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अलिफ लैला की रहस्यमई कहानियाँ

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अलिफ लैला की रहस्यमई कहानियाँ

शहरयार और शाहजमाँ की कहानी

फारस देश भी हिंदुस्तान और चीन के समान था और कई नरेश उसके अधीन थे। वहाँ का राजा महाप्रतापी और बड़ा तेजस्वी था और न्यायप्रिय होने के कारण प्रजा को प्रिय था। उस बादशाह के दो बेटे थे जिनमें बड़े लड़के का नाम शहरयार और छोटे लड़के का नाम शाहजमाँ था। दोनों राजकुमार गुणवान, वीर धीर और शीलवान थे। जब बादशाह का देहांत हुआ तो शहजादा शहरयार गद्दी पर बैठा और उसने अपने छोटे भाई को जो उसे बहुत मानता था तातार देश का राज्य, सेना और खजाना दिया। शाहजमाँ अपने बड़े भाई की आज्ञा में तत्पर हुआ और देश के प्रबंध के लिए समरकंद को जो संसार के सभी शहरों से उत्तम और बड़ा था अपनी राजधानी बनाकर आराम से रहने लगा। जब उन दोनों को अलग हुए दस वर्ष हो गए तो बड़े ने चाहा कि किसी को भेजकर उसे अपने पास बुलाए। उसने अपने मंत्री को उसे बुलाने की आज्ञा दी और मंत्री यह आज्ञा पाकर बड़ी धूमधाम से विदा हुआ। जब वह समरकंद शहर के समीप पहुँचा तो शाहजमाँ यह समाचार सुनकर उसकी अगवानी को सेना लेकर अपनी राजधानी से रवाना हुआ और शहर के बाहर पहुँचकर मंत्री से मिला। वह उसे देखकर प्रसन्न हुआ। शाहजमाँ अपने भाई शहरयार का कुशलक्षेम पूछने लगा। मंत्री ने शाहजमाँ को दंडवत कर उसके भाई का हाल कहा।

वह मंत्री बादशाह शहरयार का परम आज्ञा पालक था और उससे प्रेम करता था। शाहजमाँ ने उससे कहा कि भाई! मेरे अग्रज ने तुम्हें मुझे लेने को भेजा इस बात से मुझको अत्यंत हर्ष हुआ। उनकी आज्ञा मेरे शिरोधार्य है। अगर भगवान ने चाहा तो दस दिन में यात्रा की तैयारी कर के और शासन में अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर तुम्हारे साथ चलूँगा। तुम्हारे और तुम्हारी सेना के लिए खाने-पीने का प्रबंध सब यहीं हो जाएगा। अतएव तुम इसी स्थान पर ठहरो। अतएव उसी स्थान पर खाने-पीने आदि की व्यवस्था कर दी गई और वे वहाँ रहे।

इस अवसर पर बादशाह ने यात्रा की तैयारियाँ की और अपनी जगह अपने विश्वास पात्र मंत्री को नियुक्त किया। एक दिन सायं अपनी बेगम से जो उसे अति प्रिय थी विदा ली और अपने सेवकों और मुसाहिबों को लेकर समरकंद से चला और अपने खेमे में पहुँचकर मंत्री के साथ बातचीत करने लगा। आधी रात होने पर उसकी इच्छा हुई कि एक बार बेगम से फिर मिल आऊँ। वह सबसे छुपकर अकेला ही महल में पहुँचा। बेगम को उसके आने का संदेह तक न था; वह अपने एक तुच्छ और कुरूप सेवक के साथ सो रही थी।

शाहजमाँ सोचकर आया था कि बेगम उसे देखकर अति प्रसन्न होगी। उसे दूसरे मर्द के साथ सोते देखकर एक क्षण के लिए उसे काठ मार गया। कुछ सँभलने पर सोचने लगा कि कहीं मुझे दृष्टि-भ्रम तो नहीं हो गया। लेकिन भलीभाँति देखने पर भी जब वही बात पाई तो सोचने लगा यह कैसा अनर्थ है कि मैं अभी समरकंद नगर की रक्षा भित्ति से बाहर भी नहीं निकला और ऐसा कर्म होने लगा। वह क्रोधाग्नि में जलने लगा और उसने तलवार निकालकर ऐसे हाथ मारे कि दोनो के सिर कट कर पलँग के नीचे आ गए। इसके बाद दोनों शवों को पिछवाड़े की खिड़की से नीचे गड्ढे में फेंककर वह अपने खेमे में वापस आ गया। उसने किसी से रात की बात न बताई।

दूसरे दिन प्रातः ही सेना चल पड़ी। उसके साथ के और सब लोग तो हँसी-खुशी रास्ता काट रहे थे किंतु शाहजमाँ अपनी बेगम के पाप कर्म को याद कर के दुखी रहता था और दिनों दिन उसका मुँह पीला पड़ता जाता था। उसकी सारी यात्रा इसी कष्ट में बीती।

जब वह हिंदुस्तान की राजधानी के समीप पहुँचा और शहरयार ने यह सुना तो वह अपने सारे दरबारियों को लेकर शाहजमाँ की अभ्यर्थना के लिए आया। जब दोनों एक-दूसरे के पास पहुँचे तो अपने-अपने घोड़े से उतर कर गले मिले और कुछ देर तक एक-दूसरे की कुशलक्षेम पूछ कर बड़े समारोहपूर्वक रवाना हुए। शहरयार ने शाहजमाँ को उस महल में ठहराया जो उसके लिए पहले से सजाया गया था और जहाँ से उद्यान दिखाई देता था। वह महल बड़ा और राजाओं के स्वागतयोग्य था। फिर शहरयार ने अपने भाई से स्नान करने को कहा। शाहजमाँ ने स्नान कर के नए कपड़े पहने और दोनों भाई महल के मंच पर बैठकर देर तक वार्तालाप करते रहे। सारे दरबारी दोनों बादशाहों के सामने अपने-अपने उपयुक्त स्थान पर खड़े रहे। भोजनोपरांत भी दोनों बादशाह देर तक बातें करते रहे।

जब रात बहुत बीत गई तो शहरयार अपने भाई को आतिथ्य गृह में छोड़कर अपने महल को चला गया। शाहजमाँ फिर शोकाकुल होकर अपने पलँग पर आँसू बहाता हुआ लोटता रहा। भाई के सामने वह अपना दुख छुपाए रहा लेकिन अकेला होते ही उस पर वही दुख सवार हो गया और उसकी पीड़ा ऐसी बढ़ गई जैसे उसकी जान लेकर ही छोड़ेगी। वह एक क्षण के लिए भी अपनी बेगम का दुष्कर्म भुला नहीं पाता था। वह अक्सर हाय हाय कर उठता और हमेशा ठंडी साँसें भरा करता। उसे रातों को नींद नहीं आती थी। इसी दुख और चिंता में उसका शरीर धीरे-धीरे घुलने लगा।

शहरयार ने उसकी यह दशा देखी तो विचार किया कि मैं शाहजमाँ से इतना प्रेम करता हूँ और उसकी सुख-सुविधा का इतना खयाल रखता हूँ फिर भी सदैव ही इसे शोक सागर में निमग्न देखता हूँ। मालूम नहीं इसे अपने राज्य की चिंता खाए जाती है या अपनी बेगम का विछोह सताता है। मैंने इसे यहाँ बुलाकर बेकार ही इसे शोक संताप में डाल दिया। अब उचित होगा कि इसे समझा-बुझा कर और उत्तमोत्तम भेंट वस्तुएँ देकर समरकंद वापस भेज दूँ ताकि इसका दुख दूर हो सके। यह सोचकर उसने हिंदुस्तान देश की बहुमूल्य वस्तुएँ थालों में लगाकर शाहजमाँ के पास भेजीं और उसका जी बहलाने के लिए तरह-तरह के खेल-तमाशे करवाए लेकिन शाहजमाँ की उदासी कम नहीं हुई बल्कि बढ़ती ही गई। फिर शहरयार ने अपने दरबारियों से कहा कि सुना है यहाँ से दो दिनों की राह के बाद एक घना जंगल है और वहाँ अच्छा शिकार मिलता है इसलिए मैं वहाँ शिकार खेलने जाना चाहता हूँ; तुम लोग भी तैयार होकर मेरे साथ चलो और शाहजमाँ से भी चलने को कहो क्योंकि शिकार में उसका जी लगेगा और उसका चित्त प्रसन्न होगा। शाहजमाँ ने निवेदन किया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, इस कारण मुझे शिकार पर जाने से माफ करें। शहरयार ने कहा - अच्छी बात है, अगर तुम्हारा यहीं रहने को जी चाहता है तो रहो लेकिन मैं तैयारी कर चुका हूँ, मेरे अपने भृत्यों के साथ शिकार के लिए जाता हूँ।

शहरयार के जाने के बाद शाहजमाँ ने अपने निवास स्थान के द्वार अंदर से बंद कर लिए और एक खिड़की पर जा बैठा। वहाँ से शाही महल का उद्यान दिखाई देता था। शाहजमाँ सुवासित पुष्पों और पक्षियों के कलरव से अपना जी बहलाने लगा। लेकिन मकान और बाग की शोभा से जी बहलाने पर भी उसे अपनी पत्नी के दुराचार की कचोट बनी रहती।

जब संध्या हुई तो शाहजमाँ ने देखा कि राजमहल का एक चोर दरवाजा खुला और उसमें से शहरयार की बेगम बीस अन्य स्त्रियों के साथ निकली। वे सब उत्तम वस्त्रों और अलंकारों से शोभित थीं और इस विश्वास के साथ कि सब लोग शिकार पर चले गए हैं, बाग में आ गईं। शाहजमाँ खिड़की में छुप कर बैठ गया और देखने लगा कि वे क्या करती हैं।

दासियों ने उन लबादों को उतार डाला जो पहन कर वे महल से निकली थीं। अब उनकी सूरत स्पष्ट दिखाई देने लगी। शाहजमाँ को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिन बीसों को उसने स्त्री समझा था उनमें से दस हब्शी मर्द थे। उन दसों ने अपनी-अपनी पसंद की दासी का हाथ पकड़ लिया। सिर्फ बेगम बगैर मर्द की रह गई। फिर बेगम ने आवाज दी, 'मसऊद, मसऊद'। इस पर एक हृष्ट-पुष्ट हब्शी युवक जो उसकी आज्ञा की प्रतीक्षा में था एक वृक्ष से उतर कर बेगम की ओर दौड़ा और उसका हाथ पकड़ लिया। उन ग्यारह हब्शियों ने दस दासियों और बेगम के साथ क्या किया उसका वर्णन मैं लज्जावश नहीं कर सकूँगा। इसी भाँति वे आधी रात तक बाग में विहार करते रहे। फिर बाग के हौज में नहा कर बेगम और उसके साथ आए बीस मर्द औरतों ने अपने कपड़े पहने और जिस चोर दरवाजे से आए थे उसी से महल में चले गए और मसऊद भी बाग की दीवार फाँद कर बाहर चला गया।

यह कांड देखकर शाहजमाँ को घोर आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि मैं तो दुखी हूँ ही, मेरा बड़ा भाई मुझ से भी अधिक दुखी है। यद्यपि वह अत्यंत शक्तिशाली और वैभवशाली है तथापि इस दुष्कर्म को रोकने में असमर्थ है, फिर मैं इतना शोक क्यों करूँ। जब मुझे मालूम हो गया कि यह नीच कर्म संसार में अक्सर ही होता है तो मैं बेकार ही स्वयं को शोक सागर में डुबोए दे रहा हूँ। यह सोचकर उसने सारी चिंता छोड़ दी और साधारण रूप से रहने लगा। पहले उसकी भूख मिट गई थी, अब वह जाग गई और वह नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन मँगाकर खाने लगा और संगीत-नृत्य आदि का आनंद लेने लगा।

जब शहरयार शिकार से लौटा तो शाहजमाँ ने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उसका स्वागत किया। शहरयार ने उसे शिकार किए हुए बहुत से जानवर दिखाए और कहा कि बड़े खेद की बात है कि तुम शिकार पर नहीं गए, वहाँ बड़े आनंद की जगह है। शाहजमाँ बादशाह की हर बात का हँसी-खुशी उत्तर देता था। शहरयार ने सोचा था कि वापसी पर भी शाहजमाँ को दुख और शोक में डूबा पाएगा लेकिन इसके विपरीत उसे प्रसन्न और संतुष्ट देखकर बोला 'ऐ भाई, भगवान को बड़ा धन्यवाद है कि मैंने थोड़ी ही अवधि में तुम्हें प्रसन्न और व्याधिमुक्त देखा। अब मैं तुम्हें सौगंध देकर एक बात पूछता हूँ, तुम वह बात जरूर बताना। शाहजमाँ ने कहा, 'जो बात भी आप पूछेंगे मैं अवश्य बताऊँगा।'

शहरयार ने कहा, 'जब तुम अपनी राजधानी से यहाँ आए थे तो मैंने तुम्हें शोक सागर में डूबा देखा था। मैंने तुम्हारा चित्त प्रसन्न करने के लिए अनेक उपाय किए, भाँति-भाँति के खेल-तमाशे करवाए किंतु तुम्हारी दशा जैसी की तैसी रही। मैंने बहुत सोचा कि इस दुख का कारण क्या हो सकता है किंतु इसके सिवा कोई कारण समझ में नहीं आया कि तुम्हें अपनी बेगम के विछोह का दुख है और राज्य प्रबंध की चिंता है। किंतु अब क्या बात हुई जिससे तुम्हारा दुख और चिंता दूर हो गई?

शाहजमाँ यह सुनकर मौन रहा किंतु जब शहरयार ने बार-बार यही प्रश्न पूछा तो वह बोला, 'आप मेरे मालिक हैं मुझ से बड़े हैं; मैं इस प्रश्न का उत्तर न दूँगा क्योंकि इसमें बड़ी निर्लज्जता की बात है।' शहरयार ने कहा कि जब तक तुम मुझे यह न बताओगे तब तक मुझे चैन न आएगा। शाहजमाँ ने विवश होकर अपनी बेगम के कुकर्म का सविस्तार वर्णन किया और कहा कि मैं इसी कारण दुखी रहता था।

शहरयार ने कहा, 'भैय्या, यह तो तुमने बड़े आश्चर्य की, असंभव-सी बात बताई। यह तो तुमने बड़ा अच्छा किया कि ऐसी व्यभिचारिणी को उसके प्रेमी सहित मार डाला। इस मामले में कोई तुम्हें अन्यायी नहीं कह सकता। मैं तुम्हारी जगह होता तो मुझे एक स्त्री को मारने से संतोष न होता, हजार स्त्रियों को मार डालता। बताओ कि मेरे बाहर जाने पर यह शोक किस प्रकार दूर हुआ?'

शाहजमाँ ने कहा, 'मुझे यह बात कहते डर लगता है कि ऐसा न हो कि यह सुनकर आपको मुझसे भी अधिक दुख हो।' शहरयार ने कहा कि भाई, तुमने यह कह कर मेरी उत्कंठा और बढ़ा दी है; मुझे अब इसे सुने बगैर चैन न आएगा इसलिए यह बात जरूर बताओ। विवश होकर शाहजमाँ ने मसऊद, दसों दासियों और बेगम का सारा हाल बताया और बोला, यह घटना मैंने अपनी आँखों से देखी है और समझ लिया है कि सारी स्त्रियों के स्वभाव में दुष्टता और पाप होता है। और आदमी को चाहिए कि उनका भरोसा न करे। मुझे यह सारा कांड देखकर अपना दुख भूल गया है और इसीलिए मैं नीरोग और प्रसन्नचित्त दिखाई देता हूँ।'

यह हाल सुनकर भी शहरयार को अपने भाई के कथन पर विश्वास न हुआ। वह क्रुद्ध स्वर में बोला, 'क्या हमारे देश की सारी बेगमें व्यभिचारिणी हैं? मुझे तुम्हारे कहने का विश्वास नहीं होगा जब तक मैं खुद अपनी आँखों से यह न देख लूँ। संभव है तुम्हें भ्रम हुआ हो।' शाहजमाँ ने कहा, 'भाई साहब, आप खुद देखना चाहते हैं तो ऐसा कीजिए कि दुबारा शिकार के लिए आज्ञा दीजिए। हम आप दोनों फौज के साथ शहर से कूच कर के बाहर चलें। दिन भर अपने खेमों में रहें और रात को चुपचाप इसी मकान में आ बैठें। फिर निश्चय ही आप वह सारा व्यापार अपनी आँखों देख लेंगे जो मैंने आपको बताया है।'

शहरयार ने यह बात स्वीकार कर के दरबारियों को आज्ञा दी कि कल मैं फिर शिकार को जाऊँगा। अतः दूसरे दिन प्रातःकाल ही दोनों भाई शिकार को चले और शहर के बाहर जाकर अपने खेमों में ठहरे। जब रात हुई तो शहरयार ने मंत्री को बुलाकर आज्ञा दी कि मैं एक जरूरी काम से जा रहा हूँ, तुम फौज के किसी आदमी को यहाँ से जाने न देना। तत्पश्चात दोनों भाई घोड़ों पर सवार होकर गुप्त रूप से शहर में आए और सवेरा होने के पहले ही शाहजमाँ के महल की उसी खिड़की में आ बैठे जिससे शाहजमाँ ने सारा कांड देखा था। सूर्योदय के पूर्व ही महल का चोर दरवाजा खुला और कुछ देर में बेगम अपने उन्हीं स्त्री वेशधारी हब्शियों के साथ वहाँ से निकल कर बाग में आई और मसऊद को पुकारा।

यह सारा हाल - जो न कहने के योग्य है न सुनने के - देखकर शहरयार अपने मन में कहने लगा कि हे! भगवान, यह कैसा अनर्थ है कि मुझ जैसे महान नृपति की पत्नी ऐसी व्यभिचारणी हो। फिर वह शाहजमाँ से बोला कि यह अच्छा रहेगा कि हम इस क्षणभंगुर संसार को जिसमें एक क्षण आनंद का होता है दूसरा दुख का, छोड़ दें और अपने देशों और सेनाओं का परित्याग कर के अन्य देशों में शेष जीवन काटें और इस घृणित व्यापार के बारे में किसी से कुछ न कहें।

शाहजमाँ को यह बात पसंद नहीं आई किंतु अपने भाई की अत्यंत दुखी दशा देखकर उसने इनकार करना ठीक न समझा और बोला, 'भाई साहब, मैं आपका अनुचर हूँ और आपकी आज्ञा को पूर्ण रूप से मानूँगा। लेकिन मेरी एक शर्त है। जब आप किसी व्यक्ति को अपने से अधिक इस दुर्भाग्य से पीड़ित देखें तो अपने देश को लौट आएँ।'

शहरयार ने कहा, 'मुझे तुम्हारी यह शर्त स्वीकार है लेकिन मेरा विचार है कि संसार में किसी मनुष्य को हमारे जैसा दुख नहीं होगा।' शाहजमाँ ने कहा, 'थोड़ी-सी ही यात्रा करने पर आपको इस बात का पता अच्छी तरह से चल जाएगा।'

अतएव वे दोनों छुप कर एक सुनसान रास्ते से नगर के बाहर एक ओर को चले। दिन भर चलने के बाद रात को एक पेड़ के नीचे लेट कर सो रहे। दूसरे दिन प्रातःकाल वे वहाँ से भी आगे चले और चलते-चलते एक मनोरम वाटिका में पहुँचे जो एक नदी के तट पर बनी हुई थी। इस वाटिका में दूर-दूर तक घने और बड़े-बड़े वृक्ष लगे थे। वहाँ एक वृक्ष के नीचे बैठकर वे सुस्ताने लगे और बातचीत करने लगे।

थोड़ी ही देर हुई थी कि एक भयानक शब्द सुनकर दोनों अत्यंत भयभीत हुए और काँपने लगे। कुछ देर में देखा कि नदी के जल में दरार हुई और उसमें से एक काला खंभा निकलने लगा। वह इतना ऊँचा हो गया कि उसका ऊपरी भाग आकाश के बादलों में लुप्त हो गया। यह कांड देखकर दोनों भाई और भी भयभीत हुए और एक ऊँचे वृक्ष पर चढ़ कर उसकी डालियों और पत्तों में छुपकर बैठ गए। उन्होंने देखा कि काला खंभा नदी के तट की ओर बढ़ने लगा और तट पर आकर एक महा भयानक दैत्य के रूप में परिवर्तित हो गया। अब वे दोनों और भी घबराए और एक और ऊँची डाल पर जा बैठे। दैत्य नदी तट पर आया तो उन्होंने देखा कि उसके सिर पर एक सीसे का बड़ा और मजबूत संदूक है जिसमें पीतल के चार ताले लगे हैं।

दैत्य ने नदी तट पर आकर सिर से संदूक उतारा और उसी वृक्ष के नीचे रख दिया जहाँ दोनों भाई छुपे थे। फिर उसने कमर से लटकती हुई चार चाभियों से संदूक के चारों ताले एक-एक कर के खोले। संदूक खोला तो उसमें से एक अति सुंदर स्त्री निकली जो उत्तमोत्तम वस्त्राभूषणों से अलंकृत थी। दैत्य ने स्त्री को प्रेम दृष्टि से देखा और कहा, 'प्रिये, तू सुंदरता में अनुपम है। बहुत दिन हो गए जब मैं तुझे तेरे विवाह की रात को उड़ा लाया था। इस सारे काल में तू बड़ी निष्कलंक और मेरे प्रति वफादार रही है। मुझे इस समय बड़ी नींद आ रही है इसलिए तेरे निकट सोना चाहता हूँ।' यह कहकर वह महा भयानक आकृति वाला दैत्य उस स्त्री की जंघा पर सिर रख कर सो रहा। उसका शरीर इतना विशाल था कि उसके पाँव नदी के जल को छू रहे थे। सोते समय उसकी साँस का स्वर ऐसा हो रहा था जैसे बादल गरज रहे हों। सारा वातावरण उस ध्वनि से कंपायमान हो रहा था।

एक बार संयोग से जब स्त्री ने ऊपर की ओर देखा तो उसे पत्तियों में छुपे हुए दोनों भाई दिखाई दिए। उसने दोनों को नीचे उतरने का संकेत किया। उसके उद्देश्य को समझकर दोनों का भय और बढ़ा। दोनों ने इशारे ही से उससे विनती की कि हमें पेड़ ही पर छुपा रहने दो। स्त्री ने धीरे से दैत्य का सिर अपनी गोद से उतारकर पृथ्वी पर रख दिया और उठकर उनको धैर्य देते हुए बोली कि कोई भय की बात नहीं है, तुम नीचे उतर आओ और मेरे समीप बैठो। उसने यह भी धमकी दी कि अगर न आओगे तो मैं दैत्य को जगा दूँगी और वह तुम दोनों को समाप्त कर देगा। यह सुनकर वे बहुत डरे और चुपचाप नीचे उतर आए। वह स्त्री मुस्कारती हुई दोनों का हाथ पकड़ कर एक वृक्ष के नीचे ले गई और उनसे अपने साथ संभोग करने को कहा। पहले तो उन दोनों ने इनकार किया किंतु फिर उसकी धमकी से डर कर वह जैसा चाहती थी उसके साथ कर दिया। इसके बाद स्त्री ने उनसे उनकी एक-एक अँगूठी माँग ली। फिर उसने एक छोटी-सी संदूकची निकाली और उनसे पूछा कि जानते हो इसमें क्या है और किसलिए है? उन्होंने कहा, हमें नहीं मालूम, तुम बताओ इसमें क्या है। उस सुंदरी ने कहा, इसमें उन लोगों की निशानियाँ हैं जो तुम्हारी तरह मुझसे संबंध कर चुके हैं। ये अट्ठानबे अँगूठियाँ थीं और तुम्हारी दो मिलने से सौ हो गईं। इस दैत्य की इतनी कड़ी निगरानी के बाद भी मैंने सौ बार ऐसी मनमानी की है। यह दुराचारी दैत्य मुझ पर इतना आसक्त है कि क्षण भर के लिए भी मुझे अपने से अलग नही करता और बड़ी देखभाल के साथ मुझे इस सीसे के संदूक में छुपाकर समुद्र की तलहटी में रखता है। लेकिन उसकी सारी चालाकी और रक्षा प्रबंध पर भी मैं जो चाहती हूँ वह करती हूँ और इस बेचारे का सारा प्रबंध बेकार हो जाता है। अब मेरे हाल से तुम समझ लो कि स्त्री जब कामासक्त होती है तो कोई भी उसे दुष्कर्म से रोक नहीं सकता।

इसके पश्चात वह उनकी अँगूठियाँ लेकर अपनी जगह आई। उसने दैत्य का सिर फिर अपनी गोद में रख लिया और इन दोनों को संकेत किया कि चले जाओ। दोनों वहाँ से चल दिए और जब बहुत दूर निकल गए तो शाहजमाँ ने अपने बड़े भाई शहरयार से कहा, 'देखिए, इतनी सुरक्षा और कड़े प्रबंध पर भी यह स्त्री अपने मन की अभिलाषा पूरी कर रही है। यह भी देखिए कि दैत्य को उस पर कितना विश्वास है और वह उसकी निष्कलंकता की कैसी प्रशंसा कर रहा था। अब आप ही न्यायपूर्वक बताएँ कि इस बेचारे पर हम लोगों से अधिक दुर्भाग्य है या नहीं। हम जो बात ढूँढ़ने निकले थे वह हमें मिल गई। अब हमें चाहिए कि अपने-अपने देशों को चलें और किसी स्त्री से विवाह न करें क्योंकि शायद ही कोई स्त्री निष्पाप हो।

चुनांचे शहरयार ने अपने छोटे भाई के कहने के अनुसार ही काम किया और वहाँ से दोनों शहरयार की राजधानी को चले। तीन रातों बाद वे अपनी सेनाओं में पहुँचे। शहरयार ने आगे शिकार पर न जाना चाहा और राजधानी को वापस आ गया। महल में जाकर उसने मंत्री को आज्ञा दी कि वह बेगम को ले जाकर मृत्युदंड दे। मंत्री ने बादशाह की आज्ञानुसार ऐसा ही किया। फिर शहरयार ने दसों व्याभिचारिणी दासियों को अपने हाथ से मार डाला। इसके बाद शहरयार ने सोचा कि कोई ऐसा उपाय करूँ कि विवाह के बाद मेरी बेगम कुकर्म का अवसर ही ना पा सके। अतएव उसने निश्चय किया कि रात को विवाह करूँ और सबेरे ही बेगम को मरवा दूँ। तत्पश्चात उसने अपने भाई शाहजमाँ को विदा किया। वह शहरयार की दी हुई अमूल्य भेंटों को लेकर अपनी सेना के साथ समरकंद चला गया। शाहजमाँ के जाने के बाद अपने प्रधान मंत्री को आज्ञा दी कि वह विवाह हेतु किसी सामंत की बेटी को लाए। प्रधान मंत्री ने एक अमीर की बेटी ला खड़ी की। शहरयार ने उससे विवाह किया और रात भर उसके साथ बिता कर सुबह मंत्री को आज्ञा दी कि इसे ले जाकर मार डालो और रात के लिए फिर किसी सरदार की सुंदरी बेटी मेरे विवाहार्थ ले आना। मंत्री ने उस बेगम को मार डाला और शाम को एक और अमीर की बेटी ले आया और दूसरे दिन उसे भी ले जाकर मार डाला। इसी प्रकार शहरयार ने सैकड़ों अमीरों सरदारों की बेटियों से विवाह किया और दूसरी सुबह उन्हें मरवा डाला। अब सामान्य नागरिकों की बारी आई। साथ ही इस जघन्य अन्याय की बात सब जगह फैल गई। सारे नगर में शोक, संताप और रोदन की आवाजें उठने लगीं। कहीं पिता अपनी पुत्री को मृत्यु पर आठ-आठ आँसू रोता था, कहीं लड़की की माता पछाड़ें खाती थी। जो कन्याएँ अभी तक बच रही थीं उनके माता-पिता और सगे-संबंधी अत्यंत दुखी रहते थे। कई लोग अपनी बेटियों को लेकर देश छोड़ गए और अन्य देशों में जा बसे।

वहाँ के मंत्री की दो कुँआरी बेटियाँ थीं। बड़ी का नाम शहरजाद और छोटी का नाम दुनियाजाद था। शहरजाद अपनी बहन और सहेलियों से अधिक तीक्ष्ण बुद्धि थी। वह जो बात भी सुनती या किसी पुस्तक में देखती उसे कभी नहीं भूलती थी। वार्तालाप के गुण में भी प्रवीण थी। उसे बहुत प्राचीन मनीषियों की आख्यायिकाएँ और कविताएँ जुबानी याद थीं और स्वयं गद्य-पद्य रचना में निपुण थी। इन सारे गुणों के अतिरिक्त उसमें अद्वितीय सौंदर्य भी था। एक दिन उसने पिता से कहा कि मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ लेकिन आप को मेरी बात माननी होगी। मंत्री ने कहा, यदि तेरी बात मानने योग्य होगी तो मैं अवश्य मानूँगा। शहरजाद ने कहा कि मेरा निश्चय है कि मैं बादशाह को इस अन्याय से रोकूँ जो वह कर रहा है और जो कन्याएँ अभी बची हैं उनके माता-पिता को चिंतामुक्त कर दूँ।

मंत्री ने कहा, 'बेटी, तुम यह हत्याकांड किस प्रकार रोक सकती हो। तुम्हारे पास कौन-सा उपाय ऐसा हो सकता है जिससे यह अन्याय बंद हो?' शहरजाद बोली, 'यह आपके हाथ में है। मैं आप को अपनी सौगंध देकर कहती हूँ कि मेरा विवाह बादशाह के साथ कर दीजिए।' मंत्री यह सुनकर काँपने लगा और बोला, 'बेटी, तू पागल हो गई है क्या जो ऐसी वाहियात बातें कर रही है। क्या तुझे बादशाह के प्रण का पता नहीं है? तू सोच- समझ कर बात किया कर। तू किस तरह बादशाह को इस अन्याय से रोक सकेगी? बेकार ही अपनी जान गँवाएगी।

शहरजाद ने कहा, 'मैं बादशाह के प्रण को भली भाँति जानती हूँ, परंतु अपने इस विचार को किसी प्रकार न छोड़ूँगी। यदि मैं अन्य कन्याओं की भाँति मारी गई तो इस असार संसार से मुक्ति पा जाऊँगी और अगर मैंने बादशाह को इस अत्याचार से विमुख कर दिया तो अपने नगर निवासियों का बड़ा हित कर सकूँगी।'

मंत्री ने कहा, 'मैं किसी प्रकार तेरी यह इच्छा स्वीकार नहीं कर सकता। मैं तुझे जानते-बूझते ऐसी विकट परिस्थिति में कैसे डाल सकता हूँ? अजीब-सी बात है कि तू मुझ से कहती है कि मेरी मौत का सामान कर दो। कौन-सा पिता ऐसा होगा जो अपनी प्यारी संतान के लिए ऐसा करने का सोच भी सकेगा। तुझे चाहे अपने प्राण प्यारे न हों लेकिन मुझ से यह नहीं हो सकता कि तेरे खून से हाथ रँगूँ।' शहरजाद फिर भी अपनी जिद पर अड़ी रही और विवाह की प्रार्थी रही।

मंत्री ने कहा, तू बेकार ही मुझे गुस्सा दिला रही है। आखिर क्यों तू मरना चाहती है? क्यों अपने प्राणों से इतनी रुष्ट है? सुन ले, जो भी व्यक्ति किसी काम को बगैर सोच-विचार के करता है उसे बाद में पछताना पड़ता है। मुझे भय है कि तेरी दशा उस गधे की तरह न हो जाए जो सुख से रहता था किंतु मूर्खता के कारण दुख में पड़ा। शहरजाद ने कहा, यह कहानी मुझे बताइए। मंत्री ने कहानी सुनाई।
 


किस्सा गधे, बैल और उनके मालिक का


एक बड़ा व्यापारी था जिसके गाँव में बहुत-से घर और कारखाने थे जिनमें तरह-तरह के पशु रहते थे। एक दिन वह अपने परिवार सहित कारखानों को देखने के लिए गाँव गया। उसने अपनी पशुशाला भी देखी जहाँ एक गधा और एक बैल बँधे हुए थे। उसने देखा कि वे दोनों आपस में वार्तालाप कर रहे हैं। वह व्यापारी पशु-पक्षियों की बोली समझता था। वह चुपचाप खड़ा होकर दोनों की बातें सुनने लगा।

बैल ने गधे से कहा, 'तू बड़ा ही भाग्यशाली है, सदैव सुखपूर्वक रहता है। मालिक हमेशा तेरा खयाल रखता है। तेरी रोज मलाई-दलाई होती है, खाने को दोनों समय जौ और पीने के लिए साफ पानी मिलता है। इतने आदर-सत्कार के बाद भी तुझसे केवल यह काम लिया जाता है कि कभी काम पड़ने पर मालिक तेरी पीठ पर बैठ कर कुछ दूर चला जाता है। तुझे दाने-घास की कभी कमी नहीं होती।

'और तू जितना भाग्यवान है मैं उतना ही अभागा हूँ। मैं सवेरा होते ही पीठ पर हल लादकर जाता हूँ। वहाँ दिन भर मुझे हल में जोतकर चलाते हैं। हलवाहा मुझ पर बराबर चाबुक चलाता रहता है। उसके चाबुकों की मार से पीठ और जुए से मेरे कंधे छिल गए हैं। सुबह से शाम तक ऐसा कठिन काम लेने के बाद भी ये लोग मेरे आगे सूखा और सड़ा भूसा डालते हैं जो मुझसे खाया नहीं जाता। रात भर मैं भूखा-प्यासा अपने गोबर और मूत्र में पड़ा रहता हूँ और तेरी सुख-सुविधा पर ईर्ष्या किया करता हूँ।'

गधे ने यह सुनकर कहा, 'ऐ भाई, जो कुछ तू कहता है सब सच है, सचमुच तुझे बड़ा कष्ट है। किंतु जान पड़ता है तू इसी में प्रसन्न है, तू स्वयं ही सुख से रहना नहीं चाहता। तू यदि मेहनत करते-करते मर जाए तो भी ये लोग तेरी दशा पर तरस नहीं खाएँगे। अतएव तू एक काम कर, फिर वे तुझ से इतनी मेहनत नहीं लिया करेंगे और तू सूख से रहेगा।'

बैल ने पूछा कि ऐसा कौन-सा उपाय हो सकता है। गधे ने कहा, 'तू अपने को रोगी दिखा। एक शाम का दाना-भूसा न खा और अपने स्थान पर चुपचाप लेट जा।' बैल को यह सुझाव बड़ा अच्छा लगा। उसने गधे की बात सुनकर कहा, 'मैं ऐसा ही करूँगा। तूने मुझे बड़ा अच्छा उपाय बताया है। भगवान तुझे प्रसन्न रखें।'

दूसरे दिन प्रातःकाल हलवाहा जब पशुशाला में यह सोचकर गया कि रोज की तरह बैल को खेत जोतने के लिए ले जाए तो उसने देखा कि रात की लगाई सानी ज्यों की त्यों रखी है और बैल धरती पर पड़ा हाँफ रहा है, उसकी आँखें बंद हैं और उसका पेट फूला हुआ है। हलवाहे ने समझा कि बैल बीमार हो गया है और यह सोचकर उसे हल में न जोता। उसने व्यापारी को बैल के बीमारी की सूचना दी।

व्यापारी यह सुनकर जान गया कि बैल ने गधे की शिक्षा पर कार्य कर के स्वयं को रोगी दिखाया है अतएव उसने हलवाहे से कहा कि आज गधे को हल में जोत दो। इसलिए हलवाहे ने गधे को हल में जोत कर उससे सारे दिन काम लिया। गधे को खेत जोतने का अभ्यास नहीं था। वह बहुत थक गया और उसके हाथ-पाँव ठंडे होने लगे। शारीरिक श्रम के अतिरिक्त सारे दिन उस पर इतनी मार पड़ी थी कि संध्या को घर लौटते समय उसके पाँव भी ठीक से नहीं पड़ रहे थे।

इधर बैल दिन भर बड़े आराम से रहा। वह नाँद की सारी सानी खा गया और गधे को दुआएँ देता रहा। जब गधा गिरता-पड़ता खेत से आया तो बैल ने कहा कि भाई, तुम्हारे उपदेश के कारण मुझे बड़ा सुख मिला। गधा थकान के कारण उत्तर न दे सका और आकर अपने स्थान पर गिर पड़ा। यह मन ही मन अपने को धिक्कारने लगा कि अभागे, तूने बैल को आराम पहुँचाने के लिए अपनी सुख-सुविधा का विनाश कर दिया।

मंत्री ने इतनी कथा कर कहा, 'बेटी, तू इस समय बड़ी सुख-सुविधा में रहती है। तू क्यों चाहती है कि गधे के समान स्वयं को कष्ट में डाले?' शहरजाद अपने पिता की बात सुनकर बोली, 'इस कहानी से मैं अपनी जिद नहीं छोड़ती। जब तक आप बादशाह से मेरा विवाह नहीं करेंगे मैं इसी तरह आपके पीछे पड़ी रहूँगी।' मंत्री बोला, 'अगर तू जिद पर अड़ी रही तो मैं तुझे वैसा ही दंड दूँगा जो व्यापारी ने अपनी स्त्री को दिया था।' शहरजाद ने पूछा, 'व्यापारी ने क्यों स्त्री को दंड दिया और गधे और बैल का क्या हुआ?'

मंत्री ने कहा, 'दूसरे दिन व्यापारी रात्रि भोजन के पश्चात अपनी पत्नी के साथ पशुशाला में जा बैठा और पशुओं की बातें सुनने लगा। गधे ने बैल से पूछा, 'सुबह हलवाहा तुम्हारे लिए दाना-घास लाएगा तो तुम क्या करोगे?' 'जैसा तुमने कहा है वैसा ही करूँगा,' बैल ने कहा। गधे ने कहा, 'नहीं, ऐसा न करना, वरना जान से जाओगे। शाम को लौटते समय मैंने सुना कि हमारा स्वामी अपने रसोइए से कह रहा था कि कल कसाई और चमार को बुला लाना और बैल, जो बीमार हो गया है, का मांस और खाल बेच डालना। मैंने जो सुना था वह मित्रता के नाते तुझे बता दिया। अब तेरी इसी में भलाई है कि सुबह जब तेरे आगे चारा डाला जाए तो तू उसे जल्दी से उठकर खा ले और स्वस्थ बन जा। फिर हमारा स्वामी तुझे स्वस्थ देखकर तुझे मारने का इरादा छोड़ देगा।' यह बात सुन कर बैल भयभीत होकर बोला, 'भाई, ईश्वर तुझे सदा सुखी रखे। तेरे कारण मेरे प्राण बच गए। अब मैं वही करूँगा जैसा तूने कहा है।

व्यापारी यह बात सुनकर ठहाका लगा कर हँस पड़ा। उसकी स्त्री को इस बात से बड़ा आश्चर्य हुआ। वह पूछने लगी, 'तुम अकारण ही क्यों हँस पड़े?' व्यापारी ने कहा कि यह बात बताने की नहीं है, मैं सिर्फ यह कह सकता हूँ कि मैं बैल और गधे की बातें सुन कर हँसा हूँ। स्त्री ने कहा, 'मुझे भी वह विद्या सिखाओ जिससे पशुओं की बोली समझ लेते हैं।' व्यापारी ने इससे इनकार कर दिया। स्त्री बोली, 'आखिर तुम मुझे यह क्यों नहीं सिखाते?' व्यापारी बोला, 'अगर मैंने तुझे यह विद्या सिखाई तो मैं जीवित नहीं रहूँगा।' स्त्री ने कहा, 'तुम मुझे धोखा दे रहे हो। क्या वह आदमी जिसने तुझे यह सिखाया था, सिखाने के बाद मर गया? तुम कैसे मर जाओगे? तुम झूठ बोलते हो। कुछ भी हो मैं तुम से यह विद्या सीख कर ही रहूँगी। अगर तुम मुझे नहीं सिखाओगे तो मैं प्राण तज दूँगी।'

यह कह कर वह स्त्री घर में आ गई और अपनी कोठरी का दरवाजा बंद कर के रात भर चिल्लाती और गाली-गलौज करती रही। व्यापारी रात को तो सो गया लेकिन दूसरे दिन भी वही हाल देखा तो स्त्री को समझाने लगा कि तू बेकार जिद करती है, यह विद्या तेरे सीखने योग्य नहीं है। स्त्री ने कहा कि जब तक तुम मुझे यह भेद नहीं बताओगे, मैं खाना-पीना छोड़े रहूँगी और इसी प्रकार चिल्लाती रहूँगी। व्यापारी ने कहा कि अगर मैं तेरी मूर्खता की बात मान लूँ तो मैं अपनी जान से हाथ धो बैठूँगा। स्त्री ने कहा, 'मेरी बला से तुम जियो या मरो, लेकिन मैं तुमसे यह सीख कर ही रहूँगी कि पशुओं की बोली कैसे समझी जाती है।'

व्यापारी ने जब देखा कि यह महामूर्ख अपना हठ छोड़ ही नहीं रही है तो उसने अपने और ससुराल के रिश्तेदारों को बुलाया कि वे उस स्त्री को अनुचित हठ छोड़ने के लिए समझाएँ। उन लोगों ने भी उस मूर्ख को हर प्रकार समझाया लेकिन वह अपनी जिद से न हटी। उसे इस बात की बिल्कुल चिंता न थी कि उसका पति मर जाएगा। छोटे बच्चे माँ की यह दशा देखकर हाहाकार करने लगे।

व्यापारी की समझ ही में नहीं आ रहा था कि वह स्त्री को कैसे समझाए कि इस विद्या को सीखने का हठ ठीक नहीं है। वह अजीब दुविधा में था - अगर मैं बताता हूँ तो मेरी जान जाती है और नहीं बताता तो स्त्री रो रो कर मर जाएगी। इसी उधेड़बुन में वह अपने घर के बाहर जा बैठा।

उसने देखा कि उसका कुत्ता उसके मुर्गे को मुर्गियों से भोग करते देख कर गुर्राने लगा। उसने मुर्गे से कहा, 'तुझे लज्जा नहीं आती कि आज के जैसे दुखदायी दिन भी तू यह काम कर रहा है?'

मुर्गे ने कहा, 'आज ऐसी क्या बात हो गई है कि मैं आनंद न करूँ?' कुत्ता बोला, 'आज हमारा स्वामी अति चिंताकुल है। उसकी स्त्री की मति मारी गई है और वह उससे ऐसे भेद को पूछ रही है जिसे बताने से वह तुरंत ही मर जाएगा। नहीं बताएगा तो स्त्री रो-रो कर मर जाएगी। इसी से सारे लोग दुखी हैं और तेरे अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं है जो स्त्री संभोग की भी बात भी सोचे।'

मुर्गा बोला, 'हमारा स्वामी मूर्ख है जो एक स्त्री का पति है और वह भी उसके अधीन नहीं है। मेरी तो पचास मुर्गियाँ हैं और सब मेरे अधीन हैं। अगर हमारा स्वामी एक काम करे तो उसका दुख अभी दूर हो जाएगा।'

कुत्ते ने पूछा कि स्वामी क्या करे कि उसकी मूर्ख स्त्री की समझ वापस आ जाए। मुर्गे ने कहा, 'हमारे स्वामी को चाहिए कि एक मजबूत डंडा लेकर उस कोठरी में जाए जहाँ उसकी स्त्री चीख-चिल्ला रही है। दरवाजा अंदर से बंद कर ले और स्त्री की जम कर पिटाई करे। कुछ देर में स्त्री अपना हठ छोड़ देगी।'

मुर्गे की बात सुनकर व्यापारी ने उठकर एक मोटा डंडा लिया और उस कोठरी में गया जहाँ उसकी पत्नी चीख-चिल्ला रही थी। दरवाजा अंदर से बंद कर के व्यापारी ने स्त्री पर डंडे बरसाने शुरू कर दिए। कुछ देर चीख-पुकार बढ़ाने पर भी जब स्त्री ने देखा कि डंडे पड़ते ही जा रहे हैं तो वह घबरा उठी। वह पति के पैरों पर गिर कर कहने लगी कि अब हाथ रोक ले, अब मैं कभी ऐसी जिद नही करूँगी। इस पर व्यापारी ने हाथ रोक लिया।

यह कहानी सुनाकर मंत्री ने शहरजाद से कहा कि अगर तुमने अपना हठ न छोड़ा तो मैं तुम्हें ऐसा ही दंड दूँगा जैसा व्यापारी ने अपनी स्त्री को दिया था। शहरजाद ने कहा 'आप की बातें अपनी जगह ठीक हैं किंतु मैं किसी भी प्रकार अपना मंतव्य बदलना नहीं चाहती। अपनी इच्छा का औचित्य सिद्ध करने के लिए मुझे भी कई ऐतिहासिक घटनाएँ और कथाएँ मालूम हैं लेकिन उन्हें कहना बेकार है। यदि आप मेरी कामना पूरी न करेंगे तो मैं आप से पूछे बगैर स्वयं ही बादशाह की सेवा में पहुँच जाऊँगी।'

अब मंत्री विवश हो गया। उसे शहरजाद की बात माननी पड़ी। वह बादशाह के पास पहुँचा और अत्यंत शोक-संतप्त स्वर में निवेदन करने लगा, 'मेरी पुत्री आपके साथ विवाह सूत्र में बँधना चाहती है।' बादशाह को इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कहा, 'तुम सब कुछ जानते हो फिर भी तुमने अपनी पुत्री के लिए ऐसा भयानक निर्णय क्यों लिया?' मंत्री ने कहा, 'लड़की ने खुद ही मुझ पर इस बात के लिए जोर दिया है। उसकी खुशी इसी बात में हैं कि वह एक रात के लिए आप की दुल्हन बने और सुबह मृत्यु के मुख में चली जाए।' बादशाह का आश्चर्य इस बात से और बढ़ा। वह बोला, 'तुम इस धोखे में न रहना कि तुम्हारा खयाल कर के मैं अपनी प्रतिज्ञा छोड़ दूँगा। सवेरा होते ही मैं तुम्हारे ही हाथों तुम्हारी बेटी को सौंपूँगा कि उसका वध करवाओ। यह भी याद रखना कि यदि तुमने संतान प्रेम के कारण उसके वध में विलंब किया तो मैं उसके वध के साथ तेरे वध की भी आज्ञा दूँगा।'

मंत्री ने निवेदन किया, 'मैं आपका चरण सेवक हूँ। यह सही है कि वह मेरी बेटी है और उसकी मृत्यु से मुझे बहुत ही दुख होगा। लेकिन मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।' बादशाह ने मंत्री की बात सुनकर कहा, 'यह बात है तो इस कार्य में विलंब क्यों किया जाए। तुम आज ही रात को अपनी बेटी को लाकर उसका विवाह मुझ से कर दो।'

मंत्री बादशाह से विदा लेकर अपने घर आया और शहरजाद को सारी बात बताई। शहरजाद यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई और अपने शोकाकुल पिता के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर के कहने लगी, 'आप मेरा विवाह कर के कोई पश्चात्ताप न करें। भगवान चाहेगा तो इस मंगल कार्य से आप जीवन पर्यंत हर्षित रहेंगे।'

फिर शहरजाद ने अपनी छोटी बहन दुनियाजाद को एकांत में ले जाकर उससे कहा, 'मैं तुमसे एक बात में सहायता चाहती हूँ। आशा है तुम इससे इनकार न करोगी। मुझे बादशाह से ब्याहने के लिए ले जाएँगे। तुम इस बात से शोक-विह्वल न होना बल्कि मैं जैसा कहूँ वैसा करना। मैं तुम्हें विवाह की रात पास में सुलाऊँगी और बादशाह से कहूँगी कि तुम्हें मेरे पास आने दे ताकि मैं मरने के पहले तुम्हें धैर्य बँधा सकूँ। मैं कहानी कहने लगूँगी। मुझे विश्वास है कि इस उपाय से मेरी जान बच जाएगी।' दुनियाजाद ने कहा, 'तुम जैसा कहती हो वैसा ही करूँगी।'

शाम को मंत्री शहरजाद को लेकर राजमहल में गया। उसने धर्मानुसार पुत्री का विवाह बादशाह के साथ करवाया और पुत्री को महल में छोड़कर घर आ गया। एकांत में बादशाह ने शहरजाद से कहा, 'अपने मुँह का नकाब हटाओ।' नकाब उठने पर उसके अप्रतिम सौंदर्य से बादशाह स्तंभित-सा रह गया। लेकिन उसकी आँखों मे आँसू देख कर पूछने लगा कि तू रो क्यों रही है। शहरजाद बोली, 'मेरी एक छोटी बहन है जो मुझे बहुत प्यार करती है और मैं भी उसे बहुत प्यार करती हूँ। मैं चाहती हूँ कि आज वह भी यहाँ रहे ताकि सूर्योदय होने पर हम दोनों बहनें अंतिम बार गले मिल लें। यदि आप अनुमति दें तो वह भी पास के कमरे में सो रहे।' बादशाह ने कहा, 'क्या हर्ज है, उसे बुलवा लो और पास के कमरे में क्यों, इसी कमरे में दूसरी तरफ सुला लो।'

चुनांचे दुनियाजाद को भी महल में बुला लिया गया। शहरयार शहरजाद के साथ ऊँचे शाही पलँग पर सोया और दुनियाजाद पास ही दूसरे छोटे पलँग पर लेट रही। जब एक घड़ी रात रह गई तो दुनियाजाद ने शहरजाद को जगाया और बोली, 'बहन, मैं तो तुम्हारे जीवन की चिंता से रात भर न सो सकी। मेरा चित्त बड़ा व्याकुल है। तुम्हें बहुत नींद न आ रही हो और कोई अच्छी-सी कहानी इस समय तुम्हें याद हो तो सुनाओ ताकि मेरा जी बहले।' शहरजाद ने बादशाह से कहा कि यदि आपकी अनुमति हो तो मैं जीवन के अंतिम क्षणों में अपनी प्रिय बहन की इच्छा पूरी कर लूँ। बादशाह ने अनुमति दे दी।
 
व्यापारी और दैत्य

शहरजाद ने कहा :

प्राचीन काल में एक अत्यंत धनी व्यापारी बहुत-सी वस्तुओं का कारोबार किया करता था। यद्यपि प्रत्येक स्थान पर उसकी कोठियाँ, गुमाश्ते और नौकर-चाकर रहते थे तथापि वह स्वयं भी व्यापार के लिए देश-विदेश की यात्रा किया करता था। एक बार उसे किसी विशेष कार्य के लिए अन्य स्थान पर जाना पड़ा। वह अकेला घोड़े पर बैठ कर चल दिया। गंतव्य स्थान पर खाने-पीने को कुछ नहीं मिलता था, इसलिए उसने एक खुर्जी में कुलचे और खजूर भर लिए। काम पूरा होने पर वह वापस लौटा। चौथे दिन सवेरे अपने मार्ग से कुछ दूर सघन वृक्षों के समीप एक निर्मल तड़ाग देखकर उस की विश्राम करने की इच्छा हुई। वह घोड़े से उतरा और तालाब के किनारे बैठ कर कुलचे और खजूर खाने लगा। जब पेट भर गया तो उसने जगह साफ करने के लिए खजूरों की गुठलियाँ इधर-उधर फेंक दीं और आराम करने लगा।

इतने में उसे एक महा भयंकर दैत्य अपनी ओर बड़ी-सी तलवार खींचे आता दिखाई दिया। पास आकर दैत्य क्रोध से गरज कर बोला, 'इधर आ। तुझे मारूँगा।' व्यापारी उसका भयानक रूप देखकर और गर्जन सुनकर काँपने लगा और बोला, 'स्वामी, मैंने क्या अपराध किया है कि आप मेरी हत्या कर रहे हैं?' दैत्य ने कहा, 'तूने मेरे पुत्र की हत्या की है, मैं तेरी हत्या करूँगा।'

व्यापारी ने कहा, 'मैने तो आपके पुत्र को देखा भी नहीं, मैंने उसे मारा किस तरह?'

दैत्य बोला, 'क्या तू अपना रास्ता छोड़कर इधर नहीं आया? क्या तूने अपनी झोली से निकाल कर खजूर नहीं खाए और उनकी गुठलियाँ इधर-उधर नहीं फेंकीं?' व्यापारी ने कहा, 'आपकी बातें ठीक हैं। मैंने ऐसा ही किया है।' दैत्य ने कहा, 'जब तू गुठलियाँ फेंक रहा था तो इतनी जोर से फेंक रहा था कि एक गुठली मेरे बेटे की आँख में लगी और बेचारे का उसी समय प्राणांत हो गया। अब मैं तुझे मारूँगा।'

व्यापारी बोला, 'स्वामी मैंने आप के पुत्र को जान-बूझकर तो मारा नहीं है। फिर मुझ से जो भूल हो गई है उसके लिए मैं आप के पैरों पर गिर कर क्षमा माँगता हूँ।' दैत्य ने कहा, 'मैं न दया करना जानता हूँ न क्षमा करना। और क्या खुद तुम्हारी शरीयत में नरवध के बदले नरवध की आज्ञा नहीं दी गई है? मैं तुझे मारे बगैर नहीं रहूँगा।'

यह कह कर दैत्य ने व्यापारी की बाँह पकड़कर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया और उसे मारने के लिए तलवार उठाई। व्यापारी अपने स्त्री-पुत्रों की याद कर-कर के विलाप करने लगा, साथ ही ईश्वर और पवित्रात्माओं की सौगंध दिला-दिला कर दैत्य से अपने प्राणों की भिक्षा माँगने लगा। दैत्य ने यह सोच कर हाथ रोक लिया कि जब यह थक कर हाथ-पाँव पटकना बंद कर देगा तो इसे मारूँगा। लेकिन व्यापारी ने रोना-पीटना बंद ही नहीं किया। अंत में दैत्य ने उससे कहा, 'तू बेकार ही अपने को और मुझे तंग कर रहा है। तू अगर आँसू की जगह आँखों से खून बहाए तो भी मैं तुझे मार डालूँगा।'

व्यापारी ने कहा, 'कितने दुख की बात है कि आपको किसी भाँति मुझ पर दया नहीं आती। आप एक दीन, निष्पाप मनुष्य को अन्यायपूर्वक मारे डाल रहे हैं और मेरे रोने- गिड़गिड़ाने का आप पर कोई प्रभाव नहीं होता। मुझे तो अब भी विश्वास नहीं होता कि आप मुझे मार डालेंगे।' दैत्य ने कहा, 'नहीं। निश्चय ही मैं तुम्हें मार डालूँगा।'

इतने में सवेरा हो गया। शहरजाद इतनी कहानी कह कर चुप हो गई। उसने सोचा, बादशाह के नमाज पढ़ने का समय हो गया है और उसके बाद वह दरबार को जाएगा। दुनियाजाद ने कहा, 'बहन, यह कितनी अच्छी कहानी थी।' शहरजाद बोली, 'तुम्हें यह कहानी पसंद है? अभी तो कुछ नहीं, आगे तो और भी आश्चर्यप्रद है। तुम सुनोगी तो और भी खुश होगी। अगर बादशाह सलामत ने आज मुझे जीवित रहने दिया और फिर कहानी कहने की अनुमति दी तो कल रात मैं तुम्हें शेष कथा सुनाऊँगी, वरना भगवान के पास चली जाऊँगी।'

शहरयार को भी यह कहानी बेहद पसंद आई थी। उसने विचार किया कि जब तक कहानी पूरी न हो जाए शहरजाद को नहीं मरवाना चाहिए इसलिए उसने उस दिन उसे प्राणदंड देने का इरादा छोड़ दिया। पलँग से उठकर वह नमाज पढ़ने गया और फिर दरबार में जा बैठा। शोक-कातर मंत्री भी उपस्थित था। वह अपनी बेटी का भाग्य सोच कर सारी रात न सोया था। वह प्रतीक्षा में था कि शाही हुक्म हो तो मैं अपनी बेटी को ले जाकर जल्लाद के सुपुर्द करूँ। किंतु उसे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि बादशाह ने यह अत्याचारी आदेश नहीं दिया। शहरयार दिन भर राजकाज में व्यस्त रहा और रात को शहरजाद के साथ सो रहा।

एक घड़ी रात रहे दुनियाजाद फिर जागी और उसने बड़ी बहन से कहा कि यदि तुम सोई नहीं तो वह कहानी आगे कहो। शहरयार भी जाग गया और बोला, 'यह ठीक कहती है। मैं भी व्यापारी और दैत्य की कहानी सुनना चाहता हूँ। तुम कहानी को आगे बढ़ाओ।'

शहरजाद ने फिर कहना शुरू किया :

जब व्यापारी ने देखा कि दैत्य मुझे किसी प्रकार जीवित न छोड़ेगा तो उसने कहा, 'स्वामी, यदि आपने मुझे वध्य समझ ही लिया है और किसी भाँति भी मुझे प्राण दान देने को तैयार नहीं हैं तो मुझे इतना अवसर तो दीजिए कि मैं घर जाकर अपने स्त्री-पुत्रों से विदा ले लूँ और अपनी संपत्ति अपने उत्तराधिकारियों में बाँट आऊँ ताकि मेरे पीछे उनमें संपत्ति को लेकर लड़ाई-झगड़ा न हो। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि यह सब करने के बाद मैं इसी स्थान पर पहुँच जाऊँगा। उस समय आप जो ठीक समझें वह मेरे साथ करें।' दैत्य ने कहा, 'यदि मैं तुम्हें घर जाने दूँ और तुम वापस न आओ फिर क्या होगा? ' व्यापारी बोला, 'मैं जो कहता हूँ उससे फिरता नहीं। फिर भी यदि आपको विश्वास न हो तो मैं उस भगवान की, जिसने पृथ्वी-आकाश आदि सब कुछ रचा है, सौगंध खाकर कहता हूँ कि मैं घर से इस स्थान पर अवश्य वापस आऊँगा।' दैत्य ने कहा, 'तुम्हें कितना समय चाहिए?' व्यापारी ने कहा, 'मुझे केवल एक वर्ष की मुहलत चाहिए जिसमें मैं अपनी सारी जाएदाद का प्रबंध कर के आऊँ और मरते समय मुझे कोई चिंता न रहे। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि वर्षोपरांत मैं इसी स्थान पर आकर स्वयं को आप के सुपुर्द कर दूँगा।' दैत्य ने कहा, 'अच्छा, मैं तुम्हें एक वर्ष के लिए जाने दूँगा किंतु तुम यह प्रतिज्ञा ईश्वर को साक्षी देकर करो।' व्यापारी ने ईश्वर की सौगंध खाकर प्रतिज्ञा दुहराई और दैत्य व्यापारी को उसी तालाब पर छोड़ कर अंतर्ध्यान हो गया। व्यापारी अपने घोड़े पर सवार होकर घर को चल दिया।

रास्ते में व्यापारी की अजीब हालत रही। कभी तो वह इस बात से प्रसन्न होता कि वह अभी तक जीवित है और कभी एक वर्ष बाद की निश्चित मृत्यु पर शोकातुर हो उठता था। जब वह घर पहुँचा तो उसकी पत्नी और बंधु-बांधव उसे देखकर प्रसन्न हुए किंतु वह उन लोगों को देख कर रोने लगा। वे लोग उसके विलाप से समझे कि उसे व्यापार में कोई भारी घाटा हुआ है या कोई और प्रिय वस्तु उसके हाथ से निकल गई है जिससे उसका धैर्य जाता रहा है।

जब व्यापारी का चित्त सँभला और उसके आँसू थमे तो उसकी पत्नी ने कहा, 'हम लोग तो तुम्हें देखकर प्रसन्न हुए हैं; तुम क्यों इस तरह रो-धो रहे हो?'व्यापारी ने कहा, 'रोऊँ-धोऊँ नहीं तो और क्या करूँ। मेरी जिंदगी एक ही वर्ष की और है।' फिर उसने सारा हाल बताया और दैत्य के सामने ईश्वर को साक्षी देकर की गई अपनी प्रतिज्ञा का वर्णन किया। यह सारा हाल सुन कर वे सब भी रोने-पीटने लगे। विशेषतः उसकी पत्नी सिर पीटने और बाल नोचने लगी और उसके लड़के-बच्चे ऊँचे स्वर में विलाप करने लगे। वह दिन रोने-पीटने ही में बीता।

दूसरे दिन से व्यापारी ने अपना सांसारिक कार्य आरंभ कर दिया। उस ने सब से पहले अपने ॠणदाताओं का धन वापस किया। उसने अपने मित्रों को बहुमूल्य भेंटें दीं, फकीरों-साधुओं को जी भर कर दान किया, बहुत-से दास-दासियों को मुक्त किया। उसने अपनी पत्नी को यथेष्ट धन दिया, अवयस्क बेटे-बेटियों के लिए अभिभावक नियुक्त किए और संतानों में संपत्ति को बाँट दिया।

इन सारे प्रबंधों में एक वर्ष बीत गया और वह अपनी प्रतिज्ञा निभाने के लिए दुखी मन से चल दिया। अपने कफन-दफन के खर्च के लिए उसने कुछ रुपया अपने साथ रख लिया। उसके चलते समय सारे घर वाले उससे लिपट कर रोने लगे और कहने लगे कि हमें भी अपने साथ ले चलो ताकि हम भी तुम्हारे साथ प्राण दे दें। व्यापारी ने अपने चित्त को स्थिर किया और उन सब को धैर्य दिलाने के लिए कहने लगा, 'मैं भगवान की इच्छा के आगे सिर झुका रहा हूँ। तुम लोग भी धैर्य रखो। यह समझ लो कि एक दिन सभी की मृत्यु होनी है। मृत्यु से कोई भी नहीं बच सकता। इसलिए तुम लोग धैर्यपूर्वक अपना काम करो।'

अपने सगे-संबंधियों से विदा लेकर व्यापारी चल दिया और कुछ समय के बाद उस स्थान पर पहुँच गया जहाँ उसने दैत्य से मिलने को कहा था। वह घोड़े से उतरा और तालाब के किनारे बैठ कर दुखी मन से अपने हत्यारे दैत्य की राह देखने लगा। इतने में एक वृद्ध पुरुष एक हिरनी लिए हुए आया और व्यापारी से बोला, 'तुम इस निर्जन स्थान में कैसे आ गए? क्या तुम नहीं हानते कि बहुत-से मनुष्य धोखे से इसे अच्छा विश्राम स्थल समझते हैं और यहाँ आकर दैत्यों के हाथों भाँति-भाँति के दुख पाते हैं?' व्यापारी ने कहा, 'आप ठीक कहते हैं। मैं भी इसी धोखे में पड़ कर एक दैत्य का शिकार होने वाला हूँ।' यह कह कर उसने बूढ़े को अपना सारा वृत्तांत बता दिया।

बूढ़े ने आश्चर्य से कहा, 'यह तुमने ऐसी बात बताई जैसी संसार में अब तक किसी ने नहीं सुनी होगी। तुमने ईश्वर की जो सौंगध खाई थी उसे पूरा करने में प्राणों की भी चिंता नहीं की। तुम बड़े सत्यवान हो और तुम्हारी सत्यनिष्ठा की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। अब में यहाँ ठहर कर देखूँगा कि दैत्य तुम्हारे साथ क्या करता है।'

वे आपस में वार्तालाप करने लगे। इतने ही में एक और वृद्ध पुरुष आया जिसके हाथ में रस्सी थी और दो काले कुत्ते उस रस्सी से बँधे हुए थे। वह उन दोनों से उनका हालचाल पूछने लगा। पहले बूढ़े ने व्यापारी का संपूर्ण वृतांत कहा और यह भी कहा कि मैं आगे का हाल-चाल देखने यहाँ बैठा हूँ। दूसरा बूढ़ा भी यह सब सुनकर आश्चर्यचकित हुआ और वहीं बैठकर दोनों से बातें करने लगा।

कुछ समय के उपरांत एक और बूढ़ा एक खच्चर लिए हुए आया और पहले दो बूढ़ों से पूछने लगा कि यह व्यापारी इतना दुखी होकर यहाँ क्यों बैठा है। दोनों ने उस व्यापारी का पूरा हाल कहा। तीसरे वृद्ध पुरुष ने वहाँ ठहरकर इस व्यापार का अंत देखने की इच्छा प्रकट की। अतएव वह भी वहाँ बैठ गया।

अभी तीसरा बूढ़ा अच्छी तरह साँस भी नहीं ले पाया था कि उन चारों व्यक्तियों ने देखा कि सामने के जंगल में एक बड़ा गहन धूम्रपुंज उठ रहा है। वह धुएँ का बादल उनके समीप आकर गायब हो गया। वे लोग आश्चर्य से आँखें मल ही रहे थे कि एक अत्यंत भयानक दैत्य उपस्थित हो गया। उसके हाथ में तलवार थी और उसने व्यापारी से कहा, 'उठकर इधर आ। मैं तुझे मारूँगा, तून मेरे बेटे को मारा है।' यह सुन कर व्यापारी और तीनों बूढ़े काँपने लगे और उच्च स्वर में विलाप करने लगे। उन सब के रोने- चिल्लाने से जंगल गूँज उठा। किंतु दैत्य व्यापारी को पकड़कर एक ओर ले ही गया।

हिरनी वाले बूढ़े ने यह देखा और वह दौड़कर दैत्य के पास पहुँचा और बोला, 'दैत्य महाराज, मैं आपसे कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। आप अपने क्रोध पर कुछ देर के लिए संयम रखें। मेरी इच्छा है कि मैं अपनी और इस हिरनी की कहानी आपको सुनाऊँ। किंतु कहानी के लिए एक शर्त है। यदि आप को यह कहानी विचित्र लगे और पसंद आए तो आप इस व्यापारी का एक तिहाई अपराध क्षमा कर दें।' दैत्य ने कुछ देर तक सोचकर कहा, 'अच्छा, मुझे तुम्हारी शर्त स्वीकार है। कहानी कहो।'
 
किस्सा बूढ़े और उसकी हिरनी का

वृद्ध बोला, 'हे दैत्यराज, अब ध्यान देकर मेरा वृत्तांत सुनें। यह हिरनी मेरे चचा की बेटी और मेरी पत्नी है। जब यह बारह वर्ष की थी तो इसके साथ मेरा विवाह हुआ। यह अत्यंत पतिव्रता थी और मेरे प्रत्येक आदेश का पालन करती थी। किंतु जब विवाह को तीस वर्ष हो गए और इससे कोई संतान नहीं हुई तो मैंने एक दासी मोल ले ली क्योंकि मुझे संतान की अति तीव्र अभिलाषा थी। कुछ समय बाद दासी से एक पुत्र का जन्म हुआ। बच्चा पैदा होने पर मेरी पत्नी उस बच्चे और उसकी माता से अत्यंत द्वेष रखने लगी। मुझे इस बात का अति खेद है कि मुझे अपनी पत्नी के विद्वेष का हाल बहुत दिन बाद मालूम हुआ।

'संयोगवश मुझे एक अन्य देश को जाना पड़ा। मैंने अपनी पत्नी से जोर देकर कहा कि मेरे पीछे इन दोनों की अच्छी तरह देखभाल करना और इनके आराम-तकलीफ का खयाल करना। भगवान चाहेगा तो मैं एक वर्ष में लौट आऊँगा।

'मेरी स्त्री ने मेरे जाने के बाद उन दोनों से दुश्मनी रखना शुरू कर दिया। वह जादू-टोना भी सीखने लगी थी। मेरे जाने के बाद उस दुष्ट ने अपने जादू से मेरे बच्चे को बछड़ा बना दिया और उसे मेरे नौकर ग्वाले के सुपुर्द कर दिया कि अपने घर ले जाकर इसे खिला-पिला कर मोटा-ताजा कर दे। इसी प्रकार उसने मेरी दासी को जादू के जोर से गाय बना दिया और उसे भी ग्वाले के घर भेज दिया।

'विदेश से वापस आकर मैंने अपनी पत्नी से अपने पुत्र और उसकी माँ के बारे में पूछा। उसने कहा कि तुम्हारी दासी तो मर गई है और तुम्हारे पुत्र को मैंने दो महीने से नहीं देखा, मालूम नहीं वह कहाँ चला गया। मुझे अपनी दासी के मरने का बड़ा दुख हुआ किंतु सब्र कर के बैठ गया। किंतु मुझे आशा थी कि कभी न कभी पुत्र से मेरी भेंट हो जाएगी।

'आठ महीने बाद ईद का त्योहार आया। मेरी इच्छा हुई कि इस त्योहार पर मैं किसी पशु का बलिदान करूँ। मैंने अपने ग्वाले को बुला कर कहा कि कुरबानी के लिए एक स्वस्थ गाय ले आ। संयोग से वह मेरी दासी ही को ले आया जो जादू के जोर से गाय बन गई थी। मैंने उसे बलिदान करने के लिए उसके पैरों को बाँधा तो वह बड़े करुणापूर्ण स्वर में डकारने लगी और उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। उसका यह हाल देखकर मुझे उस पर दया आ गई और मुझसे उसके गले पर छुरी न चल सकी। मैंने ग्वाले से कहा कि इसे ले जा और कुरबानी के लिए दूसरी गाय ले आ। यह सुनकर मेरी पत्नी बहुत क्रुद्ध हुई और कहने लगी कि इसी गाय की बलि दी जाएगी, ग्वाले के पास इससे अधिक हृष्ट-पुष्ट और कोई गौ नहीं है।

'उसके भला-बुरा करने से मैंने फिर छुरी हाथ में ली और गाय को मारने के लिए उद्यत हुआ। इस पर गाय और भी चीख-पुकार करने लगी। मैं अजीब दुविधा में पड़ा। अंत में मैंने छुरी ग्वाले को दे दी और कहा, मुझ से इस गाय पर छुरी नहीं चलती, तू ही इसका बलिदान कर दे। ग्वाले को गाय के रोने-चिल्लाने पर दया न आई और उसने छुरी फेर दी।

'जब गाय की खाल उतारी गई तो सब ने देखा कि उसके अंदर अस्थिपंजर मात्र है, मांस का कहीं पता नहीं। कारण यह था कि गाय की हृष्टतापुष्टता तो केवल मायाजाल के कारण थी। मैं उस ग्वाले पर नाराज हुआ कि गाय को ऐसी दशा में क्यों रखा कि वह ऐसी दुबली-पतली हो गई। मैंने गाय ग्वाले ही को दे दी और कहा, तू इसे अपने ही काम में ला, मेरे कुरबानी करने के लिए कोई बछड़ा ही ले आ, किंतु वह मोटा-ताजा होना चाहिए, इस गाय की तरह नहीं।

'ग्वाला शीघ्र ही एक मोटा-ताजा बछड़ा ले आया। बछड़ा देखने में भी बड़ा सुंदर था। यद्यपि उस बछड़े के बारे में मुझे मालूम न था कि यह मेरा ही पुत्र है तथापि उसे देखकर मेरे हृदय में प्रेम उमड़ने लगा और वह बछड़ा भी मुझे देखते ही रस्सी तुड़ाकर मेरे पैरों पर गिर पड़ा। इस बात से मेरे हृदय में प्रेम का स्रोत और जोर से उबलने लगा और मैं सोचने लगा कि ऐसे प्यारे बछड़े को कैसे मारूँ। इन भावनाओं ने मुझे अत्यंत विह्वल कर दिया। उस बछड़े की आँखों से आँसू बहने लगे। इससे उसके प्रति मेरा प्यार और उमड़ा और मैंने ग्वाले से कहा कि इस बछड़े को वापस ले जा और इसकी जगह कोई दूसरा बछड़ा ले आ।

'इस पर मेरी पत्नी ने कहा कि तुम इतने मोटे-ताजे बछड़े की कुर्बानी क्यों नहीं करते। मैंने कहा कि यह बछड़ा मुझे बड़ा प्यारा लगता है और मेरा जी नहीं करता है कि इसका वध करूँ, तुम इसके लिए कुछ जोर मत दो। लेकिन उस निष्ठुर दुष्ट ने तकरार जारी रखी और विद्वेषवश उसके वध पर जोर देती रही। मैं उसकी बहस से तंग आकर छुरी लेकर पुत्र की गर्दन काटने चला। उसने फिर मेरी ओर देखकर आँसू बहाए। मेरे हृदय में ऐसी दया और प्रीति उमड़ी कि छुरी हाथ से गिर गई।

'फिर मैंने अपनी पत्नी से कहा कि मेरे पास एक और बछड़ा है, मैं उसे कुरबान कर दूँगा। वह दुष्टमना फिर भी उसी बछड़े को मारने पर जोर देती रही। किंतु इस बार मैंने उसके बकने-झकने की परवाह नहीं की और बछड़े को वापस कर दिया। हाँ, पत्नी के हृदय को सांत्वना देने के लिए कह दिया कि बकरीद के दिन इसी बछड़े की बलि दूँगा।

'ग्वाला बछड़े को अपने घर ले गया। लेकिन दूसरे दिन तड़के ही मुझ से एकांत में कहा कि मैं आप से कुछ कहना चाहता हूँ और मुझे आशा है कि आप मेरी बात सुन कर प्रसन्न होंगे। मेरी बेटी जादू-टोने में प्रवीण है। कल जब मैं उस बछड़े को वापस लेकर गया तो वह उसे देख कर हँसी भी और रोई भी। मैंने इस विचित्र बात का कारण पूछा तो बोली कि अब्बा, जिस बछड़े को तुम लौटा कर जिंदा लाए हो वह हमारे मालिक का बेटा है, इसलिए मैं इसे जीता-जागता देखकर प्रसन्न हुई। रोई इसलिए कि इसके पहले इसकी माँ की कुरबानी दे दी गई थी। हमारे स्वामी की पत्नी ने सौतिया डाह के कारण इन माता-पुत्र को जादू के जोर से गाय और बछड़ा बना दिया था। मैंने जो अपनी बेटी के मुँह से सुना, जैसा का तैसा आपको बता दिया।

'हे दैत्यराज, अब आप सोचिए कि यह वृत्तांत सुनकर मेरे हृदय में कितना शोक और संताप उठा होगा। मैं कुछ देर मर्माहत होकर चुप रहा फिर ग्वाले के साथ उसके घर पर चला गया ताकि इस वृत्तांत को उसकी बेटी के मुँह से सुनूँ। सबसे पहले मैं उसकी पशुशाला में गया ताकि अपने बछड़ा बने हुए पुत्र को देखूँ। मैं उस पर हाथ फेरूँ इसके पहले ही वह मेरे पास आकर इतना लाड़ करने लगा कि मुझे विश्वास हो गया कि यह मेरा पुत्र ही है।

'मैंने लड़की के पास जाकर ग्वाले के मुँह से सुना हुआ हाल दुबारा सुना और लड़की से कहा कि क्या तुम इस बछड़े को फिर से मनुष्य का रूप दे सकती हो। उसने कहा, निश्चय ही मैं उसे दुबारा मनुष्य बना सकती हूँ। मैंने कहा, अगर तुम ऐसा कर दो तो मैं तुम्हें अपनी सारी धन-संपदा दे दूँगा। लड़की ने मुस्करा कर कहा कि हम लोग आप के सेवक हैं, आप हमारे मालिक हैं, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है; किंतु बछड़े को मनुष्य रूप मैं दो शर्तों पर दूँगी - एक तो यह कि उसके मनुष्य बन जाने पर आप उसका विवाह मेरे साथ कर दें और दूसरा यह कि जिसने इसे मनुष्य से पशु बनाया है उसे भी थोड़ा दंड दिया जाए।

'मैंने उत्तर दिया, मुझे तुम्हारी पहली शर्त बिल्कुल मंजूर है, मैं तुम्हारा विवाह उसके साथ कर दूँगा और तुम दोनों को इतना धन-धान्य दूँगा कि जीवन पर्यंत तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं रहेगी। दूसरी शर्त में निर्णय मैं तुम्हारे ही हाथ छोड़ता हूँ, तुम जो भी दंड उसके लिए उचित समझोगी वही दंड मेरी पत्नी को दिया जाएगा, हाँ यह जरूर कहूँगा कि यद्यपि वह दुष्ट दंडनीय है किंतु उसे प्राणदंड न दे देना।

'लड़की ने कहा कि जैसा उस ने आप के पुत्र के साथ किया है वैसा ही मैं उस के साथ करूँगी। यह कहकर उसने एक प्याले में पानी लिया और उसे अभिमंत्रित कर के बछड़े को सामने लाकर कहा कि ऐ खुदा के बंदे, अगर तू आदमी है और केवल जादू के कारण बछड़ा बना है तो भगवान की दया से अपना पूर्व रूप प्राप्त कर ले। यह कहकर उसने अभिमंत्रित जल उस पर छिड़का और वह तुरंत ही मनुष्य रूप में आ गया। मैंने प्रीतिपूर्वक उसे छाती से लगाया और गदगद स्वर में उससे कहा कि इस लड़की के कारण ही तुमने फिर से मानव देह पाई है, तुम इसका एहसान चुकाओ और इसके साथ विवाह कर लो। पुत्र ने सहर्ष मेरी बात मानी। लड़की ने इसी प्रकार जल को अभिमंत्रित कर के मेरी पत्नी को हिरनी का रूप दे दिया।

'मेरे पुत्र ने उस कन्या के साथ विवाह किया किंतु दुर्भाग्यवश वह थोड़े ही समय के बाद मर गई। मेरे पुत्र को इतना दुख हुआ कि वह देश छोड़कर कहीं चला गया। बहुत दिनों तक मुझे उसका कोई समाचार नहीं मिला। अतएव मैं उसे ढूँढ़ने निकला हूँ। मुझे किसी पर इतना भरोसा नहीं था कि अपनी हिरनी बनी हुई पत्नी को उसके पास छोड़ता, इसलिए मैं उसे अपने साथ लिए हुए देश-देश अपने पुत्र की खोज में घूमता हूँ। यही मेरी और इस हिरनी की कहानी है। अब आप स्वयं निर्णय कर लें कि यह घटना विचित्र है या नहीं।' दैत्य ने कहा, 'निःसंदेह विचित्र है। मैंने व्यापारी के अपराध का एक तिहाई हिस्सा माफ कर दिया।'

फिर शहरजाद ने शहरयार से निवेदन किया कि जब पहला वृद्ध मनुष्य अपनी कहानी कह चुका तो दूसरे बूढ़े ने, जो अपने साथ दो काले कुत्ते लिए था, दैत्य से कहा कि मैं भी अपना और इन दोनों कुत्तों का इतिहास आपके सम्मुख रखता हूँ। यदि यह पहली कहानी से भी अच्छा हो तो आशा करता हूँ कि उसे सुनने के बाद व्यापारी के अपराध का एक तिहाई भाग और क्षमा कर दिया जाएगा। दैत्य ने कहा कि अगर तुम्हारी कहानी पहली कहानी से अधिक विचित्र हुई तो मैं तुम्हारी बात जरूर मानूँगा।
 
किस्सा दूसरे बूढ़े का जिसके पास दो काले कुत्ते थे

दूसरे बूढ़े ने कहा, 'हे दैत्यराज, ये दोनों काले कुत्ते मेरे सगे भाई हैं। हमारे पिता ने मरते समय हम तीनों भाइयों को तीन हजार अशर्फियाँ दी थीं। हम लोग उन मुद्राओं से व्यापार चलाने लगे। मेरे बड़े भाई को विदेशों में जाकर व्यापार करने की इच्छा हुई सो उसने अपना सारा माल बेच डाला और जो वस्तुएँ विदेशों में महँगी बिकती थीं उन्हें यहाँ से खरीद कर व्यापार को चल दिया। इसके लगभग एक वर्ष बाद मेरी दुकान पर एक भिखमंगा आकर बोला, भगवान तुम्हारा भला करे। मैंने उस पर ध्यान दिए बगैर जवाब दिया, भगवान तुम्हारा भी भला करे। उसने कहा कि क्या तुमने मुझे पहचाना नहीं। मैंने उसे ध्यानपूर्वक देखा और फिर उसे गले लगाकर फूट-फूट कर रोया। मैंने कहा, भैया, मैं तुम्हें ऐसी दशा में कैसे पहचानता। फिर मैं ने उसके परदेश के व्यापार का हाल पूछा तो उसने कहा कि मुझे इस हाल में भी देख कर क्या पूछ रहे हो।

'फिर मेरे जोर देने पर उसने वे सारी विपदाएँ बताईं जो उस पर पड़ी थीं और बोला कि मैंने संक्षेप ही में तुम्हें सब बताया है, इससे अधिक विस्तार से बताऊँगा तो मेरा भी दुख बढ़ेगा और तुम्हारा भी। उसकी बातें सुनकर मैं अपने सभी काम भूल गया। मैंने उसे स्नान कराया और अच्छे वस्त्र मँगाकर उसे पहनाए। फिर मैंने अपना हिसाब देखा तो मालूम हुआ कि मेरे पास छह हजार रुपए हैं।

'मैंने तीन हजार रुपए अपने भाई को देकर कहा कि तुम पिछली हानि भूल जाओ और इस तीन हजार से नए सिरे से व्यापार करो। उसने रुपयों को सहर्ष ले लिया और नए सिरे से व्यापार करने लगा और हम सब लोग पहले की तरह रहने लगे।

'कुछ दिनों बाद मेरे छोटे भाई की इच्छा हुई कि विदेश जाकर व्यापार करे। मैंने उसे बहुत मना किया लेकिन उसने मेरी बात न मानी और अपना सारा माल बेच-बाच कर के वस्तुएँ खरीद लीं जो विदेशों में महँगी मिलती हैं। फिर उस ने मुझ से विदा ली और एक कारवाँ के साथ जो विदेश जा रहा था, रवाना हो गया। एक वर्ष के बाद मेरे बड़े भाई की तरह वह भी अपनी सारी जमा-पूँजी गँवाकर फकीर बनकर मेरे पास वापस आया। मैंने बड़े भाई की तरह छोटे भाई की भी सहायता की और उस वर्ष जो तीन हजार रुपए मुझे व्यापार में लाभ के रूप में मिले थे उसे दिए। वह भी नगर में एक दुकान लेकर पहले की तरह व्यापार करने लगा और सब कुछ पहले की तरह ठीक-ठाक चलने लगा।

'कुछ समय बीता था कि मेरे दोनों भाइयों ने मुझसे कहा, हम सभी लोग विदेश जाकर व्यापार करें। पहले मैंने इनकार किया और कहा कि तुम लोगों ही को विदेशी व्यापार से क्या लाभ हुआ है जो मुझे भी इस बार चलने को कह रह हो। तब दोनों मेरे साथ बहस करने लगे और कहने लगे कि कौन जाने इस बार तुम्हारे भाग्य और तुम्हारी व्यापार बुद्धि ही से हम दोनों की तकदीर जाग जाए और हमारे सारे सपने पूरे हो जाएँ। मैंने फिर इनकार कर दिया लेकिन ये मेरे पीछे पड़े रहे। यहाँ तक कि इसी बहस में पाँच वर्ष बीत गए और इस अवधि में उन्होंने मेरी जान खा डाली। तंग आकर मैंने उसकी बात मान ली।'

'मैंने व्यापार के लिए आवश्यक वस्तुएँ मोल ले लीं। उसी समय मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे भाइयों ने मेरा दिया हुआ धन खर्च कर डाला है और उनके पास कुछ नहीं बचा। मैंने इस पर भी उनसे कुछ नहीं कहा। उस समय मेरे पास बारह हजार रुपए थे। उसमें से आधा धन मैंने दोनों को दे दिया और कहा कि भाइयो, बुद्धिमानी और दूरदर्शिता इसी में है कि हम अपना आधा धन व्यापार में लगाएँ और आधा अपने घर में छोड़ जाएँ। अगर तुम दोनों की तरह इस बार भी हम सब को व्यापार में घाटा हो तो उस समय घर में रखा हुआ धन काम आएगा और हम लोग उसे व्यापार में लगा कर अपना काम चलाएँगे।

'चुनांचे मैंने उन्हें तीन-तीन हजार रुपए दिए और इतनी ही राशि अपने लिए रखी और बाकी तीन हजार रुपए अपने घर में एक गहरा गढ़ा खोदकर उसमें दबा दिया। फिर हमने व्यापार की वस्तुएँ खरीदीं और जहाज पर सवार होकर एक अन्य देश को निकल गए। एक महीने बाद हम कुशलतापूर्वक एक नगर में पहुँचे और व्यापार आरंभ किया। हमें व्यापार में बहुत लाभ हुआ। फिर हमने उस देश की बहुत-सी अच्छी वस्तुएँ अपने देश में बेचने के मंतव्य से मोल लीं।

'जब हम उस स्थान पर लेन-देन कर चुके और जहाज पर वापस आने के लिए तैयार हुए तो एक अत्यंत सुंदर स्त्री फटे-पुराने कपड़े पहने हुए मेरे सामने आई। उसने जमीन पर गिरकर मुझे सलाम किया, मेरा हाथ चूमा और मुझसे निवेदन किया कि मेरे साथ विवाह कर लो। मैंने इस बात को उचित न समझा और इनकार कर दिया। लेकिन वह गिड़गिड़ाती और मिन्नतें करती रही। अंत में मुझे उसकी निर्धनता पर दया आ गई और मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर के उसके साथ विधिवत विवाह कर लिया और उसे अपने साथ जहाज पर चढ़ा लिया। मैंने रास्ते में देखा कि वह केवल सुंदरी ही नहीं, अत्यंत बुद्धिमती भी है। इस कारण मैं उससे बहुत प्रेम करने लगा।

'किंतु मेरे इस सौभाग्य को देखकर मेरे दोनों भाई जल मरे और मेरी जान के दुश्मन हो गए। उनका विद्वेष यहाँ तक बढ़ा कि एक रात जब हम दोनों सो रहे थे उन्होंने हमें समुद्र में फेंक दिया। मेरी पत्नी में जैसे कोई अलौलिक शक्ति थी। ज्यों ही हम दोनों समुद्र में गिरे वह मुझे एक द्वीप पर ले गई। जब प्रभात हुआ तो उसने मुझे बताया कि मेरे कारण ही तुम्हारी जान बची है, मैं वास्तव में परी हँ, जब तुम जहाज पर चढ़ने के लिए तैयार हो रहे थे तो मैं तुम्हारे यौवन और सौंदर्य को देखकर तुम पर मोहित हो गई थी और तुम्हारे साथ प्रणय सूत्र में बँधना चाहती थी; मैं तुम्हारी सहृदयता की परीक्षा भी लेना चाहती थी इसलिए मैं फटे-पुराने कपड़े पहन कर भिखारिणियों की भाँति तुम्हारे सामने आई; मुझे इस बात की बड़ी प्रसन्नता हुई कि तुम ने मेरी इच्छा पूरी की; तुम ने मेरे साथ जो उपकार किया है उस से मैं उॠण होना चाहती हूँ किंतु मैं तुम्हारे भाइयों पर अत्यंत कुपित हूँ और उन्हें जीता न छोड़ूँगी।

'उसकी बातें सुनकर मुझे घोर आश्चर्य हुआ। मैंने उसका बड़ा एहसान माना और अत्यंत दीनतापूर्वक कहा कि तुम मेरे भाइयों को जान से न मारो; यद्यपि उन्होंने मुझे बड़ा कष्ट पहुँचाया है तथापि मैं यह नहीं चाहता कि उन्हें ऐसा कठोर दंड दिया जाए। मैं जितना ही अपने भाइयों की सिफारिश करता था उतना ही परी का क्रोध उन पर बढ़ता जाता था। वह कहने लगी कि मैं यहाँ से उड़कर जाऊँगी और उन दुष्टों समेत उनके जहाज को डुबो दूँगी। मैंने फिर उसकी खुशामद की और उसे परमेश्वर की सौगंध देकर कहा कि तुम उन्हें इतना कड़ा दंड न देना, सज्जनों का काम यही है कि वे बुराई के बदले भलाई करें; तुम अपने क्रोध को ठंडा करो और यदि तुम उन्हें दंड ही देना चाहो तो मृत्यु दंड के अतिरिक्त जो दंड चाहो दे दो।

'मैं उसे इस तरह समझा-बुझा और मना रहा था कि उसने एक क्षण में मुझे उड़ाकर मेरे मकान की छत पर पहुँचा दिया और स्वयं अंतर्ध्यान हो गई। मैं छत से उतरकर घर के अंदर आया। फिर मैंने गढ़े से अपने दबाए हुए तीन हजार रुपए निकाले और दुकान में जाकर फिर कारोबार करने लगा। जब मैं दुकान से घर को वापस आया तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि मकान के अंदर दो काले कुत्ते मौजूद हैं। मुझे देखकर वे दुम हिलाते हुए मेरे पास आए और मेरे पाँवों पर सर रख कर लोटने लगे।

'उसी समय वह परी मेरे घर में आई और मुझसे बोली कि इन कुत्तों को देख कर घबराना नहीं, ये तुम्हारे दोनों भाई हैं। यह सुनकर मेरा तो खून ही सूख गया। मैंने दुखी होकर परी से पूछा कि ये कुत्ते कैसे बन गए। उसने कहा, मेरी एक बहन है जिसने मेरे कहने पर तुम्हारे जहाज को माल-असबाब समेत डुबो दिया और तुम्हारे भाइयों को दस वर्ष के लिए कुत्ता बना दिया। यह कहकर परी अंतर्ध्यान हो गई। जब दस वर्ष व्यतीत हो गए तो मैं अपने भाइयों को साथ लेकर इधर आ निकला और इस व्यापारी तथा इस हिरनी वाले वृद्ध को देखकर यहाँ रुक गया। यही मेरी कहानी है। हे दैत्यराज, आप को यह कहानी अद्भुत लगी या नहीं?'

दैत्य ने कहा, 'वास्तव में तेरी आपबीती बड़ी अदभुत है; मैंने व्यापारी के अपराध का दूसरा तिहाई भाग भी माफ कर दिया।' इस पर तीसरे बूढ़े ने इन दोनों की तरह दैत्य से कहा कि अब मैं भी अपना वृत्तांत आप से कह रहा हूँ। यदि आप इसे भी अद्भुत पाएँ तो कृपया व्यापारी के अपराध का बाकी तिहाई भाग भी क्षमा कर दें। दैत्य ने यह बात स्वीकार की।
 
किस्सा तीसरे बूढ़े का जिसके साथ एक खच्चर थ

तीसरे बूढ़े ने कहना शुरू किया : 'हे दैत्य सम्राट, यह खच्चर मेरी पत्नी है। मैं व्यापारी था। एक बार मैं व्यापार के लिए परदेश गया। जब मैं एक वर्ष बाद घर लौटकर आया तो मैंने देखा कि मेरी पत्नी एक हब्शी गुलाम के पास बैठी हास-विलास और प्रेमालाप कर रही है। यह देखकर मुझे अत्यंत आश्चर्य और क्रोध हुआ और मैंने चाहा कि उन दोनों को दंड दूँ। तभी मेरी पत्नी एक पात्र में जल ले आई और उस पर एक मंत्र फूँक कर उसने मुझ पर अभिमंत्रित जल छिड़क दिया जिससे मैं कुत्ता बन गया। पत्नी ने मुझे घर से भगा दिया और फिर अपने हास-विलास में लग गई।

'मैं इधर-उधर घूमता रहा फिर भूख से व्याकुल होकर एक कसाई की दुकान पर पहुँचा और उसकी फेंकी हुई हड्डियाँ उठाकर खाने लगा। कुछ दिन तक मैं ऐसा ही करता रहा। फिर एक दिन कसाई के साथ उसके घर जा पहुँचा। कसाई की पुत्री मुझे देखकर अंदर चली गई और बहुत देर तक बाहर नहीं निकली। कसाई ने कहा, तू अंदर क्या कर रही है, बाहर क्यों नहीं आती? लड़की बोली, मैं अपरिचित पुरुष के सामने कैसे जाऊँ? कसाई ने इधर-उधर देखकर कहा कि यहाँ तो कोई अपरिचित पुरुष नहीं दिखाई देता, तू किस पुरुष की बात कर रही है?

'लड़की ने कहा, यह कुत्ता जो तुम्हारे साथ घर में आया है तुम्हें इसकी कहानी मालूम नहीं है। यह आदमी है। इसकी पत्नी जादू करने में पारंगत है। उसी ने मंत्र शक्ति से इसे कुत्ता बना दिया है। अगर तुम्हें इस बात पर विश्वास न हो मैं तुरंत ही इसे मनुष्य बना कर दिखा सकती हूँ। कसाई बोला, भगवान के लिए सो ही कर। तू इसे मनुष्य बना दे ताकि यह लोक-परलोक दोनों का धर्म संचित करे।

'यह सुन कर वह लड़की एक पात्र में जल लेकर अंदर से आई और जल को अभिमंत्रित करके मुझ पर छिड़का और बोली, तू इस देह को छोड़ दे और अपने पूर्व रूप में आ जा। उसके इतना कहते ही मैं दुबारा मनुष्य के रूप में आ गया और लड़की फिर परदे के अंदर चली गई। मैंने उसके उपकार से अभिभूl होकर कहा, हे भाग्यवती, तूने मेरा जो उपकार किया है उससे तुझे लोक-परलोक का सतत सुख प्राप्त हो। अब मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नी को भी कुछ ऐसा ही दंड मिले।

'यह सुनकर लड़की ने अपने पिता को अंदर बुलाया और उसके हाथ थोड़ा अभिमंत्रित जल बाहर भिजवाकर बोली, तू इस जल को अपनी पत्नी पर छिड़क देना। फिर तू उसे जो भी देह देना चाहे उस पशु का नाम लेकर स्त्री से कहना कि तू यह हो जा। वह उसी पशु की देह धारण कर लेगी। मैं उस जल को अपने घर ले गया। उस समय मेरी पत्नी सो रही थी। इससे मुझे काम करने का अच्छा मौका मिल गया। मैंने अभिमंत्रित जल के कई छींटे उसके मुँह पर मारे और कहा, तू स्त्री की देह छोड़कर खच्चर बन जा। वह खच्चर बन गई और तब से मैं इसी रूप में अपने साथ लिए घूमता हूँ।'

शहरजाद ने कहा - बादशाह सलामत, जब तीसरा वृद्ध अपनी कहानी कह चुका तो दैत्य को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने खच्चर से पूछा कि क्या यह बात सच है जो यह बूढ़ा कहता है? खच्चर ने सिर हिला कर संकेत दिया कि बात सच्ची है। तत्पश्चात दैत्य ने व्यापारी के अपराध का बचा हुआ तिहाई भाग भी क्षमा कर दिया और उसे बंधनमुक्त कर दिया। उसने व्यापारी से कहा, तुम्हारी जान आज इन्हीं तीन वृद्ध जनों के कारण बची है। यदि ये लोग तुम्हारी सहायता न करते तो तुम आज मारे ही गए थे। अब तुम इन तीनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करो। यह कहने के बाद दैत्य अंतर्ध्यान हो गया। व्यापारी उन तीनों के चरणों में गिर पड़ा। वे लोग उसे आशीर्वाद देकर अपनी-अपनी राह चले गए और व्यापारी भी घर लौट गया और हँसी-खुशी अपने प्रियजनों के साथ रहकर उसने पूरी आयु भोगी।

शहरजाद ने इतना कहने के बाद कहा, 'मैंने जो यह कहानी कही है इससे भी अच्छी एक कहानी जानती हूँ जो एक मछुवारे की है।' बादशाह ने इस पर कुछ नहीं कहा लेकिन दुनियाजाद बोली, 'बहन, अभी तो कुछ रात बाकी है। तुम मछुवारे की कहानी भी शुरू कर दो। मुझे आशा है कि बादशाह सलामत उस कहानी को सुनकर भी प्रसन्न होंगे।' शहरयार ने वह कहानी सुनने की स्वीकृति भी दे दी। शहरजाद ने मछुवारे की कहानी इस प्रकार आरंभ की।
 
किस्सा मछुवारे का

शहरजाद ने कहा कि हे स्वामी, एक वृद्ध और धार्मिक प्रवृत्ति का मुसलमान मछुवारा मेहनत करके अपने स्त्री-बच्चों का पेट पालता था। वह नियमित रूप से प्रतिदिन सवेरे ही उठकर नदी के किनारे जाता और चार बार नदी में जाल फेंकता था। एक दिन सवेरे उठकर उसने नदी में जाल डाला। उसे निकालने लगा तो जाल बहुत भारी लगा। उसने समझा कि आज कोई बड़ी भारी मछली हाथ आई है लेकिन मेहनत से जाल दबोच कर निकाला तो उसमें एक गधे की लाश फँसी थी। वह उसे देखकर जल-भुन गया, उसका जाल भी गधे के बोझ से जगह जगह फट गया था।

उसने सँभाल कर फिर नदी में फेंका। इस बार जो खींचा तो उसमे सिर्फ मिट्टी और कीचड़ भरा मिला। वह रो कर कहने लगा कि मेरा दुर्भाग्य तो देखो, दो-दो बार मैंने नदी में जाल डाला और मेरे हाथ कुछ नहीं आया। मैं तो इस पेशे के अलावा और कोई व्यवसाय जानता भी नहीं, मैं गुजर-बसर के लिए क्या करूँ।

उसने जाल को धो-धा कर फिर पानी में फेंका। इस बार भी उसके हाथ दुर्भाग्य ही लगा, जाल में कंकड़, पत्थर और फलों की गुठलियों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। यह देखकर वह और भी रोने-पीटने लगा। इतने में सवेरे का उजाला भी फैल गया था। उसने भगवान का ध्यान धरा और विनय की, 'हे सर्व शक्तिमान दीनदयाल प्रभु, तुम जानते हो कि मैं हर रोज सिर्फ चार बार नदी में जाल फेंकता हूँ। आज तीन बार फेंक चुका हूँ और कुछ हाथ नहीं आया और मेरी सारी मेहनत बेकार गई। अब एक बार जाल फेंकना रह गया है। अब तू कृपा कर और नदी से मुझे कुछ दिलवा दे और मुझ पर इस प्रकार दया कर जैसी किसी समय हजरत मूसा पर की थी।'

यह कहकर उसने चौथी बार जाल फेंका और खींचा तो भारी लगा। उसने सोचा इस बार तो जरूर मछलियाँ फँसी होंगी। बड़ा जोर लगा कर उसे बाहर निकालकर देखा कि उसमें सिवाय एक पीतल की गागर के और कुछ नहीं है। गागर के भार से वह समझा कि उसमें कुछ बहुमूल्य वस्तुएँ होंगी क्योंकि उसका मुँह सीसे के ढक्कन से अच्छी तरह बंद था और ढक्कन पर कोई मुहर लगी थी। मछुवारे ने मन में कहा कि यह अंदर से खाली हुआ तो भी इसे बेच कर पैसे मिल जाएँगे जिससे आज का काम किसी तरह चलेगा।

उसने गागर को उलट-पलट कर और हिला-डुला कर देखा लेकिन उसमें से कोई शब्द नहीं निकला। फिर वह कहीं से एक चाकू लाया और बहुत देर तक मेहनत करके उसका मुँह खोला। अब वह झाँक कर गागर के अंदर देखने लगा लेकिन उसे कुछ नहीं दिखाई दिया। उसी समय उसने देखा कि गागर से धुआँ निकल रहा है। वह आश्चर्य से देखने लगा कि क्या होता है। गागर में से बहुत सा धुआँ निकल कर नदी के ऊपर आकाश में फैल गया। कुछ ही देर में वह धुआँ सिमट कर एक जगह आ गया और उसने एक भी भीषण दैत्य का आकार ले लिया। मछुवारा घबराकर भागने को हुआ लेकिन उसने सुना कि दैत्य हाथ उठाकर कह रहा है कि ऐ सुलेमान, मेरा अपराध क्षमा कीजिए, मैं कभी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करूँगा। मछुवारा यह सुनकर अपना डर भूल गया और बोला, 'अरे भूत, तू क्या बक रहा है? सुलेमान को मरे अठारह सौ वर्षों से अधिक हो गए हैं। तू कौन है, मुझे बता कि तू इस गागर में किस प्रकार बंद हो गया।'

दैत्य ने उसे घृणापूर्वक देखकर कहा, 'तू बड़ा बदतमीज है, मुझे भूत कहता है।' मछुवारा बिगड़ कर बोला, 'और कौन है तू? तुझे भूत न कहूँ तो गधा कहूँ?'

दैत्य ने कहा, 'तेरे मरने में अब अधिक समय नहीं है। मैं तुझे शीघ्र ही मार डालूँगा। तू अपनी बकबक बंद कर और मुझसे बात ही करनी है तो जुबान सँभाल कर के कर।'

मछुवारा घबराकर बोला, 'तू मेरी हत्या क्यों करना चाहता है? क्या तू इस बात को भूल गया कि मैंने ही तुझे गागर के बंधन से छुड़ाया है।'

दैत्य बोला, 'मुझे भली प्रकार ज्ञात है कि तूने ही गागर खोली है लेकिन इस बात से तेरी जान नहीं बच सकती। हाँ, मैं तेरे साथ एक रियायत करूँगा। मैं तुझे यह निर्णय करने का अधिकार दूँगा कि मैं किस प्रकार तुझे मारूँ।'

मछुवारे ने कहा, 'तेरे हृदय में जरा भी न्यायप्रियता नहीं है। मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है कि तू मुझे मारना चाहता है? क्या मेरे इस अहसान का बदला तू इसी प्रकार देना चाहता है कि अकारण मुझे मार डाले।'

दैत्य बोला, 'अकारण नहीं मार रहा। मैं तुझे बताता हूँ कि तुझे मारने का क्या कारण है, तू ध्यान देकर सुन। मैं उन जिन्नों (दैत्यों) में से हूँ जो नास्तिक थे। अन्य दैत्य मानते थे कि हजरत सुलेमान ईश्वर के दूत (पैगंबर) हैं और उनकी आज्ञाओं का पालन करते थे। सिर्फ मैं और एक दूसरा दैत्य, जिसका नाम साकर था, सुलेमान की आज्ञा से विमुख हुए। बादशाह सुलेमान ने क्रुद्ध होकर अपने प्रमुख मंत्री आसिफ बिन वरहिया को आदेश दिया कि मुझे पकड़कर उसके (सुलेमान के) सामने पेश करे। मंत्री ने मुझे पकड़ कर उसके सामने खड़ा कर दिया। सुलेमान ने मुझसे कहा कि तू मुसलमान होकर मुझे पैगंबर मान और मेरी आज्ञाओं का पालन कर। मैंने इससे इनकार कर दिया। सुलेमान ने इसकी मुझे यह सजा दी कि मुझे इस गागर में बंद किया और अभिमंत्रित करके सीसे का ढक्कन इसके मुँह पर जड़ दिया और उस पर अपनी मुहर लगा दी और एक दैत्य को आज्ञा दी कि गागर को नदी में डाल दे। अतएव वह मुझे नदी में डाल गया। उस समय मैंने प्रण किया कि सौ वर्षों के अंदर जो आदमी मुझे निकालेगा उसे मैं इतना धन दे दूँगा कि वह आजीवन सुख से रहे और उसके मरणोपरांत भी बहुत-सा धन उसके उत्तराधिकारियों के लिए रह जाए। इस अवधि में मुझे किसी ने न निकाला। फिर मैंने प्रतिज्ञा की कि अब सौ वर्ष के अंदर जो मुझे मुक्त करेगा उसे मैं सारे संसार के खजाने दिलवा दूँगा। फिर भी किसी ने मुझे न निकाला। फिर मैंने प्रतिज्ञा की कि सौ वर्षों की तीसरी अवधि में जो मुझे मुक्त करेगा उसे मैं बहुत बड़ा बादशाह बना दूँगा और हर रोज उसके पास जाकर उस की तीन इच्छाए पूरी करूँगा। जब इस तीसरी अवधि में भी किसी ने मुझे न निकाला तो मुझे बड़ा क्रोध आया और उसी अवस्था में मैंने प्रण किया कि जो मुझे अब बाहर निकालेगा मैं अत्यंत क्रूरतापूर्वक उसके प्राण लूँगा। हाँ, उसके साथ इतनी रियायत करूँगा कि वह जिस प्रकार से मरना चाहेगा मैं उसे उसी प्रकार से मारूँगा। अब चूँकि तूने मेरी इस प्रतिज्ञा के बाद मुझे निकाला है इसीलिए अब तू बता कि तुझे किस प्रकार मारूँ।'

मछुवारा यह सुन कर आश्चर्यचकित और भयभीत हुआ और सोचने लगा कि दुर्भाग्य ही मेरे पीछे पड़ गया है जो मैं भलाई करके उसके बदले मृत्युदंड पा रहा हूँ। वह गिड़गिड़ाकर दैत्य से बोला, 'भाई, तुम अपनी प्रतिज्ञा भूल जाओ, मेरे छोटे-छोटे बच्चों पर दया करो। यदि तुम्हारी समझ में मैंने कोई अपराध किया है तो भी मुझे क्षमा कर दो। क्या तुमने सुना नहीं कि जो दूसरों के अपराध क्षमा करता है ईश्वर उसके अपराध क्षमा करता है?'

दैत्य ने कहा, 'यह बातें रहने दे। मैं तुझे मारे बगैर नहीं रहूँगा; तू सिर्फ बता कि किस प्रकार मरना चाहता है।'

मछुवारा अब बहुत ही भयभीत हुआ क्योंकि उसने देखा कि दैत्य उसे मारने का हठ नहीं छोड़ रहा है। अपने स्त्री-पुत्रों की याद करके वह अत्यंत दुखी हुआ। उसने एक बार फिर दैत्य का क्रोध शांत करने का प्रयत्न किया और उससे अनुनयपूर्वक कहा, 'हे दैत्यराज, मैंने तो तुम्हारे साथ इतनी भलाई की है, तुम इसके बदले मुझ पर दया भी नहीं कर सकते?' दैत्य बोला, 'इसी भलाई करने के कारण तो तेरी जान जा रही है।' मछुवारे ने फिर कहा, 'कितने आश्चर्य की बात है कि तुम अपने उपकारकर्ता के प्राण लेने पर तुले हो। यह मसल मशहूर है कि अगर कोई बुरों के साथ भलाई करता है तो उसका कुपरिणाम ही उठाता है। यह कहावत तुम्हारे ऊपर पूरी तरह लागू होती है।' दैत्य ने कहा, 'तुम चाहे जितने सवाल-जवाब करो और चाहे जितनी कहावतें कहो, मैं तो तुम्हारी जान लेने के प्रण से हटता नहीं।'

मछुवारे ने अंत में अपनी रक्षा का एक उपाय सोचा। वह दैत्य से बोला, 'अच्छा, अब मैं समझ गया कि तुम्हारे हाथ से मेरी जान नहीं बच सकती। यदि भगवान की यही इच्छा है तो मैं उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करता हूँ। लेकिन मैं तुझे उसी पवित्र नाम की - जिसे सुलेमान ने अपनी मुहर में खुदवाया था - सौगंध देकर कहता हूँ कि जब तक मैं अपने मरने का तरीका सोच कर तय करूँ तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो।' दैत्य इतनी बड़ी सौगंध से निरुपाय हो गया और काँपने-सा लगा। उसने कहा, 'पूछ, क्या पूछना चाहता है। मैं तेरे प्रश्न का उत्तर दूँगा।'

मछुवारे ने कहा, 'मुझे तेरी किसी बात पर विश्वास नहीं होता। तू इतना विशालकाय प्राणी है, इतनी छोटी-सी गागर में कैसे समा गया। तू झूठ बोलता है।' दैत्य बोला, 'जिस पवित्र नाम की सौगंध तूने मुझे दिलाई है मैं उस की साक्षी देकर कहता हूँ कि मैं उसी गागर में था।' मछुवारे ने कहा, 'मुझे अब भी विश्वास नहीं है कि तू सच कहता है। इस गागर में तो तेरा एक पाँव भी नहीं आएगा, तू पूरा का पूरा किस प्रकार इसमें समा गया?' दैत्य ने कहा, 'क्या मेरे इतनी बड़ी सौगंध खाने से भी तुझे विश्वास नहीं आता?' मछुवारा बोला, 'तेरे कसम खाने से क्या होता है? मैं तो तभी मानूँगा जब तुझे अपनी आँखों से गागर के अंदर देखूँ और उसमें से आती हुई तेरी आवाज न सुनूँ।'

यह सुन कर दैत्य फिर धुएँ के रूप में परिवर्तित हो गया और सारी नदी पर फैल गया। फिर वह धुआँ रूपी दैत्य एक स्थान पर इकट्ठा हो गया और धीरे-धीरे गागर में जाने लगा। जब बाहर धुएँ का नाम-निशान न रहा तो गागर के अंदर से दैत्य की आवाज आई, 'अब तो तुझे मालूम हुआ कि मैं झूठ नहीं कहता था, इसी गागर में बंद था?' मछुवारे ने इस बात का उत्तर न दिया। उसने गागर का ढकना, जिस पर सुलेमान की मुहर लगी हुई थी, गागर के मुँह पर रखा और उसे मजबूती से बंद कर दिया। फिर वह बोला, 'ओ दैत्य, अब तेरी बारी है कि तू गिड़गिड़ा कर मुझसे अपना अपराध क्षमा करने को कहे। या फिर मुझे यह बता कि तू स्वयं मेरे हाथ से किस प्रकार मरना चाहता है। नहीं, मेरे लिए तो यही उचित होगा कि मैं तुझे फिर इसी नदी में डाल दूँ और नदी के तट पर घर बनाकर रहूँ और जो भी मछुवारा यहाँ जाल डालने आए उसे चेतावनी दे दिया करूँ कि यहाँ एक गागर में एक महाभयंकर दैत्य बंद है, उसे कभी बाहर न निकालना क्योंकि उसने प्रण किया है कि जो भी उसे बाहर निकालेगा उसके हाथ से मारा जाएगा।'

यह सुन कर दैत्य बहुत घबराया। उसने बहुत हाथ-पाँव मारे कि गागर से निकल आए किंतु यह बात असंभव थी क्योंकि गागर के मुँह पर सुलेमान की मुहर लगा हुआ ढकना था और उस मुहर के कारण यह विवश था। उसे क्रोध तो बहुत आया किंतु उसने क्रोध पर नियंत्रण किया और अनुनयपूर्वक बोला, 'मछुवारे भाई, तुम कहीं मुझे फिर नदी में न डाल देना। तुम क्या मेरी बात सच समझते थे? मैं तो केवल परिहासस्वरूप ही तुम्हें मारने की बात कर रहा था। खेद है कि तुमने मेरी बात को सच समझ लिया। अब मुझे निकाल लो।'

मछुवारे ने हँसकर कहा, 'क्यों भाई, जब तुम गागर के बाहर थे तब तो अपने को बड़ा शक्तिशाली दैत्य राज समझते थे और अकड़ते थे, अब क्या हुआ कि गागर के अंदर जाते ही अपने को बड़ा दीन-हीन समझ रहे हो। मैं तो अब तुम्हें नदी में जरूर डालूँगा और प्रलयकाल तक तुम इसी गागर में बंदी बने रहोगे।' दैत्य ने कहा, 'भगवान के लिए मुझे नदी में वापस फेंकने का इरादा छोड़ दे।' इस प्रकार दैत्य ने बड़ी दीनता से छुटकारे की भीख माँगी, बहुत अनुनय-विनय की लेकिन मछुवारा टस से मस न हुआ। फिर दैत्य बोला, 'यदि तुम मुझे इस बार छोड़ दो तो मैं तुम्हारे साथ बड़ा उपकार करूँगा।' मछुवारा बोला, 'तू महाधूर्त है। मैं तेरी बात पर कैसे विश्वास करूँ? अगर मैंने तुझे छोड़ दिया तो तू फिर मुझे मारने पर उद्यत हो जाएगा। तू इस उपकार का भी मुझे ऐसा ही कुफल देगा जैसा गरीक नामी बादशाह ने हकीम दूबाँ के साथ किया था।' दैत्य ने यह पूछने पर कि यह कहानी क्या है, मछुवारे ने कहना शुरू किया।
 
गरीक बादशाह और हकीम दूबाँ

फारस देश में एक रूमा नामक नगर था। उस नगर के बादशाह का नाम गरीक था। उस बादशाह को कुष्ठ रोग हो गया। इससे वह बड़े कष्ट में रहता था। राज्य के वैद्य-हकीमों ने भाँति-भाँति से उसका रोग दूर करने के उपाय किए किंतु उसे स्वास्थ्य लाभ नहीं हुआ। संयोगवश उस नगर में दूबाँ नामक एक हकीम का आगमन हुआ। वह चिकित्सा शास्त्र में अद्वितीय था, जड़ी-बूटियों की पहचान उससे अधिक किसी को भी नहीं थी। इसके अतिरिक्त वह प्रत्येक देश की भाषा तथा यूनानी, अरबी, फारसी इत्यादि अच्छी तरह जानता था।

जब उसे मालूम हुआ कि वहाँ के बादशाह को ऐसा भयंकर कुष्ठ रोग है जो किसी हकीम के इलाज से ठीक नहीं हुआ है, तो उसने नगर में अपने आगमन की सूचना उसके पास भिजवाई और उससे भेंट करने के लिए स्वयं ही प्रार्थना की। बादशाह ने अनुमति दे दी तो वह उसके सामने पहुँचा और विधिपूर्वक दंडवत प्रणाम करके कहा, 'मैने सुना है कि नगर के सभी हकीम आप का इलाज कर चुके और कोई लाभ न हुआ। यदि आप आज्ञा करें तो मैं खाने या लगाने की दवा दिए बगैर ही आपका रोग दूर कर दूँ।' बादशाह ने कहा, 'मैं दवाओं से ऊब चुका हूँ। अगर तुम बगैर दवा के मुझे अच्छा करोगे तो मैं तुम्हें बहुत पारितोषिक दूँगा।' दूबाँ ने कहा, 'भगवान की दया से मैं आप को बगैर दवा के ठीक कर दूँगा। मैं कल ही से चिकित्सा आरंभ कर दूँगा।'

हकीम दूबाँ बादशाह से विदा होकर अपने निवास स्थान पर आया। उसी दिन उसने कोढ़ की दवाओं से निर्मित एक गेंद और उसी प्रकार एक लंबा बल्ला बनवाया और दूसरे दिन बादशाह को यह चीजें देकर कहा कि आप घुड़सवारी की गेंदबाजी (पोलो) खेलें और इस गेंद-बल्ले का प्रयोग करें। बादशाह उसके कहने के अनुसार खेल के मैदान में गया। हकीम ने कहा, 'यह औषधियों का बना गेंद-बल्ला है। आप को जब पसीना आएगा तो येऔषधियाँ आप के शरीर में प्रवेश करने लगेंगी। जब आपको काफी पसीना आ जाए और औषधियाँ भली प्रकार आप के शरीर में प्रविष्ट हो जाएँ तो आप गर्म पानी से स्नान करें। फिर आपके शरीर में मेरे दिए हुए कई गुणकारी औषधियों के तेलों की मालिश होगी। मालिश के बाद आप सो जाएँ। मुझे विश्वास है कि दूसरे दिन उठकर आप स्वयं को नीरोग पाएँगे।'

बादशाह यह सुनकर घोड़े पर बैठा और अपने दरबारियों के साथ चौगान (पोलो) खेलने लगा वह एक तरफ से उनकी ओर बल्ले से गेंद फेंकता था और वे दूसरी ओर से उसकी तरफ गेंद फेंकते थे। कई घंटे तक इसी प्रकार खेल होता रहा। गर्मी के कारण बादशाह के सारे शरीर से पसीना टपकने लगा और हकीम की दी हुई गेंद और बल्ले की औषधियाँ उसके शरीर में प्रविष्ट हो गईं। इसके बाद बादशाह ने गर्म पानी से अच्छी तरह मल-मल कर स्नान किया। इसके बाद तेलों की मालिश और दूसरी सारी बातें जो वैद्य ने बताई थीं की गईं। सोने के बाद दूसरे दिन बादशाह उठा तो उसने अपने शरीर को ऐसा नीरोग पाया जैसे उसे कभी कुष्ठ हुआ ही नहीं था।

बादशाह को इस चामत्कारिक चिकित्सा से बड़ा आश्चर्य हुआ। वह हँसी-खुशी उत्तमोत्तम वस्त्रालंकार पहन कर दरबार में आ बैठा। दरबारी लोग मौजूद थे ही। कुछ ही देर में हकीम दूबाँ भी आया। उसने देखा कि बादशाह का अंग-अंग कुंदन की तरह दमक रहा है। अपनी चिकित्सा की सफलता पर उसने प्रभु को धन्यवाद दिया और समीप आकर दरबार की रीति के अनुसार सिंहासन को चुंबन दिया। बादशाह ने हकीम को बुलाकर अपने बगल में बिठाया और दरबार के लोगों के सन्मुख हकीम की अत्यधिक प्रशंसा की।

बादशाह ने अपनी कृपा की उस पर और भी वृष्टि की। उसे अपने ही साथ भोजन कराया। संध्याकालीन दरबार समाप्त होने पर जब मुसाहिब और दरबारी विदा हो गए तो उसने एक बहुत ही कीमती खिलअत (पारितोषक राजवस्त्र) और साठ हजार रुपए इनाम में दिए। इसके बाद भी वह दिन-प्रतिदिन हकीम की प्रतिष्ठा बढ़ाता जाता था। वह सोचता था कि हकीम ने जितना उपकार मुझ पर किया है उसे देखते हुए मैंने इसके साथ कुछ भी नहीं किया। इसीलिए वह प्रतिदिन कुछ न कुछ इनाम-इकराम उसे देने लगा।

बादशाह का मंत्री हकीम की इस प्रतिष्ठा और उस पर बादशाह की ऐसी अनुकंपा देखकर जल उठा। वह कई दिन तक सोचता रहा कि हकीम को बादशाह की निगाहों से कैसे गिराऊँ। एक दिन एकांत में उसने बादशाह से निवेदन किया कि मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ, अगर आप अप्रसन्न न हों। बादशाह ने अनुमति दे दी तो मंत्री ने कहा, 'आप उस हकीम को इतनी मान-प्रतिष्ठा दे रहे हैं यह बात ठीक नहीं है। दरबार के लोग और मुसाहिब भी इस बात को गलत समझते हैं कि एक विदेशी को, जिसके बारे में यहाँ किसी को कुछ पता नहीं है, इतना मान-सम्मान देना और विश्वासपात्र बनाना अनुचित है। वास्तविकता यह है कि हकीम दूबाँ महाधूर्त है। वह आपके शत्रुओं का भेजा हुआ है जो चाहते हैं वह छल क द्वारा आपको मार डाले।'

बादशाह ने जवाब दिया, 'मंत्री, तुम्हें हो क्या गया है जो ऐसी निर्मूल बातें कर रहे हो और हकीम को दोषी ठहरा रहे हो?' मंत्री ने कहा, 'सरकार मैं बगैर सोचे-समझे यह बात नहीं कह रहा हूँ। मैंने अच्छी तरह पता लगा लिया है कि यह मनुष्य विश्वसनीय नहीं है। आपको उचित है कि आप हकीम की ओर से सावधान हो जाएँ। मैं फिर जोर देकर निवेदन करता हूँ कि दूबाँ अपने देश से वही इरादा ले कर आया है अर्थात वह छल से आप की हत्या करना चाहता है।'

बादशाह ने कहा, 'मंत्री, हकीम दूबाँ हरगिज ऐसा आदमी नहीं है जैसा तुम कहते हो। तुमने स्वयं ही देखा है कि मेरा रोग किसी और हकीम से ठीक न हो सका और दूबाँ ने उसे एक दिन में ही ठीक कर दिया। ऐसी चिकित्सा को चमत्कार के अलावा क्या कहा जा सकता है? अगर वह मुझे मारना चाहता तो ऐसे कठिन रोग से मुझे छुटकारा क्यों दिलाता? उसके बारे में ऐसे विचार रखना बड़ी नीचता है। मैं अब उसका वेतन तीन हजार रुपए मासिक कर रहा हूँ। विद्वानों का कहना है कि सत्पुरुष वही होते हैं जो अपने साथ किए गए किंचित्मात्र उपकार को आजीवन न भूलें। उसने तो मेरा इतना उपकार किया है कि अगर मैं उसे थोड़ा इनाम और मान-सम्मान दे दिया तो तुम उससे जलने क्यों लगे। तुम यह न समझो कि तुम्हारी निंदा के कारण मैं उसका उपकार करना छोड़ दूँगा। इस समय मुझे वह कहानी याद आ रही है जिसमें बादशाह सिंदबाद के वजीर ने शहजादे को प्राणदंड देने से रोका था।' मंत्री ने कहा, 'वह कहानी क्या है? मैं भी उसे सुनना चाहता हूँ।'

बादशाह गरीक ने कहा, 'बादशाह सिंदबाद की सास किसी कारण सिंदबाद के बेटे से नाराज थी। उसने छलपूर्वक शहजादे पर ऐसा भयंकर अभियोग लगाया कि बादशाह ने शहजादे को प्राण-दंड देने का आदेश दे दिया। सिंदबाद के वजीर ने उससे निवेदन किया कि महाराज, इस आदेश को जल्दी में न दें। जल्दी का काम शैतान का होता है। सभी धर्मशास्त्रों ने अच्छी तरह समझे बूझे-बगैर किसी काम को करने से मना किया है। कहीं ऐसा न हो कि आप का उस भले आदमी जैसा हाल हो जिसने जल्दबाजी में अपने विश्वासपात्र तोते को मार दिया और बाद में हमेशा पछताता रहा। बादशाह के कहने से वजीर ने भद्र पुरुष और उसके तोते की कहानी इस तरह सुनाई।'
 
किस्सा भद्र पुरुष और उसके तोते का

पूर्वकाल में किसी गाँव में एक बड़ा भला मानस रहता था। उसकी पत्नी अतीव सुंदरी थी और भला मानस उससे बहुत प्रेम करता था। अगर कभी घड़ी भर के लिए भी वह उसकी आँखों से ओझल होती थी तो वह बेचैन हो जाता था। एक बार वह आदमी किसी आवश्यक कार्य से एक अन्य नगर को गया। वहाँ के बाजार में भाँति-भाँति के और चित्र-विचित्र पक्षी बिक रहे थे। वहाँ एक बोलता हुआ तोता भी था। तोते की विशेषता यह थी कि उस से जो भी पूछा जाए उसका उत्तर बिल्कुल मनुष्य की भाँति देता था। इसके अलावा उसमें यह भी विशेषता थी कि किसी मनुष्य की अनुपस्थिति में उसके घर पर जो-जो घटनाएँ घटी होती थीं उन्हें भी वह उस मनुष्य के पूछने पर बता देता था।

कुछ दिनों बाद उस भद्र पुरुष का विदेश जाना हुआ। जाते समय उसने तोते को अपनी पत्नी के सुपुर्द कर दिया कि इसकी अच्छी तरह देख-रेख करना। वह परदेश चला गया और काफी समय बाद लौटा। लौटने पर उसने अकेले में तोते से पूछा कि यहाँ मेरी अनुपस्थिति में क्या-क्या हुआ। उसकी अनुपस्थिति में उसकी पत्नी ने खूब मनमानी की थी और शील के बंधन तोड़ दिए थे। तोते ने अपने स्वामी से सारा हाल कह सुनाया। स्वामी ने अपनी पत्नी को खूब डाँटा-फटकारा कि तू मेरे पीठ पीछे क्या-क्या हरकतें करती है और कैसे-कैसे गुल खिलाती है।

पत्नी-पति से तो कुछ न बोली क्योंकि बातें सच्ची थीं। लेकिन यह सोचने लगी कि यह बातें उसके पति को किसने बताई। पहले उसने सोचा कि शायद किसी सेविका ने यह काम किया है। उसने एक एक सेविका को बुलाकर डाँट फटकार कर पूछा किंतु सभी ने कसमें खा-खाकर कहा कि हमने तुम्हारे पति से कुछ नहीं कहा है। स्त्री को उनकी बातों का विश्वास हो गया और उसने समझ लिया कि यह कार्रवाई तोते ने की है। उसने तोते से कुछ न कहा क्योंकि तोता इस बात को भी अपने स्वामी को बता देता। किंतु वह इस फिक्र में रहने लगी कि किसी प्रकार तोते को अपने स्वामी के सन्मुख झूठा सिद्ध करें और अपने प्रति उसके अविश्वास और संदेह को दूर करें।

कुछ दिन बाद उसका पति एक दिन के लिए फिर गाँव से बाहर गया। स्त्री ने अपनी सेविकाओं को आज्ञा दी कि रात में एक सेविका सारी रात तोते के पिंजरे के नीचे चक्की पीसे, दूसरी उस पर इस तरह पानी डालती रहे जैसे वर्षा हो रही है और तीसरी सेविका पिंजरे के पीछे की ओर दिया जला कर खुद दर्पण लेकर तोते के सामने खड़ी हो जाए और दर्पण पर पड़ने वाले प्रकाश को तोते की आँखों के सामने रह-रह कर डालती रहे। सेविकाएँ रात भर ऐसा करती रहीं और भोर होने के पहले ही उन्होंने पिंजरा ढक दिया।

दूसरे दिन वह भद्र पुरुष लौटा तो उसने एकांत में तोते से पूछा कि कल रात को क्या-क्या हुआ था। तोते ने कहा, 'हे स्वामी, रात को मुझे बड़ा कष्ट रहा; रात भर बादल गरजते रहे, बिजली चमकती रही और वर्षा होती रही।' चूँकि विगत रात को बादल और वर्षा का नाम भी नहीं था इसलिए आदमी ने सोचा कि यह तोता बगैर सिर-पैर की बातें करता है और मेरी पत्नी के बारे में भी इसने जो कुछ कहा वह भी बिल्कुल बकवास थी। उसे तोते पर अत्यंत क्रोध आया और उसने तोते को पिंजरे से निकाला और धरती पर पटक कर मार डाला। वह अपनी पत्नी पर फिर विश्वास करने लगा लेकिन यह विश्वास अधिक दिनों तक नहीं रहा। कुछ महीनों के अंदर ही उसके पड़ोसियों ने उसके उसकी पत्नी के दुष्कृत्यों के बारे में ऐसी-ऐसी बातें कहीं जो उस तोते की बातों जैसी थीं। इससे उस भद्र पुरुष को बहुत पछतावा हुआ कि बेकार में ही ऐसे विश्वासपात्र तोते को जल्दी में मार डाला।

मछुवारे ने इतनी कहानी कहकर गागर में बंद दैत्य से कहा कि बादशाह गरीक ने तोते की कथा कहने के बाद अपने मंत्री कहा, 'तुम दुश्मनी के कारण चाहते हो कि मैं दूबाँ हकीम को जिसने मेरा इतना उपकार किया है और तुम्हारे साथ भी कोई बुराई नहीं की है निरपराध ही मरवा डालूँ। मैं तोते के स्वामी जैसा मूर्ख नहीं हूँ जो बगैर सोचे-समझे ऐसी बात जल्दबाजी में करूँ।'

मंत्री ने निवेदन किया, 'महाराज, तोता अगर निर्दोष मारा भी गया तो कौन सी बड़ी बात हो गई। न स्त्री का दुष्कृत्य कोई बड़ी बात है। किंतु जो बात मैं आप से कह रहा हूँ वह बड़ी बात है और इस पर ध्यान देना जरूरी है। फिर आप के बहुमूल्य जीवन के लिए एक निरपराध व्यक्ति मारा भी जाय तो इस में खेद की क्या बात है। उसका इतना अपराध है ही कि सभी लोग उसे शत्रु का भेदिया कहते हैं। मुझे उससे न ईर्ष्या है न शत्रुता। मैं जो कुछ कहता हूँ आप ही के भले के लिए कहता हूँ। मुझे इससे कुछ लेना-देना नहीं कि वह अच्छा है या बुरा, मैं तो केवल आप की दीर्घायु चाहता हँ। अगर मेरी बात असत्य निकले तो आप मुझे वैसा ही दंड दें जैसा एक राजा ने अपने अमात्य को दिया था। उस अमात्य को अंतत: राजाज्ञा से मरना ही पड़ा था।' बादशाह ने पूछा किस राजा ने अमात्य को प्राण-दंड दिया और किस बात पर दिया। मंत्री ने यह कहानी कही।
 
अमात्य की कहानी

प्राचीन समय में एक राजा था उसके राजकुमार को मृगया का बड़ा शौक था। राजा उसे बहुत चाहता था, राजकुमार की किसी इच्छा को अस्वीकार नहीं करता था। एक दिन राजकुमार ने शिकार पर जाना चाहा। राजा ने अपने एक अमात्य को बुलाकर कहा कि राजकुमार के साथ चले जाओ; तुम्हें सब रास्ते मालूम हैं, राजकुमार को नहीं मालूम, इसलिए एक क्षण के लिए भी राजकुमार का साथ न छोड़ना।

राजकुमार अमात्य और कई अन्य लोगों को लेकर आखेट के लिए वन में गया। कुछ देर में एक बारहसिंघा सामने से निकला। राजकुमार ने घोड़ा उसके पीछे डाल दिया। अमात्य ने सोचा कि राजकुमार का घोड़ा तेज है और शीघ्र ही बारहसिंघे को मार लिया जाएगा। इसलिए उसने कुछ ढील डाल दी। लेकिन बारहसिंघा दौड़ता ही रहा। राजकुमार कई कोस तक उसके पीछे गया लेकिन उसे पा न सका। वह रास्ता भी भूल गया। उसने चाहा कि वापस अपने अमात्य और अन्य शिकारी साथियों से जा मिले लेकिन वह बिल्कुल भटक गया।

भटकते-भटकते उसने एक स्थान पर देखा कि एक अति सुंदर स्त्री विलाप कर रही है। राजकुमार ने अपने घोड़े को रोका और स्त्री से पूछा कि तू क्यों रो रही है। स्त्री ने बताया कि मैं एक देश की राजकुमारी हूँ, मैं विशेष परिस्थिति वश अकेली अपने घोड़े पर सवार होकर इधर से जा रही थी कि मुझे नींद आ गई और मैं घोड़े से गिर पड़ी और मेरा घोड़ा भी जंगल में भाग गया, मुझे यह भी नहीं मालूम वह किधर को गया है। राजकुमार को उस पर दया आई। उसने अपने आगे अपने घोड़े पर बिठा लिया और जिस ओर स्त्री ने अपनी राजधानी बताई थी उधर चल दिया।

कुछ समय पश्चात स्त्री ने कहा मैं घोड़े पर थक गई हूँ, पैदल चलना चाहती हूँ। राजकुमार ने उसे उतार दिया और उसके साथ पैदल चलने लगा। लेकिन उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक परकोटे के पास पहुँच कर उसने पुकार कर कहा, 'बच्चों प्रसन्न हो जाओ। मैं तुम्हारे लिए बड़ा मोटा ताजा आदमी शिकार के लिए लाई हूँ।' जवाब में आवाज आई, अम्मा कहाँ है वह आदमी। हमें जल्दी से दे। हम बहुत भूखे हैं। राजकुमार यह सुन कर बड़ा भयभीत हुआ। वह समझ गया कि यह स्त्री नरभक्षी वनवासियों की जाति की है और मुझे मार कर खा जाने के लिए यहाँ धोखे से लाई है। वह घोड़े पर बैठ कर मुड़ने लगा। स्त्री ने देखा कि शिकार हाथ से निकला जाता है तो पलट कर कहने लगी, 'तुम परेशान क्यों हो, यह तो तुम्हारे साथ मजाक हो रहा था। राजकुमार ने कहा, 'खैर, तुम अपने घर आ गई हो और अब मैं जा रहा हूँ।' स्त्री बोली तुम कौन हो, कहाँ जाओगे। राजकुमार ने अपना हाल बताया कि शिकार खेलने में राह भूल गया हूँ। स्त्री ने कहा, 'फिर मेरे साथ क्यों नहीं आते? थोड़ी देर आराम करो।'

राजकुमार की समझ में नहीं आया कि स्त्री पर विश्वास करे या न करे। उसने अंततः दोनों हाथ उठाकर कहा, 'हे भगवान, यदि तू सर्वशक्तिमान है तो मुझे इस विपत्ति से बचा और मुझे मेरा मार्ग दिखा।' उसके यह कहते ही नरभक्षिणी स्त्री एक घने जंगल में गायब हो गई और कुछ देर में राजकुमार को अपना मार्ग भी मिल गया। अपने महल में पहुँच कर उसने अपने पिता से अपना संपूर्ण वृत्तांत कहा कि किस प्रकार वह अमात्य से बिछुड़ गया और नरभक्षिणी के पंजे में फँसते-फँसते बचा। राजा इस बात से इतना क्रुद्ध हुआ कि उसे अमात्य का वध करवा डाला।

शहरजाद इतनी कहानी कह कर फिर आगे बोली कि बादशाह सलामत, मंत्री गरीक बादशाह को यह किस्सा सुनाकर कहने लगा, 'मैंने विश्वस्त सूत्रों से मालूम किया है कि हकीम दूबाँ आपके किसी वैरी का जासूस है और उसने इसे यहाँ पर इसलिए भेजा है कि आपको धीरे-धीरे मार दे। यह ठीक ही है कि आप का रोग अभी दूर हो गया है किंतु औषधियों का बाद में ऐसा प्रभाव होगा कि आप को अत्यंत कष्ट होगा और संभव है कि जान पर भी बन आए।

मंत्री ने बादशाह को इतना बहकाया कि वह हकीम पर संदेह करने लगा। वह बोला, 'शायद तुम ठीक ही कहते हो। हो सकता है कि यह मेरी हत्या के उद्देश्य से आया हो और किसी समय मुझे कोई ऐसी औषधि सुँघाए जिससे मेरी जान जाती रहे। मुझे वास्तव में अपने लिए खतरा मालूम होता है।' मंत्री ने सोचा कि अपने षड्यंत्र को शीघ्र ही पूरा करना चाहिए, ऐसा न हो कि बादशाह का विचार बाद में पलट जाय। वह बोला, 'महाराज, फिर देर किस बात की है। उसे अभी बुलवा कर क्यों नहीं मरवा देते?' बादशाह ने कहा, 'अच्छा, मैं ऐसा ही करता हूँ।'

बादशाह ने एक सरदार को भेजा कि इसी समय दूबाँ को यहाँ ले आओ। दूत उसे थोड़ी ही देर में ले आया। दूबाँ के आने पर बादशाह ने पूछा, 'तुम्हें मालूम है मैंने तुम्हें इस समय क्यों बुलाया है' उसने निवेदन किया कि मुझे नहीं मालूम। बादशाह ने कहा, 'मैंने तुम्हें प्राणदंड देने के लिए बुलाया है ताकि तुम्हारे षड्यंत्र से बचाव कर सकूँ।' हकीम को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने पूछा कि मेरा अपराध क्या है कि आप मुझे मरवाए डाल रहे है। बादशाह ने कहा, 'तुम मेरे किसी शत्रु के जासूस हो और यहाँ मुझे मारने के लिए आए हो। मेरे लिए यही उचित है कि तुम्हें प्राणदंड देने में एक क्षण का भी विलंब न करूँ। यह कह कर बादशाह ने उसी सरदार से कहा कि हकीम का वध कर दे।

हकीम समझ गया कि मेरे शत्रुओं ने ईर्ष्या के कारण बादशाह का मन मुझ से फेर दिया है। वह इस बात पर पछताने लगा कि मैंने क्यों यहाँ आकर बादशाह को रोगमुक्त किया और अपनी जान जाने का सामान किया। वह बहुत देर तक बादशाह के सामने निर्दोषिता सिद्ध करता रहा लेकिन बादशाह ने उसे मारने की जिद पकड़ ली। उसने दूसरी बार सरदार को आज्ञा दी कि हकीम को मार दो। हकीम कहने लगा आप मुझे निरपराध ही मरवाए डाल रहे हैं, भगवान मेरी हत्या का बदला आप से लेगा।

इतना कह कर मछुवारे ने गागर के दैत्य से कहा कि जो बात दूबाँ और बादशाह गरीक के बीच थी वही मेरे तुम्हारे बीच है, खैर आगे की कहानी सुनो, जब जल्लाद दूबाँ को मारने के लिए उसकी आँखों की पट्टी बाँधने लगा तो बादशाह के दरबारियों ने हकीम को निरपराध समझ कर एक बार फिर बादशाह से उसकी जान न लेने की प्रार्थना की किंतु बादशाह ने उन सब को ऐसी डाँट बताई कि उन्हें कुछ कहने की हिम्मत न रही। हकीम को निश्चय हो गया कि किसी तरह मेरी जान नहीं बच सकती। उसने बादशाह से कहा, 'स्वामी, मुझे इतनी मुहलत तो दें कि मैं घर जाकर वसीयत लिख आऊँ। मैं अपनी पुस्तकें किसी सुपात्र को देना चाहता हूँ। लेकिन उनमें से एक पुस्तक आपके अपने पुस्तकालय में रखने योग्य है।'

बादशाह ने कहा, 'ऐसी कौन सी पुस्तक तेरे पास है जो मेरे लायक हो? क्या है उस पुस्तक में? दूबाँ ने कहा, 'उसमें बड़ी अद्भुत और काम की बातें हैं। उनमें से एक बात यह है कि मेरे सिर के काटे जाने के बाद आप पुस्तक के छठे पन्ने के बाएँ पृष्ठ की तीसरी पंक्ति को पढ़कर आप जो भी प्रश्न करेंगे उसका उत्तर मेरा कटा हुआ सिर देगा।' बादशाह को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोच विचार कर आज्ञा दी कि हकीम को पहरे में उसके घर ले जाओ। बादशाह की आज्ञा के अनुसार सिपाही हकीम को उसके घर ले गए। हकीम ने एक दिन में अपना काम काज समेट लिया। दूसरे दिन जब उसे बादशाह के सामने ले जाया गया तो उसके हाथों में एक मोटी सी पुस्तक थी जो एक कपड़े मे लिपटी थी।

हकीम ने बादशाह से कहा, 'मेरे कटे हुए सर को एक सोने के थाल में उस पुस्तक में ऊपर लिपटे कपड़े पर रखना तो खून बहना बंद हो जाएगा। इस के बाद मेरी बताई हुई पंक्ति पढ़कर जो भी आप पूछेंगे वह मेरा कटा हुआ सिर बता देगा। लेकिन मैं फिर आपसे निवेदन करता हूँ कि मैं निरपराध हूँ। आप मुझ पर दया करें और मेरे वध का आदेश वापस ले लें। बादशाह ने कहा, नहीं, अब मैं जो कुछ सुनना होगा तेरे कटे हुए सिर ही से सुनूँगा। तेरे रोने पीटने का कोई लाभ नहीं है।'

यह कहकर बादशाह ने पुस्तक अपने हाथ में ले ली और जल्लाद को हकीम के मारने की आज्ञा दी। फिर उसने सोने के थाल पर पुस्तक का आवरण वस्त्र रखवाया और जब सिर से खून बहना बंद हो गया तो उसे और दरबारियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। अब उस कटे सिर ने आँखें खोलकर बादशाह से कहा, 'पुस्तक का छठा पन्ना खोल।' बादशाह ने ऐसा करना चाहा लेकिन पुस्तक के पृष्ठ एक दूसरे से चिपके हुए थे। इसलिए उसने उँगली में थूक लगा कर पन्नों को अलग करना शुरू किया। जब छठा पन्ना खुला तो बादशाह ने बाएँ पृष्ठ की तीसरी पंक्ति पढ़नी चाही किंतु उसने देखा कि उस पृष्ठ पर कुछ नहीं लिखा है। उसने यह बात बताई तो कटे सिर ने कहा, 'आगे के पृष्ठ देख, शायद उनमें लिखा हो।' बादशाह उँगली में थूक लगा-लगाकर पृष्ठों को अलग करने लगा।

वास्तव में हकीम ने पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर विष लगा रखा था। थूक लगी उँगली के बार बार पृष्ठों पर रगड़े जाने और फिर मुँह में जाने पर उन पृष्ठों में लगा विष बादशाह के शरीर में प्रवेश कर गया। बादशाह की हालत खराब होने लगी किंतु उसने कटे सिर से प्रश्नों के उत्तर पाने के शौक में इस पर कुछ ध्यान न दिया। अंततः उसकी दृष्टि भी मंद पड़ गई और वह राजसिंहासन से नीचे गिर गया। हकीम के सिर ने जब देखा कि विष पूरी तरह चढ़ गया और बादशाह क्षण दो क्षण का मेहमान है तो हँस कर बोला, हे क्रूर अन्यायी तूने देखा कि निर्दोष की हत्या का क्या परिणाम होता है।' यह सुनते ही बादशाह के प्राण निकल गए। इस प्रकार उसे अपने किए का फल मिल गया।

रानी शहरजाद ने शहरयार से कहा कि मछुवारे ने दैत्य को हकीम दूबाँ और बादशाह गरीक की जो कहानी सुनाई थी वह तो खत्म हो गई, अब मैं मछुवारे और दैत्य की कहानी आगे बढ़ाती हूँ।

मछुवारा यह कहानी सुनाकर दैत्य से कहने लगा, 'यदि गरीक बादशाह हकीम दूबाँ की हत्या न करता तो भगवान उसे ऐसा दंड न देता। दैत्य तेरा हाल भी उस बादशाह की तरह है। तू अगर बंधन से छूटकर मेरे मारने की इच्छा न करता तो दुबारा बंधन में न पड़ता। अब मैं तुझ पर दया करके तुझे फिर से स्वतंत्र क्यों करूँ? मैं तो गागर समेत तुझे फिर नदी में डाल रहा हूँ जहाँ तू अनंतकाल तक पड़ा रहेगा।

दैत्य बोला, 'मेरे मित्र, तू ऐसा न कर मैं अब तुझे मारने का इरादा कभी न करूँगा। बुराई के बदले में भी भलाई करनी चाहिए। तू भी मेरे साथ ऐसी ही भलाई कर जैसी इम्मा ने अतीका के साथ की थी।' मछुवारे ने कहा, 'मुझे वह कहानी नहीं मालूम है, तू बता तो मैं सुनूँ।' दैत्य बोला, 'यदि तू यह कहानी सुनना चाहे तो मुझे बंधन मुक्त कर क्योंकि मैं गागर में अच्छी तरह नहीं बोल पाऊँगा। मुझे मुक्त कर दो तो यही नहीं, और भी बहुत सी अच्छी कथाएँ सुनाऊँगा।' मछुवारा बोला, 'मुझे नहीं सुननी तेरी कहानी' दैत्य ने कहा, 'तू मुझे छोड़ दे तो मैं तुझे अति धनी होने का उपाय बताऊँगा।' मछुवारे को कुछ लालच आ गया। वह बोला, 'मुझे तेरी बात का विश्वास तो नहीं है, किंतु अगर तू इस्मे-आजम (महामंत्र) की सौगंध खाकर कहे कि तू मेरे साथ धोखा नहीं करेगा और अपने वचन पर दृढ़ रहेगा तो मैं तुझे छोड़ दूँ।' दैत्य ने ऐसा ही किया।

ज्यों ही मछुवारे ने गागर का ढकना खोला उसमें से धुँआ निकला और फैल गया। कुछ देर में उसने दैत्य का रूप धारण कर लिया। दैत्य ने ठोकर मार कर गागर को नदी में डुबो दिया। मछुवारा यह देखकर बहुत डरा और बोला, 'हे दैत्य तूने यह क्या किया। क्या तू अपने वचन पर स्थिर नहीं रहना चाहता? मैंने तो तेरे साथ वही किया है जो हकीम दूबाँ ने बादशाह गरीक के साथ किया था।' मछुवारे के भयभीत होने पर दैत्य हँस कर बोला, 'तू डर मत मैं अपने वचन पर दृढ़ हूँ। अब तू अपना जाल उठा और मेरे पीछे-पीछे चला आ।

नितांत वे दोनों चले और एक नगर के अंदर से निकल कर एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ गए। फिर वहाँ से उतर कर एक लंबे चौड़े महल में गए। उस महल में एक तालाब दिखाई दिया जिसके चारों ओर चार टीले थे। तालाब के पास पहुँच कर मछुवारे से दैत्य ने कहा, 'तू इस तालाब में जाल डाल और मछलियाँ पकड़।' मछुवारा खुश हो गया क्योंकि तालाब में बहुत सी मछलियाँ थीं। उसने तालाब में जाल डाल कर खींचा तो उसमें चार मछलियाँ आई जो चार रंग की थीं - सफेद, लाल, पीली और काली।

दैत्य ने कहा, 'तू इन मछलियों को लेकर यहाँ के बादशाह के पास जा। वह तुझे इतना धन देगा जो तूने कभी देखा भी नहीं होगा। किंतु एक बात का ध्यान रखना। तालाब में एक दिन में एक ही बार जाल डालना।' यह कहकर दैत्य ने जमीन में जोर से ठोकर मारी। जमीन फट गई और दैत्य उसमें समा गया। दैत्य के उस गढ़े में समाने के बाद धरती फिर बराबर हो गई जैसे उसमें कभी गढ़ा हुआ ही न हो। मछुवारा उन चारों मछलियों को बादशाह के महल में ले गया।

शहरजाद ने शहरयार से कहा कि उस बादशाह को उन मछलियों को देखकर जितनी प्रसन्नता हुई उसे वर्णन करना मेरी शक्ति के बाहर है। उसने अपने मंत्री से कहा कि ये मछलियाँ उस बावर्चिन के पास ले जाओ जो यूनान के राजा ने मुझे भेंट स्वरूप दी है। सिर्फ वही ऐसी होशियार है जो इन सुंदर मछलियों को भली भाँति पका सकती है। मंत्री मछलियाँ बावर्चिन के पास ले गया। बादशाह ने मछुवारे को चार सौ मोहर इनाम में दे डालीं।

शहरजाद शहरयार से बोली कि अब उस बावर्चिन का हाल सुनिए कि उस पर क्या बीती। बावर्चिन ने मछलियों के टुकड़े करके उन्हें धो-धाकर गर्म तेल में भुनने के लिए डाला। जब टुकड़े एक ओर भुनकर लाल हो गए तो उसने दूसरी ओर भुनने के लिए उन्हें पलटा। उस समय उसने जो कुछ देखा उससे उसकी आँखें फट गईं। उसने देखा कि रसोई घर की दीवार फट गई। उसमें से एक अति सुंदर स्त्री बड़े ठाट-बाट से भड़कीले कपड़े पहने बाहर निकली। उसके शरीर पर भाँति-भाँति के रत्न आभूषण सज रहे थे जैसे मिश्र देश की रानियों के होते हैं। उसके कानों में मूल्यवान बाले, गले में बड़े-बड़े मोतियों की माला और बाँहों में सोने के बाजूबंद थे जिनमें लाल जड़े हुए थे। इनके अलावा भी वह बहुत से मूल्यवान गहने पहने हुए थी।

स्त्री बाहर आकर अपने हाथ में पकड़ी हुई एक मूल्यवान छड़ी उठाकर उस कड़ाही के पास आ खड़ी हुई जिसमें मछलियाँ भुन रही थीं। उसने एक मछली पर छड़ी मारी और बोली, 'ओ मछली, ओ मछली, क्या तू अपनी प्रतिज्ञा पर कायम है।' मछली में कोई हरकत न हुई स्त्री ने फिर छड़ी और अपना प्रश्न दोहराया। इस पर चारों मछलियाँ उठ खड़ी हो गईं और बोलीं, 'यह सच्ची बात है कि तुम हमें मानोगी तो हम तुम्हें मानेंगे और अगर तुम हमारा ॠण वापस करोगी तो हम तुम्हारा ॠण वापस कर देंगे।' यह सुनते ही उस स्त्री ने कड़ाही को जिसमें मछलियाँ भुन नही थीं। जमीन पर उलट दिया और स्वयं दीवार में समा गई और दीवार जुड़ कर पहले की तरह हो गई।

बावर्चिन इस कांड को देखकर सुधबुध खो बैठी। कुछ देर बाद होश में आई तो देखा मछलियाँ चूल्हे के अंदर गिर कर कोयला हो चुकी हैं। वह अत्यंत दुखी होकर रोने लगी। वह सोच रही थी कि मैंने तो यह सारा व्यापार अपनी आँखों से देखा है लेकिन इस पर बादशाह को कैसे विश्वास आएगा। वह इसी चिंता में बैठी थी कि मंत्री ने आकर पूछा कि मछलियाँ पक चुकीं या नहीं। बावर्चिन ने मंत्री को सारा हाल बताया मंत्री को इस कहानी पर विश्वास तो न हुआ लेकिन उसने बावर्चिन की शिकायत करना ठीक न समझा। उसने मछलियों के खराब होने का कोई बहाना बादशाह से बना दिया और मछुवारे को बुला कर कहा कि वैसी ही चार मछलियाँ और ले आओ। मछुवारे ने दैत्य से किया हुआ वादा तो उसे न बताया लेकिन कोई और मजबूरी बता दी कि आज मछलियाँ क्यों नहीं ला सकता।

दूसरे दिन मछुवारा फिर उस तालाब पर गया और उसी प्रकार की चार रंगों वाली मछलियाँ उसके जाल में फँसीं। मछलियाँ लेकर वह मंत्री के पास पहुँचा। मंत्री ने उसे कुछ इनाम दिया और बावर्चिन के पास मछलियाँ लाकर कहा कि इन्हें मेरे सामने पकाओ। बावर्चिन ने पहले दिन की तरह मछलियाँ काट और धो कर गर्म तेल में डालीं और जब उसने उन्हें कड़ाही में पलटा तो दीवार फट गई और वही स्त्री हाथ में छड़ी लेकर दीवार के अंदर से निकली और छड़ी से एक मछली को छूकर पहले दिन वाली बात पूछी। उन चारों मछलियों ने जुड़कर सिर उठाकर और पूँछ पर खड़े होकर वही उत्तर दिया। स्त्री ने फिर कड़ाही उलट दी और स्वयं दीवार में समा गई और दीवार फिर जुड़कर पहले जैसी हो गई।

मंत्री यह सब बातें देख कर स्तंभित हो गया। अब उसने यह बात बादशाह को बता देना ही ठीक समझा। जब उसने बादशाह को यह कांड बताया तो उसे भी घोर आश्चर्य हुआ। उसने कहा कि मैं स्वयं अपनी आँखों यह सब देखना चाहता हूँ। उसने फिर मछुवारे से कहा कि ऐसी ही चार मछलियाँ और ले आओ। मछुवारा बोला अब मैं तीन दिन से पहले मछलियाँ लाने में असमर्थ हूँ। चूँकि सारा व्यापार अद्भुत था इसलिए बादशाह ने मछुवारे पर कुछ जोर नहीं डाला। तीन दिन बाद उसने फिर वैसी ही चार मछलियाँ लाकर बादशाह को दीं। बादशाह ने खुश हो कर उसे चार सौ अशर्फियाँ और दीं।

अब बादशाह ने मंत्री से कहा कि बावर्चिन को हटा दो और तुम खुद मेरे सामने इन मछलियों को पकाओ। मंत्री ने बावर्ची खाना अंदर से बंद करके मछलियाँ पकाना शुरू किया। जब एक ओर लाल होने पर मछलियों को पलटा गया तो एक बार फिर दीवार फट गई। किंतु इस बार उसमें से सुंदरी नहीं निकली बल्कि गुलामों जैसा कपड़ा पहने हाथ में एक हरी-भरी छड़ी लिए एक हब्शी निकला। हब्शी ने बड़े कठोर और भयावह स्वर में पूछा, 'मछलियों, मछलियों क्या तुम अपने वचन पर अब भी स्थिर हो? मछलियाँ अपने सरों को उठा कर बोली, 'हम उसी बात पर स्थिर हैं।' हब्शी ने कड़ाही उलट दी और स्वयं दीवार के छेद में घुस गया और दीवार पहले की तरह जुड़ गई।

बादशाह ने मंत्री से कहा, 'यह अद्भुत घटना मैंने स्वयं देखी है वरना मैं इस पर विश्वास न करता। यह मछलियाँ भी साधारण नहीं है। मैं इस रहस्य को जानने के लिए बड़ा उत्सुक हूँ।' यह कहकर उसने मछुवारे को फिर बुलवाया और उससे पूछा कि तू यह रंगीन मछलियाँ कहाँ से लाया था। मछुवारे ने बताया कि मैंने उसे उस तालाब से पकड़ा है जिसके चारों ओर चार टीले हैं। बादशाह ने मंत्री से पूछा तुम्हें मालूम है कि वह तालाब कहाँ है? मंत्री ने कहा मैं साठ वर्ष से उस ओर शिकार खेलने जाता रहा हूँ लेकिन मैंने ऐसा तालाब न देखा न सुना। अब बादशाह ने मछुवारे से पूछा कि वह तालाब कितनी दूर है और क्या तू मुझे वहाँ ले जा सकता है? मछुवारे ने कहा वह तालाब यहाँ से तीन घड़ी के रास्ते पर है और मैं आपको जरूर वहाँ ले जाऊँगा।

उस समय दिन कम ही रह गया था किंतु बादशाह को ऐसी उत्सुकता थी कि उसने अपने दरबारियों और रक्षकों को शीघ्र तैयार होने की आज्ञा दी। फिर वह मछुवारे के पीछे-पीछे हो लिया और उसके बताए हुए पहाड़ पर चढ़ गया। जब पहाड़ के दूसरी ओर उतरा तो वहाँ बड़ा विशाल वन दिखाई दिया। यह वन पहले किसी ने नहीं देखा था। फिर बादशाह और उसके साथियों ने वह वन भी पार किया और सब लोग उस तालाब के किनारे पहुँच गए जिसके चारों ओर चार टीले थे। उस तालाब का पानी अत्यंत निर्मल था और जिन चार रंगों की मछलियाँ उसे मछुवारे से मिलती थीं वैसी अनगिनत मछलियाँ उस तालाब में तैर रही थीं। बादशाह का आश्चर्य और बढ़ा। उसने अपने दरबारियों और सरदारों से पूछा कि तुम लोगों ने पहले भी इस तालाब को देखा है या नहीं। उन सब ने निवेदन किया कि हम लोगों ने इस तालाब को देखना कैसा, इसके बारे में सुना तक नहीं।

बादशाह ने कहा कि जब तक मैं इस तालाब और इस की रंगीन मछलियों का रहस्य अच्छी तरह समझ नहीं लूँगा यहाँ से नहीं जाऊँगा, तुम सब लोग भी यहाँ डेरा डालो। उसकी आज्ञानुसार दरबारियों और रक्षकों के डेरे तालाब के चारों ओर पड़ गए।

रात होने पर उसने मंत्री को अपने डेरे में बुलाया और कहा, 'मैं इस भेद को जानने के लिए अति उत्सुक हूँ कि उस बावर्चीखाने में हब्शी कैसे आया और उसने मछलियों से कैसे बात की, और यह भी जानना चाहता हूँ कि यह तालाब जिसे किसी ने नहीं देखा था अचानक कहाँ से आ गया। मैं अपने कौतूहल को दबा नहीं पा रहा हूँ, अतएव मैंने सोचा कि मैं अकेले ही इस रहस्य का उद्घाटन करूँ। मैं अकेला जा रहा हूँ। तुम यहीं रहो। प्रातःकाल जब दरबारी यहाँ पर दरबार के लिए आएँ तो उनसे कह दो कि बादशाह कुछ बीमार हो गए हैं और कुछ दिन यहीं पर शांतिपूर्वक रहना चाहते हैं। यह कह कर सारे दरबारियों और रक्षकों को राजधानी वापस भेज देना और तुम इस डेरे में अकेले ही उस समय तक प्रतीक्षा करना जब तक मैं लौट न आऊँ।'

मंत्री ने बादशाह को बहुत समझाया 'महाराज आप यह न करें। इस काम में बड़ा खतरा है। यह भी संभव है कि इतना सब करने के बाद भी आपको कोई रहस्य ज्ञान न हो पाए। फिर बेकार में क्यों इतना कष्ट उठा रहे हैं और इतना खतरा मोल ले रहे हैं।' बादशाह पर उसके समझाने-बुझाने का कोई असर नहीं हुआ। उसने बादशाही पोशाक उतारी और एक साधारण सैनिक के वस्त्र पहन लिए। जब सब लोग गहरी नींद सोए हुए थे तब वह तलवार लेकर अपने खेमे से निकला और एक ओर चलता हुआ एक पहाड़ पर चढ़ गया। कुछ ही देर में वह उसकी चोटी पर पहुँच कर दूसरी ओर उतर गया। आगे उसे एक गहन वन दिखाई दिया। वह उसी के अंदर चलने लगा। कुछ दूर जाने पर पूरा सवेरा हो गया और उसे दूर जाने पर एक सुंदर प्रासाद दिखाई दिया। वह यह भवन देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे आशा बँधी कि उसे इस जगह तालाब के रहस्य का पता चलेगा।

भवन के निकट पहुँच कर उसने देखा कि वह बड़ा विशाल है और काले पत्थरों का बना है। उसकी दीवारों पर साफ किए हुए इस्पाती पत्तर जड़े थे जो दर्पण की भाँति चमकते थे। बादशाह को विश्वास हो गया कि यहाँ उसे मनोवांछित सूचना मिलेगी। वह बहुत देर तक खड़ा हुआ भवन की शोभा निहारता रहा फिर उसके पास चला गया। वह देख रहा था कि भवन का द्वार खुला है, फिर भी शिष्टता के नाते उसने ताली बजाई कि उसकी आवाज सुनकर कोई अंदर से आ जाए। जब कोई न आया तो उसने साँकल को खड़खड़ाया, यह सोच कर कि शायद उसकी ताली की आवाज अंदर तक नहीं पहुँची होगी।

साँकल खड़खड़ाने पर भी जब कोई नहीं निकला तो बादशाह को क्रोध आया कि अजीब घर है जहाँ बुलाने पर भी कोई आकर नहीं पूछता। वह अंदर चला गया और डयोढ़ी में पहुँच कर जोर से पुकारा कि क्या इस भवन के अंदर कोई मनुष्य है जो एक अतिथि के रहने के लिए थोड़ा स्थान दे। फिर भी उसे कोई उत्तर न मिला तो उसका आश्चर्य और बढ़ा। ड्योढ़ी से आगे बढ़ कर वह घर में घुसा तो देखा कि अंदर से और भी लंबा चौड़ा मकान है किंतु उसके अंदर कोई नहीं है। अब वह एक लंबे चौड़े आँगन को पार करके एक दालान में पहुँचा। उसमें रेशमी कालीन बिछा हुआ था। अंदर का मकान और भी सजा हुआ था। दरवाजों पर जड़ाऊ मखमल के परदे पड़े थे जिनमें सुनहरे और रुपहले फूल बूटे कढ़े थे। अंदर एक बारहदरी थी जिसमें एक हौज था जिसके चारों ओर सोने से चार शेर बने हुए थे। शेरों के मुँह से पानी के फव्वारे छूटते थे और जब उनका पानी नीचे संगमरमर के फर्श पर गिरता था तो मालूम होता था लाखों हीरे-जवाहरात उछल रहे हैं। हौज के बीच में एक फव्वारा था जिस पर अरबी अक्षरों में कुछ खुदा हुआ था और उसका पानी उछल कर बारहदरी की छत को छूता था।

इसके अलावा उस विशाल भवन में तीन बाग थे जिनमें बड़े सुघड़पन के साथ भाँति-भाँति के सुगंधित फूलों और उत्तम फलों के पेड़ लगे थे। बागों में हर चीज ऐसी तरतीब से लगी थी कि उन्हें देख कर दुखी मनुष्य भी आनंद में डूब जाए। वृक्षों पर नाना प्रकार के सुंदर पक्षी कलरव कर रहे थे।

वे पक्षी उन्हीं वृक्षों पर रहते थे, उड़कर नहीं जा सकते थे क्योंकि वृक्षों के ऊपर जाल पड़े हुए थे। बादशाह एक कमरे से दूसरे कमरे और एक बाग से दूसरे बाग में घूम-घूमकर हर वस्तु से आनंदित होता रहा। घूमते-घूमते वह थक गया और एक मकान में बैठ कर आराम करने लगा और सामने वाले बाग की शोभा देखने लगा।

इतने में उसे एक कातर वाणी सुनाई दी जैसे कोई बड़े दुख में कराह रहा हो। उसने कान धर कर सुना तो मालूम हुआ कि कोई मनुष्य रो-रो कर अपनी करुण कथा कह रहा है और अपने दुर्भाग्य को कोस रहा है। बादशाह ने उस कमरे का परदा उठाया जिसमें से यह आवाज आ रही थी। उसने देखा कि एक नवयुवक सिंहासन जैसी किसी ऊँची चीज पर राजसी वस्त्र पहने बैठा है और करुण स्वर में विलाप कर रहा है। बादशाह ने उसके निकट जाकर सलाम किया तो युवक बोला, 'मुझे क्षमा कीजिए मैं उठकर आपका स्वागत करने में असमर्थ हूँ इसीलिए मैं आपके पास न आ सका। बादशाह ने कहा, 'मैं आपके शीलवान व्यवहार से बड़ा प्रभावित हुआ हूँ। वास्तव में कोई ऐसा अपरिहार्य कारण होगा कि आप उठ न सके। किंतु आपके दुख को देख कर मुझे अति क्लेश हुआ है।

आप मुझे बताएँ कि मैं आपका कष्ट किस प्रकार दूर कर सकता हूँ। कृपया मुझे अपनी कठिनाई बताने में तनिक भी न हिचकें। कृपया यह बताएँ कि आप यहाँ इस मजबूरी की हालत में कैसे पड़े हैं। यह भी बताएँ कि यह भव्य प्रासाद किसका है और ऐसा निर्जन क्यों है। साथ ही यह भी बताएँ - क्योंकि मैं यही जानने के लिए निकला हूँ - कि पास के तालाब का रहस्य क्या है और उसकी मछलियाँ कौन हैं।'

जवान आदमी यह सुनकर फिर रोने लगा और बोला, 'मेरा हाल सुनने के पहले देख लीजिए। यह कह कर उसने अपना कपड़ा उठाया तो बादशाह ने देखा कि वह नाभि के ऊपर तो जीवित मनुष्य है और नीचे काले पत्थर का बना हुआ है। उसकी आँखें फटी रह गई और वह बोला, 'मुझे तो वैसे यहाँ की प्रत्येक वस्तु देख कर आश्चर्य हो रहा था किंतु आपका यह हाल देख कर मेरा आश्चर्य और उत्सुकता बहुत बढ़ गई है। भगवान के लिए अपना ब्योरेवार हाल कहिए। मुझे विश्वास हो रहा है कि तालाब की रंग-बिरंगी मछलियों के रहस्य का भी आपसे संबंध है। आप मुझे अपनी व्यथा-कथा शीघ्र कहिए क्योंकि दूसरे को सु
नाने से आदमी का कुछ दुख तो दूर होता ही है।' जवान आदमी ने कहा कि मुझे अपनी दशा के वर्णन से भी कष्ट होता है किंतु आपका आदेश है इसलिए कहता हूँ।
 
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