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पुष्पा का पुष्प

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लेखक:-लीलाधर

सुबह की स्वच्छ ताजी हवा में गुलाब के ताजा फूलों की खुशबू फैल रही थी। शहर के कोलाहल से दूर प्रदूषणमुक्त शांत वातावरण में फूलों की सुगंधभरी ताजी हवा में घूमते हुए मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। हर तरफ गुलाब फैले थे भाँति भाँति के- लाल, गुलाबी, काले, बैंगनी, उजले… !

मैं उनके कलेक्शन की मन ही मन तारीफ करता क्यारियों के बीच काँटों से सावधानी से बचता घूम रहा था। पुष्पा थोड़ी दूर पर बाड़ के पास फूल तोड़ रही थी।

पुष्पा के पिताजी का बड़ा सा फूलों का बाग था, शहर के नजदीक ही एक गाँव में। वे फूलों की खेती करते थे। मैं छुट्टियों में वहाँ घूमने आया था। पुष्पा ने मुझे बुलाया था, ”आकर कभी मेरा बाग देखो। बहुत अच्छा लगेगा।”

उसने गलत नहीं कहा था। मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। और फूलों की क्यारियो के बीच स्वयं फूल-सी खिली पुष्पा भी मुझे कम अच्छी नहीं लग रही थी। मैं भौंरे-सा उसके आकर्षण में घूम रहा था।

मैं घूमता घूमता उसके पास पहुँचा। वह कुशलता से काँटों से बचती हुई फूलों को डंठल से नीचे पकड़कर कैंची से काट लेती। मुझे पास आता देखकर उसके चेहरे पर एक गर्व और खुशी का भाव चला आया।

“बड़ी कुशलता से तोड़ती हो। काँटे नहीं चुभते?”

वह कुछ नहीं बोली। बस गर्व से मुस्कुराई।

मुझे उसका घमण्ड अच्छा लगा। काश, मैं इसे ही तोड़ लेता।

“मैं भी तोडूँ?”

“काँटे चुभेंगे !” उसकी आवाज में गर्व था।

“मुझे परवाह नहीं !”

“अच्छा!” उसने मुझे देखकर भौंहें उठाई,”लेट मी सी?” उसने अंग्रेजी में कहा। कैंची नहीं दी।

मैंने हाथ बढ़ाया और बहुत बचाकर एक डंठल को तोड़ने की कोशिश की। डंठल टूटकर टेढ़ी हो गई मगर डाल से अलग नहीं हुई। उसे अलग करने के लिए टूटी डंठल को घुमाया।

“जानते हो !” उसने कहा।

थोड़ी कोशिश से डंठल टूट गई मगर हाथ में काँटों की खरोंच लग ही गई। एक-दो पंखुड़ियाँ भी झटकने में टूट गईं। मैंने फूल उसके हाथ में दे दिया।

“देखा?” उसने खरोंच में जमा होते खून की बूंद को देखते हुए कहा।

उसने टोकरी में से छोटे-से डिब्बे से डेटाल भीगा रूई का फाहा निकाला और उससे खरोंच का लहू पोंछते हुए दबा दिया। वह डेटाल भीगा फाहा छोटी सी शीशी में साथ रखती थी। मैं उसके झुके सिर को, एक से मेरा हाथ पकड़े दूसरे से जख्म पर रुई घुमाते उसके गोरे नाजुक हाथों को देखता रहा।

“मगर …” मैंने बात आधी छोड़ दी। उसने उत्सुकता से मेरी ओर देखा।

“मैं तो एक खास फूल तोड़ना चाहता हूँ।” मैंने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए पूरा किया।

उसके चेहरे पर क्षणमात्र के लिए एक अजब-सा भाव आया। बात को कुछ ताड़ती हुई-सी प्रतीत हुई। मैंने उसके प्रश्नवाचक चेहरे पर से दृष्टि हटाकर सर से पाँव तक नजर दौड़ाई और उसकी आँखों में देखते हुए आगे कहा,”अगर वह इजाजत दे तो !”

वह समझ गई। मगर लजाकर या घबराकर दृष्टि नहीं हटाई। वह निडर थी। मुझे उसकी यह बात अच्छी लगती थी।

“कितने फूल तोड़े हैं अब तक?” उसने कुछ ठहर कर पूछा।

“झूठ नहीं बोलूँगा ! सिर्फ एक ! मगर यह फूल बहुत खास है।”

उसे झूठ से नफरत थी। सच सुनना पसंद करती थी। कड़वा हो तो भी। फिर उसी कॉलेज में तो पढ़ती थी।

“उससे भी यही कहा होगा, “यह फूल बहुत खास है।” वह कुछ मजा लेती, कुछ मजाक उड़ाती बोली,”फुसलाने का पुराना तरीका है।”

“नहीं पुष्पा, यह सच नहीं। मैं पहले भी झूठ बोल सकता था मगर ऐसा नहीं किया। सचमुच यह फूल बेहद खास है। औरों से अलग ! दुर्लभ है।”

प्रशंसा से वह प्रसन्न हुई। कुछ मूड में आ गई।

“क्या खास है इसमें?” कुछ मजा लेते हुए बोली।

वह गर्व भरी नजरों से फूल को देखते हुए उसे अपनी चुटकी में घुमा रही थी, अपनी तारीफ सुनना चाह रही थी। मैंने अपना दाँव खेला।

“यह अगर उसकी इजाजत मिले तभी बताऊँगा।”

“इजाजत है !” उसने बात को हँसी में उड़ाते हुए कहा।

“सच? क्या मुझे फूल तोड़ने की इजाजत है?” मैंने भी उसी अंदाज में उसके टालने की कोशिश को व्यर्थ करते हुए कहा।

अब वह मुश्किल में थी। इस बात को हँसी में उड़ाना कठिन था। वह गंभीर हो गई।

यही सही समय था अगला वार करने का, मुझे उसके मजबूत स्वभाव का भरोसा था, मैंने उसके हाथ के फूल पर अपनी हथेली रखकर दूसरे हाथ से उसकी हथेली को नीचे से सहारा देते हुए कहा,”सच पुष्पा। यकीन मानो। यह साधारण नहीं। इसका सौंदर्य, इसका रूप, इसकी महक, इसका सब कुछ अतुलनीय है। यह बहुत भाग्य से पाने लायक है।”

उस पर प्रशंसा का असर हो रहा था। उसे तारीफ अच्छी लगती थी। मुस्कुराने की कोशिश की।

“क्या करोगे इसका? तुम इसे सूंघकर छोड़ दोगे। मैं ऐसी … ” बोलते बोलते रुक गई।

अनजाने में ही वह फूलों के बहाने को छोड़कर सीधे अपने बारे में बोलने लगी थी।

मैंने अपने दिल पर हाथ रखते हुए कहा,”भगवान कसम, दिल में बसा कर रखूँगा।”

“यह काफी नहीं।”

मैंने उसके हाथ से गुलाब का फूल लेकर अपनी कमीज के बटन में टाँक लिया।

 
“इसे सदा के लिए अपनी जिन्दगी में जगह दूँगा।”

थोड़ी देर के लिए चुप्पी छाई रही।

“इतनी दूर जाने की जरूरत नहीं। वह सम्भलती हुई बोली।

मैं जानता था वह मुझे पसंद करती थी। और लड़कों को उतना भाव नहीं देती थी जितना मुझे।मगर उसे प्यार कह सकना मुश्किल था। शादी के निर्णय के लिए सिर्फ प्यार जरूरी होता है ऐसा न तो मैं मानता था न वह। मगर मैं उसे पाने के लालच में काफी आगे का वादा कर गया था। वह मुझे अच्छी लगती थी, बल्कि बहुत अच्छी लगती थी। तेज थी। सुंदर भी बहुत थी। गोरा रंग, खड़ी लम्बी नाक, लाल भरे होंठ, छरहरी। चुस्त जींस शर्ट में उसकी गठन खुलकर बिखरती। लम्बी, सीधी चलने वाली। सक्रिय रहती। कई लड़कियाँ जिन संकोचों में खुद को बांधे रखती हैं उनसे वह अलग थी। उसके साथ बात करने में मजा आता था। लगता था ऐसी उत्साही साथी मिले तो क्या बात है। कभी रात की तनहाई में अपने हाथ से करता तो उसकी कल्पना करता हुआ।

“थोड़ी दूर की इजाजत है?” मैंने फिर पूछा।

वह सिर झुकाकर हँसी,”तुम बुद्धू हो। कुछ समझते नहीं !”

मुझे गुदगुदी हुई। आखिरकार यह भी लड़की ही है, खुद कैसे कहेगी।

उसकी स्वीकृति मुझे विभोर कर गई। उम्मीद थी, मगर विश्वास नहीं था। लगा जन्नत मिल गई।

“तुम और लड़कियों की तरह नहीं हो, तुमसे सुनना अच्छा लगता है।”

“ओके ! मगर इसका मतलब संकेत समझने में नासमझी तो नहीं होती है।”

यह थी वो ! बोल सकती थी। मैं उसकी इसी खूबी पर तो मरता था।

“ठीक है।” मैंने सिर झुकाते हुए कहा, “मैं नतमस्तक हुआ।”

“खूब !” उसने मेरी उस अदा का आनन्द लिया,”मेरे सामने बार बार होना पड़ेगा। सोच लो?”

तो क्या वह भी कहीं अवचेतन में मुझसे स्थायी रूप से जुड़ने के लिए सोच रही है? बार बार झुकने से क्या मतलब है?

“मैं तो सदा से हूँ।” मैंने कहा।

“मस्का मत लगाओ।” अब वह ऊपर हो रही थी।

झुके झुके मेरे दिमाग में एक खयाल आया। पुष्पा के लायक जवाब होगा।

“बताऊँ, और कितना झुकने की तमन्ना है?”

“कितना?” वह मेरे गंतव्य को समझ नहीं पाई थी मैं उसे कहाँ ले जाना चाहता था।

मैं और झुका। उसके गले के नस की एक नीली सी छाया नीचे जाकर खो रही थी। उठानों के नीचे कुछ धड़क रहा था। दुपट्टा नहीं ओढ़ती थी।

“बस?” वह इसे खेल समझ रही थी।

मैं और झुका। इस बार उसके स्तन मेरे सामने थे। फ्रॉक में उभरे हुए। उनकी नोकों के बहुत हल्के उभार का पता चल रहा था।

“बस?” मुझे पूरा झुकाने के चक्कर में वह बेखबर चुग्गा खाती कबूतरी की तरह जाल की तरफ बढ़ी जा रही थी।

मैं और झुका। उरोजों के नीचे की ढलान, समतल पेट और उससे नीचे उसकी संकरी कमर। फ्रॉक के कपड़े में लिपटी हुई। नीचे दोनों तरफ फैलते कूल्हे।

“गो ऑन।” वह जीत के नशे में गाफिल थी।

अब मैं बैठ गया, घुटनों पर। मेरा गंतव्य आ गया था जिसके सपने मैं बार बार देखता था। मैंने घुटनों पर बैठे सिर झुकाया। वह समझी कि अब मैं नमाज की मुद्रा में दोजानूँ होऊँगा। सोच रही थी मैं अंतत: साष्टांग बिछ जाउंगा। मैंने उसके नितम्बों को बाँहों में घेरा और कमर के नीचे उस स्थान पर जहाँ भीतर जांघों का संधिस्थल था उसमें मुँह घुसाकर जोर से चूम लिया। मेरे होटों पर और नाक पर कपड़ों की सलवटों के नीचे मुलायम गद्देदार मांसल उभार महसूस हुआ।

वह ठगी-सी खड़ी रही गई। उसके मुँह से बस आश्चर्य में निकला,”अरे !”

मैंने जहाँ चुम्बन की मुहर लगाई थी उस स्थान को देखते हुए कहा, “यह फूल सबसे अनूठा है। कुदरत का सबसे बेहतरीन करिश्मा। इसके सामने सब फूल बेकार हैं।”

वह चुप थी। एक आघात में। इतने बड़े दुस्साहस की उम्मीद नहीं की थी। मुझे लगा वह डाँटेगी और चल देगी। मगर मुझे उसके मेरे प्रति आकर्षण का भरोसा भी था। तभी मैं इतनी हिम्मत कर गया था। उसके चेहरे का भाव थोड़ा नरम पड़ा। उसमें सम्हलने की क्षमता बेशुमार थी। हाथों से मेरा सिर दूर हटाते हुए बोली,”यह क्या कर रहे हो?”

“वही जो मैं बाद में बहुत अच्छे से करूँगा।” उसे हराने के बाद अब मैं हावी होने की स्थिति में था। वह अभी तक अपनी तेज तर्रारी और तेज दिमाग को ही बहुत भाव देती आई थी।

वह कुछ देर चुप रह गई।

“छी: ! तुम्हें गंदा नहीं लगता?”

मैं उठा। उसके हाथ से गूलाब का फूल ले लिया। उसे चुटकियों में घुमाते हुए धीरे धीरे बोला,”मैं उस सबसे बेशकीमती फूल से सबसे खास व्यव्हार करूँगा। उसमें डूबकर प्यार करूंगा। उसकी पंखुड़ियाँ खोलूंगा- ऐसे।”

मैंने उंगलियों से गुलाब की धीरे धीरे उसकी पंखुड़ियाँ फैलाईं,”फिर उसे चूमूंगा, ऐसे, यहाँ।”

मैंने फैली पंखुड़ियों के बीच मुँह घुसाकर उसके भीतर गर्भस्थल को चूमा, चूमने की चुसकारी की जोर की आवाज की।

“बड़ी हिम्मत है !”
 
“और बताऊँ, क्या करूँगा?” पता नहीं कहाँ से आज मेरी हिम्मत और अक्ल दोनों काम कर रहे थे। आज मैं उसे आश्चर्य पर आश्चर्य दे रहा था। मैंने बाड़ से बबूल का एक सूखा काँटा तोड़ा और उसे फूल के गर्भ में चुभो दिया।

वह शर्म से लाल हो गई।

“अब बताओ।” मैंने कहा। जैसे पूछ रहा होऊँ,”कैसा रहा?”

मगर जो शर्म से सिकुड़ जाए वह पुष्पा क्या। वह तो बराबर का जवाब देने में यकीन रखती थी। उसे अपनी जवाब देने की क्षमता का यकीन था। उसने काँटे को फूल से निकाला जिसका नुकीला सिरा फूल के रस में भीगा हुआ था। उसने उसे धीरे धीरे उठाया और मुँह में लेकर चूस लिया।

मैं उसे देखता रह गया।

सुबह की स्वच्छ ताजी हवा में गुलाब के ताजा फूलों की खुशबू फैल रही थी। शहर के कोलाहल से दूर प्रदूषणमुक्त शांत वातावरण में फूलों की सुगंधभरी ताजी हवा में घूमते हुए मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। हर तरफ गुलाब फैले थे भाँति भाँति के- लाल, गुलाबी, काले, बैंगनी, उजले… !

मैं उनके कलेक्शन की मन ही मन तारीफ करता क्यारियों के बीच काँटों से सावधानी से बचता घूम रहा था। पुष्पा थोड़ी दूर पर बाड़ के पास फूल तोड़ रही थी।

पुष्पा के पिताजी का बड़ा सा फूलों का बाग था, शहर के नजदीक ही एक गाँव में। वे फूलों की खेती करते थे। मैं छुट्टियों में वहाँ घूमने आया था। पुष्पा ने मुझे बुलाया था, ”आकर कभी मेरा बाग देखो। बहुत अच्छा लगेगा।”

उसने गलत नहीं कहा था। मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। और फूलों की क्यारियो के बीच स्वयं फूल-सी खिली पुष्पा भी मुझे कम अच्छी नहीं लग रही थी। मैं भौंरे-सा उसके आकर्षण में घूम रहा था।

मैं घूमता घूमता उसके पास पहुँचा। वह कुशलता से काँटों से बचती हुई फूलों को डंठल से नीचे पकड़कर कैंची से काट लेती। मुझे पास आता देखकर उसके चेहरे पर एक गर्व और खुशी का भाव चला आया।

“बड़ी कुशलता से तोड़ती हो। काँटे नहीं चुभते?”

वह कुछ नहीं बोली। बस गर्व से मुस्कुराई।

मुझे उसका घमण्ड अच्छा लगा। काश, मैं इसे ही तोड़ लेता।

“मैं भी तोडूँ?”

“काँटे चुभेंगे !” उसकी आवाज में गर्व था।

“मुझे परवाह नहीं !”

“अच्छा!” उसने मुझे देखकर भौंहें उठाई,”लेट मी सी?” उसने अंग्रेजी में कहा। कैंची नहीं दी।

मैंने हाथ बढ़ाया और बहुत बचाकर एक डंठल को तोड़ने की कोशिश की। डंठल टूटकर टेढ़ी हो गई मगर डाल से अलग नहीं हुई। उसे अलग करने के लिए टूटी डंठल को घुमाया।

“जानते हो !” उसने कहा।

थोड़ी कोशिश से डंठल टूट गई मगर हाथ में काँटों की खरोंच लग ही गई। एक-दो पंखुड़ियाँ भी झटकने में टूट गईं। मैंने फूल उसके हाथ में दे दिया।

“देखा?” उसने खरोंच में जमा होते खून की बूंद को देखते हुए कहा।

उसने टोकरी में से छोटे-से डिब्बे से डेटाल भीगा रूई का फाहा निकाला और उससे खरोंच का लहू पोंछते हुए दबा दिया। वह डेटाल भीगा फाहा छोटी सी शीशी में साथ रखती थी। मैं उसके झुके सिर को, एक से मेरा हाथ पकड़े दूसरे से जख्म पर रुई घुमाते उसके गोरे नाजुक हाथों को देखता रहा।

“मगर …” मैंने बात आधी छोड़ दी। उसने उत्सुकता से मेरी ओर देखा।

“मैं तो एक खास फूल तोड़ना चाहता हूँ।” मैंने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए पूरा किया।

उसके चेहरे पर क्षणमात्र के लिए एक अजब-सा भाव आया। बात को कुछ ताड़ती हुई-सी प्रतीत हुई। मैंने उसके प्रश्नवाचक चेहरे पर से दृष्टि हटाकर सर से पाँव तक नजर दौड़ाई और उसकी आँखों में देखते हुए आगे कहा,”अगर वह इजाजत दे तो !”

वह समझ गई। मगर लजाकर या घबराकर दृष्टि नहीं हटाई। वह निडर थी। मुझे उसकी यह बात अच्छी लगती थी।

“कितने फूल तोड़े हैं अब तक?” उसने कुछ ठहर कर पूछा।

“झूठ नहीं बोलूँगा ! सिर्फ एक ! मगर यह फूल बहुत खास है।”

उसे झूठ से नफरत थी। सच सुनना पसंद करती थी। कड़वा हो तो भी। फिर उसी कॉलेज में तो पढ़ती थी।

“उससे भी यही कहा होगा, “यह फूल बहुत खास है।” वह कुछ मजा लेती, कुछ मजाक उड़ाती बोली,”फुसलाने का पुराना तरीका है।”

“नहीं पुष्पा, यह सच नहीं। मैं पहले भी झूठ बोल सकता था मगर ऐसा नहीं किया। सचमुच यह फूल बेहद खास है। औरों से अलग ! दुर्लभ है।”

प्रशंसा से वह प्रसन्न हुई। कुछ मूड में आ गई।

“क्या खास है इसमें?” कुछ मजा लेते हुए बोली।

वह गर्व भरी नजरों से फूल को देखते हुए उसे अपनी चुटकी में घुमा रही थी, अपनी तारीफ सुनना चाह रही थी। मैंने अपना दाँव खेला।

“यह अगर उसकी इजाजत मिले तभी बताऊँगा।”

“इजाजत है !” उसने बात को हँसी में उड़ाते हुए कहा।

“सच? क्या मुझे फूल तोड़ने की इजाजत है?” मैंने भी उसी अंदाज में उसके टालने की कोशिश को व्यर्थ करते हुए कहा।

अब वह मुश्किल में थी। इस बात को हँसी में उड़ाना कठिन था। वह गंभीर हो गई।

यही सही समय था अगला वार करने का, मुझे उसके मजबूत स्वभाव का भरोसा था, मैंने उसके हाथ के फूल पर अपनी हथेली रखकर दूसरे हाथ से उसकी हथेली को नीचे से सहारा देते हुए कहा,”सच पुष्पा। यकीन मानो। यह साधारण नहीं। इसका सौंदर्य, इसका रूप, इसकी महक, इसका सब कुछ अतुलनीय है। यह बहुत भाग्य से पाने लायक है।”

 
उस पर प्रशंसा का असर हो रहा था। उसे तारीफ अच्छी लगती थी। मुस्कुराने की कोशिश की।

“क्या करोगे इसका? तुम इसे सूंघकर छोड़ दोगे। मैं ऐसी … ” बोलते बोलते रुक गई।

अनजाने में ही वह फूलों के बहाने को छोड़कर सीधे अपने बारे में बोलने लगी थी।

मैंने अपने दिल पर हाथ रखते हुए कहा,”भगवान कसम, दिल में बसा कर रखूँगा।”

“यह काफी नहीं।”

मैंने उसके हाथ से गुलाब का फूल लेकर अपनी कमीज के बटन में टाँक लिया।

“इसे सदा के लिए अपनी जिन्दगी में जगह दूँगा।”

थोड़ी देर के लिए चुप्पी छाई रही।

“इतनी दूर जाने की जरूरत नहीं। वह सम्भलती हुई बोली।

मैं जानता था वह मुझे पसंद करती थी। और लड़कों को उतना भाव नहीं देती थी जितना मुझे।मगर उसे प्यार कह सकना मुश्किल था। शादी के निर्णय के लिए सिर्फ प्यार जरूरी होता है ऐसा न तो मैं मानता था न वह। मगर मैं उसे पाने के लालच में काफी आगे का वादा कर गया था। वह मुझे अच्छी लगती थी, बल्कि बहुत अच्छी लगती थी। तेज थी। सुंदर भी बहुत थी। गोरा रंग, खड़ी लम्बी नाक, लाल भरे होंठ, छरहरी। चुस्त जींस शर्ट में उसकी गठन खुलकर बिखरती। लम्बी, सीधी चलने वाली। सक्रिय रहती। कई लड़कियाँ जिन संकोचों में खुद को बांधे रखती हैं उनसे वह अलग थी। उसके साथ बात करने में मजा आता था। लगता था ऐसी उत्साही साथी मिले तो क्या बात है। कभी रात की तनहाई में अपने हाथ से करता तो उसकी कल्पना करता हुआ।

“थोड़ी दूर की इजाजत है?” मैंने फिर पूछा।

वह सिर झुकाकर हँसी,”तुम बुद्धू हो। कुछ समझते नहीं !”

मुझे गुदगुदी हुई। आखिरकार यह भी लड़की ही है, खुद कैसे कहेगी।

उसकी स्वीकृति मुझे विभोर कर गई। उम्मीद थी, मगर विश्वास नहीं था। लगा जन्नत मिल गई।

“तुम और लड़कियों की तरह नहीं हो, तुमसे सुनना अच्छा लगता है।”

“ओके ! मगर इसका मतलब संकेत समझने में नासमझी तो नहीं होती है।”

यह थी वो ! बोल सकती थी। मैं उसकी इसी खूबी पर तो मरता था।

“ठीक है।” मैंने सिर झुकाते हुए कहा, “मैं नतमस्तक हुआ।”

“खूब !” उसने मेरी उस अदा का आनन्द लिया,”मेरे सामने बार बार होना पड़ेगा। सोच लो?”

तो क्या वह भी कहीं अवचेतन में मुझसे स्थायी रूप से जुड़ने के लिए सोच रही है? बार बार झुकने से क्या मतलब है?

“मैं तो सदा से हूँ।” मैंने कहा।

“मस्का मत लगाओ।” अब वह ऊपर हो रही थी।

झुके झुके मेरे दिमाग में एक खयाल आया। पुष्पा के लायक जवाब होगा।

“बताऊँ, और कितना झुकने की तमन्ना है?”

“कितना?” वह मेरे गंतव्य को समझ नहीं पाई थी मैं उसे कहाँ ले जाना चाहता था।

मैं और झुका। उसके गले के नस की एक नीली सी छाया नीचे जाकर खो रही थी। उठानों के नीचे कुछ धड़क रहा था। दुपट्टा नहीं ओढ़ती थी।

“बस?” वह इसे खेल समझ रही थी।

मैं और झुका। इस बार उसके स्तन मेरे सामने थे। फ्रॉक में उभरे हुए। उनकी नोकों के बहुत हल्के उभार का पता चल रहा था।

“बस?” मुझे पूरा झुकाने के चक्कर में वह बेखबर चुग्गा खाती कबूतरी की तरह जाल की तरफ बढ़ी जा रही थी।

मैं और झुका। उरोजों के नीचे की ढलान, समतल पेट और उससे नीचे उसकी संकरी कमर। फ्रॉक के कपड़े में लिपटी हुई। नीचे दोनों तरफ फैलते कूल्हे।

“गो ऑन।” वह जीत के नशे में गाफिल थी।

अब मैं बैठ गया, घुटनों पर। मेरा गंतव्य आ गया था जिसके सपने मैं बार बार देखता था। मैंने घुटनों पर बैठे सिर झुकाया। वह समझी कि अब मैं नमाज की मुद्रा में दोजानूँ होऊँगा। सोच रही थी मैं अंतत: साष्टांग बिछ जाउंगा। मैंने उसके नितम्बों को बाँहों में घेरा और कमर के नीचे उस स्थान पर जहाँ भीतर जांघों का संधिस्थल था उसमें मुँह घुसाकर जोर से चूम लिया। मेरे होटों पर और नाक पर कपड़ों की सलवटों के नीचे मुलायम गद्देदार मांसल उभार महसूस हुआ।

वह ठगी-सी खड़ी रही गई। उसके मुँह से बस आश्चर्य में निकला,”अरे !”

मैंने जहाँ चुम्बन की मुहर लगाई थी उस स्थान को देखते हुए कहा, “यह फूल सबसे अनूठा है। कुदरत का सबसे बेहतरीन करिश्मा। इसके सामने सब फूल बेकार हैं।”

वह चुप थी। एक आघात में। इतने बड़े दुस्साहस की उम्मीद नहीं की थी। मुझे लगा वह डाँटेगी और चल देगी। मगर मुझे उसके मेरे प्रति आकर्षण का भरोसा भी था। तभी मैं इतनी हिम्मत कर गया था। उसके चेहरे का भाव थोड़ा नरम पड़ा। उसमें सम्हलने की क्षमता बेशुमार थी। हाथों से मेरा सिर दूर हटाते हुए बोली,”यह क्या कर रहे हो?”

“वही जो मैं बाद में बहुत अच्छे से करूँगा।” उसे हराने के बाद अब मैं हावी होने की स्थिति में था। वह अभी तक अपनी तेज तर्रारी और तेज दिमाग को ही बहुत भाव देती आई थी।

वह कुछ देर चुप रह गई।

“छी: ! तुम्हें गंदा नहीं लगता?”

मैं उठा। उसके हाथ से गूलाब का फूल ले लिया। उसे चुटकियों में घुमाते हुए धीरे धीरे बोला,”मैं उस सबसे बेशकीमती फूल से सबसे खास व्यव्हार करूँगा। उसमें डूबकर प्यार करूंगा
 
उसकी पंखुड़ियाँ खोलूंगा- ऐसे।”

मैंने उंगलियों से गुलाब की धीरे धीरे उसकी पंखुड़ियाँ फैलाईं,”फिर उसे चूमूंगा, ऐसे, यहाँ।”

मैंने फैली पंखुड़ियों के बीच मुँह घुसाकर उसके भीतर गर्भस्थल को चूमा, चूमने की चुसकारी की जोर की आवाज की।

“बड़ी हिम्मत है !”

“और बताऊँ, क्या करूँगा?” पता नहीं कहाँ से आज मेरी हिम्मत और अक्ल दोनों काम कर रहे थे। आज मैं उसे आश्चर्य पर आश्चर्य दे रहा था। मैंने बाड़ से बबूल का एक सूखा काँटा तोड़ा और उसे फूल के गर्भ में चुभो दिया।

वह शर्म से लाल हो गई।

“अब बताओ।” मैंने कहा। जैसे पूछ रहा होऊँ,”कैसा रहा?”

मगर जो शर्म से सिकुड़ जाए वह पुष्पा क्या। वह तो बराबर का जवाब देने में यकीन रखती थी। उसे अपनी जवाब देने की क्षमता का यकीन था। उसने काँटे को फूल से निकाला जिसका नुकीला सिरा फूल के रस में भीगा हुआ था। उसने उसे धीरे धीरे उठाया और मुँह में लेकर चूस लिया।

मैं उसे देखता रह गया।

कहानी जारी रहेगी।

सुबह की स्वच्छ ताजी हवा में गुलाब के ताजा फूलों की खुशबू फैल रही थी। शहर के कोलाहल से दूर प्रदूषणमुक्त शांत वातावरण में फूलों की सुगंधभरी ताजी हवा में घूमते हुए मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। हर तरफ गुलाब फैले थे भाँति भाँति के- लाल, गुलाबी, काले, बैंगनी, उजले… !

मैं उनके कलेक्शन की मन ही मन तारीफ करता क्यारियों के बीच काँटों से सावधानी से बचता घूम रहा था। पुष्पा थोड़ी दूर पर बाड़ के पास फूल तोड़ रही थी।

पुष्पा के पिताजी का बड़ा सा फूलों का बाग था, शहर के नजदीक ही एक गाँव में। वे फूलों की खेती करते थे। मैं छुट्टियों में वहाँ घूमने आया था। पुष्पा ने मुझे बुलाया था, ”आकर कभी मेरा बाग देखो। बहुत अच्छा लगेगा।”

उसने गलत नहीं कहा था। मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। और फूलों की क्यारियो के बीच स्वयं फूल-सी खिली पुष्पा भी मुझे कम अच्छी नहीं लग रही थी। मैं भौंरे-सा उसके आकर्षण में घूम रहा था।

मैं घूमता घूमता उसके पास पहुँचा। वह कुशलता से काँटों से बचती हुई फूलों को डंठल से नीचे पकड़कर कैंची से काट लेती। मुझे पास आता देखकर उसके चेहरे पर एक गर्व और खुशी का भाव चला आया।

“बड़ी कुशलता से तोड़ती हो। काँटे नहीं चुभते?”

वह कुछ नहीं बोली। बस गर्व से मुस्कुराई।

मुझे उसका घमण्ड अच्छा लगा। काश, मैं इसे ही तोड़ लेता।

“मैं भी तोडूँ?”

“काँटे चुभेंगे !” उसकी आवाज में गर्व था।

“मुझे परवाह नहीं !”

“अच्छा!” उसने मुझे देखकर भौंहें उठाई,”लेट मी सी?” उसने अंग्रेजी में कहा। कैंची नहीं दी।

मैंने हाथ बढ़ाया और बहुत बचाकर एक डंठल को तोड़ने की कोशिश की। डंठल टूटकर टेढ़ी हो गई मगर डाल से अलग नहीं हुई। उसे अलग करने के लिए टूटी डंठल को घुमाया।

“जानते हो !” उसने कहा।

थोड़ी कोशिश से डंठल टूट गई मगर हाथ में काँटों की खरोंच लग ही गई। एक-दो पंखुड़ियाँ भी झटकने में टूट गईं। मैंने फूल उसके हाथ में दे दिया।

“देखा?” उसने खरोंच में जमा होते खून की बूंद को देखते हुए कहा।

उसने टोकरी में से छोटे-से डिब्बे से डेटाल भीगा रूई का फाहा निकाला और उससे खरोंच का लहू पोंछते हुए दबा दिया। वह डेटाल भीगा फाहा छोटी सी शीशी में साथ रखती थी। मैं उसके झुके सिर को, एक से मेरा हाथ पकड़े दूसरे से जख्म पर रुई घुमाते उसके गोरे नाजुक हाथों को देखता रहा।

“मगर …” मैंने बात आधी छोड़ दी। उसने उत्सुकता से मेरी ओर देखा।

“मैं तो एक खास फूल तोड़ना चाहता हूँ।” मैंने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए पूरा किया।

उसके चेहरे पर क्षणमात्र के लिए एक अजब-सा भाव आया। बात को कुछ ताड़ती हुई-सी प्रतीत हुई। मैंने उसके प्रश्नवाचक चेहरे पर से दृष्टि हटाकर सर से पाँव तक नजर दौड़ाई और उसकी आँखों में देखते हुए आगे कहा,”अगर वह इजाजत दे तो !”

वह समझ गई। मगर लजाकर या घबराकर दृष्टि नहीं हटाई। वह निडर थी। मुझे उसकी यह बात अच्छी लगती थी।

“कितने फूल तोड़े हैं अब तक?” उसने कुछ ठहर कर पूछा।

“झूठ नहीं बोलूँगा ! सिर्फ एक ! मगर यह फूल बहुत खास है।”

उसे झूठ से नफरत थी। सच सुनना पसंद करती थी। कड़वा हो तो भी। फिर उसी कॉलेज में तो पढ़ती थी।

“उससे भी यही कहा होगा, “यह फूल बहुत खास है।” वह कुछ मजा लेती, कुछ मजाक उड़ाती बोली,”फुसलाने का पुराना तरीका है।”

“नहीं पुष्पा, यह सच नहीं। मैं पहले भी झूठ बोल सकता था मगर ऐसा नहीं किया। सचमुच यह फूल बेहद खास है। औरों से अलग ! दुर्लभ है।”

प्रशंसा से वह प्रसन्न हुई। कुछ मूड में आ गई।

“क्या खास है इसमें?” कुछ मजा लेते हुए बोली।

वह गर्व भरी नजरों से फूल को देखते हुए उसे अपनी चुटकी में घुमा रही थी, अपनी तारीफ सुनना चाह रही थी। मैंने अपना दाँव खेला।

“यह अगर उसकी इजाजत मिले तभी बताऊँगा।”

“इजाजत है !” उसने बात को हँसी में उड़ाते हुए कहा।

 
“सच? क्या मुझे फूल तोड़ने की इजाजत है?” मैंने भी उसी अंदाज में उसके टालने की कोशिश को व्यर्थ करते हुए कहा।

अब वह मुश्किल में थी। इस बात को हँसी में उड़ाना कठिन था। वह गंभीर हो गई।

यही सही समय था अगला वार करने का, मुझे उसके मजबूत स्वभाव का भरोसा था, मैंने उसके हाथ के फूल पर अपनी हथेली रखकर दूसरे हाथ से उसकी हथेली को नीचे से सहारा देते हुए कहा,”सच पुष्पा। यकीन मानो। यह साधारण नहीं। इसका सौंदर्य, इसका रूप, इसकी महक, इसका सब कुछ अतुलनीय है। यह बहुत भाग्य से पाने लायक है।”

उस पर प्रशंसा का असर हो रहा था। उसे तारीफ अच्छी लगती थी। मुस्कुराने की कोशिश की।

“क्या करोगे इसका? तुम इसे सूंघकर छोड़ दोगे। मैं ऐसी … ” बोलते बोलते रुक गई।

अनजाने में ही वह फूलों के बहाने को छोड़कर सीधे अपने बारे में बोलने लगी थी।

मैंने अपने दिल पर हाथ रखते हुए कहा,”भगवान कसम, दिल में बसा कर रखूँगा।”

“यह काफी नहीं।”

मैंने उसके हाथ से गुलाब का फूल लेकर अपनी कमीज के बटन में टाँक लिया।

“इसे सदा के लिए अपनी जिन्दगी में जगह दूँगा।”

थोड़ी देर के लिए चुप्पी छाई रही।

“इतनी दूर जाने की जरूरत नहीं। वह सम्भलती हुई बोली।

मैं जानता था वह मुझे पसंद करती थी। और लड़कों को उतना भाव नहीं देती थी जितना मुझे।मगर उसे प्यार कह सकना मुश्किल था। शादी के निर्णय के लिए सिर्फ प्यार जरूरी होता है ऐसा न तो मैं मानता था न वह। मगर मैं उसे पाने के लालच में काफी आगे का वादा कर गया था। वह मुझे अच्छी लगती थी, बल्कि बहुत अच्छी लगती थी। तेज थी। सुंदर भी बहुत थी। गोरा रंग, खड़ी लम्बी नाक, लाल भरे होंठ, छरहरी। चुस्त जींस शर्ट में उसकी गठन खुलकर बिखरती। लम्बी, सीधी चलने वाली। सक्रिय रहती। कई लड़कियाँ जिन संकोचों में खुद को बांधे रखती हैं उनसे वह अलग थी। उसके साथ बात करने में मजा आता था। लगता था ऐसी उत्साही साथी मिले तो क्या बात है। कभी रात की तनहाई में अपने हाथ से करता तो उसकी कल्पना करता हुआ।

“थोड़ी दूर की इजाजत है?” मैंने फिर पूछा।

वह सिर झुकाकर हँसी,”तुम बुद्धू हो। कुछ समझते नहीं !”

मुझे गुदगुदी हुई। आखिरकार यह भी लड़की ही है, खुद कैसे कहेगी।

उसकी स्वीकृति मुझे विभोर कर गई। उम्मीद थी, मगर विश्वास नहीं था। लगा जन्नत मिल गई।

“तुम और लड़कियों की तरह नहीं हो, तुमसे सुनना अच्छा लगता है।”

“ओके ! मगर इसका मतलब संकेत समझने में नासमझी तो नहीं होती है।”

यह थी वो ! बोल सकती थी। मैं उसकी इसी खूबी पर तो मरता था।

“ठीक है।” मैंने सिर झुकाते हुए कहा, “मैं नतमस्तक हुआ।”

“खूब !” उसने मेरी उस अदा का आनन्द लिया,”मेरे सामने बार बार होना पड़ेगा। सोच लो?”

तो क्या वह भी कहीं अवचेतन में मुझसे स्थायी रूप से जुड़ने के लिए सोच रही है? बार बार झुकने से क्या मतलब है?

“मैं तो सदा से हूँ।” मैंने कहा।

“मस्का मत लगाओ।” अब वह ऊपर हो रही थी।

झुके झुके मेरे दिमाग में एक खयाल आया। पुष्पा के लायक जवाब होगा।

“बताऊँ, और कितना झुकने की तमन्ना है?”

“कितना?” वह मेरे गंतव्य को समझ नहीं पाई थी मैं उसे कहाँ ले जाना चाहता था।

मैं और झुका। उसके गले के नस की एक नीली सी छाया नीचे जाकर खो रही थी। उठानों के नीचे कुछ धड़क रहा था। दुपट्टा नहीं ओढ़ती थी।

“बस?” वह इसे खेल समझ रही थी।

मैं और झुका। इस बार उसके स्तन मेरे सामने थे। फ्रॉक में उभरे हुए। उनकी नोकों के बहुत हल्के उभार का पता चल रहा था। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

“बस?” मुझे पूरा झुकाने के चक्कर में वह बेखबर चुग्गा खाती कबूतरी की तरह जाल की तरफ बढ़ी जा रही थी।

मैं और झुका। उरोजों के नीचे की ढलान, समतल पेट और उससे नीचे उसकी संकरी कमर। फ्रॉक के कपड़े में लिपटी हुई। नीचे दोनों तरफ फैलते कूल्हे।

“गो ऑन।” वह जीत के नशे में गाफिल थी।

अब मैं बैठ गया, घुटनों पर। मेरा गंतव्य आ गया था जिसके सपने मैं बार बार देखता था। मैंने घुटनों पर बैठे सिर झुकाया। वह समझी कि अब मैं नमाज की मुद्रा में दोजानूँ होऊँगा। सोच रही थी मैं अंतत: साष्टांग बिछ जाउंगा। मैंने उसके नितम्बों को बाँहों में घेरा और कमर के नीचे उस स्थान पर जहाँ भीतर जांघों का संधिस्थल था उसमें मुँह घुसाकर जोर से चूम लिया। मेरे होटों पर और नाक पर कपड़ों की सलवटों के नीचे मुलायम गद्देदार मांसल उभार महसूस हुआ।

वह ठगी-सी खड़ी रही गई। उसके मुँह से बस आश्चर्य में निकला,”अरे !”

मैंने जहाँ चुम्बन की मुहर लगाई थी उस स्थान को देखते हुए कहा, “यह फूल सबसे अनूठा है। कुदरत का सबसे बेहतरीन करिश्मा। इसके सामने सब फूल बेकार हैं।”

वह चुप थी। एक आघात में। इतने बड़े दुस्साहस की उम्मीद नहीं की थी। मुझे लगा वह डाँटेगी और चल देगी। मगर मुझे उसके मेरे प्रति आकर्षण का भरोसा भी था। तभी मैं इतनी हिम्मत कर गया था। उसके चेहरे का भाव थोड़ा नरम पड़ा। उसमेउसमें सम्हलने की क्षमता बेशुमार थी। हाथों से मेरा सिर दूर हटाते हुए बोली,”यह क्या कर रहे हो?”

“वही जो मैं बाद में बहुत अच्छे से करूँगा।” उसे हराने के बाद अब मैं हावी होने की स्थिति में था। वह अभी तक अपनी तेज तर्रारी और तेज दिमाग को ही बहुत भाव देती आई थी।

वह कुछ देर चुप रह गई।

“छी: ! तुम्हें गंदा नहीं लगता?”

मैं उठा। उसके हाथ से गूलाब का फूल ले लिया। उसे चुटकियों में घुमाते हुए धीरे धीरे बोला,”मैं उस सबसे बेशकीमती फूल से सबसे खास व्यव्हार करूँगा। उसमें डूबकर प्यार करूंगा। उसकी पंखुड़ियाँ खोलूंगा- ऐसे।”

मैंने उंगलियों से गुलाब की धीरे धीरे उसकी पंखुड़ियाँ फैलाईं,”फिर उसे चूमूंगा, ऐसे, यहाँ।”

मैंने फैली पंखुड़ियों के बीच मुँह घुसाकर उसके भीतर गर्भस्थल को चूमा, चूमने की चुसकारी की जोर की आवाज की।

“बड़ी हिम्मत है !”

“और बताऊँ, क्या करूँगा?” पता नहीं कहाँ से आज मेरी हिम्मत और अक्ल दोनों काम कर रहे थे। आज मैं उसे आश्चर्य पर आश्चर्य दे रहा था। मैंने बाड़ से बबूल का एक सूखा काँटा तोड़ा और उसे फूल के गर्भ में चुभो दिया।

वह शर्म से लाल हो गई।

“अब बताओ।” मैंने कहा। जैसे पूछ रहा होऊँ,”कैसा रहा?”

मगर जो शर्म से सिकुड़ जाए वह पुष्पा क्या। वह तो बराबर का जवाब देने में यकीन रखती थी। उसे अपनी जवाब देने की क्षमता का यकीन था। उसने काँटे को फूल से निकाला जिसका नुकीला सिरा फूल के रस में भीगा हुआ था। उसने उसे धीरे धीरे उठाया और मुँह में लेकर चूस लिया।

मैं उसे देखता रह गया।

कहानी जारी रहेगी।

 
उसकी पनीली आँखों में, जिनमें एक अजब-सा मर्म को छूता भाव उमड़ रहा था। शर्म से लाल गालों पर झूलती लट, बालों के बीच सफेद मांग ! खाली।

मेरे भीतर कुछ उमड़ आया। उस तमाम निर्भयता और तेजी के पीछे एक अदद औरत उमड़ रही थी, वह औरत जो खुद उसे तीर से भेदने वाले शिकारी को ही खुद को समर्पित कर देती है।

मैंने सिर घुमाया। आसपास कोई नहीं था। फूलों की झाड़ लम्बी थी। हम उसकी ओट में थे। मैंने सिर झुकाया और उसके होठों पर हल्का सा चुम्बन लिया।

“तुम अद्भुत हो। मुझे तुम जैसी साथ देने वाली कोई और नहीं मिलेगी।”

उसने सिर झुका लिया।

“मुझसे शादी करोगी?” मुझे हैरानी हुई मेरे मुँह से क्या निकल गया।

मैं शादी के लिए गम्भीर नहीं था और वह भी मुझसे शादी करना पसंद करेगी कि नहीं मालूम नहीं था मगर अपने जोड़ का साथी के रूप में पत्नी के रूप में उसकी कल्पना मुझे बड़ी अच्छी लगती थी।

वातावरण बोझिल हो गया था। मुझे लगा इस बोझ में मेरा उसे पाने का लक्ष्य दब न जाए। हालांकि घूमती हवा और चिड़ियों की चहचहाहट स्फूर्तिदायी थे।

अच्छा बताओ, पुष्पा के पुष्प का रंग कैसा है?” मैंने मजाक करना चाहा था मगर मुझे अफसोस हुआ मुँह से क्या निकल गया।

इतनी गंभीर बातों के बाद इतनी सस्ती, इतनी छिछोरी बात ! मगर आज का दिन ही लगता है अप्रत्याशित बातों के लिए था।

उसने कुछ न समझते हुए मुझे देखा। मैंने उसी फूल को, जिसमें काँटा चुभाया था, उसके सामने कर दिया।

“तुम भी कैसी बातें करते हो।”

“सचमुच बताओ न?”

“अजीब हो!”

“तुम्हारे बाग में तरह तरह के रंग के गुलाब है लाल, कत्थई, गुलाबी, बैगनी, काला भी, सफेद भी। तुम्हारे होंठ लाल गुलाब के रंग के हैं। वह भी लाल है या…?” मैंने हिम्मत करके कहा।

“छी: तुम बेहद गंदे हो।”

“बताओ ना ! गंदा कहकर उस फूल को अपमानित न करो।”

वह मेरी ओर कुछ देर तक देखती रही। फिर कुछ जैसे सबल हुई,”मगर … छी: … ओके, वह फूल तुम देखोगे कैसे?”

“क्यों? क्या परेशानी है?”

“आज अमावस्या है।”

अबकी बारी मेरे हैरान होने की थी। वह भी चकित कर देने में कम न थी।

“इसका मतलब आज ही….!!” आज सचमुच आश्चर्यों का दिन था।

इच्छा हुई कि नाचूँ। मैं जिस खजाने को दूर समझकर पाने के लिए इतना दाएँ बाएँ कर रहा था वह उम्मीद से पहले अचानक सामने आ गया था। आज का दिन मुरादों के पूरे होने का दिन था।

“कब? कैसे? कहाँ?”

“इन्तजार करना।”

मैं कुछ और कहना चाहता था। मगर उसने कहा,”जाओ।”

अतिथियों के लिए कमरा छत पर था। मुझे उसी में ठहराया गया था। ऊपर अकेला कमरा। सामने खुली सहन थी। किनारे फूलों के गमले सजे थे। पुष्पा के पिता शौकीन थे, फूलों से उन्हें अच्छी आय होती थी।

कमरे को खूबसूरती से सजाया था। एक बड़ा-सा पलंग, खिड़कियों पर सुन्दर पर्दे, खिड़की खोलते ही बाग के फूलों का सुन्दर दृश्य दिखता था। अटैच्ड बाथरूम, टॉयलेट, नहाने का टब भी।

कहते थे यह कमरा शादी के बाद बेटे को दूंगा, ऊपर एकांत में आजादी से आनंद मना सकेंगे। खुले विचारों के थे। फूलों के प्रेमी का रोमाण्टिक होना स्वाभाविक था। शायद पुष्पा पर उनके खुलेपन का असर था। वरना पुष्पा एक ‘ब्वायफ्रेंड’ को अपने घर कैसे बुलाती।

‘ब्वायफ्रेंड’…’ मैं मुस्कुराया।

मैंने खुद को कभी इस रूप में देखा नहीं था। आज उस खूबसूरत कमरे में उनकी खूबसूरत बेटी के साथ जो मैं करने वाला था वह किस श्रेणी में आता था?

मुझे एक मजेदार खयाल आया- जिस तरह पूजा के बाद मिट्टी की मूर्ति में देवता की प्राणप्रतिष्ठा होती है उसी तरह आज इस कमरे में भी अक्षत कौमार्य की पूजा के बाद स्त्रीत्व की प्राणप्रतिष्ठा होगी। क्या उन्हें इतनी महत्वपूर्ण बात का गुमान भी है।

अक्षत कौमार्य ! मैं इस ख्याल पर ठहरा। मुझे मालूम नहीं था वह अक्षत है कि नहीं। खुले विचारों की लड़की है, नहीं भी हो सकती है।

पूछना चाहा था, मगर हिम्मत नहीं हुई।

जब उसने मुझसे पूछा था कि कितने फूल तोड़े हैं तब भी मैं हिम्मत नहीं कर पाया था। लगता था यह बात पूछने से उसकी बेइज्जती होगी। एक औरत से यह पूछना ही उसकी गरिमा के खिलाफ है।

मुझे एहसास हुआ मैं आमोद-प्रमोद के भाव से आगे जाकर उसे महत्व देने लगा हूँ। वह सुन्दर है बुध्दिमान है, शिक्षित, एनर्जेटिक और सलीकेवाली। उतने खुलेपन के बावजूद मैंने उसमें छिछोरापन नहीं देखा था। आज तो मैंने उसे ‘प्रोपोज’ भी कर दिया था।

जाड़ों की शुरुआत हो रही थी। सुबह हवा में ठंडक होती थी। सहन पर फैली धूप अच्छी लगती थी। मुझे फैली धूप देखकर चांदनी रात का खयाल आया। आज अगर पूर्णिमा की रात होती तो खुली चांदनी में छत पर उसके संग प्रणय में कितना मजा आता।

चांद की बरसती सफेदी में नहाता हुआ देखता पुष्पा का पुष्प।

पुष्पा का पुष्प … पुष्पा का पुष्प … बार बार दिमाग में घूमने लगा।

 
जब भी कोई आहट होती, मेरी उत्सुकता और उत्तेजना बढ़ जाती। सीमा पर बंकर में बैठे सिपाही की तरह छोटी से छोटी आहट पर कान लगे थे।

तीसरा पहर, रात भीग रही थी। मेरी आँखों में नींद का पता नहीं। उत्कण्ठा में रोम रोम कान हुए जा रहे थे। खिड़की के बाहर अंधेरे में सारा जग जैसे घुलकर खो गया था। झींगुरों की आवाज और बहती हवा में ताड़ के पत्तों की सरसराहट के सिवा और कोई आवाज नहीं। कभी कभी पहरेदार का स्वर दूर से आता।

दुनिया सो रही थी। मेरी बेसब्री का ठिकाना नहीं था। एक तो बज रहा है, अब और कितनी देर लगाएगी।

कहीं मैंने गलत तो नहीं समझा। उसने जगह समय वगैरह तो कुछ बताया नहीं था, सिर्फ कहा था इंतजार करना। अब अमावस्या की रात में अपने कमरे को छोड़कर उसका इंतजार और कहाँ किया जा सकता है !

बाहर तारों की रोशनी में सीढ़ीघर की ओर देखने की कोशिश कर रहा था, आ रही है या नहीं।

इंतजार में बहुत कष्ट होता है। सिर पर हाथ रखकर लेटे कुछ से कुछ सोचता नाउम्मीदी को टालने की कोशिश कर रहा था।

पता नहीं कब आँख लग गई और जब नींद खुली तो देखा खिड़की के बाहर सुबह की धूप फैली थी। वह नहीं आई। उसने मुझे झूठी उम्मीद दिलाई थी। मुझे गुस्सा आया।

वह बगीचे में फूलों के पौधों में पानी दे रही थी, मुझे देखकर मुस्कुराई।

मुझे लगा, वह मुझ पर हँस रही है, मेरा मजाक उड़ा रही है।

“कैसे हो?”

इस सवाल से गुस्सा और बढ़ गया। एक तो खुद वादा करके नहीं आई और अब पूछती है कैसे हो ! मैं गुस्से को दबाते हुए चुप रहा।

“तुम्हारी आँखें लाल हैं। रात सोए नहीं?”

अब तो हद हो गई। इतना खुलकर कटाक्ष कर रही है। ऐसा जवाब देने का मन हुआ कि तिलमिला जाए।

“तुम ऐसा करोगी, मुझे उम्मीद नहीं थी।” गुस्सा बढ़कर खीझ में बदल गया था।

“तुम नहीं समझ सकते।”

“क्या नहीं समझ सकता? तुमने खुद कहा था इन्तजार करने को। मैं तो …. ”

‘इन्तजार कर रहा था…’ बोला नहीं गया। बोलकर स्वीकार करना अपने गर्व के विरुद्ध था।

“क्या तुम लड़कियों के बारे में कुछ भी कल्पना नहीं कर सकते?” उसने एक क्षण को जैसे रोष में मुझको देखा और दूसरी ओर मुड़ गई।

मैं उसे देखता रह गया। लड़कियों के बारे में क्या? क्या माँ बाप के कारण आने का मौका नहीं निकाल पाई? लेकिन यह तो पहले से ही था, फिर कल के लिए वादा कैसे कर गई?

समझ में नहीं आ रहा था, कहीं वो अभी….!

मैं जितना ही सोचने लगा उतनी ही उसकी सम्भावना अधिक लगने लगी। यही बात है। लड़कियों के बारे में और क्या कल्पना करने की बात हो सकती है? मैंने उसे गौर से देखा। मुझे उसकी चाल में एक ढीलेपन का एहसास हुआ। कल ही शुरु हुआ होगा।

मैंने क्या क्या सोच लिया था। खुद पर अफसोस हुआ। लेकिन भला मुझे इसका अनुमान कैसे हो सकता था।

वह झुकी हुई, जड़ के चारों ओर क्यारी चौड़ी करके उसमें पानी दे रही थी। मुझे लग रहा था उसकी हरकतों में एक सुस्ती है। हो सकता है यह मेरा भ्रम हो, वह एनर्जेटिक लड़की थी। फिर भी इस स्थिति में भी काम कर रही है।

मुझे उस पर दया आई। उसने अपनी उस हालत के बावजूद मुझसे पूछा था कि कैसे हो। वह धोखेबाज हरगिज नहीं हैं। अगर मेरे प्रति कुछ जवाबदेही नहीं महसूस करती तो क्या अपनी उस स्थिति का भी संकेत देती? बेहद भली लड़की है। मेरा मन उमड़ने लगा।

मगर पुष्पा का पुष्प ! अब कैसे देखूंगा। अभी उसका खयाल भी मुझे गंदा लगा। कहाँ तो सोचा था उसे चूम लूँगा। छी: ! तीन चार दिन तो ऐसे ही गए। उसके बाद भी तुरंत तो नहीं ही। मुझे वापस भी लौटना था। किस्मत ने बीच में ही आकर डंडा चला दिया था। यह मौका तो गया !

मैं उसके पास पहुँचा। उसके हाथ से पानी का बरतन लेने की कोशिश की। बिना किसी आनाकानी से मुझे उसने दे दिया। मुझे लगा कि बोलने के बाद से वह आहत महसूस कर रही है। लगा, वह भी वादा नहीं निभा पाने की मजबूरी महसूस कर रही है। इच्छा हुई कि कहूँ कोई बात नहीं, बाद में देखेंगे। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे लगा कि बिना बोले ही मेरा आश्वासन उस तक पहुँच गया है।

वह उठी और आगे बढ़ गई। मैंने देखा, उसके पिताजी आ रहे थे। मेरे हाथ में बरतन देखकर हँसे,”पुष्पा आपको भी उलझा रही है?”

पूरा दिन सुस्ती भरा ही गुजरा। खाने और सोने के सिवा कोई काम नहीं था। पुष्पा कटी-कटी-सी रही। उस राज के जानने के बाद उसे मेरे सामने आना लज्जाजनक लगता होगा। मैं अब लौटने का कार्यक्रम बदलने की सोच रहा था। अब तो कुछ होगा नहीं।

पुष्पा का पुष्प ! अफसोस !

ऐसा नहीं कि मैं उसी के लिए आया था। चलते वक्त इसकी कोई कल्पना भी नहीं थी। यहाँ आकर परिस्थितियों के मोड़ से इतनी बड़ी बात की सम्भावना के बनने के बाद अब वही लक्ष्य बन गया था। उसके बिगड़ जाने के बाद खाली लग रहा था। कल सुबह ही लौट जाऊँगा। खिड़की के बाहर अंधेरी रात में आकाश में तारे दिख रहे थे और मैं सिर पर हाथ रखे लेटा सोच रहा था कि अभी मेरे तारे अनुकूल नहीं हैं।बाहर कल की तरह सन्नाटा था, रात अधिक हो रही थी, नींद आज भी नहीं आ रही थी। यद्यपि आज किसी का इंतजार नहीं था। खिड़की से आती हवा में हल्की ठण्ड का एहसास हुआ लेकिन गुलाबों की आती खुशबू अच्छी लग रही थी। घड़ी में देखा- ग्यारह बज रहे थे…

 
बाहर कल की तरह सन्नाटा था, रात अधिक हो रही थी, नींद आज भी नहीं आ रही थी। यद्यपि आज किसी का इंतजार नहीं था। खिड़की से आती हवा में हल्की ठण्ड का एहसास हुआ लेकिन गुलाबों की आती खुशबू अच्छी लग रही थी। घड़ी में देखा- ग्यारह बज रहे थे…

किवाड़ के कब्जों की बहुत धीमी चरमराहट से मैं चौंका।

“कौन है?” मन में प्रश्न उठा और मैं तुरंत आवेग में आकर उठने को हुआ।

मगर भीतर उठे किसी खयाल ने मुझे रोक दिया। कहीं वो तो नहीं !

मगर वो कैसे हो सकती है ? उठूँ या न उठूँ की दुविधा में वैसे ही पड़ा रहा।

अंधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था।

परफ्यूम की हल्की सी महक पास आई। मेरे दिल की धड़कन बढ़ने लगी।

वही है ! मेरी लहकती कामनाओं की मूर्ति !

मगर इस हालत में किसलिए आई है?

“सो गए?” फुसफुसाहट की आवाज आई।

मैं वैसे ही स्थिर रहा। कुछ देर चुप्पी रही।

मेरे होठों पर कुछ ठंडा, धातु का टकराया। उसके कान का टॉप्स। वह कान नजदीक लाकर मेरी सांसें सुनने की कोशिश कर रही थी।

मैं खुद को रोके रहा।

“जानती हूँ, नाटक कर रहे हो।” वह बुदबुदाई।

अब रुक पाना मुश्किल था। मैंने हाथ बढ़ाकर उसे अपने ऊपर खींच लिया। वह फूलों से लदी डाली की तरह मेरे ऊपर गिर पड़ी।

मैंने उसे बाँहों में समेटते हुए चूम लिया। वह छूटने की कोशिश करने लगी। उसे छोड़ते हुए मेरे मन में सवाल कुलबुला रहा था आज तो मासिक में है, फिर कैसे आई? पूछना चाहा।

‘आज क्यों आई’ मगर मुँह से निकला,”कल क्यों नहीं आई?”

वह कुछ नहीं बोली।

एक लड़की से कल क्यों नहीं आई का कारण बताने की उम्मीद करना बेमानी था।

“मैंने तो समझा था कि तुम शायद…..”

“क्या?” उसकी बेहद सकुचाती फुसफुसाहट भी कमरे में रात की नीरवता में साफ सुनाई दी।

चलो बोली तो। डर रहा था कहीं चुप न रह जाए।

होंठों पर शब्द लाने में बेहद हिचक हो रही थी। फिर भी थोड़ा जी कड़ा करके कहा,”वो क्या कहते हैं पीरियड वगैरह….?”

अंधेरे में उसकी हल्की हँसी कानों में गूंजी।

हँसी क्यों? मुझे शंका हुई, कहीं मैं गलत तो नहीं था?

“तो क्या तुम…?”

“………….”

उसके चुप रहने से मैं और परेशान हो गया।

“बोलो ना पुष्पा…..?”

“मुझसे ज्यादा तेज बनने की कोशिश करोगे तो यही होगा।”

“तो तुम मुझे छका रही थी?” मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला।

मुझे फिर उसकी हँसी सुनाई दी।

“तुमने मुझे बेवकूफ बनाया ! अब देखो मैं तुम्हारा क्या हाल करता हूँ।” मैंने उसे बिना कुछ सोचने का मौका दिए एक जोर का झटका दिया। वह बेसाख्ता मेरे ऊपर आ गिरी। न जाने कैसे अंधेरे में मेरे होंठ सीधे उसके होठों से जा लगे और मैं उसे जोर से चूमने लगा।

वह साँस की कमी से अकुलाने लगी।

मैंने उसके दोनों हाथों को उसकी पीठ के पीछे लाकर एक हाथ में कस लिया और एक क्षण के लिए साँस लेने का मौका देकर दूसरे हाथ से पीछे से उसका सिर अपने मुँह पर दबा लिया।

वह तीर लगी चिड़िया की तरह छटपटाने लगी, लेकिन उसके हाथ पीछे जकड़े हुए थे और वह बेबस थी।

मैं बेतहाशा उसके मुँह पर मुँह दबाए चूस रहा था। उसके कोमल होंठ मेरे होंठों के दबाव के नीचे पिसे जा रहे थे और मुझे डर लग रहा था कहीं छिल न जाएँ। हर ‘पुच’ की आवाज के साथ उसके मुँह का रस मेरे मुँह में चला आता और मैं उसकी सुगंधित मिठास में खो जाता। मैं अब सचमुच उसे पी ही रहा था और वह उम.. उम.. कर रही थी।

धीरे धीरे उसकी छटपटाहट शांत पड़ने लगी।

जब हमारे होंठ अलग हुए तो दोनों हाँफ रहे थे। मेरे सीने पर दबे उसके स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे। चिकनी साटिन नाइटी के भीतर उसका बदन धड़क रहा था।
 
कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा ! उसकी पीठ के पीछे बंधे अपने एक हाथ में चिकोटी काटी। चुभन महसूस हुई।

नहीं, यह सपना नहीं है। होटों पर टंगी उसके चुम्बन की गरमाहट, साँसों में आती उसकी साँसों की सुगंध और मेरे चेहरे पर गिरते उसके बालों की रेशमी सरसराहट ने मुझे उन स्वर्गिक क्षणों के वास्तविक होने का यकीन दिला दिया।

मैंने धीरे धीरे उसे एक करवट की तरफ लिटा लिया। वह हाँफ रही थी।

किवाड़ बंद करते हुए एक ठंडी हवा का झोंका जैसे कोई होश दिला गया। चारों तरफ चुप सूना संसार। गहरी रात। नीचे उसके माँ बाप गहरी नींद में सो रहे होंगे। यहाँ बिस्तर पर उनकी बेटी। यौवन की उमड़ती धारा, उत्तेजित, गर्म सांसें छोड़ती, कुछ कर चुकने को आतुर। चुप्पी को बढ़ाती पेड़ों की सरसराहट, गुलाबों की खुशबू और हवा का मध्धम झोंका।

खिड़की खुली थी। कोई बात नहीं। गहरी रात के सुरक्षित अंधेरे में दुमंजिले पर कमरे में किसी के देखने का डर नहीं था।

बिस्तर पर वह मुश्किल से छाया-सी नजर आ रही थी। पास आकर मैंने टटोला। वह सिमट गई।

“पुष्पा …ऽ…ऽ….!” मैंने प्यार से बुलाया।

उसकी तेज साँसें गूंज रही थीं। मैं उसके बगल में लेट गया। स्त्री के शरीर का मुलायम गुदगुदा एहसास। उसे अपने में कसते हुए मैं घमंड से भर गया। वह मेरी थी। मेरी बाँहों के घेरे में, मेरी कैद में। उसकी गर्म सांसें मेरे कंधे पर, छाती पर जल रही थी। मैं खोजते हुए ही उसे चूम रहा था- गालों को, होंठों को, उनके गीले किनारों को, अधर के नीचे… ठुड्डी, जबड़े की लकीर, गले की बगल, जूडें के भीतर की मुलायम सोंधी त्वचा।

मैंने बालों की सोंधी जड़ों में नथुने घुसाकर साँस भरी। वह मेरे कंधे पर कुछ चूम कुछ मुँह रगड़ रही थी।

उसकी पीठ पर घूमते मेरे हाथ नाइटी के नीचे ब्रा के फीते से टकराए। उसे मैंने उंगलियों से कुरेदा। नितम्बों पर तिरछे काटती पैंटी के किनारों की लाइन थी। कॉलेज में टाइट जींस में आती थी तो उन पर नीचे से अंग्रेजी के वी की तरह निकलती पैंटीलाइन उभरती थी। मुझे अंधेरे का अफसोस हुआ। अभी उन्हें असल में देखता।

मैंने उन नितम्बों को हथेलियों में भरकर सहलाया और फिर उसके बदन को अपने में भींच लिया। वह कसमसा उठी। एक हुंकार सी उसके मुँह से निकल गई।

मैं उत्साह से भर गया- हाँ ! यह बात है। उसकी पीठ पर नाइटी को हाथों में बटोरते हुए मैंने उसे चित्त कर दिया और सामने से नाइटी को ऊपर खींचा। उसने नितम्ब उठाकर नीचे से नाइटी निकालने में सहयोग किया। मैंने उसकी गर्दन के नीचे हाथ डालकर उसे बिठाया और नाइटी को सिर के ऊपर खींच लिया।

अब छिलकों की तरह सिर्फ ब्रा और पैंटी ही उसके बदन पर बच रही थी। मैंने अपनी बनियान उतार दी।

उस अंधेरे में भी वह मेरी निगाह से बचने के लिए मुझमें जकड़ गई और अपनी कोमल बाँहो में मुझे कस लिया।

शायद यह उसके लिए पहला मौका था। पता नहीं…..? मुझे याद आया मैंने पूछा नहीं था कि वह अछूती है या नहीं। हो सकता है शर्म के बावजूद अपने बोल्ड स्वभाव के कारण ही पहली बार में इतना सहयोग कर रही हो। ऋचा, मेरी पहली लड़की, जब मैंने उसके साथ संसर्ग किया था तो वह तो निष्क्रिय ही रही थी। उसे बहुत खून भी निकला था। वह रो रही थी। यह दूसरी ही लड़की है, सहयोग कर रही है। सचमुच की साथी। अपनी जिन्दगी भर की साथी हो जाए तो क्या बात है।

मेरे हाथ उसकी पीठ पर ब्रा के हुक से संघर्ष कर रहे थे, जो खुल नहीं रहा था। मुझे लगा वह मुझ पर हँसी है। वह अपने हाथ पीछे ले जाकर हुक खोलने को हुई मगर मैंने अधीर होकर दोनों तरफ फीते को पकड़कर झटक दिया। हुक टूट गया।

वह सिहर गई,”बड़े बेकरार हो रहे हो !”

मुझे खुशी हुई। अभी मर्द की ताकत को उसने देखा कहाँ है।उसने सिमट कर स्तनों को बाँहों के नीचे दबा लिया। उसकी साफ हो गई पीठ पर मैंने हाथ फिराए और कंधों पर से फीते को सरकाते हुए झुककर गर्दन को बगल से चूम लिया। वह बाँहों में स्तनों को छिपाए सिमटी हुई झुकी थी। मैंने एक तरफ से उसकी कुहनी उठाकर ब्रा के फंदे को कलाई तक खिसकाने की कोशिश की।

उसने हिचकते-हिचकते ही अपना वह हाथ स्तन पर से उठाया और मुझे ब्रा का फंदा बाहर निकालने दिया। उसे प्यार से सहलाते हुए मैंने ब्रा को धीरे धीरे खींचते हुए उसके दूसरे हाथ से भी बाहर निकाल दिया।

अब उसके स्तन आजाद थे। मैंने धीरे धीरे उसे लिटा दिया।

“जागते रहो…..” दूर से आई आवाज ने हम दोनों को चौंका दिया।

उसका हाथ मेरी पीठ पर ठहर गया। गाँव में पहरा पड़ रहा था। मैंने अंधेरे में ही एक बार आँखें खोलकर देखा। कोई डर की बात तो नहीं ! जागते रहो का आमंत्रण, किसके लिए? आज जागने का जश्न तो हम मना रहे थे। उसके माँ बाप को तो खबर भी नहीं। वे निश्चिंत सो रहे हैं। पहरे की आवाज से कहीं वे जाग गए, उन्हें पता चल गया तो? डर की एक लहर दौड़ गई। नीचे देखा, पुष्पा भी निश्चल थी। शायद वह भी यही सोच रही थी।

 
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