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हरसिंगार by रानु
दिल्ली का वातावरण। अकदूबर का महीना था। गुलाबी जाड़ा। रात के लगभग आठ बजे होंगे। ठाकुर मार्तण्डसिंह की आलीशान कोठी के अन्दर एक विशेष उत्सव मनाया जा रहा था। यद्यपि कोठी के बाहर किसी प्रकार की सजावट नहीं थी, परन्तु कोठी के अंदर हो रहे उत्सव का पता इस बात से चलता था कि कोठी के मुख्य द्वार के बाहर चहारदीवारी से लगकर अनेक कारें एक पंक्ति में खड़ी अपने देशी-विदेशी, नये-पुराने मॉडलों- तथा रंगों का प्रदर्शन कर रही थीं।
रंगीन सजावट केवल कोठी के बड़े हॉल के अंदर ही थी। हॉल का कोना-कोना रंगीन कागजों तथा गुबारों द्वारा आज के उत्सव की शोभा बढ़ा रहा था, हॉल में एक ओर आर्केस्ट्रा का मैच था। संगीतकारों के विदेशी साजों से बिखरती सुरीली धुन ने मानो हॉल के अन्दर एक जादू-सा बिखेर रखा था। मधुर धुनों का सहारा लेकर युवक-युवतियां एक-दूसरे की बाहों में बाहें डाले थिरकते हुएऊ प्यार के संसार में खो गए थे। नौकर साफ-सुथरी वर्दियां पहने हाथों में तरह-तरह की हल्की-भारी शराबों तथा अन्य पेय भरे गिलासों की ट्रे लिए दौड़-दौड़कर मेहमानों की सेवा कर रहे थे। जाम से जाम टकराए जा रहे थे। जामों के छनाके आर्केस्ट्रा की धुन में एक मद्धिम सरगम बनकर सम्मिलित होते और डूब जाते थे? जो मेहमान नृत्य नहीं कर रहे थे तथा जो । अपना-अपना समूह बनाकर हॉल के किनारे खड़े या सोफों और कुर्सियों पर बैठे बातें करूर रहे थे, उनके ठहाके कभी-कभी बेसुरे खेकर धुन में इस प्रकार सम्मिलित हो जाते थे, जैसे अच्छी-भली चांदनी छिटकते चन्द्रमा पर अचानक बदली ने छाकर रजनी का गला घोंट दिया हो।
आर्केस्ट्रा की धुन लॉन तक सुनाई पड़ रही थी। कोठी के चारों ओर ही लॉन था। फुलवारी की ओर क्यारियां थीं। कहीं-कहीं पाम तथा अशोक के वृक्ष भी थे।
जिस हॉल में उत्सव हो रहा था, उसके सभी द्वार खुले हुए थे। द्वार पर रेशमी पर्दे लहरा रहे थे। अगल-बगल तथा सामने बरामदों के कुछेक स्तंभों से लिपटी कागजी कतरनें हवा के हल्के से झोंकों से भी नृत्य कर उठती थीं। कतरनों के कारण स्तंभों के आसपास हल्की छाया का अंधकार था। कोठी का यह सुन्दर वातावरण संसार से बिल्कुल अलग था-निश्चित।
वह उत्सव ठाकुर मार्तण्डसिंह के एक मात्र पुत्र चंद्रभाल के लंदन से चार वर्ष बाद लौटने के उपलक्ष्य में मनाया जा रहा था। चंद्रभाल घर वालों के लिए कुंवर था तथा नौकरों के लिए छोटा मालिक। स्वतंत्रता से पहले मार्तण्डसिंह उत्तर प्रदेश में एक बड़े जागीरदार थे।
स्वतंत्रता के बाद सरकार ने जागीर का खासा बड़ा भाग छीन लिया तो दूरदर्शिता से काम लेकर उन्होंने अपनी शेष जागीर भी बेच दी थी। फिर दिल्ली में आ बसे। यही फैक्टरी खोली और अब व्यापारिक दष्टि से सफलता के शिखर पर पहुंचकर शहर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से एक थे। अन्य कारों के साथ उनके पास एक लम्बी विदेशी कार भी थी-सफेद। उनकी एकमात्र बेटा दिल्ली में हो उत्पन्न हुआ था। चंद्रभाल सत्रह वर्ष की आयु में सीनियर कैम्ब्रिज पास करके लंदन चला गया था और सप्ताह भर पहले ही लौटा था।
पार्टी चल रही थी। रंगीनी छाई हुई थी और उच्च समाज के इस रंगीन ढकोसले को कुछ दूर से देखते हुए
सभी नौकर आनन्द उठा रहे थे! इन्हीं नौकरों में कोठी के माली की नातिन रजनी भी थी। उसके बदन में टहनियों की-सी लचक थी। फूल-सा मुखड़ा था उसका। सांसों में हरसिंगार की सुगन्ध थी। अन्य नौकरों से अलग इस समय वह बरामदे में एक स्तम्भ पर लिपटी कतरनों की छाया में खड़ी बड़ी हसरत से हॉल के अंदर होते नृत्य हो देख रही थी।
उसके हाथ में एक गुलाब का फूल था उसी के समान प्यारा, न का सबसे सुन्दर फूल। उसकी दष्टि बस एक ही थिरकते हुए जोड़े पुर चिपकी हुई थी-चंद्रभाल वाले जोड़े पर। अन्य नौकरों के समान वह चंद्रभाल को'छोटे मनिक' न कहकर अपने दिल ही दिल में कुंवर साहब' कहती थी, क्योंकि चंद्रभाल के साथ उसका बचपन बीता था, इसी कोठी की चहारदीवारी में। परन्तु आज वह चंद्रभाल को चार वर्ष बाद देख रही थी। चार वर्ष पहले वह चंद्रभाल को प्रतिदिन एक गुलाब भेंट किया करती थी। लॉन का सबसे सुन्दर फूल होता था वह। चंद्रभाल के साथ नृत्य करती सुन्दरी चंद्रभाल से कुछ अधिक ही चिपकी हुई थी। कंधे तक झूलती रेशमी लटें, चमकती आखें, गाल गुलाबी, होंठ शराबी। इस समय उस सुन्दरी ने मैक्सी पहन रखी थी-बिना आस्तीन की मैक्सी-पीठ से कमर तक बिल्कुल खुली हुई। नृत्य करते हुए उसने चंद्रभाल की छाती पर अपना सिर रख लिया था और आखें बंद कर ली थीं, कुछ इस प्रकार, मानो वह स्वर्गलोक की यात्रा कर रही हो। चंद्रभाल ने भी उसकी नग्न पीठ पर तथा कमर का स्पर्श प्राप्त करते हुए उसे कुछ अधिक ही सख्ती के साथ अपनी बाहों में समा रखा था।
इस दृश्य को देखते हुए रजनी को ऐसा लग रहा था, मानो लीन के पौधों के सारे ही कांटे उसके शरीर में प्र रहे हों। पहली बार चंद्रभाल को उस सुन्दरी के साथ ऐसी स्थिति में देखकर उसके हाथ से गुलाब छूटकर गिरते-गिरते बचा था, परन्तु फिर उसने स्वयं को संभाल लिया था। उच्च समाज के उत्सव में ऐसे नृत्य तो होते ही रहते हैं अरि फिर चंद्रभाल तो लंदन से आया था। विदेशी सभ्यता का रंग उस पर क्यों नहीं चढ़ता? फिर भी रजनी के मन में उस सुन्दरी के प्रति ईर्ष्या अवश्य समा गई थी-इच्छा के विरुद्ध। वह जानती थी कि उसका रास्ता अलग है तथा चंद्रभाल का रास्ता अलग। वह तो चंद्रभाल के चरणों की धूल बनने योग्य भी नहीं थी। चंद्रभाल के योग्य ऐसी ही लड़की होनी चाहिए-बिल्कुल राजकुमारी जैसी-जो इस समय उसकी बांहों में समाई थिरक रही थी।
दिल्ली का वातावरण। अकदूबर का महीना था। गुलाबी जाड़ा। रात के लगभग आठ बजे होंगे। ठाकुर मार्तण्डसिंह की आलीशान कोठी के अन्दर एक विशेष उत्सव मनाया जा रहा था। यद्यपि कोठी के बाहर किसी प्रकार की सजावट नहीं थी, परन्तु कोठी के अंदर हो रहे उत्सव का पता इस बात से चलता था कि कोठी के मुख्य द्वार के बाहर चहारदीवारी से लगकर अनेक कारें एक पंक्ति में खड़ी अपने देशी-विदेशी, नये-पुराने मॉडलों- तथा रंगों का प्रदर्शन कर रही थीं।
रंगीन सजावट केवल कोठी के बड़े हॉल के अंदर ही थी। हॉल का कोना-कोना रंगीन कागजों तथा गुबारों द्वारा आज के उत्सव की शोभा बढ़ा रहा था, हॉल में एक ओर आर्केस्ट्रा का मैच था। संगीतकारों के विदेशी साजों से बिखरती सुरीली धुन ने मानो हॉल के अन्दर एक जादू-सा बिखेर रखा था। मधुर धुनों का सहारा लेकर युवक-युवतियां एक-दूसरे की बाहों में बाहें डाले थिरकते हुएऊ प्यार के संसार में खो गए थे। नौकर साफ-सुथरी वर्दियां पहने हाथों में तरह-तरह की हल्की-भारी शराबों तथा अन्य पेय भरे गिलासों की ट्रे लिए दौड़-दौड़कर मेहमानों की सेवा कर रहे थे। जाम से जाम टकराए जा रहे थे। जामों के छनाके आर्केस्ट्रा की धुन में एक मद्धिम सरगम बनकर सम्मिलित होते और डूब जाते थे? जो मेहमान नृत्य नहीं कर रहे थे तथा जो । अपना-अपना समूह बनाकर हॉल के किनारे खड़े या सोफों और कुर्सियों पर बैठे बातें करूर रहे थे, उनके ठहाके कभी-कभी बेसुरे खेकर धुन में इस प्रकार सम्मिलित हो जाते थे, जैसे अच्छी-भली चांदनी छिटकते चन्द्रमा पर अचानक बदली ने छाकर रजनी का गला घोंट दिया हो।
आर्केस्ट्रा की धुन लॉन तक सुनाई पड़ रही थी। कोठी के चारों ओर ही लॉन था। फुलवारी की ओर क्यारियां थीं। कहीं-कहीं पाम तथा अशोक के वृक्ष भी थे।
जिस हॉल में उत्सव हो रहा था, उसके सभी द्वार खुले हुए थे। द्वार पर रेशमी पर्दे लहरा रहे थे। अगल-बगल तथा सामने बरामदों के कुछेक स्तंभों से लिपटी कागजी कतरनें हवा के हल्के से झोंकों से भी नृत्य कर उठती थीं। कतरनों के कारण स्तंभों के आसपास हल्की छाया का अंधकार था। कोठी का यह सुन्दर वातावरण संसार से बिल्कुल अलग था-निश्चित।
वह उत्सव ठाकुर मार्तण्डसिंह के एक मात्र पुत्र चंद्रभाल के लंदन से चार वर्ष बाद लौटने के उपलक्ष्य में मनाया जा रहा था। चंद्रभाल घर वालों के लिए कुंवर था तथा नौकरों के लिए छोटा मालिक। स्वतंत्रता से पहले मार्तण्डसिंह उत्तर प्रदेश में एक बड़े जागीरदार थे।
स्वतंत्रता के बाद सरकार ने जागीर का खासा बड़ा भाग छीन लिया तो दूरदर्शिता से काम लेकर उन्होंने अपनी शेष जागीर भी बेच दी थी। फिर दिल्ली में आ बसे। यही फैक्टरी खोली और अब व्यापारिक दष्टि से सफलता के शिखर पर पहुंचकर शहर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से एक थे। अन्य कारों के साथ उनके पास एक लम्बी विदेशी कार भी थी-सफेद। उनकी एकमात्र बेटा दिल्ली में हो उत्पन्न हुआ था। चंद्रभाल सत्रह वर्ष की आयु में सीनियर कैम्ब्रिज पास करके लंदन चला गया था और सप्ताह भर पहले ही लौटा था।
पार्टी चल रही थी। रंगीनी छाई हुई थी और उच्च समाज के इस रंगीन ढकोसले को कुछ दूर से देखते हुए
सभी नौकर आनन्द उठा रहे थे! इन्हीं नौकरों में कोठी के माली की नातिन रजनी भी थी। उसके बदन में टहनियों की-सी लचक थी। फूल-सा मुखड़ा था उसका। सांसों में हरसिंगार की सुगन्ध थी। अन्य नौकरों से अलग इस समय वह बरामदे में एक स्तम्भ पर लिपटी कतरनों की छाया में खड़ी बड़ी हसरत से हॉल के अंदर होते नृत्य हो देख रही थी।
उसके हाथ में एक गुलाब का फूल था उसी के समान प्यारा, न का सबसे सुन्दर फूल। उसकी दष्टि बस एक ही थिरकते हुए जोड़े पुर चिपकी हुई थी-चंद्रभाल वाले जोड़े पर। अन्य नौकरों के समान वह चंद्रभाल को'छोटे मनिक' न कहकर अपने दिल ही दिल में कुंवर साहब' कहती थी, क्योंकि चंद्रभाल के साथ उसका बचपन बीता था, इसी कोठी की चहारदीवारी में। परन्तु आज वह चंद्रभाल को चार वर्ष बाद देख रही थी। चार वर्ष पहले वह चंद्रभाल को प्रतिदिन एक गुलाब भेंट किया करती थी। लॉन का सबसे सुन्दर फूल होता था वह। चंद्रभाल के साथ नृत्य करती सुन्दरी चंद्रभाल से कुछ अधिक ही चिपकी हुई थी। कंधे तक झूलती रेशमी लटें, चमकती आखें, गाल गुलाबी, होंठ शराबी। इस समय उस सुन्दरी ने मैक्सी पहन रखी थी-बिना आस्तीन की मैक्सी-पीठ से कमर तक बिल्कुल खुली हुई। नृत्य करते हुए उसने चंद्रभाल की छाती पर अपना सिर रख लिया था और आखें बंद कर ली थीं, कुछ इस प्रकार, मानो वह स्वर्गलोक की यात्रा कर रही हो। चंद्रभाल ने भी उसकी नग्न पीठ पर तथा कमर का स्पर्श प्राप्त करते हुए उसे कुछ अधिक ही सख्ती के साथ अपनी बाहों में समा रखा था।
इस दृश्य को देखते हुए रजनी को ऐसा लग रहा था, मानो लीन के पौधों के सारे ही कांटे उसके शरीर में प्र रहे हों। पहली बार चंद्रभाल को उस सुन्दरी के साथ ऐसी स्थिति में देखकर उसके हाथ से गुलाब छूटकर गिरते-गिरते बचा था, परन्तु फिर उसने स्वयं को संभाल लिया था। उच्च समाज के उत्सव में ऐसे नृत्य तो होते ही रहते हैं अरि फिर चंद्रभाल तो लंदन से आया था। विदेशी सभ्यता का रंग उस पर क्यों नहीं चढ़ता? फिर भी रजनी के मन में उस सुन्दरी के प्रति ईर्ष्या अवश्य समा गई थी-इच्छा के विरुद्ध। वह जानती थी कि उसका रास्ता अलग है तथा चंद्रभाल का रास्ता अलग। वह तो चंद्रभाल के चरणों की धूल बनने योग्य भी नहीं थी। चंद्रभाल के योग्य ऐसी ही लड़की होनी चाहिए-बिल्कुल राजकुमारी जैसी-जो इस समय उसकी बांहों में समाई थिरक रही थी।