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मायावी दुनियाँ

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मायावी दुनियाँ



'टन टन टन! स्कूल की घण्टी तीन बार बजी और रामू को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके दिल पर किसी ने तीन बार हथौड़े से वार कर दिया। चौथा पीरियड शुरू हो गया था और ये पीरियड उसे किसी राक्षस के भोजन की तरह लगता था। किसी तरह खत्म ही नहीं होता था। उसे गणित और गणित के अग्रवाल सर दोनों से चिढ़ थी। और चौथा पीरियड उन्हीं का होता था।

उसने अपने मन को उम्मीद बंधाई कि शायद आज अग्रवाल सर न आये हों। किसी एक्सीडेन्ट में उनकी टांग टूट गयी हो। आजकल के ट्रेफिक का कोई भरोसा तो है नहीं।

लेकिन ट्रेफिक वाकई भरोसेमन्द नहीं है। क्योंकि अग्रवाल सर अपनी दोनों टांगों की पूरी मजबूती के साथ क्लास में दाखिल हो रहे थे। चेहरे पर चढ़ा मोटा चश्मा उन्हें और खुंखार बना रहा था।

आने के साथ ही उन्होंने बोर्ड पर दो रेखाएं खींच दीं और एक लड़के को खड़ा किया, ''अनिल, तुम बताओ ये क्या है?

अनिल खड़ा हुआ, ''सर, ये दो समान्तर रेखायें हैं।

''शाबाश। बैठ जाओ। गगन, तुम समान्तर रेखाओं की कोई एक विशेषता बताओ।

''सर, समान्तर रेखाएं आपस में कभी नहीं मिलतीं। गगन ने तुरन्त जवाब दिया। उसकी गणित का लोहा तो अच्छे अच्छे मानते थे।

''गुड। तुम भी बैठ जाओ। रामकुमार, अब तुम खड़े हो।

''लो, आ गयी शामत।" किसी तरह उसने अपनी टांगों पर जोर दिया। पूरी क्लास का सर उसकी तरफ घूम गया था।

''बताओ, समान्तर रेखाएं आपस में क्यों नहीं मिलतीं ?" अग्रवाल सर ने सवाल जड़ा और उसका दिमाग घूम गया। उन दोनों से तो इतने आसान सवाल और मुझसे इतना टेढ़ा।

''सर, रेखाएं स्त्रीलिंग होती हैं। और सित्रयों की विशेषता यही होती है कि वो ससुरी आपस में मिल बैठकर नहीं रह सकतीं। आखिरकार उसे एक धांसू जवाब सूझ ही गया।

दूसरे ही पल पूरी क्लास में एक ठहाका पड़ा और वह बौखला कर चारों तरफ देखने लगा। क्या उसके मुंह से कुछ गलत निकल गया था?

''अबे घोंघाबसंत की औलाद, पूरी दुनिया सुधर जायेगी लेकिन तू नहीं सुधरेगा । चल इधर किनारे आ। दूसरे ही पल उसका कान अग्रवाल सर की मुटठी में था। किनारे पहुंचकर पहले तो उस खड़ूस ने दो तीन थप्पड़ जमाये फिर मुर्गा बन जाने का आर्डर दे दिया।

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सड़क पर पैडिल मारते हुए रामकुमार उर्फ रामू आज कुछ ज्यादा ही विचलित था। उसे एहसास हो गया था कि गणित जीवन भर उसके पल्ले नहीं पड़ेगी। और गणित के बिना जीवन ही बेकार था। यही सबक रोज उसके माँ बाप और टीचर्स दिया करते थे।

सो उसने अपना जीवन समाप्त करने का निश्चय किया। उसके रास्ते में एक छोटा सा जंगल पड़ता था। उसके अंदर एक गहरा तालाब है, ये भी उसे पता था। उसने अपनी साइकिल सड़क से नीचे उतार दी। अब वह उस गहरे तालाब की ओर जा रहा था। चूंकि उसने तैरना सीखा नहीं था, इसलिए वह आसानी से डूबकर मर जायेगा यही विचार आया उसके मन में।

जल्दी ही उसकी साइकिल तालाब के किनारे पहुंच गयी। उसने स्पीड तेज कर दी। वह साइकिल के साथ ही पानी में घुस जाना चाहता था।

अचानक उसे लगा, पीछे से किसी ने उसकी साइकिल रोक ली है। उसने घूमकर देखना चाहा, लेकिन उसी समय उसकी गर्दन भी किसी ने पकड़ ली। कोई उसकी गर्दन दबा रहा था। धीरे धीरे उसपर बेहोशी छा गयी।

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इस छोटे से कमरे में तेज नीली रोशनी फैली हुई थी। इस रोशनी में चार बच्चे आसपास खड़े हुए किसी गंभीर चिंतन में डूबे थे। पास से देखने पर राज़ खुलता था कि ये दरअसल बच्चे नहीं, बौने प्राणी हैं। क्योंकि इनके चेहरे पर दाढ़ी मूंछें भी मौजूद थीं। इनके शरीर का गहरा पीला रंग सूचक था कि ये प्राणी इस धरती के अर्थात पृथ्वीवासी तो नहीं हैं।

इसी कमरे के एक कोने में रामू मौजूद था। बेहोश अवस्था में। लेकिन कमरे की सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाली वस्तु थी, एक ताबूतनुमा शीशे का बक्सा। जिसके अंदर उन्ही चारों जैसा एक प्राणी निश्चल अवस्था में पड़ा हुआ था।

''तो अब क्या इरादा है मि0 रोमियो? उन चारों में से एक ने वातावरण में छायी निस्तब्धता तोड़ी।

''हमें अपने सम्राट को किसी भी कीमत पर बचाना है। वरना पृथ्वी नाम के इस अंजान ग्रह पर हम ज्यादा समय तक जिन्दा नहीं रह पायेंगे।

''सारी गलती हमारे यान के आटोपायलट की थी। यहां के वायुमंडल में उतरते हुए उसने यान को पूरी तरह डिसबैलेंस कर दिया। नतीजे में हमारे सम्राट का शरीर लगभग पूरा ही नष्ट हो गया।" तीसरा व्यक्ति बोला।

''ठीक कहते हो सिलवासा। अब हमारे सम्राट के शरीर में केवल उसका मस्तिष्क ही सही सलामत बचा है। और अगर हमने देर की तो वह भी नष्ट हो जायेगा। क्यों रोमियो?" पहले वाला बोला।

''हाँ डोव। अब आगे मैडम वान को अपना हुनर दिखाना है। उन्हें जल्द से जल्द सम्राट का दिमाग उस लड़के के शरीर में ट्रांस्प्लांट कर देना है, जिसे हम जंगल में तालाब के किनारे से पकड़ कर लाये हैं।"

''ठीक है।" तीसरा व्यक्ति जो दरअसल मैडम डोव थी, बोल उठी। और फिर वे सब अपने अपने काम में जुट गये। रामू को ताबूत के बगल में लिटा दिया गया था। फिर वे मस्तिष्क ट्रांस्प्लांट के आपरेशन में जुट गये। एक तरफ रामू का सर खोला जा रहा था और दूसरी तरफ सम्राट का।

ये आपरेशन पूरे एक घण्टे तक चलता रहा। और फिर थोड़ी देर बाद सम्राट का दिमाग रामू के जिस्म में फिट हो चुका था। जबकि रामू का दिमाग अलग एक ट्रे में नजर आ रहा था।

''अब पूरा हो गया है आपरेशन। हम लड़के के दिमाग को अब नष्ट कर देते हैं।" मैडम वान ने रामू के शरीर को अच्छी तरह टेस्ट करने के बाद कहा।

''मेरे दिमाग में एक आइडिया आया है।" खिड़की से बाहर डाल पर बैठे बन्दर की ओर देखते हुए कहा रोमियो ने।

''कैसा आइडिया ?" सिलवासा ने पूछा।

''इस दिमाग को उस बन्दर में फिट करके जंगल में छोड़ देते हैं। अगर होश में आने के बाद सम्राट के दिमाग ने इस शरीर को कुबूल नहीं किया तो एक मनुष्य का दिमाग बेकार में नष्ट हो जायेगा।"

''ठीक कहते हो रोमियो।" डोव ने सहमति जताई, और छोटी सी पिस्टल निकालकर बन्दर की तरफ तान दी। उसे बेहोश करने के लिए।

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मिसेज और मिस्टर वर्मा रामू के स्कूल में मौजूद थे। उनके सामने थी प्रिंसिपल मिसेज भाटिया।

''देखिए, मैं फिर आपसे कहती हूं कि हाईस्कूल लेवेल तक के बच्चों की छुटटी ठीक दो बजे हो जाती है। उसके बाद किसी के यहां रुकने का सवाल ही नहीं पैदा होता। और आपके बच्चे रामकुमार को तो मैं अच्छी तरह जानती हूं। वो तो कभी लाइब्रेरी भी नहीं जाता।" प्रिंसिपल ने कहा।

''फिर भी आप अगर स्टाफ से एक बार पूछ लें तो...। दो घण्टे हो रहे हैं। रामू अभी तक घर नहीं पहुंचा।" मि0 वर्मा बोले।

''उसकी तो कहीं इधर उधर जाने की भी आदत नहीं है।" स्कूल से सीधा घर ही आता है।

उसी समय वहां किसी काम से अग्रवाल सर ने प्रवेश किया। इन्हें बैठा देखकर वह इनकी तरफ घूमे।

''अच्छा हुआ आप लोग आ गये। आपका बच्चा रामकुमार गणित में बिल्कुल गोल है। अगर आपने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया तो इस साल उसका पास होना मुश्किल है।

''एक मिनट!" प्रिंसिपल ने उसे रोका, ''मि0 और मिसेज वर्मा यहां इसलिए आये हैं क्योंकि इनका लड़का दो घण्टे से घर नहीं पहुंचा।"

''ज़रूर वह किसी पार्क वगैरा की तरफ निकल गया होगा। आज मैंने उसे सजा दी थी। हो सकता है दिल बहलाने के लिए कहीं पिक्चर देखने निकल गया हो।"

''आप ऐसा करें, प्रिंसिपल मि0 वर्मा की तरफ मुखातिब हुई, ''थोड़ी देर और अपने लड़के का इंतिजार कर लें। हो सकता है अब तक वह घर पहुंच गया हो। अगर ऐसा नहीं होता है तो हमें और पुलिस को इन्फार्म करें।"

''ठीक है।" दोनों ठंडी सांस लेकर उठ खड़े हुए। उनके चेहरे पर परेशानी की लकीरें और गहरी हो गयी थीं।

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सम्राट के पपोटों में हरकत पैदा हुई और फिर धीरे धीरे उसने आँखें खोल दीं। उसके आसपास मौजूद सहयोगियों के चेहरे खिल उठे।

''आप कैसा महसूस कर रहे हैं सम्राट?" डोव उसकी तरफ झुका।

''मैं तो ठीक हूँ। लेकिन मुझे हुआ क्या था?"

''सम्राट! हमारे अंतरिक्ष यान में हुई दुर्घटना में आपका शरीर पूरी तरह नष्ट हो गया था। इसलिए हमने आपका दिमाग एक मानव के शरीर में फिट कर दिया है।"

''क्या?" चौंक पड़ा सम्राट।

''क्या हमसे कोई गलती हो गयी सम्राट?" डरते डरते पूछा रोमियो ने।

थोडी़ देर चुप रहने के बाद सम्राट बोला, ''तुम लोगों ने बिल्कुल ठीक किया। इस शरीर में शायद मैं अपने मकसद में जल्दी कामयाब हो जाऊँ। वह मकसद, जिसके लिए हम इस पृथ्वी पर आये हैं।"

''अब आगे के लिए क्या प्लान है सम्राट?" रोमियो ने पूछा।

''फिलहाल जिस बच्चे का शरीर तुम लोगों ने मुझे दिया है, उसके घरवालों से मैं मिलूंगा। और कोशिश करूंगा उनमें घुलमिल कर रहने की। अगर मैं अपनी पहचान छुपाने में कामयाब रहा तो हम यहां बहुत कुछ कर सकते हैं।"

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रामू जब क्लास में दाखिल हुआ तो आगे बैठे हुए सभी लड़के ठहाका मारकर हंस दिये। उन्हें पिछले दिन अग्रवाल सर को दिये जवाब और फिर उसके मुर्गा बनने की याद आ गयी थी।

''लो आ गया गणित का डब्बा।" अमित बोला। वह अग्रवाल सर का चहेता स्टूडेन्ट था।

''इसके दिमाग का डब्बा तो हमेशा गोल रहेगा। पता नहीं किसने इसे हम लोगों के बीच बिठा दिया।" गगन मुंह बिचकाते हुए बोला।

रामू बिना किसी से बात किये चुपचाप पीछे की सीट पर जाकर बैठ गया।

जल्दी ही अग्रवाल सर का पीरियड भी शुरू हो गया। अंदर दाखिल होते ही उनकी पहली दृष्टि रामू पर गयी।

''रामू! कल छुटटी के बाद तुम कहां गायब हो गये थे?"

''मैं टहलने गया था जंगल तक। संक्षिप्त जवाब दिया रामू के रूप में सम्राट ने।"

''अपने रिश्तेदारों से मिलने गया होगा वहाँ ये।" एक महीन सी आवाज उभरी और पूरी क्लास ठहाकों से गूंज उठी।

अग्रवाल सर ने सबको शान्त किया और पढ़ाना शुरू किया, ''आज मैं त्रिभुजों के कुछ गुण बताता हूँ। तीन भुजाओं से मिलने वाली ये आकृति त्रिभुज कहलाती है।" ब्लैक बोर्ड पर चाक से अग्रवाल सर ने त्रिभुज की आकृति खींची, ''गगन, तुम बताओ, त्रिभुज के तीनों कोणों का योग कितना होता है?"

''सर, एक सौ अस्सी डिग्री।" गगन ने फौरन जवाब दिया।

''गुड। रामकुमार, तुम खड़े हो और बताओ समबाहू त्रिभुज क्या होता है?" अग्रवाल सर किसी से पूछें या न पूछें रामू से जरूर पूछते थे।

रामू खड़ा हुआ, ''सर, पहले मैं गगन के जवाब में कुछ जोड़ना चाहता हूं। त्रिभूज के तीनों कोणों का योग हमेशा एक सौ अस्सी डिग्री नहीं होता। यह निर्भर करता है उस सतह पर जहां वह त्रिभुज बना हुआ है। अगर वह सतह यूक्लीडियन प्लेन है तब तो कोणों का योग एक सौ अस्सी डिग्री होगा, वरना कम या ज्यादा भी हो सकता है। मिसाल के तौर पर त्रिभुज किसी घड़े जैसी सतह पर बना है तो कोणों का योग एक सौ अस्सी डिग्री से ज्यादा होगा। और अब मैं आता हूं आपके सवाल पर.........।" अग्रवाल सर ने उसे हाथ के इशारे से रुकने के लिए कहा और खुद अपने सर को थामकर कुर्सी पर बैठ गये।

पूरी क्लास अवाक होकर रामू को देख रही थी।

''यह सब तुमने कहाँ पढ़ा?" अग्रवाल सर ने अपनी साँसों को संभालते हुए पूछा।

''यह तो कामनसेन्स है सर।" रामू के जवाब ने गगन और अमित के साथ अग्रवाल सर को भी सुलगा दिया।

''सर आज्ञा दें तो मैं रामू के कामनसेन्स का टेस्ट लेना चाहता हूं।" गगन अपनी सीट से उठा। अग्रवाल सर ने बिना कुछ कहे सर हिलाया।

''बताओ एक से सौ तक की संख्याओं को योग कितना होता है?" गगन ने पूछा। उसे मालूम था कि जिस फार्मूले को उसके भाई ने बताया है यह जोड़ निकालने के लिए, वह रामू को हरगिज नहीं पता होगा।

''पाँच हजार पचास!" जितनी तेजी से रामू ने जवाब दिया उससे यही लगा किसी ने उसके दिमाग में कम्प्यूटर फिट कर दिया है।

रामू यही बताकर चुप नहीं हुआ, ''मैंने यह कैलकुलेशन फार्मूले के आधार पर की है। जहां तक की संख्याओं को जोड़ना है, उससे एक आगे की संख्या लेकर उस संख्या से गुणा करो और फिर दो से भाग दे दो। रिजल्ट मिल जायेगा। वास्तव में यह समान्तर श्रेणी का एक स्पेशल केस होता है। यह श्रेणी अलजेब्रा की एक कामन श्रेणी है । अन्य प्रचलित श्रेणियां हैं गुणोत्तर, हरात्मक तथा चरघातांकी।"

उसने खामोश होकर इधर उधर देखा। सारे बच्चों के साथ अग्रवाल सर का भी मुंह भाड़ जैसा खुला हुआ था। उन्हें इसका भी एहसास नहीं था कि एक मक्खी लगातार उनके खुले मुंह से अन्दर बाहर हो रही है।

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''हैलो राम।" रामू ने घूमकर देखा, उसी के क्लास की स्टूडेन्ट नेहा उसे पुकार रही थी।

''क्या बात है नेहा?"

''आज तो तुमने सबकी बजा दी। क्या जवाब दिये।"

''शुक्रिया।" सपाट चेहरे के साथ कहा रामू ने।

''क्या बात है? आज तो तुम बदले बदले दिखाई दे रहे हो।" नेहा ने गौर से उसकी ओर देखा।

''मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ।" गड़बड़ा कर रामू बने सम्राट ने कहा।

''चलो कैंटीन चलकर चाउमीन खाते हैं।" नेहा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

''चलो।" दोनों कैंटीन की तरफ बढ़ गये।

उस बंदर ने एक अंगड़ायी लेकर आँखें खोल दीं, जिसके शरीर में रामू का दिमाग फिट किया गया था। दो पलों तक तो उसकी समझ में नहीं आया कि वह कहाँ है फिर उसने चारों तरफ नजर दौड़ायी। वह जिस पलंग पर लेटा था अचानक वह जोर जोर से हिलने लगा। उसने घबरा कर नीचे नजर की और उसकी जान निकल गयी। वह एक ऊँचे पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर लेटा हुआ था।

उसने जल्दी से घबरा कर खड़ा होना चाहा किन्तु उसी समय उसका पैर फिसल गया और वह नीचे गिरने लगा। अब पल भर में जमीन से टकरा कर उसकी हडिडयाँ चूर हो जाने वाली थीं। किन्तु पता नहीं कहाँ से उसके शरीर में इतनी फुर्ती आ गयी। उसने हवा में ही पलटा खाया और एक दूसरी डाल पकड़ कर झूल गया।

उसे अपने शरीर की फुर्ती पर हैरत हुई। फिर उसकी नजर अपने हाथों पर गयी और वह एक बार फिर बुरी तरह घबरा गया। उसके हाथों सहित पूरे शरीर पर बड़े बड़े बाल उग आये थे।

''ये ये सब क्या है!" वह बड़बड़ाया। फिर उसके दिमाग में पुरानी बातें याद आती गयीं। वह तो तालाब में डूबकर खुदकुशी करने निकला था। फिर छलांग लगाने से पहले ही किसी ने उसे बेहोश कर दिया था। लेकिन अब तो उसका पूरा शरीर ही बदलकर बंदर जैसा हो गया था।

''कहीं ऐसा तो नहीं मैं वाकई मर गया हूँ। और अब ये मेरा पुनर्जन्म है। चलो अच्छा है, कम से कम बंदर बनकर गणित से तो पीछा छूटा।"

वह अंदर से एकाएक खुशी और फुर्ती से भर उठा। और एक डाल से दूसरी डाल पर छलांग मारने लगा।

किन्तु उसी समय उसकी खुशी पर ब्रेक लग गया। सामने की डाल से लिपटा हुआ विषधर ज़बान लपलपाते हुए उसकी तरफ गुस्से से घूर रहा था।

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''रोमियो, सम्राट का मैसेज आ रहा है।" सिलवासा ने स्क्रीन की तरफ ध्यान आकृष्ट किया और रोमियो के साथ बाकी साथी भी स्क्रीन की तरफ देखने लगे। फिर स्क्रीन पर धीरे धीरे सम्राट का चेहरा स्पष्ट हो गया जो दरअसल रामू का चेहरा था।

''क्या पोजीशन है?" सम्राट की आवाज उन्हें सुनाई दी।

''हम लोग तो ठीक हैं सम्राट। आगे के लिए क्या हुक्म है?" रोमियो ने पूछा।

''फिलहाल तुम लोग अपने अंतरिक्ष यान को अच्छी तरह चेक करो। आइंदा के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। मैं इन लोगों में काफी हद तक घुल मिल गया हूँ और धीरे धीरे अपना काम शुरू कर दूंगा।"

''ठीक है सम्राट।"

''तुम लोग एलर्ट रहना। किसी भी समय मुझे तुम लोगों की जरूरत पड़ सकती है।"

''हम लोग हर वक्त तैयार हैं।"

''वैसे पृथ्वीवासियों का आई. क्यू. बहुत अच्छा नहीं है। इसलिए मुझे विश्वास है कि बहुत जल्द हम कामयाब हो जायेंगे। दैटस आल।" इसी के साथ स्क्रीन पर सम्राट का चेहरा दिखना बन्द हो गया।

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स्कूल के इनडोर स्टेडियम के एक कोने में तीनों की तिकड़ी सर जोड़े खड़ी हुई थी। तीनों में शामिल थे - गगन, अमित और सुहेल।

''ये रामू का बच्चा तो हमारे लिए सिरदर्द बन गया है। समझ में नहीं आता उसकी गणित एकाएक इतनी मजबूत कैसे हो गयी।" अमित अपना सर खुजलाते हुए बोला।

''कल तक क्लास की जो लड़कियां हमारे सामने गिड़गिड़ाया करती थीं, आज उसके आगे पीछे फिर रही हैं।"

''उसमें तुम्हारी खास गर्ल फ्रेन्ड भी है गगन। मैंने नेहा को अपनी आँखों से रामू के साथ चाउमिन खाते देखा है।" सुहैल ने खबर दी।

''अब मैं उस कमबख्त की गर्दन तोड़ दूँगा।" गुस्से में बोला गगन।

''बी कूल गगन।" अमित ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

''उसका बाप डाक्टर है। कहीं ऐसा तो नहीं उसने अपने सुपुत्र के भेजे में आपरेशन करके मैथ के फार्मूले फिट कर दिये हों।"

''दुनिया के किसी डाक्टर में अभी इतना दम नहीं है।" अमित ने सुहेल की थ्योरी रिजेक्ट कर दी।

''अग्रवाल सर भी उससे बुरी तरह खफा हैं। एक तो वह उनसे टयूशन नहीं पढ़ता। और हम लोग जो सर के रेगुलर स्टूडेन्ट हैं, उन्हें वह नीचा दिखा रहा है।"

''हम लोगों को अग्रवाल सर से डिसकस करना चाहिए। वह जरूर रामू की गणित का कोई न कोई तोड़ निकाल लेंगे।

''तुम ठीक कहते हो अमित। चलो चलते हैं।" तीनों वहाँ से चल दिये।

..............continued
 
जबकि बंदर बने रामू की जान सांसत में थी। सामने मौजूद विशालकाय साँप उसे गटकने के लिए तैयार खड़ा था। उसने बचाव बचाव कहने के लिए मुँह खोला। लेकिन मुँह से बंदरों जैसी खों खों निकल कर रह गयी।

साँप ने उसके ऊपर एक झपटटा मारा और वह जल्दी से साइड में हो गया। इस चक्कर में उसके हाथ से डाल छूट गयी। और वह धड़ाक से नीचे चला आया। लेकिन नीचे उसे जरा भी चोट नहीं आयी। क्योंकि वह किसी जानवर की पीठ पर गिरा था। अब जो उसने घूमकर जानवर का चेहरा देखा तो उसकी रूह फना हो गयी। क्योंकि वह जानवर जंगली सुअर था।

जंगली सुअर भी अचानक आयी इस आफत से घबरा गया और सरपट नाक की सीध में दौड़ लगा दी। बड़ी मुशिकल से रामू उसकी पीठ पर बैलेंस कर पा रहा था।

फिर सुअर एक झाड़ी में घुस गया और रामू को नानी याद आ गयी। क्योंकि कंटीली झाडि़यों ने उसके पूरे जिस्म को छेड़ना शुरू कर दिया था। फिर उसके हाथ में एक मजबूत पौधा आ गया और वह उसे थामकर लटक गया। सुअर आगे भागता चला गया।

''हाय हाय कहाँ फंस गया मैं। इससे अच्छा तो गणित ही पढ़ता रहता मैं।" कराहते हुए रामू सोच रहा था। फिर उसने इरादा किया शहर वापस लौटने का।

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''सुनिए, मैं आपसे कुछ ज़रूरी बात करना चाहती हूँ।" बिस्तर पर करवट लेते हुए मिसेज वर्मा ने मिस्टर वर्मा के कंधे को हिलाया।

''अब सोने दो। मुझे नींद आ रही है।" मिस्टर वर्मा ने फौरन आँखें बन्द कर लीं।

''आप तो हमेशा इधर बिस्तर पर पहुँचे और उधर अंटा गफील हो गये।" मिसेज वर्मा ने शिकायत की।

''तो क्या तुम चाहती हो मुझे नींद न आने की बीमारी हो जाये?"

''बकवास मत करिये और मेरी बात सुनिए। मुझे राम आजकल कुछ बदला बदला सा लगता है।"

''हाँ। मैं भी देख रहा हूँ। उसका रंग आजकल कुछ ज्यादा ही साँवला हो गया है।"

''मैं रंग की बात नहीं कर रही हूँ।" मिसेज वर्मा ने दाँत पीसे, ''मुझे उसके व्यवहार में कुछ बदलाव लग रहा है। हर वक्त खोया खोया सा रहता है। मुझसे आजकल किसी बात की जिद भी नहीं करता। जो कुछ कहती हूँ फौरन मान लेता है।"

''ये तो अच्छी बात है। तुम्हारी प्राब्लम साल्व हो गयी। तुम ही तो शिकायत करती थीं कि वह तुम्हारी बात नहीं सुनता।"

''पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि उसके शरीर में कोई भूत आ गया है।"

''अब तुमने शुरू कर दीं जाहिलों वाली बातें। मुझे नींद आ रही है। मैं सोता हूँ।" दूसरे ही पल मि0 वर्मा के खर्राटे गूंजने लगे थे। मिसेज वर्मा थोड़ी देर कुछ सोचती रही फिर वह भी अण्टा गफील हो गयी।

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अग्रवाल सर के घर पर उनके चहेते शिष्य डेरा जमाये हुए थे। यानि गगन, अमित और सुहेल सभी आपस में इस तरह सर जोड़कर बैठे थे मानो किसी गंभीर सब्जेक्ट पर विचार विमर्श कर रहे हों।

''सर, समझ में नहीं आता कल का गोबर गणेश रामू एकाएक इतना तेज कैसे हो गया।" अमित बोला।

''आश्चर्य मुझे भी है। लेकिन अब उसे नीचा दिखाना ही होगा। वरना और सर चढ़ जायेगा।" अग्रवाल सर बोले।

''हाँ सर। अब तो पानी सर के ऊपर से गुजरने लगा है। अब तो वह आपको भी कुछ नहीं समझता।"

''अच्छा।" अग्रवाल सर ने पैर पटका। और तीनों ने मुस्कुराहट छुपाने के लिए अपने मुँह पर हाथ रख लिए। क्योंकि अग्रवाल सर की पैंट की जिप खुली थी। जो पैर पटकने से ज़ाहिर हो गयी थी।

''हाँ सर।" अमित जल्दी से बोला, ''कहता है अग्रवाल सर की मैथ उसके मुकाबले में कुछ नहीं।"

''ऐसा कहा उसने।" गुस्से में उनके मुँह से झाग निकलने लगा था, ''मैं उसे दिखाऊंगा कि गणित किस बला का नाम है। बच्चू को ऐसा सबक सिखाऊँगा कि मैथ का नाम लेना भूल जायेगा।"

अब तीनों लड़कों के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। क्योंकि वे अग्रवाल सर को गुस्सा दिलाने में कामयाब हो चुके थे। अब रामू की खैर नहीं थी।

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उधर बंदर बना रामू अब शहर की सीमा में प्रवेश कर चुका था। यहाँ आकर उसने राहत की साँस ली। 'चलो जंगली जानवरों से पीछा छूटा। यहाँ पर सिर्फ कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आ रही थीं। अब कुत्ते तो भौंकते ही रहते हैं।'

लेकिन यह क्या? कुत्ते तो भौंकते हुए उसी की तरफ दौड़े चले आ रहे थे। उसे याद आ गया कि उसका जिस्म बंदर का है। और कुत्ते बंदरों के अव्वल दर्जे के दुश्मन होते हैं।

एक बार फिर उसे दौड़ जाना पड़ा। उसने छलांग लगाई और एक मकान का पाइप पकड़कर जल्दी जल्दी ऊपर चढ़ने लगा। थोड़ी ही देर में वह मकान की छत पर था।

अब वहाँ मौजूद पानी की टंकी पर चढ़कर वह चारों ओर नजारा कर रहा था। उसे एरिया कुछ जाना पहचाना महसूस हुआ। फिर इस घर को भी वह पहचान गया। यह तो नेहा का घर है। एक वही तो थी पूरे क्लास में जो उससे हमदर्दी रखती थी।

अब उसे थोड़ा इत्मिनान हुआ। वह नेहा को पूरी बात बतायेगा। शायद वह उसकी कुछ मदद कर सके।

रामू को किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी। उसने झांककर देखा, नेहा गीले कपड़ों को धुप में डालने के लिए ऊपर आ रही थी।

''काम बन गया। लगता है ऊपर वाला मेरे ऊपर मेहरबान है।" उसने खुश होकर सोचा।

नेहा ऊपर आयी और फिर वहाँ लगे हुए तार पर कपड़े डालने लगी। अभी उसकी नजर बंदर उर्फ रामू पर नहीं पड़ी थी।

''हैलो नेहा! मैं रामू हूँ। प्लीज मेरी मदद करो।" रामू बोला। ये अलग बात है कि उसके मुंह से सिर्फ बंदरों वाली खों खों ही निकल पायी।

नेहा ने घूमकर देखा। और फिर जो कुछ हुआ वह रामू के लिए अप्रत्याशित था।

नेहा ने एक जोर की चीख मारी और मम्मी-बंदर मम्मी-बंदर रटती हुई सीढि़यों से नीचे भागी।

''बंदर-किधर है बंदर.. रामू भी घबरा कर इधर उधर देखने लगा। फिर उसे याद आया कि बंदर तो वह खुद ही बना बैठा है।

''तो नेहा भी मुझे पहचान नहीं पायी।" अफसोस के साथ उसने सोचा।

''किधर है बंदर! नीचे से एक दहाड़ सुनाई दी।" रामू ने घबराकर देखा। नीचे नेहा का बड़ा भाई हाथ में मोटा डंडा लिए नेहा से पूछ रहा था। रामू की रूह फना हो गई। उसने वहाँ से फौरन निकल लेना ही उचित समझा।

फिर एक लम्बी छलांग ने उसे दूसरे मकान की छत पर पहुँचा दिया। यहाँ पहुंचकर वह खुश हो गया। क्योंकि चारों तरफ मूंगफलियां बिखरी हुई थीं। दरअसल उन्हें सुखाने के लिए वहाँ रखा गया था। रामू को जोरों की भूख लग रही थी, लिहाजा उसने आव देखा न ताव और मुटठी भर भर कर मूंगफलियां चबानी शुरू कर दीं।

अभी उसने दो तीन मुटिठयां ही मुंह में डाली थीं कि कोई चीज बहुत जोरों से उसके पैर से टकराई। दर्द की एक जोरदार टीस में वह सी करके रह गया। फिर घूमकर देखा तो थोड़ी दूर पर एक लड़का खड़ा हुआ था हाथ में गुलेल लिए हुए।

''आओ बच्चू, ये गुलेल मैंने तुम लोगों के लिए ही तैयार की है।" कहते हुए लड़का गुलेल में फिर से कंकड़ी लगाने लगा।

अब रामू के पास एक बार फिर भागने के अलावा और कोई चारा नहीं था।
 
उस समय क्लास में गुप्ता जी अंग्रेजी पढ़ा रहे थे जब चपरासी ने वहाँ प्रवेश किया। गुप्ता जी ने पढ़ाना छोड़कर प्रश्नात्मक दृष्टि से चपरासी को देखा।

''मास्टर साहब, रामू को प्रिंसिपल मैडम बुला रही हैं।

रामू बने सम्राट ने हैरत से चपरासी को देखा। भला प्रिंसिपल को उससे क्या काम पड़ गया था।

''रामू!" गुप्ता जी ने रामू को पुकारा, ''जाओ, तुम्हें प्रिंसिपल मैडम बुला रही हैं।"

रामू अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ। एक ही जगह बैठे अमित, गगन और सुहेल ने एक दूसरे को राज़भरी नज़रों से देखा।

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जब सम्राट प्रिंसिपल के रूम में दाखिल हुआ तो वहाँ अग्रवाल सर पहले से मौजूद थे।

''आओ रामकुमार!" प्रिंसिपल ने बड़े प्यार से रामू को बुलाया। रामू बना सम्राट आगे बढ़ा।

''मुझे यह सुनकर ख़ुशी हुई कि तुमने अग्रवाल सर को चैलेंज किया है कि तुम इन्हें गणित में हरा सकते हो।" प्रिंसिपल भाटिया ने अग्रवाल सर की ओर देखकर कहा। अग्रवाल सर रामू को व्यंगात्मक तरीके से देख रहे थे।

''मैंने!" हैरत से सम्राट ने कहा। फिर तुरंत ही सिचुएशन उसकी समझ में आ गयी। यानि गगन वगैरा ने अग्रवाल सर और प्रिंसिपल के कान भरे थे।

''चलो अच्छा है। इससे मेरा ही मकसद हल होगा।" उसने सोचा।

''जवाब दो रामकुमार।" प्रिंसिपल भटिया ने उसे टोका।

''मेरे दिल ने कहा था, इसलिए मैंने ऐसा चैलेंज किया।" रामू ने जवाब दिया।

अग्रवाल सर का चेहरा तपते लोहे की तरह लाल हो गया जबकि मैडम भाटिया अपनी कुर्सी से गिरते गिरते बचीं।

''मैं इसका चैलेंज कुबूल करता हूँ।" अग्रवाल सर ने भर्राई आवाज में कहा, ''लेकिन मेरी एक शर्त है।"

''कैसी शर्त?" प्रिंसिपल ने पूछा।

''अगर ये सवाल नहीं हल कर पाया तो स्कूल के पीछे बह रहे गन्दे नाले में इसे डुबकी लगानी पड़ेगी।"

''यह तो बहुत सख्त सजा है अग्रवाल जी...!" प्रिंसिपल ने कहना चाहा किन्तु रामू बने सम्राट ने बीच में बात काट दी, ''मुझे शर्त मंजूर है।"

''ठीक है। मैं क्वेश्चन पेपर सेट करता हूँ।" अग्रवाल सर उठ खड़े हुए।

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''यह तुमने क्या किया रामू! माना कि तुम मैथ में तेज हो गये हो। लेकिन इतने भी नहीं कि अग्रवाल सर को चैलेंज कर दो। वो अपने जमाने के गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं।" नेहा इस समय रामू से बात कर रही थी।

''देखा जायेगा।" लापरवाही के साथ कहा रामू बने सम्राट ने।

''सोचता हूँ, पीछे के नाले में एकाध बाल्टी सेन्ट डलवा दूं।" अचानक पीछे से एक आवाज उभरी। दोनों ने चौंक कर देखा गगन, अमित और सुहेल की तिकड़ी थोड़ी दूर पर मौजूद थी। यह जुमला अमित ने कहा था।

''हाँ। वरना कोई बेचारा बदबू से मर जायेगा।" सुहेल ने जवाब दिया था।

''चलो यहाँ से चलते हैं।" नेहा ने रामू का हाथ पकड़कर कहा। दोनों वहाँ से चलने को हुए। उसी समय गगन ने सामने आकर उनका रास्ता रोक लिया।

''हाय नेहा!" उसने नेहा को मुखातिब किया।

''हाय!" बोर अंदाज में जवाब दिया नेहा ने।

''क्या बात है। आजकल तो लिफ्ट ही नहीं दे रही हो।" गगन ने शिकायत की।

''लिफ्ट खराब हो गयी है। तुम सीढि़यों का इस्तेमाल कर सकते हो।" गंभीर स्वर में नेहा ने जुमला उछाला। आसपास मौजूद दूसरे लड़कों ने मुस्कुराहट छुपाने के लिए अपने मुंह पर हाथ रख लिए।

गगन कोई सख्त जुमला कहने जा रहा था। उसी समय मिसेज कपूर उधर से गुजरने लगीं। फिर इन लड़कों को भीड़ लगाये हुए देखा तो टोक भी दिया, ''ऐ तुम लोगों ने यहाँ भीड़ क्यों लगा रखी है। जाओ अपनी क्लास में।"

''मैडम, आज आपके पास बहुत देर से फोन नहीं आया।" अमित ने टोक दिया। मिसेज कपूर इतिहास की शिक्षक थीं और मोबाइल पर बात करने के लिए बदनाम थीं। रांग नंबर भी लगता था तो फोन पर ही उसका पूरा इतिहास खंगाल डालती थीं।

''क्या बताऊं।" मिसेज कपूर के चेहरे से उदासी झलकने लगी, ''मेरे पास एक हथौड़ा है जिससे महान स्वतन्त्रता सेनानी चन्द्रशेखर आजाद ने अपनी बेडि़यां तोड़ी थीं। यह उस जमाने की बात है जब वह अंग्रेजों की जेल तोड़कर फरार हुए थे...।"

''मैडम मोबाइल की बात...।" सुहेल ने बीच में टोका।

''वही बता रही हूँ नालायक।" मैडम कपूर ने उसे घूरा, ''आज सुबह की बात है। मेरे भांजे ने वही हथौड़ा मेरी सेफ से निकाल लिया, और मेरे मोबाइल को उससे पीट डाला। तभी से उसकी आवाज गायब हो गयी है।" मैडम कपूर पर्स से मोबाइल निकालकर सबको दिखाने लगी।

''मैं देखता हूँ।" रामू बने सम्राट ने मैडम कपूर के हाथ से मोबाइल ले लिया और उसे खोल डाला।

''क्या करता है बे। क्या मैडम के फोन को कब्र में पहुंचा देगा।" सुहेल ने रामू को आँखें दिखाईं । मिसेज कपूर भी सकपका गयी थीं।

लेकिन इन सब से बेपरवाह रामू ने जेब से पेन निकाला और उसकी निब से मोबाइल के सर्किट से छेड़छाड़ करने लगा। चार पाँच सेकंड बाद उसने मोबाइल बन्द करके मिसेज कपूर की ओर बढ़ा दिया।

''मोबाइल ठीक हो गया।"

''क्या!" मिसेज कपूर के साथ साथ वहाँ मौजूद सारे लड़के उछल पड़े।

मिसेज कपूर ने जल्दी जल्दी अपने फोन को चेक किया।

''ये तो चमत्कार हो गया। मेरा फोन बिल्कुल ठीक हो गया। जियो मेरे लाल।" मिसेज कपूर ने तड़ाक से रामू के गालों पर एक चुंबन जड़ दिया और रामू मुंह बनाकर अपना गाल सहलाने लगा।

''कमाल है, हमें पता ही नहीं था कि ये ससुरा मैकेनिक भी है।" मिसेज कपूर के आगे बढ़ने के बाद अमित बोला।

इसके बाद वहां की भीड़ तितर बितर हो गयी, क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि प्रिंसिपल मैडम भाटिया राउंड पर निकल चुकी हैं।

उधर असली रामू के सामने एक के बाद एक इस तरह मुसीबतें आकर गिर रही थीं जैसे पतझड़ के मौसम में पत्ते गिरा करते हैं। इतनी समस्याएं तो गणित के सवाल हल करने में नहीं झेलनी पड़ी थीं जितनी जीवन की उस पहेली को हल करने में दुश्वारियां आ रही थीं।

जिस छत पर भी वह पहुंचता था, वहीं से उसे खदेड़ दिया जाता था। पतंग की एक डोर उसकी नाक को भी घायल कर चुकी थी। दौड़ते भागते दोनों टाँगें बुरी तरह दुख रही थीं।

डार्विन ने कहा था इंसान के पूर्वज बंदर थे। लेकिन अगर ऐसा था तो इंसानों को बंदरों की इज्जत करनी चाहिए। लेकिन यहां इज्जत तो क्या मिलती उलटे मार पीट कर भगाया जा रहा था।

फिर एक छत पर पहुंच कर उसे ठिठक जाना पड़ा। उस छत की मुंडेर पर बैठी एक बंदरिया उसे प्रेमभरी नज़रों से देख रही थी।

बंदर बना रामू घबराकर साइड से कटने का रास्ता ढूंढने लगा। अब बंदरिया धीरे धीरे उसके करीब आ रही थी। और अपनी भाषा में कुछ कह भी रही थी। शायद किसी मुम्बइया फिल्म का रोमांटिक मीठा गीत गा रही थी।

लेकिन रामू के दिल से तो बेतहाशा कड़वी गालियां ही निकल रही थीं।

बंदरिया ने उसपर छलांग लगाईं और बंदर बना रामू परे हो गया। नतीजे में वह मुंह के बल गिरी धड़ाम से।

बंदरिया को शायद रामू से ऐसी उम्मीद नहीं थी। इसलिए वह थोड़ा गुस्से से और थोड़ा हैरत से रामू को देखने लगी। फिर उसने सोचा कि शायद यह शरारती बंदर उससे खेलना चाहता है। इसलिए इसबार उसने संभल संभल कर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया।

इसबार भी रामू ने सरकना चाहा लेकिन बंदरिया ने झट से उसकी पूंछ पर पैर रख दिया। रामू ने उससे अपनी पूंछ छुड़ाने के लिए जो़र लगाना शुरू कर दिया। बंदरिया को भी शरारत सूझी और उसने झट से पूंछ पर से पैर उठा लिया। नतीजे में एक जोरदार झटके के साथ रामू सामने मौजूद खम्भे से टकरा गया और उसके सामने तारे नाच गये।

अब वह भी तैश में आ गया और उस नामाकूल बंदरिया को सबक सिखाने के लिए उसकी तरफ बढ़ा।

बंदरिया ने झट से अपने मुंह पर हाथ रख लिया। पता नहीं डर की वजह से, या शरमा कर।

रामू ने उसे थप्पड़ जड़ने के लिए अपना हाथ उठाया, लेकिन बीच ही में किसी के द्वारा थाम लिया गया।

उसने घूम कर देखा, ये कौन हीरो बीच में टपक पड़ा था। देखकर उसकी रूह फना हो गयी। क्योंकि वह उससे भी तगड़ा बंदर था और इस तरह उसे घूर रहा था मानो अभी उसे कच्चा चबा जायेगा।

फिर उस बदमाश ने उसकी पिटायी शुरू कर दी। बगल में खड़ी बंदरिया उसकी इस दुर्दशा पर खी खी करके हंस रही थी।

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यह एक अनोखी परीक्षा थी, जिसमें परीक्षा देने वाला केवल एक था और परीक्षक भी केवल एक। लेकिन देखने वाले बेशुमार थे। रामू यानि की सम्राट एक कुर्सी पर बैठा हुआ अग्रवाल सर के आने का इंतिजार कर रहा था। उसके सामने नोटबुक खुली रखी थी। जिसमें उसे अग्रवाल सर के सवालों के जवाब लिखने थे।

उससे थोड़ी दूर पर बाकी स्टूडेन्टस की भीड़ लगी हुइ थी। उनके पास कुछ टीचर्स भी मौजूद थे।

अचानक रामू ने पेन उठाया और नोटबुक पर तेजी से कुछ लिखना शुरू कर दिया।

''क्या लिख रहे हो रामू?" वहाँ मौजूद मिसेज कपूर ने टोका।

''अग्रवाल सर के प्रश्नों के जवाब।" रामू ने जवाब दिया और वहाँ मौजूद सारे स्टूडेन्ट एक दूसरे का मुंह देखने लगे।

''लेकिन अग्रवाल सर तो अभी अपने सवाल लेकर आये ही नहीं।" हैरत से कहा फिजि़क्स के टीचर सक्सेना सर ने।

''मैं जानता हूं वह कौन से प्रश्न लाने वाले हैं।" रामू ने अपना लिखना जारी रखा। सारे स्टूडेन्ट एक दूसरे से कानाफूसियां करने लगे थे। लग रहा था हाल में ढेर सारी मधुमक्खियाँ भिनभिना रही हैं।

''तुम्हें किसने बताया उन प्रश्नों के बारे में ?" सक्सेना सर ने फिर पूछा।

''किसी ने नहीं।" रामू का जवाब पहले की तरह संक्षिप्त था।

उसी समय वहाँ अग्रवाल सर ने प्रवेश किया। उनके हाथ में प्रश्न पत्र भी मौजूद था।

''ये लो और लिखना शुरू करो।" अग्रवाल सर ने प्रश्नपत्र रामू की तरफ बढ़ाया।

जवाब में रामू ने नोटबुक अग्रवाल सर की तरफ बढ़ा दी।

''ये क्या है?" अग्रवाल सर ने नोटबुक की तरफ नज़र की।

''आपके प्रश्नों के जवाब।"

''क्या? लेकिन मैंने तो अभी प्रश्नपत्र दिया ही नहीं।" हैरत का झटका लगा अग्रवाल सर को।

''मुझे मालूम था कि आप कौन कौन से प्रश्न पत्र देने वाले हैं। इसलिए वक्त न बरबाद करते हुए मैंने जवाब पहले ही लिख दिये।"

अविश्वसनीय भाव से पहले अग्रवाल सर ने रामू का चेहरा देखा और फिर नोट बुक पढ़ने लगे। जैसे जैसे वह आगे पढ़ रहे थे उनकी आँखें फैलती जा रही थीं।

''क्या बात है अग्रवाल साहब?" मिसेज कपूर ने पूछा।

''यह कैसे हो सकता है!"

''क्या?" सक्सेना सर भी उधर मुखातिब हो गये।

''इसने बिल्कुल सही जवाब लिखे हैं। दो ही बातें हो सकती हैं। या तो इसकी किसी ने मदद की है या फिर..!"

''या फिर क्या अग्रवाल साहब?" सक्सेना सर ने पूछा।

''या फिर इसके अंदर कोई दैवी शक्ति आ गयी है।"

''मुझे तो यही बात सही लगती है!" मिसेज कपूर आँखें फैलाकर बोली, ''कल इसने मेरा मोबाइल चुटकियों में सही कर दिया था। इसमें जरूर कोई दैवी शक्ति घुस गयी है।"

''रामू तुम खुद बताओ, क्या है असलियत?" सक्सेना सर ने रामू की तरफ देखा।

रामू बना सम्राट कुछ नहीं बोला। बस मन्द मन्द मुस्कुराता रहा।
 
घण्टी की आवाज पर मिसेज वर्मा ने उठकर दरवाजा खोला। सामने उनके पड़ोसी मलखान सिंह मौजूद थे। हाथ में मिठाई का डब्बा लिये हुए।

''नमस्कार जी। लो जी मिठाई खाओ।" मलखान सिंह ने जल्दी से मिठाई का डब्बा मिसेज वर्मा की तरफ बढ़ाया।

मिसेज वर्मा ने इस तरह मलखान सिंह की तरफ देखा मानो उनकी दिमागी हालत पर शक कर रही हो।

किसी को एक गिलास पानी भी न पिलाने वाले मक्खीचूस मलखान सिंह के हाथ में जो मिठाई का डब्बा था उसमें काफी मंहगी मिठाइयां थीं।

''आपके यहां सब ठीक तो है?" मिसेज वर्मा ने हमदर्दी से पूछा।

''अरे अपने तो वारे न्यारे हो गये। और सब तुम्हारे सुपुत्र की वजह से हुआ है।" मलखान जी ख़ुशी से झूम रहे थे।

''मैं कुछ समझी नहीं। ऐसा क्या कर दिया रामू ने।" चकराकर पूछा मिसेज वर्मा ने।

''उसने परसों मुझे राय दी कि जॉली कंपनी के शेयर खरीद लो। फायदे में रहोगे। मैंने खरीद लिये। आज तीसरे दिन उसके शेयरों के भाव तीन गुना बढ़ चुके हैं। मैं तो मालामाल हो गया। कहाँ है वो, मैं उसको अपने हाथों से मिठाई खिलाऊँगा।"

''उसने जरूर आपको राय दी होगी। इधर कई दिनों से उसका दिमाग कुछ गड़बड़ चल रहा है। मैं तो उनसे भी कह चुकी हूं लेकिन वो कुछ सुनते ही नहीं।"

''बहन जी, आपके लड़के में जरूर कोई पुण्य आत्मा घुस गयी है।"

''मतलब उसके अंदर कोई भूत प्रेत घुस गया है। भगवान, तूने मुझे ये दिन भी दिखाना था।" फिर मिसेज वर्मा अपनी ही परेशानी में पड़ गयी और मलखान सिंह मौका देखकर वहां से खिसक लिए।

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बंदर रामू इस समय एक पाइप के अंदर दुबका बैठा था। उसका पूरा जिस्म फोड़े की तरह दर्द कर रहा था। उस नासपीटे बंदरिया के आशिक ने बुरी तरह उसकी पिटाई की थी और फिर दोनों बाहों में बाहें डाले वहां से कूद कर नज़दीक के पार्क में निकल गये थे। वह वहीं आंसू बहाता हुआ बैठा रह गया था। गणित से जी चुराने की इतनी बड़ी सजा उसे मिलेगी, यह तो उसने सोचा ही नहीं था।

जब उसे थोड़ा सुकून हुआ तो उसने पाइप के अंदर झांका। काफी लम्बा पाइप मालूम हो रहा था। उसे काफी दूर पर रौशनी दिखाई दी। 'यानि वह पाइप का दूसरा सिरा है। उसने सोचा और धीरे धीरे दूसरी तरफ बढ़ने लगा।

जल्दी ही वह दूसरे सिरे पर पहुंच गया। यह सिरा एक गली में खुलता था। गली के उस पार एक और मकान दिखाई दे रहा था।

उसने छलांग लगाई और उस मकान की छत पर पहुंच गया।

''यह मकान तो जाना पहचाना लगता है।" उसने चारों तरफ देखा, दूसरे ही पल उसके दिमाग को झटका सा लगा, ''अरे ये तो मेरा ही घर है।

उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसका मन चाहा दौड़कर नीचे जाये और अपने मम्मी पापा से लिपट जाये।

लेकिन दूसरे ही पल उसे ध्यान आ गया कि वह इस समय रामू नहीं बल्कि एक बंदर है और इस हालत में दुनिया की कोई ताकत उसे नहीं पहचान सकती। उसके माँ बाप भी नहीं। उसकी खुशियों पर ओस पड़ गयी और वह ठण्डी साँस लेकर वहीं कोने में बैठ गया।

पीरियड अभी अभी खत्म हुआ था। नेहा अपनी सहेलियों पिंकी और तनु के साथ बाहर निकल आयी।

''आज क्लास में रामू नहीं दिखाई दिया, कहां रह गया?" नेहा ने इधर उधर देखा।

''कालेज तो आया था वह। कहीं चला गया होगा।" पिंकी ने ख्याल जाहिर किया।

''आजकल वह अजीब अजीब हरकतें कर रहा है। कभी गुमसुम हो जाता है तो कभी ऐसा मालूम होता है जैसे वह आइंस्टीन की तरह बहुत बड़ा साइंटिस्ट हो गया है।"

''लेकिन मैं देख रही हूं कि तू आजकल उसकी कुछ ज्यादा ही फिक्र करने लगी है। कहीं मामला गड़बड़ तो नहीं?" शोख अंदाज में कहा तनु ने।

''गड़बड़ कुछ नहीं। मुझे हैरत है कि अचानक वह इतना जीनियस कैसे हो गया?"

''गगन को भी हैरत है कि अचानक तूने उससे मुंह क्यों मोड़ लिया।"

''एवरीवन वान्टस बेस्ट। तुम लोगों को पता है कि मैं मैथ में कमजोर हूं। इसीलिए मैंने गगन को घास डाली कि वह मेरी हेल्प करेगा। लेकिन मुश्किल सवालों में वह भी फंस जाता है। बट रामू तो जबरदस्त है। आँख बन्द करके जवाब देता है। चाहे जितना मुश्किल सवाल ले जाओ उसके सामने।"

''लो हटाओ। तुम्हारा पुराना आशिक तो इधर ही आ रहा है।" पिंकी ने एक तरफ इशारा किया, जिधर से गगन चला आ रहा था। उसके हाथों में फूलों का एक गुलदस्ता था।

''यहां से जल्दी निकल चलो, वरना अभी जख्म बन जायेगा आकर।"

लेकिन इससे पहले कि वे वहां से खिसकतीं, गगन ने उन्हें देख लिया था और रुकने का इशारा भी कर दिया था। फिर वह तेजी से उनकी ओर आया।

''हाय नेहा! हैप्पी बर्थ डे।" उसने गुलदस्ता नेहा की ओर बढ़ाया।

''लगता है रामू ने गणित के साथ तुम्हारी मेमोरी भी चौपट कर दी है। मेरा बर्थ डे अगले महीने है।" नेहा ने उसकी तरफ हमदर्दी से देखा। उसे यकीन हो गया था कि रामू की कामयाबियों ने गगन का दिमाग उलट दिया है।

''मैंने पुरातन काल के शक संवत कैलेण्डर के हिसाब से तुम्हारे जन्म दिन की गणना की है। और उस कैलकुलेशन के हिसाब से तुम्हारा जन्म दिन आज ही है।"

''बड़ी मेहनत कर डाली तुमने तो। लेकिन मैं पहले ये कैलकुलेशन रामू से जँचवाऊंगी। अगर सही निकली तब तुम्हें थैंक्यू कहूंगी।" नेहा का ये जुमला गगन को सुलगाने के लिए काफी था। फिर नेहा तो आगे बढ़ गयी और वह वहीं खड़ा हाथ में पकड़े गुलदस्ते को गुस्से से घूरने लगा मानो सारी गलती उसी गुलदस्ते की है।

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बंदर बना रामू चूंकि अपने घर के चप्पे चप्पे से वाकिफ था, इसलिए वह आराम से अपने ड्राइंग रूम में पहुंच गया। अभी तक उसकी मुलाकात अपनी मम्मी से नहीं हुई थी। और पापा से इस वक्त मिलने का सवाल ही नहीं था। क्योंकि ये उनके आफिस का वक्त था।

उसने देखा सारी किताबें कायदे से रैक में सजी हुई थीं।

'शायद मेरे पीछे मम्मी ने ये सब किया है।' उसने सोचा। किताबों के बीच मैथ की टेक्स्ट बुक देखकर उसके तनबदन में आग लग गयी। उसी किताब की वजह से तो आज उसकी ये हालत हुई थी। अब न तो वो जानवरों के रेवड़ में शामिल था और न ही इंसानों के।

'मम्मी पापा ने मुझे कितना ढूंढा होगा।' उसे अफसोस हो रहा था, 'क्यों वह खुदकुशी करने के लिए भागा। उसके मम्मी पापा का क्या हाल होगा। मम्मी तो रो रोकर बेहाल हो गयी होगी।'

उसे किसी के आने की आहट सुनाई दी, और वह जल्दी से एक अलमारी के पीछे छुप गया। अन्दर दाखिल होने वाली उसकी मम्मी ही थी और किसी नयी फिल्म का रोमांटिक गाना गुनगुना रही थी।

'मम्मी तो पूरी तरह खुश दिखाई दे रही है। यानि उसे मेरे गायब होने का जरा भी दु:ख नहीं। पूरी दुनिया में किसी को मेरी परवाह नहीं।' दु:ख के साथ उसने सोचा और वहीं जमीन पर बैठ गया।

अब मम्मी ने वहां की सफाई शुरू कर दी थी।

''रामू, मैंने तुम्हारा नाश्ता लगा दिया है। जल्दी से कर लो वरना स्कूल की देर हो जायेगी।' मम्मी ने पुकार कर कहा और रामू को हैरत का एक झटका लगा। वह तो बंदर की शक्ल में वहां मौजूद था, फिर मम्मी किसे आवाज दे रही थीं?

''मम्मी मैं नाश्ता कर रहा हूं।" अंदर से आवाज आयी और रामू को एक बार फिर चौंकना पड़ा। ये तो हूबहू उसी की आवाज थी, जिसको मुंह से निकालने के लिए वह कई दिन से तरस रहा था।

"लेकिन यह कौन बहुरूपिया है जिसने उसकी जगह पर उसके घर में कब्जा जमा लिया है?" उसके दिल में उसे देखने की इच्छा जागृत हो गयी। लेकिन इसके लिए जरूरी था कि वह डाइनिंग रूम में पहुंचे और वह भी बिना किसी की नजर में आये। वरना वहां अच्छा खासा बवाल खड़ा हो जाता।

उसकी मां वहां सफाई करके निकल गयी। वह भी छुपते छुपाते उसके पीछे पीछे चला, यह देखने के लिए कि कौन सा चोर उसके बहुरूप में उसकी जगह घेरे हुए है।

जब वह डाइनिंग रूम के पास पहुंचा तो उसने स्कूल की ड्रेस में एक लड़के को बाहर निकलते देखा। लेकिन पीठ उसकी तरफ होने की वजह से वह उसकी शक्ल देखने से वंचित रहा। इससे पहले कि वह उसकी शक्ल देखने की कोशिश करता, लड़का साइकिल पर सवार होकर दूर निकल चुका था। उसी समय रामू को किसी के आने की आहट सुनाई दी और वह एक पुराने कबाड़ के पीछे छुप गया।
 


जबकि रामू की शक्ल में मौजूद सम्राट साइकिल पर सवार स्कूल की ओर बढ़ा जा रहा था। इस रोड पर अपेक्षाकृत सन्नाटा रहता था। उसने देखा दूर पेड़ की एक मोटी सी डाल ने रास्ता घेर रखा है। वह डाल के पास पहुंचा और साइकिल से नीचे उतरकर डाल को हटाने लगा। उसी समय झाडि़यों के पीछे से तीन लड़के निकलकर उसके सामने आ गये। तीनों ने अपने चेहरों पर मुखौटे डाल रखे थे और उनके हाथों में चेन तथा हाकियां मौजूद थीं। उसमें से एक उसकी साइकिल के पास पहुंचा और उसके पहिए से हवा निकालने लगा।

''क्या कर रहे हो भाई?" सम्राट उसकी तरफ घूमा।

''अबे दिखाई कम देता है क्या। हम तेरी हवा निकाल रहे हैं।" हवा निकालने वाला लड़का बोला और बाकी दो लड़के कहकहा लगाकर हंसने लगे।

''तुम बहुत गलत कर रहे हो। इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा।" सम्राट पूरी तरह शांत स्वर में बोला।

''अरे। ये तो हमें धमकी दे रहा है।" हवा निकालने वाले लड़के ने बाकियों की ओर घूमकर देखा।

''ओह। फिर तो इसकी मौत आ गयी है।" दूसरे लड़के ने अपनी हाकी रामू बने सम्राट की ओर घुमाई। सम्राट ने हाकी से बचने की कोई कोशिश नहीं की। दूसरे ही पल उन लड़कों को हैरत का झटका लगा क्योंकि हाकी सम्राट के जिस्म से दो इंच पहले ही झटके के साथ पलट गयी थी। हाकी पकड़ने वाले लड़के को एक जोरदार झटका लगा और वह गिरते गिरते बचा।

''गगन, अमित क्यों जबरदस्ती अपना और मेरा टाइम खराब कर रहे हो?" रामू उर्फ सम्राट सुकून के साथ बोला। उसकी बात सुनकर लड़कों को मानो साँप सूंघ गया। और वे सब सकपका गये।

''तो तूने हमें पहचान लिया।" उनमें से एक जो वास्तव में अमित था, बोला।

''हमारे चेहरे तो छुपे हुए हैं। लगता है इसने हमें आवाज से पहचान लिया।" सुहैल बोला, जो वास्तव में रामू की साइकिल की हवा निकालने के लिए झुका था।

''अगर तुम लोग अपनी आवाज़ भी बदल लेते तब भी मैं पहचान जाता।" सम्राट ने कहा।

''क्यों? क्या तेरे अन्दर कोई ईश्वरीय शक्ति समा गयी है?" गगन के स्वर में व्यंग्य था।

''कुछ हद तक सही अनुमान लगाया है तुमने।" गंभीर स्वर में बोला सम्राट।

उसकी इस बात ने मानो वहां धमाका किया और तीनों लड़के उछल पड़े।

''क्या मतलब? क्या कहा तुमने?" अमित तेजी से उसकी तरफ घूमा।

''वही, जो तुम लोगों ने सुना।" सम्राट अपनी साइकिल के पास पहुंचा और हवा निकला हुआ टायर टयूब एक झटके में खींच लिया। अब वह खाली रिम लगे हुए पहिए की साइकिल पर सवार हुआ और तेजी से पैडिल मारते हुए आगे बढ़ गया। तीनों लड़के वहां खड़े एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे।

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रामू को एक बार फिर ज़ोरों की भूख लगने लगी। इसलिए वह किचन की तरफ बढ़ने लगा। और जल्दी ही वहां पहुंच गया। उसने इधर उधर देखा। पूरा किचन खाली था सिवाय कुछ जूठे बर्तनों के। उसे पता था कि उसकी मम्मी खाने के बाद बची हुई चीज़ों को सीधे फ्रिज में ठूंस देती हैं। क्योंकि खुले में रखा खाना सड़ने लगता है।

मम्मी की यह आदत इस वक्त उसके लिए मुसीबत बन गयी। फ्रिज खोलना कम से कम उसके बन्दर वाले जिस्म के लिए मुमकिन न था। अब उसके सामने एक ही चारा था कि जूठे बर्तनों को चाटना शुरू कर दे। उसने यही किया। उसे अपनी हालत पर हंसी भी आ रही थी और रोना भी। कभी वह घर में घुसी बिल्ली या चूहे को जूठे बर्तन चाटते देखता था तो मारकर भगा देता था। आज यही काम वह खुद कर रहा था।

जल्दी ही उसने सारे बर्तन इस तरह चाट कर साफ कर दिये मानो अभी अभी धुले गये हों। लेकिन पेट कमबख्त अभी भी और की डिमांड कर रहा था। यानि अब इसके अलावा और कोई चारा नहीं था कि वह किसी तरह फ्रिज खोलने का जुगाड़ करे।

वह फ्रिज के पास पहुंचा और उसे खोलने की कोशिश करने लगा। लेकिन उसकी सारी कोशिशें एक बन्दर की जबरदस्ती की उछलकूद से ज्यादा कुछ न कर सकीं। फिर उसे कोने में पड़ा चिमटा दिखाई दिया और उसे एक तरकीब सूझ गयी। उसने फौरन चिमटा उठाया और उसे फ्रिज के दरवाजे में फंसाकर जोर लगाने लगा।

तरकीब कामयाब रही और फ्रिज खुल गया। अन्दर से आने वाले पकवानों की खुशबू ने उसकी भूख दोगुनी कर दी। उसने एक ढक्कन उठाया और यह देखकर उसकी बाँछें खिल गयीं कि सामने उसकी मनपसंद डिश यानि छोले मौजूद थे। इधर उधर देखे बिना उसने दोनों हाथों से छोले उठाकर खाने शुरू कर दिये।

पेट भरने की कवायद ने उसे आसपास के माहौल से बेखबर कर दिया। अचानक बर्तन गिरने की छनछनाहट ने उसे चौंका दिया। उसने मुंह उठाकर देखा तो भौंचक्का रह गया। किचन के दरवाजे पर उसकी मां मौजूद थी और डरी हुई नजरों से उसकी तरफ देख रही थी। शायद वह किचन में बर्तन रखने आयी थी, जो उसके हाथ से छूटकर जमीन पर पड़े हुए थे।

अब दोनों एक दूसरे की आँखों में आँखें डाले हुए मूर्ति बने हुए अपनी अपनी जगह एक ही एक्शन में खड़े हुए थे।

सम्राट इस समय जंगल में मौजूद अपने अंतरिक्ष यान में मौजूद था। उसके साथी उसे घेरे हुए थे और उनके बीच कोई गहन विचार विमर्श हो रहा था। हमेशा की तरह सम्राट रामू के हुलिए में ही था।

''हम अपने मिशन में काफी हद तक कामयाबी हासिल कर चुके हैं। अब बहुत जल्द हम अपने टार्गेट तक पहुंचने वाले हैं।" सम्राट काफी उत्साहित होकर बता रहा था।

''सम्राट, यदि आप उचित समझें तो एक बात पूछना चाहता हूं।" सिलवासा ने सम्राट की ओर देखा।

''हां हां। पूछो।"

''अपना टार्गेट तो हम सभी को मालूम है। यानि इस ग्रह को पूरी तरह अपने कब्जे में करना। लेकिन इस टार्गेट को हासिल करने के लिए हम क्या रणनीति अपना रहे हैं, ये शायद हममें से किसी को नहीं मालूम।"

सम्राट ने बारी बारी से सबकी ओर नजर की फिर बोला, ''क्या वास्तव में आपमें से किसी को मेरी रणनीति के बारे में कुछ नहीं पता?

सभी ने नकारात्मक रूप में सर हिला दिया।

''ठीक है मैं बताता हूं। इस पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव है। जिसका पूरी पृथ्वी पर लगभग अधिकार है। एक वही है जो बुद्धि रखता है और उसके अनुसार निर्णय लेता है। अपनी अक्ल से काम लेकर उसने पूरी पृथ्वी पर कब्जा जमा लिया है। इसलिए इस पृथ्वी को अपने अधिकार में करने के लिए उसपर नियन्त्रण करना जरूरी है।" सम्राट की बात वहां मौजूद सभी लोग गौर से सुन रहे थे।

''अब इनपर कण्ट्रोल कैसे किया जाये, इसपर मैं इस ग्रह पर उतरने से पहले ही विचार कर रहा था। क्योंकि जिस प्रजाति ने पूरी पृथ्वी पर कब्जा जमा रखा है उनसे पार पाना बहुत दुष्कर होगा, इतना तो तय था।"

''अगर हम पूरी मानव प्रजाति को समाप्त कर दें तो बाकी जीवों पर आसानी से काबू पाया जा सकता है।" डेव ने कहा।

''यकीनन हम ऐसा कर सकते हैं। लेकिन हमारा टार्गेट है इस ग्रह के समस्त प्राणियों को अपने कण्ट्रोल में करना न कि उन्हें समाप्त करना। ऐसे में कोई दूसरा ही तरीका अपनाना ठीक रहता। अब इत्तेफाक से यान उतरते वक्त मेरा एक्सीडेंट हो गया। और मेरे मस्तिष्क को पृथ्वी के एक बच्चे का शरीर देना पड़ा। यहीं से मुझे एक अनोखा रास्ता मिल गया।

''कौन सा रास्ता सम्राट?" रोमियो ने पूछा।

''दरअसल इस ग्रह की सर्वाधिक शक्तिशाली प्रजाति एक अनदेखी ताकत से भय खाती है। और उसकी पूजा या इबादत करती है। वह अनदेखी ताकत कहीं ईश्वर कहलाती है, कहीं खुदा तो कहीं गॉड ।"

''आप सही कह रहे हैं सम्राट। यहां आने से पहले जब हम पृथ्वी का अध्ययन कर रहे थे तो यह बात काफी गहराई से हमने पढ़ी थी।" सिलवासा ने सर हिलाया।

''इसी तथ्य ने मुझे रास्ता दिखाया इन मानवों को अपने कण्ट्रोल में करने का। हम वैज्ञानिक रूप से इन पृथ्वीवासियों से बहुत ज्यादा विकसित हैं। और ऐसे कारनामे कर सकते हैं जो इनको किसी चमत्कार से कम नहीं दिखाई देंगे। रामू के रूप में मैंने ऐसे बहुत से कारनामे कर भी दिये हैं। जिसके बाद मेरे आसपास रहने वाले लोग मानने लगे हैं कि मेरे अन्दर कोई ईश्वरीय ताकत आ गयी है।"

''यह तो बहुत बड़ी कामयाबी है सम्राट।" डेव के चेहरे पर प्रसन्नता थी।

''हां। अब मेरा अगला टार्गेट है पूरी दुनिया के मनुष्यों में यह विश्वास जगाना कि मैं ईश्वर का अवतार हूं। और जब पूरी दुनिया इसपर यकीन कर लेगी तो उसी समय मैं यह घोषणा कर दूंगा कि मैं ही ईश्वर, अल्लाह या गॉड हूं।" सम्राट ने अपना पूरा मंसूबा उनके सामने जाहिर कर दिया।

सब ने ख़ुशी से सर हिलाया।

''फिर तो पूरी पृथ्वी बिना कुछ कहे हमारे कदमों में आ गिरेगी।" सिलवासा ने खुश होकर कहा।

''लेकिन ये काम इतना आसान भी नहीं। इस पृथ्वी पर एक से एक खुराफाती मनुष्य भी मौजूद हैं। जो अक्सर आँखों देखी को भी झुठलाने पर तुले रहते हैं। इसी पृथ्वी पर ऐसे लोग भी हैं जो अपने ईश्वर की सत्ता को भी स्वीकार नहीं करते। ऐसे में वह मुझे ईश्वर के रूप में कुबूलेंगे या नहीं, ये एक बड़ा प्रश्न है।" सम्राट ने फौरन ही उनकी उम्मीदों को बहुत आगे बढ़ने से रोका।

''उन्हें मानना ही पड़ेगा। कब तक वे हमारे चमत्कारों को झुठलायेंगे। और अगर मुटठी भर लोग न भी माने तो हम उन्हें चुपचाप मौत के घाट उतार देंगे।" डेव ने क्रोधित होकर कहा।

''ये इतना आसान भी नहीं है। सम्राट मौन होकर कुछ सोचने लगा।

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कुछ पलों तक रामू और उसकी माँ जड़वत बने एक दूसरे को देखते रहे। फिर उसकी माँ ने चीखने के लिए अपना मुंह खोला। एक बन्दर अगर किसी के सामने आ जाये तो चीखने के अलावा और कोई चारा ही कहां होता है।

उसी वक्त रामू को एक तरकीब सोची। उसने फौरन अपने दोनों हाथ जोड़ दिये और मां के कदमों में लोट गया। आखिर उसकी मां ही तो उसकी उम्मीदों का आखिरी सहारा थी। और माँ के कदमों में गिरना तो किसी के लिए भी गर्व की बात होती है।

मिसेज वर्मा ने जब एक बन्दर को अपने कदमों में लोटते देखा तो उसका डर हैरत में बदल गया। उसने अब गौर से बन्दर की आँखों में देखा तो वहां उसे आंसुओं की बूंदें चमकती दिखाई दीं।

मिसेज वर्मा का दिल करुणा से भर उठा। न मालूम इस बन्दर को कौन सा कष्ट था। जो वह इस तरह रो रहा था। वह घुटनों के बल जमीन पर बैठ गयी और उसके सर पर हाथ फेरने लगी। अपनी माँ का स्नेह पाकर बन्दर बने रामू की आँखों से आँसू और तेजी से गिरने लगे। उसे यूं रोता देखकर मिसेज वर्मा ने उसे अपने सीने से लगा लिया।

''मत रो। तुम्हें जरूर कोई बड़ी तकलीफ है। शायद तुम्हें भूख लगी है। मैं अभी तुम्हें कुछ खिलाती हूं।" वह उसे पुचकारती हुई फ्रिज की ओर बढ़ी जो पहले से ही खुला हुआ था। उसने गौर से फ्रिज के पास पड़े हुए चिमटे को देखा, फिर रामू की तरफ।

''अरे वाह तुम तो बहुत अक्लमन्द बन्दर हो। कैसी तरकीब लगाकर फ्रिज को खोला है।"

मिसेज वर्मा ने चार पाँच डिशेज निकालकर किचन के काउंटर पर रख दीं, ''बताओ, क्या खाओगे?

बन्दर बने रामू ने फौरन छोलों की तरफ इशारा किया।

''कमाल है। तुम्हारी पसन्द तो बिल्कुल मेरे बेटे रामू से मिलती है। उसे भी छोले बहुत पसन्द हैं। लो खा लो। उसके लिए मैं और बना दूंगी। वह शायद उस बहुरूपिये की तरफ इशारा कर रही थी। जो उसकी जगंह उसी के मेकअप में जमा हुआ था।

मिसेज वर्मा ने एक प्लेट में छोले निकालकर उसके सामने रख दिये। रामू उसे खाने लगा। उसे इतिमनान था, कि अब कोई भगायेगा नहीं। यही फर्क होता है माँ में और दूसरों में। उसकी मां बन्दर के जिस्म में भी उसकी भावनाओं को समझ गयी थी और उससे प्यार कर रही थी। जबकि दूसरे उसे देखते ही दुत्कार देते थे। उसे सबसे ज्यादा गुस्सा नेहा के ऊपर था जो कहने को उसकी बहुत बड़ी हमदर्द थी लेकिन इस हुलिये में देखकर ऐसा बुरी तरह दुत्कारा था जैसे वह कोई चोर हो।

''तुम ज़रूर पास के जंगल से आये होगे। लेकिन बिल्कुल मालूम नहीं होता कि तुम जंगली हो। ऐसा लगता है कि तुम किसी बहुत ही सभ्य घर में पले बढ़े हो।" मिसेज वर्मा ने कहा। और रामू की हलक में निवाला अटक गया। वह बुरी तरह खांसने लगा।

''आराम से खाओ। जल्दी करने की जरूरत नहीं।" मिसेज वर्मा जल्दी से गिलास में पानी निकाल लायी, ''लो इसे पी लो। इसको ऐसे पीते हैं। वह अपने मुंह के पास गिलास ले गयी और दो तीन घूंट लिये। शायद उसने सुन रखा था कि बन्दर इंसानों की नकल करते हैं।

रामू ने उसके हाथ से गिलास ले लिया और बाकायदा पीते हुए पूरा गिलास खाली कर दिया। मिसेज वर्मा उसे हैरत से देख रही थी। ऐसा सभ्य बन्दर उसने पहली बार देखा था।
 


तीनों लड़कों के मुंह उतरे हुए थे। अग्रवाल सर के ड्राइंग रूम में अमित, गगन और सुहेल की तिकड़ी मौजूद थी। तीनों अग्रवाल सर के आने का इंतिजार कर रहे थे।

''आखिर कहां से आ गयी रामू में इतनी पावर?" अमित हाथ मलते हुए बोला।

''कहीं उसकी बात सच तो नहीं?" सुहैल ने आँखें फैलाते हुए सबकी तरफ देखा।

''कौन सी बात?"

''यही कि अल्लाह उसके ऊपर मेहरबान हो गया है, और उसे ताकत बख्श दी है?"

''जबरदस्ती की मत उड़ाओ। भला अल्लाह उसे ताकत क्यों देने लगा!" अमित ने सुहेल को घूरा।

''लेकिन अगर तुम गहराई से सोचो। जो रामू क्लास का सबसे घोंचू लड़का था, वह गणित में एकाएक इतना तेज़ हो गया कि अग्रवाल सर को मात देने लगा। फिर उसने मिसेज कपूर का फोन सिर्फ पेन की नोक की मदद से ठीक कर दिया। उसके इक्ज़ाम में जो कुछ आने वाला था वह उसको पहले से पता चल गया। और अब यह ताज़ा घटना।......"

दोनों ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। वे भी अन्दर ही अन्दर सुहेल की बात से कायल थे।

अग्रवाल सर ने अन्दर प्रवेश किया और तीनों उनके सम्मान में खड़े हो गये।

''बैठो बैठो तुम लोग। कहो क्या हाल है?"

''ठीक है सर।" गगन ने धीरे से कहा।

''क्या बात है, आज तुम लोग काफी बुझे बुझे नज़र आ रहे हो! क्या समस्या है?"

''सर समस्या तो हमारी एक ही है। रामू।"

''वह तो हम सब के लिए समस्या बन गया है। एक स्टूडेन्ट की नालेज टीचर से ज्यादा हो गयी है। कहीं स्कूल वाले मुझे निकालकर उसे टीचर न रख लें।" अग्रवाल सर के माथे पर चिन्ता की लकीरें साफ दिख रही थीं।

''लेकिन वो लोग ऐसा क्यों करेंगे? आपके पास तो क्वालिफिकेशन है। जबकि रामू तो अभी हाईस्कूल भी पास नहीं है।" गगन ने हमदर्दी से सर की ओर देखते हुए कहा।

''तुम इस स्कूल के ट्रस्टी को नहीं जानते। महाकंजूस और चीकट टाइप का है। अगर वो रामू को रखेगा तो इसे सैलरी भी कम देनी पड़ेगी और उसका काम भी हो जायेगा। वो मेरी क्वालिफिकेशन को चाटेगा भी नहीं।"

मामला वाकई गंभीर था। सभी अपनी अपनी जगंह सोच में पड़ गये।

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जबकि बन्दर बने असली रामू ने भरपेट खाना खा लिया था और अब उसे नींद आ रही थी।

''लगता है तुम काफी थक गये हो और अब तुम्हें नींद आ रही है।" मिसेज वर्मा ने उसकी तरफ देखा। रामू ने सहमति में सर हिलाया।

''मेरे साथ आओ।" मैं तुम्हारे सोने का इंतिजाम कर देती हूं।

मिसेज वर्मा ने किचन से बाहर जाने के लिये कदम बढ़ाया। रामू उसके पीछे पीछे हो लिया। उसे देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वह उसे रामू के यानि उसी के कमरे की तरफ ले जा रही थी।

'तो क्या मम्मी ने उसे पहचान लिया है? हो सकता है। भला कौन मां होगी जो अपने लाल को नहीं पहचानेगी।' वह ख़ुशी ख़ुशी उसके पीछे बढ़ने लगा। उसकी मम्मी रामू के कमरे के दरवाजे पर पहुंच गयी।

लेकिन वहां न रुककर वह आगे बढ़ गयी। और एक छोटे से खुले स्थान के पास जाकर खड़ी हो गयी जो रामू के कमरे की बगल में मौजूद था। यहां एक पाइप था जो छत की तरफ गया हुआ था। उस पाइप से बरसात के मौसम में छत का गंदा पानी नीचे बहता था।

''तुम यहां आराम करो। मैं जाती हूं। कुछ और काम निपटाना है।" उसकी मम्मी वहाँ इशारा करके वहां से चली गयी और वह हसरत से उस छोटी सी गंदी जगह को घूरने लगा। उसके कमरे की एक खिड़की उसी तरफ खुलती थी और वह अक्सर उसका इस्तेमाल थूकने के लिए करता था। अब इस जगंह को आराम के लिए इस्तेमाल करना, उसे सोचकर ही उबकाई आ गयी।

लेकिन मरता क्या न करता। और कोई चारा ही न था। वह वहीं एक कोने में पसर गया। और कहते हैं नींद तो फांसी के तख्ते पर भी आ जाती है सो उसे भी थोड़ी ही देर में आ गयी।

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रामू बना सम्राट प्रिंसिपल के आफिस में दाखिल हुआ। प्रिंसिपल ने सर उठाकर उसकी तरफ देखा।

''क्या बात है रामकुमार?" प्रिंसिपल ने पूछा।

''मैडम मैं आपसे एक रिक्वेस्ट करना चाहता हूं।"

''लगता है तुम अग्रवाल सर की शिकायत लेकर आये हो। मैं जानती हूं कि वो तुम्हारे साथ बहुत ज्यादती कर रहे हैं। और तुम्हें परेशान कर रहे हैं। लेकिन तुम घबराओ मत। मैं बहुत जल्दी उन्हें हटाने वाली हूं। नये गणित के टीचर की वैकेन्सी अखबार में दे दी गयी है। जैसे ही कोई नया टीचर आयेगा, उन्हें हम हटा देंगे।"

''मैडम, मुझे अग्रवाल सर से कोई शिकायत नहीं। मुझे तो इस दुनिया के किसी जीव से कोई शिकायत नहीं।" रामू की बात पर प्रिंसिपल मैडम ने हड़बड़ा कर उसकी तरफ देखा, इस समय वह कोई बहुत ही पहुंचा हुआ सन्यासी लग रहा था। बल्कि एक अजीब सी रोशनी उसके चेहरे के चारों तरफ फैली हुई थी।

''क्या बात है रामकुमार? आज तुम कुछ बदले बदले दिखाई दे रहे हो।"

''हाँ मैडम। मैं वाकई बदल गया हूं। मैं क्यों बदला हूं यही बताने के लिए मैं आपके पास आया हूं।"

''तो फिर बताओ। ये सुनने के लिए मैं बेचैन हूं।"

''यहाँ पर नहीं मैडम। ये बात मैं पूरी दुनिया के सामने बताना चाहता हूं और उससे पहले पूरे स्कूल के सामने। आप प्लीज पूरे स्कूल में नोटिस निकलवा दीजिए कि रामू उन्हें कुछ खास बताना चाहता है।"

''ठीक है नोटिस निकल जायेगा।" मैडम रामू से कुछ ज्यादा ही इम्प्रेस हो चुकी थी इसलिए उसकी हर बात बिना चूँ चरा मान रही थी, ''मैं आज ही एनाउंस कर देती हूं कि कल की प्रेयर में सबको हाजिर होना अनिवार्य है। प्रेयर के बाद तुम अपनी बात उनके सामने रख देना।"

''ठीक है मैडम। जो बात मैं कहना चाहता हूं। उसके लिए प्रेयर के बाद का समय ही सबसे अच्छा है।" रामू मैडम को अपनी पहेली में उलझाकर बाहर निकल गया।

''अरे नेहा तुमने ये नोटिस पढ़ा?" पिंकी ने नेहा का ध्यान नोटिस बोर्ड की तरफ दिलाया और वो सब एक साथ नोटिस बोर्ड को पढ़ने लगीं।

''कल प्रेयर के बाद रामू क्या बताने जा रहा है?" तनु ने अपने दिमाग पर जोर डालने के लिए नाक भौं चढ़ाई।

''पता नहीं। अब तो लगता है उसका दिमाग यहाँ के टीचरों की समझ से भी बाहर हो गया है।" नेहा ने कंधे उचकाते हुए कहा।

''मैं बताऊं?" पिंकी बोली और दोनों उसकी तरफ घूम गयीं।

''क्या?" नेहा ने पूछा।

''मुझे लगता है कल रामू पूरे स्कूल के सामने तुम्हारे और अपने प्यार का एनाउंसमेन्ट करने जा रहा है। हो सकता है कल सबके सामने वह तुम्हें सगाई की अँगूठी पहना दे।" पिंकी अपनी गोल गोल आँखें छटकाते हुए बोली।

''यह खुराफाती विचार तुम्हारे भेजे में आया कहाँ से?" नेहा ने उसे घूरा।

''अरी यार, मेरा दिमाग कम्प्यूटर से भी तेज चलता है। मैं उसकी आँखों में बहुत दिन से तुम्हारे लिये प्यार देख रही हूं।"

''काश कि ये सच होता।" नेहा ने एक ठंडी साँस ली, ''लेकिन यह बस एक हसीन सपने के सिवा और कुछ नहीं।"

''क्यों सपना क्यों? मैंने कह दिया सो कह दिया। कल वह यही करेगा जो मैं कह रही हूं।"

पिंकी ने झटके के साथ अपनी उंगली ऊपर उठायी और उसी समय उसे पीछे से एक जोरदार झटका लगा। वह उई कहकर पीछे घूमी तो एक लड़का उसके पीछे औंधे मुंह लेटा हुआ था। एक भारी भरकम गुलदस्ता उसके हाथ से छूटकर साइड में गिर चुका था। फिर कराहते हुए वह लड़का जब ऊपर उठा तो उन्होंने उसके चेहरे पर कीचड़ भरा होने के बावजूद उसे पहचान लिया। यह गगन था।

''अरे गगन! तुम्हें क्या हुआ?" तनु ने हैरत से पूछा।

''ऐक्चुअली अपने भारी भरकम गुलदस्ते की वजह से सामने देख नहीं पाया और नाली से ठोकर खा गया।'' गगन ने खिसियानी हंसी हंसते हुए कहा।

''यह गुलदस्ता मेरे लिये है न। गगन तुम मेरा कितना ख्याल रखते हो।" पिंकी खुश होकर बोली और गगन ने बुरा सा मुंह बनाया। पूरे स्कूल में यही लड़की ऐसी थी जो उसे एक आँख नहीं भाती थी।

''आपको मैं किसी टाइम इमामदस्ता दे जाऊंगा। मसाला कूटने वाला। ये गुलदस्ता तो नेहा तुम्हारे लिये है।" गगन ने गुलदस्ता जमीन से उठाया और नेहा की तरफ बढ़ा दिया।

''मेरे लिये? भला मैं इस गुलदस्ते का क्या करूं?" नेहा ने कोई रिस्पांस नहीं दिया।

''ऐक्चुअली आज मैं तुम्हारे सामने वह बात निकाल देना चाहता हूं जो बरसों से तुमसे कहने के लिये तड़प रहा हूं।" गगन इस वक्त पूरा रोमांटिक होने की कोशिश कर रहा था। यह अलग बात है कि शक्ल से कुछ और ही लग रहा था।

''कमाल है! बात न हुई कब्ज का मर्ज़ हो गया कि जब तक न निकले आदमी तड़पता रहे।" तनु की बीच में टपक कर बोलने की आदत कभी कभी सामने वाले को दाँत पीसने पर मजबूर कर देती थी।

''तो फिर जल्दी बोल कर अपनी तड़प निकालो। मुझे काम से जाना है।" नेहा ने अपनी घड़ी पर नजर की।

''नेहा, आई लव यू सो मच और मैं तुमसे मंगनी और शादी दोनों करना चाहता हूं। ये देखो मैं अंगूठी भी लेकर आया हूं मंगनी के लिये।" गगन ने जेब से अंगूठी निकालकर दिखायी।

नेहा ने एक गहरी साँस ली और पिंकी की तरफ घूमी, ''पिंकी, तुम्हारी भविष्यवाणी तो कल की बजाय आज ही सच हो गयी।"

''अरे क्या मेरे बारे में कोई भविष्यवाणी की गयी थी?" खुश होकर गगन ने पूछा।

''हाँ।" नेहा ने कहा।

''क्या?" दाँत निकालकर गगन ने पूछा।

''यही कि एक गुलदस्ता तुम्हारे सर पर टूटने वाला है।" नेहा ने उसी का गुलदस्ता उसके सर पर दे मारा। और तेजी के साथ वहाँ से निकलती चली गयी। जबकि गगन अपने सर को सहलाता गुलदस्ते वाले को कोसता रह गया जिसने इतने भारी बरतन में रखकर वह गुलदस्ता बनाया था।

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पता नहीं उस वक्त क्या बज रहा था जब खट पट की आवाज सुनकर रामू की आँख खुल गयी। उसने अपनी पोजीशन पर नजर डाली। उस पत्थर पर काफी अच्छी नींद आयी थी उसे। फिर उसका ध्यान अपने कमरे की तरफ गया जिसकी खिड़की उसकी तरफ खुलती थी। उसने देखा कि उसके कमरे में रौशनी हो रही थी। यानि कमरे में कोई मौजूद था। उसने धीरे धीरे अपना सर खिड़की की तरफ बढ़ाया। वह देखना चाहता था कि कमरे में कौन मौजूद है।

उसकी आँखें खिड़की के बराबर में पहुंचीं और तब उसने देखा कि उसकी कुर्सी पर कोई उसी के डील डौल का लड़का मौजूद है जिसकी पीठ खिड़की की तरफ थी। वह लड़का कोई किताब पढ़ रहा था। रामू ने गौर से किताब को देखा और यह देखकर उसके देवता कूच कर गये कि यह किताब उसकी नहीं बल्कि उसके बाप की थी जिसे वह हाल ही में किसी कबाड़ी मार्केट से खरीद कर लाये थे। यह किताब प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान पर आधारित थी। रामू ने एक बार उसे उठाया था और फिर कवर पेज देखकर रख दिया था।

'तो यह है वह बहुरूपिया जो रामू बनकर मेरे घर पर कब्जा जमाये हुए है।' रामू ने अपने मन में कहा।

वह लड़का तल्लीनता से किताब की स्टडी में जुटा हुआ था। इतनी तल्लीनता से तो रामू अपने कोर्स की किताबें भी नहीं पढ़ता था जैसे वह उसके बाप की किताब पढ़ रहा था।

'मौका अच्छा है। मैं आज इसका सर तोड़ दूंगा। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।' बन्दर बने रामू ने इधर उधर नज़र दौड़ाई और जल्दी ही एक भारी पत्थर पर उसकी निगाहें गड़ गयीं। वह पत्थर के पास गया और उसे अपने हाथों में थाम लिया। अब वह धीरे धीरे खिड़की की ओर बढ़ा। खिड़की की चौखट पर उसने पत्थर रख दिया और फिर उचक कर खिड़की पर चढ़ गया। जबसे उसे बन्दर का शरीर मिला था, उसकी किसी भी हरकत में कोई आवाज़ नहीं पैदा होती थी। और वह लड़का तो वैसे भी किताब की स्टडी में इतना तल्लीन था कि उसे रामू के अन्दर आने का कोई एहसास ही नहीं हुआ।

रामू धीरे धीरे चलता हुआ उसके ठीक पीछे पहुंच गया। उसने उस लड़के की खोपड़ी तोड़ने के लिये पत्थर को अपने सर से बलन्द किया। और उसी पल वह लड़का उसकी तरफ घूम गया। उसकी आँखें रामू की आँखों से टकराईं और रामू को ऐसा लगा मानो उसके हाथों को किसी ने जकड़ लिया हो। उसने अपने हाथों को हिलाने की कोशिश की लेकिन असफल रहा।

लेकिन रामू को अपनी दशा से भी ज्यादा एहसास उस हैरत का था जो उस लड़के का चेहरा देखकर पैदा हुई थी। वह लड़का हूबहू उसकी फोटोस्टेट कापी था। जरा भी दोनों में फर्क नहीं था। उस लड़के ने अपने सर को झटका दिया और रामू के हाथ से पत्थर छूटकर नीचे गिर गया।

''तो तुम आ ही गये अपने घर।" उस लड़के के मुंह से आवाज़ निकली और रामू को आश्चर्य हुआ। क्योंकि उसने उसे पहचान लिया था। उसके बन्दर की शक्ल में होने के बावजूद।

''कौन हो तुम?" रामू ने पूछना चाहा लेकिन उसकी ज़बान से एक बार फिर बन्दरों वाली खों खों निकल कर रह गयी।

''मैं ... रामू हूं। क्या शक्ल से नहीं दिखाई देता।" उस लड़के ने अपने चेहरे की ओर इशारा किया। रामू ने एक गहरी साँस ली। इसका मतलब उसका हमशक्ल उसकी ज़बान समझ रहा था।

''ल.. लेकिन रामू तो मैं हूं।" उसने हकलाते हुए कहा।

''तुम रामू नहीं हो। तुम सिर्फ एक बन्दर हो, जिसके अन्दर रामू का दिमाग फिट किया गया है।" उस लड़के ने कहा। इसका मतलब उस लड़के को सारी बातें मालूम थीं। और शायद उसी का इन सबके पीछे हाथ भी था।

''तुम हो कौन जिसने मेरे शरीर और घर दोनों पर अपना अधिकार कर लिया है?" रामू ने इसबार बेबसी के साथ पूछा।

''जल्दी ही जान जाओगे मेरे बारे में। अगर तुम अपनी भलाई चाहते हो तो मेरे साथ ही रहना अब। क्योंकि मेरे अलावा इस दुनिया में तुम्हारी भाषा और कोई नहीं समझ सकता है। और तुम्हारे मेरे पास रहने से मेरे बहुत से मकसद आसानी से हल हो जायेंगे?" वह लड़का इस तरह उसकी कुर्सी पर बैठा था मानो कोई सम्राट बैठा हो।

''कैसे मक़सद?" रामू ने पूछा।

''मैंने कहा न उतावली ठीक नहीं। धीरे धीरे तुम्हें सब मालूम हो जायेगा।"

''अरे रामू, किससे बात कर रहा है?" बाहर से उसकी माँ की आवाज़ आयी। और फिर वह अन्दर दाखिल भी हो गयी।

''मैं इस बन्दर से बात कर रहा था माँ।" रामू बने सम्राट ने बन्दर बने रामू की ओर इशारा किया और रामू सिर्फ दाँत पीसकर रह गया।

''अरे! ये अन्दर कैसे आ गया? वैसे बहुत समझदार बन्दर है ये। तुम इसे पालतू बना लो। काम आयेगा।"

''पालतू तो मैं इसे पहले ही बना चुका हूं।" रामू बने सम्राट ने अर्थपूर्ण मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया।
 


स्कूल का प्रार्थना स्थल इस समय पूरी तरह फुल था। जो बच्चे कभी स्कूल नहीं आते थे वह भी आज मौजूद थे। क्योंकि सब को यही जिज्ञासा थी कि देखें आज रामू क्या एनाउंस करने जा रहा है। कुछ लड़कों के चेहरे भी उतरे हुए थे। ये लड़के थे अमित, सुहेल और गगन। उन्हें यही डर सता रहा था कि कहीं रामू उनकी उस दिन वाली घटना के बारे में तो नहीं बताने वाला है जब उन्होंने उसे मारने की कोशिश की थी। वहां टीचर व प्रिंसिपल सहित सभी मौजूद थे सिवाय रामू के। प्रिंसिपल बार बार अपनी घड़ी देख रही थीं।

''मैंडम, प्रार्थना का समय हो गया है। क्या मैं प्रार्थना शुरू करवा दूं?" सक्सेना सर ने प्रिंसिपल को मुखातिब किया।

''दो मिनट इंतिजार कर लीजिए सक्सेना जी। रामू को आ जाने दीजिए। उसे आज कुछ एनाउंस करना है।"

''लगता है वह हमारी छूट का कुछ ज्यादा ही नाजायज़ फायदा उठा रहा है। जब सारे बच्चे आ गये तो वह क्यों नहीं आया अभी तक।" सक्सेना सर बड़बड़ाये।

उसी समय रामू वहाँ दाखिल हुआ। उसके साथ साथ एक बन्दर भी चल रहा था।

''अरे रामकुमार। तुम इतनी देर से क्यों आये? और क्या ये बन्दर तुम्हारा पालतू है?" प्रिंसिपल भाटिया ने पूछा।

''मैं किसी भी प्राणी को अपना पालतू बना सकता हूं।" रामू ने अजीब से स्वर में कहा।

''क्या मैं प्रार्थना शुरू करवाऊं?" सक्सेना सर ने प्रिंसिपल की ओर देखा।

''जी हां।" प्रिंसिपल ने सहमति दी और वहाँ ईश्वर की वंदना शुरू हो गयी। बन्दर बने रामू ने भी अपने हाथ जोड़ लिये थे।

वंदना खत्म हुई। अब प्रिंसिपल रामू यानि सम्राट की तरफ घूमी।

''हाँ रामकुमार। तुम्हें जो एनाउंस करना है तुम कर सकते हो।"

रामू बने सम्राट ने माइक संभाला और कहना शुरू किया, ''यहाँ पर मौजूद सभी श्रोताओं। अभी आप लोगों ने ईश्वर की वंदना की। मैं आपसे सवाल करता हूं। क्या आप में से किसी ने ईश्वर को देखा है?"

सभी बच्चों ने नहीं में सर हिलाया।

''अगर तुम लोगों के सामने ईश्वर प्रकट हो जाये तो तुम लोगों को कैसा लगेगा?"

उसके इस सवाल पर सब उसका मुंह ताकने लगे। फिर एक लड़का बोला, ''अगर हमारे सामने ईश्वर प्रकट हो जाये तो हम फौरन उसके सामने अपना सर झुका देंगे।"

उसकी बात पर सब बच्चों ने एक स्वर में 'हाँ कहा।

''तो फिर आओ। मेरे सामने अपना सर झुकाओ। क्योंकि मैं ही हूं ईश्वर। सर्वशक्तिमान इस पूरी सृष्टि का रचयिता।"

रामू की बात सुनकर वहाँ सन्नाटा छा गया। बच्चों के साथ साथ वहाँ मौजूद टीचर्स भी रामू बने सम्राट का मुंह ताकने लगे थे। जबकि बन्दर बना असली रामू भी हैरत में पड़ गया था।

''यह तुम क्या कह रहे हो रामू?" प्रिंसिपल ने हैरत से उसकी ओर देखा।

''अब मैं रामू नहीं हूं। क्योंकि रामू की आत्मा मेरे शरीर से निकल चुकी है और परमात्मा का अंश मेरे शरीर में दाखिल हो चुका है। अब मैं अवतार बन चुका हूं परमेश्वर का। सम्राट के मुंह से निकलने वाली आवाज़ में अच्छी खासी गहराई थी।

''हम कैसे मान लें कि तुम ईश्वर के अवतार हो?" अग्रवाल सर कई दिन बाद रामू से मुखातिब हुए।

''जिस प्रकार से मैंने गणित के सवाल हल किये हैं और तुम्हारे शागिर्दों को नाकों चने चबवाए हैं क्या इससे यह बात सिद्ध नहीं होती कि मैं सर्वशकितमान हूं?

''यह तो मैं मानता हूं कि तुम्हारे अन्दर कोई दैवी शक्ति मौजूद है। लेकिन तुम्हें ईश्वर तो मैं हरगिज़ नहीं मान सकता।" अग्रवाल सर ने टोपी उतारकर अपनी खोपड़ी खुजलाई।

''मैं भी नहीं मानता। मेरा अल्लाह तो वो है जो हर जगह है और किसी को दिखाई नहीं देता। तुम अल्लाह हरगिज नहीं हो सकते।" सुहेल बोला।

''लगता है मुझे अपनी शक्तियां दिखानी ही पड़ेंगी।" सम्राट बोला। फिर उसने अपनी एक उंगली अग्रवाल सर की ओर उठायी और दूसरी सुहेल की तरफ। दूसरे ही पल दोनों उछल कर हवा में टंग गये। वहां मौजूद सारे बच्चे यह दृष्य देखकर चीख पड़े। रामू बने सम्राट ने फिर इशारा किया और दोनों हवा में चक्कर खाने लगे। इस चक्कर में दोनों एक दूसरे से बार बार टकरा रहे थे। फिर उसने एक और इशारा किया और दोनों धप से ज़मीन पर गिर गये। दोनों बुरी तरह हांफ रहे थे।

''किसी और को मेरे ईश्वर होने में शक हो तो वह बता दे।" रामू ने चारों तरफ देखकर कहा।

सब चुप रहे। अगर किसी को शक था भी तो मुंह खोलकर उसे हवा में लटकने का हरगिज़ शौक नहीं था।

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शहर के लोकल न्यूज़ पेपर्स और न्यूज़ चैनल्स को ज़बरदस्त मसाला मिल गया था। सब चीख चीखकर रामकुमार वर्मा के भगवान बन जाने की कहानी सुना रहे थे। रामू के घर में एक आफत मची हुई थी। उसके माँ बाप यानि मिसेज और मि0 वर्मा बदहवास घर के एक कोने में दुबके हुए थे जबकि उनके घर का बाहरी दरवाज़ा जोर जोर से भड़भड़ाया जा रहा था। बाहर पबिलक का एक रैला था जो शायद उनका दरवाज़ा तोड़कर अन्दर घुस जाना चाहती थी। आखिरकार कमज़ोर सा दरवाज़ा भीड़ की ताब न लाकर शहीद हो गया और पब्लिक तले ऊपर गिरती पड़ती अन्दर दाखिल हो गयी। भीड़ की पोजीशन देखकर दोनों और सिमट गये।

''द..देखो, हम कुछ नहीं जानते...हमें..." मिसेज वर्मा ने कुछ कहना चाहा लेकिन उसी वक्त मलखान सिंह बोल उठे जो सबसे आगे मौजूद थे।

''भाइयों यही हैं वह पवित्र हस्तियाँ जिन्होंने हमारे भगवान को जन्म दिया है।"

मलखान सिंह का इतना कहना था कि पब्लिक मि0 एण्ड मिसेज वर्मा पर टूट पड़ी। कोई मि0 वर्मा के हाथ चूम रहा था तो कोई मिसेज वर्मा के पैरों पर गिरा जा रहा था। सब अपनी अपनी इच्छाएं भी मि0 और मिसेज वर्मा से बयान करने लगे थे ताकि वह अपने भगवान सुपुत्र से सिफारिश कर दें।

''कृपा करके आप रामू से कह दें कि वह मेरा इनकम टैक्स का मामला क्लीयर कर दे।" नंबर दो का रुपया धड़ल्ले से कमाने वाले राजू मियां हाथ जोड़कर बोले जिनके घर में कुछ ही दिन पहले इनकम टैक्स की रेड पड़ी थी।

''अबे ओये ऊपर वाला तेरे भेजे को खराब करे। तू भगवान को रामू रामू कहकर पुकारता है मानो वह तेरा खरीदा हुआ है।" मलखान सिंह राजू मियां की गर्दन पकड़ कर दहाड़े।

''तो फिर हम रामू को और क्या बोलें?" मिनमिनाती आवाज में राजू मियां ने पूछा।

''ओये तू अगर रामू को भगवान राम कह देगा तो क्या तेरी ज़बान घिस जायेगी?"

''लेकिन इससे तो कन्फ्यूज़न हो जायेगा मलखान भाई।" पंडित बी.एन.शर्मा पीछे से बोले।

''ओये कैसा कन्फ्यूज़न पंडित।" मलखान ने इस बार बीएनशर्मा की तरफ देखकर आँखें तरेरीं।

''एक भगवान राम जी तो पहले ही पैदा हो चुके हैं त्रेता युग में। अगर हम इन्हें भी भगवान राम कहने लगे तो लोग डाउट में पड़ जायेंगे कि हम कौन से भगवान की बात कर रहे हैं।"

''हाँ यह बात तो है।" मलखान जी सर खुजलाने लगे। फिर बोले, ''आईडिया। हम इन्हें पूरे नाम से बुलाते हैं यानि भगवान रामकुमार वर्मा।"

''हाँ यह ठीक है।" पंडित बीएनशर्मा ने सर हिलाया।

''तो फिर बोलो तुम सब। भगवान रामकुमार वर्मा की - जय हो।" अब मलखान सिंह जी बाकायदा वहाँ रामकुमार वर्मा की जय जयकार कराने लगे थे।

लेकिन जितनी ज्यादा ये लोग जय जयकार करते थे मिस्टर और मिसेज वर्मा उतना ही ज्यादा अपने में दुबके जा रहे थे।
 
रामू यानि सम्राट को ईश्वर मानने वालों की संख्या धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी। यह देखकर प्रशासन की आँखों में चिन्ता के भाव तैरने लगे थे। क्योंकि इस नये भगवान को मानने वालों और पुराने भगवानों को मानने वालों के बीच झगड़ों के आसार भी बढ़ते जा रहे थे। पुराने धर्मों को मानने वाले इस नये धर्म के भगवान को पाखंडी बता रहे थे। जवाब में सम्राट के अनुयायी उन्हें मरने मारने पर उतारू थे। हालांकि अभी कोई गंभीर घटना नहीं हुई थी। लेकिन आगे क्या होगा इसकी आशंका सभी को थी।

पुलिस विभाग ने इस नये भगवान की तफ्तीश के लिये एक दरोगा को दो सिपाहियों के साथ भेजा।

''यह तुमने क्या नाटकबाज़ी फैला रखी है!" रामू बने सम्राट के सामने पहुंचकर दरोगा ने आँखें तरेरीं। सम्राट इस समय ऊंचे चबूतरे पर विराजमान था। असली रामू बन्दर के जिस्म में उसकी बगल में बैठा हुआ था। अगर वह मानवीय शक्ल में होता तो कोई भी उसकी चेहरे की परेशानी आसानी से देख लेता। जिस चबूतरे पर वे लोग मौजूद थे उसके आसपास लगभग सौ लोगों का मजमा लगा हुआ था जो भगवान रामकुमार वर्मा की जय जयकार कर रहे थे।

''यहाँ कोई नाटक नहीं फैला हुआ है। यहाँ तो शान्ति का साम्राज्य फैला हुआ है।" सम्राट ने शांत स्वर में जवाब दिया।

''कौन शान्ति? सिपाहियों, देखो शान्ति किधर गायब है। ससुर दोनों को ले चलकर हवालात में बन्द कर दो।" दरोगा सिपाहियों की तरफ घूमा।

सिपाही तुरंत शान्ति की तलाश में जुट गये।

उधर सम्राट का प्रवचन जारी था, ''शान्ति, सुख और चैन की तलाश हर एक को होती है। लेकिन शान्ति तो तुम्हारे मन के अन्दर ही बसती है। लेकिन तुम उसे पहचान नहीं पाते। ठीक उसी तरह जैसे तुम लोगों को जीवन भर ईश्वर की तलाश होती है। लेकिन अगर ईश्वर सामने आ जाये तो तुम उसे पहचान नहीं पाते और दीवाने बनकर इधर उधर चकराने लगते हो। ऐ दीवानों मुझे पहचानो। मैं ही ईश्वर हूं। मैं ही हूं इस सृष्टि का निर्माता।

''इस दीवाने को ले चलकर हवालात में बन्द कर दो। जब दो डंडे पड़ेंगे तो अक्ल ठिकाने आ जायेगी। ससुर ईश्वर बना रहा है।" दरोगा ने व्यंगात्मक भाव में कहा। सिपाही सम्राट को पकड़ने के लिये आगे बढ़े लेकिन सम्राट के भक्तों ने सामने आकर उनका रास्ता रोक लिया।

''उन्हें मत रोको। मेरे पास आने दो। सम्राट ने शांत स्वर में कहा।" सिपाही आगे बढ़े और जैसे ही उन्होंने सम्राट को हाथ लगाया। बुरी तरह उछलने कूदने लगे और साथ ही इस तरह हंसने लगे मानो कोई उन्हें गुदगुदा रहा है। पबिलक और दरोगा हैरत से उन्हें देख रहे थे।

''अबे उल्लुओं। ये क्या कर रहे हो तुम लोग। जल्दी से इसे पकड़ो और हवालात में बन्द करो।" दरोगा चीखा। लेकिन सिपाहियों ने मानो उसकी बात ही नहीं सुनी। वे उसी प्रकार उछलने कूदने और कहकहा मारने में व्यस्त थे।

''नर्क में जाओ तुम लोग । मैं ही कुछ करता हूं।" दरोगा इस बार खुद सम्राट को गिरफ्तार करने आगे बढ़ा। सम्राट शांत भाव से उसे देख रहा था। जैसे ही दरोगा ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया, सम्राट ने उसके चेहरे पर एक फूंक मारी। फौरन ही दरोगा दो कदम ठिठक कर पीछे हट गया। अचानक ही उसके चेहरे के भाव बदल गये। चेहरे की सख्ती गायब हो गयी और उसकी जगह ऐसा लगा मानो उसपर दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा। चेहरा कुछ इसी तरह उदास हो गया था।

फिर उसकी आँखें छलछला कर निर्मल धारा भी बहाने लगीं। और उसके मुंह से भर्राई हुई आवाज़ में निकला, ''माँ, तुम कहां हो। मुझे छोड़कर किधर खो गयीं तुम। देखो तुम्हारी याद में तुम्हारे बबलू का क्या हाल हो गया है।

सम्राट के पास बैठे भक्त हैरत से दरोगा को देखने लगे थे।

''बचपन में इसकी माँ अपने आशिक के साथ भाग गयी थी। आज इसे उसकी याद आ रही है।" सम्राट ने बताया।

''लेकिन अभी अचानक इसे कैसे माँ की याद आ गयी?" एक भक्त ने पूछा।

''इसलिए क्योंकि अभी मैंने इसको इसकी माँ की आत्मा के दर्शन कराए हैं।"

''अरे वाह। भगवान, कृपा करके मुझे अपने बाप की आत्मा के दर्शन करा दीजिए। मुझे उससे उस गड़े धन का पता पूछना है जो उसने ज़मीन में कहीं छुपा दिया था। और फिर हमें बताने से पहले ही उसका दम निकल गया था।" भक्त ने आशा भरी नज़रों से भगवान की ओर देखा।

''इसके लिये तुम्हारे बाप की आत्मा से बात करने का कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि करारे नोटों की शक्ल में जो धन उसने गाड़ा था, वह पूरे का पूरा दीमक चाट गयी है।" सम्राट ने भक्त की आशाओं पर तुरंत आरी चला दी।

उधर दरोगा अपनी माँ की याद में एक कोने में गुमसुम बैठ गया था, अत: अब सम्राट को रोकने वाला कोई नहीं था। अब तो वहां अच्छी खासी तादाद में न्यूज़ चैनल वाले भी पहुंच गये थे। और चीख चीखकर रामकुमार वर्मा के बारे में बहस कर रहे थे कि वह असली ईश्वर है या नक़ली। इन चैनलों के ज़रिये इस भगवान को पूरे देश में देखा जा रहा था। दूसरी तरफ बन्दर बना असली रामकुमार वर्मा यानि रामू अपने दाँत पीस रहा था और मन ही मन सम्राट को सबक सिखाने की तरकीबें सोच रहा था। सम्राट इस समय उसकी तरफ मुत्वज्जे नहीं था। जल्दी ही रामू को उसे सबक सिखाने की तरकीब सूझ गयी। इस समय एक धूपबत्ती उसकी बगल में ही जल रही थी। उसने धीरे से उस धूपबत्ती को सम्राट की तरफ खिसकाना शुरू कर दिया।

सम्राट इस समय उपदेश देने में तल्लीन था। उसने रामू की हरकत की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। उसे वैसे भी रामू की कोई चिन्ता नहीं थी। भला बन्दर के जिस्म में मौजूद रामू उसका बिगाड़ ही क्या सकता था।

अचानक रामू ने झपटकर जलती हुई धूपबत्ती सम्राट के पिछवाड़े लगा दी। दूसरे ही पल एक चीख मारकर सम्राट उछल पड़ा। उसने हैरत और गुस्से से बन्दर बने रामू की ओर देखा। पहली बार किसी ने उसे इस धरती पर चोट पहुंचायी थी।

''ओह। तो तुम्हें भी अब सबक देने की ज़रूरत है।" उसने दाँत पीसकर कहा। उधर पूरी पब्लिक हैरत से दोनों की ओर देख रही थी। उन्होंने साफ साफ देखा था कि एक बन्दर ने उनके भगवान को चीख मारने पर मजबूर कर दिया है।

''भगवान, आपका बन्दर तो बड़ा नटखट है।" एक भक्त ने प्यार से भगवान के बन्दर की ओर देखा।

''हाँ। ये मुझे बहुत प्रिय है। सम्राट ने ऊपरी तौर पर मुस्कुराहट सजाकर किन्तु भीतर ही भीतर पेचो ताब खाते हुए कहा।

''अच्छा। अब यह सभा यहीं बर्खास्त की जाती है। मुझे अब ध्यान में लीन होना है।" सम्राट ने उठते हुए कहा।

''किन्तु ईश्वर तो आप स्वयं हैं। फिर आप किसके ध्यान में लीन होंगे?" एक भक्त ने जो कुछ ज्यादा ही खुराफाती दिमाग का था सम्राट को टोक दिया।

''मैं स्वयं के ध्यान में लीन होऊंगा। मैं ईश्वर हूं जिसकी सीमाएं अनन्त हैं। उस अनन्त के बोध हेतु ध्यान की ऊर्जा अति आवश्यक है ताकि मैं अनन्त सृजन कर सकूं।" सम्राट ने इस बार कठिन आध्यात्मिक भाषा का इस्तेमाल किया था जिसने भक्तों को भाव विह्वल कर दिया। उधर सम्राट ने बन्दर बने रामू को पकड़ा और हवा में तैरते हुए एक तरफ को निकल गया।

नीचे पब्लिक खड़ी हुई भगवान रामकुमार वर्मा की जय जयकार कर रही थी।
 


अपने यान में सम्राट अपने साथियों के साथ मौजूद था। थोड़ी दूरी पर असली रामू भी दिखाई दे रहा था जिसका बन्दर का जिस्म हरे रंग की किरणों के घेरे में था।

''हम काफी हद तक अपने मकसद में कामयाब हो चुके हैं। बहुत जल्द पूरी दुनिया में हमारी पूजा शुरू हो जायेगी। हालांकि कुछ टेढ़े दिमाग वाले अभी भी हमारे रास्ते में टाँग अड़ाने की कोशिश कर रहे हें, लेकिन उनकी औकात कीड़े मकोड़ों से ज्यादा नहीं।" सम्राट अपने साथियों से कह रहा था।

''एक बार पूरी दुनिया के दिमागों पर हमारा कब्ज़ा हो जाये। फिर इस धरती पर हमारी हुकूमत होगी।" रोमियो ने खुश होकर कहा।

''हां। यहाँ के लोग हमारे गुलाम होंगे। जो लोग अभी इस ज़मीन पर पहले दर्जे पर क़ाबिज़ है वह अब दूसरे दर्जे पर आ जायेंगे। हमेशा के लिये। लेकिन शायद उनके दिमाग में विद्रोह की भावना हमेशा रहेगी।" सम्राट ने कुछ सोचते हुए कहा।

''ऐसा क्यों सम्राट?" सिलवासा ने चौंक कर पूछा।

''क्योंकि इन लोगों ने हमेशा ही पृथ्वी पर शासन किया है। अब इस बन्दर को ही देख लो। उस लड़के का दिमाग इस बन्दर के जिस्म में आने के बाद भी अपनी हार कुबूल नहीं कर रहा है। कुछ देर पहले इसने मुझे परेशान कर दिया था।''

''तो फिर इसका पत्ता साफ कर देते हैं।" डोव ने क्रूरता के साथ कहा।

''नहीं। हमें यहाँ मौजूद हर इंसान के दिमाग से अपने लिये विद्रोह की भावना निकालनी है। उनसे अपनी पूजा करानी है।"

''लेकिन कैसे?" सिलवासा ने पूछा।

''उसके लिये हमें कुछ तजुर्बे करने होंगे। और इसके लिये यह बन्दर बना रामू काम आयेगा।"

''आप कैसा तजुर्बा करना चाहते हैं सम्राट?" सिलवासा ने पूछा।

''मैं देखना चाहता हूं कि कोई इंसान कितनी बेबसी के हालात से गुज़रने के बाद हमारा गुलाम बन सकता है। अत: तुम लोग इसे 'एम-स्पेस में भेज दो।" सम्राट की बात सुनकर वहां मौजूद सभी के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गयी।

''एम-स्पेस। वो तो मैथेमैटिकल समीकरणों का ऐसा चक्रव्यूह है जहां से निकलना लगभग नामुमकिन है। वहां पर तो ये नाचता रह जायेगा।" सिलवासा ने गहरी साँस लेकर कहा।

''लेकिन मुझे एक डर है।" बहुत देर से खामोश मैडम वान ने अपनी ज़बान खोली।

''शायद तुम ये कहना चाहती हो कि अगर किसी ने एम-स्पेस पार कर लिया तो वह हमें हमेशा के लिये अपने कण्ट्रोल में कर लेगा।" सम्राट ने कहा।

मैडम वान ने सर हिलाया, ''जी हाँ। क्योंकि एम स्पेस हमारा कण्ट्रोल रूम भी है। और उसी के द्वारा हमें अपने ग्रह से शक्तियां मिलती हैं।

''यह नामुमकिन है कि पृथ्वी का कोई दिमाग एम-स्पेस की गणितीय पहेलियों को समझ ले। और ये बच्चा तो बिल्कुल ही नहीं समझ सकेगा। क्योंकि मैं इसकी पूरी हिस्ट्री से वाकिफ हूं। गणित तो इसके लिये हमेशा एक हव्वे की तरह रही है। और बिना एम स्पेस की गणितीय पहेलियों को समझे कोई उसे पार नहीं कर सकता।"

''तो फिर ठीक है। हम इसे एम-स्पेस में डाल देते हैं।" कहते हुए मैडम वान ने डोव को इशारा किया और डोव जो कि यान के स्विच बोर्ड के पास था उसने एक स्विच दबा दिया। दूसरे ही पल यान में उस जगह का फर्श गोलाई में हट गया जहाँ पर बन्दर बना रामू मौजूद था। एक क्षण के अन्दर रामू का जिस्म उस रिक्त स्थान में गायब हो चुका था।

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यह अँधेरी सुरंग पता नहीं कितनी लंबी थी जिसमें रामू गिरता ही जा रहा था। उसे कुछ नहीं सुझाई दे रहा था। वह तो बस उस पल का इंतिज़ार कर रहा था जब वह किसी पक्के फर्श से टकरायेगा और उसके चिथड़े उड़ जायेंगे। उसने अपनी आँखें भी बन्द कर ली थीं। फिर उसे लगा कि उसके चारों तरफ रोशनी फैल गयी है। और उसी पल वह किसी नर्म स्थान पर गिरा था। क्योंकि उसे ज़रा भी चोट नहीं आयी थी।

उसने अपनी आँखें खोल कर देखा। यह तो किसी रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म मालूम हो रहा था। एक ऊँचा स्थान जिसकी साइड में रेलवे ट्रैक भी मौजूद था। जैसे ही उसने अपनी आँखें खोलीं, उस ट्रैक पर कहीं से एक ट्राली आकर रुक गयी। उस प्लेटफार्म पर उसके अलावा और कोई मुसाफिर नहीं था। अचानक वहाँ एक अनाउंसमेन्ट होने लगा। उसने सुना, अनाउंसमेन्ट उसी की भाषा में हो रहा था।

'समस्त यात्रियों से अनुरोध है कि दस मिनट के अन्दर इस जगह से दो सौ किलोमीटर दूर चले जायें क्योंकि दस मिनट के बाद दो सौ किलोमीटर के दायरे में तेज़ाबी बारिश शुरू हो जायेगी। जिसमें हर व्यक्ति गल जायेगा।" अनाउंसमेन्ट सुनते ही उसके होश उड़ गये। दस मिनट में दो सौ किलोमीटर कोई कैसे दूर जा सकता है? असंभव।"

उसने देखा न तो प्लेटफार्म और न ही ट्राली के ऊपर कोई छत जैसी संरचना थी। जो उस बारिश से बचाने वाली होती। फिर उसके दिमाग में एक विचार आया और वह दौड़कर ट्राली पर चढ़ गया। उसके चढ़ते ही ट्राली तेज़ गति से ट्रैक पर भागने लगी। उसने देखा सामने दो इंडिकेटर मौजूद हैं। पहला इंडिकेटर ट्राली की स्पीड को बता रहा था, सौ किलोमीटर प्रति मिनट। जबकि दूसरा इंडिकेटर समय को बता रहा था। उसके फेफड़ों से इत्मीनान की एक गहरी साँस निकली। इस स्पीड से तो ट्राली दो मिनट में ही दो सौ किलोमीटर का रास्ता तय कर लेती। उसने खुश होकर कोई गीत गुनगुनाना शुरू कर दिया। ये अलग बात है कि मुंह से केवल बंदर की खौं खौं ही निकल कर रह गयी। झल्लाकर उसने गाना बन्द कर दिया । और ट्राली के इंडिकेटर को देखने लगा। समय बताने वाले इंडिकेटर ने एक मिनट पूरा किया, और उसी समय ट्राली को एक झटका लगा। उसने चौंक कर देखा, अब ट्राली की स्पीड सौ से कम होकर पचास हो गयी थी।

'कोई बात नहीं। दो मिनट न सही, तीन मिनट में तो ट्राली दो सौ किलोमीटर के दायरे से निकल ही जायेगी। तब भी सात मिनट रह जायेंगे।' उसने अपने लड़खड़ाते दिल को संभाला। और आसमान की ओर देखा जहाँ अब अजीब से बादल छाने लगे थे। ये बादल पूरी तरह सुर्ख थे और शायद यही तेज़ाबी बारिश लाने वाले थे।

एक मिनट और बीता, और ट्राली को फिर एक झटका लगा। अब इंडिकेटर उसकी स्पीड पच्चीस किलोमीटर प्रति मिनट ही बता रहा था।

अचानक एक विचार ने उसके दिल की धडकनें फिर बढ़ा दीं। यानि हर मिनट ट्राली की स्पीड कम होकर आधी रही जा रही थी। इसका मतलब कि, वह मन ही मन कैलकुलेट करने लगा कि अगर इसी तरह हर मिनट ट्राली की स्पीड आधी होती रही तो दो सौ मीटर दूर जाने में उसे कितना समय लगेगा। गणित में हमेशा फिसडडी रहने वाला उसका दिमाग इस समय अपने को मुसीबत से घिरा देखकर बिजली की रफ्तार से चलने लगा था। जब उसने अपनी कैलकुलेशन का रिज़ल्ट देखा तो उसके होश उड़ गये। इस तरह तो अनंत समय तक चलने के बाद भी ट्राली कभी भी दो सौ मीटर के दायरे को पार नहीं कर सकती थी।

 
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