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सुबह जल्दी नींद खुल गई।
"ये मेरे साथ ही होता है या आप सभी के साथ भी?"
जन्मदिन वाले दिन जल्दी नींद खुल जाना, जल्दी नहा कर भगवान के सामने प्रार्थना करना। उठकर पूजा-पाठ करके बैठी ही थी कि अभ्युदय जी का फोन आया।
"हेलो।"
"हैप्पी बर्थडे निशी और गुड वाली मॉर्निंग भी।"
"थैंक्यू बहुत सारा।"
"सुनो बाहर अपनी खिड़की के पास देखो।तुम्हारा आज का पहला तोहफा।"
मैं बाहर आई और देखा तो एक चमकीले से कवर में पैक एक छोटा सा गिफ्ट था।
"ये आपने कब?कैसे?"
"खोल कर देखो निशी।मैं 10 मिनट में फोन करता हूँ।"
मैंने फोन कटने का भी इंतजार नही किया और गिफ्ट खोला।एक डिब्बी में पायल थीं।पर ये क्या?
"ये तो डिज़ाइन मैंने जो बनाई थी वो।" मैंने अपनी ड्राइंग बुक ढूंढने की कोशिश की पर वो मुझे कंही नही मिली।इतने दिनों से कुछ हरकत भी नहीं की उस बुक में तो याद ही नहीं रहा कि कंहा है वो।
पर अब समझ आ गया। पायल में बनी तीन छोटी डांसिंग डॉल और एक तरफ लटकते घुँघरुओं को देख कर,कि आखिर मेरी वो ड्राइंग बुक है कंहा।
पैरों में डालकर देखी तो खुशी से झूम उठी मैं।बिल्कुल वैसी ही लग रही है जैसा मैंने सोचा था।दरसल मुझे ज्वैलरी डिज़ाइन बनाने में बहुत मज़ा आता है।जब भी कभी थक जाती हूँ तो माइंड को रिलैक्स करने को पेन चला लेती हूँ।"पर ये तोहफा मुझे रखना चाहिए क्या?क्यों रखूँ? माँ ने समझाया था न बिना वजह तोहफे लेने से इंसान गलत मतलब निकालता है।फिर?नहीं ये मुझे वापिस करना होगा।मैं ये नही ले सकती।अखरोट के पैसे भी 4 दिन एक्सरसाइज के पैसे न लेकर चुकाए थे,याद है न निशी?फिर अब?कोई तोहफा नहीं।"
मैं नही जानती थी कि फोन अब तक चालू है और मेरी बड़-बड़ भी चालू ही थी।
फोन की घंटी बजी दुबारा तब ध्यान गया।
"अभ्युदय जी,मैं ये नहीं ले सकती।माफ कीजिएगा।"
"निशी ये चांदी की पायल नहीं हैं।"
"मतलब?"
"मतलब नकली हैं, बस डिज़ाइन तुम्हारा है।"
"मैं अब भी नही समझी अभ्युदय जी।"
"मतलब नाटक बन्द करो।चांदी की भी है गर तो मत लेना 4 दिन पैसे एक्सरसाइज के।यही तो आता है तुम्हें।"
"आपने सब सुन लिया?"
"अब बोलोगी तो सुनाई पड़ेगा ही।"
"अच्छा।ओह.. मतलब फोन काटा नही गया था है न?"
"तुमने ही नही काटा।हर बार तुम ही काटती हो फोन।मैं तो बस कहता हूँ फोन रखने को।"
"क्या मतलब?"
"अरे कुछ नहीं।तुम कितने साल की हो गई हो?"
"अच्छा जी।लड़कियों से उम्र नहीं पूछी जाती।पता नही क्या आपको?"
"तुमसे इस जवाब की उम्मीद तो बिल्कुल नही थी।तुम अलग हो,अलग ही रहो।आम लड़कियों सी हरकत मत किया करो।"
"आप डांट रहे हैं? वो भी मेरे जन्मदिन पर?जाइये बात ही नही करनी मुझे आपसे।"
"अच्छा मत करो।बिल्कुल मत करो।जाओ घर के बाहर फिर कुछ है तुम्हारे लिए।"
"क्या अभ्युदय जी?कोई जिन्न है क्या आपके पास? या जादू की छड़ी? ये कौन है जो गिफ्ट्स रख रहा है?
"जादू है निशी।जादू। जाओ अब।"
मैं बाहर आई तो फिर एक पैकेट था।पर ये रख कौन रहा है? मैं छत पर गई लेकिन कोई नही था।बाहर भी झांका कि ये रिया का काम तो नहीं।आंटी से ऐसी उम्मीद करना बेकार है।क्योंकि वो तो हड़का के हड़कम्प मंचा देंगी।फिर कौन है?
मैं गिफ्ट लेकर अंदर आ गई।इस बार गिफ्ट खोलने पर एक रेड कलर का बहुत सुंदर सूट था।मुझे ब्राइट कलर ही पसन्द हैं पर रेड?
लेकिन ये क्या?
"ये भी मेरी डिज़ाइन?"
वैसा ही जैसा मैंने उस ड्राइंग में बनाया था।मोतियों से सजा और फाइन शिफॉन पर एक तरफ ब्लू स्टोन का वर्क।स्लीव्स पर रेड ब्लू का ऑन-ऑफ कॉम्बिनेशन।
बहुत ही सुंदर,एक दम मेरी स्टाइल वाला और अलग।
एक बहुत अच्छी चीज जो शायद मैंने भी अपनी डिज़ाइन में नही सोची थी वो था बैक पर डोरी।
नॉर्मल सूट को प्रॉपर फिटिंग में लाने के लिए चोली की तरह ही पीछे जिगजैग पैटर्न में डोरी लगाई गई थी।
पहनने के बाद डोरी को खींच कर प्रॉपर फिटेड सूट बनाया जा सकता था।इतना दिमाग,क्या बात।बहुत खुश हो गई थी मैं,पर टेंशन अब भी थी कि कितने पैसे कटवाने पड़ेंगे इन गिफ्ट्स को रखने के चक्कर मे?
फोन बजा।
"कैसी लगी?"
"अभ्युदय जी,आपको चोरी आती है ये नही पता था?"
"क्या?दिल इतनी जल्दी चुरा लिया क्या मैंने? मैं तो ब्लश कर रहा हूं सच।"
"हा हा अभ्युदय जी पर आप अभी बिल्कुल रिया की तरह साउंड कर रहे हैं।"
"मतलब नही समझे बर्थडे गर्ल।"
"मतलब ये कि दिल नहीं, ड्राइंग बुक चुराई आपने।चोर हैं आप।"
"आज माफ कर दो।लेकिन तुम बहुत टैलेंटेड हो।उस दिन घर न आता तो पता ही नही चलता मुझे।अच्छा ड्रेस पहन कर देखी?"
"नहीं।अभी नहीं।"
"चेक कर लो।कुछ भी दिक्कत हो तो बुटीक जा सकती हो।ओके?
"जी देख लूंगी।ओर सुनो ब्लू स्टोन्स में ढूंढो नाम लिखा है कंही।"
"मेरा?"
"नहीं।मेरा। ऑब्विसली तुम्हारा।"
"थैंक्यू अभ्युदय जी।"
बहुत ढूंढने पर नाम दिखाई दिया
"निशिअभ्यः"।
"निशिअभ्यः मतलब?"
"तुम और मैं।"
"लेकिन मेरे लिए जो ड्रेस है उस पर आपका और मेरा नाम क्यों?"
"बस मन किया तो लिखवा दिया।आज यही पहनोगी तुम।"
"लेकिन अभ्युदय जी रेड कलर ज़्यादा ही ब्राइट हो जाएगा।"
"ठीक है तो बाहर जाओ फिर से।"
"अब क्या है?"
"आज कॉलेज में पहनने के लिए कुछ है।"
मैंने बाहर आकर एक और पैकेट उठाया।अब मुझे यकीन हो चला था कि ये काम भाभी का ही है।बस ये समझ नही आ पा रहा था कि अभ्युदय जी ने इन्हें मनाया कैसे होगा?और कब?
पैकेट खोला तो इस बार पीले और सफेद शिफॉन का सूट था।
"बहुत सुंदर है ये अभ्युदय जी।"
"तुमसे ज़्यादा सुंदर नही है निशी।इसे ही पहनना और सुनो ड्रेस के पैकेट में कुछ और भी है।"
ढूंढने पर वोयला की एक डिब्बी दिखी जिसमें बहुत सुंदर ड्राप शेप्ड इयरिंग,नेक पेन्डेन्ट के साथ चेन और एक ब्रेसलेट भी था।
"ये भी चांदी का है क्या?"
"नहीं निशी।ये स्टर्लिंग सिल्वर है।"
"अच्छा।स्टर्लिंग सिल्वर स्टील नही होता अभ्युदय जी।हमें मत सिखाइये।हम नहीं ले सकते ये सब गिफ्टस।"
"आज एक ही बात कहूंगा और एक ही बार कहूँगा।"
"क्या मतलब?"
"अगर मुझे ठीक होते देखना चाहती हो तो आज किसी भी गिफ्ट के लिए मना नही करोगी।"
"अरे.. लेकिन पर.. मैं नही ले पाऊंगी।प्लीज समझने की कोशिश कीजिये न।"
"निशी जन्मदिन पर नाराज़ नहीं होना चाहता तुम से,तो आराम से तैयार हो।"
"लेकिन अभ्युदय जी मैं "
"ठीक है। किसी भी चीज़ को हाथ मत लगाना।खबरदार जो वो सूट पहना भी तो।भूल जाना हम कभी मिले थे।भूल जाना कोई पेशेंट देखा था तुमने अभ्युदय के नाम का।"
"अभ्युदय जी।सुनिए न?"
"मुझे कुछ नही सुनना।तुम ने भी बोल लिया मैंने भी।मैं माँ को समझा भी लूंगा अब घर आने की जरूरत भी नही तुम्हे।"
सुनकर लगा कोई अच्छा सपना टूट गया हो।
"ये मेरे साथ ही होता है या आप सभी के साथ भी?"
जन्मदिन वाले दिन जल्दी नींद खुल जाना, जल्दी नहा कर भगवान के सामने प्रार्थना करना। उठकर पूजा-पाठ करके बैठी ही थी कि अभ्युदय जी का फोन आया।
"हेलो।"
"हैप्पी बर्थडे निशी और गुड वाली मॉर्निंग भी।"
"थैंक्यू बहुत सारा।"
"सुनो बाहर अपनी खिड़की के पास देखो।तुम्हारा आज का पहला तोहफा।"
मैं बाहर आई और देखा तो एक चमकीले से कवर में पैक एक छोटा सा गिफ्ट था।
"ये आपने कब?कैसे?"
"खोल कर देखो निशी।मैं 10 मिनट में फोन करता हूँ।"
मैंने फोन कटने का भी इंतजार नही किया और गिफ्ट खोला।एक डिब्बी में पायल थीं।पर ये क्या?
"ये तो डिज़ाइन मैंने जो बनाई थी वो।" मैंने अपनी ड्राइंग बुक ढूंढने की कोशिश की पर वो मुझे कंही नही मिली।इतने दिनों से कुछ हरकत भी नहीं की उस बुक में तो याद ही नहीं रहा कि कंहा है वो।
पर अब समझ आ गया। पायल में बनी तीन छोटी डांसिंग डॉल और एक तरफ लटकते घुँघरुओं को देख कर,कि आखिर मेरी वो ड्राइंग बुक है कंहा।
पैरों में डालकर देखी तो खुशी से झूम उठी मैं।बिल्कुल वैसी ही लग रही है जैसा मैंने सोचा था।दरसल मुझे ज्वैलरी डिज़ाइन बनाने में बहुत मज़ा आता है।जब भी कभी थक जाती हूँ तो माइंड को रिलैक्स करने को पेन चला लेती हूँ।"पर ये तोहफा मुझे रखना चाहिए क्या?क्यों रखूँ? माँ ने समझाया था न बिना वजह तोहफे लेने से इंसान गलत मतलब निकालता है।फिर?नहीं ये मुझे वापिस करना होगा।मैं ये नही ले सकती।अखरोट के पैसे भी 4 दिन एक्सरसाइज के पैसे न लेकर चुकाए थे,याद है न निशी?फिर अब?कोई तोहफा नहीं।"
मैं नही जानती थी कि फोन अब तक चालू है और मेरी बड़-बड़ भी चालू ही थी।
फोन की घंटी बजी दुबारा तब ध्यान गया।
"अभ्युदय जी,मैं ये नहीं ले सकती।माफ कीजिएगा।"
"निशी ये चांदी की पायल नहीं हैं।"
"मतलब?"
"मतलब नकली हैं, बस डिज़ाइन तुम्हारा है।"
"मैं अब भी नही समझी अभ्युदय जी।"
"मतलब नाटक बन्द करो।चांदी की भी है गर तो मत लेना 4 दिन पैसे एक्सरसाइज के।यही तो आता है तुम्हें।"
"आपने सब सुन लिया?"
"अब बोलोगी तो सुनाई पड़ेगा ही।"
"अच्छा।ओह.. मतलब फोन काटा नही गया था है न?"
"तुमने ही नही काटा।हर बार तुम ही काटती हो फोन।मैं तो बस कहता हूँ फोन रखने को।"
"क्या मतलब?"
"अरे कुछ नहीं।तुम कितने साल की हो गई हो?"
"अच्छा जी।लड़कियों से उम्र नहीं पूछी जाती।पता नही क्या आपको?"
"तुमसे इस जवाब की उम्मीद तो बिल्कुल नही थी।तुम अलग हो,अलग ही रहो।आम लड़कियों सी हरकत मत किया करो।"
"आप डांट रहे हैं? वो भी मेरे जन्मदिन पर?जाइये बात ही नही करनी मुझे आपसे।"
"अच्छा मत करो।बिल्कुल मत करो।जाओ घर के बाहर फिर कुछ है तुम्हारे लिए।"
"क्या अभ्युदय जी?कोई जिन्न है क्या आपके पास? या जादू की छड़ी? ये कौन है जो गिफ्ट्स रख रहा है?
"जादू है निशी।जादू। जाओ अब।"
मैं बाहर आई तो फिर एक पैकेट था।पर ये रख कौन रहा है? मैं छत पर गई लेकिन कोई नही था।बाहर भी झांका कि ये रिया का काम तो नहीं।आंटी से ऐसी उम्मीद करना बेकार है।क्योंकि वो तो हड़का के हड़कम्प मंचा देंगी।फिर कौन है?
मैं गिफ्ट लेकर अंदर आ गई।इस बार गिफ्ट खोलने पर एक रेड कलर का बहुत सुंदर सूट था।मुझे ब्राइट कलर ही पसन्द हैं पर रेड?
लेकिन ये क्या?
"ये भी मेरी डिज़ाइन?"
वैसा ही जैसा मैंने उस ड्राइंग में बनाया था।मोतियों से सजा और फाइन शिफॉन पर एक तरफ ब्लू स्टोन का वर्क।स्लीव्स पर रेड ब्लू का ऑन-ऑफ कॉम्बिनेशन।
बहुत ही सुंदर,एक दम मेरी स्टाइल वाला और अलग।
एक बहुत अच्छी चीज जो शायद मैंने भी अपनी डिज़ाइन में नही सोची थी वो था बैक पर डोरी।
नॉर्मल सूट को प्रॉपर फिटिंग में लाने के लिए चोली की तरह ही पीछे जिगजैग पैटर्न में डोरी लगाई गई थी।
पहनने के बाद डोरी को खींच कर प्रॉपर फिटेड सूट बनाया जा सकता था।इतना दिमाग,क्या बात।बहुत खुश हो गई थी मैं,पर टेंशन अब भी थी कि कितने पैसे कटवाने पड़ेंगे इन गिफ्ट्स को रखने के चक्कर मे?
फोन बजा।
"कैसी लगी?"
"अभ्युदय जी,आपको चोरी आती है ये नही पता था?"
"क्या?दिल इतनी जल्दी चुरा लिया क्या मैंने? मैं तो ब्लश कर रहा हूं सच।"
"हा हा अभ्युदय जी पर आप अभी बिल्कुल रिया की तरह साउंड कर रहे हैं।"
"मतलब नही समझे बर्थडे गर्ल।"
"मतलब ये कि दिल नहीं, ड्राइंग बुक चुराई आपने।चोर हैं आप।"
"आज माफ कर दो।लेकिन तुम बहुत टैलेंटेड हो।उस दिन घर न आता तो पता ही नही चलता मुझे।अच्छा ड्रेस पहन कर देखी?"
"नहीं।अभी नहीं।"
"चेक कर लो।कुछ भी दिक्कत हो तो बुटीक जा सकती हो।ओके?
"जी देख लूंगी।ओर सुनो ब्लू स्टोन्स में ढूंढो नाम लिखा है कंही।"
"मेरा?"
"नहीं।मेरा। ऑब्विसली तुम्हारा।"
"थैंक्यू अभ्युदय जी।"
बहुत ढूंढने पर नाम दिखाई दिया
"निशिअभ्यः"।
"निशिअभ्यः मतलब?"
"तुम और मैं।"
"लेकिन मेरे लिए जो ड्रेस है उस पर आपका और मेरा नाम क्यों?"
"बस मन किया तो लिखवा दिया।आज यही पहनोगी तुम।"
"लेकिन अभ्युदय जी रेड कलर ज़्यादा ही ब्राइट हो जाएगा।"
"ठीक है तो बाहर जाओ फिर से।"
"अब क्या है?"
"आज कॉलेज में पहनने के लिए कुछ है।"
मैंने बाहर आकर एक और पैकेट उठाया।अब मुझे यकीन हो चला था कि ये काम भाभी का ही है।बस ये समझ नही आ पा रहा था कि अभ्युदय जी ने इन्हें मनाया कैसे होगा?और कब?
पैकेट खोला तो इस बार पीले और सफेद शिफॉन का सूट था।
"बहुत सुंदर है ये अभ्युदय जी।"
"तुमसे ज़्यादा सुंदर नही है निशी।इसे ही पहनना और सुनो ड्रेस के पैकेट में कुछ और भी है।"
ढूंढने पर वोयला की एक डिब्बी दिखी जिसमें बहुत सुंदर ड्राप शेप्ड इयरिंग,नेक पेन्डेन्ट के साथ चेन और एक ब्रेसलेट भी था।
"ये भी चांदी का है क्या?"
"नहीं निशी।ये स्टर्लिंग सिल्वर है।"
"अच्छा।स्टर्लिंग सिल्वर स्टील नही होता अभ्युदय जी।हमें मत सिखाइये।हम नहीं ले सकते ये सब गिफ्टस।"
"आज एक ही बात कहूंगा और एक ही बार कहूँगा।"
"क्या मतलब?"
"अगर मुझे ठीक होते देखना चाहती हो तो आज किसी भी गिफ्ट के लिए मना नही करोगी।"
"अरे.. लेकिन पर.. मैं नही ले पाऊंगी।प्लीज समझने की कोशिश कीजिये न।"
"निशी जन्मदिन पर नाराज़ नहीं होना चाहता तुम से,तो आराम से तैयार हो।"
"लेकिन अभ्युदय जी मैं "
"ठीक है। किसी भी चीज़ को हाथ मत लगाना।खबरदार जो वो सूट पहना भी तो।भूल जाना हम कभी मिले थे।भूल जाना कोई पेशेंट देखा था तुमने अभ्युदय के नाम का।"
"अभ्युदय जी।सुनिए न?"
"मुझे कुछ नही सुनना।तुम ने भी बोल लिया मैंने भी।मैं माँ को समझा भी लूंगा अब घर आने की जरूरत भी नही तुम्हे।"
सुनकर लगा कोई अच्छा सपना टूट गया हो।