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माँ भारती के लाड़ले complete

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“माँ भारती के लाड़ले”

[एक]

स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते भारत के उस दौर के कलकत्ता से कुछ दूर एक नगर…विजय नगर ! आज़ादी मिलने से चंद वर्षों पहले का समय था।

अंधकार में डूबी सड़कें और गलियाँ…। ऐसी ही एक गली के कोने वाले आखिरी मकान से अंधेरे में एक छोटा-सा प्रकाश-बिंदु हिलता हुआ नज़र आया। यही बिंदु धीरे-धीरे निकट आने लगा।

अगले कुछ पलों में वह बिंदु लम्बे-चौड़े इंसानी साये में बदल गया। कुछ क्षण बाद वह साया गली पार करके रुका। शायद यह देखने के लिए कि कोई उसकी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए तो नहीं है।

अपनी ओर से जब वह संतुष्ट हो गया तो तेजी से डग भरता हुआ एक ओर को बढ़ गया। अब उसकी पीठ पर कुछ लदा हुआ सा भी दिखने लगा था। लगता था उसकी पीठ पर कोई अचेत व्यक्ति लदा हुआ था।

साया अब सड़क पर तेजी से बढ़ रहा था। उसकी चाल अब पहले से तीव्रतर होती चली जा रही थी। इसका अर्थ यही था कि उसकी मंजिल या तो आ पहुँची थी, या अभी वह बहुत दूर थी कि वह तेज-तेज चलकर जल्दी वहाँ पहुंचना चाहता था।

इतनी देर बाद, सड़क पर अब पूर्ण अंधेरा भी नहीं रह गया था। सड़क के लैम्प जल उठते थे।

सड़क अभी भी सुनसान थी।

उसने एक लैम्प के नीचे से गुजरते हुए अपनी जेब से घड़ी निकाल कर समय देखा — रात के दो बजने जा रहे थे।

पाठक मित्रों ! इस समय वह इस अचेत व्यक्ति को कहाँ लेकर जा रहा है, आइए देखते हैं। अपनी कैमरे जैसी आंख को उसके पीछे लगाए चलते हैं। यह तो स्पष्ट ही है कि उसने इस बेसुध व्यक्ति का अपहरण किया है, उसी कोने वाले मकान से। माजरा क्या है ? चलिए, देखते हैं।

सुनसान सड़क पर वह अकेला ही जा रहा है। अकेले उसी के कदमों की आवाज़ वातावरण में गूंज रही है — खट्ट ..खट्ट…खट्ट…।

उसने एक बार अपने कंधे पर पड़े व्यक्ति के शरीर को थोड़ा-सा उछालकर संतुलन बनाया। इसके बाद वह फिर बेफिक्री से चलने लगा।

मगर अगले पल ही उसे सजग हो जाना पड़ा।। वातावरण में इस समय केवल अकेले उसी के कदमों की ही आवाज़ न थी, बल्कि दो जोड़े कदमों की आवाज़ और उभर आई थी। यानी दो व्यक्ति और इसी तरफ आ रहे थे।

वह हटकर सड़क के एकदम किनारे हो गया, जहां अपेक्षाकृत अंधकार अधिक था। उसके कदमों की आवाज़ अब दब सी गई थी क्योंकि वह एक तरह से स्वयं को छिपाते हुए धीरे-धीरे कदम उठाने लगा था। उसने एक बार फिर अपने कंधे पर पड़े हुए अचेत व्यक्ति को ठीक किया। धीरे-धीरे मगर निरन्तर ही वह अब भी आगे बढ़ता जा रहा था।

निरन्तर दो जोड़े कदमों की आवाज़ नजदीक-दर-नजदीक आती सुनाई दे रही थी। यानी वे आने वाले दो व्यक्ति थे।

अब उसकी स्थिति दुविधाजनक हो गई थी। यह तो था नहीं कि उसे इस स्थिति की बिल्कुल आशा ही न थी, मगर उसने जानबूझकर यह जोखिम लिया था क्योंकि जिस व्यक्ति को वह कंधे पर ढोकर ले जा रहा था, वह इस व्यक्ति को किसी भी कीमत पर अब हाथ से जाने नहीं देना चाहता था।

जब तक वे दोनों व्यक्ति उस तक पहुंचते, उसने अपनी कार्य-प्रणाली को निश्चित कर लिया था। वह आशा कर रहा था कि आने वाले व्यक्तियों पर आक्रमण न करके उनसे बचकर निकल जाना है।

उधर, दोनों व्यक्तियों के कदमों की आवाज़ बढ़ती हुई उधर ही आ रही थी। मगर अगले ही पल लगा कि जैसे उनमें से एक व्यक्ति दूसरी तरफ को बढ़ गया था।

चंद मिनटों बाद ही स्पष्ट हो गया कि अब एक ही व्यक्ति के कदम उस तरफ आ रहे थे..और दूसरी आवाज़ निरन्तर क्षीण पड़ती चली गई।

अचानक टॉर्च का तेज प्रकाश उसके मुँह पर पड़ा। साथ ही एक गुर्राहट जैसा स्वर निकला, “कौन है ?”

अब तो बच निकलने की कोई स्थिति ही न रह गई थी। मन कसमसा रहा था, दिमाग जड़ हो गया और शरीर ने कोई हरकत करने से मना कर दिया।

यह गश्ती सिपाही था। अपने सवाल का जवाब न पाकर तेज आवाज में बोला, “बोल बे, कौन है ?”

वह गश्ती सिपाही दूसरी बार भी जवाब न पाकर उसके बिल्कुल पास आ गया, “मैंने पूछा कि कौन है…और कंधे पर यह कौन है ?”

वह घिघियाया, “भाई है मेरा। मैं जनखू हूँ साहब। देखिए साहब, मेरा भाई जीता है कि…।” इसके साथ ही उसका स्वर भीग-सा गया।

पुलिसिया कांस्टेबल अपने लिए “साहब” का सम्बोधन सुनकर गर्व से अकड़ गया। दया का भाव दिखाता हुआ वह उसके कंधे पर लटके जिस्म की तरफ घूमा। हाथ बढ़ाकर नब्ज़ थाम ली, ऐसे जैसे कोई अनुभवी वैद्य रहा हो।

इतना समय उसके कार्य के लिए काफी था।

“इसे होश…आ आ~~।” पुलिस वाला अपना कोई फैसला दे इससे पहले ही उसकी आवाज़ कण्ठ में घुट कर रह गई। वह उसी के ऊपर झूल गया। तुरन्त उसने उस पुलिसिए को एक तरफ धकेल दिया। दरअसल उसने अपनी हथेली को खड़ा करके सीधा प्रहार पुलिसमैन की गर्दन पर किया था, जिससे वह कटे पेड़ की तरह ढह गया था।
 
अब मौक़ा देखकर वह तेजी से लपक चला, लगभग भागता हुआ सा।

कुछ दूर चलकर उसकी वांछित गली आ गई। वह तुरन्त उसमें घुस गया। अब फिर से वह अंधेरे में गुम हो गया। उसके विचार से अब कोई खतरा न था। और हुआ भी यही।

एक-दो गलियां पार करके उसने एक मकान के आगे रुककर दरवाज़ा खटखटाया।

तुरन्त अंदर से आवाज़ आई, “कौन ?”

“नेताजी, मैं हूँ। दरवाज़ा खोलिए।”

“सही सलामत हो ?” फिर प्रश्न हुआ।

“जी बिल्कुल।”

अगले क्षण दरवाजे का जरा-सा पट खुला। कथित नेताजी ने जरा-सा सिर बाहर निकाल कर देखा। आश्वस्त होने पर उन्होंने पूरा दरवाज़ा खोल दिया, “आओ, अंदर आ जाओ। किसी ने देखा तो नहीं ?'”

“सवाल ही नहीं उठता। सब आराम से सो रहे हैं और देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा दर्द से कराह रहा है।”

अंदर जाकर उसने अचेत व्यक्ति को एक खाली पड़ी चारपाई पर डाल दिया।

नेताजी ने लालटेन की लौ बढ़ाई। दम तोड़ता प्रकाश सजीव हो उठा। कमरा था या घुड़साल ? एक कमरे में टूटा-सा तख्त पड़ा था। एक ओर एक चारपाई दीवार के साथ खड़ी थी। दीवार में बने एक छोटे से आले से बाहर निकली कार्निश पर लालटेन रखी थी।

कमरे में इस समय एक सीलन-घुटन सी व्याप्त थी जैसे वर्षों तक कमरा बन्द पड़ा रहा हो और धूप व हवा तक के दर्शन न हुए हों। यह था नेताजी और उनके इस साथी का आवास।

नेताजी पलटकर चारपाई के पास आ खड़े हुए और गौर से उस व्यक्ति को देखा, “जिन्दा है ?” फिर स्वयं ही आगे बढ़कर उसका हाथ थामा और नब्ज़ टटोलकर देखी। फिर गम्भीर स्वर में बुदबुदाए, “हाँ, ज़िन्दा तो है। बेहोश है।” फिर अपने साथी से बोले, “एक-एक पल हमारा कीमती है। अब समय भी ज्यादा नहीं है। कोशिश करके देख लो। अगर होश में आ जाए तो बड़ा अच्छा है। इस पर कुछ वक्त बर्बाद करके देख लो। मेरे हिस्से का एक घण्टा और बचा है, तब तक मैं सो लूँ। फिर देखेंगे।”

यह कहकर वे उस टूटे से तख्त पर जा पड़े। कुछ ही क्षण लगे उन्हें नींद आने में।

शायद आवाज़ सुनकर ही कुछ देर में उनकी नींद खुल गई थी। वही व्यक्ति, जिसे अचेत करके नेताजी का साथी यहाँ लाया था, अब होश में आ चुका था और नेताजी के साथी से लड़ रहा था। कह रहा था, उसे इस तरह जबरन उठाकर क्यों लाया गया ? इसी मुद्दे को लेकर वह लड़ रहा था। जो मुँह में आ रहा था, कह रहा था। गाली-गलौच तक हो रही थी।

नेताजी की आंख खुल गई थी। वे उठे और दोनों का बीचबचाव कराया। फिर अपहृत व्यक्ति से बोले, “झगड़ा करना ठीक नहीं है भाई। बात कुछ भी नहीं है, बस थोड़ा-सा कष्ट दूँगा।”

यह सुनते ही अपहृत व्यक्ति फिर लाल-पीला हो गया, “मैं तुम्हारा कोई काम नहीं कर सकता। सरकारी नौकर हूँ। बीवी-बच्चे भी हैं। तुम लोग आदमी तो शरीफ लग रहे हो फिर अब यह कैसा धंधा शुरू कर दिया ?”

“चुप रहो और हमारी बात सुनो।” नेताजी का साथी गुस्से में बोला।

मगर अपहृत व्यक्ति सुन ही नहीं रहा था। वह बोले जा रहा था, “तुम्हारा पहला निशाना मैं ही हूँ। फिर तो तुम्हारे सिर मुंडाते ही ओले पड़ गए। मैं वैसा नहीं जैसा आप समझ रहे हो। नौकरी के प्रति वफादार हूँ। हिंदुस्तानी हूँ, जिसका नमक खाता हूं, हलाल ही करता हूँ। मुझे जाने दो, तुम्हारा भला इसी में है।”

“चुप बे साले।” साथी ने एक हाथ अपहृत के गाल पर खींच मारा, “हमें फिलासफी पढ़ा रहा है। साले कुत्ते की दुम।”

नेताजी समझ गए कि ऐसे नहीं चलेगा। घी निकालने के लिए उँगली थोड़ी तिरछी ही करनी पड़ेगी। वे बोले, “देखो मिस्टर, अंग्रेजों के वफादार सरकारी नौकर ! मैं साफ कहने वाला आदमी हूँ। जिद यह है कि काम तुम्हें हर हाल में करना ही पड़ेगा। गोरों के प्रति जो वफादार होता है और उनका नमक खाकर नमक-हलाली करता है, उसे मैं ठीक से हलाल करता हूँ, यह समझ लो कि यह धमकी भी है और असलियत भी। तुम्हारी दोनों आँखें फोड़कर इनमें नमक भरा जाएगा।”

इस बार लगा कि वह कुछ सहम गया था। मगर बोला कुछ नहीं।

उसके सहमने को भाँप कर नेताजी बोले, “इसलिए हिंदुस्तानी हो तो दूसरे हिंदुस्तानी को पाप का भागीदार बनने पर मजबूर मत करो। यही बेहतर होगा।”

“तो क्या तुम क्रांतिकारी हो…?” मारे भय के उस अपहृत व्यक्ति के होंठ सूख गए थे। वह होंठों पर जुबान फेरने लगा, “मगर मैं ऐसा नहीं कर सकता।”

इस बार अपेक्षाकृत कुछ नम्र होकर नेताजी बोले, “भाई मेरे…मैं सब कुछ जानता हूँ। मुझे इतना बेरहम भी मत समझो।”

उसकी घबराहट थोड़ी कम हुई थी। नेताजी थोड़ा मुस्कराए और बोले, “तुम क्या कर सकते हो और क्या नहीं, तुम इस बारे में कतई फ़िक्र मत करो। हमें मालूम है कि तुम क्या कर सकते हो। हम दोनों तुमसे वैसा ही काम लेंगे, जो तुम कर सकते हो। बात इतनी-सी है कि बर्मा में मेरा एक मित्र रहता है। तुम हमारे लिए कल सुबह जाने वाले प्लेन में रंगून तक के लिए दो टिकट बुक करवा दो। हमें कल जाना है और परसों लौटकर आना है। अब दुबारा मुझे यह नहीं कहना पड़े कि नहीं मानोगे तो मैं क्या करके तुम्हें मजबूर करूँगा।”

नेताजी बराबर उसके चेहरे पर आते-जाते भावों को देख रहे थे। एक-एक सेकेंड में उसके चेहरे का रंग बदल रहा था।

यह सब कहने के बाद नेताजी ने एक ऐसा भाषण उसे सुनाया जो हर किसी देशप्रेमी को सोचने के लिए मजबूर कर दे।

और कुछ ऐसा ही हुआ भी।
 
अपहृत व्यक्ति नेताजी से चमत्कृत जान पड़ा। वह उनके आदेश को क्रियान्वित करने के लिए सहर्ष तैयार हो गया। उसकी शक्ल तो यही बता रही थी, बाकी वह खुद जाने या उसका खुदा जाने। मगर अब

वह मंत्रमुग्ध-सा नेताजी का मुँह देख रहा था।

मगर नेताजी बहुत सतर्क थे। वह कोई चाल भी चलता हो सकता था और यह भी हो सकता था कि उसका देशप्रेम अब जाग ही गया था।

नेताजी की गम्भीर मुद्रा गम्भीर ही बनी रही। उन्होंने अपहृत व्यक्ति के कंधे पर जोर से हाथ मारा, “शाबाश ! बहादुर बनो मेरे दोस्त। देखो, मैं अपने दल में गर्म स्वभाव का नेता कहलाता हूँ मगर दिल का उतना गर्म नहीं। जहां सुई से काम हो जाए, वहां पर तलवार निकालने की ज़रूरत नहीं समझता। मेरे आदमी देवदूत की तरह हर क्षण, हर जगह मौजूद रहते हैं। मैं समझता हूँ कि तुम मेरा मतलब अब अच्छी तरह समझ गए होंगे ?”

नेताजी यह कहकर चुप हो गए। मगर उन्हें लगा कि अपहृत कुछ कहना चाहता है।

“कुछ कहना चाहते हो ? कह दो, मैं अब तुम्हारी भी सुनूँगा।”

अपहृत कुछ स्वर संयत करके बोला, “वैसे…वैसे नेताजी मुझे कुछ ऐतराज तो नहीं। मगर…”

“मतलब ?”

“मतलब सीधा साफ है।”

“यानी ?”

“इस काम में खतरा ही खतरा है।”

नेताजी मुस्कराए, “हम खतरों के खिलाड़ी हैं। जान हथेली पर लिए फिरते हैं…और तुम हमें यह बता रहे हो कि इस काम में खतरा बहुत है ?”

“जी, आप मुझे गलत मत समझिए। मैं कहना चाहता हूँ कि इसके अलावा एक तरीका और भी है।”

“तो कहो।”

“नेताजी आपके काम आ सकूँ, मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है मगर…”

“जो कहना है जल्दी कह दो। समय बहुत कम है।” अब नेताजी के साथी ने उसे डाँटा।

“दरअसल…विमान में सीटें बुक करवाने से खतरा मुझे भी है और आपके लिए भी। मेरे विचार से मैं आपके लिए एक चार्टर्ड हैलीकॉप्टर का इंतज़ाम करवा देता हूँ।” यह कहकर वह नेताजी के जवाब का इंतज़ार करते हुए उनके मुँह की ओर देखने लगा।

“चलो ठीक है। तुमने कहा था कि तुम बाल-बच्चेदार आदमी हो। तुम्हारी बात मंजूर है।”

* * *

अपहृत व्यक्ति नेताजी की उस कोठरी से निकल कर, गली पार करके सड़क पर चल रहा था। तभी उसे अहसास हुआ कि उसका पीछा भी हो रहा है। यह जानकर वह कुछ भयभीत से हो उठा मगर उसे कुछ उपाय नहीं सूझा कि क्या करे, अलबत्ता सड़क पर वह तेजी से आगे बढ़ने लगा।

एक तरफ देशप्रेम था और दूसरी तरफ अपना और अपने बीवी-बच्चों का भविष्य। नेताजी का गहन शांत चेहरा और वे रौबीली चुम्बकीय आकर्षण वाली आंखें, उसे बार-बार शून्य में टकटकी लगाए देखती नज़र आ रही थीं। सोच-सोचकर वह चिंतातुर हो उठता और आप से आप उसकी चाल तेज होती जाती थी।

तभी एकाएक उसके ऊपर टॉर्च का तेज प्रकाश पड़ा। आंखों की ज्योति निस्तेज हो गई। आंखों पर से प्रकाश हटा तो उसने देखा, पास ही की एक गली के नुक्कड़ पर एक पुलिसमैन खड़ा था।

टॉर्च के प्रकाश को क्रमशः ऊपर-नीचे घुमाकर उसके शरीर के सब अंगों का जायजा लेकर पुलिसमैन ने पूछा, “कौन हो ? इतनी रात में…इस तरह से कहाँ जा रहे हो ?”

पुलिसमैन का संकेत अपह्रत के कपड़ों की ओर था। वह इस वक़्त सोते समय पहने जाने वाले लिबास में था। और फिर ऊपर से अस्त-व्यस्त सी स्थिति… घबराया हुआ-सा चेहरा। यही सब पुलिसमैन के संदेह के कारण थे।

मगर अपहृत भी हवाई विभाग में बहुत बड़ा अफसर था, अतः स्थिति की नज़ाकत को भाँपकर वह दृढ़ बना और पुलिसमैन से बड़े आत्मविश्वास भरे स्वर में बोला, “अरे भई…कहीं जा नहीं रहा, एक दोस्त के यहाँ से आ रहा हूँ।”

पुलिसमैन कुछ बोला नहीं, वैसे ही देखता रहा।

“भई मैं हूँ हरगोविंद।” फिर सफाई देने वाले अंदाज़ में आते हुए थोड़ा हँसी दिखाते हुए बोला, “भई, एक दोस्त को अचानक बड़ी तकलीफ हो गई। खबर मिली तो मैं सोने ही जा रहा था। बस रुका नहीं गया। जैसे था, वैसे ही भाग पड़ा। ऐसे क्या देख रहे हो ? कोई उठाईगिरा लगता हूँ क्या। अफसर हूँ…हवाई विभाग में बड़ा अफसर हूँ।”

पल भर को जैसे पुलिसमैन चौंका। तुरन्त बूट ‘खट्ट’ की आवाज़ के साथ बजे और हाथ माथे से चिपक गया, “म…माफ करना सर !”

“ठीक है…ठीक है।” अपहृत लापरवाही से बोला, “भई तुम बड़े मुस्तैद कारिंदे हो। समय मिला तो तुम्हारे थानेदार से मिलूँगा। अब तो तुम मुझे घर जाने दो। अरे नहीं-नहीं…तुम ड्यूटी करो। मैं खुद चला जाऊँगा।” यह कहते हुए वह आगे बढ़ता चला गया।

पुलिसमैन कुछ देर यूँ ही उसे अपने स्थान पर खड़े-खड़े देखता रहा। फिर विपरीत दिशा में बढ़ गया।

अपहृत का पीछा हो रहा था। यह मात्र संदेह न था, सच्चाई थी। नेताजी का साथी ही अपहृत का पीछा कर रहा था। उसकी हर गतिविधि पर नज़र रखने की नेताजी की हिदायत थी। इसीलिए नेताजी के साथी ने अपना हुलिया भी बदल लिया था।

वह यूँ ही बढ़ता जा रहा था कि सामने से उसे वही पुलिसमैन आता दिखाई पड़ा, जो अभी अपहृत को मिला था। वह उस पुलिसिए को देखकर एक खम्भे के पीछे जा छिपा। कुछ देर बाद वह पुलिसिया आगे चला गया तो फिर वह भी खम्भे की आड़ से निकल कर रास्ते पर आगे बढ़ गया।

मगर तभी पुलिसमैन एकाएक पलट आया।

उसके शरीर में बिजली-सी कौंध गई। अब क्या करे ? अब कहाँ छिपे ? क्या करे ? पलक झपकते ही उसने सोच लिया और एकदम पलटकर खम्भे से आ लगा। खम्भे पर दस्तक देने का ऐसे उपक्रम करने लगा जैसे वह शराब के नशे में हो।

“दरवाजा खोलो।” उसके स्वर में शराबी के जैसी लड़खड़ाहट थी।

मगर दरवाजा हो, तभी तो खुले। वह बार-बार ऐसे ही करता रहा, “खोलो~~।”

पुलिसमैन उसके पास आकर खड़ा हो गया। उसे खम्भे पर ऐसे दस्तक देते देख वह उसके और समीप आ गया। डाँटकर बोला, “क्या है बे ?”

शराबी की तरह वह पुलिसिए की तरफ घूमा, “तुमसे मतलब ? मैं अपने घर का दरवाज़ा खटखटा रहा हूँ।”

पुलिसिया मन ही मन जोर से हँसा। मगर प्रत्यक्ष में उसने खींचकर उसे एक थप्पड़ मारा, “साले इतनी पी क्यों ली, जो यह भी नहीं दिखता कि यह तेरा घर नहीं बिजली का खम्भा है ?”

चांटा खाकर उसने भी ताव आ जाने का प्रदर्शन किया। जवाब में एक थप्पड़ पुलिसिए को खींच मारा, “साले, पी रखी है क्या ? देख, ऊपर के कमरे की बिजली जल रही है।”

उसका आशय खम्भे पर ऊपर जल रहे बिजली के लैम्प से था।

थप्पड़ लगने की पीड़ा होने के बावजूद पुलिसमैन की हँसी निकल गई। वह यह कहता हुआ आगे बढ़ गया, “मर साले यहीं। खटखटाता रह दरवाज़ा।”

नेताजी का साथी वहीं रुककर पुलिसमैन के वहाँ से दूर निकलने की प्रतीक्षा करने लगा।

पुलिसमैन बड़बड़ाता जा रहा था, “साले इतनी पी लेते हैं कि दीन-दुनिया का कुछ होश नहीं रहता।”

पुलिसमैन के जाते ही वह उस अफसर के पीछे लपक चला, जो अब तक दूर जा चुका था मगर अभी आंखों से ओझल नहीं हुआ था।

और फिर…।

करीब दो घण्टे बाद वह लौटा। उसी कोठरी का दरवाज़ा खटखटाया।
 
पहले की ही तरह सावधानी बरतते हुए नेताजी ने दरवाज़ा खोला। अपना सिर अधखुले दरवाजे से बाहर निकाला, “क्या रहा ?”

“लाइन क्लियर है।” उसने कहा।

दरवाजा पूरा खुला। उनका साथी अंदर घुसा और फिर उसी तरह दरवाजा बंद कर दिया गया।

* * *

थका-हारा श्रमिक गरीब…।

विदेशी हिंदुस्तान को सोने की खूबसूरत चिड़िया कहते थे। मगर यह चिड़िया अपनी एक आँख से गरीबी के आँसू रोती है, उन्होंने यह नहीं देखा।

बंशी…।

बांस की बजने वाली बंशी नहीं, बल्कि एक जीवित इंसान। नाम ही तो बंशी था। खेतिहर मजदूर — बंशी।

भरी दोपहरी में काम करके खेत से लौट रहा था। लड़खड़ाकर बढ़ता हुआ जिस्म, पसीने से तरबतर… जैसे नहाया हो। भरी-भरी सी देह मगर रंग गहरा काला। डीप ब्लैक यानी उलटा तवा।

सत्तारूढ़ अंग्रेज गुलाम हिंदुस्तानियों को इसी नाम से पुकारते रहे — काला कुत्ता…ब्लैक डॉग। जाति से कोई हिंदुस्तानी चाहे जो हो। ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, सबको वे ऐसे ही हिकारत की नज़र से देखते थे।

यही काला रंग जिसमें सभी रंग अपना अस्तित्व खो देते हैं, बेमेल रहा। किसी में न मिल सका। या यूँ कहिए कि मिलने लायक नहीं — शूद्र, अछूत, चमार,अपवित्र और न जाने क्या-क्या…?

ब्रह्मा जी के पी.ए. — ये पण्डित।

इन पण्डों का शास्त्र कहता है — शूद्र केवल बाकी तीन वर्णों की सेवा करने के लिए पैदा हुए हैं। फलां वेद में कहा गया है, फलाँ शास्त्र में लिखा है — सेवक हैं ये।

चलो जी, मान लेते हैं — सेवक हैं। सेवक है…सेवा भी करता है…आगे भी करेगा। मगर तिरस्कार क्यों ? उपेक्षा क्यों ? अत्याचार क्यों ?

एक कहावत है — जहां गुड़ होगा, मक्खियाँ भिनभिनाएँगी ही। गुड़ का रंग देखकर नहीं, मिठास देखकर। तो फिर समझा दो इन्हें कि इन अछूतों में क्या वही मिठास नहीं, जो ब्राह्मणों में है, या वैश्य-क्षत्रियों में है ? रक्त है, माँस-मज्जा है, अस्थि-कंकाल है, हार्मोन्स हैं, दिमाग है, दिल है — पूरा एक; न कम न ज्यादा। फिर…?

कहते हैं — गंदे हैं, निम्न कोटि के काम करते हैं। इससे क्या हुआ ? ये ही निम्न कोटि के काम करते हैं ? आपने सब निम्न कोटि के काम करना छोड़ रखा है ? इतिहास गवाह है…उसमें झाँक लो जरा।

कुछ कहते हैं — गंदगी साफ करते हैं, मरे हुए पशु का गोश्त खाते हैं। भई, जब आप उन्हें कुछ खाने को न दोगे, कुछ अच्छी चीज उनके खाने के लिए ही न छोड़ोगे, सब अपने कब्जे में रखोगे तो वे बेचारे क्या करेंगे ? हवा चलने की दिशा में यदि ये आ जाएं तो आप नहाने चले जाते हो, क्या सिर्फ इसलिए कि आपकी गन्दगी साफ करते हैं। क्या आप अपनी, अपने बूढ़े माँ-बाप या अपने बच्चों की कभी गन्दगी (शौचादि) साफ नहीं करते ? एक माँ नौ महीने तक माँस के गंदे लोथड़े को कोख में रखती है और पैदा होते ही उस लोथड़े को अपने सीने से चिपका लेती है। उसकी गन्दगी साफ करती है, उसे अपने से भी ज्यादा स्वच्छ रखती है। खुद उसके गीले किए में सोती है, उसके मल-मूत्र को साफ करती है, फिर तो वह माँ सबसे अछूत हो गई ?

खैर…!

बंशी थका, सुस्त मुरझाया-सा गाँव की तरफ जा रहा था। सवाल था — पेट में भूख का, दिमाग में रोटी का।

वह गुस्से से बड़बड़ा रहा था, “आँतें कुलबुला रही हैं…दम बस निकल ही जाएगा। ये नथिया…उफ नथिया की बच्ची, आज अभी तक रोटियाँ लेकर नहीं आई। हैंय…कहीं कुछ हो तो नहीं गया। होना क्या है ? कमबख्त लग गई होगी मुहल्ले की लौंडियों के साथ खेल में। आज देख लूँगा। मैंने भी इस लौंडिया की चुटिया जड़ से न उखाड़ फेंकी तो बंशी कौन कहे।”

वह अपने आप भूख और उससे उपजे आवेश में बड़बड़ाता जा रहा था।

सामने ही एक बड़ा सा पेड़ था। वह उधर ही बढ़ गया, यह सोचते हुए — ‘अरे छोड़, थोड़ा पेड़ की छाँव में सुस्ता लूँ। कैसी घनी छाँव है। थोड़ी ठंडी हवा ले लूँ तब चलूँ। शायद आ ही जाए वह नथिया।’

उसने कंधे से अंगोछे को उतारा और जमीन पर दो-चार बार मारकर, थोड़ी सी बैठने लायक जगह साफ की। अंगोछे को झाड़कर नीचे बिठाया और एक दीर्घ निश्वास खींचकर पेड़ के तने से सिर लगाकर बैठ गया।

कुछ एक पल बीते। एकाएक उसके कानों में अपनी बहन की जानी-पहचानी आवाज पड़ी, “ऐ भैया !”

बंशी ने सिर उठाकर देखा। नथिया हाथ में एक लोटा और एक रोटी का नथना पकड़े चली आ रही थी।

बंशी के पेट में भूख ने दरवाजे भड़भड़ाना शुरू कर दिया। मगर उसने थोड़ा रोष भी दिखाया, “क्यों री नथिया, कहाँ रह गई थी तू। पता है, तीसरा पहर होने को आया है।”

नथिया मुँह लटकाकर बोली, “भैया, वो रामकली रही ना, जोहड़ से निकल कहाँ रही थी। सुबह से कहीं जाकर अब निकली। मुनवा के झोटे के संग परली पार चली गई थी। मैं…।”

“बस…बस कर। पहले से ही बहाना गढ़ा हुआ मिलेगा तेरा। मैं जानता नई हूँ तुझे। ला, मारे भूख के जैसे प्राण शरीर से निकल ही जाएंगे।” बंशी ने उछल कर लोटा नथिया के हाथ से छीन लिया और मुँह से लगाकर गटागट पीता चला गया।

“अरे-रे-रे…।” नथिया बंशी को रोकने के प्रयास में अपने हाथ-पैर पटककर रह गई। बंशी ने तब तक लोटा खाली करके नथिया के हाथ में पकड़ा दिया, “जा ज़ल्दी सामने के उस कुएँ से ठंडा-सा पानी भरकर ला। तब तक मैं…।” वाक्य अधूरा ही छोड़कर वह रोटी का नथना खोल बैठा।

सुबह का भूखा और सामने था अन्न। बंशी खाने पर ऐसे टूट पड़ा जैसे मुर्दा जानवर पर गिद्ध टूट पड़ते हैं। नथिया यह सब देखकर मुस्कराई। फिर झपट कर कुएँ की तरफ भागी चली गई थी।

बंशी बड़ी बेसब्री से खाने पर जुटा था। अभी वह एकाध रोटी ही खा पाया था कि अचानक उसके दिल में तेज दर्द-सा उठा। लगा कि जैसे आग में बुझा कोई नश्तर सीने में घुस गया हो। उसकी संतुलन स्थिति डगमगा गई। कपड़े खून से रंगने लगे।

किसी दिशा से गोली चली थी जो बंशी के सीने में बाई ओर लगी थी। अधचबी रोटी से भरा उसका मुँह फटा का फटा रह गया। उसने झपटकर उस पेड़ की जड़ में निकले एक ठूँठ को मजबूती से थाम लिया। एक तेज कराह निकली और मुँह का सब कुछ खाया-पिया उलट गया।

* * *
 
वहीं जंगल में…।

दूर कोई बोला था, “वो…वो क्या हो गया ?”

यह रॉबर्ट ग्रीन का घबराया हुआ स्वर था। अंग्रेज कलेक्टर रॉबर्ट ग्रीन, जो सैर को निकले थे, इस घटना को देख सन्नाटे में आ गए। साथ ही मौलवी दाऊद खान का चेहरा भी फक्क पड़ गया था। उससे भी प्रत्यक्ष में कुछ कहते न बन पड़ रहा था।

मौलवी को चुप देखकर रॉबर्ट का भय और बढ़ गया। भयातुर सा वह मौलवी को झिंझोड़ने लगा, “टूम जानता हाय मौलवी, हाम उस मैन को नेई मारा। करगोश के बच्चे को मारा। हाम उसको नेई मारने सकटा।”

आगे कुछ दूरी पर नथिया का स्वर सुनाई दिया। वह शायद अपने भैया से अभी दूर थी। वह कह रही थी, “भैया…भैया, वो डोर टूट गई। लोटा कुएँ में डूब गया। अब कैसे पानी खींचूं ?”

नथिया को बंशी का उत्तर न मिला। उसे क्या खबर थी कि इधर बंशी के जीवन की डोर टूट चुकी थी।

रॉबर्ट और मौलवी सकते में आ गए क्योंकि उनके हाथों वहाँ एक आदमी का खून हो चुका था।

सहसा नथिया की चीख से वातावरण गूंज उठा।

मौलवी का बोल फूटा। वह घबराए स्वर में बोला, “भाग छूटो साहब। मैं कहता हूँ भाग छूटो।” मौलवी झपटकर अपने घोड़े तक जा पहुँचा। घोड़े की नाथ पकड़कर एक तरफ को भाग छूटा। उसके पीछे-पीछे रॉबर्ट ग्रीन भी उसी तरह अपने घोड़े की रास थामे उसे लेकर पैदल ही भाग रहा था।

ये दोनों घोड़ों के साथ पैदल भाग रहे थे। उन्हें यह भी सुध-बुध न हुई थी कि घोड़े पर बैठकर ही वहाँ से भाग जाते। इसे कहते हैं — हाथों के तोते उड़ना।

दौड़ते-दौड़ते अचानक रॉबर्ट ग्रीन कराह कर रुक गया। भागते समय शायद किसी कँटीली झाड़ी की कोई टहनी जैसी चीज उसके पैर को रगड़कर छील गई थी।

चीख सुनकर पल भर को मौलवी रुका, “क्या हुआ साहब ?”

राबर्ट तेजी से अपने पैर को सहला रहा था। उसका चेहरा लट्ठे की तरह सफेद पड़ गया था।

“हामारे पैर को कुच चोट लग गया है मौलवी।” खून चोट लगने की जगह से अब रिसना शुरू हो गया था।

मौलवी ने ग्रीन की तरफ झुकते हुए उसके पैर पर नज़र डाली, “कोई खास नहीं है।” फिर उसी तरह बेसब्री से बोला, “भाग चलो साहब…किसी ने गर यहाँ देख भी लिया तो हम दोनों मारे जाएँगे। कानून बाद में कुछ करेगा, यहाँ के लोग ही हमें धुन डालेंगे। बस हम गाँव पहुँच जाएँ, फिर मैं वैद्य को दिखा दूँगा। ठीक हो जाएगा। अभी चलो घोड़े की पीठ पर बैठ जाते हैं।”

मौलवी ने राबर्ट को सहारा देकर घोड़े की पीठ पर बिठाया। फिर खुद अपने घोड़े पर बैठकर उसे ऐड़ लगाई। दोनों के घोड़े सरपट दौड़ पड़े।

“जितनी जल्दी इस जगह से दूर निकल जाएं, उतना ही अच्छा।”

दोनों घोड़े द्रुत गति से दौड़ने लगे।

काफी दूर आगे जाकर एक दरिया के किनारे दोनों ने अपने घोड़े रोके। अब उनके कुछ होश ठिकाने आए थे। दोनों ने बैठकर पसीना पोंछा। दरिया का बहता साफ पानी पिया और एक तरफ बैठकर हाँफने लगे। जैसे दौड़कर वे ही आए थे, उनके घोड़े नहीं दौड़कर आए थे।

“वो साला पाजी को उदर हामारी गोली से मरना था। साला उदर करटा ख्या रहा ?” राबर्ट ग्रीन बोला।

“छोड़ो साहब, उस बात को अब छोड़ दो। खतरा टल गया। मेरे अलावा उस बात को अब कोई नहीं जानता।”

राबर्ट कुछ कहने ही जा रहा था कि उसी क्षण दरिया में कोई भारी चीज आकर गिरी जिससे काफी दूरी तक पानी में गोलाकार वृत्त बनते-बिगड़ते चले गए।

राबर्ट ग्रीन ने एक झटके से गर्दन घुमाकर पीछे देखा। एक व्यक्ति घोड़े से उतर रहा था, जो देखने से ही डाकू जान पड़ता था। इस समय और कोई ग्रामीण व्यक्ति होता तो उठकर भाग जाता। मगर वे बैठे रहे। अब तक शायद मौलवी भी उसे देख चुका था, तभी तो भौहें चढ़ाकर बोला था, “नवाब तुम ?”

“हाँ, मैं नवाब।” वह रहस्यमय ढंग से मुस्कराया। इससे पल भर को दोनों के जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई थी। मगर मौलवी ने अभी अकड़ न छोड़ी थी वह डपटकर बोला, “क्या है ? यहाँ क्या कर रहे हो ?”

“ऐसे ही टहल रहा था। जैसे आप पहले घोड़े के साथ-साथ टहल रहे थे… और फिर घोड़े पर चढ़कर दौड़ने की प्रैक्टिस कर रहे थे।” नवाब हँस कर बोला, “तो मैंने सोचा कि मिल लेता हूँ तुम्हें शायद मेरी ज़रूरत पड़ने वाली है।”

मौलवी अचकचा गया, “नहीं- नहीं…हमें तुम्हारी क्या ज़रूरत ?”

नवाब फिर जोर से हँस पड़ा, “तुम्हें तो मैं जानता हूँ मौलवी। तुम तो कलेक्टर साहब के खैरख्वाह हो, किसी से कहोगे नहीं। मगर मैं…मुझे तो कोई लालच नहीं।”

मौलवी और रॉबर्ट दोनों सिहर गए। मगर प्रकट में मौलवी चेहरे पर रौब लाकर बोला, “तुम क्या बक-बक कर रहे हो ? क्या जानते हो तुम ? और क्या जानता हूँ मैं ?”

“मौलवी कितने भोले हो तुम। गोली चलने की क्या कोई आवाज़ नहीं होती ?”

इस बात पर राबर्ट ग्रीन के छक्के छूट गए थे। उसकी शक्ल देखने वाली हो गई थी। उसने बदहवासी से मौलवी की तरफ देखा। मौलवी ने उसे फिक्र न करने का इशारा किया। नवाब से वह उसी तरह कड़ककर बोला, “नवाब तुम जानते नहीं कि किससे बातें कर रहे हो ? मुझे भूल गए ? मेरी मेहरबानी पर शेर बने घूम रहे हो। वरना पिंजरे में होते।”

नवाब बड़े विचित्र तरीके से हँसा, “सब जानता हूँ मौलवी तुम्हें। वे डाके भी मुझे याद हैं जो मैंने तुम्हारी शह पर डाले, तुम्हें हिस्सा दिया। और वे डाके भी मुझे याद हैं, जिन डाकों में तुम्हें हिस्सा न दिया तो वहीं डकैती का माल पुलिस को पकड़वा दिया…और सरकार की तरफ से इनाम मार लिया।”

नवाब ने राबर्ट की तरफ देखा और एक क्षण के लिए चुप हो गया। मगर राबर्ट कुछ भी नहीं कह पा रहा था। फिर मौलवी से बोला, “तुम्हारी तो यही औकात है। मगर हाँ, तुमने मुझे बचाए रखा, इसके लिए मैं तुम्हारा कर्जदार हूँ। बचा लूँगा तुम्हें भी, फंसने नहीं दूँगा। मगर मुआवज़ा लूँगा।”

“नवाब !” मौलवी तिलमिलाकर गरज उठा, “अपनी खाल में रहो।”

दोनों को झगड़ते देख राबर्ट ग्रीन घबरा गया। उसे लगा कि नवाब इस घटना में उनके विरोध में चला गया तो मौलवी को चाहे ज्यादा नुकसान न हो मगर वह फंस जाएगा। इसलिए उसने मौलवी के कंधे पर हाथ मारा, “मौलवी, नवाब की माँग बी जायज हाय। अच्चा… नवाब परसों शहर में आकर अपना पैसा मुझसे ले जाना। ओके ?”

नवाब मुस्कराया, “कलटटर साहब, आप समझाइए न मौलवी साहब को। नाहक गुस्सा करते हैं।”

“हाँ, मगर टूम मेरी मदद करने को कहटे ठे। कइसे ?” राबर्ट ग्रीन ने पूछा।

“कोई बड़ी बात नहीं है हुजूर। सौ-दो सौ रुपये मरने वाले के भाई हरिया को देकर मुँह सी आऊँगा। बस फिर कोई कुछ नहीं करेगा।”

नवाब की इस बात से मौलवी और राबर्ट ग्रीन दोनों संतुष्ट हो गए। तब राबर्ट नवाब से बोला, “ओके, अपना हिसाब आकर ले जाना, आँ।” अब पहली बार राबर्ट मुस्कराया था। जवाब में नवाब ने भी अट्ठहास लगाया, “अच्छा चलता हूँ। मौलवी मेरी बात का बुरा मत मानना। ठन्डे दिमाग से सोचना।”

नवाब घोड़े पर चढ़ा और धूल उड़ाता हुआ एक तरफ को चला गया।
 
मौलवी !

मौलवी गाँव की सारी मिल्कियत का अकेला जमींदार। चाहे हिन्दू हो या मुसलमान या अन्य कोई; सभी पर उसका रौब था। मौलवी को अंग्रेजों की बड़ी इनायत हासिल थी। यही नहीं, वफादारी का तमगा तक अंग्रेजों ने उसे दे रखा था। (अंग्रेज लोग ऐसे तमगे अपने वफादार हिंदुस्तानियों को दिया करते थे)

इलाके में कोई भी अंग्रेज आता था तो मौलवी का ही मेहमान बनता था। गाँव भर में मौलवी एक नेक और दरियादिल इंसान माना जाता था। लोग ऐसा ही मानते थे क्योंकि वह अंग्रेजों का खैरख्वाह था और फिर जमींदार भी था, लोग गलत कहने की हिम्मत करते भी तो कैसे ?

मगर गलत तो नवाब ने भी एक शब्द नहीं कहा था। इसीलिए तो तिलमिला गया था मौलवी। सच्चाई बहुत कड़वी जो होती है।

* * *
 
[दो]

वैद्य बैकुंठ राज !

किन्तु गाँव में कोई भी आदमी उनका यह नाम नहीं जानता था। सब उन्हें “बैज्जी” पुकारते चले आए थे तो बैज्जी ही नाम पड़कर रह गया था।

दिन के तीसरे पहर बैज्जी अपनी दवाखाने की बैठक में मोढ़े पर बैठे, हुक्के का पाइप मुँह में दबाए धुआँ उड़ा रहे थे। भीतर दालान (बरामदे) में एक तरफ बैठा उनका चेला रमुआ इमामदस्ते में कोई दवा की जड़ी कूट रहा था।

बैज्जी यूँ ही धुआँ उगलते रहे। इसी तरह कुछ क्षण बीते थे कि उन्होंने देखा — दो घुड़सवार आकर छप्पर के बाहर रुके हैं। नज़र शायद बैज्जी की कमजोर थी। साफ नहीं देख पाए, अलबत्ता इतना अंदाजा जरूर हो गया था कि कोई भूले-भटके मुसाफ़िर हैं।

“बैज्जी !”

कानों में आवाज़ पड़ी तो वैद्यजी स्वतः उछल कर खड़े हो गए थे। शायद आवाज़ मात्र से ही उन्होंने आगन्तुक को पहचान लिया था। फिर निकट जाकर गौर से देखा, “अरे मौलवी…मौलवी साहब आओ।” फिर वैद्यजी ने नज़र फैलाकर मौलवी के साथ वाले व्यक्ति को देखा। पहचान तो नहीं पाए मगर फिर भी स्वागत में बोले, “अरे शहरी साहब…मेहमान हैं…ऐंजी ? आओ… अंदर आ जाओ जी।” फिर अंदर को मुँह करके ज़ोर से बोले, “अरे ओ रमुआ।”

अंदर से रमुआ ने कुछ कहा मगर बैज्जी को समझ नहीं आया था। वे फिर बोले, “अरे देख तो साहब लोग आए हैं। अबे भाग के आ, चारपाई बिछा।”

आगन्तुक राबर्ट ग्रीन और वही मौलवी (मौलवी दाऊद खान) थे।

दोनों बैज्जी के पीछे-पीछे चलकर अन्दर छप्पर में आकर बैठ गए।

रमुआ हैरान था। वह दौड़कर आया और चारपाई ठीक की। ये लोग बैठे तो वह सिरहाने की तरफ खड़ा होकर देखने लगा, जैसे कोई अजूबा हुआ हो।

उसके लिए तो यह अजूबा सा ही था। आज से पहले उसने बैज्जी को किसी के सामने इस तरह नरम होते और किसी का रौब खाते न देखा था। सब बैज्जी के ही रौब में रहते थे हमेशा।

“साहब जी…बीमार तो आपमें से कोई लगता नहीं है। ऊपर वाले की दुआ से, भले-चंगे लग रहे हो। कहो तो गरीब की कुटिया में आप पधारे हो तो क्या सेवा करूँ आपकी ?”

बात मौलवी ने संभाली, “हाँ, बीमार तो कोई नहीं। अलबत्ता जंगल से गुजरते वक़्त किसी कँटीली झाड़ी से छिलकर साहब के पाँव में थोड़ा-सा ज़ख्म हो गया है।”

राबर्ट ने तुरन्त अपना वह पैर आगे बढ़ा दिया।

बैज्जी ने झुककर बड़े अदब से राबर्ट के पैर को देखा। फिर एकाएक ही मुँह घुमाकर रमुआ से बोले, “अरे खड़ा-खड़ा मुँह क्या देख रहा है। साहब लोगों के लिए दूध-पानी तो ले आ, चल।”

सुनकर रमुआ जब अन्दर चला गया तो बैज्जी फिर उन लोगों से मुखातिब हुए, “किसी जहरीली झाड़ी से ज़ख्म आया है। वैसे घबराने की कोई बात नहीं है। दवाई ऐसी बांध दूँगा कि ज़ख्म दो ही दिन में बराबर।” फिर एकदम अन्दर की तरफ मुँह करके चीख-से पड़े,

“रमुआ रे, थोड़ा गर्म पानी भी लियाईयो।”

दूर अंदर से आवाज़ आई थी, “अभी लाया बैज्जी।”

बैज्जी के साथ दोनों इधर-उधर की बातें करते रहे। कुछ ही देर में रमुआ एक बड़े लोटे में दूध और दो-तीन चमचमाते कलई के गिलास लेकर आ गया। साथ में एक चौड़े मुँह के बर्तन में कोई आदमी आकर गर्म पानी भी दे गया।

बैज्जी का चेला…। बड़े सम्मान से गिलास में दूध डाल-डाल कर उन्हें पिलाने लगा।

इसके बाद, बैज्जी ने राबर्ट का पैर गर्म पानी में दवा डालकर धोया। बैज्जी जब-जब दवा का पानी राबर्ट के ज़ख्म पर डालते, वह कराह उठता। बैज्जी कहते रहते, “बस जरा सा दर्द जरूर होगा, बाद में सब ठीक कर देगा।”

फिर बैज्जी अपना इलाज करते रहे और बेचारा राबर्ट इस भारतीय चिकित्सा पद्धति को झेलता रहा।

बैज्जी राबर्ट के ज़ख्म पर पट्टी बांधकर बैठे ही थे कि बाहर कुछ शोर हुआ। किसी के रोने-चीखने का सा शोर था यह।

बैज्जी ने फिर रमुआ को पुकारा, “अरे भई देख तो कौन है बाहर ?”

रमुआ बेचारा बाहर की तरफ लपका।

“बैज्जी हैं ?”

यह पूछने वाला था बंशी का भाई हरिया। वह बंशी की देह को कांधे पर लटकाए खड़ा था। साथ में खड़ी थी उन दोनों की छोटी बहन नथिया। रो-रोकर और चीख-चीखकर जैसे मन का ज्वार अभी शांत हुआ था।

“कौन हो, आए कहाँ से हो ?” रमुआ का सीधा प्रश्न था।

“आपकी परजा हैं सरकार। वो पास में ही गाँव है ना वहीं से आए हैं। बड़े आफत के मारे हैं साहब हमारी थोड़ी मदद करो। वैद्य जी को बुला देओ।”

“बैज्जी नहीं है।” रमुआ ने जानबूझकर झूठ बोलते हुए फटकार सुनाई, “तुम लोगों की यहाँ आने की हिम्मत कैसे हुई ? हमारे मोहल्ले में कदम रखने की तुमने जुर्रत क्यों की ?” यह एक तरह से उसने बैज्जी की ही नकल की थी।

हरिया क्षीण किन्तु खुशामद भरे स्वर में बोला था, “क्या कहें बाबू, देखो तो कितना लहू बह गया है। पता नहीं किदर से गोली चली और बंशी का सीना छेद गई।”

“हाँ बाबू, ये भैया को ऐसा कुछ न हुआ होता तो राम कसम हम इधर आने की हिम्मत भी नहीं करते। बाबू, ज़ल्दी से बैज्जी को बुला देओ। इसे बचा लो…हमारा भाई मर रहा है…इसे बचा लो।” नथिया गिड़गिड़ा पड़ी।

मगर वहाँ कोई टस से मस नहीं हुआ।

रमुआ की हेकड़ी जाती रही। नथिया के करुण आग्रह को भी जब ठुकरा दिया गया तो वह सोचने पर मजबूर हो गया कि अब क्या हो सकता है।

“बाबू, भगवान तुम्हें दुनिया की सारी नेमत बख्शें। तनिक बैज्जी को बुला देओ। तुम्हारा बड़ा अहसान होगा।”

रमुआ कुछ हिचकिचाया। उन दोनों का करुण आग्रह और बंशी की शोचनीय स्थिति उससे देखी नहीं गई। वह चलकर वैद्यजी के पास गया और अपनी तरफ से सिफारिश करने लगा।

“बैज्जी, उदर के गाँव से हरिया और नथिया आए हैं, बंशी को लेकर। बैज्जी उसकी हालत बहुत खराब है, मुर्दा-सा ही हो रहा है। चलके एक नज़र देख लेओ।”

“कौन हरिया ?” वैद्यजी शायद समझ नहीं पाए थे। मौलवी ने अपना अंदाज़ा बताया, “अरे, वो तो नहीं सुक्खन चमार का ?”

“हाँ साहेब, वो ई हरिया है। गाँव की पैंठ में हमारे यहाँ जूते बेचा करते हैं ये लोग।”

“अबे वो चमार का।” बैज्जी एकाएक तैश में आ गए, “उस हरामखोर की इतनी हिम्मत कैसे हुई कि हमारी बस्ती में घुस आया।”

“बैज्जी, उस बेचारे बंशी की हालत बहुत खराब है। मैं कहता हूँ, उसे देखकर कोई अच्छी-सी दवा…”

“रमुआ !” बैज्जी गरज पड़े, “मानता हूँ तू भोला है। तभी तुझे यह समझा रहा हूँ कि तू इस मामले में मत बोल। अक्ल के अंधे जरा सोच, कहाँ हम और कहाँ वे अछूत। धर्म भ्रष्ट नहीं हो जाएगा हमारा। हम उसे छूकर भी नहीं देख सकते। जा कह दे कि नहीं हैं बैज्जी।”

“यह तो मैं उनसे कह ही रहा था। बेचारे…” रमुआ बड़बड़ाकर रह गया।

बेचारा रमुआ !

वहीं खड़ा सोचता रह गया — क्या वास्तव में वे छूने के काबिल नहीं हैं ? क्या सचमुच उनकी और हमारी कोई बराबरी नहीं ? मगर दिल तो कुछ और ही कह रहा था उसका।

“अरे जा, खड़ा-खड़ा सोच क्या रहा है। कह दे न उससे जाकर कि हम उसे नहीं देख सकते।” फिर अचानक तेज स्वर करके बोले, “न जाएं तो ससुरों को धक्के मार-मारकर निकाल देना और फिर नहाकर आ जाना।” फिर खुद ही बड़बड़ाने लगे, “मरदूद आ मरे।”

रमुआ को भी बुरा लगा। वह अनिच्छा से चलकर दरवाजे तक गया। न चाहते हुए भी उसने कहा, “बैज्जी कहते हैं कि तुम्हें नहीं देख सकते। तुम अछूत हो, उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा तुम्हें छूने से।”

धर्म न हुआ, छुई मुई का कोई पेड़ हो गया। छूते ही मुरझा जाएगा। बनाने वालों ने क्या नाज़ुक चीज बनाई है — धर्म।
 
नथिया फट पड़ी, “बाबू जी हमारा भैया मर जाएगा…. हमारी मदद कर दो। बदले में बैज्जी हमसे जो बिगार करवाएंगे हम कर देंगे।” नथिया बिलख-बिलख कर रो पड़ी।

हरिया गर्दन झुकाए ज्यों का त्यों खड़ा रह गया। उसे तो यही उम्मीद थी कि ये लोग नहीं पसीजेंगे। मगर नथिया जिद करने लगी थी। उसने बहुत समझाया था मगर नथिया ही नहीं मानी थी। बोली थी वह– बैज्जी कितने ही निर्मम सही, मेरी यानी एक कन्या की बात जरूर मान जाएंगे। तरस खाकर उसके भैया को देख लेंगे…इलाज करेंगे…ठीक हो जाएगा। हरिया ने भी सोचा था — चलो, शायद इस बार ऐसा कुछ हो जाए। जो कभी नहीं पसीजे, आज शायद पसीज जाएं। मगर हुआ वही जिसका उसे डर था।

अचानक बंशी ने एक हिचकी ली। मुँह से खून बहकर हरिया के ऊपर फैल गया। उसका जिस्म हरिया के कंधों पर झूल कर निर्जीव हो गया था। नरश्रेष्ठों की दुनिया में एक नराधम बना दिए गए इंसान ने दम तोड़ दिया था।

हरिया के धैर्य का बाँध टूट गया। वह हिचकियाँ लेकर रो पड़ा। इस निर्मम समाज ने उसके भाई की बलि ले ली। इंसान इंसान का दुश्मन हो गया। एक पवित्र हो गया…दूसरा अछूत।

वैद्यजी भी अब दरवाजे पर आ गए थे। वे बोले, “अरे हरामखोरो ! तुमने सुना नहीं ? जाओ यहाँ से। किसी ने देख लिया तो मेरा हुक्का-पानी भी बिरादरी में बन्द हो जाएगा। जाओ…चले जाओ।”

नथिया का रो-रोकर बुरा हाल था। हरिया ने अजीब दृष्टि से वैद्यजी को देखा। फिर नथिया से बोला, “चल।”

जो होना चाहिए था, वह तो हुआ नहीं। जो नहीं होना चाहिए था, वह हो गया था।

“अरे तुम जाते हो या धक्के मारकर निकलवाऊं ?”

हरिया अब कहता भी क्या ? कहने को रह भी क्या गया था। थके हुए मुसाफिर की तरह वह पलटकर चल दिया।

“अरे तू भी जा नामुराद। खड़ी-खड़ी टसुवे क्यों बहा रही है।” बैज्जी नथिया को यूँ ही खड़ी रहा देखकर चीखे थे।

“चली जाऊँगी। जा रही हूँ मगर इसका इंसाफ भगवान के यहाँ होगा। वह सबकी सुनता है। उसके यहाँ देर है, अंधेर नहीं।”

“चली जा नालायक। हम पंडित हैं और तू अछूत। हमें सिखा रही है ? धर्म क्या है, तुझसे ज़्यादा जानते हैं हम। चल दफा हो यहाँ से।”

पण्डित !

पंडितों के न्याय तो अन्याय कौन कहता। कोई बोला भी नहीं था।

हरिया और नथिया, दोनों चले गए थे; न्याय की दी हुई लाश कंधे पर लेकर रमुआ गुमसुम खड़ा था।

राबर्ट ग्रीन औऱ मौलवी भी अंदर से उठकर आ गए, “अच्छा बैज्जी, चलते हैं।”

“अरे बैठो तो साहब। नालायकों ने दिमाग खराब कर दिया। अब कुछ देर प्रभु का स्मरण करना पड़ेगा।”

“बस चलते हैं बैज्जी। साहब को शहर भी लौटना है।” मौलवी चल पड़ा। थोड़ी देर बाद अपने-अपने घोड़े लेकर दोनों चले गए तो बैज्जी ने कोने में चुप खड़े रमुआ को बाँह पकड़ कर खींचा।

वह खोया हुआ सा पूछ बैठा, “बैज्जी, क्या ये लोग ऐसे ही मरते हैं ?”

* * *

यह आज़ादी से लगभग चार-पाँच वर्ष

पूर्व का समय था। अंग्रेजी शासन का काल अपने चरमोत्कर्ष पर था इन दिनों। अंग्रेजी शासकों का पूर्ण प्रभुत्व था हिंदुस्तान पर। चारों तरफ गोरों का आतंक था। किसी की हिम्मत न थी कि उनके खिलाफ मुँह भी खोल सके। मौलवी दाऊद खान जैसे लोगों की बन आई थी। अंग्रेज भारत में ऐसे लोगों को ही बढ़ावा देते थे, जो उनके खैरख्वाह बनकर रहें।

[पाठक मित्रों, यह कहानी जो आपने पढ़ी, मेरठ जिले के मवाना तहसील के अंतर्गत आने वाले, किला परीक्षितगढ़ क्षेत्र में घटी एक सच्ची कहानी है किंतु इस कहानी के इतिहास में कोई प्रमाण नहीं मिलते। और इसके जिन पात्रों से मिलकर मैंने यह कहानी 25-30 वर्ष पहले तैयार की थी, अब वे भी इस दुनिया में नहीं हैं। अतः कुछ विवाद न पैदा हो जाए, इसलिए मैंने इस कहानी को प्रस्तुत करने के लिए “जय नगर” नामक एक काल्पनिक स्थान की रचना की है।]

तो आइए, कहानी पर आगे बढ़ते है–

कुछ लोग अपनी जान और मान-सम्मान हथेली पर रखकर शुरू से ही बुलंद आवाज़ में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे। धीरे-धीरे चिंगारी बढ़ी, क्रांति की आग फैली। चिंगारी शोले बने और बुझे। बुझे शोलों की जगह फिर नई चिंगारियां शोलों में बदलती रही। यही सिलसिला वर्षों से चल रहा था। अब भी क्रांति-दल चुप नहीं बैठे थे, कार्यरत थे। गर्म दल वाले विस्फोट कर रहे थे। नरम दल वाले आंदोलन और सत्याग्रह कर रहे थे। मगर दोनों तरफ से अंग्रेजों पर दबाव था। हिंसा और अहिंसा, दोनों तरीकों से लड़ाई चल रही थी।

इधर छुआछूत का आडम्बर भी जोरों पर था। अंग्रेजों के खैरख्वाह, नवाब, जमींदार और धर्म के ठेकेदार इस आग में भी अपनी रोटियां सेंक रहे थे।

ऐसी ही स्थिति-परिस्थिति में…।

जय नगर कॉलिज से बारहवीं की परीक्षा देकर, छुट्टियां बिताने के लिए घर लौट रहा था — आनन्द।

उन दिनों परिवहन का ऐसा जोर न था। वह साइकिल से ही सफर तय कर रहा था। वहीं के एक गाँव ललित पुर (आप इसे ग्राम ललियाना भी समझ सकते हैं) के सेठ बद्रीप्रसाद का बेटा आनन्द जय नगर ऊंची तालीम हासिल करने के लिए गया था। वहाँ कॉलिज के हॉस्टल में रहकर ही उसने अब तक की शिक्षा पूर्ण की थी।

साल के बीच में पिता या बड़े भाई साहब एक-दो बार हॉस्टल में ही जाकर उससे मिल आया करते थे। बड़े त्योहारों की छुट्टी में वह अपने घर मिलने आ जाया करता था। साहूकार का बेटा था। अतः खाता-पहनता भी अच्छा ही था। इस समय भी वह शानदार पैंट और टेरालीन की शर्ट पहने लकदक था। गाँव का कोई अनसमझ आदमी उसे इस वक़्त देख ले तो तहसीलदार ही समझ लेगा।

चलते-चलते रास्ते में गढ़ मुक्तेश्वर पड़ा। गढ़ मुक्तेश्वर जो गंगा के किनारे बसा अच्छा, रौनकदार शहर है। लोग दूर-दूर से आज भी यहाँ गंगा नहाने आते हैं।

आनन्द ने सामने आया मौका हाथ से जाने न दिया। किनारे पर साइकिल खड़ी करके तबियत से खूब नहाया। मन आल्हादित हुआ। होठों ही होठों में वह कुछ गुनगुनाने लगा।

तभी एक किताबें बेचने वाला उधर आ निकला। वह पढ़-पढ़ कर किताबें बेच रहा था। आनन्द को कुछ रुचि हुई। इकन्नी देकर किताब खरीद ली। पास ही की एक दुकान पर गया। खाने को कुछ मंगाया और किताब खोलकर पढ़ने लगा —

“आज है तातील* का दिन, लूटें मज़े यारों में हम।

कैद कल हो जाएंगे कॉलिज की दीवारों में हम।।

नौकरी नायाब तो हमको कोई मिलती नहीं।

जूतियां चटखाएँगे फिर-फिर के बाजारों में हम।।” (* छुट्टी)

पढ़कर आनन्द का मन कुछ लज्जित सा हो गया। वह आगे नहीं पढ़ पाया। किताब बन्द कर दी। लिखने वाले की इन पंक्तियों ने उसे कुछ सोचने को बाध्य कर दिया था। सोचने ही लगा — हमें नौकरियाँ क्यों नहीं मिलतीं ? क्यों हमें अपने ही देश में जीवन यापन का हक नहीं ?

वह यूँ ही सोचता चला गया — हाँ, देश तुम्हारा अपना कब है ? तुम गुलाम… तुम्हारा अपना क्या है ? जीवन भी तुम्हारा अपना नहीं है। गुलाम जो ठहरे… गुलाम शासक के सामने सिर झुकाए रखे यही उसे अच्छा लगता है। गुलाम अपने आका के सामने सिर उठाकर चले, यह बात शासक क्यों बर्दाश्त करेगा ? तुम्हें सिर झुकाकर रखना ही होगा …क्योंकि तुम गुलाम हो… गुलाम…गुलाम…गुलाम…।”

“गुलाम” शब्द तेजी से उसके कानों में बज रहा था।

इन्हीं विचारों में खोया हुआ वह अपनी साइकिल उठाकर उस पर चढ़ने लगा।

दुकान वाले ने आवाज़ दी, “बाबू साहब !”

आनन्द शायद दुकानदार के पैसे चुकाना भूल गया था। यह सोचकर वह झेंप गया। साइकिल खड़ी करके वह वापिस दुकानदार के पास गया। वह पैसे निकालकर देने लगा तो दुकानदार बोला, “नहीं बाबू जी, पैसे तो आपने बहुत देर पहले दे दिए थे।”

“फिर ?”

दुकानदार ने एक कागज की छोटी-सी पर्ची उसे थमा दी, “यह आपकी पर्ची।”

आनन्द ने पर्ची खोली और पढ़ी –‘विजयनगर (बंगाल) से खबर आई है। नेताजी व उनके साथ उन्ही के एक साथी रंगून गए थे। उस बड़े अंग्रेज अफसर का काम तमाम कर आए, जो यहाँ आकर अगले हफ्ते नियुक्त होने वाला था। इस अफसर को जनरल डायर की तरह कई जलियांवाला बाग जैसे कांड करने के लिए यहाँ की सरकार ने लंदन से बुलाया था।’
 
आनन्द ने मेटर पढ़ा तो खुशी से उसका मन मयूर नाच उठा। मगर सहसा वह चौंक पड़ा। यह पर्ची उसे इस दुकानदार ने क्यों दी है आज ? हैरत से दुकानदार को देखते हुए उसने पूछा, “क्या तुम भी ?”

“हाँ बाबूजी।” अपना कान आनन्द के कान के पास लाकर बोला, “आजकल यहाँ भी कई लोग चुपचाप क्रांतिकारियों के लिए काम कर रहे हैं। मुझे किसी ने आपकी तरफ इशारा किया था तो मैंने सोचा कि आप को भी अपने नेताजी का भेजा यह पैगाम दे दूँ।”

आनन्द ने तुरन्त दुकानदार से तपाक से हाथ मिलाया और नेताजी के इस कारनामे पर अपनी खुशी जाहिर की जिसके कारण एक और जलियांवाला बाग जैसा कांड होने की संभावनाएं नष्ट कर दी गई थीं।

तभी दुकानदार ने अपना मुंह घुमाकर एक ओर संदेह से देखा। फिर आनन्द से बोला, “फिर किसी दिन बात करेंगे। अब आप निकल जाओ। तुरन्त। एक आदमी जो इधर ही आ रहा है, उस पर मुझे शक है। उसने हम दोनों को बतियाते देख लिया तो हम दोनों की पुलिस में मुखबिरी कर देगा।”

तुरन्त आनन्द वहाँ से हट गया। अपनी साइकिल उठाई और चढ़कर चलता बना।

शहर की बाहरी सड़कों का चक्कर काटते हुए वह अपने गाँव जाने वाली पगडंडी पर चढ़ गया। विचारों में यही सब चल रहा था। देश के हालात, क्रांतिकारियों और सत्याग्रहियों के आंदोलन की बातें…आदि-आदि।

काफी दूर निकल जाने पर गर्मी और सफर की थकान के कारण आनन्द को प्यास लगी। नजदीक में कोई पीने के पानी का स्रोत न था। अतः वह प्यास को रोके चलता ही रहा…चलता ही रहा। मगर प्यास अब उसे जोरों से लग आई थी।

कुछ दूर आगे जाकर उसकी आशा के अनुसार एक गांव आ गया। उसने अपनी साइकिल उस गाँव की तरफ मोड़ दी।

गाँव के बाहर एक मंदिर था। मंदिर के आँगन में एक कुंआ नज़र आया। उस पर कोई आदमी पानी भर रहा था। आनन्द साइकिल खड़ी करके तेजी से कुएँ की तरफ लपका।

पानी भरने वाले ने आनन्द को देखा तो सहम गया — अरे, ये बाबू अपने गाँव में कैसे ? अरे यह तो अपनी तरफ ही आ रहा है। वह व्यक्ति लोटा-डोर छोड़ कर तेजी से कुएँ से उतरा और एक तरफ भाग निकला।

“अरे …अरे…सुनो भाई…सुनो तो..।” आनन्द उस आदमी की यह हरकत देखकर हैरान रह गया। उधर, वह आदमी खुद अचंभे में आ गया था। आने वाले ने मुझे भाई कहा ? उसे अपने कानों पर विश्वास न हुआ मगर ठिठक कर वह रुक ज़रूर गया था।

आनन्द उसके नज़दीक गया, “भाई, मैं आदमी हूँ, कोई हौव्वा तो नहीं। मुझे देखकर ऐसे भाग क्यों पड़े ?”

“जी साब…वो…आप बाबू लोग हो और हम अछूत हैं। इसलिए…।”

“अरे छोड़ो ये सब। मुझे बहुत जोर से प्यास लगी है। जरा कुएँ से खींचकर थोड़ा पानी पिलाओ।”

उस आदमी की आँखें हैरत से फ़टी रह गई। हकलाकर वह बोला, “हम…हम…नहीं…नहीं हम पानी आपको… नहीं।” उसका स्वर बड़बड़ाहट से परिपूर्ण था।

“क्यों, एक आदमी ‘तुम’ दूसरे आदमी ‘मुझको’ पानी पिला दे तो क्या अजूबा हो जाएगा ?”

“मगर साब हम कह चुके ना कि हम अछूत हैं। हम अपने हाथ से आपको पानी नहीं पिला सकते। आप ऊँचे लोग हैं।”

“ओफ्फोह…,” आनन्द झल्ला गया, “मेरा तो मारे प्यास के दम निकला जा रहा है और तुम हो कि अपनी यही रट लगाए हुए हो।”

“नहीं साब, मैं आंखों देखी मक्खी नहीं निगल सकता। मैं आपको जानता हूँ। आप ललितपुर वाले सेठ जी के बेटे हो। कल को बात खुली तो मेरा मरना हो जाएगा।”

आनन्द को अब बेहद गुस्सा आ गया था, “अबे उल्लू की दुम फ़ाख्ता। सब कुछ जानता है फिर भी पानी नहीं पिला रहा है। इससे तो अच्छा होता कि तू मुझे न जानता। चल जिद नहीं करते। पानी पिला।”

“जी नहीं साब…आप जिद कर रहे हैं। मैंने कह दिया ना कि पानी नहीं पिला सकते हम।”

आनन्द से न रहा गया। उसका हाथ उठ ही गया और एक चांटा उस आदमी के गाल पर पड़ा।, “आखिर कुछ बात भी है।”

वह आदमी हैरत से आनन्द का मुँह देखता रह गया।

“मैं कहता हूँ — यह बता कि पहले अंडा पैदा हुआ या मुर्गी ?”

वह चुप रहा। अजीब सवाल था। अजीब था यह सवाल करने वाला।

“बस तो जैसे इस बात का जवाब नहीं कि पहले अंडा पैदा हुआ कि मुर्गी, उसी तरह इस सवाल का भी जवाब नहीं है कि हममें से कौन बड़ा है, कौन छोटा ? कौन छूत है और कौन अछूत ? क्या माथे पर लिखा है या भगवान के घर से कोई चिट्ठी आई थी जिसमें लिखा था कि अमुक छोटा है और अमुक बड़ा है।”

वह आदमी अचम्भे से आनन्द को देख रहा था। वह बोला, “पता नहीं साब। वो पंडीजी कहते हैं कि शास्त्रों में बखान है कि हम लोग छूने के भी काबिल नहीं। पंडीजी तो देवता आदमी हैं, झूठ थोड़े ही बोलते होंगे।”

आनन्द उस पर दाँत पीसकर रह गया, “इन पण्डित-पुजारियों ने ही तो हिन्दुस्तान को कगार पर ला खड़ा किया है।” फिर आनन्द बोला, “अब तू पानी पिला रहा है या…।” चीख-सा पड़ा वह, “मैं कहता हूँ, चढ़ कुएँ पर। पानी खींच। मैं भी चाहे प्यासा मर जाऊं, पर आज यहाँ से जाने वाला नहीं हूँ।”

वह हिचकिचाता-सा कुएँ पर चढ़ा। पानी खींचा। फिर खूब रगड़-रगड़ कर हाथ धोए। फिर लोटा-डोर को मांजा। दुबारा पानी खींचा और लोटे को बिना हाथ लगाए आनन्द के सामने कर दिया जिससे कि वह खुद लेकर पी सके।

आनन्द ने पानी पीने के अंदाज में दोनों हथेलियां फैला दीं और खड़ा रहा, “पिलाओ।”

वह आदमी झिझका, सहमा और लोटे का जरा सा कोना छुआ। ऐसे ही पानी आनन्द की हथेलियों में उड़ेल दिया। आनन्द भी लोटे का सारा का सारा पानी पी गया।

पानी पीकर आनन्द ने राहत की साँस ली। फिर उससे पूछा, “नाम क्या है तेरा ?”

“बाबूजी, कौम से तो चमार हूँ। हरिया नाम है।” अब वह बड़ा खुश था, “बाबूजी साँच कहूँ हूँ। क्या आप तहसीलदार बन गए हो ?”

अब आनन्द ने अपने ऊपर एक नज़र डाली और बरबस हँस पड़ा, “अरे नहीं। ऐसा कोई घपला नहीं है। अरे हाँ, हरिया। सुना था, तुम्हारे गाँव के किसी बंशी नाम के आदमी को हमारे गाँव की सरहद में गोली मार दी थी किसी ने। मारने वाले का कुछ पता चला ?”

हरिया ने एक निश्वास खींची और नजरें नीची करके बोला, “हम अछूत हैं बाबू। हमारे हिस्से में न जिंदगी का लुत्फ है, न बयाने मौत। हम तो मुर्दा जिस्म हैं, घिसट रहे हैं जिन्हें चिता की आग अभी नसीब नही हुई है। गरीब तो रोज मरता है, ये ऊंचे लोग तो एक बार मर कर अमर हो जाते हैं साहब।”

आनन्द ने तब तक एक सिगरेट होठों से लगा ली थी। एक हरिया की तरफ बढ़ा दी, ” ये अन्याय है। और तुम सह रहे हो। अपराधी तुम भी हो। एक साथ मिलकर आवाज़ बुलंद करो। न सुनने वालों के कानों के पर्दे फट जाएंगे। सुनना ही पड़ेगा उन्हें। गरीब हैं तो वे अमीर और ऊँचे हैं। देखने वाले न होंगे तो ड्रामा क्या खाक चलेगा। खैर, सिगरेट पियो।”

आनन्द ने उसकी और अपनी सिगरेट सुलगाई और स्वयं कश लेता हुआ साइकिल की तरफ चलने लगा। हरिया भी पीछे-पीछे चल रहा था। अब वह बोला, “साब, आज मन की बात आपसे कह रहा हूँ। जिस आदमी ने बेवजह मेरे भाई बंशी को मार दिया, पता लगा लूँगा और किसी भी तरह उसे तो खत्म करके छोडूंगा।”

आनन्द ने उसकी आँखों में झाँका, जहां अब भय नहीं था, आत्मविश्वास की चमक थी।

* * *
 
[पाँच]

राबर्ट ग्रीन बड़ी बेचैनी से अपने कमरे में चहलकदमी कर रहा था। उसके चेहरे पर इस समय भय व्याप्त था। माथे पर पसीने की बूंदें झिलमिला रही थीं जिन्हें बार-बार वह रुमाल से पोंछ लेता था।

तभी मौलवी दाऊद खान भी पहुँच गया। दरवाजे से अंदर दाखिल होते हुए ही वह चौंका। फिर अदब से पूछा, “मैं अंदर आ जाऊं साहब ?”

“आओ मौलवी।”

मौलवी अंदर आ गया। राबर्ट ग्रीन की हालत देखकर कुछ हमदर्दी जताने के भाव से उसने पूछा, “साहब, आज आप कुछ परेशान नज़र आ रहे हैं ?”

“यस…यू आर राइट मौलवी।”

“ऐसी क्या बात है जो जनाब इस कदर परेशान हैं ?”

“ख्या बताएँ मौलवी…ई। आज नवाब जहूर डाकू का चिट हामारे पास आया है।”

नवाब जहूर का नाम सुनकर मौलवी चौंका। फिर बड़बड़ाया, “वह तो जेल में था।” आश्चर्यचकित नेत्रों से उसने राबर्ट की ओर देखा।

“टीन डीन पहले वह जेल से भाग गया था और कल ग्यारह बजे वह मेरे घर मेंय डाखा डालने आएगा।”

“ओह !” एक पल के लिए मौलवी को अपने पैरों तले से धरती खिसकती महसूस हुई। मगर वह राबर्ट को ढारस बंधाने के लिहाज़ से बोला, “नवाब जहूर। उसकी ये मज़ाल। खैर, आप फिक्र न कीजिए साहब। मैं अभी पुलिस को इसकी इत्तला कर देता हूँ। और फिर मैं खुद भी देखूँगा। देखता हूँ कैसे मेरे रहते यह ऐसी जुर्रत कर पाएगा।”

“पोलिस से ख्या होगा मौलवी। मुज़े टो भोत डर लगटा हाय। वो चोट खाया नाग हाय।” राबर्ट ग्रीन के चेहरे पर निरन्तर घबराहट के चिन्ह झलक रहे थे।

“आप इसकी कतई चिंता न करें हुजूर। बाकी सब मुझ पर छोड़ दीजिए। ऐसों को तो मैं कई बार रस्ते पे ला चुका हूँ। जो उसने सोचा होगा, वह मेरे दिमाग में है। कल सुबह नौ बजे से ही यहाँ पुलिस का सख्त पहरा आप लगवाएंगे और पुलिस यहाँ छिपकर रहेगी।”

“जईसा टूमारा मरजी।”राबर्ट ग्रीन ने माथे का पसीना पोंछा और घबराहट भरे स्वर में बोला, “मेरी समज में इडर कुच नई आटा। उडर बर्तानिया में हाम होटा टो सब कुच हामारी मुट्टी में ठा।”

* * *

अगले दिन सुबह ही इंस्पेक्टर अपनी पुलिस फोर्स लेकर अग्रिम सुरक्षा के लिए राबर्ट ग्रीन के बंगले पर पहुँच गया। उसने मकान के चारों तरफ घेरा डालकर पुलिस को हर पल चौकन्ना रहने की हिदायत दी और उन्हें एक गुप्त सिग्नल बताकर उस सिग्नल पर ही आक्रमण कर देने की हिदायत दी।

राबर्ट ग्रीन का घबराहट के मारे बुरा हाल था। सारे शरीर से पसीने चूने लगे थे। घबराकर बार-बार घड़ी की तरफ देखता। उसे ग्यारह बजने का इंतज़ार था। जैसे ग्यारह बजते ही उसके मकान पर कोईबम फटेगा और वे सब लोग ध्वंस हो जाएंगे। उसने सारे शहर के पुलिस अफसरों को इसकी खबर दे दी थी।

जब बाहर से इंस्पेक्टर को आते देखा तो उसकी घबराहट कम हुई। इंस्पेक्टर ने समीप आकर उससे धीरे से कहा, “सर, सब कुछ ठीक हो गया। किसी तरह का कोई खतरा नहीं है। कुछ ही देर में पुलिस के और आदमी भी आने वाले हैं।”

राबर्ट ने कोई जवाब नहीं दिया। उसे अब भी शायद थोड़ा-बहुत भय था। वह जानता था कि नवाब जहां भी डाका डालता है, पहले ही सूचित कर देता है और वह हर प्रकार की व्यवस्था कर देने के बाद भी बड़ी सफाई से अपना काम कर डालता है।

राबर्ट ग्रीन को चुप देखकर इंस्पेक्टर बोला, “सर, आप बिल्कुल न घबराएँ। इज़ाज़त हो तो मैं हिफाज़त के लिए आपके मकान में उचित जगह देखकर एक ऐसा यंत्र फिट कर देता हूँ जो कि नवाब की उपस्थिति का हर हाल में पता दे देगा।”

“क्यों, इससे क्या…” राबर्ट की आंखों में आए हल्के से आश्चर्य के भाव को देखकर इंस्पेक्टर ने उसे समझाया, “नवाब का जैसे ही किसी भी रास्ते से मकान में कदम पड़ेगा, यह यंत्र एक विशेष प्रकार की आवाज़ करने लगेगा…और हम सब तुरन्त जवाबी कार्रवाई शुरू कर देंगे।”

राबर्ट के चेहरे पर अनमने से भाव प्रकट हुए। वह बोला, “जैसा तुम चाहो कर लो।”

“थैंक यू सर।” इंस्पेक्टर मकान के अंदर घुस गया।

राबर्ट को अब संतोष हुआ। वह भी अंग्रेज था, चतुर चालाक। वह इस समय भी पूरी तरह चौकन्ना था। वह हर आदमी की गतिविधि पर यहींसे नज़र रख रहा था।

इंस्पेक्टर अपना काम करके बाहर आ गया। जब वह नजदीक आया तो राबर्ट ग्रीन ने फौरन रिवाल्वर निकाल कर इंस्पेक्टर की तरफ तान दिया।

मिसेज राबर्ट ग्रीन भी शायद किसी बात के सलाह-मशवरे के लिए उधर ही आ रही थी। वह यह देखकर ठिठक गई थी।

राबर्ट चीखकर बोला, “टूमने मेरे कमरे से ख्या चुराया हाय?” मगर तभी बिजली की सी फुर्ती से इंस्पेक्टर के हाथ में भी रिवाल्वर आ गया और उस रिवाल्वर से बिना आवाज़ किए गोली चली तो राबर्ट का रिवाल्वर उछल कर दूर जा गिरा।

“हाँ मि. ग्रीन, तुम वक़्त से पहले ही सही बात ताड़ गए। दाद देता हूँ तुम्हारे दिमाग की। मैंने तुम्हारे कमरे से वे कागज़ात चुराए हैं जिन पर तुमने और मौलवी ने मिलकर नवाब से खाली कागजों पर दस्तखत करवाए थे ताकि वक़्त आने पर तुम उन कागजों पर कुछ भी लिखकर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सको।”

तभी बाहर से पुलिस जीप के आने की आवाज़ सुनाई दी। राबर्ट ग्रीन के दम में दम आ गया और वह तत्काल चिल्लाया, “अब टूम बी यहाँ से बच कर नई जा सकटे।”

इंस्पेक्टर जो पुलिस वेश में आनन्द था, कुछ देर के लिए हड़बड़ा गया मगर फिर कड़ककर बोला, “इससे पहले तुम मरने के लिए तैयार हो जाओ।” उसने रिवाल्वर का रुख उसकी ओर करके ट्रिगर दबाया ही था कि राबर्ट की पत्नी बीच में आ गई, “नई, टूम उनको नई मारने सकटा।” मगर तब तक गोली मेमसाब केे सीने में समा चुकी थी। उसके कण्ठ से एक चीख निकल गई।

राबर्ट अपनी पत्नी की तरफ़ दौड़ा तो आनन्द बाहर की तरफ भागा मगर इत्तेफाक से सामने आ गया मौलवी दाऊद खान। उसने आनन्द को पहचान लिया, “आनन्द तुम…तुमने राबर्ट का…।” मौलवी दाऊद खान का वाक्य पूरा होने से पहले ही गोली उसके कण्ठ में समा गई और वह एक चीख मारकर वहीं ढेर हो गया।

आनन्द ने उसकी कोई परवाह नहीं की और सीधा दौड़ता चला गया।

तभी पुलिस मकान में दाखिल हुई तो आनन्द ने संयम न खोते हुए ही अपनी साथी (नकली) पुलिस को सिग्नल दे दिया।

सिग्नल पाते ही आनन्द की पुलिस असली पुलिस पर पीछे से टूट पड़ी। पल भर में ही पुलिस के सिपाही अचानक आक्रमण के कारण कुछ सोच भी न पाए, धरती पर पड़े तड़पने लगे।

आनन्द को अपने पहचान लिए जाने का डर था। उसने भागने की कोशिश की लेकिन पुलिस का इंस्पेक्टर बड़ा ही चालाक निकला। उसने आनन्द को देख लिया था।

इंस्पेक्टर ने निशाना साधकर गोली चलाई। मगर आनन्द ने भी उसे देख लिया था, इसलिए झुकाई देकर बचने की कोशिश की और जवाब में निशाने पर गोली मारी। निशाना अचूक बैठा। इंस्पेक्टर अगले पल ही जमीन पर ढेर हुआ पड़ा था । मगर अर्ध-मृत अवस्था में भी वह आनन्द को भागने देने से रोकने की जीतोड़ कोशिश कर रहा था। जब तक उसकी गर्दन एक ओर को ढुलक नहीं गई, वह आनन्द पर फायर ही करता रहा और आनन्द उछल-कूदकर, कभी लेट कर और कभी झुकाई देकर बचता ही रहा। आखिरकार उस इंस्पेक्टर के प्राण-पखेरू उड़ ही गए।
 
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