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उड़ी रे....मेरी पतंग उड़ी रे... compleet

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Guest
उड़ी रे....मेरी पतंग उड़ी रे...



हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा आपके लिए एक और नई कहानी लेकर हाजिर हूँ. दोस्तो अभी गयी मकर संक्रांति पर जो हुआ उस पर मुझे आज भी विश्वास नही हो पा रहा है. जॅयैपर में मकर संक्रांति हर वर्ष 14 जन्वरी को मनाई जाती है और इस दिन को पतंगो का त्योहार कहते है. हज़ारो पतंगे उड़ाई जाती है. लोग टेरेस पर चढ़ कर ग्रूप बनाकर दिन भर पतंगे उड़ाते रहते है. मैं भी और मेरी बिल्डिंग वाले भी पतंगे उड़ाने के बड़े शौकीन है. हम लोग सुबह से ही टेरेस पर चढ़ जाते है और शाम ढले ही वापस नीचे आते है. हमारी बिल्डिंग की टेरेस बहुत बड़ी है इसलिए दूसरी जगह के लोग भी हमारी बिल्डिंग में पतंगे उड़ाने आते है. हम लोग अपने फ्रेंड्स को बुलाते है हमारे साथ एंजाय करने के लिए. इस बड़ी टेरेस के साथ एक पानी की टंकी के लिए एक छ्होटी टेरेस भी बनी हुई है जो टेरेस के दूसरे हिस्से में है. पतंगे उड़ाने के लिए सब लोग बड़ी टेरेस ही यूज़ करते है. छ्होटी टेरेस मैं टेरेस से एक मंज़िल उपर भी है और स्टेरकेस के दूसरी तरफ भी है. उस तरफ दूसरी बिल्डिंग्स दूर होने के कारण पतंगे भी कम उड़ती है.

मैं मिड्ल क्लास फॅमिली से हूँ और अपने परिवार के साथ भाड़े के घर में रहता हूँ. हमारी बिल्डिंग में सब लोग भाड़े से ही रहते है. मकान मालिक दूसरी जगह रहता है. बिल्डिंग में कई कमरे खाली भी है. केयी तीन-चार सालों से खाली पड़े है. मेरा घर तीन रूम का है. आगे कोने में एक रूम काफ़ी दिनो से खाली पड़ा है तो मैने उसकी खिड़की, जोकि बॅक साइड के बॅराम्डा में खुलती है, के स्क्रू निकाल दिए. जिसे मैं उसको निकाल कर दिन में काफ़ी बार उस रूम को काम में लेता था. किसी को मालूम भी नही पड़ता था. मकान मालिक ने उसकी एलेक्ट्रिसिटी चालू रख छ्चोड़ी थी इसलिए फॅन और लाइट की कोई प्राब्लम नही होती थी. हम फ्रेंड्स लोग उसमे बैठकर राज शर्मा की कामुक कहानिया या मस्ती-ब्लास्ट ब्लॉग पर देशी वीडियो या विदेशी वीडियो देखते थे. मतलब यह हमारी अयाशी का अड्डा था. अंदर एक मेज और दो-तीन कुर्सिया पड़ी हुई थी.

मैं बी.कॉम के फाइनल एअर में हूँ. ऊम्र 19 यियर्ज़ और कद 5'9" और कसरती बदन. रंग गोरा और चेहरे से खूबसूरत. कॉलेज में मेरी काफ़ी लड़कियों से दोस्ती है जोकि मेरे रंग रूप पर फिदा है. मैं भी इनके साथ काफ़ी खेला खाया हुआ हूँ और हमारे शारीरिक संभंध भी बने हुए है. मुझे नयी-नयी अटॅक्टिव लड़कियों से दोस्ती करने में मज़ा आता है और इसमे मैं काफ़ी सक्सेस्फुल भी रहा हूँ. मेरे 8" के लंबे समान की केयी लड़किया दीवानी है.

खैर बात मकर सकरांति वाले किस्से की. उस दिन हम लोग सब टेरेस पेर सुबह 9 बजे से ही टेरेस से पतंगे उड़ाने में लगे हुए थे. मैं और मेरी बहन रश्मि टेरेस पर दूसरे लोगो के साथ पतंगे उड़ाने में लगे हुए थे. दोपहर में खाना खाने के बाद हम लोग वापस उपेर टेरेस पर आ गये. तभी मैने देखा कि एक लड़की जोकि टाइट टी-शर्ट और टाइट जीन्स पहने हुए वहाँ खड़ी पतंगे उड़ने का मज़ा ले रही थी. खुद तो नही उड़ा रही थी लेकिन चरखी पकड़े हुए एंजाय कर रही थी. मालूम करने पर मालूम हुआ कि हमारे किसी पड़ोसी की दूर की रिश्तेदार है और यही पास में कही रहती है. नाम उसका नताशा है.
 


नताशा की उम्र मुझे 18 वर्ष से ज़्यादा की नही लग रही थी. हाइट करीबन 5'4" रंग मीडियम लेकिन बॉडी बोले तो एकदम झक्कास!! उफ्फ! टाइट टी-शर्ट में च्छूपे हुए मीडियम से बड़े उसके अनार, पतली कमर और टाइट जीन्स से ढके हुई उसकी मांसल जांघे और राउंड शेप के चूतड़. हॅयियी. एस, मेरा मन उसको देख कर तड़फ़ उठा. वाकई में मेरा दिल बल्ले-बल्ले करने लगा. उसकी टी-शर्ट के टाइट होने की वजह से उसके बूब्स की नुकीली नोक मेरे कलेजे को चीरती जा रही थी. मेरे लंड में रह-रह कर तनाव पैदा हो रहा था. मन कर रहा था कि माँझा और पतंगे को छ्चोड़कर उसके मम्मो को हथेली में लेकर मसल दूं. उफ़फ्फ़! क्या कातिल जवानी थी उसकी. वो भी इतनी देर में तीन-चार बार नज़रें घुमा कर मुझे उपर से नीचे तक देख रही थी. उसकी नज़रें रह-रह कर मुझ पर टिक जाती. मेरी नज़रें तो काइट पर कम उसके उपेर ज़्यादा थी.

मेरी बहन जोकि मेरी चरखी पकड़े हुए थी अचानक बोली, "भैया, मुझे ज़रा नीचे जाना है, तुम ज़रा चरखी पकड़ लो ना."

मेरी काइट उस समय काफ़ी उपेर थी इसलिए मैने कहा, "ज़रा 10-15 मिनिट रूको, रश्मि. अभी चरखी कौन पकड़ेगा?"

लेकिन रश्मि बोली, "अर्जेंट काम है भैया. लो मैं किसी दूसरे को पकड़ाती हूँ."

सयोंग से उस समय नताशा के हाथ में कोई चरखी नही थी. मेरी बहन उसको जानती भी थी. उसने नताशा को बुलाया और कहा, "प्लीज़ यह चरखी थोड़ी देर के लिए पकड़ लो. मुझे अर्जेंट काम से नीचे जाना है."

नताशा ने मेरी चरखी रश्मि के हाथ से ले ली. अब मेरी उस समय की चाहत के हाथ में मेरी डोर हो गयी.

मैने उसे हाई हेलो किया, "हाई. आइ'म राज शर्मा."

नताशा ने जवाब दिया, "हाई. आइ'म नताशा."

फिर मैं काइट उड़ाने में लग गया. बीच-बीच में उसको देखने के बहाने सिर पीछे कर उसे कुच्छ-ना-कुच्छ बात कर लेता. इससे मुझे मालूम हुआ कि वो चार साल पहले ही अपने गाओं से मुंबई में आई है और सेकेंड एअर Bआ में है. उसके बोलने के अंदाज़ से लग गया कि वो मुंबई में काफ़ी एंजाय कर रही है. उसकी गाओं वाली शरम हैया ख़तम हो चुकी है. वहाँ उसे पतंगे कभी उड़ाने कोनही मिली थी. लेकिन उसे काइट उड़ते हुए देखना खूब पसंद है.

मैने महशूष किया कि नताशा का चरखी पकड़ना पर्फेक्ट्ली नही आता है. मैने उसे बताया की काइट उड़ाने वाले के हाथ के इशारे को समझ कर कैसे चरखी पकड़ी जाती है. कैसे उड़ाने वाले के पीछे खड़ा हुआ जाता है. इतना सब बताने से उसने चरखी पकड़ने का अंदाज़ बदला और मुझे भी काइट उड़ाने में आसानी होने लगी. मैं बार-बार पीछे देखकर उसके मम्मो का आँखों से रसवादन कर लेता था. उसका चेहरे की सुंदरता को पी लेता था. वो भी मेरी आँखों में आँखें डाल कर मुझे ताक्ति रहती. जिसे मेरा उत्साह बढ़ रहा था. मेरे कॉलेज का एक्सपीरियेन्स मेरे काम आ रहा था. तभी मुझे एक आइडिया सूझा

मैं अब अपनी उड़ती हुई पतंग को एक साइड में ले गया और पीछे की तरफ होने लगा जिससे नताशा भी मेरे साथ पीछे होने लगी. मेरे अनएक्सपेक्टेड पीछे होने से मेरा बदन उसके जिस्म से रगड़ खा जाता. इसे मेरे बदन में चिंगारियाँ पैदा होने लगी. मैं अपनी काइट को नीचे उतारने के बहाने अपनी कोहनी से उसके मम्मो को टच करने लगा. फिर वापस से ढील दे कर काइट को और आयेज बढ़ा देता. ऐसा आधे घंटे में मैने ना जाने कितनी बार किया होगा. उसके मम्मे से मेरी कोहनी के हल्के टच से मेरे जिस्म में अंगारे भर रहे थे. उसकी तरफ से कोई नाराज़गी ना देखकर मुझे लगा मज़ा तो उसे भी आ रहा है. मैं अपनी इस कोहनी की हरकत का बड़े ही अंदाज़ से लुत्फ़ उठा रहा था. इस बीच मेरी केयी पतंगे कट गयी. तुरंत ही दूसरी नयी काइट उड़ा देता. और इस लुत्फ़ का मज़ा उठाता रहा.

तभी मेरी बहन रश्मि वापस आ गयी. उसके साथ मेरी फॅमिली के दूसरे मेंबर्ज़ भी आ गये. रश्मि ने आते ही कहा, "नताशा, ला अब चरखी मुझे...."

मज़ा खराब होते हुए देख मैने तुरंत ही बीच में बोल दिया, "रश्मि, जा. तू पापा की चरखी पकड़ ले. नताशा अभी मेरी चरखी पकड़ी हुई है."

नताशा ने मोहक अंदाज़ से मुस्कराते हुए कहा, "रश्मि, मैं ठीक हूँ यहाँ. तू अपने पापा की चरखी ले ले."

अब मुझे यकीन हो गया कि मेरा तीर निशाने पर लगा हुआ है. आटा कूदी फसली. मच्चली जाल में आ रही है. मैं अपने नये शिकार को पा कर बड़ा खुश हो रहा था. उसके बड़े और नुकीले मम्मो को अब मसल्ने का उपाय खोजने लगा. तभी मेरी यह इच्च्छा पूरी होने आ गयी.

नताशा ने कहा, "राज , मुझे भी काइट उड़ाने दो ना."

मैने पूछा, "तुम्हे आता है काइट उड़ाना."

नताशा ने इनकार में सिर हिलाते हुए कहा, "नही. मैने कभी भी काइट नही उड़ाई है."
 


तब मैने मौके को ताड़ते हुए कहा, "रूको अभी. यहाँ तो तुम्हारे हाथ में आते ही कोई ना कोई तुम्हारी काइट काट देगा." फिर मैने दूसरी छ्होटी टेरेस के बारे में बताया, जोकि वहाँ से दिखाई तो नही पड़ रही थी, कहा, "वहाँ से उड़ाते है. वहाँ पतंगे बहुत कम है और तुम्हारी काइट को कोई जल्दी से काटेगा नही और तुम्हे भी उड़ाने में मज़ा आएगा."

मैने जल्दिबाज़ी में अपनी काइट के माँझे को बीच से ही तोड़ दिया. कौन उतारने का झंझट करे. मुझसे ज़्यादा जल्दी इस वक़्त और किसे होगी, फ्रेंड्स?

मैने 10-12 पतंगे साथ में ली और स्टेरकेस के दूसरी तरफ चल पड़ा. मेरे पीछे-पीछे नताशा हाथ में चरखी पकड़े हुए चल पड़ी. किसी ने हमे नही पूछा की कहाँ जा रहे हो. सब अपनी पतंगे उड़ाने में मशगूल थे. हम दोनो उस छ्होटी टेरेस पर चढ़ गये. वहाँ से बड़ी टेरेस वाले नही दिखाई दे रहे थे और उन लोगो को हम नही दिखाई दे रहे थे. अगाल बगल में बिल्डिंग्स नीचे थी जिसे हमे कोई तकलीफ़ नही थी. मैने वाहा पहुँचते ही काइट को उड़ाया और चरखी खुद पकड़ कर काइट उसके हाथ में दे दी. पहली बार उड़ाने के कारण उसे काइट संभालने में काफ़ी दिक्कत हो रही थी इसलिए काइट को मैने वापस अपने हाथ में ले ली.

अब मैने वही पुरानी टॅक्टिक्स अपनाई. इस बार जगह छ्होटी होने से मैं बार-बार और जल्दी-जल्दी अपनी कोहनी से उसके मम्मो पर रगड़ देने लगा. बस इतना ध्यान रखा कि कोई ज़ोर से ना मार दूँ. मैने महशूष किया की नताशा के मम्मे मुझे इस बार ज़्यादा कड़क लगे. इस पर गौर करते हुए पीछे मूड कर देखा तो मेरा मुँह आश्चर्या से खुला रह गया. नताशा अपना सीना थोडा आगे की और कर के आँखे बंद किए हुए खड़ी है. यानी खुद मेरी कोहनी की रगड़ खाने के लिए उतावली हो रखी है. मैने झूमते हुए काइट को उड़ाते हुए कोहनी से थोड़े ज़्यादा दबाते हुए उसके दोनो मम्मो पर बारी बारी रगड़ मारी. वॉववव! उसके मुँह से सिसकारी निकल रही थी. उफ़फ्फ़! यह सुनकर मेरा लंड तो दंडनाता हुआ खड़ा हो गया. मेरा जोश बढ़ गया. अब मुझे एक कदम और आगे बढ़ाना था. फिर एक आइडिया दीमाग में आया. आरे वह मेरे शैतान दीमाग!!!

मैने नताशा के हाथ में फिर से काइट थमा दी. उसे उड़ाने में दिक्कत होने पर मैने उसका हाथ थाम कर उसे उड़ाने के बारे में सिखाने लगा. सिखाना तो बहाना था. मैं तो अपनी जाँघो से उसके गोल-गोल चूतड़ को रगड़ रहा था. मेरा लंड मेरी जीन्स के अंदर कहीं च्छूपा हुआ था लेकिन था बड़ा अलर्ट. उसके चूतड़ का अहसास पाते ही फुंफ-कारने लगा. उसके हाथो को काइट उड़ाने के बहाने अपने हाथों से पकड़ रखा था. उसकी कोमल स्किन की छुहन मेरे जिस्म में बिजली पैदा कर रही थी. काइट को संभालने के कारण हम दोनो के हाथ एक साथ आगे पीछे हो रहे थे. जिसे मेरे हाथ उसके मम्मो को टच कर रहे थे. मैं अब उसके मम्मो के एकदम नज़दीक पहुँच चुका था. वो भी मज़े लेती हुई अपने हाथो को थोड़े ज़ोर से आगे पीच्चे कर रही थी जिसे उसके मम्मो पेर हाथो की टक्कर भी ज़ोर से होने लगी. इसके साथ ही उसकी सिसकारियाँ बढ़ने लगी. उसकी आँखे बंद होने लगी.

मैने इसका फयडा उठाते हुए अपनी झंघों का ज़ोर उसके चूतड़ पर बढ़ा दिया. मेरा लंड शायद उसकी चूतड़ के क्रॅक्स के बीच लगा हुआ था. शायद इसलिए की दोनो की मोटी जीन्स पहने होने के कारण मालूम नही पड़ रहा था. फिर भी मैं कोशिश में लगा हुआ था. अब मेरे हाथ बार-बार उसके उन्नत और बड़े मम्मो के पास ही रह रहे थे. मैं अपने गालों को उसके गालों से टच करने की कोशिश करने लगा. हमारा ध्यान अब काइट उड़ाने पर नही बल्कि एक दूसरे में खो जाने में हो रहा था. काइट तो हमारी कोई पेच लगा कर काट चुका था लेकिन हम दोनो इस नये पेच लड़ाने में लगे हुए थे. अब मेरे हाथ सीधे उसके मम्मो को थाम चुके थे. उफफफफ्फ़! उसके मांसल और कड़क मम्मे मेरी हथेलियों के बीच में थे. मैं उनको सहला रहा था. वो आँखें बंद किए हुए सिसकारी लेते हुए अपने चूतड़ का ज़ोर मेरे लंड की तरफ बढ़ा रही थी.

इसी बीच मैने अपने घुटने से उसके घुटनो को मोड़ा और हम दोनो टेरेस के फर्श पर जा बैठे. अब उसका मुँह मेरी तरफ. उसका कोमल चेहरा, बंद आँखें, भारी साँसें और रूस से भरे तपते होंठ मुझे चूमने का इन्विटेशन देते हुए मेरी ओर बढ़े. मैं झट से अपने दोनो हथेलियों से उसको थाम लिया और अपने होंठो को उसके रसीले होंठो पर रख दिया. अफ... मादक रसीले होंठ... नरम और गरम... तपते हुए उसके होंठ... संतरे की फांको के जैसे मीठे होंठ...

 


नताशा भी अपनी आँखें बंद किए हुए मेरे तपते होंठो का जूस अपने नीचले होंठ से पी रही थी. मेरे दोनो हाथ अब उसके कोमल गालों को छ्छू रहे थे. उसकी रेशमी जुल्फें हमारे दोनो के चेहरे पर बिखरी हुई थी. उन्न रेशमी ज़ुल्फो के नीचे हम दोनो एक ज़ोर दार चुंबन लेने में लगे हुए थे. मैं उसके गालों को, कान को और उसकी बंद आँखों को अपनी हथेली से सहला रहा था. दोनो दीन-दुनिया से बेख़बर एक दूसरे के आगोश में खोए चुंबन पर चुंबन ले रहे थे. मैं अब अपने हाथों को नीचे लाते हुए उसकी टाइट टी-शर्ट में छिपे हुए उसके 2-2 गथीले और उभरे हुए उसके मम्मो को सहलाने लगा. सहलाते ही नताशा के मुँह से सिसकारी निकल पड़ी. सिसकारी के साथ ही उसके मुँह से थूक बाहर निकलने लगा. मैने झट से उसके दोनो मम्मो को थोड़ा ज़ोर से दबा दिया

"हाई दायया... थोड़ा धीरे..." बस इतना ही निकला उसके मुँह से.

मैने फिर से अपनी जीभ उसके मुँह में थेल्ते हुए उसके उसकी नरम जीभ का स्वाद लेने लगा और उसके मम्मो को सहलाते रहा. अब वो बेसब्री हो उठी. उसके हाथ मेरे सीने से फिसलते हुए मेरी जीन्स की चैन के पास आ गिरे. मैने थोडा बैठते हुए उसे अपनी बाहों में जाकड़ लिया. मैं उसके मम्मो को अब टी-शर्ट के अंदर से बाहर निकालने की कोशिश करने लगा. वो मेरी जीन्स की चैन को खोलने की कोशिश कर रही थी. तभी नीचे टेरेस एक-साथ ज़ोर दार आवाज़ गूँज उठी. शायद किसी की काइट किसी ने काटी थी. हम दोनो एक दूसरे की आँखों में देखा. एक दूसरे को छ्चोड़ने का सवाल नही था लेकिन यहाँ कपड़े उतारना भी ख़तरे से खाली नही था.

तभी मैने कहा, "नताशा, चलो नीचे चलते हैं."

वो बोली, "कहाँ? अब रहा नही जा रहा है राज शर्मा."

"नीचे एक रूम है. मैं पहले नीचे उतरता हूँ. पीछे पीछे तुम भी एक-दो मिनिट बाद नीचे आ जाना," मैने उसे कहा.

उसको छोड़ते हुए मैने फिर से उसके मदमुस्त होंठो का एक चुंबन ले लिया और नीचे टेरेस पेर उतर कर सीधा 2न्ड फ्लोर के खाली रूम, जोकि मेरा और मेरे फ्रेंड्स का ऐषगाह था, की तरफ निकल पड़ा. 3 मिनिट बाद नताशा भी वहाँ पर आ गयी. मैने रूम के पीछे वाली खिड़की को खोला और यहाँ-वहाँ देखने के बाद नताशा को रूम के अंदर खिड़की से जाने को कहा. नताशा के घुसने के बाद मैं भी अंदर घुस गया. अब रूम में हम दो ही थे. दो जिस्म दो जान जोकि एक जान होने वाले थे. मैने नाइट बल्ब जला दिया और नताशा को अपनी बाहों में भर लिया.

क्रमशः................

 


Udi Re....Meri Patang Udi Re...

Hello dosto Main yaani aapka dost Raj sharma aapke kiye ek our nai kahaani lekar haajir hun. dosto Abhi gayi Makar Sankranti per jo hua us per mujhe aaj bhi vishwas nahi ho paa raha hai. Mumbai mein Makar Sankranti her varsh 14 January ko manayi jaati hai aur is din ko Patang ka tyohaar kahte hai. Hajaaro Patange udaayi jaati hai. Log terrace per chadh kar group banakar din bhar Patange udaate rahte hai. Main bhi aur meri building wale bhi patange udaane ke bade shaukin hai. Hum log subah se hi terrace per chadh jaate hai aur shaam dhale hi wapas neeche aate hai. Hamaari building ki terrace bahut badi hai isliye dusri jagah ke log bhi hamari building mein patange udaane aate hai. Hum log apne freinds ko bulate hai hamare saath enjoy karne ke liye. Is badi terrace ke saath ek paani ki tanki ke liye ek chhoti terrace bhi bani huyi hai jo terrace ke dusre hisse mein hai. Patange udaane ke liye sub log badi terrace hi use karte hai. Chhoti terrace main terrace se ek manzil upar bhi hai aur staircase ke dusri taraf bhi hai. Us taraf dusri buildings dur hone ke karan patange bhi kam udati hai.

Main middle class family se hoon aur apne pariwaar ke saath bhaade ke ghar mein rahta hoon. Hammari building mein sub log bhaade se hi rahte hai. Makaan malik dusri jagah rahta hai. Building mein kai kamre khaali bhi hai. Kayi teen-chaar saalon se khaali pade hai. Mera ghar teen room ka hai. Aage kone mein ek room kaafi dino se khaali pada hai to maine uski khidki, joki back side ke barramda mein khulti hai, ke skrew nikaal diye. Jise main usko nikaal ker din mein kaafi baar us room ko kaam mein leta tha. Kisi ko maloom bhi nahi padta tha. Makaan Malik ne uski electricity chaalu rakh chodi thi isliye fan aur light ki koi problem nahi hoti thi. Hum freinds log usme baithkar Raj sharma ki kaamuk kahaniya ya Masti-blast jaisi deshi video ya videshi video dekhte the. Matlab yeh hamaari aiyaashi ka adda tha. Andar ek mej aur do-teen kursiya padi huyi thi.

Main B.Com ke final year mein hoon. Umra 19 years aur kad 5'9" aur kasrati badan. Rang gora aur chehre se khoobsurat. College mein meri kaafi ladkiyon se dosti hai joki mere rang roop per fida hai. Main bhi inke saath kaafi khela khaya hua hoon aur hamare sharirik sambhandh bhi bane huye hai. Mujhe nayi-nayi attactive ladkiyon se dosti karne mein maza aata hai aur isme main kaafi successful bhi raha hoon. Mere 8" ke lambe samaan ki kayi ladkiya deewani hai.

Khair baat Makar Sakranti wale kise ki. Us din hum log sub terrace per subah 9 baje se hi terrace se patange udaane mein lage huye the. Main aur meri bahan Rashmi terrace per dusre logo ke saath patange udaane mein lage huye the. Dopahar mein khaana khaane ke baad hum log wapas uper terrace per aa gaye. Tabhi maine dekha ki ek ladki joki tight T-shirt aur tight jeans pahne huye wahan khadi Patange udne ka maza le rahi thi. Khud to nahi udaa rahi thi lekin charkhi pakde huye enjoy kar rahi thi. Maloomaat karne per maloom hua ki hamaare kisi padosi ki dur ki rishtedaar hai aur yahi paas mein kahi rahti hai. Naam uska Natasha hai.

Natasha ki umra mujhe 18 varsh se jyada ki nahi lag rahi thi. Height kareeban 5'4" rang medium lekin body bole to ekdum jhakas!! Uff! Tight T-shirt mein chhupe huye medium se bade uske anaar, patli kamar aur tight jeans se dhake huyi uski mansal jhanghein aur round shape ke chutad. Haiii. Yess, mera man usko dekh kar tadaf utha. Wakai mein mera dil balle-balle karne laga. Uski t-shirt ke tight hone ki wajah se uske boobs ki nukili nok mere kaleje ko chirti jaa rahi thi. Mere lund mein reh-reh kar tanav paida ho raha tha. Man kar raha tha ki manjha aur patang ko chodkar uske mammo ko hatheli mein lekar masal doon. Ufff! Kya kaatil jawaani thi uski. Wo bhi itni der mein teen-chaar baar nazrein ghuma kar mujhe upar se neeche tak dekh rahi thi. Uski nazrein reh-reh kar mujh per tik jaati. Meri nazrein to patang per kam uske uper jyaada thi.

Meri bahan joki meri charkhi pakde huye thi ki achanak boli, "Bhaiya, mujhe jara neeche jaana hai, tum jara charkhi pakad lo naa."

Meri patang us samay kaafi uper thi isliye maine kaha, "Jara 10-15 minat ruko, Rashmi. Abhi charkhi kaun pakdega?"

Lekin Rashmi boli, "Urgent kaam hai bhaiya. Lo main kisi dusre ko pakdaati hoon."

Sayong se us samay Natasha ke haath mein koi charkhi nahi thi. Meri bahan usko jaanti bhi thi. Usne Natasha ko bulaya aur kaha, "Please yeh charkhi thodi der ke liye pakad lo. Mujhe urgent kaam se neeche jaana hai."

Natasha ne meri charkhi Rashmi ke hath se le li. Ab meri us samay ki chahat ke hath mein meri dor ho gayi.

Maine use hai hello kiya, "Hi. I'm Raj sharma."

Natasha ne jawab diya, "Hi. I'm Natasha."

Phir main patang udaane mein lag gaya. Beech-beech mein usko dekhne ke bahaane sir peeche ker use kuchh-na-kuchh baat kar leta. Ise mujhe maloom hua ki wo chaar saal pahle hi apne gaon se Mumbai mein aayi hai aur Second Year BA mein hai. Uske bolne ke andaaz se lag gaya ki wo Mumbai mein kaafi enjoy kar rahi hai. Uski gaon waali sharam haiya khatam ho chuki hai. Wahan use patange kabhi udaane nahi mili thi. Lekin use patang udte huye dekhna khoob pasand hai.

Maine mehshoosh kiya ki Natasha ka charkhi pakadna perfectly nahi aata hai. Maine use bataya ki patang udaane waale ke haath ke ishare ko samajh kar kaise charkhi pakdi jaati hai. Kaise udaane waale ke peechhe khada hua jaata hai. Itna sab bataane se usne charkhi pakadne ka andaaz badla aur mujhe bhi patang udaane mein aashani hone lagi. Main baar-baar peechhe dekhkar uske mammo ka ankhon se raswadan kar leta tha. Uska chehre ki sunderta ko pi leta tha. Wo bhi meri ankhon mein ankhein daal kar mujhe taakti rahti. Jise mera utsah badh raha tha. Mere college ka experience mere kaam aa raha tha. Tabhi mujhe ek idea sujha

Main ab apni udati huyi patang ko ek side mein le gaya aur peechhe ki taraf hone laga jise Natasha bhi mere saath peechhe hone lagi. Mere unexpected peechhe hone se mera badan uske jism se ragad khaa jaata. Ise mere badan mein chingariyaan paida hone lagi. Main apni patang ko neeche utaarne ke bahane apni kohni se uske mammo ko touch karne laga. Phir wapas se dheel de kar patang ko aur aage badha deta. Aisa aadhe ghante mein maine naa jaane kitni baar kiya hoga. Uske mamme se meri kohni ke halke touch se mere jism mein angaare bhar rahe the. Uski taraf se koyi naraazgi naa dekhkar mujhe laga maza to use bhi aa raha hai. Main apni is kohni ki harkat ka bade hi andaaz se lutf utha raha tha. Is beech meri kayi patange cut gayi. Turant hi dusri nayi patang udaa deta. Aur is lutf ka maza uthata raha.

Tabhi meri bahan Rashmi wapas aa gayi. Uske saath meri family ke dusre members bhi aa gaye. Rashmi ne aate hi kaha, "Natasha, laa ab charkhi mujhe...."

Maza kharab hote huye dekh maine turant hi beech mein bol diya, "Rashmi, jaa. Tu Papa ki charkhi pakad le. Natasha abhi meri charkhi pakadi huyi hai."

Natasha ne mohak andaaz se muskrate huye kaha, "Rashmi, main theek hoon yahan. Tu apne papa ki charkhi le le."

Ab mujhe yakeen ho gaya ki mera teer nishane per laga hua hai. Aata Kudi Fasli. Machhli jaal mein aa rahi hai. Main apne naye shikaar ko paa kar bada kush ho raha tha. Uske bade aur nukile mammo ko ab masalne ka upaay khojne laga. Tabhi meri yeh ichchha puri hone aa gayi.

Natasha ne kaha, "Raj sharma, mujhe bhi patang udaane do na."

Maine poochha, "Tumhe aata hai patang udaana."

Natasha ne inkaar mein sir hilate huye kaha, "Nahi. Maine kabhi bhi patang nayi udaayi hai."

Tab maine mauke ko tadte huye kaha, "Ruko abhi. Yahan to tumhare hath mein aate hi koyi na koyi tumhaari patang kaat dega." Phir maine dusri chhoti terrace ke baare mein bataya, joki wahan se dikhai to nahi pad rahi thi, kaha, "Wahan se udaate hai. Wahan patange bahut kam hai aur tumhari patang ko koyi jaldi se katega nahi aur tumhe bhi udaane mein maza aayega."

Maine jaldibazi mein apni patang ke manjhe ko beech se hi tod diya. Kaun utaarne ka jhanjhat kare. Mujhse jyada jaldi is waqt aur kise hogi, freinds?

Maine 10-12 patange saath mein li aur staircase ke dusri taraf chal pada. Mere peechhe-peechhe Natasha hath mein charkhi pakde huye chal padi. Kisi ne hame nahi poochha ki kahan jaa rahe ho. Sab apni patange udaane mein mashgul the. Hum dono us chhoti terrace per chadh gaye. Wahan se badi terrace waale nahi dikhai de rahe the aur unn logo ko hum nahi dikhai de rahe the. Agal bagal mein buildings neeche thi jise hame koi takleef nahi thi. Maine waha pahunchte hi patang ko udaaya aur charkhi khud pakad kar patang uske hath mein de di. Pahli baar udaane ke kaaran use patang sambhalne mein kaafi dikkat ho rahi thi isliye patang ko maine wapas apne haath mein le li.

Ab maine wahi purani tactics apnaayi. Is baar jagah chhoti hone se main baar-baar aur jaldi-jaldi apni kohni se uske mammo per ragad dene laga. Bus itna dhyaan rakha ki koyi jor se naa maar doon. Miane mehshoosh kiya ki Natasha ke mamme mujhe is baar jyaada kadak lage. Is per gaur karte huye peechhe mud kar dekha to mera munh ashcharya se khula rah gaya. Natasha apna seena thoda aage ki aur kar ke aankhe band kiye huye khadi hai. Yaani khud meri kohni ki ragad khaane ke liye utaawali ho rakhi hai. Maine jhoomte huye patang ko udaate huye kohni se thode jyaada dabate huye uske dono mammo per baari baari ragad maari. Wowww! Uske munh se siskaari nikal rahi thi. Ufff! Yeh sunkar mera lund to dandanaata hua khada ho gaya. Mera josh badh gaya. Ab mujhe ek kadam aur aage badhana tha. Phir ek idea deemag mein aayi. Aarey wah mere shaitaan deemag!!!
 


Maine Natasha ke hath mein phir se patang thama di. Use udaane mein dikkat hone per maine uska hath thaam kar use udaane ke baare mein sikhaane laga. Sikhaana to bahaana tha. Main to apni jhanghon se uske gol-gol chutad ko ragad raha tha. Mera lund meri jeans ke andar kahin chhupa hua tha lekin tha bada alert. Uske chutad ka ehshaash paate hi fumf-kaarne laga. Uske hatho ko patang udaane ke bahane apne hathon se pakad rakha tha. Uski komal skin ki chhuhan mere jism mein bijli paida kar rahi thi. Patang ko sambhalne ke kaaran hum dono ke haath ek saath aage peeche ho rahe the. Jise mere hath uske mammo ko touch kar rahe the. Main ab uske mammo ke ekdum nazdeek pahunch chuka tha. Wo bhi maze leti huyi apne hatho ko thode jor se aage peechhe kar rahi thi jise uske mammo per hatho ki takkar bhi jor se hone lagi. Iske saath hi uski siskariyaan badhne lagi. Uski aankhe band hone lagi.

Maine iska fayda uthate huye apni jhanghon ka jor uske chutad per badha diya. Mera lund shaayad uski chutad ke cracks ke beech laga hua tha. Shaayad isliye ki dono ki moti jeans pahne hone ke karan maloom nahi pad raha tha. Phir bhi main koshish mein laga hua tha. Ab mere hath baar-baar uske unnat aur bade mammo ke paas hi rah rahe the. Main apne gaalon ko uske galon se touch karne ki koshish karne laga. Hamaara dhyaan ab patang udaane per nahi balki ek dusre mein kho jaane mein ho raha tha. Patang to hamaari koyi pech laga kar kaat chuka tha lekin hum dono is naye pech ladaane mein lage huye the. Ab mere hath sidhe uske mammo ko thaam chuke the. Ufffff! Uske maansal aur kadak mamme meri hatheliyon ke beech mein the. Main unko sahla raha tha. Wo ankhein band kiye huye siskari lete huye apne chutad ka jor mere lund ki taraf badha rahi thi.

Isi beech maine apne ghutne se uske ghutno ko moda aur hum dono terrace ke farsh per jaa baithe. Ab uska munh meri taraf. Uska komal chehra, band ankhein, bhaari sansein aur rus se bhare tapte honth mujhe chumne ka invitation dete huye meri aur badhe. Main jhat se apne dono hatheliyon se usko thaam liya aur apne hotho ko uske raseele hontho per rakh diya. Uff... madak raseele honth... naram aur garam... tapte huye uske honth... santre ki fanko ke jaise meethe honth...

Nataasha bhi apni ankhein band kiye huye mere tapte hontho ka juice apne neechle honth se pee rahi thi. Mere dono hath ab uske komal galon ko chhoo rahe the. Uski reshmi julfein hamare dono ke chehre per bikhari huyi thi. Unn reshmi julfon ke neeche hum dono ek jor dar chumban lene mein lage huye the. Main uske galon ko, kaan ko aur uski band ankhon ko apni hatheli se sahla raha tha. Dono deen-duniya se bekhabar ek dusre ke agosh mein khoye chumban per chumban le rahe the. Main ab apne hathon ko neeche laate huye uski tight T-shirt mein chhipe huye uske 2-2 gatheele aur ubhare huye uske mammo ko sahlaane laga. Sahlaate hi Nataasha ke munh se siskari nikal padi. Siskari ke saath hi uske munh se thook bahar nikalne laga. Maine jhat se uske dono mammo ko thoda jor se daba diya

"Hai dayya... thoda dheere..." bus itna hi nikla uske munh se.

Maine phir se apni jeebh uske munh mein thelte huye uske uski naram jeebh ka swaad lene laga aur uske mammo ko sahlaate raha. Ab wo besabra ho uthi. Uske hath mere seene se fislate huye meri jeans ki chain ke paas aa gire. Main thoda baithte huye use apni bahon mein jakad liya. Main uske mammo ko ab T-shirt ke andar se bahar nikaalne ki koshish karne laga. Wo meri jeans ki chain ko kholne ki koshish kar rahi thi. Tabhi neeche terrace ek-saath jor daar awaj gunj uthi. Shayad kisi ki patang kisi ne kaati thi. Hum dono ek dusre ki ankhon mein dekha. Ek dusre ko chodne ka sawaal nahi tha lekin yahan kapde utaarna bhi khatre se khaali nahi tha.

Tabhi maine kaha, "Nataasha, chalo neeche chalte hain."

Wo boli, "Kahan? Ab raha nahi jaa raha hai Raj sharma."

"Neeche ek room hai. Main pahle neeche utarta hoon. Peechhe peechhe tum bhi ek-do minat baad neeche aa jana," Maine use kaha.

Usko chodte huye maine phir se uske madmust hontho ka ek chumban le liya aur neeche terrace per utar kar seedha 2nd floor ke khaali room, joki mera aur mere freinds ka aishgaah tha, ki taraf nikal pada. 3 minat baad Nataasha bhi wahan per aa gayi. Maine room ke peechhe waali khidki ko khola aur yahan-wahan dekhne ke baad Nataasha ko room ke andar khidki se jaane ko kaha. Nataasha ke ghusne ke baad main bhi andar ghus gaya. Ab room mein hum do hi the. Do jism do jaan joki ek jaan hone waale the. Maine night bulb jala diya aur Nataasha ko apni bahon mein bhar liya.

kramashah................

 


गतान्क से आगे..............

नताशा और मैं दोनो एक दूसरे के जिस्म से अपने जिस्म को रगड़ रहे थे. गालों से गालों को... होंठो से होंठो को... सीने से सीने को... और... जांघों से जांघों को... फिर मैने सामने पड़ी मेज को खाली किया और नताशा को उस पर लेटा दिया. नताशा आँखें मुन्दे लेट गयी. मैं उसके पास आकर उसके मम्मो को उसकी टाइट टी-शर्ट पर से ही चूमने लगा. उसके कड़क मम्मे मेरे मुँह में भी नही समा रहे थे. अपने होंठो से उसके मम्मो को रगड़ रहा था. साथ ही नताशा की सिसकियाँ निकल रही थी. फिर मैने बेसबरा होते हुए उसकी टी-शर्ट को उतार फेंका. उसके मम्मे अब लो-कट ब्रा के पीछे छुपे हुए नज़र आने लगे. मैं अपने दोनो हाथों से उसके मम्मो को चोली के साथ ही दबाने लगा. उसके कड़क मम्मे मेरे हाथो में भरे हुए थे. नताशा के मुँह से सिसकारी निकल रही थी. उसके मम्मो को मसल्ते हुए मेरे लंड में ऐंठन होने लगी. लंड जीन्स के बाहर आने को उतावला हो रहा था. मैने अपनी टी-शर्ट को उतार कर रूम के एक कोने की तरफ फेंक दिया.

तभी नताशा मेरे कसरती बदन को देखते ही मेज पर उठ कर बैठ गयी और मेरी बनियान को पकड़ कर मेरे गालों को चाटने लगी. मेरे होंठो को चूमने लगी. उसके दोनो हाथ मेरे बालों और गालों को सहला रहे थे. उसके तपते होंठ मेरे होंठो को चूम रहे थे. मेरे सीने को अपने हाथों से रगड़ रही थी. उसकी गरम साँसे पूरे रूम में तूफान ला रही थी. अपने हाथों से उसने मेरी बनियान को फाड़ फेंका. फिर मेरी जीन्स के उभरे हुए भाग को अपनी हथेली में जाकड़ लिया. अब वो अपने हाथों से करतब दिखती हुई मेरे लंड को मसल्ने लगी. मेरा लंड बहाल हो रहा था. जीन्स में क़ैद बेबस लंड उसके हाथों में उच्छल-कूद मचा रहा था. नताशा ने जीन्स की चैन खोल कर मेरे अंडरवेर के साथ ही मेरे लंड को चाटने लगी. मेरे अंडरवेर सहित ही मेरे लंड को अपने मुँह में डाल लिया. मैं बेहवाश हो गया.

मेरी यह हालत देख नताशा ने मेरे अंडरवेर को नीचे कर मेरे 8 इंच के लंड को अपने हाथ में थाम लिया. मेरा लाल-लाल लंड किसी गुसेले सांड़ की तरह उसे ताक रहा था. अपने हाथों से तौलते हुए मेरे लंड को सहला रही थी. मेरा लंड बार-बार उच्छल कर उसे सलामी दे रहा था. उसने अपने गालों को मेरे लंड के नज़दीक ला कर रगड़ने लगी. मेरा लंड उसके नरम-नरम गरम-गरम गालों से टच हो कर लोहे की तरह सख़्त हो गया. मैने उसके बालों को पकड़ा और अपना लंड उसके होंठो के पास कर दिया. मगर उसने केवल अपनी जीभ ही बाहर निकाली और मेरे सुपारे को सिर्फ़ टच ही कर रही थी. मैं पागल हो गया. मैं उसके बालों को पकड़े हुए अपने लंड को उसके मुँह में डालने को उतावला हो रहा था. लेकिन वो मेरे सांड़ जैसे लंड को और पागल करने पर उतारू थी. फिर उसने अपने रसीले होंठो को ओ की तरह कर मेरे लंड के सुपारे को अपने होंठो के बीच दबा लिया.

अब मैं बेसबरा होते हुए उसके बालों को एक हाथ से पकड़े हुए अपने चुतड़ों का धक्का मारने लगा और अपने लंड को थोड़ा अंदर घुसाने को कामयाब हो गया. इसके साथ ही नताशा ने मेरे लंबे और मोटे लंड को अपने मुँह में अंदर जाने के लिए अपने होंठो को और खोल दिया. अब मेरे लंड आधे से ज़्यादा उसके मुँह में घुस गया. उसने मेरे लंड को अब चूसना शुरू कर दिया. अब सिसकारियाँ निकालने की मेरी बारी थी. मुझे बड़ा ही शकून मिलने लगा. नताशा एक एक्सपर्ट की तरह मेरे लंड को चूस रही थी. इस मुख चुदाई से मेरा लंड और सख़्त हो गया. मैं अब अपने चूतड़ के धक्के मार कर उसके साथ मुख-चोदन करने लगा. तभी लगा कि मेरे लंड का पानी निकल सकता है तो मैने अपना लंड बाहर निकाल लिया. नताशा मेरे चेहरे की तरफ देखने लगी.
 


मैने कहा, "नताशा, मेरा पानी निकल जाएगा."

नताशा ने कहा, "तो निकल जाने दो. रुके क्यों?"

मैने कहा, "नही. अभी नही. लास्ट में एक साथ पानी निकालूँगा."

इसके साथ ही मैने अपनी जीन्स को नीचे कर अंडरवेर और जीन्स को निकाल फेंका और उसके चोली में छिपे ख़ज़ाने को मुँह से रगड़ने लगा. मैं अपने लंड को थोड़ा आराम देना चाहता था. मैं अपने दोनो हाथों से उसके मम्मो को मसल और दबा रहा था. नताशा की सिसकारी मम्मो को दबाने के साथ ही निकल पड़ी. अब मैं समझा कि उसके मम्मे बड़े सेन्सिटिव है. टच करते ही उसके जिस्म में एक झूर-झूरी फैल जाती है. शायद काइट उड़ाते वक़्त मेरे लगे उसके मम्मो पर धाक्के के कारण ही अभी वो इस हालत में मेरे साथ है. फिर नताशा को मेज पर लेटा कर उसकी ब्रा को खोल बाहर निकाला और उसके मम्मो को चूमने, चाटने लगा. उसके बड़े साइज़ के, कड़क, सुडोल और उन्नत मम्मे मुझे जी भर कर मासल्न को कह रहे थे. मैं उन्न मम्मो पर टूट पड़ा. वो भी आँखे बंद किए बड़े आराम से सिसकारियाँ लेती हुई रगडवा रही थी. मैने अपने मुँह में जी भर कर चूसा.

इसी बीच नताशा ने अपनी जीन्स और पॅंटी को अपनी टॅंगो से नीचे धकेल कर पूरी तरह नंगी हो कर मेरे सामने चित्त लेट गयी. अब मैं अपने मुँह को नीचे लेटे हुए उसकी कोमल और रेशम जैसी झांतो को चूमते हुए अपने मुँह को उसकी चूत पर टीका दिया. उसकी चूत जोकि उसके जूस से पूरी तरह गीली हो चुकी थी. मैने अपनी जीभ बाहर निकाली और उसकी जांघों और उसकी झांतों को चाटने लगा. गुद-गुडी हो रही थी नताशा को. अपनी दोनो झंघों को सिकोड रही थी. मैं अपनी एक हथेली उसकी झंघों के बीच फँसा कर अपनी जीभ से उसकी चूत को चाटने लगा. उसकी जुवैसी चूत मेरे जीभ के टच होते ही और जूस निकालने लगी. मस्ती से भरी हुई नताशा ने अब अपनी दोनो झंघों को खोल कर अपनी चूत को मेरे सामने परोस दिया. मैं उसके चूत-दाने को अपनी एक अंगूली से रगड़ने लगा. जिसे उसकी सिसकारियाँ ज़ोर पकड़ने लगी. साथ ही मैं अपने एक हाथ से उसके एक मम्मे को मसल रहा था. फिर मैने अपनी जीभ उसकी चूत के अंदर घुसा दी और मुँह से उसकी चूत की चुदाई करने लगा.

अब नताशा बेसबरा हो कर बैठ गयी. उसे सहन नही हो पा रहा था. उसने मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ लिया और अपने गालों से रगड़ने लगी. अब वो मेरे लंड के करतब देखना चाहती थी. उसने मेरे लंड को मुँह में डाला और चूसने लगी. मैं उसका इशारा समझा और देर नही करते हुए उसकी दोनो टाँगो को मेज पर फैलाया और अपने लंड का सुपरा उसकी जुवैसी चूत के मुँह पर लगा दिया. नताशा मेरे लंड को पकड़े हुए अपनी चूत के द्वार से रगड़ रही थी. उसकी चूत मेरे लंड को सटकाने के लिए बेकाबू हो रही थी. मैने अपने लंड को उसकी चूत के मुँह पर फिट किया और एक हल्का सा धक्का दिया. लंड फिसल कर बाहर आ गया. तब मैने उसकी दोनो टाँगो को और चोडा किया और अपने लंड का धक्का ज़रा ज़ोर से मारा. लंड सीधा एक चोथाई उसकी चूत में जा घुसा और बाहर निकली उसकी हल्की चीख.

"हाीइ... उफ़फ्फ़.... ज़रा धीरे से... हाईईइ..." नताशा मेरे लंड का झटका खाते ही हल्की सी चीखी.
 


मैने अब अपने लंड को थोड़ा बाहर निकाला और दो-तीन धक्के दे मारे. इन धक्को के साथ ही शुरू हुई हमारी चुदाई. अब मैं हकले-हल्के धक्के मारते हुए अपने 8 इंच के लंड को करीबन 80% तक घुसा दिया. हल्के-हल्के, मीडियम-मीडियम और फिर तेज धक्के लगाने लगे. मैं उस पर . हुए उसके होंठो को चूस्ते हुए अपने धक्को को बराबर लगाना चालू रखा. नताशा मेरे धक्को को हल्की तकलीफ़ के साथ खा रही थी. लेकिन साथ ही उसकी सिसकारियाँ भी बढ़ती जा रही थी. फिर मैने अपने धक्को की स्पीड पूरी तरह बढ़ा दी. जिसका जवाब मुझे उसके नीचे से बढ़ते धक्को के रूप में मिलने लगा. साथ ही उसकी सिसकारियाँ भी तेज होने लगी. 5-7 मिनिट बाद उसकी सिसकारियाँ बहुत तेज हो गयी.

"उफ़फ्फ़.... एसस्स... चोदो.... चोदो.... ऐसे ही अपने लंड से चोदो.... बड़ा मज़ा आ रहा है.... बड़ा सख़्त है तुमहरा लंड.... काट डालो मेरी काइट जैसी चूत को... अपने माँझे जैसे तीखे लंड से.... . .... चोदो.... मुझे.... .... ऐसे ही...." चुदने की मस्ती में नताशा बॅड-बड़ाने लगी.

उसकी बढ़ती हुई सिसकारियों से मैं जोश में आ गया और उसकी दोनो टाँगो को घुटने से मोदते हुए उसकी टाँगो को उसके मुँह की तरफ कर उसपेर चढ़ गया और दे-दना-दान धक्के पर धक्के लगाने लगा. अब मेरा लंड पूरा का पूरा इस पोज़िशन में उसकी चूत में घुसा जा रहा था. मैं अब अपने लंड को पूरा बाहर निकालता और बेरहमी से उसकी चूत के अंदर झट से घुसा देता. उसकी हालत अब बड़ी गरम हो रही थी.

"उम्म्म.... ह्म्‍म्म्मम... . ऊऊहह.... आओउुउउ..... चोदो.... लंड.... चूत.... चोदो...." सिसकारियाँ लेती हुई . रही थी नताशा

तभी उसने हल्की चीख मारते हुए मुझे कस कर पकड़ लिया और अपनी चूत को मेरे लंड से चिपका कर मुझे अपनी बाहों में ले लिया. मैं समझ गया कि उसकी चूत का पानी निकल रहा है. मैने अपने धक्को की स्पीड को धीमे कर दिया. वो अपने सीने से चिपकते हुए मुझे कस कर जकड़े हुए थी. मैने धीरे-धीरे अपने धक्के देने बंद कर दिए. वो अब लंबी-लंबी साँसे लेते हुए मेरे नीचे चित्त लेटे हुए थी. मेरा लंड अभी भी सख़्त था और उसको चोदने को मचल रहा था.

जब उसकी साँसे बराबर हो गयी तो मैं उसे टेढ़ा करते हुए साइड से उसकी चूत पर वार करने लगा. साथ ही उसके मम्मो को मसल रहा था. उसके चूतड़ मेरी जाँघो से रगड़ खा रहे थे. अपने चूतड़ से धक्के मारते हुए मैं लंड को आधा ही उसकी चूत में घुसा पा रहा था. लेकिन उसके चूतड़ की रगदाई से मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था. मैने धक्के मारने चालू रखे. लंड उसकी चूत में घुसता और फिर झटके से बाहर आ कर वापस उसकी चूत की गुफा में छुप जाता. चूतड़ की रागड़ाई से नताशा का जिस्म बेकाबू होने लगा. वो उठ बैठी.

नताशा ने मुझे अपनी पीठ से धकेलते हुए मुझे मेज पर लेटा दिया और मुझ पर चढ़ बैठी. उसके चूतड़ मेरी तरफ थे. उसने मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ा और अपनी चूत के अंदर मेरे सुपारे को डाल कर एक ज़ोर का झटका दिया जिससे मेरा लंड सुर्र्ररर से उसकी चूत में जा बैठा. अब वो अपने चूतड़ को उच्छलते हुए मेरे लंड को अपनी चूत के अंदर बाहर करने लगी. मैने अपने दोनो हाथ उसके चूतड़ पर रखते हुए उसे सहलाने लगा. उसके दमदार चूतड़ बार-बार मेरी झांघो पर गिरते और उपेर की और उठते हुए फिर से रगड़ मरते. मेरा लंड उसकी चूत की गहराई को पूरी तरह माप रहा था. वो अपने दोनो हाथ मेरी जाँघो पर रख कर मुझसे चुद्वा रही थी.

तभी उसने पोज़िशन बदलते हुए मेरे लंड को बाहर निकाले बिना ही घूम गयी और अपना चेहरा मेरे चेहरे की तरफ करते हुए अपनी चूत को उसी स्पीड से हिलाते हुए धक्के मारने लगी. मैं अब उसके मम्मो को उच्छलते हुए देखने लगा. नताशा मेरे दोनो हाथो को पकड़ कर अपने दोनो मम्मो के पास ले गयी. मैने उसके दोनो मम्मो को थाम लिया. अब वो उपेर-नीचे होते हुए अपनी चूत को मेरी जाँघो से टकराते हुए मेरे लंड को पूरा-का-पूरा अंदर ले रही थी. मैं उसके मम्मो और निपल्स को दबा और मसल रहा था. जिसे उसके जिस्म में जोश भर रहा था और सिसकारियाँ निकल रही थी.
 


"हां.... दबओ मेरे मम्मो को.... बड़ा मज़ा आ रहा है.... मेरे निपल्स को पिंच करो.... उफफफ्फ़.... पूरा अंदर जा रहा है तुम्हारा लंड.... चूत को बड़ा मज़ा आ रहा है ऐसे.... बड़ा सख़्त है तुम्हारा लंड..... एसस्स... एसस्स.... नोच डालो मेरे मम्मो को..... उफफफ्फ़..... हाईईइ..... तुम्हारा लंड..... मेरी चूत..... उफ़फ्फ़ क्या चुद रही है मेरी चूत..... बड़ा.... और बड़ा.... एस्स..... एसस्स.... एसस्स...." चुद्वाते हुए नताशा की सिसकारियाँ बढ़ने लगी.

तभी एक हल्की चीख मारते हुए नताशा मेरे सीने से चिपकटे हुए मुझ पर लेट गयी और गहरी-गहरी साँसे लेने लगी. उसका पानी फिर से निकल गया. लंबी-लंबी गहरी-गहरी साँसे लेते हुए मेरे होंठो को चूमने लगी. मैने उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए अपने सीने से दबा लिया और हम 4-5 मिनट तक ऐसे ही पड़े रहे

जब काफ़ी देर हो गयी और नताशा भी शांत हो गयी तो मैने नताशा को मेज से नीचे उतार कर उसकी दोनो कोहनी को मेज से लगा कर उसे घोड़ी बना दिया. जिसे उसकी चूत पीछे से उभर कर बाहर आ गयी. मेरा लंड लोहे की रोड की तरह अब भी सख़्त था. मैने उसकी चूत को चौड़ा किया और एक जोरदार झटका देते हुए उसकी चूत में डाल दिया. मैने उसके दोनो कंधों को पकड़े हुए अपने लंड के धक्के देने शुरू कर दिए. मेरी जांघे उसके चूतड़ से टकराती हुई मेरे लंड को उसकी चूत की पूरी गहराई तक पहुँचा रही थी. लेकिन 30-35 झटकों में ही नताशा का पानी निकलने लगा. मेरा लंड अभी तक मैदान-ए-जंग में वैसा का वैसा ही खड़ा रह गया.

जब उसका पानी निकल गया तो वो मेज पर से हाथ हटा कर मेरे सामने नीचे बैठ गयी. अब नताशा की और चुद्वाने की हिम्मत नही बची थी. वो मेरे लंड को अपने मुँह से ही झाड़ देने में लगी हुई थी. मेरा लंड कड़क, खड़ा, होशियार और पानी चोद्ने को उतावला. मैने उसके बाल पकड़ कर उसके मुँह को चूत की तरह चोद्ने लगा. अपना लंड बाहर निकाल कर उसके मुँह में पूरा का पूरा पेल रहा था. मेरा पानी अब निकलने ही वाला था कि तभी बाहर आवाज़ होने लगी. सब लोग पतंगे उड़ा कर नीचे आ रहे थे. मुझे मेरी बहन रश्मि की भी आवाज़ भी सुनाई दी. अब रूम में रहने का सवाल ही नही था. मैं बड़ा मयूष हो गया. मयूष तो नताशा भी थी. लेकिन किसी के भी अंदर आने का डर जो ठहरा. मेरा लंड जल्दी से सिकुड़ने लगा. अब सख्ती ख़तम होने लगी.

नताशा फुफउसाते हुए बोली, "विशाल, क्या करें अब? तुम्हारा लंड तो अभी तक झाड़ा ही नही है."

मैने भी धीमे से बोलते हुए कहा, "कोई बात नही. अब तुमसे फिर मुलाकात होगी तभी ही झदेगा यह."

नताशा बोली, "लेकिन कब? ऐसा मौका कब मिलेगा."

मैं बोला, "अब मेरे लंड को झाड़ने के लिए तुम्हे जल्दी ही मुझसे मिलना होगा. चलो अच्च्छा है. इसी बहाने तुम अब मुझसे जल्दी ही मिलॉगी."

नताशा बोली, "अब कैसे करें?"

मैने कहा, "तुम बाहर निकलो और बाजू में बाथरूम है. वहाँ जा कर बाहर चले जाना. किसी को भी शक नही होगा. मैं भी थोड़ी देर में बाहर आ जाऊँगा."

हमने अपने-अपने कपड़े पहने और मैं नताशा को बाहर भेज कर 2-3 मिनट बाद खुद भी बाहर आ गया. देखा नताशा मेरी बहन रश्मि से बात कर रही है. फिर उसे बात करते हुए बाइ-बाइ कर नीचे उतरने लगी. मैं भी चुप-चाप पास में आकर खड़ा हो गया और अप्पर टेरेस पर जाने लगा. मेरी आज की कहानी यही ख़तम होते दिखी. बड़ी खीज हो रही थी कि 5-7 मिनट और मिल जाते तो क्या हो जाता?
 
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