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ऐसा भी होता है compleet

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Guest
ऐसा भी होता है



"कम ऑन, व्हेर ईज़ माइ किस?"

सपना को मैं पिच्छले 3 साल से जानता था. 12त स्टॅंडर्ड में वो और मैं एक ही क्लास में थे जिसके बाद हम दोनो ने अलग अलग कॉलेजस जाय्न कर लिया थे. क्लास में एक बार उसने मुझसे शर्त लगाई थी जिसके हारने पर उसने मुझे किस करना था. किस वाली बात मैने मज़ाक में कही थी और मुझे पता था के वो मुझे किस नही करेगी इसलिए जब वो शर्त हार गयी तो मैने उसे छेड़ना शुरू कर दिया के आइ आम स्टिल वेटिंग फॉर माइ किस.

इस बात को 3 साल गुज़र चुके थे. हम दोनो के कॉलेज बदल गये और मिलना जुलना बहुत कम हो गया. कुच्छ दिन पहले उसने मुझे फोन किया था के वो और उसकी फॅमिली एक दूसरे शहर में शिफ्ट हो रहे हैं और वो मेरे साथ कुच्छ वक़्त गुज़ारना चाहती है. हम दोनो शहर के एक बड़े से पार्क में बैठे थे.

दिन के कोई 12 बज रहे थे और उस वक़्त पार्क में कोई नही था. हम दोनो एक कोने में कुच्छ पेड़ों की आड़ में बैठे थे.

मैं हमेशा से जानता था और उसने मुझे खुद भी बताया था के उसे मुझपर स्कूल प्यार था पर कभी कह नही सकी. उसके बाद कॉलेज में उसका किसी और लड़के से चक्कर चल निकला था जिससे फिलहाल कुच्छ दिन पहले ही उसका ब्रेक अप हुआ था.

आने से पहले उसने मुझे फोन पर बताया था के अगले हफ्ते वो दूसरे शहर शिफ्ट कर लेगी इसलिए बहुत मुमकिन है के शायद ये हमारी आखरी मुलाक़ात हो. हस्ते हुए उसने ये भी कहा था के शायद आज मुझे मेरा किस भी मिल जाए पर फिर हम दोनो ही उस बात पर हस पड़े थे.

स्कूल के दिनो में हम दोनो बहुत क्लोज़ फ्रेंड्स हुआ करते थे इसलिए पार्क में मैं आराम से नीचे घास पर लेटा हुआ था और सर को उसकी टाँग पर रखा था. वो मेरे बालों में हाथ फिरा रही थी और हम गुज़रे दिनो और अपनी दोस्ती के किस्से एक दूसरे से डिसकस कर रहे थे.

नीचे लेटे हुए मुँह पर पेड़ के पत्तो के बीच से धूप पड़ने लगी तो मैं उठकर बैठ गया.

"क्या हुआ" मुझे उठता देख वो बोली "लेटे रहो"

"धूप पड़ रही है मुँह पर" मैने कहा और पेड़ से टेक लगा कर बैठ गया. और फिर मुझे जाने क्या सूझी के मैने उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और उसे अपनी टाँगो के बीच कर लिया.

3 साल पहले हम दोनो ही एक दूसरे को बेहद पसंद करते थे और दोनो के दिल में दोस्ती के अलावा और भी कई बातें थी जो कभी सामने आ नही पाई थी. ये शायद उसकी का नतीजा था के जब मैने उसे यूँ अपने करीब खींचा तो वो भी चुप चाप सिमट कर मेरी बाहों में आ गयी और मेरी टाँगो के बीच अपनी कमर

मेरी छाती पर टीका कर आराम से बैठ गयी.

कुच्छ पल तक हम दोनो यूँ ही खामोश बैठे रहे. उस एक पल में यूँ करीब होकर बैठ ने से हमने पहली बार दोस्ती से आगे कदम उठाया था इसलिए शायद झिझक रहे थे के अब क्या कहें?

और फिर उसने वो किया जिसकी मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नही थी. आगे बढ़कर उसने मेरा गाल चूम लिया और धीरे से मेरे कान में बोली

"आइ लव यू"

मैं एक पल के लिए उसकी इस हरकत पर चौंक सा पड़ा. वो ऐसा करेगी इसका मुझे दूर दूर तक कोई अंदेशा नही था. मैने गर्दन घूमकर उसकी आँखों में आँखें डालकर देखा और आगे बढ़कर अपने होंठ उसके होंठो पर रख दिए.

वो एक छ्होटा सा किस था. हमारे होंठ आपस में मिले और कुच्छ पल साथ रहकर अलग हो गये.

पर जैसे उस एक किस ने चिंगारी का काम किया. कुच्छ पल बाद ही हमारे होंठ फिर आपस में मिले और इस बार जैसे एक दूसरे से चिपक कर रह गये. मैं उसके दोनो होंठों को अपने होंठों में पकड़ कर चूस रहा था और वो भी मेरा बराबर का साथ देते हुए पलटकर मेरे होंठ चूसने लगी.

"ओह साहिल !!!!"
 


मेरे होंठ थोड़ी देर बाद उसके होंठों से हटे और फिर उसके गाल और गर्दन को चूमने लगे. उसका हाथ मेरे बालों पर आ गया और पल भर को भी उसने मुझे रोकने की कोशिश नही की. मैं बारी बारी से कभी उसकी गर्दन, कभी गाल और कभी होंठों को चूमता रहा.

"साहिल कोई देख लेगा" कुच्छ पल बाद वो बोली

"कोई नही देखेगा. हम पेड़ की आड़ में हैं और इस वक़्त यहाँ कोई है भी नही" कहते हुए मैने अपना चूमने का काम जारी रखा.

थोड़ी देर के लिए वो फिर मेरा साथ देने लगी.

"साहिल हटो. मेरा पूरा मुँह गीला कर दिया तुमने"

"थोड़ा आयेज बढ़ जाऊं?"जवाब मैने पुछा

"क्या?" उसको शायद मेरी बात समझ नही आई पर मैने जवाब का इंतेज़ार किए बिना अपना एक हाथ उसकी एक छाती पर रख दिया.

"ओह साहिल" उसने मेरे जिस्म को अपने हाथों में ऐसे जाकड़ लिया जैसे करेंट का झटका लगा गो "मैं जानती थी तुम यही करोगे. तुम सब एक जैसे होते हो"

पर उसने उस वक़्त मेरा हाथ हटाने की कोई कोशिश नही की. मैं धीरे धीरे उसके होंठ चूमता हुआ अपने हाथ से उसकी चूचिया कमीज़ के उपेर से ही सहलाने लगा.

"बस अब हटो" उसने मेरा हाथ थोड़ी देर बाद अपनी छाती से हटा दिया.

पर मेरे अंदर वासना का तूफान जैसे जाग उठा था. मैं थोड़ी देर के लिए तो अलग हुआ पर कुच्छ पल बाद ही फिर उसके होंठ चूमने लगा और इस बार बिना झिझके अपना हाथ सीधा उसकी छाती पर रख दिया.

मेरे हाथ को अपने सीने पर महसूस करते ही उसने एक गहरी साँस ली और फ़ौरन हटा दिया.

मैने अगले ही पल फिर अपना हाथ उसके सीने पर रख दिया और वो फिर ऐसे काँपी जैसे बिजली का झटका लगा हो. उसने फिर मेरा हाथ हटाया और मैने फिर उसकी एक छाती पकड़ ली.

"बस करो साहिल. कोई देख लेगा"

"कोई नही है. अकेले हैं इस वक़्त हम यहाँ" मैने कहा और इस बार मैं और आगे बढ़ा.

मेरा हाथ इस बार उसके पेट पर आया और उसकी कमीज़ के एक छ्होर से होता हुआ अंदर जाकर सीधा उसके नंगे पेट को च्छू गया.

"ओह्ह्ह्ह साहिल" मेरा हाथ को अपने नंगे जिस्म पर महसूस करते ही उसने फिर एक गहरी साँस ली और कमीज़ के उपेर से मेरे हाथ को पकड़ लिया, जैसे कोशिश कर रही हो के मेरा हाथ उसके जिस्म के किसी और हिस्से को ना च्छुने पाए.

"हाथ हटाओ" मैने उससे मेरा हाथ छ्चोड़ने को कहा.

"सूट बहुत टाइट है साहिल"

"हाथ हटाओ ना प्लीज़"

"कमीज़ बहुत टाइट है मेरी"

"हाथ हटाओ सपना"

और उसने अपना हाथ हटा लिया और मेरा हाथ उसकी कमीज़ के अंदर उसके जिस्म को महसूस करने के लिए आज़ाद हो गया.

उसके चिकने पेट और पीठ पर फिसलता हुआ मेरा हाथ सीधा ब्रा के उपेर से उसकी एक चूची पर आ टीका.

उसकी चूचियाँ ना तो बहुत बड़ी थी और ना ही बहुत छ्होटी. जिस तरह से उसकी एक चूची पूरी मेरी एक मुट्ठी में समा गयी, उससे मैने उसके ब्रा का साइज़ 32 होने का अंदाज़ा लगाया.

"साहिल क्या कर रहे हो तुम" उसने ठंडी आह भरी पर मुझे रोकने या मेरा हाथ हटाने की कोई कोशिश नही की.

कभी मैं कमीज़ के अंदर हाथ डाले ब्रा के उपेर से उसकी चूचियाँ सहलाता, कभी उसके पेट पर हाथ फिराता तो कभी हाथ थोडा अंदर करके उसके नंगी पीठ को छुता.

क्रमशः...........
 
AISA BHI HOTA HAI

"Come on, where is my kiss?"

Sapna ko main pichhle 3 saal se jaanta tha. 12th standard mein vo aur main ek hi class mein the jiske baad ham dono ne alag alag colleges join kar liya the. Class mein ek baar usne mujhse shart lagayi thi jiske haarne par usne mujhe kiss karna tha. Kiss wali baat maine mazak mein kahi thi aur mujhe pata tha ke vo mujhe kiss nahi karegi isliye jab vo shart haar gayi toh maine use chhedna shuru kar diya ke i am still waiting for my kiss.

Is baat ko 3 saal guzar chuke the. Ham dono ke college badal gaye aur milna julna bahut kam ho gaya. Kuchh din pehle usne mujhe phone kiya tha ke vo aur uski family ek doosre shehar mein shift ho rahe hain aur vo mere saath kuchh waqt guzarna chahti hai. Ham dono Shehar ke ek bade se park mein bethe the.

Din ke koi 12 baj rahe the aur us waqt park mein koi nahi tha. Ham dono ek kone mein kuchh pedon ki aad mein bethe the.

Main hamesha se janta tha aur usne mujhe khud bhi bataya tha ke use mujhpar school mein crush tha par kabhi keh nahi saki. Uske baad college mein uska kisi aur ladke se chakkar chal nikla tha gaya jisse filhal kuchh din pehle hi uska break up hua tha.

Aane se pehle usne mujhe phone par bataya tha ke agle haft vo doosre shehar shift kar legi isliye bahut mumkin hai ke shayad ye hamari aakhri mulaqat ho. Haste hue usne ye bhi kaha tha ke shayad aaj mujhe mera kiss bhi mil jaaye par phir ham dono hi us baat par has pade the.

School ke dino mein ham dono bahut close friends hua karte the isliye park mein main aaram se neeche ghaas par leta hua tha aur sar ko uski taang par rakha tha. Vo mere baalon mein haath phira rahi thi aur ham guzre dino aur apni dosti ke kisse ek doosre se discuss kar rahe the.

Neeche lete hue munh par ped ke patto ke beech se dhoop padne lagi toh main uthkar beth gaya.

"Kya hua" Mujhe uthta dekh vo boli "Lete raho"

"Dhoop pad rahi hai munh par" Maine kaha aur ped se tek laga kar beth gaya. Aur phir mujhe jaane kya soojhi ke maine uska haath pakad kar apni taraf khincha aur use apni taango ke beech kar liya.

3 saal pehle ham dono hi ek doosre ko behad pasand karte the aur dono ke dil mein dosti ke alawa aur bhi kai baaten thi jo kabhi saamne aa nahi paayi thi. Ye shayad uski ka nateeja tha ke jab maine use yun apne kareeb khincha toh vo bhi chup chap simat kar meri baahon mein aa gayi aur meri taango ke beech apni kamar

meri chhati par tika kar aaram se beth gayi.

Kuchh pal tak ham dono yun hi khamosh bethe rahe. Us ek pal mein yun kareeb hokar bethne se hamne pehli baar dosti se aage kadam uthaya tha isliye shayad jhijhak rahe the ke ab kya kahen?

Aur phir usne vo kiya jiski mujhe bilkul bhi ummeed nahi thi. Aage badhkar usne mera gaal choom liya aur dheere se mere kaan mein boli

"I love you"

Main ek pal ke liye uski is harkat par chaunk sa pada. Vo aisa karegi iska mujhe door door tak koi andesha nahi tha. Maine gardan ghumakar uski aankhon mein aankhen dalkar dekha aur aage badhkar apne honth uske hontho par rakh diye.

Vo ek chhota sa kiss tha. Hamare honth aapas mein mile aur kuchh pal saath rehkar alag ho gaye.

Par jaise us ek kiss ne chingari ka kaam kiya. Kuchh pal baad hi hamare honth phir aapas mein mile aur is baar jaise ek doosre se chipak kar reh gaye. Main uske dono honthon ko apne honthon mein pakad kar choos raha tha aur vo bhi mera barabar ka saath dete hue palatkar mere honth choosne lagi.

"Oh Saahil !!!!"

Mere honth thodi der baad uske honthon se hate aur phir uske gaal aur gardan ko choomne lage. Uska haath mere baalon par aa gaya aur pal bhar ko bhi usne mujhe rokne ki koshish nahi ki. Main baari baari se kabhi uski gardan, kabhi gaal aur kabhi honthon ko choomta raha.

"Saahil koi dekh lega" Kuchh pal baad vo boli

"Koi nahi dekhega. Ham ped ki aad mein hain aur is waqt yahan koi hai bhi nahi" Kehte hue maine apna choomne ka kaam jaari rakha.

Thodi der ke liye vo phir mera saath dene lagi.

"Saahil hato. Mera poora munh geela kar diya tumne"

"Thoda aage badh jaoon?"Jawab mein aine puchha

"Kya?" Usko shayad meri baat samajh nahi aayi par maine jawab ka intezaar kiye bina apna ek haath uski ek chhati par rakh diya.

"Oh Saahil" Usne mere jism ko apne haathon mein aise jakad liya jaise current ka jhatka laga go "Main jaanti thi tum yahi karoge. Tum sab ek jaise hote ho"

Par usne us waqt mera haath hatane ki koi koshish nahi ki. Main dheere dheere uske honth choomta hua apne haath se uski chhatiyan kameez ke uper se hi sehlane laga.

"Bas ab hato" Usne mera haath thodi der baad apni chhati se hata diya.

Par mere andar vasna ka toofan jaise jaag utha tha. Main thodi der ke liye toh alag hua par kuchh pal baad hi phir uske honth choomne laga aur is baar bina jhijhke apna haath sidha uski chhati par rakh diya.

Mere haath ko apne seene par mehsoos karte hi usne ek gehri saans li aur fauran hata diya.

Maine agle hi pal phir apna haath uske seene par rakh diya aur vo phir aise kaanpi jaise bijli ka jhatka laga ho. Usne phir mera haath hataya aur maine phir uski ek chhati pakad li.

"Bas karo Saahil. Koi dekh lega"

"Koi nahi hai. Akele hain is waqt ham yahan" Maine kaha aur is baar main aur aage badha.

Mera haath is baar uske pet par aaya aur uski kameez ke ek chhor se hota hua andar jakar sidha uske nange pet ko chhu gaya.

"Ohhhh Saahil" Mera haath ko apne nange jism par mehsoos karte hi usne phir ek gehri saans li aur kameez ke uper se mere haath ko pakad liya, jaise koshish kar rahi ho ke mera haath uske jism ke kisi aur hisse ko na chhune paaye.

"Haath hatao" Maine usse mera haath chhodne ko kaha.

"Suit bahut tight hai Saahil"

"Haath hatao na please"

"Kameez bahut tight hai meri"

"Haath hatao Sapna"

Aur usne apna haath hata liya aur mera haath uski kameez ke andar uske jism ko mehsoos karne ke liye aazad ho gaya.

Uske chikne pet aur peeth par phisalta hua mera haath sidha bra ke uper se uski ek chhati par aa tika.

Uski chhatiyan na toh bahut badi thi aur na hi bahut chhoti. Jis tarah se uski ek chhati poori meri ek mutthi mein sama gayi, usse maine uske bra ka size 32 hone ka andaza lagaya.

"Saahil kya kar rahe ho tum" Usne thandi aah bhari par mujhe rokne ya mera haath hatane ki koi koshish nahi ki.

Kabhi main kameez ke andar haath daale bra ke uper se uski chhatiyan sehlata, kabhi uske pet par haath phirata toh kabhi haath thoda andar karke uske nangi peeth ko chhuta.

kramashah...........

 
गतान्क से आगे............

"ओह साहिल !!!!" वो बराबर लंबी साँसें लेते हुए आहें भर रही थी और मुझे लिपटी जा रही थी. मेरे होंठ अब भी कभी उसके गालों पर होते तो कभी उसके होंठ और गले पर.

और इसी बीच मेरे हाथ एक बार फिर कमीज़ के अंदर उसके पेट को सहलाता उसकी चूची पर आया पर इस बार ब्रा के उपेर से आने के बजाय सीधा ब्रा के अंदर घुसा और उसकी नंगी चूची मेरे एक हाथ में आ गयी.

"साहिल !!!!!!" वो मेरी बाहों में ऐसे मचल रही थी पानी के बिना मच्चली.

मैने बारी बारी ब्रा के अंदर हाथ घुसा कर उसकी दोनो चूचियो को महसूस किया, सहलाया. मेरे खुद के जिस्म में जैसे एक आग सी लगी हुई थी और मुझे खुद को समझ नही आ रहा था के मैं कैसे इस पार्क में उस आग को ठंडी करूँ.

"चलो कहीं और चलते हैं" उसकी चूचियाँ सहलाते हुए मैने कहा

"कहाँ?" वो आहें भरती हुई बोली

मैने चारों तरफ देखा. हमसे थोड़ी देर एक फुलवारी लगी हुई थी और हम उसके पिछे आराम से छिप कर बैठ सकते थे.

"उधर चलते हैं" मैने इशारे से कहा

"नही मुझे नही जाना" उसने फ़ौरन मना कर दिया

"चलो ना"

"नही"

उसने फिर मना किया और इस बार वो संभाल कर बैठ गयी. मेरा हाथ उसने अपनी कमीज़ के अंदर से निकाल दिया और अपना दुपट्टा सही करने लगी.

"उधर एक फॅमिली आकर बैठी है. वो देख लेंगे हमें. अब प्लीज़ कुच्छ मत करो"

उसने पार्क के एक तरफ इशारा किया जहाँ एक परिवार चादर बिच्छा कर बैठने की तैय्यारि कर रहा था. पर उनका ध्यान हमारी तरफ बिल्कुल नही था और बहुत मुश्किल था के उनकी नज़र हम पर पड़ती या वो हमें नोटीस करते.

"नही देखेंगे" मैने फिर उसे अपनी तरफ खींचा और हाथ सीधा उसकी कमीज़ के अंदर घुसा कर उसकी नंगी चूचियों को पकड़ लिया.

"ओह साहिल तुम क्या कर रहे हो" वो आह भर कर बोली और फिर चुप चाप मेरे किस का जवाब देने लगी.

हम कुच्छ देर तक खामोशी से काम लीला में लगे रहे.

"सपना" कुच्छ देर बाद मैने कहा

"हां" वो मुझसे लिपटी हुई बोली

"कुच्छ मांगू?"

"क्या?"

"एक बार अपने ये दिखा दो ना" मैने उसकी चूचियो पर हल्के से दबाव डाला

मेरी बात ने जैसे 1000 वॉट के झटके का काम किया. वो फ़ौरन छितक कर मुझसे अलग हो गयी.

"बिल्कुल नही" मेरा हाथ अपनी कमीज़ से निकालते हुए वो अपना दुपट्टा ठीक करने लगी

"प्लीज़"

"नही"

"एक बार"

"तुमने टच कर लिया यही बहुत बड़ी बात है"

"एक बार देखने दो ना"

"नही" वो अपने कपड़े ठीक करने लगी "और अब चलो यहाँ से. बहुत देर हो गयी है"

"थोड़ी देर तो रुक जाओ"

"रुकूंगी तो तुम फिर शुरू हो जाओगे"

"अच्छा नही करूँगा कुच्छ"

"पक्का?"

"एक आखरी किस दे दो फिर कुच्छ नही करूँगा" मैने कहा

"नही" उसने मना किया पर उसकी आँखों में भी वासना के डोरे सॉफ नज़र आ रहे थे. मैं जानता था के उस लम्हे को जितना मैं एंजाय कर रहा हूँ उतना वो भी कर रही है.

"अच्छा बैठ तो जाओ" वो खड़ी हुई तो मैने फिर उसका हाथ खींच कर नीचे बैठा लिया.

थोड़ी देर तक हम दोनो खामोशी से बैठे रहे.

"एक आखरी किस के बारे में क्या ख्याल है?"

 


मैने कहा तो वो तड़प कर ऐसे मेरी तरफ पलटी जैसे मेरे पुच्छने का इंतेज़ार ही कर रही थी. अपने होंठ उसने सीधा मेरे होंठो पर रख दिए और एक बार फिर चूमने लगी.

और मेरा हाथ जैसे अपने आप उसकी कमीज़ के अंदर घुस कर उसकी ब्रा से होता हुआ उसकी नंगी चूचियो पर आ टीका.

"एक बार दिखा दो ना प्लीज़" मैने फिर इलतेजा की

"बिल्कुल नही"

"प्लीज़"

"अपनी बेगम के देख लेना शादी के बाद"

उसकी बात सुन कर मेरी हसी छूट पड़ी.

"अब बस करो" कहकर वो अलग हुई और फिर संभाल कर बैठ गयी.

"बहुत फास्ट हो तुम" कुच्छ देर बाद वो बोली

"क्या?" मैने पुछा

"इतनी सी देर में कहाँ से कहाँ पहुँच गये. एक्सपर्ट हो. कितनी लड़कियों की ले चुके हो ऐसे?"

मैं सिर्फ़ हल्के से मुस्कुरा कर रह गया.

"सीरियस्ली साहिल. ज़रा सी देर में कितना कुच्छ कर डाला तुमने"

थोड़ी देर के लिए फिर खामोशी च्छा गयी. वो बैठी अपनी तेज़ हो चली साँसों को शांत करने की कोशिश करने लगी और मैं अपनी तेज़ हो चली धड़कन को नॉर्मल करने की कोशिश. पर मेरा दिल तो कर रहा था के एक बार फिर उसको पकड़ कर चूम लूम और उससे लिपट जाऊं.

और शायद यही हाल उसके दिल का भी था. इससे पहले के मैं कुच्छ करता, वो खुद ही घूम कर मेरी तरफ पलटी और मुझे सिमट गयी.

"क्या हुआ?"

"किस करो मुझे"

"अभी तो किया था"

"तब तुम्हें करना था. अब मुझे करना है"

मैं भला मना क्यूँ करता. मेरे लिए तो प्यासे को पानी मिलने जैसे बात हो गयी थी. एक बार फिर से वही सिलसिला शुरू हो गया. मैं उसे चूमने लगा और मेरा हाथ उसकी कमीज़ के अंदर घुस कर कभी उसकी नंगी चूचियो सहलाता तो कभी पेट तो कभी पीठ.

वो भी बराबर मेरा साथ दे रही थी पर शायद उसकी हद यहीं तक थी. इससे आगे वो कुच्छ करना चाहती नही थी. मैने भी जो मिले सो अच्छा सोचते हुए जितना मिल रहा था उसी का भरपूर फयडा उठाने की सोची.

क्रमशः...........

 


gataank se aage............

"Oh Saahil !!!!" Vo barabar lambi saansen lete hue aahen bhar rahi thi aur mujhe lipti ja rahi thi. Mere honth ab bhi kabhi uske gaalon par hote toh kabhi uske honth aur gale par.

Aur isi beech mere haath ek baar phir kameez ke andar uske pet ko sehlata uski chhati par aaya par is baar bra ke uper se aane ke bajay sidha Bra ke andar ghusa aur uski nangi chhati mere ek haath mein aa gayi.

"Saahil !!!!!!" Vo meri baahon mein aise machal rahi thi pani ke bina machhli.

Maine baari baari bra ke andar haath ghusa kar uski dono chhatiyon ko mehsoos kiya, sehlaya. Mere khud ke jism mein jaise ek aag si lagi hui thi aur mujhe khud ko samajh nahi aa raha tha ke main kaise is park mein us aag ko thandi karun.

"Chalo kahin aur chalte hain" Uski chhatiyan sehlate hue maine kaha

"Kahan?" Vo aahen bharti hui boli

Maine chaaron taraf dekha. Hamse thodi der ek phulvari lagi hui thi aur ham uske pichhe aaram se chhip kar beth sakte the.

"Udhar chalte hain" Maine ishare se kaha

"Nahi mujhe nahi jana" Usne fauran mana kar diya

"Chalo na"

"Nahi"

Usne phir mana kiya aur is baar vo sambhal kar beth gayi. Mera haath usne apni kameez ke andar se nikal diya aur apna dupatta sahi karne lagi.

"Udhar ek family aakar bethi hai. Vo dekh lenge hamen. Ab please kuchh mat karo"

Usne park ke ek taraf ishara kiya jahan ek pariwar chadar bichha kar bethne ki taiyyari kar raha tha. Par unka dhyaan hamari taraf bilkul nahi tha aur bahut mushkil tha ke unki nazar ham par padti ya vo hamen notice karte.

"Nahi dekhenge" Maine phir use apni taraf khincha aur haath sidha uski kameez ke andar ghusa kar uski nangi chhatiyon ko pakad liya.

"Oh Saahil tum kya kar rahe ho" Vo aah bhar kar boli aur phir chup chap mere kiss ka jawab dene lagi.

Ham kuchh der tak khamoshi se kaam leela mein lage rahe.

"Sapna" Kuchh der baad maine kaha

"Haan" Vo mujhse lipti hui boli

"Kuchh maangu?"

"Kya?"

"Ek baar apne ye dikha do na" Maine uski chhati par halke se dabav dala

Meri baat ne jaise 1000 watt ke jhatke ka kaam kiya. Vo fauran chhitak kar mujhse alag ho gayi.

"Bilkul nahi" Mera haath apni kameez se nikalte hue vo apna dupatta theek karne lagi

"Please"

"Nahi"

"Ek baar"

"Tumne touch kar liya yahi bahut badi baat hai"

"Ek baar dekhne do na"

"Nahi" Vo apne kapde theek karne lagi "Aur ab chalo yahan se. Bahut der ho gayi hai"

"Thodi der toh ruk jao"

"Rukungi toh tum phir shuru ho jaoge"

"Achha nahi karunga kuchh"

"Pakka?"

"Ek aakhri kiss de do phir kuchh nahi karunga" Maine kaha

"Nahi" Usne mana kiya par uski aankhon mein bhi vaasna ke dore saaf nazar aa rahe the. Main janta tha ke us lamhe ko jitna main enjoy kar raha hoon utna vo bhi kar rahi hai.

"Achha beth toh jao" Vo khadi hui toh maine phir uska haath khinch kar neeche betha liya.

Thodi der tak ham dono khamoshi se bethe rahe.

"Ek aakhri kiss ke baare mein kya khyaal hai?"

Maine kaha toh vo tadap kar aise meri taraf palti jaise mere puchhne ka intezaaar hi kar rahi thi. Apne honth usne sidha mere hontho par rakh diye aur ek baar phir choomne lagi.

Aur mera haath jaise apne aap uski kameez ke andar ghus kar uski bra se hota hua uski nangi chhati par aa tika.

"Ek baar dikha do na pls" Maine phir ilteja ki

"Bilkul nahi"

"Please"

"Apni begum ke dekh lena shaadi ke baad"

Uski baat sun kar meri hasi chhut padi.

"Ab bas karo" Kehkar vo alag hui aur phir sambhal kar beth gayi.

"Bahut fast ho tum" Kuchh der baad vo boli

"Kya?" Maine puchha

"Itni si der mein kahan se kahan pahunch gaye. Expert ho. Kitni ladkiyon ko la chuke ho aise?"

Main sirf halke se muskura kar reh gaya.

"Seriously Saahil. Zara si der mein kitna kuchh kar dala tumne"

Thodi der ke liye phir khamoshi chha gayi. Vo bethi apni tez ho chali saanson ko shaant karne ki koshish karne lagi aur main apni tez ho chali dhadkan ko normal karne ki koshish. Par mera dil toh kar raha tha ke ek baar phir usko pakad kar choom loom aur usse lipat jaoon.

Aur shayad yahi haal uske dil ka bhi tha. Isse pehle ke main kuchh karta, vo khud hi ghoom kar meri taraf palti aur mujhe simat gayi.

"Kya hua?"

"Kiss karo mujhe"

"Abhi toh kiya tha"

"Tab tumhein karna tha. Ab mujhe karna hai"

Main bhala mana kyun karta. Mere liye toh pyaase ko pani milne jaise baat ho gayi thi. Ek baar phir se vaHi silsila shuru ho gaya. Main use choomne laga aur mera haath uski kameez ke andar ghus kar kabhi uski nangi chhhatiyan sehlata toh kabhi pet toh kabhi peeth.

Vo bhi barabar mera saath de rahi thi par shayad uski hadh yahin tak thi. Isse aage vo kuchh karna chahati nahi thi. Maine bhi jo mile so achha sochte hue jitna mil raha tha usi ka bharpoor fayda uthane ki sochi.

kramashah...........

 
गतान्क से आगे............

इस बार जब मेरे होंठ उसके होंठों से होते उसके गले तक आए तो वहीं आ कर रुके नही. उसके गले से नीचे होते हुए मैने कमीज़ के उपेर से ही उसके गले पर किस किया और थोड़ा नीचे होकर उसकी दोनो चूचियो को चूम लिया.

"साहिल ...." उसने मेरे बाल अपनी मुट्ठी में पकड़ लिए.

मैं उम्मीद कर रहा था के वो मना करेगी पर जब उसने कुच्छ नही कहा तो मैं बिना रुके अपने होंठ कमीज़ के उपेर से ही उसकी दोनो चूचियो पर फिराने लगा.

"देख लो"

अचानक मेरे कानो में आवाज़ आई तो मैं चौंक पड़ा.

"क्या?" मैने उसकी तरफ देखते हुए पुछा

"देख लो" उसने फिर वही बात दोहराई.

मैं तो जैसे कब्से इसके इंतेज़ार में ही बैठा था. मैने फ़ौरन उसकी कमीज़ का पल्लू पकड़ा.

"साहिल प्लीज़" उसने फ़ौरन अपने कमीज़ को पकड़ लिया "तुम्हें कसम है. कमीज़ उपेर मत करना प्लीज़"

"फिर कैसे?"

"उपेर से देख लो" उसने खुद ही रास्ता सूझा दिया.

मैं उसकी बगल से हटकर थोड़ा सा उसके पिछे होकर बैठ गया और उसकी कमीज़ के गले को थोड़ा आगे करते हुए अंदर निगाह दौड़ाई.

उसकी छ्होटी छ्होटी चूचियाँ वाइट ब्रा के अंदर क़ैद थी. उपेर से मुझे कुच्छ ख़ास नही, सिर्फ़ उसका क्लीवेज ही दिखाई दे रहा था.

मैने एक हाथ से उसकी कमीज़ के गले को पकड़ कर आगे को खींचा और दूसरा हाथ उपेर से ही कमीज़ के अंदर डाला.

"कैसा लगा?" उसने मुझसे पुछा. वो आँखें बंद किए बैठी थी.

"अमेज़िंग" मैने कहा और उसकी एक चूची को पकड़ कर उपेर से ही बाहर निकालने की कोशिश की पर शायद ऐसा करते हुए मैने कुच्छ ज़्यादा ही ज़ोर से दबा दिए.

"आआहह" वो फ़ौरन दर्द से बिलबिलाई और मेरा हाथ हटाते हुए आगे को सरक गयी "क्या कर रहे हो? हमें दर्द नही होता क्या?"

"आइ आम सॉरी" मैने कहा

"पता है कितनी ज़ोर से दबाया तुमने?" कहकर वो फ़ौरन उठ खड़ी हुई

"अच्छा अच्छा ग़लती हो गयी. बेध्यानी में इतनी ज़ोर से दबा दिया"

"चलो अब" वो खड़ी हुई अपने कपड़े ठीक करने लगी.

मैं भी उसके साथ उठकर खड़ा हुआ और उसको अपने गले से लगा लिया. हम दोनो एक दूसरे से लिपटे चुप चाप खड़े हो गये.

वो मेरे सीने से सर लगाए चुप चाप खड़ी थी और उसकी दोनो चूचियाँ मेरे जिस्म से दब रही थी. उसकी साँस अब भी भारी थी जिसको वो कंट्रोल करने की कोशिश कर रही थी पर मेरा अभी रुकने का कोई इरादा नही था. खड़े खड़े ही मेरे हाथ जो उसकी पीठ पर थे फिसलते हुए उसकी गांद पर आ टीके.

"साहिल प्लीज़ नीचे कुच्छ मत करना" वो फ़ौरन बोली पर मेरा हाथ हटाने या मुझसे अलग होने की कोई कोशिश नही की.

"ओके"

मैने कहा और कुच्छ देर तक यूँ ही उसकी गांद पर हाथ टिकाए खड़ा रहा. पेंट के अंदर मेरा लंड एकदम टाइट खड़ा हुआ था और क्यूंकी वो मुझसे लिपटी हुई थी, इसलिए उसके जिस्म को च्छू रहा था.

"एक बार दबाओ" उसकी आवाज़ मेरे कान में पड़ी. वो किस बारे में बात कर रही थी मैं नही जानता पर उसकी बात सुनते ही मैने वो काम किया जो मैं करना चाह रहा था.

उसकी गांद को थोड़ा और मज़बूती से पकड़ कर मैने अपने लंड को उसके जिस्म के साथ दबाया.
 


"आआहह" उसके मुँह से आवाज़ आई और मेरे गले में बाहें डाले वो मेरे गले को चूमने लगी. मेरे लिए ये जैसे ग्रीन सिग्नल जैसा था. अब सारे पर्दे उठ चुके थे, हर मर्यादा ख़तम हो चुकी थी. मैने उसकी गांद को अच्छे से पकड़ा, अपने घुटने थोड़ा नीचे किए और अपने लंड को सीधा कपड़ो के उपेर से उसकी चूत

पर दबाने लगा.

इस सारे दौरान उसने एक बार भी मुझे रोकने या कुच्छ कहने की कोशिश नही की. वो चुप चाप मुझसे लिपटी खड़ी रही और मैने अपना लंड उसकी चूत पर दबाता रहा, घिसता रहा.

"साहिल मैं गिर जाऊंगी" उसने कहा तो मैने ध्यान दिया के जोश जोश में मैं उसकी गांद पकड़ कर उसको हल्का सा हवा में उठा दे रहा था.

"नही गिरगी. तुम मेरी बाहों में हो" कहते हुए मैने उसे पेड़ से लगाया और फिर लंड को उसकी चूत पर घिसने लगा.

"साहिल, कुच्छ चुभ रहा है" वो बोली पर मैने ध्यान नही दिया

जब उसने फिर से यही बात कही तो मैं रुका. मुझे लगा वो कह रही है के पीठ पर पेड़ से लगे हुए कुच्छ चुभ रहा है.

"क्या है? मैं पेड़ की तरफ देखता हुआ बोला

"यहाँ नही. नीचे कुच्छ चुभ रहा है" उसका इशारा मेरे लंड की तरफ था

मैने कोई जवाब नही दिया और इस बार उसको घुमा दिया. अब वो पेड़ की तरफ मुँह किए खड़ी थी और मैं उसकी जाँघो को पकड़े अपना लंड उसकी गांद पर रगड़ रहा था.

मेरे हाथ उसकी चूत के काफ़ी करीब थे और अब तक सिर्फ़ यही हिस्सा रह गया था जो मैने च्छुआ नही था.

मैने अपना हाथ धीरे से उपेर करते हुए उसकी टाँगो के बीच सलवार के उपेर से उसकी चूत पकड़ ली.

वो ऐसे उच्छली के हम दोनो ही गिरते गिरते बचे.

"नही प्लीज़. यहाँ हाथ मत लगाओ" कहते हुए वो फिर से नीचे बैठ गयी.

मैने कुच्छ कहना या सुनना ज़रूरी नही समझा. उसके साथ नीचे बैठे हुए मैने उसके गले में पड़ा दुपट्टा हटा कर साइड में रख दिया.

"क्या कर रहे हो?" वो बोली

मैं खिसक कर उसके करीब हुआ और एक हाथ उसके कमीज़ के गले में डालते हुए उसकी एक चूची पकड़ कर उपेर से ही बाहर निकाल ली.

"साहिल" उसने फ़ौरन अपनी चूची अंदर घुसा ली.

"प्लीज़" मैने कहा "देख तो ली ही है मैने. एक बार अच्छे से देखने दो"

मैने फिर उसकी चूची पकड़ कर कमीज़ के गले से बाहर निकाल ली.

"साहिल दोनो बाहर नही आएँगे. कमीज़ टाइट है." जब मैने दूसरी चूची बाहर निकालने की कोशिश की तो वो धीरे से बोली.

उसकी बात अनसुनी करते हुए मैने उसकी दोनो चूचियाँ जितनी हो सकी कमीज़ से बाहर निकाल ली. वो भी शायद जानती थी के अब मैने क्या करूँगा इसलिए अपनी कोहनियाँ टिकाते हुए घास पर हल्की से लेट सी गयी.

और तब मुझे वो निशान नज़र आया.

उसके निपल के चारो तरफ बने हुए ब्राउन कलर के एरोला से थोड़ा सा परे काले रंग का निशान. एक गोल निशान जो पूरा काला था पर एक तिहाई लाल.

"ये क्या है?" मैने पुछा

"बचपन से है" वो बोली

मुझे समझ नही आया के क्या करूँ या क्या कहूँ. मेरे कानो में अपने पापा की आवाज़ गूँज उठी."हमने जहाँ से तुम्हें गोद लिया था उन्ही लोगों ने हमें बताया था के यू वर ट्विन्स पर तुम दोनो में से एक को किसी ने गोद ले लिया था. लड़की थी शायद. दूसरे बचे थे तुम तो तुम्हें हम ले आए थे. ये निशान तुम्हारी छाती पर तबसे ही है और आश्रम वालो ने बताया था के ऐसा निशान तुम्हारे ट्विन की छाती पर भी था."

दोस्तो जिंदगी मे ऐसा भी हो जाता है आपको कहानी कैसी लगी ज़रूर बताना आपका दोस्त राज शर्मा

समाप्त......

 


gataank se aage............

Is baar jab mere honth uske honthon se hote uske gale tak aaye toh vahin aa kar ruke nahi. Uske gale se neeche hote hue maine kameez ke uper se hi uske gale par kiss kiya aur thoda neeche hokar uski dono chhatiyon ko choom liya.

"Saahil ...." Usne mere baal apni mutthi mein pakad liye.

Main ummeed kar raha tha ke vo mana karegi par jab usne kuchh nahi kaha toh main bina ruke apne honth kameez ke uper se hi uski dono chhaityon par phirane laga.

"Dekh lo"

Achanak mere kaano mein aawaz aayi toh main chaunk pada.

"Kya?" Maine uski taraf dekhte hue puchha

"Dekh lo" Usne phir vahi baat dohrayi.

Main toh jaise kabse iske intezaar mein hi betha tha. Maine fauran uski kameez ka pallu pakda.

"Saahil please" Usne fauran apne kameez ko pakad liya "Tumhein kasam hai. Kameez uper mat karna please"

"Phir kaise?"

"Uper se dekh lo" Usne khud hi rasta soojha diya.

Main uski bagal se hatkar thoda sa uske pichhe hokar beth gaya aur uski kameez ke gale ko thoda aage karte hue andar nigah daudayi.

Uski chhoti chhoti chhatiyan white bra ke andar kaid thi. Uper se mujhe kuchh khaas nahi, sirf uska cleavage hi dikhai de raha tha.

Maine ek haath se uski kameez ke gale ko pakad kar aage ko khincha aur doosra haath uper se hi kameez ke andar dala.

"Kaisa laga?" Usne mujhse puchha. Vo aankhen band kiye bethi thi.

"Amazing" Maine kaha aur uski ek chhati ko pakad kar uper se hi bahar nikalne ki koshish ki par shayad aisa karte hue maine kuchh zyada hi zor se daba diye.

"Aaaahhhhh" Vo fauran dard se bilbilayi aur mera haath hatate hue aage ko sarak gayi "Kya kar rahe ho? Hamen dard nahi hota kya?"

"I am sorry" Maine kaha

"Pata hai kitni zor se dabaya tumne?" Kehkar vo fauran uth khadi hui

"Achha achha galti ho gayi. Bedhyaani mein itni zor se daba diya"

"Chalo ab" Vo khadi hui apne kapde theek karne lagi.

Main bhi uske saath uthkar khada hua aur usko apne gale se laga liya. Ham dono ek doosre se lipte chup chap khade ho gaye.

vO mere seene se sar lagaye chup chap khadi thi aur uski dono chhatiyan mere jism se dab rahi thi. Uski saans ab bhi bhaari thi jisko vo control karne ki koshish kar rahi thi par mera abhi rukne ka koi irada nahi tha. Khade khade hi mere haath jo uski peeth par the phisalte hue uski gaand par aa tike.

"Saahil please neeche kuchh mat karna" Vo fauran boli par mera haath hatane ya mujhse alag hone ki koi koshish nahi ki.

"Ok"

Maine kaha aur kuchh der tak yun hi uski gaand par haath tikaye khada raha. Pent ke andar mera lund ekdum tight khada hua tha aur kyunki vo mujhse lipti hui thi, isliye uske jism ko chhu raha tha.

"Ek baar dabao" Uski aawaz mere kaan mein padi. Vo kis baare mein baat kar rahi thi main nahi janta par uski baat sunte hi maine vo kaam kiya jo main karna chah raha tha.

Uski gaand ko thoda aur mazbooti se pakad kar maine apne lund ko uske jism ke saath dabaya.

"Aaaahhhh" Uske munh se aawaz aayi aur mere gale mein baahen daale vo mere gale ko choomne lagi. Mere liye ye jaise green signal jaisa tha. Ab saare parde uth chuke the, har maryada khatam ho chuki thi. Maine uski gaand ko achhe se pakda, apne ghutne thoda neeche kiye aur apne lund ko sidha kapdo ke uper se uski choot

par dabane laga.

Is saare dauran usne ek baar bhi mujhe rokne ya kuchh kehne ki koshish nahi ki. Vo chup chap mujhse lipti khadi rahi aur maine apna lund uski choot par dabata raha, ghista raha.

"Saahil main gir jaoongi" Usne kaha toh maine dhyaan diya ke josh josh mein main uski gaand pakad kar usko halka sa hawa mein utha de raha tha.

"Nahi girogi. Tum meri baahon mein ho" Kehte hue maine use ped se lagaya aur phir lund ko uski choot par ghisne laga.

"Saahil, kuchh chubh raha hai" Vo boli par maine dhyaan nahi diya

Jab usne phir se yahi baat kahi toh main ruka. Mujhe laga vo keh rahi hai ke peeth par ped se lage hue kuchh chubh raha hai.

"Kya hai? Main ped ki taraf dekhta hua bola

"Yahan nahi. Neeche kuchh chubh raha hai" Uska ishara mere lund ki taraf tha

Maine koi jawab nahi diya aur is baar usko ghuma diya. Ab vo ped ki taraf munh kiye khadi thi aur main uski jhaangho ko pakde apna lund uski gaand par ragad raha tha.

Mere haath uski choot ke kaafi kareeb the aur ab tak sirf yahi hissa reh gaya tha jo maine chhua nahi tha.

Maine apna haath dheere se uper karte hue uski taango ke beech salwar ke uper se uski choot pakad li.

Vo aise uchhli ke ham dono hi girte girte bachi.

"Nahi please. Yahan haath mat laga" Kehte hue vo phir se neeche beth gayi.

Maine kuchh kehna ya sunna zaroori nahi samjha. Uske saath neeche bethte hue maine uske gale mein pada dupatta hata kar side mein rakh diya.

"Kya kar rahe ho?" Vo boli

Main khisak kar uske kareeb hua aur ek haath uske kameez ke gale mein daalte hue uski ek chhati pakad kar uper se hi bahar nikal li.

"Saahil" Usne fauran apni chhati andar ghusa li.

"Please" Maine kaha "Dekh toh li hi hai maine. Ek baar achhe se dekhne do"

Maine phir uski chhati pakad kar kameez ke gale se bahar nikal li.

"Saahil dono bahar nahi aayenge. Kameez tight hai." Jab maine doosri chhati bahar nikalne ki koshish ki toh vo dheere se boli.

Uski baat ansuni karte hue maine uski dono chhatiyan jitni ho saki kameez se bahar nikal li. Vo bhi shayad jaanti thi ke ab maine kya karunga isliye apni kohniyan tikate hue ghaas par halki se let si gayi.

Aur tab mujhe vo nishan nazar aaya.

Uske nipple ke chaaro taraf bane hue brown color ke aerola se thoda sa pare kaale rang ka nish. Ek gol nishan jo poora kala tha par ek tihaai laal.

"Ye kya hai?" Maine puchha

"Bachpan se hai" Vo boli

Mujhe samajh nahi aaya ke kya karun ya kya kahun. Mere kaano mein apne papa ki aawaz goonj uthi."Hamne jahan se tumhein god liya tha unhi logon ne hamen bataya tha ke you were twins par tum dono mein se ek ko kisi ne god le liya tha. Ladki thi shayad. Doosre bache the tum toh tumhein ham le aaye the. Ye nishan tumhari chhati par tabse hi hai aur aashram walo ne bataya tha ke aisa nishan tumhare twin ki chhati par bhi tha."

samaapt......

 
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