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Romance हरसिंगार/रानु

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हरसिंगार by रानु

दिल्ली का वातावरण। अकदूबर का महीना था। गुलाबी जाड़ा। रात के लगभग आठ बजे होंगे। ठाकुर मार्तण्डसिंह की आलीशान कोठी के अन्दर एक विशेष उत्सव मनाया जा रहा था। यद्यपि कोठी के बाहर किसी प्रकार की सजावट नहीं थी, परन्तु कोठी के अंदर हो रहे उत्सव का पता इस बात से चलता था कि कोठी के मुख्य द्वार के बाहर चहारदीवारी से लगकर अनेक कारें एक पंक्ति में खड़ी अपने देशी-विदेशी, नये-पुराने मॉडलों- तथा रंगों का प्रदर्शन कर रही थीं।

रंगीन सजावट केवल कोठी के बड़े हॉल के अंदर ही थी। हॉल का कोना-कोना रंगीन कागजों तथा गुबारों द्वारा आज के उत्सव की शोभा बढ़ा रहा था, हॉल में एक ओर आर्केस्ट्रा का मैच था। संगीतकारों के विदेशी साजों से बिखरती सुरीली धुन ने मानो हॉल के अन्दर एक जादू-सा बिखेर रखा था। मधुर धुनों का सहारा लेकर युवक-युवतियां एक-दूसरे की बाहों में बाहें डाले थिरकते हुएऊ प्यार के संसार में खो गए थे। नौकर साफ-सुथरी वर्दियां पहने हाथों में तरह-तरह की हल्की-भारी शराबों तथा अन्य पेय भरे गिलासों की ट्रे लिए दौड़-दौड़कर मेहमानों की सेवा कर रहे थे। जाम से जाम टकराए जा रहे थे। जामों के छनाके आर्केस्ट्रा की धुन में एक मद्धिम सरगम बनकर सम्मिलित होते और डूब जाते थे? जो मेहमान नृत्य नहीं कर रहे थे तथा जो । अपना-अपना समूह बनाकर हॉल के किनारे खड़े या सोफों और कुर्सियों पर बैठे बातें करूर रहे थे, उनके ठहाके कभी-कभी बेसुरे खेकर धुन में इस प्रकार सम्मिलित हो जाते थे, जैसे अच्छी-भली चांदनी छिटकते चन्द्रमा पर अचानक बदली ने छाकर रजनी का गला घोंट दिया हो।

आर्केस्ट्रा की धुन लॉन तक सुनाई पड़ रही थी। कोठी के चारों ओर ही लॉन था। फुलवारी की ओर क्यारियां थीं। कहीं-कहीं पाम तथा अशोक के वृक्ष भी थे।

जिस हॉल में उत्सव हो रहा था, उसके सभी द्वार खुले हुए थे। द्वार पर रेशमी पर्दे लहरा रहे थे। अगल-बगल तथा सामने बरामदों के कुछेक स्तंभों से लिपटी कागजी कतरनें हवा के हल्के से झोंकों से भी नृत्य कर उठती थीं। कतरनों के कारण स्तंभों के आसपास हल्की छाया का अंधकार था। कोठी का यह सुन्दर वातावरण संसार से बिल्कुल अलग था-निश्चित।

वह उत्सव ठाकुर मार्तण्डसिंह के एक मात्र पुत्र चंद्रभाल के लंदन से चार वर्ष बाद लौटने के उपलक्ष्य में मनाया जा रहा था। चंद्रभाल घर वालों के लिए कुंवर था तथा नौकरों के लिए छोटा मालिक। स्वतंत्रता से पहले मार्तण्डसिंह उत्तर प्रदेश में एक बड़े जागीरदार थे।

स्वतंत्रता के बाद सरकार ने जागीर का खासा बड़ा भाग छीन लिया तो दूरदर्शिता से काम लेकर उन्होंने अपनी शेष जागीर भी बेच दी थी। फिर दिल्ली में आ बसे। यही फैक्टरी खोली और अब व्यापारिक दष्टि से सफलता के शिखर पर पहुंचकर शहर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से एक थे। अन्य कारों के साथ उनके पास एक लम्बी विदेशी कार भी थी-सफेद। उनकी एकमात्र बेटा दिल्ली में हो उत्पन्न हुआ था। चंद्रभाल सत्रह वर्ष की आयु में सीनियर कैम्ब्रिज पास करके लंदन चला गया था और सप्ताह भर पहले ही लौटा था।

पार्टी चल रही थी। रंगीनी छाई हुई थी और उच्च समाज के इस रंगीन ढकोसले को कुछ दूर से देखते हुए

सभी नौकर आनन्द उठा रहे थे! इन्हीं नौकरों में कोठी के माली की नातिन रजनी भी थी। उसके बदन में टहनियों की-सी लचक थी। फूल-सा मुखड़ा था उसका। सांसों में हरसिंगार की सुगन्ध थी। अन्य नौकरों से अलग इस समय वह बरामदे में एक स्तम्भ पर लिपटी कतरनों की छाया में खड़ी बड़ी हसरत से हॉल के अंदर होते नृत्य हो देख रही थी।

उसके हाथ में एक गुलाब का फूल था उसी के समान प्यारा, न का सबसे सुन्दर फूल। उसकी दष्टि बस एक ही थिरकते हुए जोड़े पुर चिपकी हुई थी-चंद्रभाल वाले जोड़े पर। अन्य नौकरों के समान वह चंद्रभाल को'छोटे मनिक' न कहकर अपने दिल ही दिल में कुंवर साहब' कहती थी, क्योंकि चंद्रभाल के साथ उसका बचपन बीता था, इसी कोठी की चहारदीवारी में। परन्तु आज वह चंद्रभाल को चार वर्ष बाद देख रही थी। चार वर्ष पहले वह चंद्रभाल को प्रतिदिन एक गुलाब भेंट किया करती थी। लॉन का सबसे सुन्दर फूल होता था वह। चंद्रभाल के साथ नृत्य करती सुन्दरी चंद्रभाल से कुछ अधिक ही चिपकी हुई थी। कंधे तक झूलती रेशमी लटें, चमकती आखें, गाल गुलाबी, होंठ शराबी। इस समय उस सुन्दरी ने मैक्सी पहन रखी थी-बिना आस्तीन की मैक्सी-पीठ से कमर तक बिल्कुल खुली हुई। नृत्य करते हुए उसने चंद्रभाल की छाती पर अपना सिर रख लिया था और आखें बंद कर ली थीं, कुछ इस प्रकार, मानो वह स्वर्गलोक की यात्रा कर रही हो। चंद्रभाल ने भी उसकी नग्न पीठ पर तथा कमर का स्पर्श प्राप्त करते हुए उसे कुछ अधिक ही सख्ती के साथ अपनी बाहों में समा रखा था।

इस दृश्य को देखते हुए रजनी को ऐसा लग रहा था, मानो लीन के पौधों के सारे ही कांटे उसके शरीर में प्र रहे हों। पहली बार चंद्रभाल को उस सुन्दरी के साथ ऐसी स्थिति में देखकर उसके हाथ से गुलाब छूटकर गिरते-गिरते बचा था, परन्तु फिर उसने स्वयं को संभाल लिया था। उच्च समाज के उत्सव में ऐसे नृत्य तो होते ही रहते हैं अरि फिर चंद्रभाल तो लंदन से आया था। विदेशी सभ्यता का रंग उस पर क्यों नहीं चढ़ता? फिर भी रजनी के मन में उस सुन्दरी के प्रति ईर्ष्या अवश्य समा गई थी-इच्छा के विरुद्ध। वह जानती थी कि उसका रास्ता अलग है तथा चंद्रभाल का रास्ता अलग। वह तो चंद्रभाल के चरणों की धूल बनने योग्य भी नहीं थी। चंद्रभाल के योग्य ऐसी ही लड़की होनी चाहिए-बिल्कुल राजकुमारी जैसी-जो इस समय उसकी बांहों में समाई थिरक रही थी।
 
इस वास्तविकता को जानने के पश्चात् भी अपने कुंवर साहब की बांहों में उस सुन्दरी को देखकर रजनी के मन में जलन' उत्पन्न होने लगी थी। ऐसा क्यों हो रहा था? क्या इस जलन के पीछे कोई भेद नहीं था? या नारी का स्वभाव ऐसा होता है? रजनी अपने दिल में उठती ईर्ष्या भरी टीस का कारण नहीं समझ सकी थी। आर्केस्ट्रा की मधुर धुन बज रही थी। नये-नये फैशन के रंगीन वस्त्र पहने युवक-युवतियां एक-दूसरे की बांहों में बाहें डाले नृत्य कर रहे थे। हॉल के अन्दर का प्रकाश कभी तेज ताँ कभी मद्धिम होकर अपना रंग बदल रहा था। वातावरण महका-महका था। नवयुवतियों की सांसों की भीनी-भीनी सुगन्ध मदिरा की गंध पर छा गई थी। ऐसा लग रहा था, मानो स्वर्गलोक्र की परियां धरती पर उतरकर इस हॉल के अन्दर नृत्य कर रही हों।

_सहसा हॉल के अंदर प्रकाश में परिवर्तन आया। हल्की नीली-नीली और फिर गहरी नीली धुंध छा गई। नृत्य करते जोड़े छाया बन गए। छाया बनकर एक-दूसरे के और समीप आ गए!, इस प्रकार मानो एकदूसरे में समाकर एक ही छाया बन जाना चाहते हों।

बरामदे में रजनी ने जब ऐसी स्थिति चंद्रमाल तथा उसकी बांहों में समाई सुन्दरी को देखा तो उसके दिल पर छुरी चल गई। उसने अपने दिल को लाख समझाना चाहा कि ऊंचे समाज में नृत्य के प्रति इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होना एक साधारण बात है, परन्तु दिल था कि मानने से इंकार करने लगा। वह हॉल के अन्दर ऐसी स्थिति सभी जोड़ों की देख सकती थी। परन्तु अपने कुंवर साहब की नहीं और इसीलिए दिल में ईर्ष्या की चुभन लिए उसने दृष्टि फेर ली। कुछ पीछे हटकर वह वहीं खंभे के समीप फर्श पर बैठ गई, जहां बरामदे से उतरने-चढ़ने के लिए चार सीढ़ियां थी। पैरों को उसने सीढियों रार रख लिया और फिर सोचने लगी, वह सुन्दरी- कौन है? क्यों उसके मन में उस सुन्दरी के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हो रही है? क्या कोई भेद है इसके पीछे? कोई उद्देश्य?

सहसा हॉल के अन्दर बजती आर्केस्ट्रा की धुन कुछ तेज हुई। फिर अचानक रुक गई। धुन का यह भाग समाप्त हो गया था। हॉल नियोन लाइट्स से जगमगा उठा। जोड़े चौंककर एक-दूसरे से इस प्रकार अलग हो गए, मानो स्वर्गलोक की सैर करते-करते अचानक धरती पर आ गिरे हों। फिर बहुत जोर की ताली बजी। बाहर बरानदे में किनारे बैठी रजनी को ऐसा लगा, मानो उसके नन्हे तथा भोले-भाले दिल' का सब मजाक उड़ा रहे हों, परन्तु उसने क्षण भर में ही स्वयं को संभाल लिया। वह जानती थी, यह उसका भ्रम है। मेहमान अपने ही संसार में मस्त थे। किसी के पास इतना समय ही कहां था, जो उसके विषय में सोचता और वह भी इस कोठी की माली की नातिन के विषय में!

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नृत्य कुछ समय के लिए समाप्त हो गया। मेहमानों के लिए यह विश्राम का समय था, इसलिए जोड़े हॉल के किनारे लगे सोफों तथा कुर्सियों पर जाकर बैठने लगे। हॉल में एक किनारे बीर काउंटर था। जिन्हें मदिरा की तुरंत आवश्यकता महसूस हुई, वे उधर ही लपक गए। आर्केस्ट्रा की धुन रुकी तो इसका स्थान मेहमानों के चहक भरे ठहाकों तथा बातों की भुनभुनाहट ने ले लिया। कुछेक जोड़े हॉल के वातावरण से उकताकर बाहर के खुले वातावरण का आनन्द उठाने लगे।

जोड़े इधर-उधर इस प्रकार बिखर गए, मानो यह स्थान कोई पिकनिक स्थल हो। कुछेक जोड़े रजनी के पीछे से होकर बरामदे के पिछले भाग की ओर भी जाने लगे तो रजनी ने वहां बैठना उचित नहीं समझा। वह उठ खड़ी हुई। उसने सीढ़ियां उतर जाना चाहा कि तभी अपनी ओर आते जोड़े को देखकर वह ठिठक गई। दिल बहुतो जोर से धडका। सामने से चंद्रभाल चला आ रहा था, उसी सुन्दरी के साथ, जो नृत्य में हर क्षण उसकी बांहों में समाई हुई थी। दोनों ही एक-दूसरे से मुस्कराकर बातें करते हुए निश्चित थे। प्रसन्न थे। चंद्रभाल उस सुन्दरी के साथ सामने के बरामदे से बाहर निकला था और लीन में टहलते हुए वह बगल के बरामदे तक आ गया था।

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रजनी ने दोनों को प्रसन्न मुद्रा में देखा तो उसकी छाती पर सांप लोट गया। अनजाने में वह एक पग पीछे हट गई, बरामदे का प्रकाश उसके मुखड़े पर छा गया। उसने पलटकर वहां से दूसरे रास्ते द्वारा भाग जाना चाहा, परन्तु तब तक चंद्रभाल बरामदे की पहली सीढ़ी पर पग रखते हुए उसे देख चुका था। रजनी के पग फर्श पर जहां के तहा चिपककर स्थिर हो गए। हाथ से फूल छूटकर फर्श पर गिर पड़ा तो उसने फूल उठाने का साहस भी नहीं किया। एक अज्ञात भय के कारण उसका गला सूखने लगा।

चंद्रभाल ने रजनी को देखते हुए उस सुन्दरी के साथ, बरामदे पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां- पार की। फिर रजनी के समीप से निकलते-निकलते अचानक ठिठककर रुक गया। उसके साथ की सुन्दरी को भी रुक जाना पड़ा।

'तुम,,,! चंद्रभाल उसे पहचान चुका था, फिर भी उसने अपना संदेह दूर करना चाहा। मुस्कराते हुए उसने पूछा तुम रजनी हो ना?'

रजनी के होंठों की कली नहीं खुल सकी, केवल कांपकर रह गई। सिर झुकाकर उसने घबराई हिरनी के समान ही संकेत में सिर हिलां दिया। मुस्कराने के प्रयत्न में भी वह असफल रही।
 
चंद्रभाल ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी सादी सुन्दरता पर मुस्कराया। फिर बोला, बहुत बड़ी हो गई हो!'

रजनी ने चंद्रमाल को देखा। मन हुआ कह दे कि वह भी बहुत बड़ा हो गया है। चंद्रमाल को इतना समीप से वह आज वर्षो बाद देख रही थी। सफेद पैंट तथा लाल कोट में वह बिल्कुल राजकुमार लग रहा था, परन्तु रजनी कुछ कहने का साहस नहीं कर सकी। उसने देखा, चंद्रभाल के कोट के कॉलर में एक सफेद गुलाब पहले ही लगा हुआ था। हॉल के अंदर नृत्य करते समय वह बरामदे की दूरी से इसलिए फूल पर ध्यान नहीं दे सकी थी, क्योंकि उसके साथ की सुन्दरी हर क्षण ही चंद्रमाल की छाती से चिपकी हुई थी।

चंद्रभाल के कोट के कॉलर में फूल लगा देखकर रजनी को ऐसा लगा, मानो उसका स्थान किसी और ने ले लिया हो। उसने अपना मुखड़ा फिर झुका लिया और उस फूल को देखने लगी, जो फर्श पर चंद्रभाल के कदमों की धूल चाट रहा था

रजनी की दृष्टि का पीछा करते हुए चंद्रभाल ने फूल को देखा। फिर झुककर फूल उठा लिया। फूल को उसने बहुत ध्यान से देखा। कांटों के मध्य एक लाल गुलाब-सुन्दरता की ताजगी के लिए हुए। उसने फूल को सूंघा। फूल की सुगन्ध उसके नथुनों द्वारा दिल की गहराई में उतर गई। उसने फूल को अपनी उंगलियों द्वारा टहनी से नचाते हुए कहा, फूल से अभी तक खेलती हो?

- रजनी ने चंद्रभाल को फिर देखा। उसकी आखों में उसने अपना बचपन तलाश किया। क्या चंद्रभाल के जीवन में अब उसके अतीत का कोई महत्व नहीं रहा? क्या वह सब एक सपना था?

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चंद्रमाल मुस्कराया। फिर उसने फूल रजनी की ओर बड़ा दिया। रजनी ने कांपती उंगलियों द्वारा फूल की टहनी पकड़ लेनी चाही तो उंगलियां चंद्रभाल की उंगलियों से छू गई। रजनी के शरीर में बिजली दौड़ गई। वह कांप गई तो एक उंगली टहनी के कांटे से टकरा गई। कांटा प्र गया। होंठों को भींचकर उसने अपनी'सी' पर काबू पा लिया। फूल लिए बिना वह अपना हाथ एक झटके से पीछे खींच चुकी थी। उंगली से रक्त भी निकल आया था। चंद्रमाल से रजनी की चुभन छिप नहीं सकी। वह कुछ गंभीर हो गया। उसने । सहानुभूति प्रकट करते हुए पूछा'कांटा चुभ गया?'

रजनी ने कुछ नहीं कहा। हाथ बढ़ाकर उसने फूल ले लिया। उंगली से निकले रक्त की भी उसने चिन्ता न की।

चंद्रभाल के साथ खड़ी सुन्दरी को चंद्रभाल का इस प्रकार रजनी में रुचि लेना जरा भी पसंद नहीं आया। रजनी की भेद भरी गंभीरता भी उसे एक औख नहीं भाई। मन ही मन वह रजनी पर जल-भुल उठी। उसे अवसर अच्छा मिला तो व्यंग्यात्मक ढंग से वह तुरन्त बोली, फूलों से खेलना अच्छी बात नहीं है। फूलों में कांटे भी होते है।' सुन्दरी ने मानो रजनी को सावधान किया

_ 'फलो से खेलने वाले कांटों की परवाह नहीं करते।' रजनी ने तुरन्त उत्तर दिया। उसमें जाने कैसे ऐसी बात कहने का साहस उत्पन्न हो गया था।
 
सुन्दरी और जल-भुन उठी। मन हुआ, रजनी की लटें पकड़कर खींचते हुए उसकी पिटाई कर दे, परन्तु फिर रुक गई। इस सादगी में यह रजनी नाम की लड़की जाने कौन हो? रंग-रूप में तो रजनी उसे मेहमानों, में आई किसी भी सुन्दरी से कम नही लग रही थी। उसने चंद्रभाल को देखा। रजनी की बात की गहराई पर ध्यान करके उसके होंठों पर एक मुस्कान उभर आई थी। उसने तिरछी दृष्टि द्वारा सुन्दरी को देखा। फिर मुस्कराता हुआ एक ओर बढ़ गया, बिना कुछ कहे ही। सुन्दरी ने शोले-भरी दृष्टि से रजनी को देखा और फिर चंद्रमाल के साथ आगे बढ़ गई। उसने पूछा, कौन है यह लड़की?'

'रजनी।' चंद्रभाल ने बिना उसकी ओर देखते हुए चलते-चलते उत्तर दिया।

'रजनी? कौन रजनी?' सुन्दरी ने माथे पर बल डालकर पूछा।

'है एक।' चंद्रभाल ने बरामदे के द्वार से हाल में प्रविष्ट होते हुए कहा, हमारे माली की नातिन।'

'ओह!' सुन्दरी ने तिरस्कारते हुए मुंह बनाया। मन हुआ, वह पलटकर रजनी के पास जाए और उसे तथा कोठी के माली को तुरंत निकाल बाहर करे, परन्तु फिर वह अपने मन की इच्छा दबाकर रह गई। इस कोठी के नौकरों पर उसका अधिकार ही क्या था? परन्तु वह इस कोठी की रानी बनने का स्वप्न अवश्य देख रही थ्री। नाम उसका अंशु था और चंद्राशु बनने की उसकी अभिलाषा थी। - रजनी ने चंद्रभाल के जाने के बाद वहां ठहरना उचित नहीं समझा। वह कोठी के पीछे अपने बाबा के क्वार्टर की ओर बढ़ गई। अपने नाना को वह बाबा कहकर ही पुकारती थी। वह क्वार्टर पहुंची। द्वार के पट भिड़े हुए थे। उसने धीमे से धक्का दिया। कमरे का पुराना तथा गंदा बच्च, जल रहा था, जिस पर जाल भी लगा हुआ था। कमरे की सफाई वह अगले दिन करने वाली थी। आज ही तो वह यहां अपने बाबा के पास आई थी। लगभग तीन वर्ष के बाद अपने बापू के पास से, जो यहां से कोसों दूर कुसुम्पटी के एक देहात में रहता था। _उसने देखा, बाबा सो रहा था। आयु अधिक होने के कारण दिन भर माली का काम करते हुए थक जाता था। शायद इसीलिए कोठी की रंगीनी की एक, झलक देखने के बाद वह अपने क्वार्टर में चला आया था और खाना खाकर सो गया था। रजनी को जरा भी भूख नहीं थी। चंद्रभालू को अपने प्रति लापरवाह देखकर उसका मन उचाट हो गया था। उसने कमरे की खिड़की की ओर देखा। एक पट खुला हुआ था। लॉन के बाद कोठी का पिछला भाग धुंधले प्रकाश में झलक रहा था। उसने कमरे का बल्व बुझा दिया। कमरे में पूर्णतया अंधकार छाने से पहले खिड़की द्वारा बाहर की हल्की धुंध कमरे में प्रविष्ट हो गई।

 
रजनी दूसरे कमरे में पहुंची। यहां भी पहले कमरे के ही समान अधंकार था। उसने खिड़की की ओर देखा। दोनों ही पट खुले हुए थे। कोठी का पिछला भाग सामने था। रजनी के समीप ही एक पुरानी लोहे की कुर्सी- रखी थी। खिड़की के सामने खींचकर वह उस पर बैठ गई। नींद आखों से दूर थी, इसलिए कुछ आगे झुककर उसने अपने दोनों हाथों को कोहनियों से मोड़कर समेटते हुए खिड़की की चौखट पर रख लिया। अपनी टोड़ी हाथ पर रखकर वह कोठी की ओर देखने लगी, जहां दूसरी मंजिल पर बीच बारजा तथा उसके बगल का कमरा बिजली से प्रकाशमान था। बारजे तथा कमरे की खिड़की के सामने हरसिंगार के सफेद-पीले फूल मानो उसी के समान उदास थे। इन फूलों से, हरसिंगार के वृक्ष से उसके अतीत की डोर बंधी हुई थी। कभी इस हरसिंगार के पौधे की नींव उसने चंद्रभाल के साथ ही तो डाली थी। अपने हाथों से प्रतिदिन वह इस हरसिंगार की जड़ में पानी दिया करती थी। तब उस पौधे को वृक्ष के इस रूप में देखने के लिए दोनों कितने व्याकुल रहा करते थे! और आज, जब वह पौधा वृक्ष का रूप धारण कर चुका था, बचपन के वे दिन ही नहीं रहे। कोठी के हॉल में आर्केस्ट्रा की धुन फिर आरंभ हो गई थी। हवा के बझव के सहारे वह बहुत मद्धिम स्वर द्वारा वातावरण में शहद घोलती हुई रजनी के कानों तक भी आ रही थी। शायद हॉल के अंदर नृत्य फिर आरंभ हो गया था। निश्चय ही चंद्रभाल उस सुन्दरी को छाती से लगाए फिर नृत्य कर रहा होगा, परन्तु रजनी ने उस ओर अपना ध्यान देकर चिंतित या परेशान होना उचित नहीं समझा। यदि उन दोनों की रुचि एक-दूसरे में है तो वह उनके बारे में अनुचित बातें सोचने वाली कौन होती है? परन्तु अपना ध्यान उनकी ओर से हटाने का प्रयत्न करने के बावजूद उसके दिल में टीस उठती रही। यह नन्हा-सा मांस का टुकड़ा उसके लिए क्यों तड़प उठता है, जिसके पैरों की वह धूल बनने योग्य भी नहीं है? क्या बचपन के दिन खेल 'थे जिन्हें सपनों में खेला और भुला दिया? बचपन के दिन भी क्या दिन थे! कितने निश्चिचत, कितने दिलचस्प!

इस कोठी में बाबा के पास उसका बापू छोड़ गया था जब वह केवल सात वर्ष की थी। नन्ही-मुन्नी-सी, बहुत प्यारी-सी थी वह, बिल्कुल गड़िया के समान। उसका बापू उसे छोड़कर चला गया तो वह उसके लिए बहुत रोई थी। उसका बापू तो उसे बहुत अधिक प्यार करता था, फिर वह उसे बाबा के पास क्यों छोड़ गया? उसके तो एक मां भी थी! एक छोटी बहन भी थी-दो वर्षीय बहन। बहन को वह कितना अधिक प्यार करती थी। फिर भी सबसे उसे क्यों अलग कर दिया गया? उसने अपने बाबा से जब इसका कारण जानने की जिद की तो बाबा को बताना पड़ा, उसकी मां सौतेली है, बहन भी सौतेली है।

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सौतेली? नन्ही-मुन्नी-सी जान सौतेली का अर्थ नहीं समझ पाई तो बाबा ने उसकी छोटी-सी बुद्धि पर सौतेली मां की छवि खींच दी थी। रजनी की आखों में वे सारे क्षण उभर आए थे, जो याद थे तथा जिन्हें उसने मां के साथ अपनी सौतेली बहन के उत्पन्न होने के बाद बिताया था। बाबा ने उसे बताया कि उसकी सगी मां तो उसे जन्म देते ही चल बसी थी। सगी मां की ममता की कमी का एहसास जब उसके नन्हे से दिल ने किया तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी थी। परन्तु बचपन का घाव शीघ्र ही भर जाता है। बाबा का प्यार तथा सहारां पाकर उसने अपने कोमल दिल पर पत्थर रख लिया था। आरंभ से ही सगी मां का प्यार नहीं मिला था, इसलिए उसे स्वयं को संभालने में आसानी हो गई थी।

अपने बापू तथा सौतेली मां के साथ वह कुसुम्पटी के एक गांव में रहती थी। बापू को लोग हीरालाल के नाम से पुकारते थे-लम्बी लटे-औसत कद। कुसुम्पटी में उसका बाबा भी कभी-कभी अपने दामाद से मिलने जा पहुंचता था। तब वह अपने बाबा के साथ घुल-मिल जाती थी। बाबा भी उसे क्षत प्यार करता था। इतनी प्यारी नातिन को देखकर उसके बाबा का मन उसे प्यार करता भी क्यों न?

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जब वह बहुत छोटी थी तो बाबा उसे कंधे पर उठाए फिरता था। हर क्षण छाती से लगाए रखता था। यही कारण था कि बापू के जाने के बाद वह केवल कुछ ही दिनों तक उदास रही। फिर बाबा का असीम प्यार पाकर संभल गई थी। बाबा उसकी हर इच्छा अपना पेट काटकर पूरी करने लगा था। उसे सुलाता भी तो अपनी छाती से लगाकर। बाबा उसे इस प्रकार साफ-सुथरा रखता, मानो उसकी सफेद गुड़िया मैली न हो जाए। एक ही सप्ताह के अंदर रजनी ने अपने अड़ोसी-पड़ोसी नौकरों का दिल जीत लिया। बाबा का पडोसी गंग ड्राइवर था। उसका नया-नया विवाह हुआ था। रजनी को देखता तो भगवान से कामना करता कि यदि उसके घर में लड़की उत्पन्न हो तो रजनी के समान ही प्यारी हो। रजनी उसे गंगू चाचा पुकारने लगी थी।

एक शाम बाबा लीन के किनारे नल में रबड़ की ट्यूब लगाकर पौधों को पानी दे रहा था। उससे कुछ दूर लॉन के दूसरे किनारे पर रजनी खड़ी थी। बहुत ध्यान से वह पौधे में लगे एक गुलाब को देख रही थी, जो शायद लीन का सर्वाधिक सुन्दर फूल था। फूल को वह कुछेक क्षण उसी प्रकार देखती रही। फिर वह फूल के समीप चली आई। कुछ झुककर उसने एक हाथ बढ़ाते हुए फूल तोड लेना चाहा। फूल की टहनी उसने अभी पकड़ा ही थी कि अचानक पीछे एक अपरिचित स्वर सुनकर वह चौंक गई। नन्हा-सा दिल कांप गया। टहनी को थामे हाथ झटका खा गया। एक जंगली में कांटा चुभ गया तो उसने अपना हाथ तुरंत पीछे खींच लिया। उंगली में जलन होने लगी।

'कौन हो तुम?' किसी ने उससे पूछा था।

रजनी पीछे पलटी। उसके सामने एक बालक खडा था-आय साढे दस या ग्यारह वर्ष होगी। सफेद कुर्ते-पायजामे में उसका रंग-रूप खिल रहा था। गले में एक सोने की जंजीर थी। उसे देखने के बाद रजनी क्षण भर के लिए कुछ भी नहीं कह सकी।

'कौन हो तुम? यहां तुम क्या करने आई हो?' लड़के ने फिर पूछा, परन्तु उसके स्वर में सख्ती जरा भी नहीं थी।

'मै,मैं,,।' रजनी ने अपनी स्थिति संभाली। फिर अपने बाबा की ओर संकेत करती हुई बोली, वह जो बाबा हैं ना-वह मेरे ही बाबा हैं। मैं उन्हीं के साथ रहती हूं।'

लड़के ने एक बार बाबा को देखा। फिर रजनी की ओर पलटते हुए बोला,'ओह!' यह मुस्कराय मैं तो समझा था कि तुम यहा किसी अड़ोस-पड़ोस के घर से आ टपकी हो।'सहसा लड़के की दृष्टि रजनी की उंगली पर पड़ी। जहां कांटा चुभा था, वहां रक्त निकल आया था। उसने उसके और समीप आते हुए कहा, अरे! तुम्हारी उंगली से तो रक्त निकल रहा है !'

'कांटा चुभ- गया है।' रजनी ने अपनी उंगली देखने के बाद दूसरे हाथ की उंगली द्वारा रक्त पोंछते हुए कहा।

'फूल बहुत पसंद हैं?' सहसा लड़के ने मुस्कराते हुए पूछा।

परन्तु तभी वहां रजनी का बाबा चला आया। उसने आते ही रजनी से कहा, अरे रजनी बिटिया, छोटे मालिक को प्रणाम किया कि नहीं? जल्दी कर। यह बड़े मालिक के बेटे हैं।'

'ठीक है, ठीक है। कुंवर साहब ने कहा-अर्थात् कुंवर चंद्रमाल ने। उसने बात जारी रखी। बोला, अभी तो यह बच्ची है। धीरे-धीरे यहां की सभ्यता सीख जाएगी।' चंद्रभाल ने इस प्रकार कहा, मानो वह स्वयं एक बुजुर्ग था।

फिर भी रजनी ने उसे हाथ जोड़कर प्रणाम कर दिया। उत्तर में बड़ी शान से एक बुजुर्ग के समान ही चंद्रभाल ने सिर भी हिला दिया।

यह थी रजनी की चंद्रभाल से पहली भेंट, जो बीतते दिनों के साथ बड़ी तो अनजाने में दोनों एक-दूसरे के समीप आ गए।

एक दिन रजनी को देखकर चंद्रभाल के पिता ठाकुर साहब ने जब उसके विषय, में पूछते हुए उसकी वास्तविकता ज्ञात की तो उन्हें बिना मां के बच्ची पर दया आ गई। उनके दान-पुण्य पर अनेक बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। उन्होंने रजनी की शिक्षा का प्रबंध भी एक साधारण-सी पाठशाला में कर दिया।रजनी उनकी धर्मपन्ति को भी एक ही दृष्टि में भा गइ। अपने पैर दबाने के बहाने वह पैसों से भी उसकी सहायता कर देती थी। प्राय: सोचती, इस लड़की को तो किसी ऊंचे घराने में उत्पन्न होना चाहिए था।

रजनी का बापू हीरालाल कभी-कभी अपनी बेटी को देखने आ जाता था। कोठी के नौकर-चाकरों से उसका परिचय भी हो गया था। मालिक-मालकिन तथा चंद्रमाल को बह प्रणाम करने लगा तो वे भी उसे जान गए।
 
चंद्रमाल घर की एकमात्र संतान थी, इसलिए उसे रजनी के साथ खेलने से उसके माता-पिता ने मना नहीं किया। बच्चे ही तो थे। चंद्रमाल के जब मित्र आते तो वह उनके साथ कोठी के पिछले लॉन में क्रिकेट या अन्य खेल खेलने लगता। उस समय भी वह रजनी को अकेला नहीं छोड़ता। उसे लीन में खेलने के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा कर देता, जिससे वह आसानी के साथ गेंद पकड़ सके। एकांत में उससे मिलता तो उसके लिए टाफियां लाना नहीं भूलता। स्वयं खाता और उसे भी खिलाता। रजनी को प्रसन्न रखते हुए चंद्रभाल को एक बिचित्र-सी प्रसन्नता का आभास होता था।

रजनी आरंभ से ही बहुत खामोश स्वभाव की लड़की थी, परन्तु चंद्रभाल के सामने तो वह बिल्कुल दूंगी हो जाती थी। केवल चंद्रभाल ही उससे बातें करता रहता था-कभी पढ़ाई की, तो कभी खेल-कूद की। उनकी बातों में बिल्कुल बचपना था। उन दोनों की अभी आयु ही क्या थी।

समय बीत रहा था। दोनों एक-दूसरे के और समीप आ गए। रजनी की आयु अब सादे दस वर्ष की हो गई। सांसारिक बातों का कुछ ज्ञान उसे भी हो चला, परन्तु उसके सोचने-समझने के ढंग में वही पहले, जैसा बचपना था। हां, चंद्रभाल के समीप हर क्षण रहने की उसकी इच्छा बढ़ गइ थी- केवल इच्छा। इस इच्छा के पीछे कोई स्वार्थ नहीं था, कोई उद्देश्य भी नहीं था। यह केवल एक बचपना था, क्योंकि वह चंद्रभाल के साथ सादे तीन वर्षों से बराबर खेलती आई थी। चंद्रभाल उसे अच्छा लगता था। उसे देखकर उसके मुखड़े की कली मुस्करा उठती थी। वह नहीं आता तो उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। बचपन में ये बातें किसी भी मासूम दिल के साथ घट सकती थी।

चंद्रभाल भी चौदह वर्ष पार कर चुका था। उसके सोचने-समझने का दंग बदल गया। परन्तु उसके भी सोचने-समझने के ढंग में बचपना था-केबल बचपना। परन्तु उम्र के साथ उसके अंदर परिवर्तन आने लगा। वह यह समझने लगा कि रजनी से कब मिलना चाहिए, किसके सामने कैसे बातें करनी चाहिएं। रजनी की, तुलना वह अपनी परिचित लड़कियों से किए बिना नहीं रह पाता था और तब रजनी की सुन्दरता के आगे कोई उसे रजनी के पैरों की धूल भी नहीं दिखाई देती।

समय पंख लगाकर उड़ रहा था। शीघ्र ही रजनी अपनी आयु के उस मोड़ पर पहुंच गई, जब कली फूल बनने का स्वप्न देखकर लजाने लगती है। वह तेरह वर्ष की हो गई। तेरहवां वर्ष पूरा करते-करते उसके अंदर कुछ परिवर्तन तूफान की गति लिए आए। अचानक ही उसके सोचने-समझने का ढंग बदल गया। स्वभाव में गंभीरता आ गई। उसे अपनी सुन्दरता का एहसास होने लगा। अपनी खिलती कली जैसी सुन्दरता की वह रक्षा करने लगी। देर तक एक छोटे-से दर्पण के सामने वह स्वयं को संवारने लगी। दर्पण में देखते-देखते बहे स्वयं से लजा जाती। आखों में गलाबी डोरे कांप जाते। कपोलों की लालिमा बढ़ जाती।

चढ़ती आयु के साथ उसके शरीर में भी परिवर्तन आया था-एक नया निखार बनकर, जिसे लाज के मारे छिपाने के लिए कुछ झुककर चलने लगी थी। परन्तु जब वह चंद्रभाल के सामने ऐसा करती तो उसे लगता मानो कुंवर साहब उसके शरीर की चोरी कुछ अधिक ही ध्यान से देख रहे हैं। चंद्रभाल की दृष्टि उसके शरीर को छेद जाती। रजनी लाज के मारे धरती में गड़ने लगती। मन करता, वह कुंवर साहब के सामने से भाग जाए, परन्तु उसके पग मानो धरती से चिपक जाते थे। वह सोचती, उसे भागना ही था तो वह इतना बन-संवरकर कुंवर साहब के सामने क्यों आई थी? क्यों उनसे मिलने के लिए उसका दिल तड़पता रहता है? चंद्रभाल से भेंट न होने पर क्यों उसके दिल में कसक होने लगती है? इस आयु में उसे इस कसक का एहसास भी पूरा-पूरा होने लगा था। परन्तु इस कसक में भी उसे एक मिठास मिलती। प्यार के खेल कितने निराले होते हैं।

रजनी के जीवन में एक नया निखार उत्पन्न हो रहा था, इसलिए चंद्रणाल अब उससे शाम को मिलने के बाद कभी-कभी रात में भी मिलने चला आता था। रात के प्रारंभिक क्षणों में। परन्तु रजनी उस'कभी-कभी' की आशा में अपने कुंवर साहब की प्रतीक्षा प्रतिदिन ही किया करती थी। रात का अंधकार जब कोठी के ,वातावरण पर छा जाता, जब कोठी का पिछला भाग धुंधले प्रकाश में सुनसान हो जाता, जब क्वार्टर में रहने वाले नौकरों का क्वार्टरों के बाहरी वातावरण से कोई संबंध नहीं रहता, तो रजनी अपने कमरे को प्रकाशमान करके खिड़की के समीप आ बैठती। अपने स्कूल की पढ़ाई करने के बहाने चंद्रभाल की प्रतीक्षा करती रहती। चंद्रभाल ने उससे मिलने का कोई वायदा नहीं किया होता फिर भी उसकी प्रतीक्षा में उसका दिल धड़कता रहता। चंद्रभाल लीन में दिखाई पड़ जाता तो उससे मिलने की प्रसन्नता में उसके दिल की धड़कन अधीर होकर अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाती। चंद्रभाल नहीं आता तो उसका मन उदास हो जाता। फिर दिल के अंदर कसक-सी उठने लगती। ___ फिर रात के दस बजने के बाद जब वह निराश जाती तो अपनी चारपाई पर लेटकर चंद्रमाल के विचारों में खो जाती-कुंवर साहब आज क्यों नहीं

आए? क्या उनके मन में उससे मिले बिना शांति आ जाती है? रजनी अपने जीवन के ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी थी, जहा एक कुमारी के मन तथा मस्तिष्क की नींव पक्की बनने लगती है। चंद्रभाल से रात के एकांत में उसे जो अज्ञात आनन्द प्राप्त होता था, वह दिन के उजाले में सबके सामने नहीं।
 
चंद्रमाल साढ़े सोलह-सत्रह वर्ष का हो चला था। रजनी से एकान्त में मिलने का कारण वह समझता था। उससे जो भी बातें करता सोच-समझकर करता। रात के समय जब सारा संसार सो गया होता तो वह रजनी से कोठी के पिछले लॉन में ही मिलना पसन्द करता था। लॉन में एक वृक्ष के अंधकार तले वे दोनों एक पत्थर की बैच पर बैठकर काफी देर तक बातें करते रहते थे। आरंभ में जब रजनी ने उसकी बराबरी न करते हुए उसके साथ पत्थर की बेंच पर बैठना न चाहा तो चंद्रभाल ने पूरे अधिकार के साथ उसका हाथ पकड़कर उसे खींचते हुए अपने साथ बिठा लिया था। परन्तु रजनी दिन के उजाले में चंद्रभाल के साथ बराबरी में कभी बैठने का साहस नहीं कर सकी। चंद्रभाल ने भी ऐसा करना उचित नहीं समझा।

इसी प्रकार रात के समय एक बार रजनी अपने क्वार्टर की खिड़की खोलकर पढ़ाई करती हुई चंद्रभाल की प्रतीक्षा कर रही थी, परन्तु पलकें थीं कि बार-बार कोठी के पिछले भाग पर उठ जाती थीं। चांदनी छिटकी हुई थी। लीन का वातावरण सुगंधित था। हवाओं में मादकता थी। अशोक- वृक्ष झूम रहे थे। पत्तियां लहराकर सनसनाती हुई झूम रही थीं। कोठी के पिछले भाग में दूसरी मंजिल पर बारजे के अन्दर लूंगा रेशमी पर्दा हवा के झोंकों पर उलट-पलट जाता था। बारजे के अन्दर लोहे के स्टैंड में अनेक गमले रखे हुए थे, जिनके पौधों को दिन के समय रजनी अनेक बार देख चुकी थी, जब उसका माली बाबा इन गमलों में पानी देने जाता था तो वह कभी-कभी स्वय भी उसके साथ वहां चली जाती थी।

सहसा कोठी के पीछे किसी पर रजनी की दृष्टि ठिठक गई। लॉन में एक छाया चली आई थी। छाया को वह एक ही दृष्टि में पहचान गई। पहचानती भी क्यों नहीं, बिना कोई वायदा प्राप्त किए भी दिल उसी की तो प्रतीक्षा कर रहा था। कुवर साहब! उसकी आखों की चमक बढ गई। वह जानती थी, कुंवर साहब कोठी के पीछे क्यों आए हैं। उससे मिलने। प्राय: वह उससे मिलने के लिए ऐसा ही किया करते थे। अपनी खिड़की के प्रकाश, में पढ़ाई का बहाना लेकर बैठी वह उन्हें प्रकट कर देती थी कि वह भी उन्हीं की प्रतीक्षा कर रही थी। कुंवर साहब को देखकर वह तुरन्त उठी ओ र उनके पास पहुंच गई। ___ दोनों पत्थर की बैच पर बैठ गए, जो लॉन के पिछले भाग में एक वृक्ष के नीचे थी। चंद्रभाल ने अपनी बातें आरंभ कर दीं। परन्तु बात करते-करते अब वह रजनी को देखते हुए खो भी जाता था। उसके देखने का ढंग निराला था। कुछ ऐसा कि रजनी को लाज आ ही जाती थी। आखों में गुलाबी डोरे कांप जाते थे। दिल, की धड़कनें तेज हो जाती थीं। फिर वह चद्रभाल को देखने के बजाय इधर-उधर देखने लगती थी।

सहसा हवा का एक तेज झोंका आया। अशोक के वृक्ष चिंघाड़ उठे। दूसरी मंजिल पर बारजे का रेशमी पर्दा बहुत जोर से लहराकर फड़फड़ाया। इसके साथ ही एक स्वर उत्पन्न हुआ-खटाक! दूसरी मंजिल पर बारजे के अन्दर कोई वस्तु गिरकर टूट गई थी। रजनी चौंक गई। उसने घबराकर बारजे की ओर देखा-फिर चंद्रभाल को। चंद्रमाल की दृष्टि भी बारजे पर उठ गई थी। रजनी को देखकर वह मुस्करा दिया। फिर बोला लगता है हवा के कारण बारजे में रखा कोई गमला गिर पड़ा है-।'

_ 'ओह!' रजनी ने हवाओं के झोंकों से अपनी बिखरी लटों को उंगलियों द्वारा संवार कर मध्यम स्वर में कहते हुए मानो अपनी चिन्ता दूर की।
 
चंद्रभाल छिटकी हुई चांदनी का सहारा लेकर हवाओं की शरारत पर बिखरी लटों के मध्य रजनी का प्यारा। मुखड़ा देखकर कुछक खनेद्धसा गया। फिर मानो स्वयपर काबू करके मुस्कराता हुया वोला, इधर,कोटी के पीछे कितनी अच्छी हवाएं चलती हैं-प्यारी-प्यारी हवाएं। दिल को लुभाने वाली, है ना?'

'हां।' रजनी ने अपनी छोटी-सी बुद्धि से काम लिया। बोली इस ओर पेड़ जो अधिक हैं।'

'पेड़ अधिक नहीं हैं। इधर का अहाता साम ने के अहाते के मुकाबले अधिक खुला है। यहां का वातावरण अधिक सुनसान है।' चंद्रभाल ने उसे समझाया। बात उसने जारी रखी। बोख इसीलिए तो मैंने सोचा है कि जब मैं कुछ और बड़ा हो जाऊंगा तो बारने के बंगल वाले कमरे को अपना शयनकक्ष बना लूंगा। गर्मी के दिनों में रात के समय जब इसकी बड़ी-बड़ी खिड़कियां खोल दिया करूंगा तो खूब ठंडी-ठंडी हवाएं आया करेंगी।'

रजनी सोचने लगी, यह तो और अच्छा होगा। कुंवर साहब कोठी के पिछले बाले कमरे में आ जाएंगे तो गई रात तक उसे अपने क्वार्टर की खिड़की द्वारा कुंवर साहब का दर्शन प्राप्त होने में आसानी हो जाएगी। चंद्रभाल स्वयं भी रजनी से मिलने के लिए कोई आसान तरीका निकाल लेना चाहता था।

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फिर कुछ दिनों बाद आषाढ़ का महीना आ गया। एक सुबह रजनी का बाबा कोठी की शान बढ़ाने के लिए कुछेक पौधे लेकर आया। पौधों को उसने लीन के एक किनारे रख दिया, जहां प्रतिदिन उपयोग में लाने वाले औजार, खुरपी तथा रंभा, पहले ही रखे हुए थे। फिर वह गमलों को लेने चला गया। गमले नौकरों के क्वाटर्स के किनारे एक गोदाम में रखे हुए थे। तभी वहां रजनी तथा चंद्रमाल बातें करते आ निकले। अचानक नये पौधों पर उनकी दृष्टि पड़ी तो दोनों ही आकृष्ट होकर रुक गए। सहसा एक पौधे पर दृष्टि पड़ते ही चंद्रभाल चौक गया। फिर होंठों को दबाकर बहुत भेद भरे ढंग में मुस्कराया। पौधे की ओर संकेत करते हुए उसने पूछा जानती है इस पौधे का क्या नाम है?'

'हरसिंगार।' रजनी ने उत्तर, दिया।

'तुझे कैसे मालूम?' चंद्रभाल ने आश्चर्य से पूछा।

'मेरी पाठशाला में लगा है।'

'तब तो तूने उसके फूल को नहीं, देखा होगा।'

'देखा है।

'देखा है तो फिर बासी फूल देखे होंगे, क्योंकि पाठशाला में तो तू केवल दिन के समय ही रहती है, जबकि यह फूल केवल रात में ही खिलता है और सुबह होते ही झड़ जाता है।

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रजनी सोचने लगी, कुंवर साहब ठीक ही कहते हैं। उसने पूछा, कुरसिंगार रात में ही क्यों खिलता है?

'रात में क्यों खिलता है, यह तो मुझे भी नहीं मालूम, परन्तु इसे देखने के बाद इसमें मेरी रुचि अवश्य - बढ़ गई है।'

'क्यों?'

'क्योंकि यह रात में खिलता है।' चंद्रभाल ने कहा, रात में हर फूल की सुगन्ध बढ़ जाती है। रात में तू भी मुझे बहुत अच्छी लगती है, शायद इसीलिए

भगवान ने तेरा नाम रजनी रखा है।'

'मेरा नाम तो मेरे बापू ने रखा है।' रजनी भोलेपन से बोली।

'बात एक ही है।' चंद्रभाल ने कहा,'यदि भगवान तेरे बापू के मन में तेरा नाम नहीं डालता तो क्या तेरा बापू तेरा नाम रजनी रख सकता था?' ।

रजनी ने अपनी भोली समझ द्वारा सोचा, चंद्रमाल कितने बुद्धिमान हैं? उससे बड़े हैं ना शायद इसीलिए।

चंद्रभाल ने कुछ सोचकर पौधे को उठा लिया। फिर बोला,'क्यों ना मैं इस पौधे को पिछले लीन में ऐसे स्थान पर लगाऊं जहां मैंने अपना शयनकक्ष बनाने का विचार कर रखा है? जब यह बड़ा होकर दूसरी मंजिल पर पहुंचेगा, जब यह मेरे शयनकक्ष की खिड़की द्वारा अन्दर झांकेगा, तो मैं इसे देखकर तुझे यादं कर लिया करूंगा, इसकी सुगन्ध से रात भर मेरा कमरा सुगन्धित रहेगा तो मैं सोचूंगा कि तू मेरे पास है-मेरे कमरे में।



रजनी चंद्रभाल की पहेलियां भरी बातें न समझते हुए भी मुस्करा दी।

'आ, चल।' चंद्रभाल ने कहा अपने बचपन की याद को ताजा रखने के लिए हम एक यादगार बनाएं, इसे बो दें।'
 
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