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दुल्हन मांगे दहेज complete

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दुल्हन मांगे दहेज by ved prakash sharma

मेरे प्यारे पापा,

सादर नमस्ते !

अच्छी तरह जानती हूं कि इस पत्र को पढ़कर अापके दिल को धक्का पहुंचेगा, परंतु फिर भी आपकी यह जालिम और बेरहम बेटी लिखने पर मजबूर हो गई है, सच पापा--आपकी यह नन्हीं बेटी वहुत मजबूर है---------जो कुछ हो रहा है यह शायद आपकी बेटी के दुर्भाग्य के अलावा औऱ कुछ नहीं है, वरना----आपने भला क्या कमी छोडी थी----खूब धूम धाम से मेरी शादी की-दहेज में वे सब चीजे दी, जो अापकी हैसीयत से बाहर थीं !

देखने-सुनने में रिटायर्ड जुडीशियल मजिरट्रेट श्री बिशम्बर गुप्ता का परिवार सारे बुलन्दशहर के लिए एक आदर्श है------जिधर निकल जाएं लोग इनके सम्मान में बिछ--बिछ जाते हैं और देखने-सुनने में हेमन्त भी योग्य है, छोटी ही सही, मगर 'लॉक मैन्युफैक्चरिंग' नामक फेक्टरी का मालिक है, परंतु यह जानकर आपको दुख होगा पापा कि वास्तव में ये लोग वैसे नहीं हैं जैसे दिखते है !

पिछले करीब एक महीने से ये लोग मुझ पर आपसे बीस हजार रुपए मांगने के लिए दबाब डाल रहे ---मैं टालती अा रही थी, क्योकि आपकी हालत से अनजान नहीं हूं----जानती हूं इन जालिमों की मांग पूरी करना आपके लिए असंभव की सीमा तक कठिन है, मगर...ये लोग बात-बात पर मुझे ताने मारते हैं . . . . . . . . तरह-तरह से मानसिक यातनाएं दे रहे हैं ।

समझ में नहीं आ रहा है पापा कि मैं क्या करूं----हेमन्त कहता है कि अगर उसे रुपए नहीं मिले तो मुझे तलाक दे देगा-----सोचती हू कि मैं खूद को फांसी लगा लूं---कोशिश की, लेकिन आपका ख्याल आने पर सफल न हो सकी…दिल में ख्याल उठे कि अाप मुझे कितना प्यार करते हैं पापा, मेरी मृत्यु से आप पर क्या गुजरेगी-----बस मरने का साहस टूट गया---आपके फोटो के सामने बैठी बिलख-बिलखकर रोती रही मैं ।

में चार तारीख को अापके पास अा रही हूं …हालांकि जानती हूं शादी के कर्ज से अभी तक आपका बाल--बाल बिंधा पड़ा है, इस मांग को पूरा करने के लिए मेरे पापा की खाल तक बिक सकती है, परंतु फिर भी, यह लिखने पर बहुत विवश हूं पापा कि जहाँ से भी हो, जैसे भी हो----बीस हजार का इंतजाम करके रखना !

और हां, इन लोगों ने मुझे धमकी दी है कि अगर इस बारे में आपने इनसे कोई बात की तो मेरी खेर नहीं है------अाप मेरा अच्छा चाहते हैं तो इस बारे में इनसे जिक्र न कीजिएगा-----बाकी बातें मिलने पर बता सकूंगी ।

आपकी बेटी --- सुचि

दीनदयाल ने कम-से-कम बीसवीं बार अपनी बेटी के पत्र को पढ़ा और इस बार भी उस पर वही प्रतिक्रिया हुई, जो उन्नीस बार पहले हो चुकी थी-------लगा कि कोई फौलादी शिकंजा उसके दिल को जोर से भींच रहा है ।

असहनीय प्रीड़ा को सहने के प्रयास में जबड़े कस गए उसके, आंख भिंच गई और उनसे फूट पर्डी गर्म पानी की नदियां ।

दर्द सहा न जा रहा था ।

पीड़ा के उसी सैलाब से ग्रस्त सामने बैठी पार्वती ने जब देखा कि पति ने अपने दांतों से होंठ जख्मी कर लिए हैं तो कराह उठी----" बस कीजिए मनोज के पापा, बस कीजिए-दिल फटा जा रहा है । "

दीनदयाल कुछ बोला नहीं, शून्य में घूरते हुए उसका चेहरा एकाएक चमकने लगा-हौंठ से खून रिस रहा था और जबड़ों के मसल्स फूलने-पिचकने लगे-जाने वह क्या सोच रहा था कि गुस्से की ज्यादती के कारण सारा शरीर कांपने लगा------

जाने वह क्या सोच रहा था कि गुस्से की ज्यादती के कारण सारा शरीर कांपने लगा------ मुटि्ठयां भिंचती चली गई, साथ ही बेटी का पत्र भी-----एकाएक उनके मुंह से गुर्राहट निकली---"विशम्बर गुप्ता को कच्चा चबा जाऊगा, खुन कर दूंगा उसका ।"

पार्वती घबरा गई, बाली----"क्या कह रहे है आप होश में आइए । "

"ऐेसे कुत्तो' का यही इलाज है मनोज की मां----फिर इन हालतों में एक लइकी का गरीब बाप और कर भी क्या सकता है-दहेज के इन लोभी भेडियों की बोटी बोटी काटकर चील कौवों के सामने डाल देनी चाहिए । "

" मैं आपके हाथ जोड़ती हुं---यह हमारी बेटी का मामला है, अगर जोश में आपने कोई उल्टा-सीधा कदम उठा दिया तो अंजाम हमारी सुचि को भुगतना होगा, जाने वे उसके साथ क्या सलूक करें ? "

"क्या करेंगे वे कमीने--- क्या वे हमारी बेटी को मार डालेंगे ? "

' 'आए दिन बहुएं जलकर मर रही हैं, ऐसा करने वालों का ये समाज और कानून भला क्या बिगाड लेता है ?"

दीनदयाल का सारा जिस्म पसीने-पसीने हो गया, बूढ़ी आंखों ने अाग की लपटों से घिरा बेटी का जिस्म देखा तो चीख पड़ा----" न-नहीं---ये नहीं हो सकता मनोज की मां, वे ऐसा नहीं कर सकते । "

" दहेज के भूखे दरिदें कुछ भी कर सकते हैं । "

सारा क्रोध, सारी उत्तेजना जाने कहाँ काफूर हो गईं---वड़े ही, मर्मातक अंदाज में दीनदयाल कह उठा--------"वे लोग ऐसे लगते तो नहीं थे पार्वती, सारे बुलंदशहर में यह बात कहावत की तरह प्रसिद्ध है कि अपनी सर्विस के जमाने में विशम्बर गुप्ता ने कभी एक पैसे की रिश्वत नहीं ली । "

"भ्रष्ट आदमी पद और रुतबे में जिनता बड़ा होता है उसके चेहरे पर शराफत और ईमानदारी का उतना ही साफ-सुथरा फेसमास्क होता है मनोज के पापा । " पार्वती कहती चली गई-----" हम लोगों के अलावा यह भी किसको पता होगा कि विशम्बर गुप्ता दहेज के लोभी हैं---बात खुलने पर भी लोग शायद यकीनन कर सके ।"

 
रिटायर्ड जूडिशियल मजिस्ट्रेट बिशम्बर गुप्ता आराम-कुर्सी पर अखबार पड़ रहे थे कि ललितादेबी ने आँगन में कदम रखते हुए कहा---"अखबार में ऐसा क्या है, जिसमेॉ अाप चिपककर रह गए ?"

बिशम्बर गुप्ता ने नाक पर रखे चश्में के अंदर से पत्नी की तरफ देखा, अखबार की तह बनाकर गोद में रख और चश्में को दुरुस्त करते हुए बोले-----"एक और बहू को उसके ससुराल वालों ने जलाकर मार डाला । "

" हे भगवान ।" ललितादेबी कह उठी----घोर कलियुग आगया है ।"

बिशम्बर गुप्ता ने उसे ध्यानपूर्वक देखा, फिर समीप पडे स्टूल की तरफ इशारा करके बोले----' 'बैठो ललिता । "

पति के चेहरे पर छाई गंभीरता ने ललिता को विवश का दिया । वह स्टूल पर बैठती हुई बोली-"कहिए, क्या बात है ?"

बिशम्बर गुप्ता ने तुरन्त कुछ न कहा । पहले रहस्यमय अंदाज में चारों तरफ देखा , फिर ललितादेबी पर झुककर _अत्यंत धीमे स्वर में पूछा----"हेमन्त और बहू कहां हैं ?"

"उपर-अपने-कमरेमे ।"

बिशम्बर गुप्ता ने उसी अंदाज में पुन: पूछा---" रेखा और अमित ?"

" अमित अपने कॉलेज के ड्राइविंग कप्पीटि'शन की तैयारी हेतु ड्राइविंग करने गया है और रेखा छत पर पढ़ रही है, मगर आप इस तरह घरके हर सदस्य के बारे में क्यो पूछ रहेहैं ?"

बिशम्बर गुप्ता ललितादेबी पर कुछ और ज्यादा झुक गए । पहले से कई गुना ज्यादा रहस्यमय स्वर में बोले…"खाना बनाते बनाते वक्त अगर हमारी बहू भी किसी दिन जल कर मर जाये तो कैसा रहे ?"

" क-क्या ? " ललिलदेबी उछल पड़ी ।

"बात को समझने की कोशिश करो ललिता! " कहते वक्त बिशम्बर गुप्ता के बूढे परंतु रोबदार चेहरे पर हिंसा नाचने लगी----सुचि घर में भी हर वक्त रेशमी साड़ी पहने रहती है-----" गैस के चूल्हे से निकली आग का एक जर्रा यदि उसके पल्लू को स्पर्श कर ले तो ।"

"न-नहीं !‘" उनकी बात पूरी होने से पहले ही ललितादेवी चीख पडी़, उन्होंने झपटकर दोनों हाथों से पति का गिरेबान पकडा और हिस्टीरियाई अंदाज में चीख पड़ी----" अाप वे नहीं हो सकते या-या फिर आपका दिमाग खराब हो गया है---पागल हो गए हैं अाप । "

''सोच तो ललिता, एक करोड़पति सेठ की लडकी सुचि से कहीं ज्यादा खूबसूरत है-----दहेज़ में वह लाखों रुपए देगा, मगर इसके लिए सुचि को ठिकाने लगाना जरुरी है ।"

ललितादेबी अवाक् ।

बोले भी तो कैसे ?

मुंह में जुबान ही न थी----' हत्या की कल्पना' मात्र से उनके जिस्म का रोयां रोयां खडा होगया ।

" बोलो, इस काम में तुम हमारी मदद करने के लिए तैयार हो या नहीं ?"

ललितादेवी को जवाबे देने का होश कहां । जैसे लकवा मार गया था उन्हें । चेहरा कोरे कागज सा सफेद , हवाइयां उड़ रहीं थीं वहां----आंखों की जैसे रोशनी गायब हो गईं-जिस्म के सभी मसानों ने एक साथ ढेर सारा पसीना उगल दिया था ।

मारे खौफ के पत्थर की मुर्ति में बदलकर रह गई थीं वह ।

ललितादेबी की आंखें उनके चेहरे पर स्थिर र्थी-और ऐसा देखकर एक बार को तो बिशम्बर गुप्ता के समुचे जिस्म में मौत की सिहरन दोइ गई, परंतु अगले ही पल जाने क्यों, उनके होठो पर, जीवन्त, मुस्कान उभर अाई । पत्नी के दोनों कंधे पकड़कर बोले---"क्या सोचने लगी तुम, होश में आओ । "

" न--नहीं-----अाप 'वे' नहीं हो सकते । डरे हुए अन्दाज़ में ललितादेबी बड़बड़ाती चली गईं--"उनके रूप में मेरे सामने कोई नरपिशाच खडा है, मेरे पति तो ऐसी घिनौनी बाते सोच भी नहीं सकते ।"

विशम्बर गुप्ता ठहाका लगा उठे, बेसाख्ता हस पडे बह ।

ललितादेबी के चेहरे पर मौजूद आंतक के भावो से उलझन के चिह्न भी आ मिले----कुछ कहने के प्रयास में उनके होंठ हिले जरुर थे, मगर कोई आवाज न निकल सकी, जबकि खुलकर हंस रहे बिशम्बर गुप्ता ने कहा--" खूद को संभालो हेमन्त की मां, मम सचमुच सुचि की हत्या करने बाले नहीं हैं, बल्कि एक प्रयोग कर रहे थे ।"

" कैंसा प्रयोग ? " ललितादेबी के मुंह से हठात् निकल पडा । "

 


"यह कि वह भारतीय नारी जो अपने पैर तले दबकर मर जाने वाली चीटीं तक को देखकर कांप उठती है, क्या दहेज के लोभ में सास बनते ही अपनी बहूकी हत्या कर सकती है । "

"मैं समझी नहीं। "

"दरअसल जब शुरू शुरू में दहेज की बलिवेदी पर चढ जाने वाली बहुओं से सम्बन्धित समाचर पढ़े तो हमेँ मासूम बहुओं से सहानुभूति और उनके ससुराल वालों से नफरत हुई मगर देखते-ही-देखते यह समाचार- चमत्कारी ढंग से अखबार के हर कॉलम पर छा गए--इस कदर कि कभी-कभी तो एक ही अखबार में तीन या चार बहुओं के जलाए जाने की खबरें छपने लगीं…ऐसा नजर आने लगा जैसे हर सास-ससुर, ननद-देयर और पति बहुओं को जला रहा हो…धीरे-धीरे यह सवाल हमारे जेहन में उग्र रूप धारण करता चला गया कि क्या यह -सभी समाचार सच हैं, क्या हत्या करना इतना आसान हो गहु है क्रि उसे साधारण पारिवारिक लोग इतनी तादाद में कर सकें ? "

ललितादेवी अपने पति की तरफ देखती भर रही ।

जबकि बिशम्बर गुप्ता कहते चले गए--" हम जुडीशियल मजिरट्रेट रहे हैं ललिता---हमने एक-से-एक क्रूर और जालिम मुजरिम को देखा है और अपने अनुभव-के आधार पर हम या बात दावे के साथ कह सकते हैं कि 'हत्या' जैसा संगीन जुर्म करने के नाम पर बड़े-से-बड़े मुजरिम के भी छक्के छुट जाते तो हैँ-इसीलिए हम इन खबरों पर यकीन न कर सके---------- हरगिज नहीं मान सकते कि जिस जुर्म को करने की कल्पना मात्र से पेशेवर मुजरिमों को भी पसीने आ जाते हैं उसे साधारण पारिवारिक लोग इतनी तादाद में कैसे कर सकते हैं ।"

"म. ..मगर इन सब बातों का मेरे सामने सुचि की हत्या का प्रस्ताब रखने से क्या मतलब ?"

" तुम भी एक साधारण भारतीय नारी हो ललिता, साय ही 'सास‘ भी-वैसी ही 'सास' जैसी इस देश की निन्यानवे प्रतिशत महिलाएं हैं…हम यह देखना चाहते थे कि 'सास' का लेबल चिपकते ही क्या सचमुच भारतीय महिला इतनी क्रूर और जालिम हो उठती है ?" कहने के खाद बिशाम्बर गुप्ता सांस लेने के लिए रुके फिर कह उठे-----और हमने देखा-----भय से सराबोर तुम्हारा चेहरा, खौफ की ज्यादती के कारण कांपती तुम्हारी आवाज----शर्त लगाकर कह सकते है कि हमारे जिन शब्दों ने जो हालत तुम्हारी कर दी, वे शब्द वही हालत इस मुल्क की निन्यानवे प्रतिशत महिलाओं की कर सकते हैं--महिलाओं को बहुअों की हत्यारी केसे स्वीकार किया जा सकता है, 'हत्या की कल्पना' मात्र से ही जिनके छक्के छूट जाएं ?"

''तो क्या अाप मुझे सिर्फ आजमा रहे थे ?" ललितादेबी का स्वर अभी तक हैरत में डूबा हुआ था---"द्रेखना चाहते थे कि दहेज के लालच में मैं सुची की हत्या कर सकती हूं या नहीं ?"

' 'सिर्फ तुम्हें नहीं ललिता, बल्कि तुम्हारे माध्यम से हम तमाम भारतीय 'सासों' की मानसिकता और उनके हौंसले को आजमा रहे थे-देखना चाहते थे कि क्या अखबार में छपी सभी खबरें सही होती हैं ?"

" क्या आप सच कह रहे हैं ?" स्वर में अभी तक शंका थी और उस शंका के कारण ही बिशाम्बर गुप्ता एक बार फिर ठहाका लगाकर हैंस पडे----वे आगे बढ़े, ललिता के डरे हुए एवं पसीने से तर-बतर चेहरे को अपनी हथेलियों के बीच भरकर प्यार से कह उठे---"उफ तुम तो वहुत डर गई हो ललिता, क्या तुम समझती हो कि हम सचमुच. . . । "

" न--नहीं ऐसी र्तों मैं कल्पना भी नहीं कर सकती, तभी तो… । " अपने शब्द स्वयं ही बीच में छोड़कर ललितादेवी उनसे लिपट गई अोर जाने क्यों फफक-फफककर रो पड़ीं, बोली---" बहुत डर गई थी हेमन्त के पापा । "

"पगली ! " कहकर बिशम्बर गुप्ता ने बाँहो में भीच लिया और प्यार से उनके बाल सहलाने लगे ।

गुनगुनाती सुचि ने बाथरूम में लगा ‘फव्वारा‘ आँफ कर दिया---उसके तन पर पड़ रही बारिश रुक गई-उसके दूध से गोरे स्वस्थ एवं गदराए जिस्म पर पानी की बूंदें झिलमिला रही थी, जैसे पारदर्शी शीशे, पर देर सारे हीरे बिखरे पडे़ हो----

लम्बे घने एवं काले बालों क्रो उसने हौले से झटका और 'हैंडिल' से वड़ा 'टॉवल' उठाकर अपने बदन पर डाल लिया । फिर उसने टावल के नीचे से वे दो मात्र कपडे निकाले, जिन्हें पहने वह नहा रही थी-इस सारी क्रिया के बीच सुचि क्रिसी मधुर फिल्मी गाने को गुनगुनाए जा रही थी !

गरदन के पास टॉवल में उसने गाठ लगाई ।

पहले आहिस्ता से दरवाजा खोलकर उपने बेडरूम में झांका और आश्वस्त होने के बाद दरवाजा पूरी तरह खोलकर कमरे में पहुच गई---फर्श पर नन्हे-नम्हे पदचिह्न बनाती यह पूरी स्वच्छंदता के साथ एक कोने में रखी अलमारी की तरफ बढ़ रही थी…इस सच्चाई से बेखबर कि पीछे वाली दीवार से सटा हेमन्त उसे देख रहा है ।

हेमन्त की वृष्टि उसकी नग्न लम्बी सुडौल और केले के तने जैसी चिकनी टांगों पर स्थिर थी-----होंठों पर नाच रही थी शरारत से सराबोर मुस्कान-सांस रोके वह दबे पांव सुचि के पीछे बढा ।

 


शायद वस्त्र निकालने के लिए सुचि ने अभी अलमारी खोली ही थी कि हेमन्त उसके बेहद समीप जाकर दहाडा-----"हा... ! "

"उई !" बुरी तरह डरकर सुचि चीख पडी ।

खिलखिलाकर हंसते हुए हेमन्त ने उसे बांहों में भर लिया----सुचि की समझ में क्षण भर में अपने पति की शरारत अा गई, अलग हटी और बनावटी क्रोध के साथ बोली-----" यह क्या बदतमीजी है हेमू ?"

हेमन्त ठहाका लगाकर हैंस पड़ा, बोला…"यही बदतमीजी करने के लिए तो पंद्रह मिनट से उस दीवार के सहारे लाठी की तरह खडे थे मेरी जान ।

दोनों कलाइयों को बाबर उसने ‘पल्लू’ का काम लेने की असफल कोशिश के साथ अपनी दृष्टि से उसे जख्मी करती सुचि ने कहा---"तुम अपनी बदमाशियों से बाज़ नहीं आओगे ?"

"लानत है उस पर जो पानी से भीगी अाग को देखकर भी शरीफ वना रहे !" कहने के साथ ही हेमन्त ने अपनी आंखों को एक्सरे मशीन में बदल दिया था ।

सुचि ने नखरा किया---" मुझे क्रंपड़े़ चेंज करने दो हेमू ।"

" कर लो चेंज , मैनें कब मना किया ?"

" प--प्लीज हेमू, तुम कमरे से बाहर जाओ ।"

ओ के ।" 'कहने के साथ होंठों पर चंचल मुस्कान लिए हेमन्त उसकी तरफ बढ़ गया और उसके इरादे भांपते ही पीछे हटती हुई सुचि बोली---"प प्लीज हेमन्त , यह कोई समय नहीं है।"

"मैं अभी--अभी पंडित से पूछकर आया हूँ सुचि डार्लिंग यहीँ समय सबसे ज्यादा उपयुक्त और शुभ हैं, कहने के साथ ही वह बाज़ की तरह झपट पड़ा, क्रितु पहले ही से सतर्क सुचि फुदककर बेड पर चढ़ गई । "

हेमन्त पुन: झपट पड़ा …

खिलखिलाती सुचि बेड के दूसरी तरफ ।।

और फिर सुचि हेमन्त को पलंग के चक्कर कटाने लगी---- कमरे में गूंज रहीं थी एक सुखी दम्पति की खिलखिलाहटें ।

हेमन्त फैक्टरी चला गया तो सुचि अपने कमरे की सफाई में लग गईं ।

लिहाफ़ आदि की तह बनाने के बाद उसने बेडशीट दुरुस्त की और झाडू संभालकर बॉंलकनी में पहुच गई ।

अभी उसने बहां झाडू लगानी शुरु की ही थी कि, एक सिगार का टुकडा झाडू से उलझ गया ।

जुते से पूरी बेरहमी के साथ कुचले गए सिगार के इस टकड़े पर नजर पड़ते ही जाने क्यो चमत्कारिक ढंग से सुचि का चेहरा 'फफ्फ‘ पड़ गया-मात्र एक पल में उसके चेहरे पर , पसीने की नन्ही-नन्हीं बूंदें झिलमिलाने लगी----झाडू़ हाथ से छूट गई थी ।

आंखों में खौफ के कुछ वैसे ही चिह्न थे, जैसे वह सिगार के टुँकड़े को नहीं, बल्कि किसी वहुत ही जहरीले सर्प को देख रही हो ।

सुचि इस कदर आतंकित हो गई थी कि बहीं जड़ होकर रह गई --ठीक पत्थर की किसी मूर्ति के समान--यह वहीं जाने कि उस वक्त उसका मस्तिष्क दहशत कि किन वादियों में भटक रहा था ।

‘बहू-ओ बहु!' लेलितादेबी की आवाज ने उसे चौंकाया ।

सुचि बौखला गई ।

हड़बड़ाकर वह खडी़ हुईं, अपनी तरफ बढ़ती ललितादेवी को देखकर उसने जल्दी सिर ढांपा और उनके चरणी में झुकती हुई बोली------" "प्रणाम मांजी ! "

" तुम्हारा सुहाग वना रहे बेटी, चांद-सा बेटा हो ।"

घबराहट पर नियंत्रण पाने की चेष्टा करती हुई सुचि सीधी खड़ी हुई ही थी कि ललिता-देबी ने कहा------" आज तू फिर झाडू लगाने लगी "

" मां........मांजी ।"

मैं एक नहीं सुंनूगीं तेरी-----कल भी कहा था कि इस हालत में ऐसे काम नहीं करते, चल जाकर कमरे में बैठ झाडू मैं लगा लूंगी ।।।

दिल उछलकर सुचि के कंठ में फंस गया । इस संभावना ने उसके छक्के छुडा दिए कि अगर "मांजी" ने सिगार देख लिया तो क्या होगा, उसने जल्दी से सिगार पर पैर रखा और बोली---"'अ.. .अाप भी कमाल करती हैं मांजी़ं, झाडू लगाना भी कहीं ऐसा काम है कि....... । "

"बस-ज्यादा बातें न बना, जरा अपने चेहरे को देख------इतनी सर्दी के बावजूद पसीने से तर है। कमजोरी की निशानी है-कुछ खाया--पिया कर वरना बच्चा भी कमजोर होगा । "

"'ज......जी " कहने के साथ ही अपनी घबराहट को छुपाने की कोशिश में वह सिगार ही पर बैठ गई…......हाथ बढ़ाकर झाडू उठाई ही थी कि ललितादेवी ने कलाई पकड़ ली, बोली.....…"मुझे दे झाडू़ ।"

"न.....नहीं मांजी, मैं लगा लूंगी । "

"फिर वही जिद, मैं कहती हूं तू ......!"

"प....प्लीज मांजी !" सुचि बिल्कुल गिढ़गिड़ा उठी----" बस आज और लगाने दीजिए ----कल से सारे काम

आप ही करना ।"

"तुने कल भी यही कहा था ?"

सुचि ने इस हद तक जिद की कि ललितादेवी को हथियार डालने पड़े---" वह यह कहकर बहां से चली गई कि कल से वे उसके हाथपैर बांधकर रखेंगी ।"

 


सुचि ने राहत की सांस ली ।

झाडू से फारिग होने के बाद वह अपने नियमानुसार फ्रिज पर रखी अलार्म घड़ी में चाबी भरने हेतु बढ़ी--- फ्रिज से घडी उठाते ही वह चौंकी ।

वहां तह किया हुआ एक कागज रखा था । कागज की स्थिति बता रहीं थीकि उसे कुछ ही देर पहले यहां रखा गया है, घड़ी एक तरफ रखकर उसन कागज उठाया, खोला, पढा़ ।।।

मेरी प्राण प्यारी सुचि !

फैक्टरी के बाद मैं शाम को घर नहीं आऊंगा, बल्कि ठीक साढे पांच बजे गांधीं पार्क पहुंचूंगा ----तुम्हे भी वहीं पहुचना है, आज ’इवनिंग शो' पिक्चर देखेंगे, उसके बाद 'अलका' में डिनर। और _हां या सब तुम्हें मम्मी-पापा या अमित-रेखा में से किसी को नहीं बताना हे…घर से इस बहाने के साथ निकलोगी क्रि अपनी सहेली सरोज के घर जा रही हो---तुम जरूर सोच रहीं होगी कि मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूं या ऐसे रहस्यमय ढंग से प्रोग्राम क्यों बनाया है-जवाब यह जानेमन कि चोरी से, सबसे छुपकर मुलाकात का मजा ही कुछ और हेै----मेरी कसम है तुम्हें इस मुलाकात का जिक्र घर में किसी से नही करोगी ।

तुम्हारा गुलाम-हेमन्त ।

पत्र पढकर एक पल को सुचि उलझन में पढ़ गईं-शायद यह सोचकर कि अगर हमन्त को ऐसा कोई प्रोग्राम बनाना ही था तो पत्र की क्या जरूरत थी-स्वंय कह सकता था, परंतु अगले पल उसे अपने पति की शरारतें याद आई और मंद-मंद मुस्कान के साथ घडी में चाबी भरने लगी ।

गांधी पार्क में एक पेड़ के नीचे खड़ी सुचि रह--रहकर अपनी कलाई पर बंधी रिस्टबाच पर नजर डाल रही थी।।

साढ़े पांच से पांच पैंतीस तक तो उसे फिर भी सब्र था, र्कितु जब घडी की सुईयां उससे भी अागे बढ़ने लगीं तो उसकी बैचेनी भी बढ़ने लगी ।।

वातावरण में अंधेरा छाने लगा ।

पौने छ: बज गए ।

यहाँ से चलने के वारे में अभी उसने सोचा ही था कि पेड़ से कूदकर कोई 'धम्म' से उसके ठीक सामने गिरा और यह सब कुछ ऐसे अप्रत्याशित ढंग से हुआ कि सुचि के कंठ से दबी-दबी-सी चीख-निकल गई ।

"हेलो भाभी !" यह आवाज अमित की थी ।।

सामने खडे अमित को देखते ही सुचि चकरा गई, मुंह से स्वत: निकला------"त--तुम यहां ?"

"जी, हम यहाँ ।" अमित के होंठों पर शरारती मुस्कान थी ।

बौखलाई हुई सुचि ने पुछा ---" तुम यहां क्या कर रहे हो ?"

" आपकी जासूसी ।"

" ज--जासूसी ?"

" यस -- मम्मी से आप कह कर आई हैं न कि सरोज के यहा जा रही हैं ?"

" हां --- मगर वो .......!"

" तो किसका इंतजार हो रहा था यहां ?"

कुछ कहने के लिए सुचि ने मुंह खोला ही था पीछे से आवाज आई---" हर आधे मिनट बाद घड़ी देखी जा रही थी, शायद भाभी का कोई ब्वॉय-फ्रेंड आने बाला था ।"

सुचि पलटते ही भौचक्की रह गई---" 'र रेखा तू ? "

"तभी इतनी बन ठनकर अाई र्थी---फूलदार गुलाबी साडी, जीनतकट हेयर स्टाइल और यह कयामत ढाता मेकअप ।" अमित ने कहा ।

सुचि उसकी तरफ घूमी जबकि सामने आती हुई रेखा ने कहा---" और हम बिना वजह यहां दाल-भात में मूसलचंद बनने चले आए ।"

सुचि इस कदर नर्वस हो गई थी कि मुंह से बोल ना फूटा, जबकि रेखा के चुप होते ही हमला अमित ने किया------" इवनिंग शो, अलका में डिनर ।"

"वाह क्या प्रोग्राम है ?"

"ओह ।" सुचि संभली-----" तो तुमने वह पत्र पढ़ लिया था ?"

" पढा नहीं था प्यारी भाभी । " रेखा ने कहा…"बल्कि लिखा था, खुद मैंने ।"

" त--तुमने…उनकी राइटिंग में…उफ.. । सुचि ने अपना माथा पीट लिया---"'तो तुमने अपनी इस अार्ट का इस्तेमाल मुझ पर भी कर दिया?

" जी हाँ।"

"क्यों" "

" आप से फिल्म देखने और डिनर लेनेके लिए । "

"क्या मतलब ?"

" मतलब बिल्कुल सीधा है , आप हमें इवनिंग शो दिखाने के साथ डिनर भी करा रहीं हैं, वरना...... वरना... । "

"वरना । "

"मम्मी-पापा के सामने आपकी पोल खोल दी जाएगी------साबीत कर दिया जाएगा कि आप सरोज के यहाँ नहीं, बल्कि यहां आईं र्थी ।"

" ब्लैकमेल ?"

"यकीनन-ऐसी कंजूस भाभी को ब्लेकैमेल करना कोई जुर्म नहीं है, जिसने शादी से अाज तक ननद-देवर को कोई फिल्म नहीं दिखाई ।"

"कोई फिल्म कोई डिनर नहीं, धर पर वे इंतजार का रहे हौंगे । "

"कोई इतजार नहीं का रहा है, हमने फोन कर दिया था। "

"फोन ?"

नजदीक आती हुई रेखा ने कहा…"हां भाभी, फोन पर हमने कह दिया कि सरोज के यहाँ जाती भाभी हमें मिल गई और वे आज हमें फिल्म दिखा रही हैं । "

" ऐसा !"

" हां !"

 
सुचि हंस पड़ी बोली---"अच्छा, मैं फिल्म भी दिखाऊंगी और डिनर भी कराऊंगी, मगर कान पकड़ो,, कहो कि ऐसी शैतानी फिर कभी नहीं करोगे । "

अाज्ञाकारी वच्चो की तरह दौनों ने झट कान पकड़ लिए ।।

सुचि उनकी इस मासूम अदा पर खिलखिलाकर हंस, पड़ी और उन पर इतना प्यार आया उसे कि रेखा को खींचकर बाहों में भर लिया ।

" बन गया काम । " अमित बढ़बडाया ।

ड्रेसिंग टेबल के सामने खडी़ तैयार हो रही सुचि को देखकर हेमन्त ने कहा----पता नहीं तुम्हें आज ही हापुढ़ जाने की क्या जिद चढी है----अम्मा------पिताजी से मिलना ही तो है, एक दो दिन बाद मैं खुद साथ चलकर मिला लाता ।"

"फिर वही बात मै कोई बच्ची हूं क्या, जो अकली नहीं जा सकती ?" मांग भरती हुई सुची ने कहा ----" और फिर हापुड़ है कितनी दूर ?"

"वह सब तो ठीक है, मगर. . . !"

"मगर क्या हेमू ?"

"जाने क्यो, तुम्हे अकेली भेजने पर दिल मान नहीं रहा है-----अगर अाज फैक्टरी में एक इम्पोटेंट पार्टी न अा रही होती तो मैं खुद चलता । "

"तुम तो बेवजह फिक्र कर रहे हो हेमन्त ।" उसके नजदीक जाकर सुचि ने प्यार से कहा---"शादी से पहले मैंने सैकडों बार हापुढ़ और बुलंदशहर के बीच सफर क्रिया है । "

"वह शादी से पहले की बात थी।"

उसे बांडों में भरकर सुचि ने कहा…"अब क्या बात हो गई है ?"

"अब तुम किसीके दिलकी धड़कन हो ।"

"किसकैं ?" अर्थपूर्ण नजरें उसने हेमन्तकी आंखो में गड़ा दी ---उसे मुख्य मुद्दे से भटकाने के लिए सुचि ने अपनी आंखों में प्यार भरा और बहते हुए हेमन्त ने कहा----" म...मेरे । "

"आप भी तो सरताज हैं मेरे ।"

सुचि ने उसे सचमुच मुख्य मुद्दे से भटका दिया---घर में सभी को यह जानकारी हो चुकी थी कि सुचि अपने पीहर जा रही है, वह भी अकेली।

ललितादेवी ओऱ बिशम्बर गुप्ता नाखुश थे ।

विशम्बर गुप्ता ने कुछ न कहा---हां-- लतितादेवी ने समझाने की कोशिश की थी,, मगर -सुचि ने एक न सुनी--उसका निश्चय दृढ़ था ।

हेमन्त ने एक वारं को यह भी सोचा कि अमित ही उसके साथ चला जाए, मगर तभी उसे पता लगा कि आज अमित के कोलिज में वह जम्पिग और कार ड्राइविंग कप्पीटीशन है, जिसे जितने के लिए वह महीनो से तैयारी कर रहा था ।

"त. . . तू ठीक है ने बेटी,, कहीं चोट-वोट तो नहीं लगी है तुझे ? " पूछने के साथ ही पार्वती ने उसके सारे जिस्म को इस तरह टटोला जैसे केवल अपनी आंखों पर विश्वास न कर पा

रही हो ।

सुचि ने कुछ कहने के लिए अभी मुंह खोला ही था कि------

दीनदयाल ने पूछा----"उन जालिनों ने तुझे मारा-पीटा तो नहीं था सुचि ? "

"नहीं पापा, अभी तो ऐसा कुछ नहीं क्रिया, मगर… । "

"मगर......?"

"अगर मैं यहां से बीस हजार रुपए लेकर न गई तो… !"

दीनदयालके बूढे जिस्म का पोर पोर कांप उठा-----" तो ?"

"हेमन्त मुझे तलाक दे देगा ।" कहते वक्त सुचि की आंखें भर आईं, चेहरे के जरें--जर्रे पर असीम वेदना नजर आ रही थी---"धवके देकर मुझें घर से निकाल देगेे । ”

"किसने कहा ऐसा ?"

" म....मांजी ने !" सुचि की जुबान स्वत: कांप गई ।

पार्वती ने पुछा----"क्या हेमन्त से भी इस बारे में बात हुई थी ! "

" हां । "

"क्या कहा उसने ?"

"कहने लगे कि मेरे दो दो लाख के रिश्ते आ रहे थे-तू अपने पीहर से लाईं ही क्या हैं----" बीस हजार रुपए नहीं मिले तो चरित्रहीन का अरोप लगाकर तलाक दे दूंगा, दूसरी शादी कर लूंगा । "

" और वह इमानदार बनने बाला जज सब कुछ चुपचाप सुनता रहा ?"

"स..सब कुछ उन्ही की शह पर तो होरहा है, कहते हैं कि कचहरी में उनके इतने ताल्लुकात हैं कि तलाक चुटकियों में मिल जाएगा-नहीं मिला तो सैकडों बहुएं जलकर मर रही हैं----एक इसके मरने से हम पर पहाड नहीं टूट पड़ेगा--बड़े से बडा़ वकील मेरे हक में बिना फीस लिए लडेगा ।"

"अगर मेरी वेटी को हाथ भी लगाया तो कच्चा चबा जाऊंगा एकएक को । " कहते कहते दीनदयाल का चेहरा

अाग भभूका हो गया, वोला---"बोटी बीटी नोचकर कुलों के सामने डाल दूंगा !"

"खुद को संभालो मनोज के पापा ।"

" अरे क्या खाक संभालूं ?" दीनदयाल भडक उठे----"वे हमारी बेटी को तलाक देने की सोचें---ज़लाकर मार डालने तक की बात करें और तूं कहती है कि मैं होश में रहूं ?"

" हम बेटी वाले हैं ।"

" तो क्या अपनी बेटी हमने मार डालने के लिए दी है ----मैं कर्नल से बात करूगां ----उसी ने यह शादी कराई थी--पूछूंगा तो सही कि ऐसे हत्यारों को सौंपने के लिए क्या उसे मेरी हीं वेटी मिली थी ?"

 


बात बिगढ़ती देख सुचि जल्दी से बोली'--"न...नहीं पापा, कर्नल अंकल से इस बारे में कोई बात न करना ।"

"क्यों न करूं , उसी ने तो मुझें यहाँ फंसबाया है ? "

"अगर आपने ऐसा क्रिया तो वैसा ही होना निश्चित हो जाएगा जैसी धमकी वे लोग दे रहे हैं---- यह वे कभी बरदाश्त नहीं करेंगे कि कर्नल अंक्ल को इस बारे में एक लफ्ज भी पता लगे-----वे उनके रिश्तेदार हैं ओऱ कर्नल अंकल की नजरों में बाबूजी की बडी इज्जत है ।"

"उसी इज्जत का तो जनाजा निकालना है मुझें । "

अजीब से अावेश में पार्वती चीख पडी…"उनकी इज्जत का जनाजा निकले-न-निकले, मगर अपनी बेवकूफि्यों से अपनी बेटी का जनाजा तुम…जरूर निकलवा दोगे । "

"पार्वती !"

"मर गई पार्वती-कितनी वार कहा है कि जोश से नहीं, ,होश से काम लीजिए----बेटी वाले को हजार बातें सोचनी पडती हैं----अगर हमारी बेवकूफी से सुचि का बुरा हो गया तो अपने_कर्मों को पकडकर रोएंगे हम!"

"जो उन्हे करना है, वह तो करेगे ही मनोज की मां ।"

"कुछ नहीं करेगे पापा । सुचि बोली…"यक्रीन मानो, उतनी बडी बात नहीं है जितनी अाप सोच रहे हैं---उन्हें सिर्फ बीस हजार की भूख है, वह पूरी हो जाए तो सारी बाते खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी । "

" तू अभी नादान है बैटी, दुनिया, के अनुभवो से महरूम---- इंसान नामक जानवर के मुंह अगर एक बार पैसा नामक खून लग जाए तो वह 'आदमखोर' वन जाता है--बार-बार उसी खून की प्यास लगती है उसे ।"

"वस-अपनी ही कहे जाएंगें किसी दूसरे की तो यह सुनते ही नहीं है !" पार्वती बोली---" जरा सुचि की भी तो सुन लो हो सकता है कि सचमुच पैसे की जरूरत ने ही उनसे यह कदम उठवा दिया हो ?"

"तू बेवकूफी की बात कर रहीँ है मनोज का मां, अब भी का रहा हूं कि तू पछतायेगी---इसमें ही सब्र कर ही हमारी बेटी सही सलामत हमारे पास अा गई है, वस-अब हम इसे उस कसाई खाने में नहीं भेंजेगे।"

"शादी-शुदा लडकी को घर बैठाने से कहीं दुनिया चलती है ?"

सुचि कह उठी…"ऐसा मत कहो पापा-रहूंगी तो मैं वहीं ।"

"यह तू कह रही है ?"

" हां पापा वह मेरा ससुराल है और यह तालीम अा्प की ही दी हुई है कि शादी के बाद लड़की का घर ससुराल ही होता है ।"

"वह धर नहीं हत्यारों का अड्डा है । "

" प-- प्लीज पापा अगर अाप मेरी कोई मदद नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं , जो होगा उसे मैं अकेली भूगत लूंगी , मगर प्लीज, उन्हें गाली मत दीजिए----ऐसा कोई कदम उठाने के बारे में मत सोचिए कि जिससे मेरी मुसीबतें और, बढ जाऐ ।"

"क्या पागल होगई है तू ?"

" हां हां मैं पागल हो गई हूं ।" सुचि फूट फूट कर रो पडी ।

"मरने के लिए उस फांसीधर में जाने की जिद कर रही है ?"

" हालांकि ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन अगर मरना ही पडा तो मैं वहीं मरूगीं---मेरी अर्थी उसी घर से निकालेगी ----आपसे मदद मांगने की भूल अब कभी न होगी ।"

दीनदयाल अवाक् रह गया ।

पार्बती ने तड़पकर सुचि को अपने कलेजे से चिपका लिया, बोली-----" जब तक हममें सामर्थ्य है तब तक तेरी मदद क्यों नहीं करेंगें पगली ?"

"तो कह दीजिए पापा से,मेरे ससुराल बालों को गालियां न दें-क्रर्नल अंकल या उनमें से किसी से बीस हजार का जिक्र तक ना करें, वर्ना वह हो सकता है जिसके होने की फिलहाल कोई संभावना नहीं है ।"

"'सुन रहे हैं आप ? "

"सुन रहा हूं, सुना था कि शादी के बाद बेटी पराई हो जाती है, मगर यह पहली बार ही समझ में अाया कि इतनी ज्यादा पराई हो जाती है कि ससुराल वाले भले ही जल्लाद हों--पक्ष उसी का लेगी । "

"पापा फिर उन्हें गाली दे रहे हैं मम्मी'-उस घर में मैं एक पल भी नहीं ठहर सकती, जहाँ मेरे पति और सास ससुर को जल्लाद कहा जाए ।"

" सुन लिया बेटी सुन लिया-अपने होंठ सी लूगा मैं ।" कहने के साथ ही दीनदयाल अपने बूढे हाथों में चेहरा छुपाकर फूट फूटकर रो पड़ा ।

सुचि उसके नजदीक पहुंची बोली… सॉरी पापा, रोइए मत---गुस्से में मैं भी जाने क्या क्या कह गई-दरअसल बात उतनी नहीं है, जितने अाप डर गए हैं । "

"वे तेरी हत्या तक कीं बात करते हैं और तू कहती है कि------!"

" हत्या की बात करने और हत्या करने में बहुत फर्क होता है पापा ।"

" तुने अपने पत्र में आत्महत्या के बारे में लिखा था, वे हत्या ना भी करें --- लेकिन अगर उन्होंने ज्यादा परेशान किया तो ....?"

" ऐसा नहीँ होगा पापा, बीस हजार रूपए उन्हें मिल जाएंगे तो ऐसी नौबत ही नहीं जाएगी। "

" तूं सच कह रही है न ?"

" विल्कुल सच पापा ।’"

" मेरे सर पर हाथ रख और कह कि चाहे जैसे हालात हों, आत्महत्या के बारे में सोचेगी भी नहीं-हलातों के इस हद तक बिगढ़ने से पहले ही तू यहाँ चली अाएगी, मेरी कसम खाकर कह सुचि । "

कसम खाते वक्त सुचि तढ़पकर रो पडी ।

 


दीनदयाल ने उसे नन्ही मुनी गुडिया की तरह अपने अंक में भीच लिया ।

"तू अपने पापा की बातों से फिक्रमंद न हो वेटी ।" रात के वक्त अकेले कमरे में उसे पार्वती समझा रही थी---" हर पिता अपनी लडकी के बारे में ऐसा सुनकर होश गंवा सकता है, मगर ऐसे मामलों में कुछ करने से पहले हजार बार सोचेगा------चाहे कितना गुस्सा आजाए, मगर तब तक चुप ही रहेगा जब तक पानी सर से न गुजर जाए और तेरे पापा तो तुझे इतना प्यार करते हैं कि वैसा कुछ कर ही नहीं सकते, जिससे कल तेरा कुछ अहित होने की संभावना हो । "

" प्यार ही से तो मुझे डर है मां ।"

"केसा डर ?"

"कहीं मेरे प्यार में वे इस कदर पागल न हो जाएं कि कर्नल अंकल या मेरे ससुराल बालों से बीस हजार का जिक्र कर बैठे ।"

"उसकी तू फिक्र मत कर-मैं उन्हें ऐसा नहीं करने दूंगी ।

सुचि ने राहत की सांस ली।

पार्वती ने अागे कहा----"तू सारी बातें मुझे साफ-साफ बता-क्या तू ऐसा समझती है कि अगर बीस हजार रुपए नहीं ले जाएगी तो वे तेरी हत्या तक कर सकते हैं ?

" नहीं ।" सुचि ने बहुत संभलकर जवाब दिया ।

"तू सच कह रही है न ?"

"हा ।"

"हेमन्त तुझे तलाक दे सकता है ?"

"हां,ऐसा कर सकत्ते है वे।"

" कुछ देर तक पार्वती जाने क्या सोचती रही, फिर बोली---"बीस हजार का इंतजाम तो हमने कर लिया है, लेकिन अगर फिर कभी उन्होंने ऐसी मांग की तो शायद हम पूरी न कर सके।"

" मुझें पूरा यकीन है कि ऐसा नहीं होगा । "

"भगवान न करे तो अच्छा हेै----मगर अगर आगे कभी ऐसा होगया तो तू क्या करेगी ?"

"उनसे साफ कह दूंगी कि यहाँ से कोई और मदद संभव नहीं है । "

"नहीं तूं ऐसा नहीं करेगी ।"

"फिर ?"

"कुछ भी ही सुचि, लेकिन जब एक बार उनके असली चेहरे सामने आ चुके हैं तो तुझे सतर्क रहना 'पडे़गा-तेरा ऐसा जवाब तुझे वहां फंसा सकता है----उन हालातों में या तो फिर आत्महत्या के बारे में सोचेगी या...जैसा आजकल हो रहा है, बैसा करने की उनके दिमाग में भी अा सकती है और वेटी, उसे हममें से कोई भी सहन नहीं करपाएगा ।"

"अाप कहना क्या चाहती हैं?"

"अगर भविष्य में ऐसे हालात बनें तो जिस तरह आज आगई है, उसी तरह यहाँ आजाना-फिर जैसा उचित होगा हम करेंगे-हम सब कुछ सह सकते हैं, मगर तेरी जुदाई नहीं--कह कि तुं होशियार रहेगी है "

"ठीक मैं समझ गई । "

"अौर सुन , तेरे पत्र या आज तेरे आने की वास्तविक बजय की भनक मनोज को विल्कुल नहीं है---अतः उसके सामने ऐसी कोई बात न आए ।"

" क्यों ?"

"वह जवान है, इस उम्र में खून कुछ ज्यादा ही गर्म होता है----यह सुनकर वह पागल हो उठेगा कि ससुराल में उसकी वहन को परेशान किया जारहा है और जो कुछ पापा केवल

कहकर रह जाते हैं.वह बिना अागा-पीछा सोचे वह सब कुछ कर बैठेगा-----"यही सोचकर हमने उसे कुछ नहीं बताया । "

सुचि ने एक बार फिर राहत की सांस ली , बोली -----"मैं भी चाहती थी-भइया को यह सब बातें न ही पता लगें तो अच्छा है ।"

इस तरह, रात के लगभग तीन बजे तक पार्वती उसे दुनिया की ऊंच-नीच समझाती रही--सुचि बार-बार एक ही

बात पर जोर है रही थी…यह कि इन बीस हजार का जिक्र किसी भी रुप में बुलंदशहर बालों या उनसे संबंधित लोगों के सामने न जा अाए ।

हेमन्त के दूध में उसने नींद की गोलियां डाल दी थी और उन्ही के प्रभाव स्वरूप इस वक्त यह दुनिया जहान से बेखबर लिहाफ में दुबका सो रहा था ।

सुचि की आंखों में दूर तक नीद का नामोनिशान नहीं ।

फ्रिज पर रखी घडी की टिक-टिक बिल्कुल साफ सुनाई दे रही थी---कमरे में हरे रंग के नाइट बल्ब का प्रकाश पड़ा था ।

जाने किस आतंक से ग्रस्त सुचि के चेहरे पर रह रहकर हवाइयां उड़ने लगती----उस वक्त फ्रिज के ऊपर रखी घडी़ में ठीक दो बजे थे, जब सुचि बेड से उठी ।

तकिए के नीचे से एक टार्चं निकाली ।

नाइट गाउन दुरुस्त किया ।

दबे पांव बॉल्कनी में खुलने वाली खिडकी के समीप पहुंची-खिड़की खोलकर उसने टॉर्च का रुख बाहर की तरफ करके क्षणिक अंतराल से तीन बार अॉन-अॉ्फ की ।

इतना काम करके उसने खिडकी वंद करदी ।

वापस वेड के समीप आगई ।

 


वेड के नीचे से अपनी अटैची निकालकर खोली…सौ-सौ के नोटों की दो गड्डियां गाउन की जेब में डाली और अभी अटैची बंद करके वापस पलंग के नीचे खिसकाई ही थी कि ।

वॉल्कनी में खुलने वाले दरवाजे पर आहिस्ता से दस्तक हुई ।।

वह तेजी से परंतु दबे पांव दरवाजे तक पहुंची--बिना किसी तरह की आहट उत्पन्न किए चटकनी गिराकर उसने दरवाजा खोल दिया ।

सामने एक लम्बा और बलिष्ठ साया खडा था ।

बॉल्कनी में चांदनी छिटकी हुई थी-----उसके तन पर मैजूद फैल्ट हैट, ओवरकोट, गर्म पतलुन और चमकदार जुते साफ देखे जासकते थे।

गले में उसने एक मफलर डाले रखा था ।

वह बिल्ली की तरह कमरे के अंदर आ गया ।

सुचि ने धीमे से दरवाजा बंद करके चटकनीं चढाई, जबकि साया बेडरूम और ड्राइंगरूम के बीच वाले दरवाजे की तरफ बढ गया…ठीक इस तरह जैसे सारा कार्यक्रम पूर्व नियोजित हो ।

उसके यहां अाने के ढंग, से जाहिर था कि वह पहली बार नहीं आया है--दरवाजा खोलकर वह ड्राइंगरूम के अंधेरे में गुम हो गया ।

सुचि उसके पीछे लपकी ।

ड्राइगरूम में पहुंचकर उसने दरवाजा बंद कर लिया, चंटकनी चढा़कर पलटी ही कि 'क्लिक' की हल्की-सी आवाज के साथ एक लाइटर जला ।

लाइटर की लौ ने जिस सिगार के अग्र भाग को सुलगाया वह काले भद्दे और मोटे होठों के बीच फंसा हुआ था-ऱोशनी में धनी दाढी़ मूंछों वाला चौड़ा, रौबदार औऱ डरावना चेहरा चमका-साथ ही चमकी अफीम के नशे में धुत लाल लाल आंखें ।

लाइटर आँफ हो गया ।

सिगार का अग्र भाग जुगनू के समान चमकता रहा ।

सुचि ने हाथ बढाकर एक स्विच अॉन कर दिया-होल्डर में फंसा जीरो वॉट का लाल बल्ब मुस्करा उठा ।

उसकी लाल मुस्कान सारे कमरे में फैल गई ।

एक-दूसरे को देखने के लिए रोशनी पर्याप्त थी, सिगार में गहरा कश लगाने के बाद एकाएक साया गुर्राती-सी आवाज में बोला----" शायद इंतजाम हो गया है । "

"हां ।" सुचि बड़ी मुश्कि्ल से कह पाई ।

"लाओ । " उसने अपना चौड़ा और -भद्दा हाथ फैला दिया ।

सुचि ने थूक निगलकर अपने शुष्क पड़ गए हलक को तर करने की नाकाम चेष्टा के साथ कहा---" पहले फोटो । "

वह धीमे से हंसा ।

वाकी तो नहीं, मगर सोने का एक दांत जरूर चमृका---हंसी की आवाज इतनी कर्कश थी कि सुचि की आत्मा तक में उतरती चली गईं…रीढ़ की हड्डी में दोड़ गई थी मौत की सिहरन, बोला…"मेरा नाम 'मकड़ा' है और पहले भी कह चुका हूं कि मकड़ा अपने वादे से नहीं मुकरता । "

"पहले फोटो ।" सुचि ने अपना वाक्य दोहरा दिया ।

मकडा ने जेब से एक लिफाफा निकालकर सोफा सैट के बीच पडी सेंटर टेबल पर डाल दिया, उसे उठाने के लिए सुचि ने हाथ बढ़ाया ही था कि वह बोला-----"न......न...न...सुचि डार्लिग…यूं नहीं, तुम भी बीस हजार मेज पर डालो---- मेरा हाथ उन्हें उठाएगा, तुम्हारा हाथ लिफाफा ।"

सुचि ने दोनों गड्डियां जेब से निकालकर मेज पर डाल दीं ।

मकड़ा ने उन्हें उठाकर जेब में डाला और सुचि ने लिफाफे मैं भी मौजूद फोटोग्राफ्स को टटोलने के बाद कहा--नेगेटिव । "

" वे नहीं-हैं ।"

"क..क्यों ?" सुचि के गले मैं जैसे कुछ अटक गया । "

"क्यों से मतलब ? "

"न.". .नेगिटिव के बिना इन फोटुओं की क्या बैल्यू हैे, तुम जब चाहों, चाहे जितने पोजिटिव तैयार करा सकते हो । "

बहुत ही धूर्त एवं भयंकर मुस्कान मकड़ा के होंठों पर उभर अाई, दोनों हाथ ओवरकोट की जेब में डालकर टहलते हुए उसने कहा-----समझदार लड़की हो तुम, मैं सोच रहा था क्रि यह बात तुम्हें समझानी पडेगी । "

"क्या मतलब ?"

"मतलब यह सुचि डार्लिग कि नेगेटिव फिलहाल तुम्हें नहीं मिलेंगे ।"

"म...मगर तुमने वादा किया था कि...!"

"मैंने केवल पोजिटिव देने का वादा किया था, नेगेटिव नहीँ-सिर्फ बीस हजार में इतने कीमती नेगेटिव नहीं दिए जाते सुचि डार्लिंग ।"

सुचि के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गईं-चेहरा फ़क्क पड़ गया और बुत के समान खड़ी रह गई वह । मुंह से बोल न फूटा, जबकि जेबों में हाथं डाले मकडा दरवाजे की तरफ़ बढ गया ।

''ठ. ..ठहरो ।" वह बड्री मुश्किल से कह पाई ।

मकडा घूमा ।

सुचि ने अपनी आबाज को कठोर एवं कर्कश 'बनाने की हास्यास्पद कोशिश की…"नेगेटिव तुम्हें देने होगे मकड़ा, तुमने वादा क्रिया था ।"

"उनकी कीमत पचास हजार है ।"

"इतने पैसे है कहां से लाऊंगी ?" सुचि कसमसाकर चीख पड़ी ।।।

अपनी जेब थपथपाते हुए मकड़ा ने कहा…"जहाँ से ये लाईं हो ।"

"उनके पास भी पैसे नहीं हैं, इन्हीं का इंतजाम उन्होंने ना जाने किस -किस तरह किया है---मेरे पापा बहुत गरीवे हैं मकडा ।"

"बेटी के ससुरालियों की मांग पूरी करने के लिए एक बाप कुछ भी कर सकता है ।"

"वे कुछ नहीं कर सकेगे---उल्टे बात बिगड़ सकती है,उस बहाने के साथ अगर फिर उनसे मांग की गई तो वे इन लोगों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट कर सकते हैं, इनसे या कर्नल अंकल से इस मांग का जिक्र का सकते हैं-----ऐसा करने से इसी बार मैंने उन्हें बड़ी मुश्किल से रोका है । "

"तुम शायद यह भूल गई कि मैं क्या कर सकता हूं ?"

" म......मकड़ा ?"

“में ये फोटो हेमन्त, ललितादेबी और विशम्बर गुप्ता को ही नहीं, वल्कि तुम्हारे भाई और बाप को भी दिखा सकता हूं ---सारे वुलंदशहर में ही नहीं हापुड़ में भी वटवा सकता हूं, सोचो सुचि डार्लिंग । " मकड़ा का स्वर कठोरतम हो उठा---"जरां सोचो, अगर मैं ऐसा कर दूं तो क्या होगा-जो ससुराल बाले तुम्हें कांच की गुडिया की तरह संभालकर रखते हैं, वे उठाकर तुम्हें गटर में फेक देंगे-जिस बाप ने बीबी के जेवर वेच दिए वह तुम्हारा गला दबां देगा ।"

"न.. .नही-ऐसा मत कहो मकडा, ऐसा नहीं कर सकते-मैंनै तुम्हारी हर बात मानी है, तुम्हारे कहने से तुम्हारी मांग पूरी करने के लिए झूठा पत्र लिखकर यह पैसे लाई । "

"एक पत्र और लिख सकती हो।" मकडा ने कहा----" क्या लिखना है, वह पहले पत्र की तरह मैं ही तुम्हें डिक्टेट करूंगां।"

"पेैसे नहीं आएंगे मकडा, जिन तिलों में तेल ही नहीं उन्हें बार-बार मशीन में डालकर भी एक बूंद हासिल नहीं की जा सकती । "

"तव तो नेगेटिव तुम्हें मिलने का कोई रास्ता नहीं है ।"

"ऐसा मत कहो मकडा मैं तुम्हारे हाथ जोहती हूं---पैर पकड़ती हूं । " कहने के साथ ही सुचि ने झपटकर सचमुच उसके पैर पकड़ लिए----लिफाफा उसके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया, फोटो बिखर गए और उन फोटुओं में जो लडकी नंग्नावस्था में एक युवक के साथ नजर आ थी, वह मकड़ा के पैर पकड़कर गिड़गिड़ा उठी----मुझे माफ कर दो, मुक्त कर दो-मकड़ा---मुझसे गुनाह जरूर हुआा, मगर वह इतना बडा नहीं था-------------------------------बह सब होने से पहले मैं और संदीप ने एक मंदिर में गंधर्व विवाह किया था…हम अपने मां-बाप को शादी के बारे में बताने ही वाले थे कि कार एक्सीडेंट में मेरे संदीप की मृत्यु हो गई, खबर सुनते ही मैं अवाक् रह गई-कुछ समझ न अाया कि क्या करूं, क्या न करूं----अपने पति की मौत पर खुलकर मैं आंसू भी तो न बहा सकती थी----एक ही झटके में उस एक्सीडेंट ने मेरा सबकुछ लुट लिया । "

 
"अब संदीप के माता-पिता पास जाकर उन्हे हकीकत बताने से तुम्हें कुछ हासिल होने वाला न था, वे शायद तुम्हारी बकवास पर यकीन भी न करते और अपने मां-बाप से जिक्र करने का मतलब तो खुद पर उनका कहर करवा लेना था-सों, तुम चुप रह गई-किसी को, अपना राजदार न बनाया----संदीप की मौत पर छुप-छुपकर आंसू बहाए तुमने और फिर चुपचाप उस घर की बहू बन जाने के आलावा तुम्हारे पास कोई दूसरा रास्ता न था, जहाँ तुम्हारे मां-माप ने शादी कर दी ।"

"मैँ और कर भी क्या सकती थी मकड़ा, किसी से संदीप का जिक्र करने से फायदा भी क्या था !"

"तुम मर सकती थी, अपने संदीप के लिए आत्महत्या कर सकती थी ।"

सुचि बिलखती रह गई।

व्यंग्य में डूबे जहरीले स्वर में मकड़ा ने कहा---" 'मगर तुम ,ऐसा न कर सकी, आत्महत्या करने के लिए जिस साहस की जरूरत होती है वह साहस ही तुममे न था-गंधर्वं विवाह के ,बाद संदीप को सब कुछ सौंप देना उतना वड़ा गुनाह नहीं था जितना तुम्ने चुपचाप इस घर की बहू बनकर किया----उसकी कीमत तो तुम्हें चुकानी ही होगी सुचि डार्लिंग ----जो बीज तुमने बोये थे, उनकी फसल तो तुम्हें काटनी ही होगी !"

"अगर तुम इतना सब कुछ जानते हो तो यह भी जानते होगे कि मेरे पापा पचास हजार का इंतर्जाम नहीं कर सकत्ते-----मेरे पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं----यदि होता तो मैं तुम्हारी मांग जरूर पूरी करती ।"

"रास्ता तुम्हें मैं बता सकता है । "

सुचि ने सवालिया नजरों से उसकी तरफ देखा ।

बेरहम मकड़ा ने सिगार में एक गहरा कश लगाया बोला----" मैं होटल शॉर्प-वे के रूम नम्बर दो सौ पाच में रहता हूं, कल शाम सात बने तुम वहां आ जाओ । "

"क.....किसलिए ?"

"पचास हजार हासिल करने का रास्ता बताऊगा तुम्हें ।"

अफीम के नशे में धुत्त सुर्खं, आंखों में वहशियाना भाव लिए मकडा़ कहता चला गया---"याद रहे, सारी रात के लिए आना होगा तुम्हें ।"

""स.. सारी रात ? "

"हां ।"

"म.....मगर सारी रात के लिए भला मैं केसे आ सकती हूं? "

" वह तुम जानो ।"

सुचि गिड़गिड़ा उठी----"इतने निर्दयी न वनो मकड़ा, तुम्हारी भी कोई बहन, बेटी, मां या बीबी होगी-----तरस खाओ मुझपर, जरा सोचो-मै इसघर की बहु हूं----सारी रात घर से बाहर रहने के लिए क्या बहाना करूंगी? "

"सम्मानित घराने की बहू के अलावा तुम्हारी एक हकीकत इन फोटुओं में भी है सुचि डार्लिंग और इनके नेगेटिव हासिल करने तुम्हें वहाँ अाना पडेगा । कहने के वाद मकड़ा अपनी जीभ सोने से सोने के दांत को कुरेदने लगा था, सुचि के दिलो दिमाग मेँ चल रही थी एक जबरदस्त आंधी ।

मक़ड़ा चला गया ।

सुचि हेमन्त की बगल मेँ लेटी कमरे की छत को धूर रहीं थी अांखो में नीद आए भी कहाँ से…दिलो दिमाग में विचारों का तेज अंधड़ चल रहा था ।

मकड़ा के दिए हुए फोटुओं को राख कर वह फ्लश में बहा चुकी थी ।

कल पूरी रात घर से बाहर रहने की तरकीब भी उसे मकडा ने ही सुझाई थी और मदद करने का 'आश्वासन दिया था, वह जानती थी कि जिम्मेदारी उसने अपने सिर पर ली है, उसे पूरी करेगा----इस वक्त वह ये सोच रही थी ऐसा अाखिर कब तक चलेगा ?

मकड़ा ने पूरी रात लिए उसे होटल में क्यों बुलाया है ?

क्या चाहता है वह ?

"कहीं मेरी लाज के साथ खिलवाड़ तो नहीं ?'' यह बिचार दिमाग में अाते ही, शुचिं सिहर उठी, उसका चेहरा पसीने से नहा गया, किंतु अगले पल वही चेहरा कठोर होता चला गया-------

-------जबड़े सख्ती साथ भिच गये और भावावेश में वह बड़बड़ा उठी-----न----नहीं----मैँ ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगी, वह समझता क्या मुझें----गुप्त शादी के बाद जो कुछ हुआ वह केवल इसलिए हो गया था, क्योंकि मैं संदीप को अपना पति मानने लगी थी मैं इज्जतदार घराने की बहू हूं-----हेमन्त की अमानत हूं यदि फोटुओं के बल पंर यह मुझे ऐसी लड़की समझ रहा है तो मैं.......!"

" हा----हा-----हा । " उसके मस्तिष्क का एक कोना खिलखिलाकर हंस पडा, फिर उसने एक स्पष्ट अंदाज सुनी----" तो तु क्या कर सकेगी ?"

"म------मेँ खून कर दूगीं उसका । सुचि गुर्रा उठी ।

"ख----खून-----हा--हा---हा"--खून करेगी तू-----हा----हा-----हा । " दिमाग का वह कोना खिल्ली उड़ाने वाले भाव से हसता जा रहा था उसने हंसना बंद किया तो सुचि सोचती चली गई----" अगर मैं उसकी हत्या कर दूं तो क्या होगा ? "

सारे झंझट एक ही झटके में खत्म ।

जीते जी वह कमीना मेरा पीछा छोडने बाला नहीं है, ऐसे ब्लैकमेलर

अपने शिकार को सारी जिदगी जोंक की तरह चूसते रहते है-----पचास हजार तो क्या, पचास लाख में भी यह नेगेटिव देने वाला नहीं है ।"

मकडा सारी जिदगी नंगी तलवार वनकर मेरी गरदन पर लटका रहेगा ।

वह मेरी लाज से खेलेगा !

" केवल एक ही रास्ता है कि मैं उसकी हत्या कर दूं । “ सुचि जितना सोचती गई उतना ही ज्यादा उसे जंचता गया ।

वह कोई मनहुस क्षण था जब उसने निश्चय कर लिया कि मकड़ा की मौत ही उसके जीवन का सकून लोटा सकती है और वह दृढ़तापूर्वक बुदबुदा उठी----" हां मैं उस पाजी को मार दूंगी ---- खून कर दूंगी जालिम का ।"

दिमाग का वह कोना एक बार पुनः खिलखिला उठा----" खून करना क्या तू गाजर मुली काटने जितना आसान समझ रही है सुचि ?"

" मैं अपनी इज्जत के लिए कुछ भी कर सकती हूं ।"

" कैसे करेगी उस भैसें की हत्या ?"

"व...बाबूजी के रिवॉल्वर से ।" आवेश में वड़वडा़ती चली गई---"हाँ बाबूजी` पास लाइसेंस का रिवॉल्वर हेै-साइलेसर भी है उनके पास-वे उसे

अपनी सैफ़ में रखते हैं, मैं आसानी से हासिल कर सकती हूं और रिवॉ्ल्वर की एक गोली में वह भैसां लुढ़क जायेगा।"

"जरूर लुढक जाएगा, मगर उसके बाद तू खूद बच सकेगी बेवकूफ---------हत्यारे को तलाश करने में पुलिस एडी से चोटी तक का जोर लगा देती है, एक दिन तू पकडी जाएगी । "

"पुलिस को ख्वाब नही चमकेगा । " सुचि ने सोचा----मैं सेफ से बाबूजी का रिवॉल्वर चुराऊगीं---- होटल में दाखिल होने से निकलने तक चेहरे पर इस तरह साड़ी का पल्ला रखूंगी कि कोई ठीक से मेऱी शक्ल न देख सके-काउटर पर अपना नाम भी गलत बताऊंगी---कमरा नम्बर दो सौ पांच में जाकर गोली मार द्रुगी उस देत्या को-----

------साइलेंसर की वजह से कानोंकांन किसी को भनक न लगेगीे-----तब मैं तसल्ली से उसके सामाँनं और कमरे की तलाशी लूंगी -नेगेटिव केसाथ भी वह हर चीज अपने कब्जे में करलूंगी जिसके आधार पर पुलिस उसका सम्बध मुझसे जोड सके---

-----बस, वापस आकर बाबूजी का रिवॉ्ल्वर यथां-स्थान रख दूंगी-होटल के लोग केवल यह बयान दे सकेंगे कि मकडा की हत्या से पहले एक औरत वहाँ आई थी---- न ठीक से वे शक्ल बता सकेंगे न नाम-----पुलिस के पास यह पता लगाने के लिए कोई सूत्र नहीं होगा कि वह औरत कौन थी?"

सुचि सोचती चली गई ।

 
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