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वारदात complete novel

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वारदात

दौलत का दीवाना देवराज चौहान ....

..........जो दौलत की खातिर जान हथेली पर रखकर लाशों के ढेर लगाने मे भी गुरेज नही करता।

.......लेकिन हर बार दौलत .....

.............किसी बेवफा प्रेमिका की तरह उसके पहलू से निकल जाती है ।

लेकिन इस बार देवराज चौहान की दौलत के लिए दीवानगी कुछ ऐसा रंग लाई कि .....

( ऐसी दीवानगी देखी नही नावॅल नही नावॅल का भी बाप )

वारदात

अनिल मोहन

बैक डकैती का ऐसा मास्टर पीस प्लान जिसने बड़े बड़े धुरधरो के भी छक्के छूडा दिए ।

 
अन्य रातों की अपेक्षा वह ज्यादा ही भयानक रात थी ।

आकाश मे गहरे काले बादल छा जाने की वजह से… रात का कालापन और भी बढ गया था । हवा सांय-सांय करकें चल रही थी । पहले की अपेक्षा सन्नाटा कुछ और भी वढ़ गया था । शहर कै बाहरी हिस्से में स्थित शमशान की चारदीवारी कै साथ लगे लम्बे-लम्बे पेड हवा के संग झूम रहे ये । उनकें पतों की खड़खड़ाहट दिल को धड़का रही थी ।

शमशान का डरावनापन देखकर वदन में कंपकंपाहट-सी दौड जाती थी ।

शमशान के आसपास दूर दूर तक खाली जगह और जंगल हीं था । मेन रोड से सिर्फ एक ही सडक शमशान तक आ रही थी ।

~ ~ इस भयानक अंधेरी रात में एक कार शमशान के बाहर आकर रूकी । कार का इंजन बन्द होते ही हवा की सांय-सांय आवाजें कानों में स्पष्ट पडने लगीं । कार की हेडलाइट पहले से ही बन्द थी ।

तभी कार का स्टेयरिंग डोर खुला और स्वस्थ वदन वाले व्यक्ति ने बाहर कदम रखा जिसने सिर से पांव तक खुद को काले लबादे में ढक रखा था ।

चेहरे पर नकाब पडा था जिसमें से सिर्फ आंखें ही खतरनाक भेडिये कौ भांति चमक रही थीं i

क्षणभर ठिठकक्रर उसने दाएं-वाएं देखा फिर तेज तेज कदम उठाता हुआ शमशान में प्रवेश कर गया ।

उसी समय शमशान के ठीक बीचोंबीच स्थित पीपल के धने और बहुत ही भयानक-से पेड पर से उल्लू के चीखने की आवाज ने शमशान कै सन्नाटे क्रो तोडते हुए वहां की खामोशी में छाए भयानतापन क्रो और मी बढा दिया ।

परन्तु स्पष्ट लग रहा था कि नकाबपोश पर शमशान के खतरनाक माहौल और उल्लू कै चीखने जैसी आवाज का कोई असर नहीं हुआ था ।

वह अपनी स्थिर चाल से आगे बढता रहा । वहां कोई भी बल्ब नहीं जल रहा था । धटाघोप अंधेरा था । लेकिन नकाबपोश बिना ठोकर खाए चलता रहा था ।

शमशान कै कोने में वने पक्के कमरे के सामने जाकर नकाबपोश ठिठका ओऱ आसपास देखा । हर तरफ मरघट का सन्नाटा काटता था ।

फिर नकाबपोश ने कमरे कै बन्द दरवाजे को थपथपाया । तीसरी बार की थपथपाहट पर जाकर दरवाजा खुला ।

दरवाजा खोलने वाता मुर्दों का क्रियाकर्म करने वाला साठ वर्ष का बूढा था । कमरे के भीतर मध्यम रोशनी का बल्ब जल रहा था । आखों पर उसने नज़र का चश्मा चढा रखा था, जिसके मोटे-मोटे शीशे थे और उन शीशों में से उसकी आंखें बहुत ही मोटीं मोटी सी होकर सामने वाले को दिखाई दे रही थी l सिर के सफेद बाल वहुत छोटे छोटे से थे और पिछले हिस्से में पतली-सी चुटिया थी, जिसमें गांठ बांध रखी थी ।

"कौन हो तुम?" बूढे ने जब सामने किसी नकाबपोश को देखा तो उसने हैरानी से पूछा ।

"मैँ वही हुं, जिसने शाम को तुमसे बात की थी।" नकाबपोश ने भारी स्वर मे कहा ।

"तु....म......तुम वह मुर्दा लेने आए हो?" बूढे के होठों से निकला ।

“हां । शाम को दस हजार की गड्डी दे गया था और दस हजार अब देने को कहा था।"

"अब चेहरा ढककर क्यों आए हो?"

"मर्जी मेरी ।”

"मुझे समझ में नहीं आता किं मुर्दे का तुम क्या करोगे?”

"मैं डॉक्टर हू। चीर-फाढ़ करता हू।”

"डाक्टर इस तरह नकाब में लिपटकर मरघटों में मुर्दों की तलाश नहीं करते फिरते, ना ही इस तरह मुर्दे का बीस हजार देते हैं l” बूढे के स्वर में हत्का-सा तीखापन आ गया ।

" तुम अपने काम से मतलब रखो, तुम्हें बीस हजार मिल रहा है I”

"ठोक कह रहे हो तुम । बीस हजार रुपये की खातिर ही तो मैं तुम्हें शमशान में आज ज़लने वाला मुर्दा दे रहा दूं । क्या करू, मजबूर भी तो हू I जबान बेटी की शादी करनी है I पैसे की जरूरत न होती तो ऐसा घिनौना काम कभी न करता I" बूढे ने धीमे किंन्तु भारी -स्वर में कहा I

“मुर्दा कहां है?”
 
"वह मुर्दा चिता पर ही पड़ा है l आओ मेरे साथ ।" कहते हुए आचार्य उस तरफ बढा जहां मुर्दों की चिता सजाई जाती थी…“शाम को दस-बारह लोग थे उस मुर्दे के साथ । चिता क्रो आग दी ही जाने वाली थी कि बूंदा-बांदी शुरू हो गई I ऊपर से तुमने मेरे कान में फूक मार दी थी कि किसी प्रकार मुर्दे को सही सलामत बचाकर तुम्हारे हवाले कर दूं तो तुम मुझे बीस हजार दोगे, इसके साथ ही दस हजार की गड्डी तुमने मेरे कपडों में सरका दी थी I इसलिए हल्की बरसात के आरम्भ होते ही मैंने उन लोगों से कह दिया कि अभी चिता र्कों आग देने का कोई फायदा नहीं I क्योंकि बरसात आने वाली है l” चलते हुए वह बूढा बोले जा रहां था । "आखिरकार मैंने उन्हें वायदा दिया कि बरसात के थमते ही चिता को आग दे दूंगा । गीली लकडियों को भी किसी प्रकार जला दूंगा । आप लोग चौथे दिन आकर फूल ले जायें I इस प्रकार वह मुर्दा जलने से बच गया । और बरसात भी उन लोगों कै जाने कै पांच मिनट कै बाद ही थम सी गई थी I" नकाबपोश की आंखों में अब पैशाचिक चमक लहरा उठी I

"अब अन्य जले मुर्दों कै फूलों में हैराफेरी करके, उन्हें फूलों का थैला दूंगा । चौथे दिन वह लोग आयेंगे । भगवान ही जाने तुम इस मुर्दे का क्या करोगे ।" इतना कहकर उधर बढ़ गया जिधर लकडियां सजाकर चिता बना रखी थी । बूढ़े ने चिता से लकडियां उठाकर नीचे रखनी शुरू कर दीं । कुछ दूर अन्य चिता सुलग रही थी ।

ऊपर से चन्द लकडियां हटाने पर, कफन में लिपटा मुर्दा चमक उठा l कफन को मौली से अच्छी तरह बांध रखा था ।

"यह रहा तुम्हारा बीस हजार का मुर्दा.... I कैसे ले जाओगे?" बूढे ने पूछा I

"बाहर मेरी कार खडी है ।"

"चलो , मैँ इसे उठाकर तुम्हारी कार तक… I"

"जरूरत नहीं, मै खुद ले जाऊंगा ।" कहने कै साथ ही नकाबपोश ने जेब से नोटों की दस हजार की गड्डी निकालकर बूढे को थमाई-"यह लो बाकी कै दस… I"

इसके पश्चात् नकाबपोश ने आगे बढकर चिता पर पडे मुर्दे को उठाया जो कि खम्बे कै भांति अकड़ा पड़ा था I मुर्दे को उसने अपनी बांहों मेँ सीधा उठाया और पलटकर तेज-तेज कदम उठाता हुआ बाहर निकलता चला गया । उसकी चाल में बला की फुर्ती भर चुकी थी I

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फिनिश

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रात के तीन बज रहे थे I हल्की हल्की बरसात आरम्भ हो चुकी थी I आसमान में चहकती बिजली इस बात का सन्देश दे रही थी कि, जल्द ही भयानक बरसात होने वाली है । ऐसे खराब और खतरनाक मौसम में गहरे अन्धेरे कै बीच वह नकाबपोश कफन में लिपटे खम्बे कै समान अकडे मुर्दे को बांहों पें उठाए पहाडी इलाके में सावधानी से आगे बढा जा रहा था I वहां चारों तरफ चट्टानों के टुकड़े फेले हुए थे । कहीं-कहीं पहाड के ऊंचे टीले थे I हरियाली का नामो-निशान ही नहीं था ।

नकाबपोश कै चलने का अन्दाज बता रहा था कि इन रास्तों से वह अच्छी तरह परिचित है और वहां पर वह पहले भी कई बार आ चुका है ।

अपनी कार से उतरकर नकाबपोश इस प्रकार करीब रुका । जिसके भीतर जाने कै लिए बेहद छोटा व सकरा सा रास्ता था । इंसान अपना जिस्म सिकोड़कर ही भीतर प्रवेश कर सकता था। नकाबपोश ने पहले कफन मेँ लिपटे मुर्दे को खोह में सरकाकर आगे किया । तत्पश्चात् खुद भी भीतर प्रवेश कर गया । बाहर से देखकर कहना कठिन था कि यहां कोई रास्ता भी हे । देखने पर छोटा सा टीला ही लगता था वह I

भीतर से चट्टान खोखली थी । बहुत खुली जगह थी ।

. वहां पर चार मशालें जल रही थी l रोशनी पर्याप्त थी । भीतर प्रवेश करते ही नकाबपोश ठिठका । फिर उसकी निगाहें दायीं तरफ धूम गई जहां खतरनाक सा नजर आने वाता तांत्रिक बैठा था I

गंजा सिर I सिर पर लाल सुर्ख रंग की कपड़े की टोपी ।

कमर तक वह नंगा था और गले में इन्सानी हड्डियों की माला पहन रखी थी I कुछ इन्सानी हड्डियों को धागे में मूंथकर .

बांह और कमर पर बाँध रखी थीं I उसकी आँखें लाल सुर्ख थी, जैसे शराब की पूरी बोलत पी रखी हो I वह आधा फीट उची लकडी की चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाए आसन की मुद्रा में बैठा था I दायीं तरफ लोहे का बहुत बड़ा सन्दूक रखा था । ठीक सामने काले रंग कै कपडे पर तीन इंसानी खोपड्रियां रखी थी ! खोह में अजीब सी दुर्गन्ध फैली थी ।

"प्रणाम गुरुदेव I" नकाबपोश ने आगे बढकर तांत्रिक के पावों को छूते हुए आदर भरे स्वर में कहा ।

तांत्रिक की मुद्रा में कोई फर्क नहीं आया ।
 
"आखिर आ ही गए तुम?” तांत्रिक की आबाज में खुरदरापन था I

"हां I"

. , "जिद छोड दे बच्चे I नादानी मत कर l"

तांत्रिक के स्वर मे गुर्राहट आगई ---" जो

तू चाहता हे, वह ठीक नहीं हे । भूल जा सबझुछ l”

‘जो हो रहा है, वह ठीक ही हो रहा है गुरुदेव ।" नकाबपोश ने दृढ़त्ता भरे लहजे में कहा ।

"अक्ल नहीं हे तेरे मेँ I तेरे को नहीं मालूम कि इस कदम का अन्त क्या होगा l" तांत्रिक ने सख्त स्वर में कहा --- “मौत को बुला रहा है तू अपनी… l"

नकाबपोश ने तांत्रिक कै शब्दों की परवाह नहीं की और पलटकर नीचे पड़े मुर्दे के पास पहुंचा अँरि नीचे झुकते हुए मुर्दे के जिस्म से कफन उतारने लगा ।

तांत्रिक लाल सुर्ख आंखों से उस नकाबपोश को घूरता रहा I

देखते ही देखते नकाबपोश ने मुर्दे के जिस्म से कफन उतार फेंका ।

वह मुर्दा राजीब मल्होत्रा का था । मुर्दे का चेहरा हल्दी की तरह पीला पड़ा हुआ था ।

नकाबपोश ने सिर घुमाकर तांत्रिक को देखा l

"आइए गुरुदेव I"

"तो तू मेरी बात नहीं मानेगा I” तांत्रिक गुर्राया।

"गुरुदेव आप मुझे वचन दे चुके हैं I"

"मुझे समझा मत नादान कि हम वचन दे चुके हैँ कि नहीं ।" तांत्रिक एकाएक गला फाड़कर चिल्ला पड़ा-"बल्कि हम जो समझा रहे हैं, उसे समझने का प्रयत्न कर । तू आग से खेलने जा रहा हे । वह आग है जिससे तू भी नहीं बच पाएगा t यह तुझे भी जला देगी । अभी भी वक्त है, जा अपने घर । सम्भल जा-नहीं तो..... ।"

"गुरुदेव !!" नकाबपोश की आवाज में दृढ़ता थी…" आप अपना काम शुरू कीजिए l"

"नहीं मानेगा। तू कहर बरपाकर ही रहेगा I तू कुदरत कै कानून कं खिलाफ चल रहा है । याद रख एक दिन तू पछताएगा ।" इस बार तांत्रिक का स्वर बेहद घीमा-बुदबुदाहट के रूप में था । होंठ हिलाते हुए उसने खोह की छत को देखा ।

फिर चौकी से उठकर नीचे उतरा और नंगे पांव ही आगे बढा ! उसकी आंखों की सुर्खी में बढोत्तरी हो चुकी थी ।

राजीव मल्होत्रा के मुर्दा जिस्म कै करीब पहुंचकर तांत्रिक ठिठका ।

कई पल वह मुर्दे को घूरता रहा । फिर नंगे'पांव से ही मुर्दे को उलट-पलटकर देखा ।

"यह तो अकड़ा पड़ा हे ।"

"गुरुदेव मरने के बाद तो सब ही अकड जाते हैं I"

"बहुत् मेहनत करनी पड़ेगी l"

"आपके इन शब्दों को वादा खिलाफी समझू गुरुदेव?” नकाबपोश बोला ।।

"नादान.....!" त्तात्रिक पलटकर गर्जा---"मैंने इन्कार नहीँ . . किया । आने बाली कठिनाई के बारे में बता रहा हू। अपनी बद्जुबान को सम्भाल, वरना मुझे क्रोध आ जाएगा ।"

"क्षमा गुरुदेव !" तांत्रिक भिंचे दातों से वापस चौकी कै करीब पहुच और उसकें होठ हिलने लगे । स्पष्ट जाहिर था कि वह कोई मत्र पढ़ रहा हैं ।

मंत्र की समाप्ति पर उसने नीचे लाल कपडे पर रखीं तीनों खोपांड़ेयों पर हाथ फेरा तो वह भक्क से जल उठी ।

इसके साथ ही तांत्रिक पलटा और नकाबपोश को खूनी निगाहों से देखने लगा ।

"तेरी इच्छा तो मैं पूरी करने जा रहा हू परन्तु याद रख, याद रख एक दिन तू मेरे सामने गिड़गिड़ायेगा. कि मैं सब ठीक कर दूं....लेकिन लेकिन शायद तब मैँ भी कुछ न कर सकूंगा l अभी भी वक्त है सम्भल जाने का ।”

नकाबपोश खामोश रहा । कुछ भी न बोला ।।

" उठा मुर्दे को i” तांत्रिक गला फाडकर दहाड़ा-"मैं वचन दे चुका हूं इसलिए अब पीछे नहीं हटूंगा । बाबा भेरोनाथ सबका भला करेगा । इसे उठाकर खोह कै पीछे वाले हिस्से में रख दे । वहीँ पर सब-कुछ करना पडेगा l”

नकाबपोश ने फौरन नीचे पड़े राजीब मल्होत्रा के मुर्दे को दोनों बांहों में उठाकर सम्भाला और एक तरफ बढ गया ।।

एक तरफ खोह काटकर दरवाजे जितना रास्ता बनाया हुआ था, नकाबपोश मुर्दे को उठाए उसी में प्रवेश करता चला गया I
 
तांत्रिक बेचैनी से वहीं पर चहल-कदमी करने लगा। उसकी आंखों में सुखीं पल-प्रतिपल बढती जा रही यी । होठों ही होठों में जाने वह क्या बुदबुदा उठता था ।

लगभग पांच मिनट बाद, नकाबपोश की वापसी हुईं ।

वह खाली हाथ था ।

राजीव का मुर्दा वह कहीं भीतर रख आया था ।

"आज्ञा गुरुदेव ।" नकाबपोश ने हाथ बांधकर आदर के भाव से कहा ।

"फिलहाल हमें अकेला छोड़ दे । हमारी साधना का वक्त है।" तात्रिक क्रोध भरे स्वर में बोला।

“कल आऊ गुरुदेव?”

"आ जाना । लेकिन अब जा " तांत्रिक के स्वर मे अप्रसन्नता थी l

नकाबपोश जिस रास्ते से खोह में आया था उसी रास्ते से बाहर निकलता चला गया । बाहर आते ही वह भीग गया ।

बरसात जोरों पर थी ।

इस घटना से चन्द रोज पहले की घटनाएं कुछ इस प्रकार रहीँ ।

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फीनिश 2

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अन्तिम-संस्कार की क्रिया पूरी करने कै बाद तीनों वापस उसी कमरे में आ पहुचे, जो उन्होंने किराए पर ले रखा था I सुबह से उन्होंने स्मैक का नशा नहीँ किया था; इसलिए पहले उन्होंने अपने नशे को पूरा किया फिर अरुण खेडा बोला ।

"हम लोग दो बार बड़े खतरों से निकले हैं । पहला खतरा था बैंक में डाका डालने का और दूसरा था राजीव की लाश का, अनजाने में जो दिवाकर के हाथों मारा गया । "

" बीती बात न करो I खासतौर से राजीव की I” दिवाकर उखड़े लहजे में बोला-"सुनकर अच्छा नहीं लगता । इस समय हमें यह सोचना चाहिए कि वह पैंतीस लाख कहां हैं?”

"उसकी महबूबा तो उसकी मौत पर नहीं आई I"

" क्या मालूम उसे राजीव की मौत की ख़बर ही न पहुची हो वह दूर रहती हो I"

"यह भी हो सकता हैं ।" अरुण खेड़ा ने दोनों के चेहरों पर निगाह मारी-“वह आईं हो, परन्तु हमारी निगाहों कै सामने आना उसने ठीक न समझा हो ।"

" क्यों ?"

"राजीव ने उसे हमारे बारे सब-कुछ बता रखा होंगा कि हम लोगों के साथ मिलकर उसने डकैती की है । लडकी ने ठीक ही सोचा होगा कि हमेँ बैंक से लूटी दीलत की तलाश होगी और हम सोच सकते हैं कि वह दौलत उसके पास भी रखीं हो सकती है और राजीव की मौत के पश्चात् उसका दिल बेईमान हो गया हो । वह हमें दौलत देना न चाहती हो I इसी कारण उसने सामने आना ही ठीक न समझा होगा I” अरुण खेड़ा बोला ।

"यह ठीक कहता है, हो सकता है।" हेगडे ने सिर हिलाया ।
 
"दिक्कत तो यह है कि लडकी हमें पहचानती होगी ।" दिवाकंर बोला-"परन्तु हम लड़की को नहीं पहचानते और अगर पहचान भी ले तो हम उसके साथ बुरा भी नहीं कर सकते अगर करेंगे तो वह पुलिस क्रो इन्फार्म कर सकती है किं हमने बैंक-डकैती की है । उसकै बाद तो पुलिस तोढ़-फोड़ काके यह साबित कर ही देगी कि हमने डकैती की हे । शायद राजीव की मौत का इल्जाम भी हमारे सिर लग जाए या ना लगे, यह बाद की बात हे i”

"तुम्हारा मतलब है कि युवती कै बारे में जानकर भी हम कुछ नहीं कर सक्रते I”

“ हां , क्योंकि डकैती हमने मारी है, उसने नहीं। और फिर क्या पता कि राजीव ने डकैती का पैंतीस लाख रुपया कहां रख छोडा है । हो सकता है किसी और के पास रखा हो, जिसे हम जानते ही ना हों उसके सब जानने वालों को तो हम जानते नहीं हैं !"

"बात तो सही हे I” हेगड़े ने सिर हिलाया-“ चुकिं राजीवं किसी लडकी से शादी करने जा रहा था । इसलिए पैसे की खातिर डकैती में शामिल हुआ और अब हम शक कै तोर पर उसी युवती कै बारे मेँ सोचे जा रहै हैँ, जिससे राजीव शादी करने जा रहा था ।". ,

तीनों एक-दूसरे का मुह देखने लगें ।

"सही बात यह हे कि l" अरुण खेंड़ा भारी स्वर में बोला----"'यह मामला अब हमारे बस का नहीं रहा । हमेँ पैंतीस लाख को भूल जाना चाहिए । और पैसा हासिल करने का कोई नया जुगाड सोचना चाहिए जिससे कि हम अपने नशे की पूर्ति कर सकें I”

“पैंतीस लाख जैसी रकम को आसानी से नहीं छोड़ा जा सकता ।।"

"हेगडे ठीक कहता है ।" दिवाकर ने सिर हिलाया-… " इतना बड़ा खतरा मोल लेने कै पश्वात् तो पैतीस लाख की रकम आई है, उसे हम कैसे छोड सकते हैँ । मेरे पास एक रास्ता है ।"

"कैसा रास्ता ।”

"'वह अपना शंकर हे न, शंकर दादा । वह ढूंढ सकता है, दौलत कहां हैं । क्यों न हम उसे अपने साथ मिलाकर सारी बात वता दे । पैंतीस लाख कै चार हिस्से कर लेंगे ।"

हेगड़े और अरुण की निगाहें दिवाकंर के चेहरे पर जा टिकी ।

"अगर शंकर दादां हेरा-फेरी कर गया तो?"

"ये तो बाद की बात है, क्या करना हे?" दिवाकर ने सख्त स्वर में कहा…“पेंतीस लाख ढूंढकर हमें हमारा हिस्सा नहीँ देगा तो निपट लेंगे साले से । बैसे हमें वह डबल 'क्रास' करेगा नहीं । हम उसके नशे के धंधे कै कईं "लूपोल" जानते हैं । अगर वह हमसे चीट करता हे तो उसके धंधे की भीतरी बातों की जानकारी पुलिस को दे सकते है ।”

"शकर दादा बहुत खतरनाक आदमी है ।"

"हम क्या कम है ?” दिवाकर गुर्राया-“उस साले ने क़भी बैंक-डकैती डाली है । हमने डाली है, बेक डकैती । अगर हम करने पर आए तो साले की गर्दन मरोड़कर रख देंगे ।”

सबकी आंखों में सहमति के भाव आ गए ।

इसके सिवाय कर भी क्या सकते थे । अब पेंत्तीस लाख का दूढना उनके अपने बस का तो था नहीं । अगर होता तो वह शंकर दादा को सारी बात बताने की सोचते भी नहीं । शंकर दादा के 'पास जाना उनकी मजबूरी थी ।।

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फिनिश

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शंकर दादा पैंतालीस वर्ष का हट्टा कट्टा, वेहद खतरनाक-सा नजर आने चाला इन्सान था । घघे तो वह छत्तीस तरह कै करता था, परन्तु दिखावे कै लिए उसने 'बार' खोल रखा था ओर खुद काउन्टर के पीछे बने कमरे मे ही अक्सर हासिल होता था ।

क्राईम वर्ल्ड में उसका अपना अलग ही रूतबा था । अक्सर हर तरह का काम करने वाले आदमी हर समय उसके पास मौजूद रहते थे बुरे कामों का ठेकेदार था वह ।शंकर दादा अपने बार कै काउन्टर पीछे बने कमरे में मौजूद वडी-सी टेबल के पीछे कुर्सी पर बैठा गम्भीरता से दिवाकर हेगड़े और अरुण खेड़ा दोनों की बात सुन रहा था ।

उनकी बात सुनकर शंकर दादा एकाएक मुस्कराकर कह उठा ।

"बैक डकैती जेसा काम करके तुमने बहुत ही हौसला दिखाया है ।"

"शंकर । तुम पैंतीस लाख तलाश करो । उन्हें ढूंढना तुम्हारे लिए मामूली काम है । उनकें हम चार हिस्से कर लेंगे । दिवाकर ने सिर हिलाकर कहा ।"

"काम तो मै कर दूंगा ।" शंकर दादा बोला-"परन्तु हिस्से चार नहीं होगे । मैँ सीधे -सीघे दस लाख लूगा । बाकी तुम लोगों के हवाले कर दूंगा । आपस में जो मर्जी करते रहना ।"
 
"मंजूर हैं हमें ।" अरुण खेडा बोला-" तुम उस लडकी को तो जरा ढूंढो जिससे कि राजीव शादी करने जा रहा था । मुझे शक है कि माल उसके पास ही होगा ।"

" मैँ खुद देख लूंगा कि मुझे कब क्या…क्या और कैसे करना हे ।" शंकर दादा ने सख्त स्वर और कठोर निगाहों से अरुण खेडों को देखा ।

शंकर दादा से बात करके वह तीनों बाहर निकल आए । अब उनके चेहरों पर तसल्ली थी कि, राजीव ने माल जहां भी रखा होगा शंकर दादा उसे टूढ ही निकालेगा।

अंजना मर्लिक !

चौबीस वंर्ष की बेहद खूबसूरत युबती ।

जो एक बार देखै तो देखता ही रह जाए ।

उसके शरीर पर अक्सर जीन की पेंट और टाप होता था । न कोई आगे न कोई पीछे ।

अकेली थी । मा बचपन में ही मर गंई थी, बाप को मरे साल हुआ था और मरते मरते अजना मलिक को मिली थी ‘विरासत में जेब काटने की सफाई' ।

उसका बाप इतना एक्सपर्ट जेबकतरा था कि आजतक पकडा नहीं गया था, सामने वाले को भी महसूस नहीं हो पाता था कि कब उसकी जेब से माल बाहर निकला ! उसके हाथ की सफाई बहुत ज्यादा थी !!

और वहीँ सारे गुण अंजना मलिक में थे l. बाप का धंधा उसने अपना लिया था । साल भर में वह भी कभी नहीं पकडी गई । ऊपर से उसकी खूबसूरती कि, कोई शक भी नहीं कर सकता था कि वह क्या करती हैं ।

यूं वह जानती थी कि हर किसी की निगाह उसके जवान जिस्म पर ठहरती थी ! इस मामले में वह हमेशा सतर्क थी कि कोई शैतान उसके जिस्म को हाथ न लगा सकै ।

जवान जिस्म के शिकारी तो हर जगह मौजूद और हरदम तैयार रहते थे I

एक दिन जब वह घधे पर निकली तो उसकी मुलाकात इतफाकन रार्जीव मल्होत्रा से हो गई । तब वह जेब काटकर भाग रंहीँ थी क्योंकि जिसकी जेब उसने काटी थी जाने कैसे उसे अपनी जेब काटे जाने का अहसास' हो गया था ।

भागते-भागते अंजना मलिक ने उसका पर्स अपने कपडों में छिपा लिया था ।

और एक मोड़ पर वह रार्जीव से टकराई , ओर घबराकर नीचें गिर पडी । वह जल्दी से उठ खडी हुई l I गहरी-गहरीं सांसें ले रही थी अब वह l

"माफ कीजिएगा ।" राजीव ने किचकिचाकर कहा----“दरअसल गलती आपकी ही थी, आप पीछे देखकर आगे की तरफ भाग रही थीं । अगर आगे देखकर आगे की तरफ भागती तो… !"

"जी हां । गलती मेरी ही थीं । दरअसल मेरे पीछे वहुत ही खतरनाक गुण्डा पडा हुआ हे । वह ।"

“गुण्डा ?" राजीव उसकी बात काटकर चौंकते हुए बोला---" कहां है?"

"पीछे । यहां तक आने ही वाला होगा , बहुत खतरनाक हे वह ।"

"मैं देखता हूं उसे l”

"न.....हीं.....नहीं ।" अजना घबराकर बोली-"'वह इतना खतरनाक है कि आप किसी भी हाल में उसका मुकाबला नहीं कर सकते। और फिर मेरे लिए आप अपने को क्यों खतरे में डालते हैं । बस हो सकै तो एक काम करं दीजिए बडी मेहरबानी होगी ।"

" क्या'?"

“मुझे कहीँ छुपा दीजिए ! सिर्फ दो मिनट कै लिए !"

राजीव अज़ना क्रो लेकर बगल की गली मेँ घुसा ओरं दूसरी तरफ से बाहर आगया। अंजना ने चेन की सांस ली । दो पल में वह उल्टी दिशा में आ गई थी । पर्स वाला इस तरफ आसानी से नहीं आ सकता था। अजमा ने मुस्कराकर राजीव को देखा ।

"आप बहुत इच्छे इन्सान हैं ।"

“हू" ।" राजीव ने ग़हरी निगाहों से अंजना को देखा---'आइए; वह सामने मेस छोटा-सा फ्लैट हे 1 वहां चलकर एक एक कप चाए पीते है !"

" न....नही !"

"चिन्ता मत कीजिए ! वहां सिर्फ मेरा ही नहीं सैकडों लोगों के फ्लैट हैँ । मेरे वहां चलने में आपको घबराना नहीं चाहिए । आपकी एक आवाज पर पन्द्रह लोग तो फौरन आजाएंगे। वेसे मैँ भी शरीफ इन्सानों में से हूं।"

अंजना को राजीव अच्छा लगा । उसके साथ फ्लैट तक आते-आते वह दोनों एकदूसरे कै नाम से वाकिफ हो गए।

फ्लैट में आकर राजीव किचन में जाकर मेस पर चाय बनाने लगा । अंजना कमरे में बेठी-तैठी ही बोली ।।

"आपके साथ और कौन-कौन रहता है । "

"कोई नहीं । मैँ अकेला हू। आगे पीछे कोई नहीं है ।" राजीव ने किचन में से जवाब दिया ।

"मैं भी अकेली हूं आपकी ही तरह "

राजीव दो प्याले थामे किचन की चौखट पर प्रकट हुआ ।

"'तो'इसीलिए आप लोगों की 'जेबें' काटती फिरती हैं?" राजीव कै शब्द सुनते ही अंजना ने हड्रबड़ाकर उस जगह हाथ रखा जहां उसने मर्दाना पर्स छिपाया था । चेहरे पर अजीब भाव आ गए थे ।

“उस पर्स को मेंने तभी देख तिया'था जब आप मुझसे टकराकर नीचे गिरी थीं । में सोच ही रहा था कि मर्दाने पर्स का आपके पास क्या काम, कि उसी समय आपने कहा कि आपके पीछे खतनाक गुण्डा पड़ा हुआ हे । तब मेँ समझा कि आपके पीछे आने वाले की आपने पॉकेट मारी होगी । इस पर भी मैंने आपको बचाया साथ ही चाय पिलाने आपको अपने धर ले आया । इसके दो कारण हैं, एक तो यह कि आप खूबसूरत हें । दूसरा कारण आपको समझाने का था कि जो आप कर रही हैं । ऐसे काम मर्दों को ही शोमा देते हैँ ।”

अंजना के होठों से कोई शब्द न निकला ।
 
"लीजिए चाय लीजिए ।" राजीव ने आगे बढकर -उसकी तरफ प्याला दिया ।

अजना ने चाय का प्याला थाम लिया ।

राजीव अपना प्याला पकड़े उसके सामने बैठ गया।

"क्यों करती हें आप यह बुरा काम?"

"अपनी गुजर-बसर करने के लिए ।" अंजना ने गम्भीर स्वर में कह ---" अपना तो कोई है नहीं जो मुझें रख सकै । इज्जत की रोटी खिला सके । मेरी शादी कर सके ।”

"अगर अपना होता तो तुम बुरा काम नहीँ करतीं?" राजीव ने उसकी आंखों में झांका ।

"नहीँ, फिर क्यों करती ।"

" ठीक हे । तुम्हारा अपना मैं बन जाता हूं !”

"आप ?" अजना ने हैरानी से उसे देखा । '

"तुम मुझे अच्छी लगी हो ओर मुझे भी कोई अपना चाहिए। पैं पढा-लिखा हूं। नौकरी की तलाश मेँ हूं । नौकरी मिलते ही मैं तुमसे शादी कर लूंगा । हम दोनों अकैलों को सहारा मिल जाएगा ।”

अजना उसकी स्पष्ट बात पर रांजीवं को देखतीं रह गई ।

"क्यों, मेरी बात पसन्द नहीँ आई क्या ?"

"नहीं ऐसी बात तो नहीं ।" अंजना ने गम्भीर स्वर में कहा ।

"जवाब देने की, ,फैसला देने की कोई जल्दी नहीँ I आप सोच सकती हैं, मैँ कल तक का वक्त देता हू I अगर मेरी ~ बात पसन्द हो तो जेब काटने का धंधा छोडने की कसम के साथ यह पर्स जो इस समय तुम्हारे कपडों में है, भी लेकर आना है । खाली पर्स नहीं, भरे का भरा, ऐसा ही पर्स ।"' राजीव ने स्थिर लहजे में कहा ।

उसके बाद अंजना मलिक राजीव कै फ्लेट से निकली -त्तो बेचैन थी । सोचों ने उसका दिमाग खराब कर रखा था ।

राजीव ने जो कहा था, अच्छा कहा था, कुछ भी बुरा नहीं कहा था । फिर क्या करें?

राजीव की बात माने या नहीं?

अजमा को लगा जैसे ईश्वर ने उसे अपना घर बसाने का ' सुनहरी मौका दिया हैं । इस बढिया मोके क्रो गंवाना नहीं चाहिए l राजीव उसे घर की इज्जत बनाना चाहता हे तो उसे फौरन स्वीकार कर लेना चाहिए I

अजना मलिक दिन-भर सोचों में व्यस्त व्याकुलन्ती रही । रात को भी ठीक तरह से सो नही पाई और अगले दिन उठकर, नहा-धोक्रर र्तेयार हुई और नाश्ता करने के पश्चात् राजीव मल्होत्रा के घर की तरफ चल दी I

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फिनिश

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राजीव मल्होत्रा ने उसे आया देखा र्तो चेहरे पर मुस्कराहट बिखर गई ।

"मुझें पूरी आशा थी कि तुम आओगे ।"' राजीव ने उसे रास्ता देते हुए कहा कहा तो अंजना भीतर प्रवेश कर गई । राजीव पलटा I

"यह लीजिए पर्स I" अंजना ने कल बाला' पर्स उसको तरफ़ बढाया I राजीब कै चेहरे पर गंभीरता की चादर बिछती चली गई I

"क्या पर्स का मुझें देने का मतलब समझती हो ना?"

" हा l” अंजना ने हिर हिलाकर‘ कहा-"आज के बाद--- मैं कभी पॉकेटमारी का धंधा नहीं-करूगीं । इस बात कै साथ कि नौकरी मिलते ही आप मुझसे शादी करेंगे और जब तक नहीँ करेंगे, मेरे सामान्य'खर्चों क्रो पूरा करते रहेंगे ।"

राजीव मुस्कराया । खुलकर मुस्कराया ।

"वेरी गुड । तुम खूबसूरत ही नहीं, समझदार भी हो ।" राजीव ने उसके हाथ से पर्स लेते हुए कहा-"मैं कोशिश करूंगां कि मुझे जल्द ही कोई अच्छी नौकरी मिले और तुमसे जल्द ही शादी करूगा । अकेलापन बहुत काटता हे । अब साथी की जरूरत महसूस होने लगी हे । खुशनसीब हू जो तुम जैसा हमसफर मुझे मिला?"

"में भी कम खुशनसीब नहीँ कि जो आप जैसा अच्छा इंसान मिल गया, वरना पैं तो राही सोचे बैठी थी कि दुनिया में सारे बुरे इन्सान ही भरे पड़े है I” अंजना होले से हंसी ।।

राजीव ने पर्स खोला । बीच में सौ सौ कै कई नोट थे । वह सब उसने अजना की देते हुए कहा… ।

"यह रुपये अपने पास रखो और अपनी जरूरतें पूरी करो । कोशिश करना कि कम से कम खर्च करो । जब-समाप्त हो जायें तो मुझे बता देना I"

-“मेरे पास अभी पैसे हें।”

"कोई बात नहीं, यह भी रख लो ।" राजीव ने मुस्कराकर उसका हाथ थपथपाया, फिर बोला-"बह सामने किचन है । कम से कम अपने हाथों की चाय तो बनाका पिला दो ।"

अंजना हंसती हुई किचन में प्रवेश कर गई । दोनों ने एक साथ बैठकर चाय पी । बातें कीं ।
 
राजीव ने अपनी बीती जिन्दगी के बारे मेँ बताया तो अंजना ने अपने बारे में सब कुछ ।।

दुख-दर्द बांटना दीनों को अच्छा लगा, क्योंकि दोनों का ही दुनिया में कोई रिश्तेदार नहीँ था ।।

उसके बाद अंजना आधा दिन राजीव के साथ हीँ रही ।

जब अंजना. गई तो.दोनों आपस में काफी खुल चुके थे और एक-दूसरे क्रो मन ही मन बेहद पसन्द करने लगे थे उसकै बाद राजीव ने अच्छी नौकरी पाने के लिए दौड़-धूप तेज कर दी ।।

वह जल्द से जल्द अंजना को अपनी ब्याहता बना लेना चाहता था ।

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फीनिश

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राजीव मल्होत्रा ने नौकरी पाने की वहुत कोशिश की । अच्छी नौकरी मिली नहीं, जो मिलती थी । उससे उसका अपना और अंजना का गुजारा हो नहीं सकता था । दो महीने बीत गए । अंजना के साथ शादी करना उसे अधूरा सपना सा महसूस होने लगा ।

दिवाकर अरुण खेडा और सूरज हेगडे ने उसे परेशान हाल में देखा तो उन्होने परेशानी का कारण पूछा l राजीव ने सब कुछ साफ-साफ बता दिया कि वह क्यों चिन्तित हे।

नहीं बताया तो यह कि अंजना कौन है । कहां रहती हे ।

"राजीव ।” दिवाकर ने गहरी सांस लेकर कहा-"यह तो अच्छी बात है कि तूने शादी करने का विचार बना लिया । … हम तेरे से ये नहीं पूछेंगे कि लडकी कौन है । तेरी प्रॉब्लम

को हम समझ रहे हैँ । लेकिन हम तेरी हेल्प नहीं का सकते । क्योंकि अपनी आदतों कै कारण हम तीनों ही एक तरह से घर से निकले हुए हैं । तुम्हें तो मालूम ही है कि मैं शाही खानदान से ताल्लुकात रखता हूं । हमारे कई बड़े-बड़े कारखाने, मिलें वगैरह चल रही हैं । वहां पर मैं तुझे चार पांच हजार की नौकरी दिला सकता था । वेहद छोटी बात थी मेरे लिए, परन्तु आज की तारीख में मैं तेरी कोई हेल्प नहीं कर सकता, क्योकि'नशे की आदतों कै कारण मेरी घर और बिजनेस मैं चलना वन्द हो गई है I”

"कुछ ऐसी ही मजबूरी मेरे साथ है।" हेगडे ने सिर हिलाया I

अरुण खैड़ा ने मी काम न कर पाने कै कारण अफसोस जाहिर किया ।

"हम खुद पैसे-पैसे को मोहताज हुए पडे हैं । समझ मे नहीं आता कि अपेने नशे कै लिए पैसों का इन्तजाम कहा से करें । धर से मिलने…बंद हो गए हैं और' बाहर से हम नशेडियों को देने के लिए कोई तैयार नहीं । ठीक भी तो है,हम लिया उधार वापस क्ररेगे भी कहाँ से।"

राजीव ने जबाब में कुछ भी नहीं कहा ।

"लेकिन तू फिक्र नहौं-कर ।" दिवाकर ने उसका ,कंधा थपथपाया-“हम बहुत जल्दी कोई न कोई रास्ता तो निकालेंगे ही, आखिर हमें भी पैसे की दिक्कत तंग कर रही हे ।"

“कैसा रास्ता?" राजीव ने प्रश्नभरी निगाहों से उसे देखा ।

" देखेंगें कैसा रास्ता । अभी तो मुझे भी…नहीँ मालूम I” दिवाकर ने सिर झटककर कहा-“लेकिन यह बातं तो पक्की है कि कुछ न कछ तो करना ही पडेगा अब हमारी जेबे खाली रहने लगी हें नशे के लिए भी हम पैसों का जुगाड नहीं कर पाते । कितने शर्मं की बात है हमारे लिए ।"

"तुम इस बुरी नशे की लत को छोड़ क्यों नहीं देते ।" राजीव ने कहा ।

"लग गया फिर भाषण देने ।” हेगंड़े ने बुरा सा मुंह बनाकर कहा----" अरे भई, तुझे कितनी बार कहा है कि हम नशे को छोडने को तैयार है , परन्तु नशे हमें नहीं छोडते I"

राजीव मल्होत्रा ने पुनः कुछ नही कहा सिर्फ गहरीं सांस लेकर रहगया।

"क्या बात है, आप कुछ उदास-सै नजर आ रहे हैं?" अंजना ने राजीव को देखते हुए ही पूछा ।

" हां अंजना ।” राजीव ने भारी स्वर में कहा'मुझे कहीं भी ढंग की नौकरी नहीं मिल रही कि अपना और तुम्हारा पेट पाल सकू ! जबकि मैं जल्दी से तुमसे शादी करना चाहता हूं !"

"भगवान पर भरोसा रखो ! वह सब ठीक करेगा ।" अंजना ने राजीव मल्होत्रा को तसल्ली दी ।

“मुझे समझ मेँ नहीं आता कि क्या करूं ।" राजीव ने थके स्वर में कहा ।

“आपकी कुछ भी करने की ज़रुरत नहीं । जो आप कर रहे हैं, वहीँ करते रहिए l अगर हमारा वक्त ठीक हुआ तो वहुत जल्द आपकी अच्छी नौकरी मिलेगी I" अंजना ने राजीव के हाथ -पर हाथ रखा-"बैसे आप चाहें तो हम शादी कर सकते हैं I“

~ “ क्या मतलब. ?"

"मेरे पिता का अपना छोडा हुआ मकान है, जिसमेँ कि अब मैं रहती हूं। दो-तीन महीने हमारे निकल जायेगे । तब तक तो आपकी नौकरी मिल ही जाएगी ।"

"नहीं अजना, नहीँ ।" राजीव ने सिर हिलाया-"मैं उस स्थिति में शादी करना चाहता हुं जबकि मेरे पास अच्छा पैसा हो । हमें पैसों की कोई कमी न रहे और मैरी हम दौनों की यह जरूरत कोई अच्छी नौकरी ही पूरा कर सकती है । जो कि अच्छे नम्बरों पर पढा-लिखा होने कै बावजूद भी मुझे मिल नहीं रही । जाने भगबाँन की क्या इच्छा है I"

"हम कम में भी तो गुज़रा कर सक्रत्ते हैं?" अंजना ने कहा ।

" लेकिन मै नहीं-करना चाहता । सारी उम्र एक एक पैसा सोचकर खर्चता रहा हूं । बच्चों को टूयूशन पढा-पढाक्रर अपनी . पढाई का और अपना खर्च चलाया हे । वही दिक्कतें मैँ अब बर्दाश्त नहीं कर सकूंगा l” राजीव की आबाज में दृढता की झलक थी ।

अजना ने जवाब में कुछ नहीं कहा, फिर राजीव का. हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर दबा लिया ।

बीतते वक्त के साथ-साय दीनों का प्यार गहरा होता जा रहा था । दिल की गहराइयों से वह एकदूसरे को चाहने लगे थे ।

शादी'कै बाद न जाने कितने ख्वाब देख डाले थे उन्होंने।

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फीनिश

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दो दिन बाद जब राजीव मल्होत्रा पुन. अपने दोस्तों कै पास पहुंचा तो वह तीनों उसी किराये वाले कमरे मेँ बैठे थे । . , राजीव ने महसूस किया कि वहां र्खामोशी का प्रभाव कुछ ज्यादा ही है। तीनों चुप वेठे हैँ। और कोई किसी से नहीं बोल रहा, जबकि उनमें कभी ऐसा नहीं होता था । खामोशी के दरम्यान वह स्मैक का बराबर इस्तेमाल कर रहे थे । राजीव के वहां आने पर भी उन्होंने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं जाहिर की ।

"क्या बात हे?” राजीव कुर्सी पर बैठता हुआ बोला-"चुप रहकर किसका मातम मना रहे हो?”

तीनों ने राजीव को देखा I पहलु वदला । बोले कुछ भी नहीं ।

"कुछे तो बोलो, इसतरह मुंहबंद किए क्यों बैठे हो?" राजीव ने पुन: कहा ।।

"दिवाकर ने अभी-अभी तोप का गोता छोडा है I” अरुण खेडा बोला । … . . .

"क्या मतलब?"

“हमारे पास पैसे नही हैं न । दिवाकर ने पैसे का इन्तजाम करने का रास्ता बताया हे । "

"कैसा रास्ता ?"

. "सनसान सी जगह पर बैक की छोटी ब्रांच है ।" कहता हे वहां बेंक कै पैसे को लूट लेते हैं ।"

"बेक डकैती I" राजीव चौंका ।

"हां l" हेगड़े ने गम्भीरता से सिर हिलाया-"वह ब्रांच मैंने भी देखी हे । शहर कै बाहरी हिस्से में पड जाती हे I वहाँ हमेँ पहचानेगा भी कोई नहीं । काम हो सकता हे l"
 
अरुण खेड़ा ने चौककर हेगडे क्रो देखा ।

"यानी कि तुम दिवाकर की बात से सहमत हो?"

"नहीं हूं तब भी होना पडेगा l” सूरज हेगडे ने व्याकुलता से कहा -" पैसे के बिना जो हम जिन्दगी जी रहे हैं, वह जिन्दगी नहीं है l जरा जरा से नशे कै लिए, उन्हें खरीदने के लिए हमेँ एक-दूसरे का मुंह देखना पड़ता हैं कि पैसा कहां से आए । लानत है ऐसी जिन्दगी पर । कब तक चलेगा ऐसा । पैसे का जुगाड तो आखिर कहीँ से करना ही होगा !"

“बैंक डकैती का मतंलब समझते हो?” राजीव ने गम्भीर स्वर में पूछा ।

"सब समझता हूं। तुमसे अच्छी तरह समझता हूँ।” हेगडे ने तीखे स्वर मेँ कहा-"लेकिन मेरे दोस्त, तुम नशे करने का मतलब नहीं समझते कि जब नशे की जरूरत पड़े और पैसे ना हौं तो क्या हाल होता है, हम लोगों की जान निकलने लगती है । चुटकी भर स्मैक कै लिए हम हर किसी कै भी पांव धोकर पीने को तैयार हो जाते हैँ । लानत है ऐसी जलालतभरी जिन्दगी पर I और फिर यह दो एक दिन की बात तो हे नहीं, हमेशा का ही मामला है I कब तक चलेगा? जब भी नशा मिलंने का सिलसिला रूका, हमारी जानों का सिलसिला भी रुक जाएर्गों I इन सब बातो से तो बेहतर हे कि हम एक ही बार में किस्मत आजमा लें ।”

अरुण खेडा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी ।

राजीव ने चिन्ता भरी दृष्टि तीनों पर डाली ।

"तुम-तीनों बड़े-वड़े खानदानों से सम्बन्ध रखते हो I आधा शहर तुम लोगों के खानदानों के नाम से जानता है । सिर्फ इतना सोचो कि बेक-डकैती कै दरम्यान अगर तुममें से कोई पकड़ा गया तो क्या होगा? बदनामी का बहुत वड़ा धब्बा पकड़े जाने वाले खानदान पर हमेशा के लिए लग जाएगा । जरा इस तरफ भी ध्यान दे लो l”

"ठीक कहते हो तुम I" दिवाकर ने मुंह खोला…"पक्रड़े जाने पर हमारे खानदानों पर बदनामी का धब्बा लग सकता हे I इस बारे में मैं सोच चुका हूँ। लेकिन हमारे पास कोई और चारा भी तो नहीं । अपने नशे की लत क्रो कहां से पूरा करे??? धर वालों ने तो खोटा पैसा भी हमें देना बंद कर रखा हैं । वैसे हमारो कोशिश होगी कि पकडे न जायें । मेरी एक खास पहचाना वाला हैं, जो उधार के तौर पर हमें रिवॉल्वर दे सकता है । बैंक-डकैती में हम रिबॉंल्वरों का इस्तेमाल कर सकते हैं I महज डराने की खातिर, किसी की जान नहीँ लेनी है हमेँ । वैसे भी रिबॉंल्वरों कै सामने किसकी हिम्मत पडेगी जों आवाज़ उठाएगा ।"

हेगडे दिवाकर की बात से सहमत था, परन्तु अरुण खेड़ा कुछ हिचकिचा रहा था I

हिचकिचाहट का कारण था कि अगर पकडे गए तो किसी क्रो मुंह दिखाने कै काबिल न रहेंगे । तब ना तो घर वाले साथ देंगे औऱ ना ही समाज वाले ।

एकाएक अरुख खेडा ने राजीव मल्होत्रा को देखा I

“तुम्हारा इस बारे में क्या बिचार है?”

"मेरा ?" राजीव ने जहान-भर की हैरानी से उसे देखा ।

“हां, मैं तुमसे ही पूछ रहा हू। अगर हम बैंक-डकैती करते हैं तो तुम भी उसमें शामिल होऔगे । आखिर तुम्हें भी तो पैसे की जरूरत है । नहीं तौ शादी कैसे करोगे?”

“पागल हो गए हो क्या ।" खेडा की बात सुनकर राजीव सकपकाकर बोला-“शादी करने के लिए मुझे पैसे चाहियें तो क्या उसके लिए में वैक-डकैती करूगा? मेरा दिमाग ठीक है अभी । तुम अपने नशे को पूरा करने के लिए जो भी करो । मुझे इस खतरनाक मामले मेँ मत धसीटो l"

."यह वास्तव में पागल हो गया है l” दिवाकर ने व्यग्यभरे स्वर में कहा-"शादी करना चाहता है । कोई अच्छी सी नौकरी करके. और साथ में चाहता हे कि शादी कै बाद पैसे की किसी प्रकार की दिक्कत ना आए । देखना ना तो यह शादी कर पाएगा और ना ही इसे कहीँ से अच्छा पैसा हासिल होगा l ऊपर वाले ने जो लडकी इसकी झोली मेँ डाली हे, वह किसी . ओर की झोली मेँ चली जाएगी।"

"दिवा.....कर ....!”

"चीखने की क्या जरूरत है l" सूरज हेगड़े कह उठा… "दिवाकर ठीक ही तो कह रहा हे । ऐसे मोके बारम्बार नही मिलते । फिर तुम्हें तो दो खूबसूरत मौके मिल रहे हैँ । शादी करने का मौका । लडकी तुम्हारे पास है ही l दूसरा, हमारे साथ दौलत हासिल करने का मौका l"

"बैंक डकैती करके?"

"हां I"

"हम लोग मच्छर मारने कै भी काबिल नहीँ हैं और बैंक डकैती करने की सोच रहे हो । नहीँ भी मरना तो भी मरेंगे। पहले खुद को अच्छी तरह ठोकबजा कर देख तो लो कि तुम लोग किस काबिल हो । डकैती करना तुम लोगों के बस का रोग है भी?" राजीव तीखे स्वर में बोला ।

"कोशिश करने में क्या हर्ज है ।" दिवाकर खुलकर मुस्कराया-“आवश्यकता ही आविष्कार की जननी हे i हमारे साथ ही तुमने स्कूल-कॉंलेज में पढा था I अब हमेँ पैसे की_आवश्यकता हे तो इसी कारण हमने बैंक को लूटने की सोची है l कहने को बैक डकैती अवश्य हे, परन्तु वास्तव मे' बहुत हल्का सा काम हे । मामूली सी बेंक ब्रांच हे । चंद लोगों का स्टाफ है और वीरान जगह पर स्थित हैं , बेंका ग्राहक भी वहाँ इक्का दुक्का ही जाते हैं । खतरे वाली कोई बात नहीं ।"

"कहने की बाते है । जब यह काम करने जाओगे, तव पता चलेगा कि.... “

“राजीव !" सूरज हेगड़े बोला…"हम चारों दोस्तों को , अपनी जरूरतें पूरी करने कै लिए पैसे की सख्त जरूरत है। हमने तो पूरा -पूरा विचार बना रखा हे कि तुम्हें भी इस काम में शामिल करना हे ताकि अपने शादी जैसे ख्वाब को पूरा कर सको और शादी कै बाद तुम्हें किसी `भी चीज की कमी न रहे शादी का मजा तो तब ही हे ! आगे तुम्हारी मर्जी । दोस्ती का फर्ज चाहे जैसे भी हो । हम पूरा कर रहे हैँ। कल का दिन हमारे पास है। परसों हमने बेक लूटने का विचार बनाया हे । अगर हमारे साथ मिलकर इस काम में हाथ डालने की इच्छा हों तो कल सुबह आ जाना । नहीं तो तुम्हारी मर्जी। जोर देकर तो हम तुम्हें अपने साथ मिला नहीं सकते और न ही मिलाना चाहते हैं । यह तो मनमर्जी कै सौदे होते हैं i कोई और बात होतीं तो हम तुम्हें जोर भी देते । परन्तु बैंक को लूटने वाले काम में हम तुम्हें जोर नहीं दे सकते । समझा ही सकते हैं कि जिन्दगी भर पाई-पाई को तरसने की अपेक्षा एक ही बार जिन्दगी को दांव पर लगा देना कहीँ बेहत्तर है ।"

राजीव सूरज हेगडे की आंखों में झाकता रहा, बोला कुछ भी नहीं ।

"क्या सोच रहे हो?" खेडा ने उसका कंधा पकडकर हिलाया-"डकैती के लिए मैं भी तैयार नहीं था, लेकिन डकैती करना ही अब मुझे भला रास्ता नजर आ रहा हे । दिवाकर बेवकूफ नहीं है । अगर इसने बैंक डकैती का स्रोचा हे, वैंक की आसानी से लुट जाने वाली कोई ब्रांच तलाश की हे तो ठीक हीँ की होगी । किस्मत आजमा लेने से इसे पीछे नहीं हटना चाहिए ।"

"'नहीं, मै तुम लोगों के साथ इस काम में शामिल नहीं हो सकूगां I” राजीव मल्होत्रा ने दूढ़त्ताभरे स्वर मेँ कहा और उठकर बाहर निकलता चला गया ।

तीनों के बीच एक बार फिर गहरा सन्नाटा छा गया ।

दिन-भर वहा लोग बैंक डकैती की ही बातें करते रहे I साथ ही साथ स्मैक का दोर भी चलता रहा l शाम को अंधेरा घिरने पर वह तीनों उठे l वह रात उन्होंने अपने-अपने घरों में जाकर बिताई ।
 
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