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एक अनोखा बंधन**:-कि नई शुरुआत (2) complete

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उनके साथ इस तरह पिक्चर के लिए बैठे हुए पुरानी यादें ताजा होने लगीं| पुरानी यादों से मेरा मतलब ये नहीं की बहुत साल बाद हम पिक्चर देखने आये थे...पर वो एहसास याद आया जब मैं इनके साथ पिक्चर देखने आया करती थी और हमेशा इनके कन्धों पे सर रख के पिक्चर enjoy किया करती थी| आज जब मैं इनसे दूर बैठ रही हूँ तो मुझे बहुत बुरा लग रहा था| इनका मेरे कंधे पे हाथ रखना इशारा था की मैं इनमें सिमट जाऊँ पर ......दर रही थी की कहीं ये मेरा मन पढ़ लेंगे तो depressed हो जायेंगे| इसलिए मैं इनसे दूर रही! और believe me when I say it was not easy! इनके लिए मेरे मन में प्यार कम नहीं हुआ था पर मैं उसे जतानहीं पा रही थी| बिना किसी गलती के उनको सजा दे रही थी!

हमने पिक्चर देखि.... पता नहीं बच्चों के समझ में आई या नहीं पर वो खुश लग रहे थे| चलो कोई तो खुश था! पिक्चर के बाद हम घर पहुँचे पर पूरे रास्ते वो चुप बैठी रही| मेरे पास extra चाभी थी, जब हम अंदर पहुँचे तो माँ और पिताजी दोनों जाग रहे थे और टी.वी. देख रहे थे|

मैं: आप सोये नहीं?

पिताजी: नहीं बेटा... तेरी माँ को CID देखना था तो मैंने सोचा की आज मैं भी देखूं की ACP प्रदुमन "कुछ तो गड़बड़ है" कैसे बोलता है? पर देखो सीरियल खत्म होने को आया पर अभी तक इसने कुछ भी नहीं किया!

बच्चे हँसने लगे पर हम दोनों के चेहरों पर कोई भाव नहीं था|

मैं: चलिए अब सो जाते हैं|

आयुष: पापा मैं आपके पास सोऊँगा|

मैं: हम्म्म्म...

पिताजी: क्यों भई आज दादा की कहानी सुननी नहीं?

आयुष: कल सुनूंगा...वो भी दो!

पिताजी: पर बेटा जगह कम पड़ेगी?

मैं: कोई बात नहीं पिताजी manage हो जायेगा|

पिताजी: कल carpenter को बुला के तुम्हारा Bed बड़ा करवा देते हैं..हा..हा..हा...हा...

मैं: जी यही ठीक होगा|

हमने बारी-बारी से कपडे बदले और रजाई में घुस गए|आयुष और नेहा बीच में सोये थे| आयुष मेरी तरफ था और नेहा संगीता की तरफ| पर दोनों बच्चों ने करवाय मेरी तरफ ले रखी थी| और मेरी करवट भी उनकी तरफ थी| संगीता ने नजाने क्यों दूसरी तरफ करवट ले रखी थी| बच्चे कहानी सुनते-सुनते सो गए पर मेरी नींद उड़ चुकी थी| सारी रात बस बच्चों की पीठ सहलाता रहा ताकि वो इत्मीनान से सोते रहे|हालाँकि संगीता मेरे हाथ की पहुँच से दूर थी पर मैं मन ही मन कह रहा था की वो चैन से सो जाये| एक गाना याद आता है;

"राम करे ऐसा हो जाये ...

मेरी नींदिया तोहे मिल जाये

मैं जागूँ तू सो जाए....

मैं जागूँ तू सो जाये!!!

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शायद मेरी इस दुआ का असर भी हुआ| करीब दो घंटे बाद मैं उठा ये देखने के लिए की संगीता सो रही है या जाग रही है? देख के इत्मीनान हुआ की वो सो रही है| मैं दिवार का सहारा ले के खड़ा-खड़ा उसे निहारता रहा| एक बार को मन किया की उसे चूम लूँ| पर फिर खुद को रोक लिया की कहीं वो जाग ना जाये| सोये हुए उनके मस्तक पे जो सुकून था ....बस यही सुकून में उनके चेहरे पे हमेशा देखना चाहता था|" ऐ खुद मैंने कुछ ज्यादा तो नहीं माँगा था तुझ से?"

तभी आयुष की नींद कच्ची हो गई, वो अपना हाथ फेर के मुझे बिस्तर पे ढूंढने लगा| तो मैं भी जाके वापस लेट गया और उसके सर पे हाथ फेरने लगा| आधे घंटे में वो भी चैन की नींद सो गया और मैं जागता रहा| नींद तो उडी हुई थी ...मन यही सोच रहा था की कैसे उनके मन का डर दूर करूँ? दिल में बस यही बात चुभ रही थी की तू अपनी पत्नी का ख्याल नहीं रख सकता! धिक्कार है तुझ पे! बस इसी सोच ने मुझे खुद को दंड देने के लिए मजबूर कर दिया| मैंने टी-शर्ट और पजामा पहना था और मैं उन्हीं कपड़ों में छत पे आ गया| सर्दी की रात वो भी almost नंगे बदन ...क्या हालत होगी....? ठंडी-ठंडी हवा जब शरीर को छूती तो ऐसा लगता मानो किसी ने गाल पे तमाचा मारा हो| हवा के थपेड़े झेलते हुए मैं हाथ बांधे खड़ा रहा, मुंह से धुआँ लगातार निकल रहा था| खुद को सजा देने का ये तरीका सही था...और मैं deserving था इस सजा को! कोहरा घाना था और अब मेरी कंप-कंपी छूटने लगी थी| बस दस मिनट और मेरी हालत ख़राब होने लगी| तभी मुझे किसी के क़दमों की आहट आई, मैंने पलट के देखा तो कोई नहीं था मैं सीढ़ियों की तरफ बढ़ा, मुझे लगा कोई चोर छत पार कर हमारे घर तो नहीं घुस गया| इसलिए मैं दबे पाँव नीचे आया और सारा घर छान मारा पर कोई नहीं मिला! मुझे लगा की मेरा वहम् होगा| इसलिए मैं वापस कमरे में आ गया और इधर से उधर चक्कर मारने लगा, तभी आयुष भी बिस्तर पे मेरी मौजूदगी टटोलने लगा| तो मैं फिर से उसके पास लेट गया और उसकी पीठ सहलाने लगा ताकि वो उठे ना| पर वो उठा और बोला;

आयुष: पापा ...बाथरूम जाना है!

मैं ने उसे गोद में उठाया और बाथरूम ले गया| फिर जब वो बाथरूम से निकला तो उसे वापस बिस्तर में लिटा दिया और तभी नेहा जाग गई उसे भी बाथरूम जाना था, तो उसे भी गोद में उठा के बाथरूम ले गया| वापस आया तो आयुष भी जाग रहा था! मैंने नेहा को लिटाया और खुद भी लेट गया| पर ये क्या आयुष आके मेरी छाती पे सर रख के लेट गया और नेहा आके मुझसे लिपट गई| दोनों बच्चों ने मुझे "जकड" रखा था की मैं फिर कहीं न चला जाऊँ| जैसे की वो जानते थे की मैं खुद को सजा दे रहा हूँ| मुझे संगीता की भी चूड़ियों की खनक सुनाई दी लगा की वो भी जाग रही है|

मैं: सोये नहीं आप?

संगीता: आप भी तो सोये नहीं?

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और उम्मीद करने लगा की वो नजदीक आके हमारे साथ सो जाएँगी पर वो तो आयुष को ही समझने लगीं;

संगीता: आयुष ...बेटा पापा को सोने दो! क्यों तंग करते हो?

आयुष: नहीं मम्मी मैं यहीं सोऊँगा|

मैं: रहने दो ना....आप तो नजदीक आते नहीं और बच्चे को भी नजदीक आने नहीं देते?

मैंने बात घुमा फिरा के कही पर वो समझ गईं की मेरा मतलब क्या है और मैं एक बार फिर उम्मीद करने लगा की वो आके मुझसे लिपट जाएँगी पर ऐसा नहीं हुआ| उन्होंने फिर से दूसरी तरफ करवट की और सो गईं| अब तो मैं हिल भी नहीं सकता था की जाके उन्हें check करूँ की वो सो रही हैं या नहीं? खेर इसी तरह जागते-जागते सुबह हो गई| आज 4 तरीक थी और जो Contract हमने हाथ में लिया था आज वो पूरा हो चूका था| मैं Bed-पोस्ट का सहारा ले के बैठा था और चाय पि रहा था| ठण्ड ज्यादा थी तो पिताजी की हिदायत थी की अपने कमरे में ही रहा जाए क्योंकि बाहर hall में बहुत ठण्ड थी| संगीता कपडे iron कर रही थी|

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तभी फोन की घंटी बजी, फ़ोन संतोष का था;

मैं: हाँ संतोष बोल?

संतोष: Good Morning भैया, वो party आज काम देखने आ रही है| मालिक ने पर्सनल गारंटी पे ये काम कराया था तो अगर आप आ जाते तो अच्छा होता और check भी ले लेते?

मैं: Sorry यार नहीं आ पाउँगा| काम तो बढ़िया हो चूका है, तू ही मिल ले और check ले के अकाउंट में डाल दे|

संतोष: जी ठीक है|

मैंने फोन काटा, संगीता ने बिना मेरी तरफ देखे ही कहा;

संगीता: कब तक मेरी वजह से रोज़ी से मुंह मोड़ के बैठे रहोगे?

वो बात बहुत चुभी मुझे.... क्योंकि वो ऐसी बात मुझे प्यार से भी कह सकती थीं और तब मुझे बुरा नहीं लगता पर वो लहजा बहुत गलत था| मैं ये भी सह गया और कुछ नहीं बोला बस फटाफट उठा और कपडे बदल के तैयार हुआ और संतोष से कह दिया की मैं आ रहा हूँ| सुबह के दस बज चुके थे और कोहरा छत रहा था| पिताजी डाइनिंग टेबल पे आचुके थे और नाश्ते की तैयारी हो रही थी;

मैं: पिताजी मैं जा रहा हूँ| वो party से check collect करना है|

पिताजी: अच्छा ये ले मेरा मोबाइल, वो builder का फ़ोन आया था की आज check ले लेना| अब तू जा रहा है तो लेता आईओ|

मैं: ठीक है पर मैं आपके मोबाइल का क्या करूँ?

पिताजी: अरे तुझे तो पता है उस बिल्डर का, उसके पास तेरा नंबर है नहीं! अब वो मुझे फोन करेगा की check ले जाओ और फिर मैं तुझे फोन करूँगा? वैसे भी मेरी तबियत थोड़ी ठीक नहीं है तो मैं तो दवाई खा के सोने जा रहा हूँ|

मैं: ठीक है मैं check ले लूँगा|

पिताजी: पर नाश्ता ओ कर ले?

मैं: late हो जाऊँगा| Gurgaon जाना है!

पिताजी: ठीक है, पर गाडी संभाल के चलाना|

मैं: जी!

मैं साइट पे आ गया और party को काम दिखाया तो वो खुश हुई| दरअसल वो एक बाहर की कंपनी थी और हमारे within time में काम कम्पलीट करने पे खुश हुई और extra 5०००/- भी दिए| मैं संगीता के बारे में इतना सोच रहा था की उनके extra पैसे देने पे react ही नहीं कर पाया|

Mr.John: Manu are you not happy?

मैं: I’m sorry sir….actually I was thinking something! Sorry!

Mr.John: What were you thinking?

मैं: That when’s the next time we’ll get a contract from you? (मैंने किसी तरह बात संभाल ली थी| और अंग्रेज ने भी हंस के बात टाल दी थी|)

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I'm Back to Complete My Story !!
 
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उस समय मैं बस यही सोच रहा था की मुझे हार नहीं माननी चाहिए थी और HELL मैं हार नहीं मानने वाला| I'm gonna confront her! HELL YEAH !!! TEAM MANU GO FOR IT !!!!

मेरा दिमाग खराब हो चूका था.....काम ही नहीं कर रहा था| बिना किसी गलती के उनको सजा दिए जा रही थी| खुद से घिन्न आ रही थी..... एक ऐसा इंसान जो मुझे इतना चाहता है.....मैं उसके साथ ऐसा पेश आ रही थी की जैसे वो कोई ......stranger हो..... अरे कोई ऐसे Stranger से भी पेश नहीं आता...एक इंसान जो आपको प्यार करता हो....आपको हँसाने के लिए....आपके दिल को खुश करने के लिए.....और सिर्फ इसलिए नहीं की मैं प्रेग्नेंट हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि वो मुझे प्यार करते हैं| सीधे शब्दों में कहें तो "मुझे उनकी कदर ही नहीं थी|" पर वाकई में क्या मैं ऐसी ही हूँ? या हालात ने मुझे ऐसा बना दिया? मैं अपनी सफाई में कुछ नहीं कहूँगी क्योंकि मैं खुद को GUILTY मानती हूँ| आठ साल पीला का मेरा इनसे दूर रहने का फैसला और पिछले 48 घंटों से जो मैं इनके साथ कर रही थी ये....इससब के लिए मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकती| मेरे इस बर्ताव के कारन ये बिना नाश्ता खाए घर से चले गए और अभी दो बजने को आ रहे थे पर इनका कोई पता नहीं था.और जहाँ तक मैं जानती हूँ इन्होने मेरी वजह से दोपहाक का lunch भी नहीं खाया होगा| कल रात भी ये छत पे cigarette पीने गए थे और ठण्ड में खड़े रह कर खुद को सजा दे रहे थे| सबकुछ जानते हुए भी मैं पत्थर की तरह कड़ी उन्हें ठण्ड में ठिठुरता देख रही थी...बेबस और लाचार......मेरे कारन इन्हें cigarette की लत पद चुकी थी और ये सब मेरी वजह से ...सिर्फ और सिर्फ मेरी वजह से! मैंने फोन उठाया और इनको मिलाया की कम से कम SORRY बोल दूँ और उन्हें कुछ खाने को बोल दूँ| पर लगातार 5 बार फ़ोन मिलाने पर भी इन्होने फोन नहीं उठाया! मन घबराने लगा की कहीं कुछ गलत तो नहीं होगया?

दोनों पार्टियों से check collect करने के बाद मैं बैंक में check डाल रहा था की तभी पिताजी के फ़ोन पे एक call आई| आवाज भारी थी और जानी-पहचानी थी| ये बड़के दादा थे;

मैं: पांयलागी दादा!

उन्होंने कुछ भी जवाब नहीं दिया और सीधा मुद्दे की बात की|

बड़के दादा: तेरे पिताजी कहाँ हैं?

मैं: जी घर पे हैं ...मैं bank आया था|

बड़के दादा: कल पंचायत बुलाई है मैंने| तुम दोनों को आना है|

बस इतना कहा और फ़ोन काट दिया| मैं समझ गया की पंचायत क्यों और किस लिए बुलाई गई है| मैं शाम को 5 बजे घर पहुंचा पर मैंने पंचायत वाली बात किसी को नहीं बताई| बल्कि एक बहाना मार दिया;

मैं: पिताजी मुझे कल कानपुर जाना है|

पिताजी: कानपुर? किस लिए?

मैं: जी वो एक contract के सिलसिले में| मेरा एक दोस्त है उसने बताया है|

पिताजी: दोस्त? पर बेटा बहु को इस हालत में? ऐसा कर तुम दोनों चले जाओ| बच्चे यहीं रुक जायेंगे|

मैं: नहीं पिताजी....बच्चे नहीं मानेंगे और वैसे भी संगीता नहीं मनेगी| मुझे बस एक दिन का काम है| कल रात तक मैं वापस आ जाऊँगा|

पिताजी: जैसा तुझे ठीक लगे| आर अगर बहु को साथ ले जाता तो उसका मन बहल जाता|

मैं: फिर कभी पिताजी|

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ये सब मेरी वजह से हो रहा था....मेरी वजह से वो दूर जा रहे थे| मेरी बात को इन्होने इतना serious ले लिया? मुझे इनसे माफ़ी मांगनी ही होगी पर पहले इन्हें कुछ खिला तो दूँ| मैंने फटाफट परांठे सेंके और कमरे में ले आई| मैंने प्लेट टेबल पे रखी, ये उस समय अपने कपडे change कर रहे थे| मन तो किया की जाके इनके गले लग जाऊं पर नजाने वो क्या चीज थी जो मुझे इनके पास जाने से रोक रही थी| इससे पहले की मैं कुछ बोलती या हिम्मत जूता पाती इन्होने मेरी आँखों में देखा और मुझे लगा की अब ये कुछ न कुछ कहेंगे? मैंने सोच लिया की मैं इन्हें और LOW feel नहीं करवाउंगी और आज कैसे भी माफ़ी जरूर माँग लूँगी|

मैं: बैठो...

संगीता: आप पहले कुछ खा लो...सुबह से कुछ नहीं खाया आपने?

मैं: वो सब बाद में.... पहले आप बैठो मुझे आपसे कुछ बात करनी है|

मैंने जबरदस्ती उन्हें अपने सामने बिठाया और मैं उनके सामने chair लेके बैठ गया|मैं उन्हें ये सब कहना चाहता था;

“Jaan, what’s wrong with you? Why are you acting like you don’t love me? I knw you’re scare and I know you’re concerned about Aayush but if you stop expressing your love to me, I promise….I promise I’m gonna kill that Asshole! I swear to you.I’m gonna kill him! I never asked you for anything but today I’m gonna ask something from you. I don’t know how you’ll do it or whatever it takes for you….but I need my OLD SANGEETA BACK! At any cost……I don’t care about anyone now except for you! And If I didn’t get what I need …you’re gonna loose me….forever!”

मनाएं ये सब उन्हें कहना चाहता था पर रूक गया क्योंकि आज उन्हें मेरे ना खाने से तकलीफ हुई थी? ये कोई नई बात नहीं थी पर पिछले 48 घंटों में ये मेरे लिए एक नई उपलब्धि थी| मन को लगा की जब इन्हें मेरी इतनी फ़िक्र होने लगी है तो जल्द ही मेरी पुरानी संगीता वापस आ जाएगी| बेकार में अगर मैंने ज्यादा PUSH किया तो कहीं बात बिगड़ ना जाये| मैं बिलकुल एक नई शुरुआत करने को तैयार था इसलिए चुप रहा
 
मेरे अंदर जो दबी हुई संगीता थी...वो संगीता जो उन्हें प्यार करती थी....आज उसने फिर से साँस ली| मेरे मन में उनके लिए जो चिंता थी वो आज बाहर आई पर मुझे लगा था की ये कुछ कहेंगे ...पर ये तो चुप हो गए? मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैंने ही पूछा; "क्या हुआ? क्या बात करनी है?" तो ये कुछ नहीं बोले ...अब तो मन और कचोटने लगा की मेरी वजह से ये इतना upset हैं! मैंने फिर से हिम्मत की और सबसे पहले परांठे वाली प्लेट उठाई और इन्हें एक कौर खिलाया और इन्होने भी बिना किसी हिचकिचाट के खा लिया और तब मैंने बात आगे बढ़ाई; "मैं भी चलूँ कानपुर?" इन्होने मुस्कुराते हुए कहा; "जान....मैं बस एक दिन के लिए जा रहा हूँ| एक दिन में वहाँ कुछ नहीं देख पाओगी| मैं जल्दी कोई घूमने का प्लान बनाउँगा और फिर हम एक साथ जायेंगे| okay?" बहुत ताकत लगी मुझे "मुस्कुराने में" और मैंने; "हम्म……" कहा|

मैंने बात तो टाल दी पर जानता था की उन्हें बुरा लगा होगा| पर उन्हें साथ भी तो नहीं ले जा सकता था ना? पर एक बात की ख़ुशी थी की वो प्यार जिसे मैं इतना MISS कर रहा था वो बाहर आने लगा था! उनके हाथ से परांठे खाने का मजा अलग था| ऐसा की क्या बताऊँ? खेर मैंने चुपके से Internet पे लखनऊ की टिकट बुक करा दी और मैंने ये बात सबसे राज रखी थी| दोस्तों आप लोगों को याद होगा की संगीता ने आपको बताया होगा की मैं कानपुर गया हूँ, दरसल आप लोगों को भी मैंने नहीं बताया की मैं कहाँ जा रहा हूँ| वरना RSS के जरिये संगीता को भी पता लग जाता| अगले दिन निकलने से पहले मैं संगीता को हिदायत दे गया था की वो आराम करें पर आप देखो उस पागल को, उसने मेरे निकलते ही वो RSS पे log in हुई और मेरे दूसरे थ्रेड पे कमेंट पढ़ के आग बबूला हो गई| I think you all know how she felt and why she reacted so LOUD !!!

लखनऊ से गाँव पहुँचते-पहुँचते मुझे दोपहर के दो बज गए| मैं जानता था की मेरा वहाँ कोई Grand Welcome नहीं होगा और ऐसा ही हुआ| पंचायत 5 बजे बठिनी थी और मैं दो बजे पहुँच गया था| ना तो मेरे बड़के दादा और ना ही मंझिले दादा के घर में बैठ सकता था| मैं सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे बैठा था| कोई पानी पूछने वाला भी नहीं, बस घरवाले एक-एक कर घर से निकल के मुझे देख रहे थे और खुसर-फुसर कर रहे थे| वरुण (अजय भैया का लड़का) भी मुझे देख रहा था पर नजदीक नहीं आया| मैंने जेब में हाथ डाला और उसके लिए एक चॉकलेट निकाली और उसकी तरफ बधाई पर वो अपनी माँ (रसिका भाभी) को देखने लगा जो मुझे छप्पर के नीचे से देख रही थी| उन्होंने उसकी पीठ पे हाथ रख के मेरी तरफ आने को बोला| वरुण धीरे-धीरे मेरे पास आया और मेरे पाँव छूने लगा| मैंने उसे रोक और प्यार से उसके सर पे हाथ फेरा|

वरुण: चाचू आपको मैं याद हूँ?

मैं: हाँ....और ये भी की आपको चॉकलेट पसंद है| ये लो!

वरुण: थैंक्यू चाचू! चाची कैसी हैं?

मैं: अच्छी हैं...और आपको याद करती हैं|

इतने में बड़के दादा और बड़की अम्मा आ गए और वरुण को डांटने लगे| मैंने उसे इशारा किया की वो चॉकलेट छुपा ले, और उसने वैसा ही किया| वो अंदर घर में भाग गया पर बड़के दादा और बड़की अम्मा कुछ नहीं बोले| मैं उठा और बड़के दादा के पाँव छूने लगा तो वो बिना कुछ बोले हट गए| बड़की अम्मा कड़ी रहीं और वो कुछ बोलना चाहती थीं पर बोल नहं पाईं| मैंने उनके पाँव छुए और उन्होंने अपना हाथ मेरे सर पे रख दिया|
 
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बड़के दादा: तेरे पिताजी कहाँ हैं?

मैं: जी मैं ने उन्हें इस पंचायत के बारे में नहीं बताया|

बड़के दादा: क्यों?

मैं: शिकायत आपको मुझ से है उनसे नहीं| तो मेरा आना जर्रुरी था उनका नहीं| (मैंने तपाक से जवाब दिया)

बड़के दादा: (गरजते हुए) अजय! जाओ जाके पंचों से कहो की अभी आ जाएं| जितनी जल्दी बात हो उतना अच्छा है|

अजय भैया पंचों को बुलाने के लिए निकल गए| शुक्र है की मेरे पास पानी था तो मैंने वो पीने लगा| अगले एक घंटे में पंच आ गए| चार चारपाइयाँ बिछाई गईं, दो पे पंच बैठे एक पे बड़के दादा और चन्दर और दूसरी पे सिर्फ मैं|

पंच: पहले तुम (बड़के दादा) बताओ की तुम्हारा क्या कहना है फिर इस लड़के की बात सुनते हैं|

बड़के दादा: इस लड़के ने मेरे बेटे को बुरी तरह पीटा है| इसका हाथ तोड़ दिया इसने? पूछो क्यों किया इसने? कौन सी दुश्मनी निकाल रहा है ये हम से? क्या बिगाड़ा है हमने इसका?

पंच: बोलो (मैं)?

मैं: मेरी अपने बड़के दादा से कोई दुश्मनी नहीं है...ना ही कभी रही है| मैं तब भी इनका आदर करता था और अब भी इनका आदर करता हूँ| पर ये (चन्दर) ये शक्स 2 जनवरी को मेरे घर में घुस आया और मेरी पत्नी का गाला दबाने लगा और ये ही नहीं मेरे बेटे आयुष को अपने साथ ले जाने की कोशिश करने लगा| मैं उस वक़्त घर पर ही था और जब मैंने चीखने की आवाज सुनी तो मैं बाहर आया और मैंने वही किया जो मुझे ठीक लगा| बड़की अम्मा का ख़याल न होता तो मैं इसे जिन्दा नहीं छोड़ता|

बड़के दादा: ये जूठ बोल रहा है! मेरे दोनों बेटे दिल्ली गए थे पर बात करने के लिए की आयुष को हमारे हवाले कर दिया जाए| बस पर इसने चन्दर की पिटाई कर दी और अजय इस बात का गवाह है!

मैं: अच्छा? अजय भैया यही हुआ था? आप आये थे मेरे घर बात करने?

अजय भैया का सर झुका हुआ था| भले ही हालात कैसे हों पर अजय भैया और मेरे बीच सगे भाइयों जैसा प्यार था| ना तो उन्होंने और ना ही मैंने कभी उनसे जूठ बोला था| मेरे सवालों का उनके पास जवाब नहीं था और यहीं से मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई;

मैं: देख लीजिये पंचों.....ये मेरे अजय भैया कभी मुझसे जूठ नहीं बोलते| आप खुद इनसे पूछिये की क्या ये और चन्दर भैया आये थे मेरे घर बात करने के लिए?

पंच: अजय बोलो? क्या मानु जो कह रहा है वो सच है?

अजय भैया: जी! मैं नहीं गया था चन्दर भैया के साथ| इन्होने मुझे हमारे रिश्तेदार के घर रूकने को कहा था और कहा की मैं आयुष को लेने जा रहा हूँ और जब मैं हॉस्पिटल पहुँचा तो इन्होने कहा की मैं जूठ बोल दूँ|

चन्दर का सर झुक गया था|

बड़के दादा: चलो ठीक है अगर इसने जूठ भी बोला तो भी ये लड़का जूठ बोल रहा है| चन्दर ने ऐसा कछ भी नहीं किया?

मैं: मैं जूठ बोल रहा हूँ? ह्म्म्म्म्म.....ठीक है! मेरे पास कोई गवाह नहीं है कहिये इसे की ये भवानी माँ की कसम खाए और कहे की इसने ऐसा कुछ नहीं किया? और याद रहे चन्दर अगर जूठ बोला तो तू भी जानता है की भवानी माँ तुझे नहीं छोड़ेंगी! और इससे पहले की आप लोग मुझे कसम खाने को कहें मैं अभी मंदिर चलके कसम खाने को तैयार हूँ|

बड़के दादा: चल चन्दर|

पर वो नहीं हिला, हिलता भी कैसे मन में चोर जो था!

मैं: देख लो दादा! आपका अपना खून आपसे जूठ बोलता है|

बड़के दादा का सर शर्म से झुक गया और मुझे इस बात का बहुत बुरा लगा| पर वो अपनी एक बात पे अड़े रहे;

बड़के दादा: ठीक है पंचों मैं मानता हूँ की मेरा ही सिक्का खोता है| पर अब ये (मैं) यहाँ आ ही चूका है तो इससे कहिये की ये आयुष को हमें सौंप दे| आखिर वो चन्दर का खून है|

मैं: बिलकुल नहीं! ये देखिये तलाक के कागज़| (मैंने पंचों को कागज़ दिखाए)

पंच: हम्म्म्म इसमें लिखा है की की बच्चे की हिरासत तुम मानु को दे रहे हो और तुम्हारा अब इस बच्चे पे कोई हक़ नहीं है|

बड़के दादा: नहीं ये नहीं हो सकता! ये जूठ है...इसने हमें धोका दिया है! इसने ये बात हमसे छुपाई है?

मैं: मैंने आप से कोई बात नहीं छुपाई| उस दिन जब मैं तलाक के कागज़ लाया था तब मैंने कागज चन्दर को दिए थे उसने पढ़ा नहीं तो इसमें मेरा क्या कसूर और वैसे भी आयुष मेरा खून है ....इसका नहीं!

बड़के दादा: लड़के...तू जूठ पे जूठ बोलता जा रहा है| ईश्वर से डर!

मैं: मैंने कुछ भी जूठ नहीं कहा चाहे तो आप लोग मेरा और आयुष का DNA टेस्ट करा लो| (मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा था|)

बड़के दादा: हे भगवान! इसका मतलब की तू और.....................छी...छी.....छी....
 
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