीक समने टॉवल लपेटे खड़ा था और उसके हाथ में उसकी अंडरवियर थी जिससे वो अपने लंड के उभार को छुपाने की एक नाकाम सी कोशिश कर रहा था,

अब मोहिनी ने तपाक से उसके हाथो से उसकी अंडरवियर छीन ली, अचानक हुए इस हमले से आनंद सम्भल नही पाया और हडबडाहट में उसने अपने उभार को छुपाने के लिए अपने दोनों हाथों को अपने लंड पर टॉवल के उपर से रख दिया

आनंद को इस तरह करते देख मोहिनी के चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी जो जल्द ही हंसी में तब्दील हो गयी, वो जोर जोर से हंसने लगी,

“चिंता मत कर इडियट, मैं तेरी इज्ज़त नही लुटने वाली” मोहिनी ने हँसते हुए कहा

 
मोहिनी ने कह तो दिया पर उसे क्या पता था कि उसके ऐसे कहने का आनंद पे क्या असर होगा, आनंद ने जब ये सुना तो उसके आश्चर्य का तो कोई ठिकाना ही ना था, वो तो मोहिनी के इस खुलेपन पर बिलकुल हैरान सा खड़ा था, पर इधर मोहिनी बेपरवाह हँसे जा रही थी, और उसके इस तरह हंसने से उसके बड़े बड़े खुबसूरत मम्मे उसकी ताल में ताल मिलाकर कूदे जा रहे थे

आनंद की हालत ख़राब होने लगी, बूब्स को अपने इतने पास देखकर उसकी हालत ख़राब हुए जा रही थी, उसने महसूस किया कि मोहिनी के बदन से एक मदहोश करने वाली खुसबू आ रही थी, जो उसके नथुनों में घुसकर सीधे उसके लंड पर असर दिखा रही थी, आज आनंद ने पहली बार मोहिनी को इस नज़र से देखा था, मोहिनी अपने हाथो में आनंद की अंडरवियर लिए बड़ी बेपरवाह तरीके से हँसे जा रही थी, और उसके कसे ही बदन से चिपकी लेगिंग्स में जकड़ी सुडोल सुंदर मांसल जांघे, और खुले गले में से झनकते खुबसूरत मम्मे आनंद के लंड की नसों को बुरी तरह तनने पर मजबूर किये जा रहे थे,

आनंद ने तुरंत इन विचारो को अपने मन से झटकने की कोशिश की परन्तु उसकी गुस्ताख नज़रे दोबारा इस सोने से चमकते बदन को बनावट को देखने के लिए उठ जाती, आनंद अभी इसी उधेड़बुन में लगा था कि मोहिनी ने उसे टोकते हुए कहा

“ओये बेवकूफ कहाँ खो गया तू, चल अब अपनी एक टांग उठा,ताकि मैं तुझे तेरी अंडरवियर पहना सकूं” मोहिनी ने कहा

अब आनंद ने डरते डरते आखिर अपनी एक टांग उठा ही ली, मोहिनी ने झट से अंडरवियर को उसकी टांग में डाला और फिर दूसरी टांग को कहा

आनंद तो जैसे कठपुतली बना हुआ था, उसने मोहिनी के कहे अनुसार अपनी पहली टांग वापस रख दूसरी उठा ली,आनंद के हाथ अभी भी अपने लंड के उभर पर ही था,जिसे वो किसी तरह मोहिनी से छुपाना चाहता था, पर कहते हैं ना किस्मत का लिखा कौन टाल सकता है?

और यही आनंद के साथ भी हुआ, मोहिनी अब धीरे-धीरे आनंद की अंडर वियर को तोलिये के अंदर ऊपर की ओर खिसकाने लगी, इधर आनंद की हालत मोहिनी के छूने से और भी ज्यादा खराब होती जा रही थी, क्योंकि उसका लंड बुरी तरह फुंकारने लगा था, आनंद ने अपने हाथों का पूरा जोर लगा कर अपने लंड को ऊपर उठने से रोका हुआ था

इधर मोहिनी अपने काम में पूरी तरह मग्न थी, दरअसल मोहिनी को तो ये लग रहा था कि शायद आनंद शर्माने की वजह से अपने हाथो से तोलिये को पकड़ा हुआ है, उसे ये बिलकुल अंदाज़ा नही था कि आनंद के हाथो के पीछे उसका खूंखार लंड सर उठाये खड़ा है

मोहिनी ने अब टॉवल के अंदर से अंडरवियर को घुटनों तक चढ़ा दिया था, पर अब उसे थोड़ी परेशानी हो रही थी और उपर बढने में

“तुम अपने टॉवल को थोडा सा उपर उठा लो न आनंद” मोहिनी बोली

“ठिक्क्क ...है..दीदी....” आनंद बोला और जैसे ही उसने अपने हाथो से टॉवल को उठाना चाहा, तो उसके हाथो की कैद में बंद उसका लंड स्प्रिंग की तरह उछल गया और टॉवल के अंदर से मिसाइल की तरह तनकर तोलिये को एक झटके में निचे गिरा दिया, यहाँ तक तो फिर भी ठीक था पर आज आनंद का लंड पूरा बागी हो चूका था, उसने न सिर्फ तोलिये को गिराया बल्कि सीधा जाकर मोहिनी के चेहरे से जा टकराया

“ ओह्ह्ह्हह्ह........म्य्यय्य्य्यय्य्य्य........godddddddddddddd......, ये.....ये........क्या है...........इतना बड़ा..........” मोहिनी के मुंह पर हैरानी के भाव थे

इधर आनंद ने तुरंत अपना तोलिया उठाया और भागकर बेड के पीछे छुप गया, इधर मोहिनी अभी भी सदमे में थी, उसे बिलकुल समझ नही आ रहा था की अचानक ये क्या हो गया, उसने पहली बार ज़िन्दगी में कोई लंड देखा था, और वो भी इतने करीब से पर देखा भी तो किसका अपने छोटे भाई का,

मोहिनी शरमाकर सीधी कमरे से भाग गई,

इधर आनंद भी बुरी तरह पसीने से लथपथ हो गया था, वो अपने आप को कोष रहा था

“क्यों मैंने आज मुठ नही मारी, क्यों आज मैं कपडे बाथरूम में साथ नही ले गया, अगर दीदी ने किसी को बता दिया तो” आनंद मन ही मन घबराए जा रहा था

अब उसने ज्यादा टाइम ख़राब नही किया और फटाफट कपड़े पहनकर सीधा बिना नाश्ता किये ऑफिस के लिए अपनी कार में निकल गया ,क्यूंकि वो अब मोहिनी को फेस नही करना चाहता था,

आनंद बिना नाश्ता किये सीधा ऑफिस के लिए निकल गया, ये आज पहली बार था जब आनंद ऑफिस जा रहा था,और इसीलिए आनंद को वहाँ कोई नही पहचानता था, क्यूंकि आज तक किसी ने आनंद को देखा ही नही था,

आनंद अपनी कार को स्पीड में भगाए जा रहा था, उसका मन आज की घटनाओ से पूरी तरह हिला हुआ था, उसे समझ नही आ रहा था कि आखिर ये सब कैसे हो गया, साथ ही उसे इस बात का सबसे ज्यादा दर था कि मोहिनी कहीं किसी को कुछ बता न दे,वरना उसकी शामत आ जानी है,

इसी तरह की उधेड़बुन में लगा हुआ आखिर वो ऑफिस पहुंच ही गया, पर जब उसने टाइम देखा तो लगभग 9:30 बजने वाले थे

“ओह्ह्ह्हह......शिट ......मैं लेट हो गया, उस मोहिनी की वजह से,.....अब दादाजी पक्का डांटेंगे” आनंद मन ही मन सोच रहा था, आनंद ने फटाफट अपनी गाड़ी पार्क की, और अंदर की ओर बढने लगा,

“ओये.......किधर जा रहा है तू....बिना पूछे अंदर कैसे घुस आया....” गेट पर खड़े पठान चोकीदार ने आनंद को रोकते हुए कहा

“देखो चोकीदार , मैं पहले ही काफी लेट हो चूका हूँ , मुझे जाने दो” आनंद बोला

“ऐसे कैसे जाने दूँ, अपने बाप का ऑफिस समझा है क्या...?” चोकीदार गुस्से से बोला

“हाँ....ये मेरे बाप का ऑफिस ही है” आनंद बड़े कैजुअल तरीके से बोला

“मुझसे जबान लडाता है, खबिज़ का बच्चा, रुक अभी तेरी हड्डी पसली एक करता हूँ” चोकीदार ने गुस्से से कहा और पास में रखा अपना डंडा उठा लिया

“बहनचोद ....ये साला हो क्या रहा है आज मेरे साथ......पता नही सुबह सुबह किसका मुंह देखा था....अरे हाँ उस चुड़ैल मोहिनी का मुंह जो देखा था, तभी तो साला ये दो कोडी का चोकीदार भी गांड में ऊँगली कर रहा है, आज का तो साला दिन ही मनहूस है” आनंद मन ही मन सोचे जा रहा था

“अबे तू यही खड़ा है, भाग जा वरना मार मार कर कचूमर निकाल दूंगा, ये डंडा देखा है ना” चोकीदार आनंद को धमकाते हुए बोला

“देखो भैया, प्लीज़ मुझे जाने दो, ये सच में मेरे बाप का ऑफिस है” आनंद ने थोड़ी नरमी से काम लेना चाहा

“रुक तू , ऐसे नही मानने वाला” चोकीदार ने डंडा को हवा में लहराते हुए कहा

अब तो आनंद को लगा कि ये साला सच में डंडा ना घुमा दे, गलती से भी कहीं लग गया तो कई दिनों तक बिस्तर से लगे रहना पड़ेगा, इसलिए आनंद वापस मुडकर भागने लगा

“फिर कभी देख लूँगा चोकीदार के बच्चे” आनंद पीछे की तरफ मुंह करता हुआ भाग रहा था कि तभी उसकी टक्कर किसी से हो गयी, और जिस सख्श से टक्कर हुई उसका सारा सामान इधर उधर बिखर गया, आनंद देख नही पाया था की वो किससे टकराया है क्यूंकि उसका ध्यान तो चोकीदार की तरफ था

“हाय...मार डाला कमबख्त ने......” एक प्यारी सी आवाज़ जिससे ये डांट भी शहद की तरह मीठी सुनाई पड़ रही थी,

आनंद ने तुरंत पलट कर देखा और आवाज़ का पिछा करते हुए उस चेहरे तक पहुंच गया जिसके मुंह से ये आवाज़ निकल रही थी,

कोई 22 -23 साल की खुबसूरत सी लडकी, लॉन्ग स्कर्ट पहने हुए, उपर ऑफिस लेडीज शर्ट पहने,

 


काली झील जैसी आंखे , तीखे नैन नक्श, पतले गुलाबी होंठ जिनको देखकर बस हमेशा चूसने का मन करे , दिखने में मानो अजंता की कोई मूरत, सुडोल मांसल जांघे जो उसके कसे हुए बदन में झलकियां सी दे रही थी, और जब वो अपना समान उठाने के लिए थोड़ी सी झुकी तो आनंद के दिल पर तो जैसे लाखो छुर्रियाँ चल गयी थी, क्यूंकि उसकी सुन्दर सी लोंग स्कर्ट में से उसकी गदरायी मांसल गांड का नज़ारा उसे घायल किये जा रहा था, आनंद को काटो तो खून नही, वो तो इस सुन्दरता के दर्शन में इतना खो गया कि भूल ही गया था कि वो भी जमीन पर ही पड़ा है

“अबे खाबिज़, तूने मेमसाब का सामान भी गिरा दिया, रुक आज तो तेरी खैर नही” चोकीदार आनंद की तरफ आता हुआ गुस्से से बोला

“अरे भाई भड़कते क्यूँ हो , वो तो गलती से मै इन मोहतरमा से टकरा गया” आनंद चोकीदार को अपनी तरफ बढ़ते देख बोला

“चल खड़ा हो और तुरंत निकल ले यहाँ से इससे पहले कि मेरा गुस्सा और ख़राब हो” चोकीदार गुर्राया और वापस अपनी जगह पर आकर खड़ा हो गया

इधर वो लडकी अभी भी अपना सामान उठाने में लगी थी और साथ ही साथ आनंद को गालियाँ भी दिए जा रही थी

“जी मैं कुछ मदद करूं आपकी” आनंद ने उस लडकी से कहा

“पहले जो मदद की वो कम है क्या मेरा सारा सामान गिरा दिया तुमने, आँखे है या बटन, इतनी बड़ी इंसान दिखाई नही देती तुम्हे, पता नही कहाँ कहाँ से आ जाते है, तुम्हे अंदर किसने घुसने दिया, अभी चोकीदार से कहकर तुम्हे बहार निकलवाती हूँ मैं” लडकी ने गुस्से से आनंद की तरफ देखते हुए कहा

“जी मुझे माफ़ कर दीजिये प्लीज़, मैंने ये जानबुझकर नही किया, वो तो चोकीदार मेरे पीछे डंडा लेकर पड़ा था इसलिए मैं बिना आपकी तरफ देखे भाग रहा था, और इसिलए कब आप सामने आ गयी और कब मैं आपसे टकरा गया, पता ही नही चला, मैं तहे दिल से आपसे माफ़ी मांगता हूँ” आनंद ने भोली सी सूरत बनाते हुए कहा

“हम्मम्मम.......ठीक ठीक है, पर आगे से ध्यान रखना, वैसे चोकीदार ने बिलकुल सही किया तुम्हारे साथ” ये कहकर वो लडकी हल्की सी मुस्कुराने लगी

आनंद को तो ऐसे लगा जैसे चाँद ही जमीन पर उतरकर आ गया हो, इतनी खुबसूरत हंसी उसने आज तक नही देखी थी, आनंद को एहसास हुआ कि आज सुबह से सबसे अच्छी घटना उसके साथ यही हुई है कि वो इस चाँद सी खुबसूरत लडकी से टकरा गया

“अब बुत बने क्यों खड़े हो, मेरी मदद करो सामान उठाने में” लडकी ने कहा

“जी.....जी.....मैं अभी करता हूँ” आनंद ने हडबडा कर कहा

“वैसे तुम हो कौन और यहाँ क्यों आये हो” लडकी ने आनंद से पूछा

“जी, अम्मम्म....मेरा नाम आनंद है, मैं यहाँ वो मैं.......” आनंद समझ नही पा रहा था कि वो क्या बोले

“अरे ये वो वो क्या लगा रखा है, बोलो क्यों आये हो यहाँ, क्या नोकरी के लिए आये हो” लडकी ने कहा

“हाँ ....हाँ.....नोकरी के लिए ही आया हूँ” आनंद बोला

“हम्म्म्म.....समझ गयी....हमारे ऑफिस में चपरासी का पद खाली है....और हमने अख़बार में इस्तेहार (advertisement) दिया था, लगता है तुम भी उसे देखकर आये हो” लडकी बोली

“जी चपरासी......???????” आनंद चोंककर बोला

“तो क्या तुम उसके लिए नही आये, तो फिर तुम जा सकते हो” लडकी बेबाक तरीके से बोली

“नही नही मैं उसी के लिए आया हूँ.....” आनंद बोल पड़ा, दरअसल वो उस लडकी के साथ कुछ वक्त बिताना चाह रहा था, इसीलिए उसने एसा कहा

“हम्म्म्म...ठिक्क है.....वैसे कितना पढ़े हो......चपरासी के लिए भी कम से कम 5 वी तक की पढाई जरूरी है, तुम कहाँ तक पढ़े हो?” लडकी बोली

“जी मैं तो वो ...मैं तो......हाँ मैं भी 5 वी तक ही पढ़ा हूँ” आनंद झूठ बोल गया क्यूंकि उसने तो इंग्लिश में MA किया था और वो भी फर्स्ट डिवीज़न से

“देखो झूठ मत बोलना , अगर बाद में पता चला कि तुम्हे तो पढना भी नही आता तो समझ लेना कि तुम फिर इस शहर में कहीं नोकरी नही कर पाओगे, समझे” लडकी आनंद को डराते हुए बोली

“जी हाँ समझ गया, मैं 5 वी तक पढ़ा हूँ, और हिंदी पढ़ लेता हूँ, पर लिखना नही जानता” आनंद भोला बनते हुए बोला

“उसकी हमे जरूरत नही होगी, वैसे क्या थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी जानते हो या नही” लडकी बोली

“जी नही, अंग्रेजी तो नही जानता” आनंद बोला

“फिर तो थोडा मुश्किल होगा, पर देखते है क्या होता है, बाकि और लोग भी आये है नोकरी के लिए, तुम उनके साथ जाकर बैठो” लडकी बोली

 
अब तक सारा सामान लडकी ने वापस अपने पर्स में जमा लिया था और वो गेट की तरफ बढने लगी

“जी वैसे आपका नाम क्या है” आनंद ने पूछा

“चांदनी ....चांदनी नाम है मेरा” लडकी ने कहा

“बहुत सुन्दर....ह्म्म्मम्म..मेरा मतलब बहुत अच्छा नाम है” आनंद बोला

“शुक्रिया ....” चांदनी ने कहा और गेट की तरफ दोबारा बढने लगी

“जी रुकिए” आनंद फिर बोल पड़ा

“अब क्या है?” चांदनी बोली

“जी..वो ...आपका चोकीदार मुझे अंदर नही आने देगा, तो प्लीज़ क्या मैं आपके साथ आ जाऊ?” आनंद मासूम बनते हुए बोला

“ठीक है, आ जाओ” चांदनी मुस्कुरा कर बोली

और फिर वो दोनों ऑफिस के अंदर आ गये

आनंद और चांदनी साथ साथ ऑफिस के अंदर आ गये, ये पहली बार था जब आनंद ने ऑफिस के अंदर कदम रखा था, उसे कुछ पता नही था ऑफिस के बारे में, चांदनी आनंद को लेकर सीधा इनफार्मेशन काउंटर पर आ गयी, वहां पर काम करने वाली लडकी का नाम मीना था

दिखने में बड़ी ही खुबसूरत और प्यारी सी दिखाई पड़ रही थी, कितने प्यारे गुलाबी होंट थे उसके , दूध जैसी रंगत उसके बदन को चार चाँद लगा रही थी, केले के तने जैसी चिकनी बाहें देखकर आनंद का दिमाग भन्ना सा गया था, आनंद को तो अब अपने चारो तरफ बस अप्सराएँ ही नजर आने लगी थी, एक तरफ चांदनी जैसे खुबसूरत कातिल हसीना और दूसरी तरफ मीना जैसी मासूम कली जो फूल बनने के लिए बिलकुल तैयार दिखती थी, आनंद को एसा लगा की शायद मीना उसकी तरफ देख कर हल्के हल्के मुस्कुरा रही थी पर आनंद ने इसे वहम समझ कर इग्नोर कर दिया

“कैसी हो मीना” चांदनी ने मीना से पूछा

“अच्छी हूँ, चांदनी दीदी, आप बताओ, आज ऑफिस देर से कैसे ?” मीना ने कहा

“अरे यार वो बस देर से मिली थी, इसलिए लेट हो गयी” चांदनी बोली

“ये लड़का कौन है आपके साथ, पहले तो इसे कहीं नही देखा” मीना ने आनंद के बारे में पूछते हुए कहा

“इसका नाम आनंद है, ये हमारे ऑफिस में चपरासी की नोकरी के लिए आया है, अरे हाँ याद आया, क्या चपरासी के लिए जो इंटरव्यू होने थे वो शुरू हो गये क्या?” चांदनी ने पूछा

“हाँ दीदी वो तो कब के शुरू हो गये” मीना ने कहा

“अच्छा कितने लोग आये है ?” चांदनी ने फिर सवाल पूछा

“लगभग 20-25 लोग आये हुए है” मीना ने कहा

“फिर तो आनंद, शायद तुम्हे नोकरी मिलना मुश्किल है” चांदनी ने आनंद की तरफ देखकर कहा

“जी, कोई बात नही, मैं कहीं और देख लूँगा” आनंद ने चांदनी से कहा

“पर फिर भी तुम एक बार कोशिश कर लो, इंटरव्यू हमारे ऑफिस के ही शर्मा जी ले रहे है, बड़े ही सख्त किस्म के आदमी है वो” चांदनी बोली

“ठीक है जैसे आप कहे”आनंद भोली सी शक्ल बनाते हुए बोला

“अच्छा तुम जाकर बाकि लोगो के साथ बैठो मैं बड़े साहब(बद्रीप्रसाद) से मिलकर आती हूँ, कुछ फाइल्स में दस्तखत करवाने है” चांदनी बोली

“पर चांदनी दीदी, बड़े साहब तो अभी थोड़ी देर पहले ही घर के लिए निकल गये, दरअसल उन्हें दिल्ली जाना था, सो वो महेश बाबु और जगदीश बाबु के साथ ही निकल गये” मीना बोली

“दिल्ली, पर अचानक दिल्ली क्यूँ” चांदनी ने पूछा

“दीदी, वो हमारी दिल्ली वाली फैक्ट्री में अचानक कुछ जरूरी काम आ गया, तो बड़े साहब तुरन्त वहां के लिए निकल गये, शायद हफ्ता भर वहीं रहेंगे” मीना ने कहा

इधर आनंद को ये खबर सुनकर बहुत ही ज्यादा सुकून महसूस हुआ, क्यूंकि एक तो उसे हफ्ता भर के लिए ऑफिस आने से बच गया और साथ ही सुबह जो कुछ मोहिनी के साथ हुआ वो अब दादाजी को कम से कम एक हफ्ता तो नही पता चलने वाला था

“ठीक है फिर मैं किसी ओर दिन उनसे दस्तखत करवा लुंगी, अच्छा आनंद अब तुम तुरंत जाओ पर अच्छे से इंटरव्यू दो” चांदनी ने कहा

चांदनी की बात सुनकर आनंद उस कमरे का पता पूछकर सीधा उस ओर निकल गया और काउंटर पर अब सिर्फ चांदनी और मीना ही खड़ी थी

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आनंद के जाने के बाद चांदनी और मीना आपस में बातें करने लगी

“क्या दीदी, कहां से पकड़कर लाई हो ऐसे खूबसूरत नौजवान को, हाय कितना सुंदर लड़का है ना” मीना बोली

“क्या मीना, तुझे बस ये सब ही सूझता रहता है” चांदनी बोली

“दीदी, अगर इस उम्र में ये सब नहीं सोचेंगे तो कब सोचेंगे” मीना बोली

मीना की बात सुनकर चांदनी बस हल्का सा मुस्कुरा दी

“वैसे दीदी वो लड़का आपको बहुत पसंद करता है” मीना बोली

“हट बदमाश कुछ भी बोलती है” चांदनी मीना के हाथ पर चपत लगाती हुई बोली

“सच दीदी, मीना की आंखें पारखी आंखें हैं, वो लड़का सच में आपको पसंद करता है” मीना ने चांदनी के हाथ पर थोड़ा दबाव देते हुए कहा

“अच्छा तुझे कैसे पता?” चांदनी बोली

“देखा नहीं दीदी, कैसे वो आपके गले की गहराइयों को नाप रहा था: मीना ने हंसकर कहा

“चुप कर बदमाश, कुछ भी बोलती रहती है, थोड़ी बहुत शर्म भी नहीं आती तुझे तो” चांदनी शर्मा सी गयी थी मीना की बात सुनकर

चांदनी को इस तरह शर्माता देख कर मीना बोली “लगता है दीदी आपको भी वो पसंद आ गया है”

“ऐसा कुछ भी नहीं है, मैं तेरी तरह बेशर्म नहीं हूं जो बिना किसी जान पहचान के भी हर किसी को पसंद करने लगे” चांदनी बोली

“ठीक है भई, अगर आपको पसंद नहीं है तो मैं चांस मार कर देखती हूं, आपको तो कोई प्रॉब्लम नहीं ना” मीना बोली

“मुझे क्यों प्रॉब्लम होने लगी, तुझे जो करना है कर” चांदनी ने बोल तो दिया था पर वह थोड़ी सी हिचक रही थी

“ठीक है, फिर मैं ही थोड़ी कोशिश करके देखती हूं, शायद फंस जाये” मीना हंसती हुई बोली

“जैसी तेरी मर्ज़ी” चांदनी ने बेमन से कहा

“दीदी अगर आनंद को यहां नौकरी मिल जाए तो कितना अच्छा हो ना” मीना मुस्कुरा कर बोली

“मुझे क्या पता वो तो तू ही जाने” चांदनी ने थोड़ा सा मुंह बनाकर देखा

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इधर आनंद इंटरव्यू के लिए आए हुए बाकी लोगों के साथ जाकर बैठ गया, आनंद यहां पर आ तो गया पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,

“अब मैं क्या करूं, दादाजी तो यहां पर है नहीं, तो क्या वापस घर पर चला जाऊं, पर अगर दादा जी अभी तक दिल्ली के लिए रवाना नहीं हुए होंगे तो, कहीं ऐसा ना हो कि वो मुझे रोजाना ऑफिस आने के लिए बोल दे, तो फिर मैं करुं क्या” आनंद काफी देर इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था, उसे पता ही नहीं चला कि कब उसके आस-पास के सभी लोग इंटरव्यू दे कर जा चुके थे, अब सिर्फ वही बचा था

तभी एक बंदे ने आकर उसे कहा “जाओ, साहब तुम्हे इंटरव्यू के लिए अंदर बुला रहे हैं”

आनंद ने भी आखिर सोचा कि “क्यों ना एक बार ट्राई करके देखते हैं, वैसे भी मुझे कौन सी यहां पर नौकरी करनी है” यह सोचता हुआ आनंद सीधा केबिन के अंदर चला गया

अंदर जाकर उसने देखा कि एक 60 साल का बुड्ढा सा आदमी इंटरव्यू ले रहा था

शर्मा जी – “खड़े क्यों अब तक, यहां पर आकर बैठो” शर्मा जी ने गुस्से से कहा

आनंद –“जी...... जी” कहता हुआ आनंद कुर्सी पर बैठ गया

शर्मा जी - क्या नाम है तुम्हारा

आनंद - जी मेरा नाम आनंद कुमार है

शर्मा जी - कहां तक पढ़े हो

आनंद - जी पांचवी कक्षा पांच तक पढ़ा हूं

शर्मा जी - अंग्रेजी पढ़ना भी आता है

आनंद - जी नहीं अंग्रेजी तो नहीं बस हिंदी अच्छे से पढ़ लेता हूं

शर्मा जी - इससे पहले कहां नौकरी करते थे

आनंद - जी कहीं नहीं, यह मेरा पहली बार होगा

शर्मा जी - देखो तुम दिखने में अच्छे खानदान से लग रहे हो, इसलिए मैं तुम्हें नौकरी तो दे दूंगा पर क्योंकि यह तुम्हारा पहली बार है इसलिए तनख्वाह कम ही मिलेगी

आनंद - जी बिलकुल चलेगा मुझे

शर्मा जी - ठीक है तो फिर कल से सुबह 7:00 बजे से शाम को 5:00 बजे तक तुम्हारी नौकरी रहेगी, तुम्हें क्या करना है यह सब काउंटर पर जो लडकी बैठी है उससे पता चल जाएगा, वैसे तुम चाहो तो आज से ही नौकरी शुरू कर सकते हो

आनंद - जी जैसा आप कहें, वैसे मुझे तनख्वाह कितनी मिलेगी

शर्मा जी - 40 रुपए महीना

आनंद - जी बस 40 रुपए महीना

शर्मा जी - देखो अगर तुम्हें नौकरी नहीं चाहिए तो मना कर दो, मैं किसी और को रख लूंगा, वैसे भी तुम्हारे पास काम करने का कोई एक्सपीरियंस नहीं है

आनंद - जी ठीक है मुझे मंजूर है

शर्मा जी - तो फिर जाओ और जाकर उस लडकी से मिलो, वो तुम्हे तुम्हारा सारा काम समझा देगी

आनंद को बड़ी हैरानी हो रही थी कि कोई सिर्फ 40 रूपये के लिए एक महीने तक कैसे काम कर सकता था जबकि वह तो महीने के 25 से 30 हजार यूं ही उड़ा देता था,

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आनंद बाहर आया और सीधा काउंटर की तरफ बढने लगा, काउंटर पर अब सिर्फ मीना ही खड़ी थी

मीना – अरे आनंद, तो फिर कैसा रहा तुम्हारा इंटरव्यू, नोकरी मिली की नही

आनंद – जी इंटरव्यू बहुत अच्छा रहा और मुझे यहाँ नोकरी भी मिल गयी है

मीना - अरे वाह ये तो बड़ी ख़ुशी की बात है, वैसे पगार क्या रखी है तुम्हारी

आनंद – जी पगार बहुत कम है, सिर्फ 40 रूपये माहवार

मीना – देखो यहाँ पर तो यहीं तनख्वाह मिलेगी, मालिक किसी को एक पैसा भी ज्यादा नही देते, बड़े ही कंजूस किस्म के आदमी है, वैसे तुम्हे देखकर लगता भी नही कि तुम कोई चपरासी हो, शायद तुम पहली बार कोई नोकरी कर रहे हो, इसलिए मेरी मानो जो तनख्वाह मिल रही है रख लो, वैसे मैं जानती हूँ कि एक एक्सपीरियंसड चपरासी की तनख्वाह कम से कम 60 रूपये माहवार तो होनी ही चाहिए

आनंद मीना की बात सुनकर और भी ज्यादा हैरान हुआ, क्यूंकि उसने तो सोचा था की कम से कम 100 – 150 रूपये तो मिलते ही होंगे एक चपरासी को, पर यहाँ तो साला 60 रूपये भी उसको मिलते जो पहले कम कर चूका हो, आनंद को इस बात का गुस्सा भी था कि उसके दादाजी गरीबो को कम पैसा देते है, पर वो कर भी क्या सकता था

आनंद – जी हाँ, नोकरी तो मैं पहली बार ही कर रहा हूँ, वैसे आपकी और चांदनी जी की तनख्वाह क्या है

मीना – अब क्या बताऊ तुम्हे, हम दोनों की तनख्वाह ही 150 रूपये माहवार है, मालिक से कई बार अर्जी की कि तनख्वाह थोड़ी बढ़ा दे पर यहाँ तो कोई नही सुनता,

आनंद - पर आप दोनों तो काफी पढ़ी हुई लगती है, फिर भी 150 रूपये माहवार

मीना – हाँ आनंद, हम दोनों ने ही BA तक की पढाई की है, और BA तक की पढाई करने वालो को कम से कम 200 रूपये माहवार तो मिलना ही चाहिए, पर क्या करे हमारी भी मजबूरी है क्यूंकि अगर ये नोकरी छोड़ी तो क्या पता दूसरी जगह काम मिले न मिले, आजकल के जमाने में नोकरी मिलना बहुत मुश्किल काम होता है आनंद,

आनंद - जी ठीक है, वैसे वो शर्मा जी ने मुझे यहाँ इसलिए भेजा था ताकि आप मुझे मेरा काम समझा सके,

मीना – हाँ वो तो मैं तुम्हे बता दूंगी, पर कुछ काम तुम्हे मोहन ( ये वही मोहन है बस्ती वाला जिसका ज़िक्र मैंने Introduction part 1 में किया था ) बता देगा, आज उसका लास्ट दिन है यहाँ, वो हमारा पुराना चपरासी है, पर उसे साहब ने निकाल दिया क्यूंकि वो पढना लिखना नही जानता था, पता है वो 5 सालो से यहाँ काम कर रहा था और कभी कोई शिकायत का मौका नही दिया उसने पर बेचारे को अनपढ़ होने की कीमत चुकानी पड़ गयी

आनंद – क्या, ये क्या बात हुई, अनपढ़ तो वो हमेशा से ही था, तो 5 साल तक यहाँ नोकरी कैसे कर ली?

मीना – वो ....वो....तुम सही बोल रहे हो, दरअसल अनपढ़ होना तो एक बहाना था मोहन को यहाँ से निकालने के लिए, हकीक़त तो कुछ और ही है

आनंद – क्या हकीक़त है?

मीना – वैसे शर्मा जी ने ये बात किसी को भी बताने से मना किया है पर तुम तो अब यही काम करने वाले हो, तो तुमसे क्या छिपाना, असल में वो मोहन पिछले हफ्ते जेल में बंद था 2 दिन के लिए,

आनंद – जेल में, पर क्यों?

मीना- दरअसल पुलिस ने उसे कुछ आदमियों के साथ मारपीट करने के इलज़ाम में बंद कर दिया था, वैसे ये तो हमें नही पता कि उसने ऐसा क्यूँ किया, पर ये जरुर पता है कि असल में तो उन लोगो ने ही उसे पीटा था, पर उन्होंने पुलिस को थोड़े पैसे देकर मोहन पर इलज़ाम लगा दिया कि उसने ही मारपीट शुरू की है, पर जहाँ तक हम लोग जानते है, मोहन तो एसा कर ही नही सकता, वो तो बेचारा बहुत ही सीधा किस्म का इंसान है, आज तक उसने किसी से ऊँची आवाज़ में बात तक नही की,

आनंद - ह्म्म्मम्म, पर अगर तुम लोगो को पता था तो फिर उसे ऑफिस से क्यों निकाला जा रहा है

मीना – दरअसल शर्मा जी नही चाहते कि ये बात बड़े साहब(बद्री प्रसाद) को पता चले, क्यूंकि एक जेल याफ्ता इंसान को नोकरी देना ऑफिस की इज्ज़त के लिए खतरा हो सकता था, और अगर बड़े साहब को ये बात पता चलती तो वो शर्मा जी पर ही गुस्सा निकालते, इसीलिए शर्मा जी ने पहले ही मोहन को नोकरी से निकलने का फैसला कर लिया

आनंद – पर ये तो गलत है ना, जो इंसान 5 सालो से इस ऑफिस की सेवा करता आ रहा है, उसे इतनी छोटी सी गलती की इतनी बड़ी सजा?

मीना – तुम्हारी बात सही है आनंद पर तुम बड़े साहब को नही जानते, वो बहुत ही सख्त आदमी है, अगर उन तक बात पहुंचती तो हमारी सबकी नोकरी भी खतरे में पड़ सकती थी

आनंद को अपने दादाजी पर बहुत गुस्सा आ रहा था, पर वो कुछ कर भी तो नही सकता था

मीना – अच्छा अब तुम उस मोहन से मिल लो, वो तुम्हे सारा काम समझा देगा

आनंद – ठीक है

ये कहकर आनंद मोहन से मिलने के लिए चल पड़ा

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