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आफिया सद्दीकी का जिहाद/हरमहिंदर चहल

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आज की घटना ने आफिया को इतना डरा दिया कि वह चीख चीखकर रोने लगी। अमजद उसकी हालत देखकर काम पर नहीं गया। आफिया निरंतर मित्रों को फोन कर रही थी और नई उपज रही स्थिति के विषय में जानकारी ले रही थी। मगर उसका भय वैसे ही कायम था। दोपहर ढलने से पहले ही समाचार आने लग पड़े कि आधे से अधिक आतंकवादी जिन्होंने आज के इन क्रूर कारनामों को अंजाम दिया है, उनकी पहचान हो चुकी है। पहचाने जाने वालों में सबसे पहला मुहम्मद अट्टा था जो कि बॉस्टन का रहने वाला था। पुलिस ने छापामारी तेज़ कर दी। जिस किसी के बारे में यह पता चलता कि इसके संग आतंकवादी का परिचय रहा है, उसे गिरफ्तार कर लिया जाता। यहाँ तक कि जिन होटलों में वे लोग रातों को रुके थे, उन सभी को छानबीन के लिए बंद कर दिया गया और कर्मचारियों को पकड़ लिया गया। यह सब सुनकर आफिया ज़ोर-ज़ोर से रोती हुई बोलने लगी, “अमजद जितना जल्दी हो सके हमें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। यहाँ अपनी जान को खतरा है।“

“खतरेवाली इसमें क्या बात है। अपनी तरह यहाँ और बहुत से मुसलमान रहते हैं। वे क्या सभी अतिवादी हो गए। जिन्होंने ये अमानवीय कारनामा किया है, खतरा उनको या उनके हमदर्दों को है। तू यूँ ही न घबरा।“

“तुम मेरी बात समझने की कोशिश करो, बाद में पछताओगे। अभी भी मौका है कि यहाँ से शीघ्र चले जाएँ।“

“पर हम क्यों भाग जाएँ ? हमने कौन-सा कोई गलत काम किया है ?“

“मुझे पता चला है कि अमेरिकी, मुसलमानों के बच्चों को किडनेप करेंगे।“

“तुझसे यह बात किसने कही है ?“

“बस, किसी से पता चला है, तभी तो कह रही हूँ कि मुसीबत आने से पहले निकल चलें।“

“आफिया, मेरी समझ में नहीं आ रहा कि तू इतनी घबरा क्यों रही है। इस तरह हम बना-बनाया घर और अपनी पढ़ाई वगैरह बीच में ही छोड़कर कैसे जा सकते हैं।“

“इसका मतलब तुम मेरी बात नहीं मानोगे ?“ आफिया गुस्से में कांपने लगी।

“तू मुझे अपनी बात अच्छी तरह से समझा। तू तो बग़ैर सिर-पैर की बातें किए जा रही है।“

“अच्छा, करो अपनी मर्जी। जब भुगतोगे तो खुद पता लग जाएगा।“ आफिया पैर पटकती सीढ़ियाँ चढ़ गई। ऊपर जाकर उसने सुहेल, सुलेमान, मार्लेन और अन्य कई मित्रों को फोन किए। पर किसी का भी फोन न लगा। सबके फोन बंद थे। आफिया का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। फिर उसने किसी ऐसी सहेली को फोन किया जिसका जिहाद से कोई वास्ता नहीं था, पर वैसे वह इस तरह की बातों की काफ़ी जानकारी रखती थी। वह सउदी अरब की रहने वाली थी।

“आफिया, तू इतनी अपसेट क्या हो रही है। फिर क्या हो गया अगर हम मुसलमान हैं तो। लेकिन हम सबके साथ हैं।“ उसने आफिया को ढाढ़स बंधाया।

“तू मेरी असली बात नहीं समझ रही। अगर नुकसान कराकर यहाँ से निकले तो फिर क्या फायदा हुआ।“

उसकी बात सुनकर सहेली सोच में पड़ गई। उसको लगा कि आफिया हद से अधिक डरी हुई है। वह कुछ सोचते हुए बोली, “आफिया, तू यही चाहती है न कि यहाँ से जल्दी निकल जाए।“

“हाँ, बिलकुल।“

“पर, यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि अभी तो अमेरिका का सारा एअरस्पेश बंद पड़ा है। न कोई फ्लाइट अंदर आ रही है, न ही कोई यहाँ से बाहर जा रही है।“

“पर मुझे पता चला है कि एक ख़ास फ्लाइट जा रही है।“

“आफिया, वो फ्लाइट तो बहुत गुप्त तौर पर यहाँ से जा रही है। काग़ज़ों में उसका कहीं जिक्र नहीं है। तुझे पता नहीं कैसे उसके बारे में पता चला गया, वरना तो...।“

“तू क्या कोशिश करके मुझे उस फ्लाइट पर सीट नहीं दिलवा सकती ?“ सहेली की बात बीच में ही काटती हुई आफिया बोली।

“नहीं, यह मुमकिन नहीं है। उस फ्लाइट पर सिर्फ़ सउदी अरब के वही बाशिंदे जा रहे हैं जिनके सउदी अरब की अंबेसी से गहरे संबंध हैं। सउदी अंबैसडर नहीं चाहता कि कल को उसका कोई बाशिंदा इस प्लाट में फंस जाए। तुझे पता ही है कि हाईजैकरों में आधे से अधिक तो सउदी अरब के हैं। उस फ्लाइट के बारे में तू भूल ही जा।“

आफिया की अन्तिम उम्मीद भी खत्म हो गई। इसके बाद उसने अमजद से कोई बहस न की। उदास बैठी वह टी.वी. पर चल रही ख़बरें देखती रही। हर पंद्रह-बीस मिनट के बाद किसी न किसी के पकड़े जाने का समाचार आ रहा था। उसकी सहेली मार्लेन का पति अनवर अल मीराबी भी गिरफ्तार कर लिया गया। उसकी गिरफ्तारी की ख़बर सुनते ही वह कांपने लगी। क्योंकि उसको याद था कि दो सप्ताह पहले ही वह वापस हूस्टन जाते समय उसके घर आए थे। अमजद, आफिया के अंदर चल रही बातों से अनभिज्ञ सिर्फ़ यही समझता हुआ कि वह बेचारी कुछ अधिक ही डर गई है, उसको शांत करने का प्रयत्न कर रहा था। आफिया अमजद के साथ कोई बात नहीं कर रही थी। वैसे वह अपने तौर पर वापस जाने की कोशिश कर रही थी। फिर, यह उसकी कोशिशों का नतीजा ही था कि 17 सितंबर को जिस दिन अमेरिकी एअरस्पेश पहली बार खुला तो आफिया अपने दोनों बच्चों सहित पाकिस्तान को जाने वाली फ्लाइट में बैठी हुई थी। उसको बड़ा अफसोस था कि अमजद उसके साथ जाने के लिए राज़ी नहीं हुआ था। साथ ही, उसका दिल भी तेज़ी से धड़क रहा था। मगर जब जहाज़ उड़ा तो उसका सारा डर जाता रहा और उसका मन दूसरी तरफ चला गया। उसकी सोच के मुताबिक आखि़री लड़ाई शुरू हो चुकी थी। जिहादियों के अनुसार यह वो लड़ाई थी जिसमें सब काफ़िर मारे जाएंगे और पीछे सिर्फ़ इस्लाम का झंडा सारी दुनिया पर फहरेगा। उसको सारे रास्ते इसी खुशी में पलभर भी नींद नहीं आई। वह सोचती जा रही थी कि इस्लामी देशों में ख़ास तौर पर पाकिस्तान में तो इस वक़्त जिहाद बड़े स्तर पर लड़ा जा रहा होगा। लोग सब कुछ भूलकर जिहाद में शामिल हो चुके होंगे। पर जब वह कराची एअरपोर्ट पर उतरी तो वह बड़ी हैरान हुई। वहाँ तो लोग अपने अपने कामकाजों में व्यस्त थे। लगता था कि किसी को परवाह ही नहीं थी कि अमेरिका में क्या हुआ है। उसका दिल टूट गया। उसको अमजद परिवारवाले एअरपोर्ट पर लेने आए थे। घर जाते समय वह और अधिक हैरान हुई जब अमजद के घरवालों ने ट्विन टॉवरों के ढह जाने वाली बात एकआध बार ही छेड़ी और फिर अन्य बातें करने लगे। अमजद के घरवाले उसके आने पर अधिक खुश भी नहीं थे। अमजद ने उन्हें फोन पर बता दिया था कि कैसे आफिया उसकी बात न मानते हुए सिर्फ़ हालातों से डरकर अमेरिका छोड़ रही है। इससे पहले घरवाले काफी देर से कहते आ रहे थे कि अमजद और आफिया एक बार आकर मिल जाएँ और बच्चों को मिलवा जाएँ। परंतु उन्होंने कभी परिवार वालों की बात नहीं सुनी थी। आज आफिया एकदम ही आ पहुँची। मगर फिर भी खुश थे कि चलो, इस बहाने वे अपने पोता-पोती के साथ कुछ दिन बता सकेंगे।

खान परिवार एक शांत और अपने मज़हब को मानने वाला प्रतिष्ठित परिवार था। उन्होंने ज़िन्दगी में मेहनत करके यह मुकाम हासिल किया था कि उनके बच्चे विदेशों में पढ़ते थे और अच्छे ओहदों पर थे। अमजद का पिता आगा नईम खां इस वक़्त रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा था। उसकी पत्नी जाहिरा खां की घर में अच्छी चलती थी। पूरा परिवार संयुक्त परिवार के तौर पर रता था। नईम खां यद्यपि राजनीतिक नहीं था, पर उसकी सूझ-बूझ गहरी थी। घर में अमेरिका में आतंकवादियों द्वारा किए गए हमलों की चर्चा हुई थी, पर एक हद तक। परिवार ने कट्टरवादियों के इस कदम की निंदा की थी कि निर्दोषों को मारने से क्या प्राप्त होगा। मगर जब आफिया घर पहुँची तो उसने नाइन एलेवन की घटना को बहुत ही अचम्भे से बयान करना शुरू कर दिया। वह उसकी निंदा नहीं कर रही थी, बल्कि वह इस काम को करने वालों के हक़ में बोल रही थी। वह लगातार इसी घटना के बारे में बोले जा रही थी। परिवार वालों को उसको इस प्रकार उत्साहित होना अच्छा न लगा। पर फिर जाहिरा खां ने सभी को समझाया कि यह शायद उस घटना के कारण सदमे में है इसलिए इस तरह की बातें कर रही है। जब उसने बोलना बंद किया तो नईम खां थोड़ा ताव खाकर बोला, “आफिया बेटी, तुझे पता है कि अब क्या होगा ?“

“होना क्या है। बस, जिस दिन का एक मुद्दत से इंतज़ार था, वह आ चुका है। इन काफ़िरों का सफाया हो जाएगा और अल्लाह के बंदों की जीत होगी।“

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा। जो कुछ होगा, वह मुझे दिखाई दे रहा है।“

“वो क्या ?“ आफिया ने माथे पर बल डालकर पूछा।

“अब अमेरिका, अफगानिस्तान पर चढ़ाई करेगा। क्योंकि यह नाइन एलेवन का कारा करवाने वाला वहाँ पनाह लिए बैठा है। वहाँ अमेरिका अकेला नहीं होगा। सारी दुनिया उसके साथ होगी। ख़ास तौर पर पाकिस्तान ने तो ऐलान भी कर दिया है कि वह अमेरिका का साथ देगा।“

“यही तो हम चाहते हैं। इसी तरह यह आखि़री लड़ाई में तब्दील होगी। यही अल्लाह की मर्ज़ी है।“

“तुमने कभी यह भी सोचा है कि इस लड़ाई में नुकसान किसका होगा ?“

“किसका ?“

“अफगानिस्तान की गरीब जनता का, जो पिछले तीस सालों से लड़ाई में घुन की तरह पिस रही है। बड़े लोग अपना खेल खेल रहे हैं, पर गरीबों को कौन पूछता है।“

“जिहाद में आहुति तो देनी ही पड़ती है।“

आफिया जब नईम खां की बातों का जवाब देने से न हटी तो जाहिरा खां ने पति को चुप रहने का संकेत किया। कुछ देर के लिए वह चुप भी हो गया। परंतु जब आफिया फिर भी अपनी ही हांकती रही तो वह दुबारा बोला, “आफिया बेटी, मुझे यह बता कि तुम इस वक़्त अपने आपको अमेरिका की अपेक्षा यहाँ कैसे सुरक्षित समझते हो ? अमेरिका तुम्हारा देश है। तुम्हारा सब कुछ वहाँ है। और यहाँ तो अब अपने पड़ोस में लड़ाई शुरू होने वाली है।“

“आप इस बात को छोड़िए। जल्द ही अमजद को संदेशा भेजो कि वह जितनी जल्दी हो सकता है, यहाँ आ जाए। वहाँ उसकी ज़िन्दगी को ख़तरा है।“

“किससे ख़तरा है उसकी ज़िन्दगी को ?“

“अमेरिकी सरकार से।“

“वहाँ तो लाखों मुसलमान रह रहे हैं। क्या वे सारे इस नाइन एलेवन के कारनामे के लिए जिम्मेदारी हैं ? नहीं, वे तो आम शहरी हैं। और मैं बता दूँ कि इन आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता।“

“आप किसी को आतंकवादी नहीं कह सकते।“ आफिया भड़क उठी। सभी हैरान रह गए। आखि़र, सभी ने नतीजा यह निकाला कि इस वक़्त शायद सदमे के कारण इसकी दिमागी हालत सही नहीं है। इसलिए इसको आराम करने दिया जाए।

उधर अमेरिका ने अफगानिस्तान के तालिबान लीडर, एक आँख वाले मुल्ला उमर को वार्निंग दे दी कि वह कोई एक रास्ता चुन ले। या तो वह ओसामा बिन लादेन को अमेरिका के हवाले कर दे, या फिर अमेरिकी हमले के लिए तैयार हो जाए। मुल्ला उमर ने किसी की कोई बात नहीं मानी। लड़ाई शुरू होने की शंकाएँ बढ़ गईं। आखि़र 7 अक्तूबर 2001 को अमेरिका ने पहला बम अफगानिस्तान पर फेंकते हुए युद्ध की घोषणा का बिगुल बजा दिया। इस बीच आफिया बहुत अधिक उत्साहित थी। कभी वह किसी कमरे में जाती थी और कभी किसी में। कभी वह कुछ बोलती थी और कभी कुछ। घरवाले उसकी हरकतों से बड़े अवाज़ार हो गए थे। दोपहर के समय सभी खाने की मेज़ पर बैठे तो अमजद के बड़े भाई ने बात प्रारंभ की, “आफिया ऐसी कौन-सी बात है जो तू यूँ अपसेट है। और किस बात पर तुझे यूँ खड़े पैर अमेरिका छोड़ने की बात सूझी ?“

“क्योंकि वहाँ के अमेरिकन लोग मुसलमानों के बच्चे अगवा करने लग पड़े थे।“

“पर मैं तो यह बात तुझसे ही पहली बार सुन रहा हूँ। मेरे और भी कई दोस्त वहाँ हैं, उनमें से तो किसी ने भी बच्चे अगवा करने वाली बात नहीं बताई।“

“तो फिर क्या मैं झूठ बोल रही हूँ ?“

“पर आफिया तेरे अपने भाई और बहन के बच्चे भी तो वहीं हैं। वे तो अपने बच्चों को लेकर नहीं आए।“

“आप सब मुझे बेवकूफ समझते हो ? आपका मतलब इस सबके लिए मैं ही ज़िम्मेदार हूँ ?“ इतना कहते हुए वह उठी और ऊँची आवाज़ में बोलती हुई सीढ़ियाँ चढ़ गई। घरवाले उसका यह व्यवहार देखकर हैरान रह गए। साथ ही, उन्हें अन्य दूसरी बातें भी परेशान कर रही थीं। बड़ी बात थी कि आफिया घर के अंदर भी सिर से पांव तक बुरके में लिपटी हुई थी। उसकी सिर्फ़ आँखें दिखाई देती थीं। जबकि खान परिवार में बुरके को अधिक अहमियत नहीं दी जाती थी। वैसे भी वे सोचते थे कि इतने वर्ष अमेरिका जैसे मॉडर्न देश में रहकर भी वह वही दकियानूसी अंदाज़ में जी रही है। खै़र, जब वह बड़बड़ाती हुई सीढ़ियाँ चढ़ गई तो उसकी सास उसके पीछे पीछे गई। काफी देर बाद वह उसको किसी तरह मनाकर वापस खाने की मेज़ पर ले आई। वह आ तो गई, पर उसने बुरका एकतरफ नहीं किया। इसपर जाहिरा खां बोली, “आफिया बेटी, अब तो तू परदा हटा सकती है। यहाँ सब घर के ही लोग हैं।“

“यहाँ बैठे सब लोग शैतान है। किसी को इस्लाम की परवाह नहीं है।“ इतना कहते हुए वह फिर भाषण देने लग पड़ी। इस बीच वह अमजद के घरवालों का अपमान किए जा रही थी कि वे लोग धर्म के बारे मे कुछ नहीं जानते। आखि़र, नईम खां खान की मेज़ पर से उठ खड़ा हुआ। वह अपनी बहू के साथ कोई वार्तालाप नहीं कर सकता था और चुप रहकर उसकी बेहूदगी भरी बातों को भी नहीं सुन सकता था। वह उठकर बाहर चला गया। उसी रात उसने अमजद को फोन करके कहा कि वह शीघ्र वापस आकर अपनी बेगम को संभाले, क्योंकि उसने सारे परिवार का जीना दूभर किया हुआ है। उधर आफिया ने भी अमजद को फोन करके कहा, “अमजद, अब तू आकर फै़सला कर ले कि तू शैतानों के साथ रहना चाहता है या फिर मेरे साथ ?“

“आफिया, मेरे इम्तहान में इस वक़्त सिर्फ़ पाँच महीने शेष हैं। यदि मैं अब आ जाता हूँ तो अब तक का किया-कराया सब कुएँ में पड़ जाएगा। तू मुझे अपनी पढ़ाई पूरी कर लेने दे। तब तक तू किसी न किसी तरह एडजस्ट कर।“

अमजद दुविधा में फंस गया। उसके घरवाले उसको आने को कह रहे थे। उधर आफिया भी दिन रात उसको आ जाने के लिए फोन किए जा रही थी। आखि़र ऊबकर उसने यूनिवर्सिटी से अनुमति ली और पाकिस्तान के लिए चल पड़ा। जब अमजद घर पहुँचा तो बाकी परिवार उसके आने पर खुश तो हुआ, साथ ही उनको अफ़सोस भी था कि उसकी पढ़ाई का नुकसान हो गया। पर आफिया इतनी खुश थी कि धरती पर उसके पैर नहीं लग रहे थे। उस रात वह अमजद के करीब बैठते हुए बोली, “अमजद, तू बड़े सही मौके पर आया है।“

“क्या मतलब ?“

“मतलब यह कि इस वक़्त सुलेमान अहमर भी यहीं है।“

“कौन सुलेमान ?“ अमजद उसकी बात सुनकर हैरान हुआ।

“तू शायद उससे मिला तो होगा, पर उसको निजी तौर पर नहीं जानता होगा।“

“पर ऐसी क्या बात है कि मैंने अभी घर में पांव रखा ही है और तू कुछ ज्यादा ही उत्साहित हुई फिरती है ?“

“क्योंकि बात ही ऐसी है। जिस समय का मुझे बहुत दिनों से इंतज़ार था, वह वक़्त आ पहुँचा है।“

अमजद बिना कुछ कहे उसकी तरफ देखता रहा तो वह आगे बोली, “सुलेमान अहमर, बोनेवोलैंस इंटरनेशनल संगठन, चिकागो का डायरेक्टर था। अब वह स्थायी तौर पर अमेरिका छोड़ आया है। यहाँ उसने अपनी एक अन्य चैरिटी शुरू कर ली है। जिसके जरिये वह फंड इकट्ठा करके अफगानिस्तान में लड़ रहे तालिबानों की मदद करता है। इसके अलावा, वह नए जिहादियों को भर्ती करके भी अफगानिस्तान भेज रहा है।“

“फिर मैं क्या करूँ ?“ अमजद ने त्यौरी चढ़ाई।

“मैंने उसके साथ तेरे बारे में बात कर ली है।“

“मेरे बारे में ? किस काम के सिलसिले में ?“

“पहले पूरी बात सुन ले, फिर बोलना।“

अमजद कुछ न बोला। वह चुपचाप आफिया के मुँह की ओर देखता रहा तो आफिया फिर से बोलने लगी, “मैंने सारी बातचीत पक्की कर ली है। सुलेमान अहमर तुझे अपने ग्रुप में लेने के लिए राजी हो गया है। तू यहाँ से चलकर बार्डर पर पड़ने वाले बिलोचिस्तान के शहर क्वेटा जाएगा। वहाँ सुलेमान के आदमी तुझे बार्डर पार करवाकर अफगानिस्तान के शहर कलट पहुँचाएँगे। वहाँ के लोकल अस्पताल में सुलेमान ने तेरे लिए काम का इंतज़ाम कर रखा है।“

“आफिया, तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया ?“

“क्यों ?“

“तू मुझे यह बता कि मैं क्यों क्वेटा जाऊँ। क्यों मैं बार्डर पार करके अफगानिस्तान जाऊँ। और रही बात अस्पताल में काम करने की, तुझसे मैंने कब कहा कि मुझे नौकरी की ज़रूरत है ?“

“यह काम तू अपनी नौकरी की ज़रूरत पूरी करने के लिए नहीं कर रहा।“

“तो फिर यह सब क्या है ?“

“वो अस्पताल जिहादियों के लिए खोला गया है। वहाँ जाकर तू जिहाद की खिदमत करेगा। जब तू वहाँ पहुँच जाएगा तो मैं भी तेरे पीछे पीछे ही आ जाऊँगी। उसके बाद हम पूरे जोश-ओ-खरोश के साथ जिहाद के लिए काम करेंगे।“

“पर मैं इस राह का राही नहीं हूँ। तुझे मैंने पहले भी कई बार बताया है कि मैं एक अच्छा मुसलमान बनने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं ये डिगरियाँ लेने और पढ़ाई करने अमेरिका जैसे देश में इस कारण नहीं गया कि तालीम हासिल करने के बाद जिहाद जैसे कामों में शामिल होऊँ।“

“अमजद, यह काम तो तुझे करना पड़ेगा।“

“क्यों ? मेरा मतलब है क्यों करना पड़ेगा यह काम मुझे ?“

“क्योंकि तुझे मैं कह रही हूँ। तुझे अपनी बेगम की बात माननी पड़ेगी। यही मज़हब सिखाता है।“

“आफिया, मेरी बात सुन। हो सकता है कि मैं तेरी बहुत सारी बातों से सहमत होऊँ। पर सहमत या असहमत होना और बात है, किसी के खिलाफ लड़ना और। अब तू ही बता कि अमेरिका जिसने मुझे मेडिकल क्षेत्र में इतना आगे बढ़ने का अवसर दिया, जिसने मुझे इतना बड़ा ज्ञान का भंडार दिया है, तू चाहती है कि मैं उसी देश के खिलाफ सिर्फ़ इसी वजह से बंदूक उठा लूँ कि मेरी पत्नी को यह अच्छा लगता है। मेरा दिल तो यह कहता है कि जिस काबिल मुझे अमेरिका ने बनाया है, वो काबलियत मुझे लोगों में बाँटनी चाहिए। डॉक्टर होने के नाते मुझे ज़रूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।“

“तूने अमेरिका की तारीफ के पुल तो बांध दिए, पर यह भूल गया कि आज अमेरिका दुनिया में मुसलमानों पर कितने अत्याचार कर रहा है। इस्लाम की जितनी बर्बादी आज अमेरिका कर रहा है, उतनी आज तक किसी ने नहीं की होगी।“

“आफिया, यह राजनीतिक बातें हैं। तूझे पता है कि राजनीति में ऊपर-नीचे होता रहता है। जो शक्तिशाली होता है, वह ज़रा ज्यादा कर जाता है और कमज़ोर कम। कसूर तो हरेक का ही होता है।“

“तू बड़ा फिलॉस्फर बनता है तो मुझे यह बात समझा कि फलस्तिनियों का क्या कसूर है जो इन्हें आज जगह-जगह मारा जा रहा है।“

“आफिया, तू मुझे पहले यह बता कि जो ट्विन टॉवरों में हज़ारों लोग मारे गए, उनका क्या कसूर था ?“ गुस्से में आए अमजद ने भी प्रत्युत्तर में सवाल कर दिया।

“उनमें ज्यादा अमेरिकी ही मरे हैं जो कि यहूदियों के चमचे बनते हैं। हर जगह यहूदियों का समर्थन करते हैं। मैं कहती हूँ कि यहूदी वो कौम है जिस पर कभी भी एतबार नहीं करना चाहिए। जो भी इनका भला करता है, ये उसी की पीठ में छुरा मारते हैं। संसार को इनसे मुक्ति दिलाना बहुत ज़रूरी है।“

“आफिया, एक बात ध्यान से सुन ले कि मरने वाले का कोई धर्म नहीं होता। वह सिर्फ़ और सिर्फ़ इन्सान होता है।“

“मैं इस तरह नहीं सोचती। मुझे फलस्तिनी मरते दिखते हैं तो लगता है कि यह मुसलमान मर रहे हैं। और किसी का मुझे पता नहीं।“

“तुझे फलस्तिनियों के मरने से अफसोस होता है। पर जब वे निर्दोषों को मारते हैं तो तू बोलती तक नहीं।“

“क्योंकि वो अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं। पहल तो यहूदियों ने की थी।“

“टैरेरिज़्म सबसे पहले तेरे इन फलस्तिनियों ने ही शुरू किया था।“

“कब ? क्या कह रहा है तू ?“

“यह कैसे हो सकता है कि तू इस बारे में जानती न हो। पर फिर भी जितना मुझे मालूम है, बता देता हूँ। यह 1972 में आयोजित समर ओलम्पिक खेलों के समय घटित हुआ था। दुनिया भर के खिलाड़ी ओलम्पिक गाँव में ठहरे हुए थे। तब सिक्युरिटी भी इतनी नहीं हुआ करती थी क्योंकि तब आतंकवादी घटनाएँ होती ही नहीं थीं। पर फलस्तिनियों जिहादियों ने इसी बात का लाभ उठाया और अवसर पाकर ओलम्पिक गाँव में दाखि़ल हो गए। सवेरे करीब चार बजे का समय था और सब सोये हुए थे। फलस्तिनियों ने इज़राइल की टीम की निशानदेही पहले ही की हुई थी। वह सबसे पहले उनके कमरों में जा पहुँचे जहाँ इज़राइली टीम ठहरी हुई थी। एकदम हमला करके उन्होंने इज़राइलियों को बंदी बना लिया। इन बंदी बनाये लोगों में एथलीट, कोच और अन्य मेंबर शामिल थे। वहाँ उनको बंदी बनाकर किसी दूसरी बिल्डिंग में ले गए। ख़ैर, उसके बाद मारा मारी हुई। दोनों धड़ों के लोग मारे गए। पर मेरा यह बात बताने का मतलब सिर्फ़ इतना ही है कि फलस्तिनियों ने कैसे आतंकवादी कार्रवाई शुरू की थी।“

“कोई बात तो होगी जो फलस्तिनियों को यह कदम उठाना पड़ा।“

“वे इज़राइल की जे़लों में से अपने सज़ायाफ्ता क़ैदियों को छुड़वाना चाहते थे।“

“अपने हक लेने के लिए सबकुछ करना जायज़ है।“

“इज़राइल भी तो अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए ही लड़ रहा है। इस तरह देखें तो हर एक का अपना नज़रिया है।“

“तू कब से इज़राइल भक्त बन गया ?“ आफिया ने गुस्से में त्यौरियाँ चढ़ाईं।

“मैं इस मारा मारी के हक में नहीं हूँ। कुछ न कुछ ले देकर यह मसला सुलझाया जा सकता है। यहूदियों का भी बहुत नुकसान हुआ है। दूसरी बड़ी जंग के समय हिटलर ने साठ लाख यहूदी मारे थे।“

“यह सब झूठ है। मेरे ख़याल में कोई हालोकास्ट हुआ ही नहीं। यहूदियों ने संसार की हमदर्दी प्राप्त करने के लिए ऐसी बातें अपने मन से घड़ी हैं। यह सब बकवास है।“

“ओह, कम ऑन आफिया। तू एक साइंटिस्ट होकर कैसी बातें कर रही है। मैं तो हैरान हूँ कि तू कुछ भी बोली जा रही है।“

“चल, तू मेरी सारी बातों को बकवास समझ, पर मेरी आखि़री बात का जवाब दे।“ आफिया असली मुद्दे की ओर मुड़ आई।

“कौन-सी असली बात ?“

“तू मुझे यह बता कि क्वेटा के लिए कब कूच कर रहा है ? क्या मैं आज रात तेरी सारी तैयारी कर दूँ। आगे वहाँ से अफगानिस्तान जाने में भी कई दिन लग जाएँगे।“

“तू तो ऐसे बात कर रही है जैसे मैं जाने के लिए तैयार ही बैठा होऊँ। आखि़री बात, मैं कहीं नहीं जाऊँगा।“

“जाना तो तुझे पड़ेगा। तू मेरी बात नहीं टाल सकता। मैं तेरी घरवाली हूँ। तेरी दुख-सुख की साथिन।“

अमजद ने ध्यान से आफिया की ओर देखा। इस वक़्त आफिया की आँखों में मोह झलक रहा था। उसको भी आफिया पर प्यार आया। वह उसके करीब होता हुआ उसको अपनी बाहों की जकड़ में लेता हुआ बोला, “आफिया, अपने दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं। अपनी बढ़िया ज़िन्दगी है। मुझे यह भी पता है कि हम एक दूजे को बेइंतहा मुहब्बत करते हैं। एक-दूजे के बग़ैर एक पल नहीं रह सकते। मैं चाहता हूँ कि हम अल्लाह की दी हुई इस रहमतोंभरी ज़िन्दगी का आनन्द उठाएँ। तू प्लीज़ इस जिहाद वाली बात को भूल जा।“

“अमजद, तेरी सभी बातें सही हैं। तू मुझे दुनिया की हर शै से प्यारा है, पर जिहाद मेरे लिए अल्लाह का एक पाक काम है। उसके लिए मैं कुछ भी कुर्बान कर सकती हूँ।“

अमजद चुप हो गया। वह समझ गया कि यह इसके साथ बात करने का सही समय नहीं है। वह यह भी जानता था कि यह हद से ज्यादा जिद्दी है। जो बात एक बार कह दे, उससे पीछे नहीं हटती। उस वक़्त उसने फिर सोचने का कहकर बात बदल ली। रात गुज़र गई। पर अमजद को सारी रात एक पल भी चैन नहीं पड़ा। उसको कोई राह नहीं सूझ रहा था। वह आफिया को नहीं छोड़ सकता था और आफिया जिहाद को नहीं। आखि़र सुबह के समय उसको ख़याल आया कि इस्लाम यह भी कहता है कि मुश्किल के समय घर के बड़े-बुजुर्गों की मदद लेनी चाहिए। वह अपने बड़े भाई के पास चला गया और उसके साथ हिचकिचाते हुए बात की, “भाई जान, मैं तो मुसीबत में फंस गया हूँ। मेरी रहनुमाई करो।“

“क्यों अमजद, क्या हुआ ?“

इस पर अमजद ने सारी बात बता दी कि कैसे आफिया उसको जिहाद में जाने के लिए मज़बूर कर रही है और उसके पास पत्नी की बात मान लेने के सिवा और कोई चारा भी नहीं है। उसकी बात सुनकर भाई के तो होश ही उड़ गए। उसने स्वयं कोई बात नहीं की, बल्कि वह अमजद की बांह पकड़कर सीधा अपने अब्बा के पास ले गया और उसको सारी हुई-बीती सुना दी। नईम खां भड़कता हुआ बोला, “अमजद, यह क्या बकवास है ? क्या तुझे अच्छी तालीम यही सिखाती है कि तू ऐसे उल्टे काम करे ?“

“अब्बू आफिया कहती है कि...।“

“कौन क्या कहता है, तू यह बात छोड़। तुझे पहले यह सीखने की ज़रूरत है कि जिहाद क्या होता है। हर लड़ाई जिहाद नहीं होती। राजनीतिक लोग अपने निजी स्वार्थों के लिए इस पाक लफ़्ज का हर जगह इस्तेमाल करके नौजवानों को भड़का देते हैं और फिर वे वही करते हैं जो ये राजनीतिक लोग चाहते हैं। मैं तो जिया उल हक के वक़्त से ही कहता आ रहा हूँ कि यह एक राजनीतिक खेल है। पच्चीस साल से भी ऊपर का समय हो गया बेचारे गरीब अफगानिस्तान को इस गंदी राजनीति की बलि चढ़ते हुए। अफगानिस्तान आज मिट्टी का ढेर बनकर रह गया है। और सुनो, यह कहते हैं कि अफगानिस्तान ही एक ऐसा मुल्क है जहाँ सच्चा इस्लामी राज है। पर वहाँ की जनता से पूछकर देख कि उनके साथ क्या घटता है। वे पशुओं से भी खराब हालत में ज़िन्दगी व्यतीत कर रहे हैं। इन उजड्ड लोगों ने उनका जीना दूभर करके रख दिया। अब की जो हालत है, इसके लिए तालिबान जिम्मेदारी हैं। क्योंकि उन्होंने उस कातिल आदमी ओसामा बिन लादेन को अपने मुल्क में पनाह दी हुई है। इस सारे का जिम्मेदारी वही है और उसकी सज़ा भुगत रहा है, अफगानिस्तान का गरीब आदमी।“

“पर अब्बू, मुझे क्या हुक्म है ?“ अमजद डरता हुआ बोला।

“तू भूल जा इन बातों को और अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।“

अमजद ऊपर गया और उसने आफिया को बता दिया कि उसके अब्बू ने जिहाद में जाने से मना कर दिया है।

“पर तू उसकी सलाह लेने गया ही क्यों ?“ आफिया ऊँचे स्वर में बोली तो नीचे खड़े नईम खां को उसकी आवाज़ सुनाई दे गई। उसके पूरे बदन में आग लग गई। पर वह फिर भी ज़ब्त में रहा। अमजद सीढ़ियाँ उतरने लगा तो नईम खां ने ऊँची आवाज़ में कहा, “अमजद, अगर तू वहाँ गया तो फिर कभी इस घर में पैर न रखना।“

अपने ससुर की यह बात सुनकर आफिया हवा की तरह नीचे उतरी और आते ही अमजद के गिरेबान में हाथ डालकर तेज़ आवाज़ में बोली, “अभी फैसला कर। या अपने माँ-बाप के साथ रह या मेरे साथ।“

अमजद कुछ न बोला तो आफिया और अधिक गुस्से में आ गई। वह फिर चिल्लाई, “ठीक है अगर तूने मेरी बात नहीं माननी तो मुझे अभी तलाक दे। समझा तू ? तलाक दे मुझे। अभी इसी वक़्त।“

फिर वह चीखती-चिल्लाती ऊपर कमरे में चली गई। घर में मुकम्मल चुप पसर गई। आखि़र नईम खां ने अपनी बेगम को कहा कि अगर ये मियाँ-बीबी और कुछ दिन अपने साथ रहे तो ज़रूर इनका तलाक हो जाएगा। हम ऐसा करें कि इन्हें अपने से दूर रहने दें। तब तक इनका आपसी फर्क भी मिट जाएगा और शायद हालात कुछ और ही करवट ले लें। इसके बाद उनके जाने का इंतज़ाम कर दिया गया। अमजद बच्चों और आफिया को लेकर इस्लामाबाद की ओर चल पड़ा। आफिया का कहना था कि अगर जाना ही है तो वह अपने मामा एच.एस. फारूकी के पास इस्लामाबाद जाना पसंद करेगी। शाम तक वे फारूकी के पास पहुँच गए। कुछ दिन आराम से गुज़रे कि एक दिन आफिया फिर नई स्कीम लेकर अमजद के सामने आ खड़ी हुई।

“अमजद, कश्मीर और अफगानिस्तान की पहाड़ियों के बीच पड़ने वाले बालकट शहर में आजकल जैशे मुहम्मद का कैम्प चल रहा है।“

“क्या !“ अमजद को बात समझ में नहीं आई। वह हैरान होता हुआ बोला, “यह जैशे मुहम्मद किस शै का नाम है ?“

“तुझे पता ही होगा कि दिसंबर 1999 में कुछ जिहादी, इंडियन एअरलाइन्ज़ जहाज अगवा करके काबुल ले गए थे। उन्होंने यह सब अपने लीडर मौलाना मसूद अजहर को छुड़वाने के लिए किया था जो कि उस वक़्त इंडिया की जे़ल में बंद था। वो आपरेशन सफल रहा और मौलाना मसूद अजहर को छुड़वा लिया गया। बाद में मसूद ने यहाँ आकर एक नया संगठन बना लिया। उसी का नाम जैशे मुहम्मद है। जैशे मुहम्मद वालों के कैम्प इन पहाड़ियों में हैं। इनके परिवार भी इनके संग ही रहते हैं।“

“पर ये क्या करते हैं ?“

“ये जिहाद लड़ते हैं।“ आफिया ने यह बात कही तो अमजद का मुँह कसैला हो गया। उसने सोचा कि जिस बात से डरता वह यहाँ आया है, वही बात फिर सामने आ खड़ी हुई है। वह कुछ देर सोचता रहा तो आफिया बोली, “हम वहाँ चलते हैं। तू वहाँ अस्पताल में काम करना और मैं जिहादियों के बच्चों के लिए स्कूल चला लूँगी।“

अमजद फिर भी कुछ न बोला। आखि़र उसको एकाएक एक विचार कौंधा और वह आफिया से बोला, “हम यूँ करते हैं कि पहले एबटाबाद चलते हैं। वहाँ से बालकट कुल मिलाकर पाचेसेक मील होगा। वहाँ जाकर देखेंगे कि आगे क्या करना है।“

आफिया खुशी-खुशी तैयार हो गई। उसको लगा कि अमजद सही राह पर आता जा रहा है। अगले दिन वह एबटाबाद चले गए। रात के समय वे किसी होटल में ठहरे। रात भर आफिया भविष्य की योजनाएँ बनाती रही। अगली सवेर अमजद ने अपनी योजना बताई, “आफिया, मैं यहाँ किसी अस्पताल में नौकरी कर लेता हूँ। बच्चों को हम यहाँ के मशहूर मिशनरी स्कूल में पढ़ने के लिए दाखि़ला दिला देते हैं। हर इतवार हम बालकट जाकर जैशे मुहम्मद का कैम्प अटैंड कर आया करेंगे। एक तो हम उनके बारे में कुछ सीख लेंगे, और साथ ही यहाँ तब तक हम सैट हो जाएँगे। फिर अगर तू चाहेगी तो हम पक्के तौर पर वहाँ चले जाएँगे।“

“जैसे तेरी मर्ज़ी।“ आफिया चुप-सी हो गई। मगर उसको लगा कि शायद इस तरह वह अमजद को मना ही ले।

अगली सुबह आफिया उठते ही बोली, “अमजद, सारी रात बम धमाके होते रहे हैं, तूने सुने ही होंगे ?“

“आफिया, यह शहर फौज का बहुत बड़ा केन्द्र है। ऐसा होना यहाँ कुदरती है। कोई ट्रेनिंग वगैरह चल रही होगी।“

“नहीं, यह वो धमाके नहीं। ये तो उन बमों के धमाके हैं जो अमेरिकी हवाई हवाज़ अफगानिस्तान में फेंक रहे हैं।“

“हो सकता है, तेरी बात सच हो।“

“मैं तो रात में एक पल भी नहीं सो सकी। सारी रात यही सोचती रही कि अमेरिकी हमारे मुसलमान भाइयों को किस तरह मार रहे हैं।“

“युद्ध में तो ऐसा होता ही है। दोनों ओर की फौजें एक दूजे को मारती ही हैं।“

“मुझे तो यह सोच सोच कर ही अफसोस हुआ जा रहा है कि यह कुछ ही मील दूर बार्डर के पार जिहाद चल रहा है और हम उसमें शामिल नहीं हो सकते।“

अमजद ने उसकी बात का कोई उत्तर न दिया तो वह पुनः बोलने लगी, “अमजद, मैं बच्चों को किसी मिशनरी स्कूल में पढ़ने के लिए नहीं भेजूँगी। और न ही तुझे यहाँ कोई नौकरी करने की ज़रूरत है।“

“फिर मैं यहाँ निठल्ला घूमता क्या करूँगा ?“

“हम आज ही जैशे मुहम्मद के कैम्प चलते हैं। वहाँ जो काम मिलेगा, कर लेंगे।“

“आफिया, मेरी बात ध्यान से सुन ले कि मैं यह काम नहीं करूँगा।“ अमजद ने दो टूक जवाब दे दिया।

“क्यों नहीं करना ? अब तो हम जिहादियों के बिल्कुल करीब बैठे हैं। बस, दो घंटों का रस्ता है। चल उठ, चलें। मैं बच्चों को तैयार करती हूँ।“ आफिया शांत होकर बोली।

“आफिया, तुझे एक बार कही बात समझ में नहीं आती ? मैं तुझे आखि़री बार बता रहा हूँ कि मैं किसी जिहाद में हिस्सा नहीं लूँगा।“ अमजद भड़क उठा।

इसके पश्चात दोनों के बीच बहस शुरू हो गई। मगर आज आफिया अमजद को मारने के लिए नहीं बढ़ी। वह पता नहीं किस दुनिया में गुम थी। वह अंदर जाकर बैड पर लेट गई। अमजद बैठा सोचता रहा कि वह क्या करे। आखि़र उसके मन ने कहा कि वह कहीं भी चला जाए और कुछ भी कर ले, पर आफिया तब तक खुश नहीं होगी जब तक वह जिहाद में शामिल नहीं हो जाता। उसने एकदम वापस लौटने का फैसला कर लिया। उसने आफिया को उठाया। वह जली-भुनी उसके साथ कार में बैठ गई और वे वापस चल पड़े। घर आकर जब अमजद ने सभी को आफिया की जैशे मुहम्मद वाली बात बताई तो उसका पिता बहुत ही चिंतित होते हुए बोला, “कहीं यह न हो कि हम देखते ही रह जाएँ और पता तब चले जब यह आतंकवादियों के किसी गिरोह से जा मिलें।“

“अमजद के अब्बू, फिर इसका क्या इलाज है ?“ जाहिरा खां उदास लहजे में बोली।

“तुम अमजद को मेरे सामने बुलाओ।“

अमजद को बुलाया गया। वह यहाँ अकेला ही आया था। एबटाबाद से लौटते हुए आफिया बच्चों को लेकर मायके चली गई थी। अमजद आया तो नईम खां कठोर लहजे में बोला, “अमजद, तू तुरंत फ्लाइट लेकर अमेरिका रवाना हो जा।“

“और अब्बू, आफिया ?“

“फिलहाल तू सब कुछ भूल जा और वहाँ जाकर अपनी पढ़ाई पूरी कर। बाद में देखते हैं कि क्या होता है।“

अमजद ने अगले दिन की ही टिकट ले ली। इसके बाद उसने आफिया को फोन करके इतना ही बताया कि यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के कारण वह वापस जा रहा है और कल शाम की उसकी फ्लाइट है। अगले दिन आफिया बच्चों सहित उसको एअरपोर्ट पर विदा करने आई। दोनों की बीच कोई ख़ास बात नहीं हुई। आफिया हद से ज्यादा उदास थी।

(जारी…)
 
11

अमजद अमेरिका आ तो गया, पर उसका आफिया और बच्चों के बग़ैर ज़रा भी दिल नहीं लगता था। दिन के समय तो काम पर होने के कारण जैसे तैसे समय बीत जाता था, परंतु रात के समय उसको घर काटने को दौड़ता था। कभी उसको बच्चों की किलकारियाँ सुनाई देने लगतीं और कभी आफिया इधर-उधर चलती-फिरती दिखाई देती। एक दिन रात के समय फोन आया। फोन उसकी अम्मी का था। अमजद के फोन उठाते ही जाहिरा खां बोली, “बेटे, मैं जानती हूँ कि तू इस वक़्त किन हालातों में से गुज़र रहा होगा। पर इस सब की मैं ही जिम्मेदारी हूँ।“

“अम्मी, ऐसी बात नहीं है। और फिर तुम क्यों अपने आप को दोष दे रही हो ?“

“क्योंकि आफिया मेरी ही पसंद है। मैंने ही इसे तेरे लिए चुना था। पता नहीं क्या बात हो गई। यह तो बहुत ही जहीन लड़की थी। मेरी तो समझ में नहीं आता कि इसको हो क्या गया है।“

“अम्मी, तू यूँ ही फिक्र न कर।“

इतना कहकर अमजद सोचने लगा कि उसकी माँ ने तो आफिया को कुछ देर या कुछ दिन के लिए देखा होगा, मगर वह तो कितने ही सालों से उसके साथ रहता आ रहा है। और क्या वह खुद उसको अच्छी तरह जानता है। उधर अमजद को फोन पर चुप-सा हुआ देखकर जाहिरा खां बोली, “अमजद बेटे, तू मेरी बात सुन रहा है न ?“

“हाँ-हाँ, अम्मी तू बात कर। मेरा ध्यान तेरी बातों में ही है।“

जाहिरा खां दुबारा बोलने लगी, पर अमजद का ध्यान फिर आफिया की ओर चला गया। उसके मन में ख़याल आया, ‘आफिया नाइन एलेवन के बाद एकदम इतना डर क्यों गई थी। वह क्यों खड़े पांव भाग जाने के लिए उतावली पड़ गई थी। फिर वहाँ जाकर वह कुछ दूसरी ही तरह की स्कीमें बनाने लगी। सीधे ही जिहादियों के संग जा मिलने की बातें करने लग पड़ी। और वह बता रही थी कि हमारे विवाह से पहले भी एफ.बी.आई. वाले उसको तलाश रहे थे। यह तो खै़र हो सकता है कि उसके चैरिटी के काम के संबंध में वे उसके साथ कोई बातचीत करने आए होंगे।’ उसकी मन में चलती बात बीच में ही रह गई जब उधर से माँ की ऊँची आवाज़ उसके कानों में पड़ी, “बेटे तू ऐसा कर कि एक बार आफिया को फोन करके कह दे कि वह तेरे पास आ जाए। औरत को कई बार मानसिक कारणों से बहुत सारे हालातों से गुज़रना पड़ता है। अब वह ठीक हो चुकी होगी। तू मेरे बेटे, उसको अपने पास बुला ले। अल्लाह सब ठीक कर देगा।“ माँ ने नसीहतें देकर फोन काट दिया। पर अमजद का मन फिर से पहले चल रही सोचों की ओर चला गया। उसको एक नया ही ख़याल आया और वह सोचने लगा, ‘कहीं आफिया यह सब ड्रामा तो नहीं कर रही। हो सकता है कि वह मुझसे अलग होना चाहती हो और सिर्फ़ बहाने घड़ रही हो ताकि मैं उसकी बात से इन्कार कर दूँ और उसको अलग हो जाने का बहाना मिल जाए। हाँ, यही बात है। लगता है कि वह मेरे साथ खुश नहीं है। वैसे उसके बर्ताव से तो लगता है कि वह मुझे बहुत प्यार करती है, मगर हो सकता है कि यह सब दिखावा ही हो।’

खै़र, कुछ भी था उसने अपनी माँ की बात मानते हुए आफिया को फोन करने का मन बना लिया। उधर आफिया का पिता देख रहा था कि अमजद के जाने के बाद से आफिया का चेहरा मुरझाये फूल जैसा हो गया था। उसने ढंग से खाना-पीना छोड़ दिया था। सारा दिन उदास-सी बैड पर पड़ी रहती थी। सुलेह सद्दीकी सब समझता था। उसने आफिया को पास बुलाया और उसके सिर पर हाथ फेरता हुआ बोला, “बेटी, मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा, बस इतना ही कि औरत का पहला फ़र्ज़ अपना परिवार बचाना होता है। तुम्हारे बीच सिर्फ़ तनाव है, और कुछ नहीं। मैं तुझे सलाह दूँगा कि तू अमजद के पास चली जा।“

“पर अब्बू, उसने तो जाकर एक बार भी फोन नहीं किया ?“

“बेटी, कई बार इन्सान काम में उलझ जाता है और...।“ वह बात कर ही रहा था कि फोन की घंटी बजी। उसने फोन उठाते हुए हैलो कही तो उसके चेहरे पर रौनक आ गई। वह फोन को आफिया की ओर बढ़ाते हुए बोला, “ले बात कर, अमजद का फोन है।“

आफिया चहक उठी और दूसरे कमरे में जाकर बात करने लगी। आधे घंटे बाद फोन बंद करके वह बाहर निकली तो उसका चेहरा गुलाब के फूल की तरह खिला हुआ था। उसने उसी समय टिकटें बुक करने के लिए कह दिया और तीसरे दिन बच्चों को लेकर अमेरिका के बॉस्टन लोगन इंटरनेशनल एअरपोर्ट पर जा उतरी। अमजद उसको लेने आया खड़ा था। वह घर पहुँच गए। घर आकर आफिया का चेहरा एकदम बदल गया और वह गुस्से में काँपने लगी।

“तूने मुझे इतने दिन फोन भी नहीं किया। तू अपने आपे को समझता क्या है ?“ वह ऊँचे स्वर में बोलती हुए अमजद के गिरेबान को चिपट गई। इधर-उधर खींचती वह उसकी छाती में मुक्के मारने लगी। अमजद ने बिल्कुल विरोध न किया। आखि़र, आफिया थक गई और वह मुक्के मारना छोड़ अमजद की छाती से लिपट गई। अमजद ने उसको अपनी बांहों में जकड़ लिया। आफिया इतना रोई कि अमजद की कमीज़ भीग गई। उसकी आँखों में भी आँसू आ गए। इसके साथ ही उसके मन के अंदर का वह ख़याल कि शायद आफिया बहाने से उससे तलाक लेना चाहती है, कपूर की भाँति उड़ गया।

उधर, अफगानिस्तान में अमेरिका का आतंकवाद के विरुद्ध लड़ा जा रहा युद्ध लम्बा खिंचता जा रहा था। तालिबान सरकार तो पाँच-छह हफ़्तों में ही ढह-ढेरी हो गई थी। पर ओसामा बिन लादेन और उसका समस्त अलकायदा संगठन तोरा बोरा पहाड़ियों के पीछे से होकर पाकिस्तान की ओर निकल चुका था। वहाँ जाकर उन्होंने कराची में अड्डे जमाने प्रारंभ कर दिए। अमेरिका समझ गया था कि अफगानिस्तान में कच्चे घरों अथवा सूखे पहाड़ों पर बम फेंकने बेकार हैं। जिन्हें पकड़ने के लिए यह सबकुछ किया गया था, वे तो सब बचकर निकल गए। इस कारण अमेरिका युद्ध का मुहाज़ अफगानिस्तान से इराक की ओर मोड़ने के लिए तैयार होने लग पड़ा। तोरा बोरा पहाड़ियों में से भागे अलकायदा के सदस्यों को संभालने वाले पाकिस्तान में बहुत बैठे थे। इनमें से सबसे अधिक सक्रिय बलोची परिवार था। रम्जी यूसफ जो कि 1993 के नॉर्थ टॉवर वाले बम धमाके का आरोपी था, इसी परिवार से था। इस परिवार के अग्रज का नाम था - खालिद शेख मुहम्मद। जिसे सभी उसको निक नेम अर्थात के.एस.एम. से बुलाते थे। जो लोग अलकायदा सदस्यों को संभालने में लगे हुए थे, उनमें स्त्रियों का एक ग्रुप भी था। आफिया की माँ इस्मत भी इसी ग्रुप में काम कर रही थी। इतना ही नहीं, अल बलोची परिवार के कई मेंबर उसके घर मेहमान बनकर ठहर भी चुके थे। जब अफगानिस्तान में से भाग निकले अलकायदा सदस्यों को भलीभाँति संभाल लिया गया तो के.एस.एम. अपनी अगली योजना पर काम करने लगा। वह चाहता था कि जब तक अमेरिका नाइन एलेवन वाली चोट से उभरे, तब तक इससे भी बड़ा झटका अमेरिका को एक और दिया जाए। इस दूसरे हमले के लिए के.एस.एम. ने ऐसे लोगों की खोज शुरू कर दी जो कि पहले ही अमेरिका में रह रहे थे। इसके लिए उसने अमेरिका में अपने सम्पर्कों के माध्यम से ऐसे व्यक्तियों की भर्ती प्रारंभ कर दी। इनमें नए रंगरूटों में होज़े पदीला नाम का एक व्यक्ति पहले अमेरिकन था। वह फ्लोरिडा का रहने वाला था और किसी बड़े गैंग का सदस्य रहा था। उसको समझा-बुझाकर मुसलमान बनाया गया और फिर अलकायदा में लाया गया। प्रशिक्षण के लिए उसको पाकिस्तान ले जाया गया। इस प्रकार आगे से आगे के.एस.एम. को और लोग मिलते चले गए जो कि उसके काम में सहायक हो सकते थे। होज़े पदीला को इस तरफ लाने वाला एडम हुसैन था जो कि बोनेवोलैंस इंटरनेशनल में काम करता था। एडम हुसैन आगे सुलेमान अहमर को जानता था। सुलेमान की आफिया से जान-पहचान थी। यही कारण था कि आफिया बोनेवोलैंस के एक अन्य सक्रिय सदस्य अदनान शुक्रीजुमा के सम्पर्क में आई थी। आफिया के अमेरिका से लौट आने से सभी में फिर से तालमेल होने लगा। जाली ई मेल के ज़रिये अथवा कोई अन्य गुप्त तरीके से ये लोग आपस में सम्पर्क बनाये रखते थे।

जब आफिया वापस आई तो वह कई दिन बहुत बढ़िया मिज़ाज में रही। वह अमजद के साथ बड़ी मुहब्बत से पेश आती थी। अमजद को लगा कि उसके अंदर परिवर्तन हो रहा है। वह खुश था। इसी खुशी के कारण वह अगले इतवार बच्चों को लेकर एक मंहगे होटल में रात ठहरने के लिए चला गया। वहाँ पहुँचते ही आफिया भड़क उठी, “अमजद, तुम्हें शर्म आनी चाहिए। अफगानिस्तान जैसे मुल्कों में हमारे मुसलमान भाई गरीबी से मर रहे हैं और तुम्हें अय्याशी की पड़ी है।“

“आफिया, अय्याशी वाली इसमें क्या बात है। मेरी कमाई के पैसे हैं। मैं किसी गलत जगह पर नहीं खर्च कर रहा। मैं अपने परिवार की खुशी के लिए खर्च कर रहा हूँ। यह मेरा हक भी है कि हलाल की कमाई से अपने बच्चों को ज़रा बाहर घुमा फिरा दूँ।“

“तुझे कभी समझ नहीं आ सकती। मैं यहाँ नहीं रहूँगी। चल, घर वापस चलें।“

आफिया वहाँ न रुकी और अमजद को साथ लेकर घर लौटकर ही उसने साँस लिया। अमजद परेशान हो गया। उसने सोचा था कि पुरानी कड़वाहटें भूलकर नई ज़िन्दगी शुरू करेगा, पर आफिया तो वहीं अटकी हुई थी। फिर कुछ दिनों बाद अमजद ने उससे कहा कि बच्चों को अब स्कूल भेजने का समय है। अब तो इन्हें प्री-स्कूल जैसी क्लासों में डाल दें तभी कहीं ये दूसरे स्कूलों में जाने योग्य हो सकेंगे। परन्तु आफिया ने जवाब दिया कि अभी वह उन्हें स्कूल नहीं भेजेगी। वह घर में ही उन्हें मज़हबी शिक्षा देगी। अमजद मनमसोस कर रह गया। कुछ दिनों के बाद अमजद एक दिन जल्दी घर आया तो वह बड़ा हैरान हुआ। आफिया टी.वी. पर वो कुछ देख रही थी जो कि जंग के मैदान में हो रहा था। आसपास मारा मारी हो रही थी। समीप ही लाशों के ढेर लगे हुए थे। अमजद से यह सब देखा न गया। पर जब उसने देखा कि आफिया ने बच्चों को भी अपने करीब बैठा रखा है तो उसके सब्र का प्याला छलक गया। वह गुस्से में आकर बोला, “आफिया, यह क्या है ?“

“क्यों, क्या हुआ ? जो सच है, वह सच है। फिर उसको देखने में क्या हर्ज़ है।“

“बात यह नहीं है। बात यह है कि तू इन बच्चों को इतनी ख़तरनाक घटनाएँ दिखा रही है। इनके मन पर क्या असर पड़ेगा।“

“मैं तो चाहती हूँ कि इनके मन पर असर पड़े। ताकि ये बड़े होकर तेरी तरह अमेरिकी भक्त न बनें।“

“यह सही नहीं है। और फिर मैंने अमेरिकी भक्त बनने वाली क्या बात कर दी ?“

“तुझे अपनी नौकरी करने और पैसा बनाने तक ही मतलब है। तुझे इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि आसपास मुसलमानों के साथ क्या हो रहा है।“

“अब मुसलमानों के साथ क्या अलग होने लग पड़ा जो तू आज इतनी संजीदा हुई बैठी है?“

“अमेरिका, इराक पर हमला करने की तैयारी कर रहा है।“

“यह तो एक दिन होना ही था।“

“क्यों ? क्यों होना था यह एक दिन ? सिर्फ़ इसलिए कि अमेरिका दुनिया में सबसे अधिक शक्तिशाली है ?“ आफिया के माथे पर बल पड़ गए।

“नहीं, यह बात नहीं है। तू याद कर, जब 1991 में पहली इराक जंग डज़र्ट स्ट्रोम खत्म हुई थी तो जंगबंदी अहदनामे में यह मद शामिल थी कि इराक अपने बायलोजिकल और केमिकल हथियार खत्म करेगा। पर वो उसने खत्म ही नहीं किए और न ही करना चाहता है।“

“जब इराक ने कह दिया है कि उसके पास इस किस्म के हथियार है ही नहीं तो बात खत्म हो जानी चाहिए।“

“वो झूठ बोल रहा है। उसके पास ये सारे हथियार हैं।“

“तेरे पास क्या सबूत है ?“

“यह तो तुझे भी पता ही है कि इरान-इराक युद्ध आठ दस साल चलता रहा। पर जब खत्म होने पर आया तो एक दिन में ही खत्म हो गया। ऐसा पता है, क्यों हुआ था ?“

“क्यों ?“

“क्योंकि इराक ने युद्ध के मैदान में केमिकल हथियारों का प्रयोग किया था। हज़ारों इरानी फौजी मोर्चों में बैठे बैठे ही सदा की नींद सो गए। इस कारण विवश होकर इराक को लड़ाई बंद करनी पड़ी थी। सबको पता है कि इराक के पास अभी भी वो हथियार हैं। उनका इस्तेमाल करके वह लाखों लोगों को मौत के घाट उतार सकता है। साथ ही, यह फै़सला यू.एन.ओ. का है न कि अमेरिका का कि इराक को उन घातक हथियारों से मुक्त किया जाए।“

“यह तो सब बहाने हैं। असली मसला तो कुछ और है।“ आफिया उसकी किसी बात से सहमत नहीं हो रही थी।

“असली बात क्या है तू बता फिर ?“

“अमेरिका, इज़राइल को महा इज़राइल बनाने के लिए उसके करीबी मुल्कों को खत्म करके सबको इज़राइल में शामिल कर देगा। सारे अरब मुल्क खत्म हो जाएँगे। अकेला इज़राइल रह जाएगा और अरब के सारे तेल भंडारों पर अमेरिका का कब्ज़ा हो जाएगा।“

“यह मुमकिन नहीं है। यह सब कोरी अटकलें हैं।“

“क्यों मुमकिन नहीं है। पहले भी यही कुछ तो हुआ था।“

“पहले कब ?“

“जब यह सो-कॉल्ड इज़राइल बना था। तब भी ऐसी ही जबरदस्ती की गई थी।“

“मैं जानता हूँ कि तू क्या कहना चाहती है, पर मैं उस बात को भी अलग नज़रिये से देखता हूँ। तब इज़राइल नाम का कोई देश नहीं था। सिर्फ़ फलस्तीन नाम का देश था जो कि उस वक़्त अंग्रेजों का गुलाम था। फलस्तीन के यहूदी अधिक अधिकारों वाला सूबा मांगते थे। क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि अपने घर के बग़ैर उनका अस्तित्व कायम नहीं रह सकता। दूसरी बड़ी जंग के समय ही हिटलर ने आधे से ज्यादा यहूदी आबादी खत्म कर दी थी। उन्होंने जद्दोजहद करके अधिक अधिकारों वाला सूबा इज़राइल, फलस्तीन के अंदर ही ले लिया। जब अंग्रेज चले गए तो सारे अरब देशों ने मिलकर उस पृथक सूबे इज़राइल में से यहूदियों को भगाने की मुहिम शुरू कर दी। पर यहूदियों को इस बात का पहले ही अहसास था कि ऐसा होगा। उन्होंने भी अपनी तैयारी की हुई थी। जब हालात अधिक खराब हो गए तो अरब मुल्कों ने एकत्र होकर यहूदियों के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया। तू तो जानती ही है कि यह 1948 की इज़राइल-अरब देशों की पहली लड़ाई की बात है। उस लड़ाई में अरब मुल्क हार गए। फिर इज़राइल ने अपने आप को तगड़ा करना शुरू कर दिया। क्योंकि उसको पता था कि जो कुछ अब हुआ है, यह आगे भी होगा। और इस तरह हुआ भी। आगे चलकर 1973 में फिर इज़राइल और अरब देशों के बीच युद्ध हुआ। इस बार भी इज़राइल विजयी रहा। असली बात यह है कि यदि इज़राइल कमज़ोर हो तो अरब देश उसको एक दिन में ही खत्म कर दें। सो, अपने आप को बचाने का तो हरेक का पहला हक है।“

“अमजद, यह तू नहीं बोल रहा, तेरे अंदर का अमेरिकी व्यक्ति अमजद बोल रहा है।“ आफिया ने व्यंग्य कसा।

“जब तुझे कोई उत्तर नहीं सूझता तो तू मुझे यह ताना मार देती है।“

बातें करती आफिया ने इस तरह महसूस किया मानो उसके पेट में दर्द उठा हो और वह नीचे फर्श पर बैठ गई। अमजद ने शीघ्र ही एंबूलेंस को कॉल किया और उसको अस्पताल ले गया। परन्तु अस्पताल वालों ने किसी बीमारी की बजाय उनको खुशी की ख़बर दी। आफिया तीसरे बच्चे की माँ बनने वाली थी। वे खुश-खुश घर लौट आए। घर आकर आफिया सोफे पर टेढ़ी होकर लेट गई। अमजद कुर्सी खींचकर उसके पास बैठ गया। आफिया उसके मुँह की ओर एकटक देखती रही। फिर आँखें भरकर बोली, “अमजद, मेरा यहाँ दिल नहीं लगता।“

“क्यों ऐसी क्या बात है ?“

“बस, पता नहीं क्या बात है। मैं चाहती हूँ कि हम पाकिस्तान वापस लौट चलें।“

अमजद कुछ न बोला। वह चुपचाप उसके मुँह की ओर देखता रहा तो आफिया फिर बोली, “तू कोई जवाब क्यों नहीं देता ?“

“आफिया, वहाँ जाकर तू पहले की तरह फिर मेरे पर ज़ोर डालेगी कि जिहाद में शामिल हो।“

“अमजद, मैं तो बीच में फंस गई हूँ।“ काफ़ी देर चुप रहने के बाद दीवार की ओर देखते हुए आफिया बोली।

“वो कैसे ?“

“एक तरफ तू है और दूसरी तरफ पाक पवित्र जिहाद।“

“आफिया, एक बात पूछूँ ? सच सच बताना।“

“हाँ पूछ।“ आफिया ने मुँह उसकी तरफ कर लिया।

“अगर कभी तुझे चुनाव करना पड़े तो तू किसका चुनेगी ? मुझे या जिहाद को ?“

“अमजद, अगर ऐसे चुनाव का वक़्त कभी आता है तो यह मेरे लिए बड़ा दुखदायी होगा। पर सच्ची बात पहले ही बता देती हूँ कि आखि़र मैं चुनूँगी तो जिहाद को ही।“ इतना कहते हुए आफिया ने आँखें मूंद लीं और सीधी होकर सोफे पर लेट गई। अमजद उदास-सा उठकर बाहर चला गया।

अगले दिन सवेरे किसी फोन की घंटी ने आफिया को नींद से जगाया। फोन सुहेल का था। वह बताने लगा कि एफ.बी.आई. द्वारा केयर ब्रदर्ज़ और बोनेवोलैंस इंटरनेशनल के कई अन्य सदस्यों को पूछताछ के लिए पकड़ा था। पर लम्बी इंटरव्यू के बाद सब को छोड़ दिया गया। सुहेल ने आफिया को सावधान किया कि वह अपनी असली ई मेल पर कुछ भी संदेहास्पद न लिखे। साथ ही फोन का प्रयोग करते समय एतिहात बरते। कोशिश करे कि अधिक बात वह उसको दिए गए गुप्त फोन पर करे। सुहेल को लगा कि आफिया नींद में होने के कारण शायद बात नहीं करना चाहती। उसको सोने के लिए कहकर उसने फोन काट दिया। आफिया को दुबारा नींद आने ही लगी थी कि फोन फिर बजा। उसने स्क्रीन पर देखा। सुहेल ही दुबारा फोन कर रहा था। उसने फोन ऑन किया तो सुहेले बड़े उत्साह में बोला, “मैं जो कुछ बताने जा रहा था, वो तेरी नींद और तेरी सुस्ती सब मिटा देगा।“

“अच्छा !“

“मुझे अभी अभी अदनान शुक्रीजुमा का मैसज मिला है।“

“मेरे साथ भी उसकी रात ही बात हुई थी। पर अब वह क्या कह रहा है ?“

“आफिया, तुझे याद है न कि पिछले दिनों एक यहूदी पत्रकार ने पाकिस्तान जाकर जैशे मुहम्मद के लीडर की इंटरव्यू की थी और बाद में उसने जैशे मुहम्मद के बारे में काफ़ी कुछ ऐसा भी लिखा था जो कि हमारे उस लीडर को पसंद नहीं आया था।“

“मुझे पता है। तू डेनियल पर्ल की बात कर रहा है।“

“हाँ, उसी की। उसको उसकी आखि़री मंज़िल पर पहुँचा दिया गया है।“

“क्या मतलब ?“ आफिया उछलकर खड़ी हो गई।

“तू यह एड्रेस इंटरनेट पर डालकर इस वेबसाइट को खुद देख।“ एड्रेस लिखवा कर सुहेल ने फोन कोट दिया। आफिया ने कंप्यूटर ऑन करके सुहेल द्वारा बताई गई वेबसाइट खोली और वीडियो चला दी। वीडियो शुरू हुई तो वह बड़े ध्यान से देखने लगी। दो ढके चेहरों वाले व्यक्ति डेनियल पर्ल को एक खुले आँगन में लेकर आते हैं। फिर उसकी बाहें पीछे से बाँध दी जाती हैं। ढके चेहरे वाला एक व्यक्ति आगे बढ़ता है और डेनियल पर्ल की जीभ काट देता है। फिर बायें हाथ से उसके बाल पकड़कर सिर को पीछे की ओर खींचता है और दायें हाथ से धीरे धीरे उसकी गर्दन इस तरह काटता है जैसे बकरे को हलाल किया जाता है। सब कुछ करीब दो मिनट की वीडियो में ही घटित हो जाता है। आफिया इन दो मिनटों में आँखें नहीं झपकती। पहले उसका चित्त खराब होने लगता है। फिर उसको अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा मारे जा रहे जिहादी याद आते हैं तो उसका मन बदलने लगता है। आखि़र में वह उन जिहादियों पर गर्व महसूस करती है जो डेनियल पर्ल की हत्या करते हैं।

अगले दिन यह घटना अख़बारों की मुख्य सुर्खी बन गई। असल में डेनियल पर्ल कई दिनों से पकड़ा हुआ था। उसकी गर्भवर्ती पत्नी ने टी.वी. पर जाकर जिहादियों से विनती भी की थी कि उसके पति की जान बख़्श दी जाए। उसने कहा था कि और किसी के लिए नहीं तो इस नन्हीं जान के लिए ही सही, जो कुछ ही महीनों बाद जन्म लेने वाली है। कम से कम इसको पिता से वंचित न किया जाए। पर उसकी मिन्नतों का कोई असर न हुआ। आतंकवादियों ने पर्ल की सिर्फ़ हत्या ही नहीं की, बल्कि उसको मारते समय की वीडियो इसलिए बनाई ताकि अन्य पत्रकारों डराया जा सके।

अमेरिका युद्ध का मुँह हालांकि इराक की तरफ मोड़ रहा था, पर उसने अलकायदा सदस्यों का पीछा करना और तेज़ कर दिया था। आखि़र, मार्च 2002 में अमेरिका को उस वक़्त सफलता मिली जब उन्होंने बहुत ही उच्च कोटि का अलकायदा सदस्य अबू जु़बेद पकड़ लिया। पहली बार अबू जु़बेद ने ऐसी जानकारी दी कि अमेरिकी सरकार के होश उड़ गए। उसके अनुसार नाइन एलेवन की सारी कार्रवाई को अंजाम देने की जिम्मेदारी खालिद शेख मुहम्मद की थी जिसको कि आमतौर पर के.एस.एम. कहा जाता था। और 1993 में नॉर्थ टॉवर के पॉर्किंग लॉट में बम धमाका करके छह जनों की मौत और सैकड़ों को ज़ख़्मी करने वाला रम्जी यूसफ इसी के.एस.एम. का भतीजा है। अमेरिकी एंजेसियाँ जो अब तक नाइन एलेवन को लेकर अँधेरे में ही तीर मार रही थीं, अब सारी कहानी समझ गईं। वे जान गईं कि कैसे के.एस.एम. ने ओसामा बिन लोदन के साथ मिलकर नाइन एलेवन वाली घटना का खाका बनाया। फिर इसको अंजाम देने की सारी जिम्मेदारी भी के.एस.एम. ने ही पूरी की। उसने सारे आतंकवादियों को अमेरिका में पहुँचाने में मदद की और उन्हें ट्रेनिंग दी। अबू जु़बेद बहुत थोड़े टार्चर के बाद ही बहुत कुछ उगल गया। उसने के.एस.एम. की भविष्य की स्कीमों के बारे में भी बता दिया। अबू ने बताया, “के.एस.एम. अपनी इस नाइन एलेवन की प्राप्ति से बहुत उत्साहित है। वह इस लड़ाई को ज़ोर-शोर से आगे बढ़ाते हुए दूसरे बड़े हमले की तैयारी कर रहा है। उसकी आगे की योजना यह है कि अमेरिका में रेडियो एक्टिव बमों के साथ हमला किया जाए। अमेरिका की प्राकृतिक गैस लाइनों को आग लगा दी जाए जिससे एक ही बार में लाखों लोग मर जाएँगे। या फिर वह चाहता है कि अमेरिका के पानी के सिस्टम में ज़हर मिला दिया जाए। इससे भी बहुत लोग मरेंगे। अमेरिकी एटमी ऊर्जा प्लांट भी उसके निशाने पर हैं।“

अबू जु़बेद ने यह भी बताया कि इस दूसरे हमले के लिए के.एस.एम. ने भिन्न तरीका अपनाया है। इसके लिए वह पहले से ही अमेरिका में रह रहे लोगों में से जिहादियों की भर्ती कर रहा है। इस काम के लिए उसने होज़े पदीला जैसे कई लोग चुन भी लिए हैं। इसके अलावा अबू जु़बेद ने आगे बताया कि अगली सारी योजनायों को अंजाम देने के लिए के.एस.एम. ने अदनान शुक्रीजुमा को जिम्मेदारी सौंपी है। वही अमेरिका में रहते हुए आगे के आपरेशनों को अंजाम देगा। अबू जु़बेद से जिनके बारे में जानकारी मिली, एफ.बी.आई. उन सबके पीछे लग गई।

(जारी…)
 
12

अमजद ने अपनी आखि़री परीक्षा पास कर ली और उसने डॉक्टरी की सारी पढ़ाई मुकम्मल कर ली जो कि उसका लक्ष्य था। उसके लिए बड़े गर्व की बात थी कि वह अपनी कक्षा में अव्वल आया था। उसकी पार्ट टाइम टीचर की जॉब भी उसके लिए अच्छी साबित हुई। यह परीक्षा पास करते ही उसको असिसटेंट प्रोफेसर बना दिया गया। वह अब खुश था। उसकी पढ़ाई की जिम्मेदारियाँ पूरी हो चुकी थीं। उसने आफिया को खुश रखने का एक और ढंग निकाला। वह आफिया से कहने लग पड़ा कि अभी तो हम जिहाद के बारे में सीख ही रहे हैं, जब हम इस बारे में पूरी जानकारी हासिल कर लेंगे तो इसमें शामिल होने की सोचेंगे। उसने फिर से दाढ़ी बढ़ा ली ताकि आफिया को लगे कि वह मज़हब की ओर लौट रहा है। पर आफिया इस वक़्त उसकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही थी। शायद वह उसका नाटक समझ रही थी। ख़ैर, अमजद ने आफिया को खुश रखने के लिए काफ़ी सारा वक़्त घर में ही बिताना प्रारंभ कर दिया। वह हर इतवार को उसको और बच्चों को कहीं बाहर घुमाने ले जाता। एक दिन उसने घर में बात की, “आफिया, मेरे परिवार में शिकार का बहुत शोक रहा है।“

“अच्छा।“ आफिया ने साधारण-सा हुंकारा भरा।

“मैं चाहता हूँ कि मैं अपने बच्चों को खानदानी शोक से परिचित करवाऊँ।“

“इसके लिए क्या करेगा ?“

“हम इस वीक एंड पर कहीं बाहर चलते हैं। शिकार खेलने का सारा सामान वगैरह मेरा मतलब बंदूक आदि और अन्य सामान हम किसी स्टोर से खरीद लेंगे।“ उसकी बंदूक वाली बात आफिया को जच गई। उसने सोचा कि इसी बहाने वह बंदूक चलाने का अभ्यास कर लेगी। साथ ही फील्ड में पेश आने वाली मुश्किलों से परिचित हो जाएगी। उसने खुशी खुशी इस काम के लिए हामी भर दी। अगले ही दिन वे किसी असले की दुकान पर गए। दुकान वालों ने उनकी आई.डी. आदि चैक कीं। फिर उन्होंने आवश्यक सामान खरीद लिया। इस में पिस्तौल, बंदूक, सरवाइवल गाईड, बुलेट प्रूफ और नाइट विज़न गोगल्ज़ आदि थे। वे वीक एंड पर किसी शूटिंग रेंज पर चले गए। वहाँ उन्होंने दो दिन बिताये। खूब मस्ती की। शिकार खेला। ख़ास तौर पर आफिया ने बंदूक के निशाने लगाने का अभ्यास किया। इतवार की शाम वे घर लौट आए। अमजद ने देखा कि इस घटना के बाद आफिया में बहुत परिवर्तन आने लगा। वह अमजद से कहने लगी कि फिर से शूटिंग रेंज पर चला जाए। और इस बार बड़े हथियार मतलब ए.के. फोर्टी सेवन जैसी राईफलें चलाने का लुत्फ़ उठाया जाए। अमजद इसके लिए मान गया। अगले सोमवार वे यह कहकर काम पर गया कि वह कुछ घंटों के बाद लौट आएगा और फिर वे शिकार पर जाने का कार्यक्रम बनाएँगे। आफिया खुशी खुशी तैयारी करने लगी। करीब ग्यारह बजे उसके घर की डोर बेल बजी। वह दौड़ती हुई दरवाज़े की ओर गई कि शायद अमजद आ गया है। दरवाज़ा खोलने से पहले उसने की-होल में से देख लेना ज़रूरी समझा। जब उसने बाहर झांका तो वह भौंचक्क रह गई। बाहर दो व्यक्ति सूटिड-बूटिड और काली ऐनक लगाए दरवाज़ा खुलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। आफिया का दिल ज़ोर से धड़का, पर उसने अपने आप पर नियंत्रण रखते हुए पूछा, “कौन हो तुम ?“

“हम एफ.बी.आई. से हैं। आपसे मिलना है। दरवाज़ा खोलो।“

“मैं घर में अकेली औरत हूँ। मैं इस तरह दरवाज़ा नहीं खोल सकती। तुम तब आना जब मेरा पति घर में हो।“ उसने धैर्य से उत्तर दिया।

“वह कब आएगा ?“ एफ.बी.आई. वालों ने पूछा। पर आफिया कुछ न बोली। वह कुछ देर दरवाज़ा खुलवाने अथवा अन्य कोई बात करने का यत्न करते रहे, मगर आफिया ने अंदर जाते ही बैडरूम का दरवाज़ा भी बंद कर लिया। अंदर से ही वह अमजद को फोन मिलाते हुए बोली, “अमजद, गज़ब हो गया।“

“क्यों, क्या हो गया ? ख़ैर तो है ?“

“नहीं, ख़ैर नहीं है। अपने दरवाज़े पर एफ.बी.आई. वाले खड़े हैं और वे मुझे दरवाज़ा खोलने के लिए ज़ोर दे रहे हैं।“

“तू दरवाज़ा खोलकर पूछ तो सही कि आखि़र बात क्या है। वे यहाँ क्या करने आए हैं ?“

“नहीं अमजद, मैं दरवाज़ा नहीं खोलूँगी।“

“आफिया हो सकता है कि वे कोई ज़रूरी बातचीत करने आए हों। या किस दूसरे का अता-पता पूछ रहे हों। मेरा तो ख़याल है कि तू एक बार उनसे बात कर ले।“

“अमजद, मैंने तुझे कह दिया कि मैं किसी हालत में भी दरवाज़ा नहीं खोलूँगी। मुझे तो बहुत डर लग रहा है।“

“डरने की इसमें क्या ज़रूरत है। तू तो...।“ बात करते करते अमजद एकदम चुप हो गया। उसने देखा कि उसके सामने कोई आ खड़ा हुआ था। जो देखने से ही किसी एंजेंसी का व्यक्ति लगता था।

“आफिया, मैं तुझे ठहरकर फोन करता हूँ।“ इतना कहते हुए अमजद ने फोन काट दिया। उसने फोन एक तरफ रखा तो सामने खड़े व्यक्ति ने अपना कार्ड निकालकर उसके सामने कर दिया और बोला, “आए एम फ्रॉम एफ.बी.आई.।“

“जी, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?“ अमजद की आवाज़ में कंपन था।

“हम आपके साथ बातचीत करने आए हैं। मेरा साथी बाहर खड़ा है। क्या हम कुछ देर पॉर्क में जाकर बैठ सकते हैं ?“

“हाँ जी, बिल्कुल। मैं अपने बॉस को बता दूँ।“ इतना कहते हुए अमजद ने अपने बॉस से बात की और एफ.बी.आई. अफसर के साथ चल दिया। चलते हुए वह सोच रहा था कि यह तो काई खास बात लगती है कि ये एक समय में उसके घर और दफ़्तर में आए हैं। फिर उसको याद आया कि कुछ हफ़्ते पहले ही उसने असले की दुकान से जो सामान खरीदा था, ये उसी के कारण आए होंगे। यह बात याद आते ही उसका मानसिक तनाव काफ़ी घट गया, पर असल में यह बात नहीं थी। पहली बात तो अबू जु़बेद ने ही यहाँ के अलकायदा सैलों के बारे में बहुत कुछ जानकारी दी थी। शेष कसर तब पूरी हो गई जब उसकी गिरफ्तारी के अगले हफ़्ते ही पाकिस्तान से चलकर चिकागो एअरपोर्ट पर जैसे ही होजे़ पदीला उतरा, उसे पकड़ लिया गया। उसके पास से जो कंप्यूटर बम ड्राइव मिली, उसमें से बहुत सारी जानकारी प्राप्त हुई थी। उसमें से अदनान शुक्रीजुमा का नाम का पता चला। एफ.बी.आई. पहले ही उन लोगों की गतिविधियों पर नज़र रखे हुए थी जिनके नाम अबू जु़बेद से मिले थे। अबू जु़बेद की गिरफ्तारी छिपाकर रखी गई थी। इसी कारण होजे पदीला, एफ.बी.आई. के हाथ चढ़ गया। पर उसके पकड़े जाने के पश्चात शेष सभी सदस्य गुप्तवास में चले गए। ख़ैर, अमजद को साथ लेकर एफ.बी.आई. के दोनों अफ़सर पॉर्क में जा बैठे।

“मि. अमजद, हम एफ.बी.आई. से हैं। लो, तुम अपनी तसल्ली के लिए मेरा आई कार्ड देख लो।“ इतना कहते हुए एक अफ़सर ने सरकारी बैज दिखलाते हुए अपना विजिटिंग कार्ड निकालकर अमजद के हवाले कर दिया। अमजद ने सरसरी नज़र डालते हुए विजिटिंग कार्ड जेब में डाल लिया।

“मि. अमजद, आप कोई घबराहट तो महसूस नहीं कर रहे ? मेरा मतलब हम बात कर सकते हैं ?“

“नहीं सर, ऐसा कुछ नहीं है। आप बात शुरू करो।“

“मि. अमजद, नाइन एलेवन का हादसा करने वाले हाईजैकर्स घटना से पहले आपके अपार्टमेंट की बिल्डिंग में आते जाते रहे हैं। क्या आप उनके बारे में कुछ जानते हैं ?“

“नहीं सर। मुझे बात की कोई जानकारी नहीं है।“ पहली बात ने ही उसके पैर उखाड़ दिए। जितनी छोटी बात वह समझ रहा था, उतनी छोटी उसको लगी नहीं।

“क्या आपकी पत्नी को इस बारे में कुछ पता होगा ?“

“जहाँ तक मेरा ख़याल है, इस बात के बारे में उसको भी कुछ पता नहीं होगा। हम तो आम-सी ज़िन्दगी जीने वाले सादे-से लोग हैं।“

“आपको या आपकी पत्नी को और कुछ अता-पता है। हमारा मतलब हाईजैकर्स या उनकी कार्रवाइयों के बारे में ?“

“नहीं सर, हमें इस तरह की कोई जानकारी नहीं है।“

इसके बाद दोनों अफ़सरों की आपस में नज़रें मिलीं। फिर उनमें से एक बोला, “मि. अमजद, हम आप दोनों यानी पति-पत्नी की एकसाथ इंटरव्यू करना चाहेंगे। इसके लिए आपको हमारे दफ़्तर से सरकार का लैटर आएगा। पर तब तक आप शहर छोड़कर कहीं नहीं जा सकते। यह एक सरकारी आदेश है। मेरा कार्ड आपके पास है, जब चाहे कॉल करके बता सकते हो। वैसे घबराने वाली कोई बात नहीं है। यह एक रूटीन काम है।“

“जी सर।“

वे चले गए तो अमजद के मन पर से बहुत सारा बोझ कम हो गया। शुरू में तो उसको पहला प्रश्न सुनकर ही लगा था कि यह तो बात ही उल्टी दिशा की ओर चल पड़ी। पर अब उसको लगा कि यह तो वास्तव में ही आम-सी इंकुआरी है जो कि किसी के साथ भी हो सकती हे। लेकिन जब अमजद घर पहुँचा तो आफिया डर से काँपे जा रही थी। उसके घर में प्रवेश करते ही वह अमजद से लिपटकर रोने लग पड़ी। अमजद ने उसको ढाढ़स देकर शांत करवाया। आफिया थोड़ा संभलते हुए बोली, “अमजद, तू मेरी बात सुन ले। हमें आज ही पाकिस्तान चले जाना चाहिए।“

“क्यों ? हमने क्या कोई गलत काम किया है कि यहाँ से भागें ?“

“बस, मैंने कह दिया कि हमें यहाँ नहीं रहना।“

“पर कोई बात तो हो जिसकी वजह से हमें भागना पड़े।“

“इसका मतलब, तू मेरी बात नहीं मानेगा ?“

“मैं तेरी बात मान लूँगा यदि तू मुझे साफ़ साफ़ बता दे कि तुझे डर किस बात का है। पहले भी तूने ऐसा ही किया था। घटना न्यूयॉर्क में हुई थी और तूने यहाँ धरती आसमान पर उठा ली। आखि़र मेरी बात न मान पाकिस्तान जाकर ही साँस लिया था। फिर क्या निकला उस बात में से ? सिर्फ़ परेशानी के। मेरी पढ़ाई का नुकसान हुआ, साथ ही सारे रिश्तेदारों को तंग किया।“

“अमजद, तू तब की बात छोड़। मैं तेरी मिन्नत करती हूँ, प्लीज़ अब मेरी बात मान ले।“ आफिया आँखों में आँसू भरती हुई बोली। उसके आँसू देखकर अमजद ढीला पड़ गया। वह कुछ सोचता हुआ बोला, “चल, मैं कुछ दोस्तों के साथ सलाह-मशवरा करता हूँ। फिर देखते हैं कि क्या होता है।“

“अगर तब तक वो दुबारा आ गए तो ?“

“नहीं, इतनी जल्दी नहीं आते। और फिर उन्हें और भी कोई काम होगा। अकेले हम ही तो यहाँ नहीं बैठे। यहाँ लाखों मुसलमान रहते हैं। क्या पता, उन्हें किस-किस की इंटरव्यू करनी होगी।“

“तू मेरे साथ एक बात का फैसला कर, अभी।“ आफिया गुस्से में काँपने लगी।

अमजद ने हैरान होकर आफिया की ओर देखा कि यह कभी नरम पड़ जाती है और कभी फिर से भड़क उठती है।

“अमजद, तुझे मेरी परवाह है कि नहीं ?“

“तेरी परवाह मुझे न होगी तो फिर और किसको होगी।“

“फिर मेरी बात मान और कल ही पाकिस्तान चल।“

अमजद ने उसकी बात का कोई उत्तर न दिया। उसने कई मित्रों को फोन मिलाकर बातें कीं। हरेक ने उसको यही बताया कि आजकल यह बात आम हो गई है कि एफ.बी.आई. वाले किसी भी मुसलमान के घर जा पहुँचते हैं। पर जब कुछ मिलता नहीं तो वापस लौट पड़ते हैं। फिर अमजद ने आफिया के भाई मुहम्मद अली को हूस्टन में फोन किया। सारी बात सुनकर अली ने आफिया के साथ बात करनी चाही। आफिया ने फोन पकड़ लिया तो वह हँसता हुआ बोला, “तू हमारी बहादुर लिटिल सिस्टर कब से डरपोक बन गई। यह तुझे क्या हो गया। इस तरह तो सारे मुसलमान अमेरिका छोड़कर चले जाएँगे। तुझे डरने की ज़रूरत ही नहीं। शांत रह।“

“पल्ले शांति ही रह जाएगी। वे उठाकर जेल में फेंक देंगे।“

“कुछ नहीं होता। यूँ ही न घबरा।“

उसका भाई भी बार बार पूछता रहा कि वह किस बात से इतना डर रही है, पर आफिया ने कोई जवाब नहीं दिया। आखि़र वह चुप हो गई और काँपती-सी सोफे पर बैठ गई। मगर उस रात वह पल भर भी न सोई। वह सारी रात कमरे में चक्कर लगाती रही। अमजद को उसकी हरकतें बहुत परेशान कर रही थीं। उसे चिंता भी थी कि कहीं इसके दिमाग पर ही बोझ न पड़ जाए। सुबह होते ही उसने बॉस्टन के मशहूर वकील को फोन करके सारी बात बताई। साथ ही यह भी बताया कि उसकी पत्नी इस घटना से बहुत ही डरी हुई है। वकील ने सलाह दी कि इसके लिए तुम खुद ही एफ.बी.आई. वालों से मुलाकात का समय लेकर इंटरव्यू वाला काम पूरा कर सकते हो। बल्कि इस तरह तुम्हें लम्बे समय तक एफ.बी.आई. के डर तले दिन नहीं गुज़ारने पड़ेंगे। अमजद के हाँ कहते ही वकील ने एफ.बी.आई. को फोन करके उनके साथ इंटरव्यू की तारीख़ तय का ली। अमजद ने आफिया को बताया तो वह और अधिक डर गई और भड़क गई। वह कहने लगी कि वह किसी भी हालत में एफ.बी.आई. के सामने नहीं जाएगी।

“पर तुझे तकलीफ़ क्या है। तू किसी भी बात पर कान नहीं धर रही। अब वकील ने इंटरव्यू का प्रबंध कर दिया है तो तू कह रही है कि तू एफ.बी.आई. वालों से नहीं मिलेगी। तुझे पता होना चाहिए कि यह सरकारी हुक्म है कि हम इंटरव्यू के बिना यहाँ से नहीं जा सकते।“

“अमजद, क्या तुझे इस बात का ज़रा-सा अहसास भी है कि यदि कोई पंगा पड़ गया तो क्या होगा ?“

“आफिया, यह तो तुझे तब सोचना था जब मेरे रोकने के बावजूद चैरिटी के कामों में हिस्सा लेने से नहीं हटा करती थी। अब यूँ डरी जा रही है। जितने भी केयर ब्रदर्ज़ या बोनेवोलैंस इंटरनेशनल के सदस्य हैं, सबके साथ एफ.बी.आई. ने बातचीत की है। किसी को कुछ नहीं कहा।“

“उनकी और मेरी बात में अंतर है।“

“क्या ! क्या कहा ? तेरे में और उनमें क्या फर्क है ?“ अमजद का दिल ज़ोर से धड़का।

“ये बातें तू नहीं समझ सकता। ये चैरिटी के अपने काम करने के ढंग होते हैं।“ आफिया के मुँह से कोई दूसरी बात निकलने ही वाली थी, पर उसने चुस्ती के साथ बात को गोल कर दिया। फिर अमजद धैर्य से बोला, “देख आफिया, हमने बहुत बहस कर ली। अब मैं एक पति के अधिकार से तुझसे कह रहा हूँ कि कल सवेरे दस बजे हम वकील के दफ़्तर जा रहे हैं। वहीं एफ.बी.आई. वाले आएँगे और वहीं अपनी इंटरव्यू होगी। अब इस मसले पर कोई बात नहीं होगी।“ इतना कहकर अमजद घर से बाहर चला गया। शाम के वक़्त वह लौटा तो आफिया मुँह-सिर लपेटकर बैड पर पड़ी हुई थी। अमजद ने सोचा कि यह शायद इस कारण गुस्सा दिखा रही है कि मैं इसकी बात नहीं मान रहा। परंतु आफिया के अंदर बहुत बड़ी उठा-पटक मची हुई थी। उसको पूरा विश्वास था कि कल उसको गिरफ़्तार कर लिया जाएगा।

अगले दिन वह निश्चित समय पर वकील के दफ़्तर पहुँच गए। तभी एफ.बी.आई. के वही दो अफ़सर जो कि अमजद को मिलकर गए थे, वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने कुछ काग़ज़ों पर दोनों के दस्तख़्त करवाकर वकील की सहमति से इंटरव्यू शुरू कर दिया। प्रारंभ में वह कोई अधिक कठिन प्रश्न नहीं कर रहे थे। बल्कि वे बीच बीच में अमजद को ऐसे मजाक भी कर रहे थे जो कि आम लोग डॉक्टरों के बारे में करते रहते हैं। इस बात ने अमजद को निश्चिंत कर दिया कि कोई ख़तरे वाली बात नहीं है। फिर एक अफ़सर बोला, “मिस्टर और मिसेज अमजद, अब हम आफिशियल मीटिंग शुरू कर रहे हैं।“

“जी, ठीक है।“

फिर एक अफ़सर ने आफिया की ओर देखा। आफिया ने काला बुर्का पहन रखा था और मुँह-सिर दुपट्टे में लपेटा हुआ था। उसकी आँखें भी सिर्फ़ बुर्के की जालियों में से ही आधी-अधूरी-सी दिख रही थीं।

“मिसेज आफिया, आपको अपना मुँह नंगा करना पड़ेगा। क्योंकि यह ज़रूरी है।“

“नहीं, यह मैं नहीं कर सकती। यह मेरा धार्मिक अधिकार है कि मैं जैसे मर्ज़ी कपड़े पहनूँ।“

उसकी यह बात सुनकर दोनों अफ़सरों ने आपस में नज़रें मिलाईं। फिर वे उठकर एक तरफ हो गए और आपस में बातचीत करने लगे। वापस बैठते हुए उनमें से एक बोला, “मिसेज आफिया, हम आपके धार्मिक अकीदे की इज्ज़त करते हैं, पर कानून अपनी जगह है। हम आपको इतनी छूट दे सकते हैं कि आप अपने बुर्के को इस ढंग से पहने कि हमें आपका चेहरा दिखता रहे। आमने सामने की बातचीत में यह बहुत ज़रूरी है। अगर आपको यह भी मंजूर नहीं तो हम अपनी किसी औरत एजेंट को बुला लेते हैं। फिर आपको बुर्का उतारकर एक तरफ रखना पड़ेगा।“

आफिया ने स्वयं ही बुर्का ठीक कर लिया। अब उसका सारा चेहरा नंगा था। अफ़सरों ने एक इतने पर ही संतुष्टि प्रकट की। बातचीत शुरू हुई तो अफ़सर बोला, “मि. अमजद, आपके अपार्टमेंट में एक बार कोई सउदी अरब का बाशिंदा रहा करता था, वह कौन था ?“

“वह मेरे अस्पताल में ही काम करता था। उसको किराये के कमरे की ज़रूरत थी और मुझे अपने घर का एक कमरा किराये पर देना था। वह कमरा मैंने उसको दे दिया। बस, उसके बारे में इतना ही जानता हूँ।“

“उसके पास कौन आता था ?“

“हमने कभी देखा नहीं कि कभी कोई उसको मिलने आया हो।“

“आपने पिछले दिनों असले की दुकान से काफ़ी सामान खरीदा है। वो क्यों ?“

“मेरे परिवार में शिकार का शौक रहा है। मैं अपने बच्चों को उस पारिवारिक परंपरा से परिचित करवाने के लिए उन्हें शिकार के ट्रिप पर ले गया था।“

“पर वो सामान सिर्फ़ शिकार तक ही सीमित नहीं था। आपने नाइट विज़न गॉगल्ज़, बुलट प्रूफ़ जैकेट और सरवाइवल गाइड जैसी वस्तुएँ भी खरीदी थीं। यह सब किस लिए ?“

“इन सबका ताल्लुक सिर्फ़ शिकार से ही था, और कुछ नहीं।“

“मिसेज आफिया, क्या आपको बंदूक चलानी आती है ?“

“नहीं, मैंने कभी बंदूक नहीं चलाई।“

“इस शिकार के ट्रिप के समय भी चलाकर नहीं देखी ?“

“नहीं, मुझे ऐसे काम अच्छे नहीं लगते।“

“अजीब बात है कि सभी ने बंदूक चलाई, शिकार खेला, पर आपने हथियार चलाकर नहीं देखा ?“

“ये तो अपने अपने शौक पर निर्भर करता है।“ आफिया जब यह बात कह रही थी तो एक अफ़सर ने गौर से उसकी तरफ देखा। आफिया ने उसके साथ आँखें मिलाने की बजाय नीचे झुका लीं। अफ़सर समझ गया कि यह झूठ बोल रही है। इसने शिकार के समय बंदूक अवश्य चलाकर देखी होगी।

“मि. अमजद, आजकल काम का काफ़ी सारा बोझ रहता होगा ?“ एक अफ़सर ने अमजद से उसके काम की बात प्रारंभ की तो अमजद को लगा कि शायद इंटरव्यू इतनी संजीदा नहीं है। परंतु तभी अफ़सर के अगले प्रश्न ने उसकी घबराहट बढ़ा दी। वह बोला, “मि. अमजद, क्या आप कभी ओसामा बिन लादेन से मिले हो ?“

“ओसामा से ! जी बिल्कुल नहीं। मैं उन्हें कभी नहीं मिला।“

“उसकी फोटो तो देखी होगी ?“

“हाँ जी, वह तो दिनभर टी.वी. पर देखते ही रहते हैं।“

“निजी तौर पर मिलते समय फोटो से कितना भिन्न दिखाई देता है लादेन ?“

“जी, कभी मिले ही नहीं तो क्या कह सकते हैं ?“ अमजद ने ज़रा मुस्कराते हुए उत्तर दिया। एक अफ़सर इसी दौरान आफिया के चेहरे को बड़े गौर से देख रहा था। वह मन ही मन सोच रहा था कि अब यह अपने आप को इसी सवाल के लिए तैयार कर रही है जो अमजद से पूछा गया है कि क्या वह कभी ओसामा बिन लादेन से मिली है। मगर उसने दूसरे किस्म का सवाल करके आफिया को हैरान कर दिया।

“मिसेज आफिया, क्या आप कभी रम्जी यूसफ से मिली हैं ?“

“क्या ! क्या कहा ?“ आफिया वाकई हैरान रह गई।

“आपने यह नाम सुना होगा ?“

“हाँ जी, यह वही आदमी है जो कि 1993 के नॉर्थ टॉवर पॉर्किंग में बम धमाके का दोषी है। पर मैं इससे कभी नहीं मिली।“

“अच्छी तरह याद करो। कई बार आदमी वैसे ही मिल जाता है। कहीं शॉपिंग सेंटर में, किसी मस्जिद में या कहीं एअरपोर्ट की लाइन में लगे हुए।“

उसकी बात सुनकर आफिया को पसीना आ गया कि यह तो उसके बारे में बहुत कुछ जानते हैं। उसको याद आया कि बहुत पहले उसने रम्जी यूसफ को एअरपोर्ट पर साथ वाली लाइन में खड़ा देखा था। दोनों की नज़रें भी आपस में मिली थीं। यह बात याद करते ही वह अंदर तक काँप गई। वह समझ गई कि इन्हें उसके बारे में बहुत सारी जानकारी है, पर फिर भी उसने कह दिया कि वह रम्जी यूसफ को कभी नहीं मिली। उसके इस जवाब के तुरंत बाद अफ़सर बोला, “रम्जी को न सही, पर आप उसके चाचा के.एस.एम. से तो कभी मिली होंगी ?“

“नहीं, मैं उससे भी कभी नहीं मिली।“

“आपने आखि़री बार मुहम्मद अट्टे को कहाँ देखा था ?“

“मुहम्मद अट्टा ?“

“हाँ हाँ, वही जो नाइन एलेवन की घटना को अंजाम देने वाली टीम का नेता था।“

“मैं उसको कभी नहीं मिली।“

“आपकी अपार्टमेंट की इमारत में कम से कम छह हाईजैकर्स आते रहे हैं। आपकी उनके साथ कभी न कभी तो मुलाकात हुई ही होगी ?“

“नहीं, कभी नहीं हुई।“

“वैसे आते-जाते देखे होंगे। अक्सर आता-जाता आदमी मिल ही जाता है।“

“जी नहीं। मैंने किसी को नहीं देखा।“ अफ़सर गौर कर रहे थे कि एक के बाद एक किए जा रहे सवाल आफिया को परेशान कर रहे थे। पर अभी तो वे भूमिका ही बाँध रहे थे।

“मि. अमजद क्या आपने केयर ब्रदर्ज़ और बोनेवोलैंस के बारे में सुना है ?“

“जी, जहाँ तक मुझे पता है, ये चैरिटी का काम करने वाले संगठन हैं।“

“आपको यह कैसे पता है ? क्या आप इनके मेंबर रहे हैं ?“

“नहीं जी, मेरी पत्नी इनकी मेंबर है। इसी की बातों से मुझे पता लगता रहता था कि ये संगठन चैरिटी का काम करते हैं।“

“मिसेज आफिया, क्या आपका इनसे वास्ता रहा है ?“

“जी, थोड़ा-बहुत।“

“क्या आपको पता है कि ये चैरिटी द्वारा एकत्र किए गए पैसे का क्या करते हैं ?“

“मेरा ख़याल है कि गरीबों में बाँटते होंगे।“

“क्या आपने कभी इनके कारकुनों से पूछा नहीं कि इतने एकत्र हुए पैसे का क्या किया जाता है ?“

“मुझे ऐसी बातों से क्या लेना। जो चाहे करें।“ आफिया उनकी बातों को सुनकर ऊब गई थी, पर साथ ही उसको थोड़ी-सी तसल्ली भी थी कि यह तो साधारण-से प्रश्न ही पूछ रहे हैं।

“आपको पूछने का पूरा अधिकार है। आप इसको फंड इकट्ठा करके जो देती हैं।“

“नहीं, मैंने कभी किसी के लिए फंड इकट्ठा नहीं किया।“

“क्या आपने बोनेवोलैंस को फंड इकट्ठा करके नहीं दिया ?“

“नहीं, मैंने कभी कोई फंड इकट्ठा नहीं किया और न ही किसी को दिया है।“

“पक्की बात है ?“

“और क्या झूठ है ?“ आफिया ने आँखें तरेरीं।

“तो फिर आपके खाते में जो हज़ारों डॉलर इकट्ठे हुए हैं और आपने इन्हें आगे बोनेवोलैंस के खाते में भेजे हैं, यह सब फिर क्यों किया ?“

“यह सब झूठ है। मैंने ऐसे कोई पैसे इकट्ठे नहीं किए।“

“ये पेपर्स फिर झूठ बोलते हैं।“ इतना कहते ही अफ़सर ने आफिया के बैंक की पिछले दो सालों की स्टेटमेंट निकालकर वकील के सामने रख दीं। आफिया की आँखें फटी की फटी रह गईं। पर वह बात को संभालती हुई बोली, “हमारे मज़हब में यह भी है कि यदि हमारी इच्छा हो तो चैरिटी के बारे में किसी को न बताएँ।“

“चलो, ठीक है।“ अफ़सर खुश था कि उसने आफिया को झूठी साबित कर दिया था।

“मिसेज आफिया, क्या आप बता सकती हैं कि के.एस.एम. की अमेरिका को तबाह करने की भविष्य में क्या योजना है ?“

“मैं न उसको जानती हूँ, न ही कभी उससे मिली हूँ। फिर मुझे क्या मालूम कि वह क्या करता है, क्या नहीं।“

“क्यों ? आपको अदनान शुक्रीजुमा ने उसकी योजना के बारे में नहीं बताया ?“

“कौन अदनान शुक्रीजुमा ?“ यह नाम सुनकर आफिया अंदर तक काँप गई, पर बाहर से अपने को सहज ही दर्शाने की कोशिश की।

“आपके कहने का अर्थ है कि आप अदनान शुक्रीजुमा को नहीं जानती ?“

“जी, बिल्कुल नहीं।“

“सच बात है ?“ अफ़सर ने सीधा उसकी ओर देखकर पूछा।

“कह तो दिया न कि मैं उसको नहीं जानती। और कैसे बताऊँ ?“ आफिया की आवाज़ में खीझ थी।

उसने बात समाप्त की तो अफ़सर उसकी आँखों में देखता रहा। फिर वह गंभीर आवाज़ में बोला, “यदि आप उसको जानती ही नहीं तो हर रोज़ उससे ई मेल पर बातें क्यों करती हैं ?“

“क्या ?“ आफिया को लगा जैसे कंरट लगा हो। मगर उसने अपने आप को संयत रखते हुए कहा, “मैंने उसको कोई ई मेल नहीं भेजी।“

“तो फिर यह क्या है ?“ अफ़सर ने बैग में से काग़ज़ों का पुलिंदा निकालकर वकील के सामने रख दिया। ये वे ई मेल थीं जो कि अदनान शुक्रीजुमा और आफिया में आदान-प्रदान होती रही थीं। वकील ने बड़े गौर से ई मेलों को देखा। उधर आफिया परेशान हुई कुर्सी पर बैठी करवटें बदलने लगी।

“मैम, आपने हमारी बात का जवाब नहीं दिया ?“

“यह ... यह तो मैं... मेरा मतलब ...।“ उससे कोई जवाब न दिया गया। उसने गर्दन झुका ली।

दोनों अफ़सर उठे और एक तरफ जाकर आपस में बातें करने लगे। आफिया को पूरा यकीन हो गया कि अब वह उसको गिरफ्तार करने की सलाह कर रहे हैं। पर जब उन्होंने वापस आकर अपनी बात कही तो आफिया को कुछ तसल्ली-सी हो गई।

वे वकील से मुखातिब हुए, “सर, ये इंटरव्यू हम यहीं बंद करते हैं। पर इनकी इंटरव्यू अभी और होगी। उसके लिए हम अगले महीने की उन्नीस तारीख तय कर रहे हैं।“

“ठीक है। आप उसके बारे में मुझे पूरी सूचना भेज दो।“

“हाँ, ऐसा ही होगा। साथ ही मिस्टर और मिसेज अमजद खाँ से कुछ कहना चाहते हैं।“

“जी...।“ अमजद डरता हुआ बोला।

“आपका अगले इंटरव्यू में शामिल होना बहुत ज़रूरी है। आप उस इंटरव्यू से पहले यह देश छोड़कर नहीं जा सकते। यह एक सरकारी आदेश है। लीजिए, इस सरकारी आदेश पर दस्तख़्त कर दो।“ अफ़सर ने अगली इंटरव्यू पर उपस्थित रहने वाला काग़ज़ उनके सामने रख दिया। दोनों ने बारी बारी उस पर साइन कर दिए। फिर अफ़सरों ने अपने बैग संभाले और दफ़्तर से बाहर निकल गए। उनके जाते ही अमजद ने वकील से पूछा, “आपको कैसा लगा। यह इंटरव्यू कितना संजीदा था ?“

“यह तो आम-सी बात है। मेरे ख़याल में आपके लिए इसमें डरने वाली कोई बात नहीं है। साथ ही, अगली इंटरव्यू से पहले हम बैठकर आपस में बातचीत करेंगे। ऐसा करने से कई सवाल-जवाब करते समय आसानी रहती है।“

“जी ठीक है।“

इसके बाद अमजद और आफिया घर की ओर लौट पड़े। अमजद ने कई मित्रों को फोन करके आज की इंटरव्यू की कारगुज़ारी के बारे में बताया। सभी ने कहा कि ऐसे सवाल पूछे जाना आम-सी बात है। इसमें घबराने वाली कोई बात नहीं है। अमजद को लगा कि इंटरव्यू ठीक ही रही और उसने सोचा कि अगली इंटरव्यू के बाद उनका एफ.बी.आई के लफड़ों से पीछा छूट जाएगा। परंतु जब वे घर पहुँचे तो आफिया ने बावेला खड़ा कर दिया।

“अमजद, मेरी बात सुन, हमें कल ही बच्चों को लेकर वापस अपने देश चले जाना चाहिए।“

“पर क्यों ? मेरा मतलब अपनी इंटरव्यू तो ठीक ही रही है।“

“तुझे लगता है कि ठीक रही है। पर तू नहीं जानता कि.... बस, मैं तुझे कह रही हूँ कि हम यहाँ से निकलने की सोचें।“

“तू पूरी बात बता कि मैं क्या नहीं जानता। मुझे भी तो पता चले कि तुझे कौन-सी बात का भय सता रहा है ?“

“क्यों, सारी बात क्या बताना ज़रूरी है ?“ आफिया गुस्से में भड़क उठी।

“हाँ ज़रूरी है। तू ही बता कि वो अदनान शुक्रीजुमा कौन है ?“

“तुझे उससे क्या लेना ?“

“मैं उसके बारे में सबकुछ जानना चाहता हूँ। सिर्फ़ वही नहीं, और बहुत से लोग हैं जिनके एफ.बी.आई वालों ने नाम लिए थे। मैंने ऐसे लोगों का पहले कभी जिक्र भी नहीं सुना और तू उनके साथ मिलकर पता नहीं क्या काम करती रही है। कौन हैं ये सब लोग ? तू उन्हें कैसे जानती है ? मुझे सब कुछ बता।“ अमजद गुस्से में आ गया।

“मुझे इन बातों पर कोई चर्चा नहीं करनी। पर तू मेरी बात पर ध्यान दे और हम यहाँ से वापस चलें। यहाँ मेरी जान को ख़तरा है।“

“आफिया, मेरी बात सुन ले अच्छी तरह। मुझे लगता है कि तू दोहरी ज़िन्दगी जी रही है। जो मेरे सामने दिख रही है, उसके अलावा एक दूसरी आफिया और है जिसकी निजी ज़िन्दगी पता नहीं क्या है। तुझे आज सबकुछ बताना होगा।“

अमजद ने बात खत्म की तो आफिया चुप बैठी सोच में गुम थी। अचानक वह चेहरे पर बनावटी मुस्कान ले लाई और अमजद के करीब आ गई। अमजद उसके बनावटीपन को न समझ सका। वह उसको अपनी बांहों में लेती हुई बोली, “अमजद इतना चिंतित न हो। ऐसी कोई बात नहीं है। ये सब चैरिटी का काम करते हैं और मुझे वहीं मिलते रहे हैं। वे जो अदनान शुक्रीजुमा का ज़िक्र कर रहे हैं, उससे भी मेरी चैरिटी की बाबत ही ई मेल का आदान-प्रदान हुआ है। इससे अधिक इस बारे में मुझे कुछ नहीं पता।“

“फिर तू इतना घबरा क्यों रही है ?“

“मैं तो यह सोचती हूँ कि अगर यहाँ एफ.बी.आई वालों ने एक बार किसी चक्कर में फंसा लिया तो फिर पीछा नहीं छूटेगा। अपना मुल्क अपना ही होता है। मैं तो सिर्फ़ इसी कारण कह रही हूँ। अगर नहीं जाना तो कोई बात नहीं, तू गुस्सा न हो।“ आफिया ने उस समय अमजद को ठंडा कर लिया। अमजद को भी उसकी बात पर यकीन आ गया।

अगले दिन अमजद सो कर उठा तो उसने देखा कि आफिया अपना सामान बाँध रही थी। उसे इस तरह तैयारी करते देख वह हैरान-सा होकर बोला, “आफिया यह क्या ? रात अपनी बात खत्म हो गई थी कि हम कहीं नहीं जा रहे।“

“अमजद, मैंने घर फोन किया था। अब्बू की सेहत खराब है। मैं चाहती हूँ कि जल्दी से जाकर उनका पता लूँ।“

“पर चार दिन पहले ही तो अपनी बात हुई थी। तब तो वे ठीक थे।“

“तुझे पता है कि वह दिल के मरीज़ हैं। अगर में अब न जा सकी तो फिर कई महीने नहीं जा सकूँगी। तू जानता ही है, इस वक़्त मैं सात महीनों की गर्भवती हूँ।“ आफिया ने बैग तैयार करना जारी रखा और अमजद के अंदर ही अंदर गुस्सा होते मन ने सोचा कि अब्बू की बीमारी का यह सिर्फ़ बहाना बना रही है। कुछ सोचता हुआ वह बोला, “पर तुझे पता ही है कि हमें एफ.बी.आई. ने हिदायत दे रखी है कि हम उनकी इंटरव्यू पूरी किए बग़ैर कहीं नहीं जा सकते।“

“कुएं में जाए तेरी एफ.बी.आई.। मैं यहाँ अब एक पल भी नहीं रुकूँगी।“ आफिया गुस्से में पैर पटकती बोली।

उसकी बात सुनकर अमजद को गुस्सा तो बहुत आया, पर इस समय वह मज़बूर था। आफिया के गर्भवती होने के कारण वह उसके साथ कोई झगड़ा नहीं करना चाहता था। लेकिन आफिया उसकी कोई बात नहीं मान रही थी। उसने अपने वकील को फोन करके बताया कि आफिया के डैड बीमार हैं, इसलिए इस वक्त उनका पाकिस्तान जाना बहुत ज़रूरी है। उसने पूछा कि क्या यह इंटरव्यू आगे बढ़ सकती है। वकील ने मशविरा देते हुए कहा, “मि. अमजद, इस तरह इंटरव्यू बीच में छोड़कर जाना ठीक नहीं है। तुम्हारा केस खुला ही रह जाएगा जो कि तुम्हारे लौटने पर तुम्हारे लिए मुश्किल खड़ी कर देगा। अच्छा यही है कि तुम अपनी एपाइंटमेंट पूरी करके जाओ।“

“सर, इस वक़्त मेरे पास कोई दूसरा चारा नहीं है। वापस लौटकर दुबारा इंटरव्यू की तारीख ले लेंगे।“

“मि. अमजद इंटरव्यू तो मैं कैंसिल करवा देता हूँ। पर इस तरह तुम शक के घेरे में आ जाओगे। एफ.बी.आई. एक बार जिसके पीछे पड़ जाए तो फिर पीछा छुड़ाना कठिन हो जाता है।“

“ठीक है सर, मैं आपको अपनी वाइफ़ से सलाह करके बताता हूँ।“ वकील से फोन पर बात खत्म करके अमजद ने आफिया से वकील के साथ हुई बात बताई। उसकी बात सुनते ही आफिया भड़कती हुई बोली, “अगर तू चाहता है कि मैं मारी जाऊँ तो जाने की बात छोड़ देते हैं।“

“यह तू क्या कह रही है, मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा।“ अमजद आफिया की ओर देखता हुआ सोचने लगा कि कोई न कोई बात अवश्य है जो यह यहाँ से भागने के लिए उतावली हुई पड़ी है। आफिया की हरकतों ने उसका यह शक पुख्ता कर दिया कि वह सच में ही नाइन एलेवन की साजिश के बारे में कुछ न कुछ जानती है। पर उसने एकबार और उसको समझाना चाहा तो वह वैसे ही गुस्से में चीखती हुई बोली, “ओ.के. ठीक है। तू अपनी मर्ज़ी कर। पर मैं अपने बच्चों को लेकर आज ही जा रही हूँ।“

फिर अमजद ने वकील को दुबारा फोन करके कहा कि उसको जाना ही पड़ेगा। वकील ने एफ.बी.आई. के ऑफिस में फोन करके बता दिया कि उसके क्लाइंट तय की गई तारीख पर नहीं पहुँच सकेंगे। अमजद ने अपने काम पर से भी एक साल की छुट्टी ले ली।

(जारी…)
 
13

26 जून 2002 को अमजद और आफिया बच्चों सहित कराची एअरपोर्ट पर आ उतरे। वे घर पहुँचे तो घरवाले उनके आने पर काफ़ी ख़फा थे। रात के समय नईम खां ने अमजद के साथ बात शुरू की, “तू नहीं टला फिर ? अपने मन की करके ही हटा न। तुझे मैंने कितना कहा कि इस वक़्त करियर बीच में छोड़कर आना तेरे लिए ठीक नहीं है। पर तेरे दिमाग में कोई बात आए, तभी न।“

अमजद ने अपने अब्बा की ओर देखा और फिर लम्बा सांस लेता मायूस-सा बोला, “अब्बू मेरी वजह से नहीं है। अल्लाह खै़र करे, कहीं आगे चलकर मुझे इससे भी बड़े इम्तहान में से गुज़रना पड़ जाए।“

अमजद की इस एक ही बात से परिवार सारी बात समझ गया। नईम खां से रहा न गया तो वह बोला, “इस लड़की ने मेरे बेटे का भविष्य तबाह करके रख दिया...।“ नईम खां गुस्से में बोल रहा था तो उसकी पत्नी ने उसको चुप रहने का इशारा किया क्योंकि बाहर खड़ी आफिया चोरी-सी उनकी बातें सुन रही थी। नईम खां तो चुप हो गया, पर आफिया अंदर ही अंदर बल खा गई। वह उसी शाम बच्चों सहित अमजद को लेकर मायके चली गई। वहाँ जाकर उसने सबसे पहले तो अमजद को करीब बिठाकर कहा, “अमजद, अब मौका आ गया है कि तुझे कोई फै़सला करना पड़ेगा।“

“फै़सला ? फ़ैसला किसके बारे में ?“

“अब यह फै़सला कर ले कि तूने मेरे साथ रहना है या अपने घरवालों के साथ ?“

“आफिया यह तू क्या कह रही है। घरों में आपसी गुस्से-गिले तो होते ही रहते हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि मियाँ-बीवी अलग हो जाएँ।“

“नहीं, अमजद तुझे फ़ैसला करना ही होगा। तुझे पता ही है कि मैं आम औरत नहीं हूँ। मैं इस बीच के रास्ते को और ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर सकती।“ वह क्रोध में काँपे जो रही थी। उसकी माँ ने आकर उसको शांत करने की कोशिश की, पर आफिया ने उसकी कोई बात न सुनी। आफिया चीखने-चिल्लाने लगी तो अमजद उठकर बाहर चला गया। अँधेरा होने पर घर लौटा तो बात ठंडी पड़ गई थी। लेकिन अगले ही दिन आफिया ने फिर से बवाल खड़ा कर दिया। उसकी वही मांग थी कि या तो वह उसको छोड़ दे या अपने घरवालों को। अमजद को आफिया और बच्चों से बहुत लगाव था, पर वह उसके व्यवहार से तंग आ चुका था। अब उसके शक पुख़्ता होते जा रहे थे कि यह ऐसा कुछ कर रही है जो कि सही नहीं है। और उसने यह सब किया भी उससे छिपकर है। आफिया का उस पर दबाव बढ़ता ही जा रहा था, साथ ही वह यह भी ज़ोर डालने लग पड़ी कि अब अवसर आ गया कि उन्हें जिहाद में शामिल हो जाना चाहिए। ख़ासतौर पर वह जैशे-मुहम्मद के कैम्प में जाने की जल्दी मचा रही थी। अमजद इतना ऊब गया कि उसने किसी मज़हबी रहनुमा की सलाह लेनी चाहिए। वह आफिया को लेकर पाकिस्तान के देवबंदी सम्प्रदाय के सबसे बड़े इमाम के पास चला गया। यह इमाम दोनों के परिवारों को भलीभाँति जानता था। इमाम ने उनकी बातें सुनीं। उसने आफिया का जिहाद में शामिल होने का नुक्ता बड़े ध्यान से विचाराते हुए पूछा, “आफिया बेटी, तू घरवाले सहित जैशे मुहम्मद के कैम्प में जाकर क्यों रहना चाह रही है ?“

“कैम्प में रहते हुए मैं यतीम बच्चों को पढ़ाऊँगी और अमजद वहाँ गरीबों के लिए अस्पताल चलाएगा।“

“देख बेटी, आजकल ज़माना बदल गया है। गरीबों की सेवा के लिए तुम्हें उजाड़-बियाबान जगहों पर जाने की ज़रूरत नहीं है। तुम यहाँ कराची में रहते हुए समाज सेवा के ये सारे काम कर सकते हो। बल्कि मैं तो कहूँगा कि तुमने जो अमेरिका में रहकर ऊँची तालीम हासिल की है, उसको लोगों में बाँटो। यही सबसे बड़ा दीन का काम है।“

“तो फिर जिहाद कौन लड़ेगा ?“ भड़कती हुई आफिया ऊँची आवाज़ में बोली तो इमाम हैरान रह गया। आज तक किसी ने उसके साथ इस तरह बात नहीं की थी। पर वह फिर भी शांत रहते हुए आफिया से मुखातिब हुआ, “आफिया बेटी, मैं एकबार फिर कहूँगा कि तुम्हारा पहला फ़र्ज़ अपना परिवार संभालना है। इसके बाद यदि तुम्हारे पास वक़्त बचता है तो उसे तुम समाज सेवा के लिए इस्तेमाल कर सकते हो। अगर तुम्हारे पास ज्यादा पैसा है तो वह तुम गरीबों में दान कर सकते हो।“

“पर जिहाद...।“ आफिया फिर से जिहाद के बारे में कुछ कहने लगी तो इमाम ने उसको हाथ का इशारा करके रोक दिया। फिर बड़े धैर्य से बोलने लगा, “सिर्फ़ लोगों को मारना ही जिहाद नहीं है। जो डॉक्टर कैंसर की बीमारी का इलाज करके मरीज़ की जान बचाते हैं, यह उनका जिहाद है कैंसर के खिलाफ़। तुम डॉक्टर लोगों की आँखों का आपरेशन करके उनकी आँखों की रौशनी उन्हें वापस देते हो, वह तुम्हारा जिहाद है - अंधेपन के खिलाफ़। इस तरह जितने चाहो उदाहरण ले लो। तू यह दृढ़-संकल्प ले ले कि तुझे अनपढ़ता के खिलाफ़ जिहाद लड़ना है और गरीब बस्तियों में जाकर बच्चों को मुफ़्त तालीम देना शुरू कर, यह तेरा असली जिहाद होगा।“

इसके बाद इमाम ने बातचीत बर्खास्त कर दी। अमजद और आफिया घर आ गए। अगले दिन वह अमजद के घर चले गए। पर इसके बाद उनके बीच सुलह न हुई। इस बात के दो दिन बाद अमजद ने देखा कि उसके बैंक में आठ हज़ार डॉलर कम हैं। उसने आफिया से बात की तो थोड़ी न-नुकर के बाद वह मान गई कि पैसे उसने ही निकलवाए हैं। अमजद ने जब पूछा कि उसने ये पैसे कहाँ खर्च किए तो आफिया ने कंधे उचकाते हुए कहा, “मुझे ज़रूरत थी, इसलिए मैंने वे कहीं इस्तेमाल कर लिए।“

“पर तूने मुझे तो बताया नहीं कि तुझे ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी कि एकसाथ आठ हज़ार डॉलर निकलवा लिया।“

“क्यों तुझे हर बात बतानी ज़रूरी है ?“ आफिया भड़क उठी।

“मेरी भी बात सुन ले फिर...।“ अमजद का चेहरा भी लाल होने लगा। वह ज़रा रुकते हुए फिर बोलने लगा, “तेरा मेरा एकसाथ रहने का क्या फायदा जब तू हर बात मुझसे छिपाती है। जो तू सामने दिखती है, इसके अलावा तेरी एक दूसरी ज़िन्दगी भी है और उसमें पता नहीं तू क्या करती है। मैं ऊब चुका हूँ, तेरी ज्यादतियों को सहते सहते। अब हम एक छत के नीचे नहीं रह सकते।“

आफिया ने बिना किसी बात का उत्तर दिए बच्चों को उठाया और टैक्सी लेकर मायके चली गई। कई दिन इस तरह ही गुज़र गए। फिर दोनों परिवारों के बुजुर्गों ने साझे बंदों की मदद से एक मुलाकात का प्रबंध किया और उनके बीच सुलह करवाने का यत्न किया। यह बात सफल भी हुई। इस बीच फै़सला किया गया कि दोनों जन अपना अलग अपार्टमेंट लेकर कहीं और रहें। उनके लिए अपार्टमेंट का इंतज़ाम भी कर दिया गया और वे बच्चों सहित वहाँ जाकर रहने लगे। वहाँ एक सप्ताह ही बीता था कि एक दिन फिर झगड़ा शुरू हो गया। काफ़ी देर तक बहसबाज़ी होने के बाद अमजद ने ठंडी साँस भरते हुए कहा, “आफिया बस, अब हम और इकट्ठे नहीं रह सकते।“

“तू फिर क्या करना चाहता है ?“

“मैं तुझसे तलाक चाहता हूँ।“

उसकी यह बात सुनकर आफिया के मुँह का रंग उतर गया। उसने बच्चों को उठाया और अपने माँ-बाप के घर चली गई। अमजद चुपचाप अपने घर आ गया। दो सप्ताह बाद खान परिवार ने फिर से बड़े-बुजु़र्गों की बैठक बुलानी चाही, पर आफिया के परिवार वालों ने उनसे बात करने से इन्कार कर दिया। उन्होंने खान परिवार का फोन ही उठाना बंद कर दिया। वैसे तो अमजद तीन बार तलाक कहकर तलाक ले सकता था, पर अब सद्दीकी परिवार उसका फोन ही नहीं उठाता था और आफिया के साथ बात होनी तो दूर की बात थी। फिर उसने चिट्ठी लिखकर तलाक मांगने के बारे में सोचा। पर इसी बीच आफिया के पिता सुलेह सद्दीकी का निधन हो गया। हालाँकि सद्दीकी परिवारवाले अमजद को आफिया के पिता की मौत का ज़िम्मेदार ठहरा रहे थे और कह रहे थे कि वह बेटी का ग़म न सह सका और इसीलिए उसको दिल का दौरा पड़ गया। पर सब जानते थे कि यह बात सही नहीं थी। बल्कि अधिकांश लोगों का सोचना था कि वह एक नेक बंदा था जो कि आफिया और अमजद के बीच शायद एक और समझौता करवा सकता था। पर जब वह न रहा तो सब उम्मीदें ख़त्म हो गईं। इसी दौरान आफिया ने अस्पताल में बेटे को जन्म दिया। मगर उसने या उसके परिवारवालों ने अमजद को इस बच्चे की आमद की भनक न पड़ने दी। न ही उन्होंने पुनः अमजद को दूसरे बच्चों से मिलने दिया। इसी बीच सरकारी कारिंदे तलाक वाला काग़ज़ लेकर आफिया के पास गए तो उसने उस पर दस्तख़्त करने से इन्कार कर दिया। एक दिन शाम के वक़्त अमजद की माँ ने बात शुरू की, “अमजद बेटे, हमने हर जतन करने देख लिया, पर बात किसी किनारे नहीं लगती।“

“अम्मी, शायद आफिया को अक्ल आ जाए और वह तलाकनामे पर दस्तख़्त कर दे।“ वैसे वह दिल से यह चाहता था कि काश आफिया सुधर जाए और तलाक वाला मसला टल जाए। यह सोच उसकी आफिया के प्रति मुहब्बत में से उपजती थी।

“नहीं बेटे, हर मसले का एक वक़्त होता है। जब बात किसी ख़ास मुकाम से आगे निकल जाए तो फिर दुबारा से इकट्ठे रहने की कोई तुक ही नहीं रह जाती।“ उसकी माँ उसके मन के भाव समझती थी।

“ठीक है अम्मी, जैसे आपकी मर्ज़ी हो, वैसा कर लो।“ अमजद ने निराशा भरा जवाब दिया।

“अमजद बेटे, पिछली बार मुझसे गलती हुई थी जिसकी तुझे इतनी बड़ी सज़ा भुगतनी पड़ी। इस बार मैं रिश्ता अपने ही परिवार में से खोजूँगी।“

अमजद ने इस बात का कोई उत्तर न दिया और वह उठकर दूसरे कमरे में चला गया। इन्हीं दिनों वह कराची के एक अस्पताल में काम करता था। असल में, ज़ाहिरा खां ने अपने मायके वालो से जुड़े घरों में से किसी भाई की लड़की उसके लिए पसंद कर रखी थी। बस, वह अमजद की सहमति चाहती थी। यह मसला भी हल हो गया तो बात आगे चला दी गई। ज़ाहिरा खां और नई बहू का पिता चाहते थे कि यह निकाह वाला मसला जल्द हल हो जाए। उन्हें डर था कि कहीं आफिया फिर से अमजद के साथ प्यार जताकर वापस न आ जाए। जल्दबाजी में सादी-सी रस्म करके मंगनी कर दी गई। अमजद के घरवाले चाहते थे कि इसके साथ ही यदि आफिया के तलाक वाला काम भी निपट जाए तो फिर वे बिल्कुल निश्चिंत हो जाएँगे। मगर यही एक मसला उन्हें सबसे अधिक कठिन लग रहा था।

मंगनी वाली शाम को अमजद ने अपनी होने वाली नई बीवी को शाम के खाने के लिए कहीं बाहर लेकर जाना था। इसीलिए उसने शाम का काम शीघ्र समाप्त किया। तभी एक नर्स ने आकर उसको संदेश दिया कि कोई लड़की उससे मिलने आई है। उसने सोचा कि उसकी नई दुल्हन होगी। उसने डॉक्टरों वाला गाउन उतार दिया और अपने कपड़े वगै़रह ठीक किए। वह ज्यूँ ही बाहर आया तो देखता ही रह गया। सामने आफिया खड़ी थी। इस वक़्त वह उसको इतनी सुंदर लगी जितनी पहली मुलाकात के समय भी नहीं लगी थी। वहाँ आसपास के स्टाफ ने यही सोचा था कि यह अमजद की होने वाली बीवी है। आफिया की ओर देखते हुए अमजद ने अंदाज़ा लगा लिया कि यह तकरीबन महीनाभर पहले बच्चे को जन्म दे चुकी होगी। मगर फिर भी इस वक़्त उसकी खूबसूरती लाजवाब थी।

“जनाब किन सोचों में गुम हैं ?“ आफिया ने आगे बढ़कर बड़े मोह से अमजद की बांह पकड़ ली। अमजद की रूह को शांति मिल गई।

“मैं तो तुझे ही देख रहा था। कितनी खूबसूरत लग रही है। पर...।“

“पर... पर क्या, मेरे भोलेभाले डॉक्टर साहब ?“ आफिया ने उसकी ‘पर’ का मतलब समझते हुए गहरा मज़ाक किया।

“अब समझ गई हो तो खुद ही बता दे।“

“तेरा छोटा साहिबजादा एक महीने का हो चुका है।“ आफिया ने उसकी बांह पर हल्की-सी चिकौटी भरी।

“और मुझे पता भी नहीं ?“ अमजद ने नाराज़गी प्रकट की।

“मैं मानती हूँ यह बात। पर कईबार इन्सान के हाथ में कुछ नहीं होता। अब तू ही बता कि उस वक़्त मैं तो तुझे यह ख़बर देने की हालत में ही नहीं थी। घर के किसी दूसरे मेंबर ने तुम्हारे घर ख़बर भेजनी थी, पर मेरा ख़याल है कि हम दोनों के घरवाले हमें जोड़ने से ज्यादा तोड़ने की तरफ ध्यान दे रहे हैं।“ आफिया ने बहाने से नवजन्मे बच्चे के बारे में अमजद के घर ख़बर न देने के लिए अपने घर वालों को कसूरवार ठहराया। साथ ही, उसने उनकी आपसी अनबन के लिए पहली बार अपने मायके वालों को भी दोष दिया। अमजद कुछ न बोला तो आफिया ने उसकी ठोड़ी घुमाकर अपनी ओर करते हुए कहा, “चल, अब तो इस बात पर मुआफ़ कर दे। अब तो मैं खुद चलकर तुझे बताने आई हूँ।“ आफिया ने खूबसूरत अदा से कानों को हाथ लगाया। अमजद को आफिया का भोलापन अंदर तक भा गया। उसने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। वे वैसे ही चलते हुए बाहर आ गए।

“मेरा ख़याल है कि मेरा प्यारा प्यारा खाविंद इतना तो समझता ही होगा कि शाम का वक़्त है और मुझे भूख भी बहुत लगी होगी ?“

“ओह हाँ-हाँ। हम किसी नज़दीकी रेस्टोरेंट में चलते हैं।“ इतना कहते हुए अमजद आफिया को लेकर कार की ओर चल दिया।

“वैसे मैं जानती हूँ कि मेरे डॉक्टर साहब हद दरज़े के कंजूस हैं। पर जनाब, आज यह कंजूसी नहीं चलेगी। आज आपके साहिबजादे के जन्म की खुशी में यह डिनर मेरी पसंद का होगा।“

“बता फिर कहाँ चलें ?“

“होटल शैरेटन।“

“ठीक है, बैठ गाड़ी में।“ अमजद ने गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर आफिया को संग बिठा लिया और चल पड़ा। शैरेटन होटल के रेस्टोरेंट पहुँचकर उन्होंने बड़ा शानदार डिनर किया। आफिया की उपस्थिति ने पिछले कितने ही दिनों से परेशान चले आते अमजद के कलेजे को ठंडक प्रदान की।

“कैसा रहा डिनर ?“ अमजद बिल चुकाकर चलते हुए बोला।

“अमजद, तेरे हाथ का तो ज़हर भी आब-ए-हयात है। यह तो फिर भी डिनर है।“ आफिया ने अँधेरे-से में पीछे होकर अमजद को अपनी बांहों में भर लिया। अमजद ने उसकी बांह पकड़कर अपने साथ लगा लिया।

“अब क्या प्रोग्राम है ?“

“आ जा, सामने वाले पॉर्क में चलते हैं।“ आफिया उसको पॉर्क की ओर ले चली। वह होटल के लॉन की कोने वाली एक नए-से पत्थर की बैंच पर बैठ गए। आफिया ने अमजद की बांह से सिर टिकाकर आँखें मूंद लीं और मन में सोचा कि काश वक़्त यही रुक जाए। अमजद, आफिया के बालों में हाथ फेरने लगा।

“अमजद, कितने अच्छे थे वे दिन जब हम बॉस्टन में हुआ करते थे।“

“उन सुहावने दिनों की याद बड़ा तड़पाती है आफिया, क्या बताऊँ।“ अमजद ने भी ठंडी आह भरी।

“हम लड़ते-झगड़ते भी थे, पर पलों में फिर से वैसे हो जाते थे।“

“मुझे तेरी लड़ने और मान जाने की अदा बड़ी प्यारी लगती थी।“

“और मुझे तेरी मुँह फुलाने की।“ आफिया ने अमजद की ओर मुँह फुलाकर नकल-सी उतारी तो दोनों हँस पड़े।

“काश कि वे दिन वापस आ जाएँ।“

“पुलों से गुज़रे पानी भी कभी लौटे हैं पगली। पर हम मौजूदा वक़्त को ज़रूर वैसा ही बना सकते हैं। बस, इन्सान के हाथ में इतना ही होता है।“

“अमजद, पिछले दिनों हमने लड़ने-झगड़ने की सब हदें पार कर दीं। कई बार मैं तेरे पर हद से ज्यादा गुस्सा हुई होंगी। पर क्या तुझे अभी भी मेरे से मुहब्बत है ?“

“आफिया, ऐसी बातों का मुहब्बत पर कोई असर नहीं पड़ता। एकसाथ रहते हुए गुस्से-गिले होना तो एक आम बात है।“

आफिया ने अमजद के गिर्द लपेटी अपनी बांहें और कस लीं। अमजद को भी इस वक़्त आफिया पर बेइंतहा प्यार उमड़ रहा था।

“मैंने तेरे पर कई ज्यादतियाँ की हैं अमजद...।“ इतना कहते हुए आफिया रोने लग पड़ी। अमजद से उसका रोना सहन न हुआ। उसने उसके कंधे पर हाथ फेरते हुए ढाढ़स देते हुए उसे फिर से बातों में लगा लिया। आफिया अमजद की गोद में सिर रखकर लेट गई।

“अहमद का क्या हाल है ?“ उसने उसका मन बहलाने के लिए बात बच्चों की ओर मोड़ ली।

“बिल्कुल ठीक। पर जब गुस्सा होता है तो माथे पर डाले बल बाप की तरह गहरे हो जाते हैं।“

“और माँ की तरह पीटने नहीं लगता ?“ अमजद ने आफिया का नाक पकड़कर हिलाया। आफिया ने हँसते हुए उसकी छाती में प्रेमभरी हल्की-हल्की मुक्कियाँ मारीं।

“मरियम कैसी है ?“

“वह भी ठीक है। पढ़ने में बहुत होशियार है।“

“बाप पर गई है न।“

“बाप पर नहीं, माँ पर गई है जनाब। याद है, यूनिवर्सिटी में टॉप करके मैंने सबको हैरान कर दिया था।“

“मुझे गर्व है तुझे पर आफिया पर...।“

आफिया ने अमजद के मुँह पर उँगली रखते हुए उसको आगे बोलने से रोक दिया और बोली, “ये प्यार के क्षण मुश्किल से मिले हैं। इन्हें हम कड़वाहट में बिल्कुल नहीं बदलेंगे।“

“चल ठीक है।“

“बल्कि मैं तो वे कड़वाहटें हमेशा के लिए ख़त्म करने आई हूँ।“

“अच्छा !“

“अमजद, बच्चों का तेरे बग़ैर दिल नहीं लगता।“ आफिया ने बात दूसरी ओर मोड़ ली।

“और बच्चों की माँ का ?“ अमजद हँसा।

“मछली पानी से बाहर रहकर कितना तड़पती है, ये पीड़ा तो सिर्फ़ वो बेचारी ही जानती है।“ आफिया ने आँखें पोंछी।

“आफिया, तुझे दुख पहुँचाने के लिए मैं तेरा गुनाहगार हूँ।“

“नहीं प्लीज़, ऐसी बातें न कर। पुराना सबकुछ भूल जा।“

“ठीक है पुराने सबकुछ पर मिट्टी डाली। अब फिर आगे बता क्या हुक्म है सरकार का ?“

“अमजद, तुझे बच्चे बहुत याद करते हैं। मुझसे उनकी तड़प देखी नहीं जाती।“ आफिया बच्चों की बात कर रही थी, पर अमजद आफिया की तड़प महसूस कर रहा था। गहरी आह भरते हुए वह बोला, “मैं कौन-सा सुखी हूँ तुम्हारे बग़ैर।“

“चल फिर अपने बच्चों के पास चल। क्यों हम एक-दूजे के बिना भटकते फिरते हैं।“

“चल तो पड़ता, पर कहाँ ?“

“मेरे घर, और कहाँ।“

“नहीं आफिया, वहाँ नहीं मैं जा सकता। तुझे पता ही है कि पीछे क्या कुछ होकर हटा है।“

“अमजद, उसके लिए हम दोनों ही कसूरवार थे। अब पुरानी बातों को भुलाने का फै़सला भी हम दोनों का ही है।“

“मगर फिर भी आफिया मैं मुआफ़ी चाहता हूँ उस घर में...।“ आगे उसने बात बीच में ही छोड़ दी।

“चल फिर यूँ करते हैं। न तेरे घर और न ही मेरे। हम अपार्टमेंट ले लेते हैं और अपनी ज़िन्दगी नए सिरे से शुरू करेंगे।“

“तेरी इस बात पर गौर किया जा सकता है।“

“गौर क्या करना है। हमें कौन-सा किसी से इजाज़त लेनी है। चल उठ, आज किसी होटल में रुक जाएँगे। कल मैं टैक्सी करके बच्चों को ले आऊँगी और तू तब तक कहीं अपार्टमेंट का इंतज़ाम कर लेना।“

“हाँ, यह बात तेरी बिल्कुल ठीक है।“

अमजद के हामी भरते ही आफिया ने उसके इर्द-गिर्द बांहें कस लीं। उसको लगा जैसे मन पर से एक भारी बोझ उतर गया हो। तभी अमजद के फोन की घंटी बजी। उसने आफिया को वैसे ही छाती से लगाए रखा और फोन ऑन करके ‘हैलो’ कही। उधर फोन पर उसकी माँ की आवाज़ उभरी, “बेटा अमजद, तू किधर रह गया ?“

“अम्मी मैं तो...।“ उसने आफिया को मुँह पर उँगली रखकर चुप रहने का इशारा किया और फिर आगे बोला, “अम्मी मुझे तो इधर किसी काम से आना पड़ गया था।“

आफिया जिसका मन अमजद की माँ का फोन आने पर ही खराब हो गया था, फोन में से उस तक धीमी आवाज़ में पहुँचती बात ध्यान से सुनने लगी। अमजद की माँ आगे बोली, “तुझे याद होना चाहिए था कि तुझे आज किसी को डिनर के लिए ले जाना था।“

“जी अम्मी। मैं आपको बाद में फोन करता हूँ।“

अमजद की माँ ने उसकी दुबारा फोन करने वाली बात सुनी ही नहीं और बोलती चली गई, “तेरी होने वाली दुल्हन तेरा इंतज़ार करती रही। तू न आया तो आखि़र वह घर लौट गई।“

‘होने वाली दुल्हन!’ ये लफ्ज़ सुनते ही आफिया के सीने पर आरी चल गई। पर फिर भी वह ज़ब्त में रही। उसको अमजद की माँ की बात फिर सुनाई देने लगी, “अभी यह हाल है तो बाद में क्या करेगा। दो दिन बाद तुम्हारी शादी है। तूझे कुछ तो सोचना था।“

अब आफिया से अपने आप पर नियंत्रण रखना कठिन था। वह उछलकर उठ बैठी।

“अमजद जनाब, प्यार के वायदे मेरे साथ किए जा रहे हो और उधर नया निकाह करवाने की तैयारी भी चल रही है। मैंने तुझे इतना कमीना नहीं समझा था।“ इतना कहते हुए आफिया ने झपटकर अमजद के गिरेबान पर हाथ डाल दिया। वह उसको इधर-उधर खींचती रही। फिर उसकी छाती पर मुक्के मारने लगी। मुक्के मार मार कर वह हाँफ गई तो अमजद की छाती से लगने के लिए बढ़ी जैसा कि वह हर झगड़े के बाद किया करती थी। पर फिर वह एकदम रुकी और पीछे हटती हाथों में मुँह छिपाती रोने लगी। अमजद की भी रूठी हुई आफिया को सीने से लगाने की चाहत मन में ही रह गई।

कुछ देर सिसकियाँ भरती आफिया संभली और उसने जाने के लिए अपना बैग उठा लिया।

“आफिया मेरी बात सुन...।“ अमजद ने उसको रोकना चाहा। पर आफिया ने उसकी ओर ध्यान न दिया।

“अभी कुछ नहीं हुआ। मैं सब संभाल लूँगा। तू मुझसे मुँह न मोड़।“

“अमजद, रस्सी टूट चुकी है। अब जितना चाहे ज़ोर लगा ले, यह दुबारा नहीं जुड़ेगी। मगर दुख इस बात का है कि मैं यूँ ही भ्रम पालती रही।“

“आफिया, पूरी बात सुन ले, यूँ ही बखेड़ा न कर।“

आफिया ने उसकी बात बीच में ही काट दी और बोली, “तेरी हाँ के बग़ैर तो यह निकाह नहीं हो रहा होगा ? मैं यह भी जानती हूँ कि मुझे मन से उतारने के लिए ही तूने अपनी रज़ामंदी दी होगी। फिर क्या फायदा, यूँ ही सफ़ाई देने का। अच्छा, तुझे नई दुल्हन मुबारक।“ आफिया उठकर चल पड़ी।

“आफिया, एक बार मेरी बात सुन ले। फिर चाहे...।“ अमजद कुछ कहने लगा तो आफिया ने रुकते हुए उसकी बात अनसुनी करके कहा, “क्या तुझे पता है कि मैं तेरे बार बार कोशिश करने पर भी तलाकनामे पर दस्तख़्त क्यों नहीं करती थी ?“

अमजद ने कोई जवाब नहीं दिया तो आफिया फिर बोली, “क्योंकि मुझे पता था कि तू मुझे बेहद चाहता है। और यह तलाक वाला यूँ ही एक डरावा है। मैं सोचती थी कि हम दोनों एक-दूसरे को इतनी मुहब्बत करते हैं कि एक-दूजे के बिना रह ही नहीं सकते। पर मुझे क्या पता था कि तेरे दिल में खोट है।“

आफिया खड़ी होकर अमजद के बोलने का इंतज़ार करती रही, पर जब वह कुछ न बोला तो वह मुड़कर अमजद की ओर आई और धैर्य के साथ बोली, “जिस वजह से मैंने यह तलाक वाला काम रोका रखा था, वह वजह अब रही ही नहीं तो मेरे यूँ ही अड़े रहने का क्या फायदा। आ मेरे साथ, अभी वकील के यहाँ चलकर तलाकनामे पर दस्तख़्त करवा ले।“

अमजद फिर भी कुछ नहीं बोला तो आफिया उसका हाथ पकड़कर खींचती हुई उसे बाहर ले आई। वहाँ से टैक्सी लेकर नज़दीक ही वकील के दफ़्तर पहुँचे। जहाँ जहाँ वकील ने कहा, आफिया ने दस्तख़्त कर दिए। काम खत्म हो गया तो आफिया जाने के लिए उठ खड़ी हुई। वकील फाइल समेटता बोला, “अमजद साहब, इस तलाकनामे के अनुसार तुम बच्चों का खर्चा हर महीने तब तक देते रहोगे जब तक वे बालिग नहीं हो जाते। और तुम मोहतरमा आफिया, अमजद साहिब को बच्चों से मिलने से नहीं रोकेंगी। ये कानूनी नुक्ते हैं, इसी कारण तुम्हें पढ़कर सुनाए हैं।“ वकील एक तरफ हो गया तो चलने से पहले आफिया, अमजद से हाथ मिलाते हुए बोली, “नई ज़िन्दगी मुबारक मिस्टर अमजद, यह शायद अपनी आखि़री मुलाकात है।“ आफिया ने बाहर से टैक्सी ली और चली गई। इसके कुछ दिनों बाद अमजद का निकाह हो गया।

(जारी…)
 
14

(प्रथम भाग)

बचपन से लेकर आज तक आफिया ने बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी थीं। क्या पढ़ाई का क्षेत्र, क्या मज़हब या फिर समाज सेवा का क्षेत्र। आफिया ने हर तरफ अपना लोहा मनवाया था। सबको पता था कि आफिया एक बहुत ही बुद्धिमान शख़्सियत है। मगर इस सबके बावजूद आज वह इकतीस वर्ष की उम्र में अकेली रह गई थी। गुमनामी की ज़िन्दगी उसके सामने खड़ी थी। उस पर तलाकशुदा का धब्बा लग चुका था जिसको पाकिस्तान समाज में कोई पूछता नहीं। तलाक के बाद कई सप्ताह तक वह बड़े ही मानसिक तनाव में गुज़री। फिर धीरे-धीरे वह संभलने लगी। एक सुबह वह पंछियों को दाना डाल रही थी कि उसकी माँ ने दूर से आवाज़ लगाई, “आफिया, तेरा फोन है।”

“कौन है फोन पर अम्मी जान ?“

“वकील है।“

“क्या कहता है ?“

“तू खुद ही बात करके पूछ ले।”

“जी अम्मी।“ आफिया ने दानों वाला छिक्कू एक तरफ रख दिया और फोन उठा लिया। दूसरी तरफ से आवाज़ आई, “जी मुझे मोहतरमा आफिया जी से बात करनी है।”

“मैं आफिया ही बोल रही हूँ। आप कौन साहब ?“

“जी मैं जनाब अमजद का वकील बोल रहा हूँ।”

“बताओ, कैसे याद फरमाया ?“ आफिया ज़रा व्यंग्य में बोली।

“जी अमजद साहब पूछ रहे थे कि जो चैक उन्होंने बच्चों के लिए भेजा था, क्या वह कैश हो चुका है।”

“हाँ हो चुका है कैश। और कुछ ?“

“जी वे बच्चों से मिलने की इजाज़त मांग रहे थे।” वकील झिझकता हुआ-सा बोला। वह आफिया के तीखे स्वभाव से परिचित था।

“हूँ...।” आफिया उसकी बात का हुंकारा भरते हुए मन ही मन बोलने लगी, क्या इस तड़प को सहने का ठेका अकेली आफिया ने ही उठा रखा है। अमजद साहिब को भी इसमें शरीक होना चाहिए। ज़रा उसको भी पता लगे कि तड़प क्या होती है और यह कलेजे को कैसे चीरती है।’

तभी उधर से वकील की आवाज़ ने आफिया को ख़यालों में से बाहर निकाला। उसने डरते हुए पूछा था, “जी, मैं फिर अमजद साहिब को क्या संदेश दूँ ?“

“तुम अपने अमजद साहब को कह दो कि आफिया और उसके बच्चे इस पते पर नहीं रहते।” आफिया ने तंज़ कसा।

“मोहतरमा, बच्चों को मिलने का अधिकार मेरे साइल को कोर्ट देती है। आप प्लीज़ ऐसा न करो। मेरी बात…”

“जो कुछ मेरे साथ हो चुका है, तुम्हारी कोर्ट मेरा इससे बुरा क्या कर देगी। जाओ, मैं नहीं किसी को अपने बच्चों के करीब लगने देती।” खरा और तीख़ा जवाब देकर आफिया ने फोन सोफे पर पटक दिया। उसकी माँ करीब खड़ी सब सुन रही थी। वह गुस्से में आकर बोली, “कुछ न रहे इस नईम खां के बेटे का। मेरी बेटी का बेड़ा डुबा दिया उसने। अल्लाह करे उसके कीड़े...।“ इस्मत की बात बीच में ही थी कि आफिया ज़ोर से चिल्लाई, “अम्मी ! तुम्हें कितनी बार कहा है कि तू उसको लेकर जलेभुने शब्द न बोला कर।”

“तुझे उसने किसी तरफ नहीं छोड़ा और तू अभी भी उसका पक्ष लेती है ?“

“वह हमारा आपस का मामला है। पर किसी को कोई अधिकार नहीं कि अमजद के बारे में बुरे लफ्ज़ बोले।”

आफिया पैर पटकती अंदर चली गई तो इस्मत मन ही मन बोली, ‘अजीब है ये लड़की भी।’

इसके घंटाभर बाद फिर फोन बजा तो आुफिया ने गुस्से में ‘हैलो’ कहा। पर शीघ्र ही ठंडी पड़ गई। पहले वह समझी थी कि फोन अमजद के वकील का होगा, मगर यह कोई उसको जानने वाला था। फोन बंद करते हुए वह अपना मिज़ाज ठीक करने लगी। कुछ देर बाद उसने तल्ख़ी दूर करते हुए माँ को बाज़ार जाने के लिए मना लिया। माँ बेटी तैयार होकर बाज़ार की ओर चल पड़ीं। बाज़ार में खरीद-फरोख़्त करते आफिया माँ से अलग हो गई। पंद्रह-बीस मिनट के बाद वह फिर माँ के पास आ गई। इस बीच वह एक रेस्टोरेंट में बैठे सुलेमान अहमर के पास गई थी। बस दो-चार बातें करने के बाद ही वह लौट आई। घर आकर उसने इस्मत को इस बात के लिए सहमत कर लिया कि घर का आधा हिस्सा किराये पर दे दिया जाए। इस्मत ने भी सोचा कि इससे आमदनी में मदद मिलेगी। अगले दिन ही आफिया ने इश्तहार दे दिया। फिर घर किराये पर लेने वालों के फोन आने लगे। मगर आफिया ने सबको टाल दिया। उसने उसी परिवार को घर किराये पर देने के लिए ‘हाँ’ कही जिसके लिए सुलेमान अहमर ने बताया था। यह था - अल बलोची परिवार।

घर किराये पर लेने के उपरांत पहले बलोची परिवार की स्त्रियों ने यहाँ आकर रहना आरंभ किया। इस्मत से उन्होंने बड़े अच्छे संबंध रखे। आफिया के साथ भी उनकी निकटता हो गई। यह निकटता शीघ्र ही दोस्ती में बदल गई। उस परिवार में दो जवान लड़कियाँ थीं जिनके साथ आफिया के गहरे संबंध बन गए। वह उनके साथ बाहर-अंदर भी जाने-आने लगी। इस बीच वह उनके असली घर भी गई। वहीं उन लड़कियों ने आफिया को अपने भाई अली अब्दुल अजीज अली से मिलवाया। उसको सभी सिर्फ़ अली कहकर ही बुलाते थे जो कि करीब पच्चीस साल की आयु का युवक था। फिर इस परिवार की औरतों का आफिया के घर आना-जाना कम होता गया। परंतु वहाँ हर रोज़ ही नए लोग आने लगे। कोई आता और कोई जाता। इस्मत हर रोज़ नए चेहरे देखती। पर उसको इससे मतलब नहीं था। वैसे वह सोचती थी कि बड़ा परिवार है, इसलिए पारिवारिक सदस्य भी अधिक हैं। उसको बताया भी गया था कि यह एक व्यापारी परिवार है जिसके लोग आते-जाते रहते हैं। पर असल में सुलेमान अहमर ने अल-कायदा के रूपोश मेंबरों को छिपाने के लिए घर किराये पर देने वाला यह प्रबंध करवाया था। यहीं पहली बार आफिया, अल बलोची परिवार के सम्पर्क में आई। उसके इस परिवार में घुलमिल जाने का इंतज़ाम अल बलोची परिवार के अग्रज के.एस.एम. की रज़ामंदी के बाद ही किया गया था। उसको अच्छी प्रकार देखने-परखने के बाद ही एक दिन सुलेमान अहमर ने के.एस.एम. के साथ बात की, “कैसी लगी तुम्हें यह लड़की ?“

“यह पता तो तभी चलेगा जब यह किसी काम को अंजाम देगी।”

“यह बात तुम्हारी ठीक है। पर इसके अंदर जिहाद के लिए बड़ी आग भरी हुई है। वैसे भी बहुत बुद्धिमान है। साइंसटिस्ट है, दिमाग की बहुत तेज़ है।”

“तेरा क्या ख़याल है कि यह केमिकल हथियार वगै़रह बनाने में मदद कर सकती है ?“

“बिल्कुल! ऐसे कामों की तो यह माहिर है। ज़रा काम लेकर देखो।”

“यह भी देख लेते हैं। पर इसमें एक और बहुत बड़ा गुण है।”

“वह क्या ?“

“यह अमेरिकन रेज़ीडेंट है। वहाँ जाने-आने में इसको मुश्किल नहीं आएगी।”

“यह बात भी तुम्हारी ठीक है।”

“चल, एक बार इसको मुफ्ती साहिब से मिला दे। वही इसको इसका आगे का काम बताएँगे।”

मुफ्ती अबू लुबाबा शाह मन्सूर, मुकामी मस्जिद का इमाम था, जो अल रशीद ट्रस्ट का डिप्टी डायरेक्टर भी था। इस ट्रस्ट का डायरेक्टर, खुद रशीद मुहम्मद था। कराची के दहशतगर्दों में सबको पता था कि इन दोनों के ओसामा बिन लादेन से सीधे संबंध हैं और ये तालिबानों के लिए पैसे का प्रबंध बड़े स्तर पर करते हैं। मुफ्ती ने सुलेमान की सारी बात सुनते ही आफिया को फतवा जारी करके जर्म वारफेयर और अन्य बॉयोलोजिकल हथियारों पर काम करने का आदेश दे दिया। जिसको आफिया ने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। इस बीच उसका अल बलोची परिवार में आना-जाना और अधिक बढ़ गया।

अली अपने मामा के.एस.एम. का ख़ास भरोसेमंद आदमी था जो पूरी तौर पर उसके सभी मिशनों के विषय में जानता था। इतना ही नहीं, वह हर मिशन में अपना योगदान भी देता था। यद्यपि नाइन एलेवन का मास्टर माइंडिड के.एस.एम. था, पर उस मिशन को सफल बनाने के लिए अली ने भी ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया था। वह अंग्रेजी स्कूलों से पढ़ा हुआ था और पश्चिमी ढंग से रहता था। उसने ही न्यूयॉर्क के ट्विन टॉवर्ज़ तबाह करने वाले हाई जैकरों को पश्चिमी ढंग के रहन-सहन और पहनने-ओढ़ने के तरीके सिखाये थे। इसके अलावा उसने इनमें से कम से कम हाई जैकरों को उनके मिशन के बारे में प्रशिक्षण दिया था जिनमें मारवां अल शेही भी एक था जिसने कि युनाइटिड फ्लाइट नंबर 175 वल्र्ड ट्रेड सेंटर के साउथ टॉवर से हिट की थी। अली ने तकरीबन सवा लाख डॉलर मालवा अल शेही और मुहम्मद अत्ता को अमेरिका में भेजा था। वह खुद भी हाई जैकरों के साथ अमेरिका जाकर मिशन में हिस्सा लेने वाला था। इसके लिए उसने दुबई की अमेरिकन एम्बेसी में वीज़ा के लिए एप्लाई भी किया था, पर वीज़ा न मिलने के कारण वह वापस पाकिस्तान लौट आया था। नाइन एलेवन के बाद उसने के.एस.एम. के साथ पूरे ज़ोर-शोर से दूसरे बड़े हमले के लिए काम करना प्रारंभ कर दिया। उसका मुख्य काम अगले लक्ष्य के लिए जिहादियों को प्रशिक्षण देना था। इस मिशन में वह उन जिहादियों को इस्तेमाल करना चाहते थे जिन्हें अमेरिका जाने-आने में कठिनाई न आए। तात्पर्य यह है कि जो पहले ही वहाँ के बाशिंदे हों। पहले तैयार किए गए ग्रुप के होजे़ पदीला और रिचर्ड रीड जैसे व्यक्ति पकड़े जा चुके थे, इसलिए यह अगले मिशन के लोगों को बहुत ही सोच विचार के साथ अमेरिका में दाखि़ल करवाना चाहते थे। इनके नए जिहादियों में एक लड़का आया था - मजीद खान। यह कंप्यूटर प्रोगैमर था। इसका परिवार अमेरिका की स्टेट मैरीलैंड के शहर बाल्टीमोर में रहता था। मजीद खान का परिवार जब अमेरिका आया तो उस समय वह पंद्रह वर्ष का था। यहाँ आकर उसके परिवार ने राजनीतिक शरण ली थी। इसके छह वर्ष बाद मजीद खान पहली बार पाकिस्तान गया था। मगर अभी उसको ग्रीन कार्ड नहीं मिला था। इसी वजह से उसको अमेरिका से बाहर जाने के लिए इमीग्रेशन विभाग से अनुमति लेनी पड़ती थी, जो कि वह गलती से लेनी भूल गया था। इस बात का पता उसको बाद में जाकर लगा कि बिना इजाज़त के आने के कारण वह वापस अमेरिका में प्रवेश नहीं कर सकेगा।

ख़ैर, अब तक वह काफ़ी धार्मिक बन चुका था और किसी अच्छी लड़की से शादी करना चाहता था। उसकी शादी किसी मज़हबी हस्ती ने रबिया जाकूब की बेटी से करवा दी। इसी मज़हबी हस्ती ने उसके अंदर जिहाद के लिए आकर्षण को पहचाना और उसको के.एस.एम. के साथ मिलवाने का फ़ैसला किया। निश्चित किए गए समय पर वह उसको लेकर के.एस.एम. के पास गया और कहा कि इस लड़के को खालिद साहिब से मिलवाया जाए। के.एस.एम. ग़ौर से मजीद खान की ओर देखते हुए बोला, “बात सुन काके। यह जिहाद बातों से नहीं लड़ा जाता। इसके लिए अंदर जिहाद की आग होने ज़रूरी है।”

“जी, मैं हर तरफ से इसके लिए तैयार हूँ।”

“यह कोई भांडों का खेल नहीं है। हर वक़्त मौत साथ-साथ चलती है।”

“जी, मैं सब समझता हूँ।”

वे अभी बातें कर ही रहे थे कि एक व्यक्ति अंदर आया और के.एस.एम. से बोला, “उस लड़के ने आत्मघाती मिशन को बड़े अच्छे तरीके से अंजाम दे दिया है। वहाँ दस लोग मारे जा चुके हैं।”

“अल्लाह उसे बहिश्त बख़्शे। आगे का क्या प्रोग्राम है ?“

“पेट से बांधी जाने वाली बैल्ट तैयार है। धमाकाखेज सामग्री भी उसके अंदर फिट कर दी गई है। बस, अब तो किसी ऐसे लड़के की ज़रूरत है जो कि आत्मघाती मिशन के लिए तैयार हो।”

उसकी बात सुनकर के.एस.एम. ने पल भर सामने बैठे मजीद खां की ओर देखा और फिर बोला, “लड़का अपने पास पहुँच चुका है। तू बैल्ट लेकर आ।”

वह अंदर से बैल्ट ले आया तो के.एस.एम. ने उसको मजीद खां के पेट से बांध दिया। अच्छी तरह देख-परख कर वह बोला, “ले भई जवान, तू जिहाद के लिए मर मिटने के लिए तैयार है तो जिहाद भी तेरा ही इंतज़ार कर रहा था। तू किस्मत वाला है जो तुझे आते ही आत्मघाती मिशन का काम मिल गया। अब तू यहाँ से जा और डाउन टाउन की फराहखान मार्किट में जाकर इस काम को अंजाम दे। यह बम पूरे एक बजे चलेगा। बस, काम ध्यान से करना।”

“जी, बहुत बेहतर जनाब।” मजीद खां उठने लगा तो के.एस.एम. उसे रोकता हुआ बोला, “तुझे मालूम है कि यह क्या चीज़ है ?“

“जी, बिल्कुल पता है।”

“यह बम चलेगा तो वहाँ तेरे आसपास के सभी लोग मारे जाएँगे, पर तू भी उनके साथ ही मरेगा। तू नया है इसलिए मैं तुझे यह बात स्पष्ट बता रहा हूँ।”

(जारी…)
 
14

(दूसरा भाग)

“जी मुझे इजाज़त दो।“ इतना कहते हुए वह बाहर निकल गया और फराखान मार्किट पहुँच गया। वहाँ पहुँचकर वह एक भीड़ वाली जगह पर खड़ा हो गया ताकि अधिक से अधिक लोगों को शिकार बना सके। एक बज गया, पर उसके पेट से बंधा बम न फटा। कोई आधा घंटा वह वहाँ खड़ा रहा, पर उसको बताये गए समय के अनुसार बम नहीं फटा और न कोई धमाका हुआ। आखि़र वह वापस लौट आया तो वहाँ कोई नहीं था। वहाँ से वह घर चला गया। अगले दिन वह उसी मज़हबी हस्ती के पास गया तो उसने कहा, “बधाई हो।“

“जी !“ मजीद खां हैरान हुआ।

“तू खालिद शेख मुहम्मद साहिब के इम्तिहान में पास हो गया। असल में, कल तुझे तो बैल्ट दी गई थी, वह नकली थी। सिर्फ़ तुझे परखने के लिए। पर तू वाकिया ही पक्का जिहादी है। के.एस.एम. तुझे बड़ा काम सौंपने वाले हैं।“

फिर अगले सप्ताह उसको पैसे देकर इंडोनेशिया भेजा गया। उसने वहाँ पहुँचकर किसी हंबाली नाम के व्यक्ति से सम्पर्क किया और पैसे पहुँचाए। इन पैसों की मदद से हंबाली ने अगले हफ़्ते बाली के किसी क्लब में बम धमाका किया जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। इसके पश्चात, मजीद खां और छोटे-मोटे काम करके के.एस.एम. के पास वापस लौट आया तो उसको अली के हवाले कर दिया गया। मजीद खां को अमेरिका भेजकर आगे का काम करने की ट्रेनिंग देने का काम अली का था। के.एस.एम. ने अली से मिलकर दूसरे बड़े हमले की जो साजिश तैयार की थी, उसमें वह मजीद खां को इस्तेमाल करना चाहता था। उसके माध्यम से वह अमेरिका के तेल भंडारों को आग लगाने या वहाँ पीने वाले जल में ज़हर मिलाने का काम करना चाहते थे। लेकिन मजीद खां ने बताया कि वह अब अमेरिका में दाखि़ल नहीं हो सकता। अली ने कारण पूछा तो मजीद खां ने बताया कि वह अमेरिका से चलते समय ट्रैवल परमिट लेना भूल गया था। और इस परमिट के बग़ैर वह अमेरिका में प्रवेश नहीं कर सकेगा। कुछ सोचता हुआ अली बोला, “मजीद जो हो गया, सो हो गया। अब उस वक़्त को वापस तो नहीं लाया जा सकता। पर तू यह बता कि इस मुश्किल का कोई हल है ?“

“हल तो इसका है, पर वह काफ़ी कठिन है।“

“हल क्या है तू बता। कठिन को आसान बनाना तेरा नहीं, मेरा काम है।“

“वह यह है कि रिफ्यूजी सिस्टम वाले व्यक्ति को अमेरिका से बाहर जाने के लिए ट्रैवल परमिट लेना पड़ता है। उस परमिट के बिना वह दुबारा अमेरिका में दाखि़ल नहीं हो सकता। ट्रैवल परमिट लेने वाले व्यक्ति को अमेरिका से चलने से पहले ही यह परमिट लेना होता है। या यूँ कह लो कि परमिट लेने वाला व्यक्ति अमेरिका में होना चाहिए। वहाँ पहले वह अर्ज़ी भरकर इमिग्रेशन विभाग को मेल करता है। फिर बाद में उन्हें फोन करना पड़ता है। इसके बाद ही वे ट्रैवल परमिट भेजते हैं।“

“हम अब क्या कर सकते हैं, वह बता ?“

“वहाँ से कोई व्यक्ति मेरी अर्ज़ी इमिग्रेशन वालों को मेल करें फिर मजीद खान बनकर उन्हें फोन करे। पर इसमें एक अड़चन और है।“

“वह क्या है ?“

“कोई व्यक्ति वहाँ से अर्ज़ी भी भेज सकता है। मजीद खान बनकर फोन भी कर सकता है, पर मेरे पास वहाँ का कोई एड्रेस नहीं है जिस पर सारी कार्रवाई पूरी होने के बाद इमिग्रेशन वाले ट्रैवल डाक्युमेंट भेजेंगे। यह एड्रेस कोई ऐसा होना चाहिए जो कि बाद में पकड़ा न जा सके। फ़र्ज़ करो कि मैं वहाँ अपने घर का एड्रेस ही दे देता हूँ तो पता लग जाने पर एफ.बी.आई. तुरंत मेरे परिवार को पकड़ लेगी। साथ ही, तभी मेरा नाम भी सामने आ जाएगा।“

“फिर इसका हल क्या है ?“

“कोई भरोसेमंद आदमी वहाँ के किसी पोस्ट आफिस में मेरे नाम का पोस्ट बॉक्स किराये पर ले ले। वही पता मैं अपनी अर्ज़ी में भेजूँगा। जब एकबार परमिट आ गया तो पोस्ट बॉक्स में से परमिट उठाकर पोस्ट बॉक्स बंद कर दिया जाएगा। इस प्रकार सारे सबूत खत्म हो जाएँगे।“

“हूँ... अब समझा मैं तेरी बात, पर...।“ आगे अली सोचने लगा कि ऐसा भरोसेमंद आदमी कौन हो सकता है जो इतना बड़ा खतरा मोल ले ले। उसकी यह भी सोच थी कि यह काम किसी आम व्यक्ति से नहीं करवाया जा सकता। इस प्रकार सारी पोल खुल जाएगी। इसके लिए कोई सच्चा जिहादी ही हो सकता है। सोचते सोचते एकदम उसके मन में आफिया का ख़याल आ गया। उसने यह बात आफिया से करने का मन बना लिया। उसने अपनी बहन को भेजकर आफिया को घर में बुला लिया और अवसर मिलते ही मजीद खां की सारी कहानी सुना दी। आफिया ने पूछा, “मैं इसमें क्या कर सकती हूँ ?“

“तू अमेरिकन रैजीडेंट है। तू वहाँ बड़ी आसानी से जा सकती है। ग्रीन कार्ड होल्डर होने के कारण तेरे पर कोई शक भी नहीं करेगा।“

“मगर मैंने तुम्हें पहले ही बता रखा है कि मैं और अमजद एफ.बी.आई की इंटरव्यू बीच में ही छोड़कर भाग आए थे। इस कारण एफ.बी.आई. हमें ज़रूर ढूँढ़ रही होगी। मुझे डर लगता है कि कहीं उनके हत्थे ही न चढ़ जाऊँ।“

“वैसे तो बड़ी शेखियाँ मारती फिरती है कि मैं जिहाद के लिए कुछ भी कर सकती हूँ।“

“बात वो नहीं है। बात यह है कि मुझे अभी बहुत कुछ करना है। अगर शुरुआत में ही पकड़ी गई तो जिहाद के लिए जो कुछ करने के बारे में सोचा हुआ है, वे सारे सपने अधूरे ही रह जाएँगे।“

“आफिया कल किसने देखा है। और फिर, यह न भूल कि हम जिहादी हैं। और जिहादी आने वाले ख़तरों से नहीं डरा करते।“

“ठीक है। बता फिर मुझे क्या हुक्म है।“ अली के शब्दों ने आफिया के मान-सम्मान पर चोट मारी तो वह हर ख़तरा उठाकर अमेरिका जाने के लिए तैयार हो गई। आगे का सारा प्रबंध कर दिया गया। लेकिन आफिया की सलाह पर यह काम दो हिस्सों में करने के बारे में सोचा गया। पहले हिस्से में आफिया ने सिर्फ़ अमेरिका जाना था और वहाँ मजीद खां के नाम पर किसी पोस्ट ऑफिस में पोस्ट बॉक्स किराये पर लेकर वापस लौट आना था।

इसके तीसरे दिन ही आफिया कराची से अमेरिका के लिए रवाना हो गई। पूरे रास्ते उसको एकपल भी चैन न आया। उसको बार बार एफ.बी.आई. का डर सताता रहा कि कहीं ऐसा न हो कि उसे उतरते ही पकड़ लिया जाए। लेकिन ऐसा कुछ भी न हुआ। वह मौज से बाल्टीमोर एअरपोर्ट पर उतरी और सामान उठाकर बाहर निकल आई। सामने ही टैक्सी खड़ी थी। वह अपना बैग उठा टैक्सी में जा बैठी। संयोग से टैक्सी ड्राइवर पाकिस्तानी ही था। होटल तक जाते हुए वह उसके साथ बातें करती रही। आफिया ने बातों बातों में बताया कि वह पाकिस्तान सरकार की अधिकारी है और यहाँ किसी सेमिनार में भाग लेने आई है। इस कारण किसी होटल में ठहर रही है। वह होटल पहुँची और डैस्क पर जाकर कमरा बुक करवा लिया। अगले दिन वह दोपहर के बाद टैक्सी लेकर करीबी शहर गैदर्सबर्ग के पोस्ट आफिस में गई और पोस्ट बॉक्स किराये पर लेने के लिए अर्ज़ी भरी। अर्ज़ी में उसने अपने पति का नाम मजीद खां लिखा। थोड़ी-बहुत काग़ज़ी कार्रवाई के बाद आफिया सद्दीकी और मजीद खां के नाम पर पोस्ट बॉक्स मिल गया। आफिया ने पोस्ट बॉक्स की चाबी लेकर पर्स में डाली और बाहर आकर टैक्सी से फिर होटल चली गई। अगले दिन वह फ्लाइट लेकर वापस पाकिस्तान लौट आई। वहाँ पहुँचकर उसने नए खोले पोस्ट बॉक्स का पता और चाबी, दोनों अली के हवाले कर दिए।

अब अली ने काम के दूसरे भाग को अंजाम देने के लिए योजना बनानी प्रारंभ कर दी। मजीद खां ने नए पते के अनुसार अपनी अर्ज़ी भरकर तैयार कर ली थी। अली किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करने लगा जो उनके काम के अलग हिस्से को पूरा करने में मदद कर सके। इसके लिए भी भरोसेमंद व्यक्ति की ज़रूरत थी। बहुत सोच विचार के बाद अली ने यह बात अपने मामा के.एस.एम. को बताई। उसने अली से कहा कि वह एक आध दिन में उसके लिए कोई प्रबंध करेगा। दूसरे ही दिन के.एस.एम. ने अली से कहा कि शाम के समय वह सुपर स्पाइसी रेस्टोरेंट में चला जाए। वहाँ उसको उज़ेर पराचा नाम का लड़का मिलेगा जो कुछ दिन बाद ही अमेरिका जा रहा है। उसके साथ बात कैसे करनी है, के.एस.एम. ने यह सबकुछ अली को समझा दिया। उधर उज़ेर को उसके पिता सैफउल्ला पराचा ने कह दिया कि उसके कोई जान-पहचान वाले हैं, वह उनकी मदद कर दे। उज़ेर को पता था कि उसका पिता बड़ा बिजनेसमैन है और उसके कई अल-कायदा मेंबरों से भी संबंध हैं। लेकिन स्वयं वह ऐसे कामों से दूर ही रहता था। उसका पिता भी उसको यही कहता रहता था कि उसके जितने भी संबंध अलकायदा के साथ हैं, वे सिर्फ़ बिजनेस नज़रिये से हैं। वैसे वह कहता था कि उसका उनके साथ कोई लेना-देना नहीं है। खै़र, शाम के समय उज़ेर पराचा रेस्टोरेंट में अली और मजीद खां से जाकर मिला। बातचीत अली ने शुरु की, “उज़ेर भाई, अपना यह दोस्त मजीद, एक काम करने वाला मिडल क्लास आदमी है और यह आते समय अपना ट्रैवल परमिट लेना भूल गया है। बस, इसका इतना काम करना है कि इसकी अर्ज़ी वहाँ लेकर जानी है और अमेरिका पहुँचकर इमिग्रेशन को मेल कर देनी है। फिर हफ़्ते बाद उन्हें मजीद खां बनकर फोन करना है। इसके बाद इमिग्रेशन वाले इसका ट्रैवल परमिट मेल कर देंगे और तू जाकर उस मेल बॉक्स में से वह मेल उठा लेना। परमिट मिल जाने के बाद पोस्ट बॉक्स बंद करने की अर्ज़ी दे देना। और वापस पाकिस्तान आते समय इसका वो परमिट साथ ले आना ताकि इसको दुबारा अमेरिका में प्रवेश करने की अनुमति मिल जाए।“

बाईस-तेईस वर्षीय शर्मीले-से उज़ेर को बात कुछ अटपटी-सी लगी। परंतु वह उनके प्रभाव के कारण कुछ बोल न सका। और उसने मजीद खां के सारे काग़ज़-पत्र, उसका लायसेंस, सोशल सिक्युरिटी कार्ड, मेल बॉक्स की चाबी और अर्ज़ी वगैरह ले लिए। घर आकर उसने अपने पिता से कहा कि उसको यह काम कुछ जंचता नहीं है। पर सैफउल्ला पराचा ने बातचीत में उसका भय दूर कर दिया और आधे मन से उज़ेर पराचा अमेरिका जाते समय मजीद खां के सभी काग़ज़-पत्र अपने संग ले गया। वहाँ जाकर उसने अपना सारा सामान अपने पिता के दफ़्तर में रख दिया और अपने कामों में व्यस्त हो गया।

उज़ेर का पिता सैफउल्ला पराचा बहुत वर्ष पहले अमेरिका में पढ़ता रहा था। कुछ समय उसने वहाँ ट्रैवल एजेंसी भी चलाई। फिर पाकिस्तान वापस आकर उसने कपड़े का बिजनेस आरंभ कर लिया। जब उसका बिजनेस भलीभाँति जम गया तो उसने इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का लायसेंस लेकर पाकिस्तान से अमेरिका को रेडीमेड कपड़े भेजने प्रारंभ कर दिए। उसने एक दफ़्तर न्यूयॉर्क में खोल लिया। पाकिस्तान में उसने घर बनाकर बेचने का काम भी बड़े स्तर पर चला लिया। न्यूयॉर्क में सैफउल्ला का पुराना अमेरिकी दोस्त चाल्र्स उसका बिजनेस पार्टनर बन गया। इस दौरान एकबार वह पाकिस्तान की राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के साथ अफगानिस्तान गया। टीम के एक सदस्य ने उसको ओसामा बिन लादेन के साथ मिलवाने का विचार बताया तो वह खुशी खुशी मान गया। लादेन से मिलते समय उसको अपना कार्ड देते हुए सैफउल्ला ने कहा कि वह एक यूनिवर्सल ब्राडकास्टिंग नाम का टी.वी. कार्यक्रम चलाता है। उसने लादेन को अपने इस प्रोग्राम में इंटरव्यू देने के लिए कहा। लादेन ने मुस्तकराते हुए सैफउल्ला का कार्ड जेब में डाल लिया। तब तक सैफउल्ला सोच रहा था कि उसको अलकायदा से बहुत बिजनेस मिल सकता है। वह उसके नए बन रहे घरों के खरीददार हो सकते हैं। इस बीच काफी समय बीत गया कि उसके दफ़्तर में एक व्यकित आया जिसने अपना नाम मीर बताया। वास्तव में मीर, के.एस.एम. ही था। उसने वो कार्ड निकालकर दिखलाया जो कभी सैफउल्ला ने ओसामा बिन लादेन को दिया था। मीर बने के.एस.एम. ने कहा कि उन्हें कुछ घर किराये पर चाहिएँ और कुछ खरीदने भी हैं। सैफउल्ला यह काम करने के लिए खुशी से तैयार हो गया। अगले एक साल तक उसने अलकायदा को बेचे घरों में से लगभग तीन करोड़ रुपये कमाये। पिछले दिनों ही के.एस.एम. ने एक दिन उसको मुस्तफा नाम के किसी बड़े जमींदार से मिलवाया। पर मुस्तफा असल में के.एस.एम. का भान्जा अली ही था। मीर ने सैफउल्ला पराचा से कहा, “सैफउल्ला साहिब, मुस्तफा बलोचिस्तान का बहुत बड़ा बिजनेसमैन है। यह भी अमेरिका में इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनेस करना चाहता है। तुम इसकी मदद करो।“

“हाँ जी, मीर साहिब फरमाओ, मैं इसके लिए क्या कर सकता हूँ ?“

“तुम इसके पार्टनर मजीद खां के लिए वहाँ कोई कंपनी खुलवा दो ताकि यह भी अपना सामान वहाँ भिजवा सके। शुरु में तुम इसको अपनी कंपनी के रास्ते ही सामान भेजने की इजाज़त दे दो तो बहुत अच्छा होगा। आगे चलकर यह शायद तुम्हारा पार्टनर ही बन जाए।“

“कोई बात नहीं मीर साहिब, ये अगर चाहें तो एक आध डिलीवरी मेरी कंपनी की मार्फ़त भी भेज सकते हैं। आगे की आगे देखी जाएगी।“ सैफउल्ला अंदर से खुश हो गया कि उसका बिजनेस और आगे बढ़ेगा। पर के.एस.एम. की स्कीम कुछ और थी। उसने सोचा था कि अली का सामान भेजने के बहाने वह सैफउल्ला की कंपनी को इस्तेमाल करेगा। जिन कंटेनरों में सैफउल्ला कपड़े डालकर भेजता था, उनमें वह सी-4 एक्सप्लोसिव और अन्य घातक केमिकल्स डालकर भेजेगा। जिन्हें वहाँ बाद में मजीद खां ने संभालना था। यही हथियार अमेरिका के तेल भंडारों को आग लगाने के लिए प्रयोग में लाए जाने थे। बातचीत समाप्त करके मीर और मुस्तफा मामा-भान्जा सैफउल्ला के दफ़्तर से चले गए।

उधर आफिया यह सोचकर खुश हो रही थी कि वह चुपचाप अमेरिका का फेरा लगा आई ओर किसी को इसकी भनक भी नहीं पड़ी। लेकिन यह उसकी भूल थी। क्योंकि उसका नाम पहले ही एफ.बी.आई. वालों के रिकार्ड में आ चुका था। वह और अमजद जब एफ.बी.आई. की दूसरी इंटरव्यू बीच में ही छोड़कर चले गए थे तो एफ.बी.आई. ने उनका नाम ट्रैवल लिस्ट में डाल दिया था। जिसका परिणाम यह हुआ कि जैसे ही वह अमेरिका जाने के लिए कराची से जहाज पर बैठी थी तो उसी समय पाकिस्तान की फैडरल ट्रैवल एजेंसी ने अमेरिकी एफ.बी.आई. को सूचित कर दिया था। एफ.बी.आई. वालों ने उसको एअरपोर्ट पर पकड़ने की बजाय उसका पीछा करना उचित समझा। क्योंकि वह उसको पकड़ने की अपेक्षा सारे रिंग को जोड़ना चाहते थे। आफिया ने अमेरिका पहुँचकर जब एअरपोर्ट के बाहर से टैक्सी ली तो जो पाकिस्तान टैक्सी ड्राइवर उसको एअरपोर्ट से लेकर होटल में छोड़कर आया था, वह एफ.बी.आई का ही आदमी था। अगले दो दिन भी उसका पीछा होता रहा। उसके पीछे-पीछे रहते हुए एफ.बी.आई. को पता लगा कि आफिया ने पोस्ट आफिस में पोस्ट बॉक्स किराये पर लेने के वक्त मजीद खां का नाम अपने पति के रूप में लिखा है तो वह समझ गए कि अब इस नाम का व्यकित अमेरिका में आएगा। परंतु मजीद खां या बाकी ग्रुप इस बात से अनभिज्ञ आगे की कार्रवाई करने में व्यस्त हो गए।

मगर इसी बीच 1 मार्च 2003 के अख़बार ने तहलका मचा दिया। मुख्य ख़बर थी कि के.एस.एम. को पाकिस्तानी पुलिस ने पकड़ लिया है। साथ ही, यह भी ख़बर थी कि के.एस.एम. जिसका पूरा नाम खालिद शेख मुहम्मद है, अलकायदा का आपरेशन चीफ़ है। वह ओसामा बिन लादेन के मुकाबले का अलकायदा का लीडर और नाइन एलेवन का मास्टर माइंडिड है। पुलिस के अनुसर के.एस.एम. रावलपिंडी फौज़ी छावनी के करीब किसी के बड़े घर में से गिरफ्तार किया गया था। किसी मुख़बिर ने अमेरिका द्वारा घोषित पच्चीस मिलियन डॉलर के इनाम को लेने की खातिर उसको पकड़वाया था। के.एस.एम. को जिसके घर में से पकड़ा गया था, वह खुद एक साइंसटिस्ट था। उसके घर से जो अन्य सामान मिला, उससे पता चला कि अल कायदा, बॉयलॉजिकल हथियार के करीब पहुँच चका था। वहीं से दूसरे अल कायदा सदस्यों के पते मिले। मजीद खां को भी अगले दिन ही पकड़ लिया गया। इसी प्रकार इस रिंग के कई अन्य सदस्य भी पुलिस की गिरफ्त में आ गए। उधर अमेरिका में एफ.बी.आई आफिया की बहन फौज़िया के घर पहुँची। फौज़िया से सवाल-जवाब करके वह वापस चले गए तो उसने अपने भाई को हूस्टन टैक्सास में फोन किया। वह हैरान रह गई जब उसने बताया कि उसके घर से भी एफ.बी.आई. वाले अभी अभी गए हैं। वह आफिया को बुरी तरह खोज रहे थे। इस बारे में फौज़िया ने आफिया को पाकिस्तान में फोन करते हुए कहा, “आफिया, तुझे एफ.बी.आई. खोजने आई थी।“

“क्या ? पर क्यों ?“ फौजिया की बात सुनते ही आफिया के होश उड़ गए।

“यह तो पता नहीं, पर मुझे पता चला है कि मार्च के शरु से ही जो के.एस.एम. जैसे लोगों की गिरफ्तारियाँ हुई हैं, यह सब उसी कड़ी का एक हिस्सा है।“

“हूँ...।“ आफिया किसी सोच में गुम हो गई।

“आफिया, क्या तू इस के.एस.एम. के बारे में कुछ जानती है ?“ फौज़िया ने सवाल किया।

“नहीं तो। पर तू क्यों पूछ रही है ?“

“आफिया, यह कोई लम्बा चक्कर लगता है, जो धड़ाधड़ गिरफ्तारियाँ हो रही है। इसके घेरे में पता नहीं कौन कौन आएगा। सुना है कि कोई मजीद खां नाम का लड़का भी पकड़ा गया जो अमेरिका आकर अगले हमले करने चाहता था। आफिया सच बताऊँ तो मुझे बड़ा डर लग रहा है। तू संभलकर रहना।“

फौज़िया के फोन ने आफिया के होश उड़ा दिए। उसको लगने लगा कि उसको पकड़ने के लिए कोई आया कि आया। उसने तुरंत अपने तीनों बच्चों को तैयार किया और टैक्सी बुला ली। उसकी माँ ने उसको समझाते हुए कहा, “आफिया, यह क्या पागलपन है। तेरा इन लोगों से क्या संबंध है। तुझे कोई क्यों पकड़ेगा। जब तूने कुछ गलत किया ही नहीं तो डरने की कौन-सी बात है।“

“अम्मी, तू नहीं समझ सकती यह बात। इस वक्त मेरा यहाँ से चले जाना ही बेहतर है।“

“आफिया, सच बता, कहीं तेरा किसी उलटे-सीधे काम से वास्ता तो नहीं है ?“ इस्मत ने आफिया की बांह पकड़कर सख़्ती से कहा।

“अम्मी, मैंने कहा है न कि यह वक्त बहसबाजी का नहीं है।“ इतना कहते हुए आफिया ने बांह छुड़वा ली और अपनी तैयार में लग गई।

“मेरा मन कहता है कि तू ज़रूर अल कायदा के किसी आदमी के साथ जुड़ी हुई है। तू मुझे सच सच बता दे, मैं तेरा सारा प्रबंध कर लूँगी। तुझे आँच नहीं आने दूँगी।“

लेकिन आफिया ने माँ की बात का कोई जवाब नहीं दिया तो इस्मत रोने लगी। तभी, टैक्सी आ गई और आफिया बच्चों को उठाती बाहर निकलने लगी। इस्मत रोती हुई आगे आ गई और बोली, “पर इतना तो बता दे कि जा किधर रही है ?“

“फिलहाल तो फारूकी अंकल के पास जा रही हूँ। वहाँ पहुँचकर तुम्हें फोन करुँगी।“ इतना कहते हुए आफिया बच्चों सहित टैक्सी में जा बैठी। इस्मत के देखते-देखते टैक्सी आँखों से ओझल हो गई। आफिया स्टेशन पहुँची और वहाँ से टैक्सी बदल ली। अगली टैक्सी लेकर वह सीधे अल बलोची के परिवार के पास पहुँची। परिवारवालों ने उसका खुशी खुशी स्वागत किया। पर साथ ही यह भी कहा कि इस परिवार में एक अनब्याहा मर्द यानी अली रहता है, इसलिए मज़हबी अकीदे के अनुसार आफिया का वहाँ रहना उचित नहीं हागा। परंतु घर के बुजु़र्गों ने इसका हल सोचते हुए आफिया से पूछा, “बेटी क्या तू अली के साथ शादी करने के लिए राज़ी है ?“

“जी, जैसा आप सबको ठीक लगता हो।“ आफिया ने एक किस्म की सहमति दे दी। अगले दिन ही सादे ढंग से उनका निकाह करवा दिया गया और आफिया अपने बच्चों सहित अली के साथ रहने लगी।

उधर इस्मत सारा दिन प्रतीक्षा करती रही, मगर आफिया का फोन न आया। फिर उसने खुद ही फारूकी को फोन किया तो उसने बताया कि आफिया तो उसके पास आई ही नहीं। वह भी चिंतित हो उठा। अगले दिन शाम के समय फिर इस्मत का फोन आया तो सद्दीकी उदास आवाज़ में बोला, “आपा, मुझे लगता है कि आफिया को पुलिस ने कहीं रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया है। नहीं तो वह कहीं से फोन ज़रूर करती।“ इस तनाव में ही सप्ताह गुज़र गया। इस्मत थोड़ी थोड़ी देर के बाद फारूकी के घर फोन करती रही। उधर फौज़िया भी सुबह-शाम अपनी माँ से बात करती, पर आफिया का कहीं कोई ठौर-ठिकाना न मिला तो एक दिन इस्मत रोती हुई फारूकी से बोली, “भाईजान, तुम्हारी बात सही है। वह पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर ली गई लगती है। पर मैं अकेली औरत क्या करुँ। कहाँ खोजूँ उसको। फिर यह भी पता नहीं कि उसने किया क्या है। उसने बताया भी कुछ नहीं। जिस तरह डरकर वह भागी है, उससे तो लगता है कि बात कोई ज़रूर है।“

“आपा तू अकेली नहीं है। मैं तुम्हारे साथ हूँ। हम मिलकर उसको ढूँढ़ेंगे।“

पर उनके लाख टक्करें मारने के बावजूद आफिया का कोई अतापता नहीं मिला। दिन गुज़रते गए। इस्मत, बेटी के दुख से बिस्तर से लग गई। फारूकी भी सारा दिन इसी चिंता में खोया रहता था कि क्या किया जाए। उधर फौज़िया का बुरा हाल था। उसको आफिया की तो चिंता थी ही, साथ ही उसको यह भी लगता था कि जैसे उसकी भी निगरानी की जा रही हो। इस सबसे अनभिज्ञ उधर आफिया अपने नए पति अली के साथ उसके बड़े अल बलोची परिवार में रह रही थी।

फिर एक दिन एफ.बी.आई उज़ेर पराचा के न्यूयॉर्क वाले दफ़्तर में पहुँची। वह कई दिनों से उसकी निगरानी कर रहे थे। उसका दफ़्तर अंदर से बंद था। दरवाज़ा खटखटाया गया तो उज़ेर ने दरवाज़ा खोला। सामने वर्दीधारी एफ.बी.आई. की टीम देखकर उसके होश उड़ गए। उजे़र के सामान की तलाशी ली तो उसमें से मजीद खां के पेपर निकले। उसको भी गिरफ्तार कर लिया गया। उसको न्यूयॉर्क मैट्रोपॉलेटिन डिटैनशन सेंटर ले जाया गया। उसकी इंटैरोगेशन शुरू हुई तो उसने सबकुछ बता दिया कि कैसे उसका पिता ही उसको इस चक्कर में डालने का कारण बना। एफ.बी.आई. के लिए अब यह बहुत आवश्यक हो गया कि उज़ेर के पिता को पकड़ा जाए। मगर अब तक महीने से ऊपर हो गया था इन गिरफ्तारियों को चलते, इस कारण बहुत कुछ बदल गया था। शुरू में पाकिस्तान सरकार ने एफ.बी.आई. की मदद की थी। परंतु फिर वहाँ की एजेंसी आई.एस.आई. अलकायदा के मशहूर आदमियों को बचाने में लग पड़ी थी। जब भी एफ.बी.आई. धावा बोलती तब तक उनका टारगेट भाग चुका होता। वे समझ गए कि आई.एस.आई. अब उनकी पेश नहीं चलने दे रही। इसी कारण उन्होंने सैफउल्ला पराचा वाली बात बाहर न निकाली। पता था कि जैसे ही उसका नाम बाहर आएगा, आई.एस.आई. उसको पहले ही कहीं भगा देगी। लेकिन उसके लिए एफ.बी.आई. ने एक अलग ही तरीका चुना।

एक दिन न्यूयॉर्क में रहते सैफउल्ला पराचा के पुराने मित्र और बिजनेस पार्टनर चार्ल्स का उसको फोन आया। वह बोला, “सैफउल्ला तुझे एक ज़रूरी बात तो यह कहनी है कि तू इधर अमेरिका की ओर मुँह न करना। यहाँ आना तेरे लिए खतरे से खाली नहीं होगा।“

“चार्ल्स यह बात तो मैं भी समझता हूँ। इन्होंने मेरे निर्दोष बेटे को यूँ ही पकड़ लिया। पर बिजनेस भी बंद नहीं किया जा सकता।“

“यह बात भी ठीक है। बिजनेस के लिए अपना मिलना ज़रूरी है। पर मैं भी यार पाकिस्तान आने से डरता हूँ।“

“चार्ल्स तू भी यहाँ अभी बिल्कुल मत आना। अभी तो मैं भी यहाँ छिपा फिरता हूँ। इन एफ.बी.आई वाले कमबख्तों का क्या पता है कि कब किससे चिपट जाएँ।“

“तू फिर ऐसा क्यों नहीं करता कि हम कहीं दूसरी जगह छिपकर मिल लें।“

“तू ही बता कि कहाँ मिल सकते हैं ?“

“तू ऐसा कर, थाईलैंड आ जा। वहाँ किसी को पता भी नहीं चलेगा और हम मिल भी लेंगे। पर ज़रा होशियारी से जहाज में चढ़ना।“

“हाँ, यह तो ठीक है। साथ ही वहीं कुछ देर गुज़ार आऊँगा। जब तक बात ठंडी नहीं पड़ती।“

“ठीक है फिर हम वहीं मिलते हैं।“

इसके पश्चात उन्होंने तारीख़ तय कर ली। निश्चित दिन सैफउल्ला चुपचाप-सा कराची से थाईलैंड के लिए फ्लाइट लेकर जहाज में जा बैठा। जहाज बैंकाक पहुँचा तो दूसरे यात्रियों सहित सीढ़ियों से नीचे उतरा। नीचे एक सिक्युरिटी वाले ने बात करने के लिए एक तरफ बुला लिया। अगले ही पल पास खड़ी वैन में से कुछ लोग उतरे और उन्होंने सैफउल्ला को दबोचकर अपने साथ बिठा लिया। किसी को भनक भी न लगी कि वहाँ क्या हुआ। वे असल में एफ.बी.आई. वाले थे। उन्होंने ही चार्ल्स को डरा-धमकाकर अपनी मदद के लिए मनाया था। यह सारा ड्रामा चार्ल्स द्वारा सैफउल्ला को बैंकाक में लाने के लिए करवाया गया। अगले ही दिन सैफउल्ला पराचा को दूसरों की भाँति अफगानिस्तान की गुप्त जेलों में पहुँचा दिया गया। उधर उसके परिवार और जान-पहचानवाले हैरान रह गए कि सैफउल्ला गया तो किधर गया।

इसी दौरान एफ.बी.आई. के हाथ एक ऐसा व्यक्ति आ गया गया जिसने सारा रिंग ही तोड़ दिया। यह था फारसी नाम का ट्रक ड्राइवर जो कि चिकागो में रहता था। यह मजीद खां का दोस्त था, जिसका भेद मजीद खां की इंटैरोगेशन के समय ही मिला। जितना बड़ा यह अलकायदा का सोर्स था, उतना ही बड़ा यह पहेली निकला। उसने इंटैरोगेशन का एक दौर भी नहीं झेला कि वह एफ.बी.आई की हर किस्म की मदद करने को मान गया। एफ.बी.आई. शायद उसकी बातों को न मानती, पर जब उसने कहा कि वह के.एस.एम. के भान्जे अली को पकड़वा सकता है तो एफ.बी.आई. वालों की बांछें खिल उठीं। उसको किसी गुप्त घर में ले जाकर अली के साथ राब्ता कायम रखने को कहा गया। कुछ ही देर बाद उसने बताया कि अली पाकिस्तान में बैठा वहाँ की अमेरिकन एम्बेसी पर हमला करने की तैयारी कर रहा है तो एफ.बी.आई. एकदम हरकत में आ गई।

जब एफ.बी.आई. की टीम ने पाकिस्तानी पुलिस फोर्स के साथ उस घर को घेरा डाला जहाँ अली अमेरिकन एम्बेसी पर फेंके जाने वाले बम को बनाने में व्यस्त था, तो तभी अली और उसके साथी ने पुलिस पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। इधर पुलिस ने भी गोलाबारी शुरू कर दी। कुछ मिनट ही बीते थे कि तभी वहाँ आई.एस.आई. का हथियारबंद दस्ता आ पहुँचा। वह शायद देर हो जाने के कारण सिर मार रहे थे। इतने में अंदर से अली की आवाज़ आई कि वे कुछ देर के लिए सीज़ फायर कर दें ताकि अंदर घिर बच्चे को बाहर निकाला जा सके। आई.एस.आई. वालों ने गोलाबारी रुकवा दी। कुछेक मिनट प्रतीक्षा करने के बाद आई.एस.आई. वालों ने अपना ट्रक दरवाजे़ के साथ लगा दिया और किसी को चुपचाप-से ट्रक में बिठाकर चलते बने। बाद में पुलिस वाले भौंचक्के खड़े देखते रह गए। वे आई.एस.आई. की इस हरकत के बारे में सोच ही रहे थे कि तभी अंदर से फिर आवाज़ आई कि यदि उन्हें आई.एस.आई. गिरफ्तार कर रही है तो वे हथियार फेंकने के लिए तैयार हैं। पुलिस वालों ने कहा कि ठीक है, जैसा तुम कहते हो, वैसा ही होगा। अंदर से अली और उसका साथी हाथ खड़े किए बाहर आ गए। जब पुलिस ने उन्हें बांधकर गाड़ियों में बिठा लिया तो उन्हें अहसास हुआ कि आई.एस.आई. वाले तो जा चुके थे। पर अब कुछ नहीं हो सकता था। पाकिस्तानी पुलिस और अमेरिकन एफ.बी.आई. वाले इस गिरफ्तारी से इतना खुश हुए कि वे आई.एस.आई. द्वारा दख़लअंदाज़ी करके किसी को वहाँ से निकालने वाली बात भूल गए। एफ.बी.आई. वालों की खुशी तब और भी बढ़ गई जब उन्हें पता चला कि अली के साथ पकड़ा गया व्यक्ति खालिद अल अशाद है। खालिद अल अशाद वर्ष 2000 में अमेरिकी समुद्री बेड़े यू.एस.एस, कॉल्ज पर हमला करके सत्रह अमेरिकी फौजियों को मार देने वाली आतंकवादी घटना में शामिल था। आखि़र, 1 मार्च को शुरु हुआ गिरफ्तारियों का सिलसिला बंद हो गया। अमेरिका पर दूसरा बड़ा हमला करने वाली साज़िश के प्रमुख दोषी के.एस.एम. से लेकर निचले स्तर के सभी आतंकवादी एफ.बी.आई. के कब्ज़े में आ चुके थे। सिर्फ़ एकमात्र इन्सान बच गया था जो एफ.बी.आई. की पहुँच से दूर था। वह थी आफिया सद्दीकी। एफ.बी.आई. ने दुनिया का कोना कोना छान मारा, पर आफिया का कोई अता पता नहीं मिला। एफ.बी.आई. उसको बहुत अहम मान रही थी। इसके अलावा जिस घर में से के.एस.एम. पकड़ा गया था, वहाँ से एफ.बी.आई. को जो दस्तावेज़ मिले थे, उनसे साबित होता था कि अल कायदा बॉयलॉजिकल और केमिकल हथियार बनाने के करीब पहुँच चुका है। एफ.बी.आई. सोच रही थी कि कहीं यह न हो कि कोई न काई खतरनाक हथियार बन चुका हो और आतंकवादी उसको अमेरिका के खिलाफ़ इस्तेमाल के लिए तैयार हों। अब तक पकड़े गए कई अलकायदा सदस्यों ने अपनी इंटैरोगेशन के दौरान माना था कि आफिया बहुत ज्यादा खतरनाक है। वह अमेरिका पर केमिकल हथियारों से करने वाले अगले हमले के लिए देहतोड़ काम कर रही है। एफ.बी.आई. इस बात से भी चिंतित थी कि कहीं वह किसी परिवर्तित नाम से पासपोर्ट लेकर अमेरिका में न आ घुसे और किसी को पता ही न चले। आखि़र, एफ.बी.आई. ने उसकी फोटो और अन्य जानकारी अपने इश्तहारी मुज़रिमों वाली सूची में डाल दी। इस सूची पर अकेला उसका नाम नहीं था, बल्कि साथ ही उसके पहले पति का नाम भी डाला गया था।

जैसे ही यह ख़बर आई कि एफ.बी.आई ने आफिया को अपने इश्तहारी मुज़रिमों वाली सूची में डाल दिया है तो हर तरफ तहलका मच गया। अख़बारों ने इस ख़बर को उठा लिया। अमेरिकी मीडिया ने ख़बर दी कि आफिया को गिरफ्तार कर लिया गया है और उसको अमेरिकी सरकार के हवाले भी किया जा चुका है। और अमेरिकी उसको अफगानिस्तान की किसी गुप्त जेल में ले गए हैं। इसी दौरान पाकिस्तानी मीडिया ने ख़बर दी कि आफिया पकड़ी अवश्य गई थी, पर उसको थाने में ले जाकर रिहा कर दिया गया। इसके अगले दिन पाकिस्तान के मशहूर अख़बार डॉन ने ख़बर दी कि आफिया को उस वक्त कराची एअरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया जब वह फ्लाइट लेकर कहीं जाने की ताक में थी। एक अन्य अख़बार ने अपने पुलिस सोर्स का नाम गुप्त रखते हुए यह लिखा कि आफिया को तब गिरफ्तार किया गया जब वह बच्चों सहित कराची से इस्लामाबाद जा रही थी और उसको आई.एस.आई. के हवाले कर दिया गया है। अगले ही दिन फिर ख़बर आ गई कि आफिया को पाकिस्तान सरकार ने पकड़ा है और इस वक्त वह उनकी कै़द में है। परंतु अगले दिन पाकिस्तान ने मीडिया कान्फ्रेंस करके इस ख़बर का खंडन कर दिया। जब फिर से डॉन अख़बार ने ज़ोर-शोर से लिखा कि आफिया इस वक्त अमेरिकी सरकार के पास है और उसको अफगानिस्तान में कहीं गुप्त जेल में रखा हुआ है तो अमेरिका सरकार ने इस ख़बर का खंडन करते हुए कहा कि आफिया उनकी जेल में नहीं है। इस बीच यह भी ख़बर आई कि आफिया क्योंकि अल कायदा के बारे में सब कुछ जानती थी और हो सकता है कि उसका हश्र भी आफिस भूजा वाला ही हुआ हो। (आसिल भूजा का नाम पत्रकार डेनियल पर्ल के क़त्ल में आ गया था। अगले दिन जब पुलिस उसके घर उससे बातचीत के लिए पहुँची तो वह वहाँ मरा हुआ मिला। सबको शक था कि उसको अलकायदा ने स्वयं ही मार दिया है ताकि कहीं कोई भेद बाहर न निकल सक।) खै़र, ख़बरों का बाज़ार हर तरफ गरम था। परंतु लोग असमंजस जैसी स्थिति में थे। क्योंकि कोई भी ख़बर ऐसी नहीं थी जिस पर भरोसा किया जा सके। आखि़र बनते बनते आफिया की ख़बर वास्तव में एक रहस्य बनकर रह गई। आफिया एक रहस्य बनकर रह गई। किसी को पक्के तौर पर कुछ भी पता नहीं था, बस सबके अपने अपने कयास थे। फिर धीरे धीरे आफिया के नाम की चर्चा कम होने लगी। 2003 की गर्मियाँ खत्म होने तक आफिया का नाम ख़बरों में से गायब हो चुका था।

(जारी…)
 
15

(प्रथम भाग)

आफिया का नाम यद्यपि हर तरफ से गायब हो चुका था, परंतु एक ऐसा इन्सान भी था जो हर वक़्त उसके बारे में सोचता था। वह था उसका पहला पति अमजद। जब भी कहीं ख़बर आती कि आफिया गिरफ्तार हो गई है तो वह रात रातभर सो न पाता। आफिया का चेहरा उसकी आँखों के आगे घूमता रहता। वह यह सोचकर तड़पता रहता कि इस समय पता नहीं उस पर क्या बीत रही होगी। मगर जब ख़बर आ जाती कि नहीं वह अभी तक किसी की हिरासत में नहीं आई है तो उसको कुछ शांति मिलती। आफिया के साथ गहरा जुड़ा होने के अलावा उसको बच्चों की बड़ी चिंता रहती थी। वह सोचता कि वह जहाँ कहीं भी रह रही है, रहे जाए, पर पुलिस के हाथ न आए। यह दर्द उससे झेला नहीं जाएगा और साथ ही, बच्चों का जीवन भी बर्बाद हो जाएगा।

परंतु जब उसको पता चला कि आफिया के साथ उसका नाम भी एफ.बी.आई. ने मुज़रिमों के इश्तहार की लिस्ट में डाल दिया है तो उसके होश उड़ गए। क्योंकि वह तो अपने ही घर में रहता था और उसने सोचा कि उसको पुलिस किसी भी समय गिरफ्तार कर सकती है। उसने अपने पिता से बात की। पिता ने अपने किसी दोस्त की राय ली। यह दोस्त पहले आई.एस.आई. का अफ़सर रह चुका था और इस समय रिटायर हो चुका था। इसी दोस्त के उद्यम से अमजद की आई.एस.आई. के मौजूदा किसी अफ़सर के साथ इंटरव्यू करवाई गई। उसने अमजद से बहुत सारे सवाल पूछे। लेकिन अमजद ने जो सच था, वह बता दिया कि जिस आफिया को वह जानता है, वह ऐसी नहीं है और हो सकता है कि आफिया उससे छिपाकर कोई दोहरी ज़िन्दगी जी रही हो। लम्बी इंटरव्यू के बाद अफ़सर ने उसको फ्री कर दिया। अपने रिकार्ड में उसका नाम लिख दिया कि इस व्यक्ति की पूछताछ हो चुकी है और इसका किसी असामाजिक तत्वों से कोई संबंध नहीं है। अब एफ.बी.आई उसको आसानी से गिरफ्तार नहीं कर सकती थी। ख़ास तौर पर पाकिस्तान में तो कतई नहीं। इस दौरान अमेरिका के बाल्टीमोर दफ़्तर से एफ.बी.आई. का एक एजेंट उसके घर आ पहुँचा। घर वालों की तो जैसे जान ही सूख गई। पर अमजद ने उसको आई.एस.आई. के साथ हुई अपनी इंटरव्यू के बारे में बताया और साथ ही इंटरव्यू करने वाले अधिकारी का नाम-पता आदि दे दिया। उस वक़्त तो एजेंट चला गया, पर अगले रोज फिर आ गया। ख़ैर, अब उसने बताया कि वह सिर्फ़ अमजद की उसके घर में ही पूछताछ करेगा। लम्बी बातचीत के बाद इस एजेंट ने भी यही नतीजा निकाला कि अमजद को आफिया की दूसरी ज़िन्दगी का कोई इल्म नहीं है। वह वापस अमेरिका लौट गया।

आफिया की माँ के पास ग्रीन कार्ड था और वह अमेरिका जा सकती थी। वह अपनी बेटी को खोजने के लिए अमेरिका के लिए रवाना हो गई। न्यूयॉर्क के कनेडी एअरपोर्ट पर ही उसको एफ.बी.आई. वालों ने घेर लिया। पर वह डरी नहीं और ज़ोर-ज़ोर से चीख-चिल्लाकर कहती रही कि तुमने मेरी बेटी को कै़द किया हुआ है। चार घंटों के बाद उसको छोड़ दिया गया तो वह बाहर इंतज़ार कर रही फौज़िया के साथ उसके घर चली गई। करीब दो दिन बाद ही फौज़िया के दरवाज़े पर शैरिफ़ दफ़्तर का एक अधिकारी खड़ा था। उसने इस्मत सद्दीकी के विषय में पूछा, “मैम, मैं इस्मत सद्दीकी से मिलना चाहता हूँ।“

“किसलिए ?“ फौज़िया के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।

“उसको कोर्ट को आदेश हुआ है कि वह ग्रैंड ज्यूरी के पास पेश हों।“

तभी इस्मत वहाँ आइ गई। उसने दस्तख़्त करके कोर्ट का सम्मन ले लिया। इसके बाद दोनों माँ-बेटियाँ गहरी फिक्र में डूब गईं। फौज़िया ने अपने भाई को टैक्सास में फोन करके इस बारे में बताया। उसने वकील कर लेने की सलाह दी। डर था कि कहीं उनकी माँ को जेल में ही न बंद कर दें। किसी दोस्त ने बॉस्टन की बहुत ही मशहूर वकील शार्प के विषय में बताया। फौज़िया ने शार्प को फोन किया। पहले तो वह केस लेने से हिचकिचाती रही, पर फिर मान गई। इससे माँ-बेटी दोनों को बड़ी राहत मिली। शार्प ने सबसे पहला काम यह किया कि इस्मत को दिमागी तौर पर परेशान बताकर, फिलहाल ग्रैंड ज्यूरी के पेश होने से छूट दिलवा दी। इधर से पीछा छूटते ही इस्मत अपने बेटे मुहम्मद के पास टैक्सास चली गई। पर उसके वहाँ पहुँचने के अगले दिन ही एफ.बी.आई. वाले उसके दरवाज़े पर भी आ खड़े हुए। वह इस्मत की इंटरव्यू करना चाह रहे थे। मुहम्मद ने तुरंत अपने लोकल वकील को फोन किया तो वकील उसी समय उसके घर आ गया। एफ.बी.आई एजेंट ने इंटरव्यू शुरु करते हुए सवाल किया, “मैम, तुम अमेरिका में क्या करने आई हो ?“

“मेरे पास ग्रीन कार्ड है। मैं जब चाहे यहाँ आऊँ-जाऊँ, तुम कौन हो मुझे पूछने वाले ?“ इस्मत यहाँ भी भयभीत न हुई। अपितु डटकर उत्तर देने लगी।

“तुम कभी ओसामा बिन लादेन से मिली हो ?“

“मुझे उससे मिलने की कोई ज़रूरत नहीं है। नहीं, मैं उससे नहीं मिली।“

“तुम्हारी बेटी आफिया कहाँ है ?“

“मैं तो खुद उसको खोजती घूमती हूँ। उसी को तलाशती मैं अमेरिका आई हूँ। इस बात का जवाब तुम दो कि तुमने आफिया को कहाँ कै़द करके रखा हुआ है।“

“व्हट नानसेंस ! हमने उसको नहीं पकड़ा। वह हमारे कब्जे़ में नहीं है। तुम जानबूझ कर नहीं बता रही। तुम माँ-बेटियों ने मिलकर अमेरिका के खिलाफ़ कोई साज़िश रची है। उसी साज़िश को अमली रूप देने के लिए तुम यहाँ आई हो।“

“यह सब बकवास है। तुमने मेरी बेटी को कहीं खपा दिया है। बताओ, कहाँ है मेरी बेटी ?“ वह ऊँची आवाज़ में बोलने लगी।

“मैम, तुम हमारी इंटरव्यू नहीं कर रहीं, बल्कि हम तुम्हारी इंटरव्यू कर रहे हैं। इसलिए तुम्हें हमारे सवालों के उत्तर तो देने ही पड़ेंगे। तुम बताओ कि के.एस.एम. के बारे में तुम क्या जानती हो ? मजीद खान तुम्हारा क्या लगता है ? उसने क्या योजनाएँ बना रखी थीं। तुम्हारी बेटी आफिया ने उसके लिए पोस्ट ऑफिस बॉक्स किराये पर क्यों लेकर दिया था ?“

“तुम सब झूठे हो। मैं किसी भी बात का उत्तर नहीं दूँगी। जाओ, कर लो जो करना है।“

“उत्तर तो मैम तुम्हें देने ही पड़ेंगे।“

इतना कहकर एफ.बी.आई. के एजेंट उठ खड़े हुए। उनके वकील ने कहा कि तुम देख ही रहे हो कि इस औरत दिमाग सही ढंग से काम नहीं कर रहा। अपनी बेटी के गम में यह बेज़ार हो चुकी है। इसको इलाज की ज़रूरत है। मगर एफ.बी.आई. वाले उसकी बात का नोटिस लिए बग़ैर बाहर निकल गए। अगले दिन यहीं कोर्ट का समन आ पहुँचा कि इस्मत सद्दीकी ग्रैंड ज्यूरी के सामने पेश हो। लेकिन वकील ने एक बार फिर उसकी बीमारी का बहाना बनाकर यह काम टाल दिया।

“अम्मी, मुझे लगता है कि तुझे वापस चले जाना चाहिए। कहीं यह न हो कि तू यहीं घिरकर रह जाओ।“ उस शाम घर बैठी फौज़िया ने बात शुरु की।

“मेरी एक बेटी तो गायब हो ही चुकी है, मैं नहीं चाहती कि तू भी एफ.बी.आई. के चक्कर में फंस जाए। तू भी यहाँ से चली चल।“ इस्मत ने फौज़िया से कहा।

“फौज़िया, मैं भी तुझे यही सलाह दूँगा, जो अम्मी दे रही है।“ समीप बैठा मुहम्मद बोला।

“वैसे तो भाईजान मेरे पीछे भी एफ.बी.आई. वाले घूमते रहते हैं। मेरी पहले वाली जॉब चली गई। हर रोज़ अस्पताल आ पहुँचते थे। अपनी रेपुटेशन के कारण अस्पताल वालों ने मुझे नौकरी से निकाल दिया। इसी बात की सताई मैं वहाँ से दूर बाल्टीमोर जाकर एक साधारण-सी नौकरी करने लगी तो एफ.बी.आई. ने वहाँ भी मेरा ठिकाना खोज लिया। पर मैं एक बात सोचती हूँ।“

“वह क्या ?“

“जब मेरा किसी बात से कोई लेना-देना ही नहीं तो मुझे कोई क्या कर देगा।“

“फौज़िया, यह बात नहीं है। असल में तू और आफिया शुरु के काफी दिन एकसाथ रहती रही हो। फिर, तू वहाँ उसके पास बॉस्टन में भी रही। इसीलिए एफ.बी.आई. सोचती है कि तू उसके बारे में बहुत कुछ जानती होगी। या वह अवश्य तेरे से सम्पर्क कायम करती होगी।“

“भाईजान, आफिया की वजह से सारा परिवार मुश्किलों में फंसा हुआ है। पता नहीं, उसने यह राह क्यों चुना ?“ इतना कहती हुई फौज़िया रोने लगी। माँ ने उसका ढाढ़स दिया।

“फौज़िया, यह मौका इस तरह हिम्मत हारने का नहीं है। मैं चाहता हूँ कि तू कल ही अपने वकील से सारी बात बता दे और अम्मी को लेकर यहाँ से चलती बन।“

“ठीक है भाईजान।“ फौज़िया वापसी के लिए मन बनाने लगी।

अगले दिन फौज़िया ने वकील शार्प को फोन करके कहा, “मैम, मैं इन एफ.बी.आई. वालों से बड़ी तंग आ चुकी हूँ। जिस अस्पताल में मैं काम करती थी, उन्होंने एफ.बी.आई. के चक्कर में मुझे नौकरी से निकाल दिया। अब मुझे कहीं ढंग की नौकरी नहीं मिल रही। मैं यहाँ से चले जाने के बारे में सोच रही हूँ।“

“मिस फौज़िया, यह तो तेरी मर्ज़ी है। तुझे कोई यहाँ जबरन रोक नहीं सकता। तेरे पर केस भी कोई दर्ज़ नहीं हुआ। इसलिए तू जाने के लिए आज़ाद है। दूसरा इस्मत सद्दीकी को भी अपने मुल्क में ले जाकर तुम्हें उसका अच्छा इलाज करवाना चाहिए।“ इशारे से वकील ने कह दिया कि अच्छा है कि इस्मत यहाँ से चली जाए। अगले ही दिन माँ-बेटी दोनों ही वापस जाने की तैयारियाँ करने लगीं और दो दिन बाद वह पाकिस्तान पहुँच गईं।

इन्हीं दिनों आई.एस.आई. की पूरी टीम आफिया के पहले पति अमजद के घर पहुँची।

“मि. अमजद, तुझे हमारी मदद करनी पड़ेगी। हम आफिया को पकड़ने की योजना बना रहे हैं।“

“कहाँ है आफिया ? क्या मेरे बच्चे भी उसके पास हैं ?“ अमजद ने उत्साह से आई.एस.आई. के अफ़सर से पूछा।

“यह नहीं पता, पर तुम्हें हमारे साथ चलना पड़ेगा।“

“साथ चलना पड़ेगा ? पर कहाँ ?“

“इस बात का पता भी वहीं चलकर लगेगा। अब तू चलने के लिए तैयार हो।“

इसके पश्चात आई.एस.आई. वालों ने अमजद को संग लिया और कराची एअरपोर्ट पर पहुँच गए। वह वहाँ खड़े हो गए जहाँ जहाज की सवारियाँ उतरकर आ रही थीं। करीब आधे घंटे के बाद आई.एस.आई. वालों ने अमजद से कहा कि सामने जो औरत आ रही है, वह उसको पहचाने और बताए कि क्या यही आफिया सद्दीकी है। अमजद ने ध्यान से सामने से आ रही औरत की ओर देखा। उसका सारा शरीर लम्बे बुर्के से ढका हुआ था। अमजद ने उसकी आँखें देकर नब्बे प्रतिशत अंदाजा लगा लिया कि यह आफिया ही है। उसके साथ चले रहे बच्चे को भी अमजद ने पहचान लिया कि वह उसका ही बेटा है। एकबार तो वह बहुत ही भावुक हो गया। पर साथ ही उसने सोचा कि यदि उसने आई.एस.आई. वालों को बता दिया कि उसे लगता है कि यही आफिया है तो वे उसको तुरंत गिरफ्तार कर लेंगे। लेकिन उसके अंदर का अमजद यह नहीं सहन कर सकता था। उसने सिर मारते हुए कह दिया कि यह आफिया नहीं है।

उधर, आफिया के मामा एस.एच. फारूकी को भी आई.एस.आई. तंग करने लग पड़ी तो उसने दौड़-भाग करके बमुश्किल अपना पीछा छुड़वाया। फौज़िया और उसकी माँ पाकिस्तान में आकर अपने घर में रहने लग पड़ी थीं। इसी बीच उन्हें फोन आने शुरू हो गए कि या तो वे आफिया के मामले में चुप हो जाएँ, नहीं तो उनका हाल भी उसके जैसा होगा। इसके बाद माँ-बेटी दोनों ने आफिया को लेकर बातें करनी बंद कर दीं। साथ ही, उन्होंने भी मीडिया से विनती की कि वे आफिया का मामला न उठाएँ। मीडिया ने तो क्या मानना था अपितु उन्हें एक और ख़बर मिल गई कि आई.एस.आई. सद्दीकी परिवार को तंग कर रही है। एकबार फिर से लोगों में आफिया का नाम चर्चा का विषय बन गया।

जो कुछ हो रहा था, अमजद बड़े ग़ौर से सब देख रहा था। वह चाहता था कि बस एकबार वह अपने बच्चों को देख ले। पर यह मुमकिन न हो सका। एक दिन वह अपने पिता को संग लेकर उनके उसी आई.एस.आई. के रिटायर्ड अधिकारी दोस्त से मिलने पहुँचा जिसने उसकी आई.एस.आई. से इंटरव्यू करवाकर उसको क्लियरेंस दिलवाई थी। वह अफ़सर अमजद को सलाह देते हुए बोला, “अच्छा यही रहेगा कि तुम यहाँ से कहीं दूसरी जगह चले जाओ। यहाँ किसी का कोई भरोसा नहीं कि क्या करवा दे। तुम प्रेज़ीडेंट मुशरफ का उदाहरण ले लो। वह अमेरिका को खुश करने के लिए किसी को भी उनके हवाले कर देता है। मेरे कहने का अर्थ है कि कई ऐसे व्यक्ति भी उसने अमेरिका को सौंप दिए जिनका गुनाह इतना बड़ा नहीं था कि उन्हें बेगाने देश के हवाले किया जाता। कई तो सिर्फ़ पूछ-पड़ताल तक ही सीमित थे। पर इसने सभी पर अलकायदा सदस्य होने का लेबल लगाकर गिरफ्तार किया और एफ.बी.आई. के हवाले कर दिया।“

उसकी बातें सुनकर पिता-पुत्र चिंतित हो गए। कुछ देर बातें करके वे वापस लौटने लगे तो वह अजमद के पिता को एक तरफ ले गया। फिर धीमे स्वर में बोला, “नईम खां, तुम्हें एक भेद की बात बताता हूँ।

“जी।“

“तुम्हें याद होता कि कुछ समय पहले के.एस.एम. का भान्जा अली और एक अन्य आतंकवादी पकड़े गए थे। दूसरे आतंकवादी पर चार्ज है कि उसने अमेरिकी समुद्री यू.एस.एस. कोहल नामी बेड़े पर हमला किया था।“

“जी हाँ, याद है मुझे वो घटना।“

“तो फिर तुम्हें यह भी याद होगा कि उस दिन उनकी पुलिस के साथ फायरिंग हो गई थी और उन्होंने वहाँ फंसे हुए किसी बच्चे को बाहर निकालने के लिए कुछ देर के लिए फायरिंग रुकवाई थी। बाद में आई.एस.आई. का हथियारबंद दस्ता भी वहाँ पहुँच गया था।“

“हाँ जी, बिल्कुल। बाद में पता चला था कि आई.एस.आई. ने उस बच्चे को अपने कब्ज़े में कर लिया था।“

“हाँ-हाँ, वहीं घटना। पर क्या तुम्हें पता है कि वह कोई बच्चा नहीं था बल्कि एक औरत थी ?“

“जी नहीं, यह तो नहीं पता। पर फिर वो औरत कौन थी ?“

“वह तुम्हारे बेटे की पहली बीवी आफिया ही थी।“

“हैं ! यह तुम क्या कर रहे हो ?“

“यह बिल्कुल सही है। वह अलकायदा की बहुत ही सक्रिय मेंबर है। साथ ही, वह बहुत ज्यादा ख़तरनाक भी है। इसीलिए कह रहा हूँ कि तुम अपने बेटे को कहीं बाहर भेज दो। कल अगर वह फिर पकड़ी गई और उसने कहीं अमजद का नाम ले दिया तो इसकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी।“

“पर जनाब एक बात और...।“ नईम खां कोई दूसरी बात शुरु करता करता रुक गया।

“हाँ, बताओ तुम क्या कहना चाहते हो ?“

“तभी पता लगा था कि आफिया एकबार आई.एस.आई. द्वारा पकड़ ली गई थी। पर क्या वह फिर से छोड़ दी गई ? मेरा मतलब यह सब क्या है ?“

“ये दोनों बातें सहीं है। लेकिन यह एजेंसियों के काम करने का ढंग होता है, तुम इस बात के पीछे न जाओ। बस, अमजद का कुछ सोचो।“

“जी, बहुत बेहतर जनाब। मैं सब समझ गया।“

बात समाप्त करके नईम खां बाहर खड़े अमजद के साथ कार में आ बैठा। घर तक वह अपने दोस्त की कही बात के विषय में ही सोचता रहा। घर आकर उसने अमजद को समझाया कि उसको चाहिए कि अब अतीत का पीछा छोड़कर भविष्य के बारे में सोचे। अमजद भी आफिया की तलाश से ऊब चुका था। पिता की बात से सहमत होते हुए उसने अपनी ज़िन्दगी को आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया। उसका नाम एफ.बी.आई. की वांटिड लिस्ट में से उतर चुका था। इसलिए उसने पाकिस्तान छोड़ने का निर्णय करते हुए सउदी अरब के किसी अस्पताल में नौकरी कर ली। वह अपनी नई दुल्हन और छोटी-सी बच्ची को लेकर सउदी अरब चला गया।

(जारी…)
 
15

(दूसरा भाग)

इस्मत और फौज़िया अपने घर तक सीमित होकर रह गई थीं। वे भयभीत-सी किसी के साथ आफिया को लेकर बात भी नहीं करती थीं। इसके अलावा उनके घर की आई.एस.आई. निगरानी करती रहती थी। कभी उन्हें गुप्त फोन आते थे कि आफिया के बारे में बात नहीं करती, नहीं तो उनका हश्र भी आफिया जैसा ही होगा। ऐसे समय उन्हें लगता कि आफिया इस दुनिया में नहीं है। फिर अगले ही दिन कोई फोन आ जाता कि आफिया जहाँ कहीं भी है, वो ठीक है, तुम उसकी चिंता न करो। ऐसा फोन सुनकर उन्हें लगता कि आफिया जिन्दा है। इसी दुविधा में ही दिन, महीने, सालों में बदल गए, पर उन्हें कभी आफिया का कोई सुराग नहीं मिला। एक दिन इस्मत ने अपने पुत्र मुहम्मद को ह्यूस्टन में फोन करते हुए कहा, “बेटा, बता हम क्या करें। हमारे पास तो कोई घर का सदस्य भी नहीं है। तुझे बता नहीं सकती कि हम डर के साये में कैसे दिन बिता रहे हैं।“

“अम्मी, मैं यह बात समझ सकता हूँ। पर क्या किया जाए।“

“बेटा, मैं चाहती हूँ कि तू भी यहीं पाकिस्तान ही आ जा। कहीं यह न हो कि तुझे भी अमेरिकी सरकार किसी केस में फंसा लें।“

“नहीं अम्मी, ऐसा नहीं होगा। मैं कभी भी किसी गलत लोगों के साथ नहीं जुड़ा। हमेशा अपने काम से काम रखा है। इस कारण मुझे यहाँ कोई खतरा नहीं है।“

“फौज़िया के साथ भी तो यही कुछ हो चुका है। वह जहाँ कहीं भी नौकरी करने लगती थी, एफ.बी.आई. वाले वहीं पहुँच जाते थे। आखि़र, उसको अमेरिका छोड़ना पड़ा।“

“अम्मी, मेरे और फौज़िया में फर्क़ है।“

“वह कैसे ?“

“तुझे पता ही है कि आफिया फौज़िया के पास रहती रही है। आफिया की कई चैरिटियों के पते फौज़िया के घर के थे। फौज़िया हालांकि किसी बात से संबंधित नहीं थी, पर यह आफिया से जुड़ी रही है। यही कारण है कि एफ.बी.आई को हमेशा शक रहता था कि कभी न कभी आफिया उसके साथ अवश्य संबंध कायम करेगी। इसीलिए इसका हर वक्त पीछा किया जाता था, पर मुझे उसके बाद कभी कोई तकलीफ़ पेश नहीं आई।“

“फिर बेटा, तू ही बता कि हम माँ-बेटी किधर जाएँ। अमेरिका में हमको एफ.बी.आई. नहीं टिकने देती थी। यहाँ पाकिस्तानी सरकार चैन से नहीं रहने देती। आई.एस.आई. सारा दिन अपने घर के इर्द-गिर्द घूमती फिरती है। रोज़ गुप्त फोन आते रहते हैं। पता नहीं हमारा क्या बनेगा ?“ इतना कहते हुए इस्मत रोने लगी। उसके बेटे का मन भर आया।

“अम्मी, तू रो न। इस तरह तो मसला हल नहीं हागा।“

“बेटा, तू कौन से मसले की बात करता है। हमारी ज़िन्दगी नरक बनकर रह गई है। तू भी हमको भूल चुका है।“

“अम्मी, ऐसी बात नहीं है। मैं बताओं कर ही क्या सकता हूँ।“

“बेटा, आफिया तेरी भी माँ-जाई बहन है। तू ही उसको कहीं तलाशने की कोशिश कर।“

“अम्मी, पहले कौन सा हमने कम खोज की है। पर वह कहीं मिले भी।“

“मुहम्मद बेटा, तू एकबार फिर से हिम्मत कर। मेरा दिल कहता है कि वह कहीं आसपास ही है।“

“अम्मी, मेरी अपनी नौकरी है। और फिर मेरे भी बाल-बच्चे हैं। मैं ऐसे कैसे कहीं जा सकता हूँ। तुझे पता ही है कि पहले भी मेरे घर में क्या हुआ था।“

असल में, मुहम्मद की बीवी आफिया का जिक्र छिड़ते ही झगड़ा करने बैठ जाती थी। उसका कहना था कि उसकी वजह से ही पूरा परिवार परेशान हो रहा है।

“बेटा, कैसे भी कर। कोई बात नहीं, तू अपनी बीवी का गुस्सा एकबार और झेल ले। अगर मेरी बेटी का कोई पता ठिकाना न लगा तो मैं तो पागल हो जाऊँगी।“

“ठीक है अम्मी, मैं देखता हूँ कि मैं क्या कर सकता हूँ। पर एक बात है कि यहाँ एक उजे़र पराचा नाम के लड़के पर आतंकवाद संबंधी केस शुरू होने वाला है। मुझे लगता है कि उसके केस में ज़रूर आफिया का जिक्र आएगा। शायद इस तरह ही कोई पता चल जाए।“

“ठीक है, तू मुझे इस बारे में जल्दी बताना।“ इस्मत ने फोन काट दिया।

उज़ेर पराचा के केस का उन दिनों अख़बारों में खूब हो-हल्ला हो रहा था। के.एस.एम. से लेकर अब तक पकड़े गए बंदियों में सबसे पहले मुकदमा उज़ेर पराचा पर चला। न्यूयाॅर्क की कोर्ट में उसने वही बयान दिया जो उसने पहले एफ.बी.आई. के सामने दिया था। उसने कहा कि न ही उसको अलकायदा के बारे में कोई पता था और न ही उनके किसी प्लाट के बारे में। उसने कोर्ट को बताया कि उसने सिर्फ़ मजीद खां की एप्लीकेशन इमीग्रेशन को भेजी थी और दूसरा उसने मजीद खां बनकर इमीग्रेशन को फोन किया था। वह सोचता था कि उसका इतना ही जुर्म है कि उसने इमीग्रेशन को झूठ बोला। पर उसका वकील सब समझता था। वकील ने गवाहों आदि को अदालत में पेश करने की मांग की। लेकिन सरकारी वकील यह सब नहीं होने देना चाहता था। क्योंकि गवाह तो अफगानिस्तान के उजाड़ इलाकों की किन्हीं जेलों के अंदर बंद थे। गवाहों से उसका मतलब था - के.एस.एम., उसका भान्जा अली या मजीद खां। सरकार डरती थी कि यदि इन गवाहों को अदालत में पेश करना पड़ा तो बहुत सारे गुप्त भेद बाहर आ जाएँगे। उजे़र का वकील सरकार के डर को समझ गया। उसने सरकार से कहा कि या तो गवाहों को अदालत में पेश किया जाए, या फिर प्ली बारगेनिंग की इजाज़त दी जाए। सरकार ने भी प्ली बारगेनिंग के बारे में सोच लिया। वकील ने उज़ेर को गिल्टी प्ली कर देने के लिए समझाया और बताया कि इस तरह सरकार के साथ डील हो जाएगी और वह सज़ा कम कर देगी। परन्तु उज़ेर उसकी बात नहीं माना। उसका सोचना था कि सिर्फ़ किसी अन्य के नाम पर इमीग्रेशन को फोन कर देने की कितनी सज़ा हो सकती है। दूसरी बात यह भी थी कि उसको जो वकील मिला था, वह सरकार द्वारा दिया गया था। इस कारण उज़ेर उस पर पूरा भरोसा नहीं कर रहा था। वह छोटी आयु का भोला-सा लड़का था और न ही वह इस किस्म के कानूनी पचड़ों में कभी पड़ा था। यही कारण था कि वह उस वक्त मौके की नज़ाकत नहीं समझ सका और यह न जान सका कि वह कितने बड़े चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। उसने गिल्टी प्ली करने से इन्कार कर दिया। केस चला तो ज्यूरी ने उसको दोषी साबित करते हुए उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी।

यह केस बंद डिब्बे की तरह बंद ही रह गया तो मुहम्मत मायूस हो गया। उसकी आफिया के बारे में कुछ पता लगाने की उम्मीद अधूरी रह गई। उसको भी आफिया की बहुत चिंता थी। साथ ही, माँ और फौज़िया की भी। पर उसके घर के हालात इजाज़त नहीं देते थे कि वह नौकरी छोड़कर इधर-उधर भटकता फिरे। वह कई दिन उदास रहा। फिर उसने अपनी पत्नी के साथ बात की। आहिस्ता आहिस्ता उसने पत्नी को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह बस एकबार आफिया की तलाश के लिए जाएगा। लौटकर कभी वह इस मामले में नहीं पड़ेगा। नौकरी पर से छुट्टी लेकर वह पाकिस्तान जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने माँ और फौज़िया के साथ आगे की योजना बनाई। फै़सला हुआ कि वह अपने मामा फारूकी की मदद ले। अगले दिन वह इस्लामाबाद चला गया। फारूकी भी इस मामले में पड़कर अब तक बहुत मुसीबतें झेल चुका था। पर वह सोचता था कि आफिया उसकी सगी भान्जी है। अगर वह मदद नहीं करेगा तो और कौन करेगा। आखि़र विचार-विमर्श के बाद उसने मुहम्मद से कहा, “यहाँ एक जहीर खां नाम का आदमी है, वह शायद अपनी कोई मदद कर सके। पर...।“ फारूकी बात करता करता चुप हो गया।

“पर क्या अंकल ?“ मुहम्मद ने उसकी चुप तोड़ी।

“बात यह है कि यहाँ एक संगठन बना है जिसका मुख्य मकसद गुम हो चुके व्यक्तियों को तलाश करना है। जहीर खां उस संगठन का मुखिया है। पर साथ ही यह भी सुना है कि यह व्यक्ति पहले आई.एस.आई का अधिकारी रह चुका है।“

“फिर क्या है अंकल। हमें तो पता ही लगवाना है कि शायद इन्हें आफिया के बारे में कुछ मालूमात हो।“

“बेटा, बात यह है कि आई.एस.आई. के लफड़ों से हर कोई डरता है। क्या पता कि यह जहीर खां नाम का आदमी दिखावे के तौर पर ही गुमशुदा लोगों की तलाश में लगा हो और असल खेल इसका कुछ और ही हो।“

“अंकल, दूसरी कोई राह भी तो नहीं है। पता नहीं, अपने मुल्क को क्या हो गया है कि किसी पर भरोसा ही नहीं किया जा सकता। कौन किसके लिए काम कर रहा है, कुछ पता नहीं। सरकार के आदमी सरकार के बीच रहते हुए आतंकवादियों की मदद कर रहे हैं। उधर आतंकवादी गवर्नमेंट की मदद करने में लगे हुए हैं। मैं तो ऐसी बातें सुन सुनकर ऊब चुका हूँ। अगर मेरी अपनी बहन का मसला न हो तो मैं इस मुल्क में एक पल भी न रुकूँ।“

“ठीक है, फिर तू जहीर खां से मिलकर देख ले। शायद बात किसी राह लग जाए। वैसे उससे सावधान रहना। मेरा अर्थ है कि अपने बारे में अधिक बात न करना। बस, बात आफिया तक ही सीमित रखना।“

“ठीक है अंकल, आप मुझे उसका पता ठिकाना ला दो। फिर मैं देखता हूँ कि आगे क्या करना है।“

अगले दिन फारूकी ने मुहम्मद को जहीर खां का अता-पता ला दिया। उसने फोन करके उससे यह कहते हुए मुलाकात के लिए वक्त मांगा कि वह अपने किसी सरकार द्वारा गुम कर दिए गए रिश्तेदार के बारे में मालूम करना चाहता है। उसको शाम का वक्त मिल गया। शाम के समय वह जहीर खां के दो मंज़िला घर में दाखि़ल हुआ। यह रोज़ों के दिन थे। उसके घर में बहुत सारे लोग रोज़ा खोलने के लिए इकट्ठे हुए बैठे थे। रोज़ा खोलने के बाद जहीर खां ने मुहम्मद को अपने कमरे में बुला लिया। उसने मुहम्मद की ओर ग़ौर से देखा और फिर धीमे से बोला, “बरखुरदार, तुम किस बात के सिलसिले में मुझसे मिलने आए हो ?“

“जी, मैंने फोन पर भी बताया था कि मेरी बहन गुम है। उसको गुम हुए काफी समय बीत गया है। उसके बारे में जगह-जगह पता करता घूम रहा हूँ।“

“क्या नाम है तेरी बहन का ?“

“जी उसका नाम आफिया सद्दीकी है।“

“हैं ! आफिया सद्दीकी ?“ जहीर खां ऐसे बोला जैसे बिच्छू ने डंक मारा हो। फिर वह धीरे धीरे संभल गया। मुहम्मद भी हैरान हुआ कि आफिया का नाम सुनकर यह ऐसे क्यों चैंक उठा। दीवार की ओर देखता जहीर खां बोला, “मैंने तो यह नाम ही पहली बार सुना है। मुझे इस लड़की के बारे में कोई पता नहीं है। किसी दूसरे के बारे में बात करनी है तो बता ?“

“मुझे मेरी बहन के अलावा दूसरे किसी से कोई सरोकार नहीं है।“

“ये सारी औरतों को देख रहा है ?“ जहीर खां ने सामने इशारा करते हुए बात दूसरी ओर मोड़ ली।

“जी।“ मुहम्मद उतावला-सा होता बोला।

“इन सभी ने कोई न कोई खोया है। किसी का घरवाला जिहाद में शहीद हो गया। किसी का पुत्र अफगानिस्तान की जंग की बलि चढ़ गया। पता नहीं, कितनें घरों के सदस्य आई.एस.आई. खा गई। यहाँ हर कोई अपने खोये हुओं को तलाशता फिरता है।“

“जी, वह सब तो ठीक है, पर इस बात से मेरा क्या ताल्लुक है। मुझे तो पता चला था कि आपका संगठन आई.एस.आई. या अमेरिकी एफ.बी.आई. द्वारा उठाकर गुम कर दिए गए लोगों की तलाश करने में मदद करता है। बस, इसी कारण मैं आपके पास आया हूँ।“

“तू ऐसा कर, अपना पता-ठिकाना दे और कल को यहीं पर मुझसे मिलना। मैं तुझे अपने आगे के किसी लीडर से मिलवाऊँगा। वह शायद तेरी बहन को खोजने में कोई मदद कर सके।“

“जी, ठीक है। पर एक सवाल है जो इजाज़त हो तो...?“

“हाँ बोलो।“

“ये गुमशुदा लोगों की तलाश आप कानूनी ढंग से करते हैं ? मेरा मतलब अदालत में पेटीशन वगै़रह डालकर करते हैं कि वैसे ही अपने तौर पर ?“

“हमारा कोई भी ढंग हो। तुम्हें अपने काम तक मतलब रखना चाहिए। तू कल आ जाना।“ इतना कहते हुए जहीर खां उठकर चला गया और मुहम्मद घर लौट आया। फारूकी भी उसके साथ कराची ही आ गया था, इसलिए जब मुहम्मद घर लौटा तो वह भी घर में ही था। उसने घर आकर जहीर खां से हुई बातचीत बताई तो फारूकी बोला, “मैं तो तुझे पहले ही वहाँ भेजकर राज़ी नहीं था। मुझे आज ही एक और बात का पता चला है।“

“वह क्या ?“

“अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल गुम हो जाने से पहले इसी जहीर खां के घर गया था। उसके बाद उसकी लाश ही मिली थी।“

“ओह माय गॉड ! यह सब क्या हो रहा है। ये लोगों को खोजने में मदद कर रहे हैं कि लोगों को गुम करने में लगे हुए हैं। आप बता रहे थे कि ये आदमी आई.एस.आई. में पहले कोई अफ़सर रहा है, पर मुझे शक होता है कि यह अलकायदा के साथ भी जुड़ा हुआ है।“

“बस, चुप ही भली।“

“अंकल, आफिया को पाकिस्तान का बच्चा बच्चा जानता है और वह कहता है कि उसने तो यह नाम कभी सुना ही नहीं।“

“पता नहीं सरकार क्या खेल खेल रही है। किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा। पिछले दिनों गुम हुए लोगों के कई परिवारों ने इकट्ठा होकर सुप्रीम कोर्ट में पेटीशन डाली थी। चीफ़ जस्टिस इफ्तिखार चैधरी ने यह पेटीशन मंजूर करते हुए कार्रवाई शुरु भी कर दी थी। उसके कई अच्छे नतीजे भी आए थे। क्योंकि जस्टिस चैधरी ने सफाई देने के लिए हुक्मरानों को अदालत में बुलाना शुरु कर दिया था। अधिक दबाव पड़ने पर आई.एस.आई. ने बहुत सारे लोग छोड़ भी दिए थे। पर सबको डरा-धमकाकर छोड़ा गया था कि यदि बाहर जाकर किसी से कोई बात की तो दुबारा पकड़ लिए जाओगे। आखि़र लोगों की यह उम्मीद भी खत्म हो गई।“

“वह क्यों ?“

“क्योंकि पहले तो प्रैज़ीडेंट मुशर्रफ़ ने चीफ़ जस्टिस चैधरी पर दबाव डाला कि वह यह पेटीशन वाला काम बंद कर दे, पर जब वह नहीं माना तो मुशर्रफ़ ने उसको मुअŸाल कर दिया।“

“भाईजान, तब कुछ उम्मीद बंधी थी कि शायद चीफ़ जस्टिस चैधरी के हुक्म से हो रही इंकुआरियाँ के कारण ही कहीं आफिया का भेद खुल जाए। पर तभी दुष्ट मुशर्रफ़ ने यह कर डाला।“ चुप बैठी इस्मत भी बातचीत में हिस्सा लेने लगी।

“आपा बात यह है कि अपने हुक्मरान अमेरिका के इशारों पर नाचते हैं। जैसा वह कहता है, वैसा ही करते हैं। अमेरिका नहीं चाहता कि उसकी गुप्त जेलों में बंद किए लोगों के बारे में बाहर के लोगों का पता चल। इसी कारण उसने मुशर्रफ़ से कहकर चीफ़ जस्टिस चैधरी को ही एक तरफ करवा दिया।“

“अमेरिका तो अपने दूसरे भरोसेमंद चमचों को भी आगे लगाने लगा था, पर उसको अल्लाह ने खुद ही सज़ा दे दी।“

“तुम किसकी बात करते हो ?“

“बेनज़ीर की, और किसकी। भुट्टो की लाडली आई थी, यहाँ शांति स्थाति करने। सारा मुल्क चुनकर खा गई और फिर कहने लगी कि मैं मुशर्रफ़ के साथ मिलकर सरकार बनाऊँगी। पर यह नहीं पता कि इन्साफ तो तेरा इंतज़ार कर रहा है। दो महीने भी नहीं निकले कि उन्होंने जहन्नुम का टिकट काट दिया।“

“पता नहीं इस मुल्क का कया होगा। पहले ही चीफ़ जस्टिस चैधरी के मुअत्तल होने वाले मसले के कारण हर तरफ धरने-प्रदर्शन हो रहे हैं। फिर फौज लाल मस्जिद में जा घुसी। वहाँ सैकड़ों लोग मारे गए। उसके बाद बेनज़ीर भुट्टो वाला हादसा हो गया।“

“तुम राजनीति की बातें छोड़ो। हम आफिया के बारे में कुछ सोचें।“

“आपा, हम उस दिन के एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठे जब से आफिया गुम है। पर शायद अल्लाह को मंज़ूर ही नहीं कि उसका कोई पता लगे।“ फारूकी ने बहन के दिल को ढाढ़स दिया।

“सुना है कि अमेरिकियों ने अफगानिस्तान में बहुत ही बुरी जेलें बनाई हुई हैं। जहाँ हर रोज़ बेकसूरों को अमानवीय यातनाएँ दी जाती हैं। पता नहीं मेरी बेटी किन कोठरियों में मौत की घड़ियाँ गिन रही होगी।“ इस्मत रोने लगी।

“आपा तू यह रोना-धोना बंद कर। इससे कोई मसला हल नहीं होने वाला।“

“भाईजान, फिर कुछ न कुछ करो। इस तरह बातें करते तो सालों के साल बीत गए हैं।“

“आपा तू ही बता कि क्या करें ? क्या है अपने हाथ में ?“ फारूकी का भी दिल भर आया और उसने जेब में से रूमाल निकालते हुए आँसू पोंछे।

“भाईजान, तुम वॉन रिडली का शो देखा करते हो ?“ इस्मत ने बात बदली।

“यह कौन है ?“

“यह कोई इंग्लैंड की औरत है। क्रिश्चियन से मुसलमान बनी है। यह एक टी.वी. शो चलाती है। इसका मुख्य मुद्दा मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार होता है। खास तौर पर टैरेरिज़्म की आड़ में आम मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार।“

“अच्छा !“

“हाँ। पिछले हफ़्ते के प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य था - अफगानिस्तान की भयंकर गुप्त जेलों में छिपा कर रखे गए निर्दोष लोग। जिनके खिलाफ़ कोई केस नहीं बनता। उन गरीबों की कहीं सुनवाई नहीं हाती और वे इसी तरह जुल्म न सह पाने की वजह से मौत की गोद में जा पड़ते हैं। क्योंकि उनकी कहीं गिरफ्तारी भी नहीं दिखाई गई होती, इसलिए वे दुनिया के लिए रहस्य बने रह जाते हैं।“

“तुम्हारा मतलब...।“ फारूकी ने ग़ौर से इस्मत की ओर देखा।

“हाँ-हाँ, मैं वही बात करने जा रही हूँ। पिछले हफ़्ते उसने आफिया का मुद्दा उठाया था। उसके प्रोग्राम में कोई मुअज़म बेग नाम का आदमी आया था। वह बता रहा था कि उसको भी शक के आधार पर पकड़ा गया था। उसको अफगानिस्तान की किसी गुप्त जेल में रखा गया था। उस पर अमानवीय अत्याचार हुआ। पर जो खास बात उसने बताई, वह यह थी कि उसको हर रोज़ किसी औरत की चीखें सुनाई देती थीं। मानो किसी पर जु़ल्म ढाया जा रहा हो और वह उसको सहन न कर पाने के कारण चीखती चिल्लाती हो। यह हर रोज़ का काम था। वह जितने समय वहाँ रहा, ये चीखें सुनता रहा।“

इस्मत बात करते करते चुप हो गई और उसने अपनी आँखें पोंछ लीं। पर किसी ने बोलकर उसकी बात में विघ्न डालना उचित नहीं समझा। वह फिर से बोलने लगी, “बेग ने बताया कि वह कई बार उसको कै़द में रखने वालों से पूछता कि यह औरत कौन है जो विलाप कर रही है। पर वह हमेशा कह यह कहकर टाल देते कि यह तो टेपों में भरी हुई आवाज़ है जो कि उसको सिर्फ़ डराने के लिए इस्तेमाल की जाती है। पर असलियत कुछ और थी...।“ वह ज़रा रुकी और फिर बोलने लगी।

“उसको किसी ने एक दिन लोकल अफगानी पुलिस वाले ने बताया कि यह कोई टेप वगै़रह नहीं है। यह असली औरत है जो कि साथ वाली कोठरी में बंद है। इस औरत के पहनने वाले कपड़ों पर कै़दी नंगर 650 लिखा हुआ है। उसकी हर रोज़ इंटैरोगेशन होती है और तभी वह रोती-चिल्लाती है। फिर मुअज़म बेग ने एक दिन उस औरत का चेहरा भी देख लिया।“

“अच्छा ! क्या वह उसको पहचान सका ?“ फारूकी ने उत्साह से पूछा।

“तब तो उसने क्या पहचानना था। पर उसी प्रोग्राम पर रिडली ने उसके सामने आफिया की फोटो कर दी और पूछा कि क्या वह इस लड़की जैसी लगती थी। इस पर वह झट बोला, हाँ यह फोटो उसी लड़की की है।“

इसके वहाँ कोई न बोला। सभी सुन्न हो गए। इस्मत ने लम्बी आह भरी और अपनी बात आगे शुरु की।

“इतना ही नहीं, फिर रिडली ने उन पाँचों तालिबानों के साथ हुई इंटरव्यू दिखाई जो कि बैगराम शहर की उसी जेल में से भागने में कामयाब हो गए थे। उन्होंने अपनी इंटरव्यू में माना था कि उन्होंने ने भी उस औरत की चीखें सुनी थीं। बाद में उसको देखा भी था। उनके मुताबिक वह 650 नंबर की कै़दी आफिया सद्दीकी ही थी।

इस्मत ने बात ख़त्म की तो काफ़ी देर सभी चुप बैठे रहे। फिर फारूकी बोला, “आपा तू ही बता, फिर आफिया को अब कहाँ खोजें ?“

“बात तो भाईजान मैं भी समझती हूँ, पर किसी पर एतबार ही नहीं आता। क्या पता, कौन सही है। लगता है कि हो सकता है, वॉन रिडली झूठी हो और अपना शो बेचने के लिए यह सब कर रही हो।“

“आपा यह बहुत बड़ी परेशानी है। पता नहीं, आगे क्या होने वाला है।“

वे बातें कर ही रहे थे कि फोन बजने लगा। इस्मत ने आगे बढ़कर फोन उठा लिया। उधर से बग़ैर अपना नाम बताये कोई बोलने लगा, “तुम फिर आफिया को खोजना शुरु कर दिया। क्या तुमको चैन की ज़िन्दगी जीना अच्छा नहीं लगता ?“

“नहीं जी, ऐसी तो कोई बात नहीं है। पर आप कौन हैं ?“

“तेरा बेटा अमेरिका से चलकर यहाँ आफिया को खोजने आया है। अच्छा यही है कि वह वापस चला जाए। नहीं तो इसकी ख़ैर नहीं।“

“कहाँ है मेरी बच्ची ? क्या तुम उसके बारे में कुछ बता सकते हो ?“ इस्मत तड़पकर बोली।

“वो ठीकठाक है। उसको कोई खतरा नहीं है। पर यदि तुम उसको तलाशने वाला सिलसिला बंद नहीं करोगे तो ज़रूर उसकी ज़िन्दगी को खतरे में डाल दोगे। साथ ही, अपनी ज़िन्दगियों को भी बर्बाद करवाओगे।“ इतना कहकर उधर से फोन काट दिया गया।

“कौन था ?“ फारूकी उठकर इस्मत के पास आ गया।

“वहीं धमकियों वाला सिलसिला शुरु हो गया है। कहते हैं कि अगर आफिया की भली चाहते हों तो अपने बेटे को कह दो कि वापस अमेरिका चला जाए।“

इस बात के उŸार में फारूकी ने कहा तो कुछ नहीं, पर उसको जहीर खां याद आ गया। वह कुछ देर चुप रहकर बोला, “आपा मैं एक बात कहना चाहता हूँ।“

“जी भाईजान, बताओ क्या बात है ?“

“मेरा ख़याल है कि मुहम्मद को वापस अमेरिका लौट जाना चाहिए। कहीं एक काम ठीक करते करते किसी नए लफड़े में न फंस जाएँ।“

“भाईजान, तुम्हारी बात मुझे बिल्कुल ठीक लगती है। मैंने यूँ ही भावुक होकर इसको यहाँ बुला लिया। अब मैं सोचती हूँ कि जितनी जल्दी हो सके, इसको वापस लौट जाना चाहिए।“

“अगर यह बात है तो मैं कल ही इसकी टिकट का प्रबंध करवा देता हूँ।“

फिर उनकी इस बात पर सहमति हो गई। अगले दिन फारूकी ने टिकट का पता करवाया। दो दिन बाद की उनको सीट मिल गई। अगले दो दिन वे अन्य कई बड़े व्यक्तियों से मिले और आफिया के बारे में पता किया। पर उसका कोई पता न चला। तीसरे दिन फारूकी, मुहम्मद को कराची के एअरपोर्ट पर अमेरिका की फ्लाइट पर चढ़ा आया। इसके बाद वह वापस इस्लामाबाद चला गया। अगले कई दिन वह बड़ा अपसैट रहा। फिर नित्य की भाँति ज़िन्दगी ने अपनी रफ्तार पकड़ ली।

उधर लोगों में आफिया का मामला ठंडा पड़ता जा रहा था, क्योंकि अब वहाँ चीफ़ जस्टिस चैधरी को बहाल करवाने की मुहिम तेज़ हो गई थी। यह ऐसे ही होता था। जब कभी आफिया की बात मीडिया में आने लगती तो लोगों का रोष जाग उठता और वे सड़कों पर निकल आते, पर तभी कोई अन्य मुद्दा सामने आ जाता तो लोग उधर से हट जाते। वैसे भी बहुत कम पाकिस्तानी लोगों को पता था कि आई.एस.आई. अथवा एफ.बी.आई. आफिया के पीछे इस तरह क्यों हाथ धोकर पड़ी हुई है। या फिर यदि वह उनकी हिरासत में है तो भी यह मामला क्या है। आम लोगों को इस बात का भी पता नहीं था कि वह के.एस.एम. के भान्जे अली की दूसरी बीवी है। इस बलोची परिवार का पूरा किस्सा भी लोगों को मालूम नहीं था। आफिया अमेरिका रहकर क्या करती रही या यहाँ आकर किस किस्म की कार्रवाइयों में हिस्सा लेती रही या उसका जिहाद की ओर झुकना, ऐसी किसी भी बातों का लोगों को पता नहीं था। लोग समझ रहे थे कि एक दुखियारी औरत को दुनिया की सुपर पावर अमेरिका तंग कर रहा है। इसी कारण लोगों को आफिया सद्दीकी से हमदर्दी थी।

(जारी…)
 
16

वर्ष 2008 में जनवरी महीने के एक दिन एस.एच. फारूकी पाकिस्तान में अपने घर बैठा टी.वी. देख रहा था। दोपहर के समय उसके घर की डोर बेल बजी तो उसकी बेगम ने दरवाज़े से बाहर झांका। किसी अज़नबी को बाहर खड़ा देख उसने इस बारे में पति को बताया। फारूकी टी.वी. की आवाज़ कम करते हुए बाहर आया। उसने दरवाज़ा खोला तो सामने टैक्सी ड्राइवर खड़ा था। टैक्सी ड्राइवर ने कहा कि उसकी टैक्सी में एक औरत बैठी है जो आपसे मिलना चाहती है। फारूकी हैरान होता हुआ टैक्सी के पास आया और अंदर देखने लगा।

“अंकल मैं हूँ।“ इस आवाज़ ने फारूकी के रौंगटे खड़े कर दिए। बेशक औरत ने अपने आप को बुर्के में लपेट रखा था, पर यह कैसे हो सकता था कि मामा अपनी भान्जी को न पहचानता। वैसे तो उसको आवाज़ से ही अंदाज़ा लग गया था, पर उसकी आँखों की ओर देखकर उसे पक्का यकीन हो गया कि यह आफिया ही है।

“आफिया बेटी, अंदर घर चल।“ पहचानने के बाद उसने मोह भरे शब्दों में कहा।

“अंकल, इस वक्त मैं घर में नहीं जा सकती। यदि हो सकता है तो आप मेरे साथ चलो। हम बाहर कहीं एकांत में बैठकर बातें करेंगे।“ एस.एच. फारूकी ने पलभर सोचा और फिर आफिया के साथ टैक्सी में बैठ गया। वे किसी रेस्टोरेंट में जा पहुँचे।

“आफिया बेटी, तू पिछले पाँच सालों से कहाँ थी ?“ मौका मिलते ही फारूकी ने बात छेड़ी।

“अंकल, कुछ न पूछो तो बेहतर है।“

“नहीं बेटी, हम सब तेरे लिए बहुत परेशान हैं। तू कुछ तो बता।“

“अंकल...।“ आफिया बात शुरु करते हुए अपने मामा की ओर देख पलभर रुकी और फिर आगे बताने लगी, “अंकल, मैं किसी चैरिटी की मीटिंग में हिस्सा लेने कराची में ही किसी के घर गई थी कि वहाँ पुलिस ने रेड कर दी। उसके साथ अमेरिकी एफ.बी.आई. भी थी। दूसरों के साथ उन्होंने मुझे भी पकड़ लिया। बाद में मुझे आई.एस.आई. के हवाले कर दिया गया।“

“यह वाकया किस दिन घटित हुआ ?“ फारूकी ने ग़ौर से आफिया की तरफ देखा।

“जी यह 29 अपै्रल 2002 की बात है।“

“पर तू तो 3 मार्च वाले दिन अपनी माँ को यह कहकर घर से निकली थी कि तू मेरी तरफ आ रही है।“

“अंकल, वो बात भी सही है।“

“फिर यह महीना भर तू कहाँ रही ? मेरा मतलब तू न मेरे पास आई और न ही तेरा कहीं और पता चला।“

“अंकल वो...।“ आफिया बात करते करते चुप हो गई।

“हाँ बेटे, बता न कि इस बीच क्या हुआ ?“

“अंकल, आप उन दिनों की बात न छेड़ो। मुझे अपनी बात अपने ढंग से कहने दो, प्लीज़। मैं बहुत परेशान हूँ।“

फारूकी कुछ न बोला, पर वह समझ गया कि यह जो तीस मार्च से लेकर 29 अप्रैल तक का वक्फ़ा है, इस बीच ज़रूर कुछ अन्य घटित हुआ है जिसके बारे में आफिया शायद बात नहीं करना चाहती। उसने इशारे से उसको अपनी बात चालू रखने को कहा तो आफिया फिर बोलने लगी, “अब मुझे लगता है कि वे पहले से ही मेरी तलाश कर रहे थे। आई.एस.आई वाले मुझे अपने किसी गुप्त ठिकाने पर ले गए। वहाँ मुझे मेरे बच्चों से अलग कर दिया गया। अगले दिन वे मुझे अफगानिस्तान के बैगराम एअरबेस में ले गए जहाँ अमेरिका का बड़ा अड्डा है।“

“फिर...?“ आफिया बोलते बोलते चुप हुई तो फारूकी बीच में बोला।

“वहाँ मुझे चार साल रखा गया। उन्होंने मुझे बेतहाशा यातनाएँ दीं।“

“कौन थे वे लोग ? मेरा मतलब आई.एस.आई. या अमेरिकी एजेंसियाँ ?“

“दोनों ही।“

“क्या उन्होंने तुझे मारा पीटा भी ?“

“अंकल, मारपीट तो शायद मैं बर्दाश्त कर जाती, पर उनका टार्चर ज्यादा मानसिक था। मुझे कईबार बहुत ही छोटे आकार के डिब्बे में लगातार दो दो दिन खड़े रखा जाता था। वह इतना भीड़ा होता था कि मैं दो दिन बैठ नहीं सकती थी और टांगे अकड़ जाती थीं। कईबार लोहे का ऐसा एक और कमरा होता जो गर्मियों के दिनों में आग की भाँति तपा होता था, मुझे वहाँ बंद कर दिया जाता। जो गर्मी मेरा बुरा हाल करती थी, वह तो करती ही थी, पर इसके अलावा वहाँ बेइंतहा तेज़ रोशनियाँ होती थीं जो आँखों को फोड़ने वाली थीं। इसके अलावा, वहाँ सारा दिन बहुत ही ऊँचा, भद्दा और कान फोड़ू म्युजिक बजता रहता था। कई कई दिन मैं सो ही नहीं सकती थी। मुझे वो वहाँ से निकालते तो करीब के एक तालाब में ले जाते, जहाँ दो दो मिनट पानी में डुबाये रखते। या फिर लकड़ी के फट्टे के साथ बाँधकर मुँह-सिर लपेट देते और ऊपर से पानी डालना शुरु कर देते। साँस बंद हो जाता और साथ ही मुँह पर लगातार पानी पड़ते रहने के कारण डूबने का अहसास होने लगता जो कि जान निकाल देता था। यह कोई एक दिन का काम नहीं था। यह हर रोज़ होता था। और यह लगातार चार साल चलता रहा...।“ आफिया बात बीच में छोड़ते हुए थोड़ा रुकी और आसपास देखते हुए फिर बोली, “अंकल, मेरे ऊपर और बड़े भयानक अत्याचार हुए जो कि बयान से बाहर हैं।“

“आफिया बेटी तेरे पर इतना जु़ल्म हुआ...।“ फारूकी का दिल भर आया।

“अंकल, यह अफसोस वाली बात नहीं है। क्योंकि जिहाद की राह पर चलते हुए ऐसा तो होता ही है। पर मुझे गर्व है कि मैंने यह सब कुछ बर्दाश्त किया, पर अपने इरादे से नहीं डोली।“

“पर वे तुझसे चाहते क्या थे ?“

“वे मुझे डबल एजेंट बनाकर अपने ही जिहादी बहन भाइयों के खिलाफ़ इस्तेमाल करना चाहते थे।“

“फिर आगे क्या हुआ ?“

“अंकल, जो भी जुल्मो-सितम मेरे पर हुआ, वह मैंने अल्लाह का हुक्म समझकर झेला। पर आखि़र उन्होंने ऐसा ढंग तलाशा कि मैं एक दिन बीच में ही टूट गई।“

“वह क्या ?“

“जो जु़ल्म वो मेरे पर करते थे, वही उन्होंने मेरे बच्चों पर शुरु करने की धमकी दी। बस, यही बात मुझे बर्दाश्त न हुई और मैं उनकी बात मानने के लिए मज़बूर हो गई। क्योंकि मैं जानती थी कि मेरे बच्चे उनके कब्ज़े में आ चुके हैं। फिर, मैंने डबल एजेंट बनने के लिए हामी भर दी। वैसे तो मैं उनके अनुसार डबल एजेंट बन गई, पर मुझे लगा कि इस तरीके से भी मैं जिहाद का काम ही कर रही होऊँगी।“

“वह कैसे ?“

“क्योंकि मैंने कुछ और सोचा था। मुझे उन्होंने आई.एस.आई की एजेंट बना लिया और कहा कि इस बात को गुप्त रखते हुए मैं उनके लोगों को अलकायदा में दाखि़ल करवाऊँ। उन्होंने मुझे नई पहचान देकर इस्लामाबाद भेज दिया। मैं उनका काम भी करती रही और साथ ही अपनी सोची हुई स्कीम के अनुसार अलकायदा को आई.एस.आई. के भेद भी देती रही। यह काम बड़ा ज़ोखि़म भरा था क्योंकि चौबीस घंटे आई.एस.आई. के लोग मेरे इर्दगिर्द रहते थे। इसी दौरान कुछ देर बाद मुझे पाकिस्तान की फैडरल इनवैस्टीगेशन एजेंसी ने गिरफ्तार कर लिया।“

“ओह ! फिर क्या हुआ ?“

“फिर उन्होंने भी मुझे वही काम करने के लिए कहा जो आई.एस.आई. करवा रही थी, अर्थात डबल एजेंट। मुझे नई पहचान देकर यह एजेंसी मेरे से अपने लिए काम करवाने लगी। अब भी मैं वहीं हूँ। पर मुझे पता है कि यह काम ज्यादा देर नहीं चल सकेगा। इसलिए मैं ताक में थी कि कब मौका मिले और यहाँ से भागूँ। आज उनके पहरेदारों की आँखों में धूल झोंककर मैं भाग आई हूँ।“

“अब फिर आगे तू क्या करना चाहती है ?“

“अंकल, अगर मैं यहाँ रही तो मुझे फिर से किसी न किसी एजेंसी ने गिरफ्तार कर लेना है और फिर से वही जासूसी का काम करवाना है। आपको पता ही है कि इस काम में कितना ज़ोखिम है। मैं यह भी जानती हूँ कि जब भी पाकिस्तानी एजेंसियों का काम निकल गया तो वे मुझे अमेरिकियों के हवाले कर देंगे। और वे मेरे पर कोई न कोई चार्ज लगाकर हमेशा के लिए जेल में बंद कर देंगे। इसलिए मैं चाहती हूँ कि इस सबसे दूर किसी ऐसी जगह चली जाऊँ जहाँ कि मुझे इनका डर न हो। जहाँ मुझे यह न रहे कि कोई अपना ही मेरे साथ दगा कमाकर मुझे पकड़वा देगा।“

“ऐसी जगह फिर कौन सी हो सकती है ?“

“अंकल, इस समय अगर मुझे कोई उचित जगह दिखाई देती है तो वह है अफगानिस्तान के तालिबान। पर मेरा अकेली का वहाँ पहुँचना आसान नहीं है।“

“आफिया बेटी, मैं तो कहता हूँ कि अपने घर में आ जा। हम सब कुछ ठीक कर लेंगे।“

“नहीं अंकल, यह मेरा निशाना नहीं है। मैंने अपनी ज़िन्दगी जिहाद के लेखे लगानी है। मेरी तीव्र इच्छा है कि मैं फ्रंट पर जाकर लड़ाई में हिस्सा लूँ और काफिरों का खात्मा करुँ।“

“ठीक है बेटी जैसे तेरी मर्ज़ी...।“ फारूकी ने बात बीच में छोड़कर आँखों के कोये पोंछे और फिर कहा, “अच्छा बता फिर मैं तेरी उस काम में क्या मदद कर सकता हूँ ?“

“आप मेरी अफगानिस्तान के तालिबानों तक पहुँचने में मदद करो। जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि अकेली औरत का वहाँ जाना आसान नहीं है। वह भी मेरा जिसको जगह जगह पर एजेंसियाँ खोजती घूमती हैं।“

उसकी बात सुनकर फारूकी सोच में पड़ गया। फिर उसको ख़याल आया कि इसकी मदद करनी ही पड़ेगी। वह आफिया की ओर देखता हुआ बोला, “ठीक है बेटी, मेरी तालिबान गवर्नमेंट के समय की कई अफ़सरों से जान-पहचान है। मैं तुझे उन तक पहुँचा दूँगा। पर यह प्रबंध करने में कुछ दिन लग जाएँगे। चल तब तब तू मेरे घर में ठहर जा।“

“नहीं अंकल, मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकती। खूफिया एजेंसियाँ मुझे जगह जगह खोजती फिरती होंगी। मेरे साथ तुम भी मुसीबत में फंस जाओगे।“

फारूकी अकेला ही उठकर चल दिया। उस रात आफिया किसी होटल में रुकी। अगले दिन फारूकी ने जैसे तैसे उसको घर आने के लिए मना लिया। आफिया डरती थी कि कहीं कोई एजेंसी उसका पीछा न कर रही हो। पर फिर भी वह उसके संग घर आ गई क्योंकि उसको फारूकी ने बताया था कि उसकी माँ और बहन आ रही हैं जिन्हें उसने रात में ही फोन करके उसके बारे में ख़बर दे दी थी। जब दोनों घर पहुँचे, तब तक इस्मत और फौज़िया आ चुकी थीं। अंदर जाते ही आफिया ने सूख कर तीला बन चुकी माँ की ओर देखा। आफिया के आँसू छलक आए। इस्मत धाह मारकर उठी और आफिया से लिपट गई।

“हाय री बेटी, तू किन भटकती राहों पर चल पड़ी ?“ रोते हुए इस्मत ने आफिया को बाहों में लपेट लिया।

आफिया ने कुछ कहना चाहा, पर मुँह से बोल न फूटे और वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। दो चार मिनट माँ-बेटी वैराग्य के आँसू बहाती रहीं। माँ की छाती से सिर हटाते हुए आफिया ने बड़ी बहन फौज़िया की ओर देखा तो वह माँ से हटकर उससे लिपट गई। एकबार फिर से आँसुओं की धारा बहने लगी। दोनों बहनें जी भरकर रोयीं। फारूकी और उसकी घरवाली ने आँखें पोंछते हुए तीनों को चुप करवाया। बड़ी भावुक मिलनी थी। अलग अलग होकर भी काफी देर तक सभी अपने आँसू पोंछते रहे। आहिस्ता आहिस्ता फारूकी छोटी छोटी बातें करने लगा। उसके साथ ही दूसरे भी चुप हो गए और उसकी बातचीत में हिस्सा लेने लगे।

“अम्मी, मेरे बच्चों का क्या हाल है ?“ आफिया ने उदास स्वर में पूछा।

“तेरा बेटा और बेटी दोनों ठीक हैं। तू बता बड़ा अहमद कैसा है ?“

“ठीक है, वह भी अम्मी।“ इतना कहते हुए आफिया चुप हो गई और दीवार की ओर देखने लगी।

“सब ठीक हैं, एक मेरी बेटी के सिवा।“ इतना कहते हुए इस्मत ने एक आह भरी। उसकी बात ने आफिया की चेतना भंग की और उसने खाली खाली नज़रों से माँ की ओर देखा।

“अहमद कहाँ है अब ?“ माँ ने पूछा।

“अम्मी वहाँ कहीं भी है, ठीक है।“

“उस बच्चे पर भी मुसीबत पड़ गई।“

“नहीं अम्मी, मुसीबत नहीं बल्कि उस पर तो अल्लाह की मेहर हुई है जो वह जिहाद में शामिल हुआ है।“

“बच्चे के खेलने-कूदने के दिन थे, पता नहीं...।“ बात अधूरी छोड़ती हुई इस्मत चुप हो गई।

“जिहादी माँ का बेटा है। उसको कुछ नहीं हुआ। वह मौज में है।“ इतनी बात कहते हुए आफिया के चेहरे पर आत्म-विश्वास लौट आया। कुछ देर पहले उदासी में डूबी आफिया फिर से हौंसले में आ गई। भावुक बातों को छोड़कर वह जिहाद की बातें करने लगी। सभी उसके मुँह की ओर देखते उसकी बातें सुनते रहे। इस प्रकार बातचीत करते शाम हो गई। कमरे में तीनों, माँ-बेटियाँ रह गई तो फौज़िया ने बात शुरु की, “आफिया, अब तेरा आगे क्या करने का इरादा है ?“

“क्या मतलब ?“ आफिया ने चौंककर फौज़िया की तरफ देखा।

“मतलब यही कि अब आगे का क्या सोचा है ?“

“आगे-पीछे कुछ नहीं आपा। मेरा सबकुछ जिहाद हो समर्पित है।“

“आफिया, वापस लौट आ। पीछे जो हो गया, सो हो गया। हम मिलजुल कर सब कुछ ठीक कर लेंगे।“

पर आफिया उसकी बात नहीं सुन रही थी। वह तो दीवार की ओर देखती फिर कहीं गुम हो गई थी।

“आफिया, तेरा कमरा तेरा इंतज़ार कर रहा है। तेरे पालतू जानवर, कुत्ते-बिल्ली हर जगह तुझे खोजते फिरते हैं। तेरे लगाए हुए बूटे तेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनमें लगे फूल तेरी राह देख रहे हैं।“

“हैं ! क्या कहा ?“ सोच के समंदर से बाहर निकलती आफिया ने फौज़िया की ओर देखा।

“आफिया, मेरी बेटी, तू हमारे साथ अपने घर चल।“ इस्मत उठी और उसने मोह में आफिया को अपनी बांहों में कस लिया। आफिया ने भी माँ के इर्दगिर्द बांहें लपेटते हुए आँखें मूंद लीं। उसको चूप देखकर इस्मत फिर खुद बोल उठी, “यह सारा कसूर उस नईम खां के बेटे का है।“ उसका इशारा आफिया के तलाक ले चुके पति अमजद की ओर था।

“उसका क्यों अम्मी ?“ माँ की छाती से लगी आफिया बोली।

“उसने तुझे तेरे हक की मुहब्बत नहीं दी। अल्ला करे उसके कीड़े...।“

“अम्मी... इससे आगे कुछ न बोलना।“ माँ की बात बीच में काटते हुए आफिया उससे अलग हो गई।

“तू अभी भी उसकी तरफदारी करती है। उसने तो तुझे तलाक देते समय कुछ सोचा नहीं।“

“अम्मी वो दूसरी बात है। वह हमारा आपसी मामला था। पर मैं अमजद के बारे में कुछ नहीं सुन सकती।“

“मैं तेरे साथ सहमत नहीं आफिया। अगर वह चाहता तो तू अपने घर में सुख-शांति से रह सकती थी और...।“

“और क्या ?“

“तू इन गलत राहों पर जाने से बच जाती।“

“अम्मी...।“ आफिया भड़कते हुए उठ खड़ी हुई। वह गुस्से में कांपती हुई फिर बोली, “ये गलत राह नहीं है। यह तो बल्कि अल्लाह की खिदमत करने का एकमात्र राह है। तुम लोग क्या जानो कि जिहाद कितना पवित्र काम है।“

“पहले तेरे दुख में तेरा अब्बू चल बसा और अब...।“ इस्मत रोने लगी।

“मरना तो सबने ही है। पर कुर्बानी कोई कोई ही करना जानता है।“ आफिया वैसे ही गुस्से से कांपे जा रही थी।

“तुझे पता है कि तेरे अब्बू ने मरते वक्त क्या कहा था ?“

“हाँ-हाँ, मुझे याद है।“ आफिया को वह बात याद आई जब आखि़री दिनों में उसके अब्बू ने उसके बारे में कहा था कि इससे तो अच्छा था, आफिया पैदा होते ही मर जाती। उस वक्त आफिया चुप रही थी क्योंकि वह जानती थी कि यह उसके पिता का अन्तिम समय है। पर आज वह चुप न रही। माँ की ओर घूरते हुए वह फिर बोली, “तुम लोग इस धरती पर बोझ हो। खा लिया, पी लिया और ज़िन्दगी गुज़ार ली। तुम्हें जिहाद जैसे पवित्र कामों की समझ नहीं आ सकती।“

फौज़िया ने इशारे से माँ को चुप करवाया और फिर वह आफिया को शांत करने लगी। धीरे धीरे माहौल शांत हो गया। देर रात तक इस्मत और फौज़िया उसको अनेक प्रकार से समझाती रहीं। पर आफिया ने दुबारा उनके साथ ढंग से बात नहीं की। खा-पीकर सब पड़ गए, पर आफिया पलभर भी न सोई। वह रातभर नमाज़ें अदा करती रही और अपने आप से बातें करती रही। अगले दिन सुबह-सवेरे ही सद्दीकी ने उसको बुलाया, “आफिया बेटी, तू तो सारी रात सोई ही नहीं। क्यों, तबीयत तो ठीक है न ?“

“अंकल, भावुक माहौल ने मेरे अंदर कमज़ोरी पैदा कर दी थी। मैं उसके लिए अल्लाह से भूल बख़्शवाती रही। अब मैं पूरी तरह से उस माहौल से बाहर आ चुकी हूँ।“

उसकी बात का कोई जवाब दिए बग़ैर सद्दीकी रसोई में चला गया और उसके लिए चाय का कप ले आया। पर आफिया ने कुछ भी खाने-पीने से इन्कार कर दिया। जब इस्मत और फौज़िया वहाँ आईं तो आफिया अपना सामान बाँध रही थी। उन्होंने हैरान होकर उसकी तरफ देखा और इस्मत बोली, “आफिया, तू इतनी सुबह कहाँ के लिए तैयार हो रही है ?“

“मैं अपनी असली मंज़िल की ओर जा रही हूँ।“ वह उनकी ओर देखे बग़ैर बोली। सभी चुपचाप उसकी तरफ देखते रहे और वह तैयार होती रही। आखि़र, सद्दीकी ने प्यार से उसको बुलाया, “आफिया बेटी, इतनी जल्दी क्यों कर रही है ? मैंने तेरे साथ वायदा किया है कि मैं तुझे तेरी मंज़िल पर पहुँचाकर आऊँगा।“

“नहीं अंकल, अब मेरे लिए यहाँ और ठहरना मुमकिन नहीं है। मैं नहीं चाहती कि यह माहौल मेरे इरादे को कमज़ोर बनाए।“

“पर मैं कह रहा हूँ कि मैं तुझे....।“

“अंकल, मेरी मंज़िल मुझे पता है और वहाँ पहुँचने की राह भी मैं खुद ही खोजूँगी।“ इतना कहते हुए आफिया ने अपना भारी काला बैग उठाकर कंधे से लटका लिया। सद्दीकी ने उसका बैग उठाने में मदद करनी चाही तो आफिया ने बैग को हाथ न लगाने दिया। जब वह चलने लगी तो सद्दीकी ने टैक्सी की प्रतीक्षा करने को कहा। आफिया ने बैग नीचे रखते हुए उसकी बात मान ली तो सद्दीकी ने टैक्सी को फोन कर दिया। टैक्सी आने तक इस्मत और फौज़िया उसके साथ बात करने की कोशिश करती रहीं, पर उसने ढंग से बात नहीं की। इस्मत रोने लगी। उसने आफिया को कुछ पैसे देने चाहे तो उसने पैसों की तरफ देखा भी नहीं। तभी टैक्सी आ गई। आफिया ने नीचे रखा बैग उठाया और बाहर निकल पड़ी। सारा परिवार रोता रह गया और आफिया बिना उनकी ओर ध्यान दिए टैक्सी मे बैठकर चली गई।

अगले छह महीने तक आफिया के घर वालों को उसके बारे में कुछ पता न चला। फिर, उस दिन उनके होश उड़ गए जब ख़बर आई कि आफिया अफगानिस्तान के गज़नी शहर में पकड़ी गई है।

(जारी…)
 
17

यद्यपि अमेरिका ने आफिया की गिरफ्तारी के विषय में कुछ नहीं बताया था, पर फिर भी यह बात पाकिस्तान में पहुँच गई। इतना ही नहीं, यह भी कि अमेरिकियों ने उसको गोली मारी है जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गई है। लोगों का सोचना था कि उसको जान से मारने के लिए ही गोली मारी गई होगी, पर वह संयोग से बच गई। परंतु इस बात के बारे में अमेरिकी फौज के अफ़सरों का कुछ और ही कहना था। उनके अनुसार जब उन्हें पता चला कि कोई आतंकवादी स्त्री पकड़ी गई है तो वे उसके साथ इंटरव्यू करने के लिए उस कमरे में पहुँचे जहाँ उसको रखा गया था। अंदर सामने कुछ अफगानी पुलिस वाले बैठे थे। सभी के पीछे आफिया पर्दे की ओट में बैठी थी। वे बैठकर अफगान पुलिस वालों से बातचीत करने ही लगे थे कि आफिया ने पर्दे के पीछे से आकर एकाएक अमेरिकी अफसर की एम 4 गन उठा ली और वह उन पर गोलियाँ चलाने लगी। अपने बचाव के लिए अमेरिकी अफसर ने गोली चलाई जो आफिया के पेट में लगी। फिर वह उसको घायल अवस्था में स्ट्रैचर पर डालकर अपने बेस में ले गए। इस घटना के बारे में आफिया ने आगे चलकर कोर्ट में कुछ और बताया। खै़र, आफिया के गोली लगने की बात सुनकर पाकिस्तान के लोग भड़क उठे। ह्यूमन राइट्स वाले और अन्य कई ग्रुप आगे आ गए थे। पाकिस्तान में माहौल बहुत गरमा गया। आफिया सद्दीकी का नाम बच्चे बच्चे की जुबान पर चढ़ गया। जलसे-जुलूसों की हर तरफ बाढ़ आ गई। मुज़ाहरे होते तो लोगों के हाथों में बैनर होते। किसी पर लिखा होता - ’डाक्टर सद्दीकी को रिहा करो। किसी पर लिखा होता - ‘इस्लाम की बेटी आफिया सद्दीकी। कुछ ही दिनों में आफिया का नाम कौम के लिए गर्व बन गया। इधर जलसे-जुलूस ज़ोरों पर थे और उधर अमेरिका वाले आफिया को न्यूयॉर्क ले जा चुके थे। अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट द्वारा प्रैस कॉन्फ्रेंस बुलाकर यह बता दिया गया कि एफ.बी.आई द्वारा घोषित सबसे अधिक खतरनाम आतंकवादी औरत आफिया सद्दीकी पकड़ी जा चुकी है।

आफिया को न्यूयॉर्क के उस मैट्रोपोलिटन डिटैशन सेंटर में बंद किया गया जहाँ कभी 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नॉर्थ टॉवर की पार्किंग में धमाका करने वाले रम्जी यूसफ या उजे़र पराचा को रखा गया था। उसके अन्य बहुत सारे साथी जो इस वक्त जेलों में अपनी सज़ा भुगत रहे थे, इसी सेंटर में से निकलकर गए थे। पाँच अगस्त 2008 को सुबह दस बजे आफिया को पहली बार कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट कंपलैक्स खचाखच भरा हुआ था। प्रैस सहित बहुत से लोग यह देखने के लिए उतावले थे कि आतंकवाद की दुनिया की सबसे खतरनाक औरत देखने में कैसी लगती है। कुछ देर बाद पुलिस वालों ने करीब पैंतीस वर्षीय छोटी-सी और भोलीभाली औरत को लोकर कोर्ट में खड़ा किया तो सब हैरान रह गए। उसने हल्के रंग के कपड़े पहने हुए थे। सिर पर कत्थई रंग का स्कॉर्फ लपेट रखा था। देखने में वह बहुत ही कमज़ोर लगती थी। शायद वह अभी तक गोली लगे ज़ख़्म के कारण पूरी तरह ठीक नहीं हुई थी। जज ने उससे पूछा कि तू अपना केस स्वीकार करती है तो उसने ‘ना’ में सिर हिला दिया। प्रैस के लोगों से खचाखच भरी कोर्ट में चुप्पी पसर हुई थी। सबको लग रहा था कि यह केस आतंकवाद के खिलाफ़ चल रही गुप्त लड़ाई का सबसे कठिन केस होगा। आम लोग तो इस बात को भी मानने के लिए तैयार नहीं थे कि आफिया को सचमुच गज़नी शहर में पकड़ा गया होगा। वे सोच रहे थे कि पिछले पाँच वर्षों से गुप्त जे़लों में रखी आफिया को सिर्फ़ नाटक रचने के लिए गज़नी के बाज़ार में लाकर छोड़ दिया गया होगा और साथ ही साथ पकड़ लिया गया होगा। कइयों को तो यह भी लगा कि यह लड़की आतंकवादी हो ही नहीं सकती। ख़ैर, यू.एस.ए. की सिविल राइट्स यूनियन को लगा कि ऐसा केस आ चुका है जिसकी वे बहुत अरसे से प्रतीक्षा कर रहे थे। क्योंकि वे कई सालों से सरकार पर दोष लगाते आ रहे थे कि वह आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई का बहाना बनाकर बहुत सारे लोगों को लम्बे समय से गुप्त जे़लों में बंद किए बैठी है और उन पर अमानवीय अत्याचार किया जा रहा है। अब उनका सोचना था कि इस केस के माध्यम से वे इस सच्चाई को सामने ले आएँगे। आफिया को सिविल राइट्स यूनियन की ओर से फिंक नाम की एक उच्चकोटि की वकील दी गई। उस दिन थोड़ी-बहुत कार्रवाई करते हुए जज ने कोर्ट बरखास्त कर दी। मार्शल आफिया को वापस जे़ल में ले गए। अगले दिन आफिया के परिवार की वकील शार्प भी वहाँ पहुँच गई। फिंक और शार्प ने लगभग तीन घंटे जे़ल में आफिया से लम्बी इंटरव्यू की। बाहर आकर शार्प ने ऐलान किया कि आफिया के अनुसार उसको पिछले कई वर्षों से अफगानिस्तान की बैगराम एअरफोर्स बेस के किसी गुप्त सेल में कै़द करके रखा गया था। इसके उलट अमेरिकी सरकार यह मानने से इन्कार कर रही थी कि वह पहले से एफ.बी.आई. अथवा सी.आई.ए. की हिरासत में थी। पर वह यह कह रही थी कि यह बहुत ही खतरनाक आतंकवादी है। सरकार के अनुसार सबसे बड़ा सुबूत उसके पास से बरामद हुए वे काग़ज़-पत्र थे जो उसकी गिरफ्तारी के समय थानेदार गनी खां ने पकड़े थे। आफिया की वकील का कहना था कि ये सारे पेपर झूठे और सरकार की ओर से प्लांट किए गए हैं। पर इनमें से बहुत सारे पेपर आफिया की अपनी हस्तलिपि में थे जो उसको शक के घेरे में ला रहे थे। बाद में पाकिस्तान में यही बात उसके मामा फारूकी ने सुनी तो उसको कोई शक न रहा। उसको याद आया कि छह महीने पहले जब आफिया उसके घर आई थी तो यही काला बैग उसके पास था जिसको वह हाथ नहीं लगाने दे रही थी और बहुत संभाल संभालकर रख रही थी। अमजद और उसके घरवालों ने उसकी गिरफ्तारी होने की बात सुनी तो उन्हें सबसे पहले यह जानने की उतावली हुई कि उसके पास बच्चे थे कि नहीं। ख़ैर, बच्चे उसके पास नहीं थे। पर जब अमजद ने वो वीडियो देखी जो आफिया की गिरफ्तारी से अगले दिन पुलिस की ओर से बनाई गई थी तो उसने आफिया के साथ पकड़े गए लड़के को पहचान लिया। यह उसका अपना पुत्र अहमद था। परंतु आफिया अपने पुत्र की शनाख़्त छिपाकर रखना चाहती थी। उसने अपनी इंटैरोगेशन करने वालों को यही कहा कि यह लड़का कोई यतीम था, इसलिए उसने उसको अपने पास रखा हुआ था क्योंकि उसका अपना कोई नहीं था। दूसरा, साथ रखने का एक कारण उसने यह भी बताया कि औरत होने के कारण वह अकेली सफ़र नहीं कर सकती, इसलिए उस लड़के को साथ रखती थी। पर जब एफ.बी.आई ने उस लड़के का डी.एन.ए. टैस्ट करवाया तो यह बात स्पष्ट हो गई कि वह आफिया का अपना पुत्र था। इस बात का खुलासा होने के बाद आफिया बहुत उदास हो गई और उसने बोलना बंद कर दिया। उसको अपने बेटे की ज़िन्दगी को लेकर चिंता हुई। वह सोचने लगी कि एफ.बी.आई. उसके बेटे को मार सकती है या लम्बे समय तक अपनी हिरासत में रख सकती है, सिर्फ़ उसको उसके खिलाफ़ इस्तेमाल करने के लिए। क्योंकि अमेरिकी कानून के अनुसार बारह साल का बच्चा अपने माँ-बाप के हक में अथवा उलट गवाही देने के योग्य समझा जाता है। आफिया बिल्कुल ही चुप हो गई। उसने अपने वकीलों के साथ भी बोलना छोड़ दिया। ई मेल वगैरह भेजनी बंद कर दीं। पुत्र के दुख में वह सारा दिन अकेली बैठी रोती रहती थी। सही ढंग से खाना तक छोड़ दिया था। उधर पाकिस्तान में जनता बड़ी सहानुभूति के साथ आफिया की कहानी सुनती जा रही थी। सभी को इसके साथ हद से ज्यादा हमदर्दी थी। पाकिस्तान के टी.वी. चैनल जिओ टी.वी. ने ख़ास प्रोग्राम शुरु किया हुआ था जिसका नाम था - ‘ए ह्यूमन राइट्स ट्रैजेडी - आफिया सद्दीकी। पाकिस्तान की सरकार में उस समय हालात ठीक नहीं थे। मुशर्रफ़ ने इस्तीफ़ा दे दिया था और नए चुनाव होने जा रहे थे। लोगों की नब्ज़ पहचानते हुए वहाँ की नेशनल एसेम्बली ने आफिया सद्दीकी के हक में प्रस्ताव पास करते हुए आफिया की मदद के लिए एक डेलीगेशन अमेरिका भेजने का फै़सला कर लिया। उधर अमेरिका ने इस समय ड्रोन हमले बढ़ा दिए थे और इनमें चोटी के अलकायदा मेंबर मारे जा रहे थे। समझने वाले समझते थे कि यह सब इस कारण हो रहा है क्योंकि आफिया के पास से पकड़ी गई थंब ड्राइव में से बहुत सारे अलकायदा मेंबरों के ठिकानों का पता लगा होगा। और कुछ तो पाकिस्तानी सरकार न कर सकी, पर आफिया का बेटा उसकी बहन के हवाले करवाने का काम अवश्य करवा दिया।

उधर आफिया का बर्ताव अभी भी ख़ामोश और जिद्दी था। उसने अपनी तारीख़ पर कोर्ट में जाने से इन्कार कर दिया। उसने किसी को भी मुलाकात करने से मना कर दिया। जब उसने वकीलों से मिलने से इन्कार कर दिया तो फिंक जैसी प्रसिद्ध वकील ने भी स्वयं को बेबस-सा महसूस किया। इस प्रकार आफिया अपनी कई कोर्ट सुनवाइयों पर भी नहीं गई। यह देखते हुए उसकी वकील ने कोर्ट से विनती की कि आफिया दिमागी तौर पर सही प्रतीत नहीं होती, इसलिए उसका मुआयना करवा कर इलाज़ करवाया जाए। जज ने इस विनती को मानते हुए आफिया को फैडरल मेडिकल सेंटर कार्सवैल, टैक्सास भेजने का आदेश कर दिया। यहाँ पहुँचकर आफिया ने मानसिक तौर पर काफ़ी राहत अनुभव की। दिसंबर महीने में जब पाकिस्तान की सरकार का ख़ास डेलीगेशन उससे मिलने आया तो आफिया उस समय मेडिकल सेंटर में थी। उसने बड़े अच्छे ढंग से डेलीगेशन के साथ मुलाकात की। डेलीगेशन ने पाकिस्तान सरकार की ओर से उसको कानूनी मदद का भरोसा दिलाया। इसके शीघ्र बाद पाकिस्तान सरकार ने आफिया के कानूनी खर्चों के लिए लगभग दो मिलियन डॉलर की मदद का प्रबंध कर दिया। तभी अमेरिकी सरकार ने फै़सला किया कि वह आफिया पर आतंकवाद का मुकदमा नहीं चलाएगी, बल्कि उस पर उस जु़र्म के खिलाफ़ मुकदमा चलाया जाएगा जो उसने अमेरिकी फौजियों पर गोली चलाने का किया। इसी समय आफिया के डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि वह मानसिक तौर पर बीमार है। उसकी वकील फिंक ने इसका लाभ उठाते हुए सरकार पर इल्ज़ाम लगाया कि एफ.बी.आई. की यातनाओं के कारण ही आफिया की यह हालत हुई है। पर आफिया ने उसके साथ बोलना बंद कर दिया। सिर्फ़ उसके साथ ही नहीं अपितु आफिया हर उस शख़्स से दूर रहने लगी जिसके बारे में उसका लगता था कि यह यहूदी है या यहूदियों के संपर्क में है। उसकी ऐसी हरकतें उसके वकीलों और उसके अपनों को भी परेशान कर रही थीं। वैसे इस समय आफिया बड़ी अच्छी रौ में थी। एक तो पाकिस्तानी सरकार उसकी मदद कर रही थी, पर इससे भी बड़ी बात वह थी जो डॉक्टर ने लिख दी थी कि आफिया सद्दीकी मानसिक बीमारी के कारण मुकदमें का सामना नहीं कर सकती। उसको लगता था कि शायद मानसिक बीमारी की वजह से उसको यूँ ही रिहा कर दिया जाएगा। परंतु आफिया की यह खुशी उस वक्त उड़ गई जब उसको पता चला कि डॉक्टरों की एक अन्य टीम उसका मुआयना करने आ रही है। इसी बीच उसने अमेरिकी सरकार के नाम एक लम्बा पत्र लिखा। इस पत्र में उसने अपने ढंग से यह नुक्ता रखने की कोशिश की कि उसके पास बहुत सारे गुप्त भेद हैं जो कि अमेरिकी सरकार के काम आ सकते हैं। वह सोच रही थी कि शायद ये भेद जानने के बदले ही सरकार उसको रिहा करने के लिए मान जाए। जेल वार्डन को यह पत्र देते हुए उसने आगाह किया कि इस पत्र को प्रेज़ीडेंट ओबामा तक पहुँचा दिया जाए। पर आफिया को फिर निराशा हाथ लगी। उसके इस पत्र की ओर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। बल्कि उसको बड़ा धक्का तब लगा जब डॉक्टरों की नई टीम ने अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि वह बिल्कुल ठीक है और अपने केस का सामना सही ढंग से कर सकती है। मेडिकल की इस नई रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार उसको वापस न्यूयॉर्क में ले आई और केस फिर से प्रारंभ कर दिया। जज ने उसका वकील बदलते हुए केस की तारीख तय कर दी। उसकी नई वकील डॉन कार्डी थी और केस की तारीख़ थी- 7 जून 2009 ।

उस दिन जज बर्मन ने कार्रवाई शुरु करते हुए आफिया को पेश करने का आदेश दिया। मार्शलों ने आफिया को लाकर कोर्ट में खड़ा कर दिया। आवश्यक कार्रवाई निपटाते हुए जज ने उसको वकील के पास बैठने की अनुमति दे दी। वकील अपना काम करने लगी, पर लगता था कि आफिया को अपनी वकील से कोई सरोकार नहीं था। वह चलती कार्रवाई में उठ खड़ी हुई और ऊँचे स्वर में बोली -

“मैं कुछ कहना चाहती हूँ...।“

“मिस आफिया, तुम्हें बोलने का वक्त मिलेगा, पर अभी तुम बैठ जाओ।“ जज ने हुक्म सुनाया। पर आफिया उसकी बात मानने की बजाय फिर से बोली, “मैंने जो कुछ किया है, वो दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए किया...।“

उसके बोलने के साथ कोर्ट के काम में रुकावट पड़ गई। जज ने गुस्से होकर आफिया की ओर देखा, पर आफिया ने अपनी बात जारी रखी -

“मैं तो तालिबानों और अमेरिका के बीच समझौता करवाना चाहती हूँ। आप मेरी बात क्यों नहीं सुनते ?“

“मिस आफिया, तुम प्लीज़ बैठ जाओ।“ जज ने सख़्त लहजे में यह शब्द कहे तो आफिया बैठ गई। उसने मेज़ पर सिर रख लिया और आँखें मूंद लीं। उसकी यह हालत देखकर उसकी वकील जज से अनुमति लेती हुई बोली, “आप मिस आफिया की हालत देखकर खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि इसके ऊपर कितना टार्चर हुआ है। इसकी हालत सही नहीं है। एफ.बी.आई. के टार्चर ने इसको इस हालत में पहुँचा दिया है।“

“युअर ऑनर, मैं कुछ कहना चाहती हूँ।” सरकारी वकील उठ खड़ी हुई। जज ने उसको बोलने की इजाज़त दी तो वह अपनी बात रखने लगी -

“मिस आफिया अभी तक यह नहीं बता सकी कि उस पर यह टार्चर कब और कहाँ हुआ है। इसने अब तक जो भी बयान दिए हैं, वे आपस में मेल नहीं खाते। यह बार बार अपने बयान बदल रही है। इस वजह से हम यह समझने में असमर्थ हैं कि इसका कौन सा बयान सही माना जाए। मैं यह भी कहना चाहूँगी कि मिस आफिया दिमागी बीमारी का सिर्फ़ बहाना बना रही है। वैसे यह बिल्कुल ठीक है। यह अपने केस का सामना कर सकती है।”

“वही तो मैं कह रही हूँ कि मिस आफिया किसी भी बात का उत्तर ठीक नहीं दे रही। वह भूल जाती है कि पहले उसने क्या कहा था और अब क्या कह रही है। वह पुरानी कई बातें भी भूल चुकी है। और यह सबकुछ एफ.बी.आई. के अत्याचारों की वजह से हुआ है। मिस आफिया मासूम है, निर्दोष है।“ इजाज़त लेते हुए आफिया की वकील बोली।

जज ने दोनों पक्षों की बातचीत सुनने के बाद फैसला कर दिया कि आफिया बिल्कुल सही है और वह अपने केस का सामना कर सकती है। इसलिए उसने अगली तारीख़ नवंबर की रख दी।

(जारी…)
 
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