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जितनी देर मैं पढ़ता रहा था, उतनी देर नीलिमा आँखें फैलाये मेरे चेहरे की तरफ़ देख रही थी जैसे कि वह उस बीच मेरे चेहरे के मज़मून को पढ़ती रही हो। उसकी आँखों में उत्सुकता के साथ एक आशंका नज़र आ रही थी और उस आशंका में मिली-जुली एक उदासीनता...।
“तो?” उसने कहा।
मैं पत्र पढ़ते हुए साथ ही बहुत कुछ सोचता भी रहा था जिससे मेरा सिर भारी हो रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूँ। मैं कुछ क्षण खिडक़ी की तरफ़ देखता रहा, वहाँ जहाँ से एक दिन नन्हे-नन्हे सफ़ेद पंख हवा में तैरते हुए नीचे आ रहे थे। मगर उस समय वहाँ पंख नहीं उतर रहे थे, केवल धूप में चमकते हुए ज़र्रे ही नज़र आ रहे थे।
“तुम्हारा ख़याल है मुझे चली जाना चाहिए?” उसने इस तरह पूछा जैसे मेरे हाँ या न कहने पर ही सब कुछ निर्भर करता हो।
“मेरा तो ख़याल है कि चली जाना चाहिए।” मैंने कहा, “अगर रुपये का प्रबन्ध हो सकता है, तो और कोई बाधा तुम्हें नहीं होनी चाहिए।”
“रुपये का प्रबन्ध तो हो जाएगा।” वह बोली, “बीजी मुझे मैसूर जाने के लिए जो पैसे दे रही हैं, उनसे लन्दन तक तो पहुँचा ही जा सकता है। मगर सवाल तो उसके बाद का है।”
“मतलब उतने पैसे से तुम दोनों लन्दन पहुँच जाओगी, सवाल लन्दन के खर्च का है?” मैं अपने मन की अनिश्चितता को दूर कर लेना चाहता था। वह लन्दन जाएगी, तो क्या अकेली ही जाएगी, या...?
“दोनों से तुम्हारा मतलब मुझसे और शुक्ला से है?” वह बोली, “शुक्ला वहाँ कैसे जा सकती है? वह तो हर हालत में बीजी के पास ही रहेगी। मैं अगर वहाँ गयी, तो हरबंस की वजह से जाऊँगी, शुक्ला को बीजी क्यों जाने देंगी? वह अभी पढ़ रही है और कल को उसका ब्याह भी करना है। लन्दन में हमसे अपना खर्च ही नहीं उठाया जाएगा, उसकी पढ़ाई का खर्च हम कैसे उठाएँगे? पढ़ाई छोडक़र वह वहाँ चली जाए, इसलिए कि हमारे साथ रह सके, इसमें क्या तुक है? हरबंस तो पागल है जो ऐसी बात सोचता है।”
मैंने फिर चिट्ठियों के पुलिन्दे की तरफ़ देखा, जैसे कि उस पुलिन्दे की जगह स्वयं हरबंस मेरे सामने हो और मुझे उससे अनुरोध करना हो कि जैसे भी हो सके, वह नीलिमा के साथ शुक्ला को भी ज़रूर लन्दन बुला ले जिससे वह चार-पाँच साल वहाँ काट ले, ताकि इस बीच...।
“तुम्हारी चाय ठंडी हो गयी है।” नीलिमा बोली, “तुम मुझे सोचकर ठीक राय दो। मैं तब तक तुम्हारे लिए और चाय बना लाती हूँ।”
कह नहीं सकता कि वह मेरी वजह से उठकर चली गयी या अपनी वजह से ही। मैंने चिट्ठियों के पुलिन्दे को फिर उठा लिया और इस तरह एक-एक पन्ने को पलटने लगा जैसे परीक्षा से पहले एक परीक्षार्थी जल्दी-जल्दी अपनी पाठ्य-पुस्तक को देखता है। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि क्या वे सब पत्र हरबंस के ही लिखे हुए हैं, उस व्यक्ति के जिसकी फ़ाइलों में आधी हिन्दी और आधी अँग्रेज़ी में लिखे हुए कितने ही उलझे हुए पन्ने मैंने देखे थे! उन पन्नों के अटपटे और उलझे हुए वाक्यों का लेखक यह सब कैसे लिख सकता था? उसकी फ़ाइलों में तो हर वाक्य के ऊपर लाल पेंसिल से एक प्रश्नचिह्न बना हुआ था, और इन पत्रों में...? क्या वे पत्र उसके अन्दर के किसी और व्यक्ति ने लिखे थे? या कि उसके अन्दर की छटपटाहट ने स्वयं ही अपने लिए मार्ग बना लिया था और वह बिना जाने ही वह सब लिख गया था? क्योंकि वह ढंग से सँवारकर लिखने का प्रयत्न करता, तो ज़रूर उन्हें भी अपनी फ़ाइलों के पन्नों की तरह अटपटा बना देता। यदि वे पत्र इतने व्यक्तिगत न होते, तो शायद मैं यह भी सोचता कि वे उसने किसी और की फ़ाइल से ही न उड़ाये हों। ‘तुम्हारे साथ, और तुम्हारे बिना, दोनों ही तरह ज़िन्दगी मुझे असम्भव प्रतीत होती है।’ ‘यहाँ तो बर्फ़ है, कोहरा है और धुआँ है। लगता है, जैसे यह शहर ठोस धुएँ का ही बना हो।’ ‘मेरे अन्दर कहीं एक खालीपन है जो धीरे-धीरे इतना बढ़ता जा रहा है कि मेरे व्यक्तित्व के सब कोमल रेशे झड़ते जा रहे हैं।’ ‘मैं केवल छानबीन और छीछालेदर ही कर सकता हूँ, कुछ निर्माण नहीं कर सकता।’ ‘यदि तुम्हें नृत्य में सचमुच इतनी रुचि है, और तुम समझती हो कि तुम अपने में इस कला को इतना विकसित कर सकती हो कि वह सच्चे सौन्दर्य की प्रतीक बन जाए, तो वह भी मेरे लिए एक मार्ग हो सकता है, उस उपलब्धि तक जाने का जिसे मैं स्वयं नहीं समझता।’ क्या यह उसी हरबंस की भाषा थी?
नीलिमा चाय ले आयी, तो मैंने पुलिन्दा फिर रख दिया और दोनों हाथों की उँगलियाँ उलझाकर कुछ सोचता हुआ सा बैठा रहा। नीलिमा अपने ढंग से शरीर को एक लचक देकर बैठती हुई बोली, “मैं आज ही उसे उत्तर देना चाहती हूँ, क्योंकि मुझे मैसूर जाना हो, तो दो-एक दिनों में ही मुझे चली जाना चाहिए, जिससे मैं सर्दियों में यहाँ आकर एकाध प्रदर्शन भी कर सकूँ।”
“तुम बताओ, तुम्हारा अपना मन क्या कहता है?”
“मैं अपने आप सोचकर तय कर सकती, तो तुम्हें बुलाने के लिए इतनी दूर क्यों जाती?” वह प्यालियों में चाय डालकर चीनी हिलाने लगी, “मैं तो तुमसे जानना चाहती हूँ कि तुम्हारे ख़याल में क्या करना ठीक है। मुझे अपने अलावा शुक्ला की बात भी सोचनी है जो मेरे पीछे यहाँ बहुत अकेली पड़ जाएगी। इसलिए सोचती हूँ कि मेरा अपना मन जो राय देता है, वह शायद ठीक नहीं है।”
“मगर यह तो बताओ कि तुम्हारा मन राय देता क्या है?” मैं उससे कैसे कहता कि मेरी दिलचस्पी उसकी समस्या से ज़्यादा एक और ही समस्या से है और मैं उसकी बात न सोचकर अपनी ही बात सोच रहा हूँ।
“चाय ले लो।” उसने कहा।
मैं चाय की बात भी भूल गया था। मैंने चौंककर प्याली उठा ली।
“मेरा मन क्या राय देता है?” वह कुछ समय लेकर बोली, “मेरा मन यही कहता है कि मुझे वहाँ चली जाना चाहिए। हो सकता है वह वहाँ सचमुच ही बहुत दुखी हो।”
“मेरी भी यही राय थी।” मैंने कहा। सोचा कि शायद इतने से अब वह प्रकरण समाप्त हो जाएगा और मैं दूसरी बात सोचता रह सकूँगा।
“तुम सचमुच यही समझते हो कि मुझे वहाँ चली जाना चाहिए?” नीलिमा के लिए मगर बात अब भी वहीं थी जहाँ पत्र मुझे पढऩे के लिए देने से पहले थी।
“क्यों, क्या यही ठीक नहीं है? तुम भी तो यही कह रही थीं।”
“मैं हरबंस के अकेलेपन की बात सोचकर कह रही थी। मगर तुम यह भी तो सोचो कि मेरे लिए मैसूर जाकर सीखने का यही एक चांस है।”
“हाँ, यह भी बात है।” मैं बार-बार अपने मन को धकेलकर उस विषय पर लाता था और वह बार-बार भटककर अपने दर्द की पगडंडी पर चला जाता था।
“हरबंस ने अपने पहली अप्रैल के पत्र में लिखा भी है कि मैं अपनी कला का ठीक से विकास कर सकूँ, तो उसे बहुत खुशी होगी। मैं छ: महीने मैसूर में रहकर फिर उसके पास जाऊँ, तो यह ज़्यादा अच्छा नहीं होगा?”
“मगर वह इतने दिन वहाँ अकेला रह लेगा? उसके आख़िरी पत्र से तो लगता है कि वह वहाँ बहुत ही बेचैन है।”
“उस पत्र की बात तुम जाने दो! वह तो उसने कुछ घबराहट में लिखा है। मैंने उसे वैसे ही सुरजीत की एक बात लिख दी थी जिसका अपने मन में पता नहीं उसने क्या मतलब लगा लिया है। मैं इस बार उसे लिख दूँगी कि वैसी कोई बात नहीं है, तो उसका दिमाग़ फिर ठीक हो जाएगा।” और हाथ की प्याली छलक न जाए, इसलिए उसे नीचे रखती हुई वह एक रूखी-सी हँसी हँसकर बोली, “मुझे डर है कि मैं अभी वहाँ चली गयी, तो उसका मन फिर वही खुराफ़ात सोचने लगेगा कि उसका विज़न एक गोल अँधेरी दीवार से टकराकर टूट रहा है। इसलिए मैं अभी कुछ दिन उससे दूर ही रहूँ, तो अच्छा है।” और पल-भर रुककर उसने फिर कहा, “मैं सच कहती हूँ कि अगर मुझे यह विश्वास हो कि मेरे तुरन्त वहाँ पहुँच जाने से उसे सचमुच सुख मिलेगा, तो मैं आज ही चली जाऊँ। मगर मैँ जानती हूँ कि ऐसा नहीं होगा।”
“तो इसका मतलब तो यही है कि तुम्हारे ख़याल में तुम्हारा मैसूर जाना ही ठीक है।”
“मैं कहती हूँ कि वह गया है, तो अब उसे कुछ दिन अकेले रहना ही चाहिए। वह बहुत दिनों से इस तरह की ज़िन्दगी के लिए बेचैन था। मैं चाहती हूँ कि इस ज़िन्दगी से उसका मन पूरी तरह भर जाए, तभी मैं यहाँ से जाऊँ। इतने में मेरी ट्रेनिंग भी पूरी हो जाएगी।”
“और हो सकता है कि उतनी देर में वह ऊबकर वहाँ से वापस ही चला आये।”
“नहीं, वापस वह नहीं आएगा। अपनी ज़िद का वह बहुत पक्का है। और अगर आ जाए, तो और भी अच्छा।”
मैं उससे बात कर रहा था, मगर मेरा दिमाग़ उसके उस एक वाक्य पर ही अटका हुआ था, “मैंने उसे वैसे ही सुरजीत की एक बात लिख दी थी,” और मैं यही सोच रहा था कि उसने हरबंस को सुरजीत की ऐसी क्या बात लिखी थी जिससे वह एकदम बेचैन हो उठा था! अपने दर्द की पगडंडी पर भटका हुआ मेरा मन इस वाक्य को सुनने के बाद सहसा एक जगह ठिठक गया था, जैसे उसे लगा हो कि उसके सामने के झाड़-झंखाड़ के उस तरफ़ शायद कहीं एक सुरम्य वादी भी है और वह पथरीली पगडंडी एक विल्लौरी झील के तट पर जाकर भी समाप्त हो सकती है...।
“सुरजीत के बारे में तुमने उसे क्या बात लिखी थी?” मैंने कुछ रुकते-रुकते पूछा। चाहा कि मेरे स्वर से यह बिल्कुल प्रकट न हो कि उस सवाल में मेरी ज़रा भी दिलचस्पी है।
“ऐसी कोई ख़ास बात नहीं थी।” वह बोली, “उसने मुझसे एक दिन कोई अटपटी बात कह दी थी और बाद में उसके लिए माफ़ी माँग ली थी।”
“तुम इसीलिए कह रही थीं कि वह आदमी तुम्हें पसन्द नहीं है?”
“हाँ-हाँ। वह हर समय बहुत हल्के ढंग से बातें करता है और मुझे यह अच्छा नहीं लगता। बहुत हल्के ढंग से कही हुई बात दूसरे को कभी लग भी जाती है। मगर उसकी जो आदत मुझे पसन्द नहीं, शुक्ला को उसकी वही आदत सबसे अच्छी लगती है। वह उसकी हल्की-फुल्की बातें सुनकर लोट-पोट होती रहती है। आज सुरजीत सिनेमा के टिकट लेकर आया था। मैंने मना भी किया, मगर वह हठ करके बीजी, सरोज और सरिता को लेकर उसके साथ चली गयी है।”
मैं कुरसी पर थोड़ा पीछे को सरक गया। झाडिय़ों के उस पार से झील सहसा अदृश्य हो गयी थी और पगडंडी इतनी बीहड़ हो गयी थी कि मेरे लिए अपने को झेलना कठिन हो गया था।
“क्या बात है? तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है?” नीलिमा ने पूछा।
“नहीं, तबीयत ठीक है।” मैंने कहा, “रात को ठीक से सोया नहीं, इसलिए आँखें कुछ भारी हो रही हैं।”
“तुम्हें कोई टिकिया दूँ? आजकल फ़्लू से अपने को बचाते रहना चाहिए...।”
मुझे इससे अरविन्द की और अपनी कोठरी की याद हो आयी और मेरी आँखों का भारीपन अपने आप कम होने लगा।
“नहीं, दवाई की ज़रूरत नहीं।” मैंने कहा, “यह सिर्फ़ उनींदेपन की वजह से है। रात को सोकर ठीक हो जाऊँगा।”
“फिर भी एक टिकिया मैं तुम्हें दे देती हूँ।” कहती हुई वह उसी लचक के साथ उठी और अन्दर चली गयी। मैं कुछ देर आँखें बन्द किये बैठा रहा। फिर बाहर अहाते में पैरों की आहट सुनकर मैंने आँखें खोल लीं। शुक्ला और सब लोग सिनेमा से लौट आये थे। सरिता सबसे आगे थी और सुरजीत सबसे पीछे। मैं उस मन:स्थिति में सुरजीत से तो बिल्कुल ही नहीं मिलना चाहता था, मगर उस समय वहाँ बैठे रहने के सिवा और कर भी क्या सकता था? सुरजीत भी मुझे देखकर दरवाज़े के परदे के पास ही ठिठक गया।
“हलो!” उसने कहा, “तुम यहाँ हो?” और फिर मुझे बिल्कुल भूलकर बीजी से बोला, “अच्छा बीजी, मैं अब चल रहा हूँ। एक ऑस्ट्रेलियन संवाददाता आया हुआ है। उसके साथ मेरा चेम्सफोर्ड क्लब में खाना है। अगर हो सका, तो मैं शाम को आकर आपकी दाँतों की दवाई दे जाऊँगा। न आ सका, तो कल दिन में दे जाऊँगा।” और बिना उनके उत्तर की आशा किये, वह एक बार सबकी तरफ़ हाथ हिलाकर दहलीज़ से ही वापस चला गया।
“कहिए जी!” शुक्ला ने पास से गुज़रते हुए मुझसे कहा और बड़ी मेज़ से अख़बार उठाकर अन्दर चली गयी। सरोज और सरिता पहले ही चली गयी थीं। “आप कब से आये हुए हैं?” बीजी ने चलते-चलते पूछ लिया, “नीलिमा ने आपको चाय-वाय पिलायी कि नहीं?” और मेरे सिर हिला देने पर वे भी कर्तव्य से मुक्त होकर अन्दर चली गयीं। मैं जब अकेला रह गया तो मेरा मन हुआ कि मैं चुपचाप उठकर वहाँ से चला जाऊँ, मगर तभी नीलिमा अन्दर से आ गयी।
“यह रही तुम्हारे लिए दवाई की टिकिया।” उसने कहा, “बीजी की रखी हुई चीज़ें मुझे कभी मिलती ही नहीं। अब सरोज ने आकर निकालकर दी है।”
चाय की प्याली में जो दो घूँट बचे थे, उनके साथ मैंने टिकिया जल्दी से निगल ली और तुरन्त ही वहाँ से चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।
“तुम जा रहे हो?” नीलिमा कुछ आश्चर्य के साथ बोली।
“हाँ, मुझे एक काम याद आ गया है।” मैंने कहा, “एक बजे मुझे किसी के यहाँ पहुँचना है।”
“तो अब किस समय मिलोगे? मुझे तो अभी तुमसे और भी बात करनी थी।”
“मैं कल या परसों किसी समय फिर आ जाऊँगा।”
“तुम शाम को ही क्यों नहीं आते? मैं तुमसे बात करने के बाद ही हरबंस को चिट्ठी लिखूँगी।”
“देखो, कोशिश करूँगा, अगर आ सका तो।”
“नहीं, कोशिश की बात नहीं, तुम्हें ज़रूर आना है। मुझे एक और भी ज़रूरी बात करनी है।...वैसे तुम्हारा यही ख़याल है न कि मुझे छ: महीने मैसूर में रहकर ही हरबंस के पास जाना चाहिए?”
“हाँ, यही ठीक है।”
“मगर शाम को तुम्हें आना ज़रूर है। उसे चिट्ठी मैं उसके बाद ही लिखूँगी।”
“अच्छा!”
“देखो, भूल नहीं जाना!”
मैं तब तक दरवाज़े के पास पहुँच गया था। उसने मेरे बाहर निकलने के लिए परदा उठा दिया।
“नहीं, भूलूँगा नहीं।”
“शाम को मैं तुमसे कॉफ़ी पियूँगी। ठीक है?”
“हाँ, ठीक है।”
“तो किस समय तक आओगे? छ: बजे तक?”
“हाँ, छ: बजे तक आ जाऊँगा।”
“अच्छा...!”
मैं बाहर निकल आया, तो उसने परदा गिरा दिया।
“तो?” उसने कहा।
मैं पत्र पढ़ते हुए साथ ही बहुत कुछ सोचता भी रहा था जिससे मेरा सिर भारी हो रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूँ। मैं कुछ क्षण खिडक़ी की तरफ़ देखता रहा, वहाँ जहाँ से एक दिन नन्हे-नन्हे सफ़ेद पंख हवा में तैरते हुए नीचे आ रहे थे। मगर उस समय वहाँ पंख नहीं उतर रहे थे, केवल धूप में चमकते हुए ज़र्रे ही नज़र आ रहे थे।
“तुम्हारा ख़याल है मुझे चली जाना चाहिए?” उसने इस तरह पूछा जैसे मेरे हाँ या न कहने पर ही सब कुछ निर्भर करता हो।
“मेरा तो ख़याल है कि चली जाना चाहिए।” मैंने कहा, “अगर रुपये का प्रबन्ध हो सकता है, तो और कोई बाधा तुम्हें नहीं होनी चाहिए।”
“रुपये का प्रबन्ध तो हो जाएगा।” वह बोली, “बीजी मुझे मैसूर जाने के लिए जो पैसे दे रही हैं, उनसे लन्दन तक तो पहुँचा ही जा सकता है। मगर सवाल तो उसके बाद का है।”
“मतलब उतने पैसे से तुम दोनों लन्दन पहुँच जाओगी, सवाल लन्दन के खर्च का है?” मैं अपने मन की अनिश्चितता को दूर कर लेना चाहता था। वह लन्दन जाएगी, तो क्या अकेली ही जाएगी, या...?
“दोनों से तुम्हारा मतलब मुझसे और शुक्ला से है?” वह बोली, “शुक्ला वहाँ कैसे जा सकती है? वह तो हर हालत में बीजी के पास ही रहेगी। मैं अगर वहाँ गयी, तो हरबंस की वजह से जाऊँगी, शुक्ला को बीजी क्यों जाने देंगी? वह अभी पढ़ रही है और कल को उसका ब्याह भी करना है। लन्दन में हमसे अपना खर्च ही नहीं उठाया जाएगा, उसकी पढ़ाई का खर्च हम कैसे उठाएँगे? पढ़ाई छोडक़र वह वहाँ चली जाए, इसलिए कि हमारे साथ रह सके, इसमें क्या तुक है? हरबंस तो पागल है जो ऐसी बात सोचता है।”
मैंने फिर चिट्ठियों के पुलिन्दे की तरफ़ देखा, जैसे कि उस पुलिन्दे की जगह स्वयं हरबंस मेरे सामने हो और मुझे उससे अनुरोध करना हो कि जैसे भी हो सके, वह नीलिमा के साथ शुक्ला को भी ज़रूर लन्दन बुला ले जिससे वह चार-पाँच साल वहाँ काट ले, ताकि इस बीच...।
“तुम्हारी चाय ठंडी हो गयी है।” नीलिमा बोली, “तुम मुझे सोचकर ठीक राय दो। मैं तब तक तुम्हारे लिए और चाय बना लाती हूँ।”
कह नहीं सकता कि वह मेरी वजह से उठकर चली गयी या अपनी वजह से ही। मैंने चिट्ठियों के पुलिन्दे को फिर उठा लिया और इस तरह एक-एक पन्ने को पलटने लगा जैसे परीक्षा से पहले एक परीक्षार्थी जल्दी-जल्दी अपनी पाठ्य-पुस्तक को देखता है। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि क्या वे सब पत्र हरबंस के ही लिखे हुए हैं, उस व्यक्ति के जिसकी फ़ाइलों में आधी हिन्दी और आधी अँग्रेज़ी में लिखे हुए कितने ही उलझे हुए पन्ने मैंने देखे थे! उन पन्नों के अटपटे और उलझे हुए वाक्यों का लेखक यह सब कैसे लिख सकता था? उसकी फ़ाइलों में तो हर वाक्य के ऊपर लाल पेंसिल से एक प्रश्नचिह्न बना हुआ था, और इन पत्रों में...? क्या वे पत्र उसके अन्दर के किसी और व्यक्ति ने लिखे थे? या कि उसके अन्दर की छटपटाहट ने स्वयं ही अपने लिए मार्ग बना लिया था और वह बिना जाने ही वह सब लिख गया था? क्योंकि वह ढंग से सँवारकर लिखने का प्रयत्न करता, तो ज़रूर उन्हें भी अपनी फ़ाइलों के पन्नों की तरह अटपटा बना देता। यदि वे पत्र इतने व्यक्तिगत न होते, तो शायद मैं यह भी सोचता कि वे उसने किसी और की फ़ाइल से ही न उड़ाये हों। ‘तुम्हारे साथ, और तुम्हारे बिना, दोनों ही तरह ज़िन्दगी मुझे असम्भव प्रतीत होती है।’ ‘यहाँ तो बर्फ़ है, कोहरा है और धुआँ है। लगता है, जैसे यह शहर ठोस धुएँ का ही बना हो।’ ‘मेरे अन्दर कहीं एक खालीपन है जो धीरे-धीरे इतना बढ़ता जा रहा है कि मेरे व्यक्तित्व के सब कोमल रेशे झड़ते जा रहे हैं।’ ‘मैं केवल छानबीन और छीछालेदर ही कर सकता हूँ, कुछ निर्माण नहीं कर सकता।’ ‘यदि तुम्हें नृत्य में सचमुच इतनी रुचि है, और तुम समझती हो कि तुम अपने में इस कला को इतना विकसित कर सकती हो कि वह सच्चे सौन्दर्य की प्रतीक बन जाए, तो वह भी मेरे लिए एक मार्ग हो सकता है, उस उपलब्धि तक जाने का जिसे मैं स्वयं नहीं समझता।’ क्या यह उसी हरबंस की भाषा थी?
नीलिमा चाय ले आयी, तो मैंने पुलिन्दा फिर रख दिया और दोनों हाथों की उँगलियाँ उलझाकर कुछ सोचता हुआ सा बैठा रहा। नीलिमा अपने ढंग से शरीर को एक लचक देकर बैठती हुई बोली, “मैं आज ही उसे उत्तर देना चाहती हूँ, क्योंकि मुझे मैसूर जाना हो, तो दो-एक दिनों में ही मुझे चली जाना चाहिए, जिससे मैं सर्दियों में यहाँ आकर एकाध प्रदर्शन भी कर सकूँ।”
“तुम बताओ, तुम्हारा अपना मन क्या कहता है?”
“मैं अपने आप सोचकर तय कर सकती, तो तुम्हें बुलाने के लिए इतनी दूर क्यों जाती?” वह प्यालियों में चाय डालकर चीनी हिलाने लगी, “मैं तो तुमसे जानना चाहती हूँ कि तुम्हारे ख़याल में क्या करना ठीक है। मुझे अपने अलावा शुक्ला की बात भी सोचनी है जो मेरे पीछे यहाँ बहुत अकेली पड़ जाएगी। इसलिए सोचती हूँ कि मेरा अपना मन जो राय देता है, वह शायद ठीक नहीं है।”
“मगर यह तो बताओ कि तुम्हारा मन राय देता क्या है?” मैं उससे कैसे कहता कि मेरी दिलचस्पी उसकी समस्या से ज़्यादा एक और ही समस्या से है और मैं उसकी बात न सोचकर अपनी ही बात सोच रहा हूँ।
“चाय ले लो।” उसने कहा।
मैं चाय की बात भी भूल गया था। मैंने चौंककर प्याली उठा ली।
“मेरा मन क्या राय देता है?” वह कुछ समय लेकर बोली, “मेरा मन यही कहता है कि मुझे वहाँ चली जाना चाहिए। हो सकता है वह वहाँ सचमुच ही बहुत दुखी हो।”
“मेरी भी यही राय थी।” मैंने कहा। सोचा कि शायद इतने से अब वह प्रकरण समाप्त हो जाएगा और मैं दूसरी बात सोचता रह सकूँगा।
“तुम सचमुच यही समझते हो कि मुझे वहाँ चली जाना चाहिए?” नीलिमा के लिए मगर बात अब भी वहीं थी जहाँ पत्र मुझे पढऩे के लिए देने से पहले थी।
“क्यों, क्या यही ठीक नहीं है? तुम भी तो यही कह रही थीं।”
“मैं हरबंस के अकेलेपन की बात सोचकर कह रही थी। मगर तुम यह भी तो सोचो कि मेरे लिए मैसूर जाकर सीखने का यही एक चांस है।”
“हाँ, यह भी बात है।” मैं बार-बार अपने मन को धकेलकर उस विषय पर लाता था और वह बार-बार भटककर अपने दर्द की पगडंडी पर चला जाता था।
“हरबंस ने अपने पहली अप्रैल के पत्र में लिखा भी है कि मैं अपनी कला का ठीक से विकास कर सकूँ, तो उसे बहुत खुशी होगी। मैं छ: महीने मैसूर में रहकर फिर उसके पास जाऊँ, तो यह ज़्यादा अच्छा नहीं होगा?”
“मगर वह इतने दिन वहाँ अकेला रह लेगा? उसके आख़िरी पत्र से तो लगता है कि वह वहाँ बहुत ही बेचैन है।”
“उस पत्र की बात तुम जाने दो! वह तो उसने कुछ घबराहट में लिखा है। मैंने उसे वैसे ही सुरजीत की एक बात लिख दी थी जिसका अपने मन में पता नहीं उसने क्या मतलब लगा लिया है। मैं इस बार उसे लिख दूँगी कि वैसी कोई बात नहीं है, तो उसका दिमाग़ फिर ठीक हो जाएगा।” और हाथ की प्याली छलक न जाए, इसलिए उसे नीचे रखती हुई वह एक रूखी-सी हँसी हँसकर बोली, “मुझे डर है कि मैं अभी वहाँ चली गयी, तो उसका मन फिर वही खुराफ़ात सोचने लगेगा कि उसका विज़न एक गोल अँधेरी दीवार से टकराकर टूट रहा है। इसलिए मैं अभी कुछ दिन उससे दूर ही रहूँ, तो अच्छा है।” और पल-भर रुककर उसने फिर कहा, “मैं सच कहती हूँ कि अगर मुझे यह विश्वास हो कि मेरे तुरन्त वहाँ पहुँच जाने से उसे सचमुच सुख मिलेगा, तो मैं आज ही चली जाऊँ। मगर मैँ जानती हूँ कि ऐसा नहीं होगा।”
“तो इसका मतलब तो यही है कि तुम्हारे ख़याल में तुम्हारा मैसूर जाना ही ठीक है।”
“मैं कहती हूँ कि वह गया है, तो अब उसे कुछ दिन अकेले रहना ही चाहिए। वह बहुत दिनों से इस तरह की ज़िन्दगी के लिए बेचैन था। मैं चाहती हूँ कि इस ज़िन्दगी से उसका मन पूरी तरह भर जाए, तभी मैं यहाँ से जाऊँ। इतने में मेरी ट्रेनिंग भी पूरी हो जाएगी।”
“और हो सकता है कि उतनी देर में वह ऊबकर वहाँ से वापस ही चला आये।”
“नहीं, वापस वह नहीं आएगा। अपनी ज़िद का वह बहुत पक्का है। और अगर आ जाए, तो और भी अच्छा।”
मैं उससे बात कर रहा था, मगर मेरा दिमाग़ उसके उस एक वाक्य पर ही अटका हुआ था, “मैंने उसे वैसे ही सुरजीत की एक बात लिख दी थी,” और मैं यही सोच रहा था कि उसने हरबंस को सुरजीत की ऐसी क्या बात लिखी थी जिससे वह एकदम बेचैन हो उठा था! अपने दर्द की पगडंडी पर भटका हुआ मेरा मन इस वाक्य को सुनने के बाद सहसा एक जगह ठिठक गया था, जैसे उसे लगा हो कि उसके सामने के झाड़-झंखाड़ के उस तरफ़ शायद कहीं एक सुरम्य वादी भी है और वह पथरीली पगडंडी एक विल्लौरी झील के तट पर जाकर भी समाप्त हो सकती है...।
“सुरजीत के बारे में तुमने उसे क्या बात लिखी थी?” मैंने कुछ रुकते-रुकते पूछा। चाहा कि मेरे स्वर से यह बिल्कुल प्रकट न हो कि उस सवाल में मेरी ज़रा भी दिलचस्पी है।
“ऐसी कोई ख़ास बात नहीं थी।” वह बोली, “उसने मुझसे एक दिन कोई अटपटी बात कह दी थी और बाद में उसके लिए माफ़ी माँग ली थी।”
“तुम इसीलिए कह रही थीं कि वह आदमी तुम्हें पसन्द नहीं है?”
“हाँ-हाँ। वह हर समय बहुत हल्के ढंग से बातें करता है और मुझे यह अच्छा नहीं लगता। बहुत हल्के ढंग से कही हुई बात दूसरे को कभी लग भी जाती है। मगर उसकी जो आदत मुझे पसन्द नहीं, शुक्ला को उसकी वही आदत सबसे अच्छी लगती है। वह उसकी हल्की-फुल्की बातें सुनकर लोट-पोट होती रहती है। आज सुरजीत सिनेमा के टिकट लेकर आया था। मैंने मना भी किया, मगर वह हठ करके बीजी, सरोज और सरिता को लेकर उसके साथ चली गयी है।”
मैं कुरसी पर थोड़ा पीछे को सरक गया। झाडिय़ों के उस पार से झील सहसा अदृश्य हो गयी थी और पगडंडी इतनी बीहड़ हो गयी थी कि मेरे लिए अपने को झेलना कठिन हो गया था।
“क्या बात है? तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है?” नीलिमा ने पूछा।
“नहीं, तबीयत ठीक है।” मैंने कहा, “रात को ठीक से सोया नहीं, इसलिए आँखें कुछ भारी हो रही हैं।”
“तुम्हें कोई टिकिया दूँ? आजकल फ़्लू से अपने को बचाते रहना चाहिए...।”
मुझे इससे अरविन्द की और अपनी कोठरी की याद हो आयी और मेरी आँखों का भारीपन अपने आप कम होने लगा।
“नहीं, दवाई की ज़रूरत नहीं।” मैंने कहा, “यह सिर्फ़ उनींदेपन की वजह से है। रात को सोकर ठीक हो जाऊँगा।”
“फिर भी एक टिकिया मैं तुम्हें दे देती हूँ।” कहती हुई वह उसी लचक के साथ उठी और अन्दर चली गयी। मैं कुछ देर आँखें बन्द किये बैठा रहा। फिर बाहर अहाते में पैरों की आहट सुनकर मैंने आँखें खोल लीं। शुक्ला और सब लोग सिनेमा से लौट आये थे। सरिता सबसे आगे थी और सुरजीत सबसे पीछे। मैं उस मन:स्थिति में सुरजीत से तो बिल्कुल ही नहीं मिलना चाहता था, मगर उस समय वहाँ बैठे रहने के सिवा और कर भी क्या सकता था? सुरजीत भी मुझे देखकर दरवाज़े के परदे के पास ही ठिठक गया।
“हलो!” उसने कहा, “तुम यहाँ हो?” और फिर मुझे बिल्कुल भूलकर बीजी से बोला, “अच्छा बीजी, मैं अब चल रहा हूँ। एक ऑस्ट्रेलियन संवाददाता आया हुआ है। उसके साथ मेरा चेम्सफोर्ड क्लब में खाना है। अगर हो सका, तो मैं शाम को आकर आपकी दाँतों की दवाई दे जाऊँगा। न आ सका, तो कल दिन में दे जाऊँगा।” और बिना उनके उत्तर की आशा किये, वह एक बार सबकी तरफ़ हाथ हिलाकर दहलीज़ से ही वापस चला गया।
“कहिए जी!” शुक्ला ने पास से गुज़रते हुए मुझसे कहा और बड़ी मेज़ से अख़बार उठाकर अन्दर चली गयी। सरोज और सरिता पहले ही चली गयी थीं। “आप कब से आये हुए हैं?” बीजी ने चलते-चलते पूछ लिया, “नीलिमा ने आपको चाय-वाय पिलायी कि नहीं?” और मेरे सिर हिला देने पर वे भी कर्तव्य से मुक्त होकर अन्दर चली गयीं। मैं जब अकेला रह गया तो मेरा मन हुआ कि मैं चुपचाप उठकर वहाँ से चला जाऊँ, मगर तभी नीलिमा अन्दर से आ गयी।
“यह रही तुम्हारे लिए दवाई की टिकिया।” उसने कहा, “बीजी की रखी हुई चीज़ें मुझे कभी मिलती ही नहीं। अब सरोज ने आकर निकालकर दी है।”
चाय की प्याली में जो दो घूँट बचे थे, उनके साथ मैंने टिकिया जल्दी से निगल ली और तुरन्त ही वहाँ से चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।
“तुम जा रहे हो?” नीलिमा कुछ आश्चर्य के साथ बोली।
“हाँ, मुझे एक काम याद आ गया है।” मैंने कहा, “एक बजे मुझे किसी के यहाँ पहुँचना है।”
“तो अब किस समय मिलोगे? मुझे तो अभी तुमसे और भी बात करनी थी।”
“मैं कल या परसों किसी समय फिर आ जाऊँगा।”
“तुम शाम को ही क्यों नहीं आते? मैं तुमसे बात करने के बाद ही हरबंस को चिट्ठी लिखूँगी।”
“देखो, कोशिश करूँगा, अगर आ सका तो।”
“नहीं, कोशिश की बात नहीं, तुम्हें ज़रूर आना है। मुझे एक और भी ज़रूरी बात करनी है।...वैसे तुम्हारा यही ख़याल है न कि मुझे छ: महीने मैसूर में रहकर ही हरबंस के पास जाना चाहिए?”
“हाँ, यही ठीक है।”
“मगर शाम को तुम्हें आना ज़रूर है। उसे चिट्ठी मैं उसके बाद ही लिखूँगी।”
“अच्छा!”
“देखो, भूल नहीं जाना!”
मैं तब तक दरवाज़े के पास पहुँच गया था। उसने मेरे बाहर निकलने के लिए परदा उठा दिया।
“नहीं, भूलूँगा नहीं।”
“शाम को मैं तुमसे कॉफ़ी पियूँगी। ठीक है?”
“हाँ, ठीक है।”
“तो किस समय तक आओगे? छ: बजे तक?”
“हाँ, छ: बजे तक आ जाऊँगा।”
“अच्छा...!”
मैं बाहर निकल आया, तो उसने परदा गिरा दिया।