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लेखक:- राजवीर/सतीश
मेरा अपने नये पाठकों से विनम्र निवेदन है कि कहानी से ठीक से तारतम्य बिठाने के लिए पहले मेरी पुरानी कहानि को एक बार पढ़ लें. कहानि पहले पढ़ लेने से आप को नयी कहानी का ज्यादा आनंद आयेगा, यूं नहीं भी पढ़ेंगे तो भी चलेगा.
!!अस्तु!!
!इति श्री पुरानी-कथा पुराण!
ख़ुशगवार अहसासों के जादुई रेशमी स्पर्श के बाद, हक़ीक़त की ख़ुरदरी सच्चाइयों का सामना करना वाकई में बहुत ही बेचैनी भरा होता है लेकिन इन सब के बीच जिंदगी मुतवातर अपने रास्ते पर आगे बढ़ती रहती है, मेरी भी बढ़ रही थी. जिंदगी के इस अनवरत प्रवाह में अभी बहुत सारे नए किस्सों ने आकार लेना है, अभी जाने कितने नये अफ़सानों की बुनियाद रखी जानी है, अभी कितनी जानी-अनजानी प्रेमगाथाओं ने मानव-इतिहास में अमर होना है लेकिन ये सब तो अभी नियति की कोख में भविष्य में सृजन होने की प्रक्रिया की कसौटी पर कसे जा रहे हैं.
प्रस्तुत कहानी ऐसी ही एक कथा का वर्णन है जिसका बीजारोपण तो अनजाने में कई साल पहले ही हो गया था लेकिन उस बीज़ को प्राणवायु प्रिया की शादी-समारोह में ही मिली. मेरी इस रचना में नायक-नायिका के मिलते ही काम-क्रिया में लिप्त हो जाना पसंद करने वाले पाठकों को वैसा ना हो पाने के सारांश में कोफ़्त तो बहुत होगी लेकिन जो पाठक काम-कथा में भावनात्मक और रचनात्मक आवेगों के गुण-ग्राहक हैं उन्हें ये कहानी खूब भायेगी … ऐसा मेरा विश्वास है.
एक बार फिर से अपने अफ़साने के सच्चा-झूठा होने का फैसला मैंने अपने पाठकों के विवेक पर छोड़ दिया है, अगर आप का मन इस को सच मानता है तो इसे सच जानें, अगर आपका मन इसको काल्पनिक मानता है तो इसे काल्पनिक ही मानें.
पेशे-ख़िदमत है एक अद्धभुत प्रेम-कथा के बीज के सालों पहले धूल-धूसरित होने और फिर कालांतर में उसमें से अंकुर पल्लवित होने से लेकर फ़ल के पकने और उस फ़ल की अद्धभुत लज़्ज़त चखने तक की … कच्चे-पक्के जज़्बातों और आधे-अधूरे अहसासों की पूरी दास्तान......सतीश
प्रिया से सपनों के साकार होने जैसे हसीन मिलन की रात के बाद से तो दिन ऐसे पंख लगा कर उड़े कि कब प्रिया की शादी सर पर आन पहुंची … पता ही नहीं चला. चूँकि मेरा घर प्रिया के मायके और ससुराल वाले घर के ऐन सेंटर में पड़ता था और शादी वाला होटल-कम-बैंक्वेट हॉल जोकि मेरे ही एक जानकार का था और जिसे मैंने बहुत कम पैसों में बुक करवा कर दिया था, वो भी मेरे घर से सिर्फ कोई एक-डेढ़ किलोमीटर दूर था. लिहाज़ा! प्रिया की शादी में सेंट्रल-पॉइंट मेरा ही घर था.
यूं तो मैं भाग-भाग कर जिम्मेवारी से प्रिया की शादी के काम निपटा रहा था लेकिन बार-बार मेरे दिल में प्रिया के मुझ से दूर चले जाने का सोच कर ही हूक़ सी उठती थी पर प्यार की रिवायत तो यही थी कि दिल का दर्द, दिल ही में रखना पड़ता है.
बकौल शायर ज़नाब सुदर्शन फ़ाकिर साहब
“होठों पे तबस्सुम हल्का-सा, आंखों में नमी सी ऐ ‘फ़ाकिर’ …
हम अहले-मुहब्बत पर अकसर ऐसे भी ज़माने आए हैं.”
प्रिया और मेरे सम्बन्धों के बारे में मेरी कहानी
हसीन गुनाह की लज्जत
में पढ़ें!
ख़ैर! प्रिया के पापा, यानि मेरे साढू भाई के स्वर्गीय ताऊ जी के एक बेटे बहुत सालों से शिमला में सेटल्ड थे. उम्र थी कोई पैंसठ साल लेकिन खूब तंदरुस्त और हट्टे-कट्टे. मिलिट्री से अर्ली रिटायरमेंट लेकर शिमला में ही सरकारी ठेकेदारी में जम कर पैसे कूट रहे थे.
उनके दो बेटे थे (दोनों शादीशुदा) और एक अविवाहित बेटी थी … कोई पैंतीस-छत्तीस साल की और नाम था वसुन्धरा! वसुन्धरा सुधा से दो-एक साल छोटी थी.
प्रिया के पापा के ये फर्स्ट कज़न साहब अपनी पत्नी और बेटी वसुन्धरा समेत प्रिया की शादी से तीन दिन पहले से ही मेरे ही घर में अड्डा जमाये हुए थे.
सुधा तो इन लोगों से पहले भी एक-आध बार मिल चुकी थी लेकिन मैं इन सबको पहली बार ही मिल रहा था. वसुन्धरा पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगड़ से इंग्लिश लिट्रेचर में पी एच डी थी और डगशाई में किसी हाई-फ़ाई इंग्लिश स्कूल में वाईस-प्रिंसिपल थी.
डगशाई शिमला से कोई 60-62 किलोमीटर दूर सोलन ज़िले में एक छोटा सा, शांत सा हिल-स्टेशन है. चंडीगढ़-शिमला रोड पर धरमपुर से दायीं ओर साइड-रोड जाती है डगशाई को.
वहीं डगशाई में वसुन्धरा अकेली ही रहती थी. दीगर तौर पर महीने, डेढ़ महीने बाद वो शिमला चक्कर मार तो लेती थी लेकिन रहती डगशाई में ही थी … वो भी अकेली. पहाड़ी लोगों के विपरीत वसुन्धरा वैसे तो खुले-खुले हाथ-पैरों वाली, करीब 5’6″ लम्बी, गोरी-चिट्टी, क़दरतन एक खूबसूरत स्त्री थी लेकिन बन कर ऐसे रहती थी कि खुदा की पनाह! चेहरे पर कोई मेकअप नहीं, कोई क्रीम नहीं, होंठों पर कोई लिपस्टिक नहीं, भवों की कोई थ्रेडिंग नहीं, कोई नेल-पालिश नहीं, कोई मैनीक्योर-पैडीक्योर नहीं. शैम्पू-कंडीशनर से वसुन्धरा के सिर के बालों का शायद ही कभी वास्ता पड़ा हो.
वो सर में ढेर सारा तेल उड़ेल कर सारे बाल इस क़दर पीछे खींच कर चोटी करती थी कि … तौबा तौबा! माथे की सारी खाल दोनों भौहों समेत पीछे खिंच जाती थी. वसुन्धरा की दोनों कलाईयों पर ढ़ेरों बाल नुमाया थे तो यक़ीनन टांगों का भी यही हाल होगा. लगता था वसुन्धरा के लिए वैक्सिंग तो जैसे अभी ईज़ाद ही नहीं हुई थी … रही-सही कसर बोरीनुमा कपड़े की ड्रैस पहन कर निकलती थी.
ऊपर से कोढ़ में खाज़ की सी बात कि बला की दबंग, खुद-पसंद और बेहद बदतमीज़ थी. वसुन्धरा की भृकुटि हर वक़्त यूं तनी रहती कि जैसे उस की पेशानी पर स्थायी तौर पर 111 लिखा गया हो. हर किसी से उलझती थी. हर किसी को हर काम में “करो इसे नहीं तो …” वाली धौंस.
हर बात में मीन-मेख निकालना, हर शख़्स को बात-बात पर नीचा दिखाना वसुन्धरा का फुल-टाइम शुगल था.
यहां तो शादी वाला घर था, सौ तरह के काम थे. अब घरवाले हर मेहमान की पूंछ से चौबीसों घंटे तो नहीं बंधे रह सकते थे और वसुन्धरा थी कि बात-बात पर मुंह फुला लेती थी, हंगामा खड़ा कर देती थी.
उसकी मां उसको समझाती भी थी पर वसुन्धरा माने तब ना. एक मसला सुलझा नहीं कि दूसरा तैयार!
अब चूंकि घर मेरा था तो क़रीब-क़रीब सब बातों का नज़ला मुझ पर ही गिरता था. एक तो मुझ पर प्रिया की शादी के कामों की जिम्मेवारी, तिस पर प्रिया के मुझ से सदा के लिए दूर चले जाने का सदमा, ऊपर से इस वाहियात औरत के मुतवातार उलाहनों ने मेरा काफिया तंग कर रखा था.
पानी की टंकी खाली है, पिछली रात किसी ने मोटर नहीं चलाई तो जिम्मेवार मैं, प्रैस ठीक से गर्म नहीं हो रही तो जिम्मेवार मैं, बाथरूम में टूथ-पेस्ट नहीं मिल रही तो जिम्मेवार मैं, केटरर ने लंच लेट कर दिया तो जिम्मेवार मैं, किचन में कैचअपकी बॉटल में कैचअप ख़त्म हो गया है तो जिम्मेवार मैं, कॉफ़ी में चीनी कम/ज्यादा तो जिम्मेवार मैं.
मेरे 9 साल के लड़के को चेकोस्लोवाकिआ के स्पैलिंग नहीं आते है तो जिम्मेवार मैं.
और तो और … एक दोपहर को एक घंटे का पावर-कट लग गया तो भी जिम्मेवार मैं …
मेरा अपने नये पाठकों से विनम्र निवेदन है कि कहानी से ठीक से तारतम्य बिठाने के लिए पहले मेरी पुरानी कहानि को एक बार पढ़ लें. कहानि पहले पढ़ लेने से आप को नयी कहानी का ज्यादा आनंद आयेगा, यूं नहीं भी पढ़ेंगे तो भी चलेगा.
!!अस्तु!!
!इति श्री पुरानी-कथा पुराण!
ख़ुशगवार अहसासों के जादुई रेशमी स्पर्श के बाद, हक़ीक़त की ख़ुरदरी सच्चाइयों का सामना करना वाकई में बहुत ही बेचैनी भरा होता है लेकिन इन सब के बीच जिंदगी मुतवातर अपने रास्ते पर आगे बढ़ती रहती है, मेरी भी बढ़ रही थी. जिंदगी के इस अनवरत प्रवाह में अभी बहुत सारे नए किस्सों ने आकार लेना है, अभी जाने कितने नये अफ़सानों की बुनियाद रखी जानी है, अभी कितनी जानी-अनजानी प्रेमगाथाओं ने मानव-इतिहास में अमर होना है लेकिन ये सब तो अभी नियति की कोख में भविष्य में सृजन होने की प्रक्रिया की कसौटी पर कसे जा रहे हैं.
प्रस्तुत कहानी ऐसी ही एक कथा का वर्णन है जिसका बीजारोपण तो अनजाने में कई साल पहले ही हो गया था लेकिन उस बीज़ को प्राणवायु प्रिया की शादी-समारोह में ही मिली. मेरी इस रचना में नायक-नायिका के मिलते ही काम-क्रिया में लिप्त हो जाना पसंद करने वाले पाठकों को वैसा ना हो पाने के सारांश में कोफ़्त तो बहुत होगी लेकिन जो पाठक काम-कथा में भावनात्मक और रचनात्मक आवेगों के गुण-ग्राहक हैं उन्हें ये कहानी खूब भायेगी … ऐसा मेरा विश्वास है.
एक बार फिर से अपने अफ़साने के सच्चा-झूठा होने का फैसला मैंने अपने पाठकों के विवेक पर छोड़ दिया है, अगर आप का मन इस को सच मानता है तो इसे सच जानें, अगर आपका मन इसको काल्पनिक मानता है तो इसे काल्पनिक ही मानें.
पेशे-ख़िदमत है एक अद्धभुत प्रेम-कथा के बीज के सालों पहले धूल-धूसरित होने और फिर कालांतर में उसमें से अंकुर पल्लवित होने से लेकर फ़ल के पकने और उस फ़ल की अद्धभुत लज़्ज़त चखने तक की … कच्चे-पक्के जज़्बातों और आधे-अधूरे अहसासों की पूरी दास्तान......सतीश
प्रिया से सपनों के साकार होने जैसे हसीन मिलन की रात के बाद से तो दिन ऐसे पंख लगा कर उड़े कि कब प्रिया की शादी सर पर आन पहुंची … पता ही नहीं चला. चूँकि मेरा घर प्रिया के मायके और ससुराल वाले घर के ऐन सेंटर में पड़ता था और शादी वाला होटल-कम-बैंक्वेट हॉल जोकि मेरे ही एक जानकार का था और जिसे मैंने बहुत कम पैसों में बुक करवा कर दिया था, वो भी मेरे घर से सिर्फ कोई एक-डेढ़ किलोमीटर दूर था. लिहाज़ा! प्रिया की शादी में सेंट्रल-पॉइंट मेरा ही घर था.
यूं तो मैं भाग-भाग कर जिम्मेवारी से प्रिया की शादी के काम निपटा रहा था लेकिन बार-बार मेरे दिल में प्रिया के मुझ से दूर चले जाने का सोच कर ही हूक़ सी उठती थी पर प्यार की रिवायत तो यही थी कि दिल का दर्द, दिल ही में रखना पड़ता है.
बकौल शायर ज़नाब सुदर्शन फ़ाकिर साहब
“होठों पे तबस्सुम हल्का-सा, आंखों में नमी सी ऐ ‘फ़ाकिर’ …
हम अहले-मुहब्बत पर अकसर ऐसे भी ज़माने आए हैं.”
प्रिया और मेरे सम्बन्धों के बारे में मेरी कहानी
हसीन गुनाह की लज्जत
में पढ़ें!
ख़ैर! प्रिया के पापा, यानि मेरे साढू भाई के स्वर्गीय ताऊ जी के एक बेटे बहुत सालों से शिमला में सेटल्ड थे. उम्र थी कोई पैंसठ साल लेकिन खूब तंदरुस्त और हट्टे-कट्टे. मिलिट्री से अर्ली रिटायरमेंट लेकर शिमला में ही सरकारी ठेकेदारी में जम कर पैसे कूट रहे थे.
उनके दो बेटे थे (दोनों शादीशुदा) और एक अविवाहित बेटी थी … कोई पैंतीस-छत्तीस साल की और नाम था वसुन्धरा! वसुन्धरा सुधा से दो-एक साल छोटी थी.
प्रिया के पापा के ये फर्स्ट कज़न साहब अपनी पत्नी और बेटी वसुन्धरा समेत प्रिया की शादी से तीन दिन पहले से ही मेरे ही घर में अड्डा जमाये हुए थे.
सुधा तो इन लोगों से पहले भी एक-आध बार मिल चुकी थी लेकिन मैं इन सबको पहली बार ही मिल रहा था. वसुन्धरा पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगड़ से इंग्लिश लिट्रेचर में पी एच डी थी और डगशाई में किसी हाई-फ़ाई इंग्लिश स्कूल में वाईस-प्रिंसिपल थी.
डगशाई शिमला से कोई 60-62 किलोमीटर दूर सोलन ज़िले में एक छोटा सा, शांत सा हिल-स्टेशन है. चंडीगढ़-शिमला रोड पर धरमपुर से दायीं ओर साइड-रोड जाती है डगशाई को.
वहीं डगशाई में वसुन्धरा अकेली ही रहती थी. दीगर तौर पर महीने, डेढ़ महीने बाद वो शिमला चक्कर मार तो लेती थी लेकिन रहती डगशाई में ही थी … वो भी अकेली. पहाड़ी लोगों के विपरीत वसुन्धरा वैसे तो खुले-खुले हाथ-पैरों वाली, करीब 5’6″ लम्बी, गोरी-चिट्टी, क़दरतन एक खूबसूरत स्त्री थी लेकिन बन कर ऐसे रहती थी कि खुदा की पनाह! चेहरे पर कोई मेकअप नहीं, कोई क्रीम नहीं, होंठों पर कोई लिपस्टिक नहीं, भवों की कोई थ्रेडिंग नहीं, कोई नेल-पालिश नहीं, कोई मैनीक्योर-पैडीक्योर नहीं. शैम्पू-कंडीशनर से वसुन्धरा के सिर के बालों का शायद ही कभी वास्ता पड़ा हो.
वो सर में ढेर सारा तेल उड़ेल कर सारे बाल इस क़दर पीछे खींच कर चोटी करती थी कि … तौबा तौबा! माथे की सारी खाल दोनों भौहों समेत पीछे खिंच जाती थी. वसुन्धरा की दोनों कलाईयों पर ढ़ेरों बाल नुमाया थे तो यक़ीनन टांगों का भी यही हाल होगा. लगता था वसुन्धरा के लिए वैक्सिंग तो जैसे अभी ईज़ाद ही नहीं हुई थी … रही-सही कसर बोरीनुमा कपड़े की ड्रैस पहन कर निकलती थी.
ऊपर से कोढ़ में खाज़ की सी बात कि बला की दबंग, खुद-पसंद और बेहद बदतमीज़ थी. वसुन्धरा की भृकुटि हर वक़्त यूं तनी रहती कि जैसे उस की पेशानी पर स्थायी तौर पर 111 लिखा गया हो. हर किसी से उलझती थी. हर किसी को हर काम में “करो इसे नहीं तो …” वाली धौंस.
हर बात में मीन-मेख निकालना, हर शख़्स को बात-बात पर नीचा दिखाना वसुन्धरा का फुल-टाइम शुगल था.
यहां तो शादी वाला घर था, सौ तरह के काम थे. अब घरवाले हर मेहमान की पूंछ से चौबीसों घंटे तो नहीं बंधे रह सकते थे और वसुन्धरा थी कि बात-बात पर मुंह फुला लेती थी, हंगामा खड़ा कर देती थी.
उसकी मां उसको समझाती भी थी पर वसुन्धरा माने तब ना. एक मसला सुलझा नहीं कि दूसरा तैयार!
अब चूंकि घर मेरा था तो क़रीब-क़रीब सब बातों का नज़ला मुझ पर ही गिरता था. एक तो मुझ पर प्रिया की शादी के कामों की जिम्मेवारी, तिस पर प्रिया के मुझ से सदा के लिए दूर चले जाने का सदमा, ऊपर से इस वाहियात औरत के मुतवातार उलाहनों ने मेरा काफिया तंग कर रखा था.
पानी की टंकी खाली है, पिछली रात किसी ने मोटर नहीं चलाई तो जिम्मेवार मैं, प्रैस ठीक से गर्म नहीं हो रही तो जिम्मेवार मैं, बाथरूम में टूथ-पेस्ट नहीं मिल रही तो जिम्मेवार मैं, केटरर ने लंच लेट कर दिया तो जिम्मेवार मैं, किचन में कैचअपकी बॉटल में कैचअप ख़त्म हो गया है तो जिम्मेवार मैं, कॉफ़ी में चीनी कम/ज्यादा तो जिम्मेवार मैं.
मेरे 9 साल के लड़के को चेकोस्लोवाकिआ के स्पैलिंग नहीं आते है तो जिम्मेवार मैं.
और तो और … एक दोपहर को एक घंटे का पावर-कट लग गया तो भी जिम्मेवार मैं …