अब मुझे लग रहा था की मुझे उनसे सब सच कह देना चाहिए....मैं अब उनसे कुछ भी नहीं छुपाऊँगी और पिछले 24 घंटे में जो भी बातें मुझे खाय जा रही थीं मैं उन्हें सब बता दूँ| कल शाम से मैं जिस cocoon में बंद थी उसपे माँ की बातों से दररर तो पद चुकी थी और कुछ देर पहले इनके प्यार ने उस cocoon को तोड़ डाला था और अब मैं आजाद थी......मुझे इनके सामने अपनी बात रखनी ही थी|
कल...जो भी हुआ है उससे मैं बहुत डर गई हूँ! अपने लिए नहीं बल्कि आपके और बच्चों के लिए...अपने परिवार के लिए..... जब आपने उसकी गर्दन पकड़ी तो लगा की आप उसकी जान ही ले लोगे ..... और बच्चे वो भी बहुत सहम गए थे! पर खतरा अभी तक टला नहीं है!!! वो वापस आएगा....जर्रूर आएगा....आयुष के लिए! वो उसे अपने साथ ले जायेगा...हमसे दूर ...वो उसे हमसे छीन लेगा.... जर्रूर छीन लेगा ....और हम कुछ नहीं कर पाएंगे..... कुछ भी नहीं.....
मैं: Hey ...Hey…get a hold of yourself! वो ऐसा कुछ भी नहीं करेगा...कुछ नहीं होगा आयुष को...मैं उसे अपने से दूर नहीं जाने दूँगा| सुना आपने? आयुष हमारे पास ही रहेगा!
नहीं....वो उसे ले जाएगा.....सब मेरी वजह से हुआ ...मैं ही कारन हूँ इसका...मेरी वजह से वो आपको...माँ-पिताजी को ...सबको नुक्सान पहुँचायेगा! आप सब की मुसीबत का कारन मैं हूँ! ना मैं आपको जिंदगी में दुबारा आती ना ये सब होता .....प्लीज मुझे माफ़ कर दो!
मैं: बाबू...सम्भालो खुद को! क्यों इस तरह खुद को Blame कर रहे हो...आपने कुछ भी नहीं किया...अगर कोई जिम्मेदार है तो वो मैं हूँ....शादी का प्रपोजल मेरा था...और मैं मानता हूँ की मैंने ये स्वार्थ में आके कहा था| मैं जानता था की चन्दर के किये घपले के कारन पिताजी और बड़के दादा का गुस्सा उसपे अवश्य निकलेगा...परिणाम स्वरुप आपको वापस गाँव जाना होगा| और अगर आप गाँव चले जाते तो मैं अकेला रह जाता..... मैंने स्वार्थ में आके आपके सामने शादी का प्रपोजल रखा| अपने माँ-पिताजी को भी मैंने ही मनाया...आपके पिताजी से भी मैंने ही बात की .... फिर divorce papers ले के मैं ही गया था गाँव...उसके sign डरा धमका के मैंने ही लिए थे| कोई कसूरवार है तो वो मैं हूँ...आप नहीं!
पर अगर मैं दुबारा आपकी जिंदगी में ही ना आती तो ये सब होता ही नहीं ना?
मैं: जानते हो अगर आप मेरी जिंदगी में नहीं आते तो मैं बस एक चलती-फिरती लाश बन के रह जाता ..... आपको चाह के भी नहीं भुला पा रहा था...भूलता भी कैसे? मेरी आत्मा का एक टुकड़ा आपके पास जो रह गया था.....अरे आपके प्यार ने तो मुझे उस लड़की का नाम तक भुला दिया जो मुझे आकर्षित करने लगी थी!
मैंने जान बुझ के उस लड़की वाली बात कही ताकि वो मुस्कुराएं और वो थोड़ा मुस्कुराईं भी.... ऐसी मुस्कराहट जैसे की "सूरज की पहली किरण पड़ने पे जैसे कोई काली मुस्कुराती हो"!
मैं: I’m glad की आपने कुछ negative बातें नहीं सोचीं!
I’m sorry …. पर कल रात मैं इतना depressed हो गई थी की मेरे मन में खुदखुशी करने की इच्छा जन्म लेने लगी थी!
ये सुन के तो मेरी जान ही सूख गई|
मैं: What?
I'm sorry ..... पर मैंने ऐसा वैसा कुछ भी करने की नहीं सोची| मैं जानती थी की मेरे बाद आप ...........इसलिए मैंने कुछ भी नहीं किया|
मैं: आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हो? आपको पता है कल जब उसकी गर्दन मेरे हाथ में थी तो आपकी और बच्चों की ये हालत देख के मेरे खून खौलने लगा था, मन तो किया उसकी गर्दन तोड़ दूँ ....पर फिर एहसास हुआ की ऐसा करने पे मैं आप लोगों से बहुत दूर चला जाऊँगा| र आप ......शायद मेरे ही प्यार में कमी रह गई होगी की आपको ऐसा सोचने पे मजबूर होना पड़ा|
नहीं...नहीं...ऐसा नहीं है..... मैं जानती हूँ मैं गलत थी...मुझे आप पर पूरा भरोसा है...पर मैं इतना डर चुकी थी की नहीं जानती थी की जो मैं सोच रही हूँ वो सही है या गलत|
मैं: अगर आपको कुछ हो जाता ना तो I Promise I’d have slit his throat!
नहीं...आपको मेरी कसम आप...ऐसा कुछ भी नहीं करोगे! मैं पहले ही बहुत टूट चुकी हूँ अब और नहीं टूट सकती| पिछले चौबीस घंटों में मैंने बहुत से पाप किये हैं जिनकी मुझे क्षमा मांगनी है| आपसे ...माँ से...पिताजी से....और बच्चों से भी!
मैं: I don’t know why but you still feel GUILTY! Why? आप इतना हारा हुआ क्यों महसूस कर रहे हो.....? आपने हमारे आने वाले बच्चे के बारे में जरा भी नहीं सोचा? आपकी ये मायूसी उसपे कितनी भारी पद सकती है? आपको इसका जरा भी अंदाजा है? और आप दूर क्यों जाते हो, नेहा को देखो? आपको पता है की मुझे उसपे कितना फक्र है? उस नन्ही सी जान ने अकेले आयुष को संभाला हुआ है? आप उस से सबक लो! क्या माँ-पिताजी आपसे प्यार नहीं करते? क्यों आपने खुद को इतना बाँध रखा है? क्या हमें कभी समाज की परवाह थी जो आप आज कर रहे हो? हमने सीना चौड़ा कर के प्यार किया है और शादी की है फिर आपको डर किस बात का है? रही आयुष की बात तो आप उसकी चिंता मत करो| मैं माँ-पिताजी से बात करता हूँ...सब ठीक हो जायेगा! बस मुझ पे भरोसा रखो!
एक आप ही का तो सहारा है...वरना मैं कब का बह चुकी होती|
मैं: यार फिर वही बात? अगर आप मुझे आज के बाद इस तरह हताश दिखे ना तो मैं .... मैं आपसे बात नहीं करूँगा?
हम्म्म...Sorry! This won't happen again!
मैंने उन्हें फिर से गले लगा लिया...पर मैं जानता था की वो अंदर से अब भी जख्मी हैं...भले ही वो अपने घाव मुझे न दिखाएँ पर मैं अपने प्यार से उन्हें जल्दी भर दूँगा|
उनसे दिल खोल के बात करने से मेरा मन तो हल्का हुआ था... पर अब भी डर सता रहा था| पर अभी तो मुझे सबसे पहले अपने माँ-पिताजी से माफ़ी मांगनी थी| कल मेरी वजह से उन्हें और बच्चों को बिना नमक का खाना खाना पड़ा था और तो और मैंने सारा दिन जो न बोलने का पाप किया था उसका भी तो प्रायश्चित करना था|
मैं: अच्छा अब आप आराम करो....कल रात से आप सोये नहीं हो|
संगीता: पर मुझे अभी खाना बनाना है?
इतने में फोन बज उठा| पिताजी का था;
मैं: जी पिताजी!
पिताजी: बेटा हम दोपहर तक आएंगे और खाना मैं यहीं से लेता हुआ आऊँगा| तुम लोग आराम करो!
मैं: जी बेहतर|
मैंने फोन रखा और संगीता से कहा;
मैं: पिताजी का फोन था वो दोपहर तक आएंगे और खाना लेते हुए आएंगे| तब तक हम दोनों को आराम करने को कहा है|
संगीता: कल मैंने सब को बिना नमक का खाना खिलाया था ना ...इसीलिए!
मैं: Hey .... ऐसा नहीं है| वो बस हम दोनों को थोड़ा समय एक साथ गुजरने के लिए देना चाहते हैं| वो भी जानते हैं की बच्चों के यहाँ रहते हुए तो हम-दोनों....you know what I mean ???
संगीता: हम्म्म....
मैं: तो चलो रजाई में...
मैंने उन्हें लिटाया और मैं भी कपडे चेंज का के उनके पास लेट गया| उन्होंने हमेशा की तरह मेरे हाथ को अपना तकिया बनाया और सर रख के मुझसे लिपट गईं| मैं उनके बालों में हाथ फेर रहा था ताकि वो आराम से सो जाएँ| पर मुझे महसूस हुआ की वो सो नहीं रही हैं और जाग रही हैं|
मैं: (मैंने तुतलाते हुए कहा) बाबू....छो जाओ| और आज के बाद आप कभी उदास नहीं होगे नहीं तो हमारे बच्चे पे इसका बुरा असर पड़ेगा| ठीक है?
संगीता: हम्म्म.... पूरी कोशिश करुँगी|
मैं: तो अब सो जाओ.... कल रात से आप जाग रहे हो|
Well ये कोई नै बात नहीं थी ...मैं उन्हें बस अपने बच्चे का वास्ता देता रहा था और वो बात मान जाया करती थीं| खेर पिताजी और माँ के आने तक हम दोनों सोते रहे|
मैं उनके आगोश में समां चुकी थी और तभी मुझे उनके दिल की धड़कनें सुनाई देने लगी| उनके मन में मेरे लिए ...मेरी शीट के लिए....हमारे होने वाले बच्चे के लिए....नेहा के लिए...आयुष के लिए ....जो डर पनपने लगा था उसे मैं महसूस करने लगी थी| मैं जानती थी की उन्हें मेरी कितनी फ़िक्र है पर मैं ये मानती थी की वो ये सब सेह लेंगे और मुझे और पूरे परिवार को होंसला देंगे पर अभी जब मैंने उनकी धड़कनें सुनी तो मुझे एहसास हुआ की अंदर से ये मेरे और बच्चों के लिए कितना बेचैन हैं? और मैं ही इनकी बेचैनी का कारण हूँ| मेरी अंतर आत्मा ने मुझे झिंझोड़ा की जो इंसान तुझ से इतना प्यार करता है, तेरी एक ख़ुशी के लिए सब से लड़ पड़ता है...तू ही उसकी कमजोरी बन रही है? भले ही वो बाहर से ना जताएं की वो अंदर से कमजोर पड़ने लगे हैं पर तुझे तो समझना चाहिए ना? आखिर तू उनके शरीर का आधा अंग है! मुझे खुद पे काबू रखना था और जल्द से जल्द सम्भलना था| मेरे मन में एक जंग छिड़ गई..... एक तरफ मन का वो हिस्सा था जो इन्हें बहुत प्यार करता था और दूसरी तरफ वो हिस्सा जो डरा हुआ था| डरा हुआ हिस्सा अब भी हावी होने लगा था और लगने लगा था की कहीं मैं हार ना जॉन...पर कहते हैं ना ऊपर वाला हमेशा हमारे साथ होता है| अचानक से इन्होने मेरे सर को चूमा ...शायद ये जानते थे की मेरे मन में जंग छिड़ी है ....और इनकी एक Kiss ने साड़ी लड़ाई का रुख पलट दिया था| जो आत्मविश्वास मैं खो चुकी थी वो वापस आने लगा था .....इनका प्यार जीत गया था और डर हार गया था| पर जाते-जाते भी डर अपने साथ पुरानी संगीता को साथ ले गया था| यहाँ तो बस वो संगीता रह गई थी जो बस इस परिवार का ख्याल रखना चाहती थी! वो इनसे प्यार तो करती थी पर जाहिर नहीं करती!
जब हम दोनों उठे तो दोपहत के ढाई बज रहे थे और दो मिनट बाद दरवाजे की घंटी बजी| मैं उठने लगा तो संगीता ने रोक दिया और खुद दरवाजा खोलने गई| मैं भी उसके पीछे-पीछे चल दिया| दरवाजा खोलके उसने सबसे पहले माँ और पिताजी के पाँव छुए और फिर उनसे माफ़ी मांगने लगी;
संगीता: माँ....पिताजी...मुझे माफ़ कर दीजिये| कल मैने आप सब के साथ बदसलूकी की| आपकी बातों का जवाब नहीं दिया....बिना नमक का खाना खिलाया|
माँ: बेटी ये तू क्या कह रही है? हम समझ सकते हैं की तू किस दौर से गुजर रही है| खाने में नमक जैसी छोटी सी बात पे तुझे लगा हम तुझसे नराज हैं| माँ-बाप कभी अपने बच्चों से इन छोटी बातों पे नाराज होते हैं? तू भी तो माँ है, क्या तू कभी नेहा और आयुष से नाराज हो सकती है?
संगीता ने ना में सर हिलाया|
पिताजी: फिर? बेटी इन छोटी बातों को दिल से ना लगाया कर| जो कुछ हुआ उसे भूल जा और तू लाड साहब वहाँ खड़ा-खड़ा क्या कर रहा है| चल खाना परोस?
मैं: जी
मैं हँसता हुआ प्लेट और डोंगे निकलने वजा रहा था की संगीता अचानक से आ गई और बोली;
संगीता: आप बैठो ...मैं निकाल देती हूँ|
normally इतना प्यार से बोलती थी की मुझे अच्छा लगता था पर आज उसकी आवाज में कुछ बदलाव था...मेरा मतलब उसकी टोन अलग थी| ऐसा लगा जैसे वो चाहती नहीं की मैं "डोंगे निकालने की तकलीफ करूँ!" I mean मैं कोई म्हणत वाला काम तो नहीं कर रहा था की वो मेरे साथ कुछ ऐसा सलूक करे| पर फिर भी मैंने बात को दर-गुजर किया और डाइनिंग टेबल पे बैठ गया| खाना संगीता ने ही सब को परोसा और फिर वो भी बैठ गई| खाना खाने के दौरान सब चुप थे, जबकि हम लोग कुछ न कुछ बात किया करते थे| फिर अचानक से पिताजी ने ही topic उठाया|
पिताजी: बीटा तुम दोनों कहीं घूमने चले जाओ? बहु का और बच्चों का मन बदल जायेगा|
मैं: जी ठीक है|
संगीता: पर पिताजी... अभी-अभी तो हम आये हैं? फिर चले जाएं? काम भी तो देखना है इनको|
माँ: बेटी तू काम की चिंता मत कर, वो तो होता रहेगा| अभी जर्रुरी ये है की तुम दोनों खुश रहो|
संगीता: पर माँ मैं बिना आप लोगों के कहीं नहीं जाऊँगी|
मैं: रहने दो माँ हम यहीं घूम आएंगे|
मैंने बात संभाल ली पर मैं समझ गया था की संगीता का इशारा किस तरफ था| उसे डर था की कहीं हमारी गैर-हाजरी में चन्दर दुबारा आ गया और उसने फिर से लड़ाई-झगड़ा किया तो? मैं चुप रहा ...खाना खाने के बाद;
मैं: नेहा...आयुष .. बेटा आप दोनों कमरे में जाओ और अपना holiday homework पूरा करो|
नेहा: जी पापा...चल आयुष तेरा Maths का homework रहता है ना|
दोनों अंदर चले गए और फिर मैंने अपनी बात यानी संगीता का डर माँ-पिताजी के सामने रखा|
मैं: माँ संगीता को डर है की चन्दर फिर वापस आएगा.....और आयुष को अपने साथ ले जायेगा|
माँ: ऐसा कुछ नहीं होगा बेटी!!! तू ऐसा मत सोच?
संगीता: माँ .... वो जर्रूर आएगा|
मैं: माँ...पिताजी ...इनके डर का निवारण करना जर्रुरी है| मैं इन्हें समझा चूका हूँ की वो ऐसा कुछ नहीं करेगा और सतीश जी ने अजय को भी सब डरा-समझा दिया है| पर इन्हें संतोष नहीं मिला| हमें बस सावधानी बरतनी है....... स्कूल से लाने और छोड़ने की जिम्मेदारी अब हम लोग ही उठाएंगे| स्कूल में भी मैं जा के बात कर लूँगा की हमारे आलावा school authorities हमारे अलावा किसी और को बच्चों को साथ नहीं जाने देंगे|
पिताजी: बिलकुल सही है| सावधानी बरतने में कोई बुराई नहीं|
संगीता: पर पिताजी आप ही बताइये की क्या बच्चों को बंदिशों में बाँधने से उनके बचपन पे असर नहीं पड़ेगा?
माँ: बिलकुल सही कहा बेटी| इस तरह तो वो डर में जीने लगेंगे|
बात वही की वहीँ आ गई थी| मुझे समझ नहीं आ रहा था की उनका डर खत्म कैसे करूँ? मैं झुंझला उठा;
मैं: You want me to kill him? Just say the word. I promise I'll do it!
संगीता: आप ये क्या कह रहे हो?
चूँकि मैंने अंग्रेजी में बोला था तो माँ-पिताजी के पल्ले नहीं पड़ा|
पिताजी: क्या कह रहा है ये बहु?
संगीता: ये....ये......(उन्हें कहने में भी डर लग रहा था|)
मैं: मैंने कहा की मैं उसका खून कर दूँगा?
पिताजी: क्या? तेरा दिमाग खराब हो गया है? (पिताजी ने गुस्से में कहा) जानते है आस-पड़ोस वाले क्या कहते हैं? कहते हैं की भाई साहब आपके लड़के को क्या हो गया है? जिसने आज तक किसी को गाली नहीं दी वो कल अपने ही चचेरे भाई को इतनी बुरी तरह पीट रहा था? क्या जवाब दूँ मैं उन्हें?
अब तो मेरे मन में भी गुस्सा उबलने लगा था और वो बाहर भी आ गया, मैंने टेबल पे जोर से हाथ पटका और गुस्से में बोला;
मैं: तो क्या करूँ मैं? कल ही जान ले लेता उसकी पर इनका ख्याल दिल में आ गया और उसे छोड़ दिया|
अब इनके दिल में डर बैठ गया है तो आप ही बताओ मैं क्या करूँ? जब किसी के घर में कोई जानवर घूस आता है तब इंसान अपने परिवार को पहले बचाता है ना की ये सोचता है की वो एक जीव हत्या कर रहा है|
पिताजी: बेटा मैं समझ सकता हूँ तेरा गुस्सा पर ये कोई उपाय तो नहीं? ठन्डे दिमाग से काम ले!
माँ: बेटा शांत हो जा....देख बहु कितना सहम गई है|
मैं चुप हो गया और सर पकड़ के बैठ गया| कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करूँ? मैं उठा और बाहर निकल गया क्योंकि मैं जानता था की मैं चाहे जो भी कहूँ उन पर कोई असर नहीं होने वाला और वैसे भी वहां माँ और पिताजी थे और नके सामने मैं उन्हें कुछ नहीं कह सकता था| इसलिए मैं पनवाड़ी के पास आया और उससे एक cigarette ली पहले सोचा वहीँ पी लूँ पर फिर कुछ सोच के रूक गया| मैंने आज तक cigarette नहीं पि थी और जानता था की पहला कश लेते ही मुझे खांसी आ जाएगी और आस-पास खड़े लोग हंसने लगते की जब झिलती नहीं है तो पीता क्यों है? तो मैं वापस घर आ गया और सीधा छत पे पहुँच गया और cigarette सुलगाई और इससे पहले की मैं पहला कश खींचता संगीता आ गई और मेरे मुंह से cigarette खींच ली और दूर फेंक दी!
सवाल तो मैंने पूछ लिया ........पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया| बस चुप-चाप टकटकी बांधे मुझे देखने लगे| उनकी नजरें मुझे चुभ रही थीं...... कारन क्या था मैं जानती थी! मैं ही उनके हताश होने का कारन थी! मैं चाह के भी उन्हें वो प्यार नहीं दे पा रही थी .....जिस पे उनका हक़ था! आमतौर पर अगर ऐसा कुछ होता था तो मैं उनके गले लग जाया करती थी और बस इतना करने से ही उन्हें अपनी गलती का एहसास हो जाया करता था और वो बड़े प्यार से बोलते; "Sorry जान...आगे से ऐसा मैं कभी नहीं करूँगा!" पर आज हालात कुछ और थे! मेरे अंदर वो पहले वाली संगीता नहीं थी जो अपना प्यार जाहिर किया करती थी! उस समय मैं ज्यादा देर उनके सामने खड़ी नहीं रह सकी और वापस मूड के नीचे आ गई| मैं कमरे में बच्चों का homework करने में मदद कर थी की तभी ये भी नीचे आ गये| मैं जानती थी की मेरी वजह से ये इतने तड़प उठे की cigarette को छुआ| मैं जानती हूँ की आज तक इन्होने cigarette कभी नहीं पी और ना ही आगे कभी पिएंगे! मुझे लगा था की ये अपनी नाराजगी जाहिर करेंगे पर नहीं......इन्होने ऐसा कुछ भी नहीं किया! बल्कि इन्होने आके मुझसे प्यार से पूछा; "जान पिक्चर चलना है?" पर मैंने ना में सर हिलाया और डाइनिंग टेबल पे आ के बैठ गई और सब्जी काटने लगी रात के लिए|
उनकी ना सुनके मैं सोच में पड़ गया की मेरी संगीता को क्या हुआ? उस संगीता को जिसे मैं प्यार करता हूँ......जो मेरी पत्नी है..... मेरे बच्चों की माँ.....मेरे होने वाले बच्चे की माँ ..... आखिर उसे हुआ क्या है? वो कहाँ चली गई? क्या मेरा प्यार कम पड़ गया है उसके लिए? या शायद अब मेरे प्यार में वो ताकत नहीं जो उसे फिर से हँसा दे! उसका हर गम भुला दे! मेरी हर बात मैंने वाली मेरी पत्नी कहाँ चली गई? मैं क्या करूँ की वो फिर से हँस पड़े? इस घर में जो गम का सन्नाटा फैला है उसे सिर्फ और सिर्फ उसकी हँसी ही दूर कर सकती थी| उनकी किलकारियां सुनने को तरस गया था....मुझे लगा था की शायद पिक्चर जाने के बहाने वो थोड़ा रोमांटिक हो जाएं या फिर मैं थोड़ा रोमांटिक हो जाऊँ...पर यहाँ भी बदनसीबी ने दरवाजा मेरे मुँह पे दे मारा| ठीक है..."ऐ किस्मत कभी तू भी मुझ पे हँस ले.....बहुत दिन हुए मैं रोया नहीं!!!"
अब बारी थी बच्चों की, जिन्हें कल से मैं समय नहीं दे पाया था और मेरा मानना था की उन्हें अभी से सब पता होना चाहिए वरना आगे चल के वो मुझे और संगीता को गलत समझेंगे| नेहा तो सब जानती थी, समझती थी पर आयुष ज्यादा डिटेल नहीं जानता था| और मैं इतना निराश महसूस कर रहा था की मैंने सोचा की आयुष को भी ये सब पता होना चाहिए!
मैं: आयुष....नेहा...बेटा इधर आओ| पापा को आप से कुछ बात करनी है|
मैं बिस्तर में बैठ गया और रजाई ले ली| मेरी पीठ bed post से लगी थी और दोनों बच्चे मेरी अगल-बगल आके बैठ गए| नेहा मेरे दाहिने तरफ थी और आयुष मेरी बायीं तरफ|
मैं: बेटा आप दोनों को कुछ बातें बतानी है| ये बातें आपको पता होनी चाहिए| कल जो कुछ भी हुआ वो सब इन्हीं बातों के कारन हुआ| दरअसल मैं आपकी माँ से बहुत प्यार करता हूँ और वो भी मुझे बहुत प्यार करती हैं| पर आपकी मम्मी की शादी उस इंसान से हुई है जो कल आया था|
नेहा: वो...पुराने पापा?
मैं: हाँ..... पर आपकी मम्मी उसे नहीं बल्कि मुझे प्यार करती थीं| वो बहुत गन्दा इंसान है....आप (नेहा) तो जानते हो? वो शराब पीता है.... आपकी माँ को मारता-पीटता था| जब आप (नेहा) पैदा भी नहीं हुए थे तभी से आपकी मम्मी मुझे प्यार करती थीं पर उन्होंने कभी मुझे नहीं बताया| आपको याद है जब आप पहली बार इस घर में आये थे, उस दिन आपकी मम्मी ने मुझे बताया की वो मुझसे कितना प्यार करती हैं| पर तब मैं एक Teenager था...शादी नहीं कर सकता था! फिर जब मैं गाँव आया तब …… बेटा उन दिनों आपकी मम्मी और मैं बहुत नजदीक आ गए| इतना नजदीक की हम एक दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते थे| मैं उन्हें बहुत चाहने लगा था .... तभी आयुष भी उनकी कोख में आया था| आयुष....बेटा आप मेरे ही बेटे हो ...मेरा खून!
नेहा: और मैं?
मैं: बेटा आप .....मेरा खून नहीं हो पर मैं आपसे भी उतना ही प्यार करता हूँ जितना मैं आयुष को करता हूँ और शायद उससे ज्यादा ही| क्या आपको कभी ऐसा लगा की मैं आपसे प्यार नहीं करता?
नेहा: नहीं....पापा मैं जानती हूँ की आप सबसे ज्यादा मुझसे प्यार करते हो!
मैं: बेटा (आयुष) …….उसे (चन्दर) लगता है की आप उसके बेटे हो पर आप तो मेरे बेटे हो! इसलिए वो आपको जबरदस्ती अपने साथ ले जाना चाहता था|
आयुष: मैं नहीं जाऊँगा उसके साथ!
मैं: बिलकुल नहीं जाओगे| आप मेरे बेटे हो ....और पापा हैं ना आपके पास तो कोई आपको मुझसे अलग नहीं कर सकता| और कल आपने देखा की आप की दीदी ने अपने बड़े होने का कैसे फ़र्ज़ निभाया? आप बहुत तंग करते हो ना दीदी को और कल देखो उन्होंने ना केवल आपको बल्कि आपकी मम्मी को भी संभाला! I’m proud of you beta (Neha)!!!
मैंने नेहा को गले लगा लिया|
आयुष: I LOVE YOU दीदी!
नेहा: I LOVE YOU TOO आयुष!
दोनों मेरे सीने से लग गए और मैंने उनको खूब प्यार किया और फिर हम pillow fight करने लगे| दोनों एक team में और मैं अकेला! आयुष तो मेरी छाती पे बैठ के मुझे मारने लगा और नेहा भी बगल में बैठ गई और मुझे तकिये से मारनी लगी| पूरे घर में बच्चों की हँसी गूंजने लगी| मेरा आत्मविश्वास जो टूटने लगा था वो फिर से वापस आ गया और मैं सोच लिया की मैं संगीता को फिरसे हँसा के रहूँगा, पर जर्रूरत थी एक मौके की!
हमारी हँसी सुन के माँ कमरे में आईं और मुझे पिताजी का फोन देते हुए बोलीं;
माँ: बेटा बच्चों को हँसता-खेलता देख के दिल खुश हो गया है| अब बहु को भी हँसा दे?
मैं: मैंने पिक्चर जाने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया| आप उन्हें तैयार करो बाकी मुझ पे छोड़ दो, I Promise वो हँसती हुई वापस आएँगी|
माँ: मैं अभी बात करती हूँ|
माँ चली गईं और बच्चों को मैंने homework करने में लगा दिया| और मैं खुद laptop चालु कर के project reports बनाने लगा|
कमरे से आ रही इनकी और बच्चों की हँसने की आवाज से मैं मन्त्र मुग्ध हो गई थी| आज 24 घंटों बाद मुझे घर में हँसी सुनाई दी थी| मन ही मन मैं सोच रही थी की काश मैं भी वहाँ होती.... पर उस समां मैंने ये सोच के संतोष कर लिया की मैं नहीं तो क्या...मेरे बची...मेरे वो ...तो खुश हैं! मैं डाइनिंग टेबल पे बैठी मटर छील ने के काम में फिर से जुट गई, की तभी माँ आके बैठीं और बोलीं; "बहु...देख बाहर जा थोड़ी हवाबयार लगेगी....मन बदलेगा...तेरा भी और मानु का भी|" अब मैं भला उनकी बात कैसे टाल सकती थी| हालाँकि उनका कहना था की मैं खुश रहूँ पर मैं तो सिर्फ इनकी और बच्चों की ख़ुशी चाहती थी| तो मैं उठी और अंदर कमरे में गई, ये पलंग पे बैठे लैपटॉप पे कुछ काम कर रहे थे| "क्या मैं Laptop use कर सकती हूँ?" इन्होने कुछ कहना चाहा पर मैं Laptop ले के बाहर आ गई| पता नहीं क्यों मैं इनका सामना करने से डर रही थी| मई वापस डाइनिंग टेबल पे बैठ गई और माँ के सामने BOOK MY SHOW साइट खोली और PK मूवी की टिकट्स बुक करने लगी| पर कोई भी recent show खाली नहीं था| मैंने माँ से ही पूछा; "माँ....सारे show booked हैं, सिर्फ रात के show ही खाली हैं?" माँ बोलीं; "तो बेटी रात को चले जाना! इसमें पूछने की बात क्या है? बच्चों की भी तो छुट्टियां चल रही हैं| बस उसे कहना की गाडी संभाल के चलाये!" "जी माँ" मैंने इतना कहा और चार tickets बुक कर दीं और लैपटॉप उठा के इन्हें देने कमरे में आ गई| मैंने booking page change नहीं किया और as it is इन्हें laptop दे के जाने लगी...तभी पीछे से इन्होने पूछा; "खाना बाहर ही खाएं?" मैंने मुड़ के इन्हें देखा पर हिम्मत नहीं हुई की इनसे बात करूँ| पर किसी तरह जवाब दिया; "जी"और मैं वापस आके अपने काम में लग गई और माँ को बता दिया की हम सात बजे निकलेंगे और ग्यारह बजे तक लौट आएंगे| मुझे उनके सामने जाने से डर रही थी क्यों की मुझे पता था की मैं उनके सामने अपना प्यार जो उनके प्रति था उसे व्यक्त नहीं कर सकती थी......और मुझे बहुत बुरा लगता था की वो मुझसे अपने प्यार का इजहार कर रहे हैं और मैं जानते-बुझते हुए चुप रहती हूँ ...कोई प्रतिक्रिया नहीं देती| जो मेरे हिसाब से गलत भी है| और अगर मैं इनके ज्यादा पास रहती तो ये मेरा मन अवश्य पढ़ लेते और टूट जाते!
मुझे जो मौका चाहिए था वो मुझे मिल चूका था| अब बारी थी इनका दिल जीतने की! Wait a minute दिल जीतने की? पर वो तो मुझसे प्यार करती हैं? तो दिल जीतने की बात कहाँ से आई? Anyways ...... मुझे थोड़ा बुरा लग रहा था की आखिर वो क्यों खुद को express नहीं कर रहीं? मैं उनका पति हूँ कोई गैर नहीं? तो मुझसे छुपाना कैसा? खेर हम तैयार हो के सात बजे निकले| संगीता ने माँ और पिताजी को खाना खिलाया तभी वो निकलीं....she's so concerned about them!!! पिताजी और माँ ने आशीर्वाद दिया तब हम घर से निकले| अब बारी थी खाने की तो मैं इनको लेके सीधा YO CHINA आया| ये एक चीज थी जो उन्होंने और बच्चों ने taste नहीं की थी| Chinese food ...Yummmmmmmm! हम बैठे और मैंने Menu कार्ड उठाया| अब मैंने भी आज तक authentic chinese खाना कभी नहीं खाया था| ऊपर से वहां जो लोग बैठे तो वो chop sticks से खा रहे थे| अब हम में से कोई भी chop stick पकड़ना नहीं जानता था, खाना तो दूर की बात है| मैंने जब संगीता का चेहरा देखा तो वो इस माहोल को देख के थोड़ा परेशान लगीं;
मैं: बाबू don't worry ...मैं ऐसा कुछ order नहीं करूँगा जो आपको chop stick के साथ खाना पड़े| मैं नार्मल खाना आर्डर करूँगा| Okay?
संगीता: हम्म्म....
मैं: नेहा ...आप को spicy खाना पसंद है ना? तो आप के लिए म्म्म्म्म्म...... Schezwan Fried Rice okay?
नेहा: हम्म्म्म.....
आयुष: पापा मैं spicy नहीं खाऊँगा!
संगीता: क्या सब के लिए आग-अलग माँगा रहे हो| एक ही डिश मंगा लो?
मैं: यार बच्चों को भी enjoy कराना चाहिए ना?
संगीता मेरे सामने बैठी थी, आयुष मेरी बगल में और नेहा संगीता के बगल में बैठी थी| मैंने सब के लिए अलग-अलग fried rice की variety आर्डर की और साथ में Gravy Item भी! अब खाना जब आया तो उसमें Fork था ....spoon नहीं था! मैं चाहता तो Spoon माँगा सकता था पर मैंने नहीं मंगाया क्योंकि मैं सब को एक नया experience देना चाहता था| अब सब प्लेट को देख रहे थे की भला fork से चावल कैसे खाएं? मैंने पहल की और उन्हें दिखाते हुए fork से चावल उठाये और सब से संगीता को खिलाया| पर वो जिझक रहीं थीं????
मैं: Hey? खाओ?
मेरे force करने पर उन्होंने मुँह खोला| मैं हैरान था की वो ऐसा क्यों कर रहीं हैं? ये first time तो नहीं है की मैं उन्हें अपने हाथ से खिला रहा हूँ| पर मैंने अपने जज्बातों को control किया और react नहीं किया| फिर अगली बारी नेहा की थी ...जब मैंने उसे खिालय तो उसने फ़ट से मुँह खोला और मैंने उसे खिलाया| Last but not the least आयुष ...वो मेरी बगल में बैठा था और उसने भी बड़े चाव से खाया| हम ऐसे ही बारी-बारी एक दूसरे को खिला रहे थे और बच्चे इस माहोल में बहुत खुश थे| पर संगीता, उनके मुख पे अब भी वो ख़ुशी नहीं थी जो होनी चाहिए थी! Dinner के बाद हम बाहर निकले और Movie के लिए आगये| अंदर जा के हम अपनी-अपनी seats पे बैठ गए| मैं और संगीता साथ बैठे थे और बच्चे मेरी बायीं तरफ बैठे थे| पिक्चर शुरू हुई और मुझे लगा की अब वो मेरा हाथ पकड़ लेंगी....अब वो मेरे कंधे पे अपना सर रखेंगी....पर नहीं| ऐसा कुछ भी नहीं हुआ....मैंने सोचा की चलो मैं ही पहल करूँ, तो मैंने ही उनके कन्धों पे अपना हाथ रखा की वो शायद मेरी ओर झुक जाएं और मुझसे लिपट जाएं पर नहीं| वो normal बैठी हुई थीं और मैं हताश हो के अपना हाथ हटा लिया और चुप-चाप बैठ गया|