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अधूरी ख्वाहिशें
पहली मुलाकात
स्पाइनल इंज्यूरी में इंटर्नशिप का दूसरा दिन।
वो लेटे हुए थे एक पेशेंट टेबल पर।चेहरा दूसरी तरफ था।
"ओए!उधर देख। हेल्थ पर्सनालिटी देख कर तो स्मार्ट लग रहा है।" कुहनी मरते हुए रिया ने निशी को कहा।
"हाँ!पर है कौन?"
"भगवान जाने।अभी पता चल ही जायेगा चल।"
हम सभी अपने-अपने कामों में लग गए थे।सर ने पास बुलाया सभी को।पेशेंट की केस हिस्ट्री बताते हुए,पूछते हुए सभी उन्हीं के पास आए जिस पर मेरी और रिया की नज़र थी।
"ये अभ्युदय जी हैं।"
अभ्युदय नाम सुनकर ही मैं प्रभावित हो चुकी थी।
"स्ट्रोक हुआ था इन्हें अभी 6 महीने पहले।"
उन्हें ध्यान से देखने पर पाया कि बांया अंग लकवाग्रस्त है।सर की बातों पर से ध्यान हट गया और मैं उन्हें ही देखती रही।6 फुट ओर 6 इंच हाइट,गोरे, स्मार्ट,काली गहरी और शून्य में डूबी आँखे, काली घनी मूंछे और दाढ़ी भी।लिवाइस का सफेद टी शर्ट और डार्क ब्लू जीन्स।बेड के बगल नीचे रखे प्यूमा के लोफर।रिया ने फिर कुहनी मारी और बोली "बस कर xray कर रही है क्या?घूरना बंद कर।"
उनकी केस हिस्ट्री देकर सर फिर बोले "निशी और रिया ये कल से तुम्हारे पेशेंट।"
"जी सर।"
भारी आवाज़ में अभ्युदय जी बोले "सर लड़के नहीं हैं इस बैच में?"
हमारे सर ने कहा "आप परेशान न हो,अभ्युदय जी ये अच्छे स्टूडेंट्स हैं।"
"आपको कोई परेशानी नही होगी सर।" रिया बीच में ही कूद चुकी थी।
सबके जाते ही अभ्युदय जी उठने की कोशिश कर रहे थे।मैंने जाकर उनका हाथ पकड़ा और सहारा देकर उठाया।उनकी नजर पहली बार मुझ पर पड़ी।
"थैंक्यू।"
"ये तो हमारा काम है सर।मैं निशी, कल से हम ही आपको देखेंगे।"
"सिर्फ देखेंगी?या ठीक करेंगी?"
मैं झेंप गई थी।क्या इन्होंने मुझे इन्हें घूरते हुए नोटिस कर लिया था?वरना ऐसा क्यों कहते?
"जी सर?आपकी बात का मतलब समझी नही।"
"कोई बात नहीं, अखरोट खाया करो।"
"अखरोट? मतलब?"
"बहुत मतलब-मतलब करती हो आप।"
"लेकिन आप ही सीधी बात नही कह रहे।"
"मैंने क्या टेढ़ी बात की डॉक्टर साहिबा? आपको कहा कि अखरोट खाया कीजिए दिमाग के लिए बहुत अच्छा होता है।"
"तब तो आपको भी खाना चाहिए , स्ट्रोक आपको हुआ है।दिमाग में क्लॉट आपको हुआ है मुझे नहीं।"
वो अब बिल्कुल शांत थे।युनकी हल्की मुस्कान भी खत्म हो गई थी चेहरे से और मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया था।ऐसे कैसे मैं किसी को कुछ भी बोल गई?
वो व्हीलचेयर पर चले जा रहे थे अपने एक केयर टेकर राजू के साथ।
मैंने पीछे से आवाज़ दी "अभ्युदय सर।"
राजू ने व्हीलचेयर रोक दी।मैं उनके सामने आई और अपने कान पकड़ लिए।
आंखों में हल्के आंसू भी थे।नही जानती क्यों पर आंसू बहने लगे और शब्द मुँह से निकले ही नहीं।
"अरे डॉक्टर साहिबा रोती भी हैं आप?हमें लगा बस देखती हैं।रोते नहीं कल मैं अखरोट लाऊंगा आपके लिए।"
"सॉरी।"
"आपने गलत नही कहा कुछ।गलतियां की हैं मैंने अपनी जिंदगी में तो भुगत रहा हूँ।कल मिलते हैं।"
वो चले गए मैं आंसू पोछते हुए वापिस डिपार्टमेंट में आ गई।
सर सबसे केस डिसकस करके बता रहे थे कि कल से क्या-क्या कराना है।
मुझे और रिया को सर ने कहा "पहले तो उस पेशेंट को रेगुलर करवाओ।एक दिन आते है चार दिन नहीं।निशी तुम जानती हो तुम्हें क्यों दिया है ये पेशेंट?"
"नहीं सर।"कंधे उचकाते हुए बोला मैंने।
"तुम्हारी बातों का जादू चलाओ और उन्हें बताओ कि वो ठीक हो सकते हैं।देखा था मैंने तुम्हें फाइनल ईयर के प्रैक्टिकल में किस तरह वो पेशेंट के रिलेटिव तुम्हारे पैर छू रहे थे।"
"जी सर।वो उनके बेटे ने चलना शुरू कर दिया था तो।"
"बस वैसे ही बातों से दिमाग में घुस कर पॉजिटिव सेल्स डेवेलप होंगे।"
"ओके सर।"
कॉलेज से लौटकर बस ख्यालों में अभ्युदय नाम ही चल रहा था और साथ ही अखरोट भी।
पहली मुलाकात
स्पाइनल इंज्यूरी में इंटर्नशिप का दूसरा दिन।
वो लेटे हुए थे एक पेशेंट टेबल पर।चेहरा दूसरी तरफ था।
"ओए!उधर देख। हेल्थ पर्सनालिटी देख कर तो स्मार्ट लग रहा है।" कुहनी मरते हुए रिया ने निशी को कहा।
"हाँ!पर है कौन?"
"भगवान जाने।अभी पता चल ही जायेगा चल।"
हम सभी अपने-अपने कामों में लग गए थे।सर ने पास बुलाया सभी को।पेशेंट की केस हिस्ट्री बताते हुए,पूछते हुए सभी उन्हीं के पास आए जिस पर मेरी और रिया की नज़र थी।
"ये अभ्युदय जी हैं।"
अभ्युदय नाम सुनकर ही मैं प्रभावित हो चुकी थी।
"स्ट्रोक हुआ था इन्हें अभी 6 महीने पहले।"
उन्हें ध्यान से देखने पर पाया कि बांया अंग लकवाग्रस्त है।सर की बातों पर से ध्यान हट गया और मैं उन्हें ही देखती रही।6 फुट ओर 6 इंच हाइट,गोरे, स्मार्ट,काली गहरी और शून्य में डूबी आँखे, काली घनी मूंछे और दाढ़ी भी।लिवाइस का सफेद टी शर्ट और डार्क ब्लू जीन्स।बेड के बगल नीचे रखे प्यूमा के लोफर।रिया ने फिर कुहनी मारी और बोली "बस कर xray कर रही है क्या?घूरना बंद कर।"
उनकी केस हिस्ट्री देकर सर फिर बोले "निशी और रिया ये कल से तुम्हारे पेशेंट।"
"जी सर।"
भारी आवाज़ में अभ्युदय जी बोले "सर लड़के नहीं हैं इस बैच में?"
हमारे सर ने कहा "आप परेशान न हो,अभ्युदय जी ये अच्छे स्टूडेंट्स हैं।"
"आपको कोई परेशानी नही होगी सर।" रिया बीच में ही कूद चुकी थी।
सबके जाते ही अभ्युदय जी उठने की कोशिश कर रहे थे।मैंने जाकर उनका हाथ पकड़ा और सहारा देकर उठाया।उनकी नजर पहली बार मुझ पर पड़ी।
"थैंक्यू।"
"ये तो हमारा काम है सर।मैं निशी, कल से हम ही आपको देखेंगे।"
"सिर्फ देखेंगी?या ठीक करेंगी?"
मैं झेंप गई थी।क्या इन्होंने मुझे इन्हें घूरते हुए नोटिस कर लिया था?वरना ऐसा क्यों कहते?
"जी सर?आपकी बात का मतलब समझी नही।"
"कोई बात नहीं, अखरोट खाया करो।"
"अखरोट? मतलब?"
"बहुत मतलब-मतलब करती हो आप।"
"लेकिन आप ही सीधी बात नही कह रहे।"
"मैंने क्या टेढ़ी बात की डॉक्टर साहिबा? आपको कहा कि अखरोट खाया कीजिए दिमाग के लिए बहुत अच्छा होता है।"
"तब तो आपको भी खाना चाहिए , स्ट्रोक आपको हुआ है।दिमाग में क्लॉट आपको हुआ है मुझे नहीं।"
वो अब बिल्कुल शांत थे।युनकी हल्की मुस्कान भी खत्म हो गई थी चेहरे से और मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया था।ऐसे कैसे मैं किसी को कुछ भी बोल गई?
वो व्हीलचेयर पर चले जा रहे थे अपने एक केयर टेकर राजू के साथ।
मैंने पीछे से आवाज़ दी "अभ्युदय सर।"
राजू ने व्हीलचेयर रोक दी।मैं उनके सामने आई और अपने कान पकड़ लिए।
आंखों में हल्के आंसू भी थे।नही जानती क्यों पर आंसू बहने लगे और शब्द मुँह से निकले ही नहीं।
"अरे डॉक्टर साहिबा रोती भी हैं आप?हमें लगा बस देखती हैं।रोते नहीं कल मैं अखरोट लाऊंगा आपके लिए।"
"सॉरी।"
"आपने गलत नही कहा कुछ।गलतियां की हैं मैंने अपनी जिंदगी में तो भुगत रहा हूँ।कल मिलते हैं।"
वो चले गए मैं आंसू पोछते हुए वापिस डिपार्टमेंट में आ गई।
सर सबसे केस डिसकस करके बता रहे थे कि कल से क्या-क्या कराना है।
मुझे और रिया को सर ने कहा "पहले तो उस पेशेंट को रेगुलर करवाओ।एक दिन आते है चार दिन नहीं।निशी तुम जानती हो तुम्हें क्यों दिया है ये पेशेंट?"
"नहीं सर।"कंधे उचकाते हुए बोला मैंने।
"तुम्हारी बातों का जादू चलाओ और उन्हें बताओ कि वो ठीक हो सकते हैं।देखा था मैंने तुम्हें फाइनल ईयर के प्रैक्टिकल में किस तरह वो पेशेंट के रिलेटिव तुम्हारे पैर छू रहे थे।"
"जी सर।वो उनके बेटे ने चलना शुरू कर दिया था तो।"
"बस वैसे ही बातों से दिमाग में घुस कर पॉजिटिव सेल्स डेवेलप होंगे।"
"ओके सर।"
कॉलेज से लौटकर बस ख्यालों में अभ्युदय नाम ही चल रहा था और साथ ही अखरोट भी।