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आफिया सद्दीकी का जिहाद/हरमहिंदर चहल

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आफिया सद्दीकी का जिहाद/हरमहिंदर चहल

1

यह अफ़गानिस्तान का गज़नी शहर था। उस दिन वर्ष 2008 के जुलाई महीने की 17 तारीख़ थी। दिन भर बेइंतहा गरमी पड़ती रही थी। दिन ढलने लगा तो गरमी की तपिश भी कम होने लगी। आखि़र लंबा दिन गुज़र गया और थाने की दीवारों के साये अहाते के दूसरे सिरे पर जा पहुँचे। सूरज छिपने ही वाला था जब थानेदार गनी खां शहर का चक्कर लगाने के लिए उठा। आज उसका सारा दिन बाहर ही गुज़र गया था। सुबह से ही वह अमेरिकन फ़ौज़ की उस टुकड़ी के साथ घूम रहा था जो कि गाँवों की तरफ़ चक्कर लगाने गई थी। आजकल इस इलाके में तालिबानों का ज़ोर था। अमेरिकी फ़ौज़, इलाके की पुलिस को संग लेकर गाँवों की छानबीन के काम में लगी हुई थी। अमेरिकी फ़ौज़ों ने इस इलाके को तालिबानों से मुक्त करवाने का बीड़ा उठा रखा था। वे अपने मिशन में सफल भी हो रहे थे। हर रोज़ सवेरे ही फ़ौज़ का काफ़िला चल पड़ता था। जिस इलाके में उन्हें जाना होता, वहाँ के थाने का अमला-फेला साथ जाता था। इसी तरह आज गनी खां के थाने के गाँवों की बारी थी। इसीलिए आज उसका पूरा दिन बाहर घूमते हुए ही गुज़र गया था। गनी खां की एक आदत थी कि वह कितना भी व्यस्त होता, पर शाम के वक़्त शहर का चक्कर अवश्य लगाता था। आज भी घर जाने से पहले उसने शहर का एक चक्कर लगाने का मन बनाया। उसके कहने पर हवलदार कुछ सिपाहियों को ले आया और ड्राइवर ने पिकअप ट्रक को थाने के गेट के आगे ला खड़ा किया। गनी खां आगे ड्राइवर के साथ बैठ गया और शेष अमला ट्रक के पीछे खड़ा हो गया। थोड़ा घूमकर ड्राइवर ने ट्रक को बाज़ार की ओर मोड़ लिया। बाज़ार में से गुज़रते हुए ट्रक गली का मोड़ मुड़ने लगा तो गनी खां ने सामने बंद पड़ी एक दुकान के आगे बुर्के से ढकी एक औरत की ओर देखा। वह औरत नीचे ज़मीन पर बैठी थी और उसके साथ करीब बारह वर्ष का एक लड़का था। गनी खां ने मन ही मन सोचा कि शहर में मंगतों की गिनती बहुत बढ़ गई है। मोड़ मुड़ते ही पिकअप ट्रक जब करीब से गुज़रा तो उसने बड़े ध्यानपूर्वक उस औरत की तरफ़ झांका। औरत ने पास रखे काले रंग के बड़े-से बैग को कसकर हाथों में पकड़ रखा था। तभी गनी खां का पुलिसिया दिमाग हरकत में आ गया। यह इतना बड़ा बैग क्यों उठाये घूमती है - उसने सोचा। उसको शक हुआ तो उसने ट्रक रुकवा लिया और नीचे उतरकर औरत के पास चला गया। एक पैर चबूतरे पर रख और हाथ वाला डंडा औरत की तरफ करके उसने पूछा, “ऐ बीबी, कौन है तू ?“

“मैं तो एक गरीब औरत हूँ। अपने पति को खोजती फिरती हूँ जो लड़ाई में कहीं गुम हो गया है।“ इतना कहते हुए वह खड़ी हो गई। उसने पास में रखा बैग उठा लिया।

“तेरे साथ यह लड़का कौन है ?“

“यह तो कोई अनाथ है। भूचाल में इसके माँ-बाप मारे गए थे। मैं इसको संग ले आई थी।“ इतना कहकर वह उठी, बैग को कंधे से लटकाया और लड़के की उंगली पकड़कर चल पड़ी।

“ऐ रुक जा।“ गनी खां ने आगे बढ़कर उसका रास्ता रोक लिया। औरत के हावभाव और बोलने के ढंग ने उसके सन्देह को और भी बढ़ा दिया था। उसको पिछले दिनों किसी मुखबिर से मिली ख़बर याद हो आई कि कोई औरत यहाँ गवर्नर पर आत्मघाती हमला करने की ताक में है। इतने में सिपाहियों ने औरत को चारों ओर से घेर लिया। एक ने आगे बढ़कर उससे बैग छीना और उसको खंगालने लगा। कुछ काग़ज़ बाहर निकाले। गनी खां ने काग़ज़ों को ध्यान से देखा तो वह बहुत हैरान हुआ। ये नक्शे वगैरह थे। उसके कहने पर पुलिस वालों ने उस औरत को बच्चे सहित ट्रक में बिठा लिया और थाने की तरफ़ चल पड़े। थाने पहुँचकर उसके बैग की अच्छी तरह से तलाशी ली गई। और भी हैरान करने वाली वस्तुएँ बैग में से मिलीं। दो बोतलों में कोई ख़तरनाक कैमिकल थे जो कि बम बनाने का मसाला प्रतीत होते थे। इसके अलावा दो किलो के करीब सोडियम सायनाइड मिला। बाकी हाथ से लिखे हज़ारों काग़ज़ मिले जो कि अधिकतर अंग्रेजी में थे। बैग में काफ़ी संख्या में नक्शे थे जिनमें एक यहाँ के गवर्नर के घर का भी था। उस औरत ने अपना नाम सलीहा बताया। गनी खां को पूरा यकीन हो चुका था कि यह औरत किसी आतंकवादी संगठन की ख़तरनाक मेंबर है और हो सकता है कि यहाँ के गवर्नर को आत्मघाती हमले में मारने निकली हो। उसने तुरन्त गवर्नर दफ़्तर को ख़बर की। उन्होंने आगे अमेरिका के बैगराम एअरपोर्ट बेस को सूचना भेजी। इस बीच रात में औरत की पिटाई भी हुई, पर उसने मुँह नहीं खोला। उसके साथ पकड़े गए लड़के को अलग कर दिया गया था। अगले दिन सवेरे ही अमेरिकन फ़ौज़ का कैप्टन राबर्ट सिंडर अपनी टुकड़ी लेकर गज़नी थाने की ओर चल पड़ा। तब तक उस औरत को थाने में से निकालकर नज़दीक की एक इमारत के बड़े कमरे में बिठाया हुआ था। काबुल से अफ़गान सरकार के कुछ बड़े अधिकारी भी उससे बात करने के लिए पहुँचे हुए थे। जब कैप्टन सिंडर अपने अमले-फेले के साथ वहाँ पहुँचा तो इमारत को स्थानीय अफ़गानियों ने घेर रखा था। वे हथियारबंद थे क्योंकि वहाँ बात फैल चुकी थी कि थाने वाले किसी बेकसूर औरत को अमेरिकियों के हवाले करने जा रहे हैं। कैप्टन मन ही मन बोला, “जिस बात का डर था, वही हो गई।“ उसने देखा था कि यहाँ अफवाहों का बहुत ज़ोर रहता था। ज़रा-सी बात हुई नहीं कि अफवाह उड़ी नहीं। यही नहीं बल्कि अफगानी लोग हथियारबंद होकर पहुँच जाते थे। आज भी ऐसा ही हुआ था। लोगों के हुजूम ने हथियार उठाये हुए थे। आसपास नज़र घुमाते हुए उसने मन ही मन सोचा, “आज यहाँ ज़रूर कुछ न कुछ होकर रहेगा। एक तो औरत का मामला है और ऊपर से उसे कल रात से पकड़ा हुआ है। लोग भी धड़ाधड़ इकट्ठे हुए जा रहे हैं। पता नहीं हालात कैसे बन जाएँ।“ यही सब सोचकर उसने सबको पूरी मुस्तैदी के साथ रहने का हुक्म दिया और लोगों में से राह बनाता हुआ अपने खास दस्ते के साथ बड़ी इमारत के अन्दर चला गया। आगे करीब तीन सीढ़ियाँ चढ़कर वे इमारत के दरवाजे़ तक पहुँच गए। दो व्यक्ति बाहर पहरे पर खड़े हो गए। कैप्टन और वारंट अफ़सर अंदर चले गए। दुभाषिया भी उनके साथ था। कैप्टन ने अंदर बैठे अफगानी लोगों और अफ़सरों की ओर देखते हुए झुककर सलाम किया। उसने इधर-उधर नज़रें दौड़ाईं। पिछली ओर पर्दा तना हुआ था। वह समझ गया कि गिरफ्तार की गई औरत इस पर्दे की ओट में होगी। कैप्टन और वारंट अफ़सर अन्य सभी के साथ नीचे फर्श पर ही बैठ गए। उन्होंने अभी बातचीत आरंभ ही की थी कि वहाँ गोली चलने की आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ सुनते ही वारंट अफ़सर ने अपना पिस्तौल निकालकर गोली चला दी जो कि पर्दे के पीछे बैठी औरत के पेट में लगी। जब पता चला कि औरत ज़ख़्मी हो चुकी है तो कैप्टन ने अपने लोगों को आवाज़ दी। सभी ने तुरंत औरत को स्ट्रेचर पर डाला और पिछले दरवाजे़ से अपने ट्रक तक पहुँचे। वहाँ से ज़ख़्मी औरत को संग लेकर वे बैगराम एअरफोर्स बेस की ओर चल दिए। वहाँ उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया। साथ ही उसकी असली पहचान मालूम करने के लिए उसके फिंगर-प्रिंट लिए गए। दो घंटों के बाद एफ.बी.आई के दफ़्तर से उसकी सही पहचान की रिपोर्ट आ गई। जब सभी विभागों को उसके असली नाम का पता चला तो हर तरफ़ तहलका मच गया। वह कोई साधारण औरत नहीं थी। वह अमेरिकी एफ.बी.आई. द्वारा घोषित की गई विश्व की सबसे ख़तरनाक आतंकवादी औरत थी और उसका नाम था - आफ़िया सद्दीकी।

(जारी…)
 
इस्मत जेहान का जन्म 1939 में बुलंद शहर में हुआ। यहीं उसने बचपन बिताया। इस्मत ने स्कूल अभी पूरा भी नहीं किया था कि हिंदुस्तान का बंटवारा हो गया। वह परिवार के साथ पाकिस्तान चली आई। यहीं उसका विवाह मुहम्मद सुलेह सद्दीकी के साथ हुआ। सुलेह सद्दीकी पेशे से डॉक्टर था। विवाह के कुछ समय बाद वह इंग्लैंड चले गए। वहाँ वे कई वर्ष रहे। उनके परिवार में पहले बेटे का जन्म हुआ जिसका नाम उन्होंने मुहम्मद अली रखा। फिर 1966 में पहली लड़की फौजिया का जन्म हुआ। इसके बाद वे वापस पाकिस्तान लौट आए। यहीं मार्च, 1972 में उनकी दूसरी बेटी ने जन्म लिया जिसका नाम आफिया रखा गया। इसी साल जुलाई महीने में सुलेह के साले एस.एच. फारूकी का परिवार उनसे मिलने आया। फारूकी परिवार इस्लामाबाद में रहता था। नाश्ता-पानी से फुर्सत पाकर वे ड्राइंग रूम में बैठ गए। बातें चलीं तो शीघ्र ही वे मौजूदा मसले के बारे में बात करने लगे। बात शुरू करते हुए फारूकी बोला, “भाई साहब, भुट्टो ने मुल्क का बेड़ा डुबो कर रख दिया।”

“क्या किया जा सकता है। मगर अकेला वही तो जिम्मेदारी नहीं है। सभी ने मिलकर ही पाकिस्तान के मुँह पर कालिख़ मली है।”

“गर असल में पूछते हो तो यह काम याह्या खां के ज़माने से शुरू हुआ।” फारूकी की बीवी ने बातचीत में हिस्सा लेते हुए अपना विचार रखा।

“फौज तो सारी ही इस बदनामी का कारण बनी है।”

“अगर पहले ही संभलकर चलते तो क्या फर्क़ पड़ता था। आज ये दिन तो न देखने पड़ते।”

“सच बात तो यह है कि इन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की भावनाओं की कद्र नहीं की। जब मुजीब-उल-रहमान पाटी की पार्टी जीत गई थी तो हुकूमत उसके हवाले कर देते। उसूल तो यही कहता है।”

“उसूल आम लोगों के लिए हैं। इन रजवाड़ों के लिए नहीं। इन्होंने तो उन लोगों को कभी बराबरी का दर्ज़ा भी नहीं दिया था। फिर यह सब तो होना ही था।”

“इंडिया ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की मदद करके हमारी छाती पर मूंग दली है। इंशा अल्ला कभी मौका मिला तो हमें भी हिसाब बराबर करना चाहिए।” इस बार इस्मत बोली।

“इंडिया ने जो भी किया है, वह अपने हिसाब से सही किया है। उसकी जगह कोई दूसरा देश होता तो वह भी यही करता। राजनीति यही कहती है।” सुलेह सद्दीकी ने अपना विचार प्रकट किया।

“जो भी हुआ, अच्छा या बुरा यह अलग बात है। पर इस कार्रवाई ने कायदे-आज़म, अल्ला उनकी रूह को जन्नत बख्शे, का दो कौमों का सिद्धांत गलत साबित कर दिया है। इस बात ने पाकिस्तान का अस्तित्व ख़तरे में डाल दिया है।”

“और नहीं तो क्या... कितनी हसरतों से इधर आए थे कि मुसलमानों का अपना मुल्क बन गया है। अल्ला की मार पड़े इन लीडरों को जिन्होंने लोगों की भावनाएँ कुचल कर रख दी हैं। यह बंगला देश नहीं बना, यह तो हमारी जम्हूरियत के मुँह पर थप्पड़ है।”

“कौन सा बंगला देश ? मैं नहीं मानती इसको। तुम पूर्वी पाकिस्तान कहो।” इस्मत नफ़रत में बोली।

“आपा, तुम्हारे कहने से क्या होता है। ज़रा गौर फरमाओ कि पिछले हफ़्ते ही तो हमारे वज़ीरे आलम भुट्टो साहिब शिमला समझौते पर दस्तख़त करके आए हैं। उस समझौते की मुख्य मद यही है कि पाकिस्तान बंगला देश के अस्तित्व को मानता है। उस पर दस्तख़त करने का मतलब है कि पाकिस्तान ने बंगला देश को मान्यता दे दी है।”

“यह समझौता भी तो भुट्टो ने अपनी छवि बचाने के लिए ही किया है। अगर उसको मुल्क की फिक्र होती तो वह उन एक लाख फौजियों की रिहाई की बात करनी न भूलता जो इंडिया ने जंगी-क़ैदी बनाए हैं।”

“अगर जनरल नियाज़ी ज़रा हिम्मत से काम लेता तो वह क़ैद ही नहीं होते और शायद बंगला देश भी न बनने देते।” यह विचार फारूकी की बेगम का था।

“बेगम क्या बात करती हो तुम। इसमें नियाज़ी साहब का रत्तीभर भी कसूर नहीं है। वह अपनी सरकार की मदद के बग़ैर कितनी देर लड़ सकता था।”

“अवाम कभी भी भुट्टो को मुआफ़ नहीं करेगी। न ही फौज करेगी। और तो और, उसने कश्मीर मसले को भी दूसरा ही रूप दे दिया। मकबूज़ा(अधिकृत) कश्मीर की हद को ‘लाइन-ऑफ कंट्रोल’ का रूप दे आया। कहता है कि भविष्य में इस मसले का हल बातचीत के जरिये ही निकाला जाएगा। कोई पूछ तो सही कि अगर भविष्य में कभी इंडिया, पाकिस्तान पर हमला कर दे तो उसका हल भी बातचीत से ही निकालना।”

“भाई साहब, यह सब तो होना ही था। और फिर जो हो चुका है, वह बदला नहीं जा सकता। हमें सच्चाई कुबूल करनी ही पड़ेगी।” सुलेह सद्दीकी ने यह बात कही तो सभी चुप हो गए। फारूकी ने बात का रुख बदलते हुए अन्य बात छेड़ दी, “भाई साहब, तुम्हारा अफ्रीका जाने का प्रोग्राम कैसे है ?”

“बस, सब इंतज़ाम मुकम्मल हैं। जैम्बिया की लोअस्का यूनिवर्सिटी की ओर से नौकरी का ख़त भी आ चुका है। अब तो शायद इसी महीने रवाना हो जाएँ।”

फिर वे दूसरी बातें करने लगे। शाम ढले फारूकी परिवार जाने के लिए उठा। उन्होंने सभी बच्चों के सिर पर हाथ रखा। चादर में लिपटी पड़ी छोटी-सी आफिया का मुँह चूमा। फिर कार में बैठकर चले गए। इसके कुछ हफ़्ते बाद ही सद्दीकी परिवार जैम्बिया चला गया।

यहाँ आकर सुलेह सद्दीकी, लोअस्का मेडिकल युनिवर्सिटी में प्रोफेसर की नौकरी करने लगा। इस्मत बच्चों को संभालती थी। वह सारा दिन घर में खाली रहती थी। उसने इस खाली समय को धर्म के कामों में लगाने के विषय में सोचा। धार्मिक कामों में वह प्रारंभ से ही बढ़-चढ़कर भाग लेती थी। इस्लाम पर चर्चा करना उसको बहुत अच्छा लगता था। यहाँ वह पड़ोसी स्त्रियों को दिन के समय एकत्र कर लेती और उनके साथ धार्मिक मसलों पर बातें करती। अच्छा वक्ता होना उसका बड़ा गुण था। शीघ्र ही, उसके घर आने वाली स्त्रियों की संख्या में वृद्धि होने लगी। फिर तो यह गिनती इतनी हो गई कि उसको कहीं बाहर जगह का प्रबंध करना पड़ा। उसने अपने संगठन का नाम भी रख लिया। यू.आई.ए. यानी युनाइटिड इस्लामिक ऑरगनाइजेशन। उसका प्रभाव यहाँ के मुस्लिम समाज में बढ़ने लगा। सारी एशियन कम्युनिटी में सद्दीकी परिवार मशहूर हो गया। इस्मत का नाम दिनों दिन हरेक की जु़बान पर आने लगा। अपने लोगों को धार्मिक शिक्षा देने के अलावा, इस्मत यह भी कोशिश करती थी कि करीबी क्रिश्चियन भाईचारे में से लोगों को अपने धर्म में लाया जाए। इस काम में वह सफल भी हो रही थी। आफिया हालाँकि तब बहुत छोटी थी, पर उसकी माँ उसको हर रोज़ ऐसे जन-समूहों में संग लेकर जाती। आफिया बड़े ध्यान से माँ की बातें सुनती। आफिया यद्यपि पूरी तरह इन बातों को नहीं समझ सकती थी, पर ये बातें उसके अवचेतन पर उतर रही थीं। इस्मत कहीं भी जाती छोटी-सी आफिया उसके साथ होती थी।

आख़िर सुलेह की नौकरी का समय पूरा हो गया। पूरा परिवार पाकिस्तान वापस लौट पड़ा। आफिया उस वक्त सात वर्ष की थी। यह 1980 का वो समय था जब पाकिस्तान के आस-पड़ोस में उथल-पुथल हो रही थी। ईरान में खुमैनी की रिवोलिशनरी इस्लामिक सरकार ने सत्ता संभाल ली थी। हर तरफ खुमैनी की चढ़त थी। पाकिस्तान में वो सबकुछ बदल गया था जो कि उनके अफ्रीका जाने के समय में था। वहाँ फौजी जनरल जियाउल हक़ की कमांड के नीचे डिक्टेटरशिप कायम हो चुकी थी। उससे पहले प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो जो कि बहुत अमीर व्यक्ति था, मुल्क को धार्मिक प्रभाव से ऊपर उठाकर एक शक्तिशाली जनतांत्रिक देश बनाना चाहता था। इससे धार्मिक लोग अर्थात मुल्ला वगैरह उससे बहुत नाराज़ थे। जियाउल हक़ ने मौके की नब्ज़ को पहचानते हुए राज पलट दिया। उसके आते ही मुल्लों की अच्छी सुनवाई होने लगी। जियाउल हक़ ने मुल्क को धार्मिक रंग में रंगना शुरू कर दिया था, क्योंकि वह जानता था कि यदि स्थायी रूप में राज स्थापित करना है तो लोगों को धार्मिक हथियार से काबू में करना पड़ेगा। इसके लिए उसने ज़रूरी काम प्रारंभ किए। उसने धार्मिक उसूलों को लागू करने के लिए कौंसिल आफ इस्लामिक आयडियोलॉजी कामय की। ऐसे धार्मिक संगठनों की मदद से जियाउल हक ने पाकिस्तान को धार्मिक स्टेट बनाने के लिए पूरे यत्न आरंभ कर दिए। उसका पहला कदम था - स्त्रियों को परदे और चारदीवारी में बंद करना। कितने ही नए धार्मिक रंग वाले कानून बनाकर जिया उल हक ने मुल्क के धार्मिक लीडरों का विश्वास जीत लिया। हर तरफ धार्मिक रंग उभर रहा था जो कि पश्चिम के खिलाफ़ था। पश्चिम के खिलाफ़ ज़ोर-शोर से प्रचार हो रहा था। इन्हीं दिनों ईरान में अमेरिकी एम्बेसी के स्टाफ को क़ैद कर लिया गया। सऊदी अरब में उग्र इस्लामिस्टों ने मक्के की पवित्र बड़ी मस्जिद काबा पर कब्ज़ा कर लिया। पाकिस्तान में उग्रवादियों ने अमेरिका की अमेरिका की इस्लामाबाद स्थित एम्बेसी को आग लगाकर जला दिया। पश्चिम के विरुद्ध हर जगह गुस्सा भड़क रहा था। तभी दिसम्बर 1979 में सोवियत यूनियन की फौजें अफ़गानिस्तान में दाखि़ल हो गईं। इस घटना ने सब कुछ बदलकर रख दिया।

अमेरिका जो अब तक जिया उल हक की कार्रवाइयों के कारण बहुत गुस्से में था, उसको अब जिया उल हक की ज़रूरत महसूस हुई। सोवियत यूनियन को टक्कर देने के लिए वह जिस करीबी शक्ति को ढूँढ़ रहा था, जिया उल हक उसके बिल्कुल मुफ़ीद आता था। सऊदी अरब और अमेरिका ने मिलकर अफ़गानिस्तान में सोवियन यूनियन के खिलाफ़ लड़ने की योजना बनाई जिसमें उन्होंने जिया उल हक को आगे लगा लिया। जिया ने पाकिस्तान की खूफ़िया एजेंसी, आई.एस.आई. को इसकी कमांड सौंप दी। उन्हीं दिनों में अफ्रीका से लौटकर डॉक्टर मुहम्मद सुलेह सद्दीकी ने कराची की एक हाई सोसायटी ‘गुलशने इकबाल’ में बंगला खरीद लिया जहाँ कि बड़े-बड़े अफ़सर और अन्य प्रभावशाली लोग रहते थे। जिया उल हक के चीफ़ ऑफ स्टाफ मिर्ज़ा असलम बेग का परिवार, सद्दीकी का पड़ोसी था। इस प्रकार यह परिवार पाकिस्तान पर राज करने वाले ग्रुप के बहुत करीब आ गया।

इस समय आफिया अपने बचपन का आनंद ले रही थी जबकि उसकी माँ अपने धार्मिक संगठन यू.आई.ओ. के लिए अधिक से अधिक काम कर रही थी। इस्मत सद्दीकी दिनों दिन प्रसिद्ध हो रही थी। यहाँ तक कि जिया उल हक की बेगम शैफ़ीक भी उसके प्रभाव के अधीन थी और उसकी धार्मिक कक्षाओं में उपस्थित हो रही थी। उस वक़्त तक इस्मत ऊँची सोसायटी में एक बहुत ही सम्मानजनक मुकाम हासिल कर चुकी थी। जिया उल हक खुद उससे प्रभावित था। जिया, इस्मत से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसको उस बोर्ड का मेंबर बना दिया जो कि कुरान के अनुसार ज़कात अर्थात चैरिटी एकत्र करने और उसको खर्च करने का प्रबंध करता था। इस बोर्ड में आते ही इस्मत का अन्य बहुत बडे बड़े संगठनों से सम्पर्क हुआ जो कि किसी न किसी ढंग से अफ़गानिस्तान में चल रहे जिहाद के जुड़ी हुई थीं। अफ़गानिस्तान के लिए जाने वाला प्रथम लड़ाकू जिहादी दल, सद्दीकी परिवार के घर से कुछ ही दूर स्थिति बिनूरी कस्बे की मस्जिद से रवाना होने लगा तो लोगों ने उन्हें बहुत ही मान-सम्मान से विदा किया। इसके साथ ही लोगों की नज़रों में सद्दीकी परिवार विशेष तौर पर इस्मत के प्रति इज्ज़त और बढ़ गई। उस दिन आफिया भी दीवार से लगी खड़ी जाते हुए जिहादियों को देखती रही। इस प्रकार छोटी उम्र में ही आफिया जिहाद के बारे में सुनने लगी थी। इतना ही नहीं, बल्कि उसका जिहाद के प्रति लगाव बढ़ने लगा। आफिया तब ‘गुलशने इकबाल’ में लोकल इंग्लिश की छात्रा थी। वह स्कूल में इंग्लिश, मैथ, साइंस, कुरान और सुन्ना पढ़ रही थी। आफिया उस वक़्त बहुत ही मासूम थी। उसकी रुचियाँ भी मासूमों वाली थीं। वह घर में पंछियों को हर रोज़ दाना डालती। इसके अलावा उसने घर में कुत्ते, बिल्ली, बत्तख, मछलियाँ और तोते वगैरह पालतू जानवर रखे हुए थे। फुर्सत का समय वह इनके साथ खेलते हुए बिताती।

अपनी माँ के प्रभाव तले वह भी बहुत धार्मिक होती जा रही थी। माँ को देखकर उसने भी स्कूल में छोटे छोटे बच्चों को लेक्चर देने प्रारंभ कर दिए थे। सद्दीकी परिवार में हर वक़्त अफ़गानिस्तान के अंदर चल रहे जिहाद की बातें चलती रहती थीं। यद्यपि सुलेहे सद्दीकी की इन बातों में अधिक दिलचस्पी नहीं होती थी, पर उसकी पत्नी दिलोजान से जिहादियों की मदद करती थी। उसके लिए उस वक़्त इससे बड़ा कोई दूसरा काम नहीं था कि इस्लाम की धरती से कम्युनिस्टों का सफाया किया जाए और वहाँ सच्चा इस्लामिक राज्य कायम हो। आफिया माँ की इन कार्रवाइयों को बहुत ही ध्यान से देखती थी। उसका मन करता कि वह इन जिहादियों की दिलोजान से सेवा करे जो कि अपने धर्म के लिए शहीद हो रहे थे। वह जिहादियों के बहादुरी भरे कारनामे सुनती तो उसको लगता कि यही धर्म के असली हीरो हैं। थोड़े-से लड़ाकुओं की मदद से शुरू किया गया जिहाद आखि़र उनके हक में होने लगा। बड़ा कारण अमेरिका था जो कि परदे के पीछे रहता, जिया उल हक को आगे रख कर सारी लड़ाई आप लड़ रहा था। आखि़र जिहादियों का पलड़ा भारी पड़ने लगा। आहिस्ता आहिस्ता उन्होंने सोवियत यूनियन को अफ़गानिस्तान में से खदेड़ दिया। फिर समझौता हुआ जिस के अनुसार सोवियत यूनियन वहाँ से अपनी फौजें निकालने के लिए राजी हो गया। जब सोवियत यूनियन की फौजें अफ़गानिस्तान में से गर्दन झुकाकर निकलनी प्रारंभ हुई तो आफिया ने भी अन्य लोगों की तरह जश्न के कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। उस वक़्त हर तरफ खुशी का आलम था। ख़ास तौर पर सद्दीकी परिवार के घर में। उनके अनुसार अल्ला की पार्टी की जीत हो चुकी थी। उनका विचार था कि यह जिहाद ही था जिसने अफ़गानिस्तान को कम्युनिस्टों से आज़ाद करवाया। इस विजय को हर एक ने अपने नुक्ते से देखा। अमेरिका को लगा कि उसने काफी अरसे से चल रहे शीतयुद्ध में रशिया का सिर कुचल दिया है। अफ़गानिस्तान के लोगों को लगा कि उन्होंने जिहाद की राह पर चलकर अपना मुल्क आज़ाद करवा लिया है। पर जनरल जिया उल हक और उसकी सरकार ने सोवियत यूनियन की हार को किसी दूसरे रूप में देखा। जिया ने यह भ्रम पाल लिया कि यह सब कुछ पाकिस्तान की वजह से हुआ है। उसका विचार था कि इस वक़्त पाकिस्तान कुछ भी कर सकता है। उसके अनुसार आहिस्ता आहिस्ता पाकिस्तान, पूरे मध्य एशिया में अपना दबदबा कायम कर लेगा। उसने अफ़गानिस्तान से फुर्सत पाकर दूसरे हिस्सों की तरफ देखना शुरू कर दिया। सबसे पहले उसने अपना मुख्य एजेंडा चालू करने की विचार बनाया। वह था- इंडिया की ओर कश्मीर की आज़ादी (पाकिस्तानी इसको मकबूज़ा अर्थात पाक-अधिकृत कश्मीर कहते हैं जब कि पाकिस्तान की ओर के कश्मीर को आज़ाद कश्मीर कहा जाता है)। जिया ने अपने लोगों को कश्मीर आज़ाद करवाने का नारा दिया। इसके लिए उसने वही तरीका चुना जो कभी अमेरिका ने अफ़गानिस्तान के लिए चुना था। अर्थात पाकिस्तान परदे के पीछे रहकर सारी लड़ाई लड़ेगा जब कि कश्मीर में तैयार किए गए जिहादी असली लड़ाई लड़ेंगे। इसके लिए उसने एक्शन शुरू किया तो शांत पड़े जम्मू-कश्मीर में भूचाल आ गया। जगह-जगह जिहादी पैदा हो गए। इस खेल में जिया उल हक दो मोर्चे मारना चाहता था। एक तो था इंडिया से कश्मीर छीनना और दूसरा था, बंगला देश वाला हिसाब चुकता करना। वह यहाँ तक आत्मविश्वास से भर गया कि उसने सोचा कि कश्मीर के आज़ाद होने के पश्चात वह इस प्रॉक्सी वार को भारत के अन्य हिस्सों में फैला देगा और देश के टुकड़े-टुकड़े कर देगा। कश्मीर के साथ ही उसने पंजाब पर भी आँख रख ली। अपना अलग देश बनाने के लिए वह सिक्खों को भड़काने लगा। उसका कहना था कि असली लड़ाई तुम लड़ोगे और सारी मदद वह करेगा। जिया उल हक उस वक़्त बहुत ऊँची उड़ानें भर रहा था। परंतु कुदरत अपना खेल स्वयं खेलती है। एक दिन सद्दीकी परिवार के घर फारूकी का फोन आया। फोन इस्मत ने उठाया तो उधर से वह बोला, “आपा गज़ब हो गया।”

“क्यों क्या हुआ ?”

“जिया साहब नहीं रहे।”

“क्या कहा ?” इस्मत को अपने कानों पर विश्वास न हुआ।

“अभी अभी पता चला है कि जनरल जिया उल हक हवाई हादसे में मारे गए।”

“हाय अल्ला...।”

इस्मत का शरीर सुन्न हो गया। वह कुर्सी के डंडे को पकड़कर वहीं गिर पड़ी। उधर से दो चार बार आवाज़ आई तो वह अपने आप को संभालती हुई बोली, “भाई जान, यह तो बहुत बड़ा क़हर हो गया। हम तो जीते जी ही मर गए। अपने लिए तो वही सब कुछ थे। अल्लाह ख़ैर करे, पता नहीं इनके बग़ैर मुल्क का क्या होगा। पर यह सब हुआ कैसे ?”

“वो कहीं दौरे पर गए थे। साथ ही, बड़े फौजी अफ़सरों के अलावा अमेरिकी राजदूत भी था। लौटते हुए बहावलपुर से हवाई जहाज से रावलपिंडी आ रहे थे। शायद किसी ने जहाज में बम रखवा दिया। जहाज उड़ने से कुछ समय बाद ही तबाह हो गया। कोई भी सवार नहीं बचा।”

“भाई जान, कौन उनकी जान का दुश्मन बन गया होगा ?”

“आपा, क्या कह सकते हैं। पर लगता है कि या तो अमेरिका ने यह सब करवाया है या फिर रशिया ने।”

“अमेरिका भला ऐसा क्यों करवाएगा ? उसकी तो जिया साहिब ने इतनी मदद की है। रशिया की यहाँ तक पहुँच नहीं हो सकती।”

“और फिर किसने करवाया होगा यह काम ?”

“अल्लाह दोजख की भट्ठी में झोके उसको, यह सब हिंदुस्तानियों का किया करवाया है। इस वक़्त सबसे ज्यादा हिंदुस्तान ही जिया साहब से डरता था।”

“आपा आपने दुरस्त फरमाया है। ख़ैर, धीरे-धीरे पता लग जाएगा। पर हुआ बहुत बुरा।”

“बुरे से भी बुरा। अपना तो सब कुछ ही बर्बाद हो गया। अल्लाह जन्नत बख्शे उनको। हमें तो जिया साहब ने बड़ा आदर-सम्मान दिया था। अब पता नहीं आगे क्या होगा।”

“आपा, एक बार तो सारा मुल्क दहशतज़फा हो गया है। इस्लामाबाद शहर तो इस तरह लगता है मानो वहाँ कोई बसता ही न हो। लोग बहुत ज्यादा उदास है। अल्लाह ख़ैर करे, देखो आगे क्या होता है।” इतना कहते हुए फारूकी ने फोन काट दिया।

इस्मत को इस ख़बर ने तोड़कर रख दिया था। छोटी-सी आफिया माँ को दहाड़ें मारकर रोते देखती रही।

जहाँ जिया के समर्थक लोग इस हादसे से टूटकर बिखर गए थे, वहीं विरोधी इसको अपने लिए एक अच्छा वक़्त मान रहे थे। उनके अनुसार एक ज़ालिम हाकिम से पीछा छुड़वाने में अल्लाह ने उनकी मदद की थी। इन लोगों में सबसे ऊपर बेनज़ीर भुट्टो थी। कुछ वर्ष पहले ही तत्कालीन प्रधान मंत्री और बेनज़ीर के पिता जुल्फकार अली भुट्टो को जिया उल हक ने न सिर्फ़ गद्दी से नीचे उतारा था, बल्कि बाद में फांसी पर भी लटका दिया था। पिता की मौत के बाद अपनी पार्टी को आगे बढ़ाते हुए बेनज़ीर ने बड़ी यातनाएँ सही थीं। जिया उल हक की सरकार ने उसको ख़त्म करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी, पर फिर भी उसने लड़ाई जारी रखी। पिछले कुछ समय से वह पाकिस्तान में रहते हुए, लोगों को लामबंद कर रही थी। यह अवसर उसको बिल्कुल मुफ़ीद बैठ गया। उसने ज़ोर-शोर से लोगों का जम्हूरियत के लिए जागरूक करना शुरू कर दिया। उसकी मेहनत का नतीजा ही था कि कुछ देर बाद हुए चुनाव में उसकी पार्टी बहुमत ले गई और बेनज़ीर भुट्टो किसी इस्लामिक देश की पहले महिला प्रधान मंत्री बन गई। जिया के समय से जो लोग धार्मिक प्रभाव के नीचे दबकर रह गए थे, उन्हें बेनज़ीर के आने से नई उम्मीदें मिल गईं। मुल्लो की जकड़ में आया मुल्क, एकदम घुटन से बाहर आ गया। एकदम सभी हालात बदल गए। इस परिवर्तन को इस्मत ने नए नज़रिये से देखा। उसने सोचा कि यदि बेनज़ीर भुट्टो राजनीति में आगे बढ़ रही है तो आफिया क्यों नही राजनीति कर सकती। उसका विचार था कि आफिया किसी बात में भी बेनज़ीर से कम नहीं है। वह सत्रह वर्ष की हो चुकी थी। उसने प्रारंभिक पढ़ाई पूरी कर ली थी। पढ़ाई भी उसने पाकिस्तान के मशहूर सेंट जॉसिफ कालेज से की थी, जहाँ पर बड़े बड़े लोगों के बच्चे पढ़ते थे। उसने हर विषय में ‘ए’ग्रेड लेते हुए क्लास में टॉप किया था। देखने में भी वह बहुत खूबसूरत थी। कद हालांकि उसका छोटा यानी पाँच फुट दो इंच ही था, पर उसका व्यक्तित्व देखने में बहुत प्रभावशाली था। परंतु इसमें एक अड़चन वह स्पष्ट देख रही थी। वह यह थी कि पाकिस्तान में रहते हुए आफिया की शीघ्र ही शादी हो जानी थी। यहाँ के रिवाज़ के अनुसार उसकी शादी की उम्र हो चुकी थी। उसकी माँ ने सोच-विचार करके यह तय किया कि यदि इसको पढ़ने के लिए विदेश भेज दिया जाए तो यह बहुत आगे बढ़ सकती है और इस प्रकार उसके विवाह वाला मसला भी पीछे रह जाएगा। आफिया का भाई मुहम्मद अली, पहले ही पढ़ाई करने के लिए अमेरिका गया हुआ था। उसने वहाँ पढ़ाई पूरी करने के बाद आर्चीटेक्ट का काम शुरू कर रखा था। आखि़र, इस्मत ने अली के साथ सलाह-मशवरा किया। उसका भी यही कहना था कि आफिया अभी छोटी है और साथ ही पढ़ाई में बहुत होशियार भी है। इसलिए इसको अमेरिका भेज दिया जाए। आफिया के माँ-बाप ने विचार-विमर्श करके आखि़र आफिया को अमेरिका भेजने की तैयारी आरंभ कर दी। ईद के हफ़्ताभर बाद ही वह अमेरिका जाने वो जहाज़ में बैठी हुई थी।

(जारी…)
 
डेल्टा एअरलाइन्ज़ का जहाज़ नीचे होने लगा तो आफिया ने नीचे धरती की ओर गौर से देखा। उसको कुछ भी नज़र न आया। नीचे धुंध की चादर-सी बिछी हुई थी। जहाज़ नीचे होता गया, पर नीचे अभी कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। आफिया ने महसूस किया जहाज़ काफ़ी नीचे पहुँच गया है। फिर उसको मद्धम-सी रोशनियाँ दिखाई देने लगी और तभी जहाज़ लैंड कर गया। एक झटका-सा लगा और जहाज़ रन-वे पर दौड़ने लगा। जहाज़ की गति धीमी हुई तो आफिया ने बाहर की तरफ देखा। बाहर रात का अँधेरा पसरा हुआ था और हर तरफ गहरी धुंध छाई हुई थी। तभी, जहाज़ टर्मिनल पर जा लगा। वह कस्टम वगैरह में से निकलकर बाहर आई तो सामने उसका भाई मुहम्मद अली उसका इंतज़ार कर रहा था। उसके साथ उसका कोई दोस्त प्रतीत होता एक गोरा लड़का था। आफिया भाई के संग घर चली गई। उसके भाई का हूस्टन यूनिवर्सिटी के करीब ही अपना अपार्टमेंट था। वह वहीं रहकर पढ़ा था और अब आर्चीटेक्ट का काम कर रहा था। सभी उसको मुहम्मद कहकर बुलाते थे। अगले पाँच सात-दिन तो आफिया की थकान ही नहीं उतरी। उसका मन पीछे अपने माँ-बाप के लिए बहुत उदास था। वह दिन भर अपार्टमेंट में ही पड़ी रहती थी। टी.वी. वगैरह की उसको पूरी समझ नहीं थी और न ही उसको टी.वी. देखना पसंद था। फिर मुहम्मद उसको यूनिवर्सिटी ले गया और उसकी पढ़ाई के बारे में मालूम किया। सारी जानकारी लेकर आफिया ने कक्षाओं में जाना प्रारंभ कर दिया। परंतु अभी भी उसका मन यहाँ पूरी तरह नहीं लग पा रहा था। वह घर के अंदर ही घुसी रहती। फिर आहिस्ता-आहिस्ता उसका मन बहलने लगा। इसका बड़ा कारण था कि यहाँ मुस्लमान विद्यार्थियों बहुत बड़ी संख्या में थे। वह कइयों के करीब होने लगी। अपने स्वाभाव के अनुसार आफिया हरेक के साथ धर्म के विषय में चर्चा अवश्य करती। इसी बीच उसने देखा कि उसके भाई के अपार्टमेंट में बहुत सारे विद्यार्थी आते थे। वहाँ मुस्लमान विद्यार्थियों की समस्याओं के बारे में चर्चा चलती रहती थी। उसका भाई मुस्लिम कम्युनिटी का उभरता लीडर था। ऐसे समय वह पिछले कमरे में चली जाती। वह सबके बीच नहीं बैठती थी। इसी दौरान उसने देखा कि उसके भाई का वह दोस्त लड़का जो कि उसके अमेरिका आने वाले दिन उसके भाई के संग एअरपोर्ट पर आया था, वह भी अपार्टमेंट में बहुत आता-जाता था। उसका नाम जॉर्ज था। जॉर्ज जब भी आता तो आफिया उससे एकतरफ हो जाती। जबकि जॉर्ज हमेशा उसके साथ कोई बात करना चाहता। वह उसके साथ पहली बार तब बोली जब एक दिन मुहम्मद ने जॉर्ज के आने पर उसको कमरे में बुलाया। उसने बताया कि जॉर्ज उसका बहुत ही गहरा दोस्त है और वह उसके साथ बेझिझक बातचीत कर सकती है। फिर वह जॉर्ज के साथ थोड़ा-बहुत खुलने लगी। जॉर्ज उसको फ्रेंड कहकर बुलाता तो उसको यह सम्बोधन अच्छा न लगता। फिर जॉर्ज उसको सिस्टर कहकर बुलाने लगा तो वह जॉर्ज के साथ पूरी तरह खुल गई। वह उसके साथ धर्म को लेकर लम्बी बहसें करती। इन बहसों के दौरान जॉर्ज देखता कि वह हर समय मुस्लिम धर्म की ही प्रशंसा करती थी। दूसरे धर्मों की वह अधिक कद्र नहीं करती थी। जॉर्ज बहुत बार क्रिश्चियन धर्म के बारे में बहुत कुछ समझाता, पर वह किसी बात से सहमत न होती। वह हर बहस के समय मुस्लिम धर्म को ऊँचा और असली धर्म कहती। जॉर्ज ने एक बात ज़रूर देख ली थी कि आफिया धर्म के बारे में बहुत गहरी जानकारी रखती है और उसके अंदर दूसरों को अपने प्रभाव के अधीन लाने की योग्यता है। मुहम्मद के कई दोस्त तो पहली बार में ही उसका प्रभाव स्वीकार कर लेते थे। आफिया के अन्य रिश्तेदार भी हूस्टन में रहते थे। किसी न किसी त्योहार के दिन सभी इकट्ठे होते रहते थे। जॉर्ज इन सभी को जानता था और सबके साथ व्यवहार करता था। इसलिए बाद में जाकर आफिया उसके संग पूरी तरह खुल गई। वह खुलकर बहसें करते। एक दिन जॉर्ज मुहम्मद के अपार्टमेंट में आया तो उसने देखा कि आफिया चुपचाप एक तरफ बैठी हुई थी। घर में गहरी चुप छाई हुई थी।

“क्या बात है सिस्टर, आज इतनी उदास है ?“ जॉर्ज ने पूछा।

“जॉर्ज, आज घर याद आ रहा है। खास तौर पर अम्मी।”

“न तू टी.वी. देखती है। न कोई किताब वगैरह पढ़ती है। फिर अकेली बैठी उदास ही होगी न।”

“इसी कारण मैं टी.वी. नहीं देखती और न ही कुछ पढ़ती हूँ।”

“मतलब ?“ जॉर्ज हैरान हुआ।

“क्योंकि यह बातें सिर्फ़ वक़्तकटी के लिए हैं। ये इन्सान का वक़्त पास ही नहीं करवातीं, बल्कि बर्बाद भी करती हैं। इसीलिए इन बातों की हमारे धर्म में मनाही है।”

“खाली समय में फिर और क्या करना चाहिए।”

“अल्लाह की इबादत करो, या फिर सामाजिक भलाई के लिए काम करो।”

“अगर तुम टी.वी. नहीं देखोगे, कोई अखबार नहीं पढ़ोगे तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि संसार में क्या हो रहा है ?“

“तेरे जैसों से पता चल ही जाता है कि संसार में क्या चल रहा है।” इतना कहकर आफिया हँस पड़ी। उसकी यह बात सुनकर जॉर्ज हैरान न हुआ। क्योंकि उसने पहले ही देख लिया था कि जो आजकल की युवा पीढ़ी कर रही है, आफिया उन बातों से कोसों दूर है। वह टी.वी. नहीं देखती, संगीत नहीं सुनती, कोई उपन्यास वगैरह नहीं पढ़ती और किसी लड़के के साथ घूमने जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। उसके लिए बस दो ही बातें ज़रूरी थीं - अपनी पढ़ाई या फिर धर्म। वह कुछ देर चुप रहकर बोला -

“सिस्टर, तुम्हें मैं एक सलाह दूँ। तू टी.वी. वगैरह पर समाचार वगैरह अवश्य देख लिया कर। इससे इन्सान को इतना पता लगता रहता है कि हमारे आसपास क्या घट रहा है।”

“क्यों ? कुछ ख़ास हो रहा है आसपास ?“ आफिया ने बात फिर मज़ाक में डाल दी।

“तुम्हें नहीं पता कि आज क्या हुआ है ?“

“नहीं तो।”

“इराक ने कुवैत पर हमला कर दिया है।”

“क्या !“ आफिया ने हैरान होते हुए जॉर्ज की तरफ़ देखा। वह एकदम सकते में आ गई।

“हाँ, यह सच है। पिछले कई दिनों से झगड़ा चल रहा था, यह तो तुम जानती ही होगी। पर आज सद्दाम हुसैन सारी दुनिया के रोकने के बावजूद न रुका और उसने कुवैत पर चढ़ाई कर दी।”

“सद्दाम हुसैन तो बुच्चड़ है, यह सभी जानते हैं, पर कुवैत के शेख भी कम नहीं।”

“सिस्टर, कुवैत का इसमें क्या कसूर है ?“ जॉर्ज उसकी बात सुनकर हैरान हुआ।

“ये जितने भी डिक्टेटर, सुल्तान और ख़लीफे हैं, ये सभी शैतान हैं। सभी मुसलमान धर्म को नुकसान पहुँचा रहे हैं। इन सबका ही खात्मा होना ज़रूरी है।”

“फिर, तेरे ख़याल में अब क्या होना चाहिए ?“

“पहले सद्दाम का टंटा साफ़ किया जाए। उसके बाद इन डिक्टेटरों का सफाया हो।”

“कौन करेगा यह सब ?“

“लोग।” इतना कहकर आफिया ने जॉर्ज की तरफ़ देखा।

“लोग यहाँ कुछ नहीं कर सकते। इस वक़्त किसी बड़ी शक्ति की ज़रूरत है जो सद्दाम को नकेल डाले।“

“मतलब ?“

“मतलब यह है कि अमेरिका ने इराक को कह दिया है कि वह अपनी फौजें कुवैत से बाहर निकाले। नहीं तो फिर नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहे।”

“अमेरिका यहाँ बीच में कहाँ से आ गया। यह अरब मुल्कों का आपसी मामला है।” आफिया तुरन्त बात का रुख बदल गई।

“तुम्हें नहीं मालूम, इराक तो कुवैत से भी आगे सऊदी अरब पर भी हमला करने की तैयारी किए जा रहा है। यदि उसको न रोका गया तो...।”

“मुझे यह सब एक साज़िश लगती है।” जॉर्ज की बात बीच में ही काटते हुए आफिया बोली।

“साज़िश ! मतलब ?“

“अमेरिका शैतान की पार्टी है। आज यह दुनिया में किसी को भी टिक कर बैठने नहीं देता। हर देश के घरेलू मामलों में दख़ल देता रहता है। यहाँ भी इसने कोई न कोई शरारत की होगी।”

“मैं यह बात नहीं मानता। मुझे तो अमेरिका ऐसा करता कहीं दिखाई ही नहीं देता।”

“दूर जाने की ज़रूरत ही नहीं। मेरे अपने मुल्क पाकिस्तान की बात कर लेते हैं। वहाँ वही होता है जो अमेरिका को अच्छा लगे। मुल्क पर राज करने वाला कोई भी हो, उसको अमेरिका की बात माननी पड़ती है। असल में, हमारे मुल्क के सभी सियासतदान अमेरिका के पिट्ठू हैं। अपनी राजगद्दी बचाने के लिए वे कोई भी समझौता कर सकते हैं। ऐसा ही शेष देशों में हो रहा है। अरब देशों में अमेरिका एक दूसरे को लड़ा कर अपना मतलब निकाले जाता है।”

“पर हम बात इराक की कर रहे हैं।” जॉर्ज ने उसको टोका।

“ठीक है, इराक की सही। पहले तो अमेरिका इराक को इरान के खिलाफ़ उठाए रहा। इतने साल की इरान-इराक लड़ाई में इसने इराक की पूरी हिमायत की। अब वह लड़ाई ख़त्म हो गई तो इसने अपना अगला एजेंडा शुरू कर लिया।”

“सिस्टर, तू फिर मसले से दूर जा रही है। हमला, इराक ने कुवैत पर किया है न कि अमेरिका ने।”

“जॉर्ज, मैं सब जानती हूँ। पिछले कई महीनों से यह हल्ला चल रहा था। इराक ने अमेरिका के पास शिकायत भी की थी कि उसका कुवैत के साथ किसी इलाके को लेकर झगड़ा है। पर अमेरिका ने यह कहकर पल्लू झाड़ लिया कि यह तुम्हारा आपसी मामला है, जैसे चाहो सुलझाओ। वह इसमें नहीं पड़ेगा। असल में, यह कहकर अमेरिका ने इराक को एक किस्म की हल्लाशेरी दी थी कि वह जो मर्जी में आए, करे, अमेरिका बीच में नहीं आएगा। सद्दाम ने भी उसका इशारा समझ लिया और अवसर मिलते ही कुवैत पर चढ़ाई कर दी। इराक के ऐसा करते ही अमेरिका अपनी बात से पलट गया। असल में, अमेरिका चाहता था कि किसी न किसी प्रकार इराक कोई कदम उठाए और उसको बीच में पड़ने का अवसर मिले। अब देख ले, अमेरिका के मन की हो गई। इराक को रोकने के लिए उसने सऊदी अरब को आगे लगा लिया।”

“सिस्टर आफिया, पहले यह बता कि तू इराक के उठाये इस कदम के हक में है कि इसके विरोध में ?“

“मैं इसके बिल्कुल खिलाफ़ हूँ। मैं तो यहाँ तक कहती हूँ कि इस बुच्चड़ सद्दाम का खात्मा हो और इराक के लोगों का उससे पीछा छूटे। अकेला वही नहीं है, जैसा कि मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि अरब मुल्कों के सारे डिक्टेटरों और शेखों का खात्मा ज़रूरी है। ऐसा होने पर ही इस्लाम तरक्की कर सकता है। पर यह मामला मुसलमान लोगों का अपना है। मैं चाहती हूँ कि वे खुद ही इसे सुलझाएँ। अमेरिका को हमारे लोगों के मसलों में दख़ल देने की कोई आवश्यकता नहीं है।”

“जो भी है सिस्टर, पर एक बात तय है कि कुछ ही दिनों में अमेरिकी फौजें सऊदी अरब की ओर कूच कर देंगी।” जॉर्ज ने चुटकी मारते हुए हँसकर कहा।

“ऐसा कभी नहीं होगा। मुसलमान लोग ऐसा नहीं होने देंगे।”

“यह तो समय ही बताएगा, पर अब मैं चलता हूँ। मुहम्मद को बता देना कि जॉर्ज आया था।” इतना कहकर जॉर्ज बाहर निकल गया, पर आफिया चिंता में डूब गई। उसके मन-मस्तिष्क को इराक वाले मसले ने घेर लिया। दिल से हालांकि वह चाहती थी कि सद्दाम का सफाया हो जाए, पर वह यह भी नहीं चाहती थी कि अमेरिका इस बात में दख़ल दे। उसने जब से होश संभाला था, उसने घर में अमेरिका के खिलाफ़ होती बातें ही सुनी थीं। उसने अफ़गानिस्तान वाला सारा मसला अपने सामने घटित होते देखा था। वह सोचा करती थी कि अपना काम निकालने के लिए पहले तो अमेरिका ने पाकिस्तान को आगे लगा लिया। जब सोवियत यूनियन हार गया तो अमेरिका ने अपने ही उन दोस्तों का सफाया कर दिया जिन्होंने अफ़गानिस्तान की लड़ाई में उसका साथ दिया था। ख़ास करके उसको जिया उल हक वाला हादसा बहुत चुभता था। उसकी अपनी सोच यह थी कि हवाई हादसा अमेरिकी सी.आई.ए. ने करवाया था जिसमें जिया उल हक की मौत हो गई थी। उसके परिवार का अभी भी जिया उल हक के परिवार से गहरा वास्ता था। ख़ासकर उसके पुत्र इजाज उल हक के साथ। ख़ैर, जॉर्ज और आफिया की इस मुलाकात के कुछ दिन पश्चात ही वे फिर मुहम्मद के अपार्टमेंट में बैठे थे। आज मुहम्मद भी वहीं था।

“देख ले जॉर्ज, अमेरिका ने सऊदी अरब की पवित्र धरती गंदी कर दी।” बात मुहम्मद ने शुरू की।

“मुहम्मद, दूसरा कोई राह भी तो नहीं। यदि अमेरिका वहाँ न जाता तो इराक आगे ही बढ़ता जाता।”

“सब चालें हैं। जो कुछ भी हो रहा है, इस सबका जिम्मेदारी अमेरिका ही है।” आफिया बातचीत में हिस्सा लेते हुए बोली।

“असल में अमेरिका को तो बड़ी मुश्किल से मौका हाथ लगा है, अरब देशों में जाकर अड्डा जमाने का। अमेरिका कब से बहाना तलाश रहा था, वह उसको इराक ने दे दिया। अब नहीं अमेरिका वहाँ से कभी निकलने वाला।” मुहम्मद बोला।

“नहीं, मेरे ख़याल में ऐसा नहीं होगा। अमेरिका ने इराक को कहा है कि वह कुवैत में से निकल जाए। मुझे लगता है कि यह सब अमरिका ने उसको डराने के लिए किया है। इस प्रकार इराक वापस चला जाएगा तो अमेरिका भी अपनी फौजें वापस बुला लेगा।”

“जॉर्ज, ऐसा कभी नहीं होने वाला। अमेरिका ने न कभी पहले मुसलमानों की परवाह की है और न अब करेगा।”

“सिस्टर, सऊदी अरब के किंग के कहने पर ही तो अमेरिका ने फौजें वहाँ एकत्र की हैं। वह भी मुसलमान ही है।”

“जॉर्ज, तू मुझे वही बातें बार बार दोहराने को पता नहीं क्यों उकसाता रहता है कि ये शेख, किंग और डिक्टेटर सब शैतान हैं। जब तक ये जिंदा हैं, तब तक मुसलमानों का भला नहीं हो सकता।”

“जॉर्ज, वैसे तो तू बहुत फड़ें मारता रहता है कि क्रिश्चियन अहिंसा में विश्वास रखते हैं। पर अब बता कि यह सब क्या हो रहा है। अब वहाँ जाकर मुसलमान लोगों का क़त्लेआम करने लगे हो तो अहिंसा का उसूल कहाँ है ?“ मुहम्मद को गुस्सा आ गया लगता था।

“अपने तौर पर तो मैं अब भी खून-खराबे के खिलाफ़ हूँ। पर ये मुसलमान ही हैं जो अमेरिका को ऐसा करने के लिए विवश करते हैं।”

“तुम यूँ क्यों नहीं कहते कि ताकतवर का हर जगह ज़ोर चलता है।”

“यह तो है ही। हम दुनिया की सबसे बड़ी ताकत हैं। जो चाहे करें।” जॉर्ज ने हँसी में कहा। परंतु मुहम्मद इस बात का गुस्सा मान गया। दाँत पीसते हुए वह बोला, “जॉर्ज, अगर एक लफ़्ज भी आगे बोला तो मैं तुझे उठाकर बाहर फेंक दूँगा।”

“हम सुपर पावर हैं, हमें कौन छेड़ सकता है।” जॉर्ज फिर हँसी की रौ में बोला। इससे मुहम्मद को और अधिक गुस्सा आ गया। वह उठता हुआ बोला, “तू अभी मेरे घर से निकल जा।”

“यह घर तेरा ही नहीं, यह मेरी इस लिटिल सिस्टर का भी है। मैं नहीं जाने वाला यहाँ से।” जॉर्ज आफिया की ओर देखता हुआ बोला।

“ठीक है फिर, मैं ही यहाँ से चला जाता हूँ। कुएँ में गिरे तू और तेरा अमेरिका।” मुहम्मद उठकर चल पड़ा। आफिया शांत चित्त उसकी ओर देखती रही। जब वह अपार्टमेंट में से बाहर निकल गया तो आफिया बोली, “एक सच्चे मुसलमान को इतना गुस्सा शोभा नहीं देता।”

“चलो, कोई बात नहीं। वह मेरा जिगरी दोस्त है। जब गुस्सा शांत होगा, खुद ही लौट आएगा।”

इसके पश्चात आफिया और जॉर्ज आगे घटित होने वाली घटनाओं पर चर्चा करते रहे। देर रात जॉर्ज अपने घर चला गया। अगली मुलाकात के समय मुहम्मद और जॉर्ज में सुलह हो गई। उसके बाद काफी कुछ अकल्पित घटित हो गया। अमेरिकी फौजों ने हमला करके इराक को कुवैत में से बाहर धकेल दिया। इतना ही नहीं, अमेरिका ने इराकी फौजों की कमर तोड़कर रख दी। लड़ाई बंद होने के उपरांत इराक को वापस लौट रही इराकी फौजों का सफाया किया गया। जंगबंदी उसूलों की परवाह किए बग़ैर अमेरिकी फौजों ने इराकियों को मारने में कोई झिझक न दिखलाई। सब कुछ टी.वी. पर दिखाया जा रहा था। उस दिन आफिया बहुत ज्यादा चुप थी। जॉर्ज के पास गर्दन झुकाये बैठी थी। मुहम्मद ने चुप्पी तोड़ी।

“जॉर्ज, देख लिया अपने अमेरिका का असली चेहरा ?“

“हाँ, यह बहुत ही बुरा हुआ। मैं इस सबके खिलाफ़ हूँ।”

“इन्होंने कुवैत से इराक वापस लौट रही निहत्थी फौजों पर गोलाबारी करके लाखों सिपाही मार दिए। अभी कहते हैं कि हमने यह सब कुछ विश्व-शांति के लिए किया है।”

“टी.वी. वालों ने तो उस रास्ते का नाम ही डैथ हाई-वे रख दिया है जिधर से इराकी फौजें लौट रही थीं। अंधाधुंध बमबारी करके तकरीबन तीन लाख फौजी मार गिराये गए हैं। यह सब कुछ मनुष्यता के नाम पर धब्बा है। मेरा अब यहाँ रहने को जी नहीं करता।” आफिया बुझे मन से बोली।

“फिर सिस्टर अब किधर जाओगी ? क्या पाकिस्तान लौट जाने का इरादा है ?“

“नहीं जॉर्ज, वापस तो मैं नहीं जाऊँगी, पर मैंने किसी दसरे शहर की ओर जाने का मन बना लिया हैं।”

“दूसरा शहर कौन-सा ?“

“पिछले महीने मैं मैसाचूसस इंस्टीच्यूट आफ टेक्नोलॉजी में दाखि़ले के लिए अप्लाई किया था। वहाँ मुझे दाखि़ले के साथ साथ मुझे तो स्कॉलरशिप भी मिल गई है।”

“अच्छा तू एम.आई.टी. की बात कर रही है। पहले तुमने इस बात की भनक ही नहीं पड़ने दी। पर तुम्हें इस तरह यहाँ से नहीं जाना चाहिए।”

“नहीं जॉर्ज, मुझे अब यहाँ नहीं रहना।” आफिया वैसे ही गर्दन झुकाये बोली।

“सिस्टर, ऐसा न कर। तेरे बिना हमारा दिल नहीं लगेगा।” जॉर्ज ने उसको झिंझोड़ा। वास्तव में वह आफिया को सगी बहन से भी अधिक प्यार करता था।

“मैं फै़सला कर चुकी हूँ।”

“मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा।” जॉर्ज का मोह बोला, पर आफिया ने उसकी बात की ओर ध्यान नहीं दिया।

अगले दिन उनके बीच फिर बात हुई तो आफिया ने अपना यहाँ से जाने का इरादा दोहराया। जॉर्ज ने उसको यहीं रुक जाने के लिए कहा। काफी देर उनके बीच बहस चलती रही।

“जो चाहे कर, पर आफिया तू यहाँ से न जा।” जॉर्ज अपनी बात पर अड़ा रहा। आफिया कुछ पल उसके चेहरे की ओर देखती रही और फिर बोली, “जॉर्ज, तू मुझे इतने अपनेपन से क्यों रोक रहा है ?“

“क्योंकि मैं तुम्हें रियल सिस्टर के तौर पर प्यार करता हूँ।”

“वह तो मैं समझती हूँ पर...।” आगे आफिया ने बात बीच में ही छोड़ दी।

“पर क्या ?“

“तू मुझे यहाँ रखने के लिए क्या कर सकता है ?“

“कुछ भी, जिससे तुझे खुशी मिले।”

“पक्की बात है।” आफिया ने जॉर्ज के चेहरे पर निगाहें गड़ा दीं।

“हाँ-हाँ, मैं अपनी लिटिल सिस्टर के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।”

“तो फिर ऐसा कर।”

“बता।”

“तू क्रिश्चियन धर्म छोड़कर मुसलमान बन जा।”

उसकी बात सुनकर जॉर्ज के मुँह पर ताला लग गया और वह अंदर तक हिल उठा। उसको मुहम्मद ने कई बार बताया था कि यदि कोई मुसलमान किसी अन्य धर्म के इन्सान को मुस्लिम धर्म में ले आए तो उससे बड़ा पुण्य का कार्य कोई हो ही नहीं सकता। मुहम्मद के साथ वह बहुत अधिक खुला हुआ था इसी कारण मुहम्मद उसके साथ हर बात कर लेता था। पर धर्म बदलने के लिए उसने कभी नहीं कहा था। परंतु आज वही बात आफिया के मुँह से सुनकर वह हैरान रह गया। वह आफिया की बात सुनकर लगे सदमे में से बाहर आया तो उसने ध्यान से आफिया की ओर देखा। वह मन ही मन सोचने लगा, ‘यह जो दिखाई देती है, वह यह नहीं है। यह असल में कुछ और ही है। इसको किसी की भावनाओं की परवाह नहीं है। इसको सिर्फ़ अपने धर्म से प्यार है। दूसरी कोई भी बात इसके लिए मायने नहीं रखती। शायद इसका अपना सगा भाई मुहम्मद भी इसको अच्छी तरह नहीं जानता।’ अपने आप से बातें करता जॉर्ज दरवाज़ा खोलकर घर से बाहर निकल गया।

(जारी…)
 
आफिया, मैसाचूसस स्टेट के लोगन इंटरनेशनल एअरपोर्ट बॉस्टन पर उतरी। वहाँ से वह टैक्सी लेकर मैसाचूसस इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी अर्थात एम.आई.टी. की ओर चल पड़ी। टैक्सी बॉस्टन शहर की सड़कों पर दौड़े जा रही थी और आफिया अपने ही ध्यान में गहरी डूबी हुई थी। उसको पहली नज़र में ही बॉस्टन शहर भा गया। उसको बॉस्टन शहर बहुत सुंदर लगा। पता ही नही लगा कि टैक्सी कब यूनिवर्सिटी के नज़दीकी होटल में जा रुकी। टैक्सी ड्राइवर के बुलाने पर आफिया विचारों की गुंजल से बाहर निकली। किराया चुकता करके उसने सामान उठा लिया। होटल में कमरा लेकर सामान वगैरह वहाँ टिकाकर वह यूनिवर्सिटी की ओर चल पड़ी। अंदर जाते ही उसने देखा कि हर तरफ़ विद्यार्थी झुंडों में घूम रहे थे। उसने इधर-उधर नज़रें दौड़ाईं। उसको कोई भी लड़की पंजाबी पहरावे में न दिखाई दी जबकि उसने स्वयं सलवार-कमीज़ पहन रखी थी और सिर पर चुन्नी ले रखी थी। उसको अपना आप पराया-सा न लगा। अपितु उसको अपनी भिन्नता पर गर्व अनुभव हुआ। दफ़्तर जाकर उसने दाखि़ले वगैरह का शेष बचा काम निपटाया। फिर वह नज़दीकी लड़कियों के हॉस्टल मकार्मिक हॉल चली गई। उम्मीद के उलट उसको थोड़ा-सा पेपर वर्क पूरा करने के उपरांत ही कमरा मिल गया। दफ़्तर से कमरे की चाबी लेकर वह लिफ्ट से कमरे में पहुँची। ऊँची-लम्बी इमारत की बीसवीं मंज़िल पर उसका कमरा था। कमरा खोलकर वह अंदर आ गई और पिछली खिड़की में से उसने नीचे झांका। उसका मन बागबाग हो उठा। बाहर हरियाली ही हरियाली दिखाई दे रही थी और चार्सल दरिया, हॉस्टल की इमारत के साथ ही लगकर बहता था। काफी देर खड़ी वह कुदरत के नज़ारे का आनंद लेती रही। फिर होटल जाकर अपना सामान उठा लाई।

अगले दिन से ही वह पढ़ाई में डूब गई। उसके घर वाले चाहते थे कि वह डॉक्टर बने, पर उसका विचार कुछ और ही था। पहले वह पुलिटिकल साइंस पढ़ना चाहती थी। घरवालों के अधिक ज़ोर देने पर उसने साइंस और मैथ की कक्षाएँ ले लीं। आफिया हालांकि छोटे कद और हल्के शरीर की दुर्बल-सी लड़की थी, पर उसका चेहरा-मोहरा बहुत प्रभावशाली था। उसका समूचा व्यक्तित्व दूसरे को मोह लेता था। अपने काम में मस्त रहने और पढ़ाई में बहुत ही होशियार होने के कारण शीघ्र ही अपने प्रोफेसरों की चहेती बन गई। हॉस्टल में थोड़ी जान-पहचान बढ़ने के बाद उसने मुसलमान लड़कियों को जोड़ने का काम प्रारंभ कर दिया। यहाँ दूसरे धर्मों की लड़कियाँ अधिक थीं। पर वह उनसे दूरी बनाकर रखती थी। विशेष तौर पर यहूदी लड़कियों से तो वह बिना मतलब के बातचीत भी नहीं करती थी। आहिस्ता आहिस्ता उसने वहाँ अपना एक ग्रुप बना लिया। वह मुसलमान लड़कियों के साथ धर्म पर चर्चा करने लगी। परंतु अधिकांश लड़कियों का धर्म से अधिक सरोकार नहीं था। वे तो अमेरिकन ज़िन्दगी में घुलमिल गई प्रतीत होती थीं। आफिया ने उन्हें धर्म की शिक्षा का वास्ता दे देकर अपने हिसाब से सीधे राह पर लाने का प्रयत्न शुरू कर दिया। इसमें वह काफी हद तक सफल भी रही। फिर वह अपने ग्रुप को संग लेकर साझे काम करने लगी। जैसे कि कालेज कैंपस की सफाई वगैरह। इसके अलावा, वह हर सप्ताह लगभग चालीस घंटे बिना किसी वेतन के कालेज के साझे कामों में लगाती थी। अवसर मिलते ही वह गरीब इलाकों के स्कूलों में जाकर बच्चों के लिए मुफ्त साइंस फेयर वगैरह लगाने लगी। इस प्रकार वह शीघ्र ही सभी की नज़रों में आ गई। कालेज में उसका अक्स एक अच्छी होशियार और समाजसेवी छात्रा का बन गया। परंतु निजी तौर पर वह हमेशा धर्म के साथ जुड़े कामों को पहल देती। वह जब अपने ग्रुप की लड़कियों के साथ बैठकें करती तो हमेशा इस बात पर ज़ोर देती कि गै़र-मुसलमानों से दूर रहा जाए। उनके साथ दोस्ती न की जाए। पर उनके साथ व्यवहार करते समय बहुत ही प्रेमपूर्वक मीठी बोली में बात करने का दिखावा किया जाए। उसके समाजसेवा वाले कामों के कारण उसको दो बार ईनाम मिला। वैसे तो पढ़ाई के हर क्षेत्र में ही वह बहुत अच्छी थी, पर कंप्युटर में तो उसका इतना नाम बन गया कि कभी कभी तो कई प्रोफेसर भी उसकी मदद ले लेते। अब तक मुस्लिम स्टुडेंट्स एसोसिएशन जिसको कि आम तौर पर एम.एस.ए. कहा जाता था, में वह काफी आगे बढ़ गई थी। वह एम.एस.ए. के माध्यम से मुसलमान छात्रों के हकों के बारे में सभी को जागरूक कर रही थी। कालेज अथॉरिटी के साथ मिलकर वह मुसलमान विद्यार्थियों की ज़रूरतें भी पूरी करने के लिए ज़ोर डालती रही थी। यहाँ तक कि कालेज कैंपस के छोटे रेस्टोरेंटों में उसने हलाल मीट की प्रयोग शुरू करवाने के लिए अथॉरिटी को मना लिया ताकि मुसलमान विद्यार्थी अपने धार्मिक अकीदे के अनुसार हलाल मीट की इस्तेमाल कर सकें। इसके अतिरिक्त उसने हॉस्टलों में पृथक कमरों की सुविधा मुहैया करवा ली जहाँ कि मुसलमान विद्यार्थी नमाज़ अदा कर सकें। जैसे जैसे वह एम.एस.ए. के माध्यम से मुसलमान विद्यार्थियों की ज़रूरतों के लिए सक्रिय हो रही थी, वैसे वैसे उसका नाम प्रसिद्ध होता जा रहा था। मुसलमान विद्यार्थियों में उसको बहुत इज्ज़त के साथ देखा जाता था। कट्टर धार्मिक लड़के उसको ट्रू सिस्टर कहकर बुलाने लग पड़े थे। इसी दौरान उसकी मुलाकात सुहेल लैहर से हुई। सुहेल के माता पिता इंडिया से थे, पर वो जिम्बावे में जन्मा था। पेशे के तौर पर वह इंजीनियर था। सुहेल की मार्फ़त वह एम.एस.ए. के अंदरूनी क्षेत्र में आ गई। जब उसने एम.एस.ए. के भीतरी विद्यार्थियों की सोच सुनी तो वह बड़ी प्रसन्न हुई। उसको लगा कि यही असली जगह है जहाँ रहकर वह अपने धर्म की अधिक से अधिक सेवा कर सकती है। असल में, यह ग्रुप एम.एस.ए. की अगली कतार की लीडरशिप था जो कि आम तौर पर परदे के पीछे रहता था। एम.एस.ए. की अगली बैठक में अपनी बारी आने पर वह बोलने लगी, “हमें यहाँ इस्लाम की अधिक से अधिक शिक्षा देनी चाहिए। क्योंकि यही एक ढंग है अल्लाह की रहमतों को हासिल करने का। हमें सभी विद्यार्थियों के लिए जुम्मे की नमाज़ कालेज कैंपस में पढ़ने के लिए ज़रूरी कर देनी चाहिए। अपने आसपास के लोगों का विश्वास जीतकर उनको इस्लाम धर्म में लाने के लिए यत्न करना चाहिए। इंशा अल्ला ज़रा सोचो कि वो दिन कितना किस्मतवाला होगा जब अमेरिका में ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया में इस्लाम का झंडा फहरेगा। इसके अलावा आज और बहुत कुछ करने वाला है...।” उसने अपनी बात रोककर श्रोताओं की ओर देखा। सभी बड़े ध्यान से उसकी बात सुन रहे थे। ज़रा रुक कर वह फिर बोलने लगी, “आज संसार में बहुत कुछ घटित हो रहा है। जगह जगह मुसलमानों पर अत्याचार हो रहे हैं। यह क्यों हो रहा है। क्योंकि हम मुसलमान अपनी जिम्मेदारी भूल गए हैं। हम भूल गए हैं कि हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है - जिहाद। हरेक को आज दुनिया के अलग अलग हिस्सों में चल रहे जिहाद में अपनी हैसियत के अनुसार हिस्सा लेना चाहिए। असली मुसलमान वो हैं जो फ्रंट पर लड़ाई में हिस्सा ले रहे हैं। पर फिर भी हम उतना तो कर ही सकते हैं जो उनके काम में मदद बन सके। उदाहरण के लिए हम जिहाद में शहीद हो रहे हमारे भाइयों के बच्चों और उनकी विधवाओं को संभाल सकते हैं। उसके लिए चैरिटी संस्था बनाकर फंड एकत्र करने की आवश्यकता है। हमें अधिक से अधिक चैरिटी एकत्र करनी चाहिए।”

जब तक उसने अपना भाषण समाप्त किया, तब तक वह एम.एस.ए. की अगली पंक्ति के लीडरों की नज़रों में आ चुकी थी। सभी उससे प्रभावित हुए थे। वे समझ गए कि जिस लड़की की वह एक अरसे से प्रतीक्षा कर रहे थे, वह आज उन्हें मिल गई है। मीटिंग ख़त्म होने पर वह बाहर निकली और सुहेल के साथ कार में बैठ गई। सुहेल ने कार आगे बढ़ाई तो आफिया ने बात प्रारंभ की, “सुहेल वो एक कोने में बैठी गोरी अमेरिकन लड़की कौन थी ?“

“उसका नाम मार्लेन अर्ल है।”

“मतलब वह अमेरिकन है ?“

“हाँ है तो अमेरिकन ही, पर...।“

“पर क्या ?“

“उसने धर्म परिवर्तन करके इस्लाम धर्म अपना लिया है। अब वह पक्की मुसलमान है।”

“किसके प्रभाव से उसने मुस्लिम धर्म अपनाया है ?“

“इस बात को छोड़ो, पर तुम्हें बताऊँ कि उसका पति बसम कुंज बहुत बड़ा जिहादी है। उसने कई जिहादों में लड़ाई लड़ चुका है।”

“अच्छा !“

इसके बाद आफिया चुप हो गई। उसके मन में आ रहा था कि वह कितना किस्मत वाला होगा जिसने मार्लेन का धर्म परिवर्तन करवाया होगा। दूसरा उसको मार्लेन पर इस बात से भी गर्व महसूस हुआ कि उसका पति जिहादी है और फ्रंट पर बंदूक उठाकर लड़ाई में हिस्सा लेता है।

“चुप क्यों हो गईं ?“ सुहेल ने आफिया को ख़यालों में गुम देखकर उसकी चुप्पी तोड़ी।

“नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं। मैं तो सोच रही थी...।”

“क्या सोच रही थी तुम ?“

“मैं तो यह सोच रही थी कि...।”

“अच्छा सुहेल, एक बात और बता।” आफिया ने पहली बात बीच में ही छोड़ते हुए बात बदली।

“हाँ हाँ पूछ।“

“वो जो तेरे संग बैठा था, वह कौन है ? जो पूरी मीटिंग के दौरान बिल्कुल ही नहीं बोला।”

“उसका नाम...।” सुहेल ने बात बीच में ही छोड़ते हुए गौर से आफिया की ओर देखा। पल भर रुककर वह फिर बोला, “उसका नाम रम्जी यूसफ है। वह अल कीफा का कभी न थकने वाला एक बड़ा वर्कर है।”

“अल कीफा ?“ आफिया ने अल कीफा का नाम सुना तो था, पर उसके विषय में पूरी जानकारी नहीं थी।

“तुम्हें अल कीफा के बारे में बता ही देता हूँ।” सुहेल ने एक बार फिर ध्यान से आफिया की ओर देखा और मन में सोचा कि यह लड़की हमारे कॉज़ के लिए बहुत ही वफ़ादार साबित होगी। और इसके साथ हर बात साझी कर लेनी चाहिए।

“अल कीफा अपने ही बहन-भाइयों का संगठन है। यह बातों में नहीं, बल्कि एक्शन में विश्वास रखती है। अपनी सभी मस्जिदों और जिहादी सर्किलों में इसका बहुत ज़ोर है। पर ये खुलकर सामने नहीं आता। इसका नेता गुलबदन हेकमत्यार है।“

“जो अफ़गानिस्तान का वार लोर्ड है ?“ आफिया बीच में ही बोल उठी।

“हाँ वही। शुरुआत उसने की थी। पर अब यह सब तरफ फैल चुकी है। मुस्लिम समाज इसको बहुत ज्यादा मान देता है और इसको आर्थिक मदद भी बहुत मिलती है। परंतु कई बार यही आर्थिक सामर्थ्य झगड़े का कारण भी बन जाता है। तुमने पिछले दिनों मुस्तफा शलेबी के क़त्ल के बारे में सुना ही होगा ?“

“हाँ, पता है मुझे। वही जिसका कोई भेद ही नहीं खुल सका।”

“वह क़त्ल अल कीफा के पास पड़े मिलियन डॉलर का फंड लेकर ही हुआ था। अल कीफा के ही एक मैंबर को शक हो गया कि शलेबी पैसे की हेराफेरी करता है। पर मैं ऐसा नहीं मानता। शलेबी को मारकर किसी ने सही नहीं किया। उस जैसा धार्मिक और अकीदे वाला कोई हो ही नहीं सकता।”

“वह कैसे ?“ आफिया को जिज्ञासा हुई।

“उसने अल कीफा के लिए या समझ लो कि समूचे जिहाद के लिए बहुत काम किया है। वही शेख उम्र अब्दुल रहमान को अमेरिका लाने में कामयाब हुआ था।”

“शेख उम्र वही है न जो कि मिस्र से है ? जो बचपन से अंधा है ?“

“हाँ वही। वह बहुत बड़ा धार्मिक फिलासफ़र है। अमेरिका को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं है। पर वह मिस्र के कट्टर जिहादियों में से एक है। सारे मुस्लिम समाज में उसका रुतबा बहुत ऊँचा है। कोई भी उसकी बात का विरोध नहीं कर सकता। काश ! तू कभी उसको सुने तो...।”

“मुझे उसके फ़ल्सफ़े का पता है।” आफिया को याद आया कि पिछले दिनों ही उसको किसी ने शेख उम्र की वीडियो दिखाई थी। वीडियो में सुने शेख के शब्द उसके मन में घूमने लगे, “हर मुसलमान का एक ही धर्म है कि गै़र मुसलमानों को ख़त्म कर दो। दुनिया पर कोई भी ऐसा न रहे जो मुसलमान न हो। लोगों को समझा-बुझाकर मुसलमान बनाने से बेहतर यह है कि उनका खातमा करो। जितनी जल्दी गै़र मुसलमानों का सफाया होगा, उतनी जल्दी ही हम दुनिया पर इस्लाम का झंडा फहरा सकेंगे। इसके अलावा हर मुसलमान का यह भी धार्मिक फर्ज़ है कि वो कई शादियाँ करके अधिक से अधिक बच्चे पैदा करे ताकि हमारी गिनती काफ़िरों से अधिक हो जाए।”

“तू मेरी बात सुन रही है न ?“

“हाँ-हाँ, मेरा ध्यान तेरी बात की ओर ही है।” आफिया ने ख़यालों में से निकलते हुए सुहेल की बात का हुंकारा भरा।

“हमे शेख उम्र जैसे धार्मिक रहनुमा की ज़रूरत है।”

“पर...।” आफिया ने उसकी बात काटी।

“हाँ, बता ?“

“पर, यह रम्जी यूसफ फिर आज एम.एस.ए. की मीटिंग में क्या कर रहा था ?“

“असल में सभी बातों का तुम्हें आहिस्ता आहिस्ता पता चल जाएगा। कई मैंबर दोनों तरफ काम करते हैं। जैसे कि मार्लेन का पति बस्म कुंज है। वह दोनों तरफ का मैंबर है।“

“आजकल वह कहाँ है ? क्योंकि वह आज मार्लेन के साथ तो कहीं दिखा नहीं ?“ बात फिर दूसरी तरफ चली गई।

“उसकी भी लम्बी कहानी है। वह लिबनान का जन्मा पला है। वह वहीं से किसी धार्मिक संगठन से वजीफा लेकर यहाँ पढ़ने आया था। बॉस्टन यूनिवर्सिटी से उसने ग्रेज्युएशन की। यहीं वह जिहादी लीडरों के सम्पर्क में आया। फिर वह अल कीफा का सरगरम मैंबर बन गया। उन्हीं दिनों उसने मार्लेन से शादी की और उनके एक बच्ची हो गई। फिर वे दोनों पाकिस्तान चले गए। वहीं से बस्म तो जिहाद में लड़ने की खातिर बार्डर पार करके अफ़गानिस्तान चला गया और मार्लेन अपनी बच्ची के साथ पेशावर के उस इलाके में रही जहाँ कि सभी जिहादियों के परिवार रहते हैं। वहीं बस्म लड़ाई के दौरान सख़्त ज़ख्मी हो गया और उसको सर्जरी के लिए यहाँ अमेरिका वापस आना पड़ा। मार्लेन और बस्म यहाँ आकर कुछ देर रहे। जब बस्म पूरी तरह ठीक हो गया तो वह फिर जिहाद की लड़ाई में हिस्सा लेने लिबनान पहुँच गया। वहाँ से वह आगे बास्निया चला गया। आजकल वह बास्निया में ही लड़ रहा है।“

तभी आफिया का हॉस्टल आ गया था। बातों का सिलसिला बंद हो गया। सुहेल आफिया को हॉस्टल पर उतार कर वापस चला गया। आफिया अपने कमरे की ओर जाती हुई मार्लेन और बस्म कुंज के बारे में सोचे जा रही थी। उसको वह एक सच्चा मुसलमान जोड़ा लगा जो कि पूर्णरूप में जिहाद को समर्पित था। उसको मार्लेन अच्छी लगने लगी। देर रात तक भी वह उनके बारे में सोचती रही। अगले कुछ दिनों में ही उसने मार्लेन के साथ अच्छी दोस्ती गांठ ली।

आफिया की पढ़ाई के विषय में किसी कोई शंका नहीं थी। सब जानते थे कि वह इतनी होशियार है कि वह कोई भी विषय चुन ले, पर हमेशा पहले नंबर पर आएगी। इन्हीं दिनों में उसने एक पर्चा लिखा जिसका नाम था - ‘इस्लामीजेशन इन पाकिस्तान एंड इट्स इफेक्ट्स ऑन वुमन।’ इस पर्चे के कारण उसको एम.आई.टी. ने कैरल विल्सन अवार्ड से सम्मानित किया जिसमें पाँच हज़ार डॉलर का नकद ईनाम शामिल था। इस ईनाम से खुश हुई आफिया 1992 का ग्रीष्म अवकाश बिताने के लिए पाकिस्तान चली गई। उन्हीं दिनों पाकिस्तान में हदूद लॉ के बारे में शोर मचा हुआ था। ह्युमन राइट्स जैसे संगठनों का कहना था कि यह लॉ न सिर्फ़ औरत की आज़ादी को कुचल रहा है अपितु इसने तो औरत जाति को भी कुचल कर रख दिया है। इस कानून को घड़ने में मुफ़्ती मुहम्मद तकी उस्मानी ने बड़ी मेहनत की थी। मुफ्ती उस्मानी आफिया के परिवार का धार्मिक रहनुमा था। इस कारण आफिया को उन्हीं दिनों चल रहे शोर-शराबे में दिलचस्पी हो गई। उसने मुफ्ती साहिब का पक्ष लेने का निर्णय ले लिया। वह यह पक्ष इस कारण नहीं ले रही थी कि इसको घड़ने वाला मुफ्ती उस्मानी था बल्कि इस कारण कि उसकी अपनी सोच थी कि इस्लाम ने जो भी पाबंदियाँ स्त्रियों पर लगाई हैं, वे मुसलमान स्त्री के लिए सही हैं। इनको मानते हुए ही वह अपने धर्म का सही पालन कर सकेगी। इस अरसे के दौरान वह जिस किसी भी बड़े लीडर को मिली, हर कोई उसके विचारों से प्रभावित हुआ। क्योंकि एक औरत होकर वह औरतों की ओर से चलाए जा रहे संघर्ष के उलट थी। उसके शुभचिंतकों में पहले पाकिस्तानी डिक्टेटर जिया उल हक का पुत्र इयाज़ उल हक भी था। उस वक़्त पाकिस्तान की राजनीति में भी फेरबदल हो चुका था। बेनज़ीर भुट्टो की जगह नवाज शरीफ की पार्टी सत्ता में आ चुकी थी और वह मुल्क का प्रधान मंत्री था। सरकार के बदल जाने से और चाहे सब कुछ बदल गया हो, पर एक बात नहीं बदली थी। वह थी पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी आई.एस.आई. का एजेंडा। इसके तत्कालीन प्रमुख जावेद नासिर का विचार था कि पाकिस्तान को दुनिया के किसी भी हिस्से में चल रहे जिहाद की अधिक से अधिक मदद करनी चाहिए। इसी एजेंडे के अधीन वह बास्निया में चल रहे गृह युद्ध में जिहादियों की मदद कर रहा था। इसके अलावा यह एजेंसी फिलिपीन्ज़, रशिया के कई हिस्सों में चल रहे जिहाद और चीने के सिनज्यांग प्रांत में चल रहे संघर्ष में भी ऊपरोक्त नीति अपना रही थी। हर जिहाद में अरब अफ़गानों के जत्थे लड़ रहे थे। ये वही लोग थे जो अफ़गानिस्तान की जंग के समय अमेरिका की ओर से रशिया के विरुद्ध लड़े थे। जब वहाँ लड़ाई ख़त्म हो गई तो इन्हीं जत्थों के लीडर अपने लड़ाकों को दुनिया के अन्य क्षेत्रों की ओर ले गए। इन्हीं लीडरों में से सबसे अधिक उभरकर बाहर आ रहा लीडर उसामा बिन लादिन था। इसके अतिरिक्त बलोचिस्तान का एक बड़ा और बहुत ही अमीर परिवार जिहाद में मुख्य भूमिका निभा रहा था। उसको अल बलोची के नाम से जाना जाता था। यह सारा परिवार काफी पहले पाकिस्तान से कुवैत चला गया था। परंत 1990 के इर्द गिर्द यह पुनः पाकिस्तान में लौट आया और आजकल जिहाद में बढ़-चढ़कर भाग ले रहा था। इस परिवार के प्रमुख का नाम खालिद शेख मुहम्मद था जिसका सभी उसके निक नाम अर्थात के.एस.एम. के रूप में जानते थे। रम्जी यूसफ इसी के.एस.एम. का भतीजा था।

खै़र, अपनी छुट्टियाँ बिताकर आफिया वापस अमेरिका आ गई। जब वह लोगन इंटरनेशनल एअरपोर्ट पर उतर कर कस्टम वगैरह की क्लीयरेंस के लिए लाइन में लगी हुई थी तो उसने देखा कि साथ वाली लाइन में खड़ा कोई व्यक्ति उसकी ओर बड़े गौर से देख रहा था। उसने दिमाग पर ज़ोर डालकर याद करने की कोशिश की कि इस आदमी को उसने पहले कहाँ देखा था, पर उसको कुछ याद न आया। वह गर्दन झुकाकर सोचने लगी। फिर उसके दिमाग में अचानक कुछ कौंधा और उसने तुरंत ही साथ वाली लाइन की ओर देखा। तब तक वह व्यक्ति आगे निकल गया था। आफिया मन ही मन बोली, ‘ओह, यह तो रम्जी यूसफ है जिसको उस दिन एम.एस.ए. की मीटिंग में देखा था।’

(जारी…)
 
आफिया, मैसाचूसस स्टेट के लोगन इंटरनेशनल एअरपोर्ट बॉस्टन पर उतरी। वहाँ से वह टैक्सी लेकर मैसाचूसस इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी अर्थात एम.आई.टी. की ओर चल पड़ी। टैक्सी बॉस्टन शहर की सड़कों पर दौड़े जा रही थी और आफिया अपने ही ध्यान में गहरी डूबी हुई थी। उसको पहली नज़र में ही बॉस्टन शहर भा गया। उसको बॉस्टन शहर बहुत सुंदर लगा। पता ही नही लगा कि टैक्सी कब यूनिवर्सिटी के नज़दीकी होटल में जा रुकी। टैक्सी ड्राइवर के बुलाने पर आफिया विचारों की गुंजल से बाहर निकली। किराया चुकता करके उसने सामान उठा लिया। होटल में कमरा लेकर सामान वगैरह वहाँ टिकाकर वह यूनिवर्सिटी की ओर चल पड़ी। अंदर जाते ही उसने देखा कि हर तरफ़ विद्यार्थी झुंडों में घूम रहे थे। उसने इधर-उधर नज़रें दौड़ाईं। उसको कोई भी लड़की पंजाबी पहरावे में न दिखाई दी जबकि उसने स्वयं सलवार-कमीज़ पहन रखी थी और सिर पर चुन्नी ले रखी थी। उसको अपना आप पराया-सा न लगा। अपितु उसको अपनी भिन्नता पर गर्व अनुभव हुआ। दफ़्तर जाकर उसने दाखि़ले वगैरह का शेष बचा काम निपटाया। फिर वह नज़दीकी लड़कियों के हॉस्टल मकार्मिक हॉल चली गई। उम्मीद के उलट उसको थोड़ा-सा पेपर वर्क पूरा करने के उपरांत ही कमरा मिल गया। दफ़्तर से कमरे की चाबी लेकर वह लिफ्ट से कमरे में पहुँची। ऊँची-लम्बी इमारत की बीसवीं मंज़िल पर उसका कमरा था। कमरा खोलकर वह अंदर आ गई और पिछली खिड़की में से उसने नीचे झांका। उसका मन बागबाग हो उठा। बाहर हरियाली ही हरियाली दिखाई दे रही थी और चार्सल दरिया, हॉस्टल की इमारत के साथ ही लगकर बहता था। काफी देर खड़ी वह कुदरत के नज़ारे का आनंद लेती रही। फिर होटल जाकर अपना सामान उठा लाई।

अगले दिन से ही वह पढ़ाई में डूब गई। उसके घर वाले चाहते थे कि वह डॉक्टर बने, पर उसका विचार कुछ और ही था। पहले वह पुलिटिकल साइंस पढ़ना चाहती थी। घरवालों के अधिक ज़ोर देने पर उसने साइंस और मैथ की कक्षाएँ ले लीं। आफिया हालांकि छोटे कद और हल्के शरीर की दुर्बल-सी लड़की थी, पर उसका चेहरा-मोहरा बहुत प्रभावशाली था। उसका समूचा व्यक्तित्व दूसरे को मोह लेता था। अपने काम में मस्त रहने और पढ़ाई में बहुत ही होशियार होने के कारण शीघ्र ही अपने प्रोफेसरों की चहेती बन गई। हॉस्टल में थोड़ी जान-पहचान बढ़ने के बाद उसने मुसलमान लड़कियों को जोड़ने का काम प्रारंभ कर दिया। यहाँ दूसरे धर्मों की लड़कियाँ अधिक थीं। पर वह उनसे दूरी बनाकर रखती थी। विशेष तौर पर यहूदी लड़कियों से तो वह बिना मतलब के बातचीत भी नहीं करती थी। आहिस्ता आहिस्ता उसने वहाँ अपना एक ग्रुप बना लिया। वह मुसलमान लड़कियों के साथ धर्म पर चर्चा करने लगी। परंतु अधिकांश लड़कियों का धर्म से अधिक सरोकार नहीं था। वे तो अमेरिकन ज़िन्दगी में घुलमिल गई प्रतीत होती थीं। आफिया ने उन्हें धर्म की शिक्षा का वास्ता दे देकर अपने हिसाब से सीधे राह पर लाने का प्रयत्न शुरू कर दिया। इसमें वह काफी हद तक सफल भी रही। फिर वह अपने ग्रुप को संग लेकर साझे काम करने लगी। जैसे कि कालेज कैंपस की सफाई वगैरह। इसके अलावा, वह हर सप्ताह लगभग चालीस घंटे बिना किसी वेतन के कालेज के साझे कामों में लगाती थी। अवसर मिलते ही वह गरीब इलाकों के स्कूलों में जाकर बच्चों के लिए मुफ्त साइंस फेयर वगैरह लगाने लगी। इस प्रकार वह शीघ्र ही सभी की नज़रों में आ गई। कालेज में उसका अक्स एक अच्छी होशियार और समाजसेवी छात्रा का बन गया। परंतु निजी तौर पर वह हमेशा धर्म के साथ जुड़े कामों को पहल देती। वह जब अपने ग्रुप की लड़कियों के साथ बैठकें करती तो हमेशा इस बात पर ज़ोर देती कि गै़र-मुसलमानों से दूर रहा जाए। उनके साथ दोस्ती न की जाए। पर उनके साथ व्यवहार करते समय बहुत ही प्रेमपूर्वक मीठी बोली में बात करने का दिखावा किया जाए। उसके समाजसेवा वाले कामों के कारण उसको दो बार ईनाम मिला। वैसे तो पढ़ाई के हर क्षेत्र में ही वह बहुत अच्छी थी, पर कंप्युटर में तो उसका इतना नाम बन गया कि कभी कभी तो कई प्रोफेसर भी उसकी मदद ले लेते। अब तक मुस्लिम स्टुडेंट्स एसोसिएशन जिसको कि आम तौर पर एम.एस.ए. कहा जाता था, में वह काफी आगे बढ़ गई थी। वह एम.एस.ए. के माध्यम से मुसलमान छात्रों के हकों के बारे में सभी को जागरूक कर रही थी। कालेज अथॉरिटी के साथ मिलकर वह मुसलमान विद्यार्थियों की ज़रूरतें भी पूरी करने के लिए ज़ोर डालती रही थी। यहाँ तक कि कालेज कैंपस के छोटे रेस्टोरेंटों में उसने हलाल मीट की प्रयोग शुरू करवाने के लिए अथॉरिटी को मना लिया ताकि मुसलमान विद्यार्थी अपने धार्मिक अकीदे के अनुसार हलाल मीट की इस्तेमाल कर सकें। इसके अतिरिक्त उसने हॉस्टलों में पृथक कमरों की सुविधा मुहैया करवा ली जहाँ कि मुसलमान विद्यार्थी नमाज़ अदा कर सकें। जैसे जैसे वह एम.एस.ए. के माध्यम से मुसलमान विद्यार्थियों की ज़रूरतों के लिए सक्रिय हो रही थी, वैसे वैसे उसका नाम प्रसिद्ध होता जा रहा था। मुसलमान विद्यार्थियों में उसको बहुत इज्ज़त के साथ देखा जाता था। कट्टर धार्मिक लड़के उसको ट्रू सिस्टर कहकर बुलाने लग पड़े थे। इसी दौरान उसकी मुलाकात सुहेल लैहर से हुई। सुहेल के माता पिता इंडिया से थे, पर वो जिम्बावे में जन्मा था। पेशे के तौर पर वह इंजीनियर था। सुहेल की मार्फ़त वह एम.एस.ए. के अंदरूनी क्षेत्र में आ गई। जब उसने एम.एस.ए. के भीतरी विद्यार्थियों की सोच सुनी तो वह बड़ी प्रसन्न हुई। उसको लगा कि यही असली जगह है जहाँ रहकर वह अपने धर्म की अधिक से अधिक सेवा कर सकती है। असल में, यह ग्रुप एम.एस.ए. की अगली कतार की लीडरशिप था जो कि आम तौर पर परदे के पीछे रहता था। एम.एस.ए. की अगली बैठक में अपनी बारी आने पर वह बोलने लगी, “हमें यहाँ इस्लाम की अधिक से अधिक शिक्षा देनी चाहिए। क्योंकि यही एक ढंग है अल्लाह की रहमतों को हासिल करने का। हमें सभी विद्यार्थियों के लिए जुम्मे की नमाज़ कालेज कैंपस में पढ़ने के लिए ज़रूरी कर देनी चाहिए। अपने आसपास के लोगों का विश्वास जीतकर उनको इस्लाम धर्म में लाने के लिए यत्न करना चाहिए। इंशा अल्ला ज़रा सोचो कि वो दिन कितना किस्मतवाला होगा जब अमेरिका में ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया में इस्लाम का झंडा फहरेगा। इसके अलावा आज और बहुत कुछ करने वाला है...।” उसने अपनी बात रोककर श्रोताओं की ओर देखा। सभी बड़े ध्यान से उसकी बात सुन रहे थे। ज़रा रुक कर वह फिर बोलने लगी, “आज संसार में बहुत कुछ घटित हो रहा है। जगह जगह मुसलमानों पर अत्याचार हो रहे हैं। यह क्यों हो रहा है। क्योंकि हम मुसलमान अपनी जिम्मेदारी भूल गए हैं। हम भूल गए हैं कि हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है - जिहाद। हरेक को आज दुनिया के अलग अलग हिस्सों में चल रहे जिहाद में अपनी हैसियत के अनुसार हिस्सा लेना चाहिए। असली मुसलमान वो हैं जो फ्रंट पर लड़ाई में हिस्सा ले रहे हैं। पर फिर भी हम उतना तो कर ही सकते हैं जो उनके काम में मदद बन सके। उदाहरण के लिए हम जिहाद में शहीद हो रहे हमारे भाइयों के बच्चों और उनकी विधवाओं को संभाल सकते हैं। उसके लिए चैरिटी संस्था बनाकर फंड एकत्र करने की आवश्यकता है। हमें अधिक से अधिक चैरिटी एकत्र करनी चाहिए।”

जब तक उसने अपना भाषण समाप्त किया, तब तक वह एम.एस.ए. की अगली पंक्ति के लीडरों की नज़रों में आ चुकी थी। सभी उससे प्रभावित हुए थे। वे समझ गए कि जिस लड़की की वह एक अरसे से प्रतीक्षा कर रहे थे, वह आज उन्हें मिल गई है। मीटिंग ख़त्म होने पर वह बाहर निकली और सुहेल के साथ कार में बैठ गई। सुहेल ने कार आगे बढ़ाई तो आफिया ने बात प्रारंभ की, “सुहेल वो एक कोने में बैठी गोरी अमेरिकन लड़की कौन थी ?“

“उसका नाम मार्लेन अर्ल है।”

“मतलब वह अमेरिकन है ?“

“हाँ है तो अमेरिकन ही, पर...।“

“पर क्या ?“

“उसने धर्म परिवर्तन करके इस्लाम धर्म अपना लिया है। अब वह पक्की मुसलमान है।”

“किसके प्रभाव से उसने मुस्लिम धर्म अपनाया है ?“

“इस बात को छोड़ो, पर तुम्हें बताऊँ कि उसका पति बसम कुंज बहुत बड़ा जिहादी है। उसने कई जिहादों में लड़ाई लड़ चुका है।”

“अच्छा !“

इसके बाद आफिया चुप हो गई। उसके मन में आ रहा था कि वह कितना किस्मत वाला होगा जिसने मार्लेन का धर्म परिवर्तन करवाया होगा। दूसरा उसको मार्लेन पर इस बात से भी गर्व महसूस हुआ कि उसका पति जिहादी है और फ्रंट पर बंदूक उठाकर लड़ाई में हिस्सा लेता है।

“चुप क्यों हो गईं ?“ सुहेल ने आफिया को ख़यालों में गुम देखकर उसकी चुप्पी तोड़ी।

“नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं। मैं तो सोच रही थी...।”

“क्या सोच रही थी तुम ?“

“मैं तो यह सोच रही थी कि...।”

“अच्छा सुहेल, एक बात और बता।” आफिया ने पहली बात बीच में ही छोड़ते हुए बात बदली।

“हाँ हाँ पूछ।“

“वो जो तेरे संग बैठा था, वह कौन है ? जो पूरी मीटिंग के दौरान बिल्कुल ही नहीं बोला।”

“उसका नाम...।” सुहेल ने बात बीच में ही छोड़ते हुए गौर से आफिया की ओर देखा। पल भर रुककर वह फिर बोला, “उसका नाम रम्जी यूसफ है। वह अल कीफा का कभी न थकने वाला एक बड़ा वर्कर है।”

“अल कीफा ?“ आफिया ने अल कीफा का नाम सुना तो था, पर उसके विषय में पूरी जानकारी नहीं थी।

“तुम्हें अल कीफा के बारे में बता ही देता हूँ।” सुहेल ने एक बार फिर ध्यान से आफिया की ओर देखा और मन में सोचा कि यह लड़की हमारे कॉज़ के लिए बहुत ही वफ़ादार साबित होगी। और इसके साथ हर बात साझी कर लेनी चाहिए।

“अल कीफा अपने ही बहन-भाइयों का संगठन है। यह बातों में नहीं, बल्कि एक्शन में विश्वास रखती है। अपनी सभी मस्जिदों और जिहादी सर्किलों में इसका बहुत ज़ोर है। पर ये खुलकर सामने नहीं आता। इसका नेता गुलबदन हेकमत्यार है।“

“जो अफ़गानिस्तान का वार लोर्ड है ?“ आफिया बीच में ही बोल उठी।

“हाँ वही। शुरुआत उसने की थी। पर अब यह सब तरफ फैल चुकी है। मुस्लिम समाज इसको बहुत ज्यादा मान देता है और इसको आर्थिक मदद भी बहुत मिलती है। परंतु कई बार यही आर्थिक सामर्थ्य झगड़े का कारण भी बन जाता है। तुमने पिछले दिनों मुस्तफा शलेबी के क़त्ल के बारे में सुना ही होगा ?“

“हाँ, पता है मुझे। वही जिसका कोई भेद ही नहीं खुल सका।”

“वह क़त्ल अल कीफा के पास पड़े मिलियन डॉलर का फंड लेकर ही हुआ था। अल कीफा के ही एक मैंबर को शक हो गया कि शलेबी पैसे की हेराफेरी करता है। पर मैं ऐसा नहीं मानता। शलेबी को मारकर किसी ने सही नहीं किया। उस जैसा धार्मिक और अकीदे वाला कोई हो ही नहीं सकता।”

“वह कैसे ?“ आफिया को जिज्ञासा हुई।

“उसने अल कीफा के लिए या समझ लो कि समूचे जिहाद के लिए बहुत काम किया है। वही शेख उम्र अब्दुल रहमान को अमेरिका लाने में कामयाब हुआ था।”

“शेख उम्र वही है न जो कि मिस्र से है ? जो बचपन से अंधा है ?“

“हाँ वही। वह बहुत बड़ा धार्मिक फिलासफ़र है। अमेरिका को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं है। पर वह मिस्र के कट्टर जिहादियों में से एक है। सारे मुस्लिम समाज में उसका रुतबा बहुत ऊँचा है। कोई भी उसकी बात का विरोध नहीं कर सकता। काश ! तू कभी उसको सुने तो...।”

“मुझे उसके फ़ल्सफ़े का पता है।” आफिया को याद आया कि पिछले दिनों ही उसको किसी ने शेख उम्र की वीडियो दिखाई थी। वीडियो में सुने शेख के शब्द उसके मन में घूमने लगे, “हर मुसलमान का एक ही धर्म है कि गै़र मुसलमानों को ख़त्म कर दो। दुनिया पर कोई भी ऐसा न रहे जो मुसलमान न हो। लोगों को समझा-बुझाकर मुसलमान बनाने से बेहतर यह है कि उनका खातमा करो। जितनी जल्दी गै़र मुसलमानों का सफाया होगा, उतनी जल्दी ही हम दुनिया पर इस्लाम का झंडा फहरा सकेंगे। इसके अलावा हर मुसलमान का यह भी धार्मिक फर्ज़ है कि वो कई शादियाँ करके अधिक से अधिक बच्चे पैदा करे ताकि हमारी गिनती काफ़िरों से अधिक हो जाए।”

“तू मेरी बात सुन रही है न ?“

“हाँ-हाँ, मेरा ध्यान तेरी बात की ओर ही है।” आफिया ने ख़यालों में से निकलते हुए सुहेल की बात का हुंकारा भरा।

“हमे शेख उम्र जैसे धार्मिक रहनुमा की ज़रूरत है।”

“पर...।” आफिया ने उसकी बात काटी।

“हाँ, बता ?“

“पर, यह रम्जी यूसफ फिर आज एम.एस.ए. की मीटिंग में क्या कर रहा था ?“

“असल में सभी बातों का तुम्हें आहिस्ता आहिस्ता पता चल जाएगा। कई मैंबर दोनों तरफ काम करते हैं। जैसे कि मार्लेन का पति बस्म कुंज है। वह दोनों तरफ का मैंबर है।“

“आजकल वह कहाँ है ? क्योंकि वह आज मार्लेन के साथ तो कहीं दिखा नहीं ?“ बात फिर दूसरी तरफ चली गई।

“उसकी भी लम्बी कहानी है। वह लिबनान का जन्मा पला है। वह वहीं से किसी धार्मिक संगठन से वजीफा लेकर यहाँ पढ़ने आया था। बॉस्टन यूनिवर्सिटी से उसने ग्रेज्युएशन की। यहीं वह जिहादी लीडरों के सम्पर्क में आया। फिर वह अल कीफा का सरगरम मैंबर बन गया। उन्हीं दिनों उसने मार्लेन से शादी की और उनके एक बच्ची हो गई। फिर वे दोनों पाकिस्तान चले गए। वहीं से बस्म तो जिहाद में लड़ने की खातिर बार्डर पार करके अफ़गानिस्तान चला गया और मार्लेन अपनी बच्ची के साथ पेशावर के उस इलाके में रही जहाँ कि सभी जिहादियों के परिवार रहते हैं। वहीं बस्म लड़ाई के दौरान सख़्त ज़ख्मी हो गया और उसको सर्जरी के लिए यहाँ अमेरिका वापस आना पड़ा। मार्लेन और बस्म यहाँ आकर कुछ देर रहे। जब बस्म पूरी तरह ठीक हो गया तो वह फिर जिहाद की लड़ाई में हिस्सा लेने लिबनान पहुँच गया। वहाँ से वह आगे बास्निया चला गया। आजकल वह बास्निया में ही लड़ रहा है।“

तभी आफिया का हॉस्टल आ गया था। बातों का सिलसिला बंद हो गया। सुहेल आफिया को हॉस्टल पर उतार कर वापस चला गया। आफिया अपने कमरे की ओर जाती हुई मार्लेन और बस्म कुंज के बारे में सोचे जा रही थी। उसको वह एक सच्चा मुसलमान जोड़ा लगा जो कि पूर्णरूप में जिहाद को समर्पित था। उसको मार्लेन अच्छी लगने लगी। देर रात तक भी वह उनके बारे में सोचती रही। अगले कुछ दिनों में ही उसने मार्लेन के साथ अच्छी दोस्ती गांठ ली।

आफिया की पढ़ाई के विषय में किसी कोई शंका नहीं थी। सब जानते थे कि वह इतनी होशियार है कि वह कोई भी विषय चुन ले, पर हमेशा पहले नंबर पर आएगी। इन्हीं दिनों में उसने एक पर्चा लिखा जिसका नाम था - ‘इस्लामीजेशन इन पाकिस्तान एंड इट्स इफेक्ट्स ऑन वुमन।’ इस पर्चे के कारण उसको एम.आई.टी. ने कैरल विल्सन अवार्ड से सम्मानित किया जिसमें पाँच हज़ार डॉलर का नकद ईनाम शामिल था। इस ईनाम से खुश हुई आफिया 1992 का ग्रीष्म अवकाश बिताने के लिए पाकिस्तान चली गई। उन्हीं दिनों पाकिस्तान में हदूद लॉ के बारे में शोर मचा हुआ था। ह्युमन राइट्स जैसे संगठनों का कहना था कि यह लॉ न सिर्फ़ औरत की आज़ादी को कुचल रहा है अपितु इसने तो औरत जाति को भी कुचल कर रख दिया है। इस कानून को घड़ने में मुफ़्ती मुहम्मद तकी उस्मानी ने बड़ी मेहनत की थी। मुफ्ती उस्मानी आफिया के परिवार का धार्मिक रहनुमा था। इस कारण आफिया को उन्हीं दिनों चल रहे शोर-शराबे में दिलचस्पी हो गई। उसने मुफ्ती साहिब का पक्ष लेने का निर्णय ले लिया। वह यह पक्ष इस कारण नहीं ले रही थी कि इसको घड़ने वाला मुफ्ती उस्मानी था बल्कि इस कारण कि उसकी अपनी सोच थी कि इस्लाम ने जो भी पाबंदियाँ स्त्रियों पर लगाई हैं, वे मुसलमान स्त्री के लिए सही हैं। इनको मानते हुए ही वह अपने धर्म का सही पालन कर सकेगी। इस अरसे के दौरान वह जिस किसी भी बड़े लीडर को मिली, हर कोई उसके विचारों से प्रभावित हुआ। क्योंकि एक औरत होकर वह औरतों की ओर से चलाए जा रहे संघर्ष के उलट थी। उसके शुभचिंतकों में पहले पाकिस्तानी डिक्टेटर जिया उल हक का पुत्र इयाज़ उल हक भी था। उस वक़्त पाकिस्तान की राजनीति में भी फेरबदल हो चुका था। बेनज़ीर भुट्टो की जगह नवाज शरीफ की पार्टी सत्ता में आ चुकी थी और वह मुल्क का प्रधान मंत्री था। सरकार के बदल जाने से और चाहे सब कुछ बदल गया हो, पर एक बात नहीं बदली थी। वह थी पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी आई.एस.आई. का एजेंडा। इसके तत्कालीन प्रमुख जावेद नासिर का विचार था कि पाकिस्तान को दुनिया के किसी भी हिस्से में चल रहे जिहाद की अधिक से अधिक मदद करनी चाहिए। इसी एजेंडे के अधीन वह बास्निया में चल रहे गृह युद्ध में जिहादियों की मदद कर रहा था। इसके अलावा यह एजेंसी फिलिपीन्ज़, रशिया के कई हिस्सों में चल रहे जिहाद और चीने के सिनज्यांग प्रांत में चल रहे संघर्ष में भी ऊपरोक्त नीति अपना रही थी। हर जिहाद में अरब अफ़गानों के जत्थे लड़ रहे थे। ये वही लोग थे जो अफ़गानिस्तान की जंग के समय अमेरिका की ओर से रशिया के विरुद्ध लड़े थे। जब वहाँ लड़ाई ख़त्म हो गई तो इन्हीं जत्थों के लीडर अपने लड़ाकों को दुनिया के अन्य क्षेत्रों की ओर ले गए। इन्हीं लीडरों में से सबसे अधिक उभरकर बाहर आ रहा लीडर उसामा बिन लादिन था। इसके अतिरिक्त बलोचिस्तान का एक बड़ा और बहुत ही अमीर परिवार जिहाद में मुख्य भूमिका निभा रहा था। उसको अल बलोची के नाम से जाना जाता था। यह सारा परिवार काफी पहले पाकिस्तान से कुवैत चला गया था। परंत 1990 के इर्द गिर्द यह पुनः पाकिस्तान में लौट आया और आजकल जिहाद में बढ़-चढ़कर भाग ले रहा था। इस परिवार के प्रमुख का नाम खालिद शेख मुहम्मद था जिसका सभी उसके निक नाम अर्थात के.एस.एम. के रूप में जानते थे। रम्जी यूसफ इसी के.एस.एम. का भतीजा था।

खै़र, अपनी छुट्टियाँ बिताकर आफिया वापस अमेरिका आ गई। जब वह लोगन इंटरनेशनल एअरपोर्ट पर उतर कर कस्टम वगैरह की क्लीयरेंस के लिए लाइन में लगी हुई थी तो उसने देखा कि साथ वाली लाइन में खड़ा कोई व्यक्ति उसकी ओर बड़े गौर से देख रहा था। उसने दिमाग पर ज़ोर डालकर याद करने की कोशिश की कि इस आदमी को उसने पहले कहाँ देखा था, पर उसको कुछ याद न आया। वह गर्दन झुकाकर सोचने लगी। फिर उसके दिमाग में अचानक कुछ कौंधा और उसने तुरंत ही साथ वाली लाइन की ओर देखा। तब तक वह व्यक्ति आगे निकल गया था। आफिया मन ही मन बोली, ‘ओह, यह तो रम्जी यूसफ है जिसको उस दिन एम.एस.ए. की मीटिंग में देखा था।’

(जारी…)
 
5

अल कीफा की मीटिंग में हिस्सा लेने मार्लेन और आफिया एकसाथ पहुँचीं। यह मीटिंग किसी के घर पर हो रही थी। मीटिंग शुरू होने से पहले आफिया और मार्लेन एक तरफ़ खड़ी होकर बातें कर रही थीं कि तभी आफिया के कानों में आवाज़ पड़ी।

“सलाम वालेकम, हमशीरा।“

आफिया ने पीछे मुड़कर देखा। सामने रम्जी यूसफ खड़ा था। वह बड़े उत्साह के साथ बोली, “अरे ! वालेकम सलाम! मेरा ख़याल है, हम उस दिन इकट्ठे एक ही फ्लाइट पर आए थे।“

“मार्लेन तेरा क्या हाल है ?“ रम्जी यूसफ ने आफिया की फ्लाइट में एक साथ आने वाली बात पर कोई ध्यान न दिया।

“जी, ठीक है। तुम सुनाओ।“

“और, बसम का फोन वगैरह आया था ?“

“हाँ, फोन तो उसका आता ही रहता है। कह रहा था कि बास्निया की घरेलू जंग ख़तरनाम रूप अख्तियार करती जा रही है।“

“यह घरेलू जंग नहीं, यह मुसलमानों को खत्म करने की योजनाबद्ध स्कीम है। इस स्कीम में सारी दुनिया, मुसलमानों के खिलाफ़ हो चुकी है। ख़ैर...।“ वह बात बीच में ही छोड़ता हुआ किसी अन्य के पास जाकर बातें करने लगा। फिर मीटिंग शुरू हो गई। आज का मुख्य एजेंडा था- बास्निया में चल रहा जिहाद। अन्य चर्चाओं के अलावा इस बात पर सहमति प्रकट की गई कि वहाँ के जिहाद में यतीम हो रहे बच्चों और विधवाओं के लिए फंड इकट्ठा करने की आवश्यकता है। इसके लिए एक नया संगठन ‘रिलीफ इंटरनेशनल’ शुरू करने का निर्णय लिया गया। इसके सारे कामकाज और लोगों से इसके लिए फंड एकत्र करने की जिम्मेदारी आफिया ने ले ली। मीटिंग खत्म होने के करीब थी जब एक व्यक्ति के कंधे पर हाथ रखे, उसके पीछे पीछे चलता शेख उमर रहमान कमरे में दाखि़ल हुआ। सभी ने खड़े होकर, झुककर सलाम कहा। शेख ने हाथ के इशारे से सभी को बैठने के लिए कहा और अपनी सोटी इधर-उधर घुमाते हुए सोफा ढूँढ़कर आराम से बैठ गया।

“सभी जिहादियों का आज की मीटिंग में स्वागत है। मैं अधिक बातें नहीं करूँगा। बस, मुझे इतना ही याद करवाना है कि तुम्हें अपना फर्ज़ हर वक़्त याद रहना चाहिए।“

वह बोलते बोलते चुप हो गया। कमरे में मुकम्मल चुप्पी छाई हुई थी। कोई ऊँचा साँस भी नहीं ले रहा थ। उसने पलभर रुककर आगे बोलना शुरू किया, “यह दुनिया क़ाफ़िरों से भरी पड़ी है। जब तक इन सबका सफाया नहीं हो जाता, तब तक धरती पर शांति नहीं हो सकती। यह मुकम्मल शांति तभी होगी, जब चारों ओर इस्लामी झंडा फहरेगा। मैं बेशक देख पाने में असमर्थ हूँ, पर क़ाफ़िरों की प्रगति हर वक़्त मेरे मन की आँखों के सामने रहती है। ये कुछ ही दूरी पर इन क़ाफ़िरों की आसमान छूती इमारतें मेरे दिल में कांटे की तरह चुभती हैं। काश कि कोई...।“ वह चुप होकर आगे की बात वहीं दबा गया। सभी समझ गए कि उसका इशारा वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टॉवरों की ओर था। कुछ देर बेजान पुतलियाँ इधर-उधर घुमाने के बाद वह फिर बोला, “इन क़ाफ़िरों के दोहरे मापदंड देखो। इन्होंने जापान में बम फेंककर करीब सवा दो लाख लोग एक हफ़्ते में मार दिए। हमारे फिलिस्तीनी भाइयों की लड़ाई को ये टैरेरिज़्म बताते हैं। ज़रा सोचो कि असली टैरेरिस्ट कौन हुआ ? अपने हकों के लिए लड़ने वाला या निर्दोष लोगों को एटम बमों से मारने वाला। ख़ैर, पाक फतवा जारी हो चुका है। उस पर अमल करना हर सच्चे मुसलमान का फर्ज़ है।“ इतना कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ। जो व्यक्ति उसको लेकर आया था, उसने आगे बढ़कर शेख की बांह पकड़ ली और अंदर की ओर ले चला। इसके बाद मीटिंग बर्खास्त हो गई। सभी उठकर चलने लगे। आफिया और मार्लेन भी बाहर आ गईं। आफिया देख रही थी कि हर कोई मीटिंग में से उठ आया है, परंत रम्ज़ी यूसफ, मुहम्मद सालेमाह और एक व्यक्ति पीछे ही रुक गए थे। वहाँ से वे दोनों चल पड़ीं, पर रास्ते में उनके बीच अधिक बातचीत न हुई। आफिया चुप थी, पर उसका मन चुप नहीं था। वह सोच रही थी कि शेख उमर अब्दुल रहमान ने जो फतवे के बारे में कहा था, वह अवश्य ही कोई अहम बात होगी। उसने मन में यह बात भी आ रही थी कि रम्ज़ी, दूसरे साथियों सहित वहीं क्यों रुक गया। उसको इस बात का अफ़सोस हो रहा था कि यदि कोई ज़रूरी बात है तो उसको भी इस बारे में बताया जाना चाहिए था। उसको लगा कि शायद उस पर अभी पूरा भरोसा नहीं किया जा रहा। उसका मन कह रहा था कि वह इस प्रकार पीछे हटने वालों में से नहीं है। वह तो अगली कतार की जिहादी है। इस प्रकार सोचते हुए पता ही नहीं चला कि कब उसका हॉस्टल आ गया। मार्लेन उसको उतार कर आगे बढ़ गई।

इसके सप्ताहभर बाद आफिया दोपहर के समय समाचार देख रही थी, जब वह उछल कर खड़ी हो गई। ख़बर ही ऐसी थी जिसने उसका रोम रोम उत्साह से भर दिया था। सी.एन.एन. समाचार दे रहा था, “वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नॉर्थ टॉवर की पॉर्किंग में बम धमाका। जिसमें करीब आधा दर्जन लोग मारे गए और सैकड़ों ज़ख़्मी हो गए।“

यह ख़बर सुनते ही आफिया के कान फटाक फटाक से खुल गए। उसको याद आ गया कि उस दिन मीटिंग में शेख उमर ने जो फतवे वाली बात कही थी, वह इसी काम को लेकर थी। फिर साथ ही उसको यह ख़याल भी आया कि रम्ज़ी यूसफ और उसके दो साथी मीटिंग के बाद शायद इसी काम के लिए रुके थे जो कि आज वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में घटित हुई है। उसने कई मित्रों को फोन किए, पर कहीं से कोई पक्की जानकारी न मिली। उसने सुहेल को फोन किया तो उसने कहा कि वह उसको अगले दिन मिलेगा।

अगले रोज़ शाम के समय आफिया और सुहेल कार में बैठकर किसी नए पॉर्क में चले गए। वहाँ पहुँचकर सुहेल ने बात शुरू की, “शेख साहिब ने फतवा जारी किया था कि कम से कम ढाई लाख अमेरिकी लोगों को एकसाथ एक ही एक्शन में मारा जाए। इसके लिए रम्ज़ी यूसफ की जिम्मेदारी लगाई गई थी। रम्ज़ी ने अपने साथ ख़ास दोस्त मुहम्मद सालेमाह को लिया। वैसे वह इसकी तैयारी पहले से ही कर रहे थे। उन्होंने किसी अन्य दोस्त के घर, गैराज में पंद्रह सौ पौंड का बम तैयार कर रखा था। फिर 26 फरवरी के दिन मुहम्मद सालेमाह ने ट्रक किराये पर लिया और बम उसमें टिका दिया। लंच के समय वह ट्रक में बैठ वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की ओर चल पड़े। ट्रक के पीछे ही एक अन्य मित्र ने अपनी कार लगा ली। बम कहाँ रखना है, इसकी निशानदेही रम्ज़ी पहले ही कर चुका था। उन्होंने ट्रक नॉर्थ टॉवर की पॉर्किंग के बी ब्लॉक में जा खड़ा किया। ट्रक खड़ा करने के बाद रम्ज़ी ने बम के पलीते को आग लगाई और दौड़कर साथ आई दोस्त की कार में जा बैठा। वहाँ से कार स्टार्ट करके वे भाग निकले। इसके कुछ मिनट के बाद वहाँ बहुत जबरदस्त धमाका हुआ जिसने सारा लोअर मैनहंटन हिलाकर रख दिया। पर अफ़सोस कि जो सोचा गया था, वह न हो सका।“

“वह क्या ?“ चुपचाप सुहेल की बात बात सुन रही आफिया ने हैरान होकर पूछा।

“रम्ज़ी यूसफ का ख़याल था कि यह बम इतना शक्तिशाली है कि इससे नॉर्थ टॉवर ध्वस्त हो जाएगा। इतना ही नहीं, बल्कि यह ढहते हुए साउथ टॉवर को भी अपने साथ गिरा देगा। उसका विचार था कि उसका यह काम दोनों टॉवरों को धरती पर बिछा देगा और यहाँ काम करने वाले सारे लोग मारे जाएँगे। पर अफ़सोस, उसकी मंशा पूरी न हुई। सिर्फ़ पाँच-छह लोग ही मरे हैं।“

“अल्लाह उसकी इन टॉवरों को गिराने की मंशा ज़रूर पूरी करेगा। पर सुहेल, रम्ज़ी हमारी कौम का हीरो है। वह असली जिहादी है। हमें ऐसे ही जिहादियों की ज़रूरत है।“

“अल्लाह, सब इच्छाएँ पूरी करेगा। बस, अपना काम है कि अपने राह पर चलते रहें।“ इतना कहते हुए सुहेल गाड़ी बैक करने लगा।

“हम लोगों को अधिक से अधिक लड़ाकू भर्ती करने चाहिएँ।“ आफिया ने अपनी बात कही।

“आगे आगे देखना कि क्या होता है। वैसे तू भी जिहाद के लिए बहुत कुछ कर रही है।“

“सुहेल अगर सूच पूछो तो मेरा मन भी करता है कि मैं भी फ्रंट पर जाकर लडूँ।“

“नहीं, लड़ाई में हरेक का अपना अपना काम होता है। तू जो कर रही है, यही सही है। बस आगे बढ़ती चल।“

वे बातें करते हुए वापस लौट आए।

अगले दिन मुहम्मद सालेमाह पकड़ा गया। उसके गिरफ्तार होने की देर थी कि जर्सी सिटी के अल कीफा सदस्यों में अफरा-तफरी मच गई। कितने ही और सदस्य पकड़े गए और कितने ही अंडरग्राउंड हो गए। यह मामला यहीं नहीं रुका। पुलिस बॉस्टन शहर में भी पहुँच गई और वहाँ के कई अल कीफा सदस्य पुलिस की गिरफ्त में आ गए। उधर रम्जी यूसफ ने धमाके वाले दिन ही शाम को पाकिस्तान की फ्लाइट ले ली। जब तक उसका नाम बाहर आया, तब तक वह बिलोचिस्तान में अपने घर पहुँच चुका था। अगले दिन वह पेशावर के उन सुरक्षित ठिकानों की ओर निकल गया जहाँ कि अल कायदा और अन्य संगठनों के जिहादी बड़े आराम से बिना किसी भय से रह रह थे।

धड़ाधड़ हुई अल कीफा की गिरफ्तारियों ने तहलका तो मचा दिया, पर सदस्यों के हौसले और अधिक बुलंद हो गए। वे सोचते थे कि उन्होंने इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया है और आगे चलकर वे इससे भी अधिक काम कर सकते हैं। आफिया का भी हौसला बुलंद हो गया। उसने अपने इंटरनेट वाले इश्तहार में लिखा कि इन पकड़े गए सदस्यों के कोर्ट केसों के लिए धन इकट्ठा किया जाए। पुलिस के दबाव के कारण अल कीफा का दफ़्तर बंद कर दिया गया। इसके अधिकतर सदस्य बॉस्टन शहर में जा पहुँचे। उन्होंने अल कीफा का नाम छोड़कर एक नया संगठन बना लिया जिसका नाम था - केयर इंटरनेशनल। न्यूज़ लैटर अल्हसम और अल्हसम वैब साइट केयर इंटरनेशनल से जोड़ दिए गए। इनके माध्यम से मुस्लिम समाज से बड़े ज़ोशोख़रोश के साथ फंड की अपील की गई। दिनों में ही लाखों डॉलर एकत्र हो गया। इससे सभी सदस्यों के हौसले बुलंदियाँ छूने लगे। इन्हीं दिनों ही एक दिन आफिया ने अख़बार में रम्जी यूसफ के विषय में पूरा लेख पढ़ा। लिखा था - “नॉर्थ टॉवर बम धमाके के प्रमुख दोषी को एफ.बी.आई. की मोस्ट वांटिड लिस्ट में डालने के बाद उसका पीछा किया गया। शीघ्र ही पता लग गया कि वह अपने पुश्तैनी घर क्वेटा में रह रहा है। पाकिस्तानी पुलिस की मदद से उसको पकड़ने की योजना बनाई गई। पर जब तक पुलिस की टीम वहाँ पहुँचती, तब तक वह वहाँ से फरार हो गया था। लगता है कि उसके पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. के अंदर गहरे सम्बंध हैं। उसके इस घर से मिले काग़ज़ों से यह भी जानकारी मिली कि उसका असली नाम अब्दुल बसत करीम है। बम धमाका करने से बाद वह इसी नाम के पासपोर्ट से पाकिस्तान पहुँचा था। इसके अतिरिक्त उसके घर से मिले चित्रों में कई बड़े लोगों के साथ खींचे गए फोटो भी मिले। जिनमें जनरल जिया उल हक, उसका पुत्र इजाज उल हक और प्रधान मंत्री नवाज शरीफ जैसी शख़्सियतें भी शामिल हैं। इससे पता चलता है कि वह पाकिस्तान राजनीतिज्ञों के कितना करीब है। उम्मीद है कि वह पेशावर के एरिये में पहुँच चुका है। इसके अलावा, और भी बहुत सारी गुप्त जानकारी मिली है।“

आफिया ने अख़बार एक तरफ रख दिया और सुहेल की कही बात को लेकर सोचने लगी। सुहेल ने ही उसको बताया था कि पेशावर सारे जिहादियों का एक बहुत बड़ा अड्डा है। वहाँ कोई बाहरी व्यक्ति तो क्या, खुद पाकिस्तानी सरकार भी नहीं जा सकती। आफिया को लगा कि अच्छा ही हुआ कि रम्जी यूसफ पुलिस के हाथ नहीं आया। यदि वह पकड़ा जाता तो पता नहीं फिर और कितनी गिरफ्तारियाँ होती। तभी आफिया का फोन बजा। उसने फोन ऑन किया तो दूसरी तरफ उसका भाई था जो कि हूस्टन से बोल रहा था।

“आफिया, क्या हो रहा है ?“

“भाई जान, कुछ नहीं, बस खाली बैठी हूँ।“

“मैंने कराची फोन किया था, अब्बा की तबियत कुछ ढीली है।“

“क्यों ? क्या हुआ अब्बू को ?“ आफिया एकदम घबरा गई।

“नहीं, इतना फिक्र वाली बात तो नहीं है। वैसे तुझे पता ही है कि वह हाई ब्लॅड प्रैशर के मरीज़ हैं। अब, दिल की बीमारी भी शुरू हो गई है।“

“उन्हें कहो कि यहाँ आकर इलाज करवाएँ। यहाँ हर बीमारी का बेहतर इलाज है।“

“मैं तो बहुत बार कहकर देख चुका हूँ, पर वो मानते ही नहीं। तू बात करके देखना।“

“मैं करती हूँ फोन आज ही। और अम्मी तो ठीक है न ?“

“अम्मी बिल्कुल ठीक है। फौज़िया भी कह रही है कि अमेरिका पढ़ने आना है।“

“अच्छा है, यहाँ आ जाए। सभी इकट्ठा हो जाएँगे।“

“इकट्ठा कहाँ होंगे ? मैंने तुझे कितना कहा, हूस्टन न छोड़, पर तूने मेरी बात नहीं मानी। ऐसे ही वो भी अपनी मर्ज़ी ही करेगी।“

“भाई जान, कोई बात नहीं। मैं यहीं ठीक हूँ। वो हो सकता है, तुम्हारे पास रह जाए।“

“आफिया और तो सब ठीक है, पर मुझे तेरा एक बात से बड़ा फिक्र रहता है।“

“भाई जान, वह क्या ?“

“तुम्हारा बॉस्टन शहर आजकल ख़बरों में खूब रहता है। सुनते हैं कि वहाँ बड़े जिहादी घूम रहे हैं। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की पॉर्किंग में धमाके वाले केस के साथ ही बॉस्टन जुड़ा हुआ है। तू इस तरफ से बचकर रहना।“

“नहीं भाई जान, ऐसी कोई बात नहीं है। मेरा इन लोगों से कोई लेना-देना नहीं है। मैं तो सिर्फ़ चैरिटी तक ही सीमित हूँ।“ आफिया ने झूठ बोला तो डर भी गई कि उसका भाई उसकी घबराहट को न जान जाए। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मुहम्मद अली आगे बोला, “आफिया, यह काम चैरिटी से ही शुरू होता है। जितने भी जिहादी देख रहे हैं, ये पहले चैरिटी में ही काम करते थे। वहीं इनका वास्ता असली जिहादियों से पड़ता है। तू मेरी बहन खुद को बचा कर रखना। मैं तो कहता हूँ कि तूने क्या लेना है चैरिटी वगैरह से। तू चुपचाप अपनी पढ़ाई कर।“

“हाँ, भाई जान। मैं आगे की क्लासें लेने के बारे में सोच रही हूँ। तुम्हारे साथ भी सलाह करनी है कि कौन-सी क्लासें लूँ।“ आफिया बात को पढ़ाई की ओर ले गई और चैरिटी वाली बात टाल गई। वे बातें कर ही रहे थे कि बीच में आफिया की दूसरी कॉल आ गई। उसने फोन के स्क्रीन पर देखते हुए बोली, “भाई जान, मैं तुम्हें फिर फोन करती हूँ। मेरा कोई फोन आ रहा है।“ उसने दूसरी तरफ फोन ऑन करते हुए ‘हैलो’ कहा। उधर, मार्लेन थी। वह घबराई हुई आवाज़ में बोली, “आफिया, बहुत बुरा हुआ।“

“क्या हो गया ?“

“शेख उमर अब्दुल रहमान गिरफ्तार हो गए।“

“या अल्लाह !“ आफिया ने फोन काट दिया और सिर पकड़कर बैठ गई। अगले दिन सभी अख़बारों की मुख्य ख़बर थी कि नॉर्थ टॉवर की पॉर्किंग वाले बम धमाके का मुख्य सूत्रधार, अंधा शेख उमर अब्दुल रहमान पकड़ा गया।

(जारी…)
 
1993 में आफिया ने पहला सेमेस्टर खत्म होने के बाद, छुट्टियों में परिवार को मिलने जाने का मन बना लिया। ग्रीष्म अवकाश प्रारंभ हुआ तो उसने टिकट खरीदी और अगले ही दिन पाकिस्तान पहुँच गई। उसके कराची पहुँचने के दो दिन बाद उसका मामा एस.एच. फारूकी अपनी पत्नी सहित उसको मिलने आ पहुँचा। दोपहर के भोजन के बाद पूरा परिवार ड्राइंग रूम में बैठा बातों में मशगूल हुआ पड़ा था।

“अब्बू, आप देखने में तो बीमार बिल्कुल नहीं लगते, पर फोन पर मुश्किल से बोलते हो ?“ आफिया ने हँसते हुए कहा।

“भाई साहब, बिल्कुल तंदरुस्त हैं। ये तो तुझे यहाँ बुलाने के लिए बहाना घड़ा होगा।“ समीप बैठा फारूकी भी हँसा।

“बीमार को आफिया बेटा क्या है। इस उम्र में तो वैसे ही कोई न कोई बीमारी चिपटी रहती है।“ आफिया के पिता ने ढीला-सा उत्तर दिया। इसके बाद अन्य घरेलू बातें चल पड़ीं।

“अब तो फौज़िया बेटी भी अमेरिका की तैयारी कर रही लगती है।“ फारूकी की बेगम ने बात बदली।

“हाँ जी, दाखि़ला तो हो गया है। बस, अब जाने ही तैयारी ही करनी है।“

“क्या पढ़ रही है फौज़िया बेटी ?“

“जी, डॉक्टरी।“

“बहुत अच्छा है। आजकल अपने लड़के-लड़कियाँ धड़ाधड़ अमेरिका जाकर डॉक्टर, नर्स बन रहे हैं। बड़े फ़ख्र वाली बात है यह तो।“ फारूकी ने गर्व से फौज़िया की ओर देखते हुए कहा।

“मगर कुछेक लोग पाकिस्तान के नाम को वहाँ जाकर धब्बा भी लगा रहे हैं।“ सुलेह सद्दीकी ने चोट की।

“तुम किस की बात करते हो ?“ इस्मत ने चुप्पी तोड़ी।

“बिलोचिस्तान के उस अल बलोची परिवार के लड़के रम्जी यूसफ की। जिसने वहाँ किसी बड़ी इमारत के पॉर्किंग लाट में बम धमाका करके कितने ही लोगो को मारा। लोग समझते नहीं कि जो देश हमको इतनी सहूलियतें दे रहा है, हमारी अगली पीढ़ी के लिए कितने अच्छे पढ़ाई के अवसर मुहैया करवा रहा है, उसी को तुम ध्वस्त करने में लगे हो।“ सुलेह सद्दीकी थोड़ी नफ़रत में बोला।

“क्या पता है जी, सच क्या है। हम अमेरिका के कहने पर तो किसी को दोषी नहीं मान सकते।“ इस्मत ने गोलमोल-सा जवाब दिया।

“पर वहाँ हमारे ऐसे लोग भी तो हैं जो समाज सेवा का काम कर रहे हैं। अपनी आफिया भी तो समाज सेवा के कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है।“ फारूकी की बेगम बोली।

“यह तो अच्छी बात है। समाज सेविका माँ की बेटी, समाज सेवा न करेगी तो और क्या करेगी।“ फारूकी ने आफिया को और उसकी माँ को सराहा।

“आफिया, वहाँ हो रही ऐसी तोड़-फोड़ की कार्रवाइयों के बारे में वहाँ के लोगों के क्या विचार हैं ?“

“अंकल, मैं और मेरी सहेलियाँ, हम तो ज्यादा चैरिटी का काम करते हैं। हमें इन बातों का ज्यादा पता नहीं लगता। पर एक बात ज़रूर है कि सिर्फ़ अपने लोगों को ही दोष न दो। क्योंकि उन्हें ऐसा करने के लिए मज़बूर भी तो पश्चिम ही करता है। अब बास्निया में ही ले लो। वहाँ मुसलमानों पर इतने अत्याचार हो रहे हैं कि अल्लाह ही जानता है। मेरे पास वीडियो कैसिटें हैं जिनमें आप देखोगे कि कैसे वहाँ हमारे लोगों पर अत्याचार हो रहे हैं। कैसे हमारी बहन-बेटियों के साथ सामूहिक बलात्कार होते हैं। ये कैसिटें देखकर रौंगटे खड़े हो जाते हैं।“

“पर यह कैसे संभव है कि जिस वक़्त बलात्कार हो रहे थे, उस वक़्त तुम्हारे लोगों ने वो कैसिटें या मूवियाँ बनाई। तू तो ऐसे बता रही है जैसे किसी फिल्म की सूटिंग की कैसिटों की बात कर रही हो।“ सुलेह सद्दीकी नाराज़ होकर आफिया की ओर देखते हुए बोला। इस्मत को घरवाले की यह बात अच्छी न लगी। पर इसका जवाब आफिया ने ही दिया। वह बोली, “जो जिहादी वहाँ लड़े रहे हैं, वे ऐसी घटनाओं को कैमरे में कै़द कर लेते हैं। ताकि आप जैसे पश्चिम के भक्तों को सच दिखलाया जाए।“

“मैं किसी पश्चिम-वश्चिम का भगत नहीं हूँ। मगर सच्चाई तो सच्चाई ही है न। पहले तू यह बता कि तेरे पास जो कैसिटें हैं, ये किस ग्रुप ने बनाई हैं। फिर मैं आगे बात करूँगा।“

“अब्बू, यह अधिकांश काम मुस्मिल ब्रदरहुड का किया हुआ है। इस वक़्त जिहाद में सबसे अधिक योगदान वही दे रहे हैं।“ इतना कहकर आफिया अपनी कॉपी पलटने लगी।

“यह मुस्लिम ब्रदरहुड ही असली झगड़े की जड़ है। तेरी ये वीडियो कैसिटें देखने से पहले ही मैं बता देता हूँ कि यह सब प्रोपेगंडा है। मुसलमानों को भड़काने के लिए ऐसे काम तो ब्रदरहुड मुद्दत से करता आ रहा है।“

पति की बात सुनकर इस्मत ने आफिया की ओर देखा और उसे चुप रहने का इशारा किया। अगले पल कमरे में चुप्पी-सी छा गई। सभी को चुप-सा देखकर फौज़िया बोली, “अब्बू, इस मुस्लिम ब्रदरहुड की असलीयत क्या है ? मेरा मतलब यह किसने शुरू किया और इसका निशाना क्या है ?“

“इसके बारे में फौज़िया बेटी, मैं तुझे बताता हूँ।“ फारूकी ने गला साफ़ करते हुए खंखारा और फिर फिर बोलने लगा -

“बहुत पहले मिस्र के एक मशहूर बुद्धिजीवी ‘हसन अल बन्ना’ ने इस पार्टी बनाई थी। उसके इरादे बहुत नेक थे। उस वक़्त अपने आसपास ब्रितानिया ने सबको गुलाम बना रखा था। सभी देश ब्रितानिया की कालोनियाँ बनाकर रख दिए थे। इन कालोनियों के लोग जो गाढ़े पसीने की कमाई करते थे, ब्रितानवी उसी कमाई पर ऐश करते थे और हमारे लोगों के साथ पशुओं जैसा व्यवहार होता था। हसल अल बन्ना की इस नई बनाई पार्टी, मसलन ब्रदरहुड ने नारा दिया कि आओ लोगो हम सब मिलकर इन ब्रितानवी लोगों को यहाँ से भगा दें और कुरान हमारा संविधान हो। उसके कहने का भाव था कि ऐसा राज्य हो जहाँ का राज-प्रबंध और कानून व्यवस्था वगैरह मज़हबी अकीदे के अनुसार हो। अपने हकों के लिए लड़ना मज़हब का काम माना जाए और इसको जिहाद समझकर लड़ा जाए। उस वक़्त ब्रदरहुड ब्रितानिया के इतना खिलाफ़ था कि इसने दूसरी बड़ी जंग में जर्मनी का पक्ष लिया क्योंकि वह ब्रितानिया के खिलाफ़ लड़ रहा था। जंग बंद होने के बाद जब इज़राइल स्टेट बना तो मुस्लिम ब्रदरहुड ने सबसे पहले इसका विरोध किया। इसी कारण पहली अरब इज़राइल जंग में मिस्र मुख्य पार्टी था। हालांकि अरब उस जंग में हार गया, पर ब्रदरहुड की धूम मच गई। जब ब्रितानिया यहाँ से चला गया तो मुस्लिम ब्रदरहुड अपनी ही सरकार के खिलाफ़ हो गया। सरकार ने इस पर पाबंदी लगा दी। फिर, यह अन्य मुल्कों में फैलने लगा। आज हालात ये हैं कि हरेक अरब मुल्क में इसकी शाखाएँ हैं, पर तकरीबन सभी देशों ने इस पर पाबंदी लगा रखी है। क्योंकि आजकल ये इंतहापसंदों के कब्ज़े में है और बहुत ही हिंसक हो गया है।“

“जब इतना ख़तरनाक है तो यह किसी देश की मदद के बग़ैर अपना वजूद कैसे कायम रख सकता है ?“ इस्मत ने टेढ़ा सवाल किया।

“ऐसा नहीं है। कई देशों के यह फिट बैठता है। सउदी अरब का उदाहरण ले लो। वहाँ का राज घराना वहाबी है जो सुन्नी और शिया दोनों के खिलाफ़ है। वह अपनी वहाबी शाखा को फैलाने के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड की मदद करता है। असल में, सबसे अधिक सउदी अरब ही ब्रदरहुड को उठाता है।“

“इसका मतलब, बाकी सारी दुनिया पागल है जो ब्रदरहुड का पक्ष लेती है।“ इस्मत गुस्से में बोली। इसके बाद वहाँ हो रही बहस में तल्ख़ी आने लगी। फारूकी ने जाने की इजाज़त मांगी और दोनों मियाँ-बीवी उठकर चल पड़े।

इस्मत और फौज़िया उन्हें विदा करने के लिए बाहर निकल गईं। पीछे आफिया और उसका पिता रहे गए। सुलेह सद्दीकी आफिया के सर पर हाथ फेरते हुए बोला, “बेटी, तू अपनी पढ़ाई में ध्यान दे। तूने क्या लेना है इस चैरिटी वगै़रह से।“

“अब्बू, यह तो दीनवाला काम है। अम्मी ने भी तो सारी उम्र यही सब किया है। फिर आप मुझे इस तरफ से क्यों रोकते हैं ?“

“क्योंकि मैं जानता हूँ कि यह असली चैरिटी नहीं है।“

“और क्या है यह ?“

“असली चैरिटी वह होती है जो वास्तव में ज़रूरतमंदों की मदद करें, पर आजकल जितनी भी चैरिटी हो रही हैं, वे असल में जिहाद के नाम पर लड़ रहे आतंकवादियों की मदद कर रही हैं।“

“अब्बू प्लीज़, उन्हें आतंकवादी न कहो, नहीं तो मैं नाराज़ हो जाऊँगी।“ आफिया उठकर खड़ी हो गई।

“तू यूँ गुस्सा न हो, मेरी बात सुन।“ पिता ने आफिया की बांह पकड़कर उसको फिर से बिठा लिया।

“तू जिहाद का मतलब समझती है ?“

“कुछ कुछ समझती हूँ और बाकी आप समझा दो।“ आफिया रूखे स्वर में बोली।

“देख बेटा, ये लोग पवित्र कुरान में से उतने ही लफ्ज़ उठा लेते हैं जितने इनको ठीक बैठते हैं। सारी कुरान को पढ़ा जाए तो असली मतलब कुछ और निकलता है।“

“क्या निकलता है असली मतलब ?“ आफिया की अभी भी त्यौरियाँ चढ़ी हुई थीं।

“मुहम्मद साहिब ने फरमाया है कि इन्सान की ज़िन्दगी में नौ जिहाद और हैं और यह लड़ाई वाला जिहाद दसवें नंबर पर आता है। पहले ये हैं - जैसे गुस्सा, क्रोध, लालच, लोभ, मोह और काम वगै़रह। जो लोग इन नौ जिहादों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, सिर्फ़ वही दसवा जिहाद लड़ने के काबिल समझे जाते हैं। क्या तुझे लगता है कि आज के जिहादियों ने इन पर काबू पाया हुआ है।“

आफिया चुप रही। वह कुछ न बोली तो उसका पिता फिर बोला, “मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। जंग के मैदान में मुहम्मद साहिब के साथ उनका एक रिश्तेदार जीमल लड़ रहा था। उसने लड़ते हुए अपने दुश्मन को नीचे ज़मीन पर गिरा लिया और उसकी छाती पर चढ़ बैठा। वश न चलता देख नीचे पड़े दुश्मन ने उसके मुँह पर थूक किया। इस पर एकदम गुस्से में आकर जमील ने तलवार उठाई और दुश्मन का गला काटने को आगे बढ़ा। तभी उसके अंदर कुछ कौंधा और उसने तलवार दूर फेंक दी। वह दुश्मन की छाती पर से भी उठ खड़ा हुआ। नीचे पड़े दुश्मन ने कहा कि अब छोड़ क्यों दिया मुझे, मार क्यों नहीं देता। यह सुनकर उसने मालूम है क्या कहा ?“

“क्या कहा ?“

“वह बोला, अभी तो मैं अपने आपको ही मार नहीं पाया, किसी दूसरे को मैं क्या मारूँगा। उसके कहने का संकेत उसे आए क्रोध की ओर था। मतलब यह है कि अभी तो मैं अपने गुस्से को ही नहीं मार सका। इतना कहकर वह जंग के मैदान से बाहर चला गया।“

आफिया ने पिता की बात तो सुनी, पर अधिक दिलचस्पी न दिखलाई। उसकी ओर देखता सुलेह बोला, “आफिया बेटी, पुण्य-दान करना कोई बुरा काम नहीं है। पर इसके लिए सारी ज़िन्दगी पड़ी है। अभी तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। जब पढ़-लिखकर ज़िन्दगी में कामयाब हो गई तो जितना चाहे चैरिटी के लिए काम करते रहना।“

“अब्बू, जो काम करने को आदमी का दिल आज कर रहा है, उसके लिए वह आगे की ज़िन्दगी का इंतज़ार क्यों करे। और मैंने पहले भी कहा है कि यह कोई बुरा काम नहीं है।“

“देख आफिया, मैंने तेरी अम्मी को सारी उम्र यह काम करते हुए देखा है। मैं यह भी जानता हूँ कि ये सभी जिहादी इसी चैरिटी के रास्ते ही जिहादी बनते हैं। आखि़र में सभी के तार जिहाद से ही जाकर जुड़ते हैं। यह तो एक लपलपाती आग है। इस तरफ़ जाता हर राह बरबादी का राह है। इधर जो भी गया, भस्म हो गया। इतना ही नहीं, जो इसके करीब से गुज़रा, वह भी झुलस गया।“

“अब्बू, मैं समझती हूँ सब। आप कोई फिक्र न करो।“

“बस बेटी, कुछ ऐसा करने के बारे में सोचना भी नहीं जिससे मेरी और खानदान की इज्ज़त को बट्टा लगे।“

“ठीक है अब्बू।“ इतना कहते हुए आफिया उठकर चली गई। सुलेह उसको जाते हुए देखता रहा। उसको आफिया की बातों में से उसके अंदर की तपिश महसूस हो रही थी। यही नहीं, उसको अपने पुत्र का जब भी हूस्टन से फोन आता था तो वह भी हमेशा यही फिक्र ज़ाहिर करता था कि कहीं आफिया राह से भटक ही न जाए। क्योंकि उसके बताये अनुसार उसको पता चलता रहता था कि आफिया उन चैरिटियों के लिए काम करती है जो किसी न किसी जिहाद की मदद कर रही हैं।

शाम के वक़्त इस्मत, आफिया और फौज़िया को लेकर घूमने निकल गई। वह अपने जान-पहचान वाले घरों में आफिया को मिलवा लाई। उसका विचार था कि लोगों में उसकी इस बात के कारण धाक जम जाए कि उसकी बेटी कितनी बड़ी समाज-सेविका है और धर्म के लिए बहुत बड़ा काम कर रही है। अगले कई दिन अनेक जन-समूहों में आफिया के उसने भाषण भी करवाए। हर जगह श्रोता उससे बहुत प्रभावित हुए। वह हर भाषण के दौरान बॉस्निया में चल रहे घरेलू युद्ध में मरने वाले मुसलमानों की बात करती थी। इन जन-समूहों में वह मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों की वीडियो भी दिखाती थी। ये सब जन-समूह बड़े परिवारों की ओर से आयोजित करवाए जाते थे। ये वे परिवार थे जो राजनीतिक लोगों के बहुत करीब थे। इन्हीं दिनों एक दिन इस्मत ने शैरेटन होटल में आफिया का भाषण करवाया तो एक स्त्री इस्मत को एक तरफ ले गई। उसका नाम जाहिरा खां था। असल में, वह अपने पुत्र अमजद खां के लिए वधु खोज रही थी। आफिया को देखकर उसको लगा कि इस लड़की से अच्छी बहू तो उसको मिल ही नहीं सकती। इधर उधर की बातें करते हुए उसने इस्मत को खान परिवार के घर आयोजित कार्यक्रम में आने का निमंत्रण दिया। वह बहाने से आफिया को अपने पुत्र से मिलाना चाहती थी। फिर, उस दिन जाहिरा खां के घर भाषण भी हुआ और आफिया की अमजद के साथ मुलाकात भी हुई। लेकिन बाद में अमजद ने अपनी अम्मी को बताया कि लड़की तो उसको पसंद है, पर उसका भाषण और अन्य बातें उसको व्यर्थ लगती हैं। जाहिरा खां को लगा कि चलो, अमजद लड़की को पसंद करता है, यही बहुत है। उसने अमजद से कहा कि वह और सोच ले। इस दौरान वह सद्दीकी परिवार से बात चलाएगी। आफिया की छुट्टियाँ समाप्त हो चुकी थीं। जिस दिन उसको जाना था, उस दिन एअरपोर्ट पर विदा करते समय इस्मत उसको एक तरफ़ ले गई और गले मिलते हुए बोली, “आफिया, तू जल्दी से जल्दी अपनी पढ़ाई पूरी करके वापस लौट आ। यहाँ तेरे करने के लिए बहुत कुछ है। मुझे तेरी काबलियत पर भी शक नहीं है। तू बहुत ऊँचा मुकाम हासिल करेगी।“

“अम्मी, मैं ऐसा कौन-सा मोर्चा मारूँगी।“ आफिया ने माँ की बात को हँसी में टाल दिया।

“तू किसी दिन राजनीति का चमकता हुआ सितारा होगी। अगर भुट्टो परिवार की लड़की बेनज़ीर इतने बड़े ओहदे पर पहुँच सकती है तो मेरी बेटी क्यों नहीं। तू बस यूनिवर्सिटी की अपनी पढ़ाई खत्म करके यहाँ आ जा और राजनीति शुरू कर। तुझे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। मैं तेरे अंदर का जोश देख रही हूँ। बस, तू मेरी बात पर ग़ौर कर।“

“ठीक है अम्मी।“ इतना कहते हुए आफिया सामान उठाकर चल पड़ी और चैकिंग वगैरह से गुज़र कर हवाई जहाज में जा बैठी। फ्लाइट अमेरिका के लिए रवाना हुई तो आफिया के दिल में से माँ-बाप द्वारा दी गई नसीहतें भाप की तरह उड़ गईं। दूसरे दिन वह अपनी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में पहुँच गई।

इस बार जब वह यहाँ पहुँची तो उसके अंदर का जोश ठाठें मार रहा था। इसका बड़ा कारण था कि पाकिस्तान में जहाँ कहीं भी उसने लेक्चर दिया था, हर जगह उसकी भरपूर तारीफ़ हुई थी। हरेक ने उसको इस्लाम की सच्ची बेटी कहकर सराहा था। इसके अलावा, वह खुद भी सोचने लगी थी कि उसको जिहाद में आगे बढ़कर काम करना चाहिए। इन सभी बातों ने उसके अंदर एक नई शक्ति भर दी।

उसने अमेरिका पहुँचते ही जोशोखरोश के साथ काम प्रारंभ कर दिया। वह एम.एम.ए. की मीटिंगें नियमित रूप से करवाने लगी। चैरिटी के काम में दिलचस्पी बढ़ा दी। एक दिन उसको सुहेल मिलने आया। बातें करते हुए वे दोनों पॉर्क की ओर निकल गए।

“कैसी रहीं तेरी छुट्टियाँ ?“ सुहेल ने बात छेड़ी।

“बहुत बढ़िया।“

“तेरे अब्बू का क्या हाल है अब ?“

“ठीक है। बस, दिल का रोग होने के कारण कमज़ोरी बहुत आ गई है।“

“तेरी अम्मी के चैरिटी के काम कैसे चलते हैं ?“

“अम्मी के तो ठीक चल रहे हैं, पर यहाँ के मुझे सही नहीं लगते।“

“वो कैसे ?“

“मेरे जाने के बाद सब कुछ सुस्त-सा हो गया लगता है।“

“तू आ गई है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। हमें लोगों को आकर्षित करने के लिए अच्छे वक्ताओं की ज़रूरत है।“

“बुलाओ फिर, देर किस बात की है।“

“मैंने इंतज़ाम किया है। इसबार कैनेडा से कैथरीन बल्क को बुलाया है। तुझे मालूम ही है कि वह बोलती है तो आग बरसती है।“

“हाँ, मैंने उसकी किताब ‘सोशियल जस्टिस इन अमेरिका’ पढ़ी है। उसके ख़याल बहुत ऊँचे हैं। पर एक बात है।“

“वह क्या ?“

“उसको हम आम वक्ताओं के सामने नहीं बुला सकते। उसके विचार आम लोगों की समझ में नहीं आने वाले। बल्कि कई बार तो वे उसकी बातों को उलट ले जाते हैं।“

“फिर इसका हल क्या है ?“

“मैंने यह सोचा है कि हम एक अलग संगठन बना लें। जो बिल्कुल गुप्त हो। उसकी बैठकों में जिहाद को पूरी तरह समर्पित लोग ही आएँ।“

“यह बिल्कुल ठीक है। साथ ही इस बात से मुझे याद आया कि बॉस्निया में जिहादियों की कमी पड़ती जा रही है। हमें वहाँ लड़ने के लिए जिहादी चाहिएँ।“

“यह बात मैंने पहले ही सोच ली थी। इसके लिए मैंने अपनी गुप्त ई-मेल में मैसिज़ भी डाल दिया है कि हमें बॉस्निया के पाक जिहाद के लिए शहीदों की ज़रूरत है। इसके बहुत सारे जवाब भी आए हैं।“

“यह तो तुमने बहुत अच्छा किया। तुम्हारी और क्या योजनाएँ हैं ?“

“मैं चाहती हूँ कि चिकागो में चैरिटी के लिए काम कर रहे ग्लोबल रिलीफ़ फाउंडेशन और बैनेवोलैंस इंटरनेशनल फाउंडेशन की यहाँ भी ब्रांचें खोली जाएँ। इस तरह चैरिटी के अवसर बढ़ जाएँगे और बॉस्निया में चल रहे जिहाद के लिए धन की कमी भी नहीं रहेगी। तुझे पता ही होगा कि वहाँ हथियारों के लिए पैसा चाहिए।“

“यह तो ठीक है। दोनों ही चैरिटी यहीं शुरू कर लेते हैं। कुछ और ?“

“मैंने लड़कियों के ग्रुप को हथियार चलाने की ट्रेनिंग के मंतव्य से एक क्लब ज्वाइन करवाया है। खुद भी वहाँ बंदूक आदि चलाने का प्रशिक्षण ले रही हूँ। इसके अलावा...।“ आफिया ने बात बीच में ही छोड़ ऊपर आकाश की ओर देखा। बादल बरसने लगे थे। वह दौड़कर समीप की एक इमारत के छज्जे के नीचे जा खड़े हुए।

“इसके अलावा, मैं यहाँ की एक...।“ आफिया फिर से बोलने लगी ही थी कि सुहेल ने मुँह पर उंगली रखते हुए उसको चुप रहने का इशारा किया। आफिया ने चुप होकर अपने आसपास देखा। उसको याद आया कि यहाँ हरेक बिल्डिंग के किसी न किसी कोने में कैमरे लगे होते हैं जो बातों को भी रिकार्ड करते हैं। उसने दूसरी साधारण-सी बात शुरू की। करीब पंद्रह मिनट बाद बारिश बंद हो गई तो वे बाहर निकलकर क्रॉसवाक पर चलने लगे। आसपास झांकते हुए आफिया ने बीच में छोड़ी पहले वाली बात पुनः शुरू की।

“हाँ, मैं कह रही थी कि मैंने यहाँ की एक ऐसी मस्जिद के इमाम के साथ राबता कायम किया है जो यहाँ की जेलों में मुसलमान क़ैदियों को हर हफ़्ते धार्मिक शिक्षा देने जाता है। मैं उसके माध्यम से बहुत सारी अंग्रेजी में तर्ज़ुमा हुई किताबों को मुसलमान कै़दियों तक पहुँचा रही हूँ। इस तरह उनके अंदर भी जिहाद की चिंगारी सुलगेगी...।“ बात करते करते आफिया चुप हो गई, क्योंकि कोई करीब से गुज़र रहा था। थोड़ा रुककर वह फिर बोलने लगी, “इससे अलावा, मैं किताबों की पुरानी दुकानों से अमेरिकी मिलेट्री मैनुअल खरीद रही हूँ ताकि उन्हें अपने मुजाहिदीनों को भेजा जा सके। उन्हें अमेरिकियों के खिलाफ़ लड़ने के समय इनसे मदद मिल सके।“

“आफिया, तू तो बहुत आगे की सोचती है। जो कुछ तू कर रही हो वो तो साधारण व्यक्ति सोच भी नहीं सकता। तेरी इस अमेरिकी मिलेट्री मैनुअल वाली बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। पर ज़रा संभालकर चलना क्योंकि अगर किसी को थोड़ा-सा भी शक हो गया तो काम खराब हो जाएगा। तेरा यह काम बगावत माना जाएगा। तू बस...।“ तभी, सुहेल का फोन बजने लगा। फोन ऑन करके वह बात सुनने लगा। कई मिनट बात होने के बाद वह आफिया की ओर आते हुए उदास स्वर में बोला, “असल में, किसी घर के भेदी ने ही सारा काम बिगाड़ा था।“

“क्या !“

“आज फिर अलकीफा के कई मेंबरों की गिरफ्तारियाँ हुई हैं। युनाइटिड नेशन्ज़ बिल्डिंग, बड़े पुल और कई सुरंगों को नुकसान पहुँचाने के आरोप लगाकर इन मेंबरों को पकड़ा गया है। असल में, भीतरी सूत्रों से पता चला है कि जिस दिन शेख उमर अब्दुल रहमान ने ढाई लाख अमेरिकियों को मारने का फतवा जारी किया था, उस दिन वहाँ कोई ऐसा मुसलमान भी था जो कि एफ.बी.आई का मुख्बिर था। उसी के कारण सारी बात का भेद खुला और वही आगे चलकर आज वाली गिरफ्तारियों का कारण बना।“

“ऐसे गद्दारों का क्या किया जाए ?“ आफिया की भवें सिकुड़ गईं।

“इनका हल वही है जो एक दुश्मन का है। पर यहाँ यह काम बहुत कठिन है।“

“अच्छा मैं चलता हूँ। जब तक थोड़ी शांति नहीं हो जाती, तब तक बचकर रहने की ज़रूरत है।“

सुहेल चला गया तो आफिया हॉस्टल की ओर चल पड़ी।

(जारी…)
 
7

वर्ष 1994 को आरंभ हुए तीन सप्ताह हो चुके थे। उस दिन रातभर बर्फ़बारी होती रही थी। आफिया गहरी नींद सोई हुई थी जब उसके सैल फोन की घंटी बजी। उसने अलसाते हुए ‘हैलो’ कहा। दूसरी ओर मार्लेन बोल रही थी। उसने इतना कहकर फोन काट दिया कि वह उसको एक घंटे बाद लेने आ रही है। वह तैयार रहे। आफिया ने धीरे-धीरे बिस्तर छोड़ा और उठकर कमरे में से बाहर आ गई। उसने खिड़की का पर्दा उठाकर बाहर देखा। सूरज की तेज किरणों ने उसकी आँखें चुंधिया दीं। रात यद्यपि बर्फ़ गिरती रही थी, पर इस समय सूरज निकला हुआ था। स्नो पर पड़ती धूप आँखों में चुभ रही थी। वह पर्दा गिराकर वापस कमरे में आ गई। फिर तैयार होने लगी। तैयार होकर उसने अपना बैग उठाया और लम्बा कोट पहनकर नीचे आ गई। उसके नीचे पहुँचने के करीब दो मिनट बाद ही मार्लेन आ गई। आफिया दरवाज़ा खोलकर कार में बैठी तो मार्लेन ने कार आगे बढ़ा ली। बीस मिनट में वे उसके अपार्टमेंट में पहुँच गईं। दरवाज़ा खोलते ही आफिया ने देखा कि सामने सुलेमान अहमर बैठा था। दोनों ने एक दूसरे को आदाब कहा। वे पहले मिल चुके थे। सुलेमान अहमर, बैनेवोलैंस इंटरनेशनल का डायरेक्टर था। उसने पहली मुलाकात में ही आफिया को बता दिया था कि वह जिहाद की ओर कैसे अग्रसर हुआ। उसने बताया था कि वह ओर कुछ अन्य दोस्त जो कि पूरे नबरास्का यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी थे, टूर लगाने क्रोशिया गए थे। वहाँ उनको जिहादियों ने बंदी बना लिया था। कुछ दिन उन्हें कै़द में रखकर छोड़ दिया गया, परंतु जो कुछ उसने इस दौरान जिहाद के बारे में सुना, उसने उसके दिल में जिहाद के प्रति हमदर्दीभरा आकर्षण पैदा कर दिया। बाहर आकर उसने और खोजबीन की तो उसको लगा कि उसका असली काम जिहाद ही है। फिर वह छोटे सर्किलों में विचरता हुआ इस संगठन के डायरेक्टर के पद पर आ पहुँचा। आज वह यहाँ बैनेवोलैंस की ब्रांच स्थापित करने आया था। सारा दिन वे मीटिंग के विषय में विचार-विमर्श करते रहे। यह एक छोटी-मोटी मीटिंग नहीं थी। बैनेवोलैंस बहुत बड़ा संगठन था। जिसका काम हालांकि चैरिटी ही बताया जाता था, परंतु असल में यह अलकायदा के साथ जुड़ा हुआ था। अलकायदा के लिए बहुत सारा फंड इसी संगठन के जरिये इकट्ठा होता था। शाम के वक़्त मीटिंग हुई तो आफिया हैरान रह गई। इतना जोश उसने किसी भी मीटिंग में नहीं देखा था। इसके अतिरिक्त, यहाँ बहुत बड़े-बड़े जिहादी पहुँचे हुए थे। जिनके इससे पहले आफिया ने सिर्फ़ नाम ही सुने थे। सुलेमान ने बहुत ही प्रभावशाली भाषण दिया। यहाँ आफिया को भी बोलने का अवसर मिला। उसने इस अवसर का इतना अच्छा इस्तेमाल किया कि सभी हैरान रह गए। उसका लैक्चर इतना प्रभावशाली था कि सदस्यों के मुँह बंद हो गए। हरेक को लगा कि इतनी जोशिली लड़की जिहाद में पहले कभी नहीं देखी। उसने सभी की ओर देखते हुए कहा कि किधर गया मुस्लिम मर्द आज। किधर गया उसका स्वाभिमान कि बॉस्निया में हमारी बेटियों-बहनों का कुछ नहीं बचा और उसके कानों पर जूं नहीं रेंगी। उसने कहा कि मैं स्टेज पर क्यों खड़ी हूँ। यहाँ किसी मर्द को होना चाहिए। उसकी बातों का इतना असर हुआ कि कई युवकों ने जिहाद के लिए अपने नाम लिखवा दिए।

वापस लौटते हुए सुलेमान ने बात शुरू की, “आफिया इस संगठन का प्रधान मुझे नहीं, बल्कि तुझे होना चाहिए, पर...।“ आगे कुछ कहते कहते वह रुक गया। वह कहना चाह रहा था कि इस्लाम के अनुसार मर्द संगठन का मुखिया मर्द ही हो सकता है। उसको चुप हुआ देख आफिया बोली, “मैं तुम्हारी बात समझ गई हूँ। पर मैं इस बात के हक़ में हूँ कि इस्लाम ने औरत को जो भी रुतबा दे रखा है, वह सही है। मैं जिस ओहदे पर काम कर रही हूँ, वह ठीक है। बस, काम चलते रहना चाहिए।“

“आफिया, तूने कामीला की बात सुनी है।“ सुलेमान ने बात बदली।

“कामीला कौन ?“

“यह नई घटित घटना है, इसलिए तुझे पता नहीं होगा। कामीला एक जिहादी लड़की है जो कि इंग्लैंड में जन्मी-पली थी। वह अपने बलबूते पर ही बॉस्निया चली गई और जिहादी दलों में शामिल हो गई। लड़ाई में उसने काफ़िरों के छक्के छुड़ा दिए। उसकी बहादुरी की कहानियों से इंटरनेट भरा पड़ा है।“

“अच्छा ! औरत होकर उसने इतनी बहादुरी भरे कारनामे किए हैं, यह तो बहुत ही अहम बात है।“

आफिया उसकी बात सुनकर अपने आप में लीन हो गई। ख़याल में खोई आफिया कामीला की जगह स्वयं को देख रही थी। उसको लग रहा था कि बॉस्निया में कामीला नहीं, बल्कि वह गई हो। दुश्मनों के छक्के कामीला ने नहीं अपितु उसने छुड़ाये हों। उसके विचारों की लड़ी टूट गई जब सुलेमान की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, “पर...।“

“पर क्या ?“ आफिया ने सोच के घेरे से बाहर निकलकर उसकी ओर देखा।

“उसके बारे में बड़े मज़हबी लीडर इस बात से नाराज़ हैं कि वह एक औरत होकर अकेली ही जिहाद में शामिल हो गई है। मेरा मतलब ऐसे समय में उसके साथ उसका महरम होना चाहिए। इस्लाम के मुताबिक अगर कोई औरत जिहाद में हिस्सा लेती है तो वह घरवाले के बग़ैर यह काम नहीं कर सकती।“

“यह बात तो बिल्कुल ठीक है।“

“मेरा ख़याल है कि तुमने जिहादी वेबसाइट पर आज की ख़बर नहीं पढ़ी।“ अब तक शांत बैठी उनकी बातें सुन रही मार्लेन बोली।

“क्यों, क्या ख़बर है आज की ?“

“उस लड़की ने सूडान के किसी जिहादी के साथ निकाह कर लिया है। अब दोनों पति-पत्नी मुहाज़ पर लड़ रहे हैं।“

“ये हैं फिर सच्चे जिहादी जो सही ढंग से इस्लाम का पालन कर रहे हैं। काश कि...।“ आफिया बात बीच में ही छोड़ती हुई चुप हो गई। अब उसको ख़याल आया कि काश वह भी घरवाले के साथ जिहाद लड़ रही होती। कुछ आगे चलकर मार्लेन और सुलेमान उसे उतारकर आगे बढ़ गए। आफिया के ख़यालों में कामीला ही घूम रही थी। इतना ही नहीं, उसको रात में नींद भी नहीं आई। सारी रात वह किसी ख़याल से गुत्थम-गुत्था होती रही कि काश, वह किसी ऐसे व्यक्ति के साथ शादी करवाये जो कि जिहाद लड़ रहा हो या आवश्यकता पड़ने पर जिहाद में जाए। दिन चढ़ने तक उसने अपने आप से एक दृढ़ फैसला कर लिया कि वह ऐसे ही किसी लड़के के साथ विवाह करवाएगी जो उसकी इस सोच को पूरा करता हो।

आफिया ने युनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी कर ली थी। उसने बहुत अच्छे अंकों से पढ़ाई खत्म की थी। वर्ष 1995 के जनवरी महीने उसके माता-पिता उसकी ग्रेज्युएशन पर आए। ग्रेज्युएशन की पार्टी के बाद माँ-बाप के साथ वह अपार्टमेंट में आई तो उसकी माँ ने बात प्रारंभ की।

“आफिया, हम तेरी शादी के बारे में सोच रहे हैं।“

इस्मत की यह बात सुनकर आफिया की खुशी का ठिकाना न रहा। क्योंकि जबसे उसके माँ-बाप आए थे, तब से वह अवसर खोज रही थी कि किसी वक़्त वह माँ से बात करे और किसी जिहादी के साथ विवाह करवाने की अपनी ख्वाहिश बताए। अब उसके मन की हो गई जब माँ ने खुद ही बात छेड़ ली।

“अम्मी, उससे पहले मैं कुछ कहना चाहती हूँ।“

“हाँ, बोल।“

“अम्मी, मेरी दिली इच्छा है कि मैं किसी ऐसे लड़के से विवाह करवाऊँ जो कहीं जिहाद लड़ रहा हो।“

“आफिया, तेरा दिमाग तो नहीं खराब हो गया। मैंने तुझे क्या कहकर भेजा था ?“ इस्मत गुस्से में उसकी ओर लपकी। भवें सिकोड़ती वह कुछ पल आफिया की तरफ देखती रही और फिर सख़्त आवाज़ में दुबारा बोलने लगी, “मैं तुझे कई बार कह चुकी हूँ कि यह काम चैरिटी तक तो ठीक है, पर उससे आगे नहीं। तेरा असल मैदान तो राजनीति है। पाकिस्तान की राजनीति तुझे पुकार रही है। तू है कि पता नहीं क्या उल्टा-सीधा सोचती रहती है। अगर यह बात तेरे अब्बू ने सुन ली तो क़हर हो जाएगा।“

“पर अम्मी, मेरा मज़हब मुझे इजाज़त देता है कि अगर मुझे अच्छा न लगे तो मैं निकाह से इन्कार कर सकती हूँ।“

“पर इस में अच्छा या बुरा लगने वाली क्या बात है। मैंने तो तुझे अभी यह भी नहीं बताया कि तेरी मंगनी किसके साथ करने की सोच रहे हैं हम। साथ ही, मज़हब यह भी तो कहता है कि बच्चे को माँ-बाप की बात माननी चाहिए। तू पहले पूरी बात सुन ले।“

“हाँ, बताओ।“ आफिया ने मन में सोचा कि यहाँ सीधे ढंग से बात करने से बात नहीं बनने वाली। वह माँ-बाप की बात का जवाब नहीं दे सकेगी। उसने किसी दूसरे ढंग से बात को अपने हक़ में रखने का फैसला कर लिया।

“तुझे याद होगा कि जब पिछली बार तू पाकिस्तान आई थी, तो वहाँ जाहिरा खां नाम की एक बेगम साहिबा ने तेरा भाषण सुना था। बाद में उसका बेटा अमजद तुझे घर तक छोड़ने भी आया था। उस लड़के के साथ तेरी मंगनी की बात चल रही है। वह इस साल आगा खां युनिवर्सिटी से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर रहा है। फिर, वह एनेस्थीसियोलॉजी की उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका आ रहा है। हमारे मुताबिक यह लड़का हर तरह से तेरे योग्य है। तू अब सोचकर अपनी राय बता।“

माँ की बात सुनकर आफिया चुप हो गई और मन में सोचने लगी, ‘सीधे ढंग से तो माँ जिहाद वाली बात नहीं मानेंगी। पर कई बातों से यह लड़का मेरा अच्छा जीवन-साथी हो सकता है। वह यहाँ अमेरिका में होगा तो मैं उसको जिहाद में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित कर लूँगी। इस प्रकार मेरा मनोरथ भी पूरा हो जाएगा और घरवालों का मान भी रह जाएगा। मैं तरीके के साथ माँ को कहकर उस लड़के को जिहाद के लिए हामी भरवा लेती हूँ।’ मन में निर्णय करके आफिया माँ से बोली, “पर अम्मी, मेरा यह अधिकार है कि मैं अपने होने वाले घरवाले से पूछूँ कि क्या ज़रूरत पड़ने पर वह जिहाद में हिस्सा लेगा जो कि हर मुसलमान का पहला कर्तव्य है।“

इस्मत को उसकी बात कुछ-कुछ ठीक लगी। उसने सोचा कि इस तरह पूछने में क्या हर्ज़ है। इस प्रकार तो हर एक मुसलमान सोचता है कि अगर ज़रूरत होगी तो वह जिहाद में हिस्सा अवश्य लेगा। निकाह वग़ैरह के समय यह एक किस्म की रस्म ही समझी जाती है। उसने इस बात के विषय में आफिया को ‘हाँ’ कह दी और साथ ही, पाकिस्तान में अपने परिवार को खान परिवार तक यह बात पहुँचाने का संदेश भिजवा दिया। उधर खान परिवार वाले संदेश मिलने पर सद्दीकी परिवार के मज़हबी रहनुमा मुफ्ती साहिब से मिलने गए। सारी बातचीत करने के बाद मुफ्ती साहिब ने अमजद के साथ अलग ढंग से बात करते हुए पूछा, “बेटा अगर ज़रूरत पड़े तो क्या तू जिहाद में हिस्सा लेगा ?“

“क्या !“ अमजद हैरान हुआ। उसने सोचा कि वह एक डॉक्टर है, न कि कोई फौजी। फिर उसके मन में ख़याल आया कि एक मज़हबी रहनुमा होने के नाते मुफ्ती साहिब द्वारा इस तरह पूछा जाना स्वाभाविक है। उसने भी इसको एक रस्म-सी समझते हुए कहा, “जी, इंशा अल्लाह अगर खुदा ने चाहा तो ऐसा ही होगा।“ मीटिंग खत्म हो गई। यह बात अमेरिका बैठे सद्दीकी जोड़े की मार्फ़त आफिया तक पहुँच गई कि होने वाले दूल्हे ने जिहाद में हिस्सा लेने की सहमति प्रकट की है। उसने खुशी खुशी रिश्ते के लिए ‘हाँ’ कर दी। सद्दीकी परिवार के पाकिस्तान लौटने के बाद अमजद और आफिया की मंगनी हो गई। बाद में यह निकाह फोन पर ही हुआ।

इस बीच 1993 में बेनज़ीर भुट्टो दूसरी बार प्रधानमंत्री चुनी जा चुकी थी। सबको पता था कि वह अमेरिका समर्थक है। अमेरिकी सरकार ने पहली बात जो उससे कही, वह दुनिया के सबसे ज्यादा वांटेड आतंकवादी रम्जी युसफ को पकड़ने वाली बात थी। भुट्टो ने इसके लिए पूरी मदद देने का भरोसा दिया। इसके बाद कई बार छापे मारे गए, परन्तु रम्जी युसफ हर बार बच निकलता था। एक दिन भुट्टो ने अपने ख़ास अफ़सर से बात की तो उसने अपना विचार बताते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि आई.एस.आई. में रम्जी युसफ के ख़ास सैल हैं। वे हर बार पुलिस रेड होने से पहले ही उसको निकाल देते हैं। फिर, भुट्टो ने एक ऐसी टॉस्क फोर्स बनाई जिसकी वह स्वयं इंचार्ज़ थी। इस टॉस्क फोर्स में सभी उसके विश्वसनीय अफ़सर थे। इसका परिणाम यह हुआ कि अगले ही महीने रम्जी युसफ पकड़ा गया। उसको गिरफ्तार करते ही अमेरिकी सरकार उसको अमेरिका ले गई। इससे बेनज़ीर भुट्टो पर बहुत तोहमतें लगीं कि उसने मुसलमान होकर एक मुसलमान को काफ़िरों के हवाले कर दिया है। परन्तु उसने इसकी ज़रा भी परवाह नहीं की। बल्कि इसके पश्चात वह आतंकवादियों के पीछे हाथ धोकर पड़ गई। सबसे पहला काम उसने यह किया कि आई.एस.आई के मुखिया और आतंकवादियों के कट्टर समर्थक जावेद नासिर को पद से हटा दिया और उसके स्थान पर अपना ख़ास व्यक्ति बिठा दिया। इस क्षेत्र में वह और भी बड़े काम कर रही थी, पर इस दौरान उसकी सरकार भ्रष्टाचारों के चक्कर में फंस गई और अपना कार्यकाल भी पूरा न कर सकी। अगले चुनाव में भुट्टो की पार्टी हार गई और भुट्टो स्थाई तौर पर देश छोड़कर इंग्लैंड चली गई।

ग्रेज्युएशन होने के बाद भी आफिया ने एम.आई.टी. में अपनी कम्प्यूटर की पार्ट टाइम नौकरी जारी रखी थी। आजकल उसको महसूस होने लगा था, मानो उसका हर वक़्त पीछा किया जाता हो। उसने इस विषय में सुहेल से बात की तो सुहेल ने बताया कि एफ.बी.आई. केयर ब्रदर्ज़ संगठन के पीछे पड़ा हुआ है, इसलिए बचकर रहा जाए। केयर ब्रदर्ज़, एम.एस.ए. और अन्य संगठन सहमे-से रहने लगे थे। हर किसी को लगता था कि एफ.बी.आई. उनके पीछे घूम रही है। फिर तभी 19 अप्रैल 1995 को आक्लोहामा सिटी की मूरा नामक फैडरिल बिल्डिंग में भयानक बम धमाका हो गया जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। सारा अमेरिका दहल उठा। एफ.बी.आई. ने ध्यान से देखा तो पता चला कि इस बम धमाके के सारे तौर-तरीके उस बम धमाके से मिलते-जुलते थे जो रम्जी युसफ ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नॉर्थ टॉवर के पार्किंग लॉट में किया था। एफ.बी.आई. सभी मुस्लिम संगठनों के पीछे हाथ धोकर पड़ गई। ख़ास तौर पर केयर ब्रदर्ज़ के पीछे। अगले दिन आफिया काम पर गई तो उसको सहकर्मी ने बताया कि कुछ देर पहले ही उसको एफ.बी.आई वाले खोजते हुए आए थे। आफिया तुरन्त वापस लौट आई और बाहर से ही चिकागो चली गई। उसकी बड़ी बहन फौजिया कुछ महीने पहले ही पढ़ने के लिए चिकागो आई थी और वहाँ एक अपार्टमेंट में रहती थी। आफिया उसके पास जा ठहरी। वहीं उसको एक दिन सुहेल का फोन आया। आवाज़ पहचानते हुए वह बोला, “आफिया, आक्लोहामा सिटी बम धमाके का दोषी पकड़ा जा चुका है।“

“अच्छा ! कौन है वो ?“

“वह टिम्थी मकबेथ नाम का कोई अमेरिकी है।“

“अच्छा ! अमेरिका में भी जिहादी पैदा होने लग पड़े।“ आफिया हँसी।

“तू यह बात छोड़, पर उसके पकड़े जाने से हम लोगों को बहुत फायदा हुआ है।“

“वह कैसे ?“

“क्योंकि अब तक अमेरिकी सरकार समझती थी कि यह धमाका किसी इस्लामिक जिहादी ने किया है। इस कारण हमारे सभी संगठनों के पीछे हाथ धोकर पड़ गई थी। पर अब सब कुछ बदल गया है। अपनी ओर से वे पीछे हट गए हैं। तू चाहे तो वापस आ सकती है। वैसे तेरी मर्ज़ी है, पर जो भी तेरा प्रोग्राम बने, मुझे बता देना।“

इसके बाद, सुहेल ने फोन काट दिया और आफिया के सिर पर से भी बोझ उतर गया।

(जारी…)
 
8

अक्तूबर 1995 में अमजद अमेरिका पहुँचा। उसी नई-नवेली दुल्हन आफिया चिकागो एअरपोर्ट पर उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। वहाँ से वह अमजद को लेकर फौज़िया के अपार्टमेंट में आ गई। फिर, वे होटल चले गए। लगभग दो हफ़्तों का वक़्त उन्होंने होटल में गुज़ारा। अगले करीब दो महीने फौज़िया के घर रहे। फिर वो बॉस्टन, मैसाचूसस चले आए। यहाँ आकर उन्होंने किसी बड़ी इमारत के निचले हिस्से का छोटा-सा अपार्टमेंट ले लिया और अपनी ज़िन्दगी शुरू कर दी। अमजद को यह छोटा-सा अपार्टमेंट बिल्कुल भी नहीं भाया। वह एक बड़े परिवार और अच्छे खाते-पीते घर से आया था। पाकिस्तान में वे तीन भाई, माँ-बाप के साथ भरे-पूरे परिवार में रहते थे। यहाँ यह गूठ-सी जगह उसको अच्छी नहीं लगती थी। समय पाकर उन्होंने शहर से बाहर छोटे-से कस्बे मालडेन में बड़े हाई-वे 95 से थोड़ा आगे हटकर काफी बड़ा और खुला अपार्टमेंट ले लिया। यहाँ आकर अमजद बहुत खुश हुआ। उसकी ब्याहता ज़िन्दगी बहुत बढ़िया ढंग से शुरू हुई थी। वह आफिया को जी-जान से चाहने लगा था और आफिया भी अमजद को गहरी मुहब्बत करने लगी थी। दोनों को लगता था कि वे एक-दूजे के लिए ही बने हैं। इन दिनों दोनों के मध्य प्यार-मुहब्बत की बातें ही खत्म होने का नाम न लेती थीं। अमजद को लगता था कि यह भोली भाली-सी लड़की कभी गुस्सा तो होती ही नहीं होगी। पर फिर एक दिन बातें करते हुए आफिया ने अचानक कुछ ऐसा कहा कि अमजद के मुँह में कड़वाहट घुल गई। वह बोली, “अमजद, मुझे पिछली गर्मियों में एफ.बी.आई. खोजती रही थी।”

“किस बात के सिलसिले में ?“ वह हैरान होकर आफिया की ओर देखने लगा।

“यह तो मालूम नहीं, पर मैं एक बात बता देती हूँ कि अगर ऐसा कभी दुबारा हुआ तो मैं अमेरिका में नहीं रहूँगी।”

“लेकिन पता तो चले कि बात क्या है। कोई तो वजह होगी कि एफ.बी.आई. तेरे पीछे आई। तू जो कह रही है कि अगर वे दुबारा आए तो तू यहाँ नहीं रहेगी, तुझे थोड़ा-बहुत तो शक होगा ही कि वे किसी बात पर तुझे तलाश रहे थे।”

“मैंने कह दिया न कि मुझे नहीं मालूम।” इतना कहकर आफिया उठकर चल दी। अमजद भौंचक-सा उसकी ओर देखता रहा। पहली बार वह आफिया को गुस्से में देख रहा था। दो दिन वह इस तरह चुप चुप-सी रही। कुछ दिनों के बाद वह फिर घुलमिल गई। अमजद भी यह बात भूल गया। परंतु अगली बार उसने आफिया का और भी अधिक भयानक रूप देखा। असल में, इससे पहले अमजद दाढ़ी बढ़ाकर और ट्रिम करके रखता था। पर उसने पाकिस्तान में रहते हुए सुन रखा था कि अमेरिका में पाकिस्तानी चेहरे-मोहरे वाले व्यक्ति को अलग ही निगाह से देखा जाता है। वैसे वह रोजे भी रखता था और नमाज भी पढ़ लेता था, पर वह कट्टर नहीं था। इसलिए उसने अपनी सुविधा के लिए एक दिन शेव करवा ली। वह घर आया तो पहले तो आफिया उसको पहचान ही न सकी। फिर एकदम भड़ककर बोली, “तुम्हें शर्म नहीं आई दाढ़ी कटवाते हुए ?“

“क्यों, इसमें शर्म वाली कौन सी बात है। मैंने क्या गुनाह कर दिया ?“

“एक मुसलमान होकर तुम सफाचट करवाए घूमते हो और अभी पूछते हो कि क्या गुनाह कर दिया।”

“मैंने एक मज़हबी नेता की सलाह ली थी। उसका कहना है कि किसी अच्छे काम के लिए तुम्हें दाढ़ी कटवानी पड़े तो तुम कटवा सकते हो। जब मौका मिले तो फिर रख लो।”

“तुम ऐसा कौन-सा नेक काम करने लग पड़े कि तुम्हारे दाढ़ी रखने से वो काम नहीं हो सकता था।”

“आफिया, मैंने पढ़ाई शुरू कर ली है। हर रोज़ कालेज जाता हूँ। मैं नहीं चाहता कि वहाँ लोग मुझे दूसरी नज़रों से देखें।”

“अच्छा ! तुम्हें मुसलमान होने के कारण शर्म महसूस होती है।”

“यह बात नहीं है। तुम मेरी बात को समझने की कोशिश करो।”

बहस आगे ही आगे बढ़ती गई। आफिया कोई बात सुनने की बजाय आग-बबूला होती गई। आखि़र, वह इतने गुस्से में आ गई कि करीब होकर वह अमजद की छाती पर मुक्के मारती हुई चीखने-चिल्लाने लगी। पहले तो अमजद को बहुत गुस्सा आया, पर जब उसने देखा कि आफिया अपने छोटे छोटे हाथों से उसको बच्चों की तरह पीट रही है तो मन ही मन उसको हँसी आ गई। उसने विरोध करना छोड़ दिया। आखि़र, आफिया मुक्के मारते मारते हाँफ गई। उसने पलभर अमजद की तरफ देखा और फिर उसकी छाती से लगकर उसको अपनी बांहों में भरकर ज़ोर-ज़ोर से रोने गी। अमजद ने उसको छाती से कस लिया। उनके बीच की सारी कड़वाहट चली गई। इसके साथ ही अमजद को उसके रूठने और इस तरह खुद मान जाने का निराला ढंग बहुत ही प्यारा लगा। ज़िन्दगी अपने ढंग से फिर चलने लगी। मगर आफिया ने अमजद से यह वायदा ले लिया कि वह शीघ्र ही फिर से दाढ़ी बढ़ा लेगा। कुछ ही सप्ताह बीते थे कि एक दिन वह नई स्कीम लेकर घर आई।

“अमजद, मैं और सुलेमान अहमर ने एक बहुत बढ़िया काम सोचा है।”

“यह सुलेमान कौन है ?“

“यह बैनेवोलैंस इंटरनेशनल संगठन का डायरेक्टर है। तुम्हें पता है कि मैं चैरिटी के काम के सिलसिले में ऐसे लोगों से मिलती रहती हूँ।”

“क्या है तुम्हारा यह नया ख़याल ?“ अमजद ने सोचा कि आफिया उसको फिर से दाढ़ी बढ़ाने या कोई ऐसा ही काम कहेगी।

“क्यों न हम दोनों बॉस्निया चलें ?“

“बॉस्निया ? वह क्यों ?“

“मैं वहाँ जाकर अनाथों के लिए स्कूल खोल लूँगी और तुम कोई अस्पताल चला लेना। कुछ देर बाद हम सचमुच के जिहाद में शामिल हो जाएँगे।”

उसकी बात सुनकर अमजद के पैरों तले से धरती खिसक गई। उसको कोई भी बात न सूझी। उसके तो यह सुनकर ही होश गुम हो गए कि उसकी घरवाली जिहाद के प्रति इतनी समर्पित है। वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “आफिया, मैं यहाँ पढ़ने के लिए आया हूँ, न कि लड़ने। मेरी ज़िन्दगी का लक्ष्य पढ़ाई करके मेडिकल के क्षेत्र में प्रैक्टिस करने का है। मैं ऐसे कामों में हिस्सा लेने वाला इन्सान नहीं हूँ।”

“पर विवाह से पहले तुमने जिहाद में शामिल होने की हामी क्यों भरी थी फिर ?“

उसकी बात सुनकर अमजद को धक्का लगा। उसको वह वक़्त स्मरण हो आया जब मुफ्ती साहिब ने उससे पूछा था कि ज़रूरत पड़ने पर क्या वह जिहाद में हिस्सा लेगा और उसने इसे विवाह से पहले की एक मज़हबी रस्म समझकर हाँ कर दी थी। मगर आज उसको लगा कि मुफ्ती साहिब ने यह बात आफिया के कहने पर ही उससे पूछी होगी।

“तुम बोलते क्यों नहीं ? क्या सांप सूंघ गया तुम्हें ?“ आफिया गरम होने लगी तो अमजद चुपचाप घर से बाहर निकल गया। अगले दो दिन उनके बीच तनाव जारी रहा। लेकिन तीसरे दिन आफिया को पता चला कि वह गर्भवती है। इस बात ने उनके बीच सारी कड़वाहटें दूर कर दीं। आफिया बॉस्निया जाने वाली बात भूलभुला गई। अमजद ने आफिया के गर्भवती होने के बारे में अपने और उसके माता-पिता के घर में जब बताया तो सब तरफ खुशी फैल गई। इसी दौरान आफिया की माँ ने अमजद के साथ आफिया के भविष्य को लेकर बात शुरू की, “अमजद, आफिया कह रही है कि अब उसको आगे पढ़ना है ?“

“क्या ! इस हालत में ? अम्मी, अब तो उसको आराम करना चाहिए।”

“अमजद, तुम नहीं जानते इस लड़की में कितनी एनर्जी भरी हुई है। तुम इसकी जिद्द भी जानते हो। अगर इसने तय कर लिया है कि इसको अब पढ़ाई शुरू करनी है तो यह शुरू करके ही रहेगी।”

“मैं तो चाहता था कि बच्चे के जन्म तक इसको आराम करना चाहिए।”

“नहीं अमजद, यह जो करना चाहती है, करने दे। तुम देखना, यह इन हालात में भी क्लास में टॉप करेगी। मगर तू एक बात ज़रूर कर।”

“हाँ, बताओ।”

“मैं चाहती हूँ कि यह डॉक्टर बने। कम से कम इसके नाम के साथ डॉक्टर अवश्य लगे।”

“पर इसका प्रारंभिक क्षेत्र तो दूसरा है। फिर इस स्टेज पर आकर...।”

“तू इसको कह कि यह न्यूरो-साइंस के क्षेत्र में आगे की पढ़ाई करे।”

“अम्मी, उस क्षेत्र में तो दिमागी मेहनत बहुत करनी पड़ेगी।”

“जब इसके सामने चैलेंज होता है तभी इसकी सारी शक्ति प्रयोग में आती है। बस तू इसको मेरी कही बात मनवा।”

इसके पश्चात् अमजद ने आफिया के साथ बात की। उसने पहली बात तो यही कही कि उसको आगे पढ़ने से न रोका जाए, मगर साथ ही यह भी बता दिया कि उसको अम्मी की चाहत का पता है। इसलिए उसने न्यूरोसाइंस के कागनेटिव क्षेत्र में पी.एच.डी. करने का मन बना लिया है। अमजद हैरान रह गया, जब उसे पता चला कि आफिया ने अपने तौर पर इसके लिए दाखि़ला भी ले लिया है और पढ़ाई प्रारंभ होने वाली है। उसको अपनी पत्नी की कुशलता पर गर्व महसूस हुआ।

“आफिया, तुमने इसके लिए कौन-सा कालेज चुना है ?“

“मैंने ब्रैंडीज़ यूनिवर्सिटी चुनी है। उन्होंने मेरा पढ़ाई का रिकार्ड देखते हुए ही मुझे दाखि़ला दिया है। तुम्हें पता ही है कि ऐरे-गैरे को तो वे करीब भी नहीं फटकने देते।”

“पर आफिया, तुम वहाँ कैसे अडजस्ट करोगी ? तुम्हें पता ही है कि वह यूनिवर्सिटी तो यहूदियों की है।”

“हाँ, मुझे पता है। पर मुझे भी वहीं काम करने में मज़ा आता है, जहाँ आगे विरोध हो। तुम देखना तो सही, मैं उनकी यूनिवर्सिटी की ऐसी की तैसी कैसे करती हूँ।”

“तेरी मर्ज़ी है। वैसे मुझे पता है कि तुम्हारे लिए दुनिया में कुछ भी कठिन नहीं है।”

बहस समाप्त हो गई और आफिया ने यूनिवर्सिटी जाना प्रारंभ कर दिया। ब्रैंडीज़ यद्यपि अपने तौर पर धर्म-निरपेक्ष रहने की कोशिश करती थी मगर उसके सारे ताने-बाने पर यहूदी संस्कृति भारी थी। विशेषतौर पर आफिया जैसी कट्टर मुसलमान के लिए तो वहाँ एडजस्ट करना बहुत ही कठिन था। परंतु आफिया अंदर से खुश थी। क्योंकि ऐसे विरोधाभास में ही उसको आनंद आता था। खै़र, जब उसने यूनिवर्सिटी जाना शुरू किया तो उस वक़्त वह सात माह की गर्भवती थी। पढ़ाई शुरू होते ही आफिया ने यहूदी सभ्याचार के विषय में पढ़ना शुरू कर दिया। इसके साथ ही उसने इज़राइल की इंटैलीजेंस एजेंसी, मुसाद के बारे में भी जानकारी एकत्र करना प्रारंभ कर दी। शायद वह अपने होने वाले दुश्मन के बारे में पूरी जानकारी ले लेना चाहती थी। वह पूरी तरह इस्लामी लिबास में लिपटी हुई पहले दिन कालेज पहुँची। उसका इस प्रकार का पहरावा या उसका मुसलमान होना उसके लिए कोई कठिनाई पैदा नहीं करता था, अपितु इसके लिए एक बात और थी। आफिया का विचार था कि यह यूनिवर्सिटी अपने आप को धर्म निरपेक्ष कहती है जबकि अंदर से यह बिल्कुल यहूदी रंग में रंगी हुई है। बस, इसी बात को आधार बनाकर वह यूनिवर्सिटी के साथ पंगा करने के लिए तैयार हो रही थी। इसका पहला रंग उसने अपने पहले लैक्चर में ही दिखा दिया। दूसरों की भाँति उसको भी किसी ख़ास क्षेत्र में रिसर्च करके पर्चा लिखने और पढ़ने के लिए कहा गया। उसके पर्चे का विषय था - ‘प्रेगनेंट वुमन एंड अल्कोहल।’ उसने अपने पर्चे में कहा कि गर्भवती स्त्री के शराब पीने से होने वाले बच्चे के दिमाग पर असर पड़ता है। यहाँ तक तो ठीक था, पर उसने आगे कहा कि इसीलिए तो अल्लाह ने कुरान में शराब पीने की मनाही की हुई है। उसके प्रोफे़सर इस बात से नाराज़ हो गए। वह उसको समझाते हुए बोले, “देख आफिया, हम साइंसटिस्ट हैं। हम वही बात कह सकते हैं जिसे सिद्ध कर सकते हों। डॉक्टरों द्वारा शराब पीने वालियों और न पीने वाली गर्भवती स्त्रियों पर स्टडी की गई है। यहीं से यह बात साबित होकर सामने आई कि शराब पीने वालियों के बच्चे दिमागी तौर पर सही डवलैप नहीं होते। हम इसी स्टडी के आधार पर यह बात कह सकते हैं कि गर्भ के दौरान शराब बच्चे पर बुरा प्रभाव डालती है।”

“नहीं, यह इस तरह नहीं है...।” वह उनकी बातों का उत्तर देते हुए पलभर रुकी और फिर कहने लगी, “जो कुछ भी है, वह सब कुरान में दर्ज़ है। हम साइंसटिस्टों को चाहिए कि कुरान की पढ़ाई करके उसी हिसाब से आगे के कामों को दिशा दें।”

उसकी बात सुनकर प्रोफेसर और अधिक अपसेट हो गए। उन्होंने उसको समझाने की काशिश की, पर वह टस से मस न हुई। आगे भी वह अपने परचों में कुरान में से लिए गए कुटेशन प्रयोग करती रही। इससे उसका डिपार्टमेंट उसके साथ और नाराज़ होता गया। इससे भी आगे बढ़ते हुए आफिया ने इस युनिवर्सिटी के बारे में लिखना शुरू कर दिया कि स्वयं को धार्मिक निरपेक्ष बताने वाली यह युनिवर्सिटी अति दर्ज़े की कट्टर धार्मिक है। आख़िर उसको उसके डिपोर्टमेंट की ओर से नोटिस मिल गया कि वह अपनी सीमा में रहे, नहीं तो उसके विरुद्ध एक्शन लिया जाएगा। वह डरी नहीं अपितु सीधी डीन के दफ़्तर में जा पहुँची। डीन ने उसको समझाने का यत्न किया, मगर वह चिढ़कर बोली, “या तो मुझे चुपचाप मेरी डॉक्टरीन करने दो, नहीं तो फिर मैं आपके खिलाफ़ ऐसा मोर्चा खोलूँगी कि आपकी रेपूटेशन की ऐसी-तैसी फेर दूँगी।”

उसकी बात सुनकर डीन ने पल भर सोचा और फिर बोला, “मिस आफिया, यदि तू वायदा करे कि चुपचाप अपनी पढ़ाई तक ही सीमित रहेगी तो मैं तेरे डिपार्टमेंट को हिदायत कर दूँगा कि तुझे नाजायज़ तंग न किया जाए।”

आपसी सहमति के बाद बात ठंडी तो पड़ गई, पर डीन ने उसके डिपार्टमेंट को अंदरखाते कह दिया कि जैसे तैसे करके वक़्तकटी करो और इस आफत से पीछा छुड़वाओ। तभी, आफिया की माँ इस्मत पाकिस्तान से उनके पास आ गई। वह आफिया के होने वाले बच्चे के कारण उसकी मदद के लिए आई थी। इस कारण आफिया का भी ध्यान बंट गया। इस्मत को बच्चे की देखरेख के लिए स्पेशल वीज़ा मिला था जिसके कारण आगे चलकर उसको ग्रीन कार्ड भी मिल गया। आफिया ने निश्चित समय से पहले ही अपनी पढ़ाई अच्छे नंबरों से पास कर ली। उसका सिर्फ़ लैबोटरी वाला काम शेष रहता था। इसके लिए वह रात की शिफ्टों में आतीं या फिर रविवार के दिन आ जाती। यहाँ उसका जो इंचार्ज़ था, वह पुराने विचारों वाला बड़ी आयु का यहूदी था। उससे आफिया ने कहा कि बच्चे की आमद के कारण उसके लिए दिन के समय आना कठिन है। उसने आफिया को अपना लैब वर्क रात की शिफ्ट में अथवा वीकएंड पर करने की अनुमति दे दी। आफिया ने उसका तहेदिल से धन्यवाद करते हुए कहा, “सर, आपकी बड़ी मेहरबानी जो आपने मेरी मदद की।”

“कोई बात नहीं आफिया, तू मेरी बेटी जैसी है। तेरी मदद करना मेरा फर्ज़ बनता है।”

“सर आप, अपनी सोच के कारण किसी बहुत ही धार्मिक मुसलमान जैसे लगते हैं।”

“अच्छा ! मुसलमान धर्म में भी इस तरह ही सोचा जाता है ?“

“हाँ सर, आप इस्लाम के बारे में कोई किताब पढ़कर तो देखो।”

“अच्छा कभी तुझे कोई अच्छी-सी किताब मिले तो मेरे लिए लेते आना। मैं ज़रूर पढ़ूँगा।”

इसके बाद आफिया ने उसके घर बड़े बड़े मुसलमान स्कॉलरों की किताबों के ढेर लगा दिए। पर उसको पढ़ने की फुर्सत कहाँ थी। उधर आफिया समझती थी कि यह सारी किताबें बहुत ही रोचकता से पढ़ रहा है। एक दिन उसने पूछ लिया, “सर, आपको कैसी लगीं ये किताबें ?“

“अच्छी हैं, अच्छे विचार है इन लेखकों के।” उसने पढ़ी यद्यपि एक भी किताब नहीं थी, पर उसने आफिया का दिल रखने के लिए यह बात कह दी। इस बात से उत्साहित होकर आफिया उसके घर जाने लग पड़ी। टीचर को उसके बारे में ज्यादा पता नहीं था, पर उसको उसका भोलापन अच्छा लगता था। वह उसको अक्सर ही कह देता कि तू तो मेरी बेटी है। जब लैबवर्क खत्म हो गया तो आफिया एक दिन उसके घर गई। आम बातें करते हुए बोली, “सर, आप मुझे अपनी बेटी समझते हो, आपको मुसलमान धर्म भी अच्छा लगता है।”

“हाँ, मैं तुझे अपनी बेटी समझता हूँ।”

“फिर सर अपनी बेटी की एक बात मान लो।”

“हाँ, बोल बेटे।”

“आप इस्लाम मज़हब अपना लो।”

“क्या ?...“ यह बात उसका सुनकर रंग उड़ गया। उसका पलभर कोई बात ही न सूझी। वह भौंचक -सा आफिया की तरफ देखने लगा। वह मुस्करा रही आफिया के चेहरे की ओर देख रहा था। साथ ही वह इस मासूम मुस्कराहट के पीछे छिपे क्रूर चेहरे को पहचान चुका था।

“मिस आफिया अब तू जा सकती है। अपना लैबवर्क खत्म हो गया है। अपना अध्यापक और विद्यार्थी का नाता भी खत्म हो चुका है। मैं चाहूँगा कि तू मुझे भविष्य में कभी न मिले।” इतना कहते हुए वह उठा। आफिया दरवाज़ा खोलकर बाहर निकली तो टीचर ने भड़ाक-से दरवाज़ा बंद कर लिया।

उधर अफगानिस्तान में बहुत कुछ बदल रहा था। सोवियत यूनियन के वहाँ से निकल जाने के बाद भिन्न भिन्न दलों के वार लोर्ड मिलजुल कर सरकार चला रहे थे। परंतु फिर वहाँ एक नया ही संगठन पैदा हो गया। इस नए संगठन का नाम था - तालिबान। तालिबान अर्थात विद्यार्थी। अफगानिस्तान से आए रिफ्यूजियों के बच्चों के लिए, पाकिस्तान में जो मदरसे खोले गए थे, उनमें उन्हें मज़हबी तालीम देने के अलावा लड़ाई के लिए तैयार किया गया था। अफगानिस्तान के जिस जाने-माने मज़हबी रहनुमा की अगुवाई में यह काम हुआ था, उसका नाम था - मुल्ला उमर। मुल्ला उमर ने सोवियत यूनियन के साथ लड़ाई के समय बड़ी भूमिका अदा की थी। मुल्ला उमर के तालिबानों को पाकिस्तान के अलावा सउदी अरब सरकार का पूरा समर्थन हासिल था। खै़र, जब उसने अपने तालिबानों की फौज अफगानिस्तान के अंदर उतारी तो वहाँ वार लोर्डों में भगदड़ मच गई। तालिबान नौजवान बहुत ही जोशिले थे जो इन वार लोर्डों की फौजों को हर फ्रंट पर मात देते चले गए। आखि़र 1995 में आकर तालिबानों ने वार लोर्डों की कमर तोड़कर रख दी और अफगानिस्तान के उत्तर की ओर के थोड़े-से इलाके को छोड़कर सारे अफगानिस्तान पर अपना अधिकार जमा लिया। लोगों को लगा कि अब पुराने लीडरों की वहशी कारवाइयों से पीछा छूट जाएगा। पर यह उनका भ्रम साबित हुआ। तालिबानों ने आते ही ऐसे शरीअत कानून लागू किए कि लोगों का सांस लेना भी कठिन हो गया। इन नए कानूनों ने खासतौर पर औरत का तो गला ही दबा दिया। हर क्षेत्र में उनकी आज़ादी खत्म कर दी गई। औरतों के स्कूल कालेज बंद कर दिए गए। औरतों को नौकरी करने से रोक दिया गया। औरत के अकेली घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी गई। बग़ैर किसी नज़दीकी रिश्तेदार के वह घर से बाहर नहीं जा सकती थी। औरतों पर पाबंदियाँ लग गईं। हार-शिंगार पर पाबंदी, अच्छा पहनने पर पाबंदी, ऊँची एड़ी की सैंडिल पहनने पर पाबंदी, बाहर कहीं भी ऊँचे स्वर में हँसने पर पाबंदी। इसके अतिरिक्त गीत-संगीत के स्टोर वगैरह आग लगाकर राख कर दिए गए। ख़बरों के अलावा रेडियो पर हर प्रोग्राम को रोक दिया गया और सिनेमाघर बंद कर दिए गए। गाना-नाचना बंद, साहित्य-कविता आदि की किताबें बंद। तात्पर्य यह कि कोई ऐसा क्षेत्र नहीं था जहाँ मज़हबी पाबंदी न लगी हो। इस तालिबान लीडरशिप को पाकिस्तान की पूरी सरपरस्ती हासिल थी। पाकिस्तान का मज़हबी ग्रुप, संगठन आदि इस सारी मूवमेंट के पीछे था। आफिया के परिवार का इसी संगठन के साथ संबंध था। सो, आफिया इस सबको बड़े रोमांच-से देख रही थी। जब तालिबानों ने मानवीय अधिकारों का क़त्ल करने में कोई कसर न छोड़ी तो यू.एन.ओ. ने अफगानिस्तान को सारी मदद बंद कर दी। इससे चिढ़कर कट्टर लीडरों ने अल रशीद नाम का संगठन शुरू कर लिया जिसका काम तालिबानों के लिए फंड आदि का प्रबंध करना था। इसने अपने अख़बार भी निकाले। आफिया इस सबके हक में थी। उसने इन अख़बारों के लिए लेख भी लिखे। इस दौरान अमेरिका ने अफगान सरकार को आगाह किया कि वह सउदी अरब के करोड़पति इंतहापसंद ओसामा बिन लादिन को पनाह देना बंद करे। मगर तालिबान सरकार ने इस बात की कोई परवाह नहीं की। आफिया इस बात के कारण भी तालिबानों के हक में खड़ी हुई। उसके लिए ओसामा बिन लादिन हीरो था।

ओसामा बिन लादिन पहली बार अमेरिका की नज़रों में 1993 में तब आया जब वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नॉर्थ टॉवर के अंदर रम्ज़ी यूसफ द्वारा किए गए बम धमाके वाला केस शुरू हुआ। जांच के दरम्यान पता चला कि अपनी रूपोश ज़िन्दगी के दौरान रम्जी यूसफ, ओसामा बिन लादिन के गैस्ट हाउस में ठहरता रहा था। यहीं से ही ओसामा बिन लादिन के विषय में पूरी जानकारी एकत्र की गई तो पता चला कि वह सउदी अरब का एक अमीर और इंतहापसंद व्यक्ति है जो कि अफगानिस्तान की लड़ाई के समय अपनी निजी फौज से सोवियत यूनियन के खिलाफ लड़ता रहा है। बाद में उसको उसकी सरकार यानी सउदी अरब ने उसकी बगावती कार्रवाइयों के कारण देश से बाहर निकाल दिया। वह कुछ समय सूडान में रहा और मुल्ला उमर की तालिबान सरकार के अस्तित्व में आने के बाद उसने अफगानिस्तान में आकर स्थायी तौर पर डेरा जमा लिया।

आफिया को ओसामा बिल लादिन की जीवनशैली ने बहुत प्रभावित किया। जब वह नीचे ज़मीन पर बैठकर खा रहा होता या अपने साथयों के साथ जंगलों में भटक रहा होता तो आफिया की आँखें भर आतीं। वह सोचती कि यदि यह चाहे तो एक शहजादे की ज़िन्दगी व्यतीत कर सकता है। पर इसने सब कुछ धर्म के नाम अर्पित कर दिया है। आफिया के दिल में मुहम्मद साहिब के बाद यदि किसी की इज्ज़त थी तो वह ओसामा बिन लादिन की थी।

(जारी…)
 
9

आफिया ने पढ़ाई और लैब का सारा काम समाप्त कर लिया था। अब वह पी.एच.डी. के लिए अपना थीसिस लिख रही थी। अमजद ने भी अपनी रेज़ीडैंसी खत्म कर ली थी। उसने सेंट विन्सेंट होस्पीटल में इंटर्नशिप शुरू कर ली थी। वे दोनों बॉस्टन से पैंतीस-चालीस मील दूर पड़ने वाले शहर वोरैस्टर में मूव हो गए। वोरैस्टर में केयरब्रदर्स के बहुत सारे सदस्य रहते थे। यहाँ की स्थानीय मस्जिद का इमाम मुहम्मद मासूद था। यह पुराना एम.एस.ए. का सदस्य रह चुका था। इसके अलावा मुहम्मद मासूद का भाई पाकिस्तानी आतंकवादी ग्रुप लश्करे तायबा का लीडर था। इन बातों के कारण आफिया को वोरैस्टर बहुत पसंद आया। यहाँ लश्करे तायबा संगठन का औरतों का एक विंग भी था, जिसकी उमा हमाद प्रधान थी। मगर आफिया को उमा हमाद अच्छी न लगी। उसने सोच लिया कि वह यहाँ अपना एक पृथक संगठन बनाएगी। उसकी माँ उसका नवजन्मा बच्चा जिसका नाम अहमद रखा था, को संभालती थी। आफिया इस वक़्त फुर्सत में होने के कारण आसपास के इस्लामिक संगठनों की जांच-पड़ताल कर रही थी। तभी आफिया का पिता बीमार हो गया। उसकी माँ ने काफी सोच-विचार किया और इस नतीजे पर पहुँची कि आफिया का बेटा कई महीनों का हो चुका है और वह उसकी खुद देखरेख कर सकती है। इसके अगले सप्ताह ही इस्मत पाकिस्तान चली गई। अगले दिनों में घर में काफी भूचाल आ गया। अब तक तो आफिया को माँ के होते किसी काम की चिन्ता ही नहीं थी, पर अब घर का ही नहीं बल्कि अहमद का भार भी उस पर आ पड़ा। उसने अहमद के लिए बाहर किसी बेबी सिटर के यहाँ प्रबंध कर लिया। उसको वहाँ छोड़ने भी अमजद ही जाता था और लेकर भी खुद आता था। आफिया को अपने कामों से ही फुर्सत नहीं थी। एक दिन अमजद घर लौटा तो अहमद रो रहा था जबकि आफिया किसी के साथ फोन पर हँस हँसकर बातें कर रही थी।

“आफिया ?“ अमजद बैग एक तरफ रखता हुआ चिल्लाते हुए ऊँची आवाज़ में बोला।

“क्या है ? क्यों धरती सिर पर उठा रहे हो ? खै़र तो है।” आफिया दूसरी ओर फोन होल्ड करने को कहकर धीमे स्वर में बोली।

“क्यों ? तुझे नहीं दिख रहा कि बच्चे का रो रोकर बुरा हाल हो रहा है और तुम हो कि बातों से ही फुर्सत नहीं है।”

“बच्चे को तो तुम भी चुप करवा सकते हो। यूँ कूदने की क्या ज़रूरत है।”

“क्यों, कूदूँ नहीं तो और क्या करूँ ? सवेर के समय अहमद को बेबी सिटर में छोड़ने मैं जाता हूँ। शाम के वक़्त मैं ही उसको वापस लेकर आता हूँ। तू सारा दिन खाली रहकर क्या इतना भी नहीं कर सकती। इसकी छोड़, पर जब वो घर आ गया, उसके बाद तो उसको तू संभाल सकती है।”

“तुम्हें मैं खाली नज़र आती हूँ। तुम्हें पता है कि मैं और मेरा संगठन आजकल क्या कर रहा है ?“

“तू ही बता दे।” अमजद खीझा हुआ बोला।

“हम बॉस्निया के जिहादी परिवारों के लिए फंड इकट्ठा कर रहे हैं।”

“अब तो बॉस्निया में शांति हो चुकी है। अब तो तू इस बात का पीछा छोड़ दे।”

“मिस्टर अमजद, जिहाद कभी ख़त्म नहीं होगा। यह तब तक चलता रहेगा जब तक सारे संसार में इस्माल का झंडा न फहराने लग पड़े। अब लड़ाई बॉस्निया में नहीं हो रही तो क्या हुआ। अगला फ्रंट चेचनिया और कास्वो में खुल चुका है।”

“तेरे इस जिहाद मेरा घर बर्बाद कर देगा, आफिया।”

“और जिनके घरघाट पहले ही उजड़ चुके हैं। काफ़िरों ने हमारे जिहादियों का छोड़ा ही क्या है ? तुझे इस अपने छोटे से घर की चिंता है, पर बड़े संसार की और झांक कर देख।”

इस बीच अहमद रोने लग पड़ा तो उनकी बहस कुछ देर के लिए थम गई। अमजद बच्चे के करीब हुआ तो आफिया ने पहले ही उसको उठाकर छाती से लगा इससे अमजद का गुस्सा कुछ ठंडा पड़ गया। पर अहमद के चुप होते ही आफिया फिर बोली, “कुरान में लिखा है कि घर चलाना आदमी का काम है। तू नौकरी की वजह से मेरे पर यूँ रौब न झाड़ा कर।”

“कुरान में तो फिर यह भी लिखा है कि औरत घर संभाले, बच्चे संभालें अगर तू सच्ची मुसलमान है तो अपनी जिम्मेदारी समझ।”

“जिम्मेदारी तुझे समझने की ज़रूरत है। मेरी सहेलियों के खाविंद जिहाद में सेवा निभा रहे हैं और एक तू है कि अमेरिकी बनकर मौजें कर रहा है।”

“मैं मौजें नहीं करता, अपना काम करता हूँ।”

अहमद सोने लग पड़ा तो आफिया उसको थपथपाने लग पड़ी। उसका ध्यान झगड़े से हटकर सो रहे अहमद के चेहरे की ओर चला गया। वह बोलना बंद करके उसके मासूम चेहरे की ओर देखती रही। जब वह सो गया तो आफिया ने एक ओर पड़ी फाइलें उठा लीं और उनमें काट-पीट करने लग पड़ी।

“मुहतरमा, यह कैसी लिखा-पढ़ी चल पड़ी।” अमजद का गुस्सा भी खत्म हो गया था। इस कारण उसकी आवाज़ में कड़वाहट न रही।

“अमजद, कुछ लोग मुझे अपनी टैक्स रिटर्न्स दे गए थे। मैं इनमें से गलतियाँ वगैरह निकाल कर ठीक कर रही हूँ।”

“इससे क्या होगा ?“

“कम से कम उनके दो-दो, चार-चार डॉलर रिफंड हो ही जाएँगे।”

“ये दो-दो, चार-चार डॉलर गवर्नमेंट के भी तो काम ही आएँगे।”

“अमेरिकन सरकार का सारा पैसा एक ही काम आता है। वह है, मुसलमानों को मारने का काम।”

“आफिया तू हर बात को उल्टी तरफ सोचती है।”

“सिर्फ़ सोचती ही नहीं, मैं करती भी वैसा ही हूँ जिससे मुसलमानों का भला हो।”

“कभी अपने खाविंद का भला भी सोच लिया कर।” अमजद ने उबासी ली।

“तुझे शरम नहीं आती मेरा खाविंद कहते हुए।” पता नहीं क्यों आफिया एकदम भड़क उठी।

“क्यों, अब क्या हो गया ?“ अमजद ने हैरान होकर आफिया की ओर देखा।

“मैं ब्याही हुई हूँ, इसलिए किसी भी जलसे-समूह में अकेली नहीं जा सकती। तूने कभी इस बात की ओर ध्यान दिया है कि बेगम के साथ जाने में उसकी मदद करनी चाहिए।”

“आफिया, देख मेरे लिए पहले अपना परिवार है और फिर मेरी पढ़ाई। और फिर तुझे पता ही है कि अब मुझे कालेज वाले पहले से भी ज्यादा काम देते हैं। मुझे वीक एंड पर लेख लिखने होते हैं। तू अपनी बात तो फटाक से कह देती है, पर मेरी मज़बूरी नहीं समझती।”

“तुझे पता होना चाहिए कि तेरा पहला काम जिहाद है। पर मेरी ही किस्मत खराब है जो ऐसा खाविंद मिला है जिसको जिहाद के मायने भी नहीं पता।”

“तू जान तेरा जिहाद जाने। मुझे तेरी इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं।”

आफिया को एकदम गुस्सा चढ़ आया, मगर वह उठ न सकी। उसका शरीर इसकी इजाज़त नहीं दे रहा था। इस वक़्त वह दूसरी बार गर्भवती थी। वह कड़वाहट से भरी वही ढेरी हो गई और सो गई। उधर अमजद भी सो चुका था।

कुछ महीनों के बाद आफिया ने एक बच्ची को जन्म दिया। जिसका नाम उन्होंने मरियम बिंत मुहम्मद रखा। नवजन्मे बच्चे के कारण कुछ देर आफिया घर में टिक गई। उनके मध्य फिर से बढ़िया पारिवारिक माहौल बन गया। दोनों समीप वाले पॉर्क में घूमने जाते। कई बार ग्रॉसरी लेने जाते तो बच्चों को संग ले जाते। अमजद को लगा कि शायद अब आफिया बच्चों के कारण ही घर में मन लगा ले। पर यह उसका भ्रम था। आफिया ने फोन पर सबसे सम्पर्क रखा हुआ था। बच्ची के जन्म के बाद वह पहली बार केयर ब्रदर्ज़ की मीटिंग में गई तो सभी को बहुत उत्साह मिला।

“आफिया, अब तू बच्चों की तरफ से फुर्सत पाकर एम.एस.ए. और बोनेवोलैंस का काम संभाल।” सुलेमान अहमर बोला। वह आज की इस ख़ास मीटिंग में चिकागो से खासतौर पर आया था।

“यह बात सही है। बस, मुझे कुछ दिन दो। मैं किसी ऐसी औरत का प्रबंध कर लूँ जो मेरे घर रहकर मेरे बच्चों की देखभाल कर सके। फिर मैं खाली ही खाली हूँ।”

“दोस्तो, कुछ महीनों के बाद नया साल आने वाला है जो कि हमारे लिए नई ज़िन्दगी लेकर आएगा। सब जानते हैं कि बीसवीं सदी खत्म होते ही काफ़िरों का खात्मा हो जाएगा और हर तरफ इस्लाम का झंडा फहरेगा।”

“इंशा अल्ला ! इंशा अल्ला!!“ हर तरफ से आवाजें उठीं। इसके बाद कई अन्य वक्ताओं ने अपनी बात रखी। ज़रूरी मसलों पर विचार-विमर्श किया गया। आखि़र में सुहेल उठा और बोलने लगा, “हमें बड़ा गर्व है कि हमारा साथी और केयर ब्रदर्ज़ का जिहादी बसम कुंज बड़ा मार्के का काम कर रहा है। वह वापस लिबनान आ गया है। उसने वहाँ नए जिहादियों को ट्रेनिंग देने के लिए कैम्प भी शुरू कर लिया है। हालांकि यह काफी कठिन है क्योंकि वहाँ की सरकार हमको सहयोग नहीं देती, मगर उसने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है।”

सभी ने तालियाँ बजाईं। आफिया, मार्लेन की ओर देखती मन ही मन सोचने लगी, ‘यह कितनी अच्छी किस्मत वाली है जिसका घरवाला जिहाद लड़ रहा है। नए जिहादी पैदा कर रहा है। और मेरा अपना पति क्या कर रहा है ? वह तो ऐसी बैठकों में आना भी नहीं चाहता। बल्कि मुझे खुद को उससे छिपकर ऐसी मीटिंगों में आना पड़ता है। उसको तो सिर्फ़ पढ़ाई की पड़ी हुई है जब कि इस वक़्त सारा मुस्लिम समाज पूरी तनदेही से जिहाद का काम कर रहा है। मैं क्या करूँ। कैसे अमजद को जिहाद की ओर खींचूँ। यदि मैं ज़ोर डालूँ तो उसको मानना ही पड़ेगा। मेरे साथ उसे गहरी मुहब्बत जो है। मुहब्बत तो ख़ैर मुझे भी उससे बहुत है, पर मुझे उसकी यह एक ही बात बर्दाश्त नहीं होती कि उसको जिहाद से कोई सरोकार नहीं है।’

इसके पश्चात उसके नाम की घोषणा हुई तो वह ख़यालों में से निकली। उसने अपने भाषण के दौरान नए जिहादी भर्ती करने पर ज़ोर दिया। चैरिटी के लिए तो हमेशा ही वह ज़ोर देती थी। उसने सभी को बसम का उदाहरण देते हुए कहा कि आज हरेक को बसम बनने की ज़रूरत है।

मीटिंग समाप्त हुई। वह घर आ गई। उसने आकर देखा, बच्चे सोये हुए थे। उसने दूसरी ओर देखा। अमजद भी गहरी नींद में था। वह उसके पास होकर उसके चेहरे को निहारती रही। अमजद के माथे पर चुम्बन देने के लिए वह ज़रा-सा झुकी, फिर रुक गई कि कहीं उसकी नींद खराब न हो जाए। फिर वह भी अपने बैड पर जा पड़ी और सोचते सोचते उसको काफी देर बाद नींद आई। अगली सवेर ज़ोर-ज़ोर से फोन बज रहा था। वह हड़बड़ाकर उठी।

उसने आसपास देखा। वहाँ कोई नहीं था। अमजद बच्चों को तैयार करके निकल चुका था। वह ऐसे ही किया करता था। जिस दिन आफिया देर रात में लौटती तो अगले दिन वह बच्चों को खुद ही बेबी सिटर के यहाँ छोड़ने जाता था। फोन कट गया तो आफिया बिस्तरे में से निकली। तभी दुबारा घंटी बजी। उसने आगे बढ़कर फोन उठा लिया। उधर सुहेल बोल रहा था। फोन ऑन होते ही वह बोला, “आफिया, बहुत बुरी ख़बर है।”

“क्यों ? क्या हुआ ?“

“बसम कुंज शहीद हो गया।”

“क्या !“ आफिया के शरीर में कंपकंपी छिड़ गई। मगर फिर वह अपने आप को संभालने लगी। उधर सुहेल दुबारा बोलने लगा, “बसम ने लिबनान फौज के दो सिपाही किडनैप कर लिए थे। वह उनके माध्यम से अपनी कुछ मांगें मनवाना चाहता था। मगर इस बीच ही फौज ने उसके कैंप पर हमला कर दिया। इसी लड़ाई में वह शहीद हो गया।”

“अल्लाह उसकी रूह को सुकून दे। पर अब आगे का क्या प्रोग्राम है ?“

“आज शाम, उसको श्रद्धांजलि देने के लिए मीटिंग रखी गई है। तू वक़्त से पहुँच जाना।”

“ठीक है।” फोन कट गया। आफिया सोचने लगी कि कितना किस्मत वाला परिवार है। आप तो वह जिहादी शहीद बनकर बहिश्त में चला ही गया, साथ ही मार्लेन के लिए बहिश्त के दरवाजे़ खोल गया।

उस शाम मीटिंग हुई। हर एक ने बसम की तारीफ़ करते हुए उसके काम को आगे बढ़ाने का प्रण लिया। इसी दौरान एक पच्चीसेक साल का युवक उठा और बोला, “अगर आप सबकी इजाज़त हो तो मैं उस महान शहीद बसम की विधवा से शादी करना चाहता हूँ।”

“क्यों नहीं, क्यों नहीं। यह तो बड़े फख्र का काम है। जिहादी शहीद की विधवा से निकाह करवाने का मान किसी किसी को मिलता है।” कई आवाज़ें उठीं और उस युवक की बात मान ली गई। उसका नाम अनवर अल मीराबी था जो कि सउदी अरब का बाशिंदा था और आजकल हूस्टन, टैक्सास में रहता था। अगले दिन मस्जिद में दोनों का निकाह हो गया। अनवर अल मीराबी अपनी नई बेगम मार्लेन को उसके पाँच बच्चों सहित लेकर हूस्टन को चला गया। शाम के वक़्त आफिया घर लौटी तो उदास थी। पर अमजद ने उसकी ओर ख़ास ध्यान न दिया। वह समझता था कि यह तो इसका नित्य का काम है। यह किसी न किसी चैरिटी समागम से आई होगी। इससे आगे अमजद का न ही कभी ध्यान गया था और न ही जा सकता था कि यह तो बहुत समर्पित जिहादी है।

उधर केयर ब्रदर्ज़ और आफिया वगैरह समझते थे कि उनकी कार्रवाइयों का किसी को पता नहीं है। मगर यह सच नहीं था। क्योंकि एफ.बी.आई. हरेक चैरिटी संगठन के पीछे पड़ी हुई थी। केयर ब्रदर्ज़ के तो विशेष तौर पर। केयर ब्रदर्ज़ के सारे फोन टेप होते थे। जैसे ही एफ.बी.आई. को पता चला कि बसम कुंज मारा गया तो वह आगे की कार्रवाई देखने के लिए सावधान हो गए। इसी कारण मार्लेन और अनवर अल मीराबी के निकाह का एफ.बी.आई. को तुरंत पता लग गया। उन्होंने हूस्टन ब्रांच में इसकी सूचना दी और वह अनवर अल मीराबी के पीछे लग गए।

आफिया ने अपना थीसिस पूरा करके सबमिट करवा दिया। इसके साथ ही उसने मास्टर डिगरी भी पूरी कर ली थी। यह सब कुछ उसने तय समय अर्थात चार साल से भी पहले कर लिया। यह एक रिकार्ड था। वह भी तब जब कि उसने इस बीच बच्चों को जन्म दिया और अपनी दूसरी सरगर्मियों में भी पूरी तरह वह व्यस्त रही। इसके बाद उसके मन-मस्तिष्क से एक किस्म का बोझ-सा उतर गया। वह पढ़ाई और कालेज का पीछा छोड़ चुकी थी। यही नहीं, उसने अपना पहरावा भी बदल लिया। वह लम्बा बुर्का पहनने लगी। जिसमें से उसकी सिर्फ़ दो दिपदिपाती आँखें ही नज़र आती थीं। उधर अमजद ने पढ़ाई में बहुत अच्छा स्थान लिया था। उसने अपनी अनैस्थिसीऑलाजी की रैजीडेंसी में पूरी क्लास में टॉप किया था। उसकी इस प्राप्ति से प्रभावित होकर उसको अमेरिकन एसोसिशन ऑफ़ अनस्थिसीऑलाजी के नेशनल न्यूज़लैटर का चीफ़ एडिटर बना दिया गया। वह डॉक्टरी के क्षेत्र में हद से बढ़कर उपलब्धियाँ प्राप्त कर रहा था। इसके बाद उसने हावर्ड यूनिवर्सिटी के हैल्थ सेंटर में मास्टर की डिगरी के लिए आवेदन कर दिया। उसको प्रवेश मिल गया और उसने पढ़ाई प्रारंभ कर दी। परंतु आफिया का ध्यान इस वक़्त कहीं ओर था। वह इस वक़्त जिहादी वेबसाइट पर बहुत सारा काम कर रही थी। आजकल वह जिहाद में मारे जा रहे जिहादियों की बॉयोग्राफी वेबसाइट पर डाल रही थी। वह हर ऐसा आर्टिकल वेबसाइट पर डालती जिससे नए लोगों को जिहाद में शामिल होने की प्रेरणा मिले। इसके अलावा वह इंटरनेट पर इस्लामिक बहसों में भी हिस्सा लेती थी। सारा दिन उसका इस तरह की बहसों में हिस्सा लेते ही गुज़रता था। मगर वह कभी भी कुछ ऐसा नहीं सुन सकती थी जो कि जिहाद की सराहना न करता हो। अगर कोई कहता कि मुसलमानों को कुरान का पालन करते हुए शांति और सद्भावना से इस देश में रहना चाहिए तो उसको लगता कि इस प्रकार की बोली बोलने वाले मुसलमान कौम के गद्दार हैं।

आफिया की बड़ी बहन फौज़िया विवाहित और बाल-बच्चेदार थी। वह अपने डॉक्टरी क्षेत्र में न्यूरोलॉजी में फैलोशिप करने के लिए बॉस्टन आई और अपने बच्चों को भी यहाँ ले आई। यहाँ आकर उसने देखा कि आफिया, पहले वाली आफिया नहीं रह गई थी। फौज़िया को लगा कि उसकी चंचलता और मासूमियत गायब हो चुकी है। भीतरी बातों का उसको कुछ पता नहीं था। उसने इसका कारण यही निकाला कि शायद अमजद आफिया को तंग करता है। उसने इस बारे में आफिया से लम्बी-चौड़ी बातचीत की। जब आफिया ने उसकी बातों में अधिक दिलचस्पी न दिखाई तो फौज़िया को लगा कि शायद इसको अमजद ने बहुत डरा-धमका रखा है। उन्हीं दिनों में आफिया अमजद को किसी फंड रेजिंग समारोह में ले गई। वहाँ वह इतनी भावुक हो गई कि उसने अमजद की ओर से किसी समय भेंट की गई कीमती अंगूठी दान कर दी। इससे अमजद चिढ़ उठा। उसने आफिया को इशारे से समझाया कि जो हो गया, सो हो गया, अब वह यहाँ से उठकर घर चले। परंतु आफिया तो भावुकता के सागर में डूबी हुई थी। उसने अमजद की कोई बात न सुनी। वह अपना भाषण देती रही। उधर बच्चे भी घर जाने की जिद्द कर रहे थे। अमजद अपसेट हो गया। वह आफिया को अकेला छोड़कर भी नहीं जा सकता था। आखि़र कहीं देर रात समारोह खत्म हुआ। बच्चे कार में सोये पड़े थे। कार में बैठकर वे घर की ओर चले तो अमजद ने आफिया को अंगूठी दान करने के बारे में बुरा-भला कहा। इस बात पर आफिया ने उसका मजाक उड़ाया। आहिस्ता आहिस्ता चलती बातें आखि़र गरमी पकड़ गईं। जब वे घर पहुँचे तो वे बुरी तरह आपस में बहस रहे थे। घर पहुँचकर अमजद, बच्चे को बोतल से दूध पिलाने लगा। आफिया बहस करती हुए उसके साथ हाथापाई पर उतर आई और बोतल उसके मुँह पर अनायास बज गई। परिणामस्वरूप उसके मुँह पर ज़ख़्म हो गया और खून निकलने लगा। अमजद ने उसी वक़्त किसी दोस्त डॉक्टर को फोन किया और आफिया के ज़ख़्म की स्टिचिंग करवाकर लाया। उसके बाद दोनों के बीच तल्ख़ी लगभग ख़त्म हो गई। अगले रोज़ आफिया फौज़िया के पास बच्चे छोड़ने गई तो उसने मुँह पर स्टिचिंग के निशान देखकर पूछा। आफिया द्वारा सारी हकीकत बयान करने के बाद फौज़िया ने सबसे पहले आफिया के मुँह के चित्र लिए। फिर वह उसको भड़काने लगी। आखि़र, आफिया उसकी बातों में आ गई। शाम के समय जब अमजद वहाँ पहुँचा तो फौज़िया ने दरवाज़ा नहीं खोला। अमजद को यह बात खटक गई कि फौज़िया ने बीच में पड़कर उसके आपसी मामले को तूल दिया है। अगले दिन वह फोन करता रहा, पर किसी ने फोन नहीं उठाया। उसका मन बहुत खराब हो गया। तीसरे दिन उसने फोन किया तो आफिया ने फोन उठाकर हौले से ‘हैलो कहा।

“आफिया, क्या बात हो गई ? न तू लौटकर घर आई है और न ही फोन उठा रही है ?“

“वो फौज़िया आपा...।” इतना कहकर वह चुप हो गई।

“आफिया, देख यह अपना आपसी मामला है। अच्छा है कि इसको हम आप ही निपटाएँ।”

“अच्छा, आज शाम को आ जाना। उस वक़्त फौज़िया घर पर नहीं होगी।”

उस शाम अमजद फौज़िया के घर गया तो आफिया ने दरवाज़ा खोल दिया। उसका चेहरा उतरा हुआ था। वैसे भी वह काफी उदास दिख रही थी। अमजद ने उस दिन के लिए माफ़ी मांगी। आफिया का रंग एकदम बदल गया। वह ऊँची आवाज़ में बोलने लगी। बोलते बोलते वह अमजद के करीब आ गई और उसकी छाती पर मुक्के मारने लगी। अमजद चुपचाप खड़ा रहा। आहिस्ता आहिस्ता आफिया के हाथ रुकते चले गए। फिर उसने अमजद को अपनी बांहों में लपेट लिया और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। अमजद ने उसको शांत किया। जब शाम के समय फौज़िया घर आई तो उसने देखा कि आफिया अपने बच्चों सहित वहाँ से जा चुकी थी। इसके बाद अमजद ने सोचा कि यहाँ से कहीं दूर मूव हुआ जाए ताकि भविष्य में फौज़िया हमारे घरेलू मसलों में दख़ल न दे सके। जून 2001 को उसने ग्रैंडा हाईटस नाम के इलाके में बड़ा-सा अपार्टमेंट ले लिया। यह काफी बड़ा था। इस कारण उसने इसका एक कमरा अपने साथ काम करते एक सउदी अरब के बाशिंदे को किराये पर दे दिया। ज़िन्दगी फिर से बढ़िया ढंग से गुज़रने लगी। इन्हीं दिनों में ओसमा बिन लादेन की वीडियो टेप चैनलों पर दिखाई जाने लगी। पहली बार वह बहुत ही खुलकर बोल रहा था। अमेरिका के वह बहुत ही खिलाफ़ था। सुनने वाले अपने अपने कयास लगाने लगे कि इसका मतलब क्या हुआ कि ओसमा बिन लादेन एकदम पब्लिक के सामने इतने ज़ोरदार ढंग से आया है। केयर ब्रदर्ज़ जैसे संगठन भी कुछ समझ न सके।

उधर मार्लेन अपने नए पति अनवर अल मीराबी के साथ हूस्टन से चलकर बॉस्टन पहुँची। यह सारा सफ़र उन्होंने कार से तय किया। बड़ी बात उस वक़्त मार्लेन गर्भवती थी और बच्चे की डिलीवरी में भी ज्यादा वक़्त नहीं था। एफ.बी.आई. इस जोड़े की हरकतों को नोट कर रही थी, मगर उनको यह समझ में नहीं आया कि ये इस प्रकार बॉस्टन में क्या करने आए हुए हैं। मार्लेन ने वहाँ के दोस्तों को बताया कि पहले बच्चे की डिलीवरी वह बॉस्टन में चाहते हैं, इसलिए वे यहाँ आए हैं। इस बीच वे ख़ास मित्रो से मिलते रहे। उन्हें बहुत अधिक मान-सम्मान दिया गया। कई दिनों के बाद 29 अगस्त 2001 को मार्लेन ने बेटे को जन्म दिया। इसके सप्ताह भर बाद वे दोनों ही कार से वापस चले गए। जाने से पहले मार्लेन आफिया को एक तरफ ले जाकर बोली, “वह बड़ा दिन आने वाला है जिसकी हमें मुद्दत से प्रतीक्षा है।”

“मार्लेन, ज़रा विस्तार से बता।” आफिया को खुशीभरा अचंभा हुआ।

“बस, इस वक़्त मैं इतना ही कह सकती हूँ कि बहुत कुछ बड़ा होने जा रहा है, जो सारी दुनिया को हिलाकर रख देगा।”

“इंशा अल्ला, ऐसा ही हो।” आफिया को यह तो पता था कि ओसामा बिन लादेन की हिदायत पर जिहादी ग्रुप कुछ ऐसा करने वाले हैं जो वाकई तहलका मचा देगा। पर वह है कि इस बारे में उसको कुछ पता नहीं था। न ही उसने मार्लेन से इस विषय में विस्तार से पूछना आवश्यक समझा।

एफ.बी.आई. अपने अंदाज़ लगाती रही कि इस युगल का इस मुकाम पर यहाँ आने का क्या काम हो सकता है। टी.वी. चैनल अपने दिमाग लड़ाते रहे कि ओसामा बिन लादेन की कुछ ही दिन पहले आई ज़ोरदार टेप का क्या संदेश हुआ। उधर आफिया अपना दिमाग खपाती रही कि मार्लेन की बात का क्या अर्थ हुआ। सबके अपने अपने कयास थे। मगर 11 दिसंबर 2001 के दिन सबके भ्रम दूर हो गए। उस दिन आफिया सुबह के समय समाचार सुन रही थी। किसी ख़ास ख़बर ने उसकी आँखें टी.वी. स्क्रीन से चिपका दीं। ख़बर आ रही थी -

“आज सवेरे अमेरिकन एअरलाइन्ज़ की फ्लाइट नंबर 11 ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नॉर्थ टॉवर को आठ बजकर छियालीस मिनट पर हिट किया। इसके ठीक सत्रह मिनट बाद युनाइटिड एअरलाइन्ज़ की फ्लाइट संख्या 175 सेंटर के साउथ टॉवर से टकरा गई। दोनों प्लेन बॉस्टन के लोगन इंटरनेशनल एअरपोर्ट से उड़े थे। वहाँ से उड़ान भरने के बाद इन्हें हाईजैकरों ने अगवा कर लिया और फिर स्वयं ही इन हवाई जहाज़ों को उड़ाकर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नॉर्थ और साउथ टॉवरों में ला मारा। हज़ारों आदमी मर चुके हैं। हज़ारों ही ढह रहे टॉवरों के अंदर घिर हुए हैं। इसके अलावा एक प्लेन पेंटागन से जा टकराया है। एक अन्य अगवा किया गया प्लेन हाईजैकरों ने पैन्सलवेनिया के खेतों में गिरा दिया है।”

टी.वी. चैनल ने कुछ देर के लिए कैमरा ताश के पत्तों की भांति गिरती इमारतों की ओर कर दिया। वहाँ मौत का तांडव-नृत्य हो रहा था। हर तरफ ऊपर से नीचे गिरकर मरते लोग दिखाई दे रहे थे। सैकड़ों लोग बचने के उम्मीद में दफ़्तरों से बाहर निकलकर खिड़कियों से लटक गए थे। जिस किसी का भी हाथ फिसलता, वह आधे आसमान से नीचे आ गिरता। हर तरफ लोगों की दर्द भरी चीखें सुनाई दे रही थीं। आसपास गहरी गर्द छा गई थी। हर कोई रो रहा था। बल्कि सारा अमेरिका रो रहा था। वहाँ से बचकर निकल भागते लोगों के साथ सड़कें भरी पड़ी थीं। दोनों ट्विन टॉवर धू-धू करके जल रहे थे। समाचार वाचिका फिर से बोलने लगी, “सरकार को पूरा शक है कि आज की इस अति क्रूर घटना के लिए इंतहापसंद इस्लामी आतंकवादी जिम्मेदार हैं। बॉस्टन शहर में अलकायदा सदस्यों और उनके हमदर्दों के घरों में छापे लगने शुरू हो चुके थे। समाचार जारी रहेंगे।”

(जारी…)
 
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