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मगनदास निराश विचारों में डूबा हुआ शहर से बाहर निकल आया और एक सराय में ठहरा जो सिर्फ इसलिए मशहूर थी, कि वहॉँ शराब की एक दुकान थी। यहॉँ आस-पास से मजदूर लोग आ-आकर अपने दुख को भुलाया करते थे। जो भूले-भटके मुसाफिर यहॉँ ठहरते, उन्हें होशियारी और चौकसी का व्यावहारिक पाठ मिल जाता था। मगनदास थका-मॉँदा ही, एक पेड़ के नीचे चादर बिछाकर सो रहा और जब सुबह को नींद खुली तो उसे किसी पीर-औलिया के ज्ञान की सजीव दीक्षा का चमत्कार दिखाई पड़ा जिसकी पहली मंजिल वैराग्य है। उसकी छोटी-सी पोटली, जिसमें दो-एक कपड़े और थोड़ा-सा रास्ते का खाना और लुटिया-डोर बंधी हुई थी, गायब हो गई। उन कपड़ों को छोड़कर जो उसके बदर पर थे अब उसके पास कुछ भी न था और भूख, जो कंगाली में और भी तेज हो जाती है, उसे बेचैन कर रही थी। मगर दृढ़ स्वभाव का आदमी था, उसने किस्मत का रोना रोया किसी तरह गुजर करने की तदबीरें सोचने लगा। लिखने और गणित में उसे अच्छा अभ्यास था मगर इस हैसियत में उससे फायदा उठाना असम्भव था। उसने संगीत का बहुत अभ्यास किया था। किसी रसिक रईस के दरबार में उसकी क़द्र हो सकती थी। मगर उसके पुरुषोचित अभिमान ने इस पेशे को अख्यितार करने इजाजत न दी। हॉँ, वह आला दर्जे का घुड़सवार था और यह फन मजे में पूरी शान के साथ उसकी रोजी का साधन बन सकता था यह पक्का इरादा करके उसने हिम्मत से कदम आगे बढ़ाये। ऊपर से देखने पर यह बात यकीन के काबिल नही मालूम होती मगर वह अपना बोझ हलका हो जाने से इस वक्त बहुत उदास नहीं था। मर्दाना हिम्मत का आदमी ऐसी मुसींबतों को उसी निगाह से देखता है,जिसमे एक होशियार विद्यार्थी परीक्षा के प्रश्नों को देखता है उसे अपनी हिम्मत आजमाने का, एक मुश्किल से जूझने का मौका मिल जाता है उसकी हिम्मत अजनाने ही मजबूत हो जाती है। अकसर ऐसे मार्के मर्दाना हौसले के लिए प्रेरणा का काम देते हैं। मगनदास इस जोश़ से कदम बढ़ाता चला जाता था कि जैसे कायमाबी की मंजिल सामने नजर आ रही है। मगर शायद वहाँ के घोड़ो ने शरारत और बिगड़ैलपन से तौबा कर ली थी या वे स्वाभाविक रुप बहुत मजे मे धीमे- धीमे चलने वाले थे। वह जिस गांव में जाता निराशा को उकसाने वाला जवाब पाता आखिरकार शाम के वक्त जब सूरज अपनी आखिरी मंजिल पर जा पहुँचा था, उसकी कठिन मंजिल तमाम हुई। नागरघाट के ठाकुर अटलसिहं ने उसकी चिन्ता मो समाप्त किया। यह एक बड़ा गाँव था। पक्के मकान बहुत थे। मगर उनमें प्रेतात्माऍं आबाद थीं। कई साल पहले प्लेग ने आबादी के बड़े हिस्से का इस क्षणभंगुर संसार से उठाकर स्वर्ग में पहुच दिया था। इस वक्त प्लेग के बचे-खुचे वे लोग गांव के नौजवान और शौकीन जमींदार साहब और हल्के के कारगुजार ओर रोबीले थानेदार साहब थे। उनकी मिली-जुली कोशिशों से गॉँव मे सतयुग का राज था। धन दौलत को लोग जान का अजाब समझते थे ।उसे गुनाह की तरह छुपाते थे। घर-घर में रुपये रहते हुए लोग कर्ज ले-लेकर खाते और फटेहालों रहते थे। इसी में निबाह था । काजल की कोठरी थी, सफेद कपड़े पहनना उन पर धब्बा लगाना था। हुकूमत और जबर्र्दस्ती का बाजार गर्म था। अहीरों को यहाँ आँजन के लिए भी दूध न था। थाने में दूध की नदी बहती थी। मवेशीखाने के मुहर्रिर दूध की कुल्लियाँ करते थे। इसी अंधेरनगरी को मगनदास ने अपना घर बनाया। ठाकुर साहब ने असाधारण उदारता से काम लेकर उसे रहने के लिए एक माकन भी दे दिया। जो केवल बहुत व्यापक अर्थो में मकान कहा जा सकता था। इसी झोंपड़ी में वह एक हफ्ते से जिन्दगी के दिन काट रहा है। उसका चेहरा जर्द है। और कपड़े मैले हो रहे है। मगर ऐसा मालूम होता है कि उस अब इन बातों की अनुभूति ही नही रही। जिन्दा है मगर जिन्दगी रुखसत हो गई है। हिम्मत और हौसला मुश्किल को आसान कर सकते है ऑंधी और तुफान से बचा सकते हैं मगर चेहरे को खिला सकना उनके सामर्थ्य से बाहर है टूटी हुई नाव पर बैठकरी मल्हार गाना हिम्मत काम नही हिमाकत का काम है। एक रोज जब शाम के वक्त वह अंधरे मे खाट पर पड़ा हुआ था। एक औरत उसके दरवारजे पर आकर भीख मांगने लगी। मगनदास का आवाज पिरचित जान पडी। बहार आकर देखा तो वही चम्पा मालिन थी। कपड़े तार–तार, मुसीबत की रोती हुई तसबीर। बोला-मालिन ? तुम्हारी यह क्या हालत है। मुझे पहचानती हो।? मालिन ने चौंकरक देखा और पहचान गई। रोकर बोली –बेटा, अब बताओ मेरा कहाँ ठिकाना लगे? तुमने मेरा बना बनाया घर उजाड़ दिया न उसे दिन तुमसे बात करती ने मुझे पर यह बिपत पड़ती। बाई ने तुम्हें बैठे देख लिया, बातें भी सुनी सुबह होते ही मुझे बुलाया और बरस पड़ी नाक कटवा लूँगी, मुंह में कालिख लगवा दूँगी, चुड़ैल, कुटनी, तू मेरी बात किसी गैर आदमी से क्यों चलाये? तू दूसरों से मेरी चर्चा करे? वह क्या तेरा दामाद था, जो तू उससे मेरा दुखड़ा रोती थी? जो कुछ मुंह मे आया बकती रही मुझसे भी न सहा गया। रानी रुठेंगी अपना सुहाग लेंगी! बोली-बाई जी, मुझसे कसूर हुआ, लीजिए अब जाती हूँ छींकते नाक कटती है तो मेरा निबाह यहाँ न होगा। ईश्वर ने मुंह दिया हैं तो आहार भी देगा चार घर से माँगूँगी तो मेरे पेट को हो जाऐगा।। उस छोकरी ने मुझे खड़े खड़े निकलवा दिया। बताओ मैने तुमसे उसकी कौन सी शिकायत की थी? उसकी क्या चर्चा की थी? मै तो उसका बखान कर रही थी। मगर बड़े आदमियों का गुस्सा भी बड़ा होता है। अब बताओ मै किसकी होकर रहूँ? आठ दिन इसी दिन तरह टुकड़े माँगते हो गये है। एक भतीजी उन्हीं के यहाँ लौंडियों में नौकर थी, उसी दिन उसे भी निकाल दिया। तुम्हारी बदौलत, जो कभी न किया था, वह करना पड़ा तुम्हें कहो का दोष लगाऊं किस्मत में जो कुछ लिखा था, देखना पड़ा। मगनदास सन्नाटे में जो कुछ लिखा था। आह मिजाज का यह हाल है, यह घमण्ड, यह शान! मालिन का इत्मीनन दिलाया उसके पास अगर दौलत होती तो उसे मालामाल कर देता सेठ मक्खनलाल की बेटी को भी मालूम हो जाता कि रोजी की कूंजी उसी के हाथ में नहीं है। बोला-तुम फिक्र न करो, मेरे घर मे आराम से रहो अकेले मेरा जी भी नहीं लगता। सच कहो तो मुझे तुम्हारी तरह एक औरत की तलाशा थी, अच्छा हुआ तुम आ गयीं। मालिन ने आंचल फैलाकर असीम दिया– बेटा तुम जुग-जुग जियों बड़ी उम्र हो यहॉँ कोई घर मिले तो मुझे दिलवा दो। मैं यही रहूँगी तो मेरी भतीजी कहाँ जाएगी। वह बेचारी शहर में किसके आसरे रहेगी। मगनलाल के खून में जोश आया। उसके स्वाभिमान को चोट लगी। उन पर यह आफत मेरी लायी हुई है। उनकी इस आवारागर्दी को जिम्मेदार मैं हूँ। बोला–कोई हर्ज न हो तो उसे भी यहीं ले आओ। मैं दिन को यहाँ बहुत कम रहता हूँ। रात को बाहर चारपाई डालकर पड़ रहा करुँगा। मेरी वहज से तुम लोगों को कोई तकलीफ न होगी। यहाँ दूसरा मकान मिलना मुश्किल है यही झोपड़ा बड़ी मुश्किलो से मिला है। यह अंधेरनगरी है जब तुम्हरी सुभीता कहीं लग जाय तो चली जाना। मगनदास को क्या मालूम था कि हजरते इश्क उसकी जबान पर बैठे हुए उससे यह बात कहला रहे है। क्या यह ठीक है कि इश्क पहले माशूक के दिल में पैदा होता है?