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मौत का हाइवे
रात के ११ बजे हम लोगो की गाड़ी हवा से बाते करती हुई हाइवे पर सरपट दौड़ी जा रही थी। राजू गाड़ी चला रहा था और मैं, विवेक, सुनील, नितिन और दीपक पीछे बैठे बातों में मशगूल थे। पिछले मंगलवार को यह पता चला की हमारे बचपन के यार की शादी नोएड़ा में तय हो गई है। बस फिर कया था, आनन फ़ानन में सफ़र की योज़ना बनी और छह घंटो में हम फ़तेहपुर से ४०० किलोमीटर आगे निकल आए।
बाते की दौर चल ही रहा था कि बीयर की बोतलें खुल गई। आदत से मजबूर सुनील ने मुझे अॉफ़र की पर मैने मना कर दिया।
'पीलो यार, पूरे दल में तुम ही एक हो जो नही पीते हो!' विवेक ने नशे में मुझसे कहा।
'अच्छे सफ़र के लिये हम में से किसी एक की होश में रहना जरूरी है' मैंने कहा।
'ये हुई ना बात!' नितिन ने हँसते हुए कहा 'तुम संत जो ठहरे'.
'इसमें संत वाली क्या बात हुई' मैने तल्ख लहजे में कहा।
'नाराज़ क्यों होते हो यार' विवेक बीच बचाव करते हुए बोला 'जानते हो हम इस समय कहाँ हैं?'
'कहाँ?' सबकी नज़र विवेक पर आ टिकी। विवेक ने एक नज़र सबको देखा और बोला 'हम इस समय दिल्ली-नोएड़ा हाईवे पर हैं, देश की सबसे भूतही जगह'
यह सुनते ही गाड़ी में अज़ीब सा सन्नाटा छा गया। इसी खामोशी में सिर्फ़ गाड़ी के इंजन की आवाज आ रही थी। बाहर घुप्प अंधेरे के बीच चाँद बादलों के बीच झाँक लेता था।
"'तुम भी कहाँ की बात लेकर बैठ गए, 'ये भूत-प्रेत दिमाग में होता है सच में नहीं" लगभग डेढ घंटे बाद नितिन चुप्पी तोड़ी।
"हाँ यही तो में भी बोल रहा था" सुनील ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा। "तुम कब बोल रहे थे सुनील?" विवेक ने मजाकिया अंदाज में कहा। "अरे तो अब बोल रहा हूँ भई" सुनील ने भी उसी अंदाज में कहा।
रात के डेढ बज़े हैं और चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ है, बीच-बीच में जो चाँद बादलों से झाँक लेता था अब वो भी खतम हो गया। अंधेरा इतना था कि गाड़ी की तेज़ लाईट के बावजूद ५० मीटर से ड्यादा नहीं दिखता था।
हमसब अपनी बातों में इतना मसरूफ़ हो गए कि हमें पता ही नहीं चला कि कब ढाई बज गए और हम दिल्ली-नोएड़ा मेन हाइवे पर ८० किलोमीटर की रफ़्तार से बढ़े जा रहे थे कि राजू ड्रायवर ने अचानक ब्रेक मारा और गाड़ी जोर से आवाज करते हुए रुक गई।
गाड़ी के अंदर हम सब उलट-पुलट हो गए कि तभी नितिन ने गाली देते हुए राजू से गाड़ी रोकने की वजह पूछी।
"राजू, पागल हो गया है क्या? गाड़ी क्यों रोक दी?" विवेक ने झल्लाते हुए कहा पर राजू कुछ नहीं बोला।
"अरे बोलता क्यों नहीं, भाँग खाए है क्या?" नितिन चिढकर बोला। राजू अभी भी सामने देख रहा था। उसकी शक्ल बता रही थी की वह बहुत डरा हुआ था।
मैंने खुद को शांत रखकर राजू के कंधे पर हाथ रखा और पूछा "राजू, तुम डरो मत हम सब तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे"। उसकी नज़रें अभी भी सामने ही घूर रही थी।
आखिरकार १५ मिनट बाद राजू सामने बोला "वो ....आ गई है, .............वो वापस आ गई है"।
आखिरकार १५ मिनट बाद राजू सामन देखकर बोला "वो ....आ गई है, .............वो वापस आ गई है"। "कौन आ गई है?" नितिन ने बेचैन होते हुए पूछा लेकिन राजू ड्रायवर कुछ बोलने से पहले ही बेहोश हो गया।"
अब समस्या बड़ी विकट हो गई, राजू हमारा ड्रायवर ही नहीं बल्कि गाइड भी था। वह यहाँ के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ था और हम इस इलाके से अनजान थे। विवेक और नितिन ड्रायवर को होश में लानें की कोशिश करने लगे, सुनील तो पहले ही डरपोक किस्म का था और इस दुर्घटना ने उसके हाँथ-पैर फुला दिये। जनाब के मुँह से लगातार हनुमान चालीसा का पाठ निकल रहा था।
'......वो वापस आ गई है' 'ये शब्द मेरी खोपड़ी में धाड़-धाड़ कर गूंज रहे थे। कौन आ गई है जिससे राजू इतना डरा हुआ था? बहरहाल यहाँ अधिक देर तक रुकना मुनासिब ना था इसलिए ड्रायवर को गाड़ी के पीछे लेटाया गया। विवेक ने स्टियरिंग संभाल लिया और जैसे ही गाड़ी स्टार्ट करने को हुआ, '''...... धाँ.. य!... सन्नाटे को चीरती हुई एक जोरदार आवाज ने हमारा ध्यान खींच लिया।
ये बंदूक की आवाज थी और लुटेरों के ख़तरे को भाँपकर नितिन बोला "जल्दी कर विवेक, शायद लुटेरें आस-पास ही हों"। "मैं जानता हूँ पर ये गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही है, धक्का लगाना पड़ेगा" विवेक झुँझलाकर बोला।
"मैं गाड़ी से बाहर नहीं जाउगा, तुम लोग ही धक्का लगाओ" सुनील घबराते हुए बोला। मैंने कहा "ठीक है मैं धक्का लगाता हुँ, विवेक मेरी मदद करो"। विवेक ने नितिन को रिवाल्वर देते हुए कहा "चारों कर नज़र रख़ना और ख़तरा दिखे तो गोली चलानें में हिचकना मत"।
नितिन रिवाल्वर संभाल कर खड़ा हो गया, अबतक दीपक जो पीकर टल्ली था वो भी उठ गया था और उसने स्टियरिंग संभाल लिया। गाड़ी स्टार्ट होते ही सबने राहत की साँस ली और थोड़ी देर में ही हमारी गाड़ी हाइवे पर दौड़ रही थी। विवेक और दीपक के चुटकुलों ने माहौल को हल्का कर दिया, ख़तरा शायद टल गया था ........... या शायद नहीं।
रात के ११ बजे हम लोगो की गाड़ी हवा से बाते करती हुई हाइवे पर सरपट दौड़ी जा रही थी। राजू गाड़ी चला रहा था और मैं, विवेक, सुनील, नितिन और दीपक पीछे बैठे बातों में मशगूल थे। पिछले मंगलवार को यह पता चला की हमारे बचपन के यार की शादी नोएड़ा में तय हो गई है। बस फिर कया था, आनन फ़ानन में सफ़र की योज़ना बनी और छह घंटो में हम फ़तेहपुर से ४०० किलोमीटर आगे निकल आए।
बाते की दौर चल ही रहा था कि बीयर की बोतलें खुल गई। आदत से मजबूर सुनील ने मुझे अॉफ़र की पर मैने मना कर दिया।
'पीलो यार, पूरे दल में तुम ही एक हो जो नही पीते हो!' विवेक ने नशे में मुझसे कहा।
'अच्छे सफ़र के लिये हम में से किसी एक की होश में रहना जरूरी है' मैंने कहा।
'ये हुई ना बात!' नितिन ने हँसते हुए कहा 'तुम संत जो ठहरे'.
'इसमें संत वाली क्या बात हुई' मैने तल्ख लहजे में कहा।
'नाराज़ क्यों होते हो यार' विवेक बीच बचाव करते हुए बोला 'जानते हो हम इस समय कहाँ हैं?'
'कहाँ?' सबकी नज़र विवेक पर आ टिकी। विवेक ने एक नज़र सबको देखा और बोला 'हम इस समय दिल्ली-नोएड़ा हाईवे पर हैं, देश की सबसे भूतही जगह'
यह सुनते ही गाड़ी में अज़ीब सा सन्नाटा छा गया। इसी खामोशी में सिर्फ़ गाड़ी के इंजन की आवाज आ रही थी। बाहर घुप्प अंधेरे के बीच चाँद बादलों के बीच झाँक लेता था।
"'तुम भी कहाँ की बात लेकर बैठ गए, 'ये भूत-प्रेत दिमाग में होता है सच में नहीं" लगभग डेढ घंटे बाद नितिन चुप्पी तोड़ी।
"हाँ यही तो में भी बोल रहा था" सुनील ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा। "तुम कब बोल रहे थे सुनील?" विवेक ने मजाकिया अंदाज में कहा। "अरे तो अब बोल रहा हूँ भई" सुनील ने भी उसी अंदाज में कहा।
रात के डेढ बज़े हैं और चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ है, बीच-बीच में जो चाँद बादलों से झाँक लेता था अब वो भी खतम हो गया। अंधेरा इतना था कि गाड़ी की तेज़ लाईट के बावजूद ५० मीटर से ड्यादा नहीं दिखता था।
हमसब अपनी बातों में इतना मसरूफ़ हो गए कि हमें पता ही नहीं चला कि कब ढाई बज गए और हम दिल्ली-नोएड़ा मेन हाइवे पर ८० किलोमीटर की रफ़्तार से बढ़े जा रहे थे कि राजू ड्रायवर ने अचानक ब्रेक मारा और गाड़ी जोर से आवाज करते हुए रुक गई।
गाड़ी के अंदर हम सब उलट-पुलट हो गए कि तभी नितिन ने गाली देते हुए राजू से गाड़ी रोकने की वजह पूछी।
"राजू, पागल हो गया है क्या? गाड़ी क्यों रोक दी?" विवेक ने झल्लाते हुए कहा पर राजू कुछ नहीं बोला।
"अरे बोलता क्यों नहीं, भाँग खाए है क्या?" नितिन चिढकर बोला। राजू अभी भी सामने देख रहा था। उसकी शक्ल बता रही थी की वह बहुत डरा हुआ था।
मैंने खुद को शांत रखकर राजू के कंधे पर हाथ रखा और पूछा "राजू, तुम डरो मत हम सब तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे"। उसकी नज़रें अभी भी सामने ही घूर रही थी।
आखिरकार १५ मिनट बाद राजू सामने बोला "वो ....आ गई है, .............वो वापस आ गई है"।
आखिरकार १५ मिनट बाद राजू सामन देखकर बोला "वो ....आ गई है, .............वो वापस आ गई है"। "कौन आ गई है?" नितिन ने बेचैन होते हुए पूछा लेकिन राजू ड्रायवर कुछ बोलने से पहले ही बेहोश हो गया।"
अब समस्या बड़ी विकट हो गई, राजू हमारा ड्रायवर ही नहीं बल्कि गाइड भी था। वह यहाँ के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ था और हम इस इलाके से अनजान थे। विवेक और नितिन ड्रायवर को होश में लानें की कोशिश करने लगे, सुनील तो पहले ही डरपोक किस्म का था और इस दुर्घटना ने उसके हाँथ-पैर फुला दिये। जनाब के मुँह से लगातार हनुमान चालीसा का पाठ निकल रहा था।
'......वो वापस आ गई है' 'ये शब्द मेरी खोपड़ी में धाड़-धाड़ कर गूंज रहे थे। कौन आ गई है जिससे राजू इतना डरा हुआ था? बहरहाल यहाँ अधिक देर तक रुकना मुनासिब ना था इसलिए ड्रायवर को गाड़ी के पीछे लेटाया गया। विवेक ने स्टियरिंग संभाल लिया और जैसे ही गाड़ी स्टार्ट करने को हुआ, '''...... धाँ.. य!... सन्नाटे को चीरती हुई एक जोरदार आवाज ने हमारा ध्यान खींच लिया।
ये बंदूक की आवाज थी और लुटेरों के ख़तरे को भाँपकर नितिन बोला "जल्दी कर विवेक, शायद लुटेरें आस-पास ही हों"। "मैं जानता हूँ पर ये गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही है, धक्का लगाना पड़ेगा" विवेक झुँझलाकर बोला।
"मैं गाड़ी से बाहर नहीं जाउगा, तुम लोग ही धक्का लगाओ" सुनील घबराते हुए बोला। मैंने कहा "ठीक है मैं धक्का लगाता हुँ, विवेक मेरी मदद करो"। विवेक ने नितिन को रिवाल्वर देते हुए कहा "चारों कर नज़र रख़ना और ख़तरा दिखे तो गोली चलानें में हिचकना मत"।
नितिन रिवाल्वर संभाल कर खड़ा हो गया, अबतक दीपक जो पीकर टल्ली था वो भी उठ गया था और उसने स्टियरिंग संभाल लिया। गाड़ी स्टार्ट होते ही सबने राहत की साँस ली और थोड़ी देर में ही हमारी गाड़ी हाइवे पर दौड़ रही थी। विवेक और दीपक के चुटकुलों ने माहौल को हल्का कर दिया, ख़तरा शायद टल गया था ........... या शायद नहीं।