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अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete

सुबह 8:00 बजे-दिल्ली होटेल रूम

अमन की मोहब्बत सोफिया के सर चढ़कर बोलने लगी थी। रात भर सोफिया अमन को एक पल के लिए भी आराम करने नहीं दी थी। अमन रात में ही सोफिया को अपने अनुम और रज़िया के रिश्ते के बारे में सब कुछ बता देता है।

सोफिया पहले हैरान होती है फिर परेशान। अमन को लगता था कि शायद सोफिया ये बात जानकर थोड़ी डिस्टर्ब हो जाएगी और उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।

मगर अमन की सोच के बिल्कुल उल्टा सोफिया की चूत की नशें ऐसी जोश में आईं कि उसने अमन को साँस लेना मोहाल कर दिया।

सोफिया जान चुकी थी कि वो क्यों अपने अब्बू की तरफ इतनी ज्यादा आकर्षित हुई? क्यों उसे दूसरा कोई मर्द पसंद नहीं आया? और क्यों इतने कम वक्त में उसने अपना सब कुछ अपने अब्बू के नाम कर दिया। बस उसे रह-रहकर एक बात सता रही थी कि अब घर जाने के बाद क्या होगा? वो अमन के ऊपर लेटे बस यही सोच रही थी। हालाँकि उसने अमन से इस बारे में अपने फ्यूचर के बारे में कोई सवाल, कोई जवाब नहीं माँगे थे। पर चेहरे के भाव साफ बयान कर रहे थे कि वो अंदर से बहुत परेशान है।

अमन-“क्या बात है गुड़िया, इतना खूबसूरत चेहरा ऐसे मुरझाया हुआ क्यों है?”

सोफिया-“नहीं अब्बू , कुछ भी तो नहीं …”

अमन-“इधर आ ह्म्म्म्म… मैं जानता हूँ त क्या सोच रही है? तेरे अनकहे सवालों के सारे जवाब मेरे पास हैं। बस तुझे मुझपे भरोसा करना पड़ेगा और जैसे-जैसे मैं कहूँ तू वो ही करेगी, हमेशा…”

सोफिया-“अब्बू आपने अम्मी की मोहब्बत देखी है, आपने अनुम अम्मी की मोहब्बत भी परखी होगी। पर आपने अपनी बेटी की मोहब्बत को अभी तक समझा नहीं । जब एक लड़की अपना सब कुछ अपने मर्द के नाम करती है ना तो वो उसकी हो जाती है। फिर वो शख्स उसे आलीशान महलों में रखे या टूटे मकान में वो हँसी खुशी उसके साथ रहती है… बस इस वादे के साथ कि जिस तरह मैं तुम्हें सब दे चुकी हूँ , तुम भी मेरे बनकर रहना। अब्बू भरोसे की बात करते हैं तो मैं किसी दिन वक्त आया तो मैं आपके लिए खुद की जान भी दे दूँगी …”

अमन सोफिया के होंठों को चूमने लग जाता है-“मुझे तेरी मोहब्बत पे कोई शक नहीं है सोफी बेटा… बस मैं चाहता हूँ कि हमारे बीच का ये रिश्ता किसी को पता ना चले, किसी को भी नहीं …”

सोफिया-“जी अब्बू , जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही होगा। बस अपने प्यार में कमी ना होने देना…”

अमन-“मुआह्ह… नहीं होगी मेरी जान… चल अब मुझे फ्रेश होने दे। दोपहर की फ्लाइट से घर वापस भी चलना है…”

सोफिया-“ऐसे कैसे छोड़ दूं ? मुझे भी उठाकर बाथरूम में ले चलिए…”

अमन सोफिया को गोद में उठाकर बाथरूम में ले जाता है और शावर ओन करके दोनों नहाने लगते हैं। वहाँ भी सोफिया अमन को अच्छे से नहाने नहीं देती। उसकी चूत की आग ही इस कदर भड़की हुई थी कि जितना अमन उसे अपने लण्ड के पानी से बुझाता उतना ही वो भड़कती जाती।

***** *****इधर समर कैम्प में-

लुबना अपनी कुछ सहेलियों के साथ एक खूबसूरत गार्डननुमा जगह पे बैठी हुई थी। सामने कुछ लड़के बास्केट बाल खेल रहे थे।

लुबना की नजरें जीशान को तलाश कर रह थीं। पर वो था कि एक तरफ चुपचाप सा बैठा हुआ था। कल के हादसे ने उसे हिलाकर रख दिया था। उसे पता चल चुका था कि लुबना उसे प्यार करती है और उसके प्यार की शिद्दत भी उसे पता चल गई थी। वो लुबना की उस हरकत से काफी ख़ौफजदा सा हो गया था। लुबना से वो भी मोहब्बत करता था। पर ये मोहब्बत भाई-बहन की थी। वो खुद से लड़ रहा था कि कैसे लुबना से बात की जाए? कैसे उसे समझाया जाए कि वो जो सोच रही है वो नहीं हो सकता।

उसे रूबी अपनी तरफ आती दिखाई देती है। अचानक उसके दिमाग़ में एक आइडिया आता है। क्यों ना रूबी के साथ फ्लर्ट करके लुबना को ये एहसास दिलाया जाए कि हम दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगे हैं। हो सकता है इससे लुबना का ख्याल बदल जाए।

वो मुस्कुराता हुआ रूबी के पास चला जाता है और उसके हाय बोलने से पहले उसे अपनी बाहों में उठा लेता है।

रूबी-“अह्ह… आराम से… मैं गिर जाउन्गी। आखिर हो क्या गया है तुम्हें?”

जीशान-“प्यार हो गया है मुझे तुमसे…”

रूबी-“सच… तुम सच कह रहे हो जीशान?”

जीशान-“हाँ रूबी, रात भर मैं तुम्हारे बारे में सोचता रहा और दिल ने मुझे यही कहा कि तुझे रूबी जैसी अच्छी लड़की कहीं नहीं मिल सकती…”

रूबी जीशान को चूम लेती है-“मैं जानती थी… मैं जानती थी कि एक दिन ये ज़रूर होगा। पर इतने जल्दी … मुझे तो यकीन नहीं हो रहा जीशान… मुझे अपनी बाहो में समेट लो, कहीं मैं बिखर ना जाऊूँ…”

जीशान रूबी को अपने से एकदम चिपका लेता है। दूर बैठी लुबना ये सब देख रह थी। वो अपने पैरो पे बँधे ड्रेसिंग बैंडेज निकालकर फेंक देती है, जिससे खून फिर से उसके पैरो से बहने लगता है। वो जीशान की आँखों में इतनी दूर से झाँक सकती थी। बिना कुछ कहे वो नंगे पाँव अपने रूम में चली जाती है, और अपने पीछे खून के निशान छोड़ जाती है। जिसे देख जीशान का दिल भी खून के आँसू रोने लगता है।

***** *****

अमन विला में अमन पहुँच चुका था। घर की सभी औरतें जिस चाँद का दीदार करने के लिए कई दिन से तरस गई थीं, आज वो उनकी आँखों के सामने था। अमन एक-एक करके सभी से मिलता है और जो वो कपड़े गहने उनके लिए वहाँ से लाया था वो उन्हें देता है।

नग़मा सोफिया को नीचे से ऊपर तक देखने लगती है, और उसका हाथ पकड़कर अपने रूम में ले जाती है-“बाजी ये मैं क्या देख रही हूँ ?”

सोफिया चौंकते हुये-क्या हुआ नग्गो?

नग़मा-“बाजी, आप जब यहाँ से गई थीं तो कोई और थी और जो अब मैं देख रही हूँ ये तो आप हो ही नहीं सकती। क्या हुश्न खिला है आपका? कितनी खूबसूरत लग रह हैं आप? कहीं मेरे नजर ना लग जाए…”

नग़मा तो अभी तक अंजान थी। उसे क्या पता था कि इस हुश्न के पीछे किसका हाथ है? शायद नग़मा पहचान ना पाई हो, मगर रज़िया की आँखें सोफिया को देखते ही पहचान गई थीं कि कली फूल बन गई है।

रात के 12:00 बजे-

शीबा अपने रूम में लेटी हुई अमन का इंतजार कर रह थी। पर वो जानती थी कि अमन नहीं आने वाला। वैसे भी उसे अब जीशान के जवान लण्ड की आदत सी लग गई थी। वो तो बस जी शान के लौटने का इंतजार कर रह थी कि कब वो वापस आता है और कब वो अपनी चाल चलती है।

अमन सोफिया के रूम में चला जाता है।

सोफिया आईने के सामने बाल सँवार रही थी। वो अमन को देखते ही सब कुछ छोड़कर उसकी छाती से चिपक जाती है-“अब्बू , आप तो मुझे भूल ही गये है यहाँ आकर…”

अमन-“कैसी बात कर रही हो जान मेरी … बस कुछ दिन और इंतजार कर ले, मैं कुछ सोचता हूँ …”

सोफिया-“अब्बू , मैं कैसे आपके बिना रह पाउन्गि? इस कमरे में अकेली नहीं सो सकती मैं। मुझे आपके पास रहना है, आपके पास उसी तरह सोना है जैसे हम वहाँ रहते थे…”

अमन सोफिया के जज़्बात से अच्छी तरह वाकिफ़ था। वो सोफिया के नाजुक होंठों को चूमने चाटने और उसकी जीभ को अपने मुँह में लेकर उसकी गर्मी कुछ हद तक कम करने लगता है। वो एक हाथ से सोफिया की चूत को भी शलवार के ऊपर से सहलाने लगता है।

सोफिया-“अह्ह… अब्बू अह्ह… देखते ही देखते हवस का पानी जज़्बातों की आग को बुझाने लगता है और सोफिया की चूत पानी-पानी हो जाती है…”

अमन कुछ देर उसे मजीद चूमता है और गुडनाइट कहकर रज़िया के रूम में चला जाता है।

उस वक्त रज़िया और अमन के बेडरूम में अनुम भी मौजूद थी और दोनों माँ-बेटी बड़ी बेसब्री से अमन के रूम में आमद का इंतजार कर रह थीं।

अमन सीधा उन दोनों के बीच जाकर लेट जाता है। पहले वो अपनी पहली मोहब्बत को चूमता है, उसके बाद उसे जिसने उसे मोहब्बत के सही मायने समझाए थे।

रज़िया- टूर कैसा रहा?

अमन-“बहुत अच्छा। जिस काम के सिलसिले में मैं गया था वो प्रॉजेक्ट मुझे मिल गया…”

अनुम अपने शौहर के छाती पे सर रख देती है-“ये तो बहुत अच्छी बात है। आल्लाह आपको हर कदम पे कामयाबी अता करे…”

रज़िया-सोफिया ने ज्यादा परेशान तो नहीं किया ना?

अमन गौर से रज़िया के चेहरे को देखते हुये-“नहीं , वो अपनी अम्मी पे गई है, मेरा बहुत अच्छे से ख्याल रखा उसने…”

रज़िया-“हाँ, वो तो उसे और आपको देखते ही लगता है कि किसने किसका कितना ख्याल रखा है। खैर ये बताएँगे हमारी याद आई थी भी या नहीं ?”

अनुम-“हाँ जान , सच बताना…”

अमन-“याद उन्हें किया जाता है, जिन्हें भूले हों। तुम दोनों तो जिस्म से रूह तक बसी हुई हो, तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ ? ये होंठ तो बहुत याद आते थे मुझे…” और वो रज़िया के निच ले होंठ को लगभग चूस ही लेता है।

अनुम अमन के होंठ रज़िया के होंठों से अलग करके अपने होंठ अमन से मिला लेती है-“और मुझे ये बहुत याद आ रहे थे गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन-कपड़े उतारो ।

अनुम रज़िया को देखती है और रज़िया अमन को। दोनों औरतें पहले खुद के उसके बाद अमन के सारे कपड़े जिस्म से अलग कर देती हैं। अमन के लण्ड पे सबसे ज्यादा इन दोनों का ही राज रहा था। वो अपने शौहर की छोटी से छोटी दिल की बात बिना कहे ही जान जाती थीं।

अमन कभी दोनों से अपने लण्ड को मुँह में लेकर चूसने के लिए नहीं कहता था।

दोनों अच्छी तरह जानती थी कि अमन को किस तरह तैयार करना है और वो इसमें जुट जाती हैं। कई दिनों के सूखे होंठ, कई दिनों की प्यासी जीभ से जब वो नाजुक गोश्त का टुकड़ा टकराता है तो रज़िया के साथ-साथ अनुम भी सिसक पड़ती है और दोनों औरतों की जीभ में जैसे जंग शुरू हो जाती है, अपने महबूब को ज्यादा से ज्यादा अपने मुँह में लेने की।

अमन रज़िया को खींचकर अपने होंठों के पास ले आता है और अपनी जीभ उसके मुँह में डालकर रज़िया का सलाइवा पीने लगता है, और उसे भी तरोताजगी देने के लिए अपना सलाइवा पिलाने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

 
अनुम अभी भी अपने अमन के लण्ड को मुँह में लिए दिल की गहराईयों से चूस रही थी-“गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन अनुम के मुँह से लण्ड निकालकर रज़िया को अपने ऊपर ले लेता है और हमेशा की तरह वो रज़िया की चूत में नहीं बल्की उसकी गाण्ड में अपना लण्ड डालने लगता है।

रज़िया-“अह्ह… ओह्ह… अह्ह… थोड़ा आराम आराम से ज्ज्जी… सुराख छोटा हो गया होगा ना अह्ह… अमन अनुम चूत चाट…”

अनुम रज़िया की चूत पे अपने होंठ रख देती है और अमन धीरे-धीरे रज़िया की गाण्ड में लण्ड घुसाता चला जाता है अह्ह… सुराख बंद भी हो जाये तो कोई बात नहीं … अपने अमन पे भरोसा नहीं है क्या?”

रज़िया-“अह्ह… अनुम बेटी , इनसे कहना थोड़ा आराम से करें…”

अमन ना अनुम की सुनने वाला था और ना रज़िया की। वो तो अपने काम से काम रखने वाला शख्स था। जवानी से अब तक उसने कभी किसी औरत की गुहार नहीं सुना था। रज़िया चीखती रही और अमन उसकी मारता गया। जब रज़िया की टाँगे हवा में लटकी-लटकी थक गईं तो अमन रज़िया को घोड़ी बनाकर उसकी चूत में लण्ड डाल देता है और लण्ड को बड़ी तेज़ी से अंदर-बाहर करने लगता है।

15 मिनट बाद ही रज़िया हाँफते हुये पानी छोड़ देती है। अब ना उसकी चूत में वो रस रहा था और ना वो इतनी कसी हुई थी कि अमन के लण्ड का पानी भी साथ में निचोड़ सके।

अमन अनुम की तरफ देखता है और अनुम मुश्कुराते हुये टाँगे खोलकर अपनी जान को जगह दे देती है। अमन के लण्ड को असल सकून अब यहीं मिलता था। वो अनुम को चूमते हुये अपना लण्ड उसकी चूत में उतार देता है।

अनुम-“अह्ह… बड़ा सताने लगे हैं आप मुझे… जरा भी रहम नहीं आता ना अपनी बीवी पे?”

अमन-“नहीं आता… क्यों आए मुझे… रहम तुझपे… प्यार करता हूँ तुझसे… और प्यार में रहम नहीं होता। बस प्यार होता है बेशुमार अह्ह…”

अनुम-“करिये ना मुझे बेशुमार प्यार अह्ह… मैं भी तो आपसे रहम की उम्मीद नहीं रखती अह्ह…”

अमन-“अनुम मेरी जान अह्ह…”

अनुम-“अम्मी जीईई अह्ह… आपको पता है, एक-एक दिन कयामत की तरह गुजरा है मुझपे ओह्ह…”

अमन-“जानता हूँ … सब जानता हूँ अनुम आह्ह… बहुत टाइट लग रही है तू आज्ज्ज…”

अनुम-“सब आपकी वजह से उऊन्ह… जिस वक्त मुझे आपकी सबसे ज्यादा ज़रूरत महसूस होती है, आप मेरे पास नहीं रहते जीईई अह्ह… अम्मी उम्ह्ह…”

अमन के धक्कों की रफ़्तार तेज हो जाती है। वो अपने आख़िरी मुकाम पर था और एक लावा अनुम की चूत में फूट पड़ता है तो अनुम की बंजर जमीन पे फिर से किसी बारिश की तरह बरसने लगता है और इस बारिश में अनुम भी सराबोर होकर अमन के साथ झड़ने लगती है। अनुम के होंठ अमन के होंठों से अलग नही होना चाहते थे और ना अमन अनुम को अपने से अलग करना चाहता था। दोनों एक दूसरे की बाहो में कितनी ह देर बातें करते रहते हैं और एक बार फिर मोहब्बत के तालाब में दुबारा डुबकी लगा देते हैं।

रज़िया तो पहली चुदाई के बाद ही अमन और अनुम को देखते हुई सो गई थी।

पर अनुम की मोहब्बत की शिद्दत अमन को सोने नहीं देती।

सुबह के 6:00 बजे-

अमन रज़िया और अनुम के पास से उठकर अपने बेडरूम में जाने लगता है कि तभी उसे सोफिया का ख्याल आता है, और वो उसे देखने के ख्याल से उसके रूम का रुख़ कर लेता है।

सोफिया बेड पे उल्ट लेटी हुई थी। अमन ने उसकी गाण्ड को काफी हद तक बाहर की तरफ कर दिया था। नाजुक सी खूबसूरत तितली अपने सारे रंगों के साथ चैन की नींद सोई हुई थी। अमन रूम में जाकर दरवाजा लाक कर देता है और सोफिया के पीछे जाकर उससे चिपक के लेट जाता है।

सोफिया-“उम्ह्ह… सोने दो ना अम्मी…”

अमन-“मेरे बिना नींद आ गई तुम्हें?”

सोफिया हड़बड़ाकर उठकर बैठ जाती है और सामने अमन को देखकर उससे लिपट जाती है-“आपको ऐसा लगता है ना… रात गुजारना मुहाल कर दिया आपने मेरा। खुद तो चले गये आग लगाकर पर जानते भी हैं कितनी ही देर सुलगते रही मैं इन शोलों में…”

अमन सोफिया से कुछ नहीं कहता बस उसे लेटाकर उसके निपल्स को अपने मुँह में भर भर लेता है-“गलप्प्प…”

सोफिया-“अह्ह… अब्बू जी कुछ करिए ना मेरा… या तो आप मुझे जहर दे दो या मुझे अपने जिस्म में छुपा लो। नहीं रह सकती एक पल भी आपके बिना अह्ह…”

अमन-“अह्ह… गलप्प्प… पागल हो गई है तू सोफिया…”

सोफिया-“हाँ, मैं पागल हो गई हूँ और अगर अपने मेरा इलाज नहीं किया ना तो मैं सारी दुनियाँ को जला दूँगी …”

अमन सोफिया के बाल पकड़कर उसे अपने लण्ड की तरफ झुका देता है। वो जानता था कि उसे एक यही चीज काबू में कर सकती है। और हुआ भी वही ।

सोफिया के हाथ में जब अमन का लण्ड आया तो वो चुप सी हो गई और बिना कुछ बोले अमन के लण्ड को चूमते हुये उसे अपने गले में लेकर चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…"

अमन जानता था के सोफिया के ये जज़्बात कुछ वक्त के लिए हैं। धीरे-धीरे वो नॉर्मल हो जाएगी और शायद ये जज़्बाती बातें करना भी बंद कर देगी। पर वो ये भूल गया था कि सोफिया की रगों में सिर्फ़ उसका नहीं , बल्की रज़िया का भी खून मौजूद है।

सोफिया के जज़्बात और एहसास इतने ज्यादा थे कि रज़िया और अनुम दोनों उसके सामने कुछ भी नहीं थीं।

अमन उसके जिस्म पे से नाइटी अलग कर देता है और बड़े वहशी अंदाज में अपने लण्ड को एक ही झटके में सोफिया की चूत में घुसा देता है। अमन को पता था कि औरत हो या बेलगाम घोड़ी उसे काबू में करने के लिए ज़्यादती करनी ही पड़ती है।

पर सोफिया भी अमन की बेटी थी। वो चीखने चिल्लाने के बजाए मुश्कुराते हुई अमन के हर जुल्म को सहती चली जाती है, और अपनी कमर को ऊपर तक उठाकर अमन का साथ देने लगती है-“अह्ह… अब्बू … अगर मुझसे सच्चा प्यार करते हैं ना तो एक पल के लिए भी रुकियेगा मत… चाहे मैं बेहोश क्यों ना हो जाऊूँ…”

अमन ने पहली बार किसी औरत के मुँह से ऐसे लफ़्ज सुने थे।

या तो वो बूढ़ा हो गया था या सोफिया के जज़्बात अमन के लण्ड पे हावी हो गये थे। सोफिया अमन पे हर तरह से काबू पाती जा रह थी और यही वजह थी कि अब अमन का दिल रज़िया के लिए नहीं बल्की सोफिया को सोचकर तेज़ी से धड़कने लगा था। अमन सोफिया को 35 मिनट तक बिना रुके चोदता रहा। आखिरकार उसका लण्ड सोफिया की चूत के सामने झुक गया और अपने पानी से सोफिया की चूत को किनारे तक भरता चला गया।

सोफिया-आइ लव यू अब्बू ।

अमन सोफिया को चूमते हुये-आइ लव यू टू सोफी।

सोफिया अपने अब्बू के होंठों को चूमती रही । उसे अमन की बाहो में बहुत सकून मिल रहा था। अमन भी अपनी बेटी से बेपनाह मोहब्बत करने लगा था। वो सोफिया के होंठों को आजाद कर देता है-“मुझे फ्रेश होकर ऑफिस जाना है…”

सोफिया-“नहीं , अभी नहीं बाद में। मुझे आपके पास रहने दो…” सोफिया किसी बच्चे के तरह ज़िद करने लगती है।

अमन-“सोफी बेटा, ऑफिस में बहुत ज़रूर काम है। मुझे लेट हो जाएगा, फ्रेश भी होना है…”

सोफिया-“फ्रेश होना है ना आपको तो यहाँ मेरे रूम में भी बाथरूम है, यहाँ हो जाओ…”

अमन-“ठीक है, अब ऊपर से उठो भी…”

सोफिया-“जी नहीं , मुझे भी अपने साथ बाथरूम में लेकर चलिये मैं भी आपके साथ नहाऊूँगी…”

अमन सोफिया की इन्ही बातों का दीवाना हो गया था। सोफिया उसे टूटकर चाहने लगी थी और उसकी मोहब्बत रज़िया और अनुम की मोहब्बत से कहीं ज्यादा गहरी थी। अमन सोफिया को गोद में उठाकर बाथरूम में ले जाता है।

शावर के नीचे खड़े होकर दोनों नहाने लगते हैं। सोफिया के चेहरे के सामने अमन का लण्ड जो ढीला पड़ चुका था, लटक रहा था। जवान लड़की को दिन रात चोदो, तब भी वो चोदने के बाद यही कहेगी-“और चोदो…” यही हाल सोफिया का भी था। वो अमन के लण्ड पे साबुन लगे हाथ से उसकी मालिश करने लगती है। अमन एक नजर सोफिया की आँखों के तरफ डालता है और उन झील सी आँखों में फिर से उसे वही नजर आने लगता है, जो कुछ देर पहले नजर आ रहा था।

मगर इस बार सोफिया से पहले अमन उसे अपनी चौड़ी छाती से लगा लेता है और सोफिया किसी नाजुक तितली की तरह सिमट ते चली जाती है।

सोफिया-“अब्बू जी क्या नहाने भी नहीं देंगे मुझे?”

अमन उसके नाजुक से होंठों को चूमते हुये-“नहीं …”

सोफिया-“पहले मुझे नहाने दो उसके बाद जो दिल कहे कर लेना…”

अमन सोफिया के दोनों हाथ पकड़कर अपने लण्ड पे रख देता है और नरम -नरम हाथों से सोफिया अपने अब्बू के लण्ड को सहलाने लगती है। देखते ही देखते अमन का लण्ड किसी तीर की तरह खड़ा हो जाता है और ठीक सोफिया की चूत से जा टकराता है।

सोफिया-अब्बू एक बात पुछु?

अमन-“हाँ पूछ…”

सोफिया-“आप अम्मी के साथ कितनी बार नहा चुके हैं?”

अमन-कई बार।

सोफिया-“अम्मी क्या करती थी नहाते हुये?”

अमन सोफिया को नीचे बैठा देता है-“पहले तेरी अम्मी इसे मुँह में लिया करती थी ऐसे अह्ह… उसके बाद मैं उसे बाथरूम में कितनी ही देर चोदा करता था। मगर कई सालों से तेरी अम्मी ने मेरे साथ नहाना ही छोड़ दिया है…”

सोफिया-“गलप्प्प… मैं हूँ ना आपके बेटी । जो अम्मी ने नहीं किया, वो मैं करूँगी। आज से आप रोज मेरे कमरे में नहाने आ जाया करो। हम साथ मिलकर नहाएँगे गलप्प्प…”

अमन-“पहले चूसठीक सेईई अह्ह…”

सोफिया बातें बंद करके फिर से अमन के लण्ड में मगन हो जाती है और उसे चूस-चूसकर फौलाद की तरह बना देती है-“अब्बू मुझे अपने से कभी अलग मत होने देना गलप्प्प…”

अमन सोफिया को उठकर बाथटब पे बैठा देता है और उसकी गुलाबी चूत को चाटने लगता है।

सोफिया-“अम्मी जी, ऐसा मत किया करो आप… अम्मी अह्ह…”

अमन-“तेरी चूत इतनी खूबसूरत है कि मुझसे रहा नहीं जाता सोफी…”

सोफिया-“अह्ह… आपके लिए तो है… चूसो ना अब्बू जान अह्ह… अम्मी जी… अब्बू जी आपको लेट हो जाएगा, जल्दी से करिये ना जीईई…”

अमन जानता था कि सोफी से रहा नहीं जा रहा है और वो अपनी बेटी के जज़्बात को समझता भी था। वो सोफिया को अपने ऊपर ले लेता है और अपने लण्ड को उसकी चूत पे रख देता है-“अह्ह… सोफी नीचे बैठती जा आराम-आराम से…”

सोफिया-“अब्बू जी, अब्बू जी अम्म्म्मीईई अह्ह…” और वो अपने अब्बू के मोटे लण्ड को अपनी चूत में लेती हुई धीरे-धीरे चिल्लाने लगती है और मोटा लण्ड नरम चूत में घुसता चला जाता है।

अमन दोनों हाथों से सोफिया की कमर पकड़कर सटासट अपने लण्ड को उसकी चूत के अंदर तक पहुँचाता चला जाता है। मुँह के सामने लटकते हुये सोफिया के वो गुलाबी निप्पल जैसे ही अमन अपने मुँह में भरकर चूसते हुये उसे चोदने लगता है,

सोफिया की चूत धीरे-धीरे पानी छोड़ने लगती है।

सोफिया भी अपने अम्मी रज़िया की तरह थी। वो पानी निकलने से थक नहीं जाती थी, बल्की उसकी चूत में और ज्यादा जोश पैदा होने लगता था और वो अपनी कमर उठा-उठाकर अमन का लण्ड लेने लगती है। अमन अपनी बेटी की चूत में बहुत खुश था और सोफिया अपने अब्बू के लण्ड को अपने चूत में लेकर। दोनों अपनी-अपनी मोहब्बत के कारवाँ को आगे बढ़ा रहे थे।

और उधर समर कैम्प में जीशान और लुबना के रिश्ते में बदलाओ पैदा होने लगा था।

 
अमन फ्रेश होकर सोफिया के रूम से अपने रूम में चला जाता है और सोफिया बेड पे लेटी हुई अपने और अपने अब्बू के सुनहरे लम्हों को याद करते हुये मुश्कुराने लगती है कि तभी उसके रूम में रज़िया दाखिल होती है। रज़िया को देखकर सोफिया बेड से खड़ी हो जाती है।

सोफिया- दादी , आप इस वक्त यहाँ?

रज़िया-“क्यों, जब अमन तुम्हारे रूम में दिन रात आ सकता है तो मैं इस वक्त क्यों नहीं ?”

सोफिया की पेशानी पे पसीने के कतरे आने लगते हैं। वो रज़िया के चेहरे के भाव से पता लगा सकती थी की रज़िया को कुछ-कुछ पता चल चुका है।

रज़िया-“खामोश क्यों हो गई सोफिया? बोलो क्या कर रहा था अमन तुम्हारे रूम में?”

सोफिया-“वो दादी … अब्बू के कमरे में पानी नहीं आ रहा था इसलिए वो मेरे बाथरूम में नहाने आए थे…”

रज़िया-“तुम्हें देखकर ऐसा लग रहा है जैसे तुम भी…”

सोफिया-“ये आप कैसी बातें कर रह हैं दादी ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा?”

सोफिया अपनी दादी से नजरें चुरा लेती है और गर्दन मोड़कर चेहरा दूसरी तरफ कर लेती है।

रज़िया सोफिया को घुमाकर उसका चेहरा अपनी तरफ कर देती है-“मुझसे नजरें मिलाकर बात करो सोफिया…”

सोफिया का जिस्म अंदर ही अंदर लरज जाता है, गला सूखने की वजह से वो ठीक तरह से बोल भी नहीं पाती, और आवाज़ लड़खड़ाने लगती है।

रज़िया-“देखो सोफिया, जो इस घर में हो रहा है वो मुझसे छुपा नहीं है। बेहतर होगा तुम मुझसे साफ-साफ बात करो। ये तुम्हारे लिए भी अच्छा होगा और अमन विला के लिए भी। क्या करके आए हो तुम दिल्ली से? तुम्हारे और अमन के बीच कौन सा नया रिश्ता पैदा हो गया है? बोलो मुझे। मेरी नजरें धोखा नहीं खा सकती। तुम्हें देखकर बता सकती हूँ कि तुम अपना सब कुछ अमन को सौंप चुकी हो। बोलो क्या मैं गलत हूँ ?”

सोफिया बेड पे बैठ जाती है और एकटक रज़िया को देखने लगती है।

रज़िया-“बेहतर होगा इस बात का जवाब तुम मुझे अमन के सामने रात में दो…” कहती हुई रज़िया अपने कमरे में चली जाती है।

और सोफिया डर और घबराहट के मारे पसीने-पसीने हो जाती है। उसे कुछ समझ में नहीं आता कि आखिर ये सब रज़िया को कैसे पता चला?

सुबह जब अमन रज़िया और अनुम के पास से सोफिया के कमरे में गया था, उसे रज़िया ने देख लिया था। और वो काफी देर उसके रूम के दरवाजे के पास खड़ी रहकर उन दोनों की सारे बातें भी सुन चुकी थी। वो सब बर्दाश्त कर सकती थी, मगर अमन को और किसी लड़की के साथ बर्दाश्त नहीं कर सकती थी… चाहे वो फिर उसकी अपनी सगी बेटी है क्यों ना हो।

कुछ देर बाद अमन ऑफिस के लिए निकल जाता है। और रज़िया दुबारा सोफिया के रूम में आती है। सोफिया कपड़े पहनकर बेड पे बैठी हुई थी।

रज़िया-चलो सोफिया मेरे साथ।

सोफिया-कहाँ?

रज़िया-अमन के ऑफिस?

सोफिया फटी - फटी नजरों से रज़िया को देखने लगती है।

रज़िया सोफिया का हाथ पकड़कर उसे अमन के ऑफिस ले जाती है। अमन उस वक्त अपने केबिन में बैठा कुछ काम देख रहा था। रज़िया और सोफिया को देखकर वो चौंक जाता है-“अरे अम्मी, आप इस वक्त यहाँ? ख़ैरियत तो है ना? और ये सोफिया को यहाँ क्यों ले आए?”

रज़िया-“ख़ैरियत ही नहीं है अमन। मुझे सब पता चल गया है तुम्हारे और इस लड़की के बारे में। मैं सिर्फ़ ये जानने आई हूँ कि तुम आखिर चाहते क्या हो?”

अमन केबिन का दरवाजा बंद कर देता है, जिससे उन दोनों की आवाज़ बाहर ना जा सके।

सोफिया सिसकती हुई सोफे पे बैठ जाती है।

रज़िया-“देखो ये बात मैंने अभी तक अनुम को नहीं बताई, वरना तुम जानते हो कि वो पागल क्या कर देगी? खुद का भी और इस लड़की का भी। बेहतर होगा कि तुम और ये अपने जज़्बातों को यहीं दफन कर दो। इसी में अमन विला की और हम सबकी भलाई है।

सोफिया-“दफन कर दो? मेरे जज़्बात बेमानी नहीं हैं। अम्मी मैं भी जानती हूँ आपके और अब्बू के बारे में। एक बात आप भी सुन लीजिये कि मैं अब्बू से मोहब्बत करती हूँ और उनसे दूर नहीं रहूंगी । इसके लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ … कुछ भी…”

सोफिया के मुँह से ये लफ़्ज सुनकर एक पल के लिए रज़िया के दिल में सकून उतर आता है पर अगले ही पल वो खुद को संभाल लेती है। रज़िया आगे बढ़कर दो जोरदार चपत सोफिया के गाल पे रसीद कर देती है-“जब तुम जान ह चुकी हो हमारे हकीकत तो ये भी सुन लो कि मैं तुम्हारी अम्मी हूँ और एक माँ होने के नाते मैं ये कभी नहीं होने दूँगी कि तुम अपनी सारे जिंदगी ऐसे इंसान के लिए ख़तम कर दो जिससे सिर्फ़ तुम नहीं बल्की तीन औरतें भी बेपनाह मोहब्बत करती हैं। अमन सिर्फ़ तुम्हारा नहीं है उसपे तुमसे पहले मेरा, अनुम का और शीबा का हक है…”

अमन रज़िया का हाथ पकड़कर उसे सोफे पे बैठा देता है-“पहले आप सकून से बैठ जाओ और मेरी बात ध्यान से सुनो। मैं जानता हूँ कि मुझपे सबसे ज्यादा आपका हक है और मैंने सच्ची मोहब्बतू भी की थी तो सिर्फ़ आपसे और अनुम से। दिल्ली में मुझे आपकी बहुत याद आती थी। सोफिया के चेहरे में मुझे आपका अक्स नजर आता है। इसलिए मैं बहक गया था और वो सब हो गया जो नहीं होना चाहिए था…”

अमन सोफिया से-“सोफिया बेटी मैं उमर के उस पड़ाओ पे पहुँच चुका हूँ , जहाँ मैं तुम्हारे ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकता। मुझपे पहले से ही तीन औरतों की ज़िम्मेदारी है और जिनमें से तुम्हारे अम्मी और अनुम से मैं बेपनाह मोहब्बत करता हूँ …”

अमन रज़िया का हाथ अपने हाथ में ले लेता है-“मुझसे गलती हो गई, बहुत बड़ी गलती और मैं जानता हूँ इस गलती को कैसे सुधारा जा सकता है…”

रज़िया-कैसे?

अमन-“मेरे ऑफिस में अकरम नाम का एक कर्मचारी काम करता है। खानदानी है, जवान भी है, उसके वालिद ने अकरम के लिए लड़की ढूँढने की ज़िम्मेदार मुझे सौंपी है और मुझे उसके लिए लड़की मिल गई है-“सोफिया…”

सोफिया गुस्से में खड़ी हो जाती है और अमन का गिरेबान पकड़ लेती है-“आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते। मैंने आपसे सच्ची मोहब्बत की है। मैं किसी भी गैर के साथ कोई रिश्ता नहीं बनाऊूँगी। मैं शादी नहीं करूँगी, ये बात आप अच्छी तरह समझ लीजिये । रही बात आप बहक गये थे तो सुन लीजिये … मैंने आपको दिल से चाहा है और चाहती रहूंगी । अगर आपको अपनी गलती का मलाल है तो मैं आपकी गलती की सजा भुगतने को तैयार हूँ । मैं अपनी जान दे दूँगी …”

अमन सोफिया को अपने सीने से लगा लेता है-“तुम कैसी बात कर रह हो सोफी? मेरी बात समझो बेटा…”

सोफिया-“मुझे कुछ नहीं सुनना…” और वो रोती हुई वहाँ से चली जाती है। और रज़िया अमन एक दूसरे को देखते रह जाते है।

रज़िया-“तुम जानते हो अनुम को अगर ये बात पता चली तो क्या होगा?”

अमन-“अम्मी किसी को कुछ पता नहीं चलेगा और आप अनुम से कुछ नहीं कहेंगी। मुझसे वादा कीजिए। मैं सब संभाल लूँगा…”

रज़िया-“मैं वादा नहीं करूँगी उस आदमी से जिसने मुझसे ये वादा किया था कि वो मेरे और अनुम के सिवाय किसी और के साथ कोई जायज़ या नाजायज़ रिश्ता नहीं बनाएगा। जब तुम अपना वादा तोड़ सकते हो तो मैं तुमपे क्यों भरोसा करूँ?”

रज़िया भी अमन के केबिन से चली जाती है।

और अमन अपने सर को पकड़कर बैठ जाता है।

***** *****उधर समर कैम्प में।

जीशान बेहद परेशान सा अपने कमरे में बैठा हुआ था। उसने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। लुबना हाथ में खाने की प्लेट लिए उसके रूम में आती है और उसके पास आकर प्लेट -टेबल पे रख देती है-“खाना खा लो…”

जीशान-“मुझे नहीं खाना, चली जा यहाँ से…”

लुबना-“खाना खा लो…”

जीशान एक चपत लुबना के गाल पे जड़ देता है-“सुनाई नहीं देता तुझे? चली जा यहाँ से…”

लुबना-“खाना खा लो वरना मैं भी भूखी रह जाउन्गी…” उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। ये आँसू जीशान के थप्पड़ के नहीं बल्की उसके ना खाने से होने वाले दर्द की वजह से थे।

जीशान लुबना को घुरने लगता है-“ तू किस मिट्टी की बनी है लुबना?”

लुबना-“उसी मिट्टी की जिससे आप बने हो। अब बातें बाद में करना पहले कुछ खा लो…”

जीशान को लुबना पे गुस्सा भी आ रहा था और एक बहन के इस तरह टूटकर मोहब्बत करने पे प्यार भी। वो एक निवाला तोड़कर पहले लुबना को खिलाता है।

लुबना-“पहले आप खाओ, मैं बाद में खा लूँगी …”

जीशान चिल्लाते हुये-“मुँह खोल…”

लुबना जीशान की आँखों में देखते हुये मुँह खोल देती है और जीशान निवाला उसके मुँह में डाल देता है। लुबना एक निवाला तोड़कर जीशान को खिलाने लगती है पर जीशान उसे मना कर देता है।

लुबना-“मेरे हाथों में जहर नहीं लगा जो आप मना कर रहे हो? मुझे माफ कर दो, सुबह मैंने आपसे ऊूँची आवाज़ में बात की इसलिए…”

जीशान-“देख लुबु, मेरी बात अच्छे से समझ… जो तू चाहती है, वो गलत है। क्यों अपने जिंदगी बर्बाद करने पे तुली हुई है?”

लुबना-“जिसके साथ जिंदगी आबाद हो, आप उसे बर्बाद कह रहे हैं। मैंने आपसे कुछ नहीं माँगा, ना आपको किसी चीज के लिए फोर्स किया। आप मेरी तरफ से इतमीनान रखिये। मैं आपसे कभी कुछ नहीं माँगूंगी । बस जैसे आप सबसे हँसकर बात करते हैं, क्या उसी तरह मुझसे बात नहीं कर सकते? आप ही तो कहते थे कि आपको मुझसे बहुत प्यार है…”

जीशान-“वो एक पाक रिश्ते की मोहब्बत है लुबु, तू समझती क्यों नहीं ?”

99

लुबना-“समझ तो आप नहीं रहे भाई, क्या मैंने आपसे कभी कोई नाजायज़ डिमांड की? क्या मैंने आपसे कहा कि आप भी मुझसे मोहब्बत करो? ये मेरे जज़्बात हैं, मुझे अपनी यादों में, अपने जज़्बातों के साथ जीने का हक है ना? जब कभी मैं आपसे कोई गलत बात के लिए कहूँ गी, उस वक्त आप मेरा गला घोंटकर मुझे मार देना। मगर इस तरह घुट-घुटकर मत रहो। प्लीज़्ज़…” वो रुकी नहीं , अपने आँसू पोंछते हुई बाहर भाग गई।

और जीशान को सोचने पे मजबूर कर गई कि वो जो कह रही है कुछ गलत तो नहीं कह रही ।

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अमन रात में परेशान जब घर आता है तो अनुम उसे अपने रूम में लेजाकर उसपे टूट पड़ती है। रज़िया ने अपना बड़ा सा मुँह अनुम के सामने खोल दिया था। अनुम अमन का गिरेबान पकड़कर उससे सवाल करने लगती है जिसका जवाब अमन के पास नहीं था।

अनुम-“आखिर हमारी मोहब्बत में आपको ऐसी कौन सी कमी नजर आई जो आपने सोफी की जिंदगी खराब कर दिया। आपको कोई हक नहीं बनता अमन कि उसके साथ ऐसा करो। अपने ऐसा करके ना सिर्फ़ मेरी बल्की अम्मी की मोहब्बत की भी तौहीन की है। मैं आपको कभी माफ नहीं करूँगी।

अमन-“मुझसे भूल हो गई अनुम, प्लीज़्ज़… समझो। हालात ऐसे थे कि मैं खुद को काबू में नहीं रख पाया…”

अनुम-“अगर ऐसे हालात मेरे साथ पेश आ जाएँ और मैं उस शख्स के साथ वही करूँ जो आपने सोफी के साथ किया तो आपको कैसा लगेगा?

अमन आँखें निकालकर अनुम को देखने लगता है-“खामोश हो जाओ…”

अनुम-“क्यों खुद पे आई तो खामोश हो जाओ और जो मेरे और अम्मी के दिल पे गुजर रही है वो कुछ नहीं ?”

अमन-क्या चाहती हो तुम?

अनुम-“सोफिया की जल्दी से जल्दी शादी और एक वादा मुझसे कि आप आइन्दा ऐसी कोई भी हरकत नहीं करेंगे और अगर करेंगे ना अमन तो मैं आपके सर की कसम खाकर कहती हूँ कि मैं आपके कदमो में अपनी जान दे दूँगी …” वो रो पड़ती है।

और साथ में अमन की आँखों में भी आँसू आ जाते हैं।

अनुम कुछ देर सिसक-सिसक के रोने के बाद अपने रूम में चली जाती है और पीछे छोड़ जाती है अमन के लिए तनहाईयाँ और खामोशियाँ, जिसका सामना अमन को खुद अकेले करना था।

दूसरे दिन सुबह अमन बिना नाश्ता किए फॅक्टरी चला जाता है।

ऐसा नहीं था कि शीबा अमन के इस रवैये से अंजान थी, मगर वो चुप थी। वो जानती थी कि ये खामोशी किसी बड़े तूफान के पहले की है और वो इस तूफान में खुद को शामिल नहीं करना चाहती थी। क्योंकी जो हो रहा था इसमें उसी का फायेदा था।

 
अमन धीरे-धीरे अनुम और रज़िया से दूर होने लगा था।

सोफिया ने रात से कुछ नहीं खाया थी। वो अपने कमरे में बंद रोए जा रही थी और उसके आँसू पोंछने वाला भी इस वक्त कोई नहीं था। उस वक्त एक माँ की ममता उछाल मारती है और रज़िया हाथ में नाश्ते की प्लेट लिए सोफिया के रूम में दाखिल होती है।

रज़िया को देखकर सोफिया अपना मुँह मोड़ लेती है-“चले जाइए यहाँ से अम्मी, मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी…”

रज़िया मैं तुमसे बात करने नहीं आई हूँ , बल्की तुम्हें नाश्ता देने आई हूँ ।

सोफिया रोते भर्राति हुई आवाज़ में-“मुझे नहीं करना नाश्ता, चले जाइए यहाँ से…”

रज़िया-“मैं जानती हूँ तुम इस वक्त किसी की बात नहीं सुनोगी। मगर सोफिया, क्या तुम उस औरत कौ एक बार बात नहीं सुनोगी जिसके कान तुम्हारे मुँह से अम्मी सुनने के लिए तरस गये थे…”

रज़िया सोफिया का हाथ अपने हाथ में थाम लेती है-“मेरी बच्ची एक बार सिर्फ़ एक बार अपनी अम्मी की बात सुन ले। उसके बाद जो तुझे ठीक लगे, तू कर। कोई तुझे कुछ नहीं कहने वाला।

सोफिया आँसू पोंछते हुये-“बोलिए, क्या कहना है आपको?”

रज़िया-“सोफी बेटी , आज मेरी उमर 60 साल से ज्यादा हो चुकी है। मैंने तुझे जनम 40 साल की उमर में दिया। उस उमर में जिस उमर में औरतें नाती-पोत्ते के साथ खेलती हैं। जानती हो क्यों? क्योंकी मुझे तुम्हारे अब्बू से मोहब्बत हो गई थी। उतनी ही जितनी तुम्हें इस वक्त महसूस हो रही है। बेटी मोहब्बत करना गुनाह नहीं है,

मगर उसकी भी एक सीमा होती है। जब वो इंसान क्रॉस करता है तो अंजाम काफी भयानक होते हैं। तुम्हारे अब्बू इस वक्त उमर के उस पड़ाव में है जहाँ वो तुम्हारा हाथ नहीं थाम सकते। तुम्हारे जिंदगी तो अभी शुरू हुई है मेरी बच्ची। तुम जज़्बात से काम लेने के बजाए एक बार अकल से काम लो। सोचो क्या होगा अगर तुम्हारे अब्बू तुम्हारा साथ दे दें। क्या वो तुमसे शादी करेंगे? और करेंगे भी तो क्या तुम अपनी आगे की जिंदगी उनके साथ इसी तरह हँसी-खुशी गुजार पाओगी। तुम अकेली नहीं हो, जीशान है, लुबना है, नग्गो है, क्या सोचेंगे वो और क्या-क्या जवाब दोगी तुम उन सबको? जो तुमसे ये सवाल पूछेंगे कि एक 19 साल की लड़की ने आखिरकार एक 42 साल के मर्द से शादी क्यों की जो उसके अब्बू हैं? सिर्फ़ जज़्बात में आकर? बेटी ये जज़्बात कुछ वक्त के लिए होते हैं। मैं आज हूँ कल नहीं रहूंगी । और अगर खुदा-ना-ख़ास्ता अमन कुछ सालों बाद नहीं रहे, तो ये जिंदगी किसके साथ गुजारोगी? जो हुआ सो हुआ। मैं तुम्हारी अम्मी होने के नाते, तुमसे बस इतना कहना चाहती हूँ कि बस एक बार तुम ठंडे दिमाग़ से सोचो…” रज़िया सोफिया के सर पे हाथ फेरते हुये वहाँ से चली जाती है।

आसान नहीं होता उस माँ के लिए जो खुद गुनाह के दलदल में सर तक धँस चुकी हो और अपनी बेटी को सच्चाई का पाठ पढ़ाना चाहती हो।

जहाँ सोफिया अपने उमड़ते जज़्बातों को एक तरफ रख कर रज़िया की बात पे गौर कर रही थी।

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वहीं समर कैम्प में जीशान और लुबना के बीच एक समझौता सा हो गया था। वो दोनों अब अपने-अपने दोस्तों के साथ रहने लगे थे। दोनों के बीच बातचीत बंद हो गई थी। मगर आँखों की बातें भला कौन बंद कर सकता था।

जीशान रूबी के साथ एक बेंच पे बैठा हुआ था और लुबना अपनी सहेली के साथ प्रकृति की बातें कर रही थी। मगर बार-बार वो उचटती निगाह से जीशान को देख ही लेती थी।

ये बात जीशान भी अच्छी तरह जानता था। जीशान रूबी को अपनी गोद में बैठने के लिए कहता है।

रूबी-“मुझे शर्म आती है, बेशर्म…”

जीशान-“जब प्यार करती हो तो डरती क्यों हो। चलो बैठ जाओ…”

रूबी जीशान की आँखों में देखते हुये जीशान की गोद में बैठ जाती है और जीशान लुबना की तरफ देखते हुये अपने दोनों हाथ रूबी के पेट पे कस लेता है।

रूबी-“क्या बात है जी, आज बड़े रोमांटिक मूड में लग रहे हो?”

जीशान-“वो तो मैं हमेशा से रहता हूँ । आज मौसम भी खुशगवार है और पास में जब जन्नत की हूर बैठी हो तो मूड कैसे रंगीन ना हो?”

रूबी जीशान के गाल को काटती हुई-“अच्छा जी…”

जीशान-हाँ जी।

लुबना की सहेली नरगिस लुबना को इशारे से सामने का नजारा दिखाती है जिसपे लुबना की तो पहले से नजर थी। नरगिस बोल -“लुबु, वो रूबी है ना देख कैसे जीशान की गोद में बैठी है?”

लुबना-“देख रही हूँ । जब सामने वाला बैठाने को तैयार है तो वो क्यों ना बैठेगी? चल यहाँ से कहीं और जाकर बैठते हैं…”

वो दोनों जीशान और रूबी की नजरों से दूर चले जाते हैं।

जीशान-“रूबी तुम यहीं बैठो, मैं तुम्हारे लिए कोल्ड-ड्रिंक्स लेकर आता हूँ …”

रूबी-ठीक है जल्दी आना।

जीशान-बस अभी गया और अभी आया।

तभी वहाँ जीशान का दोस्त काशिफ आता है-“अरे जीशान तुम यहाँ हो? चल वहाँ सर ने अंताक्षरी शुरू कर दिया है। चल चल बहुत मजा आएगा…”

जीशान रूबी की तरफ देखता है और जीशान रूबी का हाथ पकड़कर काशिफ के पीछे-पीछे चल देता है। 20 से 25 लड़के लड़कियाँ ग्रुप में बैठे हुये थे और एक तरह से बाल पासिंग गेम शुरू था। मोबाइल में एक लड़का म्यूजिक बजाता था और एक-एक करके बाल एक से दूसरे के पास, पास किया जाता था। जब म्यूजिक बंद हो जाती तो जिस किसी के पास वो बाल होती, उसे कोई हिन्दी फिल्म का गाना या कोई गजल या जो भी वो सुना सकता था। उसे ग्रुप में लुबना अपनी सहेली के साथ बैठी हुई थी।

काशिफ रूबी और जीशान को भी वहीं बैठा देता है और खेल शुरू हो जाता है।

एक-एक करके सभी के पास बाल आती जाती है। जब रूबी के पास बाल रुकती है तो वो घबरा जाती है।

रूबी-“मुझे कुछ नहीं आता मैं क्या सुनाऊूँ?”

जीशान उसका हाथ पकड़कर-“कोई अच्छा सा गाना सुना दो…”

रूबी हँस पड़ती है, अपना गला ठीक करके वो गाने लगती है-

कितना प्यार तुम्हें करते हैं आज हमें मालूम हुआ,

जीते नहीं तुमपे मरते हैं आज हमें मालूम हुआ।

कुछ देर बाद जीशान के हाथ में बाल रुकती है। जीशान आह तो सुनिए दोस्तों। ये गाना डेडिकेटेड है मिस रूबी को-

तोड़ा सा प्यार हुआ है थोड़ा है बाकी,

तोड़ा सा प्यार हुआ है थोड़ा है बाकी,

हम तो दिल दे ही चुके बस तेरी हाँ है बाकी।

जीशान के सभी दोस्त तालिया बजाने लगते हैं।

उसके बाद बाल आकर रुकती है लुबना के हाथ में।

वो कुछ भी सुनाना नहीं चाहती थी। मगर जब जीशान को रूबी के साथ हँसते खिलखिलाते देखती है तो उसके दिल पे साँप रेगने लगता है। लुबना बोली -“ये शेर मैं डेडिकेटेड करना चाहती हूँ उस इंसान को जिससे मैं बेपनाह मोहब्बत करती हूँ –

दर्द बनकर जिगर में छुपा कौन है? दर्द बनकर जिगर में छुपा कौन है?

मुझमें रह-रहकर ये चीखता कौन है? मुझमें रह-रहकर ये चीखता कौन है?

हम किनारे पे बैठे रहे उमर भर, हम किनारे पे बैठे रहे उमर भर

ये भीतर में उतरता हुआ कौन है?

दर्द बनाकर जिगर में छुपा कौन है?

तू ना समझे कभी मेरी दिल की जुबान,

तू ना समझे कभी मेरी दिल की जुबान

के तुझको मेरी तरह चाहता कौन है?

दर्द बनाकर जिगर में छुपा कौन है।

कहते हैं एक शहीद का खून जमीन पे गिरने से पहले उसे जन्नत मिल जाती है। उसी तरह एक सच्ची मोहब्बत करने वाले के आँसू जब जमीन पे गिरते हैं, तो सातों आसमानों तक उसके दिल की आवाज़ जाती है।

वहाँ तक उस वक्त लुबना की आवाज़ गई थी या नहीं ? मगर उस वक्त वहाँ बैठे सभी लोगों के दिल लरज कर रह गये थे और ख़ासकर जीशान का।

जीशान रूबी का हाथ पकड़कर उसे अपने रूम में ले जाता है।

रूबी-“ऊऊचह जीशान ये लुबना की प्राब्लम क्या है? वो किससे प्यार करती है? और क्यों इस तरह बिहेवियर कर रही है?

इससे पहले जीशान रूबी को कुछ कहता उसे लुबना उन्हीं की तरफ आती दिखाई देती है।

जीशान-रूबी, मुझसे प्यार करती हो ना?

रूबी-हाँ बहुत।

जीशान- अपनी आँखें बंद करो।

रूबी-पर क्यूँ ?

जीशान-जैसा मैंने कहा वैसे करो?

रूबी के आँखें बंद करते ही और लुबना के दरवाजे के पास पहुँचते ही जीशान अपने होंठ रूबी के होंठों पे रख देता है। जीशान रूबी को चूम लेता है।

और लुबना के पैर वहीं रुक जाते है।

जहाँ रूबी की आँखों में खुशी के मारे आँसू निकल आते हैं, वही लुबना की पलकों से दर्द के आँसू छलक जाते हैं। वो अपनें आँखें दुपट्टे से पोंछते हुये अपने कमरे में चली जाती है और जीशान उसी वक्त अपने होंठों की गिरफ़्त से रूबी के होंठों को आजाद कर देता है।

रूबी की आँखों में सवाल उमड़ आता है-“क्या हुआ?”

जीशान-मैं अभी आता हूँ रूबी।

 
जहाँ रूबी की आँखों में खुशी के मारे आँसू निकल आते हैं, वही लुबना की पलकों से दर्द के आँसू छलक जाते हैं। वो अपनें आँखें दुपट्टे से पोंछते हुये अपने कमरे में चली जाती है और जीशान उसी वक्त अपने होंठों की गिरफ़्त से रूबी के होंठों को आजाद कर देता है।

रूबी की आँखों में सवाल उमड़ आता है-“क्या हुआ?”

जीशान-मैं अभी आता हूँ रूबी।

रूबी-ठीक है जल्दी आना।

जीशान ने लुबना की आँखों में आँसू देख लिए थे और उसका दिल अंदर तक लरज गया था। आखिरकार लुबना थी तो उसकी बहन ही । अपनी बहन को फूलों की तरह संभाल के रखने वाला, अपनी बहन की ख्वाहिश को उसकी जीभ से निकलने से पहले पूरा कर देने वाले जीशान को अपनी बहन लुबना से बेहद मोहब्बत थी। मगर ये मोहब्बत वो नहीं थी जो लुबना जीशान से कर बैठी थी।

लुबना अपने रूम में बेड पे उल्टी लेटी जारों से रोए जा रही थी। वो जीशान की मार सह सकती थी, उसकी डाँट फटकार भी चुपचाप सह जाती मगर अपने जीशान को किसी और की बाहो में इस तरह से देखकर उसका दिल बेजान सा हो गया था।

जीशान लुबना के पास आकर बैठ जाता है। बस एक पल के लिए भीगी पलकों से लुबना जीशान को देखती है और अगले ही पल तकिये में अपना चेहरा छुपा लेती है।

जीशान लुबना के सर पे हाथ रख कर उसे कुछ कहने के लिए मुँह खोलता ह है कि लुबना चीख पड़ती है-“भाई आप यहाँ से चले जाए। अगर आप मुझे समझाने आए हैं तो प्लीज़्ज़… मैं इस वक्त आपसे बात नहीं करना चाहती। मुझे समझाने की कोशिश भी मत कीजिए आप। ये मत समझियेगा कि आप जो मेरे सामने रूबी के साथ कर रहे हैं, वो देखकर मैं अपना फैसला बदल दूँगी । नहीं इससे मेरा हौसला और बढ़ेगा। मेरे दिल में आपके लिए मोहब्बत और गहरी होती जाएगी। मेरे आँसुओं पे मत जाइएगा आप… ये मोहब्बत के आँसू हैं, जितना ये बाहर निकलेंगे उतना आप मेरे दिल के करीब होते जाएँगे…”

जीशान-“हम कल सुबह घर जा रहे हैं, और वहाँ ये बात तुम अम्मी अब्बू के सामने कहना…”

लुबना जीशान का गिरेबान पकड़ लेती है-मुझे धमका रहे हैं आप? अम्मी अब्बू क्या, आप कहो तो अभी बाहर जाकर सबके सामने कह दूँ कि मैं आपसे बेपनाह मोहब्बत करती हूँ …”

जीशान लुबना के लाल होते गालों को एक जोरदार थप्पड़ से और लाल कर देता है।

लुबना रोते-रोते हँस पड़ती है-शुक्रिया।

जीशान-“देख लुबु, मैं तुझे आख़िरी बार विनती कर रहा हूँ अगर…”

लुबना-“अगर मगर छोड़िए जीशान । अब मेरी बात सुनिए, दुबारा उसके आस-पास भी आप नजर आए ना तो। तीन लाशें गिरेन्गी यहाँ, पहले रूबी की, दूसरी आपकी और तीसरी मेरी । आप दोनों को जान से मारने के बाद खुद भी जान दे दूँगी मैं। समझे आप?”

जीशान की तो जैसे हवा टाइट हो जाती है। वो लुबना को एक भोली - भाली मासूम सी लड़की समझ रहा था। मगर लुबना तो किसी गुंडे मवाली की तरह बात कर रही थी। सबसे ज्यादा डर जीशान को लुबना की आँखें देखकर उस वक्त महसूस हो रहा था। कुछ लोग सिर्फ़ धमकियाँ देते हैं और कुछ जो अपनी बात के पक्के होते हैं।

उनकी आँखों में वो चमक, वो जोश वो, जलजला भी दिखाई देता है जो जीशान को उस वक्त लुबना की आँखों में नजर आ रहा था।

जीशान लुबना के बाल पकड़कर उसकी गर्दन दबा देता है-“मुझे मारेगी तू ? मुझे…”

लुबना-“मोहब्बत करती हूँ आपसे। या तो आपको पाकर रहूंगी या आपके साथ दुनियाँ से चली जाउन्गी…”

जीशान उसे देखता रह जाता है। जीशान के हर सवाल जा मुँहतोड़ जवाब लुबना के पास था। अपना सामन पैक करके रखो, हम कल सुबह ही यहाँ से चले जाएँगे। बहुत सुन लिया मैंने तुम्हारी पागलपन की बातें। बस, अब और नहीं लुबु…”

लुबना कुछ कहने ही वाली होती है कि जीशान उसे एक और थप्पड़ मारकर बिस्तर पे गिरा देता है और लुबना अपने आँसुओं से तकिया भिगोति चली जाती है।

जीशान लुबना के रूम से बाहर निकल आता है। उसे उस वक्त लुबना पे बहुत गुस्सा भी आ रहा था और उसकी इस तरह की बातों पे हँसी भी।

रूबी-क्या बात है बड़े उखड़े-उखड़े से नजर आ रहे हैं जनाब?

जीशानरूबी के आवाज़ पे पीछे पलटकर देखता है।

रूबी अपने दोनों हाथ जीशान के गले में डाल देती है-“कल हम यहाँ से जा रहे हैं…”

जीशान-“हाँ, सुबह 8:00 बजे…”

रूबी-“मेरे रूम में जो लड़की मेरे साथ रूम शेयर कर रही थी ना… वो अपने बायफ्रेंड के साथ रोज रात को पता नहीं कहाँ चली जाती है और सुबह-सुबह वापस रूम में आती है। मुझे अकेले में बहुत डर लगता है जीशान…”

जीशान हँस देता है-तो आप क्या चाहती हैं?

रूबी-“क्या तुम कुछ देर के लिए मुझे कंपनी देने रूम में आ सकते हो? सिर्फ़ बातें करेंगे…”

जीशान-सिर्फ़ बातें करने?

रूबी-हाँ, सिर्फ़ बातें करने।

जीशान-“तो मैं नहीं आने वाला हाहाहाहा…”

रूबी-“ओह्ह… तुम बहुत बदमाश हो, सच में…”

***** *****

इधर अमन विला में हालत बहुत नाजुक बनी हुई थी।

अमन सुबह फॅक्टरी चला जाता। रात में आकर अपने रूम में सोने के बजाए हाल में ही सो जाता। ना रज़िया उससे ठीक से बात कर रही थी और ना अनुम।

शीबा इन सब में तमाशाई का रोल निभा रही थी। एक समझदार बीवी की तरह उसने कभी भी अमन से ये नहीं पूछा कि वो आखिर इतना परेशान सा क्यों दिखाई दे रहा है? उसके हाल में सोने से भी शीबा को कोई मतलब नहीं था, वो बस जीशान के घर आने के दिन गिन रही थी।

रज़िया अपने रूम में अनुम के साथ बैठी हुई थी-“अम्मी आपको पता है ये ठीक से खाना भी नहीं खा रहे हैं और कल रात तो मुझे हाल में सोए नजर आए…”

रज़िया-मेरी एक बात मानेगी?

अनुम-जी अम्मी बोलिए ना।

रज़िया-“अमन को बिखरने से पहले संभाल ले। वो अपनी गलती के लिए खुद को सजा दे रहा है वो बहुत जिद्दी है हमेशा से। मुझे तो डर है कि कहीं कुछ???”

अनुम-“नहीं नहीं अम्मी ऐसा ना कहें…”

रज़िया-“एक बीबी का फर्ज़ निभाओ। अनुम इस वक्त उसे सबसे ज्यादा तुम्हारी ज़रूरत है। उसे प्यार दो और उसके सारे गम समेट लो अपने दामन में। उसे ये महसूस मत होने दो कि तुम उसकी उस भूल से खफा हो। सच कहूँ तो हम सब गुनहगार हैं। मैं अमन को माफ कर चुकी हूँ , तुम भी कर दो। और जाओ उसके पास इससे पहले कि…”

अनुम रज़िया के मुँह पे हाथ रख देती है और बिना कुछ कहे अमन के रूम में चली जाती है। उसे अमन रूम में नहीं दिखाई देता तो वो अपने कमरे में जाने लगती है। तभी उसे अमन बालकनी में खड़ा दिखाई देता है। अनुम उसके पास आकर खड़ी हो जाती है-“क्या आज यहीं सोने का इरादा है आपका? चलिये रूम में…”

अमन अनुम की तरफ हैरत भर निगाह से देखने लगता है। अनुम ऐसे विहेब कर रही थी जैसे कुछ हुआ ही ना हो। आखिरकार अनुम अपने अमन को उस शिद्दत से प्यार करती थी, जितनी रज़िया और शीबा भी ना कर पाये थी उसे।

अमन-“सोफिया ने खाना खाया?”

अनुम-“हाँ अम्मी ने उसे खिलाकर सुला दिया…”

अमन-“और तुमने?”

अनुम-“लो, तो क्या मैं भूखी रहूँ? ऐसा कौन सा जलजला आ गया है जो मैं खाना पीना छोड़ दूँ ?”

अमन अनुम का हाथ पकड़कर उसे अपने गले से लगा लेता है-“ बेशक तू खुद को कितना भी नॉर्मल दिखाने के कोशिश कर ले, मगर तू जब तक मुझसे आँखें मिलाकर बात नहीं करती ना… मैं समझ जाता हूँ तेरे दिल में क्या है और होंठों पे क्या?”

अनुम-“मुझे माफ कर दीजिए अमन। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं अपने शौहर से बात करना कैसे बंद कर सकती हूँ । आज दो दिन हो गये, आपसे बात नहीं हुई तो ऐसा लग रहा था जैसे मुझमें जान ही नहीं रही …”

अमन-“मुझे भी ऐसे ही महसूस हो रहा था अनुम…”

अनुम-“जान , मुझे अपनी छाती से लगाकर अपने आगोश में ले लीजिये ना…”

अमन अपनी सबसे प्यार बीवी को गाल पे चूम लेता है।

अनुम-“चलिये अपनी बीवी को प्यार करिये ना…”

अमन अनुम को चूमते हुये उसे उसके रूम में ले जाता है और रूम लाक कर देता है।

अनुम अमन को बिस्तर पे धक्का देकर गिरा देती है और उसका पैंट नीचे खींच लेती है।

अमन-“अरे बाबा, थोड़ा सबर…”

अनुम-“नहीं होता मुझसे। दो दिन से भूखी हूँ । खाना मत दो मुझे तो चलेगा। मगर इससे दूर नहीं रह सकती मैं गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन अनुम कि नाइटी उसके जिस्म से अलग कर देता है। अनुम अमन की आँखों में देखते हुये उसके लण्ड को अपने मुँह में लेकर चूसती चली जाती है। अमन दोनों हाथों से अनुम का सर पकड़कर उसे अपने लण्ड पे आगे पीछे करने लगता है। अनुम कुछ देर और उसे चूसना चाहती थी मगर अमन अनुम को लेटा देता है और अपनी जीभ को उसकी मखमली चूत पे लगा देता है।

 


अनुम-“अह्ह… जान अह्ह… अम्मी अम्मी अह्ह… काटो मत ना जीईई अह्ह…”

अमन जब भी अनुम की चूत चाटता था वो उसके क्लोटॉरिस को अपने दाँत में पकड़ने की कोशिश करता था और इसी चक्कर में वो उसे काटता चला जाता, जिससे अनुम की चूत के दोनों होंठ जोर-जोर से दहलने लगते थे और वो झट से चुदाई के लिए तैयार हो जाती थी।

अनुम-“अह्ह… मत चूसो ना…”

अमन-“तो क्या करूँ? गलप्प्प…”

अनुम-“चोदो ना… मुझसे रहा नहीं जा रहा है जान …”

अमन मुस्कुराता हुआ अनुम के दोनों पैरोँ को खोल देता है और अपने लण्ड पे उसकी चूत का पानी लगाकर उसे अंदर पेल देता है। जब भी अमन का लण्ड अनुम की चूत में जाता, अनुम को अपनी पहले चुदाई याद दिला जाता था। वो अपने आँखें बंद कर लेती और उसी दिन को याद करती हुई अपने कमर को ऊपर-नीचे उछालने लगती।

अमन उमर के इस पड़ाओ में भी अनुम को किसी चीज की कमी नहीं महसूस होने देता। वो अभी भी उसी जोश के साथ रज़िया और खास तौर पे अनुम को चोदता था। अनुम अपने दोनों पैरों को अमन के कंधे पे रख देती है और अमन खड़े-खड़े अपने लण्ड को अनुम की चूत की गहराईयों में उतारता चला जाता है। यहाँ अमन विला में एक शौहर अपने बीवी के साथ खुश था।

***** *****और उधर समर कैम्प में।

जीशान अपने रूम से चुपचाप निकलकर रूबी के रूम में चला जाता है। रूबी उस वक्त आईने के सामने खड़ी बाल सँवार रही थी।

जीशान रूम में आकर दरवाजा बंद कर लेता है-“लो आ गया, मैं तुमसे बातें करने…”

रूबी-“मैंने आपको बातें करने नहीं बुलाया?”

जीशान-तो फिर किसलिए?

रूबी जीशान के करीब आती है और अपने जिस्म पे से नाइटी को खोलकर नीचे गिरा देती है। साफ शफ्फाक जिस्म जो रात के अंधेरे में भी जुगुनू की तरह चमक रहा था। जीशान की आँखों के सामने आ जाता है। रूबी सिर्फ़ पैंटी में खड़ी थी।

जीशान-ये सब क्या है रूबी?

रूबी-“मेरा पूरा जिस्म अकड़ सा गया है। यहाँ ठीक से नींद भी नहीं हो पा रही है। क्या आप तेल से जरा मेरा मसाज कर देंगे?”

जीशान दिल में सोचने लगता है-“नेकी और पूछ पूछ?” फिर कहता है-“मैं… पर मुझे तो मसाज नहीं आता…” वो बोल रूबी को रहा था मगर आँखें पैंटी के अंदर किसी और चीज को तलाश कर रही थीं…”

रूबी-“हर काम इंसान पहली बार ही करता है और फिर धीरे-धीरे सीख जाता है…”

जीशान रूबी का हाथ पकड़कर खुद से सटा लेता है-“आज तुम बहुत बदली - बदली सी लग रही हो जानेमन…”

रूबी जीशान के होंठों को हल्के से चूम लेती है-अच्छा तो इरादा क्या है आपका?

जीशान-“फिलहाल तो आपका मसाज किए देते हैं…”

रूबी अपने कमर मटकाते हुई एक तौलिया बिछाकर उसपे लेट जाती है। चूत तो हर लड़की की बाली उमर से ही लण्ड के ख्वाब देखने लगती है। और अगर लड़की अपनी ही अम्मी को अपने बायफ्रेंड से गाण्ड उछाल-उछालकर चुदती हुई देख ले तो उसकी चूत में पानी नहीं रुकता, वो बहता रहता है।

रूबी लेट जाती है।

जीशान तेल की बोतल उठाकर तेल रूबी की पीठ पे डाल देता है। और पीठ से लेकर पैरों तक का मसाज करने लगता है।

रूबी-“तुम तो कह रहे थे तुम्हें नहीं आता ये सब…”

जीशान-“सीख रहा हूँ ना… वैसे तुम्हारी स्किन बहुत साफ्ट है…”

रूबी-“बिल्कुल मेरी अम्मी की तरह…”

जीशान-क्याआअ?

रूबी-“उम्ह्ह… मेरी स्किन मेरी अम्मी की तरह है ये कह रही हूँ …”

जीशान रूबी की पैंटी को निकालने लगता है।

रूबी-“ईई क्या कर रहे हो जीशान ?”

जीशान-“तेल लग जाएगा उसे…”

रूबी-“हुन्नने्…” वो अपनी कमर को थोड़ा सा ऊपर उठाती है और जीशान पैंटी को खींच लेता है।

इस बार जीशान ढेर सारा तेल रूबी के जिस्म पे डाल देता है जिससे उसकी पूरी पीठ तेल सी गील हो जाती है। और जीशान के हाथ फिसलने लगते हैं।

रूबी-“मेरी कमर में भी बहुत दर्द है जीशान…”

जीशान-यहाँ?

रूबी-“हाँने् वहीं पे अह्ह…”

जीशान दोनों हाथों से रूबी की कमर को मसलकर रख देता है। उसके तेल से भीगे हाथ रूबी की गाण्ड के सुराख को छूने लगते हैं। रूबी ने दोनों पैर एक दूसरे से चिपका के रखे थे, जिससे जीशान को उसकी चूत अब तक नहीं दिखी थी।

जीशान-“तुम सीधी लेट जाओ…”

रूबी सीधी लेट जाती है और जीशान पेट पे, छाती पे और जाँघ पे तेल डालकर मलने लगता है। जीशान अपने आपको बड़े मुश्किल से कंट्रोल कर रहा था। जब उसके सबर का बाँध टूटने लगता है तो वो मालिश बंद कर देता है।

रूबी-क्या हुआ?

जीशान-कुछ नहीं ।

रूबी-“तो रुक क्यों गये? करो ना… मालिश मुझे अच्छी लगने लगी थी और तुम रुक गये…”

जीशान तेल सीधा रूबी की चुची पे डाल देता है और दोनों हाथों से उसकी चुची को मसलने लगता है। वो समझ चुका था कि रूबी क्या चाहती है। वो तो बस लुबना को लेकर परेशान था। मगर अब लुबना उसके दिमाग़ से निकल चुकी थी और उसे किसी भी तरह रूबी की चूत देखने थी और उसे लेना भी था।

जीशान चुची इतने जोर से मसलने लगता है कि रूबी खुद को काबू में नहीं रख पाती और वो भी जीशान के हाथों के ऊपर अपने हाथ रख कर उसे दबाने लगती है।

रूबी-“उम्ह्ह… ऐसे ही अह्ह… अम्मी जीईई…”

जीशान रूबी की दोनों टाँगों को खोलकर एक दूसरे से अलग कर देता है और पहली बार उसे वो नाजुक सी चूत नजर आती है जो बंद थी। रूबी आँखें बंद कर लेती है। जीशान के हाथ अब रूबी की कुँवारी चूत को छूने लगते हैं और इससे पहले किसी ने उसे इस तरह नहीं छुआ था। जीशान का लण्ड खड़ा तो नहीं हुआ था मगर वो उसे पैंट में परेशान ज़रूर कर रहा था। वो अपने पैंट की जिप खोल देता है और उसे बाहर निकाल देता है।

जैसे ही रूबी आँखें खोलती है उसकी आँखों के सामने वो लटका हुआ बड़ा सा औजार आ जाता है। रूबी चिल्लाती है-“अम्मीईई…” उसने कभी अपनी आँखों के इतने करीब इतना बड़ा लण्ड नहीं देखा था, उसकी चीख निकलना लाजमी था।

जीशान रूबी की आँखों में देखने लगता है और रूबी की आँखों में उतरी हुई हवस उसे लण्ड पकड़ने पे मजबूर कर देती है। जीशान खुद को आगे सरकाता है, जिससे उसका लण्ड सीधा रूबी के मुँह के पास आ जाता है। रूबी जीशान का इशारा समझ जाती है। आँखों आँखों में कही गई ये बात हकीकत का रूप ले लेती है। जीशान अपना पैंट खोलकर जैसे ही नीचे गिराता है, रूबी जीशान के लण्ड को चूमती हुई उसे अपने मुँह में लेकर चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

 
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