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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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Guest
ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना



फ्रेंड्स आपके लिए एक कहानी और शुरू करने जा रहा हूँ आशा करता हूँ आप पहले की तरह मेरा पूरा साथ देंगे

ये कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जो बिना किसी की इच्च्छा के, बिना किसी उद्देश्य के, उसके माता-पिता के मध्यम से इस धरती पर लाया गया, या यूँ कहें कि भगवान ने उसे ज़बरदस्ती नीचे धकेल दिया धरती पर कि जा वे चूतिया प्राणी, तू यहाँ हमारे किसी काम का नही है, इसलिए नीचे जाके ऐसी-तैसी करा.

एनीवेस ! जब वो नीचे फैंक ही दिया तो देखते हैं कि यहाँ पृथ्विलोक में आकर क्या कर पाता है, या यौंही जीवल व्यर्थ जाएगा इसका.

शर्मा परिवार का परिचय….

1) सबसे बड़े भाई…. राम किशन: इनके चार बेटे और एक सबसे बड़ी बेटी थी, पत्नी का देहांत सबसे छोटे बेटे के जन्म से कुच्छ सालों बाद ही हो गया था. धृतराष्ट्र किस्म के पिता अपने बेटों का हमेशा आँख बंद करके पच्छ लेते थे जिसकी वजह से बिन माँ के बच्चे बिगड़ गये और मनमानी करने लगे, नतीजा परिवार में कलह होने लगी.

सबसे बड़ी बेटी जो इस पूरे परिवार में सभी भाई बहनों में सबसे बड़ी थी, जिसकी उम्र शायद अपने सबसे छोटे चाचा के बराबर रही होगी, अपने ससुराल में चैन से रह रही है.

बड़ा बेटा भूरे लाल, डबल एमए पास, गाओं से कुच्छ 25-30किमी दूर एक कॉलेज में पढ़ाता है. शादी-शुदा है, इसके भी चार बेटे हैं.

दूसरा बेटा जिमी पाल प्राइमरी टीचर था, लेकिन शादी के कुच्छ समय बाद ही उसी के साथियों ने उसकी हत्या कर दी थी, कारण बताने लायक नही है. अब उसकी बेवा है बस, कोई बच्चा नही हो पाया था.

तीसरा बेटा चेत राम, ये भी प्राइमरी टीचर है, बहुत ही कंजूस किस्म का इंसान, इसकी भी शादी हो चुकी है और चार बच्चे- 2 बेटे, और 2 बेटियाँ हैं.

चौथा बेटा अजय पाल - पोलीस में है, ये अपने दोनो भाइयों से एक दम भिन्न है इसकी भी शादी हो गयी है और 2 बेटे और 1 बेटी है. शहर में शिफ्ट हो चुका है.

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और भी पात्र आएँगे उनका परिचय समय समय पर देता रहूँगा

 
तुम्हारा जीवन एक पेंडुलम की तरह है, जो गतिमान तो रहता है, किंतु किसी मंज़िल पर नही पहुँच पाता. ये शब्द थे अरुण शर्मा के दूसरे नंबर के भाई प्रोफेसर ब.एल. शर्मा के, जो की भारत की सर्वश्रेष्ठ अग्रिकल्चर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे. 24 वर्सिय अरुण जो इन चारों भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटा है अभी-अभी बाहर से घूम फिरके गांजे की चिलम की चुस्की लगाके अपने आवारा नसेडी दोस्तों के साथ मटरगस्ति करके घर लौटा, इस घर में अरुण को सिर्फ़ उसकी माँ एकमात्र प्यार करनेवाली है .

माँ तुझे सलाम, तेरे बच्चे तुझको प्यारे रावण हो या राम….

तो बस इस घर में उसकी वृद्ध माँ जो तकरीबन 65-70 साल की शरीर से कमजोर जोड़ों के दर्द से पीड़ित रहतीं हैं और बहू बेटों के रहमो करम पे जी रही थी. पिता 3-4 साल पहले ही परमात्मा को प्यारे हो चुके थे.

मौके पे चौका मारते हुए, दूसरे भ्राता श्री श्याम बिहारी शर्मा, जो अरुण से 3-4 साल बड़े हैं और दो साल पहले ही उनकी शादी हुई थी, वो घर पर ही रहकर खेती-वाडी संभालते हैं जो कि उन्हें ये ज़िम्मेदारी पिता की मौत के बाद सभी भाइयों ने तय करके सौपी थी कि जब तक इनके बच्चे सेल्फ़-डिपेंड नही हो जाते खेती की पैदावार से एक पैसा भी कोई डिमॅंड नही करेगा, वैसे वो भी अग्रिकल्चर से ग्रॅजुयेट थे.

वो तो और ही बड़ा सा बाउन्सर मार देते हैं अरुण के उपर. “अरे ये अपने जीवन में कुच्छ नही कर सकता, बस देखना किसी दिन भीख माँगेगा सड़कों पे और हमारे बाप की इज़्ज़त को मिट्टी में मिला देगा.

ये तो साला कुच्छ ज़्यादा ही हो गया…. अरुण का दिमाग़ गांजे के नशे में भिन्ना गया, साला अच्छा-ख़ासा मूड बनाके आया था, आज उसे लगा कि दिन बड़ा अच्छा है क्योंकि जैसे अपने मित्र-मंडली के पास से चिलम में कस लगाके खातों की तरफ से चला ही था कि उसकी छम्मक छल्लो (उसका डीटेल आगे दूँगा) रास्ते में सरसों के खेत के पास ही मिल गयी, और वहीं उसने सरसों के खेत में डालके उसको आधा-पोना घंटे अच्छी तरह से अपने लंड से मालिश कराई थी, मस्ती-मस्ती में घर आया था यहाँ भाई लोगों ने घुसते ही लपक लिया.

5’ 10” लंबा खेतों में जमके पसीना बहा कर, जग भर दूध और घी खा-खा के अरुण एक बहुत ही अच्छे शरीर का मालिक था और केवल सबसे बड़े भाई (दादा) को छोड़ कर सबसे लंबा तगड़ा गबरू जवान, निडर था, हक़ीकत ये थी कि श्याम जी उसकी मेहनत का ही खाते थे और रौब गाँठते थे अपने बड़े होने का.

अरुण की आँखें नशे और ज़िल्लत भरी बातें सुनके गुस्से की वजह से जलने सी लगी, आख़िर थे तो भाई ही ना, कोई बाप तो थे नही, और ना ही उनमें से किसी ने उसके उपर कोई एहसान ही किया था, उल्टा उसकी मेहनत और उसकी दिलेरी की वजह से ही श्याम जी अपने पिता की इज़्ज़त और रुतवे को बरकरार रखे हुए थे समाज में, सुर्ख आँखें जैसे उनमें खून उतर आया हो.. बड़े ही सर्द लहजे में अरुण ने गुर्राते हुए कहा….

मिस्टर. प्रोफेसर…. क्या कहा था आपने..? पेंडुलम… हाँ… में पेंडुलम की तरह हूँ..?? हैं… चलो मान लिया, फिर ये तो पता ही होगा आपको कि पेंडुलम होता क्या है, और पेंडुलम का काम क्या होता है..? पता है ना… जबाब दो..

प्रोफ. – ये तुम अपने बड़े भाई से किस तरह बात कर रहे हो? नशे में तमीज़ ही भूल गये…

अरुण: जो मेने पूछा है पहले उसका जबाब दीजिए दादा… फिर में सम्मान पे आउन्गा.

प्रोफ.: पेंडुलम घड़ी का नीचे वाला घंटा होता है, जो इधर से उधर मूव्मेंट करता रहता है…

अरुण : फिर तो आपको ये भी ग्यात होगा, कि अगर वो घड़ी का घंटा अपना मूव्मेंट बंद कर्दे तो क्या होता है…

प्रोफ: घड़ी बंद पड़ जाएगी और क्या होगा..

अरुण : हूंम्म… तो इसका मतलव बिना पेंडुलम के घड़ी तो बेकार ही हुई ना…

प्रोफ : तुम कहना क्या चाहते हो…?

अरुण : गुस्से में फुफ्कार्ते हुए…. भाई साब्बबब… ये वो ही पेंडुलम है, जिसकी वजह से आज आप घड़ी बने फिरते हो,

आप 10थ पास करते ही शहर में जाके पढ़ाई करने चले गये थे और बड़े दादा नौकरी में मस्त थे, उस टाइम हमारी क्या उम्र थी?? गान्ड धोना भी ढंग से नही आता था हमे, वृद्ध पिताजी, चचेरे भाइयों के बराबर काम नही कर सकते थे वैसे भी वो 3 लोग थे,

तब हम दोनों छोटे भाइयों ने घर के कामों में उनका हाथ बँटाना शुरू किया और धीरे-2 अपनी क्षमता से ज़्यादा काम करके घर को संभालने में यथा संभव मदद की.

अगर उस टाइम ये पेंडुलम नही चल रहे होते, तो चाचा कबके अलग हो जाते और हमें भूखों मरने पर विवश होना पड़ता, आपकी पढ़ाई की तो बात ही छोड़ दो.

अब आप पीएचडी करके प्रोफेसर बन गये, और हमे ही ज्ञान देने लगे. हमारी उस मेहनत में सम्मान नही दिखा आपको ??

इतनी बात सुनके श्याम भाई भी का भी सीना चौड़ा हो गया….

अरुण आपनी बात को आगे बढ़ाते हुए….

और रही बात मेरी आवारा गार्दी की तो में यहाँ घर पे रहके, खेतों में काम करके भी इंटर्मीडियेट तक साइन्स/ मथ से पास हुआ जबकि आप दोनों अग्रिकल्चर से, जो कि लोलीपोप टाइप सब्जेक्ट होते है मेरे सब्जेक्ट्स के कंपॅरिज़न में, सिर्फ़ 4 साल बाहर रहके मेकॅनिकल से इंजिनियरिंग करने गया, अब बताइए कॉन ज़्यादा लायक था और कॉन नालयक घर के लिए…??

प्रोफ: वोही तो हम तुम्हें समझाना चाहते हैं, कि क्यों दो-दो बार नौकरी छोड़ के घर भाग आया और यहाँ फालतू के लोगों के साथ आवारगार्दी में अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहा है….

में तो कहता हूँ, कि वो हल्द्वणी वाला फॅक्टरी मालिक शाह अब भी तुझे नौकरी देने को तैयार है, और वो बरेली वाली लड़की की चचेरी बेहन से शादी करके तुम भी अपना घर बसा लो और चारों भाई एक जैसे हो जाओ.

अरुण : आपको पता है, वो नौकरी मेने क्यों छोड़ी, मुझे शादी के बंधन में नही बंधना है, शादी ही क्या किसी भी बंधन में नही रह सकता में, और सभी कान खोल के सुनलो, अगर किसी ने भी मुझे बाँधने की कोशिश की तो गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाउन्गा, किसी को पता भी नही चलेगा.

प्रोफ : भाड़ में जा, हमारा काम था समझाने का, नही समझता तो तुझे जो दिखे सो कर्र्र्र्र.. और जुंझलाकर वो घर से बाहर चले गये..

प्रोफेसर साब के जाते ही श्याम भाई बोले…

तुझे उनसे इस तरह से बात नही करनी चाहिए थी…

अरुण : क्यों ?? सच्चाई बताने में कोन्सि बेइज़्ज़ती होगयि..?? और क्या ये बातें आपको अच्छी नही लगी…??

स. भाई: फिर भी वो हमारे बड़े भाई हैं…

अरुण: तो क्या छोटों की कोई इज़्ज़त या सेल्फ़-रेस्पेक्ट नही होती..? क्या उन्होने इसका ख्याल रखा??

और क्या कहा था आपने भी…. में भीख मांगूगा, बाप की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दूँगा…

स भाई : तो क्या ग़लत कहा मेने, तू काम ही ऐसे कर रहा है, तुझे पता है, लोग कैसी कैसी बातें करते हैं तेरे बारे में..??

अरुण : कैसी बातें करते हैं ??

स भाई: देखो पंडितजी (पिताजी का पेट नेम सिन्स व्हेन ही वाज़ टीचर) के तीनो बेटे कितने सज्जन और होनहार हैं और ये छोटा बेटा भांगड़ी, गंजड़ी है..

अरुण : अच्छा…. भूल गये, अपनी शादी के टाइम की बातें, यही तीनों सज्जन बेटे, घर की ज्वेल्लरि के बँटवारे को लेकर कैसे झगड़ रहे थे रिस्तेदारो के सामने.. और दोनो बड़े लायक बेटे सब चीज़े हड़प गये.. तब बहुत सम्मानजनक बातें की होंगी लोगों ने.. हैं ना..

और रही बात नशे की तो क्या लोग बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू नही खाते, वो ग़लत आदतें नही हैं…?

स भाई: कुच्छ भी हो अगर तुझे यहाँ गाओं में रहना है तो मेरी बातें माननी ही पड़ेगी…

अरुण: मतलव इनडाइरेक्ट्ली मेरा अब इस घर पर कोई हक़ नही है… क्यों..? ठीक है.. जैसी आप लोगों की मर्ज़ी……..

और इतना बोलके अरुण वहाँ से चले जाता है और सीधा आपने खेतों पे पहुँचता है, जहाँ ट्यूब वेल चल रहा था और उसके एक खेत पड़ोसी के खेतो में पानी जा रहा था पेड…घंटे के हिसाब से,

 
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