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अंधेरे बंद कमरे / मोहन राकेश संचयन

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जितनी देर मैं पढ़ता रहा था, उतनी देर नीलिमा आँखें फैलाये मेरे चेहरे की तरफ़ देख रही थी जैसे कि वह उस बीच मेरे चेहरे के मज़मून को पढ़ती रही हो। उसकी आँखों में उत्सुकता के साथ एक आशंका नज़र आ रही थी और उस आशंका में मिली-जुली एक उदासीनता...।

“तो?” उसने कहा।

मैं पत्र पढ़ते हुए साथ ही बहुत कुछ सोचता भी रहा था जिससे मेरा सिर भारी हो रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूँ। मैं कुछ क्षण खिडक़ी की तरफ़ देखता रहा, वहाँ जहाँ से एक दिन नन्हे-नन्हे सफ़ेद पंख हवा में तैरते हुए नीचे आ रहे थे। मगर उस समय वहाँ पंख नहीं उतर रहे थे, केवल धूप में चमकते हुए ज़र्रे ही नज़र आ रहे थे।

“तुम्हारा ख़याल है मुझे चली जाना चाहिए?” उसने इस तरह पूछा जैसे मेरे हाँ या न कहने पर ही सब कुछ निर्भर करता हो।

“मेरा तो ख़याल है कि चली जाना चाहिए।” मैंने कहा, “अगर रुपये का प्रबन्ध हो सकता है, तो और कोई बाधा तुम्हें नहीं होनी चाहिए।”

“रुपये का प्रबन्ध तो हो जाएगा।” वह बोली, “बीजी मुझे मैसूर जाने के लिए जो पैसे दे रही हैं, उनसे लन्दन तक तो पहुँचा ही जा सकता है। मगर सवाल तो उसके बाद का है।”

“मतलब उतने पैसे से तुम दोनों लन्दन पहुँच जाओगी, सवाल लन्दन के खर्च का है?” मैं अपने मन की अनिश्चितता को दूर कर लेना चाहता था। वह लन्दन जाएगी, तो क्या अकेली ही जाएगी, या...?

“दोनों से तुम्हारा मतलब मुझसे और शुक्ला से है?” वह बोली, “शुक्ला वहाँ कैसे जा सकती है? वह तो हर हालत में बीजी के पास ही रहेगी। मैं अगर वहाँ गयी, तो हरबंस की वजह से जाऊँगी, शुक्ला को बीजी क्यों जाने देंगी? वह अभी पढ़ रही है और कल को उसका ब्याह भी करना है। लन्दन में हमसे अपना खर्च ही नहीं उठाया जाएगा, उसकी पढ़ाई का खर्च हम कैसे उठाएँगे? पढ़ाई छोडक़र वह वहाँ चली जाए, इसलिए कि हमारे साथ रह सके, इसमें क्या तुक है? हरबंस तो पागल है जो ऐसी बात सोचता है।”

मैंने फिर चिट्ठियों के पुलिन्दे की तरफ़ देखा, जैसे कि उस पुलिन्दे की जगह स्वयं हरबंस मेरे सामने हो और मुझे उससे अनुरोध करना हो कि जैसे भी हो सके, वह नीलिमा के साथ शुक्ला को भी ज़रूर लन्दन बुला ले जिससे वह चार-पाँच साल वहाँ काट ले, ताकि इस बीच...।

“तुम्हारी चाय ठंडी हो गयी है।” नीलिमा बोली, “तुम मुझे सोचकर ठीक राय दो। मैं तब तक तुम्हारे लिए और चाय बना लाती हूँ।”

कह नहीं सकता कि वह मेरी वजह से उठकर चली गयी या अपनी वजह से ही। मैंने चिट्ठियों के पुलिन्दे को फिर उठा लिया और इस तरह एक-एक पन्ने को पलटने लगा जैसे परीक्षा से पहले एक परीक्षार्थी जल्दी-जल्दी अपनी पाठ्य-पुस्तक को देखता है। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि क्या वे सब पत्र हरबंस के ही लिखे हुए हैं, उस व्यक्ति के जिसकी फ़ाइलों में आधी हिन्दी और आधी अँग्रेज़ी में लिखे हुए कितने ही उलझे हुए पन्ने मैंने देखे थे! उन पन्नों के अटपटे और उलझे हुए वाक्यों का लेखक यह सब कैसे लिख सकता था? उसकी फ़ाइलों में तो हर वाक्य के ऊपर लाल पेंसिल से एक प्रश्नचिह्न बना हुआ था, और इन पत्रों में...? क्या वे पत्र उसके अन्दर के किसी और व्यक्ति ने लिखे थे? या कि उसके अन्दर की छटपटाहट ने स्वयं ही अपने लिए मार्ग बना लिया था और वह बिना जाने ही वह सब लिख गया था? क्योंकि वह ढंग से सँवारकर लिखने का प्रयत्न करता, तो ज़रूर उन्हें भी अपनी फ़ाइलों के पन्नों की तरह अटपटा बना देता। यदि वे पत्र इतने व्यक्तिगत न होते, तो शायद मैं यह भी सोचता कि वे उसने किसी और की फ़ाइल से ही न उड़ाये हों। ‘तुम्हारे साथ, और तुम्हारे बिना, दोनों ही तरह ज़िन्दगी मुझे असम्भव प्रतीत होती है।’ ‘यहाँ तो बर्फ़ है, कोहरा है और धुआँ है। लगता है, जैसे यह शहर ठोस धुएँ का ही बना हो।’ ‘मेरे अन्दर कहीं एक खालीपन है जो धीरे-धीरे इतना बढ़ता जा रहा है कि मेरे व्यक्तित्व के सब कोमल रेशे झड़ते जा रहे हैं।’ ‘मैं केवल छानबीन और छीछालेदर ही कर सकता हूँ, कुछ निर्माण नहीं कर सकता।’ ‘यदि तुम्हें नृत्य में सचमुच इतनी रुचि है, और तुम समझती हो कि तुम अपने में इस कला को इतना विकसित कर सकती हो कि वह सच्चे सौन्दर्य की प्रतीक बन जाए, तो वह भी मेरे लिए एक मार्ग हो सकता है, उस उपलब्धि तक जाने का जिसे मैं स्वयं नहीं समझता।’ क्या यह उसी हरबंस की भाषा थी?

नीलिमा चाय ले आयी, तो मैंने पुलिन्दा फिर रख दिया और दोनों हाथों की उँगलियाँ उलझाकर कुछ सोचता हुआ सा बैठा रहा। नीलिमा अपने ढंग से शरीर को एक लचक देकर बैठती हुई बोली, “मैं आज ही उसे उत्तर देना चाहती हूँ, क्योंकि मुझे मैसूर जाना हो, तो दो-एक दिनों में ही मुझे चली जाना चाहिए, जिससे मैं सर्दियों में यहाँ आकर एकाध प्रदर्शन भी कर सकूँ।”

“तुम बताओ, तुम्हारा अपना मन क्या कहता है?”

“मैं अपने आप सोचकर तय कर सकती, तो तुम्हें बुलाने के लिए इतनी दूर क्यों जाती?” वह प्यालियों में चाय डालकर चीनी हिलाने लगी, “मैं तो तुमसे जानना चाहती हूँ कि तुम्हारे ख़याल में क्या करना ठीक है। मुझे अपने अलावा शुक्ला की बात भी सोचनी है जो मेरे पीछे यहाँ बहुत अकेली पड़ जाएगी। इसलिए सोचती हूँ कि मेरा अपना मन जो राय देता है, वह शायद ठीक नहीं है।”

“मगर यह तो बताओ कि तुम्हारा मन राय देता क्या है?” मैं उससे कैसे कहता कि मेरी दिलचस्पी उसकी समस्या से ज़्यादा एक और ही समस्या से है और मैं उसकी बात न सोचकर अपनी ही बात सोच रहा हूँ।

“चाय ले लो।” उसने कहा।

मैं चाय की बात भी भूल गया था। मैंने चौंककर प्याली उठा ली।

“मेरा मन क्या राय देता है?” वह कुछ समय लेकर बोली, “मेरा मन यही कहता है कि मुझे वहाँ चली जाना चाहिए। हो सकता है वह वहाँ सचमुच ही बहुत दुखी हो।”

“मेरी भी यही राय थी।” मैंने कहा। सोचा कि शायद इतने से अब वह प्रकरण समाप्त हो जाएगा और मैं दूसरी बात सोचता रह सकूँगा।

“तुम सचमुच यही समझते हो कि मुझे वहाँ चली जाना चाहिए?” नीलिमा के लिए मगर बात अब भी वहीं थी जहाँ पत्र मुझे पढऩे के लिए देने से पहले थी।

“क्यों, क्या यही ठीक नहीं है? तुम भी तो यही कह रही थीं।”

“मैं हरबंस के अकेलेपन की बात सोचकर कह रही थी। मगर तुम यह भी तो सोचो कि मेरे लिए मैसूर जाकर सीखने का यही एक चांस है।”

“हाँ, यह भी बात है।” मैं बार-बार अपने मन को धकेलकर उस विषय पर लाता था और वह बार-बार भटककर अपने दर्द की पगडंडी पर चला जाता था।

“हरबंस ने अपने पहली अप्रैल के पत्र में लिखा भी है कि मैं अपनी कला का ठीक से विकास कर सकूँ, तो उसे बहुत खुशी होगी। मैं छ: महीने मैसूर में रहकर फिर उसके पास जाऊँ, तो यह ज़्यादा अच्छा नहीं होगा?”

“मगर वह इतने दिन वहाँ अकेला रह लेगा? उसके आख़िरी पत्र से तो लगता है कि वह वहाँ बहुत ही बेचैन है।”

“उस पत्र की बात तुम जाने दो! वह तो उसने कुछ घबराहट में लिखा है। मैंने उसे वैसे ही सुरजीत की एक बात लिख दी थी जिसका अपने मन में पता नहीं उसने क्या मतलब लगा लिया है। मैं इस बार उसे लिख दूँगी कि वैसी कोई बात नहीं है, तो उसका दिमाग़ फिर ठीक हो जाएगा।” और हाथ की प्याली छलक न जाए, इसलिए उसे नीचे रखती हुई वह एक रूखी-सी हँसी हँसकर बोली, “मुझे डर है कि मैं अभी वहाँ चली गयी, तो उसका मन फिर वही खुराफ़ात सोचने लगेगा कि उसका विज़न एक गोल अँधेरी दीवार से टकराकर टूट रहा है। इसलिए मैं अभी कुछ दिन उससे दूर ही रहूँ, तो अच्छा है।” और पल-भर रुककर उसने फिर कहा, “मैं सच कहती हूँ कि अगर मुझे यह विश्वास हो कि मेरे तुरन्त वहाँ पहुँच जाने से उसे सचमुच सुख मिलेगा, तो मैं आज ही चली जाऊँ। मगर मैँ जानती हूँ कि ऐसा नहीं होगा।”

“तो इसका मतलब तो यही है कि तुम्हारे ख़याल में तुम्हारा मैसूर जाना ही ठीक है।”

“मैं कहती हूँ कि वह गया है, तो अब उसे कुछ दिन अकेले रहना ही चाहिए। वह बहुत दिनों से इस तरह की ज़िन्दगी के लिए बेचैन था। मैं चाहती हूँ कि इस ज़िन्दगी से उसका मन पूरी तरह भर जाए, तभी मैं यहाँ से जाऊँ। इतने में मेरी ट्रेनिंग भी पूरी हो जाएगी।”

“और हो सकता है कि उतनी देर में वह ऊबकर वहाँ से वापस ही चला आये।”

“नहीं, वापस वह नहीं आएगा। अपनी ज़िद का वह बहुत पक्का है। और अगर आ जाए, तो और भी अच्छा।”

मैं उससे बात कर रहा था, मगर मेरा दिमाग़ उसके उस एक वाक्य पर ही अटका हुआ था, “मैंने उसे वैसे ही सुरजीत की एक बात लिख दी थी,” और मैं यही सोच रहा था कि उसने हरबंस को सुरजीत की ऐसी क्या बात लिखी थी जिससे वह एकदम बेचैन हो उठा था! अपने दर्द की पगडंडी पर भटका हुआ मेरा मन इस वाक्य को सुनने के बाद सहसा एक जगह ठिठक गया था, जैसे उसे लगा हो कि उसके सामने के झाड़-झंखाड़ के उस तरफ़ शायद कहीं एक सुरम्य वादी भी है और वह पथरीली पगडंडी एक विल्लौरी झील के तट पर जाकर भी समाप्त हो सकती है...।

“सुरजीत के बारे में तुमने उसे क्या बात लिखी थी?” मैंने कुछ रुकते-रुकते पूछा। चाहा कि मेरे स्वर से यह बिल्कुल प्रकट न हो कि उस सवाल में मेरी ज़रा भी दिलचस्पी है।

“ऐसी कोई ख़ास बात नहीं थी।” वह बोली, “उसने मुझसे एक दिन कोई अटपटी बात कह दी थी और बाद में उसके लिए माफ़ी माँग ली थी।”

“तुम इसीलिए कह रही थीं कि वह आदमी तुम्हें पसन्द नहीं है?”

“हाँ-हाँ। वह हर समय बहुत हल्के ढंग से बातें करता है और मुझे यह अच्छा नहीं लगता। बहुत हल्के ढंग से कही हुई बात दूसरे को कभी लग भी जाती है। मगर उसकी जो आदत मुझे पसन्द नहीं, शुक्ला को उसकी वही आदत सबसे अच्छी लगती है। वह उसकी हल्की-फुल्की बातें सुनकर लोट-पोट होती रहती है। आज सुरजीत सिनेमा के टिकट लेकर आया था। मैंने मना भी किया, मगर वह हठ करके बीजी, सरोज और सरिता को लेकर उसके साथ चली गयी है।”

मैं कुरसी पर थोड़ा पीछे को सरक गया। झाडिय़ों के उस पार से झील सहसा अदृश्य हो गयी थी और पगडंडी इतनी बीहड़ हो गयी थी कि मेरे लिए अपने को झेलना कठिन हो गया था।

“क्या बात है? तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है?” नीलिमा ने पूछा।

“नहीं, तबीयत ठीक है।” मैंने कहा, “रात को ठीक से सोया नहीं, इसलिए आँखें कुछ भारी हो रही हैं।”

“तुम्हें कोई टिकिया दूँ? आजकल फ़्लू से अपने को बचाते रहना चाहिए...।”

मुझे इससे अरविन्द की और अपनी कोठरी की याद हो आयी और मेरी आँखों का भारीपन अपने आप कम होने लगा।

“नहीं, दवाई की ज़रूरत नहीं।” मैंने कहा, “यह सिर्फ़ उनींदेपन की वजह से है। रात को सोकर ठीक हो जाऊँगा।”

“फिर भी एक टिकिया मैं तुम्हें दे देती हूँ।” कहती हुई वह उसी लचक के साथ उठी और अन्दर चली गयी। मैं कुछ देर आँखें बन्द किये बैठा रहा। फिर बाहर अहाते में पैरों की आहट सुनकर मैंने आँखें खोल लीं। शुक्ला और सब लोग सिनेमा से लौट आये थे। सरिता सबसे आगे थी और सुरजीत सबसे पीछे। मैं उस मन:स्थिति में सुरजीत से तो बिल्कुल ही नहीं मिलना चाहता था, मगर उस समय वहाँ बैठे रहने के सिवा और कर भी क्या सकता था? सुरजीत भी मुझे देखकर दरवाज़े के परदे के पास ही ठिठक गया।

“हलो!” उसने कहा, “तुम यहाँ हो?” और फिर मुझे बिल्कुल भूलकर बीजी से बोला, “अच्छा बीजी, मैं अब चल रहा हूँ। एक ऑस्ट्रेलियन संवाददाता आया हुआ है। उसके साथ मेरा चेम्सफोर्ड क्लब में खाना है। अगर हो सका, तो मैं शाम को आकर आपकी दाँतों की दवाई दे जाऊँगा। न आ सका, तो कल दिन में दे जाऊँगा।” और बिना उनके उत्तर की आशा किये, वह एक बार सबकी तरफ़ हाथ हिलाकर दहलीज़ से ही वापस चला गया।

“कहिए जी!” शुक्ला ने पास से गुज़रते हुए मुझसे कहा और बड़ी मेज़ से अख़बार उठाकर अन्दर चली गयी। सरोज और सरिता पहले ही चली गयी थीं। “आप कब से आये हुए हैं?” बीजी ने चलते-चलते पूछ लिया, “नीलिमा ने आपको चाय-वाय पिलायी कि नहीं?” और मेरे सिर हिला देने पर वे भी कर्तव्य से मुक्त होकर अन्दर चली गयीं। मैं जब अकेला रह गया तो मेरा मन हुआ कि मैं चुपचाप उठकर वहाँ से चला जाऊँ, मगर तभी नीलिमा अन्दर से आ गयी।

“यह रही तुम्हारे लिए दवाई की टिकिया।” उसने कहा, “बीजी की रखी हुई चीज़ें मुझे कभी मिलती ही नहीं। अब सरोज ने आकर निकालकर दी है।”

चाय की प्याली में जो दो घूँट बचे थे, उनके साथ मैंने टिकिया जल्दी से निगल ली और तुरन्त ही वहाँ से चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।

“तुम जा रहे हो?” नीलिमा कुछ आश्चर्य के साथ बोली।

“हाँ, मुझे एक काम याद आ गया है।” मैंने कहा, “एक बजे मुझे किसी के यहाँ पहुँचना है।”

“तो अब किस समय मिलोगे? मुझे तो अभी तुमसे और भी बात करनी थी।”

“मैं कल या परसों किसी समय फिर आ जाऊँगा।”

“तुम शाम को ही क्यों नहीं आते? मैं तुमसे बात करने के बाद ही हरबंस को चिट्ठी लिखूँगी।”

“देखो, कोशिश करूँगा, अगर आ सका तो।”

“नहीं, कोशिश की बात नहीं, तुम्हें ज़रूर आना है। मुझे एक और भी ज़रूरी बात करनी है।...वैसे तुम्हारा यही ख़याल है न कि मुझे छ: महीने मैसूर में रहकर ही हरबंस के पास जाना चाहिए?”

“हाँ, यही ठीक है।”

“मगर शाम को तुम्हें आना ज़रूर है। उसे चिट्ठी मैं उसके बाद ही लिखूँगी।”

“अच्छा!”

“देखो, भूल नहीं जाना!”

मैं तब तक दरवाज़े के पास पहुँच गया था। उसने मेरे बाहर निकलने के लिए परदा उठा दिया।

“नहीं, भूलूँगा नहीं।”

“शाम को मैं तुमसे कॉफ़ी पियूँगी। ठीक है?”

“हाँ, ठीक है।”

“तो किस समय तक आओगे? छ: बजे तक?”

“हाँ, छ: बजे तक आ जाऊँगा।”

“अच्छा...!”

मैं बाहर निकल आया, तो उसने परदा गिरा दिया।
 
मगर मैं छ: बजे उससे मिलने नहीं गया। उस शाम मैं कहीं भी नहीं गया, हालाँकि रात होने तक मैंने लगभग सारी दिल्ली की ख़ाक छान ली। मैं कहाँ-कहाँ गया, मुझे ठीक याद नहीं। जो बस जहाँ तक ले गयी, उसमें वहाँ तक चला गया और लौटने के लिए जो बस मिली, उसमें बैठकर उसके टर्मिनस पर जा उतरा। खाने को जहाँ जो मिला, वह मैंने कई बार बिना भूख के भी खा लिया। उस दिन की मुझे इतनी ही याद है कि कुछ देर मैं राजघाट जाकर बैठा रहा था, कुछ देर जमुना ब्रिज पर खड़ा रेत के फैलाव में से गुजरती हुई पतली-पतली पानी की धारों को देखता रहा था और बाद में उधर से मुँह फेरकर एक अक्खड़ गति से पुल को हिलाकर जाते हुए ट्रैफिक को देखता रहा था। कुछ देर मैं इंडिया गेट के पास घास पर भी लेटा रहा था। मैं घर जाने से पहले अपने मन में एक निश्चय कर लेना चाहता था, मगर उस निश्चय के रास्ते में कई एक रुकावटें थीं जिनकी वजह से मेरा मन डावाँडोल हो रहा था। जब मैं इंडिया गेट से उठकर आया, तो मैं अपनी एक मुट्ठी में घास की तिगलियाँ दबाये था। रास्ते में मैंने जब अपनी मुट्ठी में वे तिगलियाँ देखीं, तो मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि मुझे पता नहीं था कि मैंने वे तिगलियाँ कब तोड़ी थीं और कब उन्हें मुट्ठी में भींच लिया था।

मैं अपने मन में निश्चय करने से पहले लौटकर घर नहीं जाना चाहता था। मुझे खाने से अरुचि हो रही थी, फिर भी मैं कुछ-कुछ खाना चाहता था। मैं उस समय कुछ न कुछ करते रहना चाहता था। मुझे मालूम था कि मैं बिना चाहे, और बहुत हद तक बिना जाने, एक शिखर पर पहुँच गया हूँ जहाँ मैं ठिठककर नहीं रह सकता, और न ही नीचे खाई की तरफ़ झाँककर देखने का साहस कर सकता हूँ। इसलिए मैं घूमता रहा, घूमता रहा, और जब घूम-घूमकर बहुत थक गया, तो मैं उसी बार में जा बैठा जहाँ हरबंस के साथ उसके जाने के दिन बैठा था। मगर दो पेग ह्विस्की पीकर मेरा दिल वहाँ से भी उखड़ गया और मैं वहाँ से बाहर निकल आया।

तो? इस ‘तो’ का कोई उत्तर, कोई हल, मेरे पास नहीं था। मेरा मन जिस पगडंडी पर भटक गया था, वह मुझे एक गहरे दलदल में ले आयी थी। वहाँ बस, व्याकुलता के सिवा कुछ नहीं था। क्या वह व्याकुलता मैं एक छूत के रोग की तरह हरबंस के पत्रों से ले आया था? परन्तु उन पत्रों ने शायद उस व्याकुलता का मुँह खोल दिया था; वैसे वह व्याकुलता वहीं थी, बहुत दिनों से थी।

हरबंस एक ऐसा व्यक्ति था जिससे मुझे उस समय सबसे अधिक सहानुभूति हो रही थी और जिस पर मुझे सबसे अधिक गुस्सा आ रहा था। वह व्यक्ति उस समय दिल्ली में होता, और मैं एक बार उसे बाँह से पकडक़र अच्छी तरह झिंझोड़ सकता, तो शायद मेरा मन कुछ शान्त हो जाता। वह व्यक्ति बम्बई में मुझसे मिलने के लिए क्यों आया था? मेरा उससे परिचय न हुआ होता, तो क्या मुझे उस समय इतनी असमर्थता और इतनी हताशा की अनुभूति में से गुज़रना पड़ता? मैंने जेब में हाथ डाला, तो मुझे पता चला, कि मैंने घास की तिगलियाँ फेंकने की बजाय जेब में भर ली हैं। मैंने उन्हें निकालकर फुटपाथ पर बिखेर दिया। एक बार मेरे क़दम हनुमान रोड की तरफ़ मुडऩे को हुए, मगर मैं उधर न जाकर ऊपर से होता हुआ चेम्सफ़ोर्ड रोड की तरफ़ आ गया। उस समय मुझे ताँगा मिल सकता था। मगर न जाने क्यों मुझे पैदल चलना ही ठीक लगा। मुझे लग रहा था जैसे वह रात सरदी की वही रात हो जिस रात मैं गुमराह होने के बाद चेम्सफ़ोर्ड रोड से होकर पैदल घर गया था; जैसे वह रात भविष्य का एक सपना ही थी जिसे यथार्थ में मुझे उस समय अनुभव करना था; जैसे मेरा रास्ता काठ बाज़ार में से होकर ही था और मुझे वहाँ से गुज़रते हुए अभी पहलवान का सामना करना था, उसकी बाई को सिगरेट ख़रीदकर देना था, फिर उसकी गाली सुननी थी और कुढ़ते हुए घर जाना था। ताँगेवाले दो-दो आने की सवारी की आवाज़ देते हुए सदर की तरफ़ जा रहे थे, मगर मैं अपने पैदल चलने के हठ से नहीं हटा। मुझे इस बात से कुछ उलझन हो रही थी कि वह रात पहले की रात की तरह ठंडी और अँधेरी क्यों नहीं है, वह रास्ता उतना ही वीरान क्यों नहीं है, और मैं भी उसी तरह पैर पटकता हुआ क्यों नहीं चल रहा।

मैं जब काठ बाज़ार के मोड़ पर आया, तो ह्विस्की की गरमी मेरे सारे शरीर में भर रही थी; मन में एक निश्चय हो चुका था। मुझे क़स्साबपुरा के घर में जाने से पहले किसी और के घर की पनाह लेनी थी जहाँ मैं अपने मन की कटुता और हताशा से कुछ हद तक मुक्ति पा सकूँ, जहाँ मेरा दिल और दिमाग़ कुछ देर के लिए सुन्न हो जाएँ और मैं अपने अन्दर की चुभन और अपने अन्दर उबलते हुए लावे की गरमी को कुछ देर के लिए भूल जाऊँ। मुझे लग रहा था कि ज्यों ही नकली सोने के बटनोंवाला पहलवान मुझे सामने नज़र आएगा, त्यों ही मैं हाथ बढ़ाकर एक पुराने दोस्त की तरह उससे मिलूँगा और कहूँगा कि आज मैं कनॉट प्लेस से नहीं आया, क़स्साबपुरा से आया हूँ और मेरी जेब में चवन्नी नहीं, पाँच-पाँच रुपये के दो नोट हैं जिन्हें मैं तुम्हारे देखते-देखते टुकड़े-टुकड़े करके फेंक सकता हूँ।

मगर काठ बाज़ार में मुड़ते ही वह पहलवान नज़र नहीं आया, इससे मुझे निराशा हुई। बाज़ार में उस दिन की सी चमक-दमक भी नहीं थी जिससे मुझे और भी निराशा हुई। सट्टा बाज़ार की तरह सौदा करनेवाले ग्राहक भी उस समय वहाँ नहीं थे। वे रँगी-पुती औरतें भी अपनी पिंजरानुमा कोठरियों के बाहर नहीं खड़ी थीं। कुछ घरों की ड्योढिय़ों में बहुत हल्का-हल्का उजाला नज़र आ रहा था। मगर वह उजाला नहीं था जिसे देखकर आदमी उन घरों की दहलीज़ लाँघकर अन्दर जा सकता है। मेरे माथे पर पसीना आ गया। आख़िर उस बाज़ार को उस समय हुआ क्या था?

मैं कुछ क्षण जकड़ा-सा उस चौड़े अहाते में खड़ा रहा। ज़्यादातर सींखचोंवाले दरवाज़े अन्दर से बन्द थे।

अचानक अँधेरे में मेरे पास ही एक बीड़ी सुलग उठी, तो मेरा ध्यान उसकी तरफ़ चला गया। मैं बीड़ी पीनेवाले व्यक्ति के पास चला गया। “आज यह बाज़ार बन्द है?” मैंने उससे पूछा।

उसने धीरे से सिर हिला दिया। “आज यह बाज़ार मातम की वजह से बन्द है। आज यहाँ एक मौत हो गयी है। एक लडक़ी कुछ दिनों से बीमार थी, वह आज गुज़र गयी है।”

मेरे घुटनों के जोड़ ढीले होने लगे। उस बाज़ार का मौत के साथ भी कुछ नाता-रिश्ता है, यह बात कभी ज़हन में नहीं आयी थी। मैं चुपचाप उस व्यक्ति के पास से चल दिया। जब मैं गली से निकलकर सडक़ पर आया, तो मेरा गला फिर इतना ख़ुश्क हो रहा था कि उसमें काँटे से चुभ रहे थे। मुझे अपने दर्द और बेचैनी की बात कुछ भूली-सी लग रही थी और उस अहाते की तसवीर ही मेरे ज़हन में घूम रही थी। उन घरों में लालटेनों से आती हुई हल्की-हल्की रोशनी—जैसे मौत से उन घरों का कायाकल्प करके उन्हें आम घरों जैसा बना दिया हो—और उस अहाते में ठिठकी हुई एक अकेली छाया...! मैं बार-बार अपने से कहना चाहता था कि वह छाया मैं नहीं हूँ, मैं वह छाया बिल्कुल नहीं हूँ। मैं अपने को विश्वास दिलाना चाहता था कि मैं तो उस दिन उस अहाते में से गुज़रा ही नहीं हूँ। मैं तो वहाँ जीवन में एक बार, सिर्फ़ एक ही बार गया था, जब मेरा वहाँ पहलवान से सामना हुआ था और मैं मन में एक गहरी कटुता लिये हुए उस गली से बाहर निकल आया था। उसके बाद मैं वहाँ से नहीं गुज़रा, कभी नहीं गुज़रा—अगर कोई गुज़रा था, तो वह मैं नहीं था, मैंने तो उसे वहाँ से गुज़तरे देखा-भर था...।

मैंने इकन्नी की गँडेरियाँ ले लीं और उनसे अपने खुश्क गले को तर करता हुआ क़स्साबपुरा में अपनी गली में आ गया।

हमारे घर से भी लालटेन की मद्धिम रोशनी नज़र आ रही थी। दरवाज़ा खटखटाया, तो ठकुराइन ने लालटेन लिये हुए दरवाज़ा खोल दिया। उसने दरवाज़ा खोलते हुए कहा कि आज फिर मैंने बहुत देर कर दी है और कि अरविन्द की उस दिन डबल ड्यूटी है, वह सुबह पाँच बजे आएगा। ठाकुर साहब खाना खाकर शायद बाहर दालान में चारपाई निकलवकर सो गये थे, और ठकुराइन सिर्फ़ मेरी वजह से ही जाग रही थी। उसकी आँखें नींद से भारी हो रही थीं।

“कहाँ-कहाँ हो आये?” उसने चेष्टा करके अपनी आँखें पूरी खोल लीं, “आज तो मुझे मालूम था कि तुम देर से आओगे।”

मैंने कुछ न कहकर हाथ की गँडेरियाँ उसकी तरफ़ बढ़ा दीं।

“ये गँडेरियाँ कहाँ से ले आये?” ठकुराइन हँसकर बोली, “आज के दिन भी तुम्हें गँडेरियाँ ही चूसने को मिलीं?”

मुझे यह ख़याल था कि मेरे मुँह से बू न आ रही हो, इसलिए मैं बहुत कम बात करना चाहता था। बात करते समय भी मुझे ध्यान रहता था कि होंठ कम से कम खुलें। इसलिए मैंने सिर्फ़ इतना ही कहा, “ये यहीं से ले ली थीं।”

“अच्छा, यह बताओ, तुम्हारी उसने तुम्हें आज क्या खिलाया-पिलाया है?” ठकुराइन गँडेरी चूसती हुई बोली।

“किसने?” मैंने एक बार होंठों पर हाथ भी रख लिया कि ठकुराइन पिलाने की बात क्यों कर रही है।

“अब बनो नहीं।” ठकुराइन रसिकता के साथ बोली, “तुम्हारी उसी ने, जो सवेरे तुम्हें लेने आयी थी। लाला, हम तो तुम्हें ऐसे ही समझी थीं, पर तुम तो पूरे वह निकले! दिल्ली में कितनी हैं तुम्हारी ऐसी-ऐसी?”

मैं भूल गया था कि सुबह नीलिमा वहाँ आयी थी और मैं उसके साथ ही घर से गया था। इस बीच मैं एक पूरी ज़िन्दगी की मंज़िलें तय कर आया था और मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि सुबह से अब तक एक ही दिन बीता है।

“वह मेरे एक दोस्त की पत्नी थी, भाभी।” मैंने कहा, “उसे कुछ काम था, इसलिए मुझे बुलाने आयी थी।” और बिल्कुल भूख न होते हुए भी मैंने कहा, “मेरा खाना रखा हो, तो दे दो।”

“वह तो कह रही थी कि तुम उसके दोस्त हो!” ठकुराइन ने मुँह का फोक गली में फेंककर किवाड़ बन्द कर दिया, “अब हमसे छिपाओगे, तो हम तुमसे कभी बात नहीं करेंगे।”

“भाभी, वह मेरे दोस्त की पत्नी थी और मैं...” सहसा मेरे दिमाग़ में फिर कोई चीज़ लहरा गयी और मैं ठकुराइन की तरफ़ देखता रह गया। ठकुराइन उस समय इतनी उजली कैसे लग रही थी?

“तुम मेरा खाना दे दो।” मैंने कहा।

“मैंने तो तुम्हारे लिए खाना आज बनाया ही नहीं।” ठकुराइन बोली, “मैंने सोचा कि अपनी दोस्त के साथ गये हो, तो वहाँ से खा-पीकर ही आओगे। मैं तो इसलिए बैठी थी कि कहीं तुम्हारी दोस्त तुम्हें छोडऩे आ जाए, तो घर में बिल्कुल अँधेरा ही दिखायी न दे। तुम मुझे पहले बता देते, तो मैं सवेरे उठते ही तुम्हारे कमरे को ठीक कर छोड़ती। मैं भी उस वक़्त गन्दे कपड़े पहने बैठी थी। मुझे क्या पता था? सचमुच मुझे बहुत ही शरम आयी। अब मैंने इसीलिए तुम्हारे वाली यह साड़ी निकालकर पहन ली थी कि क्या पता वह फिर तुम्हारे साथ चली आये।”

मेरा ध्यान इस तरफ़ नहीं गया कि ठकुराइन नयी साड़ी बाँधे हुए है। पहली तनख़ाह मिलने के दिन ही मैं उसके लिए छ: रुपये में वह साड़ी ख़रीद लाया था और तब से शायद वह उसके ट्रंक में बन्द ही पड़ी थी। ठकुराइन की बात से मेरे दिमाग़ में दिन-भर की घटनाएँ फिर ताज़ा होने लगी थीं और मेरे दिमाग़ में एक भँवर-सा घूम रहा था। मेरे अन्दर का लावा, मेरी भूख, मेरा दर्द फिर मेरे अन्दर तड़पने लगे। मैं कई क्षण जड़-सा चुपचाप ठकुराइन की तरफ़ देखता रहा। लालटेन की रोशनी में उसका खिला हुआ चेहरा बहुत ही मासूम लग रहा था और उसके चेहरे की झाइयाँ उस समय न जाने कहाँ गायब हो गयी थीं। वह अपनी उम्र से बहुत छोटी लग रही थी। मुझे अपना गला फिर बहुत ख़ुश्क लगने लगा और मेरे माथे की नसें फडक़ने लगीं।

“तो खाना सचमुच नहीं है?” मैंने कहा।

“तुम क्या सचमुच भूखे आये हो?” ठकुराइन जैसे मेरी भूख का अनुमान लगाने के लिए एक क़दम पास आ गयी और उसके चेहरे पर अपराध की छाया घिर आयी। “मैंने तो सच, नहीं सोचा था कि तुम खाकर नहीं आओगे।”

“अगर नहीं बना तो रहने दो।” मैंने कहा, “मुझे ऐसी भूख नहीं।”

“अगर भूख हो, तो मैं अभी बना देती हूँ।”

ठकुराइन मेरे बहुत पास आकर खड़ी थी। मेरी कनपटियाँ फडक़ रही थीं और आँखों से चिनगारियाँ-सी निकल रही थीं। मेरे मन में कोई चीज़ कुलाँचें भर रही थीं। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि ठकुराइन इतनी छोटी, इतनी मासूम और इतनी सुन्दर होती हुई भी पहले ऐसी क्यों नहीं लगती थी। सहसा मेरा एक पैर थोड़ा लडख़ड़ा गया और मैंने अपना हाथ ठकुराइन के कन्धे पर रख दिया। “अब रहने दो न।” मैंने कहा, “गरम बनाने का तरद्दुद क्या करोगी?”

मगर मेरा हाथ कन्धे पर कसते न कसते ठकुराइन ने अपना कन्धा छुड़ा लिया और एकदम छिटककर कई क़दम दूर जा खड़ी हुई। उसकी आँखें गुस्से से लाल हो गयीं। “तो तुम आज सचमुच पीकर आये हो!” उसने कुछ सख़्त स्वर में कहा, “मुझे पहले ही पता था।”

मैं हतप्रभ-सा खड़ा उसकी तरफ़ देखता रहा, तो उसने कहा, “अब सो जाओ, रात बहुत हो गयी है।” और उसने अपनी कोठरी में जाकर उसी क्षण अन्दर का किवाड़ बन्द कर लिया। मैं जहाँ खड़ा था, कई क्षण पत्थर के बुत की तरह वहीं खड़ा रहा। शायद बहुत देर खड़ा रहा, क्योंकि समय का ज्ञान उस समय मुझे बिल्कुल नहीं रहा था। मुझे इतना ही याद है कि कुछ देर बाद बाहर से ठाकुर साहब की आवाज़ सुनायी दी थी, ‘सरस्वती एक गिलास पानी दे जा।’ और ठकुराइन ने कोठरी में से कहा था, “ला रही हूँ!” फिर कुछ देर की गहरी ख़ामोशी के बाद कोठरी का किवाड़ खुला था और ठकुराइन की लडक़ी निम्मा आँखें मलती हुई आकर मेरे पास से लालटेन उठाकर ले गयी थी।

उससे अगले ही दिन मैंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। दिल्ली छोडऩे से पहले मैं फिर हनुमान रोड पर नहीं गया। जिस दिन मैं दिल्ली से चला, उस दिन बत्रा मेरी जगह एक सौ साठ वाली कुरसी पर आ गया था। चार साल बाद जब मैं एक दिन के लिए दिल्ली आया, और पत्रिका के कार्यालय में लोगों से मिलने के लिए गया, तो बत्रा एक सौ पहचत्तर वाली कुरसी पर बैठा था, क्योंकि लक्ष्मीनारायण भी इस बीच प्रधान सम्पादक बनने का मोह छोडक़र वहाँ से चला गया था।

मगर उस बार आने पर ठकुराइन के घर मिलने जाने का मेरा हौसला नहीं हुआ।
 
अंधेरे बंद कमरे [भाग-2]

नौ साल के बाद मैं और हरबंस आमने-सामने बैठे थे और कॉफ़ी की प्यालियों से उठता हुआ धुआँ हमारी आँखों के बीच एक परदे का काम कर रहा था।

इन नौ सालों में मैंने बहुत कुछ बदलते देखा था, अपने से बाहर भी और अपने अन्दर भी। मैं दिल्ली से जाकर छ: महीने गाँव में रहा था और फिर मुझे लखनऊ के एक प्रकाशक के यहाँ प्रेस का काम देखने की नौकरी मिल गयी थी। मुझे याद है कि लखनऊ जाते समय मेरे मन में एक बात यह भी थी कि मॉरिस कॉलेज लखनऊ में है और हो सकता है कि...। चार साल प्रकाशक के पास काम करने के बाद मैं वहीं एक अँग्रेज़ी दैनिक में सहायक सम्पादक के रूप में काम करने लगा था और सवा चार साल उस नौकरी में काटकर एक साथ दो सौ रुपये की तरक्की का अवसर मिलने से फिर दिल्ली चला आया था।

एक दैनिक पत्र में काम करने से आदमी जो कुछ सीखता है, शायद अन्यत्र कहीं नहीं सीख सकता। उसे हर समय तेज़ी से बदलती हुई ज़िन्दगी पर आँख रखनी होती है, उसकी हर धडक़न का विश्लेषण करते हुए उसके अर्थ को समझना होता है और कई बार उस अर्थ के बीच एक आशय ढूँढऩा पड़ता है, इसलिए उसके लिए कल्पना की दुनिया फीकी और बेगानी होने लगती है। वह जीवन के यथार्थ को यथार्थ रूप में देखने लगता है, इसलिए उससे कम या अधिक को मान्यता नहीं दे पाता। दैनिक पत्र के कार्यालय में बिताये हुए चार वर्षों में मेरा कविता लिखने का मोह लगभग छूट गया था और अब मैं ‘स्टोरी’ की बात करने लगा था। हालाँकि हमारी भाषा में ‘स्टोरी’ का अर्थ कुछ दूसरा ही था। परन्तु मुझे यही अर्थ अधिक संगत और अधिक ठोस प्रतीत होता था। ‘स्टोरी’—अर्थात् जीवन की एक निश्चित संगति, एक निश्चित घटना-क्रम; वह घटना-क्रम जो तथ्य पर आश्रित हो, और तथ्य के अतिरिक्त, या उससे बड़ी और वास्तविकता थी ही क्या...?

और मेरा मन उन छायाओं से भी बहुत हद तक मुक्ति पा चुका था जो कभी उस पर मँडराया करती थीं। मुझे भावुकता की बात से ही चिढ़ होने लगी थी। भावुकता क्या मन की एक अस्वस्थ वृत्ति ही नहीं थी? जिस मन:स्थिति में मैं दिल्ली छोडक़र गया था, वही मन:स्थिति अब मुझे किसी दूसरे में नज़र आती, तो मेरा हँस देने को मन होता था। उसके लिए मुझे एक ही शब्द सूझता था, और वह था ‘एडोलेसेंट!’ मैं सोचता था पुरुष और स्त्री का पारस्परिक आकर्षण क्या है, केवल एक घटना ही तो! और ऐसी घटना अब मेरे लिए कोई अर्थ नहीं रखती थी, क्योंकि उसमें कोई ‘विशेषता’ नहीं थी। घटना में यदि कुछ ‘विशेष’ न हो, तो उसका महत्त्व ही क्या है? बिना किसी ‘विशेषता’ के घटना ‘स्टोरी’ नहीं बनती। साधारण प्रेम की सार्थकता में मुझे कोई आस्था नहीं रही थी। वह तो केवल एक जीव-धर्म मात्र था, मात्र शारीरिक और मानसिक तृप्ति की एक प्राकृतिक आवश्यकता। उसमें ‘विशेषता’ तभी मानी जा सकती थी जब वह अन्तर्राष्ट्रीय, या कम से कम राष्ट्रीय मंच पर कुछ हलचल उत्पन्न करे, कई और महत्त्वपूर्ण घटनाओं का सूत्रपात करे जिससे वास्तविक अर्थ में एक ‘स्टोरी’ बन सके, जैसे प्रिंसेस मार्गरेट या जापान के शाहज़ादे का प्रेम। वरना तो वह एक निरर्थक पुनरावृत्ति ही थी। उस पुनरावृत्ति में ‘स्कैंडल वैल्यू’ हो, तो भी कोई बात है। बिना ‘स्कैंडल वैल्यू’ के उसमें क्या सार्थकता थी...?

और यह तजरबा प्राप्त करने में मैंने अपनी कनपटियों के थोड़े से बाल सफ़ेद कर लिये थे, चश्मे का नम्बर बढ़ा लिया था और मेरी उँगलियाँ चार-मीनार पी-पीकर ज़र्द से काली होने लगी थीं। लखनऊ में मेरी गणना वयस्क पत्रकारों में होती थी।

“तो?” हरबंस ने धुएँ के उस तरफ़ से मुझे देखते हुए कहा।

“तो?” मैंने धुएँ के इस तरफ़ से उसे देखते हुए कहा।

“तुम्हें जिससे मिलना था, वह तो अभी तक आया नहीं।”

“हाँ, अभी तो नहीं आया।”

“तो चलें?”

“नहीं, थोड़ी देर और इन्तज़ार कर लेते हैं।”

और हम कुछ देर चुपचाप बैठे रहे। वर्षों के बाद मिलने पर दो व्यक्तियों को धुएँ के परदे को बीच से हटाने में थोड़ा समय लगता है। इकत्तीस जनवरी सन् इक्यावन की रात को जिस व्यक्ति को मैंने देहरादून एक्सप्रेस में बिठाया था, तेरह अक्तूबर सन् उनसठ के दिन उसके सामने बैठे हुए मुझे उस लम्बे अन्तराल को पार करके उस तक पहुँचना था। इस बीच उसके और उससे सम्बन्धित अन्य लोगों के जीवन में क्या-क्या हुआ, इसका मुझे कुछ पता नहीं था। पाँच साल पहले एक बार जब मैं एक दिन के लिए दिल्ली आया था, तो, मैंने शुक्ला को सुरजीत के साथ कनॉट प्लेस में से जाते देखा था। उस दिन पहली बार मैंने उस लडक़ी को मेकअप किये और साड़ी बाँधे देखा था और मुझे लगा था कि उसके चेहरे का रंग पहले से कुछ साँवला पड़ गया है। उसके चेहरे का आकर्षण तब भी वैसा ही था, हालाँकि वह ताज़गी उसके चेहरे पर नहीं रही थी और वह पहले की तरह लडक़ी सी न लगकर उस समय एक महिला सी लग रही थी। उस दिन शायद भद्रसेन ने ही कॉफ़ी-हाउस में बिना किसी प्रसंग के उसकी बात चलायी थी, “सुरजीत आजकल तुम्हारी उसको हर वक़्त साथ लिये घूमता है। कभी ‘मेट्रो’ में उसे साथ लिये बैठा होता है और कभी ‘पैलेस हाइट्स’ में। लगता है आजकल वह उसे ज़िन्दगी का असली सबक दे रहा है।”

मैंने माथे पर हल्की-सी त्योरी डाले भद्रसेन की बात सुन ली थी और चुप रहा था। मुझे अच्छा नहीं लगा था कि वह व्यक्ति ख़ामख़ाह मुझसे उन लोगों के बारे में बात क्यों कर रहा है। मेरी उन लोगों में क्या दिलचस्पी थी? मेरी तरफ़ से सुरजीत उसे कोई भी सबक दे, मुझे उससे क्या लेना-देना था? मैं अपनी अलग दुनिया में रहता था जहाँ मुझे उन लोगों के इतिहास से कोई मतलब नहीं था। तब तक क्योंकि मैं एक पत्रकार के रूप में वयस्क नहीं हुआ था, इसलिए ‘स्कैंडल वैल्यू’ में भी मेरी बहुत कम दिलचस्पी थी। मैं एक दिन के लिए दिल्ली घूमने के लिए आया था, मुझे इन सब बातों से क्या लेना था कि सुरजीत क्या कर रहा है, शुक्ला कैसे जी रही है और नीलिमा और हरबंस उन दिनों कहाँ हैं! मगर भद्रसेन को जैसे उन लोगों की बात करने का ही मेनिया था और मेरे साथ बैठकर बात करने का और कोई विषय उसे सूझता नहीं था। मैं जितनी देर उसके पास बैठा रहा, वह उन्हीं की बात करता रहा, “तुम्हें पता है कि नीलिमा भी लन्दन चली गयी है?” उसने पूछा।

“नहीं, मुझे उन लोगों के बारे में कुछ पता नहीं है।”

“उसे गये भी मेरा ख़याल है दो-ढाई साल हो गये हैं। जाने से पहले वह एक बार मिली थी, तो कह रही थी कि वे लोग अब वहीं रहेंगे क्योंकि हरबंस वहाँ से लौटकर नहीं आना चाहता।”

“उन्हें अपने लिए जैसे ठीक लगता है, वैसे ही करना चाहिए।” मैं चाह रहा था कि किसी तरह वह यह समझ जाए कि उन लोगों के मामले में मैं बिल्कुल उदासीन हूँ और वह जो भी सूचनाएँ दे रहा है, वे मेरे लिए बिल्कुल व्यर्थ हैं।

“मेरे ख़याल में हरबंस ने गलती की है।” वह फिर भी उस विषय से नहीं हटा।

“अच्छा?”

“सुरजीत जैसे आदमी के भरोसे वह नीलिमा और शुक्ला को छोडक़र चला गया, यह उसने अच्छा नहीं किया।”

“उसे अपने घर के लोगों की अच्छाई-बुराई का हमसे ज़्यादा ख़याल होना चाहिए।”

“हरबंस बहुत सीधा आदमी है और यही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। वह झट से जिस किसी पर भी विश्वास कर लेता है। एक तरह से यह एक गुण भी है, मगर आज की दुनिया में...”

“आज की दुनिया को क्या हुआ है? वह भी तो आज की दुनिया का ही आदमी है।”

“मगर यह उसने अच्छा नहीं किया। तुम्हें शायद पता नहीं कि सुरजीत अब तक दो बार ब्याह कर चुका है और अपनी दूसरी पत्नी को उसने जालन्धर में अपने बाप के घर में छोड़ा हुआ है।”

“होगा,” मैंने कहा, “हमें उससे क्या लेना है!” मगर यह कहते हुए मेरी उदासीनता में एक बेचैनी की लहर दौड़ गयी। तो क्या...? मगर मैंने जल्दी से अपने को सँभाल लिया। मैं नहीं चाहता था कि फिर वही छायाएँ मेरे मन पर मँडराने लगें जिनसे मैंने इतने सालों में बड़ी मुश्किल से छुटकारा पाया था।

“मेरा ख़याल है कि हरबंस को शायद इस बात का पता नहीं था,” भद्रसेन बोला।

“उसे पता था या नहीं, यह सोचकर हमें परेशान होने की क्या ज़रूरत है!” मैंने थोड़ा झुँझलाकर कहा, “मेरा ख़याल है कि अब यहाँ से चला जाए। मुझे नौ बजे लखनऊ एक्सप्रेस पकडऩी है।”

समय और स्थान के अन्तर का जितना अनुभव इधर की सीमा पर होता है, उतना शायद उधर की सीमा पर पहुँचकर नहीं रहता। कम से कम मुझे वे बीते हुए नौ वर्ष बहुत ही छोटे प्रतीत हो रहे थे, शायद इसलिए कि मेरे जीवन में उस अरसे में बहुत एकतारता रही थी और प्रतिदिन के बदलते हुए घटना-चक्र के बीच भी मैं धुरी से निकले हुए कील की तरह पड़ा रहा था। मैं पहले से बड़ा हो गया था, अपने को पहले से अनुभवी समझने लगा था, मगर मेरे जीवन में और क्या हुआ था? और जो कुछ हुआ, उसमें भी प्राप्ति की जगह अप्राप्ति ही क्या अधिक नहीं थी?

“तुम अब भी वैसे ही लगते हो,” हरबंस ने मुझसे कहा तो समय का अन्तराल और भी कम हो गया।

“मेरा तो ख़याल है मैं पहले से काफ़ी बदल गया हूँ।”

“बिल्कुल नहीं। मुझे तो लगता ही नहीं कि तुम्हें नौ साल के बाद देख रहा हूँ।”

“मेरा तो ख़याल है कि मैं भी पहले से बदल गया हूँ, और तुम भी।”

शायद यही बात थी जो वह मुझसे नहीं सुनना चाहता था। इससे उसका चेहरा कुछ लटक गया, तो मैंने कहा, “अब पहले से काफ़ी स्वस्थ लगते हो। लगता है लन्दन की आबोहवा तुम्हें बहुत मुआफ़िक आयी है।” इसकी उस पर तुरन्त प्रतिक्रिया हुई। उसके चेहरे का लटका हुआ भाव ठीक हो गया।

“ठंडा मुल्क है।” उसने कहा, “यहाँ की और वहाँ की आबोहवा में फ़र्क तो है ही।”

मुझे इससे ठंडे गोश्त की बात याद हो आयी।

“तुम कितना अरसा वहाँ रहे?”

“लगभग छ: साल।”

“मैंने सुना था कि बाद में नीलिमा भी वहाँ तुम्हारे पास चली गयी थी।”

“हाँ, साल-भर बाद वह भी वहाँ आ गयी थी।”

“तुमने इस बीच अपना डॉक्टरेट का थीसिस तो पूरा कर ही लिया होगा।”

हरबंस सहसा मेरी तरफ़ से आँखें हटाकर बैरे की तरफ़ देखने लगा जो हमारी मेज़ की तरफ़ आ रहा था। “यहाँ का बिल ले आना,” उसने बैरे से कहा, “और ज़रा जल्दी!”

“नहीं, अभी बिल रहने दो।” मैंने बैरे से कहा, “और एक-एक गरम कॉफ़ी और ले आओ और साथ ही पानी के गिलास। जल्दी!” और हरबंस से मैंने फिर पूछा, “तुम्हारे थीसिस का विषय क्या था?”

“गदर के बाद का भारत।”

“और तुम छ: साल इस पर काम करते रहे?”

“नहीं, मैं वहाँ...कुछ दूसरा काम भी करता रहा हूँ।”

“दूसरा काम—मतलब?”

“मतलब नौकरी करता रहा हूँ।”

“थीसिस लिखने के साथ-साथ, या उसके बाद?”

“नहीं, साथ-साथ ही करता रहा हूँ। थीसिस मैं पूरा नहीं कर सका। तुम्हें पता ही है मैं वहाँ इस इरादे से नहीं गया था। मैं यूनिवर्सिटी में जाता था, कुछ काम किया भी था, मगर...पूरा नहीं कर सका।”

“तो अब यहाँ से पूरा करोगे?”

“हाँ, देखो। वैसे अब नौकरी का काम ही इतना रहता है कि और किसी भी चीज़ के लिए बहुत कम वक़्त मिल पाता है। वैसे ख़याल तो है...।”

उसकी आँखों से लग रहा था कि मेरा उस विषय में पूछताछ करना उसे अच्छा नहीं लग रहा, इसलिए मैंने विषय बदल दिया, “नीलिमा ने वहाँ जाने से पहले अपनी भरतनाट्यम की ट्रेनिंग पूरी कर ली थी?”

“हाँ, वह ट्रेनिंग लेकर ही वहाँ आयी थी। उसने वहाँ कई जगह नृत्य का प्रदर्शन भी किया—लन्दन के अलावा मेड्रिड, पैरिस, बर्न और बॉन वगैरह में भी। वह काफ़ी दिन वहाँ उमादत्त के ट्रुप के साथ रही है। उमादत्त की मुख्य पार्टनर उर्वशी उसे छोडक़र चली आयी थी। उसके बाद उसकी जगह यही उमादत्त के साथ सारे यूरोप का चक्कर लगाती रही है।”

“अच्छा?” मेरे मन में इससे कुछ ईर्ष्या जाग आयी कि मेरे परिचित लोग तो इस बीच जाने क्या से क्या हो गये और मैं अभी तक उन कलम-घसीट नौकरियों के चक्कर में ही हूँ। “यह तो बहुत ही ख़ुशी की बात है,” मैंने कहा।
 
हरबंस कुछ क्षण सिगरेट के लम्बे-लम्बे कश खींचता रहा।

“इस तरह तुम भी उसके साथ सारा यूरोप घूम आये होगे।” मैंने उसी ईर्ष्या के साथ कहा।

“पहली बार मैं उसके साथ नहीं जा सकता था।” वह बोला, “मगर दूसरी बार गया था। पहली बार मुझे अपने काम में लन्दन में रुके रहना पड़ा था। उन दिनों मैं काफ़ी ज़ोर-शोर से अपने थीसिस में लगा हुआ था और मुझे रोज अपने सुपरवाइज़र के पास जाना होता था।”

“वैसे तुम्हारे ख्याल से नीलिमा के प्रदर्शन कैसे रहे? खूब सफल?”

“हाँ, काफ़ी सफल रहे।”

“यहाँ आने के बाद भी उसने कोई शो दिया है?”

“नहीं, अभी नहीं...” वह थोड़ा अटककर बोला, “मगर अब सोच रही है। मैं ही बोझ उठाने से डरता हूँ। तुम जानते हो इसमें कितनी परेशानी उठानी पड़ती है, नहीं तो वह तो कब से कह रही है!”

“मगर जहाँ तक मैं समझता हूँ, उसे यूरोप से आने के बाद ही यहाँ दो-एक प्रदर्शन कर देने चाहिए थे।”

हरबंस फिर कुछ न कहकर लम्बे कश खींचता रहा। तब तक वह जल्दी-जल्दी तीन-चार सिगरेट बुझा चुका था।

“तुम सिगरेट बहुत पीने लगे हो।” मैंने कहा।

“हाँ,” वह बोला, “पहले से कुछ ज़्यादा ही पीने लगा हूँ। अब यहाँ से चलोगे नहीं?”

मुझे अब उसे और लटकाये रखना ठीक नहीं लगा, इसलिए मैंने बिल अदा किया और उसके साथ चलने के लिए उठ खड़ा हुआ। “मुझे अब तक घर पहुँच जाना चाहिए था,” उसने उठते हुए कहा।

हम लोग बाहर आ गये, तो बैरे से पीछे से जल्दी-जल्दी आकर कहा, “साहब, आपके पैकेट!” हरबंस ने कुछ घबराहट के साथ अपने दोनों पैकेट बैरे के हाथ से ले लिये।

“पहले से एब्सेंट-माइंडिड भी हो गये हो।” मैंने कहा।

हरबंस ने इस पर कुछ नहीं कहा और दोनों पैकेट सँभाले हुए चुपचाप फुटपाथ पर चलता रहा। थोड़ी दूर चलकर उसने जैसे मन ही मन कुछ सोचते हुए कहा, “तुमसे इन दिनों किसी ने मेरे बारे में कुछ बात तो नहीं की?”

“कैसी बात?” मैंने पूछा।

“ऐसी ही कोई बात, जैसे कि लोगों की आदत होती है।”

“मैंने तुम्हारा मतलब नहीं समझा।” मैंने कहा।

“मतलब यही कि...लोग हरएक के बारे में कुछ न कुछ फिज़ूल की बातें करते रहते हैं। यहाँ एक मिस श्रीवास्तव हैं, सुषमा श्रीवास्तव। आजकल कुछ लोग उसके साथ मेरा नाम जोडक़र कुछ बे-सिर-पैर की बातें किया करते हैं। मुझे कुछ दिन हुए न जाने कौन बता रहा था!”

“यह मिस श्रीवास्तव कौन है?”

“एक जर्नलिस्ट लडक़ी है। पिछले एक-डेढ़ साल से उसकी काफ़ी गुड्डी चढ़ी हुई है। यहाँ ‘नेशनल स्टार’ में काम करती है। तुम्हारा अभी उससे परिचय नहीं हुआ?”

“नहीं, मेरा उससे परिचय नहीं हुआ और न ही मैंने तुम्हारे और उसके बारे में कोई बात सुनी है। मेरी अभी लोगों से भेंट ही बहुत कम हुई है।”

“लोग ऐसे ही बकवास करते रहते हैं। तुम आजकल की दुनिया को जानते ही हो...।”

“मगर लोगों की बकवास से हमें क्या लेना-देना है?”

“कुछ नहीं, मगर सुनकर तकलीफ़ तो होती ही है।”

“तकलीफ़ तो होती है मगर ऐसी बातों की तरफ़ ज़्यादा ध्यान न देना ही अच्छा है।”

“हाँ, मगर...एक बात यह है कि मुझे खुद उस लडक़ी के तौर-तरीके पसन्द नहीं हैं। उसकी रेप्यूटेशन भी कुछ अच्छी नहीं है।”

“मतलब चरित्र के मामले में?”

“नहीं, चरित्र के मामले में भी और वैसे भी उसकी रेप्यूटेशन कुछ और तरह की है।”

“कुछ और तरह की, यानी...?”

“लोग उसके बारे में कई तरह की बातें करते हैं।”

“ख़ैर होगा, छोड़ो। हमें क्या लेना-देना है?”

“तुमने सचमुच उसके बारे में कोई बात नहीं सुनी?”

“नहीं, अब तक तो नहीं सुनी। अब तुमसे सुन रहा हूँ।”

“वैसे कई लोग हैं जो उसकी बहुत तारीफ़ भी करते हैं। पिछले दिनों सुरजीत के यहाँ उसका काफी आना-जाना रहा है। तुम्हें पता है शुक्ला ने सुरजीत के साथ शादी कर ली थी?”

“अच्छा? मुझे नहीं पता था...।” और न जाने किस चीज़ से ठोकर खाकर मेरा पैर लडख़ड़ा गया। ठोकर इस बुरी तरह लगी थी कि काफ़ी देर तक मेरी साँस ठिकाने पर नहीं आयी और मैं कुछ बात भी नहीं कर सका। स्कूटर स्टैंड पर पहुँचने तक हरबंस ही बात करता रहा, “मेरे लौटकर आने से पहले ही उन लोगों की शादी हो गयी थी। वह लडक़ी अपनी ज़िन्दगी में अगर कोई सबसे बुरी गलती कर सकती थी, तो वह यही थी। अगर तुम मुझसे पूछो, तो गलती उससे ज़्यादा उसकी बहन की थी जो उसे यहाँ इस आदमी के भरोसे अकेली छोड़ गयी थी, हालाँकि वह जानती भी थी कि यह आदमी कैसा है।”

वह कुछ देर चुप रहा, इस आशा से कि शायद मैं कोई बात करूँ। मगर मैंने कोई बात नहीं की, तो वह फिर कहने लगा, “मैंने नीलिमा को लन्दन में ही बता दिया था कि हमारे पीछे यह घटना होगी। वह वहाँ से लम्बी-लम्बी चिट्ठियाँ लिखकर शुक्ला को समझाने का प्रयत्न किया करती थी। मगर तुम इनकी बात देखो कि इनमें से किसी ने वहाँ हमें इसकी सूचना तक नहीं दी। सब कुछ चुपचाप ऐसे हो गया जैसे कि यह एक षड्यन्त्र हो। बीजी ने या सरोज ने किसी ने भी हमें नहीं लिखा। अब वे कहती हैं कि शुक्ला ने ही हमें क़सम देकर मना कर दिया था और कहती थी कि मैं हरबंस भापाजी के आने पर उनकी इजाज़त लेकर उनके सामने नये सिरे से ब्याह करूँगी; यह ब्याह तो ऐसे ही है, असली ब्याह तो तब होगा...।”

मैंने फिर भी कुछ नहीं कहा, तो उसने पूछा, “तुम कोई और बात सोच रहे हो?”

“हाँ...नहीं...,” मैंने कहा, “मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूँ।”

“नहीं, तुम कुछ और सोच रहे हो।”

“नहीं, मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूँ।”

वह पल-भर गम्भीर होकर मुझे देखता रहा, मगर इससे पहले कि वह कुछ और कहता, एक स्कूटर स्टैंड आ गया और मैं उसका हाथ पकड़े हुए उसे स्कूटर में ले गया।

शिमला की बरफ़ानी हवा राजधानी में उतर आयी थी।

वे दिन आ गये जब कभी-कभी पहाड़ी अबाबीलों के बोल राजधानी में भी सुनायी दे जाते हैं, मगर राजधानी में किसी को उन्हें सुनने की फुरसत नहीं होती। राजधानी में जीवन की गति इन दिनों इतनी तेज़ हो जाती है कि एक दिन का समय दिन-भर के कार्यों के लिए बहुत कम प्रतीत होता है। एक पत्रकार की डायरी के पन्ने ऊपर से नीचे तक घिचपिच हुए रहते हैं। सुबह इम्पीरियल होटल में न्यूज़ीलैंड से आये हुए घुमक्कड़ दम्पती के साथ नाश्ता। दस बजे रूस के कठपुतली-चालकों से भेंट। साढ़े ग्यारह से एक बजे तक दफ़्तर में जाकर रिपोर्ट। डेढ़ बजे सुब्बास्वामी एम. पी. के साथ खाना और तमिलनाडु के भाषा-सम्बन्धी आन्दोलन पर बातचीत। तीन से साढ़े चार बजे तक दफ़्तर। अपने दिये हुए प्रेस मैटर पर एक नज़र। पाँच बजे यूनिवर्सिटी कन्वोकेशन। सात बजे रूमानी दूतावास में रिसेप्शन। नौ बजे उपमन्त्री...से उनके घर पर भेंट। ग्यारह बजे दिल्ली देखने के लिए आये हुए मेहमान के साथ खाना। फिर सुबह...

ज़िन्दगी इतनी तेज़ रफ़्तार से चलती जाती थी कि अबाबीलों की आवाज़ सुनने या घास पर चमकती हुई धूप में सुस्ताने या बिना बरसे सिर पर से गुज़र जानेवाले बादलों को देखने की बात मन में उठती ही नहीं थी। जीवन का हर क्षण आगे आनेवाले किसी और क्षण की तरफ़ दौड़ा जाता था और वहाँ पहुँचते न पहुँचते आगे के किसी और क्षण की ओर दौड़ आरम्भ हो जाती थी। समय एक ऐसी गति से दौड़ता चलता था कि अपने आपका भी कुछ पता नहीं चलता था कि हम उस दौड़ में कहाँ हैं। हर क्षण यह आशंका बनी रहती थी कि हम समय से पीछे तो नहीं छूट गये। इस गति में कभी विराम आ जाता था तो वह विराम बहुत अस्वाभाविक लगता था। अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर बहुत तेज़ी से घटनाएँ घटित हो रही थीं, उनमें से हर घटना की हल्की गहरी प्रतिक्रियाएँ अपने आसपास दिखायी देती थीं और हर समय एक प्रश्नचिह्न मन में बना रहता था कि आनेवाले कल को उस मंच पर कहाँ क्या होगा! बीच-बीच में मंच के सूत्रधार मंच पर भाषण दे जाते थे जिससे हर घटना की संगति और अर्थ को नये सिरे से पकडऩा और समझना होता था। यह उसी तरह था जैसे आदमी बहुत तेज़ी से आकाश में उड़ता जाए, उड़ता जाए और आख़िर फिर वहीं पहुँच जाए जहाँ से उसने उडऩा आरम्भ किया था, मगर उस अनुभव के प्रकाश में वह फिर आगे उडऩे लगे और उड़ता जाए, उड़ता जाए जब तक कि फिर घूमकर पहली जगह पर न आ जाए।

ऐसे में आदमी कैसे सोच सकता है कि पहाड़ से अबीबीलें कब आती हैं और कब वापस जाने की तैयारी करती हैं; कब बाँसों में फूल आते हैं और कब झड़ जाते हैं?

और ऐसे में आदमी अपने मित्रों के यहाँ आने-जाने का फ़र्ज भी कैसे पूरा कर सकता है?

हरबंस को इस बात की बहुत शिकायत थी कि मैं एक बार उसके यहाँ जाने के बाद—और यह भी जब वह मुझे ज़बरदस्ती ले गया था—फिर दूसरी बार उसके यहाँ नहीं आया। दो-एक बार दफ़्तर में उसके फ़ोन आये थे, एक बार नीलिमा का भी फ़ोन आया था। मगर मैं उनके यहाँ नहीं जा सका। एक बार खाना खाने आने के लिए कहकर भी नहीं पहुँच सका, दूसरी बार कनॉट प्लेस में मिलने के लिए कहकर भी नहीं मिल पाया। उस दिन हरबंस ने फिर फ़ोन किया, तो वह बहुत नाराज़ था। उसने कहा कि मैं उस रात भी उनके यहाँ नहीं आया, तो वह आइन्दा कभी मुझे फ़ोन नहीं करेगा, कभी मुझसे बात नहीं करेगा, कभी मेरी सूरत नहीं देखेगा। मेरी डायरी में रात के नौ बजे के लिए लिखा था—पत्रकार क्लब में स्थानीय पत्रकारों का सहभोज। मैंने वहाँ काटकर लिख दिया था—हरबंस के यहाँ जाकर उसके साथ सुख-दुख चर्चा। हरबंस ने फ़ोन पर कहा था, “तुम जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी आ जाना। मैं छ: बजे के बाद घर पर ही रहूँगा। देखना आज जैसे भी हो, तुम्हें हर हालत में पहुँचना ही है। वर्षा हो, तूफ़ान हो, तुम छ: बजे यहाँ ज़रूर पहुँच जाओ, बस!”
 
मैं अपने नोट्स तैयार करता हुआ मन ही मन अनुमान लगाता रहा कि रात को उसकी और मेरी क्या-क्या बातें होंगी। वह पहली बार जब मुझे अपने साथ ले गया था, तभी मुझे उसके मन में झाँकने का एक अवसर मिल चुका था। उसके बाद मैं जो इतने दिन उसके यहाँ नहीं गया, उसका कारण व्यस्तता के अतिरिक्त शायद यह भी था कि मैं अपने अन्दर कहीं उसके यहाँ जाने से बचना चाहता था। उस दिन रात के ग्यारह बजे तक उसने मुझे अपने यहाँ रोके रखा था। मैं एक मौका पाकर उठ न आता, तो शायद वह और दो घंटे बात करता रहता। उसकी बातचीत लन्दन और डोवर से लेकर नयी दिल्ली तक के विस्तार को छूती रही थी, मगर मुझे लग रहा था कि उसकी सारी बातचीत का केन्द्र एक ही है और वह है सुरजीत। बातचीत में वह किसी न किसी तरह उसका ज़िक्र ले आता था और जैसे राह चलता आदमी एक काँटे पर पैर पडऩे से रुक जाता है, उसी तरह वह सुरजीत का ज़िक्र आने पर वहीं रुक जाता था।

“मैं इस आदमी से सख़्त नफ़रत करता हूँ।” वह कहता रहता था, “मेरा बस हो तो मैं ज़िन्दगी में कभी इसकी सूरत तक न देखूँ। मैं कितनी बार इस औरत से (मतलब नीलिमा से) कह चुका हूँ कि हम लोग यहाँ से घर बदल लें, मगर यह मेरी बात सुनती ही नहीं। इसे ज़िन्दगी में सिर्फ़ अपनी ख़ुशी से मलतब है, मेरी ख़ुशी-नाख़ुशी से कोई मतलब नहीं!”

यह मुझे डिफेंस कॉलोनी में उनके घर जाकर ही पता चला था कि सुरजीत का घर उनके घर के बिल्कुल बराबर है। इनका नम्बर था डी एन 31 और सुरजीत का नम्बर था डी एन 32 । साथ-साथ घर होने से नीलिमा और शुक्ला का एक-दूसरी के घर में काफ़ी आना-जाना रहता था जो हरबंस कहता था उसे बिल्कुल पसन्द नहीं है। यह बात मेरी समझ में नहीं आयी कि ऐसी स्थिति में उसने वहाँ घर लिया ही क्यों था। सुरजीत और शुक्ला तो चार महीने से पहले से ही डिफ़ेन्स कॉलोनी में घर लेकर रह रहे थे।

“मैं उस लडक़ी को (यहाँ उसका मतलब शुक्ला से था) रात-दिन अपने घर में आते-जाते नहीं देखना चाहता। मुझे जो लोग अच्छे नहीं लगते, उनकी मैं सूरत भी देखना पसन्द नहीं करता। यह छोटी-सी बात जाने इस औरत की समझ में क्यों नहीं आती!”

“मगर तुम्हें सुरजीत से अब इतनी चिढ़ क्यों है?” मैंने जैसे एक प्रतिशोध लेने के लिए कहा, “सुरजीत को मैं तुम्हारे जितना तो नहीं जानता, मगर वह काफ़ी हँसमुख और मिलनसार आदमी है और...और मैं समझता हूँ काफ़ी इंटेलिजेंट भी है। एक पत्रकार के रूप में वह कैसा है, यह मैं नहीं कह सकता। लेकिन मैं समझता हूँ कि उस रूप में भी उसे काफ़ी सफल होना चाहिए।” हरबंस सुरजीत के विषय में कोई अच्छी बात कहता, तो शायद मैं उसका विरोध करके अपने मन की भड़ास निकाल लेता। मगर उसे विषय में जो बातें मेरे मन में आती थीं, उन्हें हरबंस कहे जा रहा था। मुझे बात करते हुए स्वयं आश्चर्य हो रहा था कि जिस व्यक्ति के कारण मैंने कई साल एक घुटन में काटे थे और जिसके कारण मैं नौ साल पहले दिल्ली छोडक़र चला गया था, अब उसी के पक्ष की बात मैं अपने मुँह से कैसे कर रहा हूँ।

“इंटेलिजेंट! आह!” हरबंस ने अपनी अस्थिरता को छिपाने के लिए ह्विस्की के गिलास की तरफ़ हाथ बढ़ा दिया और बोला, “वह कीचड़ का एक कीड़ा है, मैं बस इतना ही उसके बारे में कह सकता हूँ। अगर दुनिया में मैं किसी से सबसे ज़्यादा नफ़रत करता हूँ, तो वह यही आदमी है।”

“मगर विलायत जाने से पहले तो तुम्हारी उसके बारे में ऐसी राय नहीं थी।”

“तब मैं उसे जानता ही कहाँ था! मैं उसे बिल्कुल और तरह का आदमी समझता था।”

“यह तुम कैसे कह सकते हो कि तुम उसे जानते नहीं थे? तुम उसके ऊपर एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी छोड़ गये थे।” और यह कहते हुए मुझे नीलिमा की नौ साल पहले कही हुई बात याद हो आयी कि जाने क्यों हरबंस इस आदमी से हम लोगों की देखभाल करने के लिए कह गया है। उसने सुरजीत के बारे में अपनी भी राय व्यक्त की थी और मैंने जब उससे कुरेदकर पूछना चाहा था, तो उसने बात को टाल दिया था।

“मुझे पता होता कि वह मेरे पीछे इस तरह की हरकत करेगा, तो मैं कभी ऐसा करता?” कहते हुए उसने अपने गिलास का आख़िरी घूँट पी डाला। दो पेग ह्विस्की पी लेने के बाद उसकी आँखों का भाव बहुत विषादपूर्ण हो गया था। वह इस तरह एकटक मेरी तरफ़ देखने लगा था जैसे मुझी से उसके प्रति कोई अपराध बन पड़ा हो।

“ख़ैर जो होना था, हो चुका।” मैंने कहा, “अब तुम्हारे इस तरह शिकायत करने का अर्थ ही क्या है? जो भी स्थिति है, अब तुम्हें उसे स्वीकार करके ही चलना चाहिए।”

“मैं इस स्थिति को स्वीकार कैसे कर सकता हूँ?” वह कुछ आवेश के साथ बोला, “मेरे पीछे इस आदमी ने इस लडक़ी की ज़िन्दगी तबाह कर दी है। मैं उसे माफ़ कैसे कर सकता हूँ?”

“लडक़ी उसे चाहती थी और उसने अपनी इच्छा से उससे ब्याह कर लिया है। इसमें मुझे तो तबाह करने या तबाह होने की कोई बात नज़र नहीं आती।”

“तुम कुछ नहीं जानते।” हरबंस अपने दोनों हाथों को हवा में झुलाकर बोला, “बिल्कुल कुछ नहीं जानते। तुम्हें पता है कि उस लडक़ी को मजबूरन उससे ब्याह करना पड़ा है, क्योंकि...क्योंकि...”

“क्योकि...?”

“क्योंकि उसके लिए और कोई चारा नहीं रहा था। तुम इन हिन्दू लड़कियों को तो जानते ही हो। वह यह समझती थी कि वह अब...अब और किसी से ब्याह करने के लायक नहीं रही। वह उसे इस हद तक ले जा चुका था कि उसके लिए, मेरा मतलब है वह समझती थी कि उसके लिए और कोई रास्ता नहीं है। उसे इस आदमी ने फुसलाकर अपने जाल में फँसाया है और अब यह दूसरों के सामने मेरा मज़ाक उड़ाता है। मैं इसे कभी माफ़ नहीं कर सकता। मैं यहाँ होता, तो कभी यह शादी न होने देता। मैं उसे समझा देता कि इन झूठे संस्कारों में कुछ नहीं रखा है। वह चाहे ज़िन्दगी-भर क्वाँरी रहती, मगर मैं उसे इस शख्स से, कम से कम इस शख्स से, कभी, कभी शादी न करने देता।”

वह नशे की वजह से और अपनी उत्तेजना के कारण इतना असंयत होता जा रहा था कि मुझे डर लग रहा था कि वह अभी गालियाँ ही न बकने लगे।

मेरा अपना मन बहक रहा था, मगर मैंने किसी तरह अपने पर वश किये हुए कहा, “देखो, तुम इस बात को लेकर ज़्यादा बहको नहीं। तुम्हें यह पता नहीं कि तुम इन बातों से उस लडक़ी की ज़िन्दगी खराब ही कर सकते हो। तुम्हें समझना चाहिए कि उस लडक़ी की भलाई अब इसी में है कि तुम इस स्थिति को खुले दिल से स्वीकार कर लो। तुम उसे माफ़ नहीं कर सकते, तो भी तुम्हारा फ़र्ज है कि उस लडक़ी की ख़ातिर उसे माफ़ कर दो और उसके साथ पहले की तरह ही दोस्ती का व्यवहार रखो।”

“दोस्ती का व्यवहार? उसके साथ?” वह गिलास में और ह्विस्की डालता हुआ बोला, “कभी नहीं। वह गुंडा है। मैं उससे नफ़रत करता हूँ। वह नरक का कुत्ता है। वह नाली में रेंगनेवाला कीड़ा है। क्या तुम समझते हो कि मैं ज़िन्दगी में कभी उसके साथ उठना-बैठना स्वीकार कर सकता हूँ? कभी नहीं।”

बोलते-बोलते उसके मुँह में झाग-सा आने लगा था। उसने रूमाल निकालकर अपना मुँह पोंछते हुए कहा, “मैं उस आदमी को और उसके साथ इस लडक़ी को ज़िन्दगी में ऐसी सज़ा दूँगा, ऐसी सज़ा दूँगा कि ये लोग याद रखेंगे। तुम समझते हो कि में इन्हें ऐसे ही माफ़ कर दूँगा?”

मेरे दिमाग़ पर भी नशे का असर चढ़ रहा था और मुझे अपने सामने की दीवारें लचककर गोल होती नज़र आ रही थीं। हरबंस उस वक़्त जो भी बात कहता था, मेरा मन होता था कि मैं उसका विरोध करूँ, वह जितना बुरा-भला सुरजीत को कह रहा था, मैं उतना ही बुरा-भला उसे कहना चाहता था। मेरे मन में एक दबी हुई प्रतिशोध की भावना थी जो उस समय उभरकर ऊपर आ रही थी। “तुम सुरजीत को सज़ा दो, मगर शुक्ला को तुम किस बात की सज़ा दोगे?” मैंने कहा, “उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

“उसने कुछ नहीं बिगाड़ा?” उसने अपने हाथ का गिलास पटककर मेज़ पर रख दिया, “उसने नहीं, तो किसने बिगाड़ा है? यह शख्स आज अपने को मेरा सम्बन्धी कह सकता है, तो किसकी वजह से? मैं इस लडक़ी से भी आज उतनी ही नफ़रत करता हूँ।”

दीवारें गोल होकर मेरे ऊपर को झुकी आ रही थीं और मेरे दिमाग़ में तेज़-तेज लहरें दौड़ रही थीं जैसे कि वहाँ एक गरम लावा उमड़ आया हो। जिस तरह हरबंस ने अपना गिलास पटककर मेज़ पर रखा था, उसी तरह मैंने भी अपना गिलास पटककर मेज़ पर रख दिया।

“मैं उस लडक़ी को बिल्कुल बेकसूर समझता हूँ।” मैंने कहा, “वह उस शख्स को तुम्हारी ज़िन्दगी में नहीं लायी, तुम उस शख्स को उसकी ज़िन्दगी में लाये हो। वह आज उसका पति है, मगर पहले वह तुम्हारा दोस्त था। तुम्हीं पहली बार उसे उनके घर में लेकर गये थे। तुम्हीं उसके ऊपर शुक्ला और नीलिमा की देखरेख की ज़िम्मेदारी छोडक़र गये थे। तुम्हें उन दिनों वही एक अपना मित्र और हितचिन्तक नज़र आता था। जब तुम उसे सब मित्रों से बढक़र मानते थे, तो उस लडक़ी को अब उससे ब्याह करने के लिए कसूरवार क्यों ठहराते हो? तुम्हें ही जब इन्सान की पहचान नहीं थी, तो उस लडक़ी को कैसे हो सकती थी? तुम पुरुष थे और तब तीस बरस के थे। वह एक लडक़ी थी और उस समय कुल सत्रह बरस की थी। तुम्हारे ही कहने से उसने जीवन भार्गव के साथ अपना सम्बन्ध तोड़ लिया था। तुम्हें खुद आदमी की पहचान कितनी थी? तुम्हें जीवन भार्गव छोटा और ओछा लगता था, क्योंकि वह सीधा और ख़ामोश आदमी था। यह आदमी तुम्हें बहुत अच्छा लगता था जो रोज़ रंडियों के कोठों पर जाता था और जिसने अपनी एक पत्नी लाहौर में छोड़ दी थी और दूसरी जालन्धर में छोड़ रखी है।” मैं उस लावे के जोश में शायद और भी बहुत कुछ कह जाता, मगर सहसा दाँतों में ज़बान के कट जाने से मैं बोलते-बोलते रुक गया। मुझे बोलते समय अपने को लग रहा था कि जीवन भार्गव का नाम केवल एक ओट है और वास्तव में मेरा अभिप्राय जीवन भार्गव से न होकर अपने से ही है।

“मैं नहीं जानता था कि उसका रंडियों के यहाँ आना-जाना है।” वह मर्माहत-सा बोला, “मुझे तब किसी ने यह नहीं बताया था।”

“और यह भी तुम्हें किसी ने नहीं बताया था कि उसने अपनी एक पत्नी को लाहौर में छोड़ दिया था, और उसकी दूसरी पत्नी जालन्धर में है?”

“मैं इतना ही जानता था कि वह शादीशुदा है।” उसने इस तरह उत्तर दिया जैसे एक अभियुक्त वकील को जिरह का उत्तर देता है।

“तुम यह बात जानते थे, फिर भी तुमने...?” मुझे लगा जैसे दीवारें टूटकर मेरे ऊपर गिरने जा रही हों। मैं नहीं जानता था कि मैंने जो सबसे पैना अस्त्र प्रयोग किया था, वह इतना कुन्द साबित होगा। मैं फटी-फटी आँखों से भौंचक्का-सा उसकी तरफ़ देखता रहा। मेरी उत्तेजना के सामने उसकी उत्तेजना फीकी पड़ गयी थी और वह एकदम मुरझा-सा गया था।

“मैंने सोचा था कि वह ज़िम्मेदार आदमी है, इसलिए...।” और वह हाथों और आँखों से कुछ टटोलता हुआ-सा चुप कर गया। वह जाने उस समय क्या ढूँढऩा चाहता था—सिगरेट की डिब्बी या ह्विस्की का गिलास! मगर वे दोनों चीज़ें तो बिल्कुल उसके सामने ही रखी थीं।

“इसलिए...?” और सारी परिस्थिति का एक बिल्कुल नया ही अर्थ मेरे मस्तिष्क में कौंध गया। मेरा मन हुआ कि मैं अपनेवाला गिलास उठाकर ज़मीन पर पटक दूँ या उसके मुँह पर दे मारूँ।
 
“मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि वह मेरी अनुपस्थिति का इस तरह लाभ उठाएगा।” वह बोला, “मगर फिर भी मुझे सबसे ज़्यादा शिकायत इस लडक़ी से है कि इसने मेरे लौटकर आने का इन्तज़ार क्यों नहीं किया। कम से कम इसे एक बार चिट्ठी लिखकर मुझसे पूछ तो लेना ही चाहिए था। अगर इसके मन में मेरे लिए ज़रा भी कद्र होती, तो क्या यह मुझसे पूछे बिना इस तरह का क़दम उठाती? इसने मेरी राय न पूछकर एक ऐसा अपराध किया है जिसके लिए मैं इसे कभी क्षमा नहीं कर सकता।”

“तुम्हें यही नज़र आता है कि उसने एक अपराध किया है, यह नज़र नहीं आता कि तुमने उसके प्रति उससे कहीं भारी, कहीं बड़ा, अपराध किया है?”

उसका सिर झूलकर गरदन पर आ गया। वह कुछ देर मेरी तरफ़ इस तरह देखता रहा जैसे कि सीज़र ने ब्रूटस का खंजर खाने के बाद उसकी तरफ़ देखा होगा। उसे मुझसे इस तरह की सख़्त बात सुनने की आशा नहीं थी।

“कम से कम तुम इस बात से तो सहमत हो कि जो कुछ हुआ है वह नहीं होना चाहिए था,” आख़िर उसने कहा।

“मैं तो समझता हूँ कि जो हुआ है ठीक हुआ है, और ऐसे ही होना चाहिए था।”

उसका सिर ज़रा-सा उठा और फिर उसी तरह झूल गया, “तुम मेरे साथ अन्याय कर रहे हो।” उसने कहा, “मैंने नहीं सोचा था कि तुम भी मुझसे इस तरह की बातें कहोगे।”

मेरे दिमाग़ का लावा धीरे-धीरे शान्त हो रहा था और मुझे कुछ अफ़सोस भी हो रहा था कि मैंने अपने को उन बहाव में क्यों बह जाने दिया। आख़िर वह उन लोगों का व्यक्तिगत मामला था और मैं उसमें एक बाहर का व्यक्ति ही था। मुझे उससे यह सब कहने का क्या अधिकार था? यह सोचकर मन कुछ बेचैन होने लगा, तो मैं सोचने लगा कि मैं तुरन्त वहाँ से उठकर चल दूँ। उसके लिए बहाना मुझे नीलिमा के आने से मिल गया। वह सहसा साथ के कमरे से आँखें मलती हुई उस कमरे में आ गयी और हाथ से अपनी जम्हाई को रोकती हुई बोली, “तुम लोग क्या सारी रात बातें ही करते रहोगे? मैंने तो इस बीच थोड़ी देर सो भी लिया है।”

“तुम जाकर सो रहो,” हरबंस अपना गुस्सा उस पर उतारने लगा, “हम लोग आज नौ बरस के बाद मिले हैं। हो सकता है हम सुबह तक बातें करते रहें।”

मगर मैं उस अवसर का लाभ उठाकर उठ खड़ा हुआ। हरबंस ने उसके बाद बहुत कहा कि मैं और रुक जाऊँ। उसके मन में शायद कहने को अभी बहुत कुछ बाकी था। मगर मैं एक बार उठ खड़ा हुआ, तो फिर नहीं बैठा। आखिर हरबंस ने अपना ड्रेसिंग गाउन पहना और बस स्टॉप तक मुझे छोडऩे चला आया। मेरे बस में चढऩे तक वह अनुरोध करता रहा कि मैं फिर जल्दी ही किसी दिन वहाँ आऊँ। जब मेरी बस इंडिया गेट के पास पहुँची, तो मुझे सहसा वह बात याद हो आयी जो उसने अपने और किसी मिस श्रीवास्तव के सम्बन्ध में कही थी। मुझे अफ़सोस हुआ कि उस विषय में तो मैंने उससे कुछ पूछा ही नहीं। उससे बात करते समय मैं इस तरह अपने व्यक्तिगत संस्कार के वश में पड़ गया था कि अपनी पत्रकार की रुचि को भूल ही गया था। परन्तु जब उस दिन पत्रकार क्लब का सहभोज छोडक़र मैंने उसके यहाँ जाने की बात तय की, तो उस विषय में मेरी रुचि एक और कारण से पहले से कहीं बढ़ गयी थी। वह मिस श्रीवास्तव के सम्बन्ध में कहना क्या चाहता था? इस बीच पत्रकार क्लब में मेरा मिस श्रीवास्तव के साथ परिचय हो चुका था और दो-एक बार मैं उससे बात भी कर चुका था। अपने हल्के साँवले रंग के बावजूद वह लडक़ी देखने में काफ़ी आकर्षक थी। उसकी सधी हुई बात में जितना आत्मविश्वास था, उतना ही उसके बात करने के ढंग में भी था। वह अपने कोट की जेब में हाथ डाले हुए पीछे को थोड़ा झुककर जब हँसती थी, तो उसमें एक ऐसी सहजता होती थी कि जान पड़ता था उसके मन में कहीं कोई कुंठा या रुकावट नहीं है। वह जिन लोगों के बीच खड़ी होती थी, उनमें इस तरह घुल-मिल जाती थी जैसे उनसे अलग उसकी और कोई दुनिया है ही नहीं। अपने दो बार के परिचय में ही उसने मुझे कुछ ऐसा आभास दिया था जैसे हम एक अरसे से एक-दूसरे को जानते हों, और मैं जितना ही उसे देखता था, उतना ही मुझे हरबंस की उसके बारे में कही हुई बात असंगत लगती थी।

शाम को जब मैं दफ़्तर की वैन में हरबंस के घर की तरफ़ चला, तो यह बात बार-बार मेरे मन में आ रही थी कि हरबंस ने जो बात कही थी, आखिर उसका आधार क्या था!

गेट के अन्दर क़दम रखते हुए मैं हवा के झोंके से जूते के अन्दर पैर के तलवों तक काँप गया। बाहर के कमरे की बत्ती जल रही थी, मगर सारे घर में इस तरह ख़ामोशी छायी थी जैसे वहाँ कोई रहता ही न हो। मैंने बरामदे में जाकर दरवाज़ा खटखटाया। एक मिनट में ही उनके नौकर बाँके ने दरवाज़ा खोल दिया। अन्दर दीवान पर नीलिमा बैठी थी, एक पत्रिका में आँखें गड़ाये हुए। हरबंस पैर फैलाये पास की कुरसी पर बैठा था और एक किताब के पन्ने पलट रहा था। उनका लडक़ा अरुण नीचे दरी पर बैठा ड्राइंग पेपर पर सुरमे की सलाई से लकीरें खींच रहा था। उन तीनों की ख़ामोशी में एक ऐसी व्यवस्था थी कि वह कमरा कमरा न लगकर एक पिक्चर का सेट लगता था, जहाँ मेरा आना एक फ़ालतू आदमी के सेट पर चले आने की तरह था। मैं सेट पर दाख़िल होने से पहले क्षण-भर दरवाज़े के पास रुका रहा। नीलिमा ने इस बीच मेरी तरफ़ देखकर आँखें फिर पत्रिका की ओर कर लीं और हरबंस ने हाथ की पुस्तक नीचे रख दी। अरुण बिना मेरी ओर ज़रा भी ध्यान दिये अपनी लकीरें खींचता रहा।

“तुम लोगों में क्या ख़ामोश रहने की प्रतियोगिता चल रही थी?” मैंने नीलिमा के पास दीवान पर बैठते हुए कहा।

“तुमने बहुत देर कर दी।” हरबंस ने कहा। फिर कुछ देर हम चारों ही ख़ामोश रहे। मुझे नीलिमा और अरुण के कपड़ों से लगा जैसे वे कहीं जाने के लिए तैयार बैठे हों। मुझे वह ख़ामोशी बहुत विचित्र लग रही थी, इसलिए मैंने कहा, “तुम लोग कहीं जा रहे थे क्या? मुझे लगता है जैसे मैं ग़लत वक़्त पर यहाँ आया हूँ।”

“ग़लत वक़्त पर क्यों?” हरबंस बोला, “मैंने तुम्हें बुलाया था।”

“वह तो ठीक है, मगर तुम लोग इस तरह ख़ामोश बैठे हो कि...”

“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। हम लोग तुम्हारा इन्तज़ार ही कर रहे थे।”

“मुझे तो लगता है तुम लोग कहीं जा रहे थे।”

“मैं कहीं नहीं जा रहा। यह शायद जा रही है।” हरबंस ने ‘शायद’ पर इस तरह ज़ोर दिया कि नीलिमा ने सहसा तमककर पत्रिका परे हटा दी और अपनी स्वाभाविक लचक के साथ उठ खड़ी हुई।

“हाँ, में जा रही हूँ।” वह बोली, “और अरुण भी मेरे साथ जा रहा है। तुम्हारा दोस्त आ गया है, इसलिए तुम बैठकर इसके साथ बातें करो।”

जब मैं पहली बार उनके यहाँ आया था, तो भी मुझे नीलिमा के अपने प्रति व्यवहार में कुछ खिंचाव-सा महसूस हुआ था। उसकी शिष्टता और बातचीत की कोमलता में मुझे एक बनावटीपन-सा लगा था, जैसे वह शिष्टता विदेश में सीखी हुई एक कला ही हो। उसकी आँखों में कहीं एक रूखापन था जिसे वह अपनी अतिरिक्त कोमलता से छिपाना चाहती थी। मैं तब सोचता रहा था कि क्या यह इसलिए है कि वह अब तक भी नौ साल पहले की उस बात को नहीं भूली कि मैं उससे कहकर भी उस शाम उसके यहाँ नहीं गया था। मगर उतनी पुरानी बात तब तक तो उसे भूल जानी चाहिए थी।

“तुम लोगों को कहीं जाना है, तो जाओ।” मैंने कहा, “मैं भी पत्रकार क्लब के सहभोज में चला जाता हूँ। मेरी वजह से तुम लोगों को अपना कार्यक्रम बिगाडऩे की ज़रूरत नहीं।”

“हमारा कोई कार्यक्रम नहीं है।” हरबंस अपने हाथ की किताब रखता हुआ बोला, “इसे साथ के घर में एक पार्टी में जाना है, यह चली जाएगी।”

मुझे ध्यान हो आया कि वैन में आते हुए मैंने सुरजीत के घर के बाहर कुछ सजावट देखी थी और दो-तीन गाडिय़ाँ भी उसके घर के बाहर खड़ी थीं।

“क्या सुरजीत के घर में कोई पार्टी है?”

“शुक्ला की बच्ची की पहली वर्षगाँठ है।” नीलिमा बोली, “मैं कितनी देर से कह रही थी कि हम लोग थोड़ी देर के लिए वहाँ चले चलते हैं, तुम्हारे आने तक लौट आएँगे। शुक्ला ने कितनी बार कहा है कि भापाजी, कम से कम आज के दिन तो उसके यहाँ ज़रूर आ जाएँ। मैं घंटे-भर से तैयार बैठी हूँ, मगर ये साहब हैं कि यहाँ से हिल ही नहीं सकते। कह रहे थे, मैंने अपने दोस्त को वक़्त दे रखा है, इसलिए घर से बाहर नहीं जा सकता। अरुण भी कब से तैयार बैठा है। उसके लिए भी इनका कहना है कि उसे सात बजे सो जाना चाहिए, इसलिए वह भी नहीं जाएगा।”

“मेरा तो ख़याल है कि तुम लोगों को पार्टी में ज़रूर जाना चाहिए।” मैंने कहा, “मैं उतनी देर यहाँ बैठकर कोई किताब देखता हूँ। तुम लोग आध घंटे में उधर से होकर आ जाओ।”

“हा-हा! मैं, और उनके घर जाऊँगा?” हरबंस बोला।

“तुम न जाओ, मगर लडक़े को तो मेरे साथ जाने दो!” नीलिमा जैसे चीखकर बोली।

“तुम इस तरह चिल्लाओ नहीं।” हरबंस ने उसे डाँट दिया।

“तो तुम लडक़े को मेरे साथ क्यों नहीं जाने देते?”

हरबंस ने एक बार मेरी तरफ़ देखा और फिर एक बहुत बड़ा उपकार करने की तरह बोली, “उठ अरुण, चल मौसी के घर चलें। तेरी बीनू तेरा इन्तज़ार कर रही होगी।”

“बॉबी, मैं तला दाऊँ?” इतने छोटे लडक़े में परिस्थिति का इतना ज्ञान मुझे आश्चर्यजनक लगा।

“जाओ बेटे।” हरबंस ने कहा, “और जब नींद आये, तो वापस आ जाना।”

अरुण ने अपने ड्राइंग के कागज़ साथ सँभाल लिये। नीलिमा ने मुझसे कहा, “अच्छा, मैं अभी आ जाऊँगी, तुम चले नहीं जाना।” और अरुण को साथ लिये हुए वहाँ से चली गयी।

“तो?” उनके चले जाने के बाद हरबंस ने कहा।

“तुम बताओ। मैंने तो सोचा था कि आज तुम कम्बल ओढक़र पड़े हुए मिलोगे।”

“क्यों?”

“टेलीफ़ोन पर तुम्हारी आवाज़ से लग रहा था जैसे तुम बीमार हो।”

“हर बीमारी कम्बल ओढक़र पड़े रहनेवाली बीमारी नहीं होती।”

“तो कम से कम मेरा अनुमान तो ठीक ही था।”

उसके चेहरे का भाव कुछ व्यथापूर्ण हो गया। “सूदन, मैं आज तुमसे बहुत ही गम्भीर बात करना चाहता हूँ,” उसने कहा।
 
“मैं भी आज सुनने के लिए ही आया हूँ। आज तुम चाहे मुझे सुबह तक बिठा रखो। सुबह दस बजे मुझे दफ़्तर ज़रूर पहुँचना है।”

“तुम आज खाना यहीं खाना।”

“यह तो मैं सोचकर ही आया था।”

“और देर हो गयी, तो सो भी यहीं रहना।”

“ज़रूरत हुई, तो देखूँगा।”

“हरबंस ने एक बार अपने सिर पर हाथ फेरा और कुरसी पर सीधे होते हुए बाँके को आवाज़ दी। बाँके अपना दुबला-सहमा हुआ चेहरा लिये सामने आ खड़ा हुआ।

“देखो, ये खाना यहीं खाएँगे और इनका बिस्तर भी मेरे पढऩे के कमरे में लगा देना।”

बाँके ने ज़िम्मेवारी सँभालने के ढंग से आँखें हिलायीं और चला गया।

“तो?” बात फिर पहली जगह पर लौट आयी।

“आज तो तुम्हीं को बात करनी है। मैं तो केवल सुनने के लिए आया हूँ।”

“तुम जानते हो, तुम अकेले ही आदमी हो जिससे मैं बात कर सकता हूँ?”

मैंने सिर हिला दिया।

“मैं इस समय अपनी ज़िन्दगी के सबसे बड़े संकट में से गुज़र रहा हूँ।”

खिडक़ी का परदा हवा से हिला और मेरे शरीर में एक और ठंडी सिहरन दौड़ गयी।

“बाइ द वे, मैं इस बीच तुम्हारी मिस श्रीवास्तव से दो-एक बार मिल चुका हूँ।” मैंने कहा।

“अच्छा!” वह थोड़ा अव्यवस्थित हो गया।

“पत्रकार क्लब में किसी ने उससे परिचय कराया था।”

“तुम्हें वह कैसी लगी?”

“मुझे अच्छी लगी। देखने में भी अच्छी है और बातचीत भी बहुत समझदारी के ढंग से करती है!”

“हा-हा!” उसने कन्धे हिला दिये।

“क्यों?”

“वह बेवकूफ़ लडक़ी है। यह तुमने खूब कहा कि वह बातें समझदारी के ढंग से करती है!”

मैं चुप रहकर उसकी आँखों में उतरने का प्रयत्न करने लगा। आख़िर यह आदमी चाहता क्या है? क्या दुनिया में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है जिसकी वह खुले दिल से प्रशंसा कर सके? हरबंस के माथे पर हल्की-सी त्यौरी पड़ गयी थी और वह अपने निचले होंठ को ज़रा-ज़रा काट रहा था।

“मेरी उससे दो बार भेंट हुई है।” मैंने कहा, “हो सकता है तुम उसे ज़्यादा जानते हो।”

“वह बेवकूफ़ भी है और बदतमीज़ भी है।” वह बोला।

“तुम कहते हो, तो मैं मान लेता हूँ, मैं उसे इतना नहीं जानता।”

“मुझे सिर्फ़ उसकी आँखें पसन्द हैं, या उसका होंठ हिलाकर ‘हलो’ कहने का ढंग।”

“मुझे ये दोनों ही चीज़ें ज़्यादा पसन्द नहीं हैं।”

“हा, हा!” वह बोला, “वह अपने आपको समझती बहुत है।”

“यह मैं भी मानता हूँ, मगर तुम उस दिन उसके बारे में क्या बात कर रहे थे...?”

“कुछ नहीं, ऐसे ही।

“फिर भी कुछ बात तो होगी ही...?”

उसने सिर्फ़ कन्धे सिकोडक़र हाथ हिला दिये।

“मुझे तो वह बहुत सीधी लडक़ी लगी। हाँ, मिलनसार ज़रूर है।”

“ठीक है। मैंने तुमसे कहा था कि और भी कई लोग हैं जो उसकी तारीफ़ करते हैं।”

“मैंने और किसी के मुँह से उसके बारे में ऐसी-वैसी बात नहीं सुनी।”

“ख़ैर, तुम इस बात को अब जाने दो।” उसने अपने अन्दर से उठती हुई झुँझलाहट को दबाकर कहा।

उसकी आँखें खिडक़ी के परदे के उस तरफ़ किसी चीज़ को देखने का प्रयत्न कर रही थीं। “मैं तुमसे आज कुछ और ही बात करना चाहता था।” उसने कहा और इस तरह चुप कर गया जैसे कोई चीज़ उसके गले में अटक गयी हो।

मैंने अपना जूता उतार दिया और पैर समेटकर बैठ गया। मैं बहुत हल्के मूड में दफ़्तर से उठकर आया था, मगर हरबंस के भाव को देखते हुए मेरा भी मूड बदलने लगा। उसके चेहरे से लग रहा था जैसे वह अपने अन्दर ही अन्दर कहीं भटक रहा हो।

वह कुछ देर परदे की लकीरों को देखता रहा, फिर मेरी तरफ़ देखकर उसने कहा, “मैं बहुत दिनों से तुम्हारे साथ बैठकर बात करना चाहता था। तुम नहीं जानते कि मैं कैसे वर्षों से अपने अन्दर तिल-तिल करके गल रहा हूँ। मुझे कई बार लगता है कि मेरे लिए एक ही उपाय है और वह यह कि मैं अपने जीवन का अन्त कर दूँ।”

“अब ये फ़िजूल की बातें न करो।” मैंने कहा, “मैं तो तुम्हारा मूड ठीक रखने के लिए ही इधर-उधर की बातें कर रहा था। तुम्हारे मन में जो भी बात हो, तुम खुलकर मुझसे कहो। मैं यह तो नहीं कहता कि मैं तुम्हें कुछ राय दे सकूँगा, या तुम्हारी कुछ सहायता कर सकूँगा, मगर फिर भी...।”

“देखो सूदन।” वह अपनी तर हुई आँखों को झपकता हुआ बोला, “मुझे लगता है कि मेरे ऊपर एक तरह का अभिशाप है। मैं वर्षों से एक भी नया मित्र नहीं बना सका। लन्दन में इतने साल रहा हूँ और यहाँ आये भी इतने दिन हो गये हैं, मगर एक भी नये व्यक्ति को मैं अपना मित्र तो क्या, अच्छा परिचित भी नहीं बना सका। मुझे लगता है जैसे मैं दुनिया से बिल्कुल कट गया हूँ और अपने में बिल्कुल अकेला हूँ। हर नया आदमी मुझे बिल्कुल अपरिचित दुनिया का आदमी लगता है और मैं उससे अपने अन्दर की कोई चीज़ नहीं बाँट सकता। पुराने लोगों में तुम्हीं एक हो, और इसीलिए मैं तुमसे मिलने की इतनी उत्सुकता से प्रतीक्षा करता हूँ। तुम अकेले आदमी हो जिससे मिलने पर उन दिनों मुझे यह नहीं लगा था कि तुम मुझे मेरी वजह से न मिलकर किसी और की वजह से मिलते हो। इसीलिए शायद उन दिनों भी मैं तुमसे जितना तुम दे सकते थे, उससे ज़्यादा की आशा किया करता था। मैं अपना मन तब भी तुम्हारे सामने पूरी तरह खोलकर रखना चाहता था, मगर अपने स्वभाव के सन्देह और शंका के कारण ऐसा नहीं कर सका। हो सकता है तुम तब मुझे बाहर जाने से रोक देते और मेरे लिए परिस्थिति उतनी ख़राब न होती, जितनी कि अब हो गयी है।”

“मेरे साथ खुद भी यही बात थी।” मैंने कहा, “मैं भी उन दिनों अपने दिल की बात पूरी खोलकर तुम्हारे सामने नहीं रख सका। अगर ऐसा होता, तो शायद...।”

“आदमी एक ख़ास उम्र तक ही किसी नये आदमी को अपना मित्र बना सकता है।” वह मेरी बात की तरफ़ ध्यान न देकर अपनी ही धुन में बोला, “और मेरे लिए वह उम्र यहाँ से जाने से पहले ही बीत चुकी थी। मैं नहीं जानता था कि मैं उस उम्र में पहुँच चुका हूँ जहाँ आदमी चाहकर भी नये सिरे से ज़िन्दगी शुरू नहीं कर सकता। अगर तब मैं यह जानता, तो कभी बाहर न जाता। विदेश में बिताये हुए छ: साल मेरे लिए कितने दुख के और कितने कष्ट के रहे हैं, यह शायद मैं तुम्हें ठीक से नहीं बता सकता। अगर समय को लौटाया जा सकता, तो मैं फिर उन्हीं दिनों में लौट जाना पसन्द करता, जब मैंने सब कुछ छोड़-छाडक़र यहाँ से भाग जाने का निश्चय नहीं किया था।”

मैंने एक बार अपनी हथेलियों को मल लिया, दीवान पर रखा हुआ एक गद्दा पीछे से उठाकर अपनी गोद में रख लिया और उस पर कुहनियाँ टिकाकर अपना चेहरा हथेलियों पर रख लिया। मुझे फिर उसके नीलिमा के नाम लिखे हुए पत्रों की याद आ रही थी, मगर मैंने उनका ज़िक्र करना उचित नहीं समझा। जब-जब मुझे उन पत्रों की याद आती थी, तब-तब मेरे लिए उसके व्यक्तित्व का रूप बिल्कुल बदल जाता था। तब वह मेरे लिए उपहास और व्यंग्य का पात्र न रहकर सहानुभूति और सम्मान का पात्र बन जाता था। तब मेरा मन उसके चेहरे के साथ एक अस्थिर आकांक्षा और एक अप्राप्त विज़न का सम्बन्ध जोड़ देता था और उसके उस लटके हुए चेहरे में भी मुझे कुछ असाधारणता नज़र आने लगती थी। उसकी फ़ाइल के अधूरे और उलझे हुए पन्नों में भी तब एक सार्थकता आ जाती थी और मैं सोचने लगता था कि उन पन्नों के रिक्त कोष्ठ क्या किसी भी तरह भरे नहीं जा सकते!

“ख़ैर, गुज़रे हुए दिनों की बात करना तो बेकार है।” मैंने कहा, “मगर तुम आज जिस मन:स्थिति में हो, उसे मैं ज़रूर समझना चाहता हूँ। तुम इन दिनों इस तरह थके और निढाल से लगते हो जैसे आदमी ज़िन्दगी पर अपनी पकड़ ही छोड़ बैठा हो।”

उसने अपने सूखते हुए होंठों को ज़बान से गीला किया और अपने दोनों हाथों की उँगलियाँ उलझाकर कुछ देर उन्हें देखता रहा। वह शायद मन ही मन कुछ निश्चित करना चाह रहा था। आख़िर उसके उलझे हुए हाथ अलग-अलग हो गये।

“मैं तुम्हें पूरी बात शुरू से बताना चाहता हूँ।” उसने कहा, “हो सकता है तुम मुझे कोई ऐसा सुझाव दे सको, जिससे मैं इस दलदल से बाहर निकल सकूँ। नहीं, मुझे तो लगता है कि मैं हमेशा के लिए गुम हो गया हूँ और मेरा अतीत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ इस दलदल में खो गया है। मैं इससे बाहर निकलने की जितनी चेष्टा करता हूँ, उतना ही इसमें और धँसता जाता हूँ।”

उसने उठकर कमरे की बीच की बत्ती बन्द कर दी और कोने का टेबललैम्प जला दिया। इससे कमरे का वातावरण कुछ उदास और कुछ रहस्यमय-सा हो गया। परदे के पीछे से खिडक़ी का जितना भाग नंगा था, उसे भी उसने अच्छी तरह ढक दिया। फिर आकर उसने तिपाई पर टाँग फैला लीं और सिगरेट सुलगाने के लिए दियासलाई जलाकर क्षण-भर उसे देखता रहा।

“तुम जानते हो कि मैं इकत्तीस जनवरी को यहाँ से गया था...।” उसने सिगरेट सुलगा ली और दियासलाई बुझा दी, “मैं उन्नीस फ़रवरी को लन्दन पहुँचा था।”

“यह मैं जानता हूँ, नीलिमा ने मुझे बताया था।”

“वैसे तो लन्दन पहुँचने के साथ ही मेरे मन में एक संघर्ष आरम्भ हो गया था, मगर ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, वह संघर्ष धीरे-धीरे बढ़ता गया। मगर नीलिमा के वहाँ आने तक मैं फिर भी किसी तरह अपने को सँभाले रहा। मगर उसके आने के बाद...।” और वह रुक गया। लैम्प की रोशनी उसके चेहरे पर नहीं पड़ रही थी। उसने चुप रहकर दो-तीन लम्बे-लम्बे कश खींचे और कहा, “उसके बाद जो कुछ हुआ, उसने मेरे जीवन में उजाले की कोई किरण नहीं रहने दी। मैं तब से अब तक निरन्तर अँधेरे में भटक रहा हूँ जहाँ मुझे किसी भी तरफ़ उजाले का कोई मार्ग नज़र नहीं आता। मुझे लगता है जैसे मैं एक काल-कोठरी में बन्द हूँ और जीवन-भर मुझे उस काल-कोठरी में बन्द रहकर हाथ-पैर पटकते जाना है।”

मैंने पीछे से एक और गद्दा उठाकर पहले के गद्दे पर रख लिया और अच्छी तरह अपनी कुहनियों पर झुक गया। वह आहत दृष्टि से सामने की तरफ़ देखता हुआ बात करता रहा। टेबल-लैम्प के धूपछाँही उजाले में मेरे सामने एक अपरिचित देश के धुआँरे-से चित्र बनने लगे—सपने के चित्रों की तरह, जिनके अमूर्त यथार्थ में मन अपने-आप रंग और आकार भरने लगता है—वास्तविक यथार्थ से भिन्न, परन्तु मन की संगति में उतने ही यथार्थ। वह उस घर की बात करने लगा जिस घर में वे लोग लन्दन में रहते थे। मेरे मन में एक ऊँची पहाड़ी का चित्र बनने लगा जिसकी घुमावदार पगडंडियाँ शिखर पर जाकर एक छोटे-से घर में समाप्त होती थीं। जब कोहरा बहुत घना होता था, तो नीचे बस की सडक़ से वह घर दिखायी नहीं देता था। घर की मालकिन नीचे के दो कमरों में रहती थी और ऊपर के दो कमरे उसने इन लोगों को दे रखे थे। ये लोग अपना खाना अपने कमरे में ही बनाते थे। जब तडक़ते हुए प्याज़ की गन्ध ऊपर के कमरे से नीचे जाती थी, तो मकान-मालकिन अपने भारी कूल्हों को किसी तरह समेटती हुई ऊपर आकर इनका दरवाज़ा एक उँगली से खटखटाती थी। हर रोज़ वह इस गन्ध पर एतराज़ करती थी, हर रोज़ ये उसे वचन देते थे कि अब वहाँ प्याज़ नहीं तडक़ेंगे, मगर तीसरा दिन गुज़रते-ग़ज़रते वे फिर उबले हुए अँग्रेज़ी खाने से उकता जाते थे और सोचते थे कि चलो एक बार और मकान-मालकिन की बात सुन लें, फिर आइन्दा तडक़े हुए प्याज़वाला हिन्दुस्तानी खाना नहीं बनाएँगे। उनकी आर्थिक स्थिति काफ़ी ख़राब थी, क्योंकि हरबंस ने तब तक हाई कमीशन की नौकरी छोड़ दी थी और वे उस थोड़ी-सी आय पर ही अपना गुज़ारा करते थे जो उन्हें बी.बी.सी. के कार्यक्रमों से नीलिमा की बेबी-सिटिंग से होती थी। एक बार हाई कमीशन के किसी उत्सव में नृत्य का प्रदर्शन करने के बाद नीलिमा को बी.बी.सी. पर इक्का-दुक्का प्रोग्राम मिलने लगे थे। हरबंस को भी कभी-कभी भारतीय कार्यक्रम में वार्ताओं के लिए बुला लिया जाता था। नीलिमा बेबी-सिटिंग से बहुत कुढ़ती थी, मगर उसके सिवा कोई चारा भी नहीं था। हरबंस उन दिनों बहुत गम्भीर होकर अपने थीसिस के काम में जुटा था। नीलिमा जिस समय काम पर जाती थी, वह यूनिवर्सिटी चला जाता था। शाम को दोनों ही काम से थके हुए लौटते थे और रोज़ किसी न किसी वजह से उनकी लड़ाई हो जाती थी। लड़ाई की वजह से अक्सर तीन वक़्त में उनका एक वक़्त का खाना गोल हो जाता था। कोई-कोई दिन तो डबलरोटी के गिने हुए टुकड़ों और गिने हुए सिगरेटों पर ही निकलता था। स्याह कॉफ़ी भूख मारकर रहने में सहायता करती थी। बचत के ख़याल से वे यहाँ अपने मित्रों के ज़्यादा आने-जाने से बचते थे, मगर उनके कई मित्र अक्सर उनके यहाँ हिन्दुस्तानी खाने की माँग करते हुए आ जाते थे। मित्रों की आवभगत वे ठीक से करते, मगर उनके जाते ही फिर लड़ाई हो जाती। हरबंस गीले कपड़ों की गाँठ पीठ पर लादे हुए उन्हें लांड्री में सुखवाने ले जाता था। वहाँ दो-दो घंटे क्यू में खड़े रहने के बाद उसकी बारी आती, तो कपड़े सुखवाकर फिर गाँठ कन्धे पर लादे आधा मील चलकर वह पहाड़ी के नीचे पहुँचता। वहाँ रुककर एक सिगरेट पीता और फिर चढ़ाई आरम्भ करता। घर पहुँचकर पता चलता कि नीलिमा ने गुस्से में कॉफ़ी भी नहीं बनायी। वह गठरी रख देता और खिडक़ी के शीशों पर जमे हुए कोहरे को देखता हुआ बैठा रहता। कभी गैस सुलगाकर खुद ही कॉफ़ी बनाने लगता।
 
“देखो, मैं कहती हूँ मैं यहाँ से वापस जा रही हूँ।” नीलिमा ताव में उससे कहती, “मुझसे इस तरह की ज़िन्दगी नहीं जी जाती। क्या यही ज़िन्दगी जीने के लिए तुमने मुझे यहाँ बुलाया था? यही तुम्हारा वह ‘विज़न’ है जिसकी तुम लम्बी-चौड़ी बातें लिखा करते थे?” हरबंस के अन्दर से अवसाद और कटुता की न जाने कितनी-कितनी तहें उसकी आँखों में उफन आतीं।

“मैं भी तो तुम्हारे साथ यही ज़िन्दगी जी रहा हूँ।” वह कहता।

“मगर मेरी वजह से तो नहीं जी रहे। मैं यह ज़िन्दगी तुम्हारी वजह से जी रही हूँ। मैं इसीलिए पहले साल-भर वहाँ से नहीं आयी थी। मैं जानती थी कि यहाँ हम लोगों की क्या दुर्गति होगी। मगर पहले तो तुमने झूठे विश्वास देकर मुझे यहाँ बुला लिया और अब मुझसे बेबी-सिटिंग कराते हो और ख़ुद खिडक़ी के पास बैठे आसमान को घूरते रहते हो! मैं ऐसी ज़िन्दगी बरदाश्त नहीं कर सकती।”

“नहीं कर सकती, तो जैसा तुम्हारे मन में आये वैसा कर लो।” वह कहता।

“अगर मुझसे नहीं बरदाश्त होगा तो मैं ज़रूर जो मेरे मन में आएगा, वह करूँगी। तब बैठकर रोना नहीं, और न ही मुझे दोष देना।”

“मैं कौन होता हूँ तुम्हें दोष देनेवाला! मैं तुम्हारा कुछ लगता थोड़े ही हूँ!”

“मगर मैं यह जानना चाहती हूँ कि तुमने मुझे वह सब लिख-लिखकर बुलाया क्यों था? क्या तुम यह पहले ही नहीं जानते थे कि यहाँ यह हालत होगी?”

“मैं समझता था कि तुम इस बीच काफ़ी सँभल गयी होगी, और यहाँ आकर मेरे लिए वही सिर-दर्द पैदा नहीं करोगी।”

“हाँ, मैं ही तो तुम्हारे लिए सिर-दर्द पैदा कर रही हूँ। एक तो तुम्हारे लिए कमाकर लाती हूँ, दूसरे घर में नौकरानी का सारा काम करती हूँ; उस पर भी तुम्हें यह कहने का हौसला पड़ता है कि मैं ही तुम्हारे लिए सिर-दर्द पैदा कर रही हूँ।”

“तुम्हें घर का काम करने में शरम आती है? यहाँ सब घरों मं औरतें अपने हाथ से अपना काम करती हैं।”

“और उनके ख़ाविन्द बैठकर सिगरेट पीते हैं और थीसिस लिखते हैं और वे जाकर उनके लिए बेबी-सिटिंग करती हैं!”

“हा-हा! तुम मेरे लिए कमाई करती हो? मैं जो सूखी डबलरोटी खाता हूँ, उसके पैसे मैं बी.बी.सी. से ले आता हूँ।”

“हाँ, हाँ, क्यों नहीं? तुम्हीं तो सब लाते हो? कोई दूसरा होता, तो उसे यह कहते शरम आती।”

“मैं कहता हूँ अपनी ज़बान ज़्यादा मत खोलो, नहीं तो मुझसे थप्पड़ खा बैठोगी।”

“क्या?” नीलिमा अपने हाथ की चीज़ पटककर खड़ी हो जाती, “तुम मुझे हाथ लगाकर तो देखो। मैं फिर कभी तुम्हारी सूरत भी देख जाऊँ तो...!”

“मैं कह रहा हूँ कि अब तुम मेरे पास से चली जाओ और मुझे चुपचाप बैठा रहने दो।”

“तुम चुपचाप बैठे रहने के सिवा और कर भी क्या सकते हो?”

“अगर चाहो, तो मैं वह भी तुम्हें बता सकता हूँ।”

“हाँ-हाँ, बताओ, क्या बता सकते हो?”

“मैं कहता हूँ इस वक़्त अपनी ज़बान बन्द रखो और यहाँ से चली जाओ।”

“ज़बान बन्द रखो! मुझे यहाँ परदेश में बुलाकर मेरी यह दुर्दशा कर रहे हो!”

“दुनिया में अगर सबसे मूर्ख कोई स्त्री है, तो वह तुम हो।”

“और तुम क्या हो? दुनिया के सबसे समझदार आदमी न?”

“मैं भी दुनिया का सबसे मूर्ख आदमी हूँ। न होता, तो कभी तुमसे ब्याह न करता।”

“तो अब मुझे क्यों नहीं छोड़ देते? मैं आज ही तुमसे अलग होने को तैयार हूँ।”

“मैं कह रहा हूँ इस वक़्त यहाँ से चली जाओ।”

“हाँ, मैं चली जाऊँगी। और इस तरह जाऊँगी कि तुम बस देखते रहोगे...।”

“हाँ, हाँ, मैं देखता रहूँगा। अब तुम यहाँ से साथ के कमरे में चली जाओ।”

वह गुस्से में कोई न कोई चीज़ पटककर तोड़ देती और पैर पटकती हुई साथ के कमरे में चली जाती। वह बैठा देखता रहता कि शीशों पर लगा हुआ कोहरा कैसे जमकर बरफ होता और नीचे झड़ जाता है। उसे अफ़सोस होता कि जब वह एक बार उस जीवन से हताश होकर घर से चला आया था, तो उसने फिर उस स्त्री को वहाँ क्यों बुला लिया! क्या वह पहले ही नहीं जानता था कि उसके यहाँ आने पर वही कुछ होगा? मगर फिर भी उसने कितना ज़ोर देकर उसे बुलाया था और कितनी व्याकुलता के साथ उसके आने की प्रतीक्षा की थी! नीलिमा ने अपने दो-एक पत्रों में संकेत-भर किया था कि उसे सुरजीत के व्यवहार से कुछ शिकायत है और उसे लगता है जैसे वह उसे बातों में लाकर उसके अकेलेपन का अनुचित लाभ उठाना चाहता हो। “मुझे मैसूर जाने से पहले भी ऐसा आभास था, और अब तो वह आभास और भी स्पष्ट हो गया है।” उसने लिखा था, “तुमने और शुक्ला ने उस आदमी को जितना सिर पर उठा रखा था, मुझे वह उतना ही ओछा और छोटा प्रतीत होता है। वह समझता है कि कुछ उपहार देकर और कुछ चिकनी-चुपड़ी बातें करके वह किसी भी लडक़ी को फुसला सकता है।” तब नीमिला के पत्रों को पढ़ते हुए उसका शरीर गुस्से के मारे ऐंठने लगता था और उसका मन होता था कि या तो वह स्वयं उडक़र दिल्ली पहुँच जाए, या जैसे भी हो शुक्ला और नीलिमा को अपने पास बुला ले। मगर क्योंकि शुक्ला का आना असम्भव था, इसलिए उसने नीलिमा को लिखा था कि वह आते हुए कोई न कोई ऐसी व्यवस्था कर आये, जिससे उसके पीछे सुरजीत का घर में आना-जाना बन्द हो जाये। नीलिमा ने आकर बताया था कि वह बीजी से कह आयी है कि वे शुक्ला को अकेली सुरजीत के साथ घूमने-फिरने के लिए न जाने दिया करें। इससे उसे कुछ हद तक सन्तोष हो गया था, मगर...।

वह बैठा रहता और दिन में कोहरे को हल्का उजला और रात को गहरा काला होते देखता रहता। उसके मन में भी कोहरे की ही तरह कभी हल्का-सा उजाला फैलता, मगर उसके फैलते-फैलते ही कोहरा फिर घना और अँधेरा हो जाता।

मेरी आँखों के सामने लन्दन की खिडक़ी का वह शीशा और उसके सामने बैठा हुआ वह सिगरेट फूँकता हुआ व्यक्ति—यह चित्र इतना स्पष्ट बन रहा था कि मैं डिफेंस कॉलोनी के उस कमरे के वातावरण को लगभग भूल ही गया था और यह भी भूल गया था कि वे घटनाएँ कुछ बरस पहले की हैं। मैं देख रहा था कि वह आदमी उसी तरह उदास बैठा है और उसी तरह कोहरा खिड़कियों से झड़ रहा है। नीलिमा बाहर से रेनकोट में भीगती हुई आती है, आकर अपना रेनकोट उतार देती है और उससे कहती है कि हाई कमीशन के कार्यालय में उसकी प्रसिद्ध नर्तक उमादत्त से भेंट हुई है। “उमादत्त की पार्टनर उर्वशी उसे छोडक़र भारत चली गयी है और वह चाहता है कि मैं उसके साथ उर्वशी की जगह यूरोप के दौरे पर चलूँ।”

“मगर तुम नहीं जा रही हो। तुम कैसे जा सकती हो?” हरबंस उसकी तरफ़ गम्भीर दृष्टि से देखता हुआ कहता है।

“मैं क्यों नहीं जा सकती?” नीलिमा अपनी बाँहें उलझाये हुए तनी हुई-सी खड़ी रहती है। “कुल ढाई-तीन सप्ताह की तो बात है। इतने दिन मैं लन्दन की ऊब से भी छुटकारा पा लूँगी और मुझे पैसे भी इतने मिल जाएँगे जितने लन्दन में दो महीने की बेबी-सिटिंग से नहीं मिलेंगे। वैसे भी मेरे लिए यह बहुत अच्छा आरम्भ है। मैं यह अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहती।”

हरबंस कुछ देर सूनी आँखों से उसकी तरफ़ देखता रहता है और फिर कहता है, “मगर मैं उतने दिन यहाँ बिल्कुल अकेला नहीं रह जाऊँगा...?”

“कुछ दिन अकेले रहना तुम्हारे लिए भी अच्छा नहीं होगा? तुम बहुत दिनों से हर रोज़ कहते भी हो कि कुछ दिनों के लिए मैं तुम्हारे पास से चली जाऊँ, तो तुम अकेले रहकर अपने थीसिस का काम ज़्यादा अच्छी तरह कर सकते हो।”

“मगर मैं नहीं चाहता कि तुम उमादत्त के या किसी और के ट्रुप के साथ इस तरह बाहर जाओ। मुझे यह अच्छा नहीं लगेगा।”

“हाँ, तुम्हें क्यों अच्छा लगेगा!” नीलिमा की आवाज़ सहसा तीखी हो जाती है, “तुम्हें तो यही अच्छा लगेगा कि मैं यहाँ रहकर दूसरों के बच्चों के मुँह और नाक तौलिये से पोंछती रहूँ। मैं इस ज़िन्दगी से बेज़ार आ चुकी हूँ। मैं एक दिन भी अब यह काम नहीं करूँगी। मैंने उमादत्त से कह दिया है कि मैं उसके साथ चलूँगी, और अब मैं अपनी बात वापस नहीं ले सकती।”

“देखो नीलिमा?” वह अपनी कुरसी से उठ खड़ा होता है, “तुम नहीं जानतीं कि तुम किस ज़िन्दगी में पैर रख रही हो। मैंने तुम्हारे लिए इस तरह की ज़िन्दगी की बात आज तक नहीं सोची।”

“मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि मैं किस तरह की ज़िन्दगी में पैर रख रही हूँ। और तुमने क्या मेरे लिए किसी भी तरह की ज़िन्दगी की बात आज तक सोची है? मैं दो साल कथक और छ: महीने भरतनाट्यम का अभ्यास इसलिए नहीं करती रही कि मैं अँग्रेज़-बच्चों को जाँघिये और निक्कर पहनाया करूँ। अगर तुम मुझे जाने से ज़बरदस्ती रोकोगे, तो मैं तुमसे कहे देती हूँ कि मैं वैसे ही चली जाऊँगी और कभी तुम्हारे पास लौटकर नहीं आऊँगी।”

वह चुपचाप उसकी तरफ़ देखता रहता है और अपना थूक निगलकर बैठ जाता है।

“तब जो तुम्हारे मन में आता हो, वह करो। तुम्हें किसी चीज़ से नहीं रोकूँगा।

“अच्छा भी यही है कि तुम मुझे न रोको, क्योंकि अब तुम्हारे रोकने से मैं रुकूँगी नहीं।”

“तो ठीक है। मैं इस विषय में अब और कुछ कहना-सुनना नहीं चाहता।”

“मैं भी यही चाहती हूँ कि इस विषय में अब और कुछ कहा-सुना न जाए।”

“तुम कब जा रही हो?”

“परसों।”

“और आओगी कब?”

“यह अभी कह नहीं सकती। उमादत्त ने कहा है कि हमें कुल अठारह-बीस दिन ही लगेंगे। मगर दो-चार दिन ज़्यादा भी लग सकते हैं।”

“मुझे यह पता चलता रहेगा कि तुम कब कहाँ हो?”

“मैं तुम्हें हर दूसरे-तीसरे दिन पत्र लिखती रहूँगी।”

“देखो, एक बार फिर सोच लो। तुम्हें इस तरह की ज़िन्दगी अपनाकर बाद में पछतावा भी हो सकता है।”

“मैं कह चुकी हूँ कि इस वक़्त हमें और कुछ कहना-सुनना नहीं चाहिए। मैं उमादत्त से वायदा कर चुकी हूँ।”

“अच्छा, तुम मुझे एक वचन दे सकती हो?”

“बताओ।”

“तुम मुझे यह वचन दे सकती हो कि इस ट्रिप के बाद दूसरे ट्रिप पर तुम उसके साथ जाने के लिए नहीं कहोगी?”

नीलिमा पल-भर सोचती रहती है। फिर आँखें झपककर कहती है, “अच्छा, नहीं कहूँगी।”

“देखो, तुम मुझे वचन दे रही हो!”

“मैंने कह दिया है कि नहीं कहूँगी।”

“यह बात तुम्हें भूल तो नहीं जाएगी?”

“तुम अब सवाल पूछना बन्द नहीं करोगे?”

“तो चलो, मैं खुद तुम्हारे साथ चलकर उमादत्त से बात कर लेता हूँ। उसने तुम्हें क्या देने को कहा है?”

“दो गिनी रोज़।”

“तुम दो गिनी रोज़ के लिए...?”

“देखो, तुम फिर बात शुरू कर रहे हो। मुझसे तो तुम इतने-इतने वचन ले रहे हो, खुद अपनी कही हुई बात पर क़ायम नहीं रह सकते?”

“ख़ैर, इस बार तुम कह आयी हो तो चली जाओ। मगर मैं दूसरी बार तुम्हें नहीं जाने दूँगा।”

वह उसके पास से हट जाती है और जाकर गैस सुलगा देती है।

“देखो नीलिमा,” वह पीछे से जाकर उसे बाँहों में ले लेता है, “तुम मुझे ग़लत मत समझो। मैं तुम्हारे नृत्य के प्रदर्शन के ख़िलाफ़ नहीं हूँ। मगर मैं नहीं चाहता कि तुम्हारा इस तरह के लोगों के साथ ज़्यादा आना-जाना हो। मैं चाहता हूँ कि तुम इस कला का अच्छी तरह अभ्यास करके फिर अपना ही प्रदर्शन करो। मगर इस तरह व्यावसायिक ढंग से नहीं। यह ढंग भाँड़ों और बहुरूपियों का है। जहाँ तक मैं सोच सकता हूँ तुम्हें अभी कई बरस और अभ्यास करना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि जब भी तुम्हारे नृत्य का प्रदर्शन हो, तो ऐसे हो कि मैं उस पर गर्व कर सकूँ। अभी तुमने जितना सीखा है, वह बहुत थोड़ा है और मैं कह सकता हूँ कि यह तुम्हारा आरम्भ ही है। मैं यहीं बस जाना चाहता था, मगर तुम्हारी वजह से मैं थीसिस पूरा करके लौट भी चलूँगा। मुझसे सम्भव हुआ तो मैं जीवन में कभी तुम्हें इतने साधन जुटा दूँगा कि तुम निश्चिन्त होकर इस कला का अभ्यास कर सको। तुम अपने में जितना कुछ सीखकर सन्तुष्ट हो, मैं उतने से सन्तुष्ट नहीं हूँ। मैं इसके अतिरिक्त कुछ चाहता हूँ—वह कुछ जो दूसरों जैसा न होकर उनसे बहुत भिन्न हो।”

“मैं इतना जानती हूँ कि तुम कभी मेरी किसी चीज़ से सन्तुष्ट नहीं हो सकते।”

“तुम मुझे ग़लत समझती हो, सवि! हो सकता है कोई दिन ऐसा आये जब जो मैं चाहता हूँ, वह सम्भव हो सके। तब तुम मेरी बात मान जाओगी।”

“मैं जानती हूँ वह दिन कभी नहीं आएगा।”

“अगर हम कोशिश करें, तो क्यों नहीं आएगा? हम उसे लाने का प्रयत्न तो कर ही सकते हैं। मगर सबसे पहले मुझे अपना काम पूरा करना है। तुम इस समय जो कुछ भी करती हो, वह यही सोचकर करो कि अभी तुम्हें यहाँ रहकर मेरे काम में मेरी सहायता करनी है।”

“मैं इससे ज़्यादा और क्या सहायता कर सकती हूँ?” नीलिमा का शरीर उसकी बाँहों में शिथिल नहीं होता, कसा रहता है, “मगर तुम कभी मेरे किये को समझोगे नहीं।”

“तुम यह कहकर मेरे साथ ज़्यादती कर रही हो।”

“हो सकता है मैं ज़्यादती कर रही हूँ, मगर मैं कुछ भी करूँ, तुम्हारे साथ हमेशा ज़्यादती ही होती है।”

दो दिन बाद वह बोट ट्रेन से चली जाती है। वह उसे छोडक़र घर लौटता है। ऊपर जाने से पहले उसकी मकान-मालकिन से भेंट हो जाती है।

“तुम्हारी पत्नी आज कहीं बाहर गयी है?” वह पूछती है, “वह कह रही थी कि वह मैड्रिड और पैरिस जा रही है।”
 
“हाँ,” हरबंस अनमना-सा उत्तर देता है, “वह अपने नृत्य के प्रदर्शन के लिए वहाँ गयी है।”

“नृत्य के प्रदर्शन के लिए?” वह कुछ आश्चर्य के साथ कहती है, “यह उसने मुझे नहीं बताया। तुम उसके साथ नहीं गये!”

“मैं अपने काम की वजह से नहीं जा सका।” वह ज़ीने की तरफ़ देखता है और गिनता है कितनी सीढिय़ाँ पार करके उसे अपने कमरे में पहुँचना है।

“वह अच्छी डांसर है?” मकान-मालकिन कुछ अविश्वास के साथ पूछती है।

“वह भारतीय नृत्य की बहुत अच्छी कलाकार है।” वह अपनी झुँझलाहट को गर्व का पुट देकर कहता है।

“वह कितने दिन बाहर रहेगी?”

“लगभग बीस दिन। ज़्यादा से ज़्यादा इक्कीस दिन।”

“तुम इन दिनों बहुत अकेले महसूस करोगे।”

“मैं इन दिनों काम करूँगा।”

“मगर देखो, मैं तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ...।”

“हाँ-हाँ, कहो।”

“मुझसे प्याज़ की गन्ध बिल्कुल बरदाश्त नहीं होती। मेरा लडक़ा भी उससे बहुत चिढ़ता है। मैं तुमसे फिर अनुरोध के साथ कहती हूँ कि अब तुम अपने कमरे में प्याज़ न तडक़ा करो।”

“अब तुम्हें शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।”

“मैं यह नहीं कहती कि हिन्दुस्तानी खाना बुरा होता है, मगर...।”

“कम से कम बीस दिन तो तुम्हें मौका नहीं ही मिलेगा।”

“बीस दिन ही नहीं, उसके बाद भी नहीं मिलना चाहिए। मैं वह गन्ध बिल्कुल बरदाश्त नहीं कर सकती।”

वह ज़ीना पार करके अपने कमरे में आता है। गीले कपड़ों की गाँठ पड़ी है। वे कपड़े उसे सुखवाने के लिए ले जाने हैं। नीलिमा जाने की तैयारी में कई चीज़ें बिखरी छोड़ गयी है। वह उन्हें समेटने लगता है। उसे भूख लगी है। वह बासी डबलरोटी निकालकर उसे चबाने लगता है। यह निश्चित है कि बीस दिन वह प्याज़ नहीं तडक़ेगा। बस भूरी डबलरोटी खाएगा और स्याह कॉफी पिएगा...।

“बॉबी, मैं बिनी को उछके घल छे छाथ ले आया हूँ,” सहसा दरवाज़े का परदा हटाकर अरुण कमरे में आ गया। उसके आते ही धूपछाँही उजाले से अपरिचित देश का वातावरण अदृश्य हो गया। मैंने गद्दे कुहनियों के नीचे से निकालकर पीछे रख लिये। घड़ी में कुल साढ़े सात बजे थे। कुल एक-डेढ़ घंटे हम लोग ज़िन्दगी का कितना लम्बा सफ़र तय कर आये थे! कई बार दिन और महीने भी खाली-खाली से बीतते हैं और कई बार कुछ थोड़े-से क्षण ही बहुत भरपूर हो जाते हैं।

अरुण के पीछे-पीछे शुक्ला की आया उसकी बच्ची को उठाये हुए आ गयी। आया अपने नये कपड़ों में बहुत ख़ुश लग रही थी। बच्ची इस तरह घबरायी हुई थी जैसे उसके साथ कोई अनहोनी घटना घटित हो रही हो।

“बॉबी, आज इछका जमनदिन है,” अरुण बोला। मैं इछको तुमछे किछी कलाने के लिए आया दूँ। छुक्का मौछी कैती थी जाकल इछको बॉबी छे किछी कला लाओ।”

हरबंस अपनी कुरसी से उठ खड़ा हुआ। “मैं अभी आ रहा हूँ।” उसने चलते-चलते कहा, “मुझे पेट में कुछ भारीपन महसूस हो रहा है।”

“मगर तुम बच्ची को ‘किस’ तो करते जाओ।” मैंने कहा।

“हाह!” उसने कहा और बिना बच्ची की तरफ़ देखे कमरे से चला गया।

“बॉबी!” अरुण अपने उद्देश्य में असफल होकर कुछ रुआँसा हो गया।

“मैं अभी आ रहा हूँ, बेटे।” हरबंस दूसरे कमरे से बोला, “तुम जाकर अपनी ममी को बुला लाओ।”

अरुण इस दूसरे उत्तरदायित्व की वजह से पहले उत्तरदायित्व को भूल गया और तुरन्त वापस चल पड़ा। “मैं अबी ममी को लेकल आता हूँ।” उसने कहा और लगभग दौड़ता हुआ अहाते से बाहर निकल गया। आया पल-भर भौंचक्की-सी खड़ी रही। मैंने उठकर बच्ची के गालों को सहला दिया और उसे चूम लिया। आया उसके घबराये हुए चेहरे को अपने कन्धे से सटाये हुए चली गयी।

मैंने उठकर बीच की बत्ती जला दी और कमरे की चीज़ों को देखने लगा। कमरा अच्छा सजा हुआ था, मगर न जाने क्यों यह आभास होता था कि वह जगह ज़रूरत से ज़्यादा भरी हुई है, कि उसे अपनी सामथ्र्य से ज़्यादा भार उठाना पड़ रहा है। दीवान और कुरसियों के अलावा वहाँ किताबों के दो शेल्फ़ भी रखे थे। उनमें रखी हुई किताबों को देखकर मैं सोचने लगा कि उन किताबों का चुनाव ज़्यादा मेहनत के साथ किया गया है, या उन्हें ढंग से रखने में ज़्यादा मेहनत की गयी है। किताबों के बीच-बीच में तरह-तरह के फूलदान और चीनी तथा कपड़े की गुडिय़ाएँ रखी थीं। कुछ ऐसी ही सियामी गुडिय़ाएँ और एक बड़ी-सी सियामी वॉलप्लेट एक दीवार पर लगी थीं। दूसरी दीवार पर एक हरिण की खाल की टेपेस्ट्री लगी थी जिसके ऊपर वानगो के प्रसिद्ध चित्र ‘ड्रॉब्रिज’ की छपी हुई, चित्र के वास्तविक आकार की प्रतिलिपि लगायी गयी थी। दो खुली अलमारियों में न जाने कितनी तरह के क्यूरियो सजाकर रखे हुए थे। हर चीज़ के चुनाव और व्यवस्था में एक सुरुचि का परिचय मिलता था, परन्तु यह छाप मन पर बहुत गहरी पड़ती थी कि उस कमरे में उतना कुछ नहीं होना चाहिए था। उससे मन में एक अव्यक्त रुकावट का-सा अनुभव होता था, एक ऐसे घेरे का जो खुलकर साँस लेने में बाधक हो। मन होता था कि कमरे में थोड़ी खुली जगह और होनी चाहिए—ऐसी जगह जहाँ कुछ भी न हो, जिसे उपयोग में लाने की कोई विधि न सोची गयी हो। कमरे में नज़र दौड़ाते हुए मुझे यूँ लगने लगा जैसे मैं एक घर की बैठक में न होकर किसी विचित्र वस्तुओं के संकलनकर्ता के गोदाम में या किसी आर्ट डीलर के शोरूम में खड़ा हूँ। उस वातावरण में व्यावसायिकता का आभास तो नहीं होता था, मगर वहाँ की हर चीज़ में एक ऐसी अतिरिक्तता अवश्य थी कि किसी भी चीज़ के वहाँ से हटा दिये जाने पर मन को कुछ खुलेपन का ही अनुभव होता।

मैं सब चीज़ों पर अनिश्चित-सी नज़र डालने के बाद पुस्तकों के एक शेल्फ़ के पास चला गया। रेशम की नीली जिल्द की एक चौड़ी और ऊँची पुस्तक मैंने निकाल ली। वह आर्ट पेपर पर छपी आधुनिक चित्रकला-सम्बन्धी पुस्तक थी। जिल्द खोलते ही अन्दर के पहले पन्ने पर मेरी नज़र हरबंस की लिखावट पर पड़ी। लिखा था—‘सावित्री को बहुत-बहुत प्यार के साथ, हरबंस’। नीचे तिथि थी 11 जुलाई, 1947। मैं उसमें कुछ देर पिकासो और दूसरे चित्रकारों के चित्र देखता रहा। फिर मैंने दूसरी पुस्तक निकाली। वह अमृता शेरगिल के जीवन और उसके चित्रों के सम्बन्ध में थी। वह अगस्त सन् सैंतालीस में खरीदी गयी थी और उस पर लिखा था—‘प्रिय सावित्री, अनुभूति से बड़ी कला की कोई सचाई नहीं है और मैं चाहता हूँ कि तुम इस सच्चाई को अपने में आत्मसात् कर सको। तुम्हारा...।’ एक बड़ी-सी पुस्तक में जिसमें बड़ी-बड़ी चित्रों की प्लेट्स थीं, उसने लिख रखा था—‘मैं जानता हूँ मेरे अन्दर वह कुछ नहीं है जिससे एक कलाकार की सुन्दर आत्मा का निर्माण होता है। तुम्हारे अन्दर वह कुछ है और मैं चाहता हूँ कि उसे बाहर लाने में, रूप और आकार देने में मैं कुछ सहायक हो सकूँ, जिससे मुझे इसमें गर्व का अनुभव हो कि मैंने ही अपने हाथों से तुम्हें बनाया है। तुम्हारा...।’ चित्रकला के अतिरिक्त कई-एक नृत्य-कला-सम्बन्धी पुस्तकें थीं जो इसी तरह के समर्पणों के साथ सावित्री को भेंट की गयी थीं। उन पुस्तकों से हटकर मैं दूसरे शेल्फ़ के पास पहुँचा, तो वहाँ कुछ उपन्यास थे, कुछ इतिहास सम्बन्धी पुस्तकें थीं, कुछ-एक पुस्तकें राजनीति और भूगोल जैसे विषयों की थीं। मैं उन्हें देख ही रहा था कि बाहर से कई लोगों की आवाज़ें सुनायी देने लगीं। कुछ देर में नीलिमा अरुण को साथ लिये हुए कमरे में आ गयी। उसका चेहरा उस समय बहुत लाल हो रहा था, जाने उत्साह के कारण, या आवेश के कारण।

“तो तुम यहीं हो!” उसने कहा।

“हाँ, हम लोग बातें कर रहे थे।”

“हरबंस कहाँ है?”

“बाहर गया है। अभी आ जाता है।”

उसी समय हरबंस बाहर से आ गया। उसने आते ही नीलिमा से कहा, “देखो, अब लडक़े के सोने का वक़्त हो गया है। पहले जाकर इसे सुला दो।”

“तुम्हें शरम आनी चाहिए...।” नीलिमा ने कहा।

“अब क्या हुआ है?” हरबंस एकदम झुँझला उठा।

“उस छोटी-सी बच्ची ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? तुम उसके जन्मदिन पर उससे प्यार भी नहीं कर सकते थे?”

“मैंने तुमसे कितनी बार कहा है कि तुम मेरे मामलों में दख़ल मत दिया करो।” वह आकर वापस अपनी उसी कुरसी पर बैठ गया।

“तुम्हे बच्चों से भी ईर्ष्या होती है? छि:!” नीलिमा बोली।

“मैंने तुमसे कहा है कि जाकर लडक़े को सुला दो और अपनी ज़बान बन्द रखो।”

“तुम सिर्फ़ सैडिस्ट हो, और कुछ नहीं।”

“मैंने तुमसे कहा...।”

“तुमने जो कहा है, वह मैंने सुन लिया है। मुझे तुमसे कम से कम यह आशा तो नहीं थी।”

“तुम, मैं जो कह रहा हूँ, वह सुनो और जाकर लडक़े को सुला दो।”

“छि:!” नीलिमा ने कहा और अरुण की बाँह पकड़े हुए दूसरे कमरे की तरफ़ चल दी। अरुण अपने हाथों में गुब्बारे थामे हुए मुडक़र हरबंस की तरफ़ देखता रहा। वह शायद बहुत उत्साह के साथ उसे कोई बात सुनाने आया था जो उन लोगों के झगड़े में उसके मन में ही रह गयी थी।

“मैं इस ज़िन्दगी से तंग आ गया हूँ।” हरबंस ने नीलिमा के जाने के बाद कहा और सिर पर हाथ रख लिया। काफ़ी देर वह उसी तरह बैठा रहा। फिर वह उठकर साथ के कमरे में चला गया। वहाँ से नीलिमा के साथ उसके बात करने की आवाज़ सुनायी देने लगी, “सूदन रात को यहीं रहेगा। हम लोग देर तक बातें करेंगे। तुम खाना खाकर सो जाना।”
 
“ठीक है।”

“बाँके से कह देना, उसके लिए पाजामा और कुरता निकालकर रख दे।”

“कह दूँगी।”

“खाना हम लोग कब तक खाएँगे?”

“जब मन हो खा लेना। मैं उधर कह आयी हूँ कि मैं उधर खाऊँगी।”

“तुम उधर नहीं खाओगी, यहाँ हमारे साथ ही खाओगी।”

“मैं उधर ही खाऊँगी। मैं उनसे कह आयी हूँ। कई और लोग वहाँ खाने के लिए रुके हुए हैं। मेरी तो वह बहन लगती है।”

“लगती होगी, मगर मैं भी तो तुम्हारा कुछ लगता हूँ।”

“मैं कब कहती हूँ कि नहीं लगते! मगर इसका यह मतलब नहीं है कि दूसरे लोग मेरे कुछ नहीं लगते।”

“तो तुम्हारा यही फ़ैसला है कि तुम ज़रूर जाओगी?”

“इसमें भी कोई कहने की बात है?”

“और अगर मैं कहूँ कि मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा?”

“तुम जानते हो तुम्हें यह कहने का कोई हक नहीं है। इस बात का फ़ैसला हम लोग लन्दन से करके आये थे।”

“क्या हम लोग यह फ़ैसला करके आये थे कि तुम मेरी कोई बात नहीं मानोगी?”

“जो बातें माननी चाहिए, वे मैं मानती हूँ।”

“तुम जानती हो कि घर में एक मेहमान आया हुआ है। क्या तुम्हें उसके साथ बैठकर खाना नहीं खाना चाहिए?”

“तुम जानते हो कि तुमने आज जान-बूझकर मेहमान को घर में बुलाया है क्योंकि आज मेरी बहन की लडक़ी का जन्मदिन है।”

“मैं नहीं जानता था कि तुम इस तरह मेरी इज़्ज़त ख़राब करोगी।”

“मैं भी नहीं जानती थी कि तुम जान-बूझकर इस तरह मुझे ख्वार करोगे। खाना मैं वहीं खाऊँगी।”

“तो तुम...अच्छा, ठीक है।” कहकर हरबंस उधर से चला आया। मैंने इस तरह अपने हाथ के उपन्यास का पन्ना पलट दिया जैसे उतनी देर में उपन्यास ही पढ़ रहा था।

“थोड़ी देर बाहर घूमने चलोगे?” हरबंस ने आकर पूछा।

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं?” मेरा मन हो रहा था कि किसी तरह मैं अपनी बात वापस ले लूँ और खाना खाने के बाद वहाँ से चला जाऊँ। मगर हरबंस के चेहरे को देखकर मेरा उससे यह बात भी कहने का हौसला नहीं हुआ।

जब हम लोग घूमकर वापस आये, तो नीलिमा वहाँ से जा चुकी थी। हम लोगों में बाहर भी कोई बात नहीं हुई थी और खाना खाते समय भी हम लोग ख़ामोश रहे। सडक़ पर टहलते हुए मुझे कुछ सरदी लग गयी थी जिससे मुझे छींकें आ रही थीं। खाना खाकर मैंने कपड़े बदले और कम्बल लपेटकर अपने लिए बिछाये गये पलँग पर बैठ गया। हरबंस ने अपना ड्रेसिंग गाउन पहनकर सिगरेट सुलगा ली और कहा, “मेरा ख़याल है यहीं बैठकर बातें करें।”

“हाँ, ठीक है।” मैं तकिये के सहारे पलँग पर सीधा लेट गया।

“बत्ती बुझा दूँ?” उसने पूछा।

“हाँ, बुझा दो।”

“अँधेरे में आदमी ज़्यादा अच्छी तरह बात कर सकता है।” उसने कहा और बत्ती बुझा दी। वह भी पलँग पर आ बैठा। अँधेरे में हमारे सिगरेटों के नन्हे-नन्हे जलते हुए सिरे ही उजाला देने के लिए रह गये।

“मैंने तुम्हें कहाँ तक बताया था?” उसने पूछा।

“कि तुम नीलिमा को बोट ट्रेन पर चढ़ाकर वापस घर पहुँच गये।”

“हाँ...!” उसने एक उसाँस भरी। कमरे का ठंडा अँधेरा एक बोझ से लदने लगा। मेरा मन फिर एक अपरिचित देश के अपरिचित अतीत की धुँधली-सी कल्पना में लौटने लगा। नीलिमा को लन्दन से गये बीस की जगह चौबीस दिन हो चुके थे, मगर वह अभी लौटकर नहीं आयी थी। इस बीच उसके कुल दो ही पत्र आये थे जबकि वह हाई कमीशन से ट्रुप की स्थिति के विषय में पूछ-पूछकर उसे छ:-सात पत्र लिख चुका था। नीलिमा के दूसरे पत्र का स्वर बहुत उखड़ा-उखड़ा और रूखा-सा था। हरबंस बहुत उत्सुकता से उसके आने की, या कम से कम उसके तीसरे पत्र के मिलने की प्रतीक्षा कर रहा था। उसका मन न जाने क्यों हर समय एक अज्ञात आशंका से घिरा रहता था। उसका अपने थीसिस के काम में भी मन नहीं लगता था।

पच्चीसवें दिन उसे हाई कमीशन के कार्यालय से पता चला कि उमादत्त का ट्रुप उस दिन वापस पहुँच रहा है। उसने उस दिन वापस काफ़ी देर घर पर प्रतीक्षा की, फिर हाई कमीशन के कार्यालय में चला गया। ट्रुप लौट आया था। जिन लोगों ने उनके ट्रिप का आयोजन किया था, उनसे उन्हें पैसे नहीं मिले थे इसलिए उमादत्त बहुत परेशान था। हाई कमीशन के कार्यालय में पहुँचकर उसने अपने कलाकारों और साज़िन्दों को कुछ पैसे देने की व्यवस्था की थी। वहाँ हरबंस को पता चला कि नीलिमा उन लोगों के साथ लौटकर नहीं आयी। नीलिमा, एक तबला बजानेवाला सरदार और एक बर्मी कलाकार—ये तीन व्यक्ति पीछे पैरिस में ही रह गये थे। उमादत्त ने अपनी परेशानी में उससे इतना ही कहा कि नीलिमा उनके साथ स्टेशन तक आयी थी, मगर न जाने क्यों वहाँ से लौट गयी। हरबंस सहसा बहुत चिन्तित और परेशान हो उठा। इस बात से उसकी परेशानी और भी बढ़ गयी थी कि नीलिमा को वहाँ पैसे नहीं मिले। यह बहुत टूटा-सा घर लौट आया। मकान-मालकिन से वह कहकर गया था कि नीलिमा उस दिन लौटकर आ रही है। वह वापस पहुँचा, तो मकान-मालकिन अपने बरामदे में खड़ी थी। उसने हरबंस को देखते ही पूछा कि क्या उसकी पत्नी लौटकर नहीं आयी।

“उसे कुछ काम से पैरिस में रुक जाना पड़ा है।” हरबंस ने कहा, “वह वहाँ से कल रात की गाड़ी से आएगी।”

“सच-सच बताओ, वह कहीं तुम्हें छोडक़र तो नहीं चली गयी?” मकान-मालकिन ने हँसकर कहा, “तुम तो उसके बिना बिल्कुल बच्चों की तरह उदास रहते हो।”

“वह कल आ जाएगी।” उसने बात से बचने के लिए कहा और ऊपर चला गया। मगर उसका मन बहुत बेचैन था। उससे न कुछ पढ़ा गया, न बैठा गया, न सोया गया। वह थोड़ी ही देर में फिर घर से निकल पड़ा। बहुत दिनों से वह ममी के यहाँ नहीं गया था। नीलिमा को मिसेज़ चावला और उनकी लडक़ी अच्छी नहीं लगती थीं। इसलिए उसके आने के बाद से उसका भी उनके यहाँ आना-जाना कम हो गया था। हरबंस ने मिसेज़ चावला को फ़ोन किया, तो वे घर पर ही थीं। वह उनके यहाँ चला गया। ए.बी.सी. ने उस दिन नया पुडिंग बनाया था। वह लडक़ी अब पहले से काफ़ी ठीक हो गयी थी और साधारण व्यक्तियों की तरह व्यवहार करने लगी थी। हरबंस देर तक उन लोगों के पास बैठा रहा और उनसे बातें करता रहा। ए.बी.सी. की आँखों का भाव भी पहले से काफ़ी बदल गया था। मिसेज़ चावला ने बताया कि लगातार तीन महीने से उसका चीखना-चिल्लाना बिल्कुल बन्द है। बाला उस दिन उसके साथ बहुत आत्मीयता के साथ बातें करती रही। उस लडक़ी की बातों में इतनी मासूमियत थी कि उसका मन हुआ कि वह सारी रात वहीं बैठा रहे और उस लडक़ी से बातें करता रहे। बाला उससे नीलिमा के बारे में तरह-तरह के सवाल पूछती रही। जब उसे पता चला कि नीलिमा को उस दिन आना था और वह नहीं आयी, तो उसने सहसा चौंककर कहा, “क्यों? वह आयी क्यों नहीं?”

“यह मैं कैसे बता सकता हूँ?” हरबंस बोला, “वह जब आएगी, तो उसी से पता चलेगा।”

“वह कब आ रही है?”

“कल रात की गाड़ी से।”

“तुम उसे स्टेशन पर लेने जाओगे?”

उसने सिर हिला दिया। बाला कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “बड़ी अजीब बात है!”

“क्या?” वह कुछ चौंक गया।

“कि वह अकेली पीछे रह गयी है और उसने तुम्हें पत्र भी नहीं लिखा।”

“कल पता चल जाएगा।” वह अनमने ढंग से बोला। इस बात से उसका मन इतना उखड़ गया कि वह फिर और उनके यहाँ नहीं बैठ सका और बहुत आकस्मिक ढंग से उनसे विदा लेकर चला आया।

“तुम्हें ठंड तो नहीं लग रही है?” हरबंस ने बीच में रुककर मुझसे पूछा। शायद इसलिए कि मुझे फिर बीच में दो-एक बार छींकें आ गयी थीं। मुझे अपने शरीर में कुछ हरारत भी महसूस हो रही थी। सिर में कुछ भारीपन और बाँहों में शिथिलता भर रही थी।

“नहीं, ऐसी ठंड नहीं लग रही।” मैंने कहा, “आते हुए रास्ते में कुछ हवा लग गयी थी, शायद उसी का असर है। मुझे नज़ला-बुख़ार बहुत जल्दी हो जाता है।”

“तुम्हें कुछ एस्परीन व$गैरह दूँ?”

“नहीं, ऐसी ख़ास ज़रूरत नहीं है। तुम बात करते रहो।”

“तुम लेट जाओ और तकिये पर सिर रख लो।”

“मैं ठीक हूँ, तुम बात करते रहो।”

मैंने कम्बल और ठीक से ओढ़ लिया और सिर तकिये पर रख लिया। हरबंस ने अपने पैर समेट लिये और सिगरेट की राख झाड़ दी।

“तो अगले दिन तुम उसे लेने स्टेशन पर गये होगे।” मैंने कहा।

सिगरेट का सिरा अँधेरे में चमका और मन्द पड़ गया। “हाँ, मैं गाड़ी के आने से काफ़ी देर पहले ही वहाँ पहुँच गया था,” उसने कहा।

“तो...” अँधेरे में मेरी आँखों के सामने एक स्टेशन की पटरियाँ बिछ गयीं। मेरी रीढ़ की हड्डी भी दर्द कर रही थी। मैंने एक हाथ पीठ के नीचे रख लिया।

एन.डी. 32 से उठी हुई हँसी की आवाज़ सडक़ पर से होती हुई एन.डी. 31 अहाते में आ गयी। “नहीं, नहीं, यह कभी नहीं हो सकता। तुम्हारा ख़याल है कि मैं इतनी ही बेवकूफ़ हूँ? तुम चाहे मुझसे लिखाकर ले लो।” नीलिमा किसी से कह रही थी, “चाहो तो मुझसे शर्त लगा लो। मैं बड़ी से बड़ी शर्त लगाने को तैयार हूँ।”

“नहीं दीदी, शर्त लगाने की क्या ज़रूरत है! यह शुक्ला की आवाज़ थी। “आपको अपने आप पता चल जाएगा, अच्छा बाई-बाई!”

“बाई-बाई!” और नीलिमा बरामदे से कमरे में आती हुई ठिठक गयी। “अरे, तुम लोग सो गये क्या?” उसने कहा। हरबंस ने उठकर कमरे की बत्ती जला दी। बत्ती के जलते ही दृश्य-पट फिर एकदम बदल गया। पश्चिमी बर्लिन की सीमा पर खड़ा ट्रक और उसके आसपास खड़े लोगों की जगह सामने आ गयीं किताबों से भरी हुई बड़ी-बड़ी अलमारियाँ, खाने की मेज़, पलँग, तिपाई, उस पर रखी हुई हँसते हुए पिशाच-जैसी एश-ट्रे और दरवाज़े के पास खड़ी नीलिमा, जो इस समय काफ़ी ख़ुश लग रही थी। हरबंस की पीठ मेरी तरफ़ थी और अपने नाइट-गाउन में वह काफ़ी लम्बा लग रहा था। मैं कुछ इस तरह की अनुभूति के साथ जैसे कि अभी आधा ही खाने पर मेरी प्लेट मेरे सामने से उठा ली गयी हो, पलँग पर सीधा बैठ गया। बात वहाँ टूटी थी जहाँ आगे की बात जानने की उत्सुकता मेरे मन में बहुत बढ़ गयी थी। मैं हरबंस की बात सुनते हुए अपनी भारी आँखों और दर्द करती हुई रीढ़ की हड्डी की बात भी भुला रहा था। मैं सोच रहा था कि एक बार बात का सूत्र टूट जाने पर फिर उसे जोडऩे का अवसर क्या आ सकेगा? उस दिन की मन:स्थिति और अँधेरे के वातावरण ने जिस आत्मीयता, निर्भरता और विश्वास को जन्म दिया था, उसे फिर से लाने के लिए वही मन:स्थिति फिर चाहिए थी। वह वातावरण तो बहुत बार प्राप्त हो सकता था—वही अँधेरा, वही एकान्त और वही अन्दर का कमरा—परन्तु वही मन:स्थिति क्या फिर लौटकर आ सकती थी?

“तुम लोग अभी बातें ही कर रहे थे?” नीलिमा अपनी उँगलियों को उलझाकर बाँहों की माला-सी बनाये हम दोनों के बीच आकर खड़ी हो गयी, “मैंने सोचा था कि तुम लोग अब तक सो गये होगे और न जाने कहाँ के सपने देख रहे होगे। मगर जर्नलिस्ट लोग तो शायद सपने नहीं देखते। क्यों जर्नलिस्ट?”

मैं उससे कैसे कहता कि मैं अभी-अभी एक सपना ही देख रहा था जिसमें मैं कई अपरिचित देशों में घूमा हूँ, कई अपरिचित व्यक्तियों से मिला हूँ और कि उसे सामने देखते हुए भी मेरे मन में अब तक यह जिज्ञासा बनी हुई है कि वह पश्चिमी बर्लिन से हरबंस के साथ चली आयी थी या वहीं रह गयी थी।

“हम लोग गुज़रे हुए दिनों की बातें कर रहे थे।” मैंने कहा, “बरसों के बाद इस तरह बैठने और बातें करने का अवसर मिला है, इसलिए सोने और सपने देखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई। और वैसे तुम्हारी बात भी ठीक है। जर्नलिस्ट लोग सपने नहीं देखते। कम से कम नींद में तो सपने वे बहुत ही कम देखते हैं, खुली आँखों से चाहे जो सपने देखते रहें।”

“तुममें से कौन गुज़रे हुए दिनों की बातें कर रहा था?” नीलिमा बोली, “यह या तुम?”

“मैं गुज़रे हुए दिनों की बात कर रहा था।” हरबंस ने झुँझलाकर कहा, “तुम्हें इससे कुछ एतराज़ है?”

“तुम मेरे पीछे मेरी निन्दा करो, लोगों से झूठी-सच्ची बातें बनाकर कहो, तो मुझे एतराज़ नहीं होगा?” नीलिमा ने इस तरह कहा जैसे उसे दुनिया में किसी की भी परवाह न हो। फिर ज़रा-सा लडख़ड़ाकर वह मेरे नज़दीक आ गयी और बोली, “तो मेरा पति आज तुम्हें यह बताता रहा है कि मैं कितनी बुरी हूँ! और इस बेचारे को मेरी वजह से कितना परेशान होना पड़ा है! च् च् च् च्।”

“तुम आज फिर पीकर आयी हो?” हरबंस की आँखें गुस्से से लाल हो गयीं, “तुम्हें शरम तो नहीं आती होगी!”
 
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