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एक अनोखा बंधन**:-कि नई शुरुआत (2) complete

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दोपहर हो चुकी थी और बच्चों ने कुछ भी नहीं खाया था| हम डाइनिंग टेबल पे बैठे थे और छोले-कुलचे माँ ने परोस दिए थे| संगीता बिलकुल खामोश थी, कुछ भी बोल नहीं रही थी| प्लेट में सामने खाना पड़ा था पर ना तो मेरा मन हो रहा था की मैं कुछ खाऊँ और ना ही संगीता का मन था| पर उन्हें कुछ खिलाना जर्रुरी था वरना कमजोरी आ सकती थी!

मैं: हम्म्म....

मैंने उन्हें इशारे से खाने को कहा पर उन्होंने ना में सर हिला दिया| अब मैंने ही आगे बढ़ के उन्हें एक कौर खिलने को अपना हाथ उनके मुँह के आगे ले गया और आँखों से उनसे रिक्वेस्ट की तो उन्होंने अपना मुँह खोला और कौर खा लिया| बच्चे भी सहमे हुए थे;

मैं: नेहा....आयुष...इधर आओ बेटा|

मैंने उन्हें अपने पास बुलाया और अपनी ही प्लेट से उन्हें बारी-बारी कौर खिलाने लगा|

पिताजी ने माँ को कहा की वो आयुष को खिलाएं और इधर पिताजी ने खुद नेहा को अपनी गोद में बिठाया और उसे खिलाने लगे| जब तक खाना खत्म नहीं हुआ कोई भी कुछ बोला नहीं| खाने के बाद पिताजी बोले;

पिताजी: बेटा तूने मुझे बताया क्यों नहीं की घर में इतना सब कुछ हुआ है| तेरे हाथों में खून देख के मुझे लगा तूने उसे इसलिए पीटा होगा की वो तंग करने आया होगा या नशे में होगा पर तूने कारन क्यों नहीं बताया?

मैं: मैं....अपने होश में नहीं था....

पिताजी: समझ सकता हूँ| तू जा के आराम कर और बहु का ख्याल रख...मैं तेरी माँ को सारी बात बताता हूँ|

मैं: जी

मैं उठ के कमरे में आया तो संगीता अब भी गुम-सुम बैठी थी| मैं ऊके पास जाके बैठ गया और उसके हाथों को अपने हाथों में लिया| वो आके फिर से मुझसे लिपट गई और मूक उनके सर पे हाथ फेरता रहा| इतने में फोन की घंटी बज उठी, मैंने फोन देखा तो संतोष का था; मैं वहीँ बैठे-बैठे बात करने लगा और संगीता फिर से अपना सर दिवार से टिका के बैठ गई|

मैं: हाँ संतोष बोलो?

संतोष: भैया आप आ गए दिल्ली?

मैं: हाँ...आज सुबह|

संतोष: अच्छा...भैया वो कुछ सामान का आर्डर देना था, मालिक कह रह थे की उन्होंने आपको मेल किया है, आप देख के आर्डर दे दो|

मैं: मैं मेल तुम्हें फॉरवर्ड करता हूँ तुम आर्डर दे दो|

संतोष: तो आप शाम को आ रहे हो ना?

मैं; नहीं यार.... सॉरी तुम काम संभाल लो मैं नहीं आ पाउँगा|

संतोष: पर भैया मैं कारपेंटर और electrician को कैसे सम्भालूँ जब plumbing का काम अधूरा पड़ा है?

मैं: सॉरी यार...मैं नहीं आ पाउँगा...जैसे भी है तुम संभाल लो...जो काम रह जाता है उसके लिए मैं मालिक से बात कर लूँगा|

इतने में मैंने संगीता की तरफ देखा तो उन्होंने बिना कुछ बोले इशारे से मुझे जाने को कहा| मेरा उनको इस तरह छोड़ के जाने का बिलकुल भी मन नहीं था पर वो बार-बार बिना बोले मुझसे रिक्वेस्ट कर रहीं थीं....अब आप लोग सोचेंगे की भला कोई इंसान बिना बोले किसी की बात कैसे समझ सकता है तो मैं आप को बता दूँ की हम दोनों एक दूसरे को इस कदर प्यार करते थे की एक दूसरे के भावों को पढ़ कर ही समझ जाते थे की अगला व्यक्ति क्या कहने वाला है| इसे साबित करने के लिए आप फ्लैशबैक में जाके देख सकते हैं|

मैं: संतोष...मैं तुम्हें थोड़ी देर में फोन करता हूँ|

संतोष: भैया आपकी आवाज गंभीर लग रही है| अगर कोई प्रॉब्लम है तो आप मत आइये...मैं जैसे-taise सभाल लूँगा...सारा काम तो नहीं हो पायेगा पर कोशिश करता हूँ|

मैं: थैंक्स यार....

मैंने फोन रखा और संगीता से बात की;

मैं: मैं आपको इस हालत में छोड़के कहीं नहीं जा रहा| ना ही पिताजी मानेंगे!

वो अब भ कुछ नहीं बोलीं बस इशारे से मुझे कहने लॉगिन की आपको मेरी कसम! मैं जानता था की अंदर ही andr वो बहुत डरी हुई हैं और मुझे कैसे भी करके उन्हें बोलने को कहना होगा| पर अभी के लिए मुझे उनकी कसम का मान रखना था! मैं पिताजी से मिलने के लिए उनके कमरे में आया और उन्हें सारी बात बता दी| वो भी मना करने लगे की मुझे संगीता को इस समय छोड़के कहीं नहीं जाना चाहिए| पर जब मैंने उन्हें कसम वाली बात बताई तो वो चुप हो गए और फैसला मुझ पे छोड़ दिया| मुझे मजबूरन जाने के लिए हाँ करनी पड़ी!

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मैं अंदर ही अंदर घुट्टी जा रही थी.....बस एक ही डर सता रहा था की वो फिर आएगा और मेरे बच्चे को मुझ से छीन के दूर ले जायेगा| मैं क्या करूँ....क्या करूँ....की इस दरिंदे से अपने बच्चों को बचा सकूँ.....क्या उन्हें अपने सीने से लगा के रखूँ....कहीं बाहर ना जाने दूँ..... जहाँ भी जाऊँ उन्हें अपने साथ रखूँ......... पर अगर मैंने ऐसा किया तो मेरे बच्चों का बचपन बर्बाद हो जायेगा? क्यों?....आखिर क्यों? ये मेरे साथ हो रहा है? मैंने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा बस जो भी हुआ उसे सहती रही....क्या मुझे खुश होने का हक़ नहीं? इन सवालों ने मुझे कुछ भी बोलने लायक नहीं छोड़ा था....ऐसा लगता था की अगर मैं कुछ बोल पड़ी तो जो थोड़ी हिम्मत अंदर बची है वो टूट जाएगी और मैं फिर रो पडूँगी....टूट जाऊँगी..... और फिर मेरे परिवार का क्या होगा? मुझे इस तरह बिलखता हुआ देख मेरे पति का भी सब्र टूट जायेगा...माँ-पिताजी के दिल को भी ठेस पहुँचेगी| भला उनकी इस सब में क्या गलती है? गलती तो मेरी है......ना मैंने इनसे प्यार का इजहार किया होता ....ना ये मेरे लिए कभी गाँव आते ....न हम इन दो महीनों में इतना करीब आते.....ना मैं दुबारा दिल्ली आती....न इनसे मिलती..... न इनके दिल में अपने लिए उस दबे हुए प्यार को जगाती और ना ही हमारी शादी होती| तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता....मेरी एक गलती की वजह से बिचारे बच्चे भी मुसीबत में पड़ गए! पर मैं अब ऐसा क्या करूँ की सब ठीक हो जाये? अकेले बैठी बस यही सोच रही थी .....पर जब अपने पति की तरफ देखती थी तो महसूस कर सकती थी की वो मुझे और बच्चों को लेके कितना चिंतित हैं? पर मुझे दुःख है की मैं उनकी चिंता की कारन बानी...सिर्फ और सिर्फ मैं! हालाँकि जबसे ये दुखद घटना घाटी उसके बाद से ये ही लग रहा था की वो अंदर ही अंडा खुद को दोषी मान रहे हैं ...पर मैं छह कर भी उन्हें कुछ नहीं कह पा रही थी...उन्हें .....कुछ कहने के डर से ही मैं अंदर घुटती जा रही थी| मैं जानती थी की वो बिना कहे मेरी हर एक बात को महसूस कर रहे हैं और कई बार उन्होंने कोशिश की कि मैं कुछ कहूँ...बोलूं....पर मेरा अंतर मन जानता था कि अगर मैं कुछ बोली तो.....

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मैं शाम को तैयार हुआ और निकलने वाला था की सोचा एक बार उन से बात तो कर लूँ ...शायद वो कुछ बोल दें की Take Care ..... या Drive Safely .....या कुछ भी! मैं इसी उम्मीद में उनके पास जाके चुप-चाप खड़ा हो गया पर वो बोलीं कुछ नहीं बस आके मेरे सीने से लग गईं| मेरे मन ने उनके मन के विचारों को पढ़ा की वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं और शायद मैं जो चाहता हूँ वो अभी नहीं मिलेगा... !!! मैंने उनके सर को चूम और कहा;

मैं: बाबू.....

मैंने एक बार फिर आस की कि शायद मेरे बाबू कहने पे वो हमेशा खुश हो जाया करती थीं, उदास होती थीं तो मुस्कुराने लग जाया करती थीं.....गुस्सा होती थीं तो मुस्कुरा दिया करती थीं.....तो शायद कुछ बोल पढ़ें? पर नहीं...वो खामोश कड़ी रहीं|

मैं: बाबू..... अपना ख्याल रखना और कोई भी बात हो तो मुझे फोन कर लेना| ओके?

उन्होंने बस हाँ में सर हिला दिया| मैं कमरे से निकल आया और बाहर डाइनिंग टेबल पे पिताजी, माँ और बच्चे बैठे थे और चाय/दूध पी रहे थे| मैंने आयुष और नेहा के सर को चूमा और पिताजी के पाँव हाथ लगाने लगा, उन्हें भी मेरे मस्तक पे पड़ी चिंता कि शिकन दिख गई और बोले;

पिताजी: बेटा तू चिंता ना कर तेरी माँ आज रात बहु के पास होगी...औरबच्चे मेरे पास सोयेंगे| क्यों बच्चों?

बच्चों ने मुस्कुरा के हाँ में गर्दन हिलाई| मैंने एक नजर फिर संगीता को देखा कि शायद वो कुछ बोल दें पर नहीं! मैं गाडी लेके साइट पे आ गया और काम संभालने लगा| फोन मैंने हाथ में ले रखा था ...और बार-बार फोन चेक करता था कि शायद कोई मैसेज आ जाए या कोई कॉल आ जाए...या what's app पे ही कोई मैसेज आ जाये पर नहीं...संगीता ने तो अपना फोन बंद कर रखा था| फोन आया भी तो अनिल का.... पिताजी ने ससुर जी को फोन कर के सब बता दिया था और वो भी काफी चिंतित थे| उनके जरिये बात अनिल तक पहुंची और भी काफी हड़बड़ाया हुआ था, और दिल्ली आना चाहता था| मैंने उसे कहा कि अगर उसे कोई प्रॉब्लम नहीं है तो वो आ जाये, शायद उसी को देख के संगीता कुछ बोल पड़े| मैंने उसे कहा कि मैं टिकट बुक कर के भेजता हूँ तो वो बोला कि नहीं मैं खुद आ जाऊँगा.... और ससुरजी भी दो दिन बाद आ रहे हैं| अपनों को देख के उनका मन हल्का होगा....यही सोच के मैंने सब को आने कि हाँ कर दी| अब मैं वापस अपने काम में लग गया....................और उम्मीद करता रहा कि शायद संगीता call करे!

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उनके काम पे जाने के बाद मैं आधा महसूस करने लगी..... जबतक वो घर पे थे मैंभले ही उनसे कुछ नहीं बोली पर जानती थी कि वो बिना मेरे कहे मेरी बात समझते हैं पर उनके जाने के बाद मेरी मूक भाषा को समझने वाला कोई नहीं था| माँ अवश्य थीं और वो मुझे आज बहुत लाड कर रहीं थीं..ऐसा नहीं है कि वो मुझे कभी प्यार नहीं करती थीं पर आज वो मेरा बहुत ज्यादा ही ख़याल रख रहीं थीं| बार-बार कुछ न कुछ कोशिश कर के मुझसे बातें करतीं..... कभी सीरियल के बहाने ...कभी किसी recipe के बहाने..... उन्होंने तो बच्चों से भी कहा कि वो मेरे साथ खेलें...हंसी-मजाक करें....पर मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे सब का प्यार मेरे दिल को छूना चाहता है पर नजाने क्यों सब कुछ मेरे जिस्म को बिना छुए ही कहीं निकल जाता है....मैं उनका प्यार महसूस ही नहीं कर पा रही थी! मेरे दिमाग ने मुझे एक cocoon में बंद कर दिया था....जहाँ ना कोई ममता आ सकती थी...न ही किसी का प्यार! खुद को इस कदर अपनी नजरों से गिरा चुकी थी कि............. मुझे उनकी कमी खेलने लगी....लगने लगा कि मुझे उन्हें जाने को नहीं कहना चाहिए था? अगर वो यहाँ होते तो मैं अकेला महसूस नहीं करती......पर ये मैं क्या सोच रही हूँ? मैं स्वार्थी कैसे हो गई? उनका काम जिससे हमारी रोटी चलती है ...वो भी तो जर्रुरी है! मैं अपने प्यार कि बेड़ियां उनके काम पे कैसे डालने कि सोच सकती हूँ? ये मुझे क्या होने लगा था....??????????

माँ ने मुझे बहुत मन किया कि मैं खाना ना बनाउन और आराम करूँ पर मैंने सोचा कि शायद इसी बहाने मैं अपना ध्यान उन बातों से हटा सकूँ तो...मैं खाना बनाने जुट गई| पर एक पल के लिए भी मैं दिन कि घटनाओं को भूल ना पाई और इसी चक्कर में मैंने खाने में नमक ही नहीं डाला! जब सब खाना खाने बैठे तो ना पिताजी ने ना माँ ने खाने में नमक कि कमी कि बात कही और चुप-चाप खाना खाते रहे| बच्चों तक ने खाने में नमक नहीं होने कि बात नहीं की!!! वो भी जानते थे की मम्मी परेशान हैं....जब भी ये घर पे नहीं होते थे तो मैं हमेशा अंत में खाना खाती थी और मुझे खाना माँ ही परोस के देती थी...इतना प्यार करती थी माँ मुझे! आज जब उन्होंने खाना परोस के दिया तो वो नमक की बरनी में से नमक निकाल के डालने लगीं, हालाँकि वो बड़े ध्यान से ये कर रहीं थीं की मेरी नजर उनपे ना पड़े...पर मैंने फिर भी देख लिया| तब मुझे एहसास हुआ की मैंने आज अपने माता-पिता को और बच्चों को बिना नमक का खाना खिला दिया......मुझे खुद पे बहुत ग्लानि होने लगी की हे भगवान ये मुझसे कैसा अनर्थ हो गया? पर माँ ने ऐसा कुछ नहीं जताया...वो समझ सकती थीं की मेरी मनो-स्थिति कैसी है इसलिए आज पहलीबार उन्होंने अपने हाथों से मुझे खाना खिलाया| मैंने भी उन्हें मन नहीं किया क्योंकि मैं उस cocoon से बाहर निकलना चाहती थी| इस तरह मौन रह के मैं अपने ही परिवार को और दुःख नहीं देना चाहती थी| खाना खाने के बाद मैं और माँ अपने कमरे में आ गए और बिस्तर पे लेट गए| तभी माँ के फोन पे उनका फोन आया....वो जब भी साइट पे रुकते थे तो माँ को फोन कर के पूछते थे की सबने खाना खाया की नहीं और सब कुछ ठीक ठाक तो है ना?| मैं बिस्तर में लेट चुकी थी और रजाई ओढ़ चुकी थी....मैं सिर्फ माँ की ही बात सुनाई दे रही थी| माँ उन्हें बता रही थीं की; "बहु ने कहाँ खा लिया है...और मैंने अपने हाथों से उसे खाना खिलाया है....अभी लेटी है...तू कहे तो मैं उठाऊँ?" मैं जानती हूँ...उन्होंने ना ही कहा होगा फिर माँ ने उनसे पूछा की; "बेटा तूने खाना खाया? हम्म्म्म...ठीक है|" मैं ये नहीं समझ पाई की उन्होंने खाना खाया की नहीं...ना ही मेरी इतनी हिम्मत थी की मैं माँ से पूछ सकूँ इसलिए मैं सोने का नाटक करने लगी और फिर से सोच में डूब गई .....की मेरी वजह से मेरे पति ने खाना नहीं खाया...ये भी मरी ही गलती है! पर तभी माँ बोलीं; "बेटी....मैं जानती हूँ तू सोई नहीं है..... देख समझ सकती हूँ की उस दर्दनाक हादसे को भूलना आसान नहीं है...अपर बेटी अगर कोशिश नहीं करेगी तो कैसे चलेगा? मानु तुझे इतना प्यार करता है....बाहर से भले ही वो मजबूत दिखे पर अंदर से वो भी तेरे जितना ही दुखी है| वो अपनी पूरी कोशिश कर रहा है की चीजों को संभाल ले...और मैं के बात कहूँ.....तेरे कारण वो इतना जिम्मेदार हुआ है! तेरे प्यार ने उसे इतना लायक बना दिया...वरना पहले वो अपनी जिम्मेदारियाँ इतनी गंभीरता से नहीं लेता था? हमेशा मैं ही उसका बचाव करती थी.....पर याद है अपने जन्मदिन वाले दिन वो शराब पी के तेरे पास रुका था? और अगले दिन उसने तेरे साने कसम खाई की वो दुबारा ऐसी गलती नहीं करेगा....और होटल में जब हम दोनों ने उसे पीने को कहा वो भी इस लिए की उसकी खांसी-जुखाम ठीक हो जाए तो उसने कैसे मना कर दिया? ये सब तेरे कारन हुआ है..... मैं जानती थी की तेरे आने से पहले वो कभी-कभार शराब पी कर घर आया पर उसने कभी कोई ड्रामा नहीं किया...ना ही मैंने ये बात उसके पिताजी से कही पर मुझे गर्व है तुझ पे की तूने मेरे बेटे को सीधा कर दिया|" माँ ने कोशिश की कि मैं उनकी सीधा कर दूँ कि बात पे हंस दूँ ...पर नहीं ...मैं हँस नहीं पाई! उनकी बातों ने मेरे दिल को छू लिया और वो guilty वाली feeling कुछ हद्द तक काम हुई और पर खत्म नहीं हुई!

माँ मेरे सर पे हाथ फेरती रहीं कि शायद ,उझे नींद आ जाये पर नींद ने तो मुझसे कट्टी कर ली थी! मैं आँखें खोले अपने उसी cocoon में सड़ने लगी| उम्र का तगजा था कि माँ कि आँख लग गई ...और मैं माँ को देखने लगी मन ही मन उनसे माफ़ी मांगने लगी कि मेरे कारण आज वो भी उदास हैं| भले ही वो मेरे सामने अपने भाव आने ना देती हों पर मेरा दिल महसूस तो आर ही रहा था कि मैं अपने परिवार को अन्तः दुखों कि ओर धकेले जा रही हूँ| रात के कूप अँधेरे और सन्नाटे में मैं घडी कि टिक-टिक साग सुन रही थी....हर एक सेकंड...हर एक मिनट....हर एक घंटे को बीतते हुए महसूस कर रही थी| मैं इस कदर निराश हो चुकी थी कि मन कह रहा था कि "ऐ दिल...तो थम जा... कि अब इस धड़कन को सुनाके कोई फायदा नहीं| छोड़ दे ये मोह....शायद तेरी इस कुर्बानी से मेरे पति की चिंताएं कुछ काम हो जाएं?" पर अगले ही पल मैंने खुद को झिंझोड़ा और उठ के बैठ गई, "अपने मचलते मन को काबू करने लगी...की तू ये क्या कह रहा है? भूल गया की इस शरीर के साथ अभी एक और जिंदगी जुडी है? और मेरे पति का क्या होगा? वो मेरे बिना कैसे जिन्दा रहेंगे? मेरे बचचे....नहीं...नहीं....ये मुझे क्या हो रहा है| मैं उठी और जाके अपना मुंह धोया...ये सोच के की इसके साथ मेरे अंदर उठ रहे ये गंदे विचार भी बह जाएँ| मुंह धो के मैं वापस आके लेट गई पर आँखें अब भी खुली थीं और मन उनकी आवाज सुनने को बेताब होने लगा...सोचा की कॉल कर लूँ? फिर सोचा की कॉल करके कहूँगी क्या? अगर कुछ कहा और मैं रो पड़ी तो वो काम छोड़के अभी यहाँ पहुँच जायेंगे ...इसलिए मन मार के लेटी रही...और घडी की टिक-टिक सुनती रही| सुबह मेरी आँखों के सामने ही हुई और माँ जब उठीं तो मुझे जागता हुआ पाया; "बेटी तू सारी रात सोई नहीं?" मैं कुछ नहीं बोली और चुप-चाप उठ के बैठ गई| फिर माँ के पाँव छुए आशीर्वाद लिया और चाय बनाने चली गई| माँ ने बहुत कोशिश की मुझे रोकने की पर मैं नहीं मानी....उनकी आज्ञा की अवेहलना करने लगी| पिताजी डाइनिंग टेबल पे बैठे अखबार पढ़ रहे थे...मैंने उनके पाँव छुए और उन्होंने आशीर्वाद दिया और मुझसे हाल-चाल पूछा पर मैं अब भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी और हाथजोड़ के बिना कुछ कहे ही माफ़ी मांग ली| वो कुछ नहीं बोले......माँ को आवाज दी और उनसे मेरे हाल-चाल पूछा तो माँ ने कहा; "बहु अब तक कुछ नहीं बोली है....मुझे उसकी बहुत फ़िक्र है|" पिताजी बोले; "मैं अभी मानु को फोन करता हूँ|" पर इससे पहले की फोन उन्हें खनकता, ये खुद ही आ गए|

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सारी रात संगीता के बारे में सोचता रहा और जैसे ही सुबह हुई मैं साइट से निकल पड़ा| सुबह छः बजे ही घर आ धमका| आमतौर पे मैं आठ बजे तक आया करता था पर उनसे मिलने की इतनी बेचैनी थी की मैं आज जल्दी घर अ गया| Doorbell बजे तो दरवाजा माँ ने खोला और दरवाजा खोलते ही बोलीं;

माँ: लो...ये तो आ गया?

पिताजी: बैठ बेटा.....

मैंने देखा तो संगीता किचन में चाय बना रही थी|

पिताजी: बेटा...कल से बहु ने एक शब्द भी नहीं बोला है.... तेरी माँ ने बताया की वो रात भर सोई नहीं है..... तू उससे बात कर..कैसे भी...उससे कुछ बुलवा... अगर वो इसी तरह सहमी रहेगी तो कहीं उसके दिल में डर न बैठ जाये|

मैं: पिताजी....मैं उनसे बात करूँगा| नहीं तो डॉक्टर सुनीता के पास जायेंगे|

माँ: बेटा अभी बच्चे उठेंगे तो मैं और तेरे पिताजी उन्हें लेके मंदिर जायेंगे....तब बहु से इत्मीनान से बात कर|

मैं: जी|

जब तक माँ-पिताजी और बच्चे मंदिर के लिए नहीं निकल गए मैंने संगीता से कुछ नहीं कहा और चुप-चाप टेबल पे बैठा रहा| जबकि असल में में पूरा शरीर थका हुआ, जैसे ही सब बाहर गए और दरवाजा लॉक हुआ मैंने संगीता से कहा;

मैं: Can we talk please!

मैंने बड़े प्यार से बोला और ये पहली बार था की मैं उन्हें सिर्फ बात करने के लिए "please" कह रहा हूँ| मैं कमरे में आ गया और मेरे पीछे-पीछे संगीता भी आ गई पर वो अब भी गुम-सुम थी, मैंने उन्हें पलंग पे बिठाया और मैं उनके सामने घुटनों पे आ गया और उनका हाथ पकड़ के बोला;

मैं: For the past 24 hours I’ve been dying every minute to hear your voice! I gave you 24 Hrs so you may recollect yourself…but now I can’t take it anymore. I can feel what’s going inside your head but if you don’t spill it out now, then I’m sorry but I might giveup! I can’t live without you, please say something? नहीं तो इस बार मैं टूट जाऊँगा|

पर मुझे लगा की वो खुद को कुछ भी कहने से रोक रही हैं| अब तो मैं हार मान चूका था!

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Sorry dosto....wo Kya hna Mera 1st year ka exam suru ho gye h isliye let update Mila,,,,,,Ab date Aage bd gyi h to update de Diya **""so Enjoy............//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f618.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f618.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f618.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f618.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44c.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44c.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44c.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64b.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64b.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f60e.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f60e.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f646.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f495.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f497.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f60d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f3c7.svg✍//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f449.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44c.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44c.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49e.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f496.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f48e.svg
 
Thanks for comments frnds...//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f646.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f646.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f646.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49e.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f496.svg
 
मुझे लगा की वो खुद को कुछ भी कहने से रोक रही हैं| अब तो मैं हार मान चूका था! मैं उठ के खड़ा हुआ और कमरे से बाहर निकलने को पलटा तभी उन्होंने आके मुझे पीछे से जकड लिया| वो बिलख पड़ीं और रोने लगीं:

मैं जानती थी की अब वो टूट जायेंगे और अगर वो टूट गए तो मेरे इस परिवार का क्या होगा| मैंने खुद को सँभालने की कोशिश की, की मैं ना रोऊँ पर नहीं....दिल को रोने से रोक नहीं पाई और जैसे ही वो मुड़े मैंने उन्हें पीछे से जाके जकड लिया और रोने लगी| मेरे रोने से उनके दिल में जो टीस उठी उसे मैं मेहस्सो कर रही थी...पर उन्होंने खुद को संभाला और मेरी तरफ घूमे और मेरे माथे को चूमा और मुझे कस के गले लगा लिया| कल रात से मैं तड़प रही थी और आज जब उन्होंने मुझे अपने सीने से लगाया तो सारी तड़प जाती रही| उनके सीने में जल रही मेरी आवाज सुनने की आग मैं साफ़ महसूस कर रही थी और मन ही मन खुद को कोस रही थी की क्यों मैंने अपने पति को इतना तड़पाया? अपने माता-पिता की आज्ञा का बिना चाहे अवहेलना करती रही| पर अभी...अभी मुझे कुछ कहना था...ताकि मेरे पति की सहन शक्ति बानी रहे| मेरी अंतर आत्मा से आवाज आई जो मेरे मुँह से बाहर आई; "I LOVE YOU" मैंने अब भी अपना सर उनके सीने में छुपा रखा था और मैं ये नहीं देख पाई के उनके चेहरे पर कैसे भाव थे|

24 घंटे बाद जब मैंने उनकी आवाज सुनी तो मैं आपको बता नहीं सकता की मुझे कैसा महसूस हुआ| ऐसा लगा मानो "गर्मी से जल रही धरती पे पानी के कुछ कतरे गिरे हों! (Sorry Guys, मेरे पास तुलना करने के लिए कोई और संज्ञा नहीं थी|)

मैं: I LOVE YOU TOO! अब बस...रोना नहीं...मैं हूँ ना आपके पास? फिर? अब बताओ की आप इतना डरे हुए क्यों हो? क्यों आपने खुद को मुझसे काट लिया?

उनका रोना थम गया था और अब मैं बस बेसब्री से उनके जवाब का इन्तेजार करने लगा!

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