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असली या नकली
लेखक-रोकी
ये कहानी शुरू होती है 60 के दशक के भारत से
सन 1960 , विभाजन की मार झेल चुका भारत देश धीरे धीरे फिर से अपने आपको संवारने में लगा हुआ था, अमीरी गरीबी का फर्क उस समय बहुत ज्यादा था, वो भी खासकर बम्बई जैसे बड़े शहर में
जी हां कहानी शुरू होती है भारत की औद्योगिक नगरी मुम्बई जिसका नाम उस समय बम्बई था, ऊंची ऊंची इमारतों ने शहर की आबादी को बढ़ाना शुरू कर दिया था, लाखो की तादाद में मिडिल क्लास फैमिली के लोग किसी तरह इस चकाचोंध वाले शहर में अपनी गुज़र बसर कर रहे थे, कुछ किस्मत वाले ऐसे भी थे जिनके पास बेशुमार दौलत थी, जिनके लिए पैसा सिर्फ हाथ का मैल था, परन्तु सबसे बुरी हालत थी छोटी छोटी बस्तियों में रहने वाले गरीब लोगों की, जो बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा कर पा रहे थे, दिन भर घर का मुखिया जी तोड़ मेहनत करता तब कहीं जाकर 2 वक्त की सूखी रोटी का इंतेज़ाम हो पाता, उन गरीबो के लिए दिन भर में मुश्किल से 2 रुपये ही कमाना बड़ा मुश्किल होता था, उन 2 रुपयों में ही उनके दिन भर का खर्चा चलाना पड़ता था, (हालांकि उस समय के 2 रुपये की कीमत आज से ज्यादा है)
परन्तु भगवान गरीबी के साथ सब्र बिल्कुल मुफ्त देता है, भले ही वो लोग गरीब थे पर उनके मन मे हमेशा सब्र रहता था, उन्हें पैसो का लालच नही होता था बस 2 वक्त के गुजारे की चिंता होती थी
ऐसी ही एक गरीब बस्ती में मैं आप लोगो को ले जा रहा हूँ, इस बस्ती के भी बाकी जगह की तरह गरीब लोग ही रहते थे, बेचारे किसी तरह अपने परिवारों का पालन पोषण करते और अपनी ज़िंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते, ज्यादातर लोग मजदूरी करके ही अपना पेट भरते थे , कुछ मैकेनिक थे, तो कोई इक्का दुक्का लोग कहीं ठेला लगाकर अपना जीवन काट रहे थे,
सब लोग दिन भर जमकर मेहनत करते तब कहि जाकर रात को खाने का गुजारा होता, पर उनके मन मे संतोष रहता था, रात को अक्सर आपस मे बैठकर गप्पे मारते और कभी कभी रात को भजन भी कर लेते
इसी बस्ती में एक छोटा सा घर मोहन का भी था, मोहन एक 25 साल का मेहनती इंसान जिसके मा बाप बचपन मे ही चल बसे थे, पीछे रह गयी थी उसकी एक बहन माला , जिसे पाल पोष कर उसी ने बड़ा किया था, माला लगभग 19 साल की थी, मिज़ाज़ की ज़रा गरम थी, अक्सर मोहन को भी किसी बात के लिए डांट दिया करती थी, पर थी दिल की बड़ी साफ, दोनों भाई बहन किसी तरह अपने जीवन को काट रहे थे
अब कहानी के कुछ और किरदारों की तरफ बढ़ते हैं
गरीबों और मिडिल क्लास के लाखों परिवारों की तरह यहां कुछ ऐसे खुश नसीब परिवार भी थे, जिन्हें अमीरी में जीने का सुख मिल रहा था, ऐसा ही एक धनी और अमीर परिवार सेठ बद्री प्रसाद का भी था,
बद्री प्रसाद, एक 65 साल का बूढ़ा आदमी, जिसने अपनी मेहनत से सपनों के इस शहर में खुद के सपने को पूरा किया था, यह उसी की मेहनत का नतीजा था कि आज उसकी गिनती शहर के सबसे अमीर खान दानों में होती थी, उससे एक बार मिलने के लिए मंत्री भी लाइन लगाने को तैयार रहते थे,
बद्रीप्रसाद 65 साल
बेशुमार दौलत, बेहिसाब हीरे-जवाहरात, कई गाड़ियां, सैंकड़ो फैक्ट्रियां और भी ना जाने क्या-क्या, पग पग पर सिर्फ पैसा ही पैसा , इतनी धन दौलत की अगर गिनने बैठे तो कई दिन लग जाये
बद्री प्रसाद के 2 बेटे थे - बड़ा महेश (45 साल ) और दूसरा जगदीश (43 साल )
दोनों बेटे बाप की तरह ही बहुत मेहनती थे और काम में अपने पिता का हाथ बटाते थे, सारे काम काज का मुखिया अभी भी बद्री प्रसाद खुद ही था,
कहते हैं ना भगवान पैसे के साथ घमंड और लालच फ्री में देता है, यही बद्री प्रसाद और उसके बेटों के साथ भी था, अनगिनत पैसों ने उन्हें और भी ज्यादा लालची और अहंकारी बना दिया था, किसी से सीधे मुंह बात तक नही करते , दिन रात बस पैसे बनाने में लगे रहते, अपने वर्कर्स से जितना ज्यादा हो सकता उतना काम करवाते और जितनी कम हो सके उतनी पगार देते, गरीबो को वो लोग अपने पैर की जुती समझते थे , पैसो के लालच ने उन्हें पूरी तरह अँधा बना दिया था
अब हम बद्री प्रसाद के बेटों के परिवार के बारे में जानते हैं
बद्री प्रसाद के बड़े बेटे महेश की शादी रमा से हुई थी,
रमा 42 साल
रमा भी एक अमीर खानदान की लड़की थी, उसका जीवन भी सारे एशो आराम से गुजरा था, रमा 42 साल की एक गृहिणी थी , कसा हुआ बदन, तीखे नैन नक्श, कजरारी आंखे, सांचे में ढली हुई कमर, भारी नितम्ब और सुडौल जाँघे , जिन्हें देखकर कोई भी दीवाना हो जाये
उसका पूरा दिन बस घर के काम काज में ही गुजरता था, पहले के जमाने में वैसे भी बहुत कम लडकियों को जॉब करने की इज़ाज़त मिलती थी , और वो भी तब जब घर में कोई और कमाने लायक न हो ,
रमा जब पहली बार बहु बनकर उनके घर आई थी, तो उनके घर की चका चोंध देखकर उसकी आँखे भी बड़ी हो गयी थी , भले ही वो खुद भी एक आमिर खानदान से ताल्लुक रखती थी , परन्तु सेठ बद्रीप्रसाद का बंगला तो किसी महल से कम ना था ,
रमा को लगा था कि उसके पिता ने उसके लिए सबसे अच्छा रिश्ता ढूँढा है, पर जल्द ही उसकी ये गलत वहमी दूर हो गयी , शादी के कुछ दिन तक तो महेश उसे समय देता था , परन्तु बाद में वो अपने कामो में इतना खो गया था कि रमा के लिए समय भी नही निकाल पाता था, रमा हमेशा से ही एक सेक्सी और चुदाई की शौक़ीन लडकी रही थी, पर शादी से पहले उसने अपने आपको बिलकुल अछुता रखा था, ये उसकी तमन्ना थी कि उसका पति उसकी जवानी को हमेशा रोंदे, और उसे हमेशा काम सुख का आनद दे,
लेखक-रोकी
ये कहानी शुरू होती है 60 के दशक के भारत से
सन 1960 , विभाजन की मार झेल चुका भारत देश धीरे धीरे फिर से अपने आपको संवारने में लगा हुआ था, अमीरी गरीबी का फर्क उस समय बहुत ज्यादा था, वो भी खासकर बम्बई जैसे बड़े शहर में
जी हां कहानी शुरू होती है भारत की औद्योगिक नगरी मुम्बई जिसका नाम उस समय बम्बई था, ऊंची ऊंची इमारतों ने शहर की आबादी को बढ़ाना शुरू कर दिया था, लाखो की तादाद में मिडिल क्लास फैमिली के लोग किसी तरह इस चकाचोंध वाले शहर में अपनी गुज़र बसर कर रहे थे, कुछ किस्मत वाले ऐसे भी थे जिनके पास बेशुमार दौलत थी, जिनके लिए पैसा सिर्फ हाथ का मैल था, परन्तु सबसे बुरी हालत थी छोटी छोटी बस्तियों में रहने वाले गरीब लोगों की, जो बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा कर पा रहे थे, दिन भर घर का मुखिया जी तोड़ मेहनत करता तब कहीं जाकर 2 वक्त की सूखी रोटी का इंतेज़ाम हो पाता, उन गरीबो के लिए दिन भर में मुश्किल से 2 रुपये ही कमाना बड़ा मुश्किल होता था, उन 2 रुपयों में ही उनके दिन भर का खर्चा चलाना पड़ता था, (हालांकि उस समय के 2 रुपये की कीमत आज से ज्यादा है)
परन्तु भगवान गरीबी के साथ सब्र बिल्कुल मुफ्त देता है, भले ही वो लोग गरीब थे पर उनके मन मे हमेशा सब्र रहता था, उन्हें पैसो का लालच नही होता था बस 2 वक्त के गुजारे की चिंता होती थी
ऐसी ही एक गरीब बस्ती में मैं आप लोगो को ले जा रहा हूँ, इस बस्ती के भी बाकी जगह की तरह गरीब लोग ही रहते थे, बेचारे किसी तरह अपने परिवारों का पालन पोषण करते और अपनी ज़िंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते, ज्यादातर लोग मजदूरी करके ही अपना पेट भरते थे , कुछ मैकेनिक थे, तो कोई इक्का दुक्का लोग कहीं ठेला लगाकर अपना जीवन काट रहे थे,
सब लोग दिन भर जमकर मेहनत करते तब कहि जाकर रात को खाने का गुजारा होता, पर उनके मन मे संतोष रहता था, रात को अक्सर आपस मे बैठकर गप्पे मारते और कभी कभी रात को भजन भी कर लेते
इसी बस्ती में एक छोटा सा घर मोहन का भी था, मोहन एक 25 साल का मेहनती इंसान जिसके मा बाप बचपन मे ही चल बसे थे, पीछे रह गयी थी उसकी एक बहन माला , जिसे पाल पोष कर उसी ने बड़ा किया था, माला लगभग 19 साल की थी, मिज़ाज़ की ज़रा गरम थी, अक्सर मोहन को भी किसी बात के लिए डांट दिया करती थी, पर थी दिल की बड़ी साफ, दोनों भाई बहन किसी तरह अपने जीवन को काट रहे थे
अब कहानी के कुछ और किरदारों की तरफ बढ़ते हैं
गरीबों और मिडिल क्लास के लाखों परिवारों की तरह यहां कुछ ऐसे खुश नसीब परिवार भी थे, जिन्हें अमीरी में जीने का सुख मिल रहा था, ऐसा ही एक धनी और अमीर परिवार सेठ बद्री प्रसाद का भी था,
बद्री प्रसाद, एक 65 साल का बूढ़ा आदमी, जिसने अपनी मेहनत से सपनों के इस शहर में खुद के सपने को पूरा किया था, यह उसी की मेहनत का नतीजा था कि आज उसकी गिनती शहर के सबसे अमीर खान दानों में होती थी, उससे एक बार मिलने के लिए मंत्री भी लाइन लगाने को तैयार रहते थे,
बद्रीप्रसाद 65 साल
बेशुमार दौलत, बेहिसाब हीरे-जवाहरात, कई गाड़ियां, सैंकड़ो फैक्ट्रियां और भी ना जाने क्या-क्या, पग पग पर सिर्फ पैसा ही पैसा , इतनी धन दौलत की अगर गिनने बैठे तो कई दिन लग जाये
बद्री प्रसाद के 2 बेटे थे - बड़ा महेश (45 साल ) और दूसरा जगदीश (43 साल )
दोनों बेटे बाप की तरह ही बहुत मेहनती थे और काम में अपने पिता का हाथ बटाते थे, सारे काम काज का मुखिया अभी भी बद्री प्रसाद खुद ही था,
कहते हैं ना भगवान पैसे के साथ घमंड और लालच फ्री में देता है, यही बद्री प्रसाद और उसके बेटों के साथ भी था, अनगिनत पैसों ने उन्हें और भी ज्यादा लालची और अहंकारी बना दिया था, किसी से सीधे मुंह बात तक नही करते , दिन रात बस पैसे बनाने में लगे रहते, अपने वर्कर्स से जितना ज्यादा हो सकता उतना काम करवाते और जितनी कम हो सके उतनी पगार देते, गरीबो को वो लोग अपने पैर की जुती समझते थे , पैसो के लालच ने उन्हें पूरी तरह अँधा बना दिया था
अब हम बद्री प्रसाद के बेटों के परिवार के बारे में जानते हैं
बद्री प्रसाद के बड़े बेटे महेश की शादी रमा से हुई थी,
रमा 42 साल
रमा भी एक अमीर खानदान की लड़की थी, उसका जीवन भी सारे एशो आराम से गुजरा था, रमा 42 साल की एक गृहिणी थी , कसा हुआ बदन, तीखे नैन नक्श, कजरारी आंखे, सांचे में ढली हुई कमर, भारी नितम्ब और सुडौल जाँघे , जिन्हें देखकर कोई भी दीवाना हो जाये
उसका पूरा दिन बस घर के काम काज में ही गुजरता था, पहले के जमाने में वैसे भी बहुत कम लडकियों को जॉब करने की इज़ाज़त मिलती थी , और वो भी तब जब घर में कोई और कमाने लायक न हो ,
रमा जब पहली बार बहु बनकर उनके घर आई थी, तो उनके घर की चका चोंध देखकर उसकी आँखे भी बड़ी हो गयी थी , भले ही वो खुद भी एक आमिर खानदान से ताल्लुक रखती थी , परन्तु सेठ बद्रीप्रसाद का बंगला तो किसी महल से कम ना था ,
रमा को लगा था कि उसके पिता ने उसके लिए सबसे अच्छा रिश्ता ढूँढा है, पर जल्द ही उसकी ये गलत वहमी दूर हो गयी , शादी के कुछ दिन तक तो महेश उसे समय देता था , परन्तु बाद में वो अपने कामो में इतना खो गया था कि रमा के लिए समय भी नही निकाल पाता था, रमा हमेशा से ही एक सेक्सी और चुदाई की शौक़ीन लडकी रही थी, पर शादी से पहले उसने अपने आपको बिलकुल अछुता रखा था, ये उसकी तमन्ना थी कि उसका पति उसकी जवानी को हमेशा रोंदे, और उसे हमेशा काम सुख का आनद दे,