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Guest
वो एक बड़े बिज़्नेसमॅन का बेटा था जो हमारे ही कॉलेज मे पढ़ता था.. मैं भी उसी कॉलेज मे थी..
मुझे कभी लड़कों मे कोई ख़ास इंटेरेस्ट नही रहा है.. ये तो तुम जानते ही होगे.." रिया ने थोड़ी देर रुककर रवि के चेहरे की तरफ देखा जो सहमति मे सर हिला रहा था.. फिर उसने बोलना जारी रखा.
"मुझे और लड़कों की तरह ही उसमें भी कोई इंटेरेस्ट नही था जबतक की एक दिन उसने मेरी जान ना बचाई.." रिया ऐसे बोल रही थी जैसे सारा द्रिश्य उसकी आँखों के सामने चल रहा हो.. उसने आगे बोलना जारी रखा.
"एक दिन हमारे कॉलेज मे एक बहुत बड़ा फंक्षन था.. क्या इंडियन क्या अमेरिकन और आफ्रिकन..पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ था..आख़िर वो शो भी तो अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध कॉलेज का था.. " ये बोलते हुए उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी लेकिन पल भर मे ही वो मुस्कान गायब हो गयी..
"खैर प्रोग्राम की शुरुआत हुई.. एक से एक डॅन्स और गानों की बरसात से सारे दर्शक मंत्रमुग्ध हो चुके थे..
मगर एक बात मैं बताना भूल ही गयी कि उन डॅन्स प्रोग्राम्स मे एक प्रोग्राम मेरा भी था..
मगर ये इत्तेफ़ाक़ ही था कि मेरे साथी डॅन्सर्स मे एक वो लड़का भी था.. हालाँकि उस डॅन्स मे हीरो का रोल कोई और कर रहा था.. और मैं हेरोयिन का रोल कर रही थी, फिर भी ना जाने कैसे ये सब हो गया.
उस डॅन्स को करने के लिए एक बड़ा सा घर का सेट बनाया गया था जिसमें छत भी थी.. अगर एक ग़लती जो ओराग़निसेर्स ने कर दी थी कि वो पूरा सेट मोटे मोटे लकड़ी के ताकत का बनवा दिया था जिससे किसी को ऊपर जाकर डॅन्स करने मे दिक्कत ना हो...और एक सीन के दौरान मुझे छत पर चढ़ कर डॅन्स करना था और उसके नीचे हीरो को खड़े होकर मुझे डॅन्स करते हुए मानना था.. खैर वो तो बाद की बात है..
डॅन्स शुरू हो गया.. साब कुछ बिल्कुल आराम से चल रहा था और दर्शक हमारे मनमोहक न्रित्य का मज़ा उठाते हुए तालियाँ बजा रहे थे.. मगर उन्हें नही पता था कि अभी एक बड़ी घटना होने वाली है..
तभी मैने अचानक उस लड़के को छत की तरफ आते हुए देखा और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती वो मुझे लेकर छत से नीचे कूद गया.. और फिर एक धदाम की आवाज़ के साथ पूरा सेट आगे की तरफ गिर गया.. उसस्की चपेट मे आने से सब बच गये थे और कोई छति नही हुई मगर मुझे बचाने के चक्कर मे उस लड़के की टाँग ज़रूर टूट गयी..
बाद मे उस लड़के ने मुझे बताया कि उसने सेट का बेस हिलता हुआ देखा था जैसे बस अब गिरने ही वाला हो इसलिए जल्दी से भाग कर मुझे बचाने आ गया.." इतना बोलकर रिया साँस लेने के लिए रुकी.. "फिर क्या हुआ..?"रवि से अब ज़्यादा इंतेज़ार नही हो रहा था..
"फिर..? फिर वो हुआ जो आज मेरी बरबाादी का कारण बन गया.. दोस्ती और फिर प्यार.." रिया ने सर झुकाकर अपने आँसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा.
"क्यूँ ऐसा क्या कर दिया उस लड़के ने जो आज तुम इस तरह अपनी जान दे रही थी..?" रवि ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा..
"डू यू रियली वॉंट टू नो व्हाट ही डिड टू मी..? ही यूज़्ड मी.." रिया की आवाज़ बहुत धीरे आ रही थी..
"ही यूज़्ड मी सेक्षुयली.. आंड आइ'म प्रेग्नेंट.." ये बात रवि के सर पर किसी बॉम्ब की तरह गिरी और उसने जो हाथ रिया के कंधे पर रखा था वो एक झटके से दूर कर लिया जैसे वो कोई बहुत गंदी चीज़ हो जिसे छूने से वो गंदा हो जाएगा.
"रवि..." रवि को इस तरह दूर होते देख रिया के मुह्न से बस इतना ही निकल पाया और बाकी तो उसके रोने की आवाज़ ही थी..
..............................
..........
"स्नेहा..." ठाकुर साहब की कड़क आवाज़ सुनकर स्नेहा के कदम जहाँ थे वहीं रुक गये. उसने उनकी तरफ देखा जो अभी स्नेहा की तरफ पीठ किए हुए खड़े थे.. यूँ तो ठाकुर साहब कभी भी इस तरह स्नेहा से बात नही करते थे कुछ मौकों को छ्चोड़कर मतलब जब वो गुस्से मे होते थे..
"जी पापा.. क्या बात है..?" स्नेहा ने धीरे से पूछा, उसे डर लग रहा था कि कहीं उसके पिता जी को पता ना लग गया हो..
"ये मैं क्या सुन रहा हूँ..? ठाकुर साहब ने उसी कड़क आवाज़ मे बोलते हुए स्नेहा की तरफ घूमते हुए कहा..
"क्या पापा..?" स्नेहा ने फिर डरते डरते पूछा..
"तुम अच्छी तरह जानती हो कि हम किसकी बात कर रहे हैं.. जान कर भी अंजान बनने से तुम्हारा झूठ नही छिप जाएगा.." ठाकुर साहब ने फिर से कड़क आवाज़ मे कहा.
"पापा मुझे सच मे कुछ समझ नही आ रहा कि आप क्या कहना चाहते हैं.." स्नेहा ने सर झुकाते हुए कहा.
"तुम्हें नही पता.. तो किसे पता होगा..? तुम्हारा और राज का क्या संबंध है..?" ठाकुर साहब ने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा जिससे उनकी पूरी हवेली गूँज उठी.
"पापा.. वो.. वो..." स्नेहा के मुह्न से आवाज़ आनी बिल्कुल बंद हो चुकी थी..
" क्या वो..वो..? हमे जवाब चाहिए.. तुम्हारे और राज के बीच क्या संबंध हैं..?"
"कोई संबंध नही है पापा.. हम तो सिर्फ़ अच्छे दोस्त हैं.." स्नेहा ने लड़खड़ाती आवाज़ मे कहा जिससे उसका झूठ सॉफ पता चल रहा था..
"सिर्फ़ दोस्त या कुछ और भी..?" ठाकुर साहब ने गूँजती हुई आवाज़ मे पूछा..
"जी कुछ और नही पापा..."
"झूठ मत बोलो हम से...क्यूंकी उसका कोई फ़ायदा नही.." स्नेहा की बात पूरी होने से पहले ही ठाकुर साहब गरज उठे..
"सच सच बताओ कि तुम दोनो के बीच क्या संबंध हैं.. हम वादा करते हैं कि हम तुम्हें कुछ नही कहेंगे.." स्नेहा जिसकी आँखों मे अब आँसू आ गये थे, उससे ठाकुर साहब ने आवाज़ नीचे करते हुए कहा..
"पापा मैं राज से प्यार करती हूँ.. वी बोथ लव ईच अदर.." स्नेहा ने रोते हुए कहा.. जिसे सुनकर पहले तो ठाकुर साहब थोड़ा मुस्कुराए लेकिन फिर अपनी गंभीर अवस्था मे आ गये..
"तुम्हें पता है कि तुम क्या कह रही हो..?" ठाकुर साहब ने पूछा..
"हां पापा.. मैं उससे प्यार करती हूँ और उसके बिना ज़िंदा नही रह सकती.. अगर आपने मुझे उससे अलग करने की कोशिश की तो मैं अपनी जान दे दूँगी.." स्नेहा की ये बात सुनकर ठाकुर साहब को झटका लगा.
"ये तुम क्या बोल रही हो बेटी.. मैने कब कहा कि मैं तुम्हें राज से अलग करूँगा..? मैं तो बस यूँ ही मज़ाक कर रहा था.." ठाकुर साहब जो अभी तक गंभीर मुद्रा मे थे अब मज़किया लहज़े मे बोल रहे थे.
"अच्छा तो कब करवा रहे हो..?" स्नेहा के आँसू अब रुक गये थे और चेहरे पर ख़ुसी आ गयी थी..
"क्या..?" ठाकुर साहब ने पूछा..
"हमारी शादी और क्या..?" स्नेहा की ये बात सुनकर एक बार फिर से ठाकुर साहब के चेहरे पर गंभीरता आ गयी..जिसे स्नेहा ने भाँप लिया और वो समझ गयी कि वो कुछ ज़्यादा ही बोल गयी..
"सॉरी पापा.. मैं कुछ ज़्यादा बोल गयी.." स्नेहा ने उदास स्वर मे कहा..
"अरे कोई बात नही बेटा.. लेकिन हां.. इतनी जल्दी शादी की सोचना बिल्कुल ठीक नही.. अभी तो तुमने पूरी पढ़ाई भी पूरी नही की.. और वैसे भी पहले मुझे उस लड़के को अच्छी तरह परख लेने दो.. फिर हम तुम्हारी शादी के बारे मे सोचेंगे.." ठाकुर साहब ने एक ही साँस मे पूरी बात कह डाली.
"पापा मुझे पक्का यकीन है कि राज आपकी परीक्षा मे ज़रूर पास हो जाएगा. वैसे भी आप उससे पहले तो मिल ही चुके हैं." स्नेहा ने चहकते हुए कहा..
"हां बेटा.. मगार मुझे एक बार फिर उससे मिलना है.. तुम्हारे रिश्ते की बात करने के लिए.." ठाकुर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा..
"ओह पापा... तो मैं कल ही उसे बुला लूँ लंच पर..?" स्नेहा की ख़ुसी का ठिकाना नही था.
"हां बिल्कुल बिल्कुल बुला लो.. और उससे कहना मत की हम ने उसे किस लिए बुलाया है.." ठाकुर साहब ने स्नेहा के गाल पर हाथ रखते हुए कहा..
"ओह.. आइ लव यू पापा" ये बोलकर स्नेहा ठाकुर साहब के गले से लिपट गयी..
"अच्छा बेटा अब तुम जाकर फ्रेश हो जाओ.. तबतक खाना भी लगा दिया जाएगा.. जाओ.." ठाकुर साहब ने उसे अपने से अलग करते हुए कहा..
"ओके पापा.. मैं अभी फ्रेश होकर आती हूँ.." इतना बोलकर स्नेहा दौड़ते हुए सीढ़ियों पर भागती हुई अपने कमरे मे चली गयी.. मगर उसके जाते ही ठाकुर साहब एक बार फिर गंभीर मुद्रा मे चले गये और ना जाने किस गहरी सोच मे खो गये....
क्रमशः.........................
मुझे कभी लड़कों मे कोई ख़ास इंटेरेस्ट नही रहा है.. ये तो तुम जानते ही होगे.." रिया ने थोड़ी देर रुककर रवि के चेहरे की तरफ देखा जो सहमति मे सर हिला रहा था.. फिर उसने बोलना जारी रखा.
"मुझे और लड़कों की तरह ही उसमें भी कोई इंटेरेस्ट नही था जबतक की एक दिन उसने मेरी जान ना बचाई.." रिया ऐसे बोल रही थी जैसे सारा द्रिश्य उसकी आँखों के सामने चल रहा हो.. उसने आगे बोलना जारी रखा.
"एक दिन हमारे कॉलेज मे एक बहुत बड़ा फंक्षन था.. क्या इंडियन क्या अमेरिकन और आफ्रिकन..पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ था..आख़िर वो शो भी तो अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध कॉलेज का था.. " ये बोलते हुए उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी लेकिन पल भर मे ही वो मुस्कान गायब हो गयी..
"खैर प्रोग्राम की शुरुआत हुई.. एक से एक डॅन्स और गानों की बरसात से सारे दर्शक मंत्रमुग्ध हो चुके थे..
मगर एक बात मैं बताना भूल ही गयी कि उन डॅन्स प्रोग्राम्स मे एक प्रोग्राम मेरा भी था..
मगर ये इत्तेफ़ाक़ ही था कि मेरे साथी डॅन्सर्स मे एक वो लड़का भी था.. हालाँकि उस डॅन्स मे हीरो का रोल कोई और कर रहा था.. और मैं हेरोयिन का रोल कर रही थी, फिर भी ना जाने कैसे ये सब हो गया.
उस डॅन्स को करने के लिए एक बड़ा सा घर का सेट बनाया गया था जिसमें छत भी थी.. अगर एक ग़लती जो ओराग़निसेर्स ने कर दी थी कि वो पूरा सेट मोटे मोटे लकड़ी के ताकत का बनवा दिया था जिससे किसी को ऊपर जाकर डॅन्स करने मे दिक्कत ना हो...और एक सीन के दौरान मुझे छत पर चढ़ कर डॅन्स करना था और उसके नीचे हीरो को खड़े होकर मुझे डॅन्स करते हुए मानना था.. खैर वो तो बाद की बात है..
डॅन्स शुरू हो गया.. साब कुछ बिल्कुल आराम से चल रहा था और दर्शक हमारे मनमोहक न्रित्य का मज़ा उठाते हुए तालियाँ बजा रहे थे.. मगर उन्हें नही पता था कि अभी एक बड़ी घटना होने वाली है..
तभी मैने अचानक उस लड़के को छत की तरफ आते हुए देखा और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती वो मुझे लेकर छत से नीचे कूद गया.. और फिर एक धदाम की आवाज़ के साथ पूरा सेट आगे की तरफ गिर गया.. उसस्की चपेट मे आने से सब बच गये थे और कोई छति नही हुई मगर मुझे बचाने के चक्कर मे उस लड़के की टाँग ज़रूर टूट गयी..
बाद मे उस लड़के ने मुझे बताया कि उसने सेट का बेस हिलता हुआ देखा था जैसे बस अब गिरने ही वाला हो इसलिए जल्दी से भाग कर मुझे बचाने आ गया.." इतना बोलकर रिया साँस लेने के लिए रुकी.. "फिर क्या हुआ..?"रवि से अब ज़्यादा इंतेज़ार नही हो रहा था..
"फिर..? फिर वो हुआ जो आज मेरी बरबाादी का कारण बन गया.. दोस्ती और फिर प्यार.." रिया ने सर झुकाकर अपने आँसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा.
"क्यूँ ऐसा क्या कर दिया उस लड़के ने जो आज तुम इस तरह अपनी जान दे रही थी..?" रवि ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा..
"डू यू रियली वॉंट टू नो व्हाट ही डिड टू मी..? ही यूज़्ड मी.." रिया की आवाज़ बहुत धीरे आ रही थी..
"ही यूज़्ड मी सेक्षुयली.. आंड आइ'म प्रेग्नेंट.." ये बात रवि के सर पर किसी बॉम्ब की तरह गिरी और उसने जो हाथ रिया के कंधे पर रखा था वो एक झटके से दूर कर लिया जैसे वो कोई बहुत गंदी चीज़ हो जिसे छूने से वो गंदा हो जाएगा.
"रवि..." रवि को इस तरह दूर होते देख रिया के मुह्न से बस इतना ही निकल पाया और बाकी तो उसके रोने की आवाज़ ही थी..
..............................
..........
"स्नेहा..." ठाकुर साहब की कड़क आवाज़ सुनकर स्नेहा के कदम जहाँ थे वहीं रुक गये. उसने उनकी तरफ देखा जो अभी स्नेहा की तरफ पीठ किए हुए खड़े थे.. यूँ तो ठाकुर साहब कभी भी इस तरह स्नेहा से बात नही करते थे कुछ मौकों को छ्चोड़कर मतलब जब वो गुस्से मे होते थे..
"जी पापा.. क्या बात है..?" स्नेहा ने धीरे से पूछा, उसे डर लग रहा था कि कहीं उसके पिता जी को पता ना लग गया हो..
"ये मैं क्या सुन रहा हूँ..? ठाकुर साहब ने उसी कड़क आवाज़ मे बोलते हुए स्नेहा की तरफ घूमते हुए कहा..
"क्या पापा..?" स्नेहा ने फिर डरते डरते पूछा..
"तुम अच्छी तरह जानती हो कि हम किसकी बात कर रहे हैं.. जान कर भी अंजान बनने से तुम्हारा झूठ नही छिप जाएगा.." ठाकुर साहब ने फिर से कड़क आवाज़ मे कहा.
"पापा मुझे सच मे कुछ समझ नही आ रहा कि आप क्या कहना चाहते हैं.." स्नेहा ने सर झुकाते हुए कहा.
"तुम्हें नही पता.. तो किसे पता होगा..? तुम्हारा और राज का क्या संबंध है..?" ठाकुर साहब ने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा जिससे उनकी पूरी हवेली गूँज उठी.
"पापा.. वो.. वो..." स्नेहा के मुह्न से आवाज़ आनी बिल्कुल बंद हो चुकी थी..
" क्या वो..वो..? हमे जवाब चाहिए.. तुम्हारे और राज के बीच क्या संबंध हैं..?"
"कोई संबंध नही है पापा.. हम तो सिर्फ़ अच्छे दोस्त हैं.." स्नेहा ने लड़खड़ाती आवाज़ मे कहा जिससे उसका झूठ सॉफ पता चल रहा था..
"सिर्फ़ दोस्त या कुछ और भी..?" ठाकुर साहब ने गूँजती हुई आवाज़ मे पूछा..
"जी कुछ और नही पापा..."
"झूठ मत बोलो हम से...क्यूंकी उसका कोई फ़ायदा नही.." स्नेहा की बात पूरी होने से पहले ही ठाकुर साहब गरज उठे..
"सच सच बताओ कि तुम दोनो के बीच क्या संबंध हैं.. हम वादा करते हैं कि हम तुम्हें कुछ नही कहेंगे.." स्नेहा जिसकी आँखों मे अब आँसू आ गये थे, उससे ठाकुर साहब ने आवाज़ नीचे करते हुए कहा..
"पापा मैं राज से प्यार करती हूँ.. वी बोथ लव ईच अदर.." स्नेहा ने रोते हुए कहा.. जिसे सुनकर पहले तो ठाकुर साहब थोड़ा मुस्कुराए लेकिन फिर अपनी गंभीर अवस्था मे आ गये..
"तुम्हें पता है कि तुम क्या कह रही हो..?" ठाकुर साहब ने पूछा..
"हां पापा.. मैं उससे प्यार करती हूँ और उसके बिना ज़िंदा नही रह सकती.. अगर आपने मुझे उससे अलग करने की कोशिश की तो मैं अपनी जान दे दूँगी.." स्नेहा की ये बात सुनकर ठाकुर साहब को झटका लगा.
"ये तुम क्या बोल रही हो बेटी.. मैने कब कहा कि मैं तुम्हें राज से अलग करूँगा..? मैं तो बस यूँ ही मज़ाक कर रहा था.." ठाकुर साहब जो अभी तक गंभीर मुद्रा मे थे अब मज़किया लहज़े मे बोल रहे थे.
"अच्छा तो कब करवा रहे हो..?" स्नेहा के आँसू अब रुक गये थे और चेहरे पर ख़ुसी आ गयी थी..
"क्या..?" ठाकुर साहब ने पूछा..
"हमारी शादी और क्या..?" स्नेहा की ये बात सुनकर एक बार फिर से ठाकुर साहब के चेहरे पर गंभीरता आ गयी..जिसे स्नेहा ने भाँप लिया और वो समझ गयी कि वो कुछ ज़्यादा ही बोल गयी..
"सॉरी पापा.. मैं कुछ ज़्यादा बोल गयी.." स्नेहा ने उदास स्वर मे कहा..
"अरे कोई बात नही बेटा.. लेकिन हां.. इतनी जल्दी शादी की सोचना बिल्कुल ठीक नही.. अभी तो तुमने पूरी पढ़ाई भी पूरी नही की.. और वैसे भी पहले मुझे उस लड़के को अच्छी तरह परख लेने दो.. फिर हम तुम्हारी शादी के बारे मे सोचेंगे.." ठाकुर साहब ने एक ही साँस मे पूरी बात कह डाली.
"पापा मुझे पक्का यकीन है कि राज आपकी परीक्षा मे ज़रूर पास हो जाएगा. वैसे भी आप उससे पहले तो मिल ही चुके हैं." स्नेहा ने चहकते हुए कहा..
"हां बेटा.. मगार मुझे एक बार फिर उससे मिलना है.. तुम्हारे रिश्ते की बात करने के लिए.." ठाकुर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा..
"ओह पापा... तो मैं कल ही उसे बुला लूँ लंच पर..?" स्नेहा की ख़ुसी का ठिकाना नही था.
"हां बिल्कुल बिल्कुल बुला लो.. और उससे कहना मत की हम ने उसे किस लिए बुलाया है.." ठाकुर साहब ने स्नेहा के गाल पर हाथ रखते हुए कहा..
"ओह.. आइ लव यू पापा" ये बोलकर स्नेहा ठाकुर साहब के गले से लिपट गयी..
"अच्छा बेटा अब तुम जाकर फ्रेश हो जाओ.. तबतक खाना भी लगा दिया जाएगा.. जाओ.." ठाकुर साहब ने उसे अपने से अलग करते हुए कहा..
"ओके पापा.. मैं अभी फ्रेश होकर आती हूँ.." इतना बोलकर स्नेहा दौड़ते हुए सीढ़ियों पर भागती हुई अपने कमरे मे चली गयी.. मगर उसके जाते ही ठाकुर साहब एक बार फिर गंभीर मुद्रा मे चले गये और ना जाने किस गहरी सोच मे खो गये....
क्रमशः.........................