रात में दो बजे तक कामपिपाशु नानाजी ने मुझे कुत्ती की तरह चोद चोद कर मेरे तन का पुर्जा पुर्जा ढीला कर दिया था। सुबह करीब 8 बजे मेरी नींद खुली। हड़बड़ा कर उठी और सीधे बाथरूम घुसी। बड़े जोर का पेशाब लग रहा था, चुद चुद कर मेरी चूत का दरवाजा इतना बड़ा हो गया था कि पेशाब रोकने में सफल न हो सकी और टायलेट घुसते घुसते ही भरभरा कर पेशाब की धार बह निकली। नानाजी के विशाल श्वान लौड़े की बेरहम चुदाई से मेरी चूत फूल कर कचौरी की तरह हो गई थी और किसी कुतिया की तरह थोड़ी बाहर की ओर भी उभर आई थी। मेरी अर्धविकसित चूचियां जालिम नानाजी के बनमानुषि पंजों के बेदर्द मर्दन से लाल होकर सूज गई थी। मेरी चूचियों और चूत में मीठा मीठा दर्द उठ रहा था। टायलेट से फारिग हुई और नंग धड़ंग आदमकद आईने के सामने खड़ी हो कर अपने शरीर का बारीकी से मुआयना करने लगी और यह देख कर विस्मित थी कि दो ही दिन में मेरी काया कितनी परिवर्तित हो गई थी, निखरी निखरी और आकर्षक।
“इस लड़की को आखिर हुआ क्या है? इतनी देर तक तो सोती नहीं है। कामिनी उठ, इतनी देर तक कोई सोता है क्या?” मम्मी की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ और “आती हूं मां,” कहती हुई हड़बड़ा कर फ्रेश हो कर बाहर आई।
ड्राइंग हॉल में जैसे ही आई, मैंने देखा कि तीनों बूढ़े एक साथ बैठे हुए आपस में खुसर फुसर कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने मुझे देखा, चुप हो गये और बड़े ही अजीब सी नजरों से मुझे देखने लगे। उनके होंठों पर मुस्कान खेल रही थी और आंखों पर चमक।
“आओ बिटिया, लगता है रात को ठीक से नींद नहीं आई।” दादाजी रहस्यमयी मुस्कुराहट के साथ बोल उठे।
मैं ने नानाजी की ओर घूर कर देखा और बोली, ” नानाजी आप जरा इधर आईए,” और बोलते हुए बाहर बगीचे की ओर चली। पीछे-पीछे नानाजी किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह मेरे पास आए।
“क्या हुआ” उन्होंने पूछा।
” क्या बात कर रहे थे आपलोग?” मैं ने गुस्से से पूछा।
“अरे और क्या, ऊ लोग पूछ रहे थे कि रात को का का हुआ?” नानाजी बोले।
” और आपने उन्हें सब कुछ बता दिया, है ना?” मैं नाराजगी से बोल पड़ी।
” हां तो और का करता? पीछे ही पड़ गये थे साले। मुझे बताना ही पड़ा।” नानाजी बोले।
” हाय रे मेरे बेशरम कुत्ते राजा, आप सब बहुत हरामी हो।” मैं बोली। समझ गई कि मैं इन हवस के पुजारी बूढ़ों के चंगुल में फंसकर उनकी साझा भोग्या बन गयी हूं। मैं ने भी हालात से समझौता करने में कोई नुक्सान नहीं देखा, आखिर मैं भी तो उनकी कामुकता भरी कामकेलियों में बेशर्मी भरी भागीदारी निभा कर अभूतपूर्व आनंद से परिचित हुई और अपने अंदर के नारीत्व से रूबरू हुई। अपने स्त्रीत्व के कारण प्राप्त होने वाले संभोग सुख से परिचित हुई।
“ठीक है कोई बात नहीं मेरे कुत्ते राजा, मगर अपनी कुतिया की इज्जत परिवार वालों के सामने कभी उतरने मत देना। यह राज सिर्फ हम चारों के बीच ही रहनी चाहिए, ठीक है ना!” कहते हुए घर की ओर मुड़ी।
” ठीक है हमरी कुतिया रानी, ई बात किसी पांचवे को पता ना चलेगा।” कहते हुए मेरे पीछे पीछे आए और हम साथ नाश्ते की टेबल पर बैठे जहां दोनों बूढ़े, परिवार के बाकी लोगों के साथ बैठे थे। नाश्ते के वक्त पूरे समय तीनों बूढ़े मुस्कुराते मुझे शरारती नज़रों से देख रहे थे। मेरे मन में इन बूढ़ों के प्रति कोई गिला शिकवा नहीं रह गया था बल्कि अपने ऊपर चकित थी कि मुझे उन बूढ़े वासना के पुजारियों पर प्यार क्यों आ रहा था। मैं ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए मम्मी से शिकायत भरे लहजे में कहा “देखो ना मम्मी दादाजी और नानाजी मुझ पर हंस रहे हैं।”
मम्मी हमारे बीच के गुप्त रिश्ते से अनजान इसे नाती पोती नाना दादा के बीच वाली शरारती चुहलबाजी समझ कर मुस्कुरा के सिर्फ इतना ही कहा कि ” यह तुम लोगों का आपस का मामला तुम आपस में ही सलटो। मुझे बीच में मत घसीटो।” कह कर उठी और अपने कार्यों में व्यस्त हो गयी। भाई भी उठ कर अपने दोस्तों को साथ मटरगश्ती करने रफूचक्कर हो गया।
पापा बोले, “कल तो इन्हें वापस गांव लौटना है, क्यों नहीं इन्हें आज शहर घुमा देती, इनका भी टाइम पास हो जाएगा।”
“हां ई सही आईडिया है। चल बिटिया हम आज शहर घूम आते हैं।” दादाजी बोल उठे।
“मैं नहीं जाती इनके साथ।” मैं बनावटी गुस्से से बोली।
“अरे चल ना बेटी,” अब नानाजी मनुहार करते स्वर में बोले।
“ठीक है लेकिन आप लोग कोई शरारत नहीं कीजियेगा” मैं बोली।
“ठीक है बिटिया ठीक है” सब एक स्वर में बोल उठे।
हमारी नोंकझोंक से पापा मुस्कुरा उठे। फिर हम फटाफट तैयार हो कर बाहर निकले।
मैं निकलने से पहले उसी बूढ़े टैक्सी ड्राइवर को एस एम एस कर चुकी थी, फलस्वरूप वह चेहरे पर मुस्कान लिए अपनी टैक्सी के साथ हाजिर था। उसकी नजरों में मैं अपने लिए हवस भरी चमक और मूक निवेदन साफ साफ देख रही थी।
“वाह ई तो चमत्कारहो गया। ई तो गजब का संयोग है, हमारे लिए। चल आज हम तेरे ही टैक्सी में पूरा शहर घूमेंगे।” दादाजी बोल उठे।
मैं ने बहुत ही मादक अंदाज में मुस्कुरा कर ड्राईवर को देखा, ड्राईवर बेचारा तो घायल ही हो गया और अपनी सीट पर बैठे बैठे कसमसा उठा। मैं ने उसकी अवस्था भांप ली और मन-ही-मन बूढ़े कद्रदान ड्राईवर को शुक्रिया स्वरूप “तोहफा प्रदान” की योजना बनाने लगी। मुझे पता नहीं क्यों, बुजुर्गों के प्रति आकर्षण बढ़ गया था, अवश्य ही यह पिछले दो दिनों में मेरे साथ हुए तीन बूढ़ों के संग कामुकतापूर्ण अंतरंग संबंधों का असर था।
हम सब टैक्सी में बैठे, सामने बड़े दादाजी और पीछे मैं दादाजी और नानाजी के बीच में बैठी। मेरे बांई ओर नानाजी और दांई ओर दादाजी। मैं ने कहा, “पहले हम म्यूजियम जाएंगे फिर जू और उसके बाद किसी होटल में खाना खाना कर नेशनल पार्क और शाम को बाजार होते हुए घर, ठीक है?”
“ठीक है बिटिया”, नानाजी बोल उठे।
फिर हमारा ग्रुप चल पड़ा। जैसे ही टैक्सी चलना शुरू हुआ, नानाजी ने अपना दाहिना हाथ मेरी जांघों पर फिराना चालू किया और मैं गनगना उठी। दादाजी नें मुझको बांये हाथ से अपनी ओर चिपटा लिया और दाहिने हाथ से मेरी चूचियां सहलाने लगे, बीच बीच में दबा भी रहे थे। मैं एकदम गरम हो उठी। मेरी चूचियां तन गईं, मेरी चूत पनिया उठी। मेरे मुंह से हल्की सी आ्आ्आह निकल पड़ी। बड़े दादाजी ने पीछे मुड़कर यह कामुक दृष्य देखा तो वासनात्मक मुस्कान के साथ बोल उठा, “मेरे पीठ पीछे ई का हो रहा है भाई?”
“अरे कुछ नहीं तू आगे देख” नानाजी ने कहा।
उनका हाथ अब मेरी चूत सहला रहा था। मेरी गीली चूत का अहसास उन्हें हो चुका था। मैं भी बेशरम होकर उनके पैंट का जिप खोलकर टनटनाए लंड बाहर निकाल कर सहलाने लगी। मुठियाने लगी। हाय अगर मैं टैक्सी में न होती तो अभी ही चुदवाने लग जाती, इतनी उत्तेजित हो चुकी थी। नानाजी नें मेरा स्कर्ट उठा कर सीधे पैंटी में हाथ डाल दिया और भच्च से एक उंगली मेरी चूत में पेल कर उंगली से ही चोदना चालू कर दिया। “सी सी” कर मेरी सिसकारियां निकलने लगी। मैं ने अपनी दोनों हाथों में एक एक लंड कस कर पकड़ लिया और पागलों की तरह मूठ मारने लगी। उनके मुख से भी दबी दबी सिसकारियां निकलने लगी। हम दीन दुनिया से बेखबर दूसरी ही दुनिया में पहुंच चुके थे। पीछे सीट पर अभी वासना का तूफ़ान चल रहा था कि टैक्सी रुकी और ड्राईवर की आवाज आई, “साहब हम म्यूजियम पहुंच गये।”