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दिल का दर्द
" बार-बार ऐसी चोटे कैसे लग जाती है तुम्हे मुन्ना " मैने अलमारी से फर्स्ट एड बॉक्स निकालते हुवे अपने सामने बैठे मुन्ना से कहा
" पता नही डॉक्टर साहब, जाने क्या इत्तेफ़ाक है " मुन्ना एक फीकी हँसी हंसकर बोला.
" इत्तेफ़ाक एक बार हो सकता है, दो बार हो सकता है, लेकिन बार-बार एक ही तरीके का इत्तेफ़ाक हो तो इसका मतलब है कि कुछ ना कुछ गड़बड़ है " मैं बोला.
" क्या गड़बड़ हो सकती है डॉक्टर साहब " मुन्ना मेरी ओर देखता हुआ बोला.
" मुझे लगता है कि तुम खुद अपने आपको चोट पहुचाते हो " कहकर मैं उसके चेहरे पर आने वाले भाव को बारीकी से देखने लगा.
एक बार को उसके चेहरे पर ऐसे रंग आए जैसे कि उसकी चोरी पकड़ी गयी हो, लेकिन तुरंत ही उसने खुद को संभाल लिया.
" ऐसी कोई बात नही है डॉक्टर साहब "
मुन्ना आज मेरे पास पाँचवी बार आ रहा था, पहली बार उसकी उंगली दरवाजे मे आ गयी थी, दूसरी बार पैर मे चोट लगी थी, और फिर हर बार अलग जगह पर चोट और उसके लिए अलग बहाना, और इस बार ऐसा लग रहा था जैसे उसकी कोहनी के पास से उसके दोनो हाथो को जैसे ब्लेड से काटा गया हो, शुरू मे 3 बार तो उसका बड़ा भाई उसके साथ आया था लेकिन फिर उसने भी आना बंद कर दिया था.
" देखो मुन्ना, मैं डॉक्टर हू, रोज हज़ारो पेशेंट्स को देखता हू, उनकी मनोदशा को समझता हू, और उनका इलाज करने की कोशिश करता हू, लेकिन अगर पेशेंट्स ही मुझसे सबकुछ छुपाएँगे तो मैं उनका इलाज कैसे कर पाउन्गा, मैं जानता हू कि कोई ऐसी बात ज़रूर है जो तुम्हे अंदर ही अंदर खाए जा रही है, जिसकी सज़ा तुम खुद को चोट पहुचकर दे रहे हो, मुझे बताओ, दर्द बाँटने से कम ही होता है मुन्ना, बढ़ता नही है " मैने मुन्ना के हाथ मे पट्टी करते हुवे कहा.
मेरी उन बातो का उसपर जादुई असर हुआ.
" आप सही कह रहे है डॉक्टर साहब, मैं खुद को ही सज़ा दे रहा हू, उसकी जिंदगी बर्बाद कर देने की सज़ा, मुझे कोई हक़ नही था उसकी जिंदगी बर्बाद करने का, लेकिन अपने घमंड मे चूर मैने वो भी कर दिया, ये भी नही सोचा कि उसके बाद उसपर क्या बीतेगी, समाज मे उसकी क्या इज़्ज़त रह जाएगी " बोलते- बोलते मुन्ना की आँखो के कोने से आँसू की छोटी सी बूँद बाहर निकल आई थी और उसके गालो को चूम रही थी.
" शुरू से शुरू करो मुन्ना, ऐसे तो मैं कुछ समझ नही पाउन्गा " मैं बोला.
मुन्ना एकटक शुन्य मे ताकने लगा, ऐसा लग रहा था जैसे कि वो सोच रहा हो कि शुरू कहाँ से करे.
" बात आज से कोई 6 महीने पहले की है डॉक्टर साहब, मेरे मोहल्ले मे एक बहुत ही खूबसूरत लड़की रहती थी, अंजू नाम था उसका, खूबसूरती की मूरत थी वो, भगवान ने जब उसे बनाया होगा तो वो भी कुछ देर तक उसके आकर्षण मे खो सा गया होगा, उसकी झील सी नीली आँखो मे डूब सा गया होगा, वो थी ही ऐसी, जो भी उसे देख ले उससे प्यार हो जाए उससे, मुझे भी हो गया, लेकिन वो ठहरी एक शरीफ घर की लड़की और मैं ठहरा आवारा लड़का, जिसके पास ना
नौकरी थी, जिसे ना रिश्तो की समझ थी, हर रोज झगड़ा करना, मार-पीट करना यही मेरा काम था, और इसी वजह से मैं पूरे मोहल्ले मे बदनाम था,
आख़िरकार एक दिन हिम्मत करके मैने उससे अपने प्यार का इज़हार कर ही दिया लेकिन उसने मेरे प्यार को ठुकरा दिया " वो साँस लेने के लिए रुका तो मैं बोल पड़ा,"
तो इसलिए तुमने खुद को जख्म देने शुरू कर दिए "
" नही डॉक्टर साहब, ये बात नही है, जिस दिन उसने मेरे प्यार को ठुकरा दिया, उस दिन शाम को मैं अपने दोस्तों के साथ बैठा शराब पी रहा था, तो मैनेउन्हे उसके बारे मे बताया, उन लोगो ने कहा कि भाई, आपकी कोई ऐसे बेइज्जत कैसे कर सकता है, आपको अपनी बेइज़्ज़ती का बदला लेना ही होगा, और घमंड मे चूर मैने भी उनसे वादा कर दिया कि हां, अबसे उस कुतिया को उसकी औकात याद दिलाना ही मेरी जिंदगी का एक मात्र मकसद है, साला, उस वक़्त सोचा ही नही था कि कौनसी बेइज़्ज़ती का बदला लेना चाहता था मैं, साली जिसकी कोई इज़्ज़त ही नही थी, जिसे गली का कुत्ता भी इज़्ज़त नही देता था बल्कि सब उससे डरते थे,
उसकी भला कोई बेइज़्ज़ती कैसे कर सकता है, लेकिन कहते है ना कि नफ़रत मे बहुत ताक़त होती है, उस दिन से ही मैं उशे बर्बाद करने के लिए प्लान बनाने लगा, हर पल ये सोचने लगा कि मैं कैसे उसे बदनाम करके उसके हाथो हुई अपनी बेइज़्ज़ती का बदला ले सकता हू, और आख़िरकार मेरे दिमाग़ मे एक तरकीब आ ही गयी "
" वो क्या " मैने पूछा.
" हमारी कॉलोनी मे एक आदमी है जिसका नाम अमरीश है, इधर की बात उधर करने की उसकी आदत है, वो किसी भी बात को पूरे मोहल्ले मे चुटकियो मे फैला सकता था, मैने उसे इस्तेमाल करने की ठानी "
" वो कैसे " मैने पूछा.
" जिस कॉलेज मे अंजू पढ़ती थी, एक दिन मैं उस कॉलेज मे जा पहुचा, वहाँ बाहर खड़े हुवे सेक्यूरिटी गार्ड ने मुझे अंदर जाने से रोक दिया, मैने उससे बहुत रिक्वेस्ट की मगर वो नही माना, ऐसा नही था कि उसको साइड मे करके अंदर जाना मेरे लिए कोई मुश्किल काम था, लेकिन ऐसा करने से मेरे प्लान मे दिक्कत पैदा हो सकती थी, इसलिए मैने दूसरा रास्ता अपनाया "
" वो क्या "
" पैसे का, लालच हर इंसान की कमज़ोरी होती है, मैने उसे एक 1000 का नोट दिया और कहा कि देख भाई, इस कॉलेज मे अंजू नाम की एक लड़की पढ़ती है और मेरा दोस्त उससे बहुत प्यार करता है लेकिन वो उसके प्यार को समझती नही है, इसलिए मैं उसे समझाने आया हू, बस 2 मिनिट का काम है,
वो बोला, नही,नही, मेरी नौकरी चली जाएगी, मैने एक और 1000 का नोट निकालकर उसके हाथ मे रख दिया, अब वो लाइन पर आ गया, बोला, ठीक है, लेकिन सिर्फ़ दो मिनिट,
मुझे क्या दिक्कत हो सकती थी "
" तुम्हारा प्लान क्या था " मैने पूछा.
" वो भी पता चल जाएगा डॉक्टर साहब, पहले पूरी बात तो सुन लीजिए " मुन्ना ने कहा, तो मैं चुप हो गया.
" वो भीतर गया और अंजू को ये कहकर बुला लाया कि उससे कोई मिलने आया है, अंजू आई लेकिन मुझे देखते ही वो बिफर उठी, बोली, क्या लेने आयो हो यहाँ, उस दिन कही हुई बात समझ मे नही आई तुम्हारे, मुझे तुम मे कोई इंटेरेस्ट नही है, दफ़ा हो जाओ यहाँ से, भगवान कसम डॉक्टर साहब, गुस्से मे वो और भी खूबसूरत लग रही थी, उसकी नीली आँखो की गहराई मे खो सा गया था मैं, उसे पागलो की तरह एकटक घूरे जा रहा था,
मुझे ऐसे घूरते हुवे देखकर वो बोली, समझ मे नही आता क्या, मैने कहा दफ़ा हो जाओ यहाँ से, उसकी बात सुनकर जैसे मैं हक़ीकत के धरातल पर वापिस आया और अपने प्लान के बारे मे सोचने लगा, मैने उससे कहा, मैं उस दिन के लिए तुमसे माफी माँगने आया हू, मुझे तुमसे वो सबकुछ नही कहना चाहिए था, मुझे माफ़ कर दो,
और मै तुम्हे ये बताने आया था कि कल मैने रात को चौक पर कुछ लोगो को बात करते सुना था कि वो तुम्हारे पापा को बिज़्नेस मे भारी नुकसान पहुचाना चाहते है, और उन्हे जैल भिजवाना चाहते है, ये सुनकर वो चौंक गयी, पूछने लगी कि कौन थे वे लोग, मैने अपना अगला दाँव चला, कहा, अंधेरा होने की वजह से मैं उन्हे पहचान नही पाया लेकिन अगर तुम मुझे माफ़ कर दोगि तो मैं उनका पता लगाकर तुम्हे बता दूँगा,
उसने कहा, ठीक है, मैने तुम्हे माफ़ किया, मैने अपनी अगली चाल चली, कहा, थॅंक यू, कल इसी समय पर मैं तुमसे यहाँ पर मिलने आउन्गा और तब तक मैं उन लोगो का पता भी लगा लूँगा, उसने कहा, ठीक है, ये बाते करके मैं वहाँ से चला आया "
वो साँस लेने के लिए रुका तो मैं खुद को बोलने से ना रोक सका," लेकिन वो लोग कौन थे जो अंजू के पापा को बिज़्नेस मे नुकसान पहुचना चाहते थे और इन सारी बातो से अमरीश का क्या लेना-देना "
मुन्ना के होंठो पर एक फीकी मुस्कुराहट उभर आई, बोला," ऐसे कोई लोग थे ही नही डॉक्टर साहब, वो तो मैने उसे खुद को माफ़ करवाने के लिए कहा था, क्योंकि अगर वो मुझे माफ़ नही करती तो मेरा प्लान कैसे कामयाब होता "
" क्या था तुम्हारा प्लान " मैं फिर बीच मे टपका.
" उस दिन शाम को मैने और मेरे दोस्तो ने अमरीश को पार्टी दी, उसे शराब पिलाई और बातो ही बातो मे उससे इधर-उधर की खबरें पता करने लगे, तो उसने बताया कि भाई कुछ भी कहो, अपनी पूरी कॉलोनी मे सबसे शरीफ अजय (अंजू के पिता) और उसका परिवार ही है, उनसे शरीफ कोई नही है, अपनी बेटी मे भी क्या संस्कार डाले है उन्होने, एकदम लक्ष्मी है उनकी बेटी भी,
मुझे जिस मौके की तलाश थी, वो मिल गया था, इसलिए मैं बोला, आपकी ये शरीफ लड़की मुझसे प्यार करती है अमरीश भाई, वो चौंक कर बोला, क्या बात कर रहे हो मुन्ना, उसकी तो शादी तय हो गयी है, वो भला तुमसे प्यार कैसे कर सकती है,
वो कितनी शरीफ लड़की है, नही, मैं नही मानता,
मैने कहा, वो मुझसे प्यार करती है, और इसलिए हम दोनो भागने वाले है अमरीश भाई, उसके चेहरे पर हैरत के भाव अभी भी काबिज थे, बोला, मैं नही मान सकता, मैं बोला, ठीक है, कल खुद तुम अपनी आँखो से देख लेना, जब मैं उसके कॉलेज मे उससे मिलने जाउन्गा, अमरीश बोला, ठीक है, अगर तुम उससे मिले तो ये साबित हो जाएगा कि वो तुमसे प्यार करती है, इतना बोलकर अमरीश चला गया "
" अच्छा, तो ये तुम्हारा प्लान था, तुम अंजू को बदनाम करना चाहते थे अमरीश के ज़रिए " मैं बात को समझते हुवे बोला.
" बिल्कुल ठीक समझे डॉक्टर साहब, अगले दिन भी मई अंजू की कॉलेज जा पहुचा, जाते ही मैने सेक्यूरिटी गार्ड को 2000 रुपये थमा दिए, वो बिना कुछ बोले सीधा अंजू को बुलाने चला गया, मैने अमरीश से कहा कि तुम आसपास थोड़ा दूर चले जाओ और आज खुद अपनी आँखो से देख लेना जब वो मुझसे मिलने आए, अमरीश मेरी बात सुनकर गेट के पास एक पेड़ के पीछे जाकर छुप गया, थोड़ी देर बाद अंजू आई, उसे अपने पिता के दुश्मनो के नाम जानने की उत्सुकता थी इसलिए वो काफ़ी तेज़ी के साथ मेरी तरफ आई थी, और बाहर खड़ा अमरीश सबकुछ देख रहा था, वो मेरे पास आकर बोली, बताओ कौन है वो, तुमने पता किया,
मैने कहा, सॉरी अंजू, मैं पता नही लगा सका, मुझे माफ़ कर देना, इतना बोलकर मैं चुपचाप वहाँ से चल पड़ा, बिना पीछे मुड़े, क्योंकि मेरा काम हो चुका था, अमरीश हम दोनो को साथ देख चुका था और ये बात मैं बहुत अच्छी तरह से जानता था कि अब ये बात उसके पेट मे पचेगी नही, पीछे अंजू हैरत से भरी आँखे लिए मुझे जाते हुवे देख रही थी "
" फिर क्या हुआ " मैने पूछा.
" फिर वही हुआ जो मैं चाहता था, अमरीश ने ये बात सारी कॉलोनी मे फैला दी कि अंजू का मेरे साथ चक्कर है, उसके पिता की सारी इज़्ज़त मिट्टी मे मिल गयी, अंजू से जिसकी शादी होने वाली थी, उसने शादी तोड़ दी, और अंजू ने अपने घर की छत से कूदकर अपनी जान देने की कोशिश की "
" लेकिन तुम अपने आप को सज़ा क्यो दे रहे हो, तुमने जो चाहा था, वो तो तुम्हे मिल गया था ना " बोलते वक़्त मेरी आँखो मे आँसू थे.
उसके चेहरे पर मौजूद मुस्कान मे दर्द की लहर दौड़ पड़ी," क्या चाहता था मैं, क्यू चाहता था, क्या बिगाड़ा था उसने मेरा, मैं उससे प्यार करता था, वो मुझसे नही करती थी तो इसमे उसकी क्या ग़लती थी, डॉक्टर साहब, जब मैने उसका छत से गिरा, टूटा शरीर देखा तो मेरे दिल मे वो दर्द उठा जिसे मैं बयान नही कर सकता, ऐसा लगा जैसे किसी ने गरम लोहा मेरे सीने मे उतार दिया हो, उस वक़्त सोचा कि अपने घमंड मे चूर मैने कितनी जिंदगिया बर्बाद कर दी,
मुझे जीने का कोई हक़ नही है डॉक्टर साहब, कोई हक़ नही है, जिससे प्यार करता हू, वो मुझसे नफ़रत करती है, और वो नफ़रत पैदा भी मैने ही की, किसलिए, क्यू, आज जब सोचता हू तो समझ नही पाता कि मैने ऐसा क्यू किया, अगर वो मेरे साथ नही है तो जीकर करूँगा भी क्या, इसलिए खुद को दर्द देता हू ताकि सीने मे उठते दर्द से थोड़ा ध्यान हट जाए, किसी तरह से वो दर्द कम हो जाए, लेकिन वो दर्द कम नही होता, बढ़ता जाता है, हमेशा उसका उधड़ा हुआ शरीर मेरी आँखो के सामने घूमता रहता है, मेरे दिल से हमेशा ये आवाज़ उठती रहती है कि उसके इस हाल के लिए मैं और सिर्फ़ मैं ही ज़िम्मेदार हू, इसलिए खुद को दर्द देता हू डॉक्टर साहब, इसलिए खुद को दर्द देता हू मैं " कहने के बाद वो फुट-फूटकर रोने लगा.
आँसू मेरी आँखो मे भी थे, इसलिए नही क्योंकि मुझे मुन्ना से हमदर्दी थी, इसलिए क्योंकि आज मैं खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था, अंजू से मेरी शादी होने वाली थी, उसके और मुन्ना के बारे मे सुनकर बिना कुछ सोचे-समझे मैने उससे रिश्ता तोड़ दिया, इसमे उस बेचारी की क्या ग़लती थी, कही ना कही अंजू की इस हालत के लिए मैं भी उतना ही ज़िम्मेदार हू जितना कि मुन्ना है, अब सिर्फ़ एक ही तरीका है मेरे पापो का प्रायश्चित करने का, मुझे मुन्ना और अंजू की शादी करवानी होगी, पता नही मैं ये सब कैसे करवा पाउन्गा लेकिन मुझे ये करना ही पड़ेगा, दो प्रेमियो को मिलवाकर मैं अपने द्वारा की गयी ग़लती को सुधार लूँगा और फिर शायद मेरे दिल से भी वो दर्द कम हो जाएगा जो आज मुन्ना के मुँह से उसकी कहानी सुनने के बाद पैदा हुआ है.....
दा एंड
" बार-बार ऐसी चोटे कैसे लग जाती है तुम्हे मुन्ना " मैने अलमारी से फर्स्ट एड बॉक्स निकालते हुवे अपने सामने बैठे मुन्ना से कहा
" पता नही डॉक्टर साहब, जाने क्या इत्तेफ़ाक है " मुन्ना एक फीकी हँसी हंसकर बोला.
" इत्तेफ़ाक एक बार हो सकता है, दो बार हो सकता है, लेकिन बार-बार एक ही तरीके का इत्तेफ़ाक हो तो इसका मतलब है कि कुछ ना कुछ गड़बड़ है " मैं बोला.
" क्या गड़बड़ हो सकती है डॉक्टर साहब " मुन्ना मेरी ओर देखता हुआ बोला.
" मुझे लगता है कि तुम खुद अपने आपको चोट पहुचाते हो " कहकर मैं उसके चेहरे पर आने वाले भाव को बारीकी से देखने लगा.
एक बार को उसके चेहरे पर ऐसे रंग आए जैसे कि उसकी चोरी पकड़ी गयी हो, लेकिन तुरंत ही उसने खुद को संभाल लिया.
" ऐसी कोई बात नही है डॉक्टर साहब "
मुन्ना आज मेरे पास पाँचवी बार आ रहा था, पहली बार उसकी उंगली दरवाजे मे आ गयी थी, दूसरी बार पैर मे चोट लगी थी, और फिर हर बार अलग जगह पर चोट और उसके लिए अलग बहाना, और इस बार ऐसा लग रहा था जैसे उसकी कोहनी के पास से उसके दोनो हाथो को जैसे ब्लेड से काटा गया हो, शुरू मे 3 बार तो उसका बड़ा भाई उसके साथ आया था लेकिन फिर उसने भी आना बंद कर दिया था.
" देखो मुन्ना, मैं डॉक्टर हू, रोज हज़ारो पेशेंट्स को देखता हू, उनकी मनोदशा को समझता हू, और उनका इलाज करने की कोशिश करता हू, लेकिन अगर पेशेंट्स ही मुझसे सबकुछ छुपाएँगे तो मैं उनका इलाज कैसे कर पाउन्गा, मैं जानता हू कि कोई ऐसी बात ज़रूर है जो तुम्हे अंदर ही अंदर खाए जा रही है, जिसकी सज़ा तुम खुद को चोट पहुचकर दे रहे हो, मुझे बताओ, दर्द बाँटने से कम ही होता है मुन्ना, बढ़ता नही है " मैने मुन्ना के हाथ मे पट्टी करते हुवे कहा.
मेरी उन बातो का उसपर जादुई असर हुआ.
" आप सही कह रहे है डॉक्टर साहब, मैं खुद को ही सज़ा दे रहा हू, उसकी जिंदगी बर्बाद कर देने की सज़ा, मुझे कोई हक़ नही था उसकी जिंदगी बर्बाद करने का, लेकिन अपने घमंड मे चूर मैने वो भी कर दिया, ये भी नही सोचा कि उसके बाद उसपर क्या बीतेगी, समाज मे उसकी क्या इज़्ज़त रह जाएगी " बोलते- बोलते मुन्ना की आँखो के कोने से आँसू की छोटी सी बूँद बाहर निकल आई थी और उसके गालो को चूम रही थी.
" शुरू से शुरू करो मुन्ना, ऐसे तो मैं कुछ समझ नही पाउन्गा " मैं बोला.
मुन्ना एकटक शुन्य मे ताकने लगा, ऐसा लग रहा था जैसे कि वो सोच रहा हो कि शुरू कहाँ से करे.
" बात आज से कोई 6 महीने पहले की है डॉक्टर साहब, मेरे मोहल्ले मे एक बहुत ही खूबसूरत लड़की रहती थी, अंजू नाम था उसका, खूबसूरती की मूरत थी वो, भगवान ने जब उसे बनाया होगा तो वो भी कुछ देर तक उसके आकर्षण मे खो सा गया होगा, उसकी झील सी नीली आँखो मे डूब सा गया होगा, वो थी ही ऐसी, जो भी उसे देख ले उससे प्यार हो जाए उससे, मुझे भी हो गया, लेकिन वो ठहरी एक शरीफ घर की लड़की और मैं ठहरा आवारा लड़का, जिसके पास ना
नौकरी थी, जिसे ना रिश्तो की समझ थी, हर रोज झगड़ा करना, मार-पीट करना यही मेरा काम था, और इसी वजह से मैं पूरे मोहल्ले मे बदनाम था,
आख़िरकार एक दिन हिम्मत करके मैने उससे अपने प्यार का इज़हार कर ही दिया लेकिन उसने मेरे प्यार को ठुकरा दिया " वो साँस लेने के लिए रुका तो मैं बोल पड़ा,"
तो इसलिए तुमने खुद को जख्म देने शुरू कर दिए "
" नही डॉक्टर साहब, ये बात नही है, जिस दिन उसने मेरे प्यार को ठुकरा दिया, उस दिन शाम को मैं अपने दोस्तों के साथ बैठा शराब पी रहा था, तो मैनेउन्हे उसके बारे मे बताया, उन लोगो ने कहा कि भाई, आपकी कोई ऐसे बेइज्जत कैसे कर सकता है, आपको अपनी बेइज़्ज़ती का बदला लेना ही होगा, और घमंड मे चूर मैने भी उनसे वादा कर दिया कि हां, अबसे उस कुतिया को उसकी औकात याद दिलाना ही मेरी जिंदगी का एक मात्र मकसद है, साला, उस वक़्त सोचा ही नही था कि कौनसी बेइज़्ज़ती का बदला लेना चाहता था मैं, साली जिसकी कोई इज़्ज़त ही नही थी, जिसे गली का कुत्ता भी इज़्ज़त नही देता था बल्कि सब उससे डरते थे,
उसकी भला कोई बेइज़्ज़ती कैसे कर सकता है, लेकिन कहते है ना कि नफ़रत मे बहुत ताक़त होती है, उस दिन से ही मैं उशे बर्बाद करने के लिए प्लान बनाने लगा, हर पल ये सोचने लगा कि मैं कैसे उसे बदनाम करके उसके हाथो हुई अपनी बेइज़्ज़ती का बदला ले सकता हू, और आख़िरकार मेरे दिमाग़ मे एक तरकीब आ ही गयी "
" वो क्या " मैने पूछा.
" हमारी कॉलोनी मे एक आदमी है जिसका नाम अमरीश है, इधर की बात उधर करने की उसकी आदत है, वो किसी भी बात को पूरे मोहल्ले मे चुटकियो मे फैला सकता था, मैने उसे इस्तेमाल करने की ठानी "
" वो कैसे " मैने पूछा.
" जिस कॉलेज मे अंजू पढ़ती थी, एक दिन मैं उस कॉलेज मे जा पहुचा, वहाँ बाहर खड़े हुवे सेक्यूरिटी गार्ड ने मुझे अंदर जाने से रोक दिया, मैने उससे बहुत रिक्वेस्ट की मगर वो नही माना, ऐसा नही था कि उसको साइड मे करके अंदर जाना मेरे लिए कोई मुश्किल काम था, लेकिन ऐसा करने से मेरे प्लान मे दिक्कत पैदा हो सकती थी, इसलिए मैने दूसरा रास्ता अपनाया "
" वो क्या "
" पैसे का, लालच हर इंसान की कमज़ोरी होती है, मैने उसे एक 1000 का नोट दिया और कहा कि देख भाई, इस कॉलेज मे अंजू नाम की एक लड़की पढ़ती है और मेरा दोस्त उससे बहुत प्यार करता है लेकिन वो उसके प्यार को समझती नही है, इसलिए मैं उसे समझाने आया हू, बस 2 मिनिट का काम है,
वो बोला, नही,नही, मेरी नौकरी चली जाएगी, मैने एक और 1000 का नोट निकालकर उसके हाथ मे रख दिया, अब वो लाइन पर आ गया, बोला, ठीक है, लेकिन सिर्फ़ दो मिनिट,
मुझे क्या दिक्कत हो सकती थी "
" तुम्हारा प्लान क्या था " मैने पूछा.
" वो भी पता चल जाएगा डॉक्टर साहब, पहले पूरी बात तो सुन लीजिए " मुन्ना ने कहा, तो मैं चुप हो गया.
" वो भीतर गया और अंजू को ये कहकर बुला लाया कि उससे कोई मिलने आया है, अंजू आई लेकिन मुझे देखते ही वो बिफर उठी, बोली, क्या लेने आयो हो यहाँ, उस दिन कही हुई बात समझ मे नही आई तुम्हारे, मुझे तुम मे कोई इंटेरेस्ट नही है, दफ़ा हो जाओ यहाँ से, भगवान कसम डॉक्टर साहब, गुस्से मे वो और भी खूबसूरत लग रही थी, उसकी नीली आँखो की गहराई मे खो सा गया था मैं, उसे पागलो की तरह एकटक घूरे जा रहा था,
मुझे ऐसे घूरते हुवे देखकर वो बोली, समझ मे नही आता क्या, मैने कहा दफ़ा हो जाओ यहाँ से, उसकी बात सुनकर जैसे मैं हक़ीकत के धरातल पर वापिस आया और अपने प्लान के बारे मे सोचने लगा, मैने उससे कहा, मैं उस दिन के लिए तुमसे माफी माँगने आया हू, मुझे तुमसे वो सबकुछ नही कहना चाहिए था, मुझे माफ़ कर दो,
और मै तुम्हे ये बताने आया था कि कल मैने रात को चौक पर कुछ लोगो को बात करते सुना था कि वो तुम्हारे पापा को बिज़्नेस मे भारी नुकसान पहुचाना चाहते है, और उन्हे जैल भिजवाना चाहते है, ये सुनकर वो चौंक गयी, पूछने लगी कि कौन थे वे लोग, मैने अपना अगला दाँव चला, कहा, अंधेरा होने की वजह से मैं उन्हे पहचान नही पाया लेकिन अगर तुम मुझे माफ़ कर दोगि तो मैं उनका पता लगाकर तुम्हे बता दूँगा,
उसने कहा, ठीक है, मैने तुम्हे माफ़ किया, मैने अपनी अगली चाल चली, कहा, थॅंक यू, कल इसी समय पर मैं तुमसे यहाँ पर मिलने आउन्गा और तब तक मैं उन लोगो का पता भी लगा लूँगा, उसने कहा, ठीक है, ये बाते करके मैं वहाँ से चला आया "
वो साँस लेने के लिए रुका तो मैं खुद को बोलने से ना रोक सका," लेकिन वो लोग कौन थे जो अंजू के पापा को बिज़्नेस मे नुकसान पहुचना चाहते थे और इन सारी बातो से अमरीश का क्या लेना-देना "
मुन्ना के होंठो पर एक फीकी मुस्कुराहट उभर आई, बोला," ऐसे कोई लोग थे ही नही डॉक्टर साहब, वो तो मैने उसे खुद को माफ़ करवाने के लिए कहा था, क्योंकि अगर वो मुझे माफ़ नही करती तो मेरा प्लान कैसे कामयाब होता "
" क्या था तुम्हारा प्लान " मैं फिर बीच मे टपका.
" उस दिन शाम को मैने और मेरे दोस्तो ने अमरीश को पार्टी दी, उसे शराब पिलाई और बातो ही बातो मे उससे इधर-उधर की खबरें पता करने लगे, तो उसने बताया कि भाई कुछ भी कहो, अपनी पूरी कॉलोनी मे सबसे शरीफ अजय (अंजू के पिता) और उसका परिवार ही है, उनसे शरीफ कोई नही है, अपनी बेटी मे भी क्या संस्कार डाले है उन्होने, एकदम लक्ष्मी है उनकी बेटी भी,
मुझे जिस मौके की तलाश थी, वो मिल गया था, इसलिए मैं बोला, आपकी ये शरीफ लड़की मुझसे प्यार करती है अमरीश भाई, वो चौंक कर बोला, क्या बात कर रहे हो मुन्ना, उसकी तो शादी तय हो गयी है, वो भला तुमसे प्यार कैसे कर सकती है,
वो कितनी शरीफ लड़की है, नही, मैं नही मानता,
मैने कहा, वो मुझसे प्यार करती है, और इसलिए हम दोनो भागने वाले है अमरीश भाई, उसके चेहरे पर हैरत के भाव अभी भी काबिज थे, बोला, मैं नही मान सकता, मैं बोला, ठीक है, कल खुद तुम अपनी आँखो से देख लेना, जब मैं उसके कॉलेज मे उससे मिलने जाउन्गा, अमरीश बोला, ठीक है, अगर तुम उससे मिले तो ये साबित हो जाएगा कि वो तुमसे प्यार करती है, इतना बोलकर अमरीश चला गया "
" अच्छा, तो ये तुम्हारा प्लान था, तुम अंजू को बदनाम करना चाहते थे अमरीश के ज़रिए " मैं बात को समझते हुवे बोला.
" बिल्कुल ठीक समझे डॉक्टर साहब, अगले दिन भी मई अंजू की कॉलेज जा पहुचा, जाते ही मैने सेक्यूरिटी गार्ड को 2000 रुपये थमा दिए, वो बिना कुछ बोले सीधा अंजू को बुलाने चला गया, मैने अमरीश से कहा कि तुम आसपास थोड़ा दूर चले जाओ और आज खुद अपनी आँखो से देख लेना जब वो मुझसे मिलने आए, अमरीश मेरी बात सुनकर गेट के पास एक पेड़ के पीछे जाकर छुप गया, थोड़ी देर बाद अंजू आई, उसे अपने पिता के दुश्मनो के नाम जानने की उत्सुकता थी इसलिए वो काफ़ी तेज़ी के साथ मेरी तरफ आई थी, और बाहर खड़ा अमरीश सबकुछ देख रहा था, वो मेरे पास आकर बोली, बताओ कौन है वो, तुमने पता किया,
मैने कहा, सॉरी अंजू, मैं पता नही लगा सका, मुझे माफ़ कर देना, इतना बोलकर मैं चुपचाप वहाँ से चल पड़ा, बिना पीछे मुड़े, क्योंकि मेरा काम हो चुका था, अमरीश हम दोनो को साथ देख चुका था और ये बात मैं बहुत अच्छी तरह से जानता था कि अब ये बात उसके पेट मे पचेगी नही, पीछे अंजू हैरत से भरी आँखे लिए मुझे जाते हुवे देख रही थी "
" फिर क्या हुआ " मैने पूछा.
" फिर वही हुआ जो मैं चाहता था, अमरीश ने ये बात सारी कॉलोनी मे फैला दी कि अंजू का मेरे साथ चक्कर है, उसके पिता की सारी इज़्ज़त मिट्टी मे मिल गयी, अंजू से जिसकी शादी होने वाली थी, उसने शादी तोड़ दी, और अंजू ने अपने घर की छत से कूदकर अपनी जान देने की कोशिश की "
" लेकिन तुम अपने आप को सज़ा क्यो दे रहे हो, तुमने जो चाहा था, वो तो तुम्हे मिल गया था ना " बोलते वक़्त मेरी आँखो मे आँसू थे.
उसके चेहरे पर मौजूद मुस्कान मे दर्द की लहर दौड़ पड़ी," क्या चाहता था मैं, क्यू चाहता था, क्या बिगाड़ा था उसने मेरा, मैं उससे प्यार करता था, वो मुझसे नही करती थी तो इसमे उसकी क्या ग़लती थी, डॉक्टर साहब, जब मैने उसका छत से गिरा, टूटा शरीर देखा तो मेरे दिल मे वो दर्द उठा जिसे मैं बयान नही कर सकता, ऐसा लगा जैसे किसी ने गरम लोहा मेरे सीने मे उतार दिया हो, उस वक़्त सोचा कि अपने घमंड मे चूर मैने कितनी जिंदगिया बर्बाद कर दी,
मुझे जीने का कोई हक़ नही है डॉक्टर साहब, कोई हक़ नही है, जिससे प्यार करता हू, वो मुझसे नफ़रत करती है, और वो नफ़रत पैदा भी मैने ही की, किसलिए, क्यू, आज जब सोचता हू तो समझ नही पाता कि मैने ऐसा क्यू किया, अगर वो मेरे साथ नही है तो जीकर करूँगा भी क्या, इसलिए खुद को दर्द देता हू ताकि सीने मे उठते दर्द से थोड़ा ध्यान हट जाए, किसी तरह से वो दर्द कम हो जाए, लेकिन वो दर्द कम नही होता, बढ़ता जाता है, हमेशा उसका उधड़ा हुआ शरीर मेरी आँखो के सामने घूमता रहता है, मेरे दिल से हमेशा ये आवाज़ उठती रहती है कि उसके इस हाल के लिए मैं और सिर्फ़ मैं ही ज़िम्मेदार हू, इसलिए खुद को दर्द देता हू डॉक्टर साहब, इसलिए खुद को दर्द देता हू मैं " कहने के बाद वो फुट-फूटकर रोने लगा.
आँसू मेरी आँखो मे भी थे, इसलिए नही क्योंकि मुझे मुन्ना से हमदर्दी थी, इसलिए क्योंकि आज मैं खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था, अंजू से मेरी शादी होने वाली थी, उसके और मुन्ना के बारे मे सुनकर बिना कुछ सोचे-समझे मैने उससे रिश्ता तोड़ दिया, इसमे उस बेचारी की क्या ग़लती थी, कही ना कही अंजू की इस हालत के लिए मैं भी उतना ही ज़िम्मेदार हू जितना कि मुन्ना है, अब सिर्फ़ एक ही तरीका है मेरे पापो का प्रायश्चित करने का, मुझे मुन्ना और अंजू की शादी करवानी होगी, पता नही मैं ये सब कैसे करवा पाउन्गा लेकिन मुझे ये करना ही पड़ेगा, दो प्रेमियो को मिलवाकर मैं अपने द्वारा की गयी ग़लती को सुधार लूँगा और फिर शायद मेरे दिल से भी वो दर्द कम हो जाएगा जो आज मुन्ना के मुँह से उसकी कहानी सुनने के बाद पैदा हुआ है.....
दा एंड