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मौत का हाइवे

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मौत का हाइवे

रात के ११ बजे हम लोगो की गाड़ी हवा से बाते करती हुई हाइवे पर सरपट दौड़ी जा रही थी। राजू गाड़ी चला रहा था और मैं, विवेक, सुनील, नितिन और दीपक पीछे बैठे बातों में मशगूल थे। पिछले मंगलवार को यह पता चला की हमारे बचपन के यार की शादी नोएड़ा में तय हो गई है। बस फिर कया था, आनन फ़ानन में सफ़र की योज़ना बनी और छह घंटो में हम फ़तेहपुर से ४०० किलोमीटर आगे निकल आए।

बाते की दौर चल ही रहा था कि बीयर की बोतलें खुल गई। आदत से मजबूर सुनील ने मुझे अॉफ़र की पर मैने मना कर दिया।

'पीलो यार, पूरे दल में तुम ही एक हो जो नही पीते हो!' विवेक ने नशे में मुझसे कहा।

'अच्छे सफ़र के लिये हम में से किसी एक की होश में रहना जरूरी है' मैंने कहा।

'ये हुई ना बात!' नितिन ने हँसते हुए कहा 'तुम संत जो ठहरे'.

'इसमें संत वाली क्या बात हुई' मैने तल्ख लहजे में कहा।

'नाराज़ क्यों होते हो यार' विवेक बीच बचाव करते हुए बोला 'जानते हो हम इस समय कहाँ हैं?'

'कहाँ?' सबकी नज़र विवेक पर आ टिकी। विवेक ने एक नज़र सबको देखा और बोला 'हम इस समय दिल्ली-नोएड़ा हाईवे पर हैं, देश की सबसे भूतही जगह'

यह सुनते ही गाड़ी में अज़ीब सा सन्नाटा छा गया। इसी खामोशी में सिर्फ़ गाड़ी के इंजन की आवाज आ रही थी। बाहर घुप्प अंधेरे के बीच चाँद बादलों के बीच झाँक लेता था।

"'तुम भी कहाँ की बात लेकर बैठ गए, 'ये भूत-प्रेत दिमाग में होता है सच में नहीं" लगभग डेढ घंटे बाद नितिन चुप्पी तोड़ी।

"हाँ यही तो में भी बोल रहा था" सुनील ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा। "तुम कब बोल रहे थे सुनील?" विवेक ने मजाकिया अंदाज में कहा। "अरे तो अब बोल रहा हूँ भई" सुनील ने भी उसी अंदाज में कहा।

रात के डेढ बज़े हैं और चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ है, बीच-बीच में जो चाँद बादलों से झाँक लेता था अब वो भी खतम हो गया। अंधेरा इतना था कि गाड़ी की तेज़ लाईट के बावजूद ५० मीटर से ड्यादा नहीं दिखता था।

हमसब अपनी बातों में इतना मसरूफ़ हो गए कि हमें पता ही नहीं चला कि कब ढाई बज गए और हम दिल्ली-नोएड़ा मेन हाइवे पर ८० किलोमीटर की रफ़्तार से बढ़े जा रहे थे कि राजू ड्रायवर ने अचानक ब्रेक मारा और गाड़ी जोर से आवाज करते हुए रुक गई।

गाड़ी के अंदर हम सब उलट-पुलट हो गए कि तभी नितिन ने गाली देते हुए राजू से गाड़ी रोकने की वजह पूछी।

"राजू, पागल हो गया है क्या? गाड़ी क्यों रोक दी?" विवेक ने झल्लाते हुए कहा पर राजू कुछ नहीं बोला।

"अरे बोलता क्यों नहीं, भाँग खाए है क्या?" नितिन चिढकर बोला। राजू अभी भी सामने देख रहा था। उसकी शक्ल बता रही थी की वह बहुत डरा हुआ था।

मैंने खुद को शांत रखकर राजू के कंधे पर हाथ रखा और पूछा "राजू, तुम डरो मत हम सब तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे"। उसकी नज़रें अभी भी सामने ही घूर रही थी।

आखिरकार १५ मिनट बाद राजू सामने बोला "वो ....आ गई है, .............वो वापस आ गई है"।

आखिरकार १५ मिनट बाद राजू सामन देखकर बोला "वो ....आ गई है, .............वो वापस आ गई है"। "कौन आ गई है?" नितिन ने बेचैन होते हुए पूछा लेकिन राजू ड्रायवर कुछ बोलने से पहले ही बेहोश हो गया।"

अब समस्या बड़ी विकट हो गई, राजू हमारा ड्रायवर ही नहीं बल्कि गाइड भी था। वह यहाँ के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ था और हम इस इलाके से अनजान थे। विवेक और नितिन ड्रायवर को होश में लानें की कोशिश करने लगे, सुनील तो पहले ही डरपोक किस्म का था और इस दुर्घटना ने उसके हाँथ-पैर फुला दिये। जनाब के मुँह से लगातार हनुमान चालीसा का पाठ निकल रहा था।

'......वो वापस आ गई है' 'ये शब्द मेरी खोपड़ी में धाड़-धाड़ कर गूंज रहे थे। कौन आ गई है जिससे राजू इतना डरा हुआ था? बहरहाल यहाँ अधिक देर तक रुकना मुनासिब ना था इसलिए ड्रायवर को गाड़ी के पीछे लेटाया गया। विवेक ने स्टियरिंग संभाल लिया और जैसे ही गाड़ी स्टार्ट करने को हुआ, '''...... धाँ.. य!... सन्नाटे को चीरती हुई एक जोरदार आवाज ने हमारा ध्यान खींच लिया।

ये बंदूक की आवाज थी और लुटेरों के ख़तरे को भाँपकर नितिन बोला "जल्दी कर विवेक, शायद लुटेरें आस-पास ही हों"। "मैं जानता हूँ पर ये गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही है, धक्का लगाना पड़ेगा" विवेक झुँझलाकर बोला।

"मैं गाड़ी से बाहर नहीं जाउगा, तुम लोग ही धक्का लगाओ" सुनील घबराते हुए बोला। मैंने कहा "ठीक है मैं धक्का लगाता हुँ, विवेक मेरी मदद करो"। विवेक ने नितिन को रिवाल्वर देते हुए कहा "चारों कर नज़र रख़ना और ख़तरा दिखे तो गोली चलानें में हिचकना मत"।

नितिन रिवाल्वर संभाल कर खड़ा हो गया, अबतक दीपक जो पीकर टल्ली था वो भी उठ गया था और उसने स्टियरिंग संभाल लिया। गाड़ी स्टार्ट होते ही सबने राहत की साँस ली और थोड़ी देर में ही हमारी गाड़ी हाइवे पर दौड़ रही थी। विवेक और दीपक के चुटकुलों ने माहौल को हल्का कर दिया, ख़तरा शायद टल गया था ........... या शायद नहीं।
 


बैठे-बैठे कब मेरी आँख लग गई पता ही नहीं चला। सपनें*में ड्रायवर के वही शब्द गूँज़ रहे थे और मेरा वही सवाल "कौन वापस आ गई है?"। ड्रायवर मेरे सामने अभीभी बेहोश था, मैंने घड़ी देखी रात के सवा तीन बज़े थे। दीपक जो गाड़ी चला रहा था उसे छोड़कर सब से रहे थे। मैं खिड़की के बाहर देखने लगा जहाँ सुनसान सड़क पर दूर-दूर तक कोई नहीं था। अंधेरे का साम्राज्य हर जगह फ़ैला हुआ था।

"वो आ गई है" मैंने पलटकर देखा तो ड्रायवर बैठा मुझे देखकर रहा था। "वो वापस आ गई है" ड्रायवर फिर से बोला और मैं पूछ बैठा "राजू, कौन वापस आ गई है मुझे बताओ"।

"आगे मत जाओ साहब! ....... वापस लौट जाओ" राजू मुझे एकटक देख रहा था और बोला "वो सबको मार डालेगी, सिर्फ़ आप इन्हें बचा सकते हो"।

"मुझे बताओ तुम किसकी बात कर रहे हो, और मैं इन्हें कैसे बचा सकता हूँ" मैंने राजू के कंधे पर हाथ रखकर कहा।

"पहले वादा करो साहब, आप इनको कुछ नहीं हो ने दोगे" राजू ने मेरी आँखों में आँखे डालते हुए कहा। "मैं वादा करता हुँ, अब बताओ तुम किसकी बात कर रहे हो" मैंने राजू से कहा।

"वो सबको मार डालेगी" राजू सिर झुकाए हुए बोला, मैं राजू को देख रहा था, मेरी छठी इन्द्री ख़तरे का आभास दे रही थी कि वो फिर बोला "....... नहीं, मैं सबको मार डालूंगी", अचानक राजू की शक्ल किसी लड़की की तरह लगने लगी तभी वह मेरी तरफ झपटी। मैंने अपनें हाथों से उसे रोका और उसका नाखून मेरी कलाई में लगा और तेज दर्द की सिरहन से मेरी नींद खुल गई।

मेरा पूरा बदन पसीने से लथपथ था, विवेक मुझे उठाने की कोशिश कर रहा था। तभी दर्द ने मेरा ध्यान मेरी कलाई पर खींचा जहा नाखून का गहरा घाव था।

"ये घाव कैसे लगा? एकदम ताजा है" विवेक ने पूछा। "पता नहीं, मुझे क्या हुआ था" मैंने पूछा।

"तुम सो रहे थे तभी कुछ तुम्हारे पास दिखा" नितिन मेरी तरफ देखते हुए बोला। "क्या देखा तुमने?" मैं बेचैन होकर बोला। "पता नहीं, कुछ साफ़ नहीं दिखा पर किसी का साया था शायद" विवेक थोड़ा झिझका फ़िर बोला "किसी लड़की का साया था"।

"ड्रायवर के अंदर से एक साया निकलकर तुम पर झपटा था" सुनील थोड़ा रुककर फिर बोला "वो कुछ बोल भी रहा था"। मेरी आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ने लगीं, "मैं सबको मार डालूंगी", सब आश्चर्य से मेरी तरफ देखने लगे।

"हाँ, यही कहा था उसनें, पर तुम्हें कैसे पता चला यह?" नितिन बीच में बोल उठा। मैंने सबको एक नज़र रेखा और सपनें का सारा हाल कह सुनाया। सबकी आँखे विस्मय से फ़ैल गईं। "हो सकता है वो हम सबका वहम हो" विवेक ने माहौल को भाँपते हुए कहा, मैंने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा "जरूर यह एक सपना ही था और सपनें कभी सच नहीं ........." धा!!....ड़!!

मेरे शब्द पूरे होनेे से पहले ही कुछ भारी चीज गाड़ी से टकराई और हमारी गाड़ी का संतुलन बिगड़ गया। गाड़ी के ब्रेक की आवाज सन्नाटे को चीरती हुई गई और गाड़ी हिचकोले खाती हुई हाइवे से नीचे उतरकर रुक गई।

गनीमत ये थी की गाड़ी नहीं पलटी वरना ८० किलोमीटर की रफ़्तार पर तो हमारे चिथड़े उड़ जाते।

"दीपक!! ...... हरामखोर!.... हमारी जान लेगा क्या?" नितिन बौखलाते हुए बोला। "मेरी गलती नहीं है, गाड़ी से कुछ टकराया है" दीपक घबराते हुए बोला।

"क्या टकराया बे!" विवेक गुस्से से पागल हो रहा था, उसे कंधे पर हल्का चोट भी लगी था। "पता नहीं पर शायद कोई आदमी था" बौखलाहट ने दीपक बोला। "हे भगवान! किस को उड़ा दिया तूने?" सुनील बोल पड़ा।

"तुमने देखा कौन था वह?" मैं पूछ बैठा और दीपक के जवाब ने हम सबके दिल में सिहरन पैदा कर दी। दीपक ने हम सबको देखा और बोला "जो गाड़ी से टकराया वो गाड़ी का ड्रायवर राजू था"।

"दिमाग खराब हो गया है क्या?" नितिन खिसिआकर बोला, "ड्रायवर तो यहाँ!!!....... ड्रायवर!! ........ड्रायवर कहाँ गया??" नितिन के तो होश उड़ गए।

"क्या मतलब कहाँ गया?, इतनी तेज चलती गाड़ी से तो कोई नहीं निकल सकता फ़िर वो किधर गया" विवेक झल्लाते हुए बोला।

"पता नहीं पर मैंने उसे ही गाड़ी से टकराते हुए देखा है" दीपक अपनी बात पर द्रढ था फिर बोला "जो भी गाड़ी से टकराया है वो जिन्दा नहीं बचा होगा, चलो निकल लेते हैं"। "नहीं" मैं बोल उठा "वो हमारे साथ आया था और हम उसे एैसे नहीं छोड़ सकते"।

"क्यों नहीं छोड़ सकते?" दीपक ने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा। "क्योंकि जो तुम्हारी गाड़ी से टकराया वह ड्रायवर नहीं था, वह तुम्हारा भ्रम था पर ड्रायवर गाड़ी में नहीं है यह हकीकत है" विवेक ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा, एक कश लेकर वह फिर बोला "हमें जाकर तसल्ली करनी पड़ेगी"।

बड़ी कशमकश में था मैं, राजू का बेहोश होना, फिर मुझपर हमला करना और अब उसका रहस्यमय ढंग से गाड़ी से टकराना। कुछ तो था जो हमारी समझ से परे था, मैंने घड़ी देखी तो रात के तीन बजकर तीस मिनट हो रहे थे। सुबह तक पहुँचने से पहले हमें इस काली रात को पार करना था। वापस जाकर देखने का फ़ैसला हुआ कि गाड़ी से ड्रायवर टकराया था या कोई और था। लाश से पचास मीटर दूर गाड़ी रोक दी गई, यह तय किया गया कि दो लोग लाश की जाँच करेंगे, नितिन गन से हमें कवर करेगा बाकी गाड़ी के अंदर ही रहेंगे।

मैंने टार्च संभाली और विवेक ने रिवाल्वर। 'हम धीरे-धीरे लाश के पास आने लगे। मेरा दिल धाड़-धाड़ कर धड़क रहा था, मैंने लाश के कंधे को पकड़कर पलटाया और राहत की साँस ली। यह ड्रायवर नहीं बल्कि अधेड़ उम्र का कोई आदमी था। लाश पूरी चिथड़ों में तब्दील हो गई थी। मैंने पहले विवेक की तरफ़ पलटकर सब ठीक है का* इशारा किया फ़िर उसने नितिन को फ़ोनकर सब बता दिया। तभी किस की के कराहनें की आवाज़ ने मेरा ध्यान खींचा, विवेक सड़क के किनारे गया और मुझे इशारा किया। मैंने टार्च की रोशनी वहाँ डाली, कराहनें की आवाज़ अब रोने में बदल गई थी।

वह एक औरत की आवाज़ थी जो घायल थी। जख्मों की वजह से उसका रोना माहौल को और डरावना बना रहा था। उसे देखकर रह-रह कर मुझे सपने वाली लड़की याद आ रही थी।

 
"हेलो! आप कौन हैं?" वो सिर झुकाए लगातार रोए जा रही थी। मैं उसके थोड़ा और करीब गया और बोला "आप घबराइए मत, हम आपकी मदद कर सकते हैं, आप घायल हैं"। कोई जवाब ना पाकर मैं विवेक की तरफ़ पलटा, वो पास आया और बोला "आपको डाक्टर की सख्त जरूरत है, हम आपको हॉस्पिटल पहुँचा सकते हैं"। वो सिर झुकाए हमारी तरफ़ पीठ किये बैठी थी, मैंने उसके कंधे की तरफ़ हाथ बढ़ाया, विवेक का रिवाल्वर ठीक मेरे कंधे से लड़की के सिर का निशाना लिये हुए था। कुछ भी ख़तरा होता ही विवेक लड़की को शूट कर देता।

उसके कंधे को छूते ही वह बेहोश हो गई। हम उसे इस हालत में हम नहीं छोड़ सकते थे अतः हम उसे गाड़ी में ले आए। "ये कौन है? और ड्रायवर कहाँ है?" दीपक ने हैरत से पूछा। "पता नहीं पर तुमने जिसे ठोका वह ड्रायवर नहीं बल्कि कोई और आदमी था बेचारा" विवेक ने हाँफ़ते हुए कहा। बेहोश चाहने कमसिन लड़की ही क्यों ना हो पर बेहोश होने पर काफ़ी भारी हो जाती है। ये बेशरम अपहरणकर्ता पता नहीं कौन सा बोर्नवीटा पीकर आते हैं कि पल में लड़कियों को उठा ले जाते हैं और हम दोनों से तो एक भी नहीं उठाई जा रही थी वो भी मदद करने के लिये।

"और ड्रायवर?" सुनील मुझे देखते हुए बोला। मैंने सबकी तरफ़ एक नज़र डाली और बोला "ड्रायवर का पता नहीं, पर वह मरा नहीं है, हम उसे बाद में ढूँढेंगे"। गाड़ी स्टार्ट होते ही हवा से बाते करने लगी। सब थके थे इसलिए तुरंत सो गए। अब मेरा ध्यान बेहोश लड़की पर गया। २३-२४ लाल की उमर, गोरा रंग, चौड़े नितम्ब, पतली कमर पर लाल रंग का घाघरा और उसके मिलते-जुलते रंग की चोली थोड़ी तंग थी शायद उसके नाप की नहीं थी। लड़की किसी पास के गाँव की होगी शायद। बेहोश होने की वजह से उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे जिससे नितिन का ध्यान कहीं और ही जा रहा था। मैने एक कंबल लेकर उसे ढक दिया ताकी बच्चे बिगड़ ना जाएँ।

मैंने घड़ी देखी तो लगा वक्त जैसे मंद पड़ गया हो, तीन बजकर चालीस मिनट हुए थे। सिर्फ़ दस मिनट में हमने घायल लड़की को गाड़ी में लिटाकर मरहमपट्टी की थी और सफ़र शुरू।

अचानक हलचल महसूस हुई, लड़की होश में आ रही थी। खुद को गाड़ी में अनजान लोगों के साथ पाकर वो थोड़ा घबराई लेकिन मैंने तुरंत उसे गाड़ी में लाने की वजह बताई जिससे वो थोड़ा झेप गई। बड़ी-बडी झील सी आँखों मे घबराहट भी किसी सम्मोहन से कम नहीं थी।

"क्या नाम है तुम्हारा?" मैंने पूछा, "जी गौरी!" संयत होते हुए उसने जवाब दिया। "क्या हुआ था?" मैंने दूसरा सवाल दागा, "वो मुझे मारना चाहते थे" वह घबराते हुए बोली। "कौन थे वो लोग" मेरे सवाल जारी थे जिससे वह रोने लगी।

"मुझे पूरी बात बताओ" मैंने सीधा सवाल किया और वो टेपरिकार्डर की तरह चालू हो गई ---

"मैं पास ही के गाँव में रहती हूँ, मेरे पिता वहाँ मंदिर के पुजारी हैं। कुछ दिनों पहले दो आदमीं बापू के पास आए, उनमें से एक मुझे घूर-घूर के देख रहा था। पता नहीं बापू और उनमें क्या बातें हुई कि तब से बापू दिन-रात मेरी तरफ़ देखकर रोते रहते थे। एक रात अचानक बापू मुझे रात में उठाकर बोले ""भाग जा बेटी! वो वापस आ रही है, वो हम सबको मार डालेगी""।

""कौन मार डालेगी बापू!"" मैंने डरकर पूछा पर बापू बोले ""अब समय नहीं है बेटी, उसनें उन दोनों को भेजा है तुझे लाने के लिये"", ""मुझे क्यों बापू?"" मैंने पूछा पर बापू अचानक नीचे गिर पड़े, उनके चेहरे से दर्द साफ़ झलक रहा था। ""उत्तर! उत्तर दिशा में जाओ उस सुनसान हाइवे की तरफ़! वहाँ कोई ना कोई तेरी मदद करेगा"" वो रोते हुए बोले।

मैं डरकर वहाँ से भाग आई पर बापू को कैसे इस हालत में छोड़ देती इसलिए थोड़ी देर बाद मैं वापस गई तो डर के मारे मेरी चीख गले में अटक गई। बापू की लाश छत से लटकी हुई थी, दोनों हाथों की अंगुलियाँ कटी हुई थी और पैर एड़ियों से कटे थे। खून हाथों से नीचे टपक रहा था। मैंने चीखने के लिये मुँह खोला लेकिन किसी के तगड़े हाथों ने मेरा मुँह कसकर ढक दिया। मेरी साँस रुकने लगी और मैं जल बिना मछली की तरह तड़प रही थी। इसी छटपटाहट में मेरे हाथ कोई भारी चीज आ गई और मैंने पूरी ताकत से उस पर दो मारी।

मैं वहाँ से भागने लगी की तभी किसी ने मेरे सिर पर कुछ मारा और मैं बेहोश हो गई। जब होश में आई तो आप लोगों को देखा।"" --

"लेकिन तुम्हारे हिसाब से तुम्हे हाइवे पर होना ही नहीं चाहिये था, हाइवे तक 'तुम कैसे पहुँची?" नितिन बोला। उसे लड़की की कहानी पर भरोसा नहीं था, सच पूछो तो मुझे भी विश्वास नहीं था।

"तुम्हें ये चोट कैसे लगी?" मैंने उसके पैर की चोट की तरफ़ इशारा किया। "पता नहीं" वह बोली। "झूठ! हमने जब तुम्हें देखा तब तुम होश में थी और वो रही थी दर्द की वजह से" विवेक ने आँखे तरेरकर कहा। "मुझे कुछ नहीं पता मैं यहाँ कैसे आई और ये चोट मुझे कैसे लगी" वह रोते हुए बोली।

"तब तो हमें तुमको गाड़ी से उतारना होगा अभी" विवेक ने सख्त लहजे में रहा, "नहीं एेसा मत करना, वो मुझे मार डालेंगे" वो विनती करने लगी, "क्यों नहीं! हो सकता है तुम भी लुटेरों की साथी हो और हमें किसी जाल में फँसा रही हो" विवेक का शक जायज था।

उसने मेरी तरफ़ देखा और बोली "मेरा यकीन कीज़िए, मैं ने जो रहा वह सच है और अगर मैं लुटेरों का साथ दे रही होती तो किसी मुख्य हाइवे पर होता, ना कि इस अभिशप्त हाइवे पर जहँ पिछले ४० सालों से कोई नहीं आता"। हम सबके दिमाग में जैसे धमाका हुआ। "क्या कहा तुमने? अभिशप्त! ये दिल्ली-नोएड़ा हाईवे है, भारत का सबसे व्यस्त हाइवे" दीपक ने अपनी चुप्पी तोड़ी।

"क्यों मजाक करते हैं साहब, यह अभिशप्त हाइवे है हमारी गाँव में इसे मौत का हाइवे कहते हैं" लड़की की बात ने हमें उलझा दिया। मैंने दीपक को गाड़ी का जीपीएस चेक करने को कहा ताकी लड़की के झूठ को सामने ला सकुँ। जीपीएस सिग्नल नहीं मिलने की वजह से हमें पता नहीं चल पा रहा था कि हम सही रास्ते पर हैं कि नहीं।

"मुझे लगता है यह लड़की झूठ बोल रही है" दीपक बोले "या शायद नहीं," सबकी नज़रें विवेक पर टिकी थी तभी उसने फ़ोन पर गूगल सर्च पर कुछ दिखया और बात पूरी की "एक हाइवे है जो १९७० तक ठीक-ठाक चल रहा था कि तभी एक दुर्घटना हुई, पाँच लोग रहस्यमयी ढंग से गायब हो गए सिवाए एक बूढे की लाश के जो शायद उनकी गाड़ी के नीचे आ गया था।"

"इसका हमसे क्या संबंध?" सुनील मुझे देखते हुए बोला। "क्योंकि" मैंने विवेक का फ़ोन देखते हुए कहा "क्योंकि जो लोग गायब हुए वो पाँच थे, उनकी गाड़ी का रंग लाल था और जानते हो उनकी गाड़ी का नंबर क्या था?"

सबकी नज़रें मुझ पर टिकी थी, मैंने फ़ोन विवेक को वापस दिया और कहा "गाड़ी का नंबर था HA 12 8888"। "ये... ये तो हमारी गाड़ी का नंबर है" सुनील की हवाइयाँ उड़ रही थी।

 
"ये क्या बक रहे हो, ये कैसे हो सकता है?" दीपक गाडी से उतारते हुए बोला। "क्या हम अतीत में पहुँच गए हैं? नितिन ने सवाल किया। "मुझे नहीं लगता!" मैं बीच में ही बोल उठा, सब मेरी तरफ देखने लगे. मैंने दूसरी सिगरेट सुलगा ली और एक कश लगाने के बाद बोला "अगर हम अतीत में होते तो हमारे फ़ोन पर इन्टरनेट नहीं चलता पर ऐसा नहीं है"। मैं किसी गहरी सोच में था तभी मैंने विवेक से फ़ोन लिया और कुछ सर्च करने के बाद बोला "दरअसल ये नंबर प्रीमियम है इसलिए ये नंबर कई बार बेचा गया है"।

"विवेक, ये गाडी कितनी पुरानी है?" मैंने विवेक की तरफ देखा और वो मेरा मतलब समझ कर बोला " मैंने ये गाडी दो हफ्ते पहले ही खरीदी है"। गाडी का नंबर भी मुझे मेरे कार एजेंट ने दिलवाया था। "और जितने भी लोग इस हाईवे पर गायब हुए हैं उन सबकी गाडी का नंबर HA 12 8888था"

छोटी सी उस इनफार्मेशन ने हम सबको हिलाकर रख दिया, गाडी का सिर्फ नंबर ही नहीं बल्कि हमारे नाम तक मिलते थे, ये एक इत्तेफाक नहीं हो सकता। थोड़ी ही देर में विवेक ने इतिहास में घटी उस दुर्घटना की पूरी कहानी गूगल से सर्च कर ली। रात के तीन बजकर पचास मिनट हो रहे थे और अगले कुछ ही पलों में पता चला की उस रात उन पांच दोस्तों के साथ क्या हुआ था।

४० साल पहले ठीक इसी जगह पर कुछ भयानक हुआ जिसने इस हाईवे को मौत का हाईवे बना दिया जो कि इस प्रकार है -

२७ जनवरी की वो शाम थी जब पांच दोस्त अपने किसी दोस्त की शादी में शामिल होने के लिए फतेहपुर से नॉएडा जा रहे थे। गाडी में शराब का दौर चल रहा था और बातों की महफ़िल जवान थी। मौसम खुशनुमा था और रात अपने अंचल से सितारों के मोती बिखेर रही थी। गाडी नोयडा हाईवे पर ९० किलोमीटर की रफ़्तार से जा रही थी की तभी उनकी गाडी से एक बूढ़ा टकरा गया। थोड़ी बहस के बाद सभी दोस्त वापस गए तो बूढ़ा मर चूका था, तभी एक लड़की उन्हें घायल मिली जो सड़क के किनारे रो रही थी. वो बुढा उसी लड़की का बाप था, लड़की ने बताया की कुछ लोग उसे मारना चाहते हैं और उन लोगो ने उसके बाप को भी मार दिया था। उस भोली सी लड़की ने मदद मांगी ताकि ये लोग उसे उन थीं हत्यारो से बचा सकें। लाख मिन्नतों के बावजूद इन लोगो ने लड़की की मदद नहीं की और उनकी आँखों के सामने वो तीन हत्यारें उस कमसिन लड़की को उठा कर ले गए। उन दरिंदों ने लड़की को बेरहमी से मार डाला।

इस घटना के बाद से इस हाईवे से जो भी गया वो कभी लौटकर नहीं आया और रहस्यमयी ढंग से गायब हो गया।

उस लड़की का नाम था 'गौरी'।

हम सब गाड़ी से बाहर थे, सिर्फ़ गौरी गाड़ी के अंदर बैठी थी। वो बेचारी सोच रही होगी की हम उसकी मदद करेंगे या नहीं। किसने सोचा था कि एक हाइवे पर हम एेसी अजीब और शायद खतरनाक परिस्थिति में पड़ जाएंगे। पहली बार मुझे यह सवाल सताने लगा कि क्या हम वापस घर जा पाएंगे....... जिंदा। आसमान में चाँद भी शायद हमारी दुविधा समझकर टकटकी लगाकर हमें देख रहा था। बीच-बीच में अपनी मुँह बादलों में छुपा लेता था

"इसका मतलब वो लड़की......", "नहीं, यह महज एक इत्तेफाक भी हो सकता है" मैं सुनील की बात बीच में ही काटते हुए बोला। "क्या इत्तेफाक? वह लड़की जरूर भूत है" सुनील बेचैन था और शायद हम सब भी।

"तब क्या अगर यह लड़की सच में किसी मुसीबत में हो?" विवेक ने चुप्पी तोडी। "और अगर यह लड़की भूत हुई तो हम सब भी उन पाँच दोस्तों की तरह मारे जाएँगें" सुनील के तर्क में दम था, अगर यह लड़की सच में आत्मा है तो हम सबकी जान खतरे में थी।

"मैं कहता हुँ इस लड़की को नहीं छोड़कर निकलते हैं, हम एक लड़की के लिये अपनी जान खतरे में क्यों डालेंगे?" दीपक की बात सही थी पर पता नहीं जा में क्यों मेरी अंतरआत्मा इस बात की गवाही नहीं दे रही थी। हम एेसे दो राहे पर खड़े थे कि एक गलत फ़ैसला और हम सब भी अतीत का एक हिस्सा बन जाते और ना जाने मौत का यह सिलसिला ना जाने कितने लोगों की जिन्दगी से लेगा। मैं बहुत बहादुर तो नहीं हुँ पर पता नहीं कहाँ मेरे अंतर्मन में इस सिलसिले को खत्म करने की इच्छा प्रबल हो रही थी।

एक बड़े फ़ैसले की घड़ी नजदीक आ रही थी। एक एैसा फैसला जो शायद इस अभिशाप को मिटा सकता था।

"लड़की को साथ से जाने में ख़तरा है लेकिन अगर हमारा शक गलत निकला तो यह लड़की बेमौत मारी जाएगी और इस के जिम्मेदार हम होंगे" मेरी बात सुन विवेक बोला "लगता है तुम्हारे पास कोई प्लान है"।

"हाँ, मैं इस लड़की की मदद के लिये यहाँ रहूँगा और तुम लोग आगे सुरक्छित आगे निकल जाओ", "तुम होश में तो हो? ....ये क्या बक रहे हो!" दीपक बौखलाकर बोला।

मैंने सबको एक नज़र देखा और कहा "मैं जानता हूँ मैं क्या कह रहा हुँ लेकिन इस लड़की की मदद करना भी जरूरी है, अगर यह लड़की आत्मा है तो भी मैं यह ख़तरा लेने को तैयार हुँ, ....... क्या पता शायद यही एक तरीका हो हमारे यहाँ से सही-सलामत निकलनें का और शायद यही अंत हो इस अभिशाप का"।

मेरी बात सुन सब सन्न रह गए, "क्यों?... क्यों तुम उस लड़की के लिये अपनी जान खतरे में डालेगी रहे हो?" सुनील के इस सवाल का जवाब नहीं था मेरे पास।

"नहीं! हम तुम्हें छोड़कर नहीं जाएँगें ......." विवेक ने दृढता से कहा किन्तु मैंने बात काटते हुए कहा "ये बहस का वक्त नहीं है, हम साथ रहेंगे तो सबकी जान को ख़तरा होगा लेकिन मेरी बात मानोगे तो तुम सबकी जान बच सकती है"। "और तुम्हारा क्या होगा? दीपक मेरी तरफ़ ही देख रहा था। "मैं इस लड़की के साथ हाइवे पार करूंगा और कहीं सुरक्छित छोड़कर तुमसे मिलने की कोशिश करूंगा" पता नहीं मुझे में इतना हिम्मत कैसे आ गई थी और इस हिम्मत के आगे सब हार गए। आखिरकार मैं लड़की के साथ गाड़ी से उतर गया और वो सब चले गये।

सुनसान सड़क पर मैं आगे चल रहा था और वो मेरे पीछे सिर झुकाए चल रही थी। आसमान में चाँद अपनी साँसे रोके हमें देख रहा था जैसे मानों वो भी जानना चाहता हो कि अब आगे क्या होने वाला है। चारों तरफ़ फैली नीरस खामोशी को तोड़ा उसकी आवाज़ ने "आप क्यों नहीं गए? आपके दोस्त सही कह रहे थे, एक अजनबी लड़की के लिये आपको अपनी जान खतरे में नहीं डालनी चाहिये थी"।

दो पल मैं रुका फिर उसकी तरफ़ देखकर मैंने जो कहा वो सुनकर वो अवाक रह गई "मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो, मैं यह भी नहीं जानता कि तुम सच भी बोल रही हो या नहीं लेकिन मैं मुसीबत में पड़ी एक लड़की को एैसे छोड़कर नहीं जा सकता"।

"लेकिन क्यों? ......... मैं आपकी कुछ लगती नहीं हुँ फिर भी आप मेरे लिये आप अपनी जान खतरे में क्यों डालेंगे रहे हैं?......... हो सकता है आपके दोस्त सही हों, हो सकता है मेरी वह से आपकी जान चली जाए" उसकी आँखों में सवाल के साथ दर्द की झलक साफ दिख रही थी।

"शायद तुम मुझे अच्छी लगने लगी हो" मैंने माहौल को हल्का करते हुए चुटकी ली और उसके चेहरे की लाली देखने लायक हो गई थी। थोड़ी देर के लिये वह सब भूल कर हँसी फिर संयत होकर वह बोली "आप पूरे पागल हो साहब, आप इस डरावनी जगह पर भी मजाक कर लेते हो"। "करना पड़ता है गौरी ताकी मेरे साथ चलने वाली लड़की इस समय डरे नहीं और मुझे भी डराए नहीं, अब यहाँ से निकलनें पर ध्यान दें?" वह हाँ में सिर हिलाकर मेरे पीछे चल दी।

हम कुछ आधा किलोमीटर ही चले थे कि मेरी घड़ी का अलार्म बज उठा। चार बजने में सिर्फ़ पाँच मिनट बाकी थे तभी वो अचानक चलते-चलते रुक गई "साहब"। मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा तो उसकी आँखों में आँसु थे, इससे पहले कि मैं कुछ बोलता...... वो बोली "साहब, आप बहुत अच्छे हो, आप यहाँ से चले जाइए"।

"क्या हुआ गौरी?" मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह अपनें आँसु पोछते हुए बोली "आप यहाँ से चले जाइए, वो मेरे साथ आपको भी मार देंगे"। "कौन हैं ये लोग जो तुम्हारे पीछे पड़े हैं"

इस बार उसने सच कहा - "साहब, वो तीन पूरे हैवान हैं, उन्होने मेरे बापू को मार दिया और मुझे जंगल में उठाकर ले गए। मैं समझी कि ये अब मुझे मार डालेंगे पर मैं जिन्दा थी,..........पूरे तीन घंटों बाद मुझे होश आया था और मैं एक ही पत्थर की शिला पर निर्वस्त्र लेटी हुई थी। मुझे सिर से लेकर पाँव तक बाँध रखा था इन लोगों ने,

...........उन तीनों की भूखी नज़रें मेरे बदन को जैसे नोच रही थी। तभी उनमें से एक मेरे पास आया, शराब की तेज दर्गंध मेरे नथुनों से टकराई। उसने मुझे छूने के लिये हाथ आगे बढ़ाया और मैंने डरकर आँखें बंद कर ली

........आज शायद मेरी इज्जत और मेरी जान दोनों जाने वाली थी, मेरे बापू के सपने मेरे तीनों में शब्द बनकर घूम रहे थे। "मेरी बेटी एकदम देवी है, देखना एकदम देवता जैसा दूल्हा ढूंढुगा तेरे लिये", उनक़ी देवी इन हैवानों के हाथों लुटने जा रही थी, इससे अच्छा तो मैं मर जाती तो अच्छा होता ........

 
"दूर हटो!" किसी महिला कि दमदार आवाज़ से वो तीनों डरकर पीछे हट गए। एक अधेड़ उम्र की महिला थी वो पर चेहरे पर झुर्रियाँ उम्र से भी ज्यादा थी। माथे पर रक्त का तिलक, कानों में हड्डियों से बनी बालियाँ गले में पड़ी नरमुण्डों की माला किसी का भी दिल दहलाने के लिये काफ़ी थी पर मुझे तो वह उस समय देवी लग रही थी। वह धीरे-धीरे मेरे पास आई और मैं इस उम्मीद में कि वो मुझे इन शैतानों से बचाने आई है खुश हो गई पर मैं गलत थी।

उसने मेरे सिर पर हाथ फेरा और मेरे बाल पकड़कर बोली "तुम्हें भोग मिलेगा! पर पहले देवता को भोग लगाना है"। "कौन हो तुम! मुझे जाने दो मैं आपके हाथ जोड़ती हुँ"। "डंकिनी! .......... डंकिनी कहते हैं मुझे सब" यह कहकर उसनें एक थाल से सिंदूर लेकर मेरे पूरे बदन पर उड़ेल दिया, मेरे माथे पर सिंदूर लगाते हुए वह बोली "देवता का भोग हो तुम! तुम किस्मत वाली हो जो देवता तुम्हारा भोग करेंगे"।

मैं गिड़गिड़ाते हुए उससे मुझे छोड़ने की विनती करने लगी पर मेरे बाल पकडे हुए वह किसी गर्म तरल पदार्थ से धोने लगी। वह मानव रक्त था। मेरे पूरे शरीर पर रक्त से कुछ बनाते हुए वह बोली "तुम मेरी बरसों की साधना को सफल बनाओगी"। मैं अंदर तक सिहर गई और विनती करने लगी "मुझे जाने दो मैं आपके किसी काम की नहीं हुँ, मैं तो आपकी बेटी की तरह हुँ", इतना सुनकर वह मेरी तरफ़ देखकर हँसी "मूर्ख लड़की! साधना में कोई रिश्ता सच नहीं होता, मेरी बेटी को मैं कब का देवता को बलि चढ़ा चुकी हूँ, अब तेरी बारी है" इतना कहते हुए उसने एक खोपड़ी पर सिंदूर लगाकर मेरी नाभि पर रख दी।

थोड़ी देर बाद जब वह वापस आई तोे उसके हाँथ में कटार थी मैंने डरकर अपनी आँखें बंद कर ली पर काफ़ी देर तक जब उसने प्रहार नहीं किया तो मैंने आँखें खोली, वह कोई मंत्र बुदबुदा रही थी की तभी उसकी कटार चली और मैं एवं खोपड़ी खून से नहा गई और मेरी चीख निकल गई। वह मेरा खून था........ या शायद नहीं।

डंकिनी की कलाई से खून खोपड़ी पर गिरा और जैसे ही खून खोपड़ी के मुँह से मेरी नाभि पर गिरा तो जैसे मुझे करंट सा लगा। मेरा पूरा बदन सूखे पत्ते की तरह काँपने लगा, मेरे अंग-अंग में अजीब सी एेठन होने लगी और अचानक मेरा शरीर हवा में सात फुट ऊँचा उठ गया। डंकिनी का वह भयानक अट्टाहास मेरे कान फाड़े डाल रहा था, मैं जिसका भोग बनने जा रही थी वो मुझे लेने आ रहा था। एक भीमकाय साया धुँए से बनकर मुझे आगोश में ले रहा था, कुछ ही पलों में मेरा अस्तित्व खत्म होने वाला था और मेरी आत्मा तक इस शैतान की गुलाम होने वाली थी। मैंने आखिरी बार अपनी आँखें बंद की जो अब तभी नहीं खुलेंगी तभी एक धमाका हुआ और मेरे काम सुन्न पड़े गए। मेरा शरीर पत्थर की तरह अकड़ा हुआ था और सब धुंधला सा दिख रहा था।

अचानक एक साया मेरे करीब आया, शायद वही शैतान था, पर मुझे नुकसान पहुँचने की जगह मेरे पास चुपचाप बैठा था। अचानक उसने मुझे उठाकर झिंझोड़ा, वह कुछ बोल रहा था पर मुझे कुुछ सुनाई नहीं दे रहा था। "बेटी!....." अचानक यह शब्द मेरे कानों में पड़ा, ये ..........ये तो बापू की आवाज़ है। मैंने आँखों पर जोर डालकर देखा ये बापू नहीं थे........तो बापू की आवाज़ कहाँ से आई?

"बेटी!" वो अजनबी बोला, "बापू!......." मेरी बात पूरी होने से पहले वो बोले "मैं जानता हुँ बेटी इसलिए तुझे बचाने आया हुँ पर मैं डंकिनी को ज्यादा देर नहीं रोक पाउँगा, यहाँ से भाग जा बेटी!" बापू की आँखों में आँसु थे।

"बापू!...... यह तुम्हें क्या हो गया?" मैं रोते हुए बोली, "तु मेरी फ़िक्र मत कर बेटी, यहाँ से भाग जा! .....", "पर बापू! ........" "वक्त कम है बेटी ........ भाग जा यहाँ से,....... मौत के हाइवे से जाना" बापू मेरी बात काटते हुए बोलेे।

"पर बापू वहाँ तो कोई नहीं आता ......." मैंने सवाल भरी आँखों से बापू को देखा पर जैसे आज बापू के पास मेरे हर सवाल का जवाब था, उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा और कहा "आज वहाँ तुझे मदद भी मिलेगी ........ जा बेटी!"। मैंने जल्दी से अपनें कपड़ेे पहनें और जाने लगी बापू ने टोका "गौरी!...... मेरी बेटी..... वादा कर की कुछ भी हो जाए .... तु वापस यहाँ नहीं आएगी", "मैं वादा करती हुँ पर मेरी मदद कौन करेगा?". मेरे इस सवाल पर बापू थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले "मुझपर भरोसा कर बेटी!......मदद तेरी इंतजार कर रही है!"

काफ़ी देर से हम दोनों सड़क पर खामोश चल रहे थे, कितना बुरा हुआ इस लड़की के साथ, ......... आखिर भगवान कुछ लोगों का इतना इम्तेहान क्यों लेता है। सुबह के चार बजने मे सिर्फ़ एक मिनट बाकी था ....... ये रात बहुत लम्बी थी ........... सुबह होने वाली थी और ये सुबह बहुत कुछ लाने वाली थी लेकिन अंधेरे को जाने में अभी काफ़ी वक्त बाकी था। अंधेरे की एक खासियत है कि यह तब तक नहीं जाता जब तक हम इसे भगाने की नहीं ठान लेते..........और मैंने इस अंधेरे को हमेशा के लिये दूर करने का फ़ैसला कर लिया।

"तुम्हारे बापू ने गलत नहीं कहा था, ........... मैं तुम्हारा मदद करूंगा" ...... "पर आप मेरी मदद क्यों करना चाहता हैं,....... आप मेरे लिये अपनी जान खतरे में क्यों डाल रहे हैं? ....... क्यों?" उसकी आँखों में सवाल था जिसका जवाब मेरे पास नहीं था या शायद मैं जवाब देना नहीं चाहता था।

"वो छोड़ो, ...... सुबह होने वाली है, ...... जल्द ही हम इस जंगल और इस हाइवे से दूर निकल जाएँगें" मैं थोड़ा आश्वस्त होने चला था पर मुझे क्या पता था कि मेरा आखिरी इम्तेहान बाकी था। हम दोनों बातें करते हुए चले जा रहे थे कि अचानक वह चलते-चलते रुक गई ....... "क्या हुआ?" मैंने पलटकर उसे देखा, वो शर्म से लाल हो रही थी जैसे कुछ कहना चाहती हो पर कह नहीं पा रही हो।

मेरे बार-बार पूछने के बावजूद वह कुछ ना बोली, ........

....... थोड़ी देर में उसने इशारों में बताया और मेरी हँसी छूट गई और उसने नाराज होते हुए मुझे घूमने को कहा ताकि मैं उसको ना देख सकुँ। उसे बाथरुम आ रही थी।

"और कितना देर?......" मुझे खड़े-खड़े पाँच मिनट हो गए थे पर वो जवाब नहीं दे रही थी, ".......अगर तुम कुछ नहीं बोलोगी तो मुझे तुम्हारे पास आना पड़ेगा!......" काफ़ी देर बाद उसका कोई जवाब ना पाकर मैंने वहाँ जाकर देखा पर वो कहीं नहीं थी, मैंने आस-पास देखा पर उसका नामो-निशान तक नहीं था।

"गौरी!!....." किसी संभावित खतरे की आशंका से मेरा दिल घबरा रहा था। "गौरी!! ..... कहाँ हो तुम!!!............गौ.....", "बचा!..ओ!!!!!" एक चीख ने मेरा ध्यान खींचा, वो गौरी ही थी जो किसी भयानक खतरे में पड़ गई थी और मुझे उसे बचाना था। मेरे इम्तेहान की घड़ी आ गई है ........ बत्तीस सालों से सीधी चली जा रही मेरी जिन्दगी एक एेसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ एक प्रचंड मुकाबला है .......... सही और गलत के बीच ......... मानवीय इच्छाशक्ति और क्रूर तामसिक शक्तियों के बीच ........... आज कोई एक ही जीतेगा .......... आज कोई एक ही सुबह का सूरज देखेगा ............ मेरे गुरू ने सत्य ही कहा था कि बहुत जल्दी मेरा वक्त बदलने वाला है।

 


चीख दक्षिण दिशा से आई थी और मैं पूरी शक्ति के साथ उस दिशा में दौड़ रहा था। कुछ भी हो जाए मैं गौरी को कुछ नहीं होने दूूँगा।

गौरी आज फिर उन्हीं दरिंदों के बीच फँस गई थी जिनसे वह अबतक भाग रही थी। ये डर तब तक नहीं जाता जब तक हम इसे मार-मार कर भगा नहीं देते। उन तीन दरिंदों के अट्टाहास के बीच एक जानी पहचानी आवाज़ गूँजी "आ गई लड़की! …........कैसा लग रहा है मौत को सामने देखकर?" डंकिनी गौरी के पास गई और उसकी आँखों में आँखें डालकर बोली "तुझे क्या लगा! ....... तु मुझसे भाग सकती है? ....... हा हा हा हा...... अरे पगली! मौत से भी कोई भाग पाया है आजतक?"।

गौरी ने नफ़रत से मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया पर डंकिनी के डंक जैसे शब्द जारी थे "मेरी बात मान लेती तो आसान मौत देती तुझे .......... लेकिन अब मैं तुझे वो मौत दूँगी की दुनियाँ देखेगी ......... अब तेरा भोग देवता नहीं...... भैरव करेगा,...... भैरव!!!" डंकिनी के इतना कहते ही जैसे तूफान आ गया, उन तीनों में जो इतना देर से सबसे भूखी नजरों से गौरी को देख रहा था, वो भीमकाय दानव भैरव उठा लड़की को एक हाथ से उठा लिया। गौरी की चीखों से धरती और आसमान दोनों सिहर उठे।

भैरव ने उसे नीचे पटक दिया, गौरी की जैसे सारी हड्डियाँ टूट गई, यह देख वह राक्षस और भयानक अट्टहास करने लगा। "तूने अपनी मौत खुद बुलाई है लड़की, देख इसे! ........ यह भैरव है, ....... इसने पिछले चालीस सालों से किसी औरत को नहीं छुआ है, ..... आज यह तेरे बदन से अपनी बरसों पुरानी प्यास बुझायेगा! ........ और तो और मारने के बाद भी तू इसकी गुलाम रहेगी और यह तेरी आत्मा के साथ अगले ३०० सालों तक दुष्कर्म करता रहेगा। ....... यह है तेरा अंजाम मेरी बात ना मानने का आज के बाद तू मौत मांगेगी पर ये तुझे मौत भी आसानी से नहीं देगा। ....... पहले यह तुझसे अपनी भूख मिटाएगा फिर मन भर जाने पर यह तुझे अपने हज़ारों सेवकों को दे देगा जो पल-पल तेरा बदन नोचेंगे"

डंकिनी की बातें सुनकर गौरी अंदर से आतंकित हो गई और अपनी जान बचाने के लिए एक शिला के छुप गई। भैरव जोर से हँसा और उसने शिला के दो टुकड़े कर दिए, इतने में डंकिनी गरजी "जानना चाहती है उन औरतों का क्या हुआ जिन्हें भैरव ने भोगा?........ ये देख!!" इतना कहकर उसने अपने गले में टंगी खोपड़ी उतारी और गुफा की दिवार पर दे मारी तो पूरी दिवार ही भरभराकर गिर गई। दिवार के पीछे का नज़ारा किसी को भी आतंकित करने के लिए काफी था, दिवार के पीछे औरतों के सैकड़ो कंकाल थे जिनका भैरव ने भोग लगाया था। उनकी चीखें आज भी यहाँ सुनाई दे रही थी, एक हड्डी भी सलामत नहीं थी...... भैरव ने एक-एक ऊँगली तक को नोच कर अलग कर दी थी कंकालों की।

गौरी को पकड़ने के लिए भैरव ने अपना हाथ बढ़ाया जिससे बचने के लिए गौरी भागी और उसकी चुनरी भैरव के हाथ आ गई और उसने पल भर में ही चुनरी के टुकड़े कर दिए। "आज के बाद तू मेरी दासी बन कर रहेगी! ........" भैरव की गरजदार आवाज ने उसको हिलाकर रख दिया, वह शैतान एक बार फिर गौरी पर झपटा और उसे पकड़कर नीचे गिरा दिया। भैरव के आगे गौरी एक छोटे मेमने से ज्यादा नहीं थी, उसने गौरी के दोनों हाथों को अपने एक हाथ में पकड़कर ऊपर किया और उसका दूसरा हाथ गौरी की चोली की तरफ बढ़ा।

उसकी लाल आँखों में वासना भरी थी और जबान से लार गौरी के ऊपर गिर रही थी, उसकी सांसों की बदबू से वो मरी जा रही थी। गौरी के हलक से गगनभेदी चीख निकली और उसकी चोली फटकर भैरव के हाथ में तभी जोरदाज बिजली कड़की और मौसम का मिजाज बदल गया, आसमान में घने काले बादल छा गए, सूरज भी जैसे आज निकलना नहीं चाहता था वो राक्षस अभी तक चोली को ही चाट रहा था, ...... गौरी ने अपने हाथों से अपने स्तनों को ढक लिया। आसमान भी शायद यह देखकर रोने लगा और घनघोर बारिश शुरू हो गई, ..... तभी भैरव का ध्यान गौरी पर गया और उसका अर्धनग्न बदन देखकर उसकी आँखों में खून उत्तर आया ....... अब गौरी भी समझ चुकी थी की उसे उसके दर्दनाक अंत से कोई नहीं बचा सकता इसलिए उसने विरोध करना छोड़ दिया। उस दैत्य ने गौरी के घागरे को भी चीरकर फेक दिया, ..... गौरी अब उसके सामने निर्वस्त्र पड़ी थी.... अकेली ....... और सामने था उसके बदन को खा जाने को आतुर वो हैवान। गौरी अपनी आँखे बंद कर ली, ....... उसकी आँखों में उसके बचपन की यादें उत्तर आई, बापू के साथ रोज शाम को पूजा के लिए थाल सजाना, ...... बापू हमेशा कहते थे की सच्चे मन से पुकारो। .... तो भगवान् जरूर आतें हैं ...... पर ...... ये द्वापर युग नहीं है की भगवान् श्री कृष्णा आएंगे उसकी लाज बचाने के लिए।

भैरव धीरे-धीरे गौरी के निर्वस्त्र बदन की तरफ बढ़ रहा था, ...... युग चाहे कोई भी हो पर अगर पुकार सच्ची हो तो चमत्कार होते देर नहीं लगती, गौरी को मदद की जरुरत थी जिसकी उसे बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी। अचानक जोरदार बिजली कड़की और वही हुआ जिसकी उम्मीद नहीं थी, भैरव अचानक रुक गया था, ....... दो धमाके और हुए और भैरव निढाल होकर एक तरफ लुढ़क गया। गौरी की आँखों में हैरानी या डर में क्या ज्यादा था ये तो पता नहीं पर जो सामने आया उसे देखकर उसकी आँखों में ख़ुशी के आंसू जरूर आ गए थे। श्रीकृष्ण तो नहीं पर उनका दूत जरूर आ गया था उसकी लाज बचाने के लिए जो उसे ढूंढते हुए यहाँ तक आ पंहुचा था अपने वचन को निभाने जो उसने हाईवे में रोती हुई गौरी को दिया था।

"मैं तुम्हे कुछ नहीं होने दूंगा" गौरी को उसकी बातें याद आने लगी, ... कितनी सच्चाई थी उसकी बातों में ...... वो आ गया था अपना वचन निभाने।

वो २० मिनट मुझे २० साल की तरह लग रहे थे जब मैं गौरी को पागलों की तरह ढूंढ रहा था, आखिरकार उसकी चीखों की आवाज पास आती जा रही थी और मैं अपनी मंजिल के करीब था। वहाँ का नज़ारा देखकर मेरा खून खौल गया ...... वो दैत्य गौरी के कपड़ों को तार-तार कर रहा था पर ये वक्त बुद्धि से काम लेने का था, मेरे पास रिवाल्वर था पर निशाना गलत निकल तो ये राक्षस बच जाएगा और मैं गौरी को बचा नहीं पाऊंगा। मैंने अपनी रिवाल्वर निकाल ली और छुपते हुए शिला के पीछे आ गया और किस्मत से उस हैवान ने गौरी को वही गिराया था, जब वो गौरी के घाघरे को तार तार कर रहा था तब मेरा रोम-रोम कह रहा था की मैं उसके सर के टुकड़े कर दूँ पर मैंने दिमाग को शांत कर निशाना लगाया। पहली गोली उस शैतान के सिर के आर-पार हो गई, .... दूसरी गोली उसकी गर्दन को चीरती हुई चली गई और तीसरी गोली ने उसके दिल को छेड़कर मेरे दिल को शांत कर दिया। धम्म से उसका भारी शरीर नीचे आ गिरा और हैरान होने की बारी डंकिनी की थी।

मेरी आँखों में खून खौल रहा था, मैंने अपनी शर्ट उतार कर गौरी का बदन ढक दिया। डंकिनी हैरान जरूर हुई पर उतना नहीं जितना होना चाहिए था फिर संयत होते हुए बोली "तेरी तारीफ़ करनी पड़ेगी लड़के! अपनी बुद्धि और युक्ति के बल पर तूने भैरव को मार दिया पर मुझे कैसे मारेगा? वैसे तेरा गठीला बदन देखकर तो मैं वैसे ही मर गई "।

"मरेगी तो अब तू डंकिनी!" मैं आंखों में खून दौड़ रहा था मैं उसकी तरफ आगे बढ़ा तो उसके तीनों साथी मुझसे आ भिड़े पर दो को तो मेरी रिवाल्वर ने परलोक पंहुचा दिया। तीसरा मेरे पीछे से आया और मुझ पर एक प्रहार किया और मैं लड़खड़ाया, वह आगे बढ़ा और उसने मुझे कसकर पीछे से पकड़ लिया। मैं छुड़ाने की कोशिश करने लगा तभी डंकिनी बोली "बेकार कोशिश मत कर लड़के, इसकी पकड़ से कोई नहीं छूट सकता,.... क्यों आया है यहाँ? ........ इस लड़की के लिए? ..... क्या लगती है ये तेरी?"। मैं कुछ नहीं बोला तो वह फिर बोली "क्यों बचाना चाहता है तू इस लड़की को?" .... मैं चुप था। वो मेरे पास आई और बोली "ऐसा क्या है उसमे जो मुझमें नहीं है? ....... मेरे साथ आजा तुझे दुनिया का सबसे अच्छा रति सुख दूंगी। ........ इस जैसी लड़कियां तो तेरे आगे-पीछे घूमेंगी"। मेरा चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था और मैं छूटने की लगातार कोशिश कर रहा था कि तभी डंकिनी फिर बोली "प्यार करता है उसको?" ......... "नहीं!!" मेरे मुँह से निकल और वो ठठाकर हंसने लगी। "मुझसे झूठ बोलता है, चल एक सौदा करती हूँ तेरे साथ, मुझे बलि चाहिए ........ इस लड़की की या तेरी ........ अब तू बोल किसे छोड़ दूँ "।

"गौरी को छोड़ दे डंकिनी! बलि लेनी है तो मैं दूंगा तेरे लिए अपनी बलि ........ " इससे पहले मैं अपनी बात पूरी करता वो बोली "पकड़ा गया ना!!! ........ तू इसे प्यार करता है तभी तो इसके लिए अपनी जान देना चाहता है, ....... बलि तो मैं इस लड़की की ही लूँगी और वो भी अभी!"।

"ले पायेगी बलि मेरे होते हुए?" मेरे सवाल ने उसको हैरान कर दिया, पहली बार किसी ने उसे चुनौती दी थी। डंकिनी मेरे पास आई और बोली "तू मुझे रोकेगा? ....... जानता है मैं कौन हूँ? ....... मैं चाहूँ तो अभी तुझे मार सकती हूँ"। मैं उसकी आँखों में आँखे डालकर बोला "मरना तो एक दिन सबको है डंकिनी! आज तेरी बारी है", "मूर्ख है तू जो ये सोचता है की मुझे हरा सकता है, मैं चाहूँ तो अभी इस लड़की की बलि तेरे सामने दे सकती हूँ ........ भुजंग! उठा ला उस लड़की को!" भुजंग ने मुझे जकड़ा हुआ था मुझे छोड़कर वो लड़की की तरफ बढ़ा ....... मैं उठा और जोरदार किक उसकी पीठ पर दे मारी वह मेरी तरफ़ पलटा तो मैंने उससे मुँह पर दूसरी किक जड की पर वो हिला भी नहीं। उसका एक घूँसा मेरी कनपटी पर पड़ा और मैं सात फीट पीछे दीवार से टकराया ....... मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

 


"बस! इतना ही दम था! ...... चला था मुझसे लड़ने" डंकिनी ने व्यंग्य किया। भुजंग वापस गौरी की तरफ़ बढा और इस बार मैंने लड़नेे का तरीका बदल दिया। मैं दौड़कर दीवार पर चढ़ा और अपनें शरीर को इस्तेमाल करते हुए भुजंग के उपर कूदा और भुजंग सिर्फ़ थोड़ा लड़खड़ाया। मेरे इस बार से बौखलाकर उसने मुझे उठाकर पटक दिया और उसका हाथ मेरी गर्दन पर आ कसा ....... मैं साँस नहीं पा रहा था ........ मेरे हाथ पूरी ताकत से लगे थे मेरी गर्दन को उसके शिकंजे छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे।

"बेकार कोशिश कर रहा है, ...... इसके हाथ से तू नहीं बच सकता ...........९५ लोगों को मार चुका है यह इस तरह" डंकिनी गलत नहीं बोल रही थी अगर जल्द ही कुछ नहीं किया तो मेरी जान नहीं बचेगी" अचानक मुझे कुुछ याद आया ......... मेरे हाथों की पर ढीली हुई ..........मेरी आँखें बंद हुई ........ कुछ सेकंड्स बाद मेरी आँखें खुली ........... मेरे चेहरे पर मुस्कान देख भुजंग थोड़ा हैरान हो गया ............ मेरी अंगुलियाँ कड़ी हुई और भुजंग की बाँह मे मक्खन की तरह घुसती गई। भुजंग चीखकर हटा और मेरा दूसरे हाँथ की अंगुलियाँ उसकी आँखों में घुस गई।

भुजंग का मृत शरीर अपने ऊपर से हटाकर मैंने डंकिनी की तरफ़ देखा .......... "तू तो मेरी उम्मीद से ज्यादा चालाक निकला ! और कितना हैरान करेगा मुझे? .......... डंकिनी का दिल आ गया है तुझपर ...... वैसे भी तूने भुजंग को मारा है ......... अब उसकी जगह तू मेरा साधक बनेगा"। मैंने डंकिनी को सिर से लेकर पाँव तक देखा और व्यंग्य किया "तुझमें एैसा क्या है जो मैं तेरी साधना करूँ?" वो तिलमिलाई और बोली "तूने मेरा रूप देखा कहाँ है, ......... देखेगा मेरा कामिनी रूप?" मैंने मुँह फेर लिया, वो दस कदम पीछे गई और थोड़ी ही देर में उसका रूप बदल गया "यह माया है तेरी मैं चीखा" वो मेरे पास आई और बोली "छूकर परीक्षा कर ले!....."।

उसके बदन से आती मादक सुगंध मुझे विचलित कर रही थी। रेशमीं वस्त्रों में उसका एक-एक अंग साँचे में ढला हुआ वह रहा था, तंग चोली से झाँकते उसके उभार जैसे किसी की भी तपस्या भंग करने की प्रतिज्ञा कर चुके थे। मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था....... वो धीरे-धीरे मेरे और करीब आई...... उसकी साँसें मेरी साँसों से टकराया रही थी।

"मैं गौरी को लेकर यहाँ से चला जाउँगा और तू देखती रह जाएगी" मेरी बात पर वो जोर से हँसी और बोली "इतना तो तू भी समझ गया होगा कि तू इस लड़की को मेरे होते हुए नहीं ले जा सकता ...........…... चल एक सौदा करते हैं, ....... मैंने इस लड़की की जान बक्श दी ......... अगर तू मेरे साथ रहे तो"।

"मुझे मंजूर है! .......पर पहले तुझे इस लड़की को छोड़ना होगा" गौरी को बचाने का अब यही रास्ता था , "मंजूर है मुझे भी ...... तू खुद इसे छोड़कर आएगा .......... पर पहले मेरा तो हो जा!" , "कैसे?" मैंने सवाल किया तो वो बोली "चले जाना .......... पर उससे पहले तुझे मेरा भोग करना होगा वो भी अभी और इस लड़की के सामने......" उसके जवाब ने मुझे संकट में डाल दिया, मैं सोच रहा था कि एक बार यहाँ से निकलकर वापस नहीं आऊँगा पर डंकिनी ने पहले ही इसका इंतजाम कर दिया था।

"मेरे साथ संभोग करने से तुझे प्राप्त होगा असीम आनंद और मुझे मिलेगी परम सिद्धी" इतना कहते हुए उसने अपनी चोली उतार दी, देखते ही देखते वह निर्वस्त्र हो गई। बारिश में भीगता उसका बदन और उसे देखकर मेरे अंदर उठती उत्तेजना ......... सच में यह मेरी सबसे बड़ी परिक्षा थी। डंकिनी ने अपने दोनों हाथ ऊपर कर मादक पोज़ बनाया और बोली " आजा! ........ मेरा भोग करले ......... सम्भोग करले ....... ".

मैंने गौरी की तरफ देखा तो वो बेहोश थी, कुछ सोचने का वक्त नहीं था ........ डंकिनी अपने बारिश में भीगते स्तनों को अपने हाथों से उठाते हुए बोली " सोचता क्या है ........ आजा! ........ मैंने तुझे बहुत दुःख दिया है ........ आकर बदला नहीं लेगा?" मेरी नस-नस उत्तेजना से फट रही थी तभी उसने अपनी जाँघे उठाकर अपनी योनि दिखाई और बोली "एक औरत ने तुझ मर्द को बहुत सताया है ........ आकर मुझे अपनी मर्दानगी नहीं दिखायेगा?....... आजा! मुझे मसल कर मेरे रूप के घमंड को तोड़ दे! ........"। मेरे सब्र का बाँध टूट गया और मैं उसके बदन से खेलने लगा ........ डंकिनी को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई हो ........ वह तो आनंद में सराबोर होने लगी ........ मैंने उसे उठाकर शिला पर लिटा दिया और फिर उस पर जुट गया । थोड़ी ही देर हम दोनों एक दूसरे से बुरी तरह गुथें हुए थी की तभी मैंने उसे झटके से छोड़ा और ऊँची शिला पर जा खड़ा हुआ।

"क्या हुआ मेरे मर्द?........" उसने अचरज से मुझे देखा, उसकी प्यासी निगाहें मुझे पाने को मरी जा रही थी तभी मैं बोला "मैं तेरे पास नहीं बल्कि तू मेरे पास आकर मिन्नते करेगी यहाँ" मैंने शिला के नीचे आने का इशारा किया। "तेरे लिए मैं हजार बार मिन्नतें करने को तैयार हूँ ........ आती हूँ तेरे पास" डंकिनी उठी और शिला के पास आ गई। मैं शिला के ऊपर था और वो नीचे ........ मैं नीचे झुका और उसके बाल पकड़ लिए ........ वो मुस्कुराई और मेरे पास आई ........ हम दोनों के होठ मिले और जैसे बिजली कड़की और पल भर की देर में ही मैंने अपने गले में पड़ी रुद्राक्ष की माला उसके गले में डाल दी........ अगले ही पल डंकिनी के हलक से कर्णभेदी चीख निकली।

मेरा अंदाजा सही निकला ........ किसने सोचा था की तीन सालों पहले बनारस से ली गई यह साधारण सी माला इतना बड़ा काम कर जायेगी। रोज शाम को शिव भक्ति और हनुमानजी की पूजा काम आ गई थी। डंकिनी की चीखों से धरती और आकाश दोनों गूँज रहे थे, रुद्राक्ष की माला गर्म होकर लाल हो गई और थोड़ी ही देर में भस्म हो गई। अब चौकने की बारी मेरी थी ........ डंकिनी घायल जरूर हुई थी पर बच गई और घायल नागिन की भांति फुफकारते हुए बोली "बस!!!! अब बहुत खेल हो गया ........ अब मैं तुझे दिखाउंगी की डंकिनी से टकराने वाले कैसी दर्दनाक मौत मरते हैं" वह उठी और नीचे से गीली मिटटी उठा कर कुछ बनाने लगी ........ मेरी छठी इंद्री कह रही थी की ख़तरा बहुत बढ़ गया है पर इसे मारे बिना इस खतरे से निजाद नहीं मिलेगी।

"ये देख लड़के! ........" मैंने देखा तो उसने कुछ पुतला सा बनाया था मिट्टी से इससे पहले मैं कुछ समझ पाता वह फिर बोली "अब मैं तुझे मेरी साधना की शक्ति दिखाउंगी और तू तड़प-तड़प कर मरेगा।", उसने एक हाथ को चीरकर खून उस पुतले पर टपकाया और जैसे मेरे बदन में करंट लग गया। मेरा पूरा शरीर कांपने लगा तभी अचानक मेरे बाई टांग में भयंकर दर्द हुआ और मैं चीखकर नीचे गिर पड़ा ........ मैंने डंकिनी की तरफ देखा तो वो पुतले की बाई टांग में सलाई घुसा रही थी। जैसे-जैसे वह सलाई पुतले की टांग में घुसा रही थी ........ वैसे-वैसे मेरी टांग में दर्द बढ़ता जा रहा था।

"कैसा लग रहा है डंकिनी के हाथों मरने में........" वह जोर से अट्टहास कर रही थी तभी उसने सलाई मेरी दाई टांग में घुसा दी और मैं दर्द से चीख पड़ा। मैं घिसटकर उसके पास जा रहा था, ........ मेरी दोनों टाँगे टूट चुकी थी। वो मेरे पास आई और बोली "अभी भी वक्त है........ मेरा कहा मान जा ........ जिन्दा रहेगा कुछ दिन और........" मैंने मुँह फिरा लिया तो उसने गुस्से में मेरी बाई बाजू में भी सलाई घुसा दी और मेरा बाया हाथ भी टूट गया। मुझे मेरा अंत सामने दिख रहा था पर उससे ज्यादा दुःख इस बात का था की मैं गौरी को बचा नहीं सका। डंकिनी मेरे ऊपर बैठ गई और बोली "तुझे मुझसे कोई नहीं बचा सकता ....... याद करले अपने भगवान् को! ......." सही में यह मेरा अंत ही था पर मेरी आखिरी इच्छा थी की गौरी की जान बच जाए ....... और भगवान् ही मेरा आखिरी सहारा थे।

मैंने आँखे बंद की ....... इधर डंकिनी ने सलाई ली और पुतले के सीने में घुसाने लगी ....... सीने में एक तेज लहार दौड़ गई पर मैंने खुद को एकाग्र कर भगवान् को याद किया। ये तुच्छ भटके हुए तांत्रिक थोड़ी से सिद्धि पाते ही खुद को भगवन समझ लेते हैं पर ये भूल जातें हैं की अगर सच्चे मन से भगवान् को याद किया तो चमत्कार जरूर होते हैं और ....... वही हुआ।

इससे पहले डंकिनी की सलाई मेरे पुतले के सीने में जाकर मेरी धड़कनों को रोकते ....... उससे पहले एक जोरदार बिजली कड़की और डंकिनी नीचे गिर पड़ी।मैंने पलटकर देखा तो विवेक और मेरे बाकि दोस्त थे, विवेक की गोली सीधे डंकिनी के सिर में घुसी और इसके साथ इस रोमांचक और जोरदार कहानी का अंत कर गई।

 


-------------- Three Months Later. ---------------

///एक चतुर नार! .......... बड़ी होशियार!! ........... मेरे दिल में छेद ये करत जात!! ..........हम मरत जात!! अरे एे ऐ ऐ ......///

"बंद करो यह गाना नितिन! .......... पूरे छः महीनों बाद तुम्हारे पैरों का प्लास्टर कट रहा है ............. उस चुड़ैल ने तो तुम्हें मार ही दिया था" विवेक मेरी तरफ़ जूस बढ़ाते हुए बोला। "जो भी हो यार ........... वो चुड़ैल थी बड़ी खूबसूरत! ............. तुमने एक अच्छा मौका गँवा दिया" नितिन ने चुटकी लेते हुए कहा।

"सच में यार!! .............. उसने गलत आदमीं को चुन लिया था .......... जो आॅफ़र उसनें तुम्हें दिया था, अगर उसने मुझे दिया होता ........... तो आज वो और मैं कहीं झिंगालाला कर रहे होते।" नितिन के इतना कहते ही सब हँस पड़े तभी डाक्टर साहब आप गए "हैलो मिस्टर नरेन्द्र! हाउ आर यू फीलिंग नाऊ?", "आइ एम फीलिंग गुड" मैंने जवाब दिया, थोड़ी जॉच के बाद डाक्टर साहब चले गए और हम बार बातों में मसरूफ़ हो गए।

"वैसे जिस तरह से तुम में डंकिनी का सामने किया ........ वह काबिले तारीफ़ है…" विवेक मेरी तरफ़ देखते हुए बोला। "यह तुम्हारे बगैर संभव नहीं था, ......... अगर तुम सही वक्त पर उसे गोली नहीं मारते तो मैं भी एक रहस्य बन जाता" मैंने सबकी तरफ़ देखते हुए कहा।

"वैसे एक बात समझ में नहीं आई........" मेरे सवाल का सब इंतजाम कर रहे थे, मैंने आगे कहा "उस घने जंगल में तुमने मुझे ढूँढा कैसे? ........" मेरे सवाल पर सब मुस्कुराए फिर विवेक ने मेरीआँखों में देखकर कहा "हैरान होने के लिये तैयार हो जाओ दोस्त!"।

"हम लोग जंगल से बाहर निकल तो गए पर तुम्हें छोड़कर जाने का इरादा हमारा तभी नहीं था, .......... जब तुमने हमें जाने को बोला तो पहले हम हैरान हुए, पर ये सोचकर कि हम तुम्हारे लिये मदद ला सकेंगे ..... हम चले आए" विवेक की बातें सुनकर सभी खयालों में खो गए, विवेक ने आगे कहा "वहाँ से बाहर निकलते ही हमें एक पुलिस चौकी दिखा जहाँ काफ़ी चहल-पहल थी, ...... शायद वहाँ के विधायक चौकी में आए थे......... हमने पुलिस को सब बताया पर ये हाइवे भुतह है कहकर उन्होंने कोई कार्यवाही नहीं की। हम विधायक के पास भी गए और मदद माँगी पर वो तो और हरामखोर निकला....... वो अपनी बीवी के सामने शेखी बघारने में व्यस्त था ......... उसकी बीवी अपनें तीन लाख के हार पर इतना अकड़ रही थी कि मन कर रहा था कि दूँ दोनों को दो कंटाप (तमाचा)।

हमारी मदद के सब रास्ते बंद हो गए थे तभी कानों में घंटे की आवाज़ गूँजी, ..... सामने हनुमानजी का मंदिर था।

अनायास ही हमारे कदम मंदिर की तरफ़ बढ़ गए। वह मंदिर क्या था एक छोटे से १०×१० के करने में हनुमानजी की तीन फीट ऊँची मूर्ति रखी गई थी। मूर्ति बहुत ही पुराने जाने की लग रही थी, पत्थर की बड़ी शिला को बड़ी ही मेहनत से महीनों तराशा गया होगा तब जाकर यह मूर्ति बनी होगी, सिंदूर से रंगी प्रतिमा पर जगह-जगह दिये जलने की वजह से कालिख थी। मंदिर की बाँई दीवार पर गणेशजी और दुर्गाजी की मूर्तियाँ रखी हुई थी, ......... मंदिर की दायी तरफ़ बड़ा बरगद का पेड़ था। सुबह के पाँच बज रहेे थे और मंदिर से आती घण्टे की आवाज़ मन को सुकून दे रही थी ...... शायद पुजारी सुबह की आरती में व्यस्त था।

"अब क्या करें?" नितिन के सवाल ने मेरा ध्यान भंग किया "......... ये हरामखोर पुलिस वाले तो हमारी सुनने को तैयार नहीं है ........... और उस विधायक को तो हाइवे का नाम सुनते ही जैसे साँप सूँघ गया हो!" नितिन की बात सही थी और हमें जल्द ही कुछ करना होगा।

"हमें नरेन्द्र को जल्द ही बचाना होगा, पता नहीं वो किसी खतरे में हो ........." सुनील की बात से मैं भी चिंतित था तभी नितिन बोला ".......लेकिन कैसे??...... किससे मदद लें ........ कौन करेगा हमारी मदद?........ उस भुतहे हाइवे में कोई नहीं जाना चाहता .......... तो अब क्या भगवान जाएंगे हमारे दोस्त को बचाने??....." , नितिन की बात पूरी होती इससे पहले एक दमदार आवाज़ मेरे पीछे से आई "क्यों नहीं जाएँगें भगवान?......." हमने पलटकर देखा तो पुजारी खड़ा था।

बड़ी-बड़ी आँखें, लम्बे चेहरे पर बड़ी-बड़ी रौबदार मूँछें, साढे छः फुट लम्बी बलिष्ठ काया ........ वह सिर्फ़ नाम से पुजारी लगता था, देखने में तो वह पहलवान से कम नहीं था। किसी जमानें में प्रसिद्ध पहलवान रहा होगा। पुजारी हमारे पास आया और प्रसाद हाथ में देते हुए बोला "......अगर सच्चे मन से पुकारो तो भगवान को आना ही पड़ता है"।

"ओ पंडितजी!...... ये प्रवचन देने का वक्त नहीं है........ हमारे दोस्त की जान खतरे में है और कोई हमारी मदद नहीं कर रहा है" नितिन पहले ही बहुत परेशान था और पुजारी की बातों ने उसे भड़का दिया। "मैं प्रवचन भी सुपात्र को ही देता हुँ ......... और तुम्हें सात जन्म लगेंगे इस लायक बनने में!" पंडितजी ने भड़कते हुए कहा। बात बिगड़ती देख मैं बीच-बचाव करते हुए बोला "पंडितजी इसे माफ़ कर दीजिये ........हम सब परेशान थे इसलिए ये गलती हो गई"।

"तुम समझदार लगते हो! ........ क्या परेशानी है तुम्हें?" पुजारी ने संयत होते हुए कहा, मैंने पुजारीजी को हमारी यात्रा की पूरी दास्तान सुनाई कि कैसे हमारा ड्राइवर खो गया और कैसे एक एक्सीडेंट की वजह से एक लड़की की मदद हमें करनी पड़ी। मैंने यह भी बताया की हमारा एक दोस्त उस लड़की की सुरक्षा के लिए उसके साथ रुक गया है, ....... पता नहीं हमारी दोस्त किस हाल में होगा यही चिंता हमने खाये जा रही है।

पुजारीजी ने पूरी बात बड़ी गंम्भीरता से सुनी फिर कुछ सोचकर बोले "तुम्हारा सामना परामानवीय शक्तियों से हुआ था और उनसे ये पुलिसवाले तो क्या कोई भी नहीं जीत सकता, ......... तुम्हारी मदद कोई नहीं कर सकता सिवाय एक के!", हमारी सवालिया नजर पुजारी पर थी, पुजारी ने आगे कहा "सिवाय भगवान् के तुम्हारी मदद कोई नहीं कर सकता!"। "देखा!! ...... मैंने कहा था ना! ..... ये पुजारी हमारा वक्त बर्बाद कर रहा है,..... अब भगवान् को कहा से लेकर आये मदद करने के लिए?" नितिन बिफरते हुए बोला पर इस बार पुजारी ने शांत होकर जवाब दिया "तुम्हारी मदद ना तो पुलिस ने की ........ और ना ही उस नेता ने! ......... और जब मदद के सारे रास्ते बंद हो गए है तो एक बार भगवान् को याद करने में हर्ज क्या है?" इससे पहले नितिन कुछ कहता मैं बोला "पुजारीजी हमें हमारा दोस्त सही सलामत चाहिए! ......... अगर भगवान् हमारी मदद कर सकते हैं तो वो ही सही, ......... हमें क्या करना होगा?", "........ कुछ नहीं!... बस सच्चे मन से भगवान् को याद करो!"

 


हमारे पास वैसे भी कोई रास्ता नहीं था, ......... मैंने आँखे बंद की और मन ही मन प्रार्थना की

"हे भगवान्! ......... मैं नहीं जानता की आपका अस्तित्व है भी या नहीं, ......... मैं ये भी नहीं जानता की आप हमें सुन सकते हैं की नहीं पर ......... अगर आप हमें सुन सकते हैं तो प्लीज! ......... हमारी मदद कीजिये"।

पता नहीं कितनी देर मुझे हो गई थी ऐसे ही बैठे की तभी नितिन की हंसी ने मेरा ध्यान भंग किया "हा हा हा! ........ एक और मार मेरी तरफ से ...... बहुत अकड़ रहा था"। मैंने पलटकर देखा तो विधायक की पत्नी कुर्सी से नीचे गिरी हुई थी, उसका गाल लाल था जैसे किसी ने उसे जोरदार थप्पड़ लगा दिया हो पर किस में इतनी हिम्मत थी की एक विधायक की बीबी पर हाथ उठा सके। थोड़ी देर में ही मैं सारा माजरा समझ गया ........ थोड़ी देर पहले वह बंदरो को चने खिला रही थी, शायद किसी बन्दर ने किसी बात से चिढ़कर उसे थप्पड़ जड़ दिया था। जो भी था मुझे भी बड़ा मजा आया ........ सारे पुलिसवाले बंदरो को भगाने में लगे थे पर बन्दर तो जाने से रहे। उस अंगूठा छाप बन्दर को क्या पता की विधायक क्या होता है, तभी एक बन्दर विधायक की पत्नी के पास आया और उसका तीन लाख का हार ले कर भाग गया। अब तो जैसे विधायक पर दौरा चढ़ गया ........ वो खिसियाते हुए पुलिसवालों पर चिल्लाने लगा।

हमारी हँसी रुकने का नाम ही नही ले रही थी की तभी मुझे कुछ याद आया "दीपक! ये बन्दर उधर ही जा रहे हैं जहाँ से हम आये हैं राईट? ........ दीपक ने देखा और बोला "हाँ ........ ये वहीँ जा रहे है,........ चलो चलते हैं शायद अब ये हमारी मदद कर दें"। हम फटाफट गाडी में सवार होकर उसी दिशा में भागे, तब तक पुलिस की कई जीप भी हमारे पीछे पीछे आ गई। बंदरो का पीछा हम कर रहे थे और हमारे पीछे पुलिस की जीप आ रही थी, ........ जो भी हो भगवान् ने हमारी मदद कर ही दी। बन्दर इतनी तेज भाग रहे थे की हमारी गाडी जबतक एक तक पहुँचती तो वह हार दूसरे बन्दर को फेक देता था और फिर हम दूसरे का पीछा कर रहे थे। थोड़ी देर में बन्दर हाइवे छोड़कर जंगल में घुस गए और हम भी बिना सोचे समझे उनका पीछा करते हुए जंगल में खो गए।

"अब क्या करें?" नितिन बोला, "हम भटक गए हैं, नरेंद्र तक कैसे पहुंचे?"।

"श श श! ......... कोई आवाज आ रही है ......... " दीपक कान लगा कर सुनने की कोशिश करने लगा फिर एक तरफ इशारा करते हुए बोला "उधर!!" । हम सब उसी दिशा में भागे चीखों की आवाज तेज होती जा रही थी और थोड़ी ही देर में हमने तुम्हे ढूँढ लिया। तुम्हारी दोनों टाँगे टूट गई थी और वो खूबसूरत चुड़ैल किसी पुतले में कुछ घुसा रही थी जिसका असर तुम पर हो रहा था।

मैं समझ गया उसने तुम पर अफ्रीकन काला जादू 'वुडू' किया था और इसका तोड़ हममें से किसी के पास नहीं था। तुम्हारी जान बहुत बड़े खतरे में थी पर किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था क्या करें। तभी मुझे ध्यान आया की वुडू का सिद्धांत असल में तीव्र सम्मोहन है जिसमें सामने वाला व्यक्ति सम्मोहित सा हो जाता है और उसी की वजह से पुतले पर किये गए वार का असर उस व्यक्ति पर होता था। तुम्हे बचाने के लिए कुछ तो करना था वो भी जल्दी। ......... तभी मुझे कुछ ध्यान आया और मैं बन्दूक निकाल कर उस चुड़ैल पर तीन फायर किये और वो गिर गई। दो फायर मिस हुए थे पर तीसरा उसकी खोपड़ी में छेद कर गया।

सुबह के छः बज रहे थे और सूरज की पहली किरण के साथ ही इस भयानक रात का अंत हो गया साथ ही साथ अंत हो गया उस अभिशाप का जिसने इसे मौत का हाइवे बना दिया था। तुम दो हफ्ते तक बेहोश रहे फिर डेढ़ महीनों तक तुम खुद को भी नहीं पहचान पा रहे थे। हम सब तो उम्मीद खोने लगे थे पर वो देवी की तरह तुम्हारी सेवा में लगी रही, दिन-रात उसने एक कर दिया तुम्हे मौत के मुँह से खींच कर लाने में, आखिरकार उसकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे तुम्हारी हालात सुधरती गई और आज हम यहाँ हैं।

जानते हो उसका असली नाम क्या है?

मैंने प्रश्नभरी निगाहों से विवेक की तरफ देखा और पूछा "उसका असली नाम क्या है?", विवेक ने एक नजर सभी दोस्तों को देखा जो इस समय उस प्राइवेट वार्ड में थे फिर बोला "डंकिनी!" .........

......... मैं तो जैसे चार फुट ऊपर उछल गया "क्या !!!!........ ये नहीं हो सकता!! ........ उसका नाम डंकिनी नहीं हो सकता!", " उसका नाम डंकिनी ही है नरेंद्र ........" विवेक बीच में ही बोला। "पर ये कैसे हो सकता है? ........ तुमने उसे ठीक माथे पर गोली मारी थी फिर वो बच कैसे सकती है? ........" मेरी हैरानी बढ़ती जा रही थी।

" ........मेरे ख्याल से इसका जवाब तुम्हे डंकिनी बेहतर दे सकती है ........ डंकिनी! ........" दरवाजा खुला और डंकिनी अंदर आई ........ उसे देखते ही मेरी आँखों में नफरत का तूफ़ान उमड़ने लगा, इससे पहले मैं उसकी गर्दन तक पहुचता मेरे दोस्तों ने मुझे उठने से रोका "पहले इसकी बात तो सुनलो नरेंद्र! ........ वरना बाद में तुम पछताओगे!" विवेक ने मुझे रोकते हुए कहा। "इससे ज्यादा पछताने के लिए कुछ नहीं बचा है ........ इसने गौरी को तो मार ही डाला था ........ कोई भी औरत किसी लड़की के साथ वो नहीं करेगी जो इसने किया ........ इसने भैरव को गौरी की इज्जत लूटने के लिए छोड़ दिया ........ और अगर मैं सही वक्त पर नहीं आता तो वो राक्षस गौरी के बदन को नोच खाता!" मेरी आँखों में खून उतर रहा था और ये देख विवेक ने डंकिनी को बाहर जाने का इशारा किया और वो रोती हुई बाहर चली गई।

"मैं तुझे मार दूंगा!! ........ तू दुनियाँ के किसी भी कोने में छुप जाए पर मैं तुझे ढूंढकर मार डालूंगा!! ........ " मैं अभी भी बड़बड़ा रहा था।

" क्या हो गया है तुम्हें? ........ इसी लड़की की वजह से तुम्हारी जान बची है और तुम इसे ही मारना चाहते हो! ........ " विवेक झल्लाते हुए बोला, "बचाना नहीं मारना चाहती थी ये मुझे ........ और कोई कसर छोड़ी भी नहीं थी ........ क्या तुम भूल गये? ........ तुमने ही तो इसे गोली मारी थी!" मैं गुस्से से पागल हो रहा था। "मेरी बात सुनो! ........ जो तुम देख रहे थे ........ वो सही नहीं था और ये समझने के लिए की क्या हुआ था तुम्हे ठन्डे दिमाग से काम लेना होगा ........ एक बार उसे अपनी बात कहने का मौका तो दो!" विवेक मुझे समझाने की कोशिश कर रहा था, आखिरकार मैं उसकी बात सुनने को तैयार हुआ लेकिन मैंने लोडेड रिवाल्वर अपने पास रखी थी की चाहे जो हो जाए ........ अगर ये झूठ बोल रही है तो इसे वही गोली मार दूंगा चाहे जो अंजाम हो।

थोड़ी देर बाद डंकिनी कमरे के अंदर आई और मैंने रिवाल्वर निकाल कर उसे दिखाते हुए टेबल पर रखा और बोला "मैं नहीं जानता की तुमने दोस्तों को क्या पट्टी पढाई है पर अगर तुम्हारा एक शब्द भी गलत निकला ........ तो मैं तुम्हे शूट करने में जरा भी देर नहीं करूँगा" मेरे चेहरे पर सख्त रुख देखकर वो सहम गई और उसकी आँखों में आँसु आ गए। विवेक मुझे रोकने के लिए उठा लेकिन डंकिनी ने उसे रोक दिया फिर बोली "मुझे मार दीजिये! ........ मैं इसी के लायक हुँ," "फ़ालतू के बकवास बंद करो और काम की बात करो! ........ तुम बेगुनाह हो तो साबित करो या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ!", "नरेंद्र!! ........ " विवेक गुस्से से बोला लेकिन मैंने बन्दूक का रुख उसकी तरफ करते हुए कहा "वहीँ बैठे रहो विवेक! ........ मुझे मजबूर मत करो की मैं सब भूलकर तुम्हे गोली मारने पर मजबूर हो जाऊं, ........ ये लड़की तुम्हे बेवकूफ बना रही है ........ मैं साँप पर भरोसा कर सकता हूँ पर इस पर नहीं!"

"नरेंद्र! एक बार इसकी बात सुनलो! .......... प्लीज!" विवेक ने मेरी आँखों में देखकर कहा। मैंने गन नीचे रखी और बोला "कहो जो कहना है पर उम्मीद मत करना की मैं तुम्हारी बात का विश्वास कर लूंगा!"

डंकिनी ने हामी भरी और बोली।

"ये सच है की मैंने ही गौरी को मारने की कोशिश की, ....... यह भी सच है कि गौरी के पीछे जो तीन लोग पड़े थे वो मेरे ही आदमी थे पर तुमने जो देखा वह पूरा सत्य नहीं था ....... असल में 'मौत के हाइवे' का अभिशाप मैं नहीं बल्कि गौरी ही थी। गौरी के पिता एक पुजारी थे और गौरी एक बहुत ही अच्छी लड़की थी, गाँव के लड़के पीछे पड़े रहते थे उसे देखने के लिए। २७ दिसंबर की वो सर्द रात थी जब उसके पिता को तेज ज्वर था, वह बेचारी वैद्यजी के पास दावा लेने गई थी। दवा लेकर घर आते-आते उसे काफी देर हो गई थी इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से गौरी ने हाइवे वाला रास्ता पकड़ा जो कभी सुनसान नहीं रहता था पर आज ना जाने उसे हाइवे पर डर लग रहा था। दिन-रात चलने वाला हाइवे आज पूरा सुनसान था ....... ऐसा लग रहा था की चाँद भी डरकर अपना मुँह बार-बार बादलों में छुपा लेता था। वह बेचारी डरी सहमी चली जा रही थी की तभी एक गाडी आई और उसमे बैठे पांच लोग बैठे थे, गाडी गौरी के पास रुकी और उनमे से एक ने गौरी से पूछा "एक्सक्यूज़ मी! ....... क्या आप बता सकतीं है की नोयडा जाने का ये सही रास्ता है की नहीं?", गौरी ने उसे देखा और कहा "हाँ साहब! ये सही रास्ता है ....... आप सीधा चले जाइये और आपको आपकी मंजिल मिल जायेगी"।

 


"मंजिल तो हमारी मिल गई ....... " तभी अंदर से कोई बोला तो गौरी बोली "कुछ कहा साहब आपने?", "नहीं! ....... कुछ नहीं! ....... धन्यवाद" ड्रायवर ने ये बोलकर गाडी आगे बढा दी।

काली रात मैं उमड़ते बादल और उनसे झांकता चाँद, इस रात को और भी डरावना बना रहे थे .......... मानो कह रहे हों कि कुछ तो बुरा होने वाला है आज और उनकी ये चेतावनी गलत नहीं थी। लगभग एक किलोमीटर आगे जाने पर गौरी को वही गाड़ी दिखाई दी जो खड़ी थी मानो किसी का इन्तजार कर रही हो। "अरे साहब! आप अभी तक यहीं रुके हैं, फिर रास्ता भटक गए हैं क्या?" ड्राइवर बोला "हाँ गौरीजी, अब पता नहीं किधर जाएँ, ........ हम यहाँ पहली बार आए हैं"। गौरी हँसी और बोली "कोई बात नहीं साहब, आप यहाँ से सीधे चले जाइये और कहीं मुड़ना मत तो आप सीधा वहीँ पहुँचेंगे जहाँ आप जाना चाहते हैं"। "आपका बहुत शुक्रिया, अगर आप बुरा ना मानें तो क्या आप हमारे साथ कुछ दूर तक चल सकती हैं? ...... हम भटकने से बच जाएंगे, हमारे दोस्त की बेटी का जन्मदिन है आज" उनमे से एक आदमी बोला "मेरा नाम विवेक है!"। पाँच अजनबियों के साथ जाने में गौरी हिचक रही थी इसलिए उसने बहन बनाते हुए बोली " आप चले जाइये साहब मेरे बापू की तबियत खराब है और मुझे ये दवाई लेकर घर जाना है"।

तभी उनमे से एक बोला "मैं खुद एक डॉक्टर हूँ अगर तुम कहो तो मैं तुम्हारे बापू का इलाज कर सकता हूँ। ...... आखिर तुमने हमारी मदद की है", गौरी अभी भी हिचक रही थी "नहीं साहब! ........ आप क्यों हमारे लिए अपना वक्त खराब करते हो, ........मैं ये वैद्यजी से काढ़ा ले आई हूँ और बापू इससे ठीक हो जाएंगे"।

"तुम भी क्या बात करती हो, ..... अगर तुम्हारे बापू इससे ठीक नहीं हुए तो उनकी जान भी जा सकती है, ....... तुम्हारा घर कहाँ है हम वहाँ तक तुम्हे छोड़ देंगे और तुम्हारे बापू का इलाज भी कर देंगे" उसकी बात सुन गौरी सोच में पड़ गई, तभी बादल गरजे और जोरदार बारिश होने लगी। तभी उनमे से एक जिसका नाम विवेक था वो बोला "जल्दी करो! ..... बारिश भी होने वाली है, अगर देर हो गई तो तुम्हारे बापू की जिंदगी खतरे में आ जायेगी!", गौरी उनकी गाड़ी में बैठ गई और यही उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल हो गई।

"हैलो! हम पेशे से इंजीनियर हैं और ये मेरे दोस्त हैं, एक-एक कर उसने सबसे परिचय करवाया फिर बोला "तुम्हारा घर कहाँ है? ....", "जी वहां पहाड़ी के पास एक गाँव है बस वहीँ पर मेरा घर है" गौरी ने मासूमियत से कहा। गाडी में बैठने से पहले बारिश शुरू हो गई थी इसलिए गौरी का बदन भीग गया था इसलिए ड्राइवर के बगल वाली सीट में हवा बहुत लग रही थी जिससे उसे ठण्ड लग रही थी, ये देखकर वो बोला " लगता है आप काफी भीग गई हैं, ........ आप यहाँ आ जाइये नहीं आप खुद बीमार पड़ जाएंगी"। गौरी अब पीछे वाली सीट में बैठ गई और एक आगे बैठ गया। पीछे अब गौरी के साथ तीन लोग बैठे थे, कुछ देर तो सब ठीक रहा पर थोड़ी देर बाद उसने महसूस किया की ड्राइवर के बगल में बैठा आदमी उसे मिरर से घूर-घूर के देख रहा था। इससे वो थोड़ी असहज हो गई तो उनका लीडर था वो बोला "आप इधर आ जाइये" ..... गौरी जॉन के बगल में बैठ गई"।

गौरी के सामने बैठे आदमीं की नज़रें उसके उभारों का साइज नाप रही थी, उनके लीड़र की नजर अब गौरी के बदन पर घूमने लगी, बारिश ने उसका पूरा बदन भिगा दिया था जिससे उसके कपडों से उसके अंग झलकने लगे। धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि सभी की आँखें उसके कपडों के अंदर झाँक रही थी।

असहज होते हुए वह बोली “साहब, बस मुझे यहीं उतार दीजिये …….. मुझे अच्छा नहीं लग रहा है” तभी उनमें से एक बोला “मैं डाक्टर हुँ…… लाओ तुम्हारा चेकअप कर देता हुँ” इतना कहते हुए उसने स्टेथेस्कोप निकालकर गौरी के सीने पर रखते हुए बोला “कहाँ दिक्कत हो रही है बताना …” और इतना कहते हुए गौरी के मना करते-करतेे उसने स्टेथेस्कोप सीधा बाए स्तन पर रखकर दबाते हुए बोला “कुछ हो रहा है या नहीं! ……..”। “मुझे जाने दीजिये ……..मैं पैदल ही घर चली जाऊँगी!” गौरी ने घबराते हुए कहा, ”अरे चेकअप अभी पूरा नहीं हुआ है, …...…अभी तो चेकअप शुरू हुआ है, ……..यारों मुझे समस्या की जड़ मिल गई ………. समस्या इनके गीले चोली में है, ……….. चोली उतारनी पड़ेगी” इतना कहते ही गाड़ी के पीछे बैठे उन तीनों ने गौरी को पर लिया “...... अरे! चोली उतारने में हम तुम्हारी मदद करते हैं “ इसी के साथ वो तीनों के हाथ गौरी के बदन पर फिसलने लगे, वह बेचारी बार-बार मिन्नतें कर रही थी लेकिन उन पर उसका बातों का कोई असर नहीं हो रहा था और वो बेदर्दी से उसके अंगों को मसलने लगे।

“अरे क्या अकेले ही मजे लोगे इसके? ……..” ड्रायवर के बगल में बैठा वो शख्स बोला, “अरे नहीं ! ….. तुम भी आ जाओ ……… साथ में मिलकर सुहागरात मनाते हैं” उनका लीड़र गौरी के बाँए स्तन को जोर से मसलते हुआ बोला। “भगवान के लिये मुझे जाने दीजिये …….. मेरे बापू बीमार हैं ………. वो मर जाएँगें!” गौरी रोते हुए बोली। “यार! ….. ये गाँव वाले अपनी लड़कियों को क्या खिलाते हैं ………. चोली तो देख इसकी …..…. साली जवानी आ नहीं रही है चोली में …….. चलो चोली फाड़ देते हैं”।

गौरी बड़े संकट में थी, उसके पिता के साथ-साथ उसकी इज्जत भी खतरे में थी। अचानक उन सबने गौरी को छोड़ दिया, इससे पहले वह कुछ समझपाती, उनका लीड़र बोला “जाओ छोड़ दिया! …….”, “अबे ये क्या कर रहा है? …….. अभी तो हमने कुछ किया ही नहीं!” बाकी ने विरोध जताया पर लीड़र बोला “जाओ…….. चली जाओ………. पर अगर तुम वापस नहीं आई तो हम आएँगे और तुम्हारे पिता के सामने तुम्हारा बलात्कार करेंगे”। गौरी बुरी तरह फँस चुकी थी और बीमार पिता की जान बचाने का अब एक ही रास्ता था कि वो इन शैतानों की बात मान ले, उसने हाँ मे सिर हिलाया और गाड़ी से निकलनें लगी कि तभी दूसरे आदमी ने उसे रोका “चली जाना ………. पर चोली के नीचे क्या है ये तो हमने देख लिया पर ………..” जरा रुककर उसने सबकी तरफ़ देखकर मुस्कुराया और बोला “ ………… इस घाघरे के नीचे क्या है वो अभी तक पता नहीं चला ………..”, “……...पता चल जाएगा यारों! ……….. ये खुद अपना घाघरा उतारकर हमें दिखाएगी” लीड़र हँसते हुए बोला।

“मैं विनती करती हुँ, ……… मुझे जाने दीजिये” वह बेचारी लगातार उन्हें छोड़ देने की गुहार लगा रही थी कि तभी लीड़र बोला “एे लड़की! ……… या तो अपनी घाघरा उतारकर अपनी माँसल जाँघे दिखा ………. या हम तेरा घाघरा उतारेंगे और तू बिना घाघरे के अपनें बाप के पास जाएगी”। वो बेचारी मजबूर थी …….गौरी के हाथ घाघरे की तरफ़ बढ़े और घाघरा सर्र से सरक कर नीचे गिर पा, उस भयानक काली रात में एक कुँवारी लड़की पाँच अजनबियों के सामने अपनी नंगी जाँघें लिये खड़ी थी, ………. ना जाने किस पल वो दरिंदे उस नाजुक कली पर टूट पड़ेंगे। पाँचो राक्षसों की आँखों में वासना के डोरे तैरने लगे।

सुनसान हाइवे की उस काली रात में कोई दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता था। आंधी और तेज बारिश की वजह से एक मीटर से ज्यादा कुछ दिखाई नहीं देता था, बीच-बीच में कड़कती बिजली की वजह से पूरा जंगल काँप जाता था। सभी जीव-जंतु भी डर से अपने बिलों में घुसे हुए थे, दिसम्बर की उस सर्द रात में बेमौसम बरसात और घुप्प अँधेरे की वजह से जंगल और भी डरावना हो गया था। इसी अँधेरे के बीच कोई बेतहाशा बाग़ रहा था, ...... उसे रास्ते के पत्थरों के टकराने से लगी चोंटों की कोई परवाह नहीं थी, ....... वह तो बस भाग जाना चाहता हो उस जंगल से, ...... उस भयानक रात से और हो सके तो उन हैवानो से जो उसकी इज्जत लूटना चाहते थे।

गौरी की साँस धौकनीं की तरह चल रही थी, ना जाने कितनी देर से भाग रही थे वो और अब उसके पैर जवाब देने लगे थे, ..... पीछे वो पाँचो शैतान शिकारी कुत्तों की तरह उसके पीछे पड़े हुए थे और गौरी किसी हिरनी की तरह अपना अस्तित्व बचाने में लगी थी। पर वो शिकारी कुत्ते पाँच थे और वो एक अकेली, यह उनका पहला शिकार नहीं था ... इससे पहले भी लोग ना जाने कितनी लड़कियों का शिकार कर चुके थे और आज गौरी की बारी थी। गौरी भागते हुए एक गुफा के पास जाकर चुप गई, थोड़ी ही देर में वो पाँचो वहाँ आ गए।

"कहाँ गई वो छमियाँ! ......" उनमे से एक बोला, गौरी एक चट्टान के पीछे छुपी हुई थी । "यहीं कही होगी वो .... कहाँ बचकर जायेगी हमसे ......” दूसरा आदमी बोला। तूफ़ान के साथ घनघोर बारिश की वजह से काफी ढूँढने के बाद भी चट्टान के पीछे छुपी गौरी उन्हें दिखाई नहीं दी तभी उनमे से एक बोला "लगता है चिड़िया निकल गई हाथ से। .......", "ये सब इसकी गलती है!....... अगर ये लड़की को नहीं छोड़ता तो वो हाथ से ना निकलती" दूसरे ने लीडर की तरफ देखकर कहा। "छोड़ न यार! ऐसी लड़कियां और भी मिलेगी, चलो यहाँ से चलते हैं । ..... साल सारा मजा किरकिरा हो गया!" लीडर बोला और वो सब वापस जाने को हुए की तभी जोर से बिजली कड़की और गौरी की सिसकारी निकल गई जो लीडर ने सुन ली।

 
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