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अधूरी ख्वाहिशें

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अधूरी ख्वाहिशें

पहली मुलाकात

स्पाइनल इंज्यूरी में इंटर्नशिप का दूसरा दिन।

वो लेटे हुए थे एक पेशेंट टेबल पर।चेहरा दूसरी तरफ था।

"ओए!उधर देख। हेल्थ पर्सनालिटी देख कर तो स्मार्ट लग रहा है।" कुहनी मरते हुए रिया ने निशी को कहा।

"हाँ!पर है कौन?"

"भगवान जाने।अभी पता चल ही जायेगा चल।"

हम सभी अपने-अपने कामों में लग गए थे।सर ने पास बुलाया सभी को।पेशेंट की केस हिस्ट्री बताते हुए,पूछते हुए सभी उन्हीं के पास आए जिस पर मेरी और रिया की नज़र थी।

"ये अभ्युदय जी हैं।"

अभ्युदय नाम सुनकर ही मैं प्रभावित हो चुकी थी।

"स्ट्रोक हुआ था इन्हें अभी 6 महीने पहले।"

उन्हें ध्यान से देखने पर पाया कि बांया अंग लकवाग्रस्त है।सर की बातों पर से ध्यान हट गया और मैं उन्हें ही देखती रही।6 फुट ओर 6 इंच हाइट,गोरे, स्मार्ट,काली गहरी और शून्य में डूबी आँखे, काली घनी मूंछे और दाढ़ी भी।लिवाइस का सफेद टी शर्ट और डार्क ब्लू जीन्स।बेड के बगल नीचे रखे प्यूमा के लोफर।रिया ने फिर कुहनी मारी और बोली "बस कर xray कर रही है क्या?घूरना बंद कर।"

उनकी केस हिस्ट्री देकर सर फिर बोले "निशी और रिया ये कल से तुम्हारे पेशेंट।"

"जी सर।"

भारी आवाज़ में अभ्युदय जी बोले "सर लड़के नहीं हैं इस बैच में?"

हमारे सर ने कहा "आप परेशान न हो,अभ्युदय जी ये अच्छे स्टूडेंट्स हैं।"

"आपको कोई परेशानी नही होगी सर।" रिया बीच में ही कूद चुकी थी।

सबके जाते ही अभ्युदय जी उठने की कोशिश कर रहे थे।मैंने जाकर उनका हाथ पकड़ा और सहारा देकर उठाया।उनकी नजर पहली बार मुझ पर पड़ी।

"थैंक्यू।"

"ये तो हमारा काम है सर।मैं निशी, कल से हम ही आपको देखेंगे।"

"सिर्फ देखेंगी?या ठीक करेंगी?"

मैं झेंप गई थी।क्या इन्होंने मुझे इन्हें घूरते हुए नोटिस कर लिया था?वरना ऐसा क्यों कहते?

"जी सर?आपकी बात का मतलब समझी नही।"

"कोई बात नहीं, अखरोट खाया करो।"

"अखरोट? मतलब?"

"बहुत मतलब-मतलब करती हो आप।"

"लेकिन आप ही सीधी बात नही कह रहे।"

"मैंने क्या टेढ़ी बात की डॉक्टर साहिबा? आपको कहा कि अखरोट खाया कीजिए दिमाग के लिए बहुत अच्छा होता है।"

"तब तो आपको भी खाना चाहिए , स्ट्रोक आपको हुआ है।दिमाग में क्लॉट आपको हुआ है मुझे नहीं।"

वो अब बिल्कुल शांत थे।युनकी हल्की मुस्कान भी खत्म हो गई थी चेहरे से और मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया था।ऐसे कैसे मैं किसी को कुछ भी बोल गई?

वो व्हीलचेयर पर चले जा रहे थे अपने एक केयर टेकर राजू के साथ।

मैंने पीछे से आवाज़ दी "अभ्युदय सर।"

राजू ने व्हीलचेयर रोक दी।मैं उनके सामने आई और अपने कान पकड़ लिए।

आंखों में हल्के आंसू भी थे।नही जानती क्यों पर आंसू बहने लगे और शब्द मुँह से निकले ही नहीं।

"अरे डॉक्टर साहिबा रोती भी हैं आप?हमें लगा बस देखती हैं।रोते नहीं कल मैं अखरोट लाऊंगा आपके लिए।"

"सॉरी।"

"आपने गलत नही कहा कुछ।गलतियां की हैं मैंने अपनी जिंदगी में तो भुगत रहा हूँ।कल मिलते हैं।"

वो चले गए मैं आंसू पोछते हुए वापिस डिपार्टमेंट में आ गई।

सर सबसे केस डिसकस करके बता रहे थे कि कल से क्या-क्या कराना है।

मुझे और रिया को सर ने कहा "पहले तो उस पेशेंट को रेगुलर करवाओ।एक दिन आते है चार दिन नहीं।निशी तुम जानती हो तुम्हें क्यों दिया है ये पेशेंट?"

"नहीं सर।"कंधे उचकाते हुए बोला मैंने।

"तुम्हारी बातों का जादू चलाओ और उन्हें बताओ कि वो ठीक हो सकते हैं।देखा था मैंने तुम्हें फाइनल ईयर के प्रैक्टिकल में किस तरह वो पेशेंट के रिलेटिव तुम्हारे पैर छू रहे थे।"

"जी सर।वो उनके बेटे ने चलना शुरू कर दिया था तो।"

"बस वैसे ही बातों से दिमाग में घुस कर पॉजिटिव सेल्स डेवेलप होंगे।"

"ओके सर।"

कॉलेज से लौटकर बस ख्यालों में अभ्युदय नाम ही चल रहा था और साथ ही अखरोट भी।
 
डायरी का पन्ना

रात की सोच

ख्याल ज्यादा देर रहते नही दिल में मेरे पर फिर भी न जाने क्यों बार-बार आज मन में वही छवि उतरती जा रही थी।ना-ना ये इश्क मोहब्बत से बहुत दूर रहती हूँ मैं।ये कोई पहली नज़र वाला पहला प्यार नहीं पर कुछ तो है जो मेरा मन अभ्युदय जी पर अटका सा हुआ था।

उनकी उदास और खाली आँखे शायद बहुत कुछ कहने को बेताब थीं और मैं सुनने को।वैसे भी कॉलेज की सागर कहलाती हूँ।हर छोटी-बड़ी नदी आकर मुझमे ही समाती है।रिया मुझे सागर ही कहती है।मेरे पास बहुत से लोगों के राज दफ़न होते थे।न जाने क्यों और कैसे लोग मुझे आकर अपने गहरे राज भी बता दिया करते थे।

बहुत से लोग तो पहली ही दफा बात करने बैठते थे और अपनी जिंदगी की किताब खोल देते थे।मैं लोगों की बातें तो सुनती थी पर राय कायम तब ही करती थी जब जरूरत हो वरना सब भुला दिया करती थी।

मैं बात करना चाहती थी अभ्युदय जी से।उनकी उदास आंखों की वजह उनकी बीमारी थी या फिर कुछ और?

रात भी नींद ठीक से नही आई।दूसरे दिन के लिए कुछ जरूरी नोट्स बनाने बैठी तो न जाने क्यों आज स्ट्रोक पर ही हाथ रुक गया।आज फिर एक बार पूरा स्ट्रोक पढ़कर कुछ जरूरी जानकारी को अपने नोट्स में लिख लिया।अगर बांया अंग लकवे से ग्रस्त है तो दिक्कत दाहिने तरफ के दिमाग में हुई है।पता करना होगा कि स्ट्रोक का रीज़न क्या है?क्लॉट के चलते हुआ है या ब्लॉक के?या कुछ और कारण है।सब जानना है।

6 महीने में कितना इम्प्रूवमेंट आ जाना चाहिए था क्या नही आया, सब लिख कर रख लिया था।अब मिलिए कल अभ्युदय जी,मैं करती हूँ अब आपको ठीक।लेकिन क्या वो कल आएंगे?

सर ने कहा कि एक दिन आते हैं तो चार दिन नही आते।फिर कल तक रुकना होगा उनकी बातों को जानने के लिए और तो और उन्हें ठीक करने के लिए।

सिर्फ देखने के लिए नहीं।क्या वाकई उन्होंने मुझे घूरते वक्त नोटिस किया होगा? मैं भी पागल हूँ सच में।ऐसे भी कोई करता है क्या?अब बस वो कल आ जाएं।आएंगे क्यों नहीं कहा तो उन्होंने कल मिलते हैं और अखरोट लाएंगे भी कहा था उन्होंने।

लेकिन अखरोट?ये अखरोट का क्या चक्कर है।शायद उन्होंने इस बात को गंभीरता से ले लिया है कि अखरोट से दिमाग बढ़ता है।हाँ! ओमेगा 3 फैटी एसिड्स होते हैं,अखरोट में जो वाकई दिमाग के लिए बहुत अच्छे होते हैं।पर मुझे क्यों लाकर देंगे?ये कुछ अजीब था जो घटित हुआ पहली बार मेरे साथ।

भगवान प्लीज भेज देना उन्हें कल।प्लीज..प्लीज

चलिए सोती हूँ, बहुत देर हो गई।आज का ये पूरा पन्ना तो सिर्फ अभ्युदय जी को ही समर्पित हो गया।

बाए डायरी।कल मिलूंगी नई बातों के साथ।

तुम्हारी पागल
 
जैसे आप सभी को इंतजार है ना मेरी इस कहानी और अभ्युदय जी की मुझसे मुलाकात का,वैसे ही मुझे भी दूसरे दिन उनका इंतजार था।लेकिन सच कहा था सर ने वो एक दिन आते हैं चार दिन नहीं।आज तीसरा दिन था और आज भी इंतजार था उनका पर मेरा मन बहुत खिज़ा हुआ था उनपर।गुस्सा था जो दबा हुआ सा था।बिना मतलब ही गुस्सा आ रहा था सब पर।वजह शायद मुझे, मेरे दिल को पता थी कि ये क्या नौटंकी है? जिसे नियमित होकर रोज आना ही चाहिए उसकी तरफ से इतनी लापरवाही।

हुह तभी तो 6 महीने में भी ठीक नही हुए, होंगे भी कैसे।ख़ुदा भी उसके साथ खड़ा होता है, जो खुद के लिए खड़ा हो।मुझे क्यों इतना फर्क पड़ रहा था नही जानती।

एक और दिल को समझा रही थी कि मुझे कोई फर्क नही पड़ता,भाड़ में जाएं वो।दूसरी तरफ एक भटकता,उड़ता से ख्याल कि क्या वजह है इस लापरवाही की? ओह्ह ये दर्द3 Full stop अजीब सा एक दर्द जो अब सर का दर्द बन गया था मेरे।दर्द वो भी एक नाम ने दे दिया "अभ्युदय जी"।

चौथा दिन

आज दिन की शुरुआत ही बुरी हुई थी।रिया आज कॉलेज नही आ रही थी और मेरी स्कूटी पंचर पड़ी थी।मतलब आज पैदल चल कर जाना होगा कॉलेज।दूरी ज्यादा नही थी पर गर्मियों के दिन और तपती धूप।

, कॉलेज के रास्ते में पैदल निकल गई।कुछ ही दूर चली और पीछे से पी-पी की आवाज़ हुई।पलटी तो एक जूनियर थी। "गुड मॉर्निंग मैम"

"सुचिता?"मुँह में इतना कपड़ा बांध कर चलती हैं लड़कियां कि इनके मम्मी पापा भी इन्हें न पहचान पाएं, तो हम किस खेत की मूली हैं?कंफर्म करना ही बेहतर था।

"जी मैम,आइये साथ में चलें।"

"कॉलेज जा रही हो?चलो पहले अटेंडेंस तो वंही देनी है।" कहकर मैं बैठ चुकी थी स्कूटी में।

डिपार्टमेंट में अटेंडेंस देकर स्पाइनल इंज्यूरी सेंटर के लिए बहुत से साथी मिल गए।पहुँच कर सब अपने कामों में व्यस्त हो गए।मैंने भी अपनी एक पेशेंट को देखने के बाद अपनी वर्कशीट में चार्टिंग और पॉइंट्स लिखने लगी।रिया भी नही और कोई पेशेंट नही तो मन ऊबने लगा था।मैं वार्ड की तरफ अपना रजिस्टर लेकर निकल गई।

सामने से राजू भैया और व्हीलचेयर पर बैठे अभ्युदय जी दिखे।मन किया खुशी से खूब ढोल पर नाचने वाला डांस कर ही लूं पर मन की बात चेहरे पर न आये तो गुस्सा दिखाती पूछ बैठी "तीन ही दिन हुए हैं अभ्युदय जी।अभी तो एक दिन बाकी था आपके आने में।"

"आप मेरा इस तरह इंतजार कर रही होंगी सोचा नही था।वरना3 Full stop"

"वरना..क्या वरना?"

"वरना आज भी न आता डॉ साहिबा।"

"आपको लगता है मैं आपका इंतजार कर रही थी?आपकी ग़लतफ़हमी है ये।"

"आँखों में तो इंतजार ही खत्म होता दिखाई दिया,ज़ुबान से भले कुछ भी बोलें आप।" अजीब इंसान है आँखों के साथ दिल भी पढ़ लिया इसने तो।लेकिन निशी गुस्सा3 Full stopगुस्सा दिखाते हुए फिर मैंने कहा,

"अच्छा तो आप आँखे पढ़ लेते हैं?लेकिन फ़ॉर योर काइंड इन्फॉर्मेशन, आपका ये अनुमान गलत है।"

"हम्म.. हो सकता है। आपको शायद इनका इंतजार होगा फ़िर।"

"अखरोट।"अब ये क्या है?

एक बड़ा सा पैकेट अखरोट का उन्होंने राजू से लेकर मुझे पकड़ाया और हाथ को आगे बढ़ा इशारे से कहा चलें?

"मैं ये सब नही ले सकती रखिए इसे अपने पास।आप चलिए और मैं पांच मिनट में आती हूँ।"

अखरोट वापिस युनकी तरफ करते हुए मैंने कहा तो उन्होंने बिना कुछ कहे ही अखरोट राजू को दिए और बोले "गाड़ी में रख के आओ।बच गए अपने अखरोट।"

आँखों में आज चमक थी और चेहरे पर मुस्कान।राजू जा चुका था वो और मैं एक दूसरे को देखते चुपचाप थे।उन्होंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा "सच में इंतजार था न मेरा आपको?"

"नहीं और मेरे नहीं का मतलब नहीं ही होता है।"

"नाराजगी की वजह?"

"नाराजगी? किस से? आपसे?"

"नहीं। मुझसे नही राजू से।वो मुझे 3 दिन लेकर जो नही आया।" हंसी को कंट्रोल तो किया पर मुस्कुराने को छिपा नही पाई।थोड़ा कड़ा लहजा कर फिर बोली

"ऐसा नही चलेगा अब।एक दिन आये चार दिन गायब।सर ने आपको ठीक करने की जिम्मेदारी मुझे दी है।"

"मैं यंहा आकर ठीक हो जाऊंगा?"

"जी हाँ।"

"सच कहना।मेरे पापा भी डॉक्टर हैं।तुम्हारे ही कॉलेज में।आपके ही कॉलेज में।आपने नाम नही सुना शायद उनका?"

मैंने अपने कंधे उचकाकर कहा "नहीं,मुझे नही पता।"

"डॉ.अविनाश सिंह।"

"नहीं जानती सच में।किस डिपार्टमेंट में हैं?"

राजू वापिस आ गया था और अभ्युदय जी कमरे की तरफ चल चुके थे अपनी व्हीलचेयर पर।मैं भी वार्ड में सर के पास आ गई थी।

"सर अभ्युदय जी आ गए हैं।"

"अरे वाह एक दिन पहले ही आ गए।"

"सर उनके फ़ादर?"

"हाँ निशी।उनके फ़ादर अपने ही कॉलेज में रेडियोलोजी के एच ओ डी हैं।तुम जाओ स्टार्ट करो उनका ट्रीटमेंट।याद रखना उन्हें रोज़ आना है अब।"

"जी सर।"
 
मैं वापिस डिपार्टमेंट के कमरे में आई।वो मशीन लगवाने के लिए रूम में बैठे थे।मैं पहुची, मैंने बिना उन्हें देखे अल्ट्रासाउंड जेल उठाया और मशीन ऑन करने लगी।युनकी तरफ पलटी तो देखा टी शर्ट पहन ही रखी है।गुलाबी रंग,हल्का गुलाबी।ये तो लड़कियों का रंग है ऐसे रंग की टी शर्ट कौन पहनता?पर जँच रही थी अभ्युदय जी पर।

"टी-शर्ट।"

"अच्छी है ना डॉ साहिबा?"

"आप हर समय मज़ाक कैसे कर लेते हैं?"

"जैसे आप हर समय गुस्से में रहने का नाटक करती हैं।"

"आप आज दूसरी बार तो मिले हैं मुझसे।फिर ये ऐसा कैसे कह सकते हैं आप?"

"आप भी तो आज दूसरी बार मिली हैं मुझसे।आपने भी कहा कि।"

"सॉरी। अपनी टी शर्ट हटाइये।कंधे पर मशीन लगानी है।"

"जी। राजू..उतार इसको।"

राजू की मदद से उन्होंने अपनी टी-शर्ट एक हाथ से निकाल दी।

मैंने मशीन ऑन करके अल्ट्रासाउंड थेरेपी स्टार्ट कर दी।

"इससे क्या होगा?"

"आप कितने समय से फिजियोथेरेपी करा रहे हैं?"

"यंहा किसे फिजियोथेरेपी आती?ये सब तो मालिश वाले हैं।"

बात सुनकर मेरे तनबदन में आग लग गई।समझते क्या हैं खुद को?हम सब मालिशवाले हैं?

, "ये मालिश ही तो है।आपने फिजियोथेरेपी पढ़ी है लगता है?आँखे भी पढ़ लेते हैं,फिजियोथेरेपी भी आती है और क्या-क्या गुण हैं आपमें?"

"नाराज़ हो रही हैं डॉ साहिबा।"

"नहीं।बताइये न?"

"आप मेरे घर आएंगी?"

"क्या?मतलब?"

"आप मेरी फिजियोथेरेपी घर पर कर देंगी?"

"मैं तो मालिशवाली हूँ।"तमतमाते हुए जवाब दिया मैंने।

"आपको बुरा लगे इसलिए नहीं कहा।सच जो देख रहा हूँ, पिछले 6 महीनों से वही कहा।"

"आप यंहा रोज़ आइए।रेगुलर तब ठीक होंगे।"

"मैं हफ्ते के सातों दिन 7 अलग-अलग फिजियो से फिजियोथेरेपी करवा रहा हूँ।"

"क्या?"

"जी।तब भी कोई फायदा नहीं।उठकर बैठ गया तो लोगों ने अचीवमेंट मां लिया।पर मुझे चलना है।"

"आइए फिर चलते हैं।" 8 मिनट की मशीन के बाद मैंने टी-शर्ट वापिस हाथ मे डालने के लिए उनकी मदद की और उन्हें कमरे से बाहर आने कहा।राजू उनकी व्हीलचेयर बाहर ले आया।

पैरेलल बार के सामने लाकर उन्हें खड़े होने को कहा पर वो नही माने।

उनका दाहिना हाथ पकड़ कर उन्हें फिर कहा "आइए अब,चल कर देखते हैं।"

"नहीं।अभी पैरों में मशीन लगनी है।"

"डर लग रहा है आपको?"

"नहीं। बिल्कुल भी नहीं।" उनके हाथ की पकड़ मजबूत हो गई थी मेरे हाथ पर।समझ रही थी मैं की डर है मन में, लेकिन इस डर को भगाना तो होगा ही।

, "अभ्युदय जी मेरा हाथ।" उन्होंने हाथ छोड़ दिया।मैं उनकी बायीं तरफ आकर खड़ी हो गई।उनके हाथ को बार पर रखा और मजबूती से पकड़ लिया।

"अभ्युदय जी,अपने दाहिने हाथ को बार पर रखिए बॉडी को ऊपर की तरफ प्रेशर लगा कर खड़े होने की कोशिश कीजिए।"

उन्होंने कोशिश तो की पर नही उठ पाए।मैंने राजू को बायीं तरफ खड़ा करके मजबूती से हाथ पडकने को कहा और दाहिनी तरफ आ गई। "चलिए,उठिए अब मैं हूँ आपके साथ।" एक बार उन्होंने मुझे देख।आँखों मे न जाने क्या पढ़ा उन्होंने और थोड़ा सा पुश करने पर वो खड़े हो गए।सामने आईना दोनों हाथ बार पर और वो मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे।

"क्या हुआ?मालिशवाली ने ज्यादा कसरत करा दी?"

"नहीं। मैं तो देख रहा था कि तुम बायीं तरफ ज़्यादा अच्छी लग रही थीं।"

"मतलब?"

"मतलब,बहुत पूछती हो डॉ साहिबा।अब बैठ जाऊ?पैर कांप रहा है।"

"नहीं अभी नही।पहले मतलब बताइये आप।क्या मतलब उस बात का बायीं तरफ वाली।"

मैं उन्हें बातों में उलझा कर ज्यादा से ज्यादा देर खड़े रखना चाहती थी।वेट बेयरिंग जितनी ज्यादा देर होगी उतना हमें फायदा है।

"डॉ साहिबा पहला दिन है।रहम, कीजिये।"

दर्द का लेवल समझने के बावजूद बहुत देर तक उन्हें बातों में उलझाए रखने की कोशिश थी।

"अच्छा लेकिन एक शर्त है।"

"सारी शर्ते मंजूर हैं आपकी।"बोलकर वो बैठ गए वापिस अपनी व्हीलचेयर पर।

"बताइये शर्त?"

"कल से आपको रेगुलर आना होगा।रोज़, हर रोज़।"

"मेरी भी एक शर्त है।"

"शर्त आपको मेरी माननी है।मुझे आपकी नहीं।बिना मतलब शर्त।"

"मेरी शर्त नही मानेंगी तो मैं भी कुछ नही मानूँगा।"

"जबरजस्ती है ये तो।"

"हाँ है तो। मानेंगी या नहीं?"

"वो शर्त सुनकर बताऊंगी।क्या शर्त है।"

"एक नही दो।"

"अब ज्यादा हो रहा है अभ्युदय जी।"

"आपको मेरे घर आकर भी मेरी फिजियोथेरेपी करानी होगी और अखरोट भी रखने होंगे। मंजूर?"

"अखरोट।ये अखरोट समझ से परे हैं अब तक।मुझे दोनों शर्तों को मानने के लिए वक्त चाहिए,सोचने का।"

"फीस आप जो कहेंगी वो।"

"सोचकर बताती हूँ।"

"ठीक है अगले चार दिन का समय है आपके पास।"

"जी नहीं। मैं आ जाऊंगी।आपको कल से रोज आना है।समझे आप।"

"शर्त मंजूर न?98266 मेरा नम्बर।घर का एड्रेस बता दूंगा आपको।काल कर लीजियेगा।"

"जी।"

"राजू अखरोट का पैकेट निकाल के ला।"

"मैं अखरोट नहीं।"

"तो मैं कल से नहीं।"

"हद है मतलब।"

"जी डॉ साहिबा हद।"

हाथ मे अखरोट का पैकेट लिए जाते देख रही थी उनको और सोच रही थी कि हुआ क्या आज??

फोन में नम्बर सेव कर लिया था पर हिम्मत नही कर पा रही थी काल करने की।अखरोट का पैकेट देख कर मन में दुःखी थी खुद से।माँ ने सीख दी थी बिना वजह किसी से कुछ लेना नहीं।

इन अखरोट को लेने का क्या मतलब निकलेंगे अभ्युदय जी? न मैंने फोन किया और न गई उनके घर।शाम को रिया को फोन लगा सब बताया।

"लोड क्यों ले रही है? अखरोट खा।" हंसती रिया पर बहुत गुस्सा आ रहा था।

"बकवास बन्द कर न यार।एक तो मैं वैसे ही परेशान हूँ, ऊपर से तेरी नौटंकियां खत्म नही होती।तू आई क्यों नही आज?"

"कल बताऊंगी।पापा आये हैं।शादी के लिए एक बकरे को ढूंढ कर लाए हैं।चल बाए, कल आ रही है तू मेरे साथ पापा से मिलने ओके।"

"ठीक है।"

रात कुछ नोट्स बनाते और कल कैसे अभ्युदय जी को हैंडल करना है सोचते हुए बीत गई।डायरी को भी समय नही दे पाई।

आज की सुबह समझ नही आ रहा था,क्या पहनूँ? पहले कभी ऐसी दिक्कत महसूस नही हुई थी पर आज क्यों सबसे अच्छा दिखने का फितूर सवार है मुझ पर?

पीले रंग का शिफॉन की कुर्ती और सफेद चूड़ीदार,माथे पर स्टोन वाली बिंदी और उसके नीचे कुमकुम।होंटो पर लिपबाम और आंखों में काजल।आधे खुले बालों में फॅसा छोटा सा कल्चर और भीनी महक का वो प्रीटी वीमेन वाला परफ्यूम।अब खुद को देखकर खुश थी मैं।तभी रिया ने दरवाजे पर दस्तक दी।

"चलें मैडम?"

"हाँ।चल।"बाहर निकलते हुए मैंने कहा।

"एक मिनट रुक।आज 7 जुलाई है क्या?"

"नहीं मैडम।अभी एक महीना है 7 जुलाई को।"

"फिर ऐसे क्यों सजी है?जैसे बर्थडे हो तेरा?"

"क्या यार।तू लेट आई है।इंतजार कर रही थी तो काजल लगा लिया।"

"सिर्फ काजल?"

"अरे..मतलब लिप् बाम भी लगाई है।"

"अच्छा।सिर्फ काजल और लिपबाम?"

"रिया यार पका मत।चल अब।और लेट मत करवा।" उसकी बात को काटते हुए दरवाजे को ताला लगाया और उसकी गाड़ी के पास आकर रुक गई।

"चलें??"

वो आई और चाबी मुझे पकड़ा दी।मैंने गाड़ी स्टार्ट की और वो पीछे बैठ गई।

"आज कॉलेज नही जाना।कंही और चल।"

"क्या बोल रही है?मतलब?"

"मतलब आज बंक।"

"आज क्यों?नहीं।आज नहीं।आज कॉलेज।"

"निशी।"

"हाँ बोल?"

"गाड़ी रोक।"

मैंने साइड में गाड़ी रोकी सामने ही पिसनहारी मढ़िया थी। पिसनहारी मढ़िया,मढ़िया जी के नाम से प्रसिद्ध हैं।ये एक जैन धर्म का मंदिर था।इसकी खूबसूरती से रूबरू मैं यंहा क्या करवाऊं?जबलपुर में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने देखा होगा इसे।नीचे वाले मन्दिर में प्रवेश करते ही लगता है जैसे हम किसी प्लेनेटोरियम में आ गए हैं।ऊपर पहुँचने का सुंदर रास्ता।सुंदर बगीचे।पहाड़ो पर बना ये मंदिर अलग ही विशेषता रखता है जैन समुदाय में।

"चल आज मढ़िया जी मैं बैठेंगे।"

"रिया।हम स्पाइनल इंज्यूरी से निकल कर बैठेंगे,ठीक है?अभी चल देर हो रही है यार।सब पहुच गए होंगे।"

"तुझे जाना है जा।मुझे नही जाना,मैं यहीं हूँ।तू फ्री होकर आ जाना।"

"क्यों कर रही है तू ऐसा?जानकर ना?तुझे सब समझ आ रहा है।फिर भी तू.."

"हम्म..मतलब मुझे जो समझ आ रहा है सही है?सच बोल अब।"

"क्या बोलूं?मैं कुछ नही जानती अभी।मुझे नही पता सच।"

"चल बैठ आजा।" रिया ने गाड़ी स्टार्ट कर के सीधे स्पाइनल इंज्यूरी में लगाई।रास्ते में सिर्फ एक गाना ही सुनाया जा रहा था मुझे "इश्क छिपता नहीं छुपाने से "

हम जब अपने डिपार्टमेंट में जा ही रहे थे तब मुझे याद आया "अटेंडेंस?"

"मैंने बोल दिया था शिवि को,लगवा दी होगी उसने।"

मूरख सी मैं इतना सज-धज के गई थी पर आज फिर अभ्युदय जी नही आए।इससे तो अच्छा होता मैं ही मढ़िया जी मे रुक गई होती।दिमाग का दही होना इसे ही कहते हैं।ऊपर से रिया का हर बात पर कुछ ऐसा ताना की बस क्या कर लूँ।

फोन नम्बर तो है ना।बाहर आकर फोन लगाया सामने कॉलर ट्यून बजी "जिंदगी3 Full stop दो पल की3 Full stop इंतजार कब तक..हम करेंगे भला3 Full stopतुम्हें प्यार..कब तक.. हम करेंगे भला3 Full stopद नम्बर यू आर कालिंग इस नॉट रेस्पोंडिंग टू योर कॉल।"

"मत उठाओ फोन।भाड़ में जाओ।"

मैं अंदर आ गई।लेकिन तभी कॉल आया अभ्युदय जी का।रिया मुझे गुस्से से देख रही थी और कोशिश कर रही थी समझने की।मैंने बाहर आकर फोन उठाया।

"आप कंहा हैं?"

"डॉ. साहिबा।आपने कोई कॉलर ट्यून नही लगवाई?"

"आपसे पूछ रही हूँ कुछ।आप क्यों नही आये आज?"

"आप भी तो नहीं आईं कल।आपने शर्त नही मानी तो मैंने भी।"

"आप अभी के अभी आइए।"

"अब तो समय नही है।राजू भी नही आया है।"

"ठीक है।एड्रेस बताइये अपना मैं आती हूँ।"

"आप अभी आएंगी?"

"जी हाँ।अभी आउंगी।आपको लेने।"

"जी ठीक है।लिखिए।"

"मेसेज भेज दीजिये।मैं और रिया आ रहे हैं।"

मैंने फोन रख दिया।अच्छी बात थी कि आज सर भी नही आये थे तो सभी अपना काम निपटाने और जल्दी खिसकने में लगे थे।मेरा और रिया का एक ही पेशेंट था और अब हम दोनों फ्री थे।अंदर आकर मैंने उसे कहा "चल।"

"किधर?"

"चल न।पेट्रोल है गाड़ी में?धन्वन्तरी जाना है।"

"धन्वन्तरी क्यों जाना है?"

धन्वन्तरी मेडिकल के पास ही एक कॉलोनी/इलाका है।जंहा अपने अभ्युदय जी का घर है।एड्रेस को याद कर लिया था जैसे ही मेसेज मिला था।

"चलो मैडम जल्दी।पैरों में मेंहदी लगवा रखी हो ऐसे मत चल।"

"नहीं जाना मुझे।तू जा भाग।एक तो बताना नही है कुछ ऊपर से डायलॉग।आई बड़ी।"

"अरे मेरी आई छोटी,चल न।तुझे तो पता है न?जिसके लिए तैयार थी उसने देखा नही न अब तक।"

"अभ्युदय?"

"जी भी बोलो।लेकिन पहले गए चलना है।"हम दोनों पहले मेरे घर आए और फिर निकल गए उनके घर के लिए।
 
घर के बाहर बोर्ड लगा था "बिवेयर ऑफ डॉग" देखते ही मेरी और रिया की हँसी छूट गई।

"देख ले निशी।कुत्ते से सावधान रहने की चेतावनी दी गई है।"

"तू चुप कर और चल।" बेल बजा कर हम दोनों वेट कर रहे थे तभी एक सुंदर सी एक लेडी आई।नीला सलवार सूट,काले लम्बे बालों की बनी कमर तक कि चोटी।सुंदर नयन नक्श लेकिन ये है कौन?

"तेरा अभ्युदय शादी-शुदा तो नहीं?भाभी जी आ रही हैं सामने से।"

दिल पर सौ छुरिया सी चल रही थीं।क्या वाकई प्यार हो गया था मुझे? अभ्युदय जी से? दो मुलाकातों में प्यार तो नही हुआ करता ना? फिर ये जलन क्यों थी मन में?

वो नीले सूट वाली ने आकर गेट खोला हम दोनों अंदर पीछे चल दिये उनके।उन्होंने हमें कोई जवाब ही नही दिया जब हमने कहा "अभ्युदय जी।"

गेट से अंदर बड़ा सा बगीचा था,जिसमें एक सफेद बिल्ली खेल रही थी।वो गोल-गोल घूम कर अपनी ही पूंछ को पकड़ने की कोशिश कर रही थी। बगीचे के बगल में,बरामदे से होते हुए हम घर के अंदर आ गए थे।हमें एक कमरे में बैठाया गया था जंहा ऐ सी की ठंडक थी।गलीचा बिछा हुआ था।कंप्यूटर पर अभ्युदय नाम गोते खा रहा था, कभी दाएं से-कभी बाएं से।एक तरफ कोने में बुक सेल्फ में तरीके से जमी हुई नॉवेल्स और एक कोने में रखा एंटीक पीस की शक्ल में खूंखार सा अजीब दिखने वाला चेहरा।

"निशी, उधर देख।" अजीब से एंटीक चेहरे की तरफ इशारा करते रिया बोली।

"वो छोड़ पागल।उधर देख।नॉवेल्स!कितनी सारी।"

"कीड़ा कुलबुलाने लगा तेरा?अभी मत पढ़ने बैठ जाना समझी।"

हमारी बातें चल ही रही थी कि कमरे के दरवाजे पर दस्तक देकर दो थोड़े बुजुर्ग,एक दिखने में काफी स्मार्ट और फिट।जो शायद अभ्युदय जी के पापा थे और एक उनके पापा के पापा।

हम दोनों सोफे से उठ गए।दोनो को नमस्ते कह कर फिर बैठ गए।

"आप हैं डॉ निशी और?"

"सर रिया, ये डॉ रिया और मैं निशी।"

"बताया अभी ने।तो कितना समय लगेगा अभी को ठीक होने में।"

"तीन महीने।"रिया ने बिना कुछ सोचे तपाक से बीच मे कूद कर बोल दिया।मैं चुप थी और घूर रही थी रिया को।

"तीन महीने में बिल्कुल ठीक?"

"यस सर।"

"आपका क्या कहना है डॉ निशी?"

"सर 100% रिकवरी इम्पॉसिबल है।मैं 99.9%तक कोशिश करूँगी पर 00.1% तब भी रह ही जायेगा। जो ब्रेन पर असर हुआ है वो रहेगा। कोई भी ऐसा केस आज तक कि हिस्ट्री में नही जो 100% रिकवर हो गया हो।"

"आपका कहना है अभ्यु कभी ठीक नही होगा? वो दादा जी ही थे जिन्होंने ये पूछा।

"नहीं सर,ऐसा नही है।उन्हें टाइम देना होगा और खुद को भी पॉज़िटिव रखकर रेगुलर फिजियोथेरेपी करानी होगी। शुरू के 3 महीने से 6 महीने में सबसे अच्छी रिकवरी होती है।फुट ड्राप को ठीक कर देना मुश्किल है पर अगले 3 हफ़्तों में अभ्युदय जी चलने लगेंगे अपने आप ये वादा है मेरा आपसे।"

"सच कह रही हो बेटा?" बहुत उम्मीद भरी नजरों से ये प्रश्न दादा जी ने ही किया था।मैं उठ कर उनके पास तक गई थी और उन्हें प्रोमिस किया मैंने।

"जी सर।मेरा प्रोमिस है ये आपको।"

"दादू हूँ,अभ्यु का।खुश रहो हमेशा।मिलता रहूंगा तुम कब से आओगी?"

"सर आज से ही।"

"दादा जी कह सकती हो।"

दरवाजा फिर खुला और राजू के साथ व्हीलचेयर पर अभ्युदय जी आ गए।वाइट शर्ट और ब्लैक पैंट।इंटरव्यू देकर आए हों जैसे।

"दादू मिले हमारी डॉ साहिबा से?"

"अच्छी हैं अभ्यु दोनों।तुम कैसे लेट हो गए?"

"हम तो गए थे फिजियोथेरेपी कराने, हमारी डॉक्टरनीया घर ही आ गईं।" अभ्युदय जी के पापा के अलावा सभी हंस दिए।उनके चेहरे पर थोड़ी भी मुस्कुराहट नही थी।शायद वो मेरी बातों से संतुष्ट नही थे।वो और भी कुछ पूछना चाहते थे लेकिन वो बिना पूछे ही उठ कर जाने लगे।

"सर, यू डोंट वरी।आई विल ट्राय माय बेस्ट।"

"प्लीज डोंट ट्राय, डू सम मैजिक और व्हाट, आई डोंट नो। बट प्लीज डू समथिंग पॉजिटिव।"

इतना बोलकर वो चले गए।दादा जी ने फिर कहा "उदास ही अभी।दुःखी भी,तुम करवाओ अब इसकी कसरत।"

वो भी जाने लगे तो अभ्युदय जी ने उन्हें रुकने को कहा वो वापिस बैठ गए।

"अरे डॉ साहिबा आज आपका बर्थडे है?"

"जी हाँ। आज इनका बर्थडे ही है अभ्युदय जी।आपको अखरोट खिलाने आई हैं ये,लीजिए।"रिया ने बैग से निकाल कर अखरोट का पैकेट सामने रखी सेंटर टेबल पर रख दिया।
 
"बेटा ऐसे किसी की दिए उपहार को लौटते नही हैं।" दादा जी ने जब ये कहा तप समझ आया कि इन्हें पता है कि अभ्युदय जी ने अखरोट दिए हैं मुझे।

"लेकिन दादा जी बिना किसी वजह के किसी से उपहार लेना भी तो ठीक नही है।"मैंने जब अपनी बात रखी तो दादा जी ने कहा "मेरे उसूलों में से एक है ये जो अभ्यु अभी भी निभाता है।मैं जिससे मित्रता करना चाहता हूँ उसे अपने पसन्द की एक चीज़ उपहार में देकर ही मित्रता का हाथ बढ़ाता हूँ।ये बच्चा बस मेरे जैसा ही है और इसे अखरोट बहुत पसंद हैं।"

मैं घूर कर अभ्युदय जी को देख रही थी और दादा जी की बातें सुनकर क्या जवाब दूँ सोच ही रही थी कि अभ्युदय जी बोले

"जन्मदिन है न आपका आज?आपका बर्थडे गिफ्ट समझ लीजिए।"

"नही मेरा जन्मदिन 7 जुलाई होता है।"

"7 जुलाई। अब तो ये आपको रखने ही होंगे।मेरे दादू मेरे बेस्ट फ्रेंड हैं और इनका बर्थडे भी 7 जुलाई ही है।" उफ्फ ये भगवान इतने संजोग क्यों बनाता है।अब क्या कहकर मना करूँ।

दरवाजे पर दस्तक के साथ थोड़ी एज्ड लेकिन बेहद खूबसूरत सफेद चिकन का कुर्ता पहने एक आंटी अंदर आईं। हो न हो ये अभ्युदय जी की माँ हैं।

"नमस्ते।" मैंने दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते किया तो उन्होंने पास आकर सिर पर हाथ रखा और खुश रहो कहा।

वो आकर अभ्युदय जी के पास बैठ गईं थीं।मुझे और रिया को ध्यान से देख लेने के बाद बोलीं "आप हो डॉ निशी?"

"जी आंटी जी।"

"जैसा इसने बताया था,बिल्कुल वैसी ही हो।"

"जी मतलब?"

दोनों माँ बेटे ने एक दूसरे को देखा और जोर से हंस पड़े।आंटी ने हंसते हुए ही फिर कहा "अभ्यु सच कहा था तुमने। मतलब ये बेटा कि अभ्यु ने आकर बताया था आपके बारे में और जो बताया था उसे सुनकर कोई भी आपको पहचान लेगा।फिर भी न पहचान पाया तो आपके मतलब कहने से पहचान लेगा।"

मैं फिर झेंप गई थी।ये क्या हो रहा है?रिया शांति से बैठी थी।उसे भी समझ नही आ रहा था क्या कहे क्या नही।

तभी फिर दरवाजे पर दस्तक हुई और नीले सूट वाली वो लेडी हाँथ में ट्रे लिए अंदर आईं।आंटी ने उन्हें कहा "शर्मिला चाय भी देख लेना।"

तो ये घर की बहू हैं या खाना बनाने वाली?अब भी ये मिस्ट्री सॉल्व नही हुई थी।शर्मिला ये कैसा नाम है लेकिन?

ट्रे में वेज कटलेट और चॉकलेट कुकीज़ के अलावा अखरोट भी थे।चटनी और सॉस के साथ चाय लेकर वो शर्मिला फिर अंदर आईं और बोली "दीदी मैं जा रही हूँ।शाम को जल्दी नही आ पाऊंगी आज।"

"शर्मिला कुछ खा लो पहले फिर जाना।"आंटी उसके पीछे जाते हुए बोलीं।अब इस बात का तो पक्का पता था कि ये अभ्युदय जी की वो नही जो हम समझ रहे थे।

"खाओ बेटा।आप सब ऐसे ही बैठोगे तो सब ठंडा हो जाएगा।"दादा जी ने कहा।

मैंने और रिया ने एक-एक प्लेट में दो कटलेट रखे और चटनी डाली।रिया बैठकर खाने को हुई और मैंने अपनी प्लेट दादा जी की तरफ बढ़ा दी "पहले आप दादा जी।"

रिया ने कटलेट वापिस प्लेट में रख कर अभ्युदय जी की तरफ बढ़ाई और हम सभी एक साथ हंस पड़े।

"खाओ आप रिया। मुझे भी डॉ साहिबा दे देंगी।" मैंने एक प्लेट और ली दो कटलेट रखे "चटनी रहने दीजियेगा।"

"सॉस?" सॉस बोलकर युनकी तरफ देखा तो उनकी नज़र मुझ पर ही थी।हल्की मुस्कुराहट हाय एक दम ग़जनी के आमिर खान की तरह स्मार्ट और वो मुस्कान।

"नहीं सॉस भी नहीं, मैं अचार के साथ खाऊंगा।माँ उन्होंने आंटी को आवाज़ दी और आंटी भी हाथ मे एक छोटा मर्तबान लिए आ गईं।

"पता है मुझे अभ्यु।ये लो अचार।तुमने नही लिया निशी?"

"जी बस आंटी जी ले ही रही हूं।आप क्या लेंगी चटनी या सॉस?"

"मैं कुछ भी नहीं।तुम क्या लोगी बताओ?"

मैंने अपने ही हाथ से प्लेट उठाकर एक कटलेट और चटनी ले ली।अब कमरे में शांति थी।सब खाने में व्यस्त थे।लेकिन, कुटुर-कुटुर की आवाज़ शुरू हो चुकी थी।रिया और अभ्युदय जी अखरोट खाने में जो व्यस्त हो गए थे।
 
खा कर जब चाय पी तो दिल खुश हो गया।बहुत ही टेस्टी चाय थी।घर से दूर रहकर घर पर बना कुछ खाना और चाय वो भी इतनी टेस्टी हो तो दिल हवा में उड़ने लगता है।बस वही हुआ,रिया जिसे अब तक अभ्युदय जी के नाम से भी खुजली होती थी बड़ी मीठी-मीठी बातें कर रही थी दादा जी और अभ्युदय जी से।चाय का कप रखते ही जीभ को अपने होंटो पर घुमाया और मुह से निकल ही गया "वाह,बहुत बढ़िया थी चाय।"

सब मुझे देख हंस दिए।

"तो एक्सरसाइज कब से करना है डॉ साहिबा?"

"आपको एक्सरसाइज रिया कराएगी अभ्युदय जी।" मैंने जानकर ऐसा बोला क्योंकि मैं देखना चाहती थी कि अभ्युदय जी के मन मे क्या है?

"रिया जी के पास समय कंहा है?उनके पापा आये हैं बताया उन्होंने।"

"पापा.. हाँ पापा मैं तो भूल ही गई थी।हमें अभी निकलना होगा मैं शाम को आउंगी 5 बजे।आपके लिए ठीक है टाइम?"

"जी। जब आप समय दे दें।" अभ्युदय जी मुस्कुरा रहे थे।उनकी मुस्कुराहट को छोड़ कर जाने का दिल नही कर रहा था पर जाना तो था ही।मैं और रिया निकल चुके थे।रिया गाड़ी चला रही थी और मैं सपनों में खोई हुई सी थी कि फोन की घण्टी बजी।

"हेलो।"

"निशी।"

"जी बोल रही हूँ।आप?"

"मैं अभ्युदय।आपने पहचाना नहीं?"

"ये नम्बर सेव नहीं है आपका और आपने निशी कहा तो।"

"तो आप भी सभी बातों को नोटिस करती हैं?"

"जी मतलब?"

"फिर मतलब?आपको बताने के लिए फोन किया था कि आपकी या रिया जी की पायल में से किसी की पायल यंही गिर गई है।"

"जी संभाल कर रखिएगा मैं शाम को ले लूंगी।"

"इंतजार रहेगा।अल्लाह हाफ़िज डॉ साहिबा।"

ये अल्लाह हाफ़िज समझ नहीं आया मुझे।मैंने बाय बोलकर फोन कट कर दिया।

"क्या हुआ जानू?याद आने लगी उन्हें तुम्हारी?"

"चल बे।पका मत।मेरी पायल गिर गई है।"

"ओहहो!कंही जानकर तो नहीं गिराई गई है?"

"पगलाओ मत ज्यादा।घर चल लो।अंकल इंतजार कर रहे होंगे।"

"हमें पूरा शक है तुमपर मोहतरमा।ये पायल गिराकर तुम उनके जेहन में अपना ख्याल छोड़कर आना चाहती थीं न?"

ख्याल कितना अच्छा है।ये बात मेरे दिमाग मे क्यों नही आई थी?शायद इसलिए क्योंकि संजोग ज़्यादा बड़ा होता साजिश से।

"तेरा दिमाग बहुत चलता है बकबास बातों पर। है न?"

हम दोनों की बकवास चलती रही और हम रिया के घर पहुच गए थे। दोपहर के 3 बजे अंकल खाना बना कर हम दोनों का ही इंतजार कर रहे थे। कढ़ी चावल और अंकल के हाथों से बनें मगज़ के लड्डू।अहा आज का दिन तो बड़ा ही अच्छा बीता था।बातें करते और रिया के लिए बहुत से बंदरों की फोटोज में से एक हमें पसन्द आया था। हमें मतलब अंकल और मुझे रिया को तो वो खूंखार गीदड़ लग रहा था।

4.45 पर रिया ने कुहनी मरना शुरू कर दिया था।

रिया के घर आकर इतनी जल्दी जाने का सवाल ही नही पैदा होता।

"क्यों भगाना चाहती है?नहीं जाना मुझे।तुझे जाना है?तू जा।"

"नालायक लड्डू तुम फोड़ो मन में अपने और हमें कहो कि तू जा।"

"देख परेशान मत कर।"

"पापा को बताऊं?"

रिया की नौटंकियों से हारकर मैं 5.26 पर लेबर चौक से धन्वन्तरी के लिए निकली। रिया का घर लेबर चौक के पास ही था।पहले 10 रुपये का ऑटो मेडीकल तक फिर वंहा से 5 रुपये के ऑटो से धन्वन्तरी।मेरी गाड़ी के पंचर के साथ परकच्छे भी उड़ चुके थे।जितना चलती थी उस से दोगुना घसिटवाती थी।उसे लेकर चलना मतलब मुसीबत में फंसना था।बस अपना ऑटो ही जिंदाबाद था।

धन्वन्तरी पर उतर कर दुर्गा मंदिर तक पैदल ही चलना होगा,सोचकर मैंने अपना फोन और इयरपीस निकाला।देखा तो फोन साइलेंट पर था पर कम से कम दस मिस्ड कॉल थे।सारे अभ्युदय जी के।

"इन्हें क्या हुआ?10 मिस्ड कॉल?"

मैंने सोचा काल क्या करूँ एक मिनट में जब घर ही पहुचना है तो।घर पहुच काल बेल बजाई।कम से कम 5 मिनट डोर बेल बजती रही पर किसी ने दरवाजा नही खोला।दिमाग का दही।

"मेरे साथ ही ऐसा होना जरूरी होता है क्या?हद है बाय गॉड।" नम्बर मिलाया ही था कि पीछे गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी से राजू भैया उतर कर आए।

"मैडम घर पर कोई नही है।सब हॉस्पिटल में हैं।"

"क्या हुआ भैया?"

"आपको बुलाया है अभी भैया ने चलिए।दादा जी की तबियत बिगड़ गई थी।"

"चलिए।"बिना देर किए मैं गाड़ी में बैठ गई थी।मेडिकल के ही आई सी यू में थे दादा जी।डर लगता था पहले आई सी यू के नाम पर।अब तो दूसरा घर ही हॉस्पिटल था तो डरना कैसा? मैं अंदर गई तो स्टाफ नर्स ने मुझे रोका।

लेकिन तभी डॉ सिंह आ गए और उन्होंने सिस्टर को कहा

"हमारे साथ हैं ये आने दीजिए।"

मैं उनके पीछे-पीछे चल दी।

"आपने अभ्युदय का फोन नही उठाया?"

"सर ऑटो में थी और फोन साइलेंट में था तो घर पहुँच कर ही देखे मिस्ड कॉल।"

"रेस्पोंसिबल होना चाहिए आपको ।बीइंग अ डॉ दिस बिहैवियर इस नॉट एक्सेपटेबल।"

"सॉरी सर।"

रूम में अभ्युदय जी अपनी व्हील चेयर पर दादा जी का हाथ पकड़े बैठे थे।ऑन्टी साथ ही चेयर पर बैठी थीं।दादा जी की आँखे बंद थीं।मेरे जाते ही अभ्युदय जी ने गुस्से से कहा "फोन रखती क्यों हो जब उठाना नही होता?"

दादा जी ने आँखे खोली और बोले "अभ्यु नहीं।ऐसे गुस्सा नहीं।"

"सॉरी।वो फोन..।"

"रहने दो अब। बताने के लिए फोन कर रहा था कि दादू को सांस लेने में दिक्कत हो गई है।हम घर पर नही हैं।पर फोन ही नही उठाया।"

मुझे बुरा लग रहा था।एक ही दिन में क्या-क्या होगा?
 
जो हुआ सो हुआ।अब तो दादा जी ठीक हैं न,बस यही सोच कर मैंने कुछ भी नहीं कहा।चुपचाप बातें सुन लीं अभ्युदय जी की।

ये दिन बहुत ही बड़ा था।अब भी समय था।मैं जाने को तैयार थी कि दादा जी ने अपने पास बुलाया

"डॉ साहिबा।"

"जी दादा जी।"

"आपको एक काम देना था?"

"जी दादा जी कहिए।क्या काम है?"

"आपकी बातों में सच्चाई देखी है आज हमने,वरना जो भी डॉ आता है कहता है अभ्यु बिल्कुल ठीक हो जाएगा।"

"मैं चाह कर भी ऐसी बातों पर झूठ नही बोल पाती।माफ़ी चाहूँगी दादा जी।मेरी बातों की वजह से आपको तकलीफ हुई हो तो?"

"नहीं बेटा जी।तकलीफ नही एक संतुष्टि कि कोई तो मिला है। पहली बार जो सच बोलने का साहस कर पाया।"

"आप बताइए दादा जी काम।मैं पूरी कोशिश करूँगी।"

"अभ्यु को मेरे सामने एक बार चलवा दो बस।मैं फिर उसे उसके कदमों पर खड़े देखना चाहता हूँ।ये व्हीलचेयर पर मेरा अभ्यु जंचता नहीं।"

"वादा करती हूँ दादा जी।अगले आने वाले 2 हफ़्तों में आपको अभ्यु जी। मेरा मतलब अभ्युदय जी चलते ही मिलेंगे।"

दादा जी की आंखों में चमक थी।होंटो पर मुस्कुराहट और मुझ पर विश्वास।सिंह सर और राजू अभ्युदय जी के साथ बाहर से आए।मैं उठकर खड़ी हुई जाने को तो अभ्युदय जी ने कहा

"दो मिनट रुको मैं आपको अभी छुड़वा देता हूं।"

"नहीं मेरा घर पास ही है।मैं चली जाऊंगी।

"अपने-अपने घर नहीं।अभी दोनो जाओ और आज से ही एक्सरसाइज शुरू करो।"दादा जी ने आवाज़ पर जोर देकर कहा।

हम दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर दादा जी की तरफ,दादा जी ने फिर कहा

"अभ्यु! आज से ही,समझ गए?"

"जी दादू।"

"डॉ साहिबा,टाइम है ना आपके पास?"

मैंने अभी तो वादा किया है दादा जी को।अभी मना किया तो उन्हें बुरा लगेगा।मैंने हाँ में सिर हिलाया और बाहर आ गई।पीछे-पीछे राजू अभ्युदय जी को लेकर आने लगे।हम नीचे पहुँचे तो मैं पीछे मुड़ी कहने को कि कल से करेंगे पर आंटी भी साथ ही खड़ी थीं तो कुछ कह नही पाई।बस बैठ गई चुपचाप गाड़ी में।आंटी भी मेरे बगल में आकर बैठ गईं।15 से 20 मिनट का समय लगाकर अभ्युदय जी भी बैठ गए।गाड़ी चल दी।आगे ही एक मेडिकल के पास मैंने कहा "गाड़ी रोकिए।"

अभ्युदय जी ने मुझे पलट कर देखा।

"क्या हुआ निशी?"

"गाड़ी रोकिए ज़रा।"

गाड़ी रुकी मैं मेडिकल पर गई और वापिस कार में आई।

"मुझे 350 रुपए दीजिए।"

"350" आंटी की तरफ अभ्युदय जी ने देखा और आंटी ने मुझे 500 का एक नोट पकड़ा दिया।

मैं एक केन(छड़ी)लेकर बाकी पैसे आंटी जी को देकर बैठ गई वापिस गाड़ी में।

घर पहुँचकर मैं और आंटी उतर गए।आंटी जी गेट पर से होकर अंदर वाले दरवाज़े की तरफ़ निकल गईं।मैं केन लेकर अभ्युदय जी के पास आई।एडजस्ट कर के छड़ी उनकी तरफ बढ़ाई।

"लीजिए इसकी मदद से बाहर आइए और फिर अपनी व्हीलचेयर पर बैठिएगा।"

"मुझसे..मुझसे होगा नहीं।"

"ऐसे कैसे नही होगा?मैं हूँ ना?आइए।"

"तुम शाहरुख खान हो?"

"शाहरुख खान मतलब?"

"फिर मतलब? मैं हूँ ना?"

"हे प्रभु।जी नही मैं शाहरुख नही। आप आइए।"

हाथ बढ़ाया तो बिना देर किए उन्होंने हाथ पकड़ लिया।

"मुझे आपका ये नहीं, वो वाला हाथ चाहिए।इसमे आप इसे लीजिए।" मैंने छड़ी उनके सीधे हाथ मे पकड़ा दी और बांया हाथ अपने हाथ में कसकर पकड़ लिया।उनके हाथों में पकड़ थी।उन्होंने मेरे हाथ पर जोर दिया।

एक अजीब सी सिहरन हो गई थी पूरे शरीर पर।जैसे कोई करंट सा दौड़ गया हो।ये क्या हुआ अचानक?अभी जब सीधे हाथ से पकड़ा था तब क्यों कुछ ऐसा महसूस नही हुआ।सब सोचते हुए जब उनकी तरफ देखा तो वो मुझे ही देख रहे थे।शायद समझने की कोशिश कर रहे थे कि मेरे दिमाग मे क्या चल रहा है।

उनको यू देखता मैंने अपनो नजरें हटा लीं।कंही उन्हें मन की बात आंखों में नजर न आ जाए।

"उठिए अब।देर मत कीजिए।"

वो उठे और थोड़ी देर मैं वंही खड़े उनसे बातों में लग गई।

"आपका ये हाथ बहुत भारी है अभ्युदय जी।"

"निशी।तुम बायीं तरफ ही रहा करो।"

"ये आप बहुत जल्दी आप से तुम पर नहीं आ गए?"

"तुम्हारा डेट ऑफ बर्थ बताओ?"

"एक ही दिन में दो मिस्टेक्स?पहले आप से तुम।अब DOB?"

"एक बात कहूँ?"

"जी दो कहिये।एक बस क्यों?"

"रहने दो।तुम नही समझोगी।"

"अरे।मतलब?क्यों नही समझेंगे?"

"राजू "

राजू भाई को व्हीलचेयर दूर रखने का इशारा ही काफी था।

"क्या राजू?चलिए वो रखी है व्हीलचेयर।"

"नहीं।राजू "

"आपको चलना होगा अभ्युदय जी।"

"राजू कंहा मर गया?"

"हम्म.. ये क्या बात हुई? वो रखी है एक कदम भी दूर नही चलिए आइए।"

"मैं गिर, जाऊंगा।तुम संभाल नही पाओगी।"

"तो चलिए मैं भी गिरूँगी साथ में।"

"इतनी देर से खड़ा हूँ न जानकर कि तुम यंहा से ही एक्सरसाइज शुरू करवा चुकी हो।"

"तो जब आ जानते हैं,इतने इंटेलिजेंट हैं तो ये भी एक्सरसाइज ही है,चलिए अब।"

"क्या मुसीबत पाल ली मैंने।"

"अब पाल ही ली है तो झेलिए।"

कोशिश कर के उन्होंने दो कदम बढ़ाए।बांया हाथ मेरे कंधे पर था और दाहिना हाथ छड़ी पर। बिना गिराए अब अभ्युदय जी अपनी व्हीलचेयर पर बैठे हुए थे
 
अंदर आकर उन्होंने अपने कंप्यूटर के टेबल के दराज़ में से मेरी पायल निकाली और मुझे देते हुए बोले।

"इतनी पुरानी डिज़ाइन की पायल,निशी?"

"जी मुझे पसंद हैं ये।"

"लेकिन बहुत पुरानी लगती हैं।"

"मैंने खुद एक डिज़ाइन बनाया है, अपने लिए जल्द ही बनवाऊंगी।"

"मैं भी तो सुनूं जरा।बताओ कैसी डिज़ाइन सोची है?"

"छोड़िये।मैं जब बनवा लूंगी तब बताऊंगी।"

"मैंने पकड़ा कब तुम्हें?जो छोड़ू?"

"मतलब?"

"कुछ नही बाबा।"

"अच्छा चलिए, अब कोई मज़ाक या बात नहीं। मैं जो बोलूंगी वो करना है आपको।"

"ओके डॉ साहिबा।" एक से डेढ़ घंटे एक्सरसाइज कराने के बाद मैंने कहा

"कल से मशीन भी लेकर आउंगी।फिर 2 से ढाई घंटे का समय लगेगा।"

"मशीन रखी है निशी, रुको।" अभ्युदय जी ने एक बटन दबाई और बाहर चिड़िया की बोली में एक बेल बजी।राजू भाई अंदर आये तो अभ्युदय जी ने उन्हें कहा

"राजू माँ से पूछकर वो मशीन ले आओ।"

जी बोलकर राजू भाई चले गए।मैंने अभ्युदय जी को देखा वो अब भी मुझे हल्की मुस्कुराहट के साथ अपलक देख रहे थे।

"कौन सी मशीन है?"

कोई जवाब नहीं बस वही मुस्कान।

"कौन सी मशीन अभ्यु जी?"

"हम्म.."वो चेतना में वापिस आए जैसे।

"वो टेन्स और यू एस टी।"

"आपके पास दोनों मशीन हैं?

"हाँ, निशी।"

"लेकिन मुझे स्टिमुलेटर चाहिए।"

"हाँ, वो भी है।"

"तो फिजियोथेरेपी क्यों नही जॉइन कर लेते आप भी?"

"मजाक अच्छा है।"

राजू भाई के साथ आंटी भी आ गईं थी।मशीन की टेबल राजू भाई ले आये और आंटी के हाथ में अल्ट्रासोनिक जेल था।

"ये लो।कुछ और चाहिए निशी?"

"जी आंटी जी।एक रुमाल, एक कैंची और एक मग में पानी।"

"पर ये क्यों?"

"स्टिमुलेटर में मुझे पानी और कपड़े की जरूरत पड़ेगी।"

"अच्छा,भेजती हूँ। निशी चाय लोगी?"

"नहीं आंटी जी।अब सीधे जाकर टिफिन खाना है।"

"खाना यंही खा लो।आज कटहल की सब्जी बनी है।अभ्यु की फेवरेट।"

"वाओ बहुत दिनों बाद कटहल नाम ही सुना आंटी,टिफिन में तो आये दिन बस कद्दू,टिंडा और बैंगन की सब्जी आती है।"

"तो खाना खाकर जाना।"

आंटी और राजू भाई चले गए।पानी और रुमाल भी आ गया था।मैंने पहले कंधे पर यू एस टी लगाई फिर हाथ पर स्टिमुलेटर। 10 मिनट तक उनके हाथ को अपने हाथों में ले लिया था मैंने।स्टिमुलेशन के कारण जैसे हाथ ऊपर उठता मैं अपने हाथों से उसे और भी स्ट्रेच करती जा रही थी।मेरा पूरा ध्यान सिर्फ स्ट्रेचिंग पर था और अभ्युदय जी का ध्यान सिर्फ मुझपर।

पैर पर मशीन लगाने के लिए उन्हें कहा।

"अपने लोअर को ऊपर कीजिये।"

उन्होंने बिना कुछ कहे अपने लोअर को ऊपर खिसकाया।पैर में जगह-जगह जले के निशान थे।

"ये क्या है?"

"वो मशीन से जल गया हूँ।"

"मशीन से?मतलब?"

"फिजियो ने कहा कि जल जाते हैं कई बार।"

"किस फिजियो ने कहा ऐसा?ऐसे मशीन लगाई जाती है क्या?"

"जैसे तुमने लगाई वैसे तो किसी ने नहीं लगाई?"

"मतलब?"

"फिर मतलब।मतलब ये की सबने जेल के साथ ही मशीन लगाई।किसी ने भी पानी कपड़े के साथ स्टिमुलेशन नहीं दिया।"

"हे प्रभु।अजीब लोग।"

मैंने बहुत संभाल कर उनके पैर में मशीन लगाई।खुद सोफे के पास नीचे बैठ गई ताकि उनके पैर को साथ ही स्ट्रेच कर सकूं।अब भी नजरों को महसूस कर रही थी खुद पर।ऊपर युनकी तरफ देखा तो इसबार मुस्कुराहट कम थी।शायद स्ट्रेचिंग का दर्द था जो मुस्कान को कम कर चुका था।पर कौन कमजोर दिखना चाहता है किसी लड़की के सामने, तो शांत थे। मैंने भी शरारत में पैर को थोड़ा ज्यादा स्ट्रेच कर दिया।उनके मुँह से आह निकल गई।

"सॉरी..सॉरी।"

मैंने जल्दी से अपने दोनों कान पकड़ लिए।

"कोई बात नहीं।मैंने तो ऐसे ही कह दिया।"

मुझे बहुत गुस्सा आया।देखो जरा कितने नौटंकी हैं ये।

मशीन लगने के बाद फिर उन्हें छड़ी पकड़ाई और कहा

"अब आपको चलना होगा।बहुत हुआ व्हीलचेयर पर घूमना।"

"लेकिन.."

"लेकिन वेकीन कुछ नही।चलना ही होगा।मैं हूँ न।"

"हाँ-हाँ मेरी शाहरुख खान। चलो।"

उनके दाहिने हाथ मे छड़ी थी बाएं तरफ मैं उनका हाथ थामे हुए।हम दरवाजे की तरफ चल दिये थे।जिसपर काला शीशा था।आईने से दिखने वाले शीशे पर हमारी छवि एकदम साफ नजर आ रही थी।मैं खुद हम दोनों को देखती रह गई थी।दो कदम चल कर रुक गई थी।अभ्युदय जी और मैं। हम दोनों साथ में अच्छे लग रहे थे।धीरे से अभ्युदय जी ने कहा

"अभी भी सिर्फ देखोगी या.."

"जी.. क्या या?"

"या चलोगी और?"

मैं हंस पड़ी।

"चलिए न आप क्यों रुक गए हैं?"

"क्योंकि आप रुक गईं हैं।"

हम, दोनों हंस पड़े।चलकर दरवाजे तक गए और वापिस भी आए।आकर बैठे ही थे कि आंटी जी मेरे लिए खाने की थाली लेकर आ गईं थीं।

"निशी खाना।"

थाली में 2 रोटियां एक कटोरी में मसालेदार कटहल की सब्जी,सलाद में खीरा,प्याज,टमाटर और कटोरी में रायता।

"वाह" थाली देखकर मुँह से निकला।थाली लेकर मैंने सबसे पहले रायता चम्मच में लेकर मुँह में डाला पर ये क्या? रायते में भी अखरोट?? कौन डालता है यार? इतना मीठा रायता कौन खाता?

सारा मूड खराब हो गया पर कटहल की सब्जी ने मन रख लिया।

अभ्युदय जी सब देख रहे थे और अपने बगल में रखे स्टूल पर रखे मर्तबान से अखरोट निकाल कुटुर-कुटुर खा रहे थे।खाना खत्म करके मुझे गाड़ी से घर पहुँचवा दिया गया।

आज डायरी में लिखने बहुत कुछ था पर आज मैंने सब यादों में ही रखने का सोच कर सो गई।कल मिलना भी तो है उनसे।

अभ्यु जी से।
 
आज का दिन खास था,इसलिए नही की आज स्पाइनल इंज्यूरी की पोस्टिंग खत्म होनी थी।बल्कि 4 जुलाई इसलिए खास था क्योंकि आज अभ्युदय जी ने वादा किया था कि वो बिना व्हीलचेयर अपनी स्टिक के साथ आएँगे।

नहीं जानती थी कि 4 जुलाई और भी खास बन जायेगा मेरे लिए क्योंकि आज अभ्युदय जी का जन्मदिन भी है।मैं आज न जाने क्यों रोज से ज़्यादा तैयार थी।आज हल्का गुलाबी शिफॉन का सूट पहन रखा था मैंने।सच कहूँ तो हल्की गुलाबी लिपस्टिक भी लगाई थी।कंही न कंही खुद को अभ्युदय जी के चलने का श्रेय मन ही मन दे रही थी और बेहद खुश भी थी।

अभ्युदय जी अपनी छड़ी के साथ रूम में आये।सबकी नज़र उनपर ही थी और उनकी नज़र सिर्फ मुझपर।खुशी मेरे चेहरे पर साफ छलक रही थी।रिया ने धीरे से कहा "अपनी घूरने की बीमारी इन्हें भी लगा दी क्या?"

मैं बस मुस्कुरा दी और जाकर अभ्युदय जी का बायां हाथ पकड़ कर उन्हें पेशेंट टेबल तक ले आई।सर अभ्युदय जी को चलते देख पास आए।

"अभ्युदय जी बहुत बधाई आपको।"

"थैंक्यू सर।" पीछेसे राजू भाई मिठाई का बड़ा सा डिब्बा ले आए।मैं अब तक इसी सोच में थी कि ये सब चलने की खुशी के लिए हो रहा है।पर जब सर ने कहा "जन्मदिन की भी बधाई आपको।"

"थैंक्यू सर।"

तब सारी खुशी गुस्से में तब्दील हो गई।

"जन्मदिन? आज आपका जन्मदिन है?"

"जी डॉ साहिबा।"

"तो कल क्यों नही बताया?"

"सरप्राइज आपके लिए।"

"ओह! बहुत बढ़िया जन्मदिन की शुभकामनाएं।" गुस्से में मैं दूसरे पेशेंट को देखने निकल गई।रिया अभ्युदय जी को मशीन लगाने लगी।

"नाराज़ कर दिया आपने मेरी जान को।"

"आपकी भी जान हैं,जानते नही थे वरना नही करते।"

"आपकी भी से आपका तातपर्य क्या है?"

"हमें लगा आपको तो हमारे दिल का हाल पता चल गया होगा।"

"हाले दिल तो आप दोनों का एक सा ही लगता हूँ।बात अलग है आपने मान लिया है आज,वो मानती नही कभी।"

रिया और अभ्युदय जी को बात करते देख गुस्से का पारा और बढ़ रहा था।मैं रोक नही पाई खुद को ओर पास आ गई।

"आप बता भी तो सकते थे न?"

"निशी। मैं जन्मदिन नही मनाता।"

"अच्छा और सर को कैसे पता चला?"

"आज उनकी बेटी का भी जन्मदिन है इसलिए पता चला उन्हें।" मैं और रिया अभ्युदय जी को असमंजस की नजरों से देख ही रहे थे कि वो बोले

"जिस दिन आया था पहली बार तब सब फॉर्मेलिटी सर ने ही पूरी की थी।डेट ऑफ बर्थ पूछा था बताया तो बोले मेरी बेटी का जन्मदिन भी 4 जुलाई होता है।इसलिए याद होगा उन्हें।"

"अच्छा और ये मिठाई?"

"दादा जी ने भेजी तुम्हारे लिए।आज उनके सामने चलकर जो आया हूँ।"

"आप शाम तक का इंतजार नही कर सकते थे?"

"नहीं कर पाया।"

"ठीक है।शाम को चॉक्लेट केक और वाइट सॉस पास्ता।"

"ये तुम लेकर आओगी? या माँ को बोलना है कि मैडम ने आर्डर दिया है।"

"शर्मिला है न?उसे कह दीजियेगा।"

आज का सेशन खत्म होने पर सर फिर से आए।उन्होंने अभ्युदय जी से कहा

"आप आजकल शाम को फिजियोथेरेपी नही कर रहे हैं क्या?"

"करता हूँ सर।"

"किस फिजियो से?कौन करवा रहा है आपको आजकल एक्सरसाइज?"

"खुद ही कर रहा हूँ सर।माँ की एक फ्रेंड की बेटी भी आई हुई है बंगलोर से वो भी करवा रही है।फिजियो है।"

"तब तो बहुत ही अच्छी बात है।कल से ये बच्चियां नहीं मिलेगी यंहा।आपके लिए अब 2 नए फिजियो आ जाएंगे।"

"लेकिन क्यों?"

सर ने मेरी और रिया की तरफ देख कर कहा "बताया नही तुमने?"

हम दोनों ने एक साथ न में गर्दन हिला दी।अभ्युदय जी के इस प्यारे साथ ने एक महीने की पोस्टिंग को कब खत्म करवा दिया हमें खुद भी नही पता चला था।गड़बड़ हो गई थी और अब बारी थी अभ्युदय जी के नाराज़ होने की।

"सर मैं अब नही आ पाऊंगा।"

"लेकिन क्यों?"

"डॉ निशी से बात की थी मुझे फिजियोथेरेपी कराने की।इन्होंने कहा आपसे पूछ कर बताएंगी और अब तक बताया नहीं।"

"निशी?कब कहा था सर ने?"

"बहुत दिन हो गए सर?"

"तो तुमने बताया क्यों नहीं?"

"सर वो मैं भूल गई।"

"बड़े भुल्लककड़ फिजियो है सर आपके डिपार्टमेंट में।"अभ्युदय जी का गुस्सा युनकी बातों से साफ झलकता दिख रहा था।आज जन्मदिन है।आज ही ये पता चलना चाहिए था क्या?गुस्सा तो होना ही चाहिए।

"निशी पेशेंट इस गॉड फ़ॉर अस।डोंट बी इर रिस्पांसिबल।"

"सॉरी सर।विल टेक केअर ऑफ दिस।"

अभ्युदय जी की तरफ नजर गई तो वो मेरी तरफ देख भी नही रहे थे।एक्सरसाइज के बाद सभी मरीज निकल गए।हम सब भी अपनी फॉर्मेलिटी पूरी कर के और कुछ सेल्फ़ीज़ लेकर बाहर आ गए।

"अभ्युदय जी की गाड़ी।"रिया ने इशारा किया।

"ये अभी भी यंहा क्यों है?"

गाड़ी में से राजू भाई ने निकल कर दो डायरी और दो पेन मुझे पकड़ा दिए।

" भैया जी ने दिया है मैडम।आपके और आपकी सहेली के लिए।"

राजू भाई चले गए।मैंने डायरी पर नज़र डाली तो ब्लैक कलर की जिल्द वाली डायरी पर गोल्डन अक्षरों में लिखा था 'निशी'।

मैंने एक डायरी रिया को दी और झमाका पर आकर चाय पीने बैठ गए।

"तू प्यार करती है उनसे?"रिया के इस प्रश्न के लिए तैयार नही थी मैं।

"तू पागल हो गई है क्या?बकवास क्यों कर रही है आज?"

"सच बोल न निशी।"

"यार तू खुद सोच, मैं डॉ वो मरीज तो एक लगाव हो गया है।पर प्यार?कैसे कर लूं प्यार?उन्हें स्ट्रोक हुआ है जानती है न?"

"निशी तू ऐसा कहेगी उम्मीद न थी मुझे।"

"तुझे कहूँगी कि उनके साथ जीवन बिता ले,शादी कर ले तो करेगी?"

"बकवास मत कर निशी।अभ्युदय जी चाहते हैं तुझे।"

"क्या बोल रही है?"

"वही जो उन्होंने कहा।जान है तू उनकी।"

"रिया पर मैं।मैं क्या चाहती हूँ मैं खुद भी नही जानती।"

"तू खुद को समय दे।सब जान जाएगी।"

रिया अब उलझन में थी और मैं खुद भी बहुत उलझा सा महसूस कर रही थी।

रिया मुझे छोड़कर घर चली गई।मैंने अभ्युदय जी को फ़ोन लगाया।

"जिंदगी.. दो पल की "

फोन उठा और आवाज आई

"निशी अभ्यु सो रहा है।कुछ खास काम?"

"आंटी अभ्युदय जी को क्या पसन्द है?"

"निशी उसके बदले स्वरूप को देख कर तो लगता है तुम ही हो जो उसे सबसे ज्यादा पसंद हो।"

मेरे मुँह पर ताला लग चुका था।सारी दुनिया को पता है बस मुझे नही।

"निशी?उसे पोहे पसन्द हैं।आज बना कर लाओगी अभ्यु के लिए?"

"जी आंटी जी।"

"सफेद रंग का कुछ पहनना आज।"

"मुझे सफेद रंग पसन्द नही आंटी।"

"अभ्यु का फेवरेट है।"

"ठीक है ऑन्टी।'
 
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