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अलंकार

जब तक वह बोलता रहा, उसकी आंखों से ज्वालासी निकल रही थी। ऐसा जान पड़ता था कि उसके मुख से आग के अंगारे बरस रहे हैं। जो लोग वहां खड़े थे, इच्छा न रहने पर भी मन्त्र मुग्ध से खड़े उसकी बातें सुन रहे थे।

किन्तु वह वृद्ध व्यापारी ऊधम मचाने में अत्यन्त परवीण था। वह अब भी शांत न हुआ। उसने जमीन से पत्थर के टुकड़े और घोंघे चुन लिये और अपने कुरते के दामन में छिपा लिये, किन्तु स्वयं उन्हें फेंकने का साहस न करके उसने वह सब चीजें भिक्षुकों के हाथों में दे दीं। फिर क्या था ? पत्थरों की वर्षा होने लगी और एक घोंघा पापनाशी के चेहरे पर ऐसा आकर बैठा कि घाव हो गया। रक्त की धारा पापनाशी के चेहरे पर बहबहकर त्यागिनी थायस के सिर पर टपकने लगी, मानो उसे रक्त के बपतिस्मा से पुनः संस्कृत किया जा रहा था। थायस को योगी ने इतनी जोर से भींच लिया था कि उसका दम घुट रहा था और योगी के खुरखुरे वस्त्र से उसका कोमल शरीर छिला जाता था। इस असमंजस में पड़े हुए, घृणा और त्र्कोध से उसका मुख लाल हो रहा था।

इतने में एक मनुष्य भड़कीले वस्त्र पहने, जंगली फूलों की एक माला सिर पर लपेटे भीड़ को हटाता हुआ आया और चिल्लाकर बोला-’ठहरो, ठहरो, यह उत्पात क्यों मचा रहे हो ? यह योगी मेरा भाई है।’

यह निसियास था, जो वृद्ध यूत्र्कसइटीज कसे कबर में सुलाकर इस मैदान में होता हुआ घर लौटा जा रहा था। देखा तो अलाव जल रहा है, उसमें भांतिभांति की बहुमूल्य वस्तुएं पड़ी सुलग रही हैं, थायस एक मोटी चादर ओ़े खड़ी है और पापनाशी पर चारों ओर से पत्थरों की बौछार हो रही है। वह यह दृश्य देखकर विस्मित तो नहीं हुआ, वह आवेशों से वशीभूत न होता था। हां, ठिठक गया और पापनाशी को इस आत्र्कमण से बचाने की चेष्टा करने लगा।

उसने फिर कहा-’मैं मना कर रहा हूं, ठहरो, पत्थर न फेंको। यह योगी मेरा पिरय सहपाठी है। मेरे पिरय मित्र पापनाशी पर अत्याचार मत करो।’

किन्तु उसकी ललकार का कुछ असर न हुआ। जो पुरुष नैयायिकों के साथ बैठा हुआ बाल की खाल निकालने ही में कुशल हो, उसमें वह नेतृत्वशक्ति कहां जिसके सामने जनता के सिर झुक जाते हैं। पत्थरों और घोघों की दूसरी बौछार पड़ी, किन्तु पापनाशी थायस को अपनी देह से रक्षित किये हुए पत्थरों की चोटें खाता था और ईश्वर को धन्यवाद देता था जिसकी दयादृष्टि उनके घावों पर मरहम रखती हुई जान पड़ती थी। निसियास ने जब देखा कि यहां मेरी कोई नहीं सुनता और मन में यह समझकर कि मैं अपने मित्र की रक्षा न तो बल से कर सकता हूं न वाक्चातुरी से, उसने सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया। (यद्यपि ईश्वर पर उसे अणुमात्र भी विश्वास न था।) सहसा उसे एक उपाय सूझा। इन पराणियों को वह इतना नीच समझता था कि उसे अपने उपाय की सफलता पर जरा भी सन्देह न रहा। उसने तुरन्त अपनी थैली निकाल ली, जिसमें रुपये और अशर्फियां भरी हुई थीं। वह बड़ा उदार, विलासपरेमी पुरुष था, और उन मनुष्यों के समीप जाकर जो पत्थर फेंक रहे थे, उनके कानों के पास मुद्राओं को उसने खनखनाया। पहले तो वे उससे इतने झल्लाये हुए थे, लेकिन शीघर ही सोने की झंकार ने उन्हें लुब्ध कर दिया, उनके हाथ नीचे को लटक गये। निसियास ने जब देखा कि उपद्रवकारी उसकी ओर आकर्षित हो गए तो उसने कुछ रुपये और मोहरें उनकी ओर फेंक दीं। उनमें से जो ज्यादा लोभी परकृति के थे, वह झुकझुककर उन्हें चुनने लगे। निसियास अपनी सफलता पर परसन्न होकर मुट्ठियां भरभर रुपये आदि इधरउधर फेंकने लगा। पक्की जमीन पर अशर्फियों के खनकने की आवाज सुनकर पापनाशी के शत्रुओं का दल भूमि पर सिजदे करने लगा। भिक्षु गुलाम छोटेमोटे दुकानदार, सबके-सब रुपये लूटने के लिए आपस में धींगामुश्ती करने लगे और सिरोन तथा अन्य भद्रसमाज के पराणी देर से यह तमाशा देखते थे और हंसतेहंसते लोट जाते थे। स्वयं सिरोन का त्र्कोध शान्त हो गया। उसके मित्रों ने लूटने वाले परतिद्वन्द्वियां को भड़काना शुरू किया मानो पशुओं को लड़ा रहे हों। कोई कहता था, अब की यह बाजी मारेगा, इस पर शर्त बदता हूं, कोई किसी दूसरे योद्घा का पक्ष लेता था, और दोनों परतिपक्षियों में सैकड़ों की हारजीत हो जाती थी। एक बिना टांगों वाले पंगुल ने जब एक मोहर पायी तो उसके साहस पर तालियां बजने लगीं। यहां तक कि सबने उस पर फूल बरसाये। रुपये लुटाने का तमाशा देखतेदेखते यह युवक वृन्द इतने खुश हुए कि स्वयं लुटाने लगे और एक क्षण में समस्त मैदान में सिवाय पीठों के उठने और गिरने के और कुछ दिखाई ही न देता था, मानो समुद्र की तरंगें चांदीसोने के सिक्कों के तूफान से आन्दोलित हो रही हों। पापनाशी को किसी की सुध ही न रही।

तब निसियास उसके पास लपककर गया, उसने अपने लबादे में छिपा लिया और थायस को उसके साथ एक पास की गली में खींच ले गया जहां विद्रोहियों से उनका गला छूटा। कुछ देर तक तो वह चुपचाप दौड़े, लेकिन जब उन्हें मालूम हो गया कि हम काफी दूर निकल आये और इधर कोई हमारा पीछा करने न आयेगा तो उन्होंने दौड़ना छोड़ दिया। निसियास ने परिहासपूर्ण स्वर में कहा-’लीला समाप्त हो गयी। अभिनय का अंत हो गया। थायस अब नहीं रुक सकती। वह अपने उद्घारकर्ता के साथ अवश्य जायेगी, चाहे वह उसे जहां ले जाये।’

थायस ने उत्तर दिया-’हां, निसियास, तुम्हारा कथन सर्वथा निमूर्ल नहीं है। मैं तुम जैसे मनुष्यों के साथ रहतेरहते तंग आ गयी हूं, जो सुगन्ध से बसे, विलास में डूबे हुए, सहृदय आत्मसेवी पराणी हैं। जो कुछ मैंने अनुभव किया है, उससे मुझे इतनी घृणा हो गई है कि अब मैं अज्ञात आनन्द की खोज में जा रही हूं। मैंने उस सुख को देखा है जो वास्तव में सुख नहीं था, और मुझे एक गुरु मिला है जो बतलाता है कि दुःख और शोक ही में सच्चा आनन्द है। मेरा उस पर विश्वास है क्योंकि उसे सत्य का ज्ञान है।’

निसियास ने मुस्कराते हुए कहा-’और पिरये, मुझे तो सम्पूर्ण सत्यों का ज्ञान पराप्त है। वह केवल एक ही सत्य का ज्ञाता है, मैं सभी सत्यों का ज्ञाता हूं। इस दृष्टि से तो मेरा पद उसके पद से कहीं ऊंचा है, लेकिन सच पूछो तो इससे न कुछ गौरव पराप्त होता है, न कुछ आनन्द।’

तब यह देखकर कि पापनाशी मेरी ओर तापमय नेत्रों से ताक रहा है, उसने सम्बोधित करके कहा-’पिरय मित्र पापनाशी, यह मत सोचो कि मैं तुम्हें निरा बुद्घू, पाखण्डी या अन्धविश्वासी समझता हूं। यदि मैं अपने जीवन की तुम्हारे जीवन से तुलना करुं, तो मैं स्वयं निश्चय न कर सकूंगा कि कौन श्रेष्ठ है। मैं अभी यहां से जाकर स्नान करुंगा, दासों ने पानी तैयार कर रखा होगा, तब उत्तम वस्त्र पहनकर एक तीतर के डैनों का नाश्ता करुंगा, और आनन्द से पलंग पर लेटकर कोई कहानी पू़ंगा या किसी दार्शनिक के विचारों का आस्वादन करुंगा। यद्यपि ऐसी कहानियां बहुत पॄ चुका हूं और दार्शनिकों के विचारों में भी कोई मौलिकता या नवीनता नहीं रही। तुम अपनी कुटी में लौटकर जाओगे और वहां किसी सिधाये हुए ऊंट की भांति झुंककर कुछ जुगालीसी करोगे, कदाचित कोई एक हजार बार के चबाये हुए शब्दाडम्बर को फिर से चबाओगे, और सन्ध्या समय बिना बघारी हुई भाजी खाकर जमीन पर लेटे रहोगे। किन्तु बन्धुवर, यद्यपि हमारे और तुम्हारे मार्ग पृथक है, यद्यपि हमारे ओर तुम्हारे कार्यत्र्कम में बड़ा अन्तर दिखाई पड़ता है, लेकिन वास्तव में हम दोनों एक ही मनोभाव के अधीर कार्य कर रहे हैं-वही जो समस्त मानव कृत्यों का एकमात्र कारण है। हम सभी सुख के इच्छुक हैं, सभी एक ही लक्ष्य पर पहुंचना चाहते हैं। सभी का अभीष्ट एक ही है-आनन्द, अपराप्त आनन्द, असम्भव आनन्द। यही मेरी मूर्खता होगी अगर में कहूं कि तुम गलती पर हो यद्यपि मेरा विचार है कि मैं सत्य पर हूं।

‘और पिरये थायस, तुमसे भी मैं यही कहूंगा कि जाओ और अपनी जिन्दगी के मजे उठाओ, और यदि यह बात असम्भव न हो, तो त्याग और तपस्या में उससे अधिक आनन्दलाभ करो जितना तुमने भोग और विलास में किया है। सभी बातों का विचार करके मैं कह सकता हूं कि तुम्हारे ऊपर लोगों को हसद होता था क्योंकि यदि पापनाशी ने और मैंने अपने समस्त जीवन में एक ही एक परकार के आनन्दों का आस्वादन किया है जो बिरले ही किसी मनुष्य को पराप्त हो सकते हैं। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि एक घण्टे के लिए मैं बन्धु पापनाशी की तरह सन्त हो जाता। लेकिन यह सम्भव नहीं। इसलिए तुमको भी विदा करता हूं, जाओ जहां परकृति की गुप्त शक्तियां और तुम्हारा भाग्य तुम्हें ले जाय ! जाओ जहां तुम्हारी इच्छा हो, निसियास की शुभेच्छाएं तुम्हारे साथ रहेंगी। मैं जानता हूं कि इस समय अनर्गल बातें कर रहा हूं, इस पर असार शुभकामनाओं और निर्मूल पछतावे के सिवाय, मैं उस सुखमय भरांति का क्या मूल्य दे सकता हूं जो तुम्हारे परेम के दिनों में मुझ पर छायी रहती थीं और जिसकी स्मृति छाया की भांति मेरे मन में रह गयी है ? जाओ मेरी देवी, जाओ, तुम परोपकार की मूर्ति हो जिसे अपने अस्तित्व का ज्ञान नहीं, तुम लीलामयी सुषमा हो। नमस्कार है उस सर्वश्रेष्ठ, सवोर्त्कृष्ट मायामूर्ति को जो परकृति ने किसी अज्ञात कारण से इस असार, मायावी संसार को परदान की है।’
 
पापनाशी के हृदय पर इस कथन का एकएक शब्द वजर के समान पड़ रहा था। अन्त में वह इन अपशब्दों से परतिध्वनित हुआ-हा ! दुर्जन, दुष्ट, पापी ! मैं तुझसे घृणा करता हूं और तुझे तुच्छ समझता हूं ! दूर हो यहां से, नरक के दूत, उन दुर्बल, दुःखी म्लेच्छों से भी हजार गुना निकृष्ट, जो अभी मुझे पत्थरों और दुर्वचनों का निशाना बना रहे थे ! वह अज्ञानी थे, मूर्ख थे; उन्हें कुछ ज्ञान न था कि हम क्या कर रहे हैं और सम्भव है कि कभी उन पर ईश्वर की दयादृष्टि फिरे और मेरी परार्थनाओं के अनुसार उनके अन्तःकरण शुद्ध हो जायें लेकिन निसियास, अस्पृश्य पतित निसियास, तेरे लिए कोई आशा नहीं है, तू घातक विष है। तेरे मुख से नैराश्य और नाश के शब्द ही निकलते हैं। तेरे एक हास्य से उससे कहीं अधिक नास्तिकता परवाहित होती है जितनी शैतान के मुख से सौ वर्षों में भी न निकलती होगी।

निसियास ने उसकी ओर विनोदपूर्ण नेत्रों से देखकर कहा-’बन्धुवर, परणाम ! मेरी यही इच्छा है कि अन्त तक तुम विश्वास, घृणा और परेम के पथ पर आऱु रहो। इसी भांति तुम नित्य अपने शत्रुओं को कोसते और अपने अनुयायियों से परेम करते रहो। थायस, चिरंजीवी रहो। तुम मुझे भूल जाओगी, किन्तु मैं तुम्हें न भूलूंगा। तुम यावज्जीवन मेरे हृदय में मूर्तिमान रहोगी।’

उनसे बिदा होकर निसियास इस्कन्द्रिया की कबिरस्तान के निकट पेचदार गलियों में विचारपूर्ण गति से चला। इस मार्ग में अधिकतर कुम्हार रहते थे, जो मुर्दों के साथ दफन करने के लिए खिलौने, बर्तन आदि बनाते थे। उनकी दुकानें मिट्टी की सुन्दर रंगों से चमकती हुई देवियों, स्त्रियों उड़ने वाले दूतों और ऐसी ही अन्य वस्तुओं की मूर्तियों से भरी हुई थीं। उसे विचार हुआ, कदाचित इन मूर्तियों में कुछ ऐसी भी हों जो महानिद्रा में मेरा साथ दें और उसे ऐसा परतीत हुआ मानो एक छोटी परेम की मूर्ति मेरा उपहास कर रही है। मृत्यु की कल्पना ही से उसे दुःख हुआ। इस विवाद को दूर करने के लिए उसने मन में तर्क किया-इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं कि काल या समय कोई चीज नहीं। वह हमारी बुद्धि की भरांतिमात्र है, धोखा है। तो जब इसकी सत्ता ही नहीं तो वह मेरी मृत्यु को कैसे ला सकता है। क्या इसका यह आशय है कि अनन्तकाल तक मैं जीवित रहूंगा ? क्या मैं भी देवताओं की भांति अमर हूं ? नहीं, कदापि नहीं। लेकिन इससे यह अवश्य सिद्धि होता है कि वह इस समय है, सदैव से है, और सदैव रहेगा। यद्यपि मैं अभी इसका अनुभव नहीं कर रहा हूं, पर यह मुझमें विद्यमान है और मुझे उससे शंका न करनी चाहिए, क्योंकि उस वस्तु के आने से डरना, जो पहले ही आ चुकी है हिमाकत है। यह किसी पुस्तक के अन्तिम ष्पृठ के समान उपस्थित है, जिसे मैंने पॄा है, पर अभी समाप्त नहीं कर चुका हूं।

उसका शेष रास्ता इस वाद में कट गया, लेकिन इससे उसके चित्त को शान्ति न मिली, और जब यह घर पहुंचा तो उसका मन विवादपूर्ण विचारों से भरा हुआ था। उसकी दोनों युवती दासियां परसन्न, हंसहंसकर टेनिस खेल रही थीं। उनकी हास्यध्वनि ने अन्त में उसके दिल का बोझ हल्का किया।

पापनाशी और थामस भी शहर से निकलकर समुद्र के किनारेकिनारे चले। रास्ते में पापनाशी बोला-’थायस, इस विस्तृत सागर का जल भी तेरी कालिमाओं को नहीं धो सकता।’ यह कहतेकहते उसे अनायास क्रोध आ गया। थायस को धिक्कारने लगा-’तू कुतियों और शूकरियों से भी भरष्ट है, क्योंकि तूने उस देह को जो ईश्वर ने तुझे इस हेतु दिया था कि तू उसकी मूर्ति स्थापित करे, विधर्मियों और म्लेच्छों द्वारा दलित कराया है और तेरा दुराचरण इतना अधिक है कि तू बिना अन्तःकरण में अपने परति घृणा का भाव उत्पन्न किये न ईश्वर की परार्थना कर सकती है न वन्दना।’

धूप के मारे जमीन से आंच निकल रही थी और थायस आपने नये गुरु के पीछे सिर झुकाये पथरीली सड़कों पर चली जा रही थी। थकान के मारे उसके घुटनों में पीड़ा होने लगी और कंठ सूख गया। लेकिन पापनाशी के मन में दयाभाव का जागना तो दूर रहा, (जो दुरात्माओं को भी नर्म कर देता है) वह उलटे उस पराणी के परायश्चित पर परसन्न हो रहा था जिस के पापों का वारापार न था। वह धमोर्त्साह से इतना उत्तेजित हो रहा था कि उसे देह को लोहे के सांगों से छेदने में भी उसे संकोच न होता जिसका सौन्दर्य उसकी कलुषता का मानो उज्ज्वल परमाण था। ज्योंज्यों वह विचार में मग्न होता था, उसका परकोप औरभी परचण्ड होता जाता था। जब उसे याद आता था कि निसियास उसके साथ सहयोग करचुका है तो उसका रक्त खौलने लगता था और ऐसा जान पड़ता था कि उसकी छाती फट जायेगी। अपशब्द उसके होंठों पर आआकर रुक जाते थे और वह केवल दांत पीसपीसकररह जाता था। सहसा वह उछलकर, विकराल रूप धारण किये हुए उसके सम्मुख खड़ा हो गया और उसके मुंह पर थूक दिया। उसकी तीवर दृष्टि थायस के हृदय में चुभी जाती थी!

थायस ने शान्तिपूर्वक अपना मुंह पोंछ लिया और पापनाशी के पीछे चलती रही। पापनाशी उसकी ओर ऐसी कठोर दृष्टि से ताकता था मानो वह सन्देह नरक है। उसे यह चिन्ता हो रही थी कि मैं इससे परभु मसीह का बदला क्योंकर लूं, क्योंकि थायस ने मसीह को अपने कुकृत्यों से इतना उत्पीड़ित किया था कि उन्हें स्वयं उसे दण्ड देने का कष्ट न उठाना पड़े। अक्समात उसे रुधिर की एक बूंद दिखाई दी जो थायस के पैरों से बहकर मार्ग पर गिरी थी। उसे देखते ही पापनाशी का हृदय दया से प्लावित हो गया, उसकी कठोर आकृति शान्त हो गयी। उसके हृदय में एक ऐसा भाव परविष्ट हुआ जिससे वह अभी अनभिज्ञ था। वह रोने लगा, सिसकियों का तार बंध गया, तब वह दौड़कर उसके सामने माथा ठोंककर बैठ गया और उसके चरणों पर गिरकर कहने लगा-’बहन, मेरी माता, मेरी देवी’-और उसके रक्त प्लावित चरणों को चूमने लगा।

तब उसने शुद्ध हृदय से यह परार्थना की-ऐ स्वर्ग के दूतो ! इस रक्त की बूंद को सावधानी से उठाओ और इसे परम पिता के सिंहासन के सम्मुख ले जाओ। ईश्वर की इस पवित्र भूमि पर, जहां यह रक्त बहा है, एक अलौकिक पुष्पवृक्ष उत्पन्न हो। उसमें स्वगीर्य सुगन्धयुक्त फूल लिखें और जिन पराणियों की दृष्टि उस पर पड़े और जिनकी नाक में उसकी सुगन्ध पहुंचे, उनके हृदय शुद्ध और उनके विचार पवित्र हो जायें। थायस परमपूज्य थायस ! तुझे धन्य है; आज तूने वह पद पराप्त कर लिया जिसके लिए बड़ेबड़े सिद्ध योगी भी लालायित रहते हैं।

जिस समय वह यह परार्थना और शुभाकांक्षा करने में मग्न था। लड़का गधे पर सवार जाता हुआ मिला। पापनाशी ने उसे उतरने की आज्ञा दी; थायस को गधे पर बिठा दिया और तब उसकी बागडोर पकड़कर ले चला। सूयार्स्त के समय वे एक नहर पर पहुंचे जिस पर सघन वृक्षों का साया था। पापनाशी ने गधे को एक छुहारे के वृक्ष से बांध दिया और काई से की हुई चट्टान पर बैठकर उसने एक रोटी निकाली और उसे नमक और तेल के साथ दोनों ने खाया, चिल्लू से ताजा पानी पिया और ईश्वरीय विषय पर सम्भाषण करने लगे।

थायस बोली-’पूज्य पिता, मैंने आज तक कभी ऐसा निर्मल जल नहीं पिया, और न ऐसी पराणपरद स्वच्छ वायु में सांस लिया। मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है कि इस समीकरण में ईश्वर की ज्योति परवाहित हो रही है।’

पापनाशी बोला-’पिरय बहन, देखो संध्या हो रही है। निशा की सूचना देने वाली श्यामला पहाड़ियों पर छाई हुई है। लेकिन शीघर ही मुझे ईश्वरीय ज्योति, ईश्वरीय उषा के सुनहरे परकाश में चमकती हुई दिखाई देगी, शीघर ही तुझे अनन्त परभाव के गुलाबपुष्पों की मनोहर लालिमा आलोकित होती हुई दृष्टिगोचर होगी।

दोनों रात भर चलते रहे। अर्द्धचन्द्र की ज्योति लहरों के उज्ज्वल मुकुट पर जगमगा रही थी; नौकाओं के सफेद पाल उस शान्तिमय ज्योत्स्ना में ऐसे जान पड़ते थे मानो पुनीत आत्माएं स्वर्ग को परयाण कर रही हैं। दोनों पराणी स्तुति और भजन गाते हुए चले जाते थे। थायस के कण्ठ का माधुर्य, पापनाशी की पंचम ध्वनि के साथ मिश्रित होकर ऐसा जान पड़ता कि सुन्दर वस्त्र पर टाट का बखिया कर दिया गया है ! जब दिनकर ने अपना परकाश फैलाया, तो उनके सामने लाइबिया की मरुभूमि एक विस्तृत सिंह चर्म की भांति फैली हुई दिखाई दी। मरुभूमि के उस सिरे पर कई छुहारे के वृक्षों के मध्य में कई सफेद झोंपड़ियां परभात के मन्द परकाश में झलक रही थीं।

थायस ने पूछा-’पूज्य पिता, क्या वह ईश्वरीय ज्योति का मन्दिर है ?’

‘हां पिरय बहन, मेरी पिरय पुत्री, वही मुक्तिगृह है, जहां मैं तुझे अपने ही हाथों से बन्द करुंगा।’
 
एक क्षण में उन्हें कई स्त्रियां झोंपड़ियों के आसपास कुछ काम करती हुई दिखाई दीं, मानो मधुमक्खियां अपने छत्तों के पास भिनभिना रही हों। कई स्त्रियां रोटियां पकाती थीं, कई शाकभाजी बना रही थीं, बहुतसी स्त्रियां ऊन कात रही थीं और आकाश की ज्योति उन पर इस भांति पड़ रही थी मानो परम पिता की मधुर मुस्कान है, और कितनी ही तपस्विनियां झाऊ के वृक्षों के नीचे बैठी ईश्वरवन्दना कर रही थीं, उनके गोरेगोरे हाथ दोनों किनारे लटके हुए थे क्योंकि ईश्वर के परेम से परिपूर्ण हो जाने के कारण वह हाथों से कोई काम न करती थीं; केवल ध्यान, आराधना और स्वगीर्य आनन्द में निमग्न रहती थीं। इसलिए उन्हें ‘माता मरियम की पुत्रियां’ कहते थे, और वह उज्ज्वल वस्त्र ही घारण करती थीं। जो स्त्रियां हाथों से कामधन्धा करती थीं, वह ‘माथी की पुत्रियां’ कहलाती थीं और नीचे वस्त्र पहनती थीं। सभी स्त्रियां कनटोप लगाती थीं, केवल युवतियां बालों के दोचार गुच्छे माथे पर निकाले रहती थीं-सम्भवतः वह आपही-आप बाहर निकल आते थे, क्योंकि बालों को संवारना या दिखाना नियमों के विरुद्ध था। एक बहुत लम्बी, गोरी, वृद्ध महिला, एक कुटी से निकलकर दूसरी कुटी में जाती थी। उसके हाथ में लकड़ी की एक जरीब थी। पापनाशी बड़े अदब के साथ उसके समीप गया, उसकी नकाब के किनारों का चुम्बन किया और बोला-’पूज्या अलबीना, परम पिता तेरी आत्मा को शान्ति दें ! मैं उस छत्ते के लिए जिसकी तू रानी है, एक मक्खी लाया हूं जो पुष्पहीन मैदानों में इधरउधर भटकती फिरती थी। मैंने इसे अपनी हथेली में उठा लिया और अपने श्वासोच्छ्वास से पुनजीर्वित किया। मैं इसे तेरी शरण में लाया हूं।’

यह कहकर उसने थायस की ओर इशारा किया। थायस तुरन्त कैसर की पुत्री के सम्मुख घुटनों के बल बैठ गयी।

अलबीना ने थायस पर एक मर्मभेदी दृष्टि डाली, उसे उठने को कहा, उसके मस्तक का चुम्बन किया और तब योगी से बोली-’हम इसे ‘माता मरियम की पुत्रियों’ के साथ रखेंगे।’

पापनाशी ने तब थायस के मुक्तिगृह में आने का पूरा वृत्तान्त कह सुनाया। ईश्वर ने कैसे उसे पररेणा की, कैसे वह इस्कन्द्रिया पहुंचा और किनकिन उपायों से उसके मन में उसने परभु मसीह का अनुराग उत्पन्न किया। इसके बाद उसने परस्ताव किया कि थायस को किसी कुटी में बन्द कर दिया जाय जिससे वह एकान्त में अपने पूर्वजीवन पर विचार करे, आत्मशुद्धि के मार्ग का अवलम्बन करे।

मठ की अध्यक्षिणी इस परस्ताव से सहमत हो गयी। वह थायस को एक कुटी में ले गयी जिसे कुमारी लीटा ने अपने चरणों से पवित्र किया था और जो उसी समय से खाली पड़ी हुई थी। इस तंग कोठरी में केवल एक चारपाई, एक मेज और एक घड़ा था, और जब थायस ने उसके अन्दर कदम रखा, तो चौखट को पार करते ही उसे कथनीय आनन्द का अनुभव हुआ।

पापनाशी ने कहा-’मैं स्वयं द्वार को बन्द करके उस पर एक मुहर लगा देना चाहता हूं, जिसे परभु मसीह स्वयं आकर अपने हाथों से तोड़ेंगे।’

वह उसी क्षण पास की जलधारा के किनारे गया, उसमें से मुट्ठी भर मिट्टी ली, उसमें अपने मुंह का थूक मिलाया और उसे द्वार के दरवाजों पर म़ दिया। तब खिड़की के पास आकर जहां थायस शान्तचित्त और परसन्नमुख बैठी हुई थी उसने भूमि पर सिर झुकाकर तीन बार ईश्वर की वन्दना की।

‘ओ हो ! उस स्त्री के चरण कितने सुन्दर हैं जो सन्मार्ग पर चलती है ! हां, उसके चरण कितने सुन्दर, कितने कामल और कितने गौरवशील हैं, उसका मुख कितना कान्तिमय!’

यह कहकर वह उठा, कनटोप अपनी आंखों पर खींच लिया और मन्दगति से अपने आश्रम की ओर चला।

अलबीना ने अपनी एककुमारी को बुलाकर कहा-’पिरय पुत्री, तुम थायस के पास आवश्यक वस्तु पहुंचा दो, रोटियां, पानी और एक तीन छिद्रों वाली बांसुरी।
 
पापनाशी ने एक नौका पर बैठकर, जो सिरापियन के धमार्श्रम के लिए खाद्यपदार्थ लिये जा रही थी, अपनी यात्रा समाप्त की और निज स्थान को लौट आया। जब वह किश्ती पर से उतरा तो उसके शिष्य उसका स्वागत करने के लिए नदी तट पर आ पहुंचे और खुशियां मनाने लगे। किसी ने आकाश की ओर हाथ उठाये, किसी ने धरती पर सिर झुकाकर गुरु के चरणों को स्पर्श किया। उन्हें पहले ही से अपनी गुरु के कृतकार्य होने का आत्मज्ञान हो गया था। योगियों को किसी गुप्त और अज्ञात रीति से अपने धर्म की विजय और गौरव के समाचार मिल जाते थे, और इतनी जल्द कि लोगों को आश्चर्य होता था। यह समाचार भी समस्त धमार्श्रमों में, जो उस परान्त में स्थित थे, आंधी के वेग के साथ फैल गया।

जब पापनाशी बलुवे मार्ग पर चला तो उसके शिष्य उसके पीछेपीछे ईश्वरकीर्तन करते हुए चले। लेवियन उस संस्था का सबसे वृद्ध सदस्य था। वह धमोर्न्मत्त होकर उच्चस्वर से यह स्वरचित गीत गाने लगा-

आज का शुभ दिन है,

कि हमारे पूज्य पिता ने फिर हमें गोद में लिया।

वह धर्म का सेहरा सिर बांधे हुए आये हैं,

जिसने हमारा गौरव ब़ा दिया है।

क्योंकि पिता का धर्म ही,

सन्तान का यथार्थ धन है।

हमारे पिता की सुकीर्ति की ज्योति से,

हमारी कुटियों में परकाश फैल गया है।

हमारे पिता पापनाशी,

परभु मसीह के लिए नयी एक दुल्हन लाये हैं।

अपने अलौकिक तेज और सिद्धि से,

उन्होंने एक काली भेड़ को।

जो अंधेरी घाटियों से मारीमारी फिरती थी,

उजली भेड़ बना दिया है।

इस भांति ईसाई धर्म की ध्वजा फहराते हुए,

वह फिर हमारे ऊपर हाथ रखने के लिए लौट आये हैं।

उन मधुमक्खियों की भांति,

जो अपने छत्तों से उड़ जाती है।

और फिर जंगलों से फूलों की,

मधुसुधा लिये हुए लौटती हैं।

न्युबिया के मेष की भांति,

जो अपने ही ऊन का बोझ नहीं उठा सकता।

हम आज के दिन आनन्दोत्सव मनायें,

अपने भोजन में तेल को चुपड़कर।।

जब वह लोग पापनाशी की कुटी के द्वार पर आये तो सबके-सब घुटने टेककर बैठ गये और बोले-’पूज्य पिता ! हमें आशीवार्द दीजिए और हमें अपनी रोटियों को चुपड़ने के लिए थोड़ासा तेल परदान कीजिए कि हम आपके कुशलपूर्वक लौट आने पर आनन्द मनायें।’

मूर्ख पॉल अकेला चुपचाप खड़ा रहा। उसने न घाट ही पर आनन्द परकट किया था, और न इस समय जमीन पर गिरा। वह पापनाशी को पहचानता ही न था और सबसे पूछता था, ‘यह कौन आदमी है ?’ लेकिन कोई उसकी ओर ध्यान नहीं देता था, क्योंकि सभी जानते थे कि यद्यपि यह सिद्धि पराप्त है, पर है ज्ञानशून्य।

पापनाशी जब अपनी कुटी में सावधान होकर बैठा तो विचार करने लगा-अन्त में मैं अपने आनन्द और शान्ति के उद्दिष्ट स्थान पर पहुंच गया। मैं अपने सन्टोष से सुरक्षित ग़ में परविष्ट हो गया, लेकिन यह क्या बात है कि यह तिनकों का झोंपड़ा जो मुझे इतना पिरय है, मुझे मित्रभाव से नहीं देखता और दीवारें मुझसे हर्षित होकर नहीं कहतीं-’तेरा आना मुबारक हो !’ मेरी अनुपस्थिति में यहां किसी परकार का अन्तर होता हुआ नहीं दीख पड़ता। झोंपड़ा ज्योंका-त्यों है, यही पुरानी मेज और मेरी पुरानी खाट है। वह मसालों से भरा सिर है, जिसने कितनी ही बार मेरे मन में पवित्र विचारों की पररेणा की है। वह पुस्तक रखी हुई है जिसके द्वारा मैंने सैकड़ों बार ईश्वर का स्वरूप देखा है। तिस पर भी यह सभी चीजें न जाने क्यों मुझे अपरिचितसी जान पड़ती हैं, इनका वह स्वरूप नहीं रहा। ऐसा परतीत होता है कि उनकी स्वाभाविकता शोभा का अपहरण हो गया है, मानो मुझ पर उनका स्नेह ही नहीं रहा। और मैं पहली ही बार उन्हें देख रहा हूं। जब मैं इस मेज और इस पलंग पर, जो मैंने किसी समय अपने हाथों से बनाये थे, इन मसालों से सुखाई खोपड़ी पर, इस भोजपत्र के पुलिन्दों पर जिन पर ईश्वर के पवित्र वाक्य अंकित हैं, निगाह डालता हूं तो मुझे ऐसा ज्ञात होता है कि यह सब किसी मृत पराणी की वस्तुएं हैं। इनसे इतना घनिष्ठ सम्बन्ध होने पर भी, इनसे रातदिन का संग रहने पर भी मैं अब इन्हें पहचान नहीं सकता। आह ! यह सब चीजें ज्योंकी-त्यों हैं इनमें जरा भी परिवर्तन नहीं हुआ। अतएव मुझमें ही परिवर्तन हो गया है, मैं जो पहले था वह अब नहीं रहा। मैं कोई और ही पराणी हूं। मैं ही मृत आत्मा हूं ! हे भगवान ! यह क्या रहस्य है ? मुझमें से कौनसी वस्तु लुप्त हो गयी है, मुझमें अब क्या शेष रह गया है ? मैं कौन हूं ?

और सबसे बड़ी आशंका की बात यह थी कि मन को बारबार इस शंका की निमूर्लता का विश्वास दिलाने पर भी उसे ऐसा भाषित होता था कि उसकी कुटी बहुत तंग हो गयी यद्यपि धार्मिक भाव से उसे इस स्थान को अनंत समझना चाहिए था, क्योंकि अनन्त का भाग भी अनन्त ही होता है, क्योंकि यहीं बैठकर वह ईश्वर की अनन्तता में विलीन हो जाता था।

उसने इस शंका के दमनार्थ धरती पर सिर रखकर ईश्वर की परार्थना की और इससे उसका चित्त शान्त हुआ। उसे परार्थना करते हुए एक घण्टा भी न हुआ होगा कि थायस की छाया उसकी आंखों के सामने से निकल गयी। उसने ईश्वर को धन्यवाद देकर कहा-परभू मसीह, तेरी ही कृपा से मुझे उसके दर्शन हुए। यह तेरी असीम दया और अनुगरह है, इसे मैं स्वीकार करता हूं। तू उस पराणी को मेरे सम्मुख भेजकर, जिसे मैंने तेरी भेंट किया है, मुझे सन्तुष्ट, परसन्न और आश्वस्त करना चाहता है। तू उसे मेरी आंखों के सामने परस्तुत करता है, क्योंकि अब उसकी मुस्कान नि:शास्त्र, उसका सौन्दर्य निष्कलंक और उसके हावभाव उद्देश्यहीन हो गये हैं। मेरे दयालु पतितपावन परभु, तू मुझे परसन्न करने के निमित्त उसे मेरे सम्मुख उसी शुद्ध और परिमार्जित स्वरूप में लाता है जो मैंने तेरी इच्छाओं के अनुकूल उसे दिया है, जैसे एक मित्र परसन्न होकर दूसरे मित्र को उसके दिये हुए उपहार की याद दिलाता है। इस कारण मैं इस स्त्री को देखकर आनन्दित होता हूं, क्योंकि तू ही इसका परेक्षक है। तू इस बात को नहीं भूलता कि मैंने उसे तेरे चरणों पर सर्मिपत किया है। उससे तुझे आनन्द पराप्त होता है, इसलिए उसे अपनी सेवा में रख और अपने सिवाय किसी अन्य पराणी को उसके सौन्दर्य से मुग्ध न होने दे।

उसे रात भर नींद नहीं आयी और थायस को उसने उससे भी स्पष्ट रूप में देखा जैसे परियों के कुंज में देखा था। उसने इन शब्दों में अपनी आत्मस्तुति की-मैंने जो कुछ किया है, ईश्वर ही के निमित्त किया है।

लेकिन इस आश्वासन और परार्थना पर भी उसका हृदय विकल था। उसने आह भरकर कहा-’मेरी आत्मा, तू क्यों इतनी शोकासक्त है, और क्यों मुझे यह यातना दे रही है ?’

अब भी उसके चित्त की उद्विग्नता शान्त न हुई। तीन दिन तक वह ऐसे महान शोक और दुःख की अवस्था में पड़ा रहा जो एकान्तवासी योगियों की दुस्सह परीक्षाओं का पूर्वलक्षण है। थायस की सूरत आठों पहर उसकी आंखों के आगे फिरा करती। वह इसे अपनी आंखों के सामने से हटाना भी न चाहता था, क्योंकि अब तक वह समझता था कि यह मेरे ऊपर ईश्वर की विशेष कृपा है और वास्तव में यह एक योगिनी की मूर्ति है। लेकिन एक दिन परभात की सुषुप्तावस्था में उसने थायस को स्वप्न में देखा। उसके केशों पर पुष्पों का मुकुट विराज रहा था और उसका माधुर्य ही भयावह ज्ञात होता था कि वह भयभीत होकर चीख उठा और जागा तो ठण्डे पसीने से तर था, मानो बर्फ के कुंड में से निकला हो। उसकी आंखें भय की निद्रा से भारी हो रही थीं कि उसे अपने मुख पर गर्मगर्म सांसों के चलने का अनुभव हुआ। एक छोटासा गीदड़ उसकी चारपाई की पट्टी पर दोनों अगले पैर रखे हांफहांफकर अपनी दुर्गन्धयुक्त सांसें उसके मुख पर छोड़ रहा था, और उसे दांत निकालनिकालकर दिखा रहा था।

पापनाशी को अत्यन्त विस्मय हुआ। उसे ऐसा जान पड़ा, मेरे पैरों के नीचे की जमीन धंस गयी। और वास्तव में वह पतित हो गया था। कुछ देर तक तो उसमें विचार करने की शक्ति ही न रही और जब वह फिर सचेत भी हुआ तो ध्यान और विचार से उसकी अशान्ति और भी ब़ गई।

उसने सोचा-इन दो बातों में से एक बात है या तो वह स्वप्न की भांति ईश्वर का परेरित किया हुआ था और शुभस्वप्न था, और यह मेरी स्वाभाविक दुबुर्द्धि है जिसने उसे यह भयंकर रूप दे दिया है, जैसे गन्दे प्याले में अंगूर का रस खट्टा हो जाता है, मैंने अपने अज्ञानवश ईश्वरीय आदेश को ईश्वरीय तिरस्कार का रूप दे दिया और इस गीदड़ रूपी शैतान ने मेरी शंकान्वित दशा से लाभ उठाया, अथवा इस स्वप्न का परेरक ईश्वर नहीं, पिशाच था। ऐसी दशा में यह शंका होती है कि पहले के स्वप्नों को देवकृत समझने में मेरी भरांति थी। सारांश यह कि इस समय मुझमें वह धमार्धर्म का ज्ञान नहीं रहा जो तपस्वी के लिए परमावश्यक है और जिसके बिना उसके पगपग पर ठोकर खाने की आशंका रहती है कि ईश्वर मेरे साथ नहीं रहा-जिसके कुफल मैं भोग रहा हूं, यद्यपि उसके कारण नहीं निश्चित कर सकता।

इस भांति तर्क करके उसने बड़ी ग्लानि के साथ जिज्ञासा की-दयालु पिता! तू अपने भक्त से क्या परायश्चित कराना चाहता है, यदि उसकी भावनाएं ही उसकी आंखों पर परदा डाल दें, दुर्भावनाएं ही उसे व्यथित करने लगें ? मैं क्यों ऐसे लक्षणों का स्पष्टीकरण नहीं कर देता जिसके द्वारा मुझे मालूम हो जाया करे कि तेरी इच्छा क्या है, और क्यों तेरे परतिपक्षी की ?

किन्तु ईश्वर ने, जिसकी माया अभेद्य है, अपने इस भक्त की इच्छा पूरी न की ओर उसे आत्मज्ञान न परदान किया तो उसने शंका और भरांति वशीभूत होकर निश्चय किया अब मैं थायस की ओर मन को जाने ही न दूंगा। लेकिन उसका यह परयत्न निष्फल हुआ। उससे दूर रहकर भी थायस नितय उसके साथ रहती थी। जब वह कुछ पॄता था, ईश्वर का ध्यान करता था तो वह सामने बैठी उसकी ओर ताकती रहती, वह जिधर निगाह डालता, उसे उसी की मूर्ति दिखाई देती, यहां तक कि उपासना के समय भी वह उससे जुदा न होती। ज्योंही वह पापनाशी के कल्पना क्षेत्र में पदार्पण करती, वह योगी के कानों में कुछ धीमी आवाज सुनाई देती, जैसी स्त्रियों के चलने के समय उनके वस्त्रों से निकलती है, और इन छायाओं में यथार्थ से भी अधिक स्थिरता होती थी। स्मृतिचित्र अस्थिर, आज्ञिक और अस्पष्ट होता है। इसके परतिकूल एकान्त में जो छाया उपस्थित होती है, वह स्थिर और सुदीर्घ होती है। इसके परतिकूल एकान्त में जो छाया उपस्थित होती है, वह स्थिर और सुदीर्घ होती है। वह नाना परकार के रूप बदलकर उसके सामने आती-कभी मलिनवदन केशों में अपनी अन्तिम पुष्पमाला गूंथे, वही सुनहरे काम के वस्त्र धारण किये जो उसने इस्कन्द्रिया में कोटा के परीतिभोज के अवसर पर पहने थे, कभी महीन वस्त्र पहने परियों के कुंज में बैठी हुई, कभी मोटा कुरता पहने, विरक्त और आध्यात्मिक आनन्द से विकसित, कभी शोक में डूबी आंखें मृत्यु की भयंकर आशंकाओं से डबडबाई हुई, अपना आवरणहीन हृदयस्थल खोले, जिस पर आहतहृदय से रक्तधारा परवाहित होकर जम गयी थी। इन छायामूर्तियों में उसे जिस बात का सबसे अधिक खेद और विस्मय होता था वह यह थी कि वह पुष्पमालाएं, वह सुन्दर वस्त्र, वह महीन चादरें, वह जरी के काम की कुर्तियां जो उसने जला डाली थीं, फिर जैसे लौट आयीं। उसे अब यह विदित होता था कि इन वस्तुओं में भी कोई अविनाशी आत्मा है और उसने अन्तवेर्दना से विकल होकर कहा-

‘कैसी विपत्ति है कि थायस के असंख्य पापों की आत्माएं यों मुझ पर आत्र्कमण कर रही हैं।’
 
जब उसने पीछे की ओर देखा तो उसे ज्ञात हुआ कि थायस खड़ी है, और इससे उसकी अशान्ति और भी ब़ गई। असह्य आत्मवेदना होने लगी लेकिन चूंकि इन सब शंकाओं और दुष्कल्पनाओं में भी उसकी छाया और मन दोनों ही पवित्र थे, इसलिए उसे ईश्वर पर विश्वास था। अतएव वह इन करुण शब्दों में अनुनयविनय करता था-भगवान्, तेरी मुझ पर यह अकृपा क्यों ? यदि मैं उनकी खोज में विधर्मियों के बीच गया, तो तेरे लिए, अपने लिए नहीं। क्या यह अन्याय नहीं है कि मुझे उन कर्मों का दण्ड दिया जाये जो मैंने तेरा माहात्म्य ब़ाने के निमित्त किये हैं ? प्यारे मसीह, आप इस घोर अन्याय से मेरी रक्षा कीजिए। मेरे त्राता, मुझे बचाइए। देह मुझ पर जो विजय पराप्त न कर सकी, वह विजयकीर्ति उसकी छाया को न परदान कीजिए। मैं जानता हूं कि मैं इस समय महासंकटों में पड़ा हुआ हूं। मेरा जीवन इतना शंकामय कभी न था। मैं जानता हूं और अनुभव करता हूं कि स्वप्न में परत्यक्ष से अधिक शक्ति है और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि स्वप्न में स्वयं आत्मिक वस्तु होने के कारण भौतिक वस्तु होने के कारण भौतिक वस्तुओं से उच्चतर है। स्वप्न वास्तव में वस्तुओं की आत्मा है। प्लेटो यद्यपि मूर्तिवादी था, तथापि उसने विचारों के अस्तित्व को स्वीकार किया है। भगवान नरपिशाचों के उस भोज में जहां तू मेरे साथ था, मैंने मनुष्यों को-वह पापमलिन अवश्य थे, किन्तु कोई उन्हें विचार और बुद्धि से रहित नहीं कह सकता-इस बात पर सहमत होते सुना कि योगियों को एकान्त, ध्यान और परम आनन्द की अवस्था में परत्यक्ष वस्तुएं दिखाई देती हैं। परम पिता, आपने पवित्र गरन्थ स्वयं कितनी ही बार स्वप्न के गुणों को और छायामूर्तियों की शक्तियों को, चाहे वह तेरी ओर से हों या तेरे शत्रु की ओर से, स्पष्ट और कई स्थानों पर स्वीकार किया है। फिर यदि मैं भरांति में जा पड़ा तो मुझे क्यों इतना कष्ट दिया जा रहा है ?

पहले पापनाशी ईश्वर से तर्क न करता था। वह निरापद भाव से उसके आदेशों का पालन करता था। पर अब उसमें एक नये भाव का विकास हुआ-उसने ईश्वर से परश्न और शंकाएं करनी शुरू कीं, किन्तु ईश्वर ने उसे वह परकाश न दिखाया जिसका वह इच्छुक था। उसकी रातें एक दीर्घ स्वप्न होती थीं, और उसके दिन भी इस विषय में रातों ही के सदृश होते थे। एक रात वह जागा तो उसके मुख से ऐसी पश्चात्तापपूर्ण आहें निकल रही थीं, जैसी चांदनी रात में पापाहत मनुष्यों की कबरों से निकला करती हैं। थायस आ पहुंची थी, और उसके जख्मी पैरों से खून बह रहा था। किन्तु पापनाशी रोने लगा कि वह धीरे से उसकी चारपाई पर आकर लेट गयी। अब कोई सन्देह न रहा, सारी शंकाएं निवृत्त हो गयीं। थायस की छाया वासनायुक्त थी।

उसके मन में घृणा की एक लहर उठी। वह अपनी अपवित्र शैया से झपटकर नीचे कूद पड़ा और अपना मुंह दोनों हाथों से छिपा लिया कि सूर्य का परकाश न पड़ने पाये। दिन की घड़ियां गुजरती जाती थीं, किन्तु उसकी लज्जा और ग्लानि शान्त न होती थी। कुटी में पूरी शान्ति थी। आज बहुत दिनों के पश्चात परथम बार थायस को एकान्त मिला। आखिर में छाया ने भी उसका साथ छोड़ दिया, और अब उसकी विलीनता भी भयंकर परतीत होती थी। इस स्वप्न को विस्मृत करने के लिए, इस विचार से उसके मन को हटाने के लिए अब कोई अवलम्ब, कोई साधन, कोई सहारा नहीं था। उसने अपने को धिक्कारा-मैंने क्यों उसे भगा न दिया ? मैंने अपने को उसके घृणित आलिंगन और तापमय करों से क्यों न छुड़ा लिया ?

अब वह उस भरष्ट चारपाई के समीप ईश्वर का नाम लेने का भी साहस न कर सकता था, और उसे यह भय होता था कि कुटी के अपवित्र हो जाने के कारण पिशाचगण स्वेच्छानुसार अन्दर परविष्ट हो जायेंगे, उनके रोकने का मेरे पास अब कौनसा मन्त्र रहा ? और उसका भय निमूर्ल न था। वह सातों गीदड़ जो कभी उसकी चौखट के भीतर न आ सके थे, अब कतार बांधकर आये और भीतर आकर उसके पलंग के नीचे छिप गये। संध्या परार्थना के समय एक और आठवां गीदड़ भी आया, जिसकी दुर्गन्ध असह्य थी। दूसरे दिन नवां गीदड़ भी उनमें आ मिला और उनकी संख्या ब़तेबढ़ते तीस से साठ और साठ से अस्सी तक पहुंच गयी। जैसेजैसे उनकी संख्या ब़ती थी, उनका आहार छोटा होता जाता था, यहां तक कि वह चूहों के बराबर हो गये और सारी कुटी में फैल गये-पलंग, मेज, तिपाई, फर्श एक भी उनसे खाली न बचा। उनमें से एक मेज पर कूद गया और उसके तकिये पर चारों पैर रखकर पापनाशी के मुख की ओर जलती हुई आंखों से देखने लगा। नित्य नयेनये गीदड़ आने लगे।

अपने स्वप्न के भीषण पाप का परायश्चित करने और भरष्ट विचारों से बचने के लिए पापनाशी ने निश्चय किया कि अपनी कुटी से निकल जाऊं तो अब पाप का बसेरा बन गयी है और मरुभूमि में दूर जाकर कठिनसे-कठिन तपस्याएं करुं, ऐसीऐसी सिद्धियों में रत हो जाऊं जो किसी ने सुनी भी न हों, परोपकार और उद्घार के पथ पर और भी उत्साह से चलूं। लेकिन इस निश्चय को कार्यरूप में लाने से पहले वह सन्त पालम के पास उससे परामर्श करने गया।

उसने पालम को अपने बगीचे में पौधों को सींचते हुए पाया। संध्या हो गयी थी। नील नदी की नीली धारा ऊंचे पर्वतों के दामन में बह रही थी। वह सात्त्विक हृदय वृद्ध साधु धीरेधीरे चल रहा था कि कहीं वह कबूतर चौंककर उड़ न जाये जो उसके कन्धे पर आ बैठा था।

पापनाशी को देखकर उसने कहा-’भाई पापनाशी को नमस्कार करता हूं। देखो, परम पिता कितना दयालु है; वह मेरे पास अपने रचे हुए पशुओं को भेजता है कि मैं उनके साथ उनका कीर्तिगान करुं और हवा में उड़ने वाले पक्षियों को देखकर उनकी अनन्तलीला का आनन्द उठाऊं। इस कबूतर को देखो, उसकी गर्दन के बदलते हुए रंगों को देखो, क्या वह ईश्वर की सुन्दर रचना नहीं है ? लेकिन तुम तो मेरे पास किसी धार्मिक विषय पर बातें करने आये हो न ? यह लो, मैं अपना डोल रखे देता हूं और तुम्हारी बातें सुनने को तैयार हूं।’

पापनाशी ने वृद्ध साधु से अपनी इस्कन्द्रिया की यात्रा, थायस के उद्घार, वहां से लौटने-दिनों की दूषित कल्पनाओं और रातों के दुःस्वप्नों-का सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उस रात के पापस्वप्न और गीदड़ों के झुंड की बात भी न छिपाई और तब उससे पूछा-’पूज्य पिता, क्या ऐसीऐसी असाधारण योगित्र्कयाएं करनी चाहिए कि परेतराज भी चकित हो जायें ?’

पालम सन्त ने उत्तर दिया-’भाई पापनाशी, मैं क्षुद्र पापी पुरुष हूं और अपना सारा जीवन बगीचे में हिरनों, कबूतरों और खरहों के साथ व्यतीत करने के कारण, मुझे मनुष्यों का बहुत कम ज्ञान है। लेकिन मुझे ऐसा परतीत होता है कि तुम्हारी दुश्चिन्ताओं का कारण कुछ और ही है। तुम इतने दिनों तक व्यावहारिक संसार में रहने के बाद यकायक निर्जन शांति में आ गये हों। ऐसे आकस्मिक परिवर्तनों से आत्मा का स्वास्थ्य बिगड़ जाये तो आश्चर्य की बात नहीं। बन्धुवर, तुम्हारी दशा उस पराणी कीसी है जो एक ही क्षण में अत्याधिक ताप से शीत में आ पहुंचे। उसे तुरन्त खांसी और ज्वर घेर लेते हैं। बन्धु, तुम्हारे लिए मेरी यह सलाह है कि किसी निर्जन मरुस्थल में जाने के बदले, मनबहलाव के ऐसे काम करो जो तपस्वियों और साधुओं के सर्वथा योग्य हैं। तुम्हारी जगह मैं होता तो समीपवर्ती धमार्श्रमों की सैर करता। इनमें से कई देखने के योग्य हैं, लोग उनकी बड़ी परशंसा करते हैं। सिरैपियन के ऋषिगृह में एक हजार चार सौ बत्तीस कुटियां बनी हुई हैं, और तपस्वियों को उतने वर्गों में विभक्त किया गया है जितने अक्षर यूनानी लिपि में हैं। मुझसे लोगों ने यह भी कहा है कि इस वगीर्करण में अक्षर, आकार और साधकों की मनोवृत्तियों में एक परकार की अनुरूपता का ध्यान रखा जाता है। उदाहरणतः वह लोग जो र वर्ग के अन्तर्गत रखे जाते हैं चंचल परकृति के होते हैं, और जो लोग शान्तपरकृति के हैं वह प के अन्तर्गत रखे जाते हैं। बन्धुवर, तुम्हारी जगह मैं होता तो अपनी आंखों से इस रहस्य को देखता और जब तक ऐसे अद्भुत स्थान की सैर न कर लेता, चैन न लेता। क्या तुम इसे अद्भुत नहीं समझते ? किसी की मनोवृत्तियों का अनुमान कर लेना कितना कठिन है और जो लोग निम्न श्रेणी में रखा जाना स्वीकार कर लेते हैं, वह वास्तव में साधु हैं, क्योंकि उनकी आत्मशुद्धि का लक्ष्य उनके सामने रहता है। वह जानते हैं कि हम किस भांति जीवन व्यतीत करने से सरल अक्षरों के अन्तर्गत हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त वरतधारियों के देखने और मनन करने योग्य और भी कितनी ही बातें हैं। मैं भिन्नभिन्न संगतों को जो नील नदी के तट पर फैली हुई हैं, अवश्य देखता, उनके नियमों और सिद्घान्तों का अवलोकन करता, एक आश्रम की नियमावली की दूसरे से तुलना करता कि उनमें क्या अन्तर है, क्या दोष है, क्या गुण है। तुम जैसी धमार्त्मा पुरुष के लिए यह आलोचना सर्वथा योग्य है। तुमने लोगों से यह अवश्य ही सुना होगा कि ऋषि एन्फरेम ने अपने आश्रम के लिए बड़े उत्कृष्ट धार्मिक नियमों की रचना की है। उनकी आज्ञा लेकर तुम इस नियमावली की नकल कर सकते हो क्योंकि तुम्हारे अक्षर बड़े सुन्दर होते हैं। मैं नहीं लिख सकता क्योंकि मेरे हाथ फावड़ा चलातेचलाते इतने कठोर हो गये हैं कि उनमें पतली कलम को भोजपत्र पर चलाने की क्षमता ही नहीं रही। लिखने के लिए हाथों का कोमल होना जरूरी है। लेकिन बन्धुवर, तुम तो लिखने में चतुर हो, और तुम्हें ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने तुम्हें यह विद्या परदान की, क्योंकि सुन्दर लिपियों की जितनी परशंसा की जाये थोड़ी है। गरन्थों की नकल करना और पॄना बुरे विचारों से बचने का बहुत ही उत्तम साधन हैं। बन्धु पापनाशी, तुम हमारे श्रद्धेय ऋषियों, पालम और एन्तोनी के सदुपदेशों को लिपिबद्ध क्यों नहीं कर डालते ? ऐसे धार्मिक कामों में लगे रहने से शनै:शैनः तुम चित्त और आत्मा की शांति को पुनः लाभ कर लोगे, फिर एकांत तुम्हें सुखद जान पड़ेगा और शीघर ही तुम इस योग्य हो जाओगे कि आत्मशुद्धि की उन त्रि्कयाओं में परवृत्त हो जाओगे जिनमें तुम्हारी यात्रा ने विघ्न डाल दिया था। लेकिन कठिन कष्टों और दमनकारी वेदनाओं के सहन से तुम्हें बहुत आशा न रखनी चाहिए। जब पिता एन्तोनी हमारे बीच में थे तो कहा करते थे-’बहुत वरत रखने से दुर्बलता आती है औद दुर्बलता से आलस्य पैदा होता है। कुछ ऐसे तपस्वी हैं जो कई दिनों तक लगातार अनशन वरत रख अपने शरीर को चौपट कर डालते हैं। उनके विषय में यह कहना सर्वथा सत्य है कि वह अपने ही हाथों से अपनी छाती पर कटार मार लेते हैं और अपने को किसी परकार की रुकावट के शैतान के हाथों में सौंप देते हैं।’ यह उस पुनीतात्मा एन्तोनी के विचार थे ! मैं अज्ञानी मूर्ख बुड्ढा हूं; लेकिन गुरु के मुख से जो कुछ सुना था वह अब तक याद है।’

पापनाशी ने पालम सन्त को इस शुभादेश के लिए धन्यवाद दिया और उस पर विचार करने का वादा किया। जब वह उससे विदा होकर नरकटों के बाड़े के बाहर आ गया जो बगीचे के चारों ओर बना हुआ था, तो उसने पीछे फिरकर देखा। सरल, जीवन्मुक्त साधु पालम पौधों को पानी दे रहा था, और उसकी झुकी हुई कमर पर कबूतर बैठा उसके साथसाथ घूमता था। इस दृश्य को देखकर पापनाशी रो पड़ा।

अपनी कुटी में जाकर उसने एक विचित्र दृश्य देखा। ऐसा जान पड़ता था कि अगणित बालुकरण किसी परचण्ड आंधी से उड़कर कुटी में फैल गये हैं। जब उसने जरा ध्यान से देखा तो परत्येक बालुकरण यथार्थ में एक अति सूक्ष्म आकार का गीदड़ था, सारी कुटी शृंगालमय हो गयी थी।

उसी रात को पापनाशी ने स्वप्न देखा कि एक बहुत ऊंचा पत्थर का स्तम्भ है, जिसके शिखर पर एक आदमी का चेहरा दिखाई दे रहा है। उसके कान में कहीं से यह आवाज आयी-इस स्तम्भ पर च़ !

पापनाशी जागा तो उसे निश्चय हुआ कि यह स्वप्न मुझे ईश्वर की ओर से हुआ है। उसने अपने शिष्यों को बुलाया और उनको इन शब्दों में सम्बोधित किया-’पिरय पुत्रो, मुझे आदेश मिला है कि तुमसे फिर विदा मांगू और जहां ईश्वर ले जाये वहां जाऊं। मेरी अनुपस्थिति में लेवियन की आज्ञाओं को मेरी ही आज्ञाओं की भांति मानना और बन्धु पालम की रक्षा करते रहना। ईश्वर तुम्हें शांति दे। नमस्कार !’

जब वह चला तो उसके सभी शिष्य साष्टांग दण्डवत करने लगे और जब उन्होंने सिर उठाया तो उन्हें अपने गुरु की लस्बी, श्याममूर्ति क्षितिज में विलीन होती हुई दिखाई दी।

वह रात और दिन अविश्रान्त चलता रहा। यहां तक कि वह उस मन्दिर में जा पहुंचा, जो पराचीन काल में मूर्तिपूजकों ने बनाया था और जिसमें वह अपनी विचित्र पूर्वयात्रा में एक रात सोया था। अब इस मन्दिर का भग्नावशेष मात्र रह गया था और सर्प, बिच्छू, चमगादड़ आदि जन्तुओं के अतिरिक्त परेत भी इसमें अपना अड्डा बनाये हुए थे। दीवारें जिन पर जादू के चिह्न बने हुए थे, अभी तक खड़ी थीं। तीस वृहदाकार स्तम्भ जिनके शिखरों पर मनुष्य के सिर अथवा कमल के फूल बने हुए थे, अभी तक एक भारी चबूतरे को उठाये हुए थे। लेकिन मन्दिर के एक सिरे पर एक स्तम्भ इस चबूतरे के बीच से सरक गया था और अब अकेला खड़ा था। इसका कलश एक स्त्री को मुस्कराता हुआ मुखमण्डल था। उसकी आंखें लम्बी थीं, कपोल भरे हुए, और मस्तक पर गाय की सींगें थीं।

पापनाशी ने स्तम्भ को देखते ही पहचान गया कि यह वह स्तम्भ है जिसे उसने स्वप्न में देखा था और उसने अनुमान किया कि इसकी ऊंचाई बत्तीस हाथों से कम न होगी। वह निकट गांव में गया और उतनी ही ऊंची एक सी़ी बनाई और जब सी़ी तैयार हो गयी तो वह स्तम्भ से लगाकर खड़ी की गयी। वह उस पर च़ा और शिखर पर जाकर उसने भूमि पर मस्तक नवाकर यों परार्थना की-’भगवान्, यही वह स्थान है जो तूने मेरे लिए बताया है। मेरी परम इच्छा है कि मैं यहीं तेरी दया की छाया में जीवनपर्यन्त रहूं।’

वह अपने साथ भोजन की सामगिरयां न लाया था। उसे भरोसा था कि ईश्वर मेरी सुधि अवश्य लेगा और यह आशा थी कि गांव के भक्तिपरायण जन मेरे खानेपीने का परबन्ध कर देंगे और ऐसा भी। दूसरे दिन तीसरे पहर स्त्रियां अपने बालकों के साथ रोटियां, छुहारे और ताजा पानी लिये हुए आयीं, जिसे बालकों ने स्तम्भ के शिखर पर पहुंचा दिया।

स्तम्भ का कलश इतना चौड़ा न था कि पापनाशी उस पर पैर फैलाकर लेट सकता, इसलिए वह पैरों को नीचेऊपर किये, सिर छाती पर रखकर सोता था और निद्रा जागृत रहने से भी अधिक कष्टदायक थी। परातःकाल उकाब अपने पैरों से उसे स्पर्श करता था और वह निद्रा, भय तथा अंगवेदना से पीड़ित उठ बैठता था।

संयोग से जिस ब़ई ने यह सी़ी बनायी थी, वह ईश्वर का भक्त था। उसे यह देखकर चिन्ता हुई कि योगी को वर्षा और धूप से कष्ट हो रहा है। और इस भय से कि कहीं निद्रा में वह नीचे न गिर पड़े, उस पुण्यात्मा पुरुष ने स्तम्भ के शिखर पर छत और कठघरा बना दिया।

थोड़े ही दिनों में उस असाधारण व्यक्ति की चचार गांवों में फैलने लगी और रविवार के दिन श्रमजीवियों के दलके-दल अपनी स्त्रियों और बच्चों के साथ उसके दर्शनार्थ आने लगे। पापनाशी के शिष्यों ने जब सुना कि गुरुजी ने इस विचित्र स्थान में शरण ली है तो वह चकित हुए, और उसकी सेवा में उपस्थित होकर उससे स्तम्भ के नीचे अपनी कुटिया बनाने की आज्ञा पराप्त की। नित्यपरति परातःकाल वह आकर अपने स्वामी के चारों ओर खड़े हो जाते और उसके सदुपदेश सुनते थे।

वह उन्हें सिखाता था-पिरय पुत्रो, उन्हीं नन्हें बालकों के समान बन रहो जिन्हें परभु मसीह प्यार किया करते थे। वही मुक्ति का मार्ग है। वासना ही सब पापों का मूल है। वह वासना से उसी भांति उत्पन्न होते हैं जैसे सन्तान पिता से। अहंकार, लोभ, आलस्य, त्र्कोध और ईष्यार उनकी पिरय सन्तान हैं। मैंने इस्कन्द्रिया में यही कुटिल व्यापार देखा। मैंने धन सम्पन्न पुरुषों को कुचेष्टाओं में परवाहित होते देखा है जो उस नदी की बा़ की भांति हैं जिसमें मैला जल भरा हो। वह उन्हें दुःख की खाड़ी में बहा ले जाता है।
 
एफरायम और सिरापियन के अधिष्ठाताओं ने इस अद्भुत तपस्या का समाचार सुना तो उसके दर्शनों से अपने नेत्रों को कृतार्थ करने की इच्छा परकट की। उनकी नौका के त्रिकोण पालों को दूर से नदी में आते देखकर पापनाशी के मन में अनिवार्यतः यह विचार उत्पन्न हुआ कि ईश्वर ने मुझे एकान्त से भी योगियों के लिए आदर्श बना दिया है। दोनों महात्माओं ने जब उसे देखा तो उन्हें बड़ा कुतूहल हुआ और आपस में परामर्श करके उन्होंने सर्वसम्मति से ऐसी अमानुषिक को तपस्या का त्याज्य ठहराया। अतएव उन्होंने पापनाशी से नीचे उतर आने का अनुरोध किया।

वह बोला-’यह जीवनपरणाली परम्परागत व्यवहार के सर्वथा विरुद्ध है। धर्मसिद्घान्त इसकी आज्ञा नहीं देते।’

लेकिन पापनाशी ने उत्तर दिया-’योगी जीवन के नियमों और परम्परागत व्यवहारों की परवाह नहीं करता। योगी स्वयं असाधारण व्यक्ति होता है, इसलिए यदि उसका जीवन भी असाधारण हो तो आश्चर्य की क्या बात है। मैं ईश्वर की परेरणा से यहां च़ा हूं। उसी के आदेश से उतरुंगा।’

नित्यपरति धर्म के इच्छुक आकर पापनाशी के शिष्य बनते और उसी स्तम्भ के नीचे अपनी कुटिया बनाते थे। उनमें से कई शिष्यों ने अपने गुरु का अनुकरण करने के लिए मन्दिर के दूसरे स्तम्भों पर च़कर तप करना शुरू किया। पर जब उनके अन्य सहचरों ने इसकी निन्दा की, और वह स्वयं धूप और कष्ट न सह सके, तो नीचे उतर आये।

देश के अन्य भागों से पापियों और भक्तों के जत्थेके-जत्थे आने लगे। उनमें से कितने ही बहुत दूर से आते थे। उनके साथ भोजन की कोई वस्तु न होती थी। एक वृद्घा विधवा को सूझी कि उनके हाथ ताजा पानी, खरबूजे आदि फल बेचे जायें तो लाभ हो। स्तम्भ के समीप ही उसने मिट्टी के कुल्हड़ जमा किये। एक नीली चादर तानकर उसने नीचे फलों की टोकरियां सजाईं और पीछे खड़ी होकर हांक लगाने लगी-ठंडा पानी, ताजा फल, जिसे खाना या पानी पीना हो चला आवे। इसकी देखादेखी एक नानबाई थोड़ीसी लाल ईंटें लाया और समीप ही अपना तन्दूर बनाया। इसमें सादी और खमीरी रोटियां सेंककर वह गराहकों को खिलाता था। यात्रियों की संख्या दिनपरतिदिन ब़ने लगी। मिस्त्र देश के बड़ेबड़े शहरों से भी लोग आने लगे। यह देखकर एक लोभ आदमी ने मुसाफिरों और नौकरों, ऊंटों, खच्चरों आदि को ठहराने के लिए एक सराय बनवाई। थोड़े ही दिन में उस स्तम्भ के सामने एक बाजार लग गया जहां मदुए अपनी मछलियां और किसान अपने फलमेवे लालाकर बेचने लगे। एक नाई भी आ पहुंचा जो किसी वृक्ष की छांह में बैठकर यात्रियों की हजामत बनाता था और दिल्लगी की बातें करके लोगों को हंसाता था। पुराना मन्दिर इतने दिन उजड़े रहने के बाद फिर आबाद हुआ। जहां रातदिन निर्जनता और नीरवता का आधिपत्य रहता था, वहां अब जीवन के दृश्य और चिह्न दिखाई देने लगे। हरदम चहलपहल रहती। भठियारों ने पुराने मन्दिर के तहखानों के शराबखाने बना दिये और स्तम्भ पर पापनाशी के चित्र लटकाकर उसके नीचे यूनानी और मिस्त्री लिपियों में यह विज्ञापन लगा दिये-’अनार की शराब, अंजीर की शराब और सिलिसिया की सच्ची जौ की शराब यहां मिलती है।’ दुकानदारों ने उन दीवारों पर जिन पर पवित्र और सुन्दर बेलबूटे अंकित किये हुए थे, रस्सियों से गूंथकर प्याज लटका दिये। तली हुई मछलियां, मरे हुए खरहे और भेड़ों की लाशें सजाई हुई दिखाई देने लगीं। संध्या समय इस खंडहर के पुराने निवासी अर्थात चूहे सफ बांधकर नदी की ओर दौड़ते और बगुले सन्देहात्मक भाव से मर्दन उठाकर ऊंची कारनिसों पर बैठ जाते; लेकिन वहां भी उन्हें पाकशालाओं के धुएं, शराबियों के शोरगुल और शराब बेचने वालों की हांकपुकार से चैन न मिलता। चारों तरफ कोठी वालों ने सड़कें, मकान, चर्च धर्मशालाएं और ऋषियों के आश्रम बनवा दिये। छः महीने न गुजरने पाये थे कि वहां एक अच्छाखासा शहर बस गया, जहां रक्षाकारी विभाग, न्याय, कारागार, सभी बन गये और वृद्ध मुंशी ने एक पाठशाला भी खोल ली। जंगल में मंगल हो गया, ऊसर में बाग लहराने लगा।

यात्रियों का रातदिन तांता लगा रहता। शैनःशैनः ईसाई धर्म के परधान पदाधिकारी भी श्रद्घा के वशीभूत होकर आने लगे। ऐन्टियोक का परधान जो उस समय संयोग से मिस्त्र में था, अपने समस्त अनुयायियों के साथ आया। उसने पापनाशी के असाधारण तप की मुक्तकंठ से परशंसा की। मिस्त्र के अन्य उच्च महारथियों ने इस सम्मति का अनुमोदन किया। एफरायम और सिरापियन के अध्यक्षों ने यह बात सुनी तो उन्होंने पापनाशी के पास आकर उसके चरणों पर सिर झुकाया और पहले इस तपस्या के विरुद्ध जो विचार परकट किये थे उनके लिए लज्जित हुए और क्षमा मांगी। पापनाशी ने उत्तर दिया-’बन्धुओं, यथार्थ यह है कि मैं जो तपस्या कर रहा हूं वह केवल उन परलोभनों और दुरिच्छाओं के निवारण के लिए है जो सर्वत्र मुझे घेरे रहते हैं और जिनकी संख्या तथा शक्ति को देखकर मैं दहल उठता हूं। मनुष्य का बाह्यरूप बहुत ही सूक्ष्म और स्वल्प होता है। इस ऊंचे शिखर पर से मैं मनुष्यों की चींटियों के समान जमीन पर रेंगते देखता हूं। किन्तु मनुष्य को अन्दर से देखो तो यह अनन्त और अपार है। वह संसार के समाकार है क्योंकि संसार उसके अन्तर्गत है। मेरे सामने जो कुछ है-यह आश्रय, यह अतिथिशालाएं, नदी पर तैरने वाली नौकाएं, यह गराम खेत, वनउपवन, नदियां, नहरें, पर्वत, मरुस्थल वह उसकी तुलना नहीं कर सकते जो मुझमें है। मैं अपने विराट अन्तस्थल में असंख्य नगरों और सीमाशून्य पर्वतों को छिपाये हुए हूं, और इस विराट अन्तस्थल पर इच्छाएं उसी भांति आच्छादित हैं जैसे निशा पृथ्वी पर आच्छादित हो जाती है। मैं, केवल मैं, अविचार एक जगत हूं।’

सातवें महीने में इस्कन्द्रिया से बुबेस्तीस और सायम नाम की दो वंध्या स्त्रियां, इस लालसा में आयीं कि महात्मा के आशीवार्द और स्तम्भ के अलौकिक गुणों से उनके संतान होगी। अपनी ऊसर देह को पत्थर से रगड़ा। इन स्त्रियों के पीछे जहां तक निगाह पहुंचती थी, रथों, पालकियों और डोलियों का एक जुलूस चला आता था जो स्तम्भ के पास आकर रुक गया और इस देवपुरुष के दर्शन के लिए धक्काधक्का करने लगा। इन सवारियों में से ऐसे रोगी निकले जिनको देखकर हृदय कांप उठता था। माताएं ऐसे बालकों को लायी थीं जिनके अंग टे़े हो गये थे, आंखें निकल आयी थीं और गले बैठ गये थे। पापनाशी ने उनकी देह पर अपना हाथ रखा। तब अन्धे, हाथों से टटोलते, पापनाशी की ओर दो रक्तमय छिद्रों से ताकते हुए आये। पक्षाघात पीड़ित पराणियों ने अपने गतिशून्य सूखे तथा संकुचित अंगों की पापनाशी के सम्मुख उपस्थित किया। लंगड़ों ने अपनी टांगें दिखायीं। कछुई के रोग वाली स्त्रियां दोनों हाथों से अपनी छाती को दबाये हुए आयी और उसके सामने अपने जर्जर वक्ष खोल दिये। जलोदर के रोगी, शराब के पीपों की भांति फूले हुए, उसके सममुख भूमि पर लेटाये गये। पापनाशी ने इन समस्त रोगी पराणियों को आशीवार्द दिया। फीलपांव से पीड़ित हब्शी संभलसंभलकर चलते हुए आये और उसकी ओर करुण नेत्रों से ताकने लगे। उसने उनके ऊपर सलीब का चिह्न बना दिया। एक युवती बड़ी दूर से डोली में लायी गयी थी। रक्त उगलने के बाद तीन दिन से उसने आंखें न खोली थीं। वह एक मोम की मूर्ति की भांति दीखती थी और उसके मातापिता ने उसे मुर्दा समझकर उसकी छाती पर खजूर की एक पत्ती रख दी थी। पापनाशी ने ज्योंही ईश्वर से परार्थना की, युवती ने सिर उठाया और आंखें खोल दीं।

यात्रियों ने अपने घर लोटकर इन सिद्धियों की चचार की तो मिरगी के रोगी भी दौड़े। मिस्त्र के सभी परान्तों से अगणित रोगी आकर जमा हो गये। ज्योंही उन्होंने यह स्तम्भ देखा तो मूर्छित हो गये, जमीन पर लौटने लगे और उनके हाथपैर अकड़ गये। यद्यपि यह किसी को विश्वास न आयेगा, किन्तु वहां जितने आदमी मौजूद थे, सबके-सब बौखला उठे और रोगियों की भांति कुलांचें खाने लगे। पंडित और पुजारी, स्त्री और पुरुष सबके-सब तलेऊपर लोटनेपोटने लगे। सबों के अंग अकड़े हुए थे, मुंह से फिचकुर बहता था, मिट्टी से मुट्ठियां भरभरकर फांकते और अनर्गल शब्द मुंह से निकालते थे।

पापनाशी ने शिखर पर से यह कुतूहलजनक दृश्य देखा तो उसके समस्त शरीर में विप्लवसा होने लगा। उसने ईश्वर से परार्थना की-’भगवान्’, मैं ही छोड़ा हुआ बकरा हूं, और मैं अपने ऊपर इन सारे पराणियों के पापों का भार लेता हूं, और यही कारण है कि मेरा शरीर परेतों और पिशाचों से भरा हुआ है।’

जब कोई रोगी चंगा होकर जाता था तो लोग उसका स्वागत करते थे, उसका लुजूस निकालते थे, बाजे बजाते, फूल उड़ाते और उसके घर तक पहुंचाते थे, और लाखों कंठों से यह ध्वनि निकलती थी-’हमारे परभु मसीह फिर अवतरित हुए !’

बैसाखियों के सहारे चलने वाले दुर्बल रोगी जब आरोग्य लाभ कर लेते थे तो अपनी बैसाखियां इसी स्तम्भ में लटका देते थे। हजारों बैसाखियां लटकती हुई दिखाई देती थीं और परतिदिन उनकी संख्या ब़ती ही जाती थी। अपनी मुराद पाने वाली स्त्रियां फूल की माला लटका देती थीं। कितने ही यूनानी यात्रियों ने पापनाशी के परति श्रद्घामय दोहे अंकित कर दिये। जो यात्री आता था, वह स्तम्भ पर अपना नाम अंकित कर देता था। अतएव स्तम्भ पर जहां तक आदमी के हाथ पहुंच सकते थे, उस समय की समस्त लिपियों-लैटिन, यूनानी, मिस्त्री, इबरानी, सुरयानी और जन्दी-का विचित्र सम्मिश्रण दृष्टिगोचर था।

जब ईस्टर का उत्सव आया तो इस चमत्कारों और सिद्धियों के नगर में इतनी भीड़भाड़ हुई देशदेशान्तरों के यात्रियों का ऐसा जमघट हुआ कि बड़ेबड़े बुड्ढे कहते कि पुराने जादूगरों के दिन फिर लौट आये। सभी परकार के मनुष्य, नाना परकार के वस्त्र पहने हुए वहां नजर आते थे। मिस्त्रनिवासियों के धरीदार कपड़े, अरबों में ीले पाजामे, हब्शियों के श्वेत जांघिए, यूनानियों के ऊंचे चुगे, रोमनिवासियों के नीचे लबादे, असभ्य जातियों के लाल सुथने और वेश्याओं की किमखाब की पेशवाजें, भांतिभांति की टोपियों, मुड़ासों, कमरबन्दों और जूतों-इन सभी कलेवरों की झांकियां मिल जाती थीं। कहीं कोई महिला मुंह पर नकाब डाले, गधे पर सवार चली जाती थी, जिसके आगओगे हब्शी खोजे मुसाफिरों को हटाने के लिए छड़ियां घुमाते, ‘हटो, बचो, रास्ता दो’ का शोर मचाते रहते थे। कहीं बाजीगरों के खेल होते थे। बाजीगर जमींन पर एक जाजिम बिछाये, मौन दर्शकों के समान अद्भुत छलांगें मारता और भांतिभांति के करतब दिखाता था। कभी रस्सी पर च़कर ताली बाजाता, कभी बांस गाड़कर उस पर च़ जाता और शिखर पर सिर नीचे पैर ऊपर करके खड़ा हो जाता। कहीं मदारियों के खेल थे, कहीं बन्दरों के नाच, कहीं भालुओं की भद्दी नकलें। सपेरे पिटारियों में से सांप निकालकर दिखाते, हथेली पर बिच्छू दिखाते और सांप का विष उतारने वाली जड़ी बेचते थे। कितना शोर था, कितना धूल, कितनी चकमदमक। कहीं ऊंटवान ऊंटों को पीट रहा है। और जोरजोर से गालियां दे रहा है, कहीं फेहरी वाले गली में एक झोली लटकाये चिल्लाचिल्लाकर को़ की बातीजें और भूतपरेत आदि व्याधियों के मंत्र बेचते फिरते हैं, कहीं साधुगण स्वर मिलाकर बाइबिल के भजन गा रहे हैं, कहीं भेड़ें मिमिया रही हैं कहीं गधे रंेंग रहे हैं, मल्लाह यात्रियों को पुकारते हैं ‘देर मत करो !’ कहीं भिन्नभिन्न परान्तों की स्त्रियां अपने खोये हुए बालकों को पुकार रही हैं, कोई रोता है और कहीं खुशी में लोग आतिशबाजी छोड़ते हैं। इन समस्त ध्वनियों के मिलने से ऐसा शोर होता था कि कान के परदे फटे जाते थे। और इन सबसे परबल ध्वनि उन हब्शी लड़कों की थी जो गले फाड़कर खजूर बेचते फिरते थे। और इन समस्त जनसमूह को खुले हुए मैदान में भी सांस लेने को हवा न मयस्सर होती थी। स्त्रियों के कपड़ों की महक, हब्शियों के वस्त्रों की दुर्गन्ध, खाना पकाने के धुएं, और कपूर, लोहबान आदि की सुगन्ध से, जो भक्तजन महात्मा पापनाशी के सम्मुख जलाते थे, समस्त वायुमंडल दूषित हो गया था, लोगों के दम घुटने लगते थे।

जब रात आयी तो लोगों ने अलाव जलाये, मशालें और लालटेनें जलायी गयीं, किन्तु लाल परकाश की छाया और काली सूरतों के सिवा और कुछ न दिखाई देता था। मेले के एक तरफ एक वृद्ध पुरुष तेली धुआंती कुप्पी जलाये, पुराने जमाने की एक कहानी कह रहा था। श्रोता लोग घेरा बनाये हुए थे। बुड्े का चेहरा धुंधले परकाश में चमक रहा था। वह भाव बनाबनाकर कहानी कहता था, और उसकी परछाईं उसके परत्येक भाव को ब़ाबढ़ाकर दिखाती थी। श्रोतागण परछाईं के विकृत अभिनय देखदेखकर खुश होते थे। यह कहानी बिट्रीऊ की परेमकथा थी। बिट्रीऊ ने अपने हृदय पर जादू कर दिया था और छाती से निकालकर एक बबूल के वृक्ष में रखकर स्वयं वृक्ष का रूप धारण कर लिया था। कहानी पुरानी थी। श्रोताओं ने सैकड़ों ही बार इसे सुना होगा, किन्तु वृद्ध की वर्णशैली बड़ी चित्ताकर्षक थी। इसने कहानी को मजेदार बना दिया था। शराबखानों में मद के प्यासे कुरसियों पर लेटे हुए भांतिभांति के सुधारस पान कर रहे थे और बोतलें खाली करते चले जाते थे। नर्तकियां आंखों में सुरमा लगाये और पेट खोले उनके सामने नाचती और कोई धार्मिक या शृंगार रस का अभिनय करती थीं।

एकांत कमरों में युवकगण चौपड़ या कोई खेल खेलते थे, और वृद्धजन वेश्याओं से दिल बहला रहे थे। इन समस्त दृश्यों के ऊपर वह अकेला, स्थिर, अटल स्तम्भ खड़ा था। उसका गोरूपी कलश परकाश की छाया में मुंह फैलाये दिखाई देता था, और उसके ऊपर पृथ्वीआकाश के मध्य पापनाशी अकेला बैठा हुआ यह दृश्य देख रहा था। इतने में चांद ने नल के अंचल में से सिर निकाला, पहाड़ियां नीले परकाश में चमक उठीं और पापनाशी को ऐसा भासित हुआ मानो थायस की सजीव मूर्ति नाचते हुए जल के परकाश में चमकती, नीले गगन में निरालंब खड़ी है।

दिन गुजरते जाते थे और पापनाशी ज्यों का त्यों स्तम्भ पर आसन जमाये हुए था। वर्षाकाल आया तो आकाश का जल लकड़ी की छत से टपकटपक उसे भिगोने लगा। इससे सरदी खाकर उसके हाथपांव अकड़ उठे, हिलनाडोलना मुश्किल हो गया। उधर दिन को धूप की जलन और रात को ओस की शीत खातेखाते उसके शरीर की खाल फटने लगी और समस्त देह में घाव, छाले और गिल्टियां पड़ गयीं। लेकिन थायस की इच्छा अब भी उसके अन्तःकरण में व्याप्त थी और वह अन्तवेर्दना से पीड़ित होकर चिल्ला उठता था- ‘भगवान ! मेरी ओर भी सांसत कीजिए, और भी यातनाएं अभी पीछे पड़ी हुई हैं, विनाश वासनाएं अभी तक मन का मंथन कर रही हैं। भगवान्, मुझ पर पराणिमात्र की विषयवासनाओं का भार रख दीजिए, उन सबों को पराश्यिचत करुंगा। यद्यपि यह असत्य है कि यूनानी कुतिये ने समस्त संसार का पापभार अपने ऊपर लिया था, जैसा मैंने किसी समय एक मिथ्यावादी मनुष्य को कहते सुना था, लेकिन उस कथा में कुछ आशय अवश्य छिपा हुआ है जिसकी सचाई अब मेरी समझ में आ रही है, क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जनता के पाप धमार्त्माओं की आत्माओं में परविष्ट होते हैं और वह इस भांति विलीन हो जाते हैं, मानो कुएं में गिरे पड़े हों। यही कारण है कि पुण्यात्माओं के मन में जितना मल भरा रहता है, उतना पापियों के मन में कदापि नहीं रहता। इसलिए भगवान्, मैं तुझे धन्यवाद देता हूं कि तूने मुझे संसार का मलकुंड बना दिया है।

एक दिन उस पवित्र नगर में यह खबर उड़ी, और पापनाशी के कानों में भी पहुंची कि एक उच्च राज्यपदाधिकारी, जो इस्कन्द्रिया की जलसेना का अध्यक्ष था, शीघर ही उस शहर की सैर करने आ रहा है-नहीं बल्कि रवाना हो चुका है।

यह समाचार सत्य था। वयोवृद्ध कोटा, जो उस साल नील सागर की नदियों और जलमार्गों का निरीक्षण कर रहा था, कई बार इस महात्मा और इस नगर को देखने की इच्छा परकट कर चुका था। इस नगर का नाम पापनाशी ही के नाम पर ‘पापमोचन’ रखा गया था। एक दिन परभातकाल इस पवित्र भूमि के निवासियों ने देखा कि नील नदी श्वेत पालों से आच्छन्न हो गयी है। कोटा एक सुनहरी नौका पर, जिस पर बैंगनी रंग के पाल लगे हुए थे, अपनी समस्त नाविकशक्ति के आगओगे निशाना उड़ाता चला आता है। घाट पर पहुंचकर वह उतर पड़ा और अपने मन्त्री तथा अपने वैद्य अरिस्टीयस के साथ नगर की तरफ चला। मन्त्री के हाथ में नदी के मानचित्र आदि थे। और वैद्य से कोटा स्वयं बातें कर रहा था। वृद्घावस्था में उसे वैद्यराज की बातों में आनन्द मिलता था।
 
कोटा के पीछ सहस्त्रों मनुष्यों का जुलूस चला और जलतट पर सैनिकों की वर्दियां और राज्यकर्मचारियों के चुगेही-चुगे दिखाई देने लगे। इन चुगों में चौड़ी बैंगनी रंग की गांठ लगी थी, जो रोम की व्यवस्थापकसभा के सदस्यों का सम्मानचिह्न थी। कोटा उस पवित्र स्तम्भ के समीप रुक गया और महात्मा पापनाशी को ध्यान से देखने लगा। गरमी के कारण अपने चुगे के दामन से मुंह पर का पसीना वह पोंछता था। वह स्वभाव से विचित्र अनुभवों का परेमी था, और अपनी जलयात्राओं में उसने कितनी ही अद्भुत बातें देखी थीं। वह उन्हें स्मरण रखना चाहता था। उसकी इच्छा थी कि अपना वर्तमान इतिहासगरन्थ समाप्त करने के बाद अपनी समस्त यात्राओं का वृत्तान्त लिखे और जोजो अनोखी बातें देखी हैं उसका उल्लेख करे। यह दृश्य देखकर उसे बहुत दिलचस्पी हुई।

उसने खांसकर कहा-’विचित्र बात है ! और यह पुरुष मेरा मेहमान था। मैं अपने यात्रावृत्तान्त में वह अवश्य लिखूंगा। हां, गतवर्ष इस पुरुष ने मेरे यहां दावत खायी थी, और उसके एक ही दिन बाद एक वेश्या को लेकर भाग गया था।’

फिर अपने मन्त्री से बोला-’पुत्र, मेरे पत्रों पर इसका उल्लेख कर दो। इसे स्तम्भ की लम्बाईचौड़ाई भी दर्ज कर देना। देखना, शिखर पर जो गाय की मूर्ति बनी हुई है, उसे न भूलना।’

तब फिर अपना मुंह पोंछकर बोला-’मुझसे विश्वस्त पराणियों ने कहा है कि इस योगी ने साल भर से एक क्षण के लिए भी नीचे कदम नहीं रखा। क्यों अरिस्टीयस यह सम्भव है ! कोई पुरुष पूरे साल भर तक आकाश में लटका रह सकता है?’

अरिस्टीयस ने उत्तर दिया-किसी अस्वस्थ या उन्मत्त पराणी के लिए जो बात सम्भव है। आपको शायद यह बात न मालूम होगी कि कतिपय शरीरिक और मानसिक विकार न हो, असम्भव है। आपको शायद यह बात न मालूम होगी कि कतिपय शारीरिक और मानसिक विकारों से इतने अद्भुत शक्ति आ जाती है जो तन्दुरुस्त आदमियों में कभी नहीं आ सकती। क्योंकि यथार्थ में अच्छा स्वास्थ्य या बुरा स्वास्थ्य स्वयं कोई वस्तु नहीं है। वह शरीर के अंगपरत्यंग की भिन्नभिन्न दशाओं का नाममात्र है। रोगों के निदान से मैंने वह बात सिद्ध की है कि वह भी जीवन की आवश्यक अवस्थाएं हैं। मैं बड़े परेम से उनकी मीमांसा करता हूं, इसलिए कि उन पर विजय पराप्त कर सकूं। उनमें से कई बीमारियां परशंसनीय है और उनमें बहिर्विकार के रूप में अद्भुत आरोग्यवर्द्धक शक्ति छिपी रहती है। उदाहरणः कभीकभी शारीरिक विकारों से बुद्धिशक्तियां परखर हो जाती हैं, बड़े वेग से उनका विकास होने लगता है। आप सिरोन को तो जानते हैं। जब वल बालक था तो वह तुतलाकर बोलता था और मन्दबुद्धि था। लेकिन जब एक सी़ी पर से गिर जाने के कारण उसकी कपालित्र्कया हो गयी तो वह उच्चश्रेणी का वकील निकला, जैसाकि आप स्वयं देख रहे हैं। इस योगी का कोई गुप्त अंग अवश्य ही विकृत हो गया है। इनके अतिरिक्त इस अवस्था में जीवन व्यतीत करना इतनी असाधारण बात नहीं है, जितनी आप समझ रहे हैं। आपको भारतवर्ष के योगियों की याद है ? वहां के योगीगण इसी भांति बहुत दिनों तक निश्चल रह सकते हैं-एकदो वर्ष नहीं, बल्कि बीस, तीस, चालीस वर्षों तक। कभीकभी इससे भी अधिक। यहां तक कि मैंने तो सुना है कि वह निर्जल; निराहार सौसौ वर्षों तक समाधिस्थ रहते हैं।’

कोटा ने कहा-ईश्वर की सौगन्ध से कहता हूं, मुझे यह दशा अत्यन्त कुतूहलजनक मालूम हो रही है। यह निराले परकार का पागलपन है। मैं इसकी परशंसा नहीं कर सकता, क्योंकि मनुष्य का जन्म चलने और काम करने के निमित्त हुआ है और उद्योगहीनता सामराज्य के परति अक्षम्य अत्याचार है। मुझे ऐसे किसी धर्म का ज्ञान नहीं है जो ऐसी आपत्तिजनक त्रि्कयाओं का आदेश करता हो। सम्भव है, एशियाई सम्परदायों में इसकी व्यवस्था हो। जब मैं शाम (सीरिया) का सूबेदार था तो मैंने ‘हेरा’ नगर के द्वार पर एक ऊंचा चबूतरा बना हुआ देखा। एक आदमी साल में दो बार उस पर च़ता था और वहां सात दिनों तक चुपचाप बैठा रहता था। लोगों को विश्वास था कि यह पराणी देवताओं से बातें करता था और शाम देश को धनधान्यपूर्ण रखने के लिए उनसे विनय करता था। मुझे यह परथा निरर्थकसी जान पड़ी, किन्तु मैंने उसे उठाने की चेष्टा नहीं की। क्योंकि मेरा विचार है कि राज्यकर्मचारियों को परजा के रीतिरिवाजों में हस्तक्षेप न करना चाहिए, बल्कि इनको मयार्दित रखना उनका कर्तव्य है। शासकों की नीति कदापि न होनी चाहिए कि परजा को किसी विशेष मत की ओर खींचें, बल्कि उथको ‘उसी मत की रक्षा करनी चाहिए जो परचलित हो, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, क्योंकि देश, काल और जाति की परिस्थिति के अनुसार ही उसका जन्म और विकास हुआ है। अगर शासन किसी मत को दमन करने की चेष्टा करता है, तो वह अपने को विचारों में त्र्कान्तिकारी और व्यवहारों में अत्याचारी सिद्ध करता है, और परजा उससे घृणा करे तो सर्वथा क्षम्य है। फिर आप जनता के मिथ्या विचारों का सुधार क्योंकर कर सकते हैं अगर तुम उनको समझने और उन्हें निरक्षेप भाव से देखने में असमर्थ हैं ? अरिस्टोयस, मेरा विचार है कि इस पक्षियों के बसाये हुए मेघनगर को आकाश में लटका रहने दूं। उस पर नैसर्गिक शक्तियों का कोप ही क्या कम है कि मैं भी उसको उजाड़ने में अगरसर बनूं। उसके उजाड़ने से मुझे अपयश के सिवा और कुछ हाथ न लगेगा। हां, इस आकाश निवासी योगी के विचारों और विश्वासों को लेखबद्ध करना चाहिए।

यह कहकर उसने फिर खांसा और अपने मन्त्री के कन्धे पर हाथ रखकर बोला-’पुत्र, नोट कर लो कि ईसाई सम्परदाय के कुछ अनुयायियों के मतानुसार स्तम्भों के शिखर पर रहना और वेश्याओं को ले भागना सराहनीय कार्य है। इतना और ब़ा दो कि यह परथाएं सृष्टि करने वाले देवताओं की उपासना के परमाण हैं। ईसाई धर्म ईश्वरवादी होकर देवताओं के परभाव को अभी तक नहीं मिटा सका। लेकिन इस विषय में हमें स्वयं इस योगी ही से जिज्ञासा करनी चाहिए।

तब फिर उठाकर और धूप से आंखों को बचाने के लिए हाथों की आड़ करके उसने उच्चस्वर में कहा-इधर देखो पापनाशी ! अगर तुम अभी यह नहीं भूले हो कि तुम एक बार मेरे मेहमान रह चुके हो तो मेरी बातों का उत्तर दो। तुम वहां आकाश पर बैठे क्या कर रहे हो ? तुम्हारे वहां जाने का और रहने का क्या उद्देश्य है ? क्या तुम्हारा विचार है कि इस स्तम्भ पर च़कर तुम देश का कुछ कल्याण कर सकते हो ?

पापनाशी ने कोटा को केवल परतिमावादी तुच्छ दृष्टि से देखा और उसे कुछ उत्तर देने योग्य न समझा। लेकिन उसका शिष्य लेवियन समीप आकर बोला-’मान्यवर, वह ऋषि समस्त भूमण्डल के पापों को अपने ऊपर लेता और रोगियों को आरोग्य परदान करता है।’

कोटा-’कसम खुदा की, यह तो बड़ी दिल्लगी की बात है तुम कहते हो अरिस्टीयस, यह आकाशवासी महात्मा चिकित्सा करता है। यह तो तुम्हारा परतिवादी निकला। तुम ऐसे आकाशरोही वैद्य से क्योंकर पेश पा सकोगे ?’

अरिस्टीयस ने सिर हिलाकर कहा-यह बहुत सम्भव है कि वह बाजेबाजे रोगों की चिकित्सा करने में मुझसे कुशल हो। अदाहरणतः मिरगी ही को ले लीजिए। गंवारी बोलचाल में लोग इसे ‘देवरोग’ कहते हैं, यद्यपि सभी रोग दैवी हैं, क्योंकि उनके सृजन करने वाले तो देवगण ही हैं। लेकिन इस विशेष रोग का कारण अंशतः कल्पनाशक्ति में है और आप यह रोगियों की कल्पना पर जितना परभाव डाल सकता है, उतना मैं अपने चिकित्सालय में खरल और दस्ते से औषधियों घोंटकर कदापि नहीं डाल सकता। महाशय, कितनी ही गुप्त शक्तियां हैं जो शास्त्र और बुद्धि से कहीं ब़कर परभावोत्पादक हैं।’

कोटा-’वह कौन शक्तियां हैं ?’

अरिस्टीयस-’मूर्खता और अज्ञान।’

कोटा-’मैंने अपनी बड़ीबड़ी यात्राओं में भी इससे विचित्र दृश्य नहीं देखा, और मुझे आशा है कि कभी कोई सुयोग्य इतिहासलेखक ‘मोचननगर’ की उत्पत्ति का सविस्तार वर्णर करुंगा। लेकिन हम जैसी बहुधन्धी मनुष्यों को किसी वस्तु के देखने में चाहे वह कितनाही कुतूहलजनक क्यों न हो, अपना बहुत समय न गंवाना चाहिए। चलिए, अब नहरों का निरीक्षण करें। अच्छा पापनाशी, नमस्कार। फिर कभी आऊंगा। लेकिन अगर तुम फिर कभी पृथ्वी पर उतरो और इस्कन्द्रिया आने का संयोग हो तो मुझे न भूलना। मेरे द्वार तुम्हारे स्वागत के लिए नित्य खुले हैं। मेरे यहां आकर अवश्य भोजन करना।’

हजारों मनुष्यों ने कोटा के यह शब्द सुने। एक ने दूसरे से कहा-ईसाइयों में और भी नमक मिर्च लगाया। जनता किसी की परशंसा बड़े अधिकारियों के मुंह से सुनती है तो उसकी दृष्टि में उस परशंसित मनुष्य का आदरसम्मान सतगुण अधिक हो जाता है। पापनाशी की ओर भी ख्याति होने लगी। सरलहृदय मतानुरागियों ने इन शब्दों को और भी परिमार्जित और अतिशयोक्तिपूर्ण रूप दे दिया। किंवदन्तियां होने लगीं कि महात्मा पापनाशी ने स्तम्भ के शिखर पर बैठेबैठे, जलसेना के अध्यक्ष को ईसाई धर्म का अनुगामी बना लिया। उसके उपदेशों में यह चमत्कार है कि सुनते ही बड़ेबड़े नास्तिक भी मस्तक झुका देते हैं। कोटा के अन्तिम शब्दों में भक्तों को गुप्त आशय छिपा हुआ परतीत हुआ। जिस स्वागत की उस उच्च अधिकारी ने सूचना दी थी वह साधारण स्वागत नहीं था। वह वास्तव में एक आध्यात्मिक भोज, एक स्वगीर्य सम्मेलन, एक पारलौकिक संयोग का निमंत्रण था। उस सम्भाषण की कथा का बड़ा अद्भुत और अलंकृत विस्तार किया गया। और जिनजिन महानुभावों ने यह रचना की उन्होंने स्वयं पहले उस पर विश्वास किया। कहा जाता था कि जब कोटा ने विशद तर्कवितर्क के पश्चात सत्य को अंगीकार किया और परभु मसीह की शरण में आया तो एक स्वर्गदूत आकाश से उसके मुंह का पसीना पोंछने आया। यह भी कहा जाता था कि कोटा के साथ उसके वैद्य और मन्त्री ने भी ईसाई धर्म स्वीकार किया। मुख्य ईसाई संस्थाओं के अधिष्ठाताओें ने यह अलौकिक समाचार सुना तो ऐतिहासिक घटनाओं में उसका उल्लेख किया। इतने ख्यातिलाभ के बाद यह कहना किंचित मात्र भी अतिशयोक्ति न थी कि सारा संसार पापनाशी के दर्शनों के लिए उत्कंठित हो गया। पराच्य और पाश्चात्य दोनों ही देशों के ईसाइयों की विस्मित आंखें उनकी ओर उठने लगीं। इटली के परधान नगरों ने उसके नाम अभिनन्दनपत्र भेजे और रोम के कैंसर कॉन्स्टैनटाइन ने, जो ईसाई धर्म का पक्षपाती था उनके पास एक पत्र भेजा। ईसाई दूत इस पत्र को बड़े आदरसम्मान के साथ पापनाशी के पास लाये। लेकिन एक रात को जब वह नवजात नगर हिम की चादर ओ़े सो रहा था, पापनाशी के कानों में यह शब्द सुनाई दिये-पापनाशी, तू अपने कर्मों से परसिद्ध और अपने शब्दों से शक्तिशाली हो गया है। ईश्वर ने अपनी कीर्ति को उज्ज्वल करने के लिए तुझे इस सवोर्च्च पद पर पहुंचाया है। उसने तुझे अलौकिक लीलाएं दिखाने, रोगियों को आरोग्य परदान करने, नास्तिकों को सन्मार्ग पर लाने, पापियों का उद्घार करने, एरियन के मतानुयायियों के मुख में कालिमा लगाने और ईसाई जगत में शान्ति और सुखसामराज्य स्थापित करने के लिए नियुक्त किया है।’

पापनाशी ने उत्तर दिया-’ईश्वर की जैसी आज्ञा।’

फिर आवाज आयी थी-’पापनाशी, उठ जा, और विधमीर कॉन्सटेन्स को उसके राज्यपरासाद में सन्मार्ग पर ला, जो अपने पूज्य बन्धु कॉन्सटेनटाइन का अनुकरण न करके एरियस और माक्र्स के मिथ्यावाद में फंसा हुआ है। जा, विलम्ब न कर। अष्टधातु के फाटक तेरे पहंुचते ही आपही-आप खुल जायेंगे, और तेरी पादुकाओं की ध्वनि; कैसरों के सिंहासन के सम्मुख सजे भवन की स्वर्णभूमि पर परतिध्वनित होगी और तेरी परतिभामय वाणी कॉन्स्टैनटाइन के पुत्र के हृदय को परास्त कर देगी। संयुक्त और अखण्ड ईसाई सामराज्य पर राज्य करेगा और जिस परकार जीव देह पर शासन करता है, उसी परकार ईसाई धर्म सामराज्य पर शासन करेगा। धनी, रईस, राजयाधिकारी, राज्यसभा के सभासद सभी तेरे अधीन हो जायेंगे। तू जनता को लोभ से मुक्त करेगा और असभ्य जातियों के आत्र्कमणों का निवारण करेगा। वृद्ध कोटा जो इस समय नौकाविभाग का परधान है। तुझे शासन का कर्णधार बना हुआ देखकर तेरे चरण धोयेगा। तेरे शरीरान्त होने पर तेरी मृतदेह इस्कन्द्रिया जायेगी और वहां का परधान मठधारी उसे एक ऋषि का स्मारकचिह्न समझकर उसका चुम्बन करेगा ! जा !’

पापनाशी ने उत्तर दिया-’ईश्वर की जैसी आज्ञा !’
 
यह कहकर उसने उठकर खड़े होने की चेष्टा की, किन्तु उस आवाज ने उसकी इच्छा को ताड़कर कहा-’सबसे महत्व की बात यह है कि तू सी़ी द्वारा मत उतर ! यह तो साधारण मनुष्यों कीसी बात होगी। ईश्वर ने तुझे अद्भुत शक्ति परदान की है। तुझ जैसे परतिभाशाली महात्मा को वायु में उड़ना चाहिए। नीचे कूद पड़, स्वर्ग के दूत तुझे संभालने के लिए खड़े हैं, तुरन्त कूद पड़।’

पापनाशी न उत्तर दिया-’ईश्वर की इस संसार में उसी भांति विषय हो जैसे स्वर्ग में है!’

अपनी विशाल बांहें फैलाकर, मानो कि बृहदाकर पक्षी ने अपने छिदरे पंख फैलाये हों, वह नीचे कूदने वाला ही था कि सहसा एक डरावनी, उपहाससूचक हास्यध्वनि उसके कानों में आयी। भीत होकर उसने पूछा-यह कौन हंस रहा है।’

उस आवाज ने उत्तर दिया-’चौंकते क्यों हो ? अभी तो तुम्हारी मित्रता का आरम्भ हुआ है। एक दिन ऐसा आयेगा जब मुझसे तुम्हारा परिचय घनिष्ठ हो जायेगा। मित्रवर, मैंने ही तुझे इस स्तम्भ पर च़ने की परेरणा की थी और जिस निरापदभाव से तुमने मेरी आज्ञा शिरोधार्य की उससे मैं बहुत परसन्न हूं। पापनाशी, मैं तुमसे बहुत खुश हूं।’

पापनाशी ने भयभीत होकर कहा-’परभु, परभु ! मैं तुझे अब पहचान गया, खूब पहचान गया। तू ही वह पराणी है जो परभु मसीह को मन्दिर के कलश पर ले गया था और भूमंडल के समस्त सामराज्यों का दिग्दर्शन कराया था।’

‘तू शैतान है ! भगवान्, तुम मुझसे क्यों पराङ्मुख हो ?’

वह थरथर कांपता हुआ भूमि पर गिर पड़ा और सोचने लगा-

मुझे पहले इसका ज्ञान क्यों न हुआ ? मैं उन नेत्रहीन, वधिर और अपंग मनुष्यों से भी अभागा हूं जो नित्य शरण आते हैं। मेरी अन्तर्दृष्टि सर्वथा ज्योतिहीन हो गयी है, मुझे दैवी घटनाओं का अब लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता और अब मैं उन भरष्टबुद्धि पागलों की भांति हूं जो मिट्टी फांकते हैं और मुर्दों की लाशें घसीटते हैं। मैं अब नरक के अमंगल और स्वर्ग के मधुर शब्दों में भेद करने के योग्य नहीं रहा। मुझसे अब उस नवजात शिशु का नैसर्गिक ज्ञान भी नहीं रहा जो माता के स्तनों के मुंह से निकल जाने पर रोता है, उस कुत्ते कासा भी, जो अपने स्वामी के पद चिह्नों की गन्ध पहचानता है, उस पौधे (सूर्यमुखी) कासा भी जो सूर्य की ओर अपना मुख फेरता रहता है। मैं परेतों और पिशाचों के परिहास का केन्द्र हूं। यह सब मुझ पर तालियां बजा रहे हैं, जो अब ज्ञात हुआ, कि शैतान ही मुझे यहां खींचकर लाया। जब उसने मुझे इस स्तम्भ पर च़ाया तो वासना और अहंकार दोनों ही मेरे साथ च़ आये ! मैं केवल अपनी इच्छाओं के विस्तार ही से शंकायमान नहीं होता। एटोनी भी अपनी पर्वतगुफा में ऐसे ही परलोभनों से पीड़ित है। मैं चाहता हूं कि इन समस्त पिशाचों की तलवार मेरी देह को छेद स्वर्गदूतों के सम्मुख मेरी धज्जियां उड़ा दी जायें। अब मैं अपनी यातनाओं से परेम करना सीख गया हूं। लेकिन ईश्वर मुझसे नहीं बोलता, उसका एक शब्द भी मेरे कानों में नहीं आता। उसका यह निर्दय मौन, यह कठोर निस्तब्धता आश्चर्यजनक है। उसने मुझे त्याग दिया है-मुझे, जिसका उसके सिवा और कोई अवलम्ब न था। वह मुझे इस आफत में अकेला निस्सहाय छोड़े हुए है। वह मुझसे दूर भागता है, घृणा करता है। लेकिन मैं उसका पीछा नहीं छोड़ सकता। यहां मेरे पैर जल रहे हैं, मैं दौड़कर उसके पास पहुंचूंगा।

यह कहते ही उसने वह सी़ी थाम ली जो स्तम्भ के सहारे खड़ी थी, उस पर पैर रखे और एक डण्डा नीचे उतरा कि उसका मुख गोरूपी कलश के सम्मुख आ गया। उसे देखकर गोमूर्ति विचित्र रूप से मुस्कराई। उसे अब इसमें कोई सन्देह न था कि जिस स्थान को उसने शांतिलाभ और सत्कीर्ति के लिए पसंद किया था, वह उसके सर्वनाश और पतन का सिद्ध हुआ। वह बड़े वेग से उतरकर जमीन पर आ पहुंचा। उसके पैरों को अब खड़े होने का भी अभ्यास न था, वे डगमगाते थे। लेकिन अपने ऊपर इस पैशाचिक स्तंभ की परछाईं पड़ते देखकर वह जबरदस्ती दौड़ा, मानो कोइर कैदी भाग जाता हो। संसार निद्रा में मग्न था। वह सबसे छिपा हुआ उस चौक से होकर निकला जिसके चारों ओर शराब की दुकानें, सराएं, धर्मशालाएं बनी हुई थीं और एक गली में घुस गया, जो लाइबिया की पहाड़ियों की ओर जाती थी। विचित्र बात यह थी कि एक कुत्ता भी भूंकता हुआ उसका पीछा कर रहा था और जब एक मरुभूमि के किनारे तक उसे दौड़ा न ले गया, उसका पीछा न छोड़ा। पापनाशी ऐसे देहातों में पहुंचा जहां सड़कें या पगडंडियां न थीं, केवल वनजन्तुओं के पैरों के निशान थे। इस निर्जन परदेश में वह एक दिन और रात लगातार अकेला भागता चला गया।

अन्त में जब वह भूख, प्यास और थकान से इतना बेदम हो गया कि पांव लड़खड़ाने लगे, ऐसा जान पड़ने लगा कि अब जीता न बचूंगा तो वह एक नगर में पहुंचा जो दायेंबायें इतनी दूर तक फैला हुआ था कि उसकी सीमाएं नीले क्षितिज में विलीन हो जाती थीं। चारों ओर निस्तब्धता छायी हुई थी, किसी पराणी का नाम न था। मकानों की कमी न थी, पर वह दूरदूर पर बने हुए थे, और उन मिस्त्री मीनारों की भांति दीखते थे जो बीच में काट लिये गये हों। सबों की बनावट एकसी थी, मानो एक ही इमारत की बहुतसी नकलें की गयी हों। वास्तव में यह सब कबरें थीं। उनके द्वार खुले ओर टूटे हुए थे, और उनके अन्दर भेड़ियों और लकड़बग्घों की चमकती हुई आंखें नजर आती थीं, जिन्होंने वहां बच्चे दिये थे। मुर्दे कबरों के सामने बाहर पड़े हुए थे जिन्हें डाकुओं ने नोचखसोट लिया था और जंगली जानवरों ने जगहजगह चबा डाला था। इस मृतपुरी में बहुत देश तक चलने के बाद पापनाशी एक कबर के सामने थककर गिर पड़ा, जो छुहारे के वृक्षों से ंके हुए एक सोते के समीप थी। यह कबर खूब सजी हुई थी, उसके ऊपर बेलबूटे बने हुए थे, किन्तु कोई द्वार न था। पापनाशी ने एक छिद्र में से झांका तो अन्दर एक सुन्दर, रंगा हआ तहखाना दिखाई पड़ा जिसमें सांपों के छोटेछोटे बच्चे इधरउधर रेंग रहे थे। उसे अब भी यही शंका हो रही थी कि ईश्वर ने मेरा हाथ छोड़ दिया है और मेरा कोई अवलम्ब नहीं है।

उसने एक दिन दीर्घ नि:श्वास लेकर कहा-’इसी स्थान में मेरा निवास होगा, यही कबर अब मेरे परायश्चित और आत्मदमन का आश्रयस्था न होगी।’

उसके पैर तो उठ न सकते थे, लेटेलेटे खिसकता हुआ वह अन्दर चला गया, सांपों को अपने पैरों से भगा दिया और निरन्तर अठारह घण्टों तक पक्की भूमि पर सिर रखे हुए औंधे मुंह पड़ा रहा। इसके पश्चात वह उस जलस्त्रोत पर गया और चिल्लू से पेट भर पानी पिया। तब उसने थोड़े छुहारे तोड़े और कई कमल की बेलें निकाकर कमल गट्टे जमा किये। यही उसका भोजन था। क्षुआ और तृषा शान्त होने पर उसे ऐसा अनुमान हुआ कि यहां वह सभी विघ्नबाधाओं से मुक्त होकर कालक्षेप कर सकता है। अतएव उसने इसे अपने जीवन का नियम बना लिया। परातःकाल से संध्या तक वह एक क्षण के लिए भी सिर ऊपर न उठाता था।

एक दिन जब वह इस भांति औंधे मुंह पड़ा हुआ था तो उसके कानों में किसी के बोलने की आवाज आयी-ष्पााणाचित्रों को देख, तुझे ज्ञान पराप्त होगा।

यह सुनते ही उसने सिर उठाया और तहखाने की दीवारों पर दृष्टिपात किया तो उसे चारों ओर सामाजिक दृश्य अंकित दिखाई दिये। जीवन की साधारण घटनाएं जीतीजागती मूर्तियों द्वारा परकट की गयी थीं। यह बड़े पराचीन समय की चित्रकारी थी और इतनी उत्तम कि जान पड़ता मूर्तियां अब बोलना ही चाहती हैं। चित्रकार ने उनमें जान डाल दी थी। कहीं कोई नानबाई रोटियां बना रहा था और गोलों को कुप्पी की तरह फुलाकर आग फूंकता था, कोई बतखों के पर नोंच रहा था ओैर कोई पतीलियों में मांस पका रहा था। जरा और हटकर एक शिकारी कन्धों पर हिरन लिये जाता था जिसकी देह में बाण चुभे दिखाई देते थे। एक स्थान पर किसान खेती का कामकाज करते थे। कोई बोता था, कोई काटता था, कोई अनाज बखारों से भर रहा था। दूसरे स्थान पर कई स्त्रियां वीणा, बांसुरी और तम्बूरों पर नाच रही थीं। एक सुन्दर युवती सितार बजा रही थी। उसके केशों में कमल का पुष्प शोभा दे रहा था। केश बड़ी सुन्दरता से गुंथे हुए थे। उसके स्वच्छ महीन कपड़ों से उसके निर्मल अंगों की आभा झलकती थी। उसके मुख और वक्षस्थल की शोभा अद्वितीय थी। उसका मुख एक ओर को फिरा हुआ था, पर कमलनेत्र सीधे ही ताक रहे थे। सवारंग अनुपम, अद्वितीय, मुग्धकर था। पापनाशी ने उसे देखते ही आंखें नीची कर लीं और उस आवाज को उत्तर दिया-’तू मुझे इन तस्वीरों का अवलोकन करने का आदेश क्यों देता है। इसमें तेरी क्या इच्छा है ? यह सत्य है कि इन चित्रों में परतिमावादी पुरुष के सांसारिक जीवन का अंकन किया गया है जो यहां मेरे पैरों के नीचे* एक कुएं की तह में, काले पत्थर के सन्दूक में बन्द, गड़ा हुआ है। उनसे एक मरे हुए पराणी की याद आती है, और यद्यपि उनके रूप बहुत चमकीले हैं, पर यथार्थ में वह केवल छाया नहीं, छाया की छाया है, क्योंकि मानवजीवन स्वयं छायामात्र है। मृतदेह का इतना महत्व इतना गर्व !’

उस आवाज ने उत्तर दिया-’अब वह मर गया है लेकिन एक दिन जीवित था। लेकिन तू एक दिन मर जायेगा और तेरा कोई निशान न होगा। तू ऐसा मिट जायेगा मानो कभी तेरा जन्म ही नहीं हुआ था।’

उस दिन से पापनाशी का चित्त आठों पहर चंचल रहने लगा। एक पल के लिए उसे शान्ति न मिलती। उस आवाज की अविश्रान्त ध्वनि उसके कानों में आया करती। सितार बजाने वाली युवती अपनी लम्बी पलकों के नीचे सक उसकी ओर टकटकी लगाये रहती। आखिर एक दिन वह भी बोली-’पापनाशी, इधर देख ! मैं कितनी मायाविनी और रूपवती हूं ! मुझे प्यार क्यों नहीं करता ? मेरे परेमालिंगन में उस परेमदाह को शान्त कर दे जो तुझे विकल कर रहा है। मुझसे तू व्यर्थ आशंकित है। तू मुझसे बच नहीं सकता, मेरे परेमपाशों से भाग नहीं सकता ! मैं नारी सौन्दर्य हूं। हतबुद्धि ! मूर्ख ! तू मुझसे कहां भाग जाने का विचार करता है ? तुझे कहां शरण मिलेगी ? तुझे सुन्दर पुष्पों की शोभा में, खजूर के वृक्षों के फूलों में, उसकी फलों से लदी हुई डालियों में, कबूतरों के पर में, मृगाओं की छलांगों में, जलपरपातों के मधुर कलरव में, चांद की मन्द ज्योत्स्ना में, तितलियों के मनोहर रंगों में, और यदि अपनी आंखें बंद कर लेगा, तो अपने
 
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