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मेरे नौकर ने मेरी बहन को चोदा

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मालकिन… तनिक छुट्टी चाही आठ दिन की!” बद्री चाचा मुझसे छुट्टी मांगते हुए बोले।

“क्यों चाचा?” मैंने पूछा।

“गांव जाना है, होली आवत है ना…” चाचा बोले।

“चाचा आपको तो पता है ना, साहब भी टूर पर गए हैं। इतने बड़े घर का काम मैं अकेले…” मैं बोल ही रही थी कि मुझे टोकते हुए चाचा बोले- मालकिन, पिछले चार साल से घर नहीं गए हैं, घर वाली बुलावत रही है…”

“अभी इस उम्र में घर वाली क्यों” मैं हँसते हुए उससे बोली।

“वैसा नहीं मालकिन, पर…” वह भी शर्माते हुए बोले।

“चाचा मगर आप को भी पता है ना मैं सबकुछ अकेले नहीं संभाल सकती, और आप ही हो कि अगर पंद्रह दिन के बाद चले जाते तो तब तक साहब भी आ जाते!” मैं बोली।

“आप फिकर मत करो, मैंने घर के काम के लिए अपने भतीजे को बोला है।” वह बोले।

चाचा पर तो मुझे भरोसा था पर उसके भतीजे पर? नये आदमी पर एकदम से भरोसा रखना थोड़ा मुश्किल ही था तो मैंने चाचा से पूछा- चाचा भरोसेमंद तो है ना?

ऐसे सीधे सीधे पूछना भी अच्छा नहीं लग रहा था।

“है मालकिन, मेरी जबान है…” वह बोला।

“तो फिर ठीक है… कब जा रहे हैं आप?” मैंने पूछा।

“परसों… कल रात को ही निकलेंगें।” चाचा बोले।

“हाँ चलेगा…” ऐसा कहते ही बद्री चाचा निकल गए।

प्रिय पाठको… मैं पिंकी सिंह … मेरे पति नितिन। नितिन का खुद का बिज़नेस है। वे स्वभाव से और शरीर से बहुत ही अच्छे हैं पर उनके टूर से मुझे बहुत चिढ़ होती है, महीने के पंद्रह दिन वे टूर पे होते हैं और मैं घर में अकेली ही होती हूँ।

हमारा शहर के बाहर एक बड़ा सा बंगला है, शहर से लगभग 10-15 किलोमीटर दूर है। आजु बाजू सब बड़े बड़े बंगले ही थे, तो किसी से ज्यादा जान पहचान नहीं थी। इसीलिए जब भी नितिन टूर पर चला जाता तो मैं बहुत बोर हो जाती घर में अकेली बैठ कर… और कुछ भी करने को नहीं होता था।

बद्री चाचा हमारे घर में नौकर है। उनकी उम्र लगभग 65 साल थी फिर भी घर के सभी काम कर लेते हैं, मुझे कोई काम नहीं करना पड़ता है। अगर शहर जाना हो तो चाचा ही ड्राइविंग करते थे, तो मैंने कभी ड्राइविंग सीखी ही नहीं।

चाचा छुट्टी पे जा रहे थे तो मुझे डर सा लग रहा था। मेरी शादी होने के बाद पहली बार चाचा छुट्टी ले रहे थे। अब सब काम मुझे करना था इस डर से ही मैं उन्हें ना कह रही थी। पर उन्होंने भी चालाकी से अपने भतीजे को काम पे लगा दिया तो मुझे कोई कारण ही नहीं बचा ना कहने को।

दूसरे दिन चाचा अपने भतीजे को ले कर आ गया- मालकिन, यह लो, राजेश को ले आया हूँ”

चाचा ने आवाज दी।

मैं उस समय ऊपर के बैडरूम में थी, मैंने ऊपर से देखा तो नीचे चाचा और उनका भतीजा खड़ा था।

मैं सीढ़ियों से नीचे आ गयी और सोफे पर बैठ गई।

“हा…तो नाम क्या है?” मैंने उसे पूछा।

तो उसने हाथ जोड़ते हुए बताया- जी राजेश…

“क्या क्या काम आता है?” मैंने पूछा।

“जी सबकुछ, जो आप कहेंगे, सब करेगा” चाचा बोले।

” चाचा मैंने सवाल उससे किया है…” मैं बोली।

“अच्छा माफी…” ऐसे कहते हुए चाचा चुपचाप खड़े हो गए।

“गाड़ी चला लेते हो…” मैंने पूछा।

“जी आवत है!” वह बोला।

“लाइसेन्स है?” मैंने पूछा।

“हाँ…” उसने अपना लाइसेंस मुझे दिखाया।

“चाचा इसे सब कुछ समझा दो, सब काम वगैरा, मैं बाहर जा रही हूं।” मैंने उन्हें बताया और घर से बाहर निकली।

बाहर टैक्सी पकड़कर मैं शहर चली गयी।

होली दो दिन बाद थी तो सारे मार्केट में हलचल थी। सारी दुकानें रंगबिरंगी हो गयी थी। मैंने मॉल में जाकर अपने लिए शॉपिंग की, फिर एटीएम में जाकर पैसे निकाले। बाद में रिक्शा पकड़कर घर आ गयी।

घर में आते ही राजेश ने मुझे पानी लाकर दिया। फिर उसे रात का खाना ऊपर बेडरूम में लाने को बोलकर मैं बेडरूम में चली गई।

शाम को मैंने चाचा को पैसे दिए, उसी रात की गाड़ी से चाचा अपने गांव को चले गए।

दूसरे दिन सुबह बैडरूम का दरवाजा बजने से मेरी नींद खुली।

“कौन है?” मैंने पूछा।

“मैं हूँ मेमसाब, चाय!” बाहर से राजेश की आवाज आई।

मैंने उठकर अपना गाउन ठीक किया और दरवाजा खोला, उसने चाय टेबल पर रखी और चला गया।

मैंने चाय पीते पीते पेपर पढ़ा, फिर नहा के नीचे जाने लगी कि तभी फोन की घंटी बजी।

“हाँ सीमा बोल?” मेरी बहन सीमा का फ़ोन था।

“दीदी आज दोपहर को टाइम है क्या?” उसने मुझे पूछा।

“हाँ है ना, क्या बात है?” उसने मुझे पूछा।

“कुछ नहीं, बहुत दिन हुए तुमसे मिले हुए, तो सोचा तुमसे मिल लूं।” वह बोली।

“मैं एक फ्रेंड के घर जा रही हूँ दोपहर को, चार बजे तक लौटूंगी, तुम ऐसा करो, चार बजे आ जाओ।”

“ओके दीदी, पर तुम चार बजे तक आ जाओगी ना?” वह बोली।

“हाँ बाबा, आ जाऊँगी।” मैंने बोला।

मैंने राजेश को बुलाया- राजेश, दोपहर को मेरी बहन आने वाली है, दोपहर को खाना थोड़ा ज्यादा बनाना।”

“जी मेमसाब…” राजेश बोला।

“मैं बाहर जा रही हूँ, दरवाजा बंद कर लेना।” उसको बोलकर मैं घर से बाहर निकली।

“मेरा काम तीन बजे ही खत्म हो गया, मैं रिक्शा पकड़ कर घर की तरफ निकली। चार बजे सीमा आने वाली थी, उसके साथ क्या क्या बातें करनी है इस बारे में मैं सोचने लगी।

सीमा मेरे से दो साल छोटी थी। सबसे छोटी होने के कारण बड़े ही लाड़ प्यार से पली बढ़ी थी। मैं हर बार उसके स्तनों की तुलना मेरे स्तनों से करती पर हर बार वही जीत जाती, ऐसा ही हाल नितम्बों का था। उसकी फिगर बड़ी ही आकर्षक थी और उसे उसने संभाली भी थी। रंग में गोरी सीमा दिखने में मुझसे ज्यादा अच्छी थी, मुँह फट थी, बिल्कुल बिन्दास रहती थी। शादी के बाद भी उसका स्वभाव नहीं बदला था।

वह बहुत बार मुझे कहती- दीदी, जीजू को तो अपना बिज़नेस प्यारा है, तुम क्यों अपने आप को तड़पा रही हो, कोई जवान मर्द रखो ना अपने यहाँ काम पे, वह दिन में काम करेगा फिर रात को काssssम भी करेगा…

पर मैंने कभी उसकी बातें गंभीरता से नहीं ली, मुझे उसमें कोई रस नहीं था। वह हमेशा से ही ऐसे बिन्दास बोलती थी पर मुझे नहीं लगता कि उसने भी कभी ऐसा कुछ किया होगा।
 
“मैडम आपका घर आ गया!” ऑटो ड्राइवर के बोलते ही मैं विचारों से बाहर आ गयी।

ऑटो से उतर कर मैंने उसको पैसे दिए और गेट के अंदर चली गई।

लॉक खोल कर घर के अंदर गयी, राजेश कहीं दिखाई नहीं दे रहा था तो मैंने खुद ही किचन में जा कर फ्रिज में से पानी निकालकर पिया। फिर हॉल में सोफे पर बैठ कर पीछे रेस्ट पे सिर रख कर आंख बंद करके बैठ गई।

अचानक ही कुछ आवाज कानों में पड़ी, मैंने आंखें खोल कर देखा तो कुछ भी नहीं था। शायद मुझे वहम हो रहा था… यह सोच कर फिर से आंखें बंद कर लेट गयी। ऊपर पंखा भी पूरी स्पीड में घूम रहा था। कुछ वक्त शांति थी पर फिर से वही आवाज सुनाई पड़ी।

मैंने ध्यान दिया तो पता चला आवाज ऊपर के बेडरूम से आ रही थी। मेरे बैडरूम के पास एक गेस्ट रूम है उसी रूम से।

राजेश मेरे न रहते मेरे बैडरूम में जाने की हिम्मत नहीं करेगा। इसलिए थोड़ा डरते हुए मैं ऊपर जाने लगी।

जैसे जैसे मैं रूम के पास जा रही थी वैसे ही आवाजें तेज होने लगी।

ये तो सिसकारियों की आवाजें थी, किसी औरत की सिसकारियों की… मगर कौन हो सकता है? राजेश ने कोई लड़की तो नहीं बुलायी ना, या फिर उसकी बीवी हो?

मेरे घर में ना रहते हुए उसका यह क्या काम चल रहा था। काम को आये हुए एक ही दिन हुआ था और वह औरतें लाने लगा था।

मुझे तो अब घर में उसके साथ अकेले रहने में भी डर लगने लगा था।

“अभी उसे रंगे हाथ पकड़ती हूँ।” उन गरम सिसकारियों की वजह से मेरे अंदर भी हलचल पैदा होने लगी थी।

“आहहह… आहहह… और और… आउच…” उस औरत की सिसकारियाँ सुनाई दे रही थी।

“यह ले हमारा बबुआ… यही चाही… था न तुम्हें… ले…हमार… और ले!” मुझे राजेश की आवाज सुनाई दी, तब मुझे पूरा यकीन हुआ।

यह तो राजेश ही है… पता नहीं कौन सी छिनाल को लाया है… मेरी इज्जत तो पूरी मिट्टी में मिला दी… पता नहीं किस किस ने देखा उसको उस रंडी को यहां लाते हुए।

मैं खुद ही चौंक गयी ‘रंडी छिनाल’ जैसे शब्द मैंने कभी इस्तमाल नहीं किये थे। कभी किसी के झगड़ों में या फिर शराबी के मुँह से सुने थे। पर आज मन में ही सही मैंने उन शब्दों का इस्तेमाल किया था।

वो कुछ भी हो, उन शब्दों की वजह से या फिर उन सिसकारियों की वजह से, मेरी चुत के पानी का स्तर अब बढ़ने लगा था। किधर किधर तो गुदगुदी होनी शुरू हो गयी थी। अंदर ही अंदर चुत के पास के बाल अकड़ने लगे थे। मेरे अंदर की बेचैनी अब बढ़ने लगी थी।

मेरा हाथ अपने आप ही मेरी चुत पर गया और मैंने अपनी चुत अपने कपड़ों के ऊपर से ही दबा दी। मेरे स्पर्श से मेरी चुत में गुदगुदी होने लगी, तन बदन रोमांचित होने लगा।

“हे भगवान, चार बजने को हैं… अगर सीमा ने यह देख लिया तो पहले राजेश को थप्पड़ जड़ देगी, फिर उसे घर से बाहर निकाल देगी। मैं घर में अकेली होती हूँ उसे पता है, मेरी इतनी चिंता तो उसे भी है, आखिरकार मेरी बहन है वह!” मेरे मन में मेरी बहन का खयाल आया।

“भाड़ में जाए यह राजेश… बाहर आने के बाद उसे देखती हूं। मैं पहले नीचे जाकर बैठती हूँ, सीमा आ गयी तो गजब हो जाएगा… बहुत ही बिन्दास है वह… मेरे ऊपर भी शक ले सकती है।” मैं नीचे जाने के लिए मुड़ी तभी राजेश की आवाज मेरे कानों में पड़ी।

“ईइह… लो कुतिया… ईइह लो हमार आखरी दाओ… ले.. जोर से… पूरा का पूरा मक्खन छोड़ते हैं तुम्हरे अंदर… ले छिनाल…” उस आवाज ने मुझे फिर से मेरी चुत रगड़ने को मजबूर कर दिया। अंदर इतना पानी था कि मेरी पैंटी पूरी गीली हो गयी थी।

“आह… क्या हो रहा है मुझे… इतना पानी… मैं क्यों गरम हो रही हूँ… और खुशबू भी बहुत मादक है…” अचानक मेरा हाथ मेरे नाक के पास ले जाते हुए मेरे मुंह से सिसकारी निकल गयी।

मैं फिर से नीचे जाने को मुड़ी तो मुझे उस औरत का आवाज आई- नहीं राजू… अंदर मत छोड़ना प्लीज… हमेशा की तरह अंदर मत…

वह उतना ही बोली पर मेरे नीचे की जमीन मानो हिलने लगी।

“ये… ये… तो सीमा की आवाज है… मतलब सीमा… नहीं नहीं… सीमा ऐसे नहीं करेगी… शायद मुझे ही गलतफहमी हुई होगी!” मन में कह कर मैं नीचे जाने लगी।

“क्या मेमसाब… आप भी देरी से बोली… मेरा मक्खन अंदर ही गिर गया ना..” राजेश बोला।
 
“मेमसाब?!? राजेश उसे मेमसाब बोल रहा है, इसका मतलब यह कोई रंडी नहीं है, कोई घरेलू औरत है, मैं घर में नहीं हूँ यह देख कर उसने इसे बुलाया होगा।”

मैं एक एक कदम दूर जा रही थी पर आगे के वाक्य से मैं थम गई।

“अरे राजू… कोई बात नहीं… तुम्हारा मक्खन मुझे बहुत पसंद है… मगर उसका टेस्ट मुझे बहुत पसंद है… तुमने तो सारा मेरे नीचे के होठों में डाल दिया… अब मैं टेस्ट कैसे करूँ?”

यह तो पक्का सीमा की आवाज है, और बोलने की स्टाइल भी सीमा जैसी है।

मेरा शक सही साबित हो रहा था।

“कोई बात नहीं… ईह लो हमार चम्मच… ले लो मुँह में और टेसट कर लो!” राजेश बोला।

बाद में मुझे ‘पुटु’ कर आवाज आई और ‘सुर्र…सुर्र…’ कर चूसने की आवाज।

अब तो मेरे चुत के गीलेपन की हद हो गयी, नीचे जाने के बजाय मैंने अब मेरे रूम में जाकर कपड़े बदलने की सोची और मेरे रूम की तरफ मुड़ी।

“चलो अब जल्दी से… यह अब ठीक करो… दीदी के आने का टाइम हो गया है।”

उसके शब्दों से मैं चौंक गयी, मुझे अब पक्का यकीन हो गया कि वह सीमा ही थी।
 
मैं अपने बेड रूम के सामने ही खड़ी थी। मैंने रूम के अंदर जाकर रूम का दरवाजा हल्के से लगा दिया। अंदर जाते ही मैंने सलवार कमीज उतार दी। मैं ब्रा और पैंटी में ही आईने के सामने खड़ी हो कर अपने आप को निहारने लगी।

“अहह..क्या सही फिगर है मेरी… पर सीमा जितनी अच्छी नहीं है ना!” मैं फिर नेगेटिव सोच रही थी.

“कितनी गीली हो गई हूँ मैं, इससे पहले मैं कभी दिन में गीली नहीं हुई थी, मगर उनके शब्दों ने और सिसकारियों ने मुझे पूरा पिंघला दिया, मेरी पैंटी भी पूरी तरह से मेरी चुत से चिपकी हुई है और उसमें दिख रही है मेरी चुत की दरार… अहह…” उस दरार पर हल्के से मेरी उंगली मैंने फिराई तो मेरे पूरे शरीर पर रोंगटे खड़े हो गए।

मैंने हाथ पीछे ले जाते हुए मेरी ब्रा का हुक निकाल कर ब्रा निकाल दी। मेरे कोमल मुलायम स्तन पूरे रोगटों से भरे हुए थे। मेरे निप्पल भी अब कड़े हो गए थे। मैंने उनको अपनी उंगलियों में पकड़ कर दबा दिए।

मेरे मुख से ‘आsssहह…’ सीत्कार बाहर निकली। मैंने अपने स्तनों को मेरे हाथो से पकड़ कर दबाया, मेरे मन में खयाल आया- ऐसे ही राजेश ने सीमा के स्तनों को दबाया होगा, ऐसे ही!

मैंने खुद ही अपने स्तनों को सहलाया और खुद ही मुस्कुराई, आगे के विचार मुझे उत्तेजना के शिखर पर पहुँचा रही थी।

“ऐसे ही दबाता होगा ना वो सीमा के स्तन, पर उसके स्तन मेरे स्तनों से ज्यादा कड़क होंगे क्या? न जाने पर उसके मर्दाना हाठों में उसके स्तन पूरे नहीं समा सकते, ऐसे ही छुआ होगा उसने सीमा के निप्पलों को!” ये सोचते हुए मैं अपने निप्पल पर उंगलियाँ फिराने लगी।

“ऐसे ही उसने अपनी उंगलियाँ उसके पेट पर घुमाई होंगी.” कहकर मैंने अपनी उंगलियाँ मेरे पेट पर घुमाते हुए मेरी चुत पर ले गयी और ‘सीssssह’ मैंने अपनी टांगें भींचते हुए चुत पर दबा दी।

मैं अब अपनी आंखें बंद करके कामुकता के शिखर पर पहुँच रही थी।

“दीदी… दीदी… मैं आ गयी, कहाँ हो तुम?” जैसे ही सीमा का आवाज आई, मैं झट से बाथरूम में चली गयी।

अंदर जाकर मैंने शावर लिया और अपने बदन को तौलिये से पौंछने लगी।

तभी दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी।

“कौन है…?” मैंने पूछा।

“मैं सीमा..” जवाब आया।

“दो मिनट रुको, मैं चेंज कर रही हूँ.” मैं बोली.

“क्या दीदी, मुझसे क्या शर्माना, दरवाजा खोलो ना… मुझे तुम्हें देखना है.” वह बोली।

“बकवास बंद करो सीमा!” मैंने गाउन पहना और दरवाजा खोला।

दरवाजा खोलते ही सीमा सीधी अंदर आ गयी और मुझे गले लगा लिया- दीदी, कितने दिन बाद मिल रही हो!

तभी राजेश ने दरवाजा खटखटाया- मेमसाब यह लो शरबत!

ऐसा बोलकर उसने शरबत का ग्लास टेबल पर रखा।

“राजेश कहाँ गए थे तुम?” मैंने पूछा।

“मेमसाब… वो… वो…” अचानक मेरे सवाल की वजह से वह थोड़ा घबराया, पर उसकी नजर सीमा पर ही थी।

“क्या वो… वो… कब से आई हूं मैं… पर तुम्हारा कोई पता ही नहीं?” मैंने जरा चिल्लाते हुए कहा।

“मेमसाब, चावल… वो चावल लेने गए थे!” वह बोला.

“चावल, चावल तो हैं ना घर में!” मैं बोली।

“हाँ… पर बासमती नहीं है… बिरयानी बनाने की सोच रहा था, ये मेमसाब भी आई हैं ना!” सीमा की तरफ देखते हुए राजेश बोला।

“अच्छा.. अच्छा… जाओ कुछ नाश्ता बनाओ.” मैं बोली।

“क्या बनाऊँ मेमसाब?” वह बोला.

सीमा बोली- समोसा चाट बनाओ, तुम्हारा अच्छा होता है.

अचानक सीमा बोली तो मैंने चौंक कर सीमा की तरफ देखा, तब तक उसने अपनी जीभ दांतों तले दबा भी दी थी।

“तुम को कैसे पता?” मैंने पूछा।

“अरे… नहीं… नार्थ में ऐसी ही चीजें होती हैं ना…” वह नजर चुराते हुए बोली।

“हाँ तो लाओ ना… और दो घंटे तक हमे डिस्टर्ब मत करो, कुछ लगेगा तो बोल देंगे!”

“जी मेमसाब!” वह बोलकर चला गया।
 
उसके जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद कर दिया, तब तक सीमा बेड पर बैठ गयी थी।

दरवाजा बंद कर के मैं सीमा के पास आई और उसे पूछा- सच बोल सीमा, तू इसको पहचानती है क्या?

“नहीं दीदी, मैं कैसे पहचानूँगी इसे?” उसने तो सरासर इन्कार कर दिया।

“सीमा, बताती हो कि नहीं?” मैंने ग़ुस्से से बोली तो वह भी ग़ुस्से से बोली- दीदी, जो भी कहना है, साफ साफ कहो!

“मुझे बस इतना ही कहना है कि जो कुछ भी है सच बोल, क्या चल रहा है तुम्हारा?” मैं बोली।

“क्या चल है मेरा?” उसने उल्टा मुझे ही सवाल किया।

“मैंने आज सब अपनी आँखों से देखा है.” मैं बोली.

तो वो अटकते हुए बोली- यह कैसे मुमकिन है, दरवाजा तो बंद था!

बोलने के बाद उसे अहसास हुआ उसने फट से जीभ अपने दांतों तले दबा दी।

“पकड़ी गई न… अब बताओ तुम्हारे और राजेश की बीच में क्या चल रहा है?” मैंने पूछा।

मैंने उसे पकड़ा जरूर था पर उसपे गुस्सा होने के बजाय उसके मुंह से उसकी कहानी सुनने में ज्यादा रस था। मेरे दिमाग से चुत ज्यादा उत्सुक थी। उनकी बातें अभी भी मुझे याद आने लगी थी। मेरी चुत भी अब गीली होने लगी थी।

“बताती हूँ!” बोलकर उसने कहानी सुनानी चालू कर दी।

“दीदी, तुम्हें तो पता है, राकेश हमेशा टूर पर रहते हैं। मैं भी तुम्हारी तरह घर में अकेली रहती हूं, मुझे भी घर खाने को दौड़ता है। पिछले साल हमारे घर का नौकर काम छोड़ कर चला गया। मैं नौकरानी रखने के बारे में सोच रही थी पर नौकरानी मिलना शहर में बहुत ही मुश्किल है। मिल भी गयी तो भी काम उसके हिसाब से होगा। और फिर चौबीस घंटे काम करने वाली नौकरानी मिलना भी बहुत मुश्किल काम है। तो फिर से नौकर रखने का सोचा, तब उसके बारे में तुमसे बात भी की थी.”

“हाँ तुम बोली तो थी, तब मैंने बद्री चाचा से बात भी की थी.” मैं बोली।

“वही तो, तभी बद्री चाचा ने राजेश को हमारे घर भेजा। राजेश भी घर के सारे काम पूरा मन लगाकर करता। और वह ईमानदार भी है। मुझे सारा घर खाने को दौड़ता। तुम्हें तो पता ही है कि मैं कितनी बिंदास स्टाइल की हूँ। पिछली होली को ही इसकी शुरुआत हुई।

पिछले साल हमारा पूरा कॉलेज का ग्रुप होली खेलने का प्लान बना रहा था। हम सब घर से कहीं बाहर जाकर होली खेलने वाले थे पर ऐन मौके पे तीनों लड़कों ने प्लान कैंसिल कर दिया, तो हम चारों लड़कियाँ ही बची। अब लड़कियाँ कहाँ बाहर जाएंगी तो हम सब ने मेरे घर पर होली सेलिब्रेट करने की सोची। प्लान के नुसार हम सब सुबह नौ बजे मेरे घर पर मिले। मैंने और राजेश ने पहले ही पूरी तैयारी कर ली थी।

वे तीनों मतलब रंजू, राखी, चेतना। उनको तो तुम पहचानती ही हो, वो सब भी मेरी तरह बोल्ड हैं। वे तीनों मेरे घर पर आई। राजेश ने पराँठे बनाये थे, हम सबने भरपेट खाना खाया, फिर बाहर गार्डन में आकर के होली खेली। हम चारों लड़कियाँ पूरी तरह से भीग चुकी थी।

फिर मैंने राजेश से टॉवल मंगवाया और सिर को और बदन को पौंछ कर घर में आ गयी।

घर में आ कर सब बारी बारी नहायी और कपड़े चेंज किये।

अब फिर सब को ज़ोरों से भूख लगी थी।

तभी रंजू बोली- सीमा, ड्रिंक्स है क्या तुम्हारे पास?

“क्यों, आज अचानक?” मैंने पूछा।

“ऐसे ही मूड है.” उसने बोला।

“नहीं यार… आज नहीं है, लेकिन अक्सर मेरे घर में होती है हर बार। मैं और राकेश पीते हैं साथ में!” मैंने बताया।

“हम्म…तो फिर जाने दो.” कहकर वह बैड पर बैठ गयी.

तभी दरवाजा बजा।

“कौन है?” मैंने पूछा।

“मैं हूँ… राजेश… खाना लाया हूँ.” वह बाहर से बोला।

“ओके ओके… अंदर आ जाओ.”

राजू अंदर आ गया और टेबल पर सब सामान रखने लगा।

“राजू तुम नहीं गए कहीं होली खेलने?” राखी ने पूछा।

“नही… शाम को खेलूंगा.” वह बोला।

“शाम को… तुम्हारे यहाँ तो होली बहुत धूमधाम से मनाते हैं.” चेतना बोली।

“जी मेमसाब सबसे बड़ी होली तो हमारे गांव में ही मनाते है, एक दूजे को रंग लगाकर… थोड़ी भंगवा पी कर। बहुत मजा आता है.” राजेश जोश में सब बोलने लगा।

“भंगवा??” चेतना ने पूछा।

हम तीनों को भी समझ में नहीं आया था तो हम भी ध्यान से सुनने लगी।

“भंगवा… उससे एक नशे वाला शर्बत बनता है.” वह बोला।

नशे का नाम सुनते ही रंजू बोली- काश यहाँ भी नशे वाली शर्बत होती!

हम तीनों भी हंसने लगी।

“आपको चाहिए क्या?” राजेश बोला.

रंजू मूड में आ गयी- है क्या तुम्हारे पास?

रंजू ने पूछा।

“हाँ, भांग तो हमेशा ही मेरे पास रहती है.” राजू बोला।

“तो गर्ल्स ट्राय करें?” रंजू ने पूछा.

हमें भी कुछ नया चाहिए ही था तो सबने हाँ कर दी।

“चलेगा राजू हमें दे दो न टेस्ट!” रंजू बोली।

“अभी बना के लाते हैं.” राजू बोला.

“खाइके पान बनारस वाला…” गाना गाते गाते नीचे चला गया।

“बढ़िया है तुम्हारा नौकर.” रंजू बोली।

“इससे भी बढ़िया है.” चेतना बोली।

“कौन?” हम तीनों ने उसकी तरफ देखा तो वह घबरा गई।

“नहीं… कोई नहीं” वह बोली।

“कौन? कौन?” रंजू उसे चिढ़ाती हुई बोली।

“नही…कोई नहीं” चेतनाइधर उधर देखते हुए बोली।

“तुम्हारा नौकर… क्या नाम है उसका?” राखी कुछ सोचते हुए बोली।

“कौन… दामोदर?” रंजू ने चेतना को चिकोटी काटते हुए पूछा।

“हाँ याररर… क्या मस्त है ना!” अब राखी लगी चेतना की टांग खींचने लगी।

“हाँ यार… उसका वो ना बहुत बढ़िया है… और मजबूत है.” चेतना भी उनके झांसे में आकर सब बताने लगी।

“तुम्हें कैसे मालूम?” रंजू बोली।

“वो एकदिन खुले में नहा रहा था ना… तब देखा.” चेतना बोली।

“नंगा ही नहा रहा था क्या?” रंजू ने पूछा।

“नहीं यार… नंगा कैसे नहाएगा… पर उसका टॉवल खुल गया और मुझे दिखा उसका… मूसल!” चेतना शर्माते हुए बोली.

“तो फिर लिया या नहीं चुत में?” रंजू ने पूछा।

“हाँ लिया ना… एक बार… बहुत मजा आया था…” चेतना सब याद करते हुए बोली।

“पर मैं शर्त लगाकर कहती हूं कि राजू का उससे भी बड़ा होगा.” राखी को क्या सूझी क्या पता।

“चुप करो, राजू को बीच में मत लाओ.” मैं डांटते हुए बोली।

“क्यों… सीमा को बुरा लगा?” रंजू मुझे चिकोटी काटते हुए बोली।

“वैसे कुछ नहीं… क्यों बेचारे को…” मैं बोल ही रही थी.

कि राखी बीच में बोली- तुमने भी उसे चढ़ा लिया है क्या?

“कुछ भी बोलती हो…” मैं थोड़ा शर्माते हुए बोली।

“कुछ भी क्या… मन हुआ तो करने का… और वैसे ही तुम्हें बहुत जरूरत है… दिन ब दिन तुम बहुत बोर होती जा रही हो!”

रंजू मुझे चिढ़ाती हुई बोली.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
 
आपने पढ़ा कि मेरी छोटी बहन सीमा मुझे बता रही है कि उसके सेक्स सम्बन्ध मेरे नौकर से कैसे और कब बनने शुरू हुए थे.

“आओ अंदर… ” मैं बोली।

“यह लीजिये” कहकर उसने एक एक ग्लास सब के हाथों में रखे। उस ग्लास में देखा तो दूध ही दिख रहा था।

“यह तो दूध है?” मैं बोली।

“उसी में मिलाया है.” वह बोला।

“अच्छा!”

“तनिक आराम से पीजिये… पहली बार पी रही है ना… आराम से मजा लीजिये.” कहकर वह नीचे चला गया।

पर हम चारों को धीरज कहाँ था, हमने एक ही बार में पूरा का पूरा ग्लास खाली कर दिया। वैसे तो हम ने शराब बहुत बार पी थी पर भांग का नशा ही कुछ और था। एक ही ग्लास में भांग अपना असर दिखाने लगी थी।

हमें हमारी जबान पर कंट्रोल नहीं रह गया था, हम सब एक दूसरे को चिढ़ा रही थी। हम पहले से ही बिंदास थी तो सेक्सुअल बातें करने लगी। भांग का नशा हमें कामुक बातें करने को उकसा रहा था।

“ये चेतना… क्या बोली तुम… तुम्हारे दामू का लंड मेरे राजू के लंड से अच्छा है?” मैं भी नशे में बड़बड़ाने लगी।

“देखो ना कुछ भी बोलती है। राजू का डेफिनेटली बड़ा होगा।” राखी मेरी साइड लेते हुए बोली।

“तुमको कैसे पता… तुमने चुत में लिया है या मुँह में लिया है?” चेतना भड़कते हुए बोली।

“नहीं लिया… पर सॉलिड ही होगा.” मैं बोली।

“साबित करो, अगर मैं हार गई तो तुम्हारी कोई भी बात मानूँगी.” चेतना बोली।

“सोच ले… कुछ भी बोलूँगी वो मानना पड़ेगा.” राखी हँसते हुए बोली।

“हाँ मंजूर है… अब साबित करके दिखाओ?” चेतना ग़ुस्से से बोली।

“राजू… राजू…” मैंने आवाज लगाई पर कोई जवाब नहीं आया।

मैंने फिर से आवाज लगाई- राजेश…

तो नीचे से आवाज आई- आया मेमसाब!

राजेश के बेडरूम में आते ही रंजू बोली- राजेश, यह तुम्हारी भाँगवा बहुत ही बढ़िया है.

ऐसा बोलकर वह हंसने लगी, उसके साथ हम सभी हँसने लगे।

वह भ्रमित हो कर हम चारों की ओर देखने लगा, फिर बोला- मेमसाब वह सही ही होती है.

“और दो ना…” राखी बोली।

“नहीं मेमसाब… इतना ही ठीक है.” उसको पता चल गया था कि हमें नशा चढ़ गया था।

“मैंने कहा ना… मुझे और चाहिए.” कह कर हँसने लगी फिर छोटी बच्ची की तरह रोने लगी।

राजू ने मेरी तरफ देखा, मैंने आँखों से ही उसे लाने का इशारा किया।

“ठीक है मेमसाब लावत है…” कहकर वह नीचे चला गया।

रंजू अब अपने दुप्पटे को हाथों में लेकर खेलने लगी, राखी रोना बंद करके बाथरूम चली गई, चेतना तो एकटक दरवाजे को देखती रही।

मैं सब को देखकर हँसने लगी।

तभी दरवाजे पे दस्तक हुई।

“आ जाओ.” मैंने बोला।

राजू ने हम तीनों के ग्लास हमारे हाथों में दिए और राखी का ग्लास टेबल पर रखकर जाने लगा तो सीमा बोली-ओह… राजू… कहाँ जा रहे हो… तनिक रुको ना!

राजू अपनी जगह पर रुक गया.

“अब तनिक दरवाजा बंद कर दो!”

अब राजू चकरा गया।

तभी राखी बाथरूम से बाहर आ गयी। मैं नशे में थी फिर भी मुझे शॉक ही लगा। राखी ने अपने कपड़े उतार दिए थे और सिर्फ ब्रा पैंटी में ही बाहर आ गयी। राजू ने अपनी आंखें बंद कर ली और बाहर जाने लगा तो राखी चिल्लाई- रुको… तुम कहाँ जा रहे हो?

कह कर वह राजू के पास चली गई और उसको गले लगा लिया।

“मेमसाब… छोड़ो… छोड़ो!” कहते हुए वह छटपटाने लगा, पर राखी उसे और भी जोर से कसने लगी।

थोड़ी देर और छटपटाने के बाद उसने प्रतिकार करना बंद किया फिर राखी ने उसे छोड़ दिया।

“वाओ… इसका हथियार तो बहुत ही कड़क है, चेतना मुझे तो लगता है कि तुम शर्त हार जाओगी.” राखी बोली।

“मैं शर्त नहीं हारूँगी, अभी तक तुमने खोल कर कहाँ देखा है.” चेतना बोली।

“ओके राजू… खोल कर दिखाओ.” रंजू राजू को बोली।

“क्या?” राजू ने डरकर पूछा, क्या चल रहा है उसको समझ नहीं आ रहा था।

“दिल… अपना दिल!” मैं विषय बदलने के लिए बोली। मेरी सहेलियां किस हद तक जाएंगी मुझे पता था, वे राजू को नंगा कर के ही छोड़ने वाली थी पर मैं प्रयास कर रही थी कि ऐसा ना हो।

पर मेरा मन भी राजू को या फिर किसी और मर्द को नंगा देखने का हो रहा था।

इसका कारण भी वैसा था, राकेश पिछले दो महीनों से बार बार टूर पर था, एक रात रुकता फिर सुबह गायब हो जाता। ट्रेवल की थकान के वजह से हम ने 2 महीने में एक बार भी सेक्स नहीं किया था। मन करता था किसी को चढ़ा लूं अपने ऊपर… पर हिम्मत नहीं होती थी। दिन तो कट जाता पर रात में बदन बगावत कर देता था।
 
“चुप… दिल क्या दिल, चलो राजू अपनी धोती उतारो!” राखी बोली।

राजू हमेशा कमीज़ और धोती पहनता था।

“क… का… बोलत हो मेम साब..” वह डरते हुए बोला।

“कुछ नहीं… बस अपनी धोती उतारो!” बोलते हुए राखी वैसे ही ब्रा पैंटी में उसके पास चली गयी।

“न… न… नहीं…” वह हकलाने लगा- अ..आ..आपके सामने…

वह पूरी तरह से डर गया था।

“क्या हुआ, शर्माते क्यों हो?” रंजू हँसने लगी।

उतने में राखी राजू तक पहुँच गयी थी अपनी उंगलियाँ राजू के चेहरे पर घूमाते हुए हाथ नीचे ले जाते हुए धोती तक ले गयी।

“नहीं मेम साब… का… कर रही हो?” उसकी आवाज भी उत्तेजित होने लगी थी, हर बीतते पल यह और भी उत्तेजित हो रहा था और मैं भी।

“नहीं… मेमसाब!” वह अभी भी ना कह रहा था। राखी ने अपना हाथ उसकी धोती पर रखा। शायद उसके हाथों में उसका लंड आ गया था तो वह हमें देखकर हँसने लगी।

“मेम साब… ऐसा मत…” वो कुछ बोल पाता उसके पहले रंजू बोली- राखी छोड़ो उसे… राजू तुम ही खोल कर दिखाओ ना प्लीज!

राखी ने भी राजू को छोड़ा और बेड पर चेतना के सामने बैठी, चेतना ने भी राखी के बगलों के नीचे से अपना हाथ आगे ले जाते हुए राखी के बूब्स को ब्रा के ऊपर से ही दबाने लगी। राजू भी यह देखकर बहुत उत्तेजित हो गया था, उसका हाथ अपने आप ही उसके लंड पर गया।

“चलो राजू फटाफट दिखाओ… हम सिर्फ देखना चाहती हैं.” चेतना राखी के स्तन मसलते हुए बोली।

राजू कुछ पल सोचने लगा।

“मेम साब… दिखावत है… पर बाहर निकालने के बाद उसका मक्खन निकालना पड़ेगा.”

“हाँ चलो दिखाओ, अगर सही होगा तो ये चेतना निकाल देगी मक्खन, निकालेगी क्या चाट चाट कर खाएगी.” अपने हाथ चेतना के हाथों पर रखके उन्हें अपने स्तनों पर दबाते हुए राखी बोली।

“मैं?” चेतना आश्चर्य से बोली।

“हाँ तुम… तुमने कबूल किया है कि शर्त हारी तो कुछ भी करोगी.” रंजू उसे बोली।

“हाँ पर अगर मैं जीत गयी तो तुम्हें खाना होगा उसका मक्खन!” चेतना रंजू को बोली।

“ओके… मुझे मंजूर है!” रंजू ने चेतना की शर्त तुरंत मान ली।

“चलो राजू दिखा ही दो अब!” मुझे भी उसका फड़फड़ाता मूसल देखना था तो मैंने ही उसे बोल दिया।

राजू ने हमारी तरफ पीठ कर के अपनी धोती उतार दी, फिर अंदर पहनी चड्डी भी उतार दी। हम चारों सहेलियों को बहुत उत्सुकता थी राजू का लंड देखने की। भांग के नशे में हम क्या कर रहे है हमें भी नहीं पता था, बस उस पल का आनन्द लेना है इतना ही मन में था।

धीरे धीरे राजू हमारी तरफ घूमा, उसका बड़ा लंबा मूसल हमारे सामने आया, जैसे कि कोई काला नाग हो।

“ले चेतना तू हार गई… अब बोल!” राखी उसके स्तनों पे रखे चेतना के हाथों पर मारते हुए बोली।

“हाँ यार, बहुत ही सॉलिड है.” चेतना के दिमाग में नशा इस तरह हावी हुआ था कि उसने राखी को छोड़ा और बेड से उठी।

चेतना बेड से उठकर राजू के सामने गयी, वह फिर राजू के आगे घुटनों के बल बैठ गयी। राजू का बड़ा लंड उसके चेहरे के आगे झूल रहा था। उसकी आँखें बड़ी हो गयी थी और वह बिना पलक झपके उसके लंड को देख रही थी।

“अब देखती ही रहोगी या बेचारे का मक्खन भी खाओगी? बेचारे को और भी बहुत काम होंगे.” रंजू बोली।

“सीमा यार, इस राजू को मेरे घर भेजो न… मेरे घर में थोड़ा काम है. कर देगा.”

इस बात पर हम सब हंस पड़ी।

चेतना ने धीरे से अपने हाथों को आगे लेकर राजू के लंड को पकड़ लिया और उसे सहलाने लगी। राजू ने अपने हाथ कमर पर रख लिए और सीधा तन कर खड़ा रहा। चेतना धीरे धीरे राजू के लंड पर मुठ मारने लगी। राजू अब उत्तेजक सिसकारियाँ निकालने लगा ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’

चेतना ने अपने हाथ हटाकर राजू के लंड पर पहले एक चुम्बन किया और फिर अपने होंठ खोल कर उसके लंड की सुपारी अपने मुंह में ली। राजू ने उत्तेजना में अपना हाथ चेतना के सिर पर रख दिया। अब तक मेरी सखी चेतना ने राजू का आधा लंड अपने मुँह में ले लिया था। अपनी थूक से उसका लंड भिगोते हुए वह लंड के जड़ तक अपने होंठों को पहुँचा रही थी। राजू भी अपने हाथों का दबाव उसके सिर पे डालते हुए पूरा लंड उसके मुख में डालने का प्रयास कर रहा था।

उसने अब उसका आधे से ज्यादा लंड अपने होंठों से पकड़ते हुए चूसना शुरू कर दिया। उसका लंड इतना बड़ा था कि पूरा उसके मुंह में नहीं समा रहा था।

हम तीनों सहेलियां भी राजू के लन्ड को आँखें फाड़ फाड़ कर देख रही थी। चेतना उस बड़े लंड को मजे से चूस रही थी। उसका मुखमैथुन देख कर हम तीनों के चुत में पानी आ रहा था।

रंजू अपने हाथ राखी के ब्रा के अंदर घुसाते हुए उसके बूब्स मसलने लगी तो राखी ने अपना हाथ मेरी जांघ पर रख कर उसे मसलने लगी।

“मेम साब,आप मेरा मक्खन मुंह के अंदर ही ले कर टेसट करत हो ना… या की मैं अपना लंडवा बाहर निकाल लूं?” राजू ने पूछा तो चेतना ने हाथों से ही उसे उसका मुख चोदन जारी रखने का इशारा किया।

राजू अब अपनी कमर हिलाते हुए उसके मुंह को चोदने लगा।

“ईहह… लो… हम आवत है… ईह लो हमार मक्खन…” ऐसा कहकर उसने अपनी कमर चेतना के मुंह पर दबा दी और सिसकारते हुए शांत हो गया।

उसके शांत होते ही हम तीनों ने चेतना की तरफ देखा उसके मुँह राजू का वीर्य बह रहा था, उसके होठों पे पड़ा उसका वीर्य चमक रहा था। यह देख कर शायद हम तीनों को चेतना के भाग्य से जलन होने लगी थी कि काश यह लंड हमारे मुख में झड़ता.

चेतना अब उठ कर अपने को साफ़ करने बाथरूम चली गयी और राजू भी अपने धोती कपड़े ठीक ठाक करके नीचे चला गया।

जो भी हो… नौकर की लंड चुसाई का शानदार नजारा देखकर हम सब सहेलियों का भांग का नशा डबल हो गया और हम वहीं बेड पर एक दूसरी से चिपक कर सो गई।

मेरे प्रिय पाठको, आपको मेरी सेक्स कहानी कैसी लगी जरूर कमेंट करना
 
शाम को छह बजे मैं जगी तो रंजू और चेतना घर जाने के लिए तैयार हो रही थी। राखी बाथरूम में थी, मैं अपने बेड से उठी तब राखी भी बाथरूम से बाहर आ गयी। मैं भी बाथरूम में जाकर फ्रेश हुई और राजू को आवाज दी, चाय और खाने की बहुत जरूरत थी। भांग के नशे में हम चारों ने भी दोपहर को ठीक से खाना नहीं खाया था।

कुछ देर गप्पें मारने के बाद राजू नाश्ता लेकर आया।

“यार सीमा, मेरे घर में थोड़ा काम है, मैं इस राजू को लेकर जाऊं क्या?” रंजू बोली।

“मेरे घर तुमसे भी ज्यादा काम है… मैं उसे ले जाती हूं आज थोड़ी देर के लिए!” राखी बोली।

“मेरे भी घर…” चेतना बोल ही रही थी कि राखी ने उसके हाथ पे मारते हुए बोली- तेरे घर में दामोदर है ना!

“दामोदर है… पर मैं बोर हो गयी हूँ.” चेतना बोली।

“सॉरी, आज मेरे ही घर में बहुत काम है, और वो काम उसे ही करने हैं.” मैं भी हँसती हुई बोली तो सभी हँसने लगे।

राजू ने चाय और नाश्ता टेबल पर रखा और दोपहर की प्लेट्स लेकर नीचे चला गया। उन तीनों को राजू से क्या काम था यह मुझे पता था, मुझे भी राजू से वही काम करने की इच्छा हो रही थी। उसका मजबूत लंड देख कर मेरी चुत में भी खलबली मची थी। क्यों नहीं होगी मैं भी दो महीने से भूखी थी, और मेरी चुत को घर में ही अच्छा विकल्प मिला था।

वे तीनों घर से चली गयी तो मैं भी घूमने बाहर चली गयी। थोड़ी देर टहल कदमी की, होली का दिन था तो हर जगह रंगों की बारिश हो रही थी, पूरी धरती रंगबिरंगी हो गयी थी।

जब घर लौटी तो राजू रात का खाना बना रहा था।

मैं बैडरूम में जाकर फ्रेश हुई एक अच्छी सी नाईटी पहनी, उसके अंदर सिर्फ पैंटी पहनी हुई थी। मैं टीवी देखने लगी। टीवी देखते समय मेरे मन में भी बहुत उथल पुथल हो रही थी।

दोपहर की घटना मेरे लिए एक सुखद अनुभव था। राजू का लंड मेरी आँखों के सामने तैर रहा था, मेरे मन में आग लगी थी मेरा तनबदन जल रहा था।

“मेमसाब खाना तैयार है… लगा दूँ क्या?” राजू ने दरवाजे से ही पूछा।

“हाँ… सुनो राजू, आज यहीं खाना लगा दो!” मुझे बैडरूम से बाहर जाने की इच्छा नहीं थी।

“जी मेमसाब!” कहकर राजू नीचे चला गया।

मैं आईने के सामने बैठकर सोचने लगी, कुछ करूँ या नहीं करूँ, करूँ तो कैसे करूँ, ना करूँ तो बदन को शांत कैसे करूँ, क्या करूँ!

कुछ उलझन वाली स्थति में मैं आईने में अपने शरीर को निहार रही थी। अनजाने में मेरी उँगलियों ने मेरी नाइटी के ऊपर के दो बटन खोल दिये। अब मेरे स्तनों के बीच की दरार अब साफ दिखने लगी थी। दोपहर का रंग अभी भी नहीं उतरा था पर मेरे मन में रंगों की वर्षा होने लगी थी।

“मेमसाब जरा दरवाजा…” मैंने देखा तो रूम का दरवाजा आधा लगा हुआ था। राजू ने दोनों हाथों से ट्रे पकड़ा था इसलिए उससे दरवाजा नहीं खुल रहा था।

मैंने फिर वहाँ जाकर बैडरूम का दरवाजा खोला।

राजू मुझे रगड़ता हुआ अंदर आया, उसके पसीने की खुशबू मुझे उकसाने लगी। पर किसी भी स्त्री को किसी भी मर्द के साथ खुद कुछ भी करने की इजाज़त अपना समाज नहीं देता इसलिए अपने मन पर काबू रखते हुए मैंने खुद को संभाला। मुझे वह सुख चाहिए था, पर उसके लिए खुद पहल करने की इजाजत मेरा मन मुझे नहीं दे रहा था। तो दूसरी और मेरा दूसरा मन उस सुख के किये कुछ भी करने को उकसा रहा था।

मैं वैसे ही दरवाजे पे खड़ी उसको देख रही थी।

कुछ साँवले रंग का भरवे बदन का राजू मुझे उस वक्त बहुत ही आकर्षक लग रहा था। उसकी कमीज़ और घुटनों तक की धोती मुझे उसकी ओर खींच रही थी। मेरी चुत पानी पानी हो रही थी। पर कैसे? कैसे करूँ? यह पहेली नहीं सुलझ रही थी।

पर यह करना सही होगा क्या, और नहीं किया तो खुद के शरीर पर अन्याय नहीं होगा क्या? ऐसे सवाल मेरे मन में घर बनाने लगे।

अन्ततः मैंने कुछ सोचा और राजू को बोली- राजू… वह दोपहर को क्या पिलाया तुमने?

मैं कुर्सी पर बैठते हुए बोली।

“जी भंगवा… भांग…” वह बोला।

“हाँ बहुत सही थी, अब भी पिलाओगे क्या मुझे?” मैंने पूछा।

“जी नहीं मेमसाब , हमार पास उतना ही था.” उसने साफ साफ मना कर दिया।

“झूठ मत बोलो!” मैं जरा ग़ुस्से में ही बोली।

“सच मेमसाब, उतना ही था हमार पास!” वह फिर से बोला।

“देखो जी, तनिक थोड़ा होगा ही…” मैं उसकी ही भाषा में बोली।

“मेमसाब, झूठ ना बोलूं… थोड़ा है पर…” वह डरते हुए बोला।

“पर वर कुछ नहीं, थोड़ा है ना… थोड़ा तुम पियो थोड़ा मुझे पिलाओ, जाओ जल्दी लेकर आओ.” मैं बोली।

दोपहर की भांग का नशा ही कुछ और था, हर बार विदेशी दारू पीती थी पर भांग का नशा ही कुछ और था और भांग का नशा मेरा प्लान भी सफल बनाने में मदद भी करने वाला था।

वह भांग लेने नीचे चला गया मैंने अपने नाइटी का एक और बटन खोला।

थोड़ी ही देर में भांग लेकर के ऊपर आ गया- “ईह लो मेमसाब…

राजू ने ग्लास टेबल पर रखा।

“ये क्या एक ही, तुम नहीं पिओगे क्या?” मैंने पूछा।

“आपके सामने… नहीं मेमसाब!” वह डरते हुए बोला।

“नहीं लो ना… तुम भी लो, मुझे अकेले पीना अच्छा नहीं लगता.” मैं बोली।

“ठीक है मेमसाब!” बोलकर वह नीचे चला गया।

उसके बाहर जाते ही कुर्सी से उठी और मैंने अपनी पैंटी को उतार दिया, वह पूरी गीली हो गयी थी। कबसे मैं उसके धोती को देख रही थी, आगे क्या होगा यह सोचते हुए। उसी वजह से मेरी चुत ने भरपूर पानी छोड़ा था। मैंने अपनी पैंटी को सूँघा फिर कुर्सी के पीछे फेंक दिया और कुर्सी पर बैठ गयी।

राजू ऊपर अपना ग्लास ले कर आ गया।

“अब ठीक है…” कहते हुए मैंने उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया पर वह वही सामने बैड पे पास जमीन पर बैठ गया।

“अरे यहाँ बैठो!” मैंने बोला।

“ठीक है मेमसाब!” उसने बोला।

मैं भांग का एक एक घूंट बड़े आराम से पी रही थी और वो नीचे देखते हुए अपनी ग्लास में से भांग पी रहा था। हम दोनों में कुछ भी बातचीत नहीं हो रही थी, शायद वह कुछ बोलने से डर रहा रहा था और मेरे मन की दुविधा मनस्थिति मुझे कुछ बोलने नहीं दे रही थी। मुझे कुछ भी करके उसका ध्यान मेरी तरफ खींचना था।

मैंने टेबल पर रखा चम्मच नीचे गिरा दिया, उस आवाज की वजह से राजू ने मेरी तरफ देखा। उसी वक्त चम्मच उठाने के बहाने मैं झुकी और उसे मेरे स्तनों का नाईटी के अंदर से दीदार करा दिया। उसका पूरा ध्यान मेरी नाईटी की दरार पर ही था, जब मैंने उसकी तरफ देखा और उसने झट से अपनी नजर वहाँ से हटाई। पर उसने नजर हटाई वह जाकर मेरी पीछे की तरफ पड़ी मेरी पैंटी पर पड़ी। वह शरमाया होगा क्योंकि नजर हटाते हुए वह हड़बड़ाते हुए उठा और उठते समय उसकी धोती उसके ही पैरो में अटक गई और आधी खुल गई।

उसने अपने हाथ से ही धोती पकड़ कर उठा, उसको नशा नहीं हुआ था पर मेरे स्तनों की झलक पाने से और मेरी पैंटी देखने की वहज से उसके लंड पर नशा होने लगा था। उसके निक्कर में बना तम्बू साफ साफ दिखाई दे रहा था।

वह वैसे ही खड़ा हुआ और दरवाजे की और जाने लगा।

“क्या हुआ राजू?” मैंने समझ कर भी ना समझने का बहाना करते हुए बोली।

“कुछ नहीं… चलता हूं मेमसाब” शायद उसे मेरे मंसूबों का पता चल गया था, मेरी दोनो इनर्स मेरे जिस्म पर नहीं थी इसका अंदाजा हो गया था।

“अरे रुको तो” मेरे कहने पर वह रुक गया।

वह मेरी तरफ पीठ कर के खड़ा था और अपने हाथों से अपना लंड एडजस्ट कर रहा था।

मैं उठकर उसके पास गई और उसके कंधे पर हाथ रख कर अपनी और घुमाया, अब उसका चेहरा मेरी तरफ था।

“राजू, दोपहर को तुमने मेरी सहेली को अपना पूरा मक्खन खिलाया…” मैंने बोला।

“हाँ… वही चाहत थी… माफी मेमसाब!” शायद उसे लग रहा था कि मैं उस पर चिल्लाने लगूंगी इसलिए वह बहुत डर रहा था।

“नहीं करूंगी माफ…” मैं भी थोड़ा आवाज ऊंची करके बोली।

“मेमसाब वह हमार गलती नहीं थी… उन्होंने ही हमें… ” वह डरते हुए बोला।

“ठीक है… करती हूं माफ़… मगर एक शर्त पर!”

“जी हुकुम… !” वह अदब से बोला।

“मुझे भी अपना मक्खन खिलाओ!” मैं उसके गालों पर प्यार से उंगलिया घूमाते हुए बोली।

“नहीं मेमसाब… यह पाप होगा!” वह बोला।

“अरे वाह… मेरे यहाँ पर काम करते हो और मक्खन उसे खिलाते हो?” मैं नखरे करते हुए रोने का नाटक करने लगी, शायद भांग की नशा हावी हो रही थी।

“नहीं मेमसाब… मैंने इस घर का नमक खाया है.” वह समझाने लगा।

“राजू मेरी प्यास बुझा दो…” मेरा हाथ अपने आप ही उसके लंड पर चला गया।

वह अभी भी अपना हाथ अपने लंड पर रख कर खड़ा था। जैसे ही मेरा हाथ उसके हाथों पर पड़ा वैसे ही उसने अपना हाथ वहा से हटा दिया। उसका निक्कर में छुपा लंड उसने जैसे मुझे भेंट दे दिया हो उसी तरह मैं उसके लंड को उसकी निक्कर के ऊपर पकड़ लिया।

‘अहह…’ कितना बड़ा और कड़क था, दोपहर को मैंने सिर्फ आँखों से स्पर्श किया था अब हाथों में ले रही थी, पर निक्कर के ऊपर से ही। मैंने उसकी धोती खोलने के लिए धोती की गाँठ पर हाथ रखा तो उसने मेरा हाथ हटा दिया।

“नहीं मेमसाब, यह पाप है!”

“और मेमसाब की प्यास ना बुझाना महापाप है.” ऐसा कहकर मैं फिर से अपने हाथों से उसके कमर पर की धोती खोलने लगी।

राजू अब प्रतिकार नहीं कर रहा था, मैंने उसकी धोती खोल दी, अब वह मेरे सामने बस निक्कर और कुर्ती में था। वह बिना हिले खड़ा था और मुझे अपना काम करने दे रहा था। मैंने अपना हाथ उसके निक्कर के इलास्टिक के अंदर डाल दिया। मेरे नर्म हाथों का स्पर्श उसके कड़क लंड पर होते ही वह सिसकार उठा।

“मेमसाब…”

“उसकी सिसकारियों को अनसुना करते हुए उसके बालों में छुपे नाग को मैंने सीधा पकड़ा, उसके निक्कर में अब तम्बू बना हुआ था। उसके लंड का आकार अब निक्कर के अंदर से भी महसूस हो रहा था। मैंने दूसरा हाथ उसके कुर्ते के अंदर घुसाते हुए उसके मर्दाना स्तनों पे रखा और उनसे खेलने लगी।

मेरी इस हरकत से राजू मचल उठा, वह अपने हाथ मेरे स्तनों पे ले जाते हुए मेरे स्तनों को दबाने लगा। दबाने नहीं वो तो उन्हें बेदर्दी से मसलने लगा। मैं भी उसके मर्दाना हाथों से अपने स्तनों के मसलने का आनंद ले रही थी और मैं भी उसे वही आनंद दे रही थी।

थोड़ी देर बाद मैंने उसकी निक्कर को उतार दिया अब राजू नीचे से बिल्कुल नंगा हो गया था। उसका लंड अब बिल्कुल मेरे सामने नंगा डोल रहा था, मेरे हाथ और आंखें उस पर ही अटकी थी। उसने अब अपनी आंखें बंद कर दी थी और उसके हाथ मेरे स्तनों को प्यार से दबाने लगे थे।

मैं मन ही मन मुस्कुरा रही थी क्योंकि यह तगड़ा लंड मेरी चुत को कूटने वाला था और मेरी दो महीने की तड़प मिटाने वाला था। उससे भी बड़ी बात यह थी कि उस लंड की मैं मालकिन थी, वह लंड मेरे ही घर में था और जब मैं चाहू वह मेरे तन बदन की आग ठंडी करने वाला था।

मैं धीरे धीरे नीचे जाने लगी, मैं नीचे घुटनों के बल बैठ गई। अब उसका लंड मेरे सामने था, मेरे बिल्कुल सामने … सिर्फ दो चार इंच दूर, वह मेरे सामने डोल रहा था। मेरे सामने खड़ा होकर वह मुझे चिढ़ा रहा था.
 
दोस्तों आपको यह कहानी कैसे लगी यह जरूर बताये आपके कमेंट के बाद ही यह कहानी आगे लिखनी है या नही यह डिसाईड होगा इस कहानी का पहला पार्ट "मेरा नोकर राजू" भी जरूर पढ़ें

आपका सलिल
 
में आपने पढ़ा कि मेरी छोटी बहन सीमा अपने नौकर के साथ पहली बार सेक्स करने जा रही थी.

अब राजू नीचे से बिल्कुल नंगा हो गया था। उसका लंड अब बिल्कुल मेरे सामने नंगा डोल रहा था, मेरे हाथ और आंखें उस पर ही अटकी थी। उसने अब अपनी आंखें बंद कर दी थी और उसके हाथ मेरे स्तनों को प्यार से दबाने लगे थे।

मैं मन ही मन मुस्कुरा रही थी क्योंकि यह तगड़ा लंड मेरी चुत को कूटने वाला था और मेरी दो महीने की तड़प मिटाने वाला था। उससे भी बड़ी बात यह थी कि उस लंड की मैं मालकिन थी, वह लंड मेरे ही घर में था और जब मैं चाहू वह मेरे तन बदन की आग ठंडी करने वाला था।

मैं धीरे धीरे नीचे जाने लगी, मैं नीचे घुटनों के बल बैठ गई। अब उसका लंड मेरे सामने था, मेरे बिल्कुल सामने … सिर्फ दो चार इंच दूर, वह मेरे सामने डोल रहा था। मेरे सामने खड़ा होकर वह मुझे चिढ़ा रहा था.

अब आगे:

मैं अपने हाथ उसके बालों के जंगल में घुमाने लगी तो उसने और अकड़कर मुझे सलामी दी। मैं हँस कर उसको देख रही थी। उसके जंगल में हाथ घूमाते समय अचानक ही राजू ने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा। मेरे सिर को अपने हाथ से पकड़कर वह मेरे होठों को अपने लंड के पास ले जाने लगा।

मेर सिर एक एक मिलीमीटर आगे जा रहा था, मेरे होंठ भी उसको अपने अंदर सामने के लिए बेकरार हो उठे थे। उसका लंड अब मेरे हाथों से बिल्कुल दो मिलीमीटर की दूरी पर था, उसके हाथों का दबाव भी बहुत बढ़ रहा था। मैं भी अब सब कुछ भुलाकर इस मूसल से अपनी चुत की शांति करने के बारे में ही सोच रही थी।

मैंने अपने होंठ उसके लंड के स्वागत के लिए खोल दिये और सिर को थोड़ा और आगे लेकर गयी। मैंने उसके लंड की सुपारी को अपने होठों में पकड़ा, उसकी सुपारी उसके लंड की तरह ही बड़ी और सख्त थी। उसकी चॉकलेटी सुपारी को चूसते वक्त मुझे स्वर्ग में होने का अहसास हो रहा था और मुझे चेतना के प्रति जलन भी हो रही थी क्योंकि मुझसे पहले उसने उस लंड पर अपना हक दिखाया था।

मेरे होंठ एक एक मिलीमीटर आगे बढ़ कर उसके लंड को अपने मुँह में ले रहे थे पिछे से मेरी जीभ भी उसके सुपारी पर घूमते हुए उसको गीला कर रही थी। उसके लंड का कुछ भी स्वाद नहीं लग रहा था, शायद कुछ ही देर पहले उसने अपना लंड साबुन से धोया था क्योंकि उसके लंड से साबुन की खुशबू आ रही थी।

मैंने उसका आधे से ज्यादा लंड मुँह में ले लिया था पर इससे ज्यादा अंदर नहीं जा सकता था। मेरा पूरा मुँह उसके लंड से भर गया था। मैं अपना मुँह आगे पीछे करके लंड को चूस रही थी और वह भी अपने हाथ मेरे सिर पर रखे मेरे सिर को आगे पीछे कर रहा था।

कुछ देर ऐसे ही चूसने के बाद उसने अपना लंड मेरे मुँह से निकाल लिया और अपने हाथों से मुठ मारने लगा। मैंने अपना हाथ उसके कलाई पर रखते हुए बोली- यह क्या कर रहे हो?

“मेमसाब अब हमार मक्खन बाहर आवत है.” वह बोला।

“हाँ तो?” मैं बोली।

“आप के मुंह में… ” वह इतना ही बोला तभी मैं उठ कर खड़ी हो गई, मैंने उसके हाथ की कलाई बहुत टाइट पकड़ी हुई थी।

मैं उसे ऐसे ही धकेलते हुए पीछे बेड की तरफ ले गयी, वह मेरी तरफ आश्चर्य से देख रहा था। फिर मैंने उसे बेड पर बिठाया और उससे थोड़ा दूर जाकर खड़ी हो गयी। फिर मैंने अपनी नाइटी धीरे से उतार दी और उसके सामने पूरी नंगी हो गयी।

“ईह का कर रही हो मेमसाब…” वह पूरा डर गया था। मैं सिर्फ उसको देख कर मुस्कुरा दी, नशा अब मुझ पर हावी हो रहा था।
 
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