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स्वाहा

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स्वाहा..

लेखक:- राज भारती

हवाएं चींख रही थीं। मूसलाधार बारिश जारी थी। आकाश से धरती तक मानो पानी की चादर-सी तन गई थी। रात के दो बजे थे। भयानक अन्धेरी रात.... गरजते बादल....कड़कती बिजली.... बारिश के शोर और दरवाजे-खिड़कियां बजाती हवा ने वातावरण को जैसे प्रेत ग्रस्त बना रखा था।

ऐसे में उसने वह खताब फिर देख लिया था।

बड़ा ही अजीव ख्वाब था । भयावह, खौफजदा और सहमा को वाला और इस खाव को वह अब निरन्तर देखने लगी थी। हर दूसरी-तीसरी रात वही ख्वाब देखती थी वह आज भी जव उसकी आंख खुली तो उसके शरीर में कम्पन था । वह हौले-हौले कांप रही थी।

दिल बैठा जा रहा था। कंठ में कांटे से पड़ रहे थे। दिमाग जैसे शल होकर रह गया था।

पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि उसकी आंख खुल गई हैं या यह अभी तक ख्वाब देख रही हैं।

वह अभी एक घण्टा पहले ही तो सोई थी। आज शाम से उसकी तवियत ठीक न थी। दिल पर कुछ वोझ सा था। आज उससे ठीक तरह से खाना भी नहीं खाया गया था। खाना खाने के बाद वह चहलकदमी के लिए जरूर निकलती थी। आज वह टहलने भी नहीं निकली थी। बस आधा-अधूरा खाना खाकर ही अपने कमरे में आ गई थी।

फिर कुछ देर वह टी० वी के विभिन्न चैनल घुमाती रही। एक चैनल पर इंगलिश फिल्म आ रही था। वह देखने बैठ गई। फिल्म लगभग बारह बजे खत्म हुई। उसने टी० वी० ऑफ कर दिया। फिल्म सस्पेन्स वाली थी उसने कई सीन बार-बार उसकी निगाहों में घूम रहे थे। वह यूं ही कमरे से निकलकर गैलरी में आ गई और बाहर का नजारा करने लगी।

तभी निकट के एक पेड़ से एक परिन्दा उड़ा व तेजी से उसके सिर के पास से गुजर गया।

वह एकदम सहम गई।

वह काफी बड़ा पक्षी था चील जितना बड़ा होगा।

उसकी समझ में न आया कि रात के बारह बजे आखिर परिन्दे को उड़ने की जरूरत क्यों पेश आई। यही लगा था उसे जैसे वह परिन्दा उसे ही गैलरी में देखकर उसकी तरफ लपका था।

इस ख्याल ने उसे सहमा दिया।

वह फौरन कमरे में आ गई। दरवाजा अच्छी तरह बन्द किया और बिस्तर पर लेट गई।

नींद आंखों से कोसों दूर थी।

एक तो रहस्यपूर्ण, सस्पेस, फिल्म का असर, फिर उस पक्षी का बहुत ही पास से... उसके चेहरे को हवा देते हुए गुजर जाना। उसने सोचा कि वह नीचे जाकर सो जाए या फिर नीचे से किसी को अपने पास बुला ले। लेकिन ये दोनों ही ख्याल खुद उसे उचित न लगे।
 
कैसेटों के रैक से उसने एक कैसेट चुना और म्यूजिक सुनने लगी।

ध्यान बंटाने को उसे यही सूझा था।

धीमे संगीत के उसके इस अपनी पसन्द के कैसेट ने धीरे-धीरे उस पर असर करना शुरू किया....उसे नींद आने लगी। उसने लेटे-लेटे ही रिमोट कन्ट्रोल से कैसट प्लेयर ऑफ किया और करवट लेकर आंखें बन्द कर लीं।

"फिर अचानक ही उसे "परों" की फड़फड़ाहट सुनाई दी। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई पैरिन्दा उसके सिर पर से गुजर गया हो।

वह तत्काल उठकर बैठ गई।

कमरे की लाईट जल रही थी।

जब से रहस्यपूर्ण भयावह ख्वावों का यह सिलसिला शुरू हुआ था वह कमरे मे लाईट जलाकर सोती थी । दरवाजा भी बन्द था। किसी परिन्दे का उसके सिर पर से गुजर जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता था। यह महज इसका भ्रम था।

अपने इस ख्याल पर उसे शर्मिन्दगी महसूस हुई कि वह दिन-प्रतिदिन ऐसी डरपोक क्यों होती जा रही थी।

रिमोट कन्ट्रोल उठाकर उसने कैसेट प्लेयर फिर ऑन का दिया । लौरी देता हुआ संगीत फिर से कमरे में सुनाई देने लगा। संगीत सुनते-सुनते अन्ततः वह नींद की आगोश में चली गई।

और फिर.... 1

वह अभी लगभग एक घंटा ही सोई होगी, उस डरावने ख्वाब ने उसकी नींद उड़ा दी।

जब वह सोई थी तो दूर तक बारिश के आसार न थे। आंख खुली तो वातावरण का रंग ही कुछ और था। कुछ देर तक तो वह समझ ही नहीं पाई कि वह अभी ख्वाब ही देख रही हैं या जाग गई है।

कहीं दूर बादलों की गर्जना सुनाई दी..... अचानक ही विजली बड़े वेग से चमकी और बाहर धमाक से होने लगे।

वह धवराकर उठ बैठी।

कैसेट-लेयर अभी तक चालू था। उसके हाथ-पांव कांप रहे थे। दिल किसी पत्ते की तरह लर्ज रहा था। उसमें इतनी हिम्मत भी न थी कि वह रिमोट उठाकर कैसेट प्लेयर ऑफ कर दे।

फिर कुछ देर बाद उसके हवास सयंत हुए.... उसने सम्भाला लिया.... विवेक काम करने लगा तो उसने साइड टेबिल पर रखे जग से पानी निकाला और गटागट करके पी गई। कुछ इस तरह जैसे सदियों से यासी हो। सूखा गला तर हुआ। संज्ञा शून्य जहन खुला तो उसे वह ख्वाब याद आया जिसकी वजह से उसकी आंख खुली थी।

यह विचित्र अनूठा सपना वह कई माह से देख रही थी। शुरू में यह ख्वाब महीने दो महीने के वाद नजर आता था । फिर धीरे-धीरे यह अन्तराल कम होने लगा। सप्ताह... दस दिन के बाद.... अब तो यह ख्वाब लगभग हर रोज ही नजर आने लगा था।

हां, पिछले पांच दिनों से वह इस ख्वाब को निरन्तर देख रही थी।

वह देखती कि अन्धेरी रात है, कहीं दूर से भेड़ियों की गुर्राहट की आवाजें आ रही है। फिर सहसा ही भयावह अन्धेरी रात... एक प्रकाशमान दुबल दिन में बदल जाती। अब उसे दूर क्षितिज तक फैला एक रेगिस्तान दिखाई देता । दूर-दूर तक रेत ही रेत उड़ती दिखाई देती। इस रेगिस्तान में वह स्वयं को भटकता महसूस करती नंगे पांव और गर्म रेत पर चलते-चलते... अचानक ही एक झोपड़ी उसके सामने आ जाती। इस झोपड़ी की छत पर उसे एक उल्लू बैठा दिखाई देता और झोपड़ी के दरवाजे पर कुण्डली मारे एक सांप काले रंग का फन उठाए-अपनी जिव्हा लपलपाता नजर आता।
 
इस भयावह दृश्य को देखकर वह भागने लगती तो पीछे से आवाज आती-

"डरा मत वहन... आओ, झोंपड़ी के भीतर आ जाओ...।"

यह किसी मर्द की आवाज होती। पुकारने वाले की आवाज से एक पीड़ा, एक व्यथा का सा आभास होता-जैसे बुलाने वाला किसी कप्ट का शिकार हो और अपनी मदद के लिए किसी को अन्दर बुलाना चाहता हो ।

इस आवाज पर वह पलटकर देखती तो पुकारने वाला तो दिखाई न देता अलबत्ता वह खौफनाक काला सांप उसकी "तरफ झपटता और वह चींख मारकर रोने लगतीं।

और तभी घबराकर उसकी आंख खुल जाती।

इस वक्त भी उसने यही ख्याब देखा था।

तपता रेगिस्तान ... गोल झोपड़ी की छत पर बैठा उल्लू...सांप और अन्दर से आती वह दर्दभरी आवाज।

"डरों मत बहन... आओ, झोपड़ी के भीतर आ जाओ।"

उसने अपने दिमाग पर बहुत जोर डाला था कि वह इस आवाज को पहचान जाए, लेकिन वह पहचान न सकी थी, यह आवाज उसके लिए निदांत अजनबी थी। उसके किसी प्रियजन, किसी सगे-सम्बन्धी या जानने वाले की आवाज नहीं थी।

वह एक निडर लड़की थी। लेकिन इस ख्वाब के खौफ ने उसकी निर्भयता व दुस्साहस में दरारें डालना शुरू कर दी थी। अब वह सोचने लगी थी कि कल से वह नीचे सोयेगी या फिर अपने साथ कमरे में किसी को बुलाकर सुलारागी।

लेकिन सुलाएगी किसको ?

ले-देकर माया ही तो थी जो उसके साथ सी सकती थी या फिर गंगा मौसी थी। मगर मौसी ऊपर नहीं आ सकती थी।

वह गठिया की मरीज थी...सीढ़ियां चढ़ना उसके बस की बात न थी। बस यही हो सकता था कि वह खुद ही उनके

कमरे में जा सोया करे।

उसने अभी तक अपना यह ख्वाब किसी को नहीं बताया था....गंगा मौसी की भी नहीं, लेकिन अब उसमें हिम्मत न रही थी । उसने तय कर लिया था वह सुबह होते ही गंगा मौसी को अपने इस सपने के बारे में जरूर बताएगी।

यूं तो अभी उसकी उम्र खैर से ख्वाब ही देखने वाली थी,

सुहाने और मीठे ख्वाब इस उम्र में लड़कियां ऐसे रहस्यमय व भयभीत करने वाले ख्वाब कहा देखती हैं? उन्हें तो हर तरफ घोड़े पर सवार एक सुदर्शन राजकुमार ही नजर आता है। वे अपनी पसन्द के अनुसार अपने-अपने 'आईडियल' के सपने देखती हैं। वह कौन होगा? कहां से आयेगा? कब आएगा?

लड़कियां ही क्या ख्वाब तो ममी देखते हैं। क्या बूढ़े ? क्या बच्चे? क्या जवान? अपनी-अपनी अतृप्त ख्वाहिशों को पूरा होते देखने के लिए, अपनी उम्र का आधा हिस्सा इंसान आंखें बंद करके गुजार देता है। यह वन्द आंखें कितनी पुरसुकून हैं-कार-आमद हैं यह बात कोई उन लोगों से पूछे जो करबटें बदलते, खुली आंखों से गुजार देते है। सच ही में नींद और ख्वाब ऊपर वाले का वरदान है। अगर इन्सान से उसकी नींद, उसके ख्वाब छीन लिए जाएं तो यह जीवन नर्क बन जाए। कैसा यातनामय हो जाये...।

ये ख्वाब, गरीब को अमीर बनाते हैं और कुंवारों को विवाहित। यह तो प्रभु कृपा है कि सपनों कोई अंकुश नहीं हैं इनकी कोई सीमा नहीं है। इंसान कैसे से ख्याब देखता है.... अगर यही ख्वाब यातनामय हो जाए तो कैसे-कैसे मासूम कैसी-कैसी सजा पायें?

उसे दिखाई देने वाला यह ख्ताव उसके लिए किसी सजा से कम नहीं था।

वह सोच-सोच कर हलकान हुई जा रही थी कि आखिर उसे यह सजा क्यों मिल रही है। यह ख्वाब उस पर, उसकी नींद पर, क्या हावी कर दिया गया है। इस दिल दहला देने वाले ख्वाब के बारे में सोचते-सोचते अंतत: उसे नींद आई
 
और फिर...।

प्रातः अगर नौकरानी माया उसे न उठाती तो वह न जाने कब तक सोती रहती।

"बीबी! क्या इरादा है, आज उठना नहीं क्या...?" नौकरानी माया ने उसका बाजू हिलाया ।

"ओह, माया ! क्या बजा है?" उसने आंखें मलते हुए पूछा।

"बहुत कुछ बज गया, बीबी और बहुत कुछ हो गया। अब उठ जाओ...!"

"क्या हो गया है?" वह एकदम चौंक गई। रात का ख्वाब बड़ी तेजी के साथ उसकी आंखों के सामने घूम रहा था। उसका दिल बेअख्तयारही तेजी से धड़कने लगा था। उसने शंकित भाव से पूछा, "खैरियत तो हैं माया...?"

"हां, वीबी... खैर है? परेशानी वाली कोई बात नहीं। वो आपके एक दादा थे ना- अरे वही दादा हरी ओम... वो जी चल

बसे! घर के सब लोग जाने की तैयारी कर रहे हैं...।"

"अरे...। माया उमरे फिर मुझे उठाया क्यों नहीं...।" वह तेजी से उठकर खड़ी हो गई, "तुम भी हद करती हो...।" "ओह बीवी! अभी तो आया है फोन। बड़ी बीबी ने जैसे ही मुझसे कहा- मैं फौरन आपका उठाने आ गई हूँ।" "क्या मौसी भी जा रही है, वहां...?"

"जा रही हैं? वह तो दरवाजे पर खड़ी हैं। तैयार है जाने के लिए...।"

"अच्छा, माया तुम मौसी से जाकर कहो। मैं मुंह-हाथ धोकर अभी नीचे आ रही हूँ।" यह कहते हुए वह बाथरूम की तरफ बड़ी- "मेरा इन्तजार करें, मैं उन्हीं के साथ जाऊंगी...।"

"ठीक है, बीबी। आप जरा जल्दी से नीचे आ जाएं।"

वह जल्दी-जल्दी तैयार होकर नीचे पहुंची। उल्टा सीधा नाश्ता किया और फिर वह गंगा मौसी के साथ गाड़ी में आ बैठी।

अमर जो ड्राईविंग सीट पर बैठा था उसने जरा-सा तिरछा होकर उसे देखा और पूछा "आज आप कुछ ज्यादा दर से नहीं उठीं?"

"हां आज कुछ ज्यादा ही देर हो गई, " बड़े सहज भाव में व सक्षिप्त सा जवाब दिया था उसने।

इसके साथ ही उसे फिर बीती हुई भयानक रात याद आ गई। वह भयावह ख्वाब उसकी नजरों में धूम गया था। उसने बटाने बंटाने के लिए बस यूं ही गंगा मौसी से पूछा-

"मौसी ! दादा की डेथ कब हुई?"

"सुबह, मुंह अन्धेरे।" गंगा मौसी ने बताया- "बड़े ही खुशनसीब थे वो भगवान ऐसी मौत सबको दे।"

"वह कैसे मौसी?" उसने जिज्ञासावश पूछा।

"नहा-धोकर ध्यान लगाते-लगाते ही प्रभु से जा मिले बेटी! घर के लोग जब जागे तो वह समाधि लगाए बैठे थे और प्राण पखेरु उड़ चुके थे। काफी समय से ध्यान लगाए बैठे थे। उन्हें पहले आवाज दी... जवाब न मिलने पर हाथ लगाया गया... हाथ लगाते ही वह एक तरफ को लुढ़क गए...।" गंगा मौसी ने गहरा ठण्डा सांस लिया।

"मौसी...! उम्र क्या होगी दादा की...?"

"बस एक साल की कमी रह गई। अगर एक साल और जी जाते तो पूरे सौ साल के हो जाते।"
 
"वाकई, मौसी ! इतनी उम्र थी उनकी...?"

और मौसी बड़े चाव से बोली- "अब तो वह दोबारा से जवान होने लगे थे। वाल काले हो रहे थे और दांत दोबारा निकल रहे थे।"

"रहने दे मौसी !" इस बार अमर बोला। उसे मौसी की बात पर जैसे यकीन न आया था।

"अच्छा-अच्छा! गाड़ी सामने देखकर चलाओ।" गंगा मौसी बोली व फिर बात का रुख दूसरी तरफ मोड़ते हुए "बोली- "एक बात और मशहूर है उनके बारे में वो सपनों का स्वप्न फल बहुत सटीक व अच्छी तरह बताते थे।"

सपना... ख्वाब...!

"सच मौसी !' वह एकदम चौंक गई और इसके साथ ही यह भी सोचे बिना न रह सकी- "हाय, दादा जी! आपने जाने में इतनी जल्दी क्यों की?"

काश! वह अपना ख्वाब उन्हें सुना सकती और उनसे मार्ग-दर्शन पा सकती। शायद वो ही उसे इस मानसिक यातना से मुक्ति दिला सकते।

"हां, यह सच है।" गंगा मौसी गम्भीरता के साथ बोली ।

"मौसी, एक बात बताए-उल्लू के बारे में आपका क्या ख्याल है?"

"अरे! यह अचानक तुम्हें उल्लू का ख्याल कैसे आ गया?" गंगा मौसी ने गर्दन घुमाकर उसकी तरफ देखा। मौसी हकीकत में बड़ी हैरान थी।

"बड़ा ही रहस्यमय व मिसटीरियस परिन्दा है।" मौसी के जवाब देने से पहले ही अमर बोल उठा- ''वेस्ट' वाले उन्हें दार्शनिक समझते हैं। अक्ल व ज्ञान का लक्षण मानते हैं।" यूरोप के एक बड़े पब्लिशर ने उल्लू की तस्वीर को अपना मोनोग्राम बनाया हुआ है और ईस्ट वाले उव्ह, को वेवकूफ

समझते हैं। हमें किसी को मूर्ख बेवकूफ कहना हो तो उल्लू कह देते है।

"अक्लमंद या बेवकूफ का तो मुझे मालूम नहीं हां, अपने बड़ों से इसकी मनहूसियत के बारे में जरूर सुना है। उल्लू जहा बैठते है वहां वीरानी फैलने लगती है। शायद इसी कारण यह उल्लू बोलने का मुहावरा बना है।" गंगा मौसी का जवाब था।

बस इसी तरह की बातें करते हुए वे दादा हरी ओम के घर पहुंच गए। काफी लोग इकट्ठे हो चुके थे और जैसे-जैसे लोगों को उनकी मौत की खबर मिलती जा रही थी संख्या बढ़ती जा रही थी।

इन्सान की वास्तविक लोकप्रियता का अंदाजा उसकी मौत के बाद होता है। जिन्दगी में तो बहुत-से स्वार्थ आदमी की एक-दूसरे के द्वार पर ले जाते हैं। लेकिन आदमी मरने के बाद तमाम स्वार्थों व जरूरतों से मुक्त हो जाता है कुछ भी तो नहीं रह जाता, न दौलत रहती है, न कुर्सी रहती है और ना ही हैसियत रहती है। बस मिट्टी का पुतला जो राख बनने को रह जाता है। तब मालूम होना है वह किसके कितने काम आया।

औपचारिकताओं के बाद जब दादा जी की अर्थी उठी तो मालूम हुआ कि दादा क्या चीज थे। बहुत से लोग थे उनकी इस शवयात्रा में और हर आंख आसुओं से भरी थी। अपनी जिन्दगी में दादा हरी ओम ने जाने कितने लोगों का दर्द बांटा होगा, कितने लोगों का बोझ उठाया होगा। ओज वही लोग दादा को अपने कन्धों पर उठाए हुए थे।
 
अंतष्टी के बाद अमर घर वापस चला गया था जबकि गंगा मौसी और वह वहीं रह गई थीं।

गंगा मौसी ने कहा था कि वे बाद में खुद डी घर पहुंच जाएगी और अमर को पाने की जरूरत नहीं।

दादा हरि आम के सात बेटे थे और मजे की बात यह थी कि वे सातों-के-सात इसी घर में रहते थे और सातों जिन्दा थे।

. बड़ा बेटा घनश्याम साठ साल से ऊपर का होगा-रिटायर्ड जिन्दगी गुजार रहा था। सब की शादियां हो चुकी थीं। सक्ठं बच्चे थे और बच्चो में से भी कईयों की शादियां हो चुकी थीं। यानी कि दादा हरिओम सिर्फ दादा न थे बल्कि वह परदादा थे।

सातों भाईयों में बड़ा अपनापन था। लेकिन इन भाईयो की सन्तानों में प्यार मुहब्बत न थी। उनमें से कई लड़के घर छोड़कर जा चुके थे और अलग-अलग मकानों में रहते थे। इन सात भाईयों की पत्नियां भी बहुत अच्छी थीं। उन्होंने इस घर में आकर घर को जोड़ने की तो कोशिश की थी-तोड़ने की कोशिश न की शी।

गंगा मौसी, दादा हरि ओम के बड़े बेटे धनश्याम से बातें कर रही थीं। घनश्याम अपने वाप की खूबियां ब्यान कर रहा दादा की जिन्दगी की घटनाएं, उनसे जुड़ी यादें और उनके गुणों की ही चर्चा हो रही थी और गंगा मौसी यह सव बड़े शौक से बड़ी दिलचस्पी के साथ सुन रही थीं।

तभी धनश्याम की पत्नी मीरा हाथ में ट्रे लिये अन्दर आई। ट्रे में चाय के चार कप रखे थे। मीरा ने उन तीनों को एक-एक कप दिया व चौथा स्वयं लेकर सोफे पर बैठ गई। पर तभी न जाने क्या ख्याल आया कप मेज पर रखा और अपने पति धनश्याम के पास जाकर उसके कान में कुछ कहा।

घनश्याम ने अपनी बीवी की बात सुनकर उसकी तरफ देखा, फिर कहा- "ठीक है जाओ, ले आओ...।"

"गंगा मौसी, मैं अभी आई।" यह कहती हुई मीरा कमरे से निकल गई।

"घनश्याम भाई! खैरियत तो है।" गंगा मौसी बेचैन होकर बोली।

इस लड़की की एक अमानत है मेरे पास। " धनश्याम ने उसकी तरफ देखते हुए कहा- "बाबा ने मरने से एक दिन पहले ही मेरे हवाले की थी। उन्होंने कहा था कि जब यह यहां आये तो इसे दे देना।"

"ऐसी क्या चीज है जी दादा हरिओम इसके लिए दे गए हैं।"

• यह तो मैं भी नहीं जानता। वह एक लिफाफा है।" घनश्याम ने चाय का घूंट लेते हुए कहा ।

गंगा मौसी की हैरत बढ़ी ही थी।

"क्या आपको यकीन है कि यह लिफाफा इसी के लिए है? यह तो दादा से शायद सिर्फ एक ही बार मिली है...।" गंगा मौसी ने बेचैनी से कहा।

"गंगा-क्या यह तुम्हारी भांजी नहीं है?"

"क्या लिफाफे पर इसका नाम लिखा है?" गंगा मौसी कुछ सोचका बोली- "मैं नहीं समझती कि दादा ने सिर्फ एक मुलाकात में ही इम याद रखा होगा, नुम्हें शायद कोई गलतफहमी हुई है घनश्याम ! वह लिफाफा किसी और के लिए होगा।"

ये बातें हो ही रही थी कि मीरा सफेद रंग का एक लम्बा-सा लिफाफा लिए अन्दर आई नीर उसनें वह लिफाफा घनश्याम के हाथ में दे दिया।

वह भी चाय पी रही थी। गंगा मौसी व घनश्याम की बातों नं उसे भी चौंकाया था और यह सचमुच ही बड़ी हैरत की बात थी कि स्वर्गीय हरि ओम ने ना सिर्फ उसे याद रखा था बल्कि उसके लिए एक लिफाफा भी छोड़ा था। दादा से.. वह सच ही में सिर्फ एक ही बार मिली थी और उनसे ऐसी कोई घनिष्ठता भी न थी कि वह कोई पत्र उसके लिए छोडते
 
गंगा मौसी का यह ख्याल भी सही था कि दादा को तो उसका नाम भी याद न रहा होगा।

घनश्याम ने उस लिफाफे को उलट-पुलट कर देखा, बोला- "गंगा! लिफाफे पर कोई नाम नहीं लिखा है। लेकिन तुम मुझे मेरे सवाल का जवाब दी कि क्या यह तुम्हारी भांजी नहीं....! "

"भाजी है लेकिन सगी नहीं और यह बात सब जानते है।"

"बात सगे या सौतेले की नहीं है गंगा! यह तुम्हारी भांजी है ना, चाहे रिश्त की सही और इसका नाम...।" घनश्याम

बोलते-बोलते सोचने लगा। "इसका नाम रेखा है।" गंगा मौसी ने उसका नाम बताया और उसकी तरफ देखा ।

घनश्याम वोला- "मुझे बाबा ने यह लिफाफा देते हुए कहा था कि 'वह' लड़की गंगा मौसा के साथ आएगी उसे यह लिफाफा दे देना और उसे हिदायत कर देना कि वह यह लिफाफा सबके सामने न खोले अपने घर जाकर एकांत में खोले। इस लिफाफे में इसका ख्वाब बंद है।

'ख्वाब...!" वह चौंकी।

उसका नाम रेखा ही था। ख्वाब के जिक्र पर उसका चौंकना स्वभाविक था। वह बोल उठी- "मेरा ख्वाब...! लेकिन दादा जी को कैसे पता चला। मैने तो अपने ख्वाब का जिक्र ही अभी तक किसी से नहीं किया है, गंगा मौसी से भी नहीं फिर... ?"

गंगा मौसी उसकी सूरत देखने लगी।

"यह मैं नहीं जनता घनश्याम लापरवाही से बोला और अब तुम्हारे इस इकरार के बाद यह पक्का हो जाता है कि यह लिफाफा तुम्हारे लिए है। याद आया एक बात और भी कही थी बाबा ने...।"

"वह क्या...?" रेखा ने अपने होठों पर जिन्हा फिराई।

"उन्होंने कहा था कि उस लड़की का नाम रेखा है... लेकिन यह उसका असली नाम नहीं है।" उसका असली नाम शीना है....।"

"शीना.....!" रेखा परेशान होकर बोली- "लेकिन... लेकिन... नाम तो रेखा है और यह सब जानते हैं।"

"इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता.....। बाबा ने मुझसे जो कहा था, वह मैंने तुम्हें बता दिया। यह लो अपनी अमानत...।" घनश्याम ने वह सफेद लिफाफा रेखा की तरफ बढ़ा दिया।

रेखा ने कांपते हाथों से वह लिफाफा थाम लिया।

उसे उलट-पुलट कर देखा और फिर अपने हैण्ड बैग में रख लिया। .

"रेखा, वेटी...!" घनश्याम उसे परेशान देखकर बोला- "शायद तुम्हें यह बात मालूम न हो कि बावा एक ज्योतिषी भी किसी का भी भूत, वर्तमान, भविष्य उनसे छिपा न रहता था। और ख्वाब... ख्वाबों की पहेली का हल बताने में तो वो माहिर थे। लोग दूर-दूर से उनसे अपने सपनों का स्वप्न फल मालूम करने आते थे."

"मुझे मालूम है।" रेखा धीमे से बोली- "मौसी ने आज ही रास्ते में मुझे बताया था।"

"और आज ही मुझे भी अपने बाबा के बोरे में एक बात और मालूम हुई है कि स्वप्न फल के साथ-साथ, खताब देखने वाले के भूत व भविष्य से भी अच्छी तरह वाकिफ हो जाते थे। सब कुछ जान लेते थे। तुम यह कह सकती हो बेटी कि वो बहुत पहुंचे हुए बुजुर्ग है। लेकिन उन्होंने खुद को हमेशा छिपाकर रखा।"

"अरे, आपको नहीं मानूम होगा। मुझे तो बाबा के बारे में अच्छी तरह अन्दाजा था कि वह कितने पहुंच हुए बुजुर्ग हैं। आखिर लोग उनके पास यूं ही नहीं आते थे।" मीरा खुद को बोलने से न रोक सकी थी।
 
बड़े चकरा देने वाले हालात थे। पहले वे भयावह स्वप्न और अब यह रहस्यमय लिफाफा रेखा बड़ी मुश्किल से ही

खुद को सयंत रख पा रही थी। कुछ देर बाद ही गंगा मौसी और रेखा ने घनश्याम से इजाजत ली। गंगा, मीरा से गले लगकर मिली। घनश्याम ने

अपने बड़े वेट को बुलाकर उससे कहा कि वह उन दोनों को अपनी गाड़ी में उनके घर तक छाड़कर आए।

गंगा मौसी ने मना भी किया कि इस कष्ट की जरूरत नहीं कि वे किसी रिक्शा या ऑटो में घर पहुंच जायेगी, लेकिन

घनश्याम ने उनकी एक न सुनी। वे घर के गेट तक गंगा मौसी व रेखा को विदा करने आए और जब तक वह गाड़ी में बैठकर चली न गयीं, वो गेट पर ही खड़े रहे।

वापसी का सफर बड़ी खामोशी से कटा ।

गंगा मौसी ने बात करनी भी चाही, लेकिन रेखा ने जवाब में उन्हें खाली-खाली निगाहों से देखा तो वह समझ गई कि

रेखा अन्दर से परेशान है।

रेखा वास्तव में, ही परेशान थी।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि दादा जी की उसके खाब के बारे में किस तरह पता चल गया था और इस लिफाफे में उसके भयानक सपने का कैसा स्वप्न फल बंद है।

रेखा शीघ्र अतिशीघ्र इस स्वप्स फल के बारे में जान लेना चाहती थी।

घर पहुंचते ही, रेखा ने साधे ही अपने कमरे का रुख किया। सीढ़ियां चढ़कर वह अपने बैडरूम में दाखिल हुई। दरवाजा बंद किया हैण्ड बैग बैड पर उछाल दिया और बाथरूम में जा घुसी।

वह नहा-धोकर बाहर निकली। ठण्डे पानी से राहत-सी पहुंची थी। वह स्वयं को तरोताजा महसूस करने लगी थी। वह दादा का पत्र पढ़ने को बेकरार थी। और फिर अभी उसने बैग से लिफाफा निकाला ही था और खोलना ही चाहती थी कि सहसा दरवाजे पर दस्तक हुई।

दरवाजा बड़े जोर से फड़फड़ाया जा रहा था और साथ ही माया चींख भी रही थी-

"जल्दी दरवाजा खोलें, बीबी...।

रेखा ने लिफाफा फौरन वापिस बैग में रखा और को बैड पर छोड़ दरवाजे की तरफ बढ़ी।

माया की हड़बड़ाहट ने उसे बदहवास कर डाला था। उसका दिल बड़े जोर-जोर से धड़कने लगा था।

"हे प्रभु... कृपा...।" रेखा ने जैसे ही दरवाजा खोला तो उसे देखकर वह बरबस ही चींख मारकर पीछे हट गई।

माया के हाथ में एक पिन्तरा था और उस पिंजरे में एक उल्लू बन्द था। रेखा ने उल्लू को देखकर ही चींख मारी थी। माया ने वह पिन्जरा दहलीज पर रख दिया व तसल्ली देते हुए बोली--"डरते नहीं बीबी ! यह पिन्तरे में बंद है।"

"यह पिन्तरा कहां से आया- कौन लाया है इस उल्लू को ...? रेखा सहमकर पिन्जरे में बन्द उल्लू को देख दूर से ही बोली।

"बीबी अभी एक आदमी आया था वही दे गया है।" माया ने पिन्जरे के कुन्डे पर हाथ रखते बताया।

फिर पूछा- "अन्दर ले आऊं, बीबी!"

"नहीं-नहीं...। तुम पागल हो गई हो क्या, माया...! रेखा ने उसे डांटते हुए कहा- "तुम अन्दर आ जाओ इसे वहीं रहने दो...।"

माया पिन्जरा वहीं छोड़कर अन्दर आ गई। रेखा कांपती टांगों से अपने बैड पर आ बैठी। बैड पर उसका बैग और वह बन्द लिफाफा पड़ा था जो दादा हरि ओम ने उसके लिए छोड़ा था और हिदायत दी थी कि उसे सबके सामने न खोला जाये
 
रेखा ने फौरन यह लिफाफा उठाकर बैग में डाल दिया और उसकी जिप बंद करते हुए दरवाजे पर रखे पिन्जरे को देखने लगी। वह उल्लू अपनी बड़ी-बड़ी जर्द आंखों से उसे ही घूर रहा था।

"मागा तुमने इस पिन्जरे को क्यों ले लिया? कौन था वह शख्स ?" रेख की परशानी बढ़ती ही जा रही थी।

"बीबी उस आदमी ने ज्यादा बात ही नहीं की। मैंने जैसे ही गेट खोला उसके यह पिन्जरा मेरी तरफ बढ़ा दिया और बोला कि शीना को दे दें।" मैंने कहा कि कौन शीना यहां इस नाम का कोई नहीं है, तो वह बोला कि अपनी रेखा बीबी को जाकर दे दें---" अच्छा मैं चलता हूँ और यह कहकर उसने पिन्जरा मेरे हाथों में थमा दिया और मेरे कुछ कहने से पहले ही चला गया।" माया ने बताया।

" शीला...sss रेखा को चक्कर- सा आ गया। उसने खुद को सम्भाला, कैसा शख्स था वह तुमने बड़ी गलती की माया। मुझे फौरन बुला लेना था।

"उसने मेरी बात सुनी ही नहीं।" माया मुंह बनाते बोली-"और वह बड़ा ही अजीब सा आदमी था, बीबी काले कपड़े पहने हुए था, बड़े लम्बे-लम्बे बाल थे, जो उसके कन्धों पर पड़े हुए थे। सांवले रंग का था। लम्बा चेहरा, कानों में बालियां, एक हाथ में तांबे का मोटा-सा कहा और उंगली में चांदी की पत्थर लगी अंगूठी। काली चमकती हुई आंखें, बस में और क्या बताऊं बीबी, कि वो कैसा आदमी था। मैंने तो इस तरह का आदमी पहले कभी नहीं देखा। फिल्मों में वो भूत-प्रेत उतारने वाले खौफनाक शख्य दिखते हैं ना बीबी! वह बस वैसा ही था। "

रेखा फौरन खिड़की की तरफ गई। इस खिड़की से घर का गेट साफ नजर आता था। खिड़की खोलकर उसने इधर-उधर देखा । मगर उसे कोई आदमी दिखाई नहीं दिया। उसने खिड़की बन्द की

पलटकर माया से सम्बोधित हुई-

"तुम्हें विश्वास है कि उस शख्स ने मेरा ही नाम लिया था?'

" जी बिल्कुल, बीबी ! पहले तो उसने शीना कहा, फिर जब मैंने इन्कार किया तो बोला कि उगाकर अपनी रेखा बीबी

को दे दो। उसने साफ-साफ आपका नाम लिया था बीबी। क्या आप उसे नहीं जानती ?" माया ने हैगन होकर पूछा।

"नहीं, माया! जाने कौन था वह शख्स और वह देकर भी क्या गया है...!" रेखा की निगाहें फिर पिन्जरे की तरफ उठ गई।

"हां, देखो भला। यह भी कोई देने की चीज है...."

"भाई है क्या घर में?" रेखा ने अमर के बारे में पूछा।

"नहीं बीबी ! वह एक घन्टा पहले कहीं गए हैं।"

"और मौसी?"

"वह अपने कमरे में हैं। पाठ पढ़ रही हैं। "

" अच्छा तुम इस पिन्जरे को लेकर नीचे चलो मैं आती हूँ...।"

"ठीक है, बीबी!"

और माया ने जैसे ही पिन्जरे का कुण्डा पकड़ने के लिये हाड़ बढ़ाया-उल्लू ने बेचैन होकर फौरन अपने पंख फड़फड़ाए और एक भयानक चीख मारी माया ने घबराकर अपना हाथ पीछे खींच लिया।

"माया इसे फौरन नीचे ले जाओ...।" रेखा बदहवास सी बोली ।

और माया ने जैसे ही फिर फिन्जरा उठाना चाहा उल्लू फौरन ही उसकी तरफ झपटा और जोर-जोर से अपने पंख फड़फड़ाये. हालाकि पिन्जरा छोटा था। उसके पर पूरी तरह खुल नहीं रहे थे। लेकिन बन्दे को खौफजदा करने के लिए बहुत थे।
 
माया ने डरकर एक बार फिर अपना हाथ खींच लिया था।

"अरे, माया क्या कर रही हो, पिन्तरा उठा लो।" रेखा ने सख्ती से कहा ।

माया ने फिर उसे उठाना चाहा तो उल्लू ने इस बार फिर भयानक चींख मारी और अपने पंख फड़फड़ाने लगा। माया हांफती कांपती-सी बोली- मैं इस पिन्तरे को नहीं उठा सकती। मुझे डर लग रहा है...।"

"अच्छा ठहरो मैं उठाकर देखती हूँ।" कहते हुए रेखा आगे बढ़ी।

उसके आगे बढ़ते ही वह उल्लू अपनी जगह साकत हो गया। रेखा ने हिम्मत करके पिन्जरे को तरफ हाथ बढ़ाया वह तैयार थी कि जैसे ही उल्लू चीखेगा, वह फौरन अपना हाथ खींच लेगी। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। उल्लू अपनी जगह सिकुड़ा- सिमटा व साकत बैठा रहा।

रेखा ने दिल कड़ा करके पिंजरा उठा लिया। उल्लू न फड़फड़ाया, न झपटा और न ही उसने खौफनाक आवाज

निकाली।

"लो माया, अब तुम नीचे ले जाओ इसे।" कहते हुए रेखा ने पिन्जरा माया के हाथ में दे दिया।

पिन्जरे का माया के हाथ में आना था कि उल्लू फौरन फड़फड़ा उठा। साथ ही उसने राक भयानक चीख मारी कुछ इस तरह कि माया ने पिन्जरा फौरन फर्श पर रख दिया और तेजी से सीढ़ियां उतरती चली गई।

वह शायद बुरी तरह डर गई थी।

माया के जाने के बाद रेखा ने पिन्जरे पर एक नजर डाली। खौफनाक उल्लू खामोशी से बुत बना- रेखा को अपनी बड़ी-बड़ी और जर्द आंखों से देख रहा था। उसकी आंखों में न जाने क्या बात थी कि खौफ की एक लहर रेखा के बदन में उतरती चली गई। रेखा ने पिन्जरे को वहीं छोड़ा व अपने कमरे में घुसकर दरवाजा बन्द कर लिया।

वह बैड पर आ बैठी और बैग से वह लिफाफा निकाला। लिफाफा हाथ में आते ही उसके दिल की धड़कनें सहसा ही

तेज हो गई। हाथ में कम्पन्न आ गया । यही सोच रही थी वह कि इस लिफाफे में जाने क्या बंद है? यह नौ इंच लम्बा और चार इंच चौड़ा एक सफेद रंग का लिफाफा था? रेखा ने उसे रोशनी की तरफ करके देखा तो

उसमें एक पत्र के रखे होने का आभास हुआ। उसने हिम्मत करके लिफाफा फाड़ा व खत बाहर निकाल लिया।

लेकिन यह एक खत तो कदापि नहीं था। कागज पर कुछ लिखा हुआ नहीं था। इस पर पेन्सिल है एक स्केच बना हुआ था और यह वही रेखा चित्र था जिसे वह कई रातों से निरन्तर देख रही थी।

एक गोल झोपड़ी। झोपड़ी की म पर बैठा हुआ उल्लू। दरवाजे पर कुण्डली मारे बैठा सांप। झोंपड़ी के अन्दर अन्धेरा यही तो वह दृश्य था जो उसे ख्वाब में नजर आता था।

बस एक आवाज की कमी थी। फिर एकाएक ही उसके दिमाग में वह आवाज भी गूंजने लगी-

डरते मत... अंदर आ जाओ।"

यह कागज सफेद था और इस ख्वाद वाले नजारे के अलावा उस पर कुछ नहीं लिखा था। रेखा ने कागज पलटकर देखा तो उस पर एक और रेखा चित्र दिखाई दिया। यह एक दरवाजा था- बन्द दरवाजा और दरवाजे के हैण्डल पर एक ताबीज लटका हुआ था।

इस दरवाजे व इसके हैण्डल पर लटके हुए ताबीज को देखते ही रेखा के दिमाग में एक धमाका-सा हुआ और उसके मुंह से वे अख्तयार निकला-

"अरे, यह तो नीचे वाले कमरे का दरवाजा है। "

उसने जल्दी से उस कागज को वापस लिफाफे में डाला और दरवाजा खोलकर हवा के तेज झोंके की तरह बाहर निकल गयी
 
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