अरुण खेड़ा ने चौककर हेगडे क्रो देखा ।
"यानी कि तुम दिवाकर की बात से सहमत हो?"
"नहीं हूं तब भी होना पडेगा l” सूरज हेगडे ने व्याकुलता से कहा -" पैसे के बिना जो हम जिन्दगी जी रहे हैं, वह जिन्दगी नहीं है l जरा जरा से नशे कै लिए, उन्हें खरीदने के लिए हमेँ एक-दूसरे का मुंह देखना पड़ता हैं कि पैसा कहां से आए । लानत है ऐसी जिन्दगी पर । कब तक चलेगा ऐसा । पैसे का जुगाड तो आखिर कहीँ से करना ही होगा !"
“बैंक डकैती का मतंलब समझते हो?” राजीव ने गम्भीर स्वर में पूछा ।
"सब समझता हूं। तुमसे अच्छी तरह समझता हूँ।” हेगडे ने तीखे स्वर मेँ कहा-"लेकिन मेरे दोस्त, तुम नशे करने का मतलब नहीं समझते कि जब नशे की जरूरत पड़े और पैसे ना हौं तो क्या हाल होता है, हम लोगों की जान निकलने लगती है । चुटकी भर स्मैक कै लिए हम हर किसी कै भी पांव धोकर पीने को तैयार हो जाते हैँ । लानत है ऐसी जलालतभरी जिन्दगी पर I और फिर यह दो एक दिन की बात तो हे नहीं, हमेशा का ही मामला है I कब तक चलेगा? जब भी नशा मिलंने का सिलसिला रूका, हमारी जानों का सिलसिला भी रुक जाएर्गों I इन सब बातो से तो बेहतर हे कि हम एक ही बार में किस्मत आजमा लें ।”
अरुण खेडा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी ।
राजीव ने चिन्ता भरी दृष्टि तीनों पर डाली ।
"तुम-तीनों बड़े-वड़े खानदानों से सम्बन्ध रखते हो I आधा शहर तुम लोगों के खानदानों के नाम से जानता है । सिर्फ इतना सोचो कि बेक-डकैती कै दरम्यान अगर तुममें से कोई पकड़ा गया तो क्या होगा? बदनामी का बहुत वड़ा धब्बा पकड़े जाने वाले खानदान पर हमेशा के लिए लग जाएगा । जरा इस तरफ भी ध्यान दे लो l”
"ठीक कहते हो तुम I" दिवाकर ने मुंह खोला…"पक्रड़े जाने पर हमारे खानदानों पर बदनामी का धब्बा लग सकता हे I इस बारे में मैं सोच चुका हूँ। लेकिन हमारे पास कोई और चारा भी तो नहीं । अपने नशे की लत क्रो कहां से पूरा करे??? धर वालों ने तो खोटा पैसा भी हमें देना बंद कर रखा हैं । वैसे हमारो कोशिश होगी कि पकडे न जायें । मेरी एक खास पहचाना वाला हैं, जो उधार के तौर पर हमें रिवॉल्वर दे सकता है । बैंक-डकैती में हम रिबॉंल्वरों का इस्तेमाल कर सकते हैं I महज डराने की खातिर, किसी की जान नहीँ लेनी है हमेँ । वैसे भी रिबॉंल्वरों कै सामने किसकी हिम्मत पडेगी जों आवाज़ उठाएगा ।"
हेगडे दिवाकर की बात से सहमत था, परन्तु अरुण खेड़ा कुछ हिचकिचा रहा था I
हिचकिचाहट का कारण था कि अगर पकडे गए तो किसी क्रो मुंह दिखाने कै काबिल न रहेंगे । तब ना तो घर वाले साथ देंगे औऱ ना ही समाज वाले ।
एकाएक अरुख खेडा ने राजीव मल्होत्रा को देखा I
“तुम्हारा इस बारे में क्या बिचार है?”
"मेरा ?" राजीव ने जहान-भर की हैरानी से उसे देखा ।
“हां, मैं तुमसे ही पूछ रहा हू। अगर हम बैंक-डकैती करते हैं तो तुम भी उसमें शामिल होऔगे । आखिर तुम्हें भी तो पैसे की जरूरत है । नहीं तौ शादी कैसे करोगे?”
“पागल हो गए हो क्या ।" खेडा की बात सुनकर राजीव सकपकाकर बोला-“शादी करने के लिए मुझे पैसे चाहियें तो क्या उसके लिए में वैक-डकैती करूगा? मेरा दिमाग ठीक है अभी । तुम अपने नशे को पूरा करने के लिए जो भी करो । मुझे इस खतरनाक मामले मेँ मत धसीटो l"
."यह वास्तव में पागल हो गया है l” दिवाकर ने व्यग्यभरे स्वर में कहा-"शादी करना चाहता है । कोई अच्छी सी नौकरी करके. और साथ में चाहता हे कि शादी कै बाद पैसे की किसी प्रकार की दिक्कत ना आए । देखना ना तो यह शादी कर पाएगा और ना ही इसे कहीँ से अच्छा पैसा हासिल होगा l ऊपर वाले ने जो लडकी इसकी झोली मेँ डाली हे, वह किसी . ओर की झोली मेँ चली जाएगी।"
"दिवा.....कर ....!”
"चीखने की क्या जरूरत है l" सूरज हेगड़े कह उठा… "दिवाकर ठीक ही तो कह रहा हे । ऐसे मोके बारम्बार नही मिलते । फिर तुम्हें तो दो खूबसूरत मौके मिल रहे हैँ । शादी करने का मौका । लडकी तुम्हारे पास है ही l दूसरा, हमारे साथ दौलत हासिल करने का मौका l"
"बैंक डकैती करके?"
"हां I"
"हम लोग मच्छर मारने कै भी काबिल नहीँ हैं और बैंक डकैती करने की सोच रहे हो । नहीँ भी मरना तो भी मरेंगे। पहले खुद को अच्छी तरह ठोकबजा कर देख तो लो कि तुम लोग किस काबिल हो । डकैती करना तुम लोगों के बस का रोग है भी?" राजीव तीखे स्वर में बोला ।
"कोशिश करने में क्या हर्ज है ।" दिवाकर खुलकर मुस्कराया-“आवश्यकता ही आविष्कार की जननी हे i हमारे साथ ही तुमने स्कूल-कॉंलेज में पढा था I अब हमेँ पैसे की_आवश्यकता हे तो इसी कारण हमने बैंक को लूटने की सोची है l कहने को बैक डकैती अवश्य हे, परन्तु वास्तव मे' बहुत हल्का सा काम हे । मामूली सी बेंक ब्रांच हे । चंद लोगों का स्टाफ है और वीरान जगह पर स्थित हैं , बेंका ग्राहक भी वहाँ इक्का दुक्का ही जाते हैं । खतरे वाली कोई बात नहीं ।"
"कहने की बाते है । जब यह काम करने जाओगे, तव पता चलेगा कि.... “
“राजीव !" सूरज हेगड़े बोला…"हम चारों दोस्तों को , अपनी जरूरतें पूरी करने कै लिए पैसे की सख्त जरूरत है। हमने तो पूरा -पूरा विचार बना रखा हे कि तुम्हें भी इस काम में शामिल करना हे ताकि अपने शादी जैसे ख्वाब को पूरा कर सको और शादी कै बाद तुम्हें किसी `भी चीज की कमी न रहे शादी का मजा तो तब ही हे ! आगे तुम्हारी मर्जी । दोस्ती का फर्ज चाहे जैसे भी हो । हम पूरा कर रहे हैँ। कल का दिन हमारे पास है। परसों हमने बेक लूटने का विचार बनाया हे । अगर हमारे साथ मिलकर इस काम में हाथ डालने की इच्छा हों तो कल सुबह आ जाना । नहीं तो तुम्हारी मर्जी। जोर देकर तो हम तुम्हें अपने साथ मिला नहीं सकते और न ही मिलाना चाहते हैं । यह तो मनमर्जी कै सौदे होते हैं i कोई और बात होतीं तो हम तुम्हें जोर भी देते । परन्तु बैंक को लूटने वाले काम में हम तुम्हें जोर नहीं दे सकते । समझा ही सकते हैं कि जिन्दगी भर पाई-पाई को तरसने की अपेक्षा एक ही बार जिन्दगी को दांव पर लगा देना कहीँ बेहत्तर है ।"
राजीव सूरज हेगडे की आंखों में झाकता रहा, बोला कुछ भी नहीं ।
"क्या सोच रहे हो?" खेडा ने उसका कंधा पकडकर हिलाया-"डकैती के लिए मैं भी तैयार नहीं था, लेकिन डकैती करना ही अब मुझे भला रास्ता नजर आ रहा हे । दिवाकर बेवकूफ नहीं है । अगर इसने बैंक डकैती का स्रोचा हे, वैंक की आसानी से लुट जाने वाली कोई ब्रांच तलाश की हे तो ठीक हीँ की होगी । किस्मत आजमा लेने से इसे पीछे नहीं हटना चाहिए ।"
"'नहीं, मै तुम लोगों के साथ इस काम में शामिल नहीं हो सकूगां I” राजीव मल्होत्रा ने दूढ़त्ताभरे स्वर मेँ कहा और उठकर बाहर निकलता चला गया ।
तीनों के बीच एक बार फिर गहरा सन्नाटा छा गया ।
दिन-भर वहा लोग बैंक डकैती की ही बातें करते रहे I साथ ही साथ स्मैक का दोर भी चलता रहा l शाम को अंधेरा घिरने पर वह तीनों उठे l वह रात उन्होंने अपने-अपने घरों में जाकर बिताई ।