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अब कहानी को कुछ दिन पहले बस्ती की और लेकर चलते है,
बस्ती के बाकि परिवारों की तरह मोहन का परिवार भी बिलकुल गरीब था, वो और उसकी बहन माला एक टूटे फूटे से घर में बड़ी मुश्किलों की जिंदगी गुज़र रहे थे,
कच्ची ईंटो से बना हुआ एक छोटा सा घर जिसमे नाम मात्र का सिर्फ एक कमरा था, जिसकी छत भी लोहे की जर्जर हो चुकी टीन की बनी हुई थी ,कमरे के सामने एक छोटा सा आँगन और कच्ची पक्की चार दिबारे खड़ी थी,लकड़ी का जर्जर दरबाजा, घर में घुसते ही बाये तरफ एक छोटी सी रसोई जिसकी कोई चारदीवारी भी न थी, लगता था कि बस थोडा था सामान ज़मीन पर रखकर रसोई का रूप दे दिया गया हो
घर के पीछे की तरफ एक ईंटो से घिरा हुआ छोटा सा बाथरूम स्नान के लिए बना था,जिसमे छत भी नहीं थी, बाथरूम में एक नल लगा हुआ था, पर पानी शाम को आता था वो भी बस 15 मिनट के लिए ,लेट्रीन के लिए उस समय पटरियों का इस्तेमाल ही सबसे मशहूर तरीका था,
पर इन लोगो के लिए ये घर भी एक महल की तरह था क्यूंकि ये उनका अपना था, पर सिर्फ कहने को, क्यूंकि उस बस्ती के ज्यादातर घर लाला दीनदयाल के पास गिरवी थे, जो उन गरीबो के खून पसीने की कमाई का एक बड़ा हिस्सा उनसे ब्याज के रूप में वसूल कर लेता था, उन गरीबो के लिए तो ये गरीबी में आटा गिला होने के बराबर था, एक तो मुश्किल से बेचारे दो वक्त की रोटी का इन्तेजाम कर पाते, उसमे से भी एक वक्त की रोटी जितना हिस्सा लालाजी को ब्याज के रूप में चुकाना उनकी मजबूरी थी, पर बेचारे करते भी तो क्या, एक आदमी ने लाला की खिलाफत करने की कोशिश की थी तो लाला ने उसे धक्के मारकर उसी के घर से निकलवा दिया था,
लाला के पास किराये के गुंडे भी थे, और साथ ही पुलिस को रिश्वत देने के लिए दोलत भी, वो अपनी ताक़त का गलत इस्तेमाल कर रातो रातो उन लोगो को उन्ही के घर से बेधख्ल कर सकता था जो उसके खिलाफ जाने की हिम्मत करते,
इन सब के उपर लाला की हरामी नियत भी अक्सर बस्ती की लडकियों पर चली जाती, उसकी गन्दी नजरे हमेशा बस्ती की जवान होती लडकियों पर रहती, सभी बस्ती वाले भी इस बात से परिचित थे पर बेचारे चाहकर भी कुछ नही कर पाते, इसलिए जब भी लाला महीने के अंत में अपना ब्याज वसूलने अपने पालतू गुंडों के साथ आता, बस्ती के लोग अपनी बहन बेटियों को घर के अंदर ही रखते ताकि लाला की हवसी नजरो से बच सके
बस्ती के लोग बस इस आशा में जी रहे थे कि कभी तो भगवान किसी फ़रिश्ते को यहाँ भेजेगा जो उनका हर दुःख हर दर्द दूर करके उन्हें दुनिया भर की खुशियाँ देगा, कभी तो कोई आएगा जो उन्हें इस गरीबी के दलदल से बाहर निकालेगा , कभी तो कोई आएगा जो उन्हें लाला के आतंक से मुक्ति दिलाएगा, बस्ती के हर इन्सान में ये उम्मीद रहती, उनकी आँखों में ये आशा रहती कि शायद भगवान किसी दिन उनकी सुन ले
पर अभी तक तो उन लोगो को सिवाय दर्द, गरीबी, ज़िल्लत, और लाला के डर में ही अपनी ज़िन्दगी बसर करनी पड़ रही थी, फिर भी उनकी आशा का बांध टुटा न था, गरीबी के साथ सब्र और भलाई का गुण कूट कूट कर भरा था भगवान ने इन लोगो में, गरीबी में जीकर भी वो लोग एक दुसरे के सुख दुःख में भागीदार बनते, हमेशा खुश रहने का दिखावा करते पर मन में हमेशा गरीबी, भुखमरी और लाला के डर का तंज़ डसता रहता,
मोहन और उसकी बहन माला भी बस्ती के बाकि लोगो की तरह ही इसी तरह की ग़ुरबत की ज़िन्दगी ज़ीने को मजबूर थे,
माला 19 बरस की एक मासूम सी दिखने वाली लड़की, उसकी काली झील जैसी आंखे , तीखे नैन नक्श, पतले गुलाबी होंठ दिखने में मानो अजंता की कोई मूरत, दमकता गोरा चिट्टा चेहरा , छोटे छोटे अमरूद जैसी सुंदर सुंदर चुचियाँ, पतली गोरी कमर, उभरी हुई गांड, भरी मांसल जाँघे, हर वो चीज़ भगवान ने उसके बदन को बख्शी थी जो कामदेव को भी एक बार विचलित कर दे, पर शायद गरीबी की मार ने उसे कभी इस और देखने का मोका ही नही दिया था
माला 19 वर्ष की हो चुकी थी लेकिन उसके घर की माली हालात इतने खराब थे कि शादी के बारे में सोचना भी उसके लिए पापा था, माला भी अपने घर के हालात को अच्छी तरह समझती थी इसलिए शायद उसने भी बिना शादी के जीवन जीने की प्रतिज्ञा ले ली थी, पर मोहन चाहता था कि वो अपनी बहन की शादी बड़ी धूमधाम से करे पर पैसो की किल्लत ने उसके हाथ बांध रखे थे
माला इतनी खुबसुरत थी और उसका जिस्म ऐसा था की अच्छी अच्छी बड़े घर की शहरी लडकियों को भी मात दे दे, पर उसका यही हुस्न उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन गया था, क्यूंकि लाला की गन्दी नजर उसके जवान जिस्म पर पड़ गयी थी, और लाला बस इसी ताक में रहता कि किसी तरह इस फूल के रस को चूस ले, लाला उसकी गरीबी का फायदा उठाने के षड्यंत्र भी रचता था, और इसीलिए
लाला ने मोहन को बताया कि उसने अपने घर को गिरवी रखकर जो कर्जा उससे लिया वो इतने सालो के बाद भी अभी सिर्फ एक चोथाई ही उतरा है, जबकि असलियत में मोहन ने तीन चोथाई कर्जा उतार दिया था, लाला हर हथकंडे अपनाता जिससे वो माला के योवन का रस चख सके, पर उसे डर था कि अगर उसने जबरदस्ती की तो कहीं मामला बहुत बढ़ न जाये, इसीलिए लाला उनकी गरीबी का फायदा उठाकर माला को भोगना चाहता था
इधर माला भी बड़ी समझदार थी, वो लाला के इरादों से पूरी तरह वाकिफ थी, पर उसने अपने आपको किसी तरह बचाया हुआ था,
बाकि लडकियों की तरह माला की भी इच्छा थी कि उसकी भी शादी हो, बच्चे हों,पारवारिक जीवन का आनंद उठाए, पर गरीबी से मजबूर होकर उसने अपनी सभी इच्छाओ को अपने वश में कर लिया था
माला जब छोटी थी,तब उसकी भी इच्छा थी कि उसका पति अच्छा हो, पैसे वाला हो, कार बंगला हो,वो जीवन को खुल कर जिए, लेकिन उसकी सभी इच्छाएं गरीबी की भेंट चढ़ गई,अब तो उसने अपने मन को उसी प्रकार ढाल लिया था, अपनी असल जिंदगी की वास्तविकता को स्वीकार कर चुकी थी, अपने सारे सपनो को आजीवन तलाक दे चुकी थी
गरीबी इस प्रकार छाई थी की उसके पास मात्र दो जोड़ी ही सलवार सूट थे, वो भी कई जगह से फटे हुए थे जिन्हें सुई से टांका मार कर उन्ही को पहना करती थी, पहनने के लिए उसके पास मात्र एक ही पेंटी बची थी और उसका इस्तेमाल भी वो सिर्फ माहवारी के दिनों में करती थी ताकि उसके कपडे ख़राब न हो, महीने के बाकि दिनों में तो वो कभी कभार ही पेंटी पहनती थी ,बस बिना पेंटी के ही सलवार पहन कर घर में रहती थी ।
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मोहन और माला किसी तरह गरीबी में अपनी गुज़र बसर कर रहे थे, मोहन अपनी थोड़ी सी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा लाला के पास जमा कराता, और ऐसा करते हुए उसे लगभग 5 साल होने को आ गये थे, पर उनका कर्ज था कि उतरने का नाम ही नही लेता था, और उतरे भी कैसे? लाला ने बस्ती वालो के अनपढ़ होने का फायदा उठाकर उनके हिसाब में गडबडी की थी, और मोहन के कर्ज का तो तीन चोथाई हिस्सा बाकि दिखा रखा था, क्यूंकि वो हरामी लाला उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर माला को भोगना चाहता था
बस्ती मे रात होने को आई थी, सिर्फ एक स्ट्रीट लाइट की रौशनी ही है जो इस बस्ती को रात के अँधेरे में गुम होने से बचाती थी, बाकि सभी घरो में मोमबतीयाँ ही उनकी रौशनी का जरिया था, बस्ती के बीचो बिच एक नीम के पेड़ बना था,जिसके चारो और बैठने के लिए एक ऊँचा चबूतरा बनाया हुआ था, बस्ती के लोग अक्सर काम से आने के बाद रात को थोड़ी देर वहाँ बैठते और हल्के फुल्के मजाक और कहानियों को दोर चलता जो उन गरीबो के दिलो के गम को थोड़ी देर के लिए ही सही पर कम जरुर कर देता
मोहन और माला अपने घर में बैठे बात कर रहे थे
माला – भैया, लाला का कर्जा कितना पूरा हुआ? हम कितने सालो से कर्जा दिए जा रहे है,
मोहन – हाँ, माला लगभग 5 साल होने को आये, पर लाला का कर्जा है कि उतरने का नाम ही नही ले रहा
माला – भैया, आप एक बार उनसे पूछ कर तो देखो कि कितना कर्जा बाकि है?
मोहन – तू ठीक कहती है छोटी, मैं कल ही लाला से मिलकर उससे हिसाब मांगता हूँ, अगर हम ऐसे ही उसे पैसे देते रहे तो तेरी शादी कैसे कर पाउँगा
माला (शर्माते हुए) – क्या भैया, मुझे नही करनी शादी वादी, मैं तो हमेशा अपने भैया के पास ही रहूंगी
मोहन – अरे पगली, कभी न कभी तो तुझे जाना ही होगा, अपनी छोटी की शादी मैं बड़ी धूम धाम से करूंगा देखना
माला – हटो भैया, मुझे आपसे बात नही करनी
और इतना कहकर माला शर्माती हुई वहां से उठ गयी, मोहन भी बहार आकर बस्ती के बाकि लोगो के साथ बैठ गया और गप्पे हांकने लगा
बंशी (मोहन का दोस्त ) – अरे आ मोहन आ, आज तो बड़ी देर लगा दी आवन में, घर में का कर रहे थे,
मोहन – अरे कुछ नही बंशी बस थोडा थक गया था सो लेटकर थोड़े पैर सीधे कर रहा था
बंशी – भाई तू तो पैर ही सीधा करता रह जायेगा, मैं तो कुछ और ही सीधा करके आ रहा हूँ,,,हा हा हा हा..........
सभी लोग बंशी की बात सुनकर हंसने लगे, कुछ देर ऐसे ही बातो को डोर चलता रहा, पर जैसे जैसे अँधेरा बढ़ता गया लोग धीरे धीरे अपने घरो की तरफ जाने लगे, अब बस वहां बंशी, मोहन और राजू ही बचे थे
राजू – का बात है बंशी बाबु, आज बड़े मूड में लग रहे हो, लगता है भाभी की खैर नाही आज ...हा हा हा......
बंशी – अरे का बताऊ राजू भाई आज गेराज में एक जबरदस्त लोंडिया आई थी गाड़ी सुधरवाने, हाय मैं तो देखकर ही पगला गया, का गोरा गदराया बदन था, एकदम मलाई के माफिक,
मोहन – अरे क्या बंशी तू भी, तू वहां काम करने जाता है कि लोंडिया टापने, हरामी कहीं का, हाहाहाहा .........
बंशी – अरे मोहन बाबु, अभी कितना भी हंस लो, पर अगर एक नज़र तुम उसको देख लिए होते ना, तो तुम्हारा तो वहीं खड़े खड़े पानी निकल जाता , का मस्त बदन था साली का, मन करता था वहीं पकड़ के पेल दे साली को, हाय इन गोरी लडकियों की चूत भी कितनी गोरी होती होगी, और एक हमार वाली है, साली की चूत अँधेरे में कोयला जान पडती है,हा हा हा,,,,,,,,,
राजू – अरे उसी चूत से दो दो बच्चे निकाल दिए रहे तुम, तब कोयला ना दिखी तुझे वो चूत ,ह्म्म्म....हाहाहा....
बंशी – का बात है रे राजू, हमार बीवी की चुत में बड़ी दिलचस्पी दिखा रहे हो हरामी, साले कहीं नजर तो नही गडा रखी हो हमार बीवी पर,
राजू – अरे हमार किस्मत में चूत कहाँ बंशी बाबु, हम तो साला अपना हाथ जगन्नाथ करके ही कम चलावत है, तुहार पास कम से कम कोनो चुत तो है, हमार किस्मत में तो हाथ का ही सुख लिखा है
मोहन – का बात है राजू, आज चुत मारने का बड़ी इच्छा हो रही है का तोहार
राजू – अरे मोहन भाई, ई इच्छा तो साला 24 घंटे रहती है पर करे भी तो का करे, मन मसोस कर और लंड मरोड़ कर ही काम चला लेते है
मोहन – अबे चिंता मत कर, कभी न कभी तेरे लिए भी कोई चुत का इंतज़ाम हो ही जायेगा
बंशी – अरे इसकी छोड़ो मोहन, ई तो ससुरा चोबीस घंटे चुत के सपने देखत है, तुम बताओ , तुम तो ऑफिस वोफ्फिस में काम करत हो, वहाँ तो काफी लोंडिया आती है हम सुने
मोहन – अरे हम तो रोज़ ही एक से एक जबरदस्त लोंडिया देखते है हमरे ऑफिस में, और मालूम है कुछ तो बिलकुल छोटे छोटे घुटनों तक के कपड़े पहन कर आती है, साला सुबह सुबह ही हमार लंड भी बिलकुल अकड जाता है, फिर गुसलखाने (टॉयलेट) में जाकर मुठ मारते है तब कहीं जाकर लंड को थोडा सुकून मिलता है
बंशी – तोहर किस्मत बड़ी अच्छी है मोहन बाबु, कम से कम रोज़ लोंडिया के दर्शन तो हो जाते है, और एक हमार किस्मत, रोजाना साला काले पीले लोगो के चेहरों के सिवा कुछु दीखता ही नही है
राजू - अरे तोहर कैसी किस्मत ख़राब, तू तो शाम को आकर कम से कम चुत तो मार लेता है, हमे देख, किस्मत तो हमारी खराब है, जो साला 23-24 की उम्र में भी लंड हिलाना पड रहा है
राजू की बात सुनकर तीनो हंसने लगते है, उनकी बातो का दौर और लम्बा चलता है और फिर वो लोग जाकर घर में सो जाते है
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बस्ती के बाकि परिवारों की तरह मोहन का परिवार भी बिलकुल गरीब था, वो और उसकी बहन माला एक टूटे फूटे से घर में बड़ी मुश्किलों की जिंदगी गुज़र रहे थे,
कच्ची ईंटो से बना हुआ एक छोटा सा घर जिसमे नाम मात्र का सिर्फ एक कमरा था, जिसकी छत भी लोहे की जर्जर हो चुकी टीन की बनी हुई थी ,कमरे के सामने एक छोटा सा आँगन और कच्ची पक्की चार दिबारे खड़ी थी,लकड़ी का जर्जर दरबाजा, घर में घुसते ही बाये तरफ एक छोटी सी रसोई जिसकी कोई चारदीवारी भी न थी, लगता था कि बस थोडा था सामान ज़मीन पर रखकर रसोई का रूप दे दिया गया हो
घर के पीछे की तरफ एक ईंटो से घिरा हुआ छोटा सा बाथरूम स्नान के लिए बना था,जिसमे छत भी नहीं थी, बाथरूम में एक नल लगा हुआ था, पर पानी शाम को आता था वो भी बस 15 मिनट के लिए ,लेट्रीन के लिए उस समय पटरियों का इस्तेमाल ही सबसे मशहूर तरीका था,
पर इन लोगो के लिए ये घर भी एक महल की तरह था क्यूंकि ये उनका अपना था, पर सिर्फ कहने को, क्यूंकि उस बस्ती के ज्यादातर घर लाला दीनदयाल के पास गिरवी थे, जो उन गरीबो के खून पसीने की कमाई का एक बड़ा हिस्सा उनसे ब्याज के रूप में वसूल कर लेता था, उन गरीबो के लिए तो ये गरीबी में आटा गिला होने के बराबर था, एक तो मुश्किल से बेचारे दो वक्त की रोटी का इन्तेजाम कर पाते, उसमे से भी एक वक्त की रोटी जितना हिस्सा लालाजी को ब्याज के रूप में चुकाना उनकी मजबूरी थी, पर बेचारे करते भी तो क्या, एक आदमी ने लाला की खिलाफत करने की कोशिश की थी तो लाला ने उसे धक्के मारकर उसी के घर से निकलवा दिया था,
लाला के पास किराये के गुंडे भी थे, और साथ ही पुलिस को रिश्वत देने के लिए दोलत भी, वो अपनी ताक़त का गलत इस्तेमाल कर रातो रातो उन लोगो को उन्ही के घर से बेधख्ल कर सकता था जो उसके खिलाफ जाने की हिम्मत करते,
इन सब के उपर लाला की हरामी नियत भी अक्सर बस्ती की लडकियों पर चली जाती, उसकी गन्दी नजरे हमेशा बस्ती की जवान होती लडकियों पर रहती, सभी बस्ती वाले भी इस बात से परिचित थे पर बेचारे चाहकर भी कुछ नही कर पाते, इसलिए जब भी लाला महीने के अंत में अपना ब्याज वसूलने अपने पालतू गुंडों के साथ आता, बस्ती के लोग अपनी बहन बेटियों को घर के अंदर ही रखते ताकि लाला की हवसी नजरो से बच सके
बस्ती के लोग बस इस आशा में जी रहे थे कि कभी तो भगवान किसी फ़रिश्ते को यहाँ भेजेगा जो उनका हर दुःख हर दर्द दूर करके उन्हें दुनिया भर की खुशियाँ देगा, कभी तो कोई आएगा जो उन्हें इस गरीबी के दलदल से बाहर निकालेगा , कभी तो कोई आएगा जो उन्हें लाला के आतंक से मुक्ति दिलाएगा, बस्ती के हर इन्सान में ये उम्मीद रहती, उनकी आँखों में ये आशा रहती कि शायद भगवान किसी दिन उनकी सुन ले
पर अभी तक तो उन लोगो को सिवाय दर्द, गरीबी, ज़िल्लत, और लाला के डर में ही अपनी ज़िन्दगी बसर करनी पड़ रही थी, फिर भी उनकी आशा का बांध टुटा न था, गरीबी के साथ सब्र और भलाई का गुण कूट कूट कर भरा था भगवान ने इन लोगो में, गरीबी में जीकर भी वो लोग एक दुसरे के सुख दुःख में भागीदार बनते, हमेशा खुश रहने का दिखावा करते पर मन में हमेशा गरीबी, भुखमरी और लाला के डर का तंज़ डसता रहता,
मोहन और उसकी बहन माला भी बस्ती के बाकि लोगो की तरह ही इसी तरह की ग़ुरबत की ज़िन्दगी ज़ीने को मजबूर थे,
माला 19 बरस की एक मासूम सी दिखने वाली लड़की, उसकी काली झील जैसी आंखे , तीखे नैन नक्श, पतले गुलाबी होंठ दिखने में मानो अजंता की कोई मूरत, दमकता गोरा चिट्टा चेहरा , छोटे छोटे अमरूद जैसी सुंदर सुंदर चुचियाँ, पतली गोरी कमर, उभरी हुई गांड, भरी मांसल जाँघे, हर वो चीज़ भगवान ने उसके बदन को बख्शी थी जो कामदेव को भी एक बार विचलित कर दे, पर शायद गरीबी की मार ने उसे कभी इस और देखने का मोका ही नही दिया था
माला 19 वर्ष की हो चुकी थी लेकिन उसके घर की माली हालात इतने खराब थे कि शादी के बारे में सोचना भी उसके लिए पापा था, माला भी अपने घर के हालात को अच्छी तरह समझती थी इसलिए शायद उसने भी बिना शादी के जीवन जीने की प्रतिज्ञा ले ली थी, पर मोहन चाहता था कि वो अपनी बहन की शादी बड़ी धूमधाम से करे पर पैसो की किल्लत ने उसके हाथ बांध रखे थे
माला इतनी खुबसुरत थी और उसका जिस्म ऐसा था की अच्छी अच्छी बड़े घर की शहरी लडकियों को भी मात दे दे, पर उसका यही हुस्न उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन गया था, क्यूंकि लाला की गन्दी नजर उसके जवान जिस्म पर पड़ गयी थी, और लाला बस इसी ताक में रहता कि किसी तरह इस फूल के रस को चूस ले, लाला उसकी गरीबी का फायदा उठाने के षड्यंत्र भी रचता था, और इसीलिए
लाला ने मोहन को बताया कि उसने अपने घर को गिरवी रखकर जो कर्जा उससे लिया वो इतने सालो के बाद भी अभी सिर्फ एक चोथाई ही उतरा है, जबकि असलियत में मोहन ने तीन चोथाई कर्जा उतार दिया था, लाला हर हथकंडे अपनाता जिससे वो माला के योवन का रस चख सके, पर उसे डर था कि अगर उसने जबरदस्ती की तो कहीं मामला बहुत बढ़ न जाये, इसीलिए लाला उनकी गरीबी का फायदा उठाकर माला को भोगना चाहता था
इधर माला भी बड़ी समझदार थी, वो लाला के इरादों से पूरी तरह वाकिफ थी, पर उसने अपने आपको किसी तरह बचाया हुआ था,
बाकि लडकियों की तरह माला की भी इच्छा थी कि उसकी भी शादी हो, बच्चे हों,पारवारिक जीवन का आनंद उठाए, पर गरीबी से मजबूर होकर उसने अपनी सभी इच्छाओ को अपने वश में कर लिया था
माला जब छोटी थी,तब उसकी भी इच्छा थी कि उसका पति अच्छा हो, पैसे वाला हो, कार बंगला हो,वो जीवन को खुल कर जिए, लेकिन उसकी सभी इच्छाएं गरीबी की भेंट चढ़ गई,अब तो उसने अपने मन को उसी प्रकार ढाल लिया था, अपनी असल जिंदगी की वास्तविकता को स्वीकार कर चुकी थी, अपने सारे सपनो को आजीवन तलाक दे चुकी थी
गरीबी इस प्रकार छाई थी की उसके पास मात्र दो जोड़ी ही सलवार सूट थे, वो भी कई जगह से फटे हुए थे जिन्हें सुई से टांका मार कर उन्ही को पहना करती थी, पहनने के लिए उसके पास मात्र एक ही पेंटी बची थी और उसका इस्तेमाल भी वो सिर्फ माहवारी के दिनों में करती थी ताकि उसके कपडे ख़राब न हो, महीने के बाकि दिनों में तो वो कभी कभार ही पेंटी पहनती थी ,बस बिना पेंटी के ही सलवार पहन कर घर में रहती थी ।
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मोहन और माला किसी तरह गरीबी में अपनी गुज़र बसर कर रहे थे, मोहन अपनी थोड़ी सी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा लाला के पास जमा कराता, और ऐसा करते हुए उसे लगभग 5 साल होने को आ गये थे, पर उनका कर्ज था कि उतरने का नाम ही नही लेता था, और उतरे भी कैसे? लाला ने बस्ती वालो के अनपढ़ होने का फायदा उठाकर उनके हिसाब में गडबडी की थी, और मोहन के कर्ज का तो तीन चोथाई हिस्सा बाकि दिखा रखा था, क्यूंकि वो हरामी लाला उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर माला को भोगना चाहता था
बस्ती मे रात होने को आई थी, सिर्फ एक स्ट्रीट लाइट की रौशनी ही है जो इस बस्ती को रात के अँधेरे में गुम होने से बचाती थी, बाकि सभी घरो में मोमबतीयाँ ही उनकी रौशनी का जरिया था, बस्ती के बीचो बिच एक नीम के पेड़ बना था,जिसके चारो और बैठने के लिए एक ऊँचा चबूतरा बनाया हुआ था, बस्ती के लोग अक्सर काम से आने के बाद रात को थोड़ी देर वहाँ बैठते और हल्के फुल्के मजाक और कहानियों को दोर चलता जो उन गरीबो के दिलो के गम को थोड़ी देर के लिए ही सही पर कम जरुर कर देता
मोहन और माला अपने घर में बैठे बात कर रहे थे
माला – भैया, लाला का कर्जा कितना पूरा हुआ? हम कितने सालो से कर्जा दिए जा रहे है,
मोहन – हाँ, माला लगभग 5 साल होने को आये, पर लाला का कर्जा है कि उतरने का नाम ही नही ले रहा
माला – भैया, आप एक बार उनसे पूछ कर तो देखो कि कितना कर्जा बाकि है?
मोहन – तू ठीक कहती है छोटी, मैं कल ही लाला से मिलकर उससे हिसाब मांगता हूँ, अगर हम ऐसे ही उसे पैसे देते रहे तो तेरी शादी कैसे कर पाउँगा
माला (शर्माते हुए) – क्या भैया, मुझे नही करनी शादी वादी, मैं तो हमेशा अपने भैया के पास ही रहूंगी
मोहन – अरे पगली, कभी न कभी तो तुझे जाना ही होगा, अपनी छोटी की शादी मैं बड़ी धूम धाम से करूंगा देखना
माला – हटो भैया, मुझे आपसे बात नही करनी
और इतना कहकर माला शर्माती हुई वहां से उठ गयी, मोहन भी बहार आकर बस्ती के बाकि लोगो के साथ बैठ गया और गप्पे हांकने लगा
बंशी (मोहन का दोस्त ) – अरे आ मोहन आ, आज तो बड़ी देर लगा दी आवन में, घर में का कर रहे थे,
मोहन – अरे कुछ नही बंशी बस थोडा थक गया था सो लेटकर थोड़े पैर सीधे कर रहा था
बंशी – भाई तू तो पैर ही सीधा करता रह जायेगा, मैं तो कुछ और ही सीधा करके आ रहा हूँ,,,हा हा हा हा..........
सभी लोग बंशी की बात सुनकर हंसने लगे, कुछ देर ऐसे ही बातो को डोर चलता रहा, पर जैसे जैसे अँधेरा बढ़ता गया लोग धीरे धीरे अपने घरो की तरफ जाने लगे, अब बस वहां बंशी, मोहन और राजू ही बचे थे
राजू – का बात है बंशी बाबु, आज बड़े मूड में लग रहे हो, लगता है भाभी की खैर नाही आज ...हा हा हा......
बंशी – अरे का बताऊ राजू भाई आज गेराज में एक जबरदस्त लोंडिया आई थी गाड़ी सुधरवाने, हाय मैं तो देखकर ही पगला गया, का गोरा गदराया बदन था, एकदम मलाई के माफिक,
मोहन – अरे क्या बंशी तू भी, तू वहां काम करने जाता है कि लोंडिया टापने, हरामी कहीं का, हाहाहाहा .........
बंशी – अरे मोहन बाबु, अभी कितना भी हंस लो, पर अगर एक नज़र तुम उसको देख लिए होते ना, तो तुम्हारा तो वहीं खड़े खड़े पानी निकल जाता , का मस्त बदन था साली का, मन करता था वहीं पकड़ के पेल दे साली को, हाय इन गोरी लडकियों की चूत भी कितनी गोरी होती होगी, और एक हमार वाली है, साली की चूत अँधेरे में कोयला जान पडती है,हा हा हा,,,,,,,,,
राजू – अरे उसी चूत से दो दो बच्चे निकाल दिए रहे तुम, तब कोयला ना दिखी तुझे वो चूत ,ह्म्म्म....हाहाहा....
बंशी – का बात है रे राजू, हमार बीवी की चुत में बड़ी दिलचस्पी दिखा रहे हो हरामी, साले कहीं नजर तो नही गडा रखी हो हमार बीवी पर,
राजू – अरे हमार किस्मत में चूत कहाँ बंशी बाबु, हम तो साला अपना हाथ जगन्नाथ करके ही कम चलावत है, तुहार पास कम से कम कोनो चुत तो है, हमार किस्मत में तो हाथ का ही सुख लिखा है
मोहन – का बात है राजू, आज चुत मारने का बड़ी इच्छा हो रही है का तोहार
राजू – अरे मोहन भाई, ई इच्छा तो साला 24 घंटे रहती है पर करे भी तो का करे, मन मसोस कर और लंड मरोड़ कर ही काम चला लेते है
मोहन – अबे चिंता मत कर, कभी न कभी तेरे लिए भी कोई चुत का इंतज़ाम हो ही जायेगा
बंशी – अरे इसकी छोड़ो मोहन, ई तो ससुरा चोबीस घंटे चुत के सपने देखत है, तुम बताओ , तुम तो ऑफिस वोफ्फिस में काम करत हो, वहाँ तो काफी लोंडिया आती है हम सुने
मोहन – अरे हम तो रोज़ ही एक से एक जबरदस्त लोंडिया देखते है हमरे ऑफिस में, और मालूम है कुछ तो बिलकुल छोटे छोटे घुटनों तक के कपड़े पहन कर आती है, साला सुबह सुबह ही हमार लंड भी बिलकुल अकड जाता है, फिर गुसलखाने (टॉयलेट) में जाकर मुठ मारते है तब कहीं जाकर लंड को थोडा सुकून मिलता है
बंशी – तोहर किस्मत बड़ी अच्छी है मोहन बाबु, कम से कम रोज़ लोंडिया के दर्शन तो हो जाते है, और एक हमार किस्मत, रोजाना साला काले पीले लोगो के चेहरों के सिवा कुछु दीखता ही नही है
राजू - अरे तोहर कैसी किस्मत ख़राब, तू तो शाम को आकर कम से कम चुत तो मार लेता है, हमे देख, किस्मत तो हमारी खराब है, जो साला 23-24 की उम्र में भी लंड हिलाना पड रहा है
राजू की बात सुनकर तीनो हंसने लगते है, उनकी बातो का दौर और लम्बा चलता है और फिर वो लोग जाकर घर में सो जाते है
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