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‘‘देवयानी”
हर रोज़ की तरह कमलकांत ड्राइंग-रूम में बैठे, समाचार-पत्र पढ़ रहे थे। किशन चाय की प्याली लाया तो अख़बार से नज़र हटा, चाय की प्याली मुँह से लगा ली। एक घूँट चाय ले, फिर अख़बार पर नज़र डाली तो एक समाचार देख, उनके चेहरे का रंग उड़ गया। ख़बर में प्रसिद्ध समाज-सेवी अमरकांत की आकस्मिक मृत्यु की सूचना छपी थी। अख़बार हाथ से छूट गया। सिर सोफ़े की पीठ से टिका, आँखें मूद लीं। उनकी ये हालत देख, कुर्सियाँ साफ कर रहा किशन, कमलकांत के बड़े बेटे शशिकांत को बुला लाया।
‘‘पापा ……… क्या हुआ ? आप ठीक तो हैं ? किशन, पानी ला।‘‘
शशिकांत के घबराए स्वर से कमलकांत ने आँखें खोलीं। आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली।
‘‘पापा, आप कुछ बोलते क्यों नहीं ? ‘‘
‘‘अमर ……. हमारा अमर नहीं रहा, शशि।‘‘ मुश्किल से इतना कह, सामने पडा़ अख़बार शशि को थमा दिया।
सूचना पढ़, शशिकांत स्तब्ध रह गया घर में आग की तरह यह खबर फैल गई। अमर की माँ ढ़ाड़े मारकर रो पड़ी। रोते-रोते- अस्फुट शब्दों में किसी अभागिन कल्याणी को कोसती गईं।
ख़बर दो दिन पहले की थी, यानी अब तक अमर का नश्वर शरीर भी राख हो चुका होगा। किसने उसे मुखाग्नि दी होगी। हाँ, उसकी बेटी…..। शायद देवयानी नाम है, उसका, क्या उसी ने पिता की चिता को अग्नि दी होगी ? उस हाहाकार के बीच घर के बड़े बेटे शशिकांत के मन में एक सवाल उमड़ रहा था। अमर के न रहने पर दोनों मां-बेटी क्या करेंगी ? कहीं वे दोनों इस घर में तो नहीं आ जाएँगी, पर क्या माँ-पापा, उन्हें आश्रय देंगे ? पिछले दस वर्षो से अमर घर से निष्कासित है, इस बीच उसकी चर्चा करना भी निषिद्ध रहा। पुरानी कहानी, शशिकांत को अच्छी तरह याद है……
राय बहादुर कमलकांत को अपने उच्च कुल-गोत्र पर बड़ा अभिमान था। दो सुयोग्य बेटों के पिता के रूप में बिरादरी में उनका बहुत सम्मान था। बड़ा बेटा शशिकांत पी.डब्लू.डी में इंजीनियर था और जब छोटे बेटे अमर ने प्रशासनिक परीक्षा में सफलता पाई तो मानो उनके सपने आकाश छूने लगे। शशिकांत का विवाह एक नामी परिवार की इकलौती बेटी से हो चुका था और आज वो एक पुत्र रोहन और पुत्री रितु का पिता था। कलक्टर दामाद पाने के लिए धनी परिवार वालों की लाइन लग गई थी।
कमलकांत कुछ निश्चय कर पाते कि गाँव से वयोवृद्ध पिता की बीमारी की ख़बर आ गई। कमलकांत असमंजस में पड़ गए। पिता की गांव न छोड़ने की ज़िद से वह परिचित थे। उन्हें शहर ला पाना असंभव था। एक जरूरी काम की वजह से उनका गाँव जाना कठिन था। पिता की परेशानी का समाधान, अमर ने आसानी से कर दिया-
‘‘आप परेशान न हों, पापा। मेरी ट्रेनिंग शुरू होने में अभी एक महीने का वक्त है। मैं बाबा की सेवा के लिए चला जाऊँगा।‘‘
‘‘उन्हें क्या तू सम्हाल पाएगा, अमर?‘ कमलकांत शंकित थे।
‘‘क्यों नहीं, पापा। जब मैं छोटा था, बाबा ने मुझे सम्हाला, अब उन्हें मेरी ज़रूरत है। मैं उन्हें अच्छी तरह सम्हाल लूँगा।‘‘ अमर को अपने पर पूरा विश्वास था।
‘‘हाँ-हाँ, वो तो जानता हूँ, तू अपने बाबा का लाड़ला पोता है। ठीक कहता है, शायद तू ही उन्हें सम्हाल सकता है।‘‘ कमलकांत ने स्नेहपूर्ण स्वर में कहा।
पैतृक गांव में पहुँचे अमर की आंखों के सामने पुरानी मीठी यादों की तस्वीरें उभरती आईं। दादी जब तक जीवित रहीं, वे सब साल में दो बार होली-दीवाली पर गाँव जरूर आते। दादी का प्यार गाँव के जीवन में मिठास भर देता। पेड़ से कच्चे-पक्के आम-अमरूद तोड़ने का मज़ा ही और होता। माँ की मृत्यु के बाद कमलकान्त ने बहुत कोशिश की पिता।कोऽपने साथ शहर ले आएं, पर बाबा तैयार नहीं हुए। उस घर में पत्नी की स्मृतियाँ थीं, कमलकांत के जन्म से जुड़ी यादें थीं। अन्ततः पिता को पुराने सेवक रामदीन के सहारे छोड़, वे सपरिवार शहर आगए। अब कभी-कभी बाबा के पास कमलकांत हो आते। युवा होते पुत्रों के पास पढ़ाई का बोझ बढ़ता गया और गाँव जाने के लिए समय कम पड़ता गया।
अमर को देख, बाबा की आँखों में खुशी की चमक आगई।
‘‘चल, मेरी बीमारी ने मेरे अमर को तो बुला लिया।‘‘
‘‘क्यों बाबा, तुमने ही तो हमे भुला दिया है, वर्ना क्या शहर में हमारे साथ न रहते ?‘‘
तू नहीं समझेगा, रे। इस घर के कोने-कोने में पुरानी यादें हैं। उन्हें बटोर कर शहर कैसे जाऊँ, अमर ?‘‘ बाबा की आवाज़ भीग आई।
रामदीन ने अमर के ठहरने की पूरी व्यवस्था कर रखी थी। बाबा को दलिया और दवा खिलाने के बाद जब अमर बिस्तर पर लेटा तो याद आया, दादी रात में कहानियाँ सुनाया करती थीं। शशि को महाभारत और रामायण की कहानियाँ सुनना पसंद था, पर अमर मचल जाता-
‘‘हमें ये कहानियाँ नहीं सुननी हैं, हमें भगत सिंह की कहानी सुनाओ।‘‘
दादी प्यार से उसका सिर सहला, आशीर्वाद देतीं –
‘‘तू एक दिन ज़रूर भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस की तरह महान इंसान बनेगा।‘‘
अमर के सोच में एक मीठे गीत ने बाधा डाल दी। किसी लड़की की मीठी आवाज़ में गाए गीत ने, उसे सोच में डाल दिया – गाँव में कौन ऐसी सुर-साधना कर सकता है ? सुबह रामदीन से पूछने का निर्णय ले, अमर सो गया।
दूसरी सुबह बाबा कुछ अच्छा महसूस कर रहे थे। बुख़ार के साथ खांसी में भी कुछ कमी आई थी। अमर को रात का गीत याद हो आया। रामदीन से पूछा –
‘‘रामदीन रात में कोई गीत गा रहा था। गाँव में इतना अच्छा संगीत का ज्ञान होना ताज्जुब की बात है।‘‘
‘‘वो हमारे मास्टरजी की बेटी कल्याणी रही, भइया। बड़ी गुणी बिटिया है। बाबा से उसे बहुत प्यार है। तुम नहीं जानते, जब तब आकर बाबा के काम करके हमारी मदद करती है।‘‘ स्नेह से वृद्ध रामदीन का स्वर गदगद था।
‘‘क्या गांव में कोई नए मास्टरजी आए हैं, रामदीन?‘‘
‘‘अरे नहीं, भइया। वही मास्टरज़ी हैं, जो बाबा के कहने पर तुम दोनों भाइयों को पढ़ाने आया करते थे। तुम उनके आने पर छिप जाया करते थे।‘‘ रामदीन के झुर्रीदार चेहरे पर मुस्कान आ गई।
‘‘हां, मुझे पहाड़े याद करना अच्छा नहीं लगता था और मास्टरजी बार-बार पहाड़े रटाते थे। आज मास्टरजी से मिलकर आऊँगा।‘‘
‘‘ठीक है, पहले दूध पीकर नाश्ता कर लो। तुम्हारा मनपसंद हलवा बनाया है।‘‘
नाश्ता करने के बाद अमर गाँव का चक्कर लगाने निकल आया। बाबा आराम कर रहे थे, घर लौटने की जल्दी का सवाल नहीं था। शुरूआती जाड़ों की गुनगुनी धूप से गाँव नहाया हुआ था। मुग्ध हष्टि से गाँव की शोभा निहारता अमर काफ़ी दूर निकल आया। अचानक उसे प्यास महसूस होने लगी। चारों ओर नज़र दौड़ाने पर पानी कहीं नज़र नहीं आया। कहते हैं, कुंआ प्यासे के पास नहीं आता, पर उस दिन वो कहावत झूठी पड़ गई। सामने से दो युवतियाँ मटकों में पानी लिए आती दिखी थीं। सिर और कमर पर मटकों के साथ सहज रूप में चलते रहना, विस्मयकारी था। आगें बढ़ अमर ने अनुरोध कर ही डाला।
हर रोज़ की तरह कमलकांत ड्राइंग-रूम में बैठे, समाचार-पत्र पढ़ रहे थे। किशन चाय की प्याली लाया तो अख़बार से नज़र हटा, चाय की प्याली मुँह से लगा ली। एक घूँट चाय ले, फिर अख़बार पर नज़र डाली तो एक समाचार देख, उनके चेहरे का रंग उड़ गया। ख़बर में प्रसिद्ध समाज-सेवी अमरकांत की आकस्मिक मृत्यु की सूचना छपी थी। अख़बार हाथ से छूट गया। सिर सोफ़े की पीठ से टिका, आँखें मूद लीं। उनकी ये हालत देख, कुर्सियाँ साफ कर रहा किशन, कमलकांत के बड़े बेटे शशिकांत को बुला लाया।
‘‘पापा ……… क्या हुआ ? आप ठीक तो हैं ? किशन, पानी ला।‘‘
शशिकांत के घबराए स्वर से कमलकांत ने आँखें खोलीं। आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली।
‘‘पापा, आप कुछ बोलते क्यों नहीं ? ‘‘
‘‘अमर ……. हमारा अमर नहीं रहा, शशि।‘‘ मुश्किल से इतना कह, सामने पडा़ अख़बार शशि को थमा दिया।
सूचना पढ़, शशिकांत स्तब्ध रह गया घर में आग की तरह यह खबर फैल गई। अमर की माँ ढ़ाड़े मारकर रो पड़ी। रोते-रोते- अस्फुट शब्दों में किसी अभागिन कल्याणी को कोसती गईं।
ख़बर दो दिन पहले की थी, यानी अब तक अमर का नश्वर शरीर भी राख हो चुका होगा। किसने उसे मुखाग्नि दी होगी। हाँ, उसकी बेटी…..। शायद देवयानी नाम है, उसका, क्या उसी ने पिता की चिता को अग्नि दी होगी ? उस हाहाकार के बीच घर के बड़े बेटे शशिकांत के मन में एक सवाल उमड़ रहा था। अमर के न रहने पर दोनों मां-बेटी क्या करेंगी ? कहीं वे दोनों इस घर में तो नहीं आ जाएँगी, पर क्या माँ-पापा, उन्हें आश्रय देंगे ? पिछले दस वर्षो से अमर घर से निष्कासित है, इस बीच उसकी चर्चा करना भी निषिद्ध रहा। पुरानी कहानी, शशिकांत को अच्छी तरह याद है……
राय बहादुर कमलकांत को अपने उच्च कुल-गोत्र पर बड़ा अभिमान था। दो सुयोग्य बेटों के पिता के रूप में बिरादरी में उनका बहुत सम्मान था। बड़ा बेटा शशिकांत पी.डब्लू.डी में इंजीनियर था और जब छोटे बेटे अमर ने प्रशासनिक परीक्षा में सफलता पाई तो मानो उनके सपने आकाश छूने लगे। शशिकांत का विवाह एक नामी परिवार की इकलौती बेटी से हो चुका था और आज वो एक पुत्र रोहन और पुत्री रितु का पिता था। कलक्टर दामाद पाने के लिए धनी परिवार वालों की लाइन लग गई थी।
कमलकांत कुछ निश्चय कर पाते कि गाँव से वयोवृद्ध पिता की बीमारी की ख़बर आ गई। कमलकांत असमंजस में पड़ गए। पिता की गांव न छोड़ने की ज़िद से वह परिचित थे। उन्हें शहर ला पाना असंभव था। एक जरूरी काम की वजह से उनका गाँव जाना कठिन था। पिता की परेशानी का समाधान, अमर ने आसानी से कर दिया-
‘‘आप परेशान न हों, पापा। मेरी ट्रेनिंग शुरू होने में अभी एक महीने का वक्त है। मैं बाबा की सेवा के लिए चला जाऊँगा।‘‘
‘‘उन्हें क्या तू सम्हाल पाएगा, अमर?‘ कमलकांत शंकित थे।
‘‘क्यों नहीं, पापा। जब मैं छोटा था, बाबा ने मुझे सम्हाला, अब उन्हें मेरी ज़रूरत है। मैं उन्हें अच्छी तरह सम्हाल लूँगा।‘‘ अमर को अपने पर पूरा विश्वास था।
‘‘हाँ-हाँ, वो तो जानता हूँ, तू अपने बाबा का लाड़ला पोता है। ठीक कहता है, शायद तू ही उन्हें सम्हाल सकता है।‘‘ कमलकांत ने स्नेहपूर्ण स्वर में कहा।
पैतृक गांव में पहुँचे अमर की आंखों के सामने पुरानी मीठी यादों की तस्वीरें उभरती आईं। दादी जब तक जीवित रहीं, वे सब साल में दो बार होली-दीवाली पर गाँव जरूर आते। दादी का प्यार गाँव के जीवन में मिठास भर देता। पेड़ से कच्चे-पक्के आम-अमरूद तोड़ने का मज़ा ही और होता। माँ की मृत्यु के बाद कमलकान्त ने बहुत कोशिश की पिता।कोऽपने साथ शहर ले आएं, पर बाबा तैयार नहीं हुए। उस घर में पत्नी की स्मृतियाँ थीं, कमलकांत के जन्म से जुड़ी यादें थीं। अन्ततः पिता को पुराने सेवक रामदीन के सहारे छोड़, वे सपरिवार शहर आगए। अब कभी-कभी बाबा के पास कमलकांत हो आते। युवा होते पुत्रों के पास पढ़ाई का बोझ बढ़ता गया और गाँव जाने के लिए समय कम पड़ता गया।
अमर को देख, बाबा की आँखों में खुशी की चमक आगई।
‘‘चल, मेरी बीमारी ने मेरे अमर को तो बुला लिया।‘‘
‘‘क्यों बाबा, तुमने ही तो हमे भुला दिया है, वर्ना क्या शहर में हमारे साथ न रहते ?‘‘
तू नहीं समझेगा, रे। इस घर के कोने-कोने में पुरानी यादें हैं। उन्हें बटोर कर शहर कैसे जाऊँ, अमर ?‘‘ बाबा की आवाज़ भीग आई।
रामदीन ने अमर के ठहरने की पूरी व्यवस्था कर रखी थी। बाबा को दलिया और दवा खिलाने के बाद जब अमर बिस्तर पर लेटा तो याद आया, दादी रात में कहानियाँ सुनाया करती थीं। शशि को महाभारत और रामायण की कहानियाँ सुनना पसंद था, पर अमर मचल जाता-
‘‘हमें ये कहानियाँ नहीं सुननी हैं, हमें भगत सिंह की कहानी सुनाओ।‘‘
दादी प्यार से उसका सिर सहला, आशीर्वाद देतीं –
‘‘तू एक दिन ज़रूर भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस की तरह महान इंसान बनेगा।‘‘
अमर के सोच में एक मीठे गीत ने बाधा डाल दी। किसी लड़की की मीठी आवाज़ में गाए गीत ने, उसे सोच में डाल दिया – गाँव में कौन ऐसी सुर-साधना कर सकता है ? सुबह रामदीन से पूछने का निर्णय ले, अमर सो गया।
दूसरी सुबह बाबा कुछ अच्छा महसूस कर रहे थे। बुख़ार के साथ खांसी में भी कुछ कमी आई थी। अमर को रात का गीत याद हो आया। रामदीन से पूछा –
‘‘रामदीन रात में कोई गीत गा रहा था। गाँव में इतना अच्छा संगीत का ज्ञान होना ताज्जुब की बात है।‘‘
‘‘वो हमारे मास्टरजी की बेटी कल्याणी रही, भइया। बड़ी गुणी बिटिया है। बाबा से उसे बहुत प्यार है। तुम नहीं जानते, जब तब आकर बाबा के काम करके हमारी मदद करती है।‘‘ स्नेह से वृद्ध रामदीन का स्वर गदगद था।
‘‘क्या गांव में कोई नए मास्टरजी आए हैं, रामदीन?‘‘
‘‘अरे नहीं, भइया। वही मास्टरज़ी हैं, जो बाबा के कहने पर तुम दोनों भाइयों को पढ़ाने आया करते थे। तुम उनके आने पर छिप जाया करते थे।‘‘ रामदीन के झुर्रीदार चेहरे पर मुस्कान आ गई।
‘‘हां, मुझे पहाड़े याद करना अच्छा नहीं लगता था और मास्टरजी बार-बार पहाड़े रटाते थे। आज मास्टरजी से मिलकर आऊँगा।‘‘
‘‘ठीक है, पहले दूध पीकर नाश्ता कर लो। तुम्हारा मनपसंद हलवा बनाया है।‘‘
नाश्ता करने के बाद अमर गाँव का चक्कर लगाने निकल आया। बाबा आराम कर रहे थे, घर लौटने की जल्दी का सवाल नहीं था। शुरूआती जाड़ों की गुनगुनी धूप से गाँव नहाया हुआ था। मुग्ध हष्टि से गाँव की शोभा निहारता अमर काफ़ी दूर निकल आया। अचानक उसे प्यास महसूस होने लगी। चारों ओर नज़र दौड़ाने पर पानी कहीं नज़र नहीं आया। कहते हैं, कुंआ प्यासे के पास नहीं आता, पर उस दिन वो कहावत झूठी पड़ गई। सामने से दो युवतियाँ मटकों में पानी लिए आती दिखी थीं। सिर और कमर पर मटकों के साथ सहज रूप में चलते रहना, विस्मयकारी था। आगें बढ़ अमर ने अनुरोध कर ही डाला।