• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

अधूरा प्यार-- एक होरर लव स्टोरी compleet

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
कमाल की तैयारी कर रखी थी नितिन ने.. अपने कपटी तेज दिमाग़ का इस्तेमाल करते हुए उसने छ्होटी से छ्होटी बात पर गौर किया था.. श्रुति को मिशन पर लगाने से पहले.. श्रुति के पास हर सवाल का जवाब था; पहले ही तैयार किया हुआ," ऐसा भी मैने अग्यात बाबा के कहने पर ही किया था.. उन्होने कहा था कि यग्य के दौरान मुझे आपके पास नही जाना है.. आपको छ्छूना नही है.. इसीलिए.. इसीलिए उस दिन मैने आपको देखा तक नही.. सिर झुकाए ही रही हर वक़्त.. और रात को सपने में कहीं आप मुझे छ्छू ना लें.. इसीलिए ऐसा कहा था..!"

"ओह्ह.. पर यहाँ भी मुझे नीरू मिल गयी.. बिल्कुल जैसा आपने सपने में बताया था.. और सपने में जैसे घर के बाहर आप मुझे खड़ी दिखाई देती थी.. बिल्कुल वैसा ही घर है उनका.. मैं तो हैरान हो गया था देख कर.. आपकी बात पर मुझे पूरा विस्वास है.. पर मेरी समझ में ये नही आ रहा की ये संयोग कैसे हुआ.. या इसके पिछे भी अग्यात बाबा का ही हाथ है...? रोहन के दिमाग़ में अब भी सवालों का अतः भंडार उथल पुथल मचाए हुए था...

रोहन के बात पूरी करने से पहले ही नीरू बोलना शुरू हो गयी थी.. नितिन को विस्वास था कि ये सवाल भी ज़रूर किया जाएगा..," हां.. उन्होने ही अपनी मन्त्र सक्ति से 'किसी नीरू' का पता लगाया था.. यग्य की सफलता के लिए मुझे पिच्छले जनम के नाम का प्रयोग करना ज़रूरी था.. और मेरी कही हुई बात यग्य के नियमों के अनुसार सच होनी भी आवस्याक थी.. इसीलिए उन्होने 'मन्त्र शक्ति' से यहाँ वाली नीरू का पता लगाया और मुझे सपने में इसी जगह का प्रयोग करने को बोला था..."

"हुम्म.. " नीरू के आख़िरी जवाब का मतलब उसको पूरी तरह समझ नही आया था.. पर क्यूंकी वह उस की किसी बात पर शक नही कर रहा था इसीलिए पचाने में कोई दिक्कत नही हुई.. बतला की नीरू पूरी तरह उसके दिमाग़ से निकल चुकी थी," अब तो मुझे सपनो में आकर नही डरा-ओगी ना!" रोहन उसकी तरफ देखकर मुस्कुराने लगा....

बेचारी श्रुति रोहन की मुस्कुराहट का भी जवाब अपनी मर्ज़ी से नही दे पाई," बाबा ने कहा है कि जब तक हम.. वो.. शादी नही कर लेते, आपको ऐसे ही सपने आते रहेंगे.. मैं यूँही आपको टीले पर बुलाती रहूंगी.. और यूँही कहती रहूंगी कि मैं बतला मैं हूँ.. मैं श्रुति नही हूँ.. नीरू हूँ.. " नीरू ने 'सेक्स' शब्द की जगह 'शादी' शब्द का इस्तेमाल किया.. इतने सभ्या इंसान के सामने 'सेक्स' वो बोल ही नही पाई...

"पर ऐसा क्यूँ?" रोहन ने उत्सुकता से पूचछा...

यहाँ श्रुति हड़बड़ा गयी.. ये पहला ऐसा सवाल था जो उसके सामने पहले नही आया था.. पर जल्द ही वह संभालते हुए बोली," हुम्म.. पता नही.. शायद यग्य का असर तभी तक रहेगा, जब तक हम मिल नही जाते... वो.. मैं थोड़ी देर आराम कर लूँ क्या? मुझे थकान सी महसूस हो रही है..." श्रुति ने पिच्छा छुड़ाने के लिए कहा..

"ओह शुवर! सॉरी.. मुझे आपसे एकद्ूम इतने सवाल नही करने चाहियें थे.. नीचे 3 बेडरूम हैं.. पहले वाले को छ्चोड़ आप कहीं भी जाकर आराम कर लें.. तब तक मैं खाने पीने का बंदोबस्त करवाता हूँ...

"थॅंक्स!" श्रुति थके हारे कदमों से उठी और गॅलरी की तरफ बढ़ने लगी.. अचानक पीछे से उसको रोहन की आवाज़ सुनाई दी..,"श्रुति!"

"हां..?" श्रुति एकद्ूम पलट गयी...

"कुच्छ नही.. बस ऐसे ही.. एक बार और तुम्हारा चेहरा देखने का दिल कर रहा था.." रोहन के चेहरे पर मुस्कान तेर गयी..

श्रुति ने फीकी मुस्कान के साथ उसकी मुस्कुराहट का स्वागत किया और मुड़कर अंदर चली गयी...

रात के करीब 11 बज चुके थे... सभी को अपने अपने रूम में गये आधे घंटे से उपर हो चुका था.. बिस्तेर पर लेटी हुई श्रुति की आँखों में नींद का नामोनिशान तक नही था. वह रोहन के बारे में ही सोच रही थी.. दोपहर में बेडरूम की और जाते हुए रोहन का उसको रोकना और फिर मुस्कुराते हुए कहना कि 'एक बार सिर्फ़ तुम्हारा चेहरा देखना चाह रहा था..' ये बात उसके दिल को छ्छू गयी थी.. यक़ीनन एक बात तो सपस्ट हो ही चुकी थी.. रोहन एक सच्चा प्यार करने वाला था.. नितिन की तरह उसमें छल कपट या किसी तरह का लालच लेशमात्रा को भी नही था.. उसको महसूस हुआ कि रोहन उसके दिल में उतर चुका है.. ना उतरने की कोई वजह भी तो नही थी.. रोहन जैसा पति तो किस्मत वालियों को ही मिलता है..

करवट लेते हुए श्रुति तड़प उठी जब उसको ख़याल आया कि रोहन के प्रति उसका लगाव सिर्फ़ एक छलावा है.. वह तो नितिन के हाथों की कठपुतली बन चुकी है और शायद जिंदगी भर भी उस'से निजात नही पा सकती.. रोहन के साथ शादी तो उसकी खुसकिस्मती ही होगी.. पर आगे क्या होगा? श्रुति ने गहरी साँस ली...

अचानक उसका फोन बज उठा.. जो आज ही नितिन ने उसको खरीद कर दिया था.. उसके अलावा किसी और की कॉल हो ही नही सकती थी.. उठकर उसने अपने पर्स में से फोन निकाल और कान से लगा लिया,"हेलो!"

"सो तो नही गयी हो ना जाने मन?" नितिन की आवाज़ फोन पर उभरी...

"हां.. सो ही गयी थी.. फोन की आवाज़ पर उठी हूँ..!" श्रुति ने जान बूझ कर नींद में होने का नाटक किया...

" ये सोने के दिन नही हैं ईडियट! कुच्छ करने के दिन हैं.. फिर तो सारी उमर ही चैन से सोना है.. जल्दी मेरे रूम में आओ!" नितिन ने आदेश सा देते हुए कहा..

"पर.. इस वक़्त.. यहाँ..." श्रुति तड़प सी उठी...

"तुम किंतु परंतु बहुत करती हो.. चुप चाप जल्दी बाहर निकल कर बीच वाले बेडरूम में आ जाओ.. सब सो चुके हैं..!" कहते ही नितिन ने फोन काट दिया...

अपने गुस्से को फोन पटक कर उतारने की कोशिश करती हुई श्रुति उठी और ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी होकर अपने कपड़ों और बालों को दुरुस्त करने के बाद बाहर निकल गयी...

---------------------------

"आओ मेरी जान.. ज़रा दरवाजा बंद कर लो!" नितिन अंडरवेर में ही बैठा था.. देखते ही ग्लानि में श्रुति ने मुँह फेर लिया..," मुझसे ये सब नही होगा.. प्लीज़!"

"अरे.. मैं कब कुच्छ करने को कह रहा हूँ अपने साथ.. हा हा हा.. ये बताओ, सब ठीक से लपेट लिया ना रोहन को...!" नितिन ने पूचछा...

"नही.. उन्हे मेरी किसी बात का विस्वास नही हुआ मुझे लगता है.. तुम ये कोशिश छ्चोड़ ही दो तो अच्च्छा है...!" श्रुति ने जानबूझ कर ऐसा कहा....

"पर.. मेरे सामने तो ऐसी कोई बात नही कही उसने.. इस बारे में कोई जिकर तक नही किया.. ना ही कोई और सवाल पूचछा.. तुम ये कैसे कह रही हो कि उसको विस्वास नही हुआ?" नितिन विचलित सा होता हुआ बोला...

"हो सकता है उन्हे तुम पर भी शक हो गया हो.. इसीलिए ना कहा हो तुमसे.. पर उन्होने ऐसे बहुत से सवाल किए थे जिनका में जवाब नही दे पाई.. और तुम भी नही दे सकोगे.. आख़िर में देख लेना.. ना तुम कहीं के रहोगे और ना ही मैं.. प्लीज़.. ये नाटक बंद करो अब.. अभी तो हम ये भी कह सकते हैं कि तुम मज़ाक कर रहे थे.. अपने साथ मुझे भी ग्लानि के दलदल में मत घसीतो प्लीज़.. जो होना था हो चुका.. मेरी इज़्ज़त से तुम खेल ही चुके हो.. क्यूँ मुझे जान देने पर मजबूर कर रहे हो..." श्रुति एक ही साँस में बोलती चली गयी...

"तुम्हे ग़लतफहमी है.. वो बातों को परख कर देखने के नज़रिए से नही सुनता... वो सबको अपने जैसा ही समझता है.. वैसे ऐसा कौनसा सवाल किया था उसने.. जिसका जवाब तुम नही दे पाई..." नितिन ने पूचछा...

"मुझे याद नही है.. प्लीज़ मुझे जाने दो वापस.. अपने घर.. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ.." श्रुति गिड़गिडती हुई घुटनो के बल बैठ गयी.. और सुबकने लगी...

"तुम ऐसे हार मान गयी तो मेरा क्या होगा..? बोलो.."नितिन ने उठकर उसके कंधे पकड़े और खड़ी कर दिया.. श्रुति पूरी तरह टूट चुकी थी," मैं अपनी जान दे दूँगी..!"

"तुम्हारे अकेले के जान देने से काम चल जाता तो मैं तुम्हे पहले ही मरने की सलाह दे देता... पर अगर तुमने ऐसा किया तो तुम्हारी मूवी सबसे पहले में तुम्हारे ही इलाक़े में बेचूँगा.. सोचो तुम्हारे बापू पर क्या गुज़रेगी.. वो ना जी पाएँगे और ना मर पाएँगे.. उनकी भी तो कुच्छ सोचो!" नितिन के चेहरे पर कुत्सित मुस्कान उभर आई...

श्रुति का अंतर्मन बिलबिला उठा," बापू के बारे में ऐसा क्यूँ कह रहे हो.. ? मैं कर तो रही हूँ सब कुच्छ.."

"शाबाश! इसी हौंसले से काम करोगी, तभी बात बनेगी.." नितिन अलमारी के पास गया और वापस मुड़ते हुए बोला," लो! ये पहन लो!" कहते हुए उसने गाढ़े नीले कलर की एक झीनी सी नाइटी उसकी और उछाल दी.. नाइटी का कपड़ा बहुत ही हूल्का और पतला था..

उसको देखते ही श्रुति बिलखती हुई बोली," पर तुमने वादा किया था कि दोबारा तुम मेरे साथ ये सब नही करोगे... क्यूँ मुझे जिंदा लाश बनाने पर तुले हुए हो.."

"जब तक तुम मेरा कहा मानती रहोगी, मैं अपना वादा नही तोड़ूँगा.. हां.. तुम्हारे सवाल और शिकायतें अगर यूँही बढ़ती रही तो एक बात बता देता हूँ.. 'वादे' मेरे लिए कोई खास मायने नही रखते.. मैं किसी भी वादे को तोड़ने से नही हिचकूंगा अगर तुमने मेरी एक भी बात नही मानी तो... जाओ बाथरूम में जाकर इसको पहन लो.. हाँ.. ब्रा नही होनी चाहिए बदन पर!" नितिन ने कहा और दरवाजा बंद करने लगा....

आँखों में आँसुओं का समंदर समेटे श्रुति बाथरूम में चली गयी....

श्रुति बाहर आई तो उसके हुश्न का जलवा देखते ही बन रहा था.. नाइटी उसके बदन चिपकी हुई हर हिस्से को उजागर सी करती हुई उसके नितंबों से कुच्छ ही नीचे तक थी.. बिना ब्रा के मस्त छतियो का सौंदर्या नाइटी में से उभर कर अलग ही दिख रहा था... शर्मिंदगी और ज़िल्लत से तार तार हो चुकी श्रुति सिर झुकाए बार बार अपनी नाइटी को नीचे खींचने की कोशिस करती पर उसकी चूचियों का उठान नाइटी को वापस उपर खींच लेता... और उसकी लगभग नंगी चिकनी जांघें फिर से देखने वाले को पिघलने के लिए मजबूर सा करने लगती...

वह सूबक रही थी...

"हाए.. इस जवानी पर कौन नही मार मिटेगा.. मैं तो फाँसी पर भी चढ़ने को तैयार हूँ.." नितिन ने अचानक उभर आए अपने अंडरवेर के 'उस' हिस्से को सहलाते हुए कहा..," एक बार और बस!"

"नही.. मुझे हाथ भी मत लगाना प्लीज़.. मैं पहले ही टूट चुकी हूँ.. मुझे मरने पर मजबूर मत करो!" श्रुति बिलखते हुए बोली...

"मैं मज़ाक कर रहा था.. अब ये रोना धोना छ्चोड़ो.. और रोहन के कमरे में जाओ!" नितिन अचानक सीरीयस हो गया....

"क्या? ऐसे?" श्रुति चौंक पड़ी.. और आस्चर्य से नितिन की आँखों में देखा...

"हाँ.. ऐसे.. आओ, बिस्तेर पर आकर बैठ जाओ.. मैं समझाता हूँ की तुम्हे क्या करना है...आज मैने तुम्हे रोहन के लिए ही तैयार किया है.. अब ये मत कहना कि उसके साथ भी नही करूँगी कुच्छ.. मैं पहले ही बहुत सब्र कर चुका हूँ.. अब ज़्यादा सहन नही होगा मुझसे.. और ध्यान रखना ये हमारे प्लान का सबसे ज़रूरी हिस्सा है.." कहते हुए नितिन उसको सारी बात समझाने लगा... श्रुति निस्तब्ध सी वहीं खड़ी खड़ी उसकी बातें सुनती रही...

 
अधूरा प्यार--11

गतांक से आगे .............................

श्रुति काँपते हुए कदमों से बाहर निकल कर रोहन के बेडरूम की और बढ़ी.. कुच्छ दूर जाकर उसने पिछे मुड़कर देखा; नितिन दरवाजे पर खड़ा उसकी और ही देखकर मुस्कुरा रहा था.. नज़रें घुमा वा सीधा चलती हुई रोहन के बेडरूम के दरवाजे पर पहुँची और हल्क से दरवाजा खटखटाया..

"कौन?" अंदर से रोहन की आवाज़ आई..

"मैं हूँ श्रुति.. प्लीज़ दरवाजा खोलो!" श्रुति के बोलते ही नितिन ने अपना दरवाजा बंद कर लिया...

रोहन दरवाजा खोलते ही श्रुति को देखकर चौंक पड़ा.. रोने की वजह से उसकी आँखें लाल हो गयी थी और वह भय में काँप सी रही थी," क्या हुआ श्रुति? क्या हुआ तुम्हे?"

बिना इजाज़त लिए ही श्रुति अंदर घुसने लगी तो रोहन ने हटकर उसको रास्ता दे दिया. पर जैसे ही रोहन ने लाइट ऑन की वह दूसरी बार चौंका,"ये..." पर वह बात खा गया..

श्रुति का पहनावा देखकर और उस पहनावे में उसको अपने पास देख कर रोहन का अचंभित होना लाजिमी था. ड्रेस में वो जैसे बिना कुच्छ पहने ही खड़ी लग रही थी.. उसके अंग अंग की स्थिति का रोहन को अंदाज़ा उपर से ही हो रहा था और कमर से ज़रा नीचे के बाद तो अंदाज़ा लगाने की भी ज़रूरत नही थी.. वहाँ से तो वो थी ही नंगी. रोहन ने कभी श्रुति को इस तरह की लड़की के रूप में नही जाना था.. श्रुति तो उसके सामने पहले ही सिर झुकाए खड़ी थी.. शर्मिंदा सा होकर रोहन भी ज़्यादा देर तक उसको नही देख पाया.. अपना चेहरा दूसरी और करके बोला," क्या हुआ श्रुति? इस समय यहाँ...?"

"ववो.. मुझे बुरे सपने आ रहे हैं.. मुझे डर लग रहा है.." श्रुति ने जवाब दिया....

"श.. सपनो से डरने की क्या ज़रूरत है.. थोड़ा पानी पी लो और सो जाओ..." टेबल पर रखे जाग से रोहन ने गिलास में पानी डाला और एक तरफ देखते हुए श्रुति को पकड़ा दिया..

"मुझे सच में बहुत डर लग रहा है रोहन.. मैं.. मैं यही सो जाउ क्या?" श्रुति ने थरथरते लबों से बात पूरी की...

"यहाँ? तुम्हे लगता है ये ठीक रहेगा?" रोहन अलमारी में कुच्छ ढूंढता हुआ बोला...

"पर मुझे डर लग रहा है.. मैं अकेली नही सो सकती...!" श्रुति ने ज़ोर सा देकर कहा.. नितिन ने उसको कहा था कि अगर वापस आ गयी तो उसके पास सोना पड़ेगा..

रोहन अलमारी से चदडार निकाल कर लाया और उसको श्रुति के कंधों पर डाल कर उसके चारों और लपेट दिया..," आओ, बैठो!"

रोहन के चादर लपेटने का अभिप्राय जान श्रुति शर्म से पानी पानी हो गयी.. सपस्ट था की रोहन को उसका 'ये' पहनावा हरगिज़ पसंद नही आया था.. टीस भरी एक साँस श्रुति के अंदर से बाहर निकली.. कहाँ रोहन है और कहाँ नितिन! रोहन की इस एक अदा ने श्रुति को हमेशा हमेशा के लिए उसकी दीवानी बना दिया.. हज़ारों दुआयं देता हुआ श्रुति का दिल उस पर न्योचछवर हो गया...

पैर नीचे लटकाए हुए ही वह बिस्तेर पर बैठ गयी.. काफ़ी देर तक कमरे में चुप्पी च्छाई रही.. श्रुति ने कमरे में चारों और नज़र दौड़ाई और उसको 'फॅन्सी लाइट' के साथ जुड़ा केमरा ढूँढने में कोई दिक्कत नही हुई.. केमरा बिस्तर पर ही फोकस किया हुआ प्रतीत हो रहा था... नितिन ने उसके बारे में पहले ही बताते हुए रोहन के साथ सेक्स ना करने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी थी..

श्रुति को अब रोहन से प्यार करने में किसी तरह की कोई दिक्कत नही थी.. बुल्की अब तो यह उसका सपना सा बन गया था.. अब रोहन ही उसका पहला और आख़िरी प्यार था.. पर रोहन का व्यक्तिताव ही ऐसा था की श्रुति को समझ नही आ रहा था की शुरुआत कैसे करे..

"सो जाओ!" रोहन ने कहा और दूसरी और करवट लेकर कर लेट गया..

"एक मिनिट..!" श्रुति ने दीवार के साथ लगते हुए अपनी टाँगें सीधी बिस्तर पर फैला ली.. ये सब उसने इस तरह से किया की चदडार उसकी कमर तक रह गयी और उसकी नंगी चिकनी जांघें पूर्ण रूप से अनावृत हो गयी.. इतनी उपर कि रोहन अगर करवट उसकी और ले लेता तो वह गुलाबी पॅंटी के किनारों को भी सॉफ देख सकता था..

"हुम्म.." रोहन दूसरी और मुँह किए हुए ही बोला..

"इधर घूम जाओ ना प्लीज़.." श्रुति ने कहते हुए रोहन की तरफ वाली टाँग को घुटने से मोड़ लिया.. नाइटी अब और उपर सरक गयी और श्रुति की पॅंटी सॉफ झलकने लगी...

रोहन ने जैसे ही करवट बदली, श्रुति का ये रूप देखकर वो भड़क गया," श्रुति.. मुझे तुम्हारी ये हरकत कतयि पसंद नही है.. मैने तुम्हे अच्च्ची लड़की समझा था.. ये सब बकवास बंद करो अब!"

"मुझसे 'प्यार' कर लो ना प्लीज़.. मैं तुम्हारे लिए तड़प रही हूँ.. जाने कितने दीनो से.." अपने दिल को पत्थर सा बनाते हुए श्रुति ने ये सब कहा और रोहन से लिपट जाने के लिए उसकी और लपकी.. रोहन उसकी इस हरकत पर हतप्रभ था.. धक्का सा देकर उसने श्रुति को वापस पटक दिया..,"प्यार! तुम जैसी लड़कियाँ समझती भी हैं कि प्यार आख़िर होता क्या है.. सेक्स की सन्तुस्ति को तुम प्यार मानती हो... और दावा करती हो कि हम जनम जनम के साथी हैं.. धिक्कार है तुम्हे.. नितिन भाई ने ठीक ही कहा था.. ये तुम बाप बेटी की ही साज़िश थी.. शर्म आनी चाहिए तुम्हे.. अपने शरीर को मुझे सौंप कर तुम ये साबित करना चाहती हो कि तुम मुझसे प्यार करती हो... अभी के अभी निकल जाओ यहाँ से" रोहन का चेहरा क्रोध के मारे तप गया था और आँखें जैसे अंगारे उगल रही थी..

श्रुति के पास बोलने के लिए कुच्छ था ही नही.. जो था वो वह बोल नही सकती थी.. शर्म से गर्दन झुक जाने पर भी वह हाथ जोड़ कर आँसू बहाती हुई यही प्रार्थना करती रही.." प्लीज़ रोहन.. मुझसे प्यार कर लो.. यहाँ से मत निकालो प्लीज़! मुझसे प्यार कर लो..."

रोहन के सब्र का बाँध टूट गया.. गुस्से से वह उठा और श्रुति का हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए वह बाहर ले गया.. धक्का सा दिया और अपना दरवाजा बंद कर लिया.. एक दो बार श्रुति ने हूल्का सा दरवाजा पीटा और कराहते हुए वहीं घुटनो के बल बैठ गयी.. विलाप सा करते हुए...

रोहन का दिमाग़ चकरा रहा था.. समझ में नही आया कि क्या करे.. अचानक उठा और बाहर निकल कर ज़बरदस्ती सा श्रुति को उठाकर उसके कमरे में छ्चोड़ आया और बाहर से कुण्डी लगा दी.... श्रुति बिलखती रह गयी...

काफ़ी देर तक श्रुति यूँही आँसू बहाती दीवारों को घूरती रही.. उसके पास अब उसका कुच्छ नही बचा था.. प्यार मिला भी तो आधा अधूरा!

अचानक उसने अपने पर्स में से एक तरफ से कोरा एक कागज और एक पेन निकाला और आँसुओं से कागज गीला करते हुए उसस्पर कुच्छ लिखने लगी...

----------------------------------------------------------

अगली सुबह सुबह एक चीख सुनकर बिस्तेर से उठने की तैयारी कर रहा रोहन चौंक कर बाहर निकला.. नौकर श्रुति के कमरे के बाहर खड़ा था और अपने दोनो हाथों से अपना सिर पकड़ रखा था," साहब.. मेम'साब!"

रोहन भागता हुआ उस तरफ गया," क्या हुआ?" पर अंदर झाँकने के बाद उसको दोबारा पूच्छने की ज़रूरत ही ना पड़ी.. श्रुति की लाश अंदर पंखे से लटकी झूल रही थी....

अगले ही पल रोहन को अपना दिमाग़ चकराता हुआ महसूस हुआ. उसी एक पल में पिच्छली रात उसके और श्रुति के बीच में जो कुच्छ भी हुआ, सब उसकी आँखों के सामने घूम गया. शायद रोहन इसके लिए खुद को ज़िम्मेदार मान चुका था. जैसे तैसे उसने दीवार पकड़ी और अपने सिर को हाथों में दबोचे नीचे बैठता चला गया.

पास खड़ा नौकर हैरत से कभी श्रुति के शरीर की और; कभी रोहन की और देखता रहा. अचानक उसकी समझ में नही आया की क्या करे और क्या ना करे. रवि, अमन और शेखर नीचे सोए हुए थे.

नौकर ने नीचे जाकर अमन को बताने की सोची ही थी की नितिन अपने रूम से बाहर निकला. रोहन को इस हालत में बैठे देख वह तेज़ी से उसकी और आया और श्रुति के बेडरूम में झाँकते ही उसके मुँह से निकला,"ओह माइ गॉड!"

नितिन लगभग भाग कर बेड पर चढ़ा और श्रुति के शरीर को उसकी जेंघो के करीब से पकड़ कर उपर उठा लिया," इधर आओ, मेरी मदद करो जल्दी!" उसने नौकर को आवाज़ दी.

"शिट! शी ईज़ नो मोर!" नितिन ने आह भारी और एक घुटना उसकी लाश के पास टीका अपनी आँखों से आँसू पौच्छे..

तब तक रोहन भी कमरे में आ चुका था. उसने नितिन के कंधे पर हाथ रखा. जैसे ही नितिन उसकी तरफ घूमा, रोहन उस'से लिपट गया," भाई! ये मैने क्या कर दिया?"

नौकर रोहन की बात सुनते ही चौंका.. बिना देर किए वह नीचे की और खिसक लिया..

"क्या मतलब? मतलब तुमने ये सब...?.. मगर क्यूँ यार?" नितिन ने रोहन की आँखों में झाँका..," ये क्या किया तुमने?"

"हां भाई.. मैने ही.. मैने ही उसको मरने के लिए मजबूर कर दिया..!" रोहन आँसू बहाते हुए बोलता जा रहा था," रात ये मेरे कमरे में आई थी.. मैं खुद से मिलन की इसकी बेकरारी को हवस की भूख समझ बैठा.. 'ये' बेचारी तो अपने बरसों पुराने 'अधूरे प्यार' को पूरा करने आई थी.. और मैने इसको जाने क्या क्या कह दिया.. बे-इज़्ज़त करके निकाल दिया इसको, अपने कमरे से! " कहते हुए वह इस जहाँ से रुखसत हो चुकी श्रुति से लिपट गया...और फुट फुट कर रोने लगा...

"संभलो अपने आपको यार.. तुम खुद को इसके लिए दोषी क्यूँ मान'ते हो? तुमने सिर्फ़ इसको कमरे से ही निकाला था.. मरने के लिए तो नही बोला ना!" नितिन ने उसकी श्रुति के जिश्म से अलग किया..

"पर भाई! ये मुझसे कितना प्यार करती होगी.. क्या कर लिया इसने? देखो तो! आआआआअ..आआआआअ" रोहन का कारून रुदन पूरी कोठी में फैल गया...

तभी कमरे में अमन, शेखर और रवि ने प्रवेश किया.. सभी को खबर लग चुकी थी.. भन्नाये हुए सभी आकर बिस्तेर के पास खड़े हो गये...

"ये क्या हो गया यार? कैसे हुआ ये सब?" अमन ने झल्लते हुए बोला...

" ये मुझसे प्यार करती थी भाई.." रोहन ने बोलना शुरू किया ही था की नितिन उसकी आवाज़ को दबा खुद सब कुच्छ बताने लगा.. रवि गौर से बोलते हुए नितिन के चेहरे की और ही देखता जा रहा था...

"ओह माइ गॉड!" पूरी बात सुनकर अमन और शेखर के मुँह से निकला...," ये तो बहुत बुरा हुआ? अब क्या करें!" अमन श्रुति के बारे में बात कर रहा था...

"अब क्या कर सकते हैं?" अब तो इसको घर पहुँचने की तैयारी करो!" रवि के मुँह से निकला....

"नही! इसको घर पर नही भेज सकते.. ये अपने बाप से झूठ बोलकर आई थी.. कि कॉलेज के टूर पर जा रही है.. इसका कुच्छ और ही करना पड़ेगा!" नितिन ने अपनी राई दी..

"नही.. मैं लेकर जाउन्गा इसको.. इसके घर! इसकी चिता को अग्नि दूँगा.. अब भी क्या मैं इसके प्यार को नज़रअंदाज कर दूं..!" रोहन भावुक हो गया था...

"अब फिल्मी बातें छ्चोड़ दे यार.. जो होना था वह हो चुका.. नितिन सही कह रहा है.. हमें इसको ठिकाने लगाने के बारे में सोचना चाहिए.. वरना सब पर मुसीबत आ सकती है..." रवि ने रोहन को कहा...

रोहन बिलखता हुआ फिर से श्रुति से लिपट गया," नही! जो कुच्छ होगा, मैं भुगत लूँगा.. पर इसको इसके घर तक मैं लेकर ही जाउन्गा.... इसकी आत्मा को फिर से नही भटकने नही दूँगा मैं...!"

"वेरी गुड!" दरवाजे पर शख्त और पैनी आवाज़ सुनकर सभी चौंक कर पलते.. वर्दीधारी इनस्पेक्टर एक प्यादे को साथ लिए दरवाजे पर खड़ा था.. सभी के खड़े होने पर वह टहलता हुआ अंदर आया और कुच्छ देर गौर से श्रुति की लाश को देखता रहा..," तो लड़कियों की आत्मा से खेलते हैं आप लोग?" इनस्पेक्टर ने बारी बारी चारों को शुर्ख नज़रों से घूरा....

"एक मिनिट.. सर.. आप मेरी बात सुनिए..!" नितिन ने कहा तो इनस्पेक्टर ने उसको अपनी उंगली सीधी कर रुकने का इशारा किया," काफ़ी देर से तुम सब की ही सुन रहा हूँ.. सर्वेंट किधर है...?"

"एक मिनिट!.." अमन कहते हुए बाहर निकल गया और बाल्कनी में खड़े होकर आवाज़ लगाई..

नौकर अगले ही पल इनस्पेक्टर के सामने था..," जी.. सर!" उसकी आवाज़ काँप रही थी..

"डरो मत राजू.. सब खुल कर बताओ क्या हुआ है यहाँ पर...!" इनस्पेक्टर ने पूचछा...

"मुझे कुच्छ नही पता साहब.. मैं तो रात से नीचे था.. सच में!" नौकर ने बीच में गला सॉफ करके बात पूरी की...

"तो फोन क्यूँ किया था उल्लू की डूम? मैं कह रहा हूँ ना.. किसी से डरने की ज़रूरत नही है... मेरे अंदर किए हुए सज़ा पूरी करने से पहले बाहर नही आते.. और तब तक तो ये चेहरा भी भूल चुके होंगे तुम्हारा.. रही नौकरी की बात.. तो तुम्हारी चोरी की आदत के बावजूद मैं तुम्हे फिर से अपने घर रखने को तैयार हूँ.. अब सीधे सीधे सारी बात समझाओ मुझे.... वरना सबसे पहले तुम्हारी ठुकाई होगी अब!" इनस्पेक्टर ने दो टुक बात कही और नौकर की गर्दन नीचे हो गयी... उसने तो रिक्वेस्ट भी करी थी कि मेरा नाम सामने मत आने देना.. पर इनस्पेक्टर ने पोलीस और मुखबिर के रिश्ते को नही निभाया...

"आप हमारी भी बात सुन लीजिए एक बार.. इसको पूरी बात का नही पता..!" नितिन ने फिर से इनस्पेक्टर को टोका... बाकी चुपचाप खड़े नौकर और इनस्पेक्टर को देख रहे थे...

"सबकी सुनी जाएगी...! बोलो राजू!" इनस्पेक्टर ने नितिन की बात को तवज्जो नही दी...

"मुझे ज़्यादा नही पता साहब.. मैं सुबह मेम'साब को चाय देने आया था.. दरवाजा खटखटाया तो पता लगा कि वो तो खुला हुआ है.. फिर भी मैने 2-4 बार आवाज़ देकर देखा.. पर मेडम ने कोई जवाब नही दिया..." कहकर नौकर रुक गया...

"फिर..?" इनस्पेक्टर ने राजू की छाती पर डंडा रख दिया...

"फिर साहब मैने दरवाजा ढकाया तो.." राजू ने कहकर अपनी उंगली श्रुति की लाश की और उठा दी...

"मतलब दरवाजा अंदर से बंद नही था.. सही है ना?" इनस्पेक्टर ने राजू को रिलॅक्स करने के लिए उसका कंधा थपथपाया....

"जी साहब!" नौकर ने नज़रें उठाकर कहा...

"इसका मतलब ये खून भी हो सकता है.. हूंम्म!"

इनस्पेक्टर ने श्रुति की लाश के पास बैठे रोहन को देखा ही था की वह बोल पड़ा," एक मिनिट सर...... राजू! तुमने दरवाजे की कुण्डी बाहर से खोली थी या नही..."

"नही साहब.. दरवाजा तो पहले ही अंदर और बाहर दोनो तरफ से खुला था.. मेरे खटखटते ही खुल गया था.. अपने आप!" राजू ने बात इनस्पेक्टर की और देखते हुए कही....

"ये बाहर से कुण्डी लगाने का क्या मामला है? उसको ज़बरदस्ती रोक रखा था क्या?" इनस्पेक्टर ने रोहन को तिर्छि निगाहों से देखते हुए कहा....

"मैं पूरी बात बताउन्गा सर! पर मैं रात को करीब एक बजे के आसपास नीरू को उसके कमरे में छ्चोड़ बाहर से कुण्डी लगाकर गया था... फिर कुण्डी खोली किसने..?" रोहन ने आस्चर्य से वहाँ मौजूद सभी लोगों को देखा....

"हूंम्म.. अगर तुम्हारी बात सच्ची है तो ये एक बहुत बड़ा पॉइंट है... इसका मतलब कि तुम्हारे उसको क़ैद करने और नौकर के आने के बीच कोई और लाश को पहले ही देख चुका था.. या हो सकता है कि उसी ने इस्कका खून भी किया हो..तुम सब के अलावा अगर घर में कोई और भी है तो उसको भी बुला लो!" इनस्पेक्टर ने अमन की और इशारा किया...

"नही.. बस हम 7 ही थे घर में.. राजू समेत!" अमन ने जवाब दिया...

"मतलब खूनी तुम ही हो?"

"क्याआआ?" अमन उच्छल पड़ा...

"मेरे कहने का मतलब तुम में से ही कोई है.. एक मिनिट.. इनस्पेक्टर ने मोबाइल निकाला और थाने में फोन किया," इनस्पेक्टर मानव बोल रहा हूँ.. 437 सेक्टर. 3 में लड़की की लाश है.. जल्दी से इसको हॉस्पिटल लेजकर पंचनामे का प्रबंध करो...!" इनस्पेक्टर ने फोन काटा और रोहन की और इशारा करते हुए बोला," आ जाओ मेरे साथ.. बाकी सब यहीं रहेंगे... !" उसको रोहन ही श्रुति का सबसे नज़दीकी दिखाई दिया... फिर अपने मातहत को हिदायत देते हुए बोला," 2 लोगों को यहीं खड़ा करो और बाकी को पूरे मकान की तलाशी लेने को बोलो...!"

"हुम्म.. अब बताओ, कौनसी पूरी बात बता रहे थे..?" इनस्पेक्टर मानव ने रोहन के बेडरूम में जाकर उसके सामने बैठते हुए पूचछा....

रोहन ने भावुक सा होते हुए अपने सपनो से लेकर टीले पर जाने की, श्रुति के घर पहुँचने की, बतला आने तक की और बाद में नितिन के साथ श्रुति को लेकर वहीं पहुँचने की, और श्रुति द्वारा बताई गयी सारी दास्तान सुना दी... पर अब उसने बतला में भी नीरू मिलने की बात का ज़िक्र करना ज़रूरी नही समझा.. क्यूंकी श्रुति की तांत्रिक वाली बात पर उसको पूरा यकीन हो गया था.. और मान'ने लगा था की उसके सपनो का कारण श्रुति ही थी...

"तुम्हे नही लगता कि कोई तुम्हारी मन-घड़ंत कहानी पर फिल्म बनाकर अच्च्छा पैसा कमा सकता है? हर किसी को ये स्क्रिप्ट मत सुनाया करो.. समझे! अब मुझे चूतिया समझना छ्चोड़ो और काम की बात बताओ!" इनस्पेक्टर रोहन की बात बंद होते ही शुरू हो गया...

"मुझे भी यही लगता था की आप विस्वास नही करेंगे.. पर यही सच है.. कल रात उसकी हरकत से मेरे उसके बारे में विचार ही बदल गये थे.. और मैं उसको ज़बरदस्ती उसके कमरे में छ्चोड़कर बाहर से कुण्डी लगा आया..!" रोहन अपनी बात पर अड़ा रहा...

"तुम्हारा कहना है कि कल वो खुद चलकर तुम्हारे कमरे में आई थी.. तुमसे सेक्स करने के लिए बेताब होकर..!" इनस्पेक्टर ने उसकी बात का निचोड़ निकालते हुए कहा...

"जी!"

"इस'से उसको क्या मिलता.. अगर वह सेक्स की भूखी ही होती तो वो तो उसको कहीं भी मिल सकता था.. काफ़ी सुंदर थी वो!" इनस्पेक्टर ने तर्क दिया...

"जी.. पर जाने क्यूँ उस वक़्त मैं ये सोच नही पाया..!" रोहन ने कहा..

"वो तांत्रिक कौन है? कभी मिले हो?"

"जी नही.. पर नितिन मिला है.. उसने रवि को बताया था.. कल!" रोहन ने सपस्ट किया...

"हुम्म.. लेट'सी.. वैसे तुम्हे क्या लगता है.. अगर तुमने उसको नही मारा तो फिर किसने मारा होगा...!" इनस्पेक्टर ने रोहन के दिल को कुरेदने की कोशिश की...

"मैं ही उसकी मौत का कारण हूँ सर!" रोहन फिर से भावुकता में बहते हुए बोला...," मैने उसके प्यार और ज़ज्बात को समझने में भूल की..."

"पर वो कुण्डी किसने खोली.. किसीने कुच्छ बताया है?"

"जी नही.. नौकर के चिल्लाने के बाद में ही सबसे पहले वहाँ पहुँचा था.. बाद में नितिन भाई आए और सबसे बाद में नीचे सो रहे बाकी तीनो..!"

"ये.. नितिन पर कितना भरोसा है?"

"जब भाई ही कह रहा हूँ सर.. तो भरोसा ना करने वाली बात तो बेमानी हो गयी ना... वो 'सच' में ही मेरे भाई जैसा है... और यकीन मानिए.. श्रुति ने स्यूयिसाइड ही की है.. किसी के बारे में भी ऐसी बात सोची ही नही जा सकती...!"

"हुम्म.. पंचनामे के बाद सब क्लियर हो ही जाएगा.. चलो थाने चलकर आराम से बात करते हैं...बाकी लोगों को भी साथ ले लो....!"

कहानी जारी है............................

 
अधूरा प्यार--12 एक होरर लव स्टोरी

गतांक से आगे ..........................................

इनस्पेक्टर रोहन के साथ रूम से बाहर निकला ही था की पोलीस वालों में से कुच्छ कपड़े उठाए उनकी ही और आता दिखाई दिया... मानव वहीं खड़ा हो गया!

"सर! सिर्फ़ ये लॅडीस कपड़े मिले हैं.. एक रूम से.. बाकी कुच्छ खास नही था!" पोलीस वाले ने आते ही कपड़े इनस्पेक्टर मानव को दिखाए...

रोहन कपड़े देखते ही तपाक से बोला," ये श्रुति के ही कपड़े हैं.. कल उसने दिन में यही पहन रखे थे...

"हुम्म.. कहाँ से मिले ये?" मानव ने पूचछा...

"सर.. वो लास्ट वाले बेडरूम के बाथरूम से..!"

रोहन आस्चर्य से बोला," क्या? पर...?" पोलीस वाला नितिन के कमरे की तरफ इशारा कर रहा था...

"पर क्या?" मानव ने उत्सुकता से रोहन की और देखा...

"नही.. कुच्छ खास नही सर!" रोहन अपने मन की बात को खा गया...

"देखो.. बात खास है या आम, ये मैं सोचूँगा.. दिल में कोई बात मत रखो.. जो कुच्छ भी है मन में.. सब निकाल दो..."

"सर, रियली कोई खास बात नही है.. मैं सिर्फ़ ये सोच रहा था कि श्रुति के कपड़े नितिन के बाथरूम में कैसे आए.." रोहन ने जवाब दिया..

"यही तो वो सवाल हैं बेटा, जिनके जवाब मुझे ढूँढने हैं.. नितिन ने तुम्हारी प्रेम कहानी में इतना इंटेरेस्ट क्यूँ लिया? वह वहीं रहकर तुम्हे बुलाने की बजाय श्रुति को यहाँ लेकर क्यूँ आया..? नितिन तांत्रिक से क्यूँ मिला? कुण्डी किसने खोली? और अब ये उसके कपड़े नितिन के बाथरूम में कैसे पहुँचे.. खैर.. रात को जब श्रुति तुम्हारे पास आई तो क्या यही कपड़े पहन रखे थे उसने??" मानव ने पूचछा...

"जी नही.. वो कोई और ड्रेस थी..?" रोहन ने जवाब दिया...

"मतलब? क्या ये भी नही थी जो उसके शरीर पर अब है?" इनस्पेक्टर अपना सिर खुजाता हुआ बोला...

"जी नही.. दरअसल उस ड्रेस की वजह से ही मुझे गुस्सा आया था.. ऐसी ही ऊटपटांग डाल रखी थी..."

"आओ मेरे साथ..!" कहकर मानव ने सिपाही को ड्रेस साथ रखने को बोला और रोहन फिर से श्रुति वाले कमरे में ले गया.. श्रुति की लाश को हॉस्पिटल वाले ले जा चुके थे.. वहाँ खड़े सभी लोगों का चेहरा उतरा हुआ था... सभी के चेहरे पीले पड़ गये थे...

"ज़रा कमरे में ढुंढ़ो, वो कपड़े कौन्से हैं...?" मानव ने रोहन को इशारा किया....

रोहन को अलमारी में ज़्यादा ताकझांक नही करनी पड़ी.. निहायत ही अश्लील नाइटी ऐसे ही बीच वाले खाने में फैंकी हुई थी... रोहन उसको उठाने को झुका तो इनस्पेक्टर ने मना कर दिया," हाथ मत लगाओ तुम इसको..! और एक सिपाही से उसको सावधानी से उठा लेने को बोला...

"अब इसका बॅग खोलकर इसके सारे कपड़े निकालो...!" मानव ने सिपाही को बोला.. सिपाही ने बॅग उलट कर सारे कपड़े बिस्तेर पर उलट दिए.. 'उस' एक नाइटी के अलावा श्रुति के पास इस तरह का कोई और उत्तेजक कपड़ा नही था.. बुल्की सारे कपड़े शरीर को लगभग पूरा ढकने वाले थे... इनस्पेक्टर ने इस बात पर गौर किया और सबको साथ लेकर चलने का इशारा पोलीस वालों को किया.

आधे घंटे बाद पाँचों मानव के सामने बैठे थे...

इनस्पेक्टर ने नितिन को कुर्सी बदल कर बीच में उसके सामने आने को बोला.. नितिन ने वैसा ही किया और रोहन लाइन में सबसे आख़िरी कुर्सी पर चला गया...

"तुम इतने थके हुए क्यूँ लग रहे हो? रात भर जागे हो क्या?" मानव ने नितिन से पूचछा..

"जी नही तो.. मैं ठीक हूँ बिल्कुल.. और जो थोड़ा बहुत तनाव आप मेरे चेहरे पर देख रहे हैं.. वो 'बेचारी' श्रुति की लाश देखने के कारण है.. उसके साथ सच में ही बहुत बुरा हुआ?" नितिन ने सफाई के साथ जवाब देते हुए खुद को संभाला...

"तुम्ही श्रुति के कातिल हो!" मानव ने तपाक से कहा...

"क्कक्या बकवास कर रहे हैं आप? उसने ख़ुदकुशी की है.. सभी जानते हैं.. रोहन ने उसके साथ संबंध बनाने से इनकार कर दिया.. इस'से वह हताश हो गयी..." नितिन एक बार तो सकपका गया था..

लगभग यही एक्सप्रेशन रोहन के चेहरे पर भी आए थे," सर आप बेवजह नितिन पर शक कर रहे हैं..!"

"मुझे किसी पागल कुत्ते ने काटा है क्या जो मैं इस पर बेवजह शक कर रहा हूँ.. मैने तुम पर नही किया.. हालाँकि, तुम उसके साथ सबसे ज़्यादा देर तक थे.. मैं ये भी कह सकता था कि तुमने ही ज़बरदस्ती करने की कोशिश की और जब नही मानी तो उसको मारकर फाँसी पर टाँग दिया.. पर मैने नही कहा ना? हमारा रोज़ का यही काम होता है बच्चू.. हम कातिल को नज़रों से पहचान लेते हैं.."

इनस्पेक्टर बोलते बोलते उत्तेजित सा हो गया था.. टेबल पर रखा पानी का गिलास खाली करते हुए वह फिर बोलना शुरू हो गया..

"मेरे कहने का ये मतलब था कि अगर तुम उसको यहाँ लेकर नही आते तो उसके साथ ये सब नही होता.. है ना?

"ज्जई.. ये तो है.." नितिन ने नज़रें झुका ली...

"तो क्यूँ लेकर आए उसको? तुम्हारा क्या फायडा था इसमें..?" मानव ने ज़ोर देकर पूचछा...

"मेरा क्या फायडा होता भला.. मैने तो जो किया, रोहन के लिए किया..!" नितिन ने सफाई दी..

"ऐसा क्या कर दिया तुमने, रोहन के लिए..." मानव ने फिर पूचछा....

"जी.. वो रोहन यहाँ किसी लड़की के चक्कर में ही आया था.. श्रुति ने जब मुझे ये बताया कि... दरअसल रोहन को पिच्छले कयि महीनो से सपने आ रहे थे.. तो इसने मुझे साथ लेकर उस लड़की के पास जाने का फैंसला किया.. लड़की ने हमें टीले.." बोलते हुए नितिन को मानव ने बीच में ही रोक दिया..," ये सब बकवास में सुन चुका हूँ... ये बताओ श्रुति ने तुम्हे क्या बताया?"

"जी यही कि सब उसने ही किया था.. एक तांत्रिक के साथ मिलकर... उसने मुझे बाते की.........." नितिन ने वही बातें दोहरा दी जो पहले दिन श्रुति ने रोहन को और आज रोहन ने इनस्पेक्टर को बताई थी....

"तुम्हे ये सब श्रुति ने कैसे बता दिया.. बताना होता तो उसी दिन बता देती जिस दिन तुमने उसको कॉलेज छ्चोड़ा था... या तुमने बाद में उसके साथ कोई ज़बरदस्ती की थी...?" मानव ने पूचछा...

सवाल पर एक बार तो नितिन बग्लें झाँकने लगा.. फिर सहज होते हुए जवाब दिया," अब ये तो वही बता सकती थी कि उन्होने मुझे क्यूँ बता दी.. मैने सिर्फ़ उसको ये बताया था कि रोहन किसी 'नीरू' के चक्कर में बतला गया है...

"क्क्या? क्या नाम बताया तुमने?" इनस्पेक्टर अचानक चौंक पड़ा..

"जी नीरू!" नितिन ने जवाब दिया...

"श.. अच्च्छा!" मानव ने घूर कर रोहन की और देखा और सामने देखते हुए बोला," फिर?"

"ये सुनकर वो बेचैन सी हो गयी और उसने रोहन ने बात करवाने को कहा.. पर जब रोहन का फोन नही मिला तो उसने मुझे ही सब कुच्छ बता दिया..." नितिन ने इतनी देर में ही बात बना ली थी....

"पर तुम उसके पास दोबारा करने क्या गये थे?" मानव ने फिर पूचछा...

"जी.. वो मैं सच्चाई का पता लगाना चाहता था.. और जो कुच्छ भी हो रहा था.. मुझे किसी साजिश की बू आ रही थी..." नितिन ने लंबी साँस लेकर अपने आपको अगले सवाल के लिए तैयार किया....

"तांत्रिक से मिले हो तुम?" मानव ने पूचछा..

"ज्जई.. नही!" नितिन के ऐसा कहते ही उसके साथ बैठे रवि ने उसको हैरत से देखा.. नितिन ने उसका हाथ दबाकर चुप रहने का इशारा किया तो वह बिफर उठा," मेरा हाथ क्यूँ दबा रहे हो भाई.. जो सच है.. वही बताओ ना.. कल तुमने मुझे बताया था कि....."

नितिन ने सकपका कर उसकी और देखा.. ," वो मैने यूँही कह दिया था यार.. ताकि तुम्हे उसकी बात पर विस्वास हो जाए..."

"कमाल है ना? तुम सच्चाई का पता लगाना चाहते थे.. पर तांत्रिक से मिले बिना ही तुम्हे उसस्पर विस्वास हो गया.. तुम हर हालत में ये चाहते थे की रोहन को श्रुति की बात पर.. या मैं इसको सही करके कहूँ तो तुम्हारी बनाई हुई बात पर विस्वास हो जाए, इसीलिए तुमने इनको झूठ बोल दिया कि मैं तांत्रिक से मिल चुका हूँ.. जब तुम किसी से मिले ही नही तो छानबीन क्या घंटा की तुमने..!" मानव कुर्सी से खड़ा हो गया....

नितिन के पास कोई जवाब नही था.. वो चुप बैठा सामने देखता रहा...

"बोलते क्यूँ नही..?" मानव वापस कुर्सी पर बैठ गया..

शेखर और अमन जो अब तक परेशान से बैठे थे, वो भी मामले में दिलचस्पी लेने लगे थे...

"अब मैं क्या बोलूं सर.. आप बेवजह बात को घुमा फिरा कर देख रहे हैं..." नितिन हताश सा हो गया था...

"एक बात बोलूं? तुम पढ़े लिखे दिखाई देते हो इसीलिए अपना भेजा खपा रहा हूँ.. वरना यहाँ बातों को घुमाने की ज़रूरत नही पड़ती.. हाथ घूमने से काम जल्दी बन जाता है.. वो चीखें सुन रहे हो ना तुम?" मानव ने तैश में आकर कहा...

"जी!" नितिन और कुच्छ नही बोला...

"अब ध्यान से सुनो! जितनी कहानी मेरी समझ में आ गयी है.. वो मुझसे सुनते जाओ.. और बीच बीच में मेरे सवालों को नोट करते जाना और आख़िर में सबका जवाब एक साथ देना... वरना मैं भूल जाउन्गा की तुम भी मेरी तरह इंसान हो!" मानव ने कड़वे लहजे में बात कही और...शुरू हो गया..

"मुझे नही पता कि सपने वाला क्या ड्रामा था और ना ही मैं उनका जिकर करूँगा.. पर जब रोहन बतला आ गया तो जाने तुम्हे क्या खुजली शुरू हो गयी.. तुम श्रुति से मिले.. पता नही कैसे और क्यूँ, पर तुमने रोहन के सपने वाली बात का फायडा उठाने के लिए श्रुति को ज़बरदस्ती अपने साथ मिलाया और कहीं रोहन तुम्हारे हाथ से ना निकल जाए इसीलिए तुम श्रुति को यहीं ले आए.. तुमने उसको अश्लील सी नाइटी उसको पहनाई और रोहन के कमरे में भेज दिया.. उसके पास इस तरह का कोई और कपड़ा क्यूँ नही मिला..सबूत हैं उसके वो कपड़े, जो उसने कल दिन में पहन रखे थे और रात को तुम्हारे बाथरूम में मिले.. कुच्छ कहना चाहते हो इस बारे में...?"

"मुझे नही पता की उसके कपड़े मेरे बाथरूम में कैसे आए...? हो सकता है जब में बाहर था तो वो बाथरूम में कपड़े चेंज करके गयी हो... सर आप.." नितिन के माथे पर पसीना छलक आया.. उसको अहसास हो चुका था कि वो घिरता जा रहा है...," मैं उसको कोई भी नाइटी पहन'ने को क्यूँ दूँगा भला...? मेरा क्या फायडा होता इसमें..?"

"यही तो मुझे पता करना है कि तुम्हारा क्या फायडा होता? खैर.. श्रुति कोई बच्ची नही थी, अगर वह यूँही तुम्हारे कमरे में कपड़े बदलने गयी होती तो अपने कपड़े कभी वहाँ नही छ्चोड़ती.. खास तौर पर वो ब्रा तो बिल्कुल नही जो वहाँ मिली... श्रुति एक ग़ैरतमंद लड़की थी जिसको तुमने वैश्या के तौर पर रोहन के सामने पेश किया".... इनस्पेक्टर की इस बात पर सामने बैठे सभी लोगों के चेहरे खुल गये..

"म्म्मै.. मेरी कुच्छ समझ में नही आ रहा सर आप कह क्या रहे हैं...!"

"अभी समझ में आ जाएगा..," वो श्रुति का लेटर लेकर आना!" मानव ने ऊँची आवाज़ में कहा. नितिन का चेहरा आस्चर्य और भय के मारे सफेद पड़ गया...

"जी.. लाया साहब!" और एक सिपाही आकर मानव को लेटर दे गया..

"सुनो.. श्रुति ने क्या लिखा है मरने से पहले..

"रोहन!

मुझे माफ़ करना.. मैने जो कुच्छ भी किया था.. वो तुम्हारे ही एक दोस्त के दबाव में आकर किया था... "

मानव लेटर को पढ़ ही रहा था की नितिन ने झपट्टा मारा और इस'से पहले कोई कुच्छ समझ पाता, वह लेटर को निगल चुका था... यह लेटर ही आख़िरकार उसको मौत के फंदे तक पहुँचा सकता था...," हां.. मैने किया है उसका खून.." नितिन कुर्सी से उठ कर अपना सिर पकड़ कर धरती पर बैठ गया और रोने लगा...

मानव ज़ोर का ठहाका लगाकर हंसा.. रोहन कुर्सी से उठा और एक ज़ोर की लात उसके पेट में मारी...," साले!" और रोहन भी अपना सिर पकड़ कर दीवार के साथ खड़ा हो गया...

"रिलॅक्स! अभी तो इसको बहुत कुच्छ बताना बाकी है.." मानव ने उसको गिरेबान से पकड़ा और वापस कुर्सी पर बिठा दिया..," अब तुम आराम से सब बता रहे हो या...?"

कुर्सी पर बैठा नितिन एक गहरी साँस छ्चोड़कर किसी मशीन की तरह चालू हो गया..

"मुझे आज अहसास हो रहा है कि दोस्त की दौलत हड़पने के चक्कर में मैं किस हद तक गिर गया हूँ.. इसके सपने पर मुझे तब भी विस्वास नही था और आज भी नही है.. पर मेरे दिमाग़ को इस बात का फायडा उठाने की हवस ने इस कदर जकड़ा की मैं गिरता ही चला गया... मैं श्रुति को ज़बरदस्ती अपनी बंद हो चुकी फॅक्टरी में ले गया.. वहाँ उसको डराया और अपने साथ सेक्स करने को मजबूर किया.. मैने उसकी सी.डी. बना ली थी. उसको ब्लॅकमेल करते हुए मैने उसको अपने साथ साज़िश में शामिल कर लिया.. मैं चाहता था कि वो रोहन के साथ शादी करके तलाक़ ले ले और क़ानूनन इसकी आधी प्रॉपर्टी की हकदार बन जाए.. फिर उस सी.डी. के दम पर सब कुच्छ मेरा ही होना था..
 
प्लान ये था कि मैं श्रुति से कहलवाकर रोहन को विस्वास दिल्वाउ कि 'श्रुति' ही वो 'नीरू' है जो उसके सपनो में आती है.. उसके बाद ये उस'से आराम से शादी कर लेता.. पर जब इसने मुझे बताया कि इसको यहाँ भी कोई 'नीरू' मिल गयी है तो मुझे सब कुच्छ मिट्टी में मिलता नज़र आने लगा... इसीलिए मैने उसको ज़बरदस्ती यहाँ आने के लिए तैयार किया... सब ठीक चल रहा था लेकिन जब उसने मुझे बाते की रोहन को उसकी कहानी पर विस्वास नही हुआ तो मैं दूसरा तरीका अपनाने पर मजबूर हो गया जो पहले ही मेरे दिमाग़ में था.. मैने शाम को ही रोहन के कमरे में केमरा फिट कर दिया था. श्रुति को मैने बोल दिया था कि मैने रोहन के रूम में केमरा फिट कर दिया है और मैं उसकी हर हरकत पर नज़र रखूँगा... और ये भी कि अगर इसको वो सेक्स के लिए मजबूर नही कर पाई तो उसको मेरे पास सोना पड़ेगा... मैने उसको 'वो' नाइटी पहन'ने को दी और रोहन के पास भेज दिया... यहीं पर मेरा दाँव उल्टा पड़ गया.. रोहन शायद उन्न कपड़ों की वजह से ही चिड गया और उसको रूम से बाहर निकाल कर उसको उसके कमरे में छ्चोड़ आया.. बाद मैं मैने उसको कयि फोन किए पर उसने फोन उठाया ही नही.. मैं उसके कमरे में गया तो 'वो' पंखे पर झूल रही थी.. नीचे लेटर रखा हुआ था.. मेरे पास अब कुच्छ बचा नही था.. मैने चुपचाप लेटर और उसका फोन अपनी जेब में डाला और बाहर निकल आया.. फिर भी मैं मानता हूँ कि उसका कातिल मैं ही हूँ.." कहकर नितिन फुट फुट कर रोने लगा...

कमरे में काफ़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा.. मानव ने ही कुच्छ देर बाद चुप्पी तोड़ी," रोने से कुच्छ नही होगा रोहन! पर श्रुति जाते जाते तुम्हे तुम्हारी आस्तीन में पल रहे एक ज़हरीले नाग से छुटकारा दिला गयी.. इसने तो सोचा भी नही होगा कि राजू मुझे फोन कर देगा और ये इस तरह फँस जाएगा... इसने तो चुपचाप लाश ठिकाने लगवा देनी थी और तुम्हारा दोस्त होने का ढोंग भी करता रहता.. फिर कभी डॅस'ता...अगर ये बाहर आते हुए कुण्डी बंद करनी ना भूलता तो शायद मैं तुम्हारी बात पर विस्वास करके मामले को पंचनामा होने तक यूँही छ्चोड़ देता.. और पंचनामे में तो शायद साबित हो ही जाएगा कि उसने आत्महत्या ही की है.. और कारण भी मैं यही मानता कि तुम्हारे कमरे से जॅलील होकर निकलने के बाद उसके पास कोई रास्ता ही नही बचा होगा..

पर तुम्हारे कुण्डी बंद करने और सुबह राजू को दरवाजा खुला मिलने पर ही मुझे पहली बार ये शक हुआ था कि हो सकता है कि किसी ने उसका खून कर दिया हो.. एक बात और.. आम तौर पर आत्महत्या करने वाले सभी लोग कोई ना कोई नोट छ्चोड़ कर ज़रूर जाते हैं.. वो भी हमें वहाँ नही मिला... इस'से भी मेरे इसी ख्याल को बल मिला कि हो ना हो उसका खून किया गया है.. उसके बाद इसके कमरे में श्रुति के कपड़े मिलना, निहायत ही कामुक नाइटी का पहन'ना, जो कि उसके नेचर से मेल नही खाती.. इसका उसको बतला लेकर आना.. और फिर तुम्हारे कमरे में बैठे हुए मुझे फॅन्सी लाइट के साथ केमरा लगा दिखाई देना; इन्न सब बातों ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था कि श्रुति को ब्लॅकमेल किया जा रहा था और बहुत पहले ही शक हो गया था कि इसी आदमी में गड़बड़ है... पर जब तक कि इसने वो कोरा कागज मेरे हाथ से नही छ्चीना था.. मुझे विस्वास नही हो रहा था कि गुत्थी इतनी आसानी से सुलझ जाएगी.."

"खैर.. अब तुम जा सकते हो.. अगर इंसानियत के नाते इसकी जमानत का प्रबंध करवाना चाहते हो तो अप्लिकेशन लगवा देना कोर्ट में.. ना चाहो तो भी कम से कम इसके घर वालों को तो इत्तला कर ही देना..." मानव ने कहा और नितिन को उठाकर ले गया...

"अब यूँ मुँह लटकाए क्यूँ बैठे हो यार.. जो कुच्छ हुआ उसका हम सबको अफ़सोस है.. पर हम कर ही क्या सकते थे? गनीमत है कि उस नितिन की असलियत बेपर्दा हो गयी.. दोस्ती के नाम पर कलंक था वो!" अमन ने रोहन के पास बैठ उसके कंधे पर हाथ रख लिया..

"सॉरी यार! मेरी वजह से तुम्हे ये दिन देखना पड़ा.. थाने तक जाना पड़ा. मैं माफी चाहता हूँ.." रोहन ने कंधे पर रखा अमन का हाथ पकड़ लिया..

"अबे साले.. देखा शेखर! अब ये हमें भी नितिन जैसा समझ रहा है.. ये बात कहकर तो तुमने हमें गाली सी दे दी.. हमारा क्या घिस गया..? सच्चाई ही सामने आई ना.. चल छ्चोड़, तुझे स्पेशल चाय पिलाता हूँ पंजाब वाली..सारी टेन्षन दूर हो जाएगी.. अबे राजू! साले चुगलखोर!" अमन ने राजू को आवाज़ लगाई...

पर राजू वहाँ होता तो मिलता!

"लगता है डर के मारे भाग गया साला! वैसे काम बंदे ने एक नंबर. का कर दिया.. अगर वो पोलीस को नही बुलाता तो हम तो यही समझते रहते कि श्रुति... " बात को पूरी किए बिना ही अमन आगे बोला," और नितिन सॉफ सॉफ बच जाता.. फिर जाने क्या तिकड़म खेलता तुम्हारे साथ.. खैर तू बैठ.. मैं चाय बनाकर लाता हूँ..!"

अमन कहकर उठने लगा तो शेखर खड़ा हो गया,"तुम लोग बातें करो.. मैं अपने हाथ का कमाल दिखाता हूँ आज.." और किचन की तरफ चला गया...

"फिर अब क्या सोचा है?" अमन वापस उसके पास बैठते हुए बोला.. रवि का दिमाग़ बहुत ज़्यादा खराब था.. पास ही सोफे पर पसरा हुआ वो अपने चेहरे को रुमाल से ढके लेटा हुआ सा था....

"अब करने को बचा ही क्या है? श्रुति के पापा को बताना पड़ेगा..." रोहन की आँखें भर आई..," फिर वही जिंदगी काटनी है यार... सुबह कॉलेज.. शाम को घर!"

"क्यूँ? अपनी नीरू को भूल जाएगा क्या? उसको ऐसे ही तड़पति रहने देगा अब?" अमन को लगा जैसे वह नीरू को तो भूल ही गया है..

"अब सोचने को क्या बचा यार.. अब तो सब सॉफ हो ही गया कि ये नितिन की साज़िश थी.. सपने भी उसी की वजह से आते होंगे..." रोहन ने यूँही मुँह लटकाए हुए कहा...

रवि उसकी बात सुनते ही उच्छल बैठा,"अबे साले.. मुझे डमरू कहता है; खुद तूने कभी दिमाग़ का यूज़ किया है कि नही.. या वो है ही नही तेरे अंदर.. नितिन ने साज़िश तेरे उसको सपने के बारे में बताने के बाद शुरू की.. श्रुति की बात साज़िश हो सकती है.. उसके सपनों की बात झूठी हो सकती है.. हो क्या सकती है, झूठी ही थी... पर तेरे सपने तो किसी की साज़िश नही है ना.. वो तो सच ही हैं.. और जो घर तू सपने में देखता था.. वैसा ही घर तू नीरू का बता रहा है.. अब तो ये सॉफ हो गया ना कि यही वो लड़की है जिसका तुझसे जनम जनम का संबंध है.. कहाँ से सोच रहा है तू.."

"हां.. यार.. मेरा तो कल से दिमाग़ ही खराब है.. आक्च्युयली सुबह ये सब देखने के बाद कुच्छ और सोच ही नही पाया.. जो कल रात को सोच रहा था वही अब तक सोच रहा हूँ.. इसका मतलब 'नीरू' है!" रोहन की आँखों में हल्की सी चमक आ गयी...

"नही नही.. नीरू कहाँ है..!" रवि मुँह कड़वा सा करके बोला," मैने तुझे कल भी बोला था.. कि मुझे नितिन के मन में खोट लग रहा है.. पर तूने मेरी बात सुनी ही नही.. नितिन के कहानी में इतना इंटेरेस्ट लेने की जो बात इनस्पेक्टर कह रहा था.. वही बात तुझसे मैं करना चाहता था.. इन्फेक्ट वो मुझे मार्केट में जब कहानी बता रहा था.. तभी मुझे शक हो गया था कि नितिन झूठ बोल रहा है.. और झूठ भी अपनी मर्ज़ी से.. पर यहाँ सुनता कौन है मेरी.. चली गयी ना बेचारी श्रुति!" रवि की आँखें लाल हो गयी...

"छ्चोड़ो यार! जो हुआ सो हुआ!" अमन ने रवि को शांत करने की कोशिश की...

"ऐसे कैसे छ्चोड़ सकते हैं मिस्टर. अमन!" कमरे में इनस्पेक्टर मानव ने प्रवेश किया तो तीनो चौंक कर खड़े हो गये..," आइए इनस्पेक्टर साहब!" अमन उसका स्वागत सा करता हुआ बोला...

"लेटर पढ़ कर मेरा दिमाग़ खराब हो गया है.. इसीलिए मुझे यहाँ आना पड़ा.. सॉरी!" मानव ने मुस्कुराते हुए कहा..

"अरे जब चाहिए आइए.. आपका ही घर है.. पर आप तो कह रहे थे कि लेटर नही था.. सिर्फ़ एक कोरा कागज ही था जो आप हमारे सामने पढ़ रहे थे..!" अमन ने उत्सुक होकर पूचछा...

तभी कमरे में ट्रे उठाए हुए शेखर ने प्रवेश किया.. इनस्पेक्टर को बैठे देख एक बार उसके कदम ठितके.. फिर चुपचाप आकर टेबल पर चाय रख दी..

"थॅंक्स! बड़ी देर से इच्च्छा हो रही थी... राजू भाग गया क्या?" मानव ने एक कप उठाते हुए शेखर के चेहरे की और देखकर कहा...

"जी.. उसने सोचा होगा कि.." अमन अपनी बात पूरी करता इस'से पहले ही इनस्पेक्टर बोल पड़ा," डॉन'ट वरी.. शाम तक वापस आ जाएगा.. वैसे तुम सब को तो खुशी ही हो रही होगी कि नितिन की असलियत का पता लग गया...

"जी बिल्कुल!" इस बार रोहन बोला," पर वो लेटर के बारे में आप क्या कह रहे हो..."

"हुम्म.. दरअसल जो लेटर श्रुति ने लिखा था, वो हमें नितिन की तलाशी लेते हुए उसकी जेब से मिला.. ये लो.. पढ़ो ज़रा लेटर को.. उस की कॉपी है.." मानव ने लेटर रोहन को पकड़ा दिया...

छ्होटा छ्होटा लिखा हुआ था.. शायद कागज श्रुति के पास कम था... रोहन उसमें आँखें जमाकर उसको बोल कर पढ़ने लगा..

------------------------------------------

"रोहन!

सुबह जब आप सोकर उठेंगे तो मैं इस दुनिया में आपको नही मिलूंगी. निहायत ही शर्मनाक हरकत की मैने आपके साथ; मेरा भी दिल रो रहा था उस वक़्त. प्लीज़ मुझे माफ़ कर देना. सब मेरी मजबूरी थी. मजबूरी भी ऐसी की बता नही सकती. वरना मेरे 'बापू' जीते जी मर जाएँगे. पर मैं आपसे बे-इंतहा प्यार करती हूँ, और आपकी नज़रों का अब सामना नही कर सकती. इसीलिए दुनिया छ्चोड़ कर जा रही हूँ.

हो सके तो मेरे बापू के पास चले जाना. जीते जी मैने कोई ऐसा काम अपनी मर्ज़ी से नही किया जो उनके मान सम्मान को ठेस पहुँचाए. मरने के बाद 'कोई' मुझे बदनाम कर सकता है. हो सके तो उनको संभाल लेना!

कहते हैं कि भगवान की मर्ज़ी के बिना तो पत्ता भी नही हिलता. भगवान मिलेंगे तो उनसे कुच्छ बातें पूच्हूँगी. मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ? कौन्से कर्मों की सज़ा मिली मुझे? मैने तो कभी किसी की तरफ नज़र उठाकर भी नही देखा, किसी के बारे में सोचा तक नही, सिवाय आपके. फिर मुझे आप के सामने ही जॅलील क्यूँ करवाया? क्यूँ नही उन्होने पहले ही मुझे उठा लिया अपनी गोद में.. उन्होने ये 'प्यार' बनाया ही क्यूँ? और बनाया भी तो हर बार अधूरा ही क्यूँ छ्चोड़ दिया, क्यूँ नही मिलने देते वो प्यार करने वालों को..?

फिर प्रार्थना करूँगी उनसे.. इस जनम में नीरू का प्यार उसको दे दें. और अगले जनम में मुझे मेरा अधूरा प्यार!

तुम्हारी हो चुकी हूँ, इंतजार करूँगी; अगले जनम में!

श्रुति"

-------------------------------------------------------

सभी की आँखें नाम हो गयी थी.. सिवाय मानव के," तुम श्रुति से कितनी बार मिले थे रोहन?"

"जी, बस दो बार.. एक बार उसके घर पर, और एक बार कल रात को!" रोहन ने रुमाल निकाल अपनी आँखें पौंचछते हुए कहा....

"तुम्हारे बीच कुच्छ बातें भी हुई थी क्या? आइ मीन, रोमॅंटिक.. प्यार भरी..!" मानव ने पूचछा...

"जी नही.. जो भी हुई थी, या तो कल दिन में हुई थी.." रोहन कुच्छ देर रुका और फिर फट सा पड़ा,"या फिर रात में.." कहता हुआ रोहन बिलखने लगा.. रात को उसने श्रुति के साथ जैसा व्यवहार किया, उसको याद करके....

"कूल डाउन यार.. लाइफ में सब कुच्छ होता रहता है.. तुम्हारी जगह कोई भी शरीफ इंसान होता, तो वो भी यही करता.. तुम्हे थोड़े ही पता था कि वह मजबूरी में वो सब कर रही है.. पर ये एक ही बात मेरी समझ में नही आई अभी तक! मैं वहीं जान'ने आया हूँ..." मानव ने उसको खुद को संभालने की सलाह दी..

"क्या?" रोहन बोला..

" मैने कभी प्यार किया नही है.. पर जहाँ तक मेरा ख़याल है.. प्यार तो धीरे धीरे होता है.. खास तौर पर इतना प्यार की कोई किसी की नज़रों से गिर जाने पर स्यूयिसाइड ही कर ले.. उसके पास और भी रास्ते थे.. नितिन 'केमरे' में देख ही लेता कि श्रुति ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की.. फिर वह जैसे चल रहा था.. वैसे भी चलने दे सकती थी.. जान देना तो आख़िरी हथियार होता और वो तो कभी भी कर सकती थी.. अगर कोई रास्ता ना बचता तो?" मानव ने कहा," और सबसे खास बात, श्रुति को प्यार कब हो गया रोहन से.. अगर वह इस'से कभी घुली मिली ही नही.. समय नही गुज़ारा साथ!"

इस बार अमन खुद को बोलने से नही रोक सका," सच कह रहे हो इनस्पेक्टर साहब.. 'प्यार' किए बिना पता ही नही चलता कि 'साला' ये होता क्या है.. इत्ता छ्होटा सा नाम है.. पर इसमें रंग इतने भरे हुए हैं कि आदमी सिर्फ़ अपने प्यार को समझ सकता है.. दूसरे के प्यार को नही.. "

"कभी कभी हम सालों साथ रह जाते हैं और पता ही नही चलता की हमें 'प्यार' हो गया है.. जुदा होने के बाद हमें अहसास होता है कि 'उसके' बिना जीना कितना मुश्किल है.. तब हमें पता चलता है कि हमें तो प्यार हो गया था.."

"कभी कभी पहली नज़र में ही हमें प्यार हो जाता है और हम समझ जाते हैं कि 'यही' प्यार है.. बोलना चाहते हैं, पर कभी बोल ही नही पाते.. जाने क्यूँ उसके सामने कभी ज़ुबान ही नही खुलती.. और जब खुलती है तो अलग होना हमारी मजबूरी बन चुका होता है.."

"एक तरफ़ा प्यार भी होता है.. हम पागल होकर किसी के पीछे लग जाते हैं और लाख जतन करके भी उसको अहसास ही नही करा पाते की 'वो' हमारे लिए क्या है.. उसके लिए सब कुच्छ छ्चोड़ देते हैं.. अपनी मंज़िल, मा-बाप के सपने, सब कुच्छ भूल कर सिर्फ़ एक ही चीज़ याद रहती है,'उसका नाम!' अपना सब कुच्छ बर्बाद करने के बाद भी हमें कभी पचहतावा नही होता कि उसने हमारे प्यार को तवज्जो नही दी.. और छ्चोड़ कर चली गयी..."

"कभी कभी 'उसकी' नफ़रत से भी हमें प्यार हो जाता है.. और हम सामने वाले पर उसकी नफ़रत के बावजूद उस पर जान लुटाने को तैयार रहते हैं.. 'पतंगा' क्या अग्नि से निकलने वाली आँच महसूस करके झुलस्ता नही होगा.. पर फिर भी वो 'उसमें' जान दिए बगैर मानता नही.. ये भी प्यार ही है.."

"श्रुति का प्यार रोहन की नफ़रत से ही पैदा हुआ होगा.. इसकी ऐसी नफ़रत जिसने रोहन के व्यक्तिताव को उसकी नज़रों में कहीं ऊँचा उठा दिया.. इसने उसके खुद को इसको सौंपने पर भी 'प्यार' नाम की कद्र रखी.. और उसको हाथ नही लगाया... वह आई यहाँ मजबूरी में थी.. पर रोहन की इंसानियत देख वह इस पर मर मिटी.. उसने दोनो तरह के लोग देख लिए; नितिन जैसे भी और फिर रोहन जैसे भी.. प्यार होता कैसे नही रोहन से!"

"प्यार..." अमन बिना रुके बोलता ही जा रहा था कि मानव ने उसको टोक दिया," तुमने 'प्यार' में पीएचडी कर रखी है क्या? या कोई 'लोवेगुरू' हो?"

"नही इनस्पेक्टर साहब! प्यार का कोई गुरु कैसे हो सकता है. प्यार ही पैदा करता है और प्यार ही जान ले लेता है.. प्यार ही सब कुच्छ सिखाता है और प्यार ही सब कुच्छ भूलने पर मजबूर करता है.. प्यार ही आदमी को खड़ा करता है और प्यार ही गिरा देता है.. सारी दुनिया उसकी गुलाम है.. सारी दुनिया उसके ही कारण चल रही है.. प्यार ही सबका गुरु है..." अमन ने गहरी साँस छ्चोड़ी...

"उफ़फ्फ़.. मैं तो तुम्हे ऐसे ही समझ रहा था यार.. तुम तो कमाल हो.. माइ नेम ईज़ मानव, नाइस टू मीट यू ब्रो!" मानव ने अमन की और हाथ बढ़ाते हुए कहा.. अमन ने दोनो हाथों में उसका हाथ पकड़ लिया...

"अब चलने का टाइम हो गया भाई.. जल्द ही मिलूँगा तुमसे.. मुझे भी प्यार करके देखना है यार.. हा हा हा" मानव ने कहा और बाहर निकल गया...

कहानी जारी है.................................

 
अधूरा प्यार--13 एक होरर लव स्टोरी

गतांक से आगे ..........................................

"अरे शीनू! आज कॉलेज नही जाना क्या?" मम्मी ने नीचे से आवाज़ लगाई...

"जा रही हूँ मम्मी जी! बस ऋतु आ जाए एक बार!" नीरू ने उपर से ही आवाज़ लगाकर जवाब दिया और परदा हटाकर सामने सड़क की और देखा. ऋतु का घर सामने वाली गली में कुच्छ घर छ्चोड़ कर ही था. उसे जब ऋतु आती नही दिखाई तो सीढ़ियों से तेज़ी से उतरती हुई नीचे आई और ऋतु के घर फोन मिलाया,"हेलो, नमस्ते आंटिजी!"

"नमस्ते बेटी!" फोन पर शायद ऋतु की मम्मी थी..

"आई नही ऋतु अभी तक.. मैं वेट कर रही हूँ उसका.." नीरू ने पूचछा...

"बस अभी अभी निकली है बेटी.. देख.. पहुँच गयी होगी.." उधर से जवाब मिला ही था कि डोर बेल बज उठी.

"लगता है आ गयी.. अच्च्छा आंटीजी!" कहकर नीरू ने फोन रखा और अपनी किताबें उठा कर बाहर की ओर निकल गयी.. ऋतु दरवाजे पर ही खड़ी उसका इंतजार कर रही थी..

"कर दिया ना क्लास से लेट.. क्या कर रही थी अभी तक तू?" नीरू ने बाहर निकलते ही ऋतु से शिकायती लहजे में कहा..

"अरे मैं आई थी यार.. तुझे पता है.. वो दोनो आज फिर चौंक पर खड़े थे.. मैं वापस चली गयी.. खम्खा आज फिर पंगा खड़ा कर देते.. कोई भरोसा नही उस बंदर का..." ऋतु ने नीरू के साथ साथ चलते हुए मुँह सा बनाकर कहा..

"कौन दोनो? किसकी बात कर रही है तू?" नीरू ने आस्चर्य से पूचछा...

"अरे वही यार.. जिनका फोन गुम गया था बस में.. आज फिर यहाँ आए हुए थे.. पता नही क्या प्राब्लम है..?" ऋतु ने जवाब देते हुए कॉलेज के सामने वाली सड़क पार करने के लिए दोनो और देखा," ओह माइ गोड! वो खड़े दोनो.. चल सीधी चल.. !"

दोनों ने तेज़ी से सड़क पार की और कॉलेज में घुस गयी...

"नीरू को नज़र भर देख लेने से ही मेरी सारी थकान मिट गयी यार" रोहन ने कलेजे पर हाथ रखते हुए रवि को कहा...

"तू थकान मिटाने आया था या बात करने.. अगर तू यूँही 50 गज दूर खड़ा होकर उसके खुद तेरे पास आने का इंतजार करता रहा ना तो इस जनम में भी बेचारी यूँही चली जाएगी.. मैने कहा था ना गेट पर खड़ा होने के लिए.. तब तो तेरी फट गयी..." रवि उसको खींचते हुए गेट की तरफ ले गया....

" पर यार, ये अच्च्छा नही लगता.. समझा कर.. अमन ने बोला है ना गौरी को.. वो कर लेगी बात!" रोहन ने उसको वापस खींच लिया..," चल चलते हैं वापस!"

"अरे शीनू! तू अब आई है.. तुझे कोई पूछ रहा था..." उनको देखकर एक लड़की उनके पास आ गयी....

"कौन? और तू बाहर क्या कर रही है.. क्लास में नही गयी क्या?" नीरू ने सामने से आ रही लड़की को देखकर पूचछा...

"गयी थी यार.. सिर्फ़ 1 मिनिट लेट थी, सर ने निकल दिया.. तुम भी मत जाना.. कोई फायडा नही अब!" लड़की ने जवाब दिया..

उन्न दोनो का मुँह लटक गया.. साथ वाले पार्क में बैठते ही नीरू ने पूचछा..," कौन पूच्छ रहा था मुझे..?"

"पता नही यार.. कोई अंजान लड़की थी.. पहले नीरू करके पूचछा.. फिर शीनू करके.. नीरू भी तेरा ही नाम है क्या?" लड़की ने जवाब देकर सवाल किया....

"नही! मेरा नाम शीनू ही है..!" नीरू ने कहते हुए पूचछा," कॉलेज की नही थी क्या?"

"कॉलेज की होती तो मैं पहचान ही ना लेती.. कोई बाहर से आई थी.. तुम्हारा घर भी पूच्छ रही थी.. मैने बता दिया... शायद इस शहर की ही नही थी वो.. हरयाणा साइड का पुट था आवाज़ में...!"

"कौन हो सकती है ?" नीरू दिमाग़ पर ज़ोर लगाकर सोचने ही लगी थी कि एक और लड़की सामने से उनकी और ही आ रही थी..," हाई!"

"हाई सोना! क्या हाल हैं?" ऋतु और नीरू ने लगभग एक साथ पूचछा..

"मैं तो ठीक हूँ.. 'वो मिली क्या?" सोना ने उनके पास बैठते हुए कहा...

"कौन?" ऋतु ने पूचछा..

"पता नही.. एक सुंदर सी लड़की सुबह सुबह तुम्हे पूछ्ति फिर रही थी.." सोना ने जवाब दिया...

नीरू अपनी उंगली को दाँतों के बीच दे कर अपने नाख़ून कुतरने लगी और अपनी आँखों को सोचने के अंदाज में चौड़ी कर लिया..," हद है यार.. कौन हो सकती है..?"

"तू छ्चोड़ ना.. जो कोई भी होगी.. घर बता दिया ना उसने!" ऋतु ने नीरू के सिर पर हाथ मारा..

"आ शीनू! इधर आना एक बार!" कॉलेज के अंदर की तरफ से आ रही शिल्पा ने उनसे थोड़ा दूर खड़े होकर ही नीरू को पुकारा..

"हुम्म.. आ रही हूँ!" नीरू ने कॉपी उठाई और शिपा के पास आकर खड़ी हो गयी..," अब तू भी ये मत कहना कि मुझे कोई ढूँढ रही थी.."

"हाँ.. पर तुझे कैसे पता?" शिल्पा ने पलट कर कहा...

"बस पता लग गया.. हर किसी से उसने ये बात पूछि है शायद! चल छ्चोड़.. कुच्छ और भी काम था क्या?"

"हाँ.. तेरे पास टाइम है ना?" शिल्पा ने उसका हाथ पकड़ कर कहा...

"हां बोल! ये पीरियड तो खाली ही समझ!" नीरू ने कहा और उसके साथ साथ चलने लगी....

"तेरा नाम नीरू भी है ना?" शिपा ने यहीं से बात शुरू की...

"कितनी बार कहूँ यार.. कोई मुझे नीरू ना कहा करो.. मेरा नाम शीनू है शीनू!" नीरू चिड सी गयी...

"गुस्सा क्यूँ होती है? तुझे पसंद नही तो कॉपी पर क्यूँ लिखा हुआ है?" शिल्पा ने कॉपी पर लिखे नाम की और इशारा किया...

"हे भगवान! ये किसने लिख दिया...? नीरू ने झट से पेन निकाला और पूरे नाम को मिटा दिया..," मेरे साथ ऐसा मज़ाक मत किया करो यार.. प्लीज़!"

"मैने क्या किया है शीनू? मैने तो सिर्फ़ लिखा दिखाया है.. 'वो लड़की भी पहले नीरू ही पूच्छ रही थी.. जब मेरी समझ में नही आया तो उसने शीनू कहा.. घर पूच्छ रही थी तेरा.. पर मुझे पता ही नही था.. खैर मुझे तुझसे कोई और बात करनी है..!" शिल्पा ने उसका हाथ पकड़ा और पार्क के एक कोने में अपने सटक उसको भी बिठा लिया...

"बोल!" नीरू का मूड खराब हो गया था...

" देख मुझे पता है तुझे ये सब पसंद नही.. फिर भी, सुन लेना पूरी बात.. बीच में उठकर मत भागना.." शिल्पा ने भूमिका बाँधी...

"ऐसी क्या बात है? बोल ना!" नीरू ने उत्सुकतावश उसकी तरफ देखा...

" वो....... कोई तेरे लिए 500 किलोमीटर से चलकर आया है.. पूरी बात सुन लेगी ना!"

"कौन आया है? क्या कह रही है तू.. अब पहेलियाँ मत बुझा.. जो बोलना है.. एक लाइन में बोल दे..." नीरू बात जान'ने के लिए जिगयासू सी हो गयी...

"रोहन! बहुत प्यार करता है तुझसे... सुन तो!" उठकर भाग रही नीरू का हाथ पकड़कर शिल्पा ने वापस खींच लिया," मैने पहले ही कहा था कि तू पूरी बात सुन लेना एक बार! फिर तेरी मर्ज़ी है..."

"और कोई भी बात कर ले.. पर ये बकवास बातें मुझे पसंद नही.. क्या होता है प्यार? 500 किलोमीटर दूर से किसी को मुझसे प्यार हो गया.. उसको कोई सपना आया था क्या मेरा!" नीरू ने व्यंग्य किया...

"हां.. सपने ही आते हैं उसको तेरे.. तभी आया है वो यहाँ पर.. पता है तुझे या सब अच्च्छा क्यूँ नही लगता? तेरे सीने में दिल नही है.. इसीलिए!" शिल्पा ने सपस्ट करने की कोशिश की....

"हा हा हा हा.. मेरे सीने में दिल नही है.. व्हाट ए जोक यार.. फिर मैं जिंदा कैसे हूँ.. ये क्या धड़क रहा है मेरे दिल में..." नीरू ने अपना दायां हाथ सीने पर रखकर अपनी धड़कन को महसूस किया..,"आज तो फर्स्ट एप्रिल भी नही है.. फिर क्या इरादा है तेरा.." नीरू अब तक हंस रही थी...

"तू मेरी बात को सीरीयस क्यूँ नही ले रही...!" शिल्पा ने नीरू के दोनो कंधे पकड़े और उसको झकझोर दिया...

"क्या सीरीयस लूँ यार तेरी बातों को.. कौनसी शदि में जी रही है तू.. अब ये कोई बात हुई की मेरे सीने में दिल नही है... 500 किलोमीटर दूर बैठे किसी को मेरे सपने आते हैं.. उसको मुझसे प्यार हो गया है.. हा!" नीरू उसकी बातों से चिदती हुई बोली...

"यार, दिल से मेरा मतलब फीलिंग्स से है.. तू एक बार उस'से मिल ले बस! तुझे सब समझ आ जाएगा...!" शिल्पा ने ज़ोर देकर कहा....

" किस'से मिल लूँ? कहाँ मिल लूँ?" नीरू ने मजबूर होकर कहा...

"आ.. मेरे साथ तू एक बार कॉलेज के गेट तक आ!" शिल्पा नीरू को उठाकर लगभग ज़बरदस्ती खींचती हुई कॉलेज के गेट पर ले गयी.. रोहन और रवि को जैसे ही नीरू ने अपनी और आते देखा.. उसकी घिग्गी बँध गयी.. अपना हाथ छुड़ाकर भागती हुई वापस अंदर आई और ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी....

"क्या हुआ? तू भाग क्यूँ आई..?" शिल्पा उसके पिछे पिछे आई और गुस्से से उसको देखने लगी....

"ये..." नीरू अब भी ज़ोर ज़ोर से हंस रही थी..," इसको आते हैं मेरे सपने.. अरे तेरा उल्लू बना दिया... इनको हम बस में मिले थे..अमृतसर से आते हुए.. तब से पिछे पड़ें हैं.. हा हा हा हा..."

कहानी जारी है...............................

 
अधूरा प्यार--14 एक होरर लव स्टोरी

गतांक से आगे ...............................

अधूरा प्यार--14

"क्या हुआ? बात हुई क्या उस'से?" अमन जैसे घर पर रोहन और रवि का ही इंतजार कर रहा था," बात बनी कि नही?"

रोहन ने आकर बिस्तेर पर पसरते हुए अपना सिर 'ना' में हिला दिया," गेट तक आई थी.. वापस भाग गयी.. एक और लड़की थी उसके साथ!" रोहन ने सीधा लटेकर अपने चेहरे को तकिये से ढक लिया...

"मैने तो बोला था इसको.. सीधी बात करनी चाहिए थी.. जनाब तो गेट के पास खड़ा होने से भी डर रहे थे.. ऐसे बात थोड़े ही बन'ती है यार..." रवि हताश होता हुआ बोला...

अमन रवि की और देखकर मुस्कुराया,"बन जाएगी यार.. पर सब्र तो करना पड़ेगा ना.. ये काम इतनी जल्दी नही होने वाला है.. एक मिनिट! मैं गौरी से बात करता हूँ!" कहकर अमन ने फोन निकाल लिया....

"हेलो!"

"हाँ अमन, बोलो!"

"क्या रहा? क्या बात हुई शीनू से?" अमन ने सीधे बात पर ही आते हुए पूचछा....

"वो... मैं आजकल कॉलेज नही जा रही.. मैने शिल्पा को बोला था बात करने के लिए.. सब समझा भी दिया था उसको! उसका नंबर. देती हूँ.. तुम उसी से बात कर लो.." गौरी ने जवाब दिया...

"हूंम्म.. लाओ! दो नंबर." अमन ने कहते हुए नंबर. नोट करने के लिए रोहन का फोन उठा लिया...

गौरी ने अमन को शिल्पा का नंबर. लिखवा दिया," एक मिनिट अमन! क्या इस सबके लिए शेखर नही फोन नही कर सकता उसको?"

"हां हाँ! मुझे क्या प्राब्लम है..? शेखर कर लेगा! कोई खास वजह है क्या?" अमन ने पूचछा....

"नही.. बस ऐसे ही.. वो.. वो उस'से बात भी करना चाहती है..." गौरी ने टालते टालते भी बात कह ही दी...

"ठीक है! मैं अभी उसको बोल देता हूँ... वो बात कर लेगा!" अमन मुस्कुराया और फोन काट दिया..

"एक मिनिट! मैं शेखर को उठाकर लाता हूँ... शिल्पा ने बात की हैं नीरू के साथ.. वोही बताएगी क्या पोज़िशन है?" अमन ने कहा और बाहर निकल गया...

------------------------------------------------------------------------

"क्या बात है बे? तू तो सेट्टिंग कर भी आया और मुझे बताया तक नही!" अमन ने दूसरे कमरे में घुसते ही सो रहे शेखर को पकड़ कर ज़ोर से हिला दिया.. शेखर हड़बड़कर उठ बैठा," क्या? ... क्या हुआ?"

"ले.. ये ले तेरी शिल्पा का नंबर., उसको तुझसे बात करनी हैं.. और हां.. ये पूच्छना मत भूलना की नीरू का क्या रेपोंस रहा.." अमन ने शेखर का फोन उठा शिल्पा का नंबर. डाइयल किया और फोन शेखर को पकड़ा दिया..

शेखर ने फोन काटा और अमन को घूर्ने लगा....

"जा रहा हूँ साले.. करले फोन अकेले अकेले.." अमन हंसा और बाहर निकल गया...

शिल्पा के बारे में सोचते ही शेखर की धड़कने बढ़ गयी.. 'आख़िर क्या बात करनी हैं उसको' सोचते हुए शेखर ने दरवाजा अंदर से बंद किया और रिडाइयल करके फोन कान से लगा लिया..

"हेलो!" शिल्पा की मीठी सी आवाज़ फोन पर उभरी..

"हाई शिल्ल्लपा! मैं, ... शेखर!" शेखर ने आवाज़ से शिल्पा का परिचय करवाया..

"ओह्ह.. हाई! .... आपके पास मेरा नंबर. कहाँ से आया..?" शिल्पा की ज़ुबान लड़खड़ा गयी...

"मुझे तो यही बताया गया है कि आपको मुझसे कुच्छ बातें करनी हैं.. इसीलिए मैं तो समझा की आपने ही दिया होगा!" शेखर ने आराम से बिस्तेर पर पसरते हुए कहा...

"नही तो.. मैने तो कोई... मतलब.. मुझे तो..." शिल्पा ने कयि तरह से अपनी बात पूरी करने की कोशिश की.. पर कर नही पाई.. कॅंटीन में लगे शीशे के सामने खड़ी हो अपने आपको यूँ निहारने लगी मानो शेखर उसको देखने ही आ रहा हो...

"सॉरी देन! होप आइ डिड्न'ट डिस्टर्ब यू.. आइन्दा ऐसी ग़लती नही करूँगा..." शेखर ने उसकी ना-नुकर पर रूठ जाने का नाटक सा किया....

"नही.. नही.. मेरा मतलब था.. हां.. मुझे.. मुझे करनी थी बात.. वो..." शिल्पा के मुँह से अनायास ही निकल गया...

"थॅंक्स!... वो क्या?" शेखर मन ही मन मुस्कुराता हुआ बोला...

"वो... कब जा रहे हो यहाँ से?" शिल्पा को और कुच्छ सूझा ही नही....

"कहो तो... आज ही निकल जाउ?" शेखर ने अपने होंतों पर जीभ फेरते हुए आँखें बंद कर शिल्पा का सलोना चेहरा याद किया...

"नही.. नही.. मेरा मतलब है कि...." शिल्पा फिर रुक गयी...

"हूंम्म.. बोलो भी अब.. बोल भी दो यार!" शेखर के दिमाग़ पर मस्ती सवार हो गयी...

"क्कक्या?" शिल्पा हड़बड़ी के साथ बोली...

"और कुच्छ नही तो 'आइ लव यू!' ही बोल दो..." शेखर कहकर हँसने लगा..

"क्कैसे.. मतलब..." शिल्पा की हालत फोन पर ही खराब हो गयी...

"मतलब में ही उलझी रहोगी या कुच्छ काम की बात भी करोगी.." शेखर ने फिर उसको छेड़ा...

"क्क्या बात... करनी हैं.. मेरी समझ में नही आ रहा.." शिल्पा की साँसे उखाड़ने लगी थी.. उसकी समझ में ही नही आ रहा था की क्या बोले और क्या नही...

"वही.. वो नीरू ने क्या जवाब दिया.. रोहन के बारे में..." शेखर के इस सवाल को सुनते ही शिल्पा का ध्यान खुद पर से हटकर नीरू पर चला गया... और इसी के साथ वा सामान्य भी हो गयी.....

"ओह्ह! शी ईज़ इंपॉसिबल शेखर. मैने उसको समझाने के क्या क्या नही किया! पर उस'से इस बारे में बात करना ही बेकार है... पहली बात तो वो मानती ही नही की 'प्यार-प्रेम' जैसा कुच्छ वास्तव में होता भी है.. दूसरे रोहन के बारे में वो समझती है कि 'वो' बस में मिलने के बाद से ही उसके पीछे पड़ा है.. 'सपने' वाली बात उसको 'ड्रम्मा' से ज़्यादा कुच्छ नही लगी..."

"कुच्छ उम्मीद है अभी...तुम्हारी तरफ से..?" शेखर ने भी संजीदा होकर पूचछा..

"मुझे नही लगता उस पर कोई फ़र्क़ पड़ेगा.. पर तुम कहो तो मैं एक बार और कोशिश करूँ!" शिल्पा ने शेखर की बात को तवज्जो देते हुए कहा...

"नही.. अभी रहने दो.. अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं बता दूँगा... बाइ दा वे, थॅंक्स फॉर नाउ!"

"ये.. कैसी बात कर रहे हो.." शिल्पा ने बात पूरी भी नही की थी कि फोन कट गया.. फोन शेखर ने जानबूझ कर काटा था.. उसको विस्वास था कि अगर 'कुच्छ' होगा तो फोन वापस ज़रूर आएगा.. और उसका विस्वास सही निकला...

"फोन क्यूँ काट दिया था" शिल्पा हताश सी होकर बोली...

"मुझे लगा बात हो गयी है.. सॉरी!" शेखर ने कहा...

"नही.. हां.. मेरा मतलब था कि.... " शिल्पा फिर अटकने लगी...

"क्‍या बात है.. बोलो भी..?"

"हम.... वो... एक बार मिल सकते हैं क्या?" शिल्पा ने हड़बड़ाहट में जल्दी से कहा और जवाब को दिल की गहराई तक उतारने के लिए अपनी आँखें बंद कर ली...

"हां.. क्यूँ नही? पर कहाँ...?" शेखर का दिल मचल उठा....

"कहीं भी.. जहाँ तुम कहो!" शिल्पा की खुशी का कोई ठिकाना नही था...

"ओके! मैं बाद में फोन करता हूँ.. और कुच्छ?" शेखर ने कहकर फोन को चूम लिया.. इस चुंबन की आहत शिल्पा को अपने कानो में सुनाई पड़ी...

"आइ लव यू!" शिल्पा ने झट से कहा और जवाब सुन'ने से पहले ही फोन काट दिया....

"मम्मी! कोई लड़की आई थी क्या?" नीरू ने घर के अंदर घुसते ही दरवाजा बंद करते हुए पूचछा...

"नही तो! किसी को आना था क्या शीनू?" दरवाजा खोलकर वापस अंदर जा रही मम्मी जी पलट गयी...

"नही.. पर कॉलेज में कोई मुझे पूच्छ रही थी.. इसीलिए.." नीरू ने आनमने ढंग से जवाब दिया और उपर चढ़ने लगी...

"अरे.. खाना तो खा ले बेटी.. सुबह भी ऐसे ही निकल गयी थी तू!" मम्मी जी ने नीचे से आवाज़ लगाई....

"आ रही हूँ मम्मी! ज़रा कपड़े बदल लूँ..." नीरू ने जवाब दिया और उपर कमरे में घुस गयी..

अंदर घुसते ही उसकी निगाह टेबल पर पेपर वेट के नीचे फड्फाडा रहे कागज पर जाकर जम गयी.. उत्सुकता से उसने कागज निकाला और यूँही पढ़ने लगी.. पर जैसे जैसे वह पहली लाइन से दूसरी और दूसरी से तीसरी लाइन पर पहुँची.. उसके हाथ पैर जमने लगे और वह उसमें लिखे शब्दों के जाल में उलझती चली गयी...

"नाम बदल लेने से तकदीर नही बदल जाती नीरू! और खास तौर से तब; जब तकदीर की 'वो' गाढ़ी रेखायें शदियो पुराने इश्क़ का गला घोंट कर एक दूसरे के लिए प्यासी दो आत्माओ के एक हो चुके लहू में डुबोकर सातवें आसमान से भी उपर लिखी गयी हों."

नीरू अचंभित सी उस कागज के टुकड़े को निहारती रही, फिर दनदनाती हुई नीचे की और भागी..

"मम्मी! कौन गया था उपर? कौन आया था घर में?" नीरू का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था...

"बता तो रही हूँ, कोई नही आया.. मैं तो सुबह से ही यहाँ हूँ.. क्या हो गया?" मम्मी ने बेफिक्री वाले अंदाज में बैठे बैठे ही कहा...

बिना कुच्छ बोले नीरू बाहर निकली और दूसरी गली पर लगे गेट की कुण्डी देखी.. पर वहाँ तो ताला लगा हुआ था...

'उनकी इतनी हिम्मत हो गयी कि दीवार फांदकर चोरों की तरह घर में घुसने लगे' बड़बड़ाती हुई नीरू ने कागज के टुकड़े टुकड़े किए और डस्टबिन में फैंक वापस उपर चली गयी...

"सीसी...क्क्क...कौन.. है?" नीरू जड़ सी होकर कमरे से अटॅच्ड बाथरूम के दरवाजे के सामने खड़ी हो डर के मारे सूखे पत्ते की तरह काँपने लगी.. दोबारा उसकी हिम्मत दरवाजे को छ्छूने तक की नही हुई...

"मुंम्म्मममय्ययययययययययययी" अचानक नीरू की इश्स चीख से पूरा का पूरा घर दहल गया...

नीरू की आवाज़ सुनकर मम्मी जी बदहवास सी दौड़ी दौड़ी उपर आई.. देखा; नीरू दरवाजे के सामने ही खड़ी खड़ी काँप रही थी...," क्या हुआ शीनू? क्या हुआ बेटी?" किसी अनहोनी की आशंका से घबराकर उपर दौड़ी आई मम्मीजी को जब नीरू सही सलामत खड़ी नज़र आई तो उसको थोड़ी राहत मिली.. उसके पास आते ही उन्होने नीरू को बाहों में लेकर अपने साथ चिपका लिया...

"ववो.. बाथरूम में कोई है?" मम्मी जी से चिपकी नीरू ने आँखें तक नही खोली...

"चुप कर.. डरपोक कहीं की.. कौन होगा?" कहते हुए मम्मी जी ने ज़ोर से दरवाजे को अंदर धकेला तो वो खुल गया.. अंदर कोई नही था..," देख.. कोई भी तो नही है...!"

"पर कोई था मम्मी.. यहाँ ज़रूर कोई आया था.. दरवाजा भी नही खुला था अभी.. !" नीरू ने डरते डरते आँखें खोल कर बाथरूम के अंदर झाँका..

"पागल.. तुझे पता है ना ये थोड़ा ज़ोर लगाने से खुलता है.. चल जा.. कपड़े बदल ले.. मैं तेरे साथ ही नीचे चलूंगी..." मम्मी ने उसको धाँढस बाँधते हुए कहा...

"नही.. मैं नीचे ही बदल लूँगी... चलो!" अपने कपड़े उठती हुई नीरू मम्मी जी के साथ साथ नीचे चल दी...

-------------------------------------------------

"मम्मी!" नीरू ने खाना खाते हुए कहा...

"हां बेटी!"

"मेरा नाम पहले नीरू था ना?"

"क्यूँ बेवजह उठाती है पुरानी बातों को.. तुझे मना किया है ना किसी को भी वो नाम बताने से!" मम्मी जी थोड़ी नर्वस हो गयी...

"मम्मी!" नीरू ने खाना खाते हुए कहा...

"हां बेटी!"

"मेरा नाम पहले नीरू था ना?"

"क्यूँ बेवजह उठती है पुरानी बातों को.. तुझे मना किया है ना किसी को भी वो नाम बताने से!" मम्मी जी थोड़ी नर्वस हो गयी...

"मैं किसी को नही बताती मम्मी.. पर फिर भी.. बताइए ना! आप सब को क्यूँ 'उस' नाम से इतनी एलेयर्जी है?" नीरू के मंन में रह रह कर कागज पर लिखी पंक्तियाँ कौंध रही थी..

"कह दिया ना! कोई बात नही है.. हमें 'वो' नाम पसंद नही है बस.. तेरा नाम शीनू ही है.. और कुच्छ नही.. अब बिना सिर पैर की बातें छ्चोड़ और खाना खाकर पढ़ाई कर ले.." मम्मी जी ने कहा और उठकर बाहर चली गयी.. पर इस'से नीरू का कौतूहल शांत नही हुआ, उल्टा नाम के पिछे छिपि सच्चाई जान'ने की उसकी जिगयसा बढ़ गयी..

ऋतु के आने के बाद दोनो पढ़ने के लिए उपर चली गयी....

---------------------------------------------------------

रात करीब 12 बजे! नीरू को लाइट बंद करके अपनी किताबें बिस्तेर के साथ लगी टेबल पर रख कर लेटी हुए मुश्किल से आधा घंटा ही हुआ था.. अचानक कमरे में फैले हुए से प्रकाश से उसकी आँखें खुल गयी.. खिड़की के सामने कमरे में एक साया उभर आया था और रोशनी उसके पिछे से उत्सर्जित होती प्रतीत हो रही थी.. इसी कारण वह 'साए' के हवा में लहराते कपड़ों के अलावा कुच्छ भी देख पाने में समर्थ नही थी...नीरू डर के मारे इतनी सहम गयी कि उसकी चीख भी ना निकल सकी..बिस्तेर पर बैठकर नीरू पिछे दीवार से चिपक गयी. वह कुच्छ समझ पाती, इस'से पहले ही 'साए' ने बोलना शुरू कर दिया..

"घबराओ मत नीरू! तुम्हे किसी तरह की तकलीफ़ नही होगी.. ना ही मेरा मकसद तुम्हे डराना है. तुम्हे लग रहा होगा कि तुम जाग रही हो.. पर ऐसा नही है! दर-असल मैं तुम्हारे सपने में हूँ.. हां! तुम सपना ही देख रही हो.. अब मेरी बातें ध्यान से सुन'ना.. मेरा मकसद सिर्फ़ तुम्हे तुम्हारे अतीत से अवगत कराना है.. ऐसा अतीत, जिसको सुनकर तुम्हारी आँखें भर आएँगी... तुम चाहो तो मुझसे सवाल भी कर सकती हो.. ठीक है ना?"

"आ..आ.. हां!" नीरू के माथे पर पसीना छलक आया... उसके पास 'हाँ' बोलने के अलावा कोई चारा भी नही था...

"एक लड़की थी, प्रिया दर्शिनी.. और एक लड़का था देव! दोनो एक दूसरे से बे-इंतहा मोहब्बत करते थे.. मोहब्बत भी इतनी कि मर कर भी उनकी रूहें एक दूसरे के लिए तड़पति रही.. जन्मो-जनम! प्रिया का प्यार आज भी अपने देव का इंतजार कर रहा है.. और देव को अपनी प्रिया की तलाश में दर दर भटकना पड़ रहा है.. देव की तलाश आख़िरकार पूरी हुई. उसको पता चल चुका है कि उसकी 'प्रिया' इस जनम में कौन है.. पर प्रिया का दिल इस जनम में उसकी रूह के साथ ना होने की वजह से वो अपने प्यार को पहचान नही पा रही... तुम सुन रही हो ना?"

"आ..हां!" बड़ी मुश्किल से नीरू के गले से आवाज़ निकल पाई...

"तुम्हे पता है वो दोनो कौन हैं?" साए ने शालीनता से फिर पूचछा...

"हहाँ.. नही!" नीरू एकदम सिमट'ती हुई बोली...

"जान'ना नही चाहोगी?"

"नही.. एम्म.. हन!" नीरू की धड़कने धीरे धीरे संतुलित होती जा रही थी और उसके दिमाग़ ने काम करना आरंभ कर दिया था...

"तो सुनो! इस जनम में उस लड़के का नाम है रोहन! और लड़की का नाम है नीरू; यानी की तुम!" कहकर साया नीरू के जवाब की प्रतीक्षा करने लगा...

नीरू के मुँह से कोई प्रतिक्रिया नही निकली.. साथ रखी टेबल पर उसका हाथ 'कुच्छ' ढूँढने लगा...

"तुम सुन रही हो ना?" साए की आवाज़ कमरे में गूँज उठी....

नीरू ने आव देखा ना ताव.. पेपर वेट हाथ में आते ही उसने ज़ोर से उसको साए की तरफ दे मारा.... निशाना एकदम सटीक था.. पर....

साया नीरू के हाथ की हरकत देख संभलते हुए एक तरफ को झुक गया.. और आवाज़ उसके पिछे से आई,"ओये तेरी मा... मार डाला रे!"

टॉर्च उसके हाथ से छ्छूट कर फर्श पर जा गिरी और वह अपना सिर दोनो हाथों में दबाकर वहीं बैठ गया..

साया तेज़ी से पिछे घूमकर अपना सिर पकड़े बैठे आदमी पर झुका और ज़बरदस्ती उसको उठाने की कोशिश करने लगा,"जल्दी भाग यार.. वरना फँस गये समझो!"

"अबे तुझे भागने की पड़ी है, यहाँ सिर फूट गया मेरा.. रुक एक मिनिट.. बीच में परदा नही होता तो गया था मैं तो काम से.." उठने की कोशिश करता हुआ वह बोला...

नीरू को आवाज़ जानी पहचानी सी महसूस हुई... उसने हिम्मत दिखाते हुए झट से उठकर लाइट ऑन कर दी..

"तूमम्म्मम???????" नीरू ने अपनी आवाज़ को दबाने का भरसक प्रयास किया..

रोहन और रवि दोनो उसके सामने मुजरिमों की तरह सिर झुका कर हाथ बाँधे खड़े थे.. हैरान परेशान नीरू की समझ में ही नही आया कि क्या बोले और क्या नही.. वह अजीब सी नज़रों से बिस्तेर के पास खड़ी उन्हे घूरती रही..

आख़िरकार वो मिनिट भर का मौन रोहन ने ही तोड़ा,"तेरा ही प्लान था ना ये.. अब भुगत!" नज़रें चुराते हुए उसने नीरू को पल भर के लिए देखा और फिर नज़रें झुका ली... नीरू भव्शुन्य सी खड़ी अब भी उन्हे घूर रही थी...

पेपर वेट हालाँकि सीधा रवि के सिर में नही लगा था.. फिर भी पेपर वेट के आधे साइज़ का गोला उसके सिर पर उभर आया था.. उसको सहलाते हुए वो रोहन पर बरस पड़ा," साले.. ऐसे करते हैं क्या भूतों की आक्टिंग? तू तो ऐसे बोल रहा था जैसे रामलीला के डाइलॉग पढ़ पढ़ कर बोल रहा हो.. 2 घंटे की रेहेअर्स्सल की ऐसी की तैसी करवा दी.. फिर प्लान में क्या कमी थी.. तूने ही तो बोला था कि अगर मैं नीरू के सपने में आ सकूँ तो बात बन सकती है...."

"चल छ्चोड़.. अब खिसक ले यहाँ से...!" रोहन ने नीरू की और देखते हुए धीरे से कहा और रवि को खिड़की की तरफ घुमा दिया....

जैसे ही रवि ने खिड़की से बाहर पैर रखा; नीरू लगभग चिल्लाते हुए बोली,"आए!"

और रवि ने अपना बाहर निकाला हुआ पैर वापस खींच लिया," सॉरी भ.. भा.. नीरू जी! आइन्दा ऐसी ग़लती नही होगी.. मैं कान पकड़ता हूँ..."

"मरना है क्या? जीने से उतर कर जाओ!" नीरू लगभग गुर्राते हुए बोली....

"ज्जई.. पर..!" रवि नीरू की ओर क्रितग्य नज़रों से देखने लगा...

"आज के बाद घर में इस तरह कदम रखे तो बचकर नही जाने दूँगी.. शोर मचा दूँगी मैं.. चलो अब.. मेरे पिछे पिछे आओ! आवाज़ मत करना!" नीरू ने कहा और कमरे से बाहर निकल गयी...

दरवाजे से बाहर निकलते हुए रोहन ने मूड कर नीरू की और देखा.. मन में एक कसक सी उठी.. जैसे वापस अंदर चला जाए.. नीरू को उसकी और अपनी कहानी सुनाने के लिए.. उसको हमेशा के लिए अपना बनाने के लिए.. पर नीरू की आँखों में झलक रहा हूल्का सा गुस्सा उसको अहसास करा रहा था कि नीरू ने सिर्फ़ उनको बख्शा है.. माफ़ नही किया...

नीरू ने बिना आवाज़ किए दरवाजे की कुण्डी लगाई और वापस उपर आ कर अपना पेट पकड़ कर बुरी तरह हँसने लगी.. और हँसती रही.. जाने कितनी ही देर!

कहानी जारी है .................................

 
अधूरा प्यार--15 एक होरर लव स्टोरी

गतांक से आगे ...............................

"हा हा हा हा हा....हा हा हा हा हा... फिर? हा हा हा हा हा" सुबह अमन और शेखर कभी रवि के सिर पर उभरे गोले और कभी उसकी चेहरे पर उभरे शिकायती अंदाज को देख देख लोटपोट हो रहे थे...

"फिर क्या? वो तो अच्च्छा हुआ उसको हम पर रहम आ गया.. अगर चिल्ला देती तो वहाँ हमारा क्या होता.. खुद ही सोच लो... मरवा दिया था साले ने!" रवि ने रोहन को घूरते हुए कहा..

"ये लो.. खुद का प्लान.. ज़बरदस्ती ले गया.. और अब मुझे कोस रहा है.. मैने कहा था क्या? ये सब करने को..." बोलते बोलते रोहन की भी हँसी छ्छूट गयी...

"प्लान में क्या कमी थी बोल? यहाँ आधे घंटे तक तेरे साथ थूक रगड़ाई की.. तू सही बोलने भी लग गया था.. वहाँ जाकर तेरी क्या ऐसी तैसी हो गई? आधे घंटे की बात को तूने 2 मिनिट में बोल दिया.. मैं क्या करता...?" रवि ने शेखर और अमन से अपने लिए समर्थन माँगा...

"पता नही यार.. उसके सामने जाते ही सब कुच्छ भूल गया.. क्या का क्या निकलने लगा मुँह से.. मेरी खुद समझ में नही आ रहा था..." रोहन ने अपनी ग़लती खुद ही स्वीकार कर ली...

"होता है... होता है बॉस! प्यार में ऐसा ही होता है.." अमन बीच में ही बोल पड़ा," पर ये बात तो सॉफ है कि नीरू को तुम्हारी हरकत पर ज़्यादा गुस्सा नही आया... इसका मतलब.. चान्स तो हैं!" कहते हुए अमन ने आइयिने में खुद को एक नज़र देख रहे शेखर को टोका,"तू कहाँ की तैयारी में है भाई?"

"मुझे किसी से मिलने जाना है.." शेखर के चेहरे पर खुशी और उत्साह सॉफ झलक रहा था...

"कौनसी 'किस' से मिलने जा रहा है बे? तू तो कुच्छ बताता ही नही है.. हमसे भी किसी की बात कर लिया कर यार..." अमन ने उसके चेहरे के भावों को ताड़ते हुए उसको छेड़ा....

"बात बन गयी तो ज़रूर बताउन्गा... शाम को लौटकर.. हे हे!" शेखर मुस्कुराया और बाहर निकल गया....

"वाह भाई वाह! सब सेट होते जा रहे हैं भाई रवि! कहो तो सलमा को बुला लूँ आज.. आख़िर हम भी इंसान हैं..." अमन रवि को देखते हुए बोला...

रवि अचानक संजीदा हो गया.. कुच्छ देर सोचता रहा; फिर बोला," नही यार! खाली सेक्स से ज़्यादा मज़ा तो ऐसे पत्थर खाने में ही आ जाता है" रवि ने अपने गोले की ओर इशारा किया," मैं इसकी जगह होता तो भाभी जी को ज़बरदस्ती उठा कर टीले पर ले जाता.. उसके बाद तो उसको याद आ ही जाएगा ना...!"

"डॉन'ट वरी! मेरे दिमाग़ में एक और प्लान है..." अमन ने कुच्छ सोचते हुए कहा...

"पर अब की बार मैं साथ नही जाउन्गा.. पहले बोल देता हूँ.. !" रवि ने सिर पर बने गोले को सहलाया...

"ठीक है.. अब की बार तू घर पर आराम करना.. मैं जाउन्गा रोहन के साथ!" अमन हँसने लगा...,"आख़िर मुझे भी तो भाभी जी को देखना है.."

----------------------------------------------------------------

"तूने उनको ऐसे ही निकल जाने दिया? पकड़वाया क्यूँ नही..? उनकी तो धुनाई होनी चाहिए थी.. ऐसे कैसे घुस गये घर में..? अजीब आदमी हैं!" कॉलेज के बाद नीरू के घर बैठी ऋतु ने उसकी आपबीती सुन'ने के बाद प्रतिक्रिया दी...

"पता नही यार.. मैने भी पहले ऐसा ही सोचा था.. फिर जाने क्यूँ उनकी दया सी आ गयी.. शरीफ ही लगते हैं बेचारे.. वरना कमरे में घुसने के बाद तो वो मेरा मुँह भी दबा सकते थे.. मैं क्या कर लेती? मेरे लाइट जलते ही उनके चेहरे ऐसे सफेद हो गये थे कि अगर और कोई होता तो उन्हे चोर समझ लेता..." नीरू हँसने लगी....

"ये बात तो है शीनू...पर हैं दोनो अजीब! भला ये भी कोई तरीका है लड़की पटाने का... शराफ़त से दिन में सीधे आकर बात करनी चाहिए थी.. 'सपने' में आने की नौटंकी क्यूँ की?" ऋतु ने बात आगे बढ़ाई...

"हूंम्म.. ये आइडिया अब तू उनको दे दे.. सीधे आकर बात करनी चाहिए थी!" नीरू ने मुँह बनाकर ऋतु की नकल की.. जैसे मैं उनका इंतजार ही कर रही हूँ यहाँ...!"

"अरे किसी ना किसी से तो शादी करनी ही है तुझे.. फिर उसमें क्या कमी है? स्मार्ट है.. शरीफ है... मुझे कहता तो मैं तो झट से तैयार हो जाती.. पर भगवान देता ही उसको है, जिसको उसकी ज़रूरत ना हो.. तू सारी उमर ऐसे ही बैठी रहेगी क्या?..... इस घर में?" ऋतु ने अपने मन की बात कह दी...

"हां! बैठी रहूंगी ऐसे ही.. मुझे तो शादी के नाम से ही नफ़रत है..!" नीरू ने जवाब दिया....

"पर क्यूँ यार? तू ऐसी क्यूँ है?" ऋतु ने ज़ोर देकर कहा....

"पता नही ऋतु.. पर मैं पक्का शादी नही करूँगी.. मुझे पता है... अब इस टॉपिक को बंद कर और किताब खोल ले.. आइन्दा अगर उन्होने कोई हरकत की तो मैं उन्हे छ्चोड़ूँगी नही...!" नीरू ने कहते हुए अपनी किताब निकाल ली....

.............................................................

"हाई शिल्पा!" शेखर ने कॉलेज से थोड़ी दूर हटकर खड़ी उसका इंतजार कर रही शिल्पा के पास गाड़ी रोकते हुए कहा...

शिल्पा नज़रें तक ना उठा सकी.. हाथ में पकड़ी कॉपी को यूँही सीने से चिपकाए खड़ी रही,"हाई"

शेखर ने दूसरी तरफ झुक कर खिड़की खोल दी..," आओ, बैठो ना!"

शिल्पा ने नज़रें उठाकर दायें बायें देखा और फिर नज़रें झुका गाड़ी के आगे से निकल कर झट से गाड़ी में बैठ गयी.. शेखर ने गाड़ी घुमाई और शहर से बाहर निकल कर सरपट दौड़ने लगी...

"कहाँ जा रहे हो?" शिल्पा ने अपने चेहरे पर लटक आई बालों की लट को पिछे करते हुए नज़रें हल्की सी शेखर की ओर उठाते हुए पूचछा...

"कहाँ चलना चाहिए?" शेखर ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी की और मुस्कुरकर उसकी और देखते हुए पूछा.. शिल्पा सहमी हुई सी बैठी थी...

"मुझे क्या पता? कहीं भी चलो!" शिल्पा उचक कर थोडा संभाल कर बैठ गयी...

"पर बुलाया तो तुम्ही ने था.. अब और किसको पता होगा?" शेखर शरारत से मुस्कुराने लगा...

"मतलब तुम आना नही चाहते थे! है ना?" शिल्पा ने शंकित निगाहों से शेखर की आँखों में झाँका...

"ये किसने कहा?" शेखर हँसने लगा...

"ऐसे क्यूँ हंस रहे हो? मैने बुलाकर कोई ग़लती कर दी क्या?" शिल्पा का चेहरा उतर गया...

"तुम तो अब भी वैसी ही हो.. बात बात पर चिड जाती हो.. मैं तो सोचा करता था कि तुम बड़ी होकर समझदार हो गयी होगी.. हा हा हा..."

शिल्पा के चेहरे पर अनायास ही शेखर की बात सुनकर चमक आ गयी," क्या तुम सच में मेरे बारे में सोचा करते थे...?"

"और नही तो क्या?" शेखर ने कहा और अचानक चुप हो गया...

शिल्पा के बदन में 'रज़ाई' वाली बात याद करते ही झुरजुरी सी दौड़ गयी.. अपनी बाँह से अपने सीने को छिपाती हुई सी वह बोली...,"क्या सोचा करते थे?"

शेखर से रोड से गाड़ी नीचे उतार कर एक टीले पर ले जाकर खड़ी कर दी.. और शिल्पा को अजीब सी निगाहों से घूर्ने लगा.. शिल्पा को उसकी नज़रें अपने कमसिन बदन में गडती हुई सी महसूस हो रही थी... उसने अपना चेहरा घुमा लिया और बाहर की और देखने लगी," बोलो ना.. क्या सोचा करते थे..?"

"यही कि मैं तुम्हे भूल क्यूँ नही पता..." शेखर ने थोड़ा रुक कर फिर बोलना शुरू किया..," ये भी कि तू भी मुझे याद करती होगी या नही... करती थी क्या?"

शिल्पा ने अचानक चेहरा घूमकर अपनी नज़रें उसकी नज़रों से मिला दी.. शेखर का उसको 'तू' कहकर बोलना उसे बहुत प्यारा और 'अपना' सा लगा.. वह यूँही उसकी आँखों में देखती रही.. पर कुच्छ बोली नही...

"तुम सच में.... बड़ी हो गयी हो शिल्पा.." शेखर उसकी आँखों में आँखें डाले हुए ही बोला...

शिल्पा की नज़रें शर्म के मारे झुक गयी और गोरे गालों पर हया की लाली नज़र आने लगी," ऐसा क्यूँ कह रहे हो?"

"और नही तो क्या? बड़ी नही हो गयी होती तो मुझसे प्यार होने के बावजूद इतने दिन बाद यूँ मिलने पर अब तक चुप ना बैठी रहती.. मुझसे लिपट गयी होती अब तक.." शेखर ने अपना हाथ बढ़ा उसके गालों को छू लिया.. उसका छूना ही था कि शिल्पा उसकी बाहों में ढेर हो गयी.. बाहें शेखर के गले में डाल उस'से चिपकती हुई सिसकने लगी," तुम नही जानते शेखर.. एक एक पल में तुम्हे कितनी बार याद किया है मैने.. कितनी तदपि हूँ मैं.. तुम्हारे लिए.. अब तो मैने उम्मीद ही छ्चोड़ दी थी.. तुम्हारे लौट कर मेरी जिंदगी में आने की..."

शिल्पा का सारा बदन प्यासा होकर अकड़ गया.. मधुर मिलन की आस में.. उसकी चूचियाँ ठोस होकर शेखर के सीने में चुभने सी लगी..,"अब वापस नही जाओगे ना!" शिल्पा के मुँह से 'आह' सी निकली...

"ज़ाउन्गा!" शेखर मुस्कुराने लगा," पर तुम्हे साथ लेकर..."

शिल्पा चौंक कर पिछे हटी और विस्मय से उसकी आँखों में देखने लगी.. फिर एक ज़ोर का घूँसा उसकी छाती में जड़ा और वापस चिपक गयी.. दुगने जोश के साथ!

"मैने मम्मी पापा से बात कर ली है.. वो शाम को तुम्हारे घर पर फोन करेंगे.. नंबर. दे देना अपना!" शेखर अब भी मुस्कुरा रहा था...

शिल्पा इस असीम खुशी को दिल में दबाकर ना रख सकी.. उसकी आँखों से झार झार आँसू बहने लगे.. भाववेश में उसने शेखर के गालों पर अपने तपते होन्ट रख दिए," आइ लव यू, शेखर!"

रात को कमरे में बैठकर पढ़ रही नीरू को रह रह कर कुच्छ अजीब सा लग रहा था.. जाने ऐसा क्यूँ था? पर वह बार बार सामने वाली खिड़की की और देख रही थी.. पर्दे की हल्की सी हुलचल भी उसका ध्यान अपनी और खींच लेती.. कल रात रोहन और रवि इसी खिड़की से अंदर आए थे.. अचानक कुच्छ याद करके नीरू उठी और खिड़की के पास गयी.. परदा हटाकर उसने देखा.. खिड़की आज बंद थी.. उसने चितकनी खोली और बाहर झाँकने लगी.. खिड़की के साथ साथ एक पाइप उपर पानी की टंकी तक जा रहा था.. वो ज़रूर इसी के सहारे उपर चढ़े होंगे...

अचानक नीरू को हँसी आ गयी.. वह मूडी और हंसते हुए ही बिस्तेर पर जाकर पसर गयी," ईडियट्स!" नीरू के मुँह से निकला.. लाइट जलती ही छ्चोड़ उसने किताबें टेबल पर रखी और कंबल में घुस गयी... कल रात के ख़यालों में खोए खोए ही उसको कब नींद आ गयी.. पता ही नही चला..

"क्कऔन है?" अचानक कमरे में हुई आहट से उसकी नींद खुल गयी और चौंकते हुए उसने अपनी आँखें खोल दी... आज उसके मन में डर कम और गुस्सा ज़्यादा था.. वह सीधी पर्दे की और देखती हुई बोली," कौन है वहाँ? मैं शोर मचा दूँगी..!"

पर उधर से कोई जवाब नही मिला..

पर्दे की हुलचल नीरू को सामान्य नही लग रही थी.. उसने झट से एक बार फिर पेपर वेट अपने हाथों में थम लिया," लगता है, आज फिर तुम्हारा सिर फूटेगा.... चुपचाप वापस जाओ!" नीरू ने मारने के लिए अपना हाथ उपर उठाया और कुच्छ सोचकर वापस नीचे कर लिया,"तुम्हारी प्राब्लम क्या है? अंदर आ जाओ!"

कोई जवाब ना मिलने पर नीरू चुपके से उठी.. और सावधानी से खिड़की की और बढ़ने लगी.. पर्दे के पास जाकर वह कुच्छ देर खड़ी रही और अचानक परदा एक तरफ सरका दिया.. वहाँ कोई नही था..

"हे भगवान!" नीरू ने खिड़की से बाहर झाँका.. पर पूरी सड़क सुनसान थी.. अपने माथे पर हाथ रखकर नीरू ने लंबी साँस ली और खिड़की अंदर से बंद कर दी.. पर वापस मुड़ते ही उसकी साँस, उपर की उपर और नीचे की नीचे रह गयी..

बिस्तेर पर, जहाँ से वो अभी उठकर आई थी; पेपर वेट के नीचे दबा एक कागज का टुकड़ा फड्फाडा रहा था.. अचंभे और दह्सत से नीरू सिहर उठी.. "ये कैसे हो सकता है?" नीरू अपने आप में ही बड़बड़ाई और कमरे में चारों तरफ किसी की मौजूदगी को महसूस करने की कोशिश करने लगी..

पर कुच्छ होता तो मिलता! भारी और थके हुए कदमों से नीरू बिस्तेर की ओर बढ़ी और कागज का टुकड़ा पेपरवेट के नीचे से निकाल कर पढ़ने लगी...

" प्यार अमर होता है नीरू, वो कभी नही मरता! तुम्हे सोच भी नही सकती कि तुम दोनो एक दूसरे से कितना प्यार करते थे.. आज खुद रोहन को भी अहसास नही है कि तुम उसके लिए क्या थी.. और वो तुम्हारे लिए क्या था.. मुझे पता है कि तुम्हे कुच्छ याद नही है.. पर नियती तुम दोनो को फिर से मिलाना चाहती है.. इस बात को नज़रअंदाज मत करो! अपने अतीत को जान'ने की कोशिश करो! जान'ने की कोशिश करो की तुम्हारे घर वाले तुम्हारा नाम नीरू से बदल कर शीनू करने पर मजबूर क्यूँ हो गये... रोहन से मिलो! उसके दिल में तुम्हारे लिए उसके ज़ज्बात और असीम प्यार को महसूस करने की कोशिश करो!"

नीरू का दिमाग़ चकरा गया.. उसने डर के बावजूद कमरे का कोना कोना छान मारा.. पर कुच्छ नही मिला.. मुश्किल से एक मिनिट के अंदर ये सब हो गया.. कोई अंदर आया और लेटर रख गया.. हुल्की सी भी आहट किए बिना.. कौन ऐसा कर सकता है..?

अचानक बाथरूम में शुरू हुई पानी की 'टॅप - टाप' ने तो उसकी जान ही निकाल कर रखी दी... ज़ोर से चीखते हुए वह बाद-हवास सी होकर बाहर निकली और नीचे की और भागी...

चीक्ख सुनकर पहले ही मम्मी पापा बाहर निकल कर आ चुके थे," क्या हुआ बेटी?" दोनो ने लगभग एक साथ पूचछा...

नीरू नीचे जाते ही मम्मी से लिपट गयी.. उसका शरीर थर थर काँप रहा था..," उपर...! उपर कोई है मम्मी!" नीरू की उपर देखने की हिम्मत तक नही हो रही थी...

नीरू की बात सुनते ही पापा उपर की और भागे.. कमरे में जाकर उन्होने एक एक चीज़ का जयजा लिया.. बिस्तेर पर रखे उस कागज के टुकड़े के अलावा उनको वहाँ कुच्छ भी नही मिला... अच्छि तरह देख भाल कर नीचे आए पापा ने नीरू से पूचछा," ये क्या है शीनू? "

"पता नही.. मैं बस एक मिनिट के लिए बिस्तेर से उठी थी.. वापस आई तो वहाँ 'ये' रखा हुआ मिला.. पता नही किसने रख दिया..." कहकर नीरू रोने लगी...

"रो क्यूँ रही है बेटी? कोई परेशान कर रहा है क्या?" मम्मी ने नीरू को पापा से अलग ले जाते हुए पूचछा...

सवाल सुनते ही नीरू के जहाँ में रोहन और रवि की तस्वीर उभर गयी.. फिर कुच्छ देर रुक कर बोली," नही मम्मी! ऐसा तो कुच्छ नही है..!"

"कहीं ऐसा तो नही किसी ने तेरी किसी किताब में ये डाल दिया हो.. और खोलते हुए बिस्तेर पर गिर गया हो...."पापा ने पास आते हुए पूचछा....

"नही पापा! बिस्तेर पर ये पेपर वेट के नीचे दबा हुआ था.. किसी ने अभी रखा है.. थोड़ी देर पहले..." नीरू ने पापा की और देखते हुए कहा...

पापा का चेहरा लटक गया और माथे पर चिंता और गुस्से की लकीरें उभर आई.. अचानक कुच्छ सोच कर उसने फोन निकाला और मानव का नंबर. डाइयल किया..

"नमस्ते अंकल जी! इतनी रात को कैसे याद किया...?" मानव किसी गस्त से वापस आ रहा था...

"कोई शीनू को परेशान कर रहा है बेटा.. टाइम मिले तो आ जाना एक बार.. यहीं बैठकर बात कर लेंगे...

"क्यूँ नही अंकल जी? प्राब्लम ज़्यादा सीरीयस हो तो अभी आ जाता हूँ.." मानव ने विनम्रता से कहा...

"नही... ऐसी कोई बात नही है.. तुम कल आ जाना.. मैं तो सुबह जल्दी ही निकल जाउन्गा.. तुम्हारी आंटिजी से बात कर लेना.. समय रहते ही समस्या का कुच्छ इलाज हो जाए तो बेहतर होता है..." पापा ने फोन पर कहा...

"नो प्राब्लम अंकल जी.. मैं कल जल्द से जल्द आने की कोशिश करूँगा...!"

"ठीक है बेटा.. अब रखता हूँ.." कहकर पापा ने फोन रख दिया....

तीनो नीचे ही लेट गये थे.. नीरू मम्मी के पास थी.. उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान तक नही था... वह इसी उधेड़-बुन में थी कि कल मानव के सामने रोहन और रवि का जिकर करे या ना करे..

सोचते सोचते उसका दिमाग़ लेटर में लिखी उस बात पर चला गया " अपने अतीत को जान'ने की कोशिश करो! जान'ने की कोशिश करो कि तुम्हारे घर वाले तुम्हारा नाम नीरू से बदल कर शीनू करने पर मजबूर क्यूँ हो गये..."

"मम्मी! " नीरू उठकर बैठ गयी..

"हां बिट्टू! क्या बात है?" मम्मी ने प्यार से पूचछा..

"तुम मुझे बताते क्यूँ नही, मेरा नाम क्यूँ बदला..." नीरू असहज हो गयी थी...

"सो जा बेटी.. सुबह बात करेंगे!" मम्मी ने नीरू का हाथ खींचकर उसको ज़बरदस्ती लिटाने की कोशिश की...

नीरू चिड गयी,"मुझे नींद नही आ रही मम्मी.. आख़िर ऐसी क्या बात है जो आप बार बार टाल रहे हैं.. बताइए ना पापा!" नीरू ने उठकर बैठ गये पापा की तरफ देखा....

"शीनू अब बड़ी हो गयी है.. मेरे ख़याल से बताने में कोई हर्ज़ नही.." पापा ने मम्मी से राय ली...

"पर बाबा जी ने माना किया था!" मम्मी ने आशंकित नज़रों से पापा की और देखा...

कुच्छ देर चुपचाप सोचते रहने के बाद पापा अतीत की यादों में खोते चले गये....

"तू जब 5 साल की ही थी शीनू! एक दिन अचानक मुझे तुम्हारे प्रिन्सिपल ने फोन करके हॉस्पिटल पहुँचने को बोला... मेरी तो जान ही निकल गयी थी... बदहवास सा हॉस्पिटल पहुँचा तो जाकर पता लगा; तुम कोई नाम बार बार चिल्लाते हुए बेहोश हो गयी थी... नाम याद नही आ रहा.." पापा ने दिमाग़ पर ज़ोर देते हुए कहा और फिर आगे बताने लगा.....

"हॉस्पिटल से छुट्टी के बाद मैं तुम्हे सीधा घर ले आया... आँखें खोलने के बाद भी तुम सहमी सहमी सी लग रही थी.. पहले पहल हुमने इस बात को ज़्यादा तवज्जो नही दी.. पर तुम्हारा अजीब व्यवहार बढ़ता ही चला गया.. ना तुम ज़्यादा बात करती थी.. और ना ही उसके बाद बच्चों के साथ खेलना पसंद था तुम्हे.. गुम्सुम सी यूँही रहने लगी.. "

"इस बात को भी हम नज़रअंदाज कर देते.. पर जब तुमने सोते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया तो हमे बड़ी चिंता होने लगी.. कयि अच्छे डॉक्टर्स को दिखाया.. पर कहीं बात नही बनी.. कुच्छ डॉक्टर्स ने बताया भी कि इस उमर तक बच्चों की स्मृति में पूर्वजनम की बातें संचित रहती हैं.. हो ना हो ये उसी का असर है..."

"रिश्तेदारों के बार बार कहने पर हम तुम्हे एक सिद्ध बाबा जी के पास ले गये.. मुझे तो यकीन था ही नही कि कुछ असर होगा.. पर उन्होने तो चमत्कार ही कर दिया.. एक यग्य करके उन्होने तुम्हारा नाम 'नीरू' से शीनू रखने को कहा... उन्होने बताया था कि तुम्हारे शरीर में घुसकर कोई आत्मा तुम्हारे पूर्वजनम की दुखदायी यादों को जगाने की कोशिश कर रही है... उन्होने ज़्यादा कुच्छ नही बताया.. सिर्फ़ इतना ही कहा था कि नाम बदल कर यहाँ से ले जाने पर वो आत्मा दिग्भ्रमित हो जाएगी.. और दोबारा परेशान नही करेगी... उन्होने ये भी हिदायत दी कि तुम्हे इस बारे में कभी कुच्छ ना बताया जाए.. तुम्हारे इस बारे में ज़्यादा सोचने से पूर्वजनम कि वो दर्दनाक यादें फिर से जीवंत हो सकती हैं..."

"उसके बाद हम तुम्हे घर लेकर आ गये.. मुझे ये सब मज़ाक जैसा लग रहा था.. पर तुम्हारे चेहरे पर लौटी मुस्कुराहट ने मेरी सोच बदल दी... फिर मैने हर रेकॉर्ड में तुम्हारा नाम बदलवा दिया... यही बात है जो हम तुम्हे बताकर बेवजह परेशान नही करना चाहते थे..." कहकर पापा चुप होकर नीरू की आँखों में देखने लगे....

नीरू हतप्रभ सी रोहन और उस रहस्मयी लेटर के बारे में सोचने लगी.....

नीरू ऋतु के साथ कॉलेज जाने के लिए निकली ही थी कि घर के सामने पोलीस ज़ीप आकर रुकी. गाड़ी को खुद मानव ही ड्राइव करके लाया था. अंदर बैठा हुआ ही मानव तब तक उसको अपलक देखता रहा जब तक वा उसकी नज़रों से औझल नही हो गयी.. पर नीरू ने अपनी नज़रें तक नही मिलाई और उसके पास से निकल गयी....

इस पूरी दुनिया में एक नीरू ही थी जो मानव को पसंद थी.. बेहद पसंद! नीरू के चेहरे की अनुपम सुंदरता और नज़ाकत, उसका संजीदा स्वाभाव और नज़रें हमेशा नीची करके चलना मानव को हमेशा चित्ताकर्षक लगता था.. पर ये भी नीरू का स्वाभाव ही था जिसने मानव को आज तक अपने दिल की बात उसके आगे जाहिर करने से रोक रखा था.. यही वजह थी कि वह सोचता था कि उसको 'प्यार' जताना ही नही आता.....

मानव की नज़रें मूड कर दूर तक जाती हुई नीरू का पिच्छा करती रही.. अचानक उसने एक लंबी साँस ली और गाड़ी से उतर कर घर की डोर बेल बजाई.... 6 फीट लंबे, गतीले शरीर पर 26 साल की उमर में ही पोलीस की वर्दी खूब जम रही थी.. और उस पर लगे तीन स्टार तो किसी भी लड़की का सपना हो सकते थे...

"आ गये बेटा! शीनू अभी अभी कॉलेज के लिए निकली है..." मम्मी जी ने दरवाजा खोलते हुए कहा....

"हाँ आंटी जी.. देखा था मैने उसको रास्ते में...!" मानव अंदर आकर बैठते हुए बोला... मम्मी जी किचन में चली गयी...

"अरे! उसको वापस क्यूँ नही ले आए.. उसी के बारे में तो बात करनी थी...!" मम्मी ने अफ़सोस सा जताया...," मैं उसकी सहेली के पास फोन करके उसको वापस बुलाती हूँ!" मम्मी ने बाहर आकर एक फोन किया और वापस अंदर चली गयी...

"मुझे तो उस'से बोलते हुए डर सा लगता है आंटी जी.. वो तो कभी देखती तक नही मेरी और... जाने कितनी ही बार आमना सामना हो जाता है हमारा.. पर अंजानों की तरह साइड से निकल जाती है..! अब बताओ भला मैं उसको कैसे टोकता, रास्ते में!" मानव कहकर हँसने लगा....

"अरे नही बेटा! तू तो जानता है.. उसका स्वाभाव ही ऐसा है.. मुझे तो डर लगा रहता है, पराए घर की अमानत है... शादी के बाद भी उसका व्यवहार नही बदला तो...!" मम्मी ने चाय बनाकर मानव को दी और उसके पास बैठ गयी....

"क्क..क्या उसकी शादी पक्की कर दी..?" बनावटी आस्चर्य और खुशी प्रकट करते हुए मानव बोला....

"अभी कहाँ? पर कोई ढंग का रिश्ता हो तो बताना.. इसके पापा उतावले हो रहे हैं इसकी शादी के लिए... तुम तो सब जानते ही हो!" मम्मी ने मुस्कुरकर कहा..

"ओह्ह.. ज़रूर!" मानव के कलेजे को ठंडक मिली," वो अंकल जी कुच्छ जिकर कर रहे थे... क्या माम'ला है....?"

मम्मी उठी और ड्रॉयर में रखा 'वो' कागज का टुकड़ा मानव को पकड़ा दिया.. मानव खोल कर पढ़ने लगा....

" प्यार अमर होता है नीरू, वो कभी नही मरता! तुम्हे सोच भी नही सकती कि तुम दोनो एक दूसरे से कितना प्यार करते थे.. आज खुद रोहन को भी अहसास नही है कि तुम उसके लिए क्या थी....." इतना पढ़कर हो मानव रुक गया...

"ये... रोहन कौन है? मैने सुना है कहीं...!" मानव ने दिमाग़ पर ज़ोर डाला.. पर 'रोहन' का नाम और उसके द्वारा लिया गया 'नीरू' नाम उसके जहाँ से उतर गया था...

"पता नही बेटा...! पर शीनू को भी पता होता तो वो ज़रूर बता देती.. उसको भी मालूम नही है कुच्छ.. कल रात को भागती हुई नीचे आई थी.. बहुत डरी हुई थी.. किसी ने उसके कमरे में ये लेटर डाल दिया... इसी से इतनी परेशान हो गयी बेचारी... फिर मामले के बढ़ने से पहले ही निपट लें तो बेहतर होता है.. लड़की की जात है.. बात बाहर निकल गयी तो लोग जाने कैसी कैसी बातें करने लगते हैं..." मम्मी ने दुख भरे लहजे में कहा....

"पर ये लेटर तो नीरू के नाम पर लिखा गया है.." कहते हुए मानव फिर से पहली लाइन से पढ़ना शुरू हो गया...

"यही बात तो हमारी समझ में नही आ रही बेटा.. दर-असल पहले शीनू का नाम 'यही' था.. पर बहुत छ्होटी थी तभी बदल दिया था ये नाम... जाने किस मुए को ये बात पता चल गयी... और अब इसको परेशान करने पर तुला है...."

"हां.. मैने भी सुना था एक बार.. शीनू का नाम पहले 'नीरू' होने के बारे में.."

मम्मी जी की बातें सुनते सुनते मानव लेटर पढ़ता जा रहा था.. अचानक एक जगह रुक कर उसकी आँखें सिकुड गयी... और कुच्छ सोचकर वह उच्छल पड़ा..,"ओह्ह माइ गोड!"

"क्या हुआ बेटा?" मम्मी ने आशंकित होकर पूचछा...

"एक मिनिट.." मानव बाहर गया और ज़ीप से सी.डी. केस डाइयरी निकाल कर लाया... वापस आकर उसने कुच्छ पेज पलते और कागज का एक टुकड़ा उसमें से निकाल कर दोनो को टेबल पर साथ साथ रख लिया....

"ये क्या है बेटा?" मम्मी को उसकी हरकत समझ में नही आई...

"कुच्छ नही.. आप निसचिंत रहें.. आपकी प्राब्लम तो सॉल्व हो ही गयी समझो.. अब मैं चलता हूँ..." कहकर मानव तेज़ी से खड़ा हो गया....

"ठीक है बेटा.. 'उनसे' अगर इस बारे में कुच्छ बात करनी हो तो फोन कर लेना.." मम्मी जी साथ खड़े होते हुए बोली....

"एक बात कहूँ आंटी जी.. अगर बुरा ना मानो तो!" मानव ने वापस पलट'ते हुए कहा...

"हां बोलो ना बेटा.. क्या बात है..?" मम्मी ने उसके चेहरे की और देखा...

"वैसे तो.... ये बात घर के बड़ों को ही करनी चाहिए... पर.... मुझे शीनू बहुत पसंद है... आप.. और पापा अगर..." कहकर मानव चुप हो गया.. आयेज उसको समझ ही नही आया की कैसे बात पूरी करे!

बात समझ में आते ही मम्मी जी का चेहरा खिल उठा," ये तो उसके लिए बड़े सौभाग्य की बात होगी बेटा... मैं इसके पापा के आते ही बात करती हूँ.. वो तुम्हारे घर फोन कर देंगे.."

खुशी से फूली नही समा रही मम्मी जी ने अपने हाथ उठा मानव के सिर पर हाथ रख दिया... मानव का भी यही हाल था.. जाने कितने दीनो के बाद वह किसी से अपने दिल की बात कह पाया था...

जैसे ही मानव बाहर निकला, उसको सामने से नीरू वापस आती दिखाई दी.. उसने लाख कोशिश की उसको टोकने की.. पर उसके मुँह से 'हाई' तक ना निकल पाया.. नीरू सिर झुकाए हुए ही साइड में खड़ी होकर मानव के रास्ता छ्चोड़ने का इंतजार करने लगी..

मानव सिर खुजाता हुआ उसके सामने से हटकर गाड़ी में जा बैठा.. और नीरू उसको बिना देखे ही अंदर चली गयी....

क्रमशः

 
अधूरा प्यार--16 एक होरर लव स्टोरी

गतांक से आगे ...............................

"ओहू! आप एक बार बात तो कर लो उनसे.. इतना अच्च्छा रिश्ता खुद चलकर आया है.. मैं तो कहती हूँ, बात बन जाए तो चट माँगनी पर ब्याह कर देंगे अपनी शीनू का...." मानव के निकलते ही मम्मी जी ने फोन लगा लिया था...

"अच्च्छा ठीक है.. मैं अभी बात करके बताता हूँ... पर उनको बोलूं क्या?" पापा ने असमन्झस से पूचछा...

"अब ये बात भी क्या मैं ही सम्झाउ? बोल देना की मानव को पसंद है.. और हम भी बहुत खुश हैं इस रिश्ते से....." मम्मी ने बात पूरी भी नही की थी कि नीरू दरवाजा खोलकर अंदर आ गयी

"किसके रिश्ते की बात हो रही है मम्मी..?" नीरू आते ही मम्मी से लिपट गयी...

"अच्च्छा रखती हूँ जी.. आप बता देना मुझे भी..." मम्मी ने कहा और फोन रख दिया...

"क्या हुआ मम्मी? मानव आया था! कुच्छ पता चला...." नीरू ने मम्मी के फोन रखते ही पूचछा...

"मानव आया था!" मम्मी ने मुँह चढ़ा कर मज़ाक मज़ाक में उसकी नकल उतारी," तू तो जैसे घर वालों के अलावा किसी को जानती ही नही.. सामने से बोल नही सकती थी क्या?"

"मैं क्यूँ बोलूं..? मुझे अच्च्छा नही लगता ऐसे किसी को राह चलते में टोकना.. बताओ ना.. आपने उस लेटर की बात की या नही..... और मुझे क्यूँ बुलाया है?" नीरू ने जवाब देते हुए पूचछा....

"हां.. कह रहा था कि अब मैं सब संभाल लूँगा... और कुच्छ हो ना हो.. हमें बहुत अच्च्छा दूल्हा मिल गया; अपनी गुड़िया रानी के लिए.." मम्मी ने नीरू का चेहरा अपने हाथों में लेकर गालों को चूमते हुए कहा...

नीरू बात सुनते ही बिदक गयी," ये क्या कह रही हैं मम्मी.. मैने कह दिया ना मुझे नही करनी शादी वादी.. आप बार बार ये जिकर ना किया करें.. मेरा दम घुटने लगता है...."

"अरी.. सुन तो ले एक बार की रिश्ता किसका आया है... अपने 'मानव' का.. कितना सुंदर और छैल छबिला है.. और थानेदार है.. तू मौज करेगी उसके साथ!" मम्मी ने समझाते हुए कहा...

"थानेदार होगा, अपने घर में.. मुझे नही करनी किसी से शादी... देख लेना, आगे बात बढ़ाई तो!" गुस्से से भरी नीरी ने अपनी किताब उठाई और पैर पटकती हुई वापस चली गयी.. कॉलेज में....!

"ये लड़की भी ना!" मम्मी ने बड़बड़ाते हुए अपने माथे पर हाथ मारा ही था की फोन की घंटी बज उठी..,"मम्मी ने लपकते हुए झट से फोन उठा लिया...,"हां जी!"

"सच में आज का दिन तो बहुत ही शुभ है... वो भी बहुत खुश हुए बात सुनकर.. झट से तैयार हो गये..!" पापा की आवाज़ थी...

"आच्छाआअ!" मम्मी जी चहकति हुई बोली और फिर अचानक नीरू की बात याद आते ही मायूस हो गयी," पर शीनू का क्या करें? ये तो उल्टी ही रामायण पढ़ रही है..."

"क्यूँ क्या हुआ? पापा ने आशंकित होकर पूचछा...

"कह रही है, इसको नही करनी शादी वादी.. मुझसे लड़ाई करके वापस गयी है..." मम्मी का चेहरा उतर गया....

"ओह्हो.. तुमने तो मुझे डरा ही दिया था.. ऐसा तो होता ही है.. लड़की है आख़िर! और क्या शादी की बात सुनकर नाचने लग जाएगी..! लड़कियाँ तो ऐसे करती ही हैं.. तुम उसकी चिंता मत करो.. वो तो इस शनिवार को ही देखने आने की बात कह रहे हैं...." पापा ने बात को आगे बढ़ाया...

"हाई राम! पर शनिवार में तो तीन ही दिन बचे हैं...." मम्मी सोच कर बोली...

"तो हमें क्या करना है.. उनकी देखी भाली तो है ही.. बस आ जाएँगे और 'अपनाकर' चले जाएँगे... तुम किसी बात की चिंता मत करो! मैं रखता हूँ अब.." कहकर पापा ने फोन काट दिया...

मम्मी जी फूली नही समा रही थी.....

------------------------------------

"एक्सक्यूस मी, मिस नीरू!"

नीरू कॉलेज के अंदर कदम रखने ही वाली थी कि अपना नाम सुनकर चौंक कर पलटी..

"मैं अमन हूँ.. रोहन का दोस्त!" अमन ने मुस्कुराते हुए कहा...

पहले से ही गुस्से में भरी हुई नीरू की थयोरियाँ चढ़ गयी,"तो?"

एक बारगी नीरू के तेवर को देख अमन भी सहम सा गया.. इस बात को जानते हुए कि नीरू ने उस रात रोहन और रवि को ऐसे ही निकल जाने दिया था, उस'से काफ़ी विनम्रता की उम्मीद थी.. कुच्छ देर रुक कर संभालते हुए बोला," तो.... मुझे आपसे कुच्छ बात करनी थी.. इसी बारे में.. आप चाहे तो अपनी सहेलियों को साथ ले सकती हैं...."

"नही... मुझे किसी से कोई बात नही करनी..." कहकर वो पलटी ही थी कि ऋतु और शिल्पा ने उसका हाथ पकड़ लिया," सुन तो लो शीनू! सुन'ने में क्या हर्ज़ है..?" ऋतु ने कहा....,"मुझे रोहन की बातें सच्ची लगती हैं...."

"अब तुम भी?" नीरू ने ऋतु को घूरा....

"मुझ पर विस्वास नही है क्या?" ऋतु ने उसका हाथ दबाकर कहा...

"यार.. इसमें विस्वास की क्या बात है? बस, मुझे कोई बात नही करनी..." नीरू अपने फ़ैसले पर अडिग थी...

"देख! मैं तुझे रोहन की बातों में सच्चाई के बहुत से सबूत दे सकती हूँ.. पर तू एक बार हमारे साथ चल.. बस!" ऋतु ने ज़ोर देकर कहा...

"साथ चलूं? ... पर कहाँ?" नीरू ने नरम पड़ते हुए कहा...

"चल आजा... " ऋतु ने कहा और लगभग ज़बरदस्ती सी करते हुए उसको अमन की गाड़ी में बैठा लिया.. साथ ही शिल्पा भी बैठ गयी......

अमन के घर पर सब लोग साथ साथ बैठे थे.. शिल्पा और शेखर एक दूसरे के साथ बैठे थे.. अमन और रोहन एक दूसरे के साथ.. उनके सामने ऋतु के साथ बैठी हुई नीरू खुद को अजीब सी स्थिति में पा रही थी... अगर ऋतु उसके साथ ना होती तो एक पल भी उसका वहाँ ठहरना नामुमकिन था... उसने ऋतु का हाथ कसकर पकड़ा हुआ था..

अचानक दारू की बॉटले छिपाने गया रवि जैसे ही उनके सामने आया.. उसके सिर पर गोला बना देख ऋतु की हँसी छ्छूट गयी.. नीरू ने भी जैसे ही अपना चेहरा उपर उठाया, अपना मुँह दबाकर हँसने से खुद को रोक ना पाई...

"प्रणाम भाभी जी!" रवि ने पहली बार नीरू के चेहरे पर सितारों की चमक जैसी मुस्कुराहट देखी थी.. मौके का फायडा उठाते हुए उसने नीरू को भाभी कह ही दिया....

नीरू ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और ऋतु से बोली," हां.. अब बताओ.. क्या बात करनी थी.. जल्दी बोलो.. मुझे जाना है...

रोहन ने बोलने के लिए जैसे ही मुँह खोला.. सब चुप होकर उसकी बात सुन'ने लगे.. अपने सपनो से शुरुआत करके आज तक की सारी कहानी रोहन ने विस्तार से बयान कर दी.. सिर्फ़ उसमें से श्रुति के साथ हुए उस दर्दनाक हादसे को वह खा गया.. इस दौरान श्रुति को याद करते हुए उसकी आँखें भर आई.. और एकाएक सब भावुक हो गये.. जिनको श्रुति के बारे में पता था.. वो श्रुति को याद करके.. और जिन्हे नही पता था.. वो ये समझ कर कि रोहन नीरू को कहानी सुनाते हुए बहक गया है....

"आई बात समझ में....?" ऋतु ने रोहन की बात ख़तम होते ही नीरू से पूचछा...

नीरू का दिमाग़ कहानी सुन'ते हुए सुन्न सा होकर अपना नाम बदले जाने वाली कहानी से तड़ातम्मया बिठा रहा था.. पर प्रत्यक्ष में उसने सिर्फ़ इतनी ही प्रतिक्रिया दी," चलें!"

"अब ये क्या बात हुई...? कुच्छ बोलो तो सही.. आख़िर सब तुम्हारे जवाब का इंतजार कर रहे हैं..." ऋतु ने गुस्से में भरकर कहा....

नीरू कुच्छ बोलने की सोच ही रही थी कि अगले ही पल मानो उसको बिजली का सा झटका लगा..

"उम्मीद करता हूँ कि मैने आप सब को डिस्टर्ब नही किया होगा..." बिना इजाज़त अंदर आने के बाद एक एक चेहरे को घूर्ने के बाद मानव की आँखें नीरू पर आकर टिक गयी....," ओह्हो! इतनी शराफ़त और नज़ाकत भरी शरारत... आइ'एम इंप्रेस्ड!" मानव के चेहरे पर कुटिल मुस्कान तेर गयी.....

"आइए ना इनस्पेक्टर साहब. बैठिए... हम उस दिन इन्ही 'नीरू' की बात कर रहे थे.." अमन इनस्पेक्टर के स्वागत में खड़ा हो गया....

नीरू कुच्छ बोल सकने की हालत में नही थी.. वह उठकर बाहर जाने ही लगी थी की मानव ने उसको टोक दिया,"अरे नही नही... ये तो बहुत ही अच्च्छा हुआ कि आप यहीं मिल गयी.. रोहन को हथकड़ी लगाने से पहले मुझे आपके बयानों की भी ज़रूरत पड़ेगी... हा हा हा!"

मानव की बात सुनकर सभी चौंक कर उसकी और देखने लगे..

"ये क्या कह रहे हैं आप..? रोहन को हथकड़ी?" अमन ने आसचर्यचकित होते हुए पूचछा....

"चिंता ना करें.. मैं सब कुच्छ सपस्ट करके ही इसको यहाँ से ले जाउन्गा..." मानव कुर्सी पर बैठ गया...

रोहन कभी मानव को और कभी नीरू को अजीब सी निगाहों से देखने लगा.....

"तो रोहन जी; आप रात को शीनू के घर में घुसपैठ करते हैं?" सबके चेहरों को अपनी और ताकता छ्चोड़ कर अपनी इनटेरगेशन शुरू कर दी....

सवाल सुनते ही रवि ने अपने सिर के गोले को हाथ से ढक लिया... मानो सबूत छिपाने की कोशिश कर रहा हो...

रोहन ने मायूस होकर शिकायती नज़रों से नीरू की और देखा.. उसको यही अंदाज़ा हुआ कि नीरू ने उसके घर में घुसने की रिपोर्ट करवा दी है... सिर झुका कर वह कबूल करने को बोलने ही वाला था कि चौंक कर उसने नीरू की और देखा...

"नही! ये हमारे घर में कभी नही आया...!" नीरू के जवाब ने सबको हैरत में डाल दिया...

मानव नीरू के बोलने से झल्ला उठा.. उसको नीरू की आवाज़ से ही पता चल गया था कि वो रोहन को बचाने के लिए ऐसा बोल रही है...

"आर यू शुवर मिस.. शीनू उर्फ नीरू जी!" चेहरा नीचे किए हुए ही नज़रें उपर उठा कर मानव ने नीरू की और घूरा....

"हां.. ये कभी हमारे घर नही आया...!" नीरू ने नज़रें झुकाए हुए ही जवाब दिया.. बात सुनकर रवि भी उच्छल पड़ा,"हां हां.. हम भला रात को क्या करने जाएँगे.. हैं ना रोहन!"

रोहन ने नज़रें उपर करके उसके 'गोले' को देखा और उसकी हँसी छ्छूट गयी.. अब रोहन काफ़ी रिलॅक्स महसूस कर रहा था.. जब मियाँ बीवी राज़ी, तो क्या करेगा काज़ी!

"वाह वाह! रोहन को बचाने की आपकी कोशिश काबिल-ए-तारीफ़ है नीरू जी! पर अफ़सोस! इसको हथकड़ी लगाने के लिए जो वजह मेरे पास है.. उसमें आप भी इसकी कोई मदद नही कर सकती.... इसके इस जुर्म के लिए तो मैं इसको समझा कर ही छ्चोड़ने वाला था.... आख़िर तुम्हे भी इसके साथ कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते... और मेरी तरह कोई भी इज़्ज़तदार मर्द ये नही चाहेगा कि उसकी होने वाली धरमपत्नी इस तरह की छ्होटी छ्होटी बातों के लिए कोर्ट के झमेले में पड़े.."

मानव ने अपनी आख़िरी बात को चबा चबा कर कहा और नीरू के घर मिला खत उसके सामने टेबल पर रख दिया...," अब ये मत कहना कि ये खत भी आपको नही मिला.. आंटी जी ने मुझे दिया है.."

नीरू ने अपनी नज़रें झुका ली.. कुच्छ देर मौन रहने के बाद बोली,"हां.."

मानव कुटिलता के साथ मुस्कुराया,"वेरी गुड!... पढ़ना ज़रा इसको!" कहकर मानव ने खत रोहन को पकड़ा दिया....

रोहन रवि शेखर और अमन आस्चर्य से खत को पढ़ने के बाद एक दूसरे की आँखों में देखने लगे.. किसी की समझ में नही आ रहा था कि ये 'लेटर' वाला क्या फंडा है.. सब एक दूसरे से इशारों ही इशारों में सवाल सा कर रहे थे....

"पढ़ लिया?" मानव ने आराम से पिछे सिर टिकते हुए पूचछा....

"जी हां.. पर इस'से हमारा कोई लेना देना नही...!" रोहन ने ज़ोर देकर कहा....

"मान लिया! चलो अब इसको पढ़ो ज़रा...." मानव ने एक और लेटर रोहन के सामने टेबल पर फैला दिया...

"ययए.. ये तो श्रुति का है...." रोहन ने हाथ में पकड़े श्रुति के स्यूयिसाइड नोट की पहली लाइन पढ़ते ही कहा....

मानव मुस्कुराया," ना! ये श्रुति ने नही लिखा... पहले में मान चुका था कि श्रुति ने आत्महत्या की है... और ये स्यूयिसाइड नोट अपने हाथों से लिखा है... पर अब नही मानूँगा... श्रुति की हत्या हुई है...!"

"क्क्या मतलब..." सभी उच्छल कर खड़े हो गये.. बेचारी नीरू को तो अब तक ये भी पता नही था कि श्रुति अब इस दुनिया में नही है.... सब हैरत से मानव की ओर देख रहे थे....

"दोनो लेटर्स एक साथ रख कर देखो... सॉफ पता चल रहा है कि दोनो एक ही आदमी ने लिखें हैं..." मानव के चेहरे पर सफलता की चमक उभर आई थी....

सबने अपने अपने हाथों में लेटर लेकर देखे.... मानव की बात शत प्रतिशत सच थी.... पर किसी की कुच्छ समझ में नही आ रहा था....

"इसका क्या मतलब है?" अमन ने हड़बड़ा कर पूचछा....

"इसका मतलब ये है कि स्यूयिसाइड नोट श्रुति ने नही लिखा... किसी और ने लिखा है.. और जिसने भी लिखा है.. उसी ने श्रुति का कत्ल किया है...!" मानव तीर छ्चोड़ कर चुप हो गया.... उसको कहीं से किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नही मिली तो मजबूरन उसको खुद ही सारी बात समझानी पड़ी....

"देखो! श्रुति मर चुकी है.. इसीलिए नीरू के घर मिला लेटर श्रुति के हाथ का लिखा नही हो सकता... अब क्यूंकी दोनो खातों में राइटिंग हूबहू एक जैसी है.. इसका मतलब ये हुया कि श्रुति का स्यूयिसाइड नोट भी उसी व्यक्ति ने लिखा है जिसने ये दूसरा खत लिखा...

सॉफ बात है कि उसी व्यक्ति ने ही श्रुति की हत्या भी की है... अब अगर उस दिन के घटनाक्रम पर नज़र डालें तो रोहन ने खुद कहा है कि लास्ट में वो कुण्डी लगाकर श्रुति को अंदर छ्चोड़ आया था.. उसके बाद नितिन ने स्वीकार किया है कि जब वो श्रुति के पास अंदर गया तो श्रुति लाश बन चुकी थी... अगर नितिन बाहर होता तो मैं एक पल को मान भी लेता कि हो सकता है हत्या नितिन ने की हो.. पर उसकी जमानत तो कल होगी.. फिर वो कैसे नीरू के घर लेटर भेज सकता है... नही ना?"

इसका मतलब कहानी शीशे की तरह बिल्कुल सॉफ हो गयी.... नितिन ने श्रुति को जबरन रोहन के पास भेजा और रोहन ने श्रुति की मजबूरी का फायडा उठाते हुए उसके साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की.. पर जब वो नही मानी तो ज़बरदस्ती के चक्कर में ही इसने उसका गला घोंट दिया... और उसको पंखे से लटका कर बाहर से कुण्डी बंद करके आ गया... समझे! नितिन पर सिर्फ़ ब्लॅकमेलिंग का आरोप रहेगा.. बाकी सारा काम तो जनाब ने अपने हाथों से ही किया है...." मानव ने एक लंबी साँस छ्चोड़ कर अपनी कहानी को विराम दिया....

"आप बेवजह रोहन पर शक कर रहे हैं इनस्पेक्टर... ये सपने में भी ऐसा नही कर सकता....!" अमन ने ज़ोर देकर कहा....

"तो किस पर करूँ प्रोफ़्फेसर साहब!" मानव हंसा," क्या आप पर करूँ? या बाकी लोगों पर... उस रात कोई और मौजूद था ही नही.. अगर आप में से कोई क़ुबूल कर रहा है कि ये कत्ल और दोनो खत आप में से किसी ने किए हैं तो ठीक है.. मैं विचार कर लेता हूँ... वरना सारे सबूत तो रोहन की तरफ ही इशारा कर रहे हैं..." मानव ने कहा...

"हम जायें!" नीरू के चेहरे पर कड़वाहट सॉफ झलक रही थी......

"जी क्यूँ नही..? वैसे अब भी कोई मुग़ालता बचा हो तो आप भी सवाल कर सकती हैं..." मानव ने तीखी नज़रों से नीरू की और देखते हुए कहा...

नीरू, ऋतु और शिल्पा बिना कुच्छ कहे बाहर निकल गयी....

"हम भी चलते हैं लव गुरु.. तुमसे टिप्स लेने फिर कभी आउन्गा.." मानव ने सलाम ठोंकने के अंदाज में अपना हाथ अमन की और उठाया और रोहन का हाथ पकड़ कर खड़ा हो गया....," रोहन को मैं कल सुबह कोर्ट में पेश कर दूँगा.. पर मुझे नही लगता कि 4-5 महीने से पहले इसकी बैल अप्लिकेशन लगाने का कोई फायडा होगा..."

रात को करीब 12 बजे जाकर मानव को बिस्तेर नसीब हुआ.. सारे दिन की भगा दौड़ी से उसको थकान महसूस हो रही थी... रोहन से उसने श्रुति वाले केस से ज़्यादा नीरू के बारे में पूचछा था... ये जानकार उसको सुकून मिला था कि अभी तक रोहन उसके दिल में जगह बनाने में नाकामयाब रहा है... उसको खुद अहसास हो रहा था कि रोहन का नाम नीरू के साथ जुड़ा होने की वजह से वह केस में कुच्छ ज़्यादा ही इंटेरेस्ट ले रहा है.. दोपहर को नीरू के सामने ही सारा खुलासा करने के पिछे भी उसका यही मकसद था...

पर मानवीयता और शायद आत्मीयता सी दिखाते हुए उसने रोहन को अपने साथ ही खाना खिलाया और स्टाफ के ही आदमी के बिस्तेर पर सो जाने को कह दिया... ताकि वह अपने ही मंन के द्वारा धिक्करे जाने से बच सके... वह खुद भी थाने में बने अपने रिटाइरिंग रूम में ही लेट गया...

अचानक दरवाजे पर हुई दस्तक से उसकी नींद टूट गयी,"कौन है?"

पर उसके सवाल का किसी ने भी जवाब नही दिया और वह करवट बदल कर फिर सोने की कोशिश करने लगा...

थोड़ी ही देर बाद दरवाजा लगातार 2 बार जल्दी जल्दी खटखटाया गया.. वह झल्ला कर उठ बैठा और पॅंट पहन कर उठ खड़ा हुआ...

"क्या बात है?" दरवाजा खोल कर मानव ने पास ही खड़े संतरी से पूचछा...

"कुच्छ नही जनाब! क्या हो गया...?" संतरी भाग कर दरवाजे के पास आया...

"दरवाजा क्यूँ खटखटा रहे हो?" मानव ने हुल्के से गुस्से से कहा...

"नही तो जनाब! मैं तो आधे घंटे से यहीं खड़ा हूँ.. दरवाजा तो किसी ने नही खटखटाया...."

मानव ने अजीब सी नज़रों से उसको घूरा और बाहर गेट की तरफ टहलने चला गया.. वापस लौट'ते हुए वा रोहन के कमरे में घुस गया.. रोहन जाग ही रहा था...

"कोई दिक्कत तो नही है भाई?" मानव ने पूचछा...

"आपके रहते दिक्कत क्या हो सकती है?" रोहन ने व्यंग्य सा किया.. मानव ने कुच्छ बोलना उचित नही समझा और बाहर निकल कर अपने कमरे में जाकर लाइट ऑफ की और फिर लेट गया...

मुश्किल से उसको लेटे हुए 5 मिनिट भी नही हुए होंगे की अचानक कमरे की लाइट जल गयी...

हड़बड़ते हुए चौंक कर मानव एक दम उच्छल कर बैठ गया," कौन है?"

पर एक बार फिर किसी से कोई जवाब नही मिला...

मानव के दिल की धड़कने बढ़ने लगी.. वह बिस्तेर से उठा और धीरे धीरे चलते हुए अलमारियों के पिछे बने स्विच बोर्ड की और बढ़ा... वहाँ पर किसी चूहें तक का भी नामोनिशान ना पाकर उसका दिल उसकी बल्लियों पर आ जमा," क्या मुसीबत है?" वह बड़बड़ाया और लाइट बंद कर दी... फिर जाने क्या सोच कर वह पलटा और लाइट फिर से ऑन कर दी....

वापस बिस्तेर की तरफ आते ही मानो उसको बिजली का कोई तेज झटका लगा हो.. हैरत और भय के मारे उसकी आँखें बाहर को निकल आई... धीरे धीरे चलकर उसने बिस्तेर पर पड़े कागज के टुकड़े को उठाया.. लाल रंग से कागज पर सिर्फ़ इतना ही लिखा हुआ था, डेड नेवेर लाइ!

आसमन्झ्स में वहीं जमकर खड़े हो चुके मानव को सपस्ट अहसास हो रहा था कि कमरे में कोई है... पर कौन है; ये उसकी समझ से परे था.. इतना तो तय था ही कि जो कोई भी था.. तीनो राइटिंग एक ही आदमी की थी...

हैरानी से पागल हुए जा रहे मानव ने बिस्तेर के नीचे देखा, दोबारा अलमारियों के पिछे देखा.. पर कहीं आदमी होने का चिन्हा तक उसको नज़र नही आया...

"कौन है भाई? ये आँख मिचौली सी कैसी खेल रहे हो... सामने आकर बात करो ना.." मानव एक जगह खड़ा खड़ा ही चारों तरफ घूम घूम कर देख रहा था...

"अगर तुम रोहन या नितिन को बचाने के इरादे से आए हो तो सामने आ जाओ! मैं भी सच जान'ना चाहता हूँ... सामने आ जाओ यार!" मानव इस तरह बात कर रहा था जैसे किसी से फोन पर बात कर रहा हो.. बोलते हुए उसकी आँखें सामने दीवार पर ठहरी हुई थी.... उसकी बातों और चेहरे से लग रहा था की उसको 'भूतों' के कॉन्सेप्ट पर यकीन हो चला है...

अगले ही पल उसने बड़ी मुश्किल से खुद को बेहोश होने से रोका... उसकी टेबल पर रखा पेन पहले सरका और फिर हवा में उठ गया.. अगले ही पल पेन टेबल पर इस तरह जाकर खड़ा हो गया मानो किसी ने पेन हाथ में लेकर टेबल पर हाथ रख दिया हो....

आअस्चर्य में मानव पलकें झपकना तक भूल गया.. वह दो कदम पिछे हटा और अपने हाथ अलमारी से चिपका लिया... उसकी आँखें हैरत से फटी जा रही थी.. गला सूख चुका था.... पर बोलती बिल्कुल बंद थी.. अब तो उसके साँस भी गिने जा सकते थे... और दिल की धड़कने भी सुनी जा सकती थी....

कुच्छ पल पेन हवा में ही लहराता रहा.. फिर अचानक उसकी सी.डी. (केस डाइयरी) के पन्ने पलटने लगे... आख़िरकार जब पन्ने पलटने बंद हो गये तो पेन डाइयरी के पन्ने से सटकार खड़ा हो गया... और इस तरह लहराने लगा जैसे पन्ने पर कुच्छ लिखा जा रहा हो....

मानव साँस रोके डाइयरी पर पेन का नृत्या देखता रहा.. आज से पहले उसने कभी सोचा भी नही था कि ऐसा भी कभी देखने को मिल सकता है.. हालाँकि अभी तक उसको किसी तरह की हानि नही हुई थी.. पर फिर भी वह पछ्ता रहा था कि रिवॉल्वर उसने टेबल के ड्रॉयर में ही क्यूँ छ्चोड़ दी.. अगर पेन उठ सकता है तो रिवॉल्वेर भी तो..

अचानक डाइयरी पेन को अपने पन्नों में ही समेटे बंद हो गयी.. कुच्छ ही देर बाद चितकनी नीचे हुई और दरवाजा अपने आप खुल गया...

मानव अभी तक सम्मोहित सा दरवाजे की और देख रहा था कि संतरी भगा भगा आया,"जी जनाब! आपने बुलाया..!"

अब तो मानव संतरी को भी शक की निगाहों से ही घूर रहा था.. ,न..नही तो!"

"ज्जई.. वो आपने दरवाजा खोला, इसीलिए मुझे लगा..." संतरी सिर झुका कर बाहर निकलने लगा....

"अरे सुनो!" मानव ने आवाज़ लगाई...

संतरी झट से सेवा में पुन्ह: हाज़िर हो गया.....

"वो... रोहन को यहीं भेज दो.. मेरे पास!"

क्रमशः .........................

 
अधूरा प्यार--17 एक होरर लव स्टोरी

गतांक से आगे ...............................

"जी! आपने बुलाया?" रोहन अंदर आकर विनम्रता से बोला.....

"हां याअर.. मरता क्या ना करता! आओ..." केस डाइयरी अब मानव के हाथ में थी...

"आओ.. बैठ जाओ आराम से.. यहीं सो जाना.. कल सुबह उठकर घर चले जाना!" मानव ने बिस्तेर पर बैठते हुए कहा.. कुच्छ देर पहले हुए पारलौकिक अनुभव का असर उसकी आँखों में अब भी सॉफ दिखाई दे रहा था...

रोहन ने आस्चर्य से मानव की और देखा,"इस रहमत की वजह जान सकता हूँ क्या?"

"लो.. ये पढ़ो!" कहकर मानव ने 'वो' पन्ना खोल कर डाइयरी रोहन के हाथों में दे दी....

"ये क्या है?" रोहन ने बिना डाइयरी में देखे ही पूचछा...

"अरे यार.. पढ़ो तो सही.. बाद में सब बताता हूँ...." मानव ने मुस्कुराने की कोशिश की.. पर मुस्कुराहट सिर्फ़ उसकी कोशिश में ही रही.. चेहरे पर आ नही पाई...

रोहन ने डाइयरी को सामने रखा और पढ़ने लगा....

" आपकी दुनिया के इस पार की दुनिया अजीब होती है इनस्पेक्टर साहब! हम जिंदा नही होते; पर कयि बार मरते भी नही. आप मुझको महसूस करके बेचैन हो गये हो; पर सच कहूँ तो हम आत्मायें धरती के जिंदा इंसानो से डरती हैं. लालच, हवस, साज़िश, विस्वश्घात; क्या क्या नही होता यहाँ... हुमारी दुनिया आप लोगों से लाख दर्जे बेहतर है...

हम में से ज़्यादातर आपकी दुनिया से दूर ही चैन से रहना चाहते हैं.. मैं भी शायद वापस लौट कर आने की कभी सोचती भी नही.. पर 'अधूरा प्यार' हम में से कुच्छ को मरने के बाद भी अपने प्रियतम से बाँधे रखता है... और हम आपकी और हमारी दुनिया के बीच आधार में ही लटक कर रह जाते हैं....

ये प्यार चीज़ ही ऐसी है इनस्पेक्टर साहब.. ये पानी की तरह तरल भी है और बर्फ से ज़्यादा ठोस भी... ये नाज़ुक भी है और सर्वशक्तिशाली भी.. ताकतवर इतना कि भगवान भी इसके आगे घुटने टेक देता है.. प्यार के कच्चे धागे से बँधे लोगों को मरने के बाद भी भगवान पूरी तरह अपने में समाहित नही कर पाता.. हम जहाँ रहना चाहते हैं; वहीं रहते हैं... और अक्सर अपने प्रियतम के साथ साथ..

नीरू को लिखा वो खत मैने ही लिखा था, ठीक वैसे ही जैसे अभी आपके सामने लिख रही हूँ.. आपको डराना मेरा मकसद नही था.. पर आपको अपनी मौजूदगी का सबूत देना ज़रूरी था.. माफ़ करना!

ज़रूरत पड़ी तो अपने 'अधूरे प्यार' की खातिर फिर आउन्गि!"

रोहन अचरज से काफ़ी देर तक डाइयरी में ही देखता रहा, फिर सिर उठा कर बोला,"ये किसने लिखा?"

"श्रुति आई थी !" मानव ने लंबी साँस लेते हुए जवाब दिया...

................................................

"अभी तक तेरा मूड ऑफ है? अब भूल भी जा!" ऋतु ने अगले दिन भी नीरू को इसी तरह मुँह लटकाए देखा तो उसको समझाने लगी," मेरी ही ग़लती है.. मैं ही तुझे वहाँ ले गयी..."

"अरे वो बात नही है यार... मुझे क्या फ़र्क पड़ता है.. किए की सज़ा तो मिलेगी ही..." नीरू ने मुँह लटकाए हुए कहा...

"तो फिर क्या बात है? चेहरे पर 12 क्यूँ बजे हुए हैं तेरे.." ऋतु ने पूचछा...

"घर वाले मेरी शादी करना चाहते हैं.. परसों आ रहे है मुझे देखने के लिए..." नीरू ने नाराज़गी के अंदाज में अपने होन्ट बाहर निकाल लिए...

"अर्रे वाह.. कॉंग्र्रर्रर..." ऋतु अचरज और गुस्से से उसकी और देख रही नीरू को देखते ही बीच में ही पलटी मार गयी,"...ओह्ह्ह..सॉरी.. ये तो बहुत बुरा हुआ! सच में यार... अब तू क्या करेगी?" ऋतु ने अपने चेहरे पर बनावटी दुख के भाव लाते हुए कहा....

"मेरी तो कुच्छ समझ में नही आ रहा... पापा ने तो सॉफ कह दिया है.. इस बार मेरी नही चलेगी...." नीरू ने बिगड़ते हुए कहा....

"क्यूँ इस बार क्या हो गया? पहले भी तो मान जाते थे वो...!" ऋतु बात को कुरेदते हुए बोली....

"कह रहे हैं कि ये रिश्ता हमें किस्मत से मिला है.. इसको किसी भी हालत में वो हाथ से नही जाने देने वाले.....!" नीरू ने कहा...

"अच्च्छा! ऐसा किसका रिश्ता आया है?" ऋतु ने उत्सुकता से पूचछा...

" वो.. इनस्पेक्टर नही है जो कल वहाँ आया था.. मानव! " नीरू ने मुँह बनाकर कहा....

"ऊऊ..वॉववव..."ऋतु ने इतना ही कहा था की नीरू ने उसको मारने के लिए अपनी किताब उठा ली....

"मेरा ये मतलब नही था यार.. पर घरवालों की बात से भी मैं सहमत हूँ.. क्या कमी है आख़िर उसमें...?" ऋतु कहे बिना ना रह सकी....

"तो तू करले ना शादी... इतना ही पसंद है तो.... मुझे शादी नही करनी तो नही करनी... बस!" नीरू के एक एक शब्द से उसका गुस्सा झलक रहा था....

"हाए.... काश मेरे लिए ऐसा रिश्ता आया होता.. मैं तो फट से हाँ कर देती.." ऋतु ने बत्तीसी निकाल कर कहा और फिर संजीदा हो गयी,"पर तू टालेगी कैसे... परसों आकर वो तुझे 'अपना' लेंगे... फिर इनकार करने पर तो दोनो ही घरों की इन्सल्ट होगी... ऐसा मत करना प्लीज़.. तुझे शादी नही करनी तो पहले ही मना कर देना..."

"वही तो मैं सोच रही हूँ यार... कैसे टलू.. कुच्छ समझ में नही आ रहा....

"एक बात और हो सकती है?" ऋतु ने कुच्छ सोचते हुए कहा...

"वो क्या?" नीरू ने उसको गौर से देखते हुए पूचछा....

" मानव ने हमें कल रोहन के पास देखा था... क्या पता वो खुद ही इस रिश्ते से मना कर दे...?" ऋतु ने दिमाग़ लड़ाते हुए कहा....

"नही... उसको कोई फ़र्क नही पड़ा शायद... कल शाम को फिर आया था घर पर... ये बताने की अब कोई परेशान नही करेगा... मम्मी से बड़ा हंस हंस कर बातें कर रहा था... मेरे तो दिल में आ रहा था कि 'मोगरा' उठा कर उसके सिर में मार दूं.. ना रहेगा बाँस.. और ना बजेगी बंसूरी..." नीरू ने अपना दुखड़ा रोया...

"हे हे हे... आज कल तुझे सिर फोड़ने में बड़ा मज़ा आने लगा है... कल उसका सिर देखा था? मुझे तो बड़ा मज़ा आया.. हे हे हे...." ऋतु ने हंसते हुए कहा...

"तू मेरी बात को सीरीयस क्यूँ नही ले रही....!" नीरू ने गुस्से से कहा...

"ले तो रही हूँ यार... तू ही बता, क्या कर सकते हैं...?" ऋतु ने सीरीयस होकर पूचछा...

"भाग जाउ घर से?" नीरू ने इतनी आसानी से कह दिया मानो ये बच्चों का खेल हो....

"पागल हो गयी है क्या? ये क्या कह रही है तू.. 'भागने' का मतलब पता है तुझे?" ऋतु ने उसकी और घूरते हुए कहा...

"हां.. पता है.. मैं बदनाम हो जाउन्गि... कोई मुझसे शादी नही करेगा.. हमेशा के लिए प्राब्लम सॉल्व्ड..." नीरू ने विस्वास के साथ कहा.....

"कैसी बातें कर रही है यार... अंकल आंटी पर क्या गुज़रेगी.. सोचा भी है...? वो कैसे रहेंगे....? ज़रा सोच! इतनी भी अकल नही है क्या?" ऋतु झल्ला उठी....

"ओह्हो.. मज़ाक कर रही हूँ यार... पर ये भी सच है.. शादी तो मुझे किसी भी सूरत में नही करनी है....परसों तक घर वाले नही माने तो मैं 2-4 हफ्ते के लिए कहीं खिसक जाउन्गि...!" नीरू ने कुच्छ सोचते हुए कहा....

ऋतु इस बात पर कुच्छ कहती.. इस'से पहले ही शिल्पा लगभग दौड़ती हुई उनकी और आई...," कॉनग्रेट्स!!!"

ऋतु और नीरू ने चौंक कर उसको देखा....,"तुम्हे कैसे पता लगा?" ऋतु ने अचरज से पूचछा....

"अरे, मुझे तो सब पता लग गया है.. तुम्हे ही नही पता!" शिल्पा ने उनके पास बैठते हुए खुशी से कहा....

"क्या?" दोनो एक साथ बोल पड़ी....

"रोहन वापस आ गया है... वो बिल्कुल निर्दोष था.. कल रात ही 'उस' इनस्पेक्टर को सारी बात पता चल गयी...." शिल्पा ने बताया...

ऋतु का मन कर रहा था कि शिल्पा को बता दे की नीरू के लिए उसका रिश्ता आया है.. पर नीरू के वहाँ रहते उसकी हिम्मत नही हुई...

"अच्च्छा... पर कैसे?" ऋतु ने पूचछा...

"सारी बात आकर बताउन्गि... अभी मुझे कहीं जाना है.. मेरी प्रॉक्सी लगवा दोगे ना प्लीज़...!" शिल्पा ने मिन्नत सी करी...

"जा जा.. ऐश कर.. आजकल तू गायब बहुत रहने लगी है.. बाद में पूच्हूँगी कि आख़िर राज क्या है...!" ऋतु ने हंसते हुए कहा....

क्रमशः............................

 
अधूरा प्यार--18 एक होरर लव स्टोरी

गतांक से आगे ...............................

"आज तो बड़ी सी पार्टी होनी चाहिए... क्यूँ?" अमन रोहन और रवि के साथ आज सारा दिन घर पर ही रहा.. शेखर घंटा भर पहले ही यहाँ से निकल कर गया था...

रोहन को छ्चोड़ कर दोनो के चेहरे खिले हुए थे.. हालाँकि सबको विस्वास था कि रोहन बे-कसूर है और जल्द ही वापस आ जाएगा... पर सुबह उनके थाने में जाने से पहले ही रोहन को वापस आया देख तीनो की खुशी का ठिकाना ही नही रहा था... तभी सुबह से ही सभी के चेहरे पर उल्लास सॉफ नज़र आ रहा था....

"काहे की पार्टी यार... बेवजह नीरू के सामने ज़िल्लत का सामना करना पड़ा.. पता नही क्या समझ रही होगी वो? मैं तो श्रुति वाला हादसा उसको बताना ही नही चाह रहा था.. बिना बात किरकिरी हो गयी..." रोहन ने कहा....

"अरे, कुच्छ नही होता.. शेखर ने शिल्पा को फोन करके सब कुच्छ बता दिया था....अब तक तो नीरू को पता लग भी गया होगा की तू बेक़ुसूर है.. पर यार ये तो कमाल ही हो गया.. श्रुति की आत्मा खुद चल कर तुझे बचाने गयी.. इट'स अम्ज़िंग यार!" अमन ने रोहन को निसचिंत करने की कोशिश की...

"अरे बचाना ही नही.. वो तो रोहन और नीरू को मिलवाना भी चाहती है... उसके घर पर भी तो लेटर मिला है.. कमाल हो रहा है यार..." रवि ने उनको बीच में टोका....

"हूंम्म... मुझे तो शाहरुख की उस फिल्म का डाइलॉग याद आ रहा है.. वो क्या है.. ' इतनी शिद्दत से मैने तुम्हे पाने की कोशिश की है, कि जर्रे जर्रे ने हमें मिलाने की साज़िश की है!' सच में यार.. तुमको मिलने के लिए तो जैसे पूरी कयनात ने अपनी ताक़त झोंक दी है... तुम्हे मिलने से अब कोई नही रोक सकता.. बेफ़िकर रहो.." अमन गहरी साँस लेते हुए रोहन की और देख मुस्कुराने लगा...

बात सुनकर रोहन का दिल खुश हो गया और वो भी मुस्कुराने लगा....

"अबे तू क्यूँ इतना खुश हो रहा है... कोशिश तूने नही, टीले पर तुम्हारे इंतजार में तड़प रही भाभी जी के दिल ने की है.. हम'में से किसी ने थोड़ी बहुत की है तो मैने.. ये देखो मेरा सिर.. मुझे तो लगता है, भाभी जी ने पर्मनेंट निशानी दे दी मुझे.. कम ही नही होता.." रवि ने कहा और तीनो हँसने लगे....

--------------------------------------------------------

" ऋतु!" शाम को नीरू ने सीरीयस होकर ऋतु से बात करनी शुरू की.. अगले दिन शाम को दोनो नीरू के घर पर ही थी....

"हुम्म.. बोल!" ऋतु ने कहा...

"अब क्या करूँ यार? मेरा तो दिमाग़ खराब हो रहा है सोच सोच कर.." नीरू ने अपना सिर पकड़ रखा था...

"देख... मैं तो यही कहूँगी की घर वालों की मान लेने में ही भलाई है.. क्या फायडा बेकार में उलझ कर.. जब कुच्छ हो ही नही सकता...!.... और फिर शादी करने में बुराई ही क्या है? मेरी ये समझ में नही आ रहा की तू शादी से इनकार क्यूँ कर रही है.. कोई और पसंद कर रखा है क्या?" ऋतु ने सीरीयस होते हुए कहा...

"तू बकवास क्यूँ कर रही है.. कुच्छ आइडिया है तो बता..!" नीरू ने गुस्से से कहा..," वो कल आ रहे हैं.. और तुझे मज़ाक सूझ रहा है..."

"मज़ाक नही कर रही यार... ठीक ही तो कह रही हूँ.. आख़िर बुराई क्या है शादी करने में.. वो तो सभी करते हैं...!" ऋतु ने ज़ोर देकर कहा...

"मुझे नही पता.. पर मुझे पक्का पता है कि शादी करते ही मैं मर जाउन्गि.." नीरू ने उदास होकर कहा....

"अच्च्छा! आज तक तो कोई मरा नही... तुझे ऐसा क्यूँ लगता है.." ऋतु लगातार जिरह कर रही थी...

"मेरा दिल कह रहा है, इसीलिए.. और मुझे पता है ये झूठ नही है.. मरना ही है तो क्यूँ ना शादी से पहले ही मर जाउ?" नीरू ने हताशा के भाव चेहरे पर लाते हुए कहा,"अपने घर में तो मरूँगी...."

"देख.. अब बकवास तू कर रही है... प्लीज़.. ऐसा मत बोल.. कुच्छ नही होगा.. अंकल आंटी तुम्हारा बुरा थोड़े ही चाहते हैं..." मरने की बात पर ऋतु को गुस्सा आ गया...

"ठीक है तो जा! तू भी उन्ही का ही पक्ष ले ले.. मुझे जो करना होगा मैं कर लूँगी..!" नीरू ने कहा और लॅटेकार तकिये के नीचे अपना चेहरा दबा लिया...

ऋतु ने नीरू के पास सरक कर उस'से तकिया छ्चीन लिया," अच्च्छा बोल.. क्या करना है.. मैं तेरे ही साथ हूँ पागल!" ऋतु उसके बालों में हाथ फेरने लगी....

ऋतु की बात सुनकर नीरू खुश होकर बैठ गयी....."देख.. मैं कल से ही मम्मी पापा के पिछे पड़ी हूँ... पर उनके कान पर जू तक नही रैंग रही.. अब तो बस एक ही इलाज है..." कहकर नीरू चुप हो गयी...

"वो क्या?" ऋतु ने संशय से पूचछा....

" गरिमा के पास होस्टल में चली जाउ 2-4 दिन के लिए.. उसको कुच्छ पता भी नही है इस शादी के चक्कर के बारे में.. मैं जाकर मम्मी को फोन भी कर दूँगी कि शादी ना करने का वादा करो तो मैं आ जाउन्गि.... फिर 'ये' आराम से मेरी शादी करने की अपनी ज़िद भी छ्चोड़ देंगे..." नीरू ने कहा....

"तूने अपनी तो सोच ली... उनकी जो बे-इज़्ज़ती होगी वो?" ऋतु ने उसको घूरते हुए कहा....

"तो मैं और क्या कर सकती हूँ यार.. मैने मम्मी से उनका नंबर. लेने की भी कोशिश की.. पर वो मानी ही नही... बता मैं क्या करूँ..." नीरू ने मायूस होकर कहा....

"हूंम्म.. देख, मैं तो सॉफ बता रही हूँ.. मुझे तो तेरा ऐसा करना अच्च्छा नही लगता... कल जो होता है होने दे.. बाद में सोच लेंगे....!" ऋतु ने समझाने की कोशिश की...

"अरे, तुझे पता नही है... वो कल मँगनी के लिए आ रहे हैं.. खाली देख कर जाने की बात होती तो मैं मान लेती.. पर घर वालों का जल्दी शादी करने का प्रोग्राम बन गया है... उन्ही के कहने पर... अब तू खुद ही सोच.. अब ज़्यादा बे-इज़्ज़ती होगी या बाद में...?" नीरू ने ज़ोर देकर पूचछा...

"देख, मैं कुच्छ नही कहती... तुझे जो करना है कर ले!" ऋतु गुम्सुम सी बैठकर कुच्छ सोचने लगी...

"देख! तू मेरा प्लान लीक तो नही करेगी ना?" नीरू ने उसको घूरते हुए पूचछा...

"कुच्छ नही करती मैं.. जो करना है कर ले.. मैं जा रही हूँ.." ऋतु खड़ी होते हुए बोली.. उसके चेहरे पर उदासी और बे'बसी सॉफ झलक रही थी.....

ऋतु को पूरी रात नींद नही आई.. सारी रात करवटें बदलते हुए वह नीरू के इस कदम के होने वाले असर के बारे में ही सोचती रही... केयी बार उसके मंन में आया की फोन करके आंटी जी को सब कुच्छ बता दे.. पर इसके लिए ज़रूरी हिम्मत वह जुटा नही सकी...

सुबह मम्मी उसको उठाने आई तो आते ही बोली," क्या बात है बेटी? तबीयत तो ठीक है?" मम्मी ने माथे पर हाथ लगा कर देखा.. वो तेज बुखार से तप रही थी.. उसकी आँखें लाल थी और चेहरा बोझिल सा लग रहा था....

"ओह्हो.. तुझे भी आज ही बीमार होना था... आज तो नीरू को देखने आने वाले हैं ना? चल चाय के साथ कुच्छ खा ले.. और गोली ले लेना... ठीक हो जाएगी..." मम्मी ने उसको पुच्कार्ते हुए कहा...

ऋतु फफक सी पड़ी... उसने अपना सिर घुटनो में दबा लिया और सिसकने लगी... अब तक तो सारे मोहल्ले को ही पता लग चुका होगा कि आज नीरू की मँगनी है.. अब क्या होगा....

अचानक उसको इस तरह से व्यवहार करते देख मम्मी जी विचलित सी हो गयी," क्या हुआ बेटा! ऐसा क्यूँ कर रही है तू..? कुच्छ बात है क्या?" मम्मी बुरा सा मुँह बनाकर उसके साथ बैठ गयी और उसका चेहरा अपनी छाती से लगा लिया...

"कुच्छ नही मम्मी!" और ऋतु और ज़्यादा तेज़ रोने लगी.....

"आए.. मेरी लाडली! ऐसा क्यूँ कर रही है? कोई बात है तो बता ना.. तू भी मुझसे कुच्छ छुपाती है कभी?" मम्मी अधीर होकर उसको दुलार करने लगी...

"ममियैयीई... वो... नीरू!" ऋतु लगातार मोटे मोटे आँसू गिराती हुई सिसक रही थी.....

"क्या हुआ? फिर से लड़ाई हो गयी क्या..? ले तू चाय ले.." मम्मी ने टेबल से ठंडी हो रही चाय उसको उठाकर दी.....

"वो शादी नही करना चाहती मम्मी... इससलिए घर से जा रही है..." अपने दिल का गुबार निकलते ही ऋतु फुट फुट कर रोने लगी.....

"हाए राम! ये क्या कह रही है तू? घर वाले समझाते क्यूँ नही... अब क्या होगा?" मम्मी के हाथ से चाय का कप छ्छूट'ते छ्छूट'ते बचा...

"उनको नही पता मम्मी... वो बिना बताए जाएगी....." ऋतु ने कहा...

"हे भगवाअन... मैं अभी उनके घर जाती हूँ.. ऐसे कैसे चली जाएगी...?" मम्मी ने एक पल भी गँवाए बिना अपनी चप्पल पहनी और तेज़ी से बाहर निकल गयी...

"उनको ये मत बताना मम्मी.. कि मैने बताया है.. वो बोलेगी नही कभी मुझसे.." ऋतु ने जब तक बात कही.. मम्मी जी बाहर निकल चुकी थी.. पता नही सुना या नही सुना....

---------------------------------------------------

ऋतु की मम्मी ने नीरू के घर की बेल बजाई.. बाहर उसकी मम्मी ही निकल कर आई," आओ बेहन.. हम तो आज बड़ी लेट उठे..." नीरू की मम्मी जी ने मुस्कुरकर उसका स्वागत किया...

"नीरू कहाँ है?" ऋतु की मम्मी ने सीधा यही सवाल किया....

"सो रही है उपर.. क्यूँ?"

"ज़रा बुलाना.. मुझे कुच्छ काम है.. चलो रहने दो.. मैं उपर ही चली जाती हूँ..." ऋतु की मम्मी उनको बात बताए बिना ही नीरू को समझाना चाहती थी....

"अरे क्यूँ परेशान होती हो... आओ चाय पी लो तब तक.. मैं बुलाकर लाती हूँ..." कहते हुए नीरू की मम्मी उपर चली गयी.....

---------------------------------------------

दिन निकलने से पहले ही नीरू घर से बाहर निकल चुकी थी.. जाने क्या बात थी, पर उसका शादी ना करने का दृढ़ निस्चय निसचीत तौर पर नियती द्वारा निर्धारित ही लगता था.. बाहर निकलने से पहले उसके मन में इतनी घबराहट नही थी, जितना वो घर से बाहर कदम रखने के बाद महसूस कर रही थी. ये तो शुक्र था कि उसके सामने एक मंज़िल थी.. अमृतसर का गर्ल'स होस्टल ! वरना क्या हाल होता उसका... कभी घर वालों का ख़याल और कभी उनकी इज़्ज़त का.. उसका मॅन कहीं ना कहीं उसको ऐसा करने से रोक रहा था... पर उसके कदम आगे ही आगे बढ़ते चले गये..

बस-स्टॅंड पर जाकर उसने अनमने मंन से अमृतसर की एक टिकेट खरीदी और बस में बैठ गयी......

--------------------------------------------

"हे भगवान! ये क्या हो गया...? क्या जवाब देंगे हम उनको... इस'से अच्च्छा तो हम उसकी मान ही लेते...." सारी बात का पता लगते ही मम्मी पापा दोनों के पैरों तले की ज़मीन खिसक गयी.... ऋतु के पापा भी वहीं आ चुके थे... सबके माथे पर चिंता की लकीरें थी....

"मैं गाड़ी लेकर देख कर आता हूँ... " विचलित से पापा ने कहा और बाहर निकल गये....

........................................................

"अंकल जी! कितनी देर में चलेगी बस?" नीरू ने बस में चढ़े कंडक्टर से पूचछा...

"5-7 मिनिट और लगने हैं बेटी बस.. एक बार मिस्त्री क्लच ठीक कर दें.. फिर तो यहाँ से सीधी 5वें गियर में चलनी है...... हे हे" कंडक्टर ने कहा और आगे चला गया.....

----------------------------------------
 
Back
Top