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जवाब मुहतोड़ ( उपन्यास )

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जवाब मुहतोड़

उपन्यास जिसके लेखक वेद प्रकाश कम्बोज जी है . और आशा करता हु की आपसब इसे पढ़ कर निराश नहीं होंगे
 
प्रोलॉग

तब तक विजय एक ताड़ के पेड़ के निकट पहुंच चूका था ....

फायरों की आवाज़ सुनकर वह तुरंत सावधानीवश जमीन पर लेट गया और पलट कर ईमारत की और देखा I

एक लम्बा सा आदमी जिसके कपडे फट कर उसके बदन पर चिथड़ों की तरह झूल रहे थे , बुरी तरह घबराया हुआ बहार निकला....

उसके पीछे-पीछे नंगी चण्डिकाओ का झुण्ड अपनी पूरी ताकत से चीखता चिल्लाता हुआ निकला....

उनके बाल चुड़ैलों की तरह बिखरे हुए थे और वे अपने बदसूरत नंगे शरीरो के साथ कोहराम मचाती हुई झाड़ियों और चट्टानों पर से कूदती हुई प्रचंड पागलपन के साथ अपने शिकार का पीछा कर रही थी ...I

कुछ छन तक तो वो उनसे जूझता रहा और फिर गिर पड़ा .,...

विजय को उसकी दर्द वहारी चिंघारे सुनाई दी.....

सब लड़कियों ने अपने दाँत उसके शरीर में फास दिए ....

उनकी यह दुर्दशा करने में उसका भी बहुत बड़ा हाथ था ....

एक ने तो अपने दातो से फूमाचु के नितम्बो का गोस्त काटकर खींच लिया और किसी जंगली जानवर की तरह चबाने लगी.

"यो तो उसे कच्चा हे चबाये जा रही है . I

विजय के मुख से बेसाख्ता निकला.


........ ......... ........



वेद प्रकाश काम्बोज

का विजय, रघुनाथ सीरीज का

अजीबोगरीब घटनाओ से लबरेज एक हैरत अंगेज उपन्यास


जवाब मुहतोड़
 
"जय शिव शम्भू ...दिखा दे जलवा, उदा दे तम्बू." विमान में अपनी सीट पर बैठे विजय ने उसके उड़ान भरते ही बड़ी श्रद्धा के साथ हाथ जोड़ कर नाडा सा लगाया - "सत श्री अकाल ...मुझको कर दो माला माल...अल्लाह हो अकबर...जल्दी से पंहुचा दे घर ...."

विजय के इन बेतुकी सी बातों से उसके साथ बैठे यात्री ने एकदम चौंक कर अजीब नजरो से उसकी और देखा . वह लगभग ४५ से ५० साल के बिच का एक स्वस्थ और सुगठित शरीर का व्यक्ति था जिसकी रईसी उसके कपड़ो से झलक रही थी.

" आप राजनगर जा रहे हैं ?" उस व्यक्ति को अपनी ओर देखते पाकर विजय ने एक विचित्र सी मुस्कराहट के साथ अपने होठ फैलते हुए पूछा .

वह व्यक्ति शायद ऐसे व्यक्ति से कोई व् बात करने के मूड में नहीं था जो विमान यात्रा के दौरान भी सड़क छाप अनपढ़ जाहिलो की तरह बेतुके नारे सा लगा रहा हो....

उसने बिना कोई जवाब दिए बिना ही एक झटके के साथ अपनी गर्दन दूसरी ओर घुमा ली .

"आप साहब कही भी जा रहे हो ...." विजय ने उस आदमी की बेरुखी का कोई नोटिस लिए बिना अपनी बात चालू रखी-"मगर हम तो राजनगर जा रहे हैं ....आप पूछेंगे साहब की हम राजनगर क्योँ जा रहे हैं ?"

"मुझे यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं हैं की आप राजनगर क्योँ जा रहे हैं?" उस व्यक्ति ने बुरा सा मुँह बना कर उपेक्षा के साथ कहा .

"आपको यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं हैं तो हमे भी यह बताने में दिलचस्पी नहीं हैं की हम राजनगर इसलिए जा रहे की वह हमारा घर है ." विजय ने भी तनिक तुनक भरे स्वर में कहा -"और यह तो आपने सुना ही होगा की आदमी चाहे साड़ी दुनिया का चक्कर काट आये मगर घूम-फिर कर लौटेगा अपने घर ही ...बुजुर्गो ने कहा भी हैं ...वो सुख बल्स न बुखारे जो सुख छज्जू के चौवारे ...छज्जू के चौवारे का मतलब हैं घर और साहब वाकई घर जैसा सुख दुनिआ में और कहा...."

"क्या आप चुपचाप बैठ कर सफर नहीं कर सकते ?"

बहुत ही सूंदर और महत्वपूर्ण सवाल किया हैं आपने ." विजय किसी राजनेता की सी गम्भीरता के साथ गर्दन हिलता हुआ बोला-"मै आपके इस बुद्धिमता पूर्ण सवाल का जवाब जरूर दूंगा ....क्यूंकि यही सवाल मुझसे एक बार लिनलिथगो ने किया था...लिनलिथगो का नाम तो आपने सुना ही होगा ?"

"नहीं ?" उस व्यक्ति ने झटके के साथ कटु स्वर में संछिप्त सा उत्तर दिया.

"आपने लिनलिथगो को नाम नहीं सुना ?" विजय ने महानतम आश्चर्य के भाव अपने चेहरे पर उतारते हुए कहा-"अंग्रेजो के वायसराय लार्ड लिनलिथगो का नाम नहीं सुना...अनेको नेताओ का गिरफ्तार करने वाले उस अत्याचारी अंग्रेज शासक लिनलिथगो का नाम नहीं सुना...कमाल हैं साहब...वैसे अच्छा ही किया जो आपने उसका नाम नहीं सुना ...क्युकी अपने प्यारे देश का गुलाम बना कर लूटने वाले अत्याचारी अंग्रेजो के नाम कान में न पड़े तो ज्यादा अच्छा हैं...."

"आप चुप रहने का क्या लेंगे ? " उस व्यक्ति ने बुरी तरह झल्लाए हुए स्वर में कहा.

"आपकी एक प्यारी सी मुस्कराहट ."

जवाब मे उस व्यक्ति ने गुस्से से विजय को घूरा और फिर झटके के साथ मूह फेर कर दूसरी ओर देखने लगा.

विजय विमान मे कोलकाता से राजनगर लौट रहा था....उसके अलावा विमान मे 50-60 यात्री ओरभी थे उसे इस बात का एहसास था की उसके साथ बैठा यात्री उसकी बातें सुन कर बुरी तरह से उखड़ गया है, मगर उसे अपने टाइम-पास करने के लिए तोड़ा-बहुत शुगल-मेला चाहिए था. इसलिए वो अपनी धुन मे बोला-चला जा रहा था.

 
"बुज़ुर्गो ने कहा है की ह्स्ने-बोलने से आदमी की सेहत और उम्र बढ़ती है." विजय कहता गया-"इसलिए आदमी को हर समय हस्ते-मुस्कुराते रहना चाहिए...वो किसी शायर ने क्या खूब कहा है की या तो दीवाना ह्न्से या तू जिसे तोफिक दे...वरना इस दुनिया मे मुस्कुरा सकता है कौन...सो साहब हम तो हर वक़्त हस्तेमुस्कुराते रहने की कोशिसकरते है...आप भी कीजिए...बड़ा मज़ा आएगा."

"आप बस अब खामोश होकर बैठ जाए."

"हम तो साहब शुरू से ही खामोश बैठे है."

"बस अब कुछ मत बोलिए...मुझे आपकी मूर्खता पूर्ण बातों मे कोई दिलचस्पी नही है".

"जैसे कीचड़ मे कमल खिलता है और गुद्रि मे लाल मिलता है...उसी तरह मूर्खता के घने बदलो के बीच मे से बुद्धिमता का सूरज निकलता है...जिसकी रोशनी मे आदमी के कर्मों की रथ्ह चमचमाता हुआ फिसलता है..."

"खबरदार" लेकिन यह ख़तरनाक धमकी विजय के साथ बैठे व्यक्ति ने नही दी थी बल्कि विमान की पिछली सीटो की तरफ से कोई और गुर्राया था-"कोई भी अपनी जगह से हिलने की कोशिस ना करे...वरना सबको भुन कर रख दूँगा...

"खबरदार" लेकिन यह ख़तरनाक धमकी विजय के साथ बैठे व्यक्ति ने नही दी थी बल्कि विमान की पिछली सीटो की तरफ से कोई ओर गुर्राया था-"कोई भी अपनी जगह से हिलने की कोशिस ना करे...वरना सबको भुन कर रख दूँगा....हम लोग प्लेन को हाई-जैक्क कर रहे है."

विजय ने एकदम चौक कर देखा..दो पिस्टल धारी ने आगे-पीछे से सभी यात्रियो को कवर कर लिया था.

पिस्टल धारियो को देखते ही सभी यात्रियो को जैसे साँप सूंघ गया हो...वे हक्के बक्के और आतंकित से फटी-फटी आँखों के साथ उन दोनो पिस्टल धारियो को देखते रह गये.

उड़ते प्लेन मे कोई यात्री कुछ करने की हिम्मत नही करेगा ये बात वो दोनो पिस्टल धारी अछी तरह से जानते थे...फिर भी पिस्टल की दहशत दिखाए रखना ज़रूरी था.

पिछली शीट का पिस्टल धारी पसनजेर को अपने पिस्टल से कवर किए खड़ा रहा और उधर अगली साइड का पिस्टल धारी पाइलट के रूम का गेट खोल कर घुस गया

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विमान का मुख्य पाइलट कॅप्टन परिमल चटर्जी अपनी सीट पर बैठा विमान को सुनिश्चित मार्ग पर ले जा रहा था की तभी उसके बराबर मे बैठे को-पाइलट ने कहा-"बहुत घने काले-काले बादल घिरने लगे है कॅप्टन."

"यानी मौसम खराब हो रहा है ?"

"लगता तो कुछ ऐसा ही है."

को-पाइलट अशोक सूरी ने कहा.

"बेहतर होगा की हम और उपर चले जाए....तुम 20 हज़ार फीट पर ले जाने की इज़ाज़त लो."

"ठीक है सर..." अशोक सूरी ने कहा और फिर ट्रांसमीटर से जुड़े माइक्रोफॉन का एक बटन दबाता हुआ बोला-"फ्लाइट-6142 रेजीना रेडियो...."

"गो-अहेड 6-1-4." इयरफोन मे एक आवाज़ घूंजी.

"हमारे रास्ते मे मौसम कुछ खराब सा हो रहा है." अशोक सूरी ने कहा-"इसलिए हमे 20 हज़ार फीट की उचाई पर जाने की इज़ाज़त चाहिए."

"थोड़ा इंतज़ार करो 6-1-4...मै ए.टी.सी से पूछ कर बताता हू."

"थॅंक्स." अशोक सूरी ने कहा.

कॅप्टन परिमल चटर्जी ने सामने उमड़ते-घूमरते बादलों को गौर से देखा और बोला-बेहतर होगा की सीट बेल्ट बाँधने का स्विच दबा दिया जाए.

"ओ.के." सूरी ने उपर की पैनेल की तरफ हाथ बढ़ा कर स्विच दबा दिया.

इस बीच एक हल्के से झटके के साथ विमान ने अपने आपको काले बादलों की छोटी सी दीवार के गिरफ़्त से छुरा लिया.

"फ्लाइट 6-1-4 " रेडियो पे आवाज़ गूँजी- ए.टी.सी ने 20 हज़ार फीट पर जाने की क्लियरेन्स दे दी है....ओवर."

"थॅंक्स आंड आउट." अशोक सूरी ने कहा.

"तो फिर चलो." कॅप्टन ने कहा.

एंजिन की आवाज़ मे परिवर्तन हुआ और उसके साथ ही विमान उपर की ओर तिरछा हुआ...आल्टिमीटर की सुई थर-थराने लगी और विमान 500 मीटर/मिनिट की रफ़्तार से उपर उठने लगा.

निश्चित उचाई पर पहुच कर एंजीनो की आवाज़ सही करने और विमान को सीधा करने के लिए अपने सामने के यंत्रों को छेर्ना शुरू कर दिया.

वे दोनो पाइलट अपने काम मे ऐसे मस्गोल थे की उन्हे दरवाज़ा खोलकर अंदर घुस आए पिस्टल धारी की कोई आहट ना सुनाई दी.

चौके जब एक ख़तरनाक आवाज़ सुनाई दी.

"इस प्लेन को हाइ-जेक किया जा रहा है." पिस्टल धारी उनके पीछे से उनकी ओर पिस्टल ताने हुए बोला-" तुम दोनो मे से अगर किसी ने भी कोई होशियारी दिखाई या हुक्म ना मानने की ग़लती की तो गोलियों से उड़ा दूँगा."

 
सुनते ही दोनो पाइलट सन्न रह गये................

"अबे भाई तुम अगर प्लेन को हाइजॅक करोगे तो हम सब लोगो को वे-बैक करके कहा पैक्क करोगे ?"विजय ने अपनी शीट से उठकर खड़े होते हुए पूछा.

"क्यों अपनी मौत को दावत दे रहा है ?"पिस्टल धारी ने विजय को मूर कर कहा-" चुप-चाप अपनी शीट पर बैठ जा."

"बैठ तो जाउ माई-बाप, मगर बैठा नही जा रहा." विजय हाथ जोड़कर गिडगिराता सा बोला-"बहुत बुरी हालत हो रही है."

"क्या हो रहा है ?" पिस्टल धारी ने गुररा कर पूछा.

"बहुत ज़ोर की छोटी उंगली हो रही है" विजय अपने हाथ की सबसे छोटी उंगली उठा कर बाथरूम जाने का इशारा करता हुआ बोला-" अगर फ़ौरन इज़ाज़त नही दी तो हुज़ूर आपके डर के मारे पैंट गीली हो जाएगी."

"चुपचाप अपनी शीट पर बैठ जा" पिस्टल धारी ने घुर्राया.

"रोके नही रुक रहा सरकार...पैंट खराब हो जाएगी."

"हो जाने दे..शीट पर बैठे-बैठे कर ले."

फिर वो हो गया जिसकी कल्पना विजय ने भी नही की थी...वो अपनी चाल खेल रहा था की किसी तरह उस टेररिस्ट पिस्टल धारी को बातों मे उलझा कर वो किसी तरह उस तक पहुच जाए या उसे अपने तक आने के लिए मज़बूर कर दे ताकि उसकी पिस्टल छीन कर उसपर काबू पा सके....मगर ऐसा कुछ होने से पहले ही एक और भयंकर घटना घटगयी.

पिस्टल धारी टेररिस्ट के पास एक युवक यात्री बैठा हुआ था....उसने जब टेररिस्ट को विजय की बातों मे उलझा हुआ पाया तो जवानी के जोश मे झटके के साथ उस पर झपट मारा.

टेररिस्ट थोड़ा असावधान ज़रूर था मगर ऐसा नही की वो युवक उस पर काबू पा सकता...हालाँकि उसने उठते ही सबसे पहले उसके पिस्टल वाले हाथ पर ही झपटा मारा था...लेकिन टेररिस्ट ने बरि फुर्ती के साथ थोड़ा सा घूमकर युवक को अपने पीछे की तरफ उछाल दिया और फिर पूरी तरह घूम कर उसने युवक के सरीर मे एक साथ पिस्टल की कई गोलिया उतार दी.

धाय-धाय की आवाज़ विमान के भीतर घूँजती चली गयी.

जैसे ही टेररिस्ट की पीठ विजय की तरफ़ घूमी वैसे ही विजय ने अपनी शीट पर पैर रख कर छल्लांग लगाई और कई यात्रियो के सिर के उपर से होते हुए सीधा टेररिस्ट के उपर जाके गिरा.

इस अचनाक आक्रमण से टेररिस्ट घबरा गया....उसने विजय को गोली मारने के लिए पिस्टल वाला हाथ पीछे घुमाया...लेकिन विजय ने फुर्ती के साथ उसकी कलाई को झटका देकर पिस्टल का रुख़ मोर दिया..टेररिस्ट की उंगली ट्रिग्गर दबा चुकी थी..धाय की आवाज़ के साथ पिस्टल से निकली गोली उसकी गुर्दी मे सुराख करती हुई उसकी खोपड़ी मे घुस गयी.

टेररिस्ट अपनी ही पिस्टल की गोली का शिकार हो चुका था.

खोपड़ी मे गोली घुसते ही उसका सरीर एकदम ढीला पड़ने लगा.

टेररिस्ट अपनी ही पिस्टल की गोली का शिकार हो चुका था.

खोपड़ी मे गोली घुसते ही उसका शरीर एकदम ढीला पड़ने लगा...विजय ने फुर्ती के साथ उसके हाथ से पिस्टल छीन ली और फिर वह रुका नही..क्यूकी उसे दूसरे टेररिस्ट का पता था जो पाइलट रूम मे घुसा हुआ था...गोलियों की आवाज़ सुनकर घबराहट मे वो कोई गड़बड़ ना कर दे उससे पहले ही उसे काबू मे करना ज़रूरी था..इसलिए वो एकदम तेज़ी के साथ पलटा और पिस्टल हाथ मे लिए पाइलट-रूम की ओर लपका.

उसका साथी यात्री आश्चर्या से मूह बाए उसके करतब देख रहा था. लेकिन फिलहाल विजय का उसकी तरफ कोई ध्यान नही था.

सीटों के बीच से उसने अभी आधा रास्ता ही पार किया था की तभी पाइलट-रूम का दरवाज़ा खुला और दूसरा टेररिस्ट पिस्टल हाथ मे लिए तेज़ी के साथ बाहर निकला...विजय को देखकर उसके चेहरे के भाव परिवर्तित हुए...अपने पिस्टल वाले हाथ को उठा कर विजय को निशाना बनाना चाहता था..किंतु उससे पहले विजय ने अपने दोनो हाथो से पिस्टल पकड़ कर फायर कर दिया. गोली सीधी उसके माथे मे सुराख बनती हुई खोपड़ी मे घुस गयी...टेररिस्ट अजीब ढंग से हवा मे लहराया और फिर धराम से विमान के फर्श पर गिर पड़ा.

 
टेररिस्ट के मुर्दा शरीर को लाँघ कर विजय आगे बढ़ा और उसने पाइलट-रूम मे झाँक कर देखा.

अंदर का दृश्या देखते हे वो सिर से पैर तक काँप गया.

"तुम प्लेन हाइजॅक करके कहा ले जाना चाहते हो ?" स्थिति की गंभीरता को समझते हुएँ परिमल चटर्जी ने शांत स्वर मे पूछा.

"प्लेन का मुख दाई तरफ मोड़ दो." टेररिस्ट ने कहा-"उसके बाद तुम्हे डेस्टिनेशन भी बता दिया जाएगा."

"असमान तुम्हे खाली ज़रूर दिखाई देता होगा." कॅप्टन चटर्जी उसी प्रकार शांत स्वर मे बोला-"लेकिन प्लेन के रुख़ ऐसे ही नही मोड़ दिए जाते...कंट्रोल टवर से इज़ाज़त लेनी पड़ती है...क्यूकी दूसरे प्लेन व आसमान मे अपने निर्धारित रास्तों पर उड़ते हुए आते है...अगर अपनी मन मर्ज़ी से लोग प्लेन उड़ाने लगे तो चरखी-दाडरी जैसे दुर्घटना रोज घटने लगे...तुम्हे चरते-दाडरी की वो घटना तो याद होगी जिसमे सौदी अरब और रशिया का चार्टर किया हुआ प्लेन आपस मे टकरा गये थे...कितनी भयानक दुर्घटना हुई थी वो...सैकरो आदमी भी मारे गये थे...."

"मुझे बेकार की बातों मे उलझाने की कोशिश मत करो." टेररिस्ट गुराया-"जो कहता हू करो...कंट्रोल टॉवेर से इज़ाज़त लेनी है तो लो...जल्दी करो...

उनलोगो को बातों मे उलझा देखकर अशोक सूरी को लगा की टेररिस्ट उसकी ओर से पूरी तरह असावधान हो गया है...इसलिए वो तेज़ी के साथ अपनी शीट मे घूमकर टेररिस्ट के पिस्टल वाले हाथ पर झपटा मारा.

टेररिस्ट असावधान ज़रूर था....... पर इतना नही की सूरी उसके हाथ से एक ही झटके मे पिस्टल छीन लेता...दोनो एक दूसरे से झुझ रहे थे...सूरी टेररिस्ट से ज़्यादा ताकतवर था....आमने -सामने की बात होती तो शायद टेररिस्ट पर काबू पा लिया होता...लेकिन उस समय बीच मे उसकी पाइलट शीट थी जिसमे उसके सरीर का निचला हिस्सा फसा हुआ था...फिर भी उसने टेररिस्ट को तिरछा कर दिया था...कॅप्टन चटर्जी की शीट की तरफ.

"सूरी यह क्या.."कॅप्टन चटर्जी के हलक से इससे ज़्यादा शब्द ना निकल सके.

"धाय" की आवाज़ के साथ एक गोली चली और उसकी गर्दन के पास से कंधे मे सुराख करती हुई जिस्म मे फॅस गयी.

जिसस तरह प्लेन के पिछले हिस्से मे चलने वाली गोलियों की आवाज़ यहा तक नही पहुचि उसी तरह यहा की गोली की आवाज़ भी वाहा तक नही पहुचि.

अशोक सूरी ने जो अपने कॅप्टन को गोली लगते देखी तो घबरा गया...उस घबराहट मे उसकी पकड़ टेररिस्ट पर कुछ ढीली हो गयी..जिसका लाभ उठा कर टेररिस्ट ने एक जोरदार झटके के साथ अपने को छुरा लिया और फिर क्रोध की अधिकता के कारण अपनी पिस्टल से अशोक सूरी पर गोलियाँ बरसानी सुरू कर दी.

सारी गोलिया अशोक सूरी की चेहरे मे फाशति चली गयी...गोलियों की विस्फोटक मार से उसके चेहरे का भुनास उड़ गया...उसका लहू-लुहान निर्जीव सरीर अपनी शीट मे ही लुढ़क गया.

कॅप्टन चटर्जी यूँ अपने शीट मे पहले की तरह ही सीधा बैठा हुआ था...मगर उसके कंधे पर गर्दन के पास के जख्म से खून उबल-उबल के बहने लगा था...फिलहाल वो जिंदा था...मगर उसका सफेद पड़ता हुआ चेहरा यह बता रहा था की उसकी हालत भी छन-प्रति छन नाज़ुक होती जा रही है.

टेररिस्ट ने यह सब देखा तो उसके होश उड़ गये...उसके जहाँ मे उस वक़्त सिर्फ़ एक ही विचार कोंधा की अगर दोनो पाइलट मर गये तो फिर प्लेन को क्रॅश होने से कोई नही बचा सकेगा...

इस भयानक इस्थिति की सूचना अपने दूसरे साथी को देने के लिए वो हवा के झोंके के तरह पाइलट-रूम से बाहर निकला...मगर बाहर निकले के बाद उसे अपना साथी कही नज़र नही आया...उसकी जगह नज़र आया कोई और आदमी जिसके हाथ मे पिस्टल थी.

ख़तरे का आभास होते हे उसने तुरंत अपना पिस्टल वाला हाथ उठाया...मगर इससे पहले की वो निशाना ले कर गोली चला पता..."धाय"की आवाज़ के साथ उसके माथे से टकराती हुई उसकी खोपड़ी मे घुस गयी...उसे नही मालूम की खोपड़ी मे वो चीज़ पहले घुसी या उसने"धाय" की आवाज़ पहले सुनी...

 
उसे सिर्फ़ इतना मालूम है की खोपड़ी मे पहले रोशनी का धमाका सा हुआ और फिर सब कुछ अंधेरे मे डूब सा गया.

वो कटे पेड़ की तरह नीचे गिड पड़ा.

विजय ने दहसतजदा नेत्रो से अशोक सूरी को देखा जिसका चेहरा गोलियों की मार से विकृत हो चुका था...उसके बाद उसने कॅप्टन चटर्जी को देखा जिसका कंधा खून से तर होता जा रहा था/.

"कॅप्टन तुम ठीक हो ?" विजय ने कॅप्टन की शीट के निकट पहुच कर उनसे पूछा.

"अभी तो ठीक हू..."कॅप्टन ने कमजोर और कांपति हुई से आवाज़ मे कहा -"लेकिन यह नही मालूम की कितनी देर ठीक रहूँगा."

"कॅप्टन थोड़ी देर अपने आपको और ठीक रखो और आस-पास के किसी एरपोर्ट पर प्लेन उतारने की कोशिस करो."विजय चिंतित स्वर मे बोला.

"ठहरो..."डूबती सी आवाज़ मे कॅप्टन चटर्जी ने कहा-"पहले मै..इस प्लेन को ऑटो पाइलट पर सेट कर दु...

निरंतर खराब होती हुई हालत के वाब जूद भी कॅप्टन चटर्जी ने बड़े शाहास के साथ अपनी मूंदती हुई आँखों को खोला और फिर अपने सामने के यंत्रों से जूझने लगा.

"मैने प्लेन को ऑटो-पाइलट के मोड पर सेट कर दिया है....कुछ देर बाद कॅप्टन चटर्जी ने दीर्घ निःशवास के साथ कहा-"इससे ज़्यादा अब मै और कुछ नही कर सकता...आसपास के किसी भी एरपोर्ट पर प्लेन नही उतरा जा सकता...बादल घिरे हुए है....नीचे तूफान चल रहा है...आह.....आअहह...."और इसके साथ ही वो अपने शीट मे लुढ़क गया.

विजय ने झपट कर उसका निरीक-छन किया...कॅप्टन चटर्जी जी मर चुका था,,,वो शायद प्लेन को ऑटो-पाइलट पर ही सेट करने के लिए जिंदा था......

अपने पीछे किसी के आभास्स पाकर विजय एक्दुम फुर्ती के साथ मुड़कर देखा...विमान की स्टी-वॉर्ड्स थी.

"क्या हुआ?" स्टी-वॉर्ड्स ने घबराए स्वर मे पूछा.

"अभी तो सिर्फ़ नाश हुआ है...मगर थोड़ी दे मे शर्वनाश होने वाला है." विजय बोला-"तुम्हे या प्लेन के किसी दूसरे कर्मचारी को प्लेन चलना आता है ?"

"नही." स्टी-वॉर्ड्स बोली-"लेकिन कॅप्टन को क्या हुआ ?"

"गोलियों की आवाज़ नही सुनी तुमने ?"

"उसे सुनकर ही तो मै किचन से दौड़ी चली आई हू." टेर्रोरिस्टों ने प्लेन को हाई-जक्क करने की कोसिस की थी...दोनो पाइलट मारे गये है."

"हे भगवान..अब क्या होगा ?"

"वही होगा जो मंजूरे खुदा होगा." विजय बोला- "ऐसे हालात मे घबराने से कुछ नही होने वाला...एक बात को हमेशा याद रखो की जब तक साँस तब तक आस."

"मगर बिना पाइलट के प्लेन का क्या होगा ?"

"वही होगा जो संकर-संभू को मंजूर होगा...अब तुम यहा बातों मे वक़्त बर्बाद मत करो और भगवान का नाम लेके पॅसेंजर्स को संभलो..अगर पॅसेंजर्स मे घबराहट फैल गयी तो हालात और बिगड़ जाएँगे."

स्टी-वॉर्ड्स की समझ मे विजय की बात आई और वो फ़ौरन बाहर निकल गयी.

उसके जाते ही विजय ने दोनो पाइलट के मुर्दा शरीर को उसकी शीट से खिच कर पीछे के फर्श पर डाला और फिर पाइलट की शीट पर बैठने ही जा रहा था की तभी एक आवाज़ गूँजी.

"यह क्या हो रहा है ?"

चौंकते हुए पलटकर देखा तो उसकी पास की शीट का यात्री पीछे खड़ा था.

"प्लेन चलाना आता है तुम्हे?"सहयात्री पूछ रहा था.

"नही..मुझे यह प्लेन चलना नही आता."

"फिर यह क्या कर रहे हो ?"

"वही जो इन हालात मे कोई दूसरा नही कर सकता." विजय बोला- "वैसे तुम्हे प्लेन चलना आता है ?"

"नही."

"तो चुप-चाप जाकर अपनी शीट पर बैठ जाओ." विजय ने कहा और माइक्रोफोन पकर कर इंटर नॅशनल संकट-संदेश ज़ोर-ज़ोर से चीख कर प्रसारित करने लगा-" मे...डे...मे....डे दिस इस फ्लाइट नंबर 614..संकट संदेश है...जो कोई भी सुन रहा है...वो फ़ौरन जवाब दे...मे डे...मे डे.....ओवर."

वो व्यक्ति विजय के कहने के वाबजूद भी अपनी शीट पर नही गया था...वो वही खड़ा हुआ चमत्कृत सा उस आदमी को देख रहा था जिसे उसने कुछ देर पहले एक बेहूदा मसखरा समझा था.

"हेलो 614..." रेडियो पर आवाज़ आई- "दिस इस राजनगर..क्या गड़बड़ हो गयी?"

"बहुत भयानक गड़बड़ हो गयी है." विजय बोला- "2 टेररिस्ट ने प्लेन को हैजैक्क करने की कोशिश की थी..मगर दोनो टेररिस्ट मारे जा चुके है..मगर उनके साथ एक यात्री और दोनो पाइलट भी मारे जा चुके है...."

"ओह माइ गोड."

"प्लेन इस वक़्त ऑटो-पिलोटे पर सेट है."

"तुम कोन हो ?"

"मेरा नाम विजय है और प्लेन के यात्रियों मे से एक हू...इस वक़्त मै प्लेन का पाइलट बना हुआ हू...आपकी जानकारी के लिए मई बता दु की मैने बरसों पहले एक एंजिन के प्लेन उड़ाए है...लेकिन इतना बड़ा प्लेन मैने जिंदगी मे कभी हॅंडल न्ही किया...यह भी नोट कर लीजिए की बरसों से मैने किसी भी किस्म का कोई प्लेन न्ही उराया...इसलिए अगर तुम रेडियो पे किसी ऐसे आदमी को बुला सको जो मुझे इस प्लेन को चलाने के बारे मे कोई इन्स ट्रक्सन दे सके तो शायद मै अपने साथ-साथ दूसरे लोगो की जाने भी बचा सकु..."

"इस समय तुम किस पोज़िशन पर हो ?"दूसरी ओर से पूछा गया.

"इस समय हम 20 थाउज़ंड फीट की उचई पर उड़ रहे है..एर स्पीड 210 नोट है.."विजय सामने लगे विभिन्न तरह के मीटर को देखकर अपनी पोज़िशन के बारे मे बताने लगा.

"6..1..4...तुम्हारा संदेश सुन लिया है...थोड़ा इंतज़ार करो प्लीज़."

"इंतज़ार करने के अलावा और कुछ किया भी तो नही जा सकता." विजय ने धीरे से बड़बड़ा कर कहा और फिर गर्दन घुमा कर उस आदमी की ओर देखा जो अभी तक वही खड़ा हुआ था.

"तुम यहा मेरे सिर पर खड़े हुए क्या कर रहे हो यार ?" विजय बोला-"जाकर अपनी शीट पर बैठो और प्रभु के भजन करो."

"मेरा नाम प्रताप केलकेर है." उस व्यक्ति का स्वर उस समय काफ़ी नरम था-" क्या मै इस संकट के समय तुम्हारे किसी काम आ सकता हू ?"

 
"मुझे अपने बारे मे नही पता की इस संकट की घड़ी मे मै किसी काम का साबित हो सकता हू या नही." विजय बोला- "फिर तुम्हारे बारे मे मै क्या कहु..वैसे बुजुर्गों ने कहा है की वक़्त पर तिनके का सहारा व बहुत होता है..वैसे भी एक से भले दो..बराबर की शीट खाली पड़ी है बैठो."

"मैने तुम्हारे जैसा विचित्र आदमी अपनी जिंदगी मे पहले कभी नही देखा. प्रताप केलकेर बराबर की शीट पर बैठ ता हुआ बोला- "जो बातें तो अजीब बेतुकी सी करता है लेकिन काम चमत्कारिक ढंग से करता है."

"यह बात है तो जी भर कर देख लो प्यारे..क्यूंकी हो सकता है मुझे देखने का यह पहला और आख़िरी मौका हो..और अगर कहीं उपर वाले की दया से बच गये तो फिर हो सकता है की मेरे थोबरे को इतनी बार देखना पड़े की देखते-देखते बोर हो जाओ."

"मै मरने के बजय तुम्हारे चेहरे को देखते हुए जिंदगी भर बोर होना ज़्यादा पसंद करूँगा." प्रताप केलकर ने मुस्कुरा कर कहा.

"भगवान तुम्हारी इक्चहा पूरी करे वत्त्स." विजय ने किसी पहुचे हुए साधु-महात्मा की तरह आशीर्वाद दिया.

ऑटो-पिलोटे के नियंत्रण मे प्लेन निर्धारित दिशा की ओर उड़ा जा रहा था और वेदोनो धड़कते दिल के साथ रेडियो से किसी के बोलने की आवाज़ आने की प्रतीक छा कर रहे थे.

तेज़ रोशनी से जगमगाती हुए कंट्रोल रूम का माहौल एकदम संगीन और टेन्स्ड हो गया.

पूरब की तरफ जाने वाली सारी डिपार्चर फ्लाइट्स को फ़ौरन काँसेल कर दिया जाए." कॉनट्रोलर ने झपटकर एक फोन का रिसीवर उठाते हुए कहा- "हमारे पास तकरीबन एक घंटे का वक़्त है जिसमे दूसरी दिशाओ मे जाने वाले ट्राफ़िक को निकाला जा सकता है...उसके बाद की जितनी भी शिड्यूल फ्लाइट्स है उन्हे तब तक के लिए रोक दिया जाएगा जब तक की...जब तक की इस समस्या का समाधान नही हो जाता..सारे स्टेशन्स और फायर क्राफ्ट को सावधान कर दो की हम अगले 40 मिनिट्स के बाद यहा आने वेल किसी भी फ्लाइट्स को उतरने की इजाज़त नही दे पाएँगे...डाइवर्ट एवेरी थिंग वीथ एन ई. टी . ए लेटर दैन डॅट.." फिर वो रीसिवर पटकता हुआ अपने एक सहायक से बोला- "क्या तुमने फायर चीफ को फोन कर दिया ?"

"उसके घर की घंटी बाज रही है."

"उससे कहो की वो फ़ौरन यहा पहुचे.. इट्स लुक लाइक अ बिग शो...और ड्यूटी फायर ऑफीसर से कहो की वो सिटी फायर डिपार्टमेंट को सूचित करे...वे अपने साज़ो-समान के साथ फॉरन यहाँ पहुँच जाए."

"वह तो मैने कह दिया है..आप कहे तो एरफोर्स को भी अलर्ट कर दिया जाए ?"

"बिल्कुल..उनसे कहो की अपने एयर क्राफ्टइस इलाक़े से दूर रखे."

"आप का क्या ख़याल है..?" सहायक ने हिचकते हुए स्वर मे कांट्रॉलर से पूछा-"कोई चान्स है...?"

"पता नही...पर हमे कोशिश तो करनी होगी..इस वक़्त तो हमे ऐसे आदमी की सख्ह्त ज़रूरत है जो इस तरह के प्लेन का पूरा एक्सपीरियेन्स रखता हो. साथ ही नीचे से सही निर्देश देने के काबिल भी हो...क्या तुम किसी ऐसे आदमी का नाम सूझा सकते हो ?"

'कॅप्टन त्रिभुवन के बारे मे आपका क्या ख़याल है ?"

"कॅप्टन त्रिभुवन..यस यू आर राइट..इस सिचुयेशन मे उससे बेहतरीन आदमी और कोई नही हो सकता...भगवान करे वो इस समय शहर से बाहर कही दूरदराज ना गया हो...फॉरन उसके घर फोन करो..घर ना हो तो जहा कही भी हो उसे तलाश करके यहा आने के लिए कहो."

उसके बाद कांट्रोलर रेडियो पैनेल की ओर बढ़ गया और माइक्रोफॉन पकर कर उसने डिस्पेचयर को गर्दन से इशारा किया जिसने तुरंत ही ट्रांसमीटर का स्विच दबा दिया.

"राजनगर कंट्रोल टू फ्लाइट 6-1-4."

विजय की आवाज़ एक कोने मे लगे लाउड-स्पीकर से आई. जब से उसका "मे-डे"का संकट संदेश आया तब से उसका सारा वार्ता लाप लाउडस्पिकर पर प्रसारित किया जा रहा था ताकि वहाँ उपस्थित सभी लोग सुन सके.

"614 तो राजनगर...मै तो समझा था की तुम लोग हमे भूल ही गये..."

"हम तुम्हारे लिए हर संभव सहयता जुटाने की कोशिश कर रहे हैं...हिम्मत मत हरो...थोड़ी देर बाद हम तुम्हे फिर से कॉंटॅक्ट करेंगे...इस बीच तुम प्लेन के कंट्रोल से कोई छेड़छाड़ करने की कोशिश मत करना...समझ गये ना..कोई छेड़छाड़ नही करनी है तुम्हे...ओवर."

"अरे भाई लोगो मै पहले ही बता चुका हू की मैने इस तरह की उड़न-परी को अपनी जिंदगी मे पहले कभी नही छेड़ा." लाउडस्पिकर पर विजय की आवाज़ आई- "और इस वक़्त भी मेरा इसके ऑटो-पाइलट से कोई छेड़-छाड़ करके बेमतलब मौत के मुह मे जाने का कोई इरादा नही है."

"ठीक है...इंतज़ार करो." कॉनट्रोलर ने माइक्रोफॉन रखा और फिर अपने आप से बोला- "जो कोई भी है, बड़े जीवट का आदमी है."

फिर जैसे उसे अचानक ही कुछ याद आया हो और वो बेताबी के साथ चिल्लाया- "कॅप्टन त्रिभुवन...फॉरन कॅप्टन त्रिभुवन का पता लगा कर उसे जल्दी से जल्दी यहा पहुचने के लिए कहो."

 


उस समय कॅप्टन त्रिभुवन अपनी पत्नी विदिशा के नंगे शरीर से छिपता हुआ उसके होंठो को चूम रहा था...आज एक हफ्ते बाद विदिशा अपनी मा के यहा से लौट कर आई थी और त्रिभुवन एक हफ्ते की पूरी कसर निकालने के मूड मे था.

कामनाओं की बिजलियाँ विदिशा के समस्त शरीर मे सन-सनसाने लगी.

"ओह..मा..." विदिशा तड़पती हुई से बोली- "अब कब तक आग को हवा देते रहोगे...जल्दी से कराही चढ़ा कर पूरियाँ तल्ना शुरू करो."

"बहुत बेचैन हो.."त्रिभुवन ने उसके गालों को चूमते हुए उसे छेरा.

"तुम बेचैन नही हो ?" विदिशा उसके गले मे अपनी गोरी-गोरी बाहें डालते हुए बोली.

"मेरी छोरो...अपनी बताओ..."

"बहुत बेशरम हो तुम..."

"इशि बेशर्मी के लिए तो लोग शादी करते है."

मादक आनंद के सागर मे गोते लगता हुआ उसका रस से भीगा हुआ शरीर शिथिल पड़ने लगा...त्रिभुवन भी क्लांत होकर विदिशा के पास निढाल सा गिर गया.

ठीक उसी समय टेलिफोन की घंटी बाजी.

"त्रिभुवन स्पीकिंग" करवट बदल कर विदिशा के पास से हट ते हुए त्रिभुवन ने रीसिवर उठाकर कान से लगते हुए कहा.

"कॅप्टन त्रिभुवन आपकी बहुत सक्थ ज़रूरत आ पड़ी है."दूसरी ओर से एक बेताब सी आवाज़ आई- "आप फॉरन राज नगर एरपोर्ट के कंट्रोल टावर पर पहुचिए."

"लेकिन बात क्या है ?"

"हम लोग इस वक़्त बड़ी मुसीबत मे फस गये है..कोलकाता से आने वाला एक प्लेन है...एम्प्रेस्स सी-6...उसके दोनो पाइलट मर चुके है और उस पर सवार यात्रिओं की जान ख़तरे मे है."

"क्या कहा ?" त्रिभुवन एकदम उछल कर बैठता हुआ बोला- "दोनो पाइलट मर चुके है...ओह गॉड."

"हाँ कॅप्टन..टॉप एमर्जेन्सी का मामला है..इस समय कोई आदमी प्लेन के कंट्रोल पर बैठा है जिसने बरसो पहले मामूली एंजिन का प्लेन चलाया है...खुदकिस्मती से प्लेन इस वक़्त ऑटो-पाइलट पर है..आपकी सक्थ ज़रूरत आ पड़ी है...सिर्फ़ आप ही इस मुसीबत को संभाल सकते है."

"मैं नही जानता हू की मै क्या कर सकता हू."

"कम से कम आप यहा फॉरन तो पहुच सकते है...बातों मे वक़्त बर्बाद किए बिना आप अपना पता बताए...कुछ ही मिनिट्स मे एक पुलिस कार आपको लेने आपके घर पहुच जाएगी."

"ठीक है मै आ रहा हू." अपना पता लिखाने के बाद त्रिभुवन ने कहा और फिर एक ही छलाँग मे पलंग से नीचे उतार आया.

"क्या हुआ ?" उसे ऐसा उछलते हुए देख कर विदिशा ने चौंक कर पूछा.

"एरपोर्ट पर कुछ जबरदस्त मुसीबत खड़ी हो गयी है...मुझे फॉरन जाना होगा...एक पुलिस कार मुझे लेने आ रही है."

"पुलिस..."

"इसमे तुम्हे घबराने की ज़रूरत नही है."

त्रिभुवन फुर्ती के साथ विदिशा को चूम कर तसल्ली सा देता हुआ बोला- "उन लोगो को मेरी मदद की ज़रूरत है...तुम ज़रा फटाफट मेरे कपड़े निकल दो..मै थोड़ा सा पानी डालकर आता हू."

"लेकिन वे लोग पुलिस कार क्यू भेज रहे है ?" विदिशा ने पलंग से उठते हुए पूछा- "स्टाफ कार भी तो भेज सकते थे."

"स्टाफ कार को लंबा रास्ता तय करना पड़ता." त्रिभुवन ने समझाया- "जबकि इलाक़े मे घूमती हुई किसी भी पोलिश कार को रेडियो दवारा संदेश दे कर फासला और टाइम बचाया गया है..टॉप एमर्जेन्सी का मामला है...अब देर ना करो...जल्दी से मेरे कपड़े निकल दो."

कहने के साथ ही त्रिभुवन झपट कर बाथरूम मे घुस गया.

"कॅप्टन विजय...कॅप्टन विजय..."चिल्लाते हुई सी स्टी-वॉर्ड्स ने पाइलट-रूम मे प्रवेश किया. वो बुरी तरह से घबराई हुई से थी.

"क्या बात है ?" विजय ने एकदम घूम कर उससे पूछा. "पॅयेसेंजर्स मे बुरी तरह दहशत सी फैल गयी है." स्टी-वॉर्ड्स ने बौखलाती सी आवाज़ मे बताया- "वे लोग मेरी कोई बात सुनने को तैयार नही है..कुछ डर के मारे चीख-चिल्ला रहे है...कई बुरी तरह से रो रहे है...दो तो दहशत से बेहोश हो गये है...ख़तरा है कही इनमे से कुछ को दिल का दौरा ना पर जाए..."

"तुम उन्हे शांत करने की कोशिश करो" विजय बोला.

"वे मेरी कोई भी बात सुनने को तैयार ही नही है" वो बोली.

"तुम किसी तरह उन लोगो को शांत कर सकते हो ?" विजय ने केलकर की ओर मुड़ते हुए उससे पूछा.

"कोशिश करके देखता हू." केलकर ने बराबर की शीट से उठते हुए कहा और फिर स्टी-वॉर्ड्स के साथ वो यात्री कच्छ मे पहुचा.

यात्रियो मे स्थिति की भयनकर्ता का आभास पाकर हरकंप सा मचा हुआ था...कई तो मौत को निस्चित जानकार ज़ोर-ज़ोर से रो रहे थे...कुछ ऐसे भी थे जो भय की अधिकता के कारण बेहोश हो गये थे.

"आप लोग ज़रा ध्यान से मेरी बात सुनिए." यात्रियो के बीच मे खड़े होकर प्रताप केलकर ने जोरदार आवाज़ मे कहा- "टेरर रिस्टो के कारण जो ख़तरा खड़ा हो गया था वो फिलहाल टल गया है...यह हम लोगो का सौभाग्य है की मिस्टर. विजय इस प्लेन पर हम लोगो के साथ सफ़र कर रहे है...आप लोगो ने देखा की उन्होने कितनी होशियारी और बहादुरी के साथ टेर्रोरिस्टो को मार गिराया...आप लोगो को यह जानकार खुशी होगी की मिस्टर. विजय ना सिर्फ़ एक बहादुर इंसान है बल्कि होशियार पयलट भी है..."

"क्या वो आदमी पाइलट भी है ?" एक साथ कई यात्रियो ने पूछा.

 
"बहुत होशियार पाइलट है."केलकर को मालूम था की वो झूठ बोल रहा है मगर उस समय उसके चेहरे और आवाज़ मे ऐसे दृढ़ता थी की जैसे वो दुनिया का सबसे बड़ा सच बोल रहा हो- "इसलिए मै कह रहा हू की स्थिति पूरी तरह नियंत्रण मे है....इसलिए आप लोगो को घबराने की कोई ज़रूरत नही...प्लेन पूरी तरह से सुरक्षित नीचे उतारा जाएगा...इसलिए आप लोग आराम से शांत बैठे और अपनी-अपनी शीट बेल्ट बाँध ले...बेहतर होगा की आप लोग उत्तेजित होने की बजे अपने सहयात्रियों की हिम्मत बढ़ायें...."

केलकर की बातों का असर हुआ और यात्रियों की उत्तेजना शांत होने लगी. वो स्टी-वॉर्ड्स को वही छोर कर फिर पाइलट-कच्छ मे लौट आया.

"कर दिया सबको शांत." केलकर वापिस विजय के बराबर के शीट पर बैठ ते हुए बोला- "मैने उनसे कह दिया की तुम बहुत बहादुर और होसियार पाइलट हो."

"तुमने मुझे होशियार पाइलट बना दिया जबकि सच्चाई ये है की मुझे इस प्लेन के बारे मे ए बी सी डी भी नही मालूम" विजय ने कहा.

"कभी-कभी लोगो को सच से जयदा झूठ की ज़रूरत होती है" केलकर धीरे से मुस्कुरा कर बोला- "और फिर मैने ऐसा कोई खास झूठ भी नही बोला...तुम बहादुर और होशियार दोनो ही हो...वैसे इस वक़्त पोज़िशन क्या है ?"

"पोज़िशन तो वही पहले जैसे है यानी ढाक के तीन पात." विजय बोला- "उन लोगो ने हर संभव सहयता जुटाने का आश्वासन देते हुए इंतज़ार करने को कहा है...लोग कहते है इंतज़ार मे बड़ा मज़ा है....मगर यहा तो हालत खराब हुई जा रही है."

अचानक रेडियो पर किसी की आवाज़ सुनाई दी.

"हेलो...फ्लाइट सिक्स-वन-फोर."कोई बोल रहा था- "मै राज नगर से पाइलट कॅप्टन त्रिभुवन बोल रहा हू...जिस प्लेन की पाइलट शीट पर तुम इस वक़्त बैठे हो मै उसे सुरक्षित एरपोर्ट पर उतारने मे तुम्हारी सहयता करने के लिए बुलाया गया हू...मै समझता हू की इस काम को हम दोनो सफलता पूर्वक सफल करने मे कामयाब होंगे....मुझे बताया गया है की तुम्हारा नाम विजय है....इस संकट के समय अगर विजय पाइलट शीट पर मौजूद है तो मुझे यकीन है की इस संकट पर हम विजय पा कर रहँगे...तुम घबरा तो नही रहे ना विजय ?"

"घबरा तो नही रहा मिस्टर. त्रिभुवन तीस मार ख़ान साहब." विजय माइक्रोफॉन मे बोला- "लेकिन हालत ऐसे भी नही है की खुशी से नाचने लगूँ."

"बहुत खूब." त्रिभुवन प्रशंसा त्माक स्वर मे बोला- "तुम्हारे जवाब से जाहिर है की तुम वाकई बहुत हिम्मती आदमी हो..तुमने जो मुझे तीस मार खा का खिताब दिया वो भी मुझे बहुत पसंद आया...अछा विजय मुझे पता चला है की तुमने एक एंजिन का प्लेन चलाया है ?"

"वो सब बरसो पहले की बात थी." विजय बोला- "एक बात सॉफ समझ लो कॅप्टन, की मै कोई पेशेवर पाइलट नही हू..बरसो पहले भी सिर्फ़ शौकियापाइलट था."

"कोई चिंता की बात नही...प्लेन उड़ाया तो है ना तुमने चाहे बरसो पहले ही सही..यह भी साइकल चलाने की तरह है जिसे आदमी एक बार सिख ले तो फिर कभी नही भूलता...वैसे तुम्हारा प्लेन अभी ऑटो-पाइलट पर ही सेट है ना ?"

"यस कॅप्टन" विजय ने जवाब दिया.

"ठीक है....थोड़ी ही देर मे तुम ऑटो-पाइलट को हटाकर प्लेन का कंट्रोल अपने हाथ मे ले लोगे....लेकिन उसे छूने से पहले एक बात का ध्यान रखना की जब तुम प्लेन का कंट्रोल अपने हाथ मे लोगे तो तुम्हे थोरा ज़्यादा दम लगाना होगा..."

"दम तो मै सारे का सारा लगा दु..बस मुझे यह बता दो की इस प्लेन को नीचे कैसे उतरा जा सकता है ?"

"मै वही बताने जा रहा हू...पहले तो तुम्हे ऑटो-पाइलट को अनलॉक करना होगा...वो तुम्हारे सामने के कंट्रोल पॅनॅल पर सॉफ लिखा होगा...बस तुम्हे ऑटो-पाइलट का रिलिज बटन दबाना है..."

कॅप्टन त्रिभुवन रेडियो पर विजय को निर्देश देता रहा और विजय उसके निर्देशा नुसार काम करता रहा.

बराबर की शीट पर बैठा हुआ केलकर खामोशी के साथ विजय के कार्य को देखता रहा...भीतर ही भीतर दिल तेज़ी से धड़क रहा था और माथे पर पसीने की परत उभर आई थी...मगर उपर से वो निर्विकार बना हुआ था....दिमाग़ मे सिर्फ़ एक ही सवाल उभर रहा था...क्या विजय नाम का ये आदमी वाकई इस भयानक संकट पर विजय पा लेगा ?

क्या यह वाकई इस प्लेन को सुरख्चित उतारने मे कामयाब हो जाएगा ?

 
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