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Guest
एक दिन इसी तरह सोचते हुए और अकेले भटकते हुए मैं बहुत दूर निकल गया था और बहुत देर बाद गिरती हुई शाम को देखकर यकायक महसूस किया था, कुछ विस्मय से ही, झरती हुई पीली, जर्जर पत्तियों की एक कालीन में डूबा-सा मैं खड़ा हूँ। सन्नाटे के कोलाहल में जज्ब, एकमेव, ठहरी हुई हवा की तरह... सामने समंदर के ऊपर हल्के सफेद कोहरे की घनी परत बिछी हुई है। चारों तरफ डूबती साँझ का नीला अँधेरा है। एक गहरी चुप्पी आकाश से जमीन तक निरंतर उतरते हुए हर तरफ व्याप रही थी। न जाने क्या हुआ था, एक कच्ची दीवार के गिरने की तरह अनायास, मैं अवसाद की अनाम, धूसर अनुभूतियों में भीगकर जड़ होने लगा था। खड़ा नहीं रह पाया था देरतक, ढह गया था गीली रेत पर किसी दीमक खाई हुई खोखली दरख्त की तरह। पड़ा रहा था चुपचाप न जाने कितनी देरतक। दिनों से अंदर धीरे-धीरे इकट्ठी हो रही चीखें और गहन मौन अब बोलना चाहते हैं - बिखराव और क्लेश की यही भाषा... मैं कहीं से दरकने लगा था - बुरी तरह से!
एक समय के बाद धूसर नील आकाश में फैले बेतरतीब बादलों के फाहों के बीच नए मौसम का एक टुकड़ा चाँद निकल आया था। मैंने बुझी आँखों से देखा था, आकाश से फीकी, हल्की चाँदनी उतर रही है - पानी की महीन धार की तरह। पेड़ पौधे भीग रहे हैं निरंतर झरती हुई इस तरल सफेदी में। मुझे अब लौटना होगा। बहुत कोशिश करके एक लंबे समय के बाद मैंने सोचा था - जिंदगी की ओर, उजाले की ओर। मगर ये उजाला किस तरफ है...
उस रात दामिनी के कॉटेज में गहरा अँधेरा पसरा हुआ था - ओर-छोर तक... मैं निराश होकर अपने कमरे में लौट आया था। रोशनी वहाँ भी नहीं थी। अपने कमरा खोलकर अँधेरे में टटोलकर मैंने मोमबत्ती जलाने की कोशिश की थी, मगर तभी पसीने से भीगे दो उष्ण हाथों ने मुझे पीछे से रोक लिया था - उँह, उजाला मत करो, ये मौसम अँधेरे का है, मैंने अपने जिस्म पर भी यही ओढ़ रखा है - खालिस अँधेरा! बस, तुम भी इसमें उतर आओ... ये आवाज रेचल की थी - बहकी हुई, गहरी कामुकता में थरथराती हुई... न जाने कब वह यहाँ लौट आई थी।
उसकी देह के नर्म, मखमली अँधेरे में उतरते हुए मैंने अनायास महसूस किया था, मुझे इस समय उसकी कितनी जरूरत थी... गहरे परितोष के अगले क्षणों में मैंने धीरे से उसके कानों में कहा था - थैंक्स रेचल... वह हल्के से रसमसाई थी - यू वेलकम लव, एनी टाइम...
तुम इतना कुछ देती हो मुझे, अपनी कृतज्ञता बोध की गहरी मनःस्थिति में उदारता के साथ पूछा था मैंने - तुम कभी कुछ माँगती क्यों नहीं?
- मैन, ये लव है। इसमें माँगना कुछ नहीं, बस देना ही माँगता है। बोले तो तुम दे भी क्या सकता है। फिर जो चीज माँगने से भी नहीं मिल सकता, उसे माँगने का कोई सेंस भी तो नहीं है। प्यार में बिना किसी को तकलीफ पहुँचाए जीतना खुशी हो सकता है, हो लेने का। बस, और कुछ नहीं। तुम अपना वर्ल्ड में मस्त, हम अपना वर्ल्ड में मस्त... उसके उदार जीवन दर्शन ने मुझे एकबार फिर से चकित किया था, मुग्ध भी। एक समय तक चुप रहने के बाद उसने मुझसे पूछा था - इतना अपसेट सा तुम आज क्यों लगता है मैन?
अपसेट नहीं, बस थोड़ा कनफ्यूज्ड, मैंने उसे बताया था - माइ वाइफ इज प्रेगनेंट अगेन, हमारी दो बेटियाँ हैं। उसे एक बेटा चाहिए। मगर इस उमर में मैं...
अरे ये तो गुड न्यूज है यार, डोंट वरी, गॉड वीलिंग सब अच्छा ही होगा... नाउ स्टाप वरींग एंड लेटस् सेलिब्रेट... उसने थोड़ी देर पहले जलाई मोमबत्ती फिर से फूँक मारकर बुझा दी थी।
सुबह हम बिस्तर में ही थे जब यकायक दरवाजे पर दस्तक हुई थी - बहुत तेज, सुबह के शांत माहौल में दूरतक गूँजती हुई। मैं चौंककर जाग उठा था। मगर रेचल की नींद नहीं टूटी थी। मैंने उसे झकझोरा था, कई बार। तब कहीं उसने कुनमुनाकर आँखें खोली थी - सोने दो न लव, आज भी तो संडे है।
प्लीज, गेट अप... मैंने एक तरह से धकेलकर ही उसे बाथरूम में भेजा था और पजामे पर अपनी शर्ट पहनते हुए दरवाजे की ओर बढ़ा था। दरवाजा अभी तक लगातार खटखटाया जा रहा था। 'होल्ड ऑन' कहते हुए मैंने दरवाजा खोला था और सामने दामिनी को खड़ी देखकर सन्न रह गया था। वह बेहद परेशान दिख रही थी, उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। पैरों में घर के स्लीपर्स, खुले हुए बाल...।
- दामिनी, तुम... मेरी जुबान लड़खड़ा गई थी।
- ओह अशेष, दरवाजा खोलने में तुमने कितनी देर कर दी... कहते हुए वह कमरे के भीतर घुस आई थी।
- क्या हुआ, तुम इतनी परेशान क्यों हो? किसी तरह स्वयं को संयमित करते हुए मैं बोला था।
- कल रात उषा को उसके पति ने शराब पीकर जला दिया, मेडिकल में है - काफी सीरियस, अभी नेलशन ने खबर दी है। प्लीज, जल्दी से तैयार हो लो, हमें अभी निकलना होगा, उसे हमारी जरूरत है, फोन पर बहुत रो रही थी। नेलशन ने ही बात करवाई।
- अरे, ये तो सचमुच बहुत बुरा हुआ... अभी मैं अपनी बात समाप्त भी नहीं कर पाया था कि रेचल बाथरूम से निकल आई थी - गीले बालों में, मेरी बड़ी-सी शर्ट पहने, जाँघ से नीचे पूरी तरह से नंगी। उसकी लंबी, गठी हुई टाँगें काँसे के स्तंभ की तरह चमक रही थीं।
- ओह! दामिनी, हाय, यार मैं तो डर ही गई थी, तुम जिस तरह से दरोगा की तरह दरवाजा पीट रही थी, मुझे लगा ऐश का पत्नी ही आ धमका है... चलो, तुम लोग बात करो, हम कॉफी बनाकर लाता है। फिर मेरी तरफ मुड़ी थी, सॉरी, तुम्हारा शर्ट बॅरो किया, अपने कपड़े तो... बात को बीच में ही छोड़कर वह शरारत से मुस्कराते हुए कमरे से बाहर निकल गई थी - तुम्ही से धुलवाऊँगी, चर्च के बाद आंटी भी अब आती ही होगी... मुझे जल्दी से खिसकना होगा...
उसके कमरे से बाहर जाते ही वहाँ गहरा सन्नाटा छा गया था। दामिनी मेरी तरफ देख रही थी, न जाने किस नजर से। उन्हें पढ़ने-समझने की सामर्थ्य मैं खो चुका था। एकदम शून्य होकर खड़ा था, उसकी तरफ एक न देखती हुई-सी नजर से तकते हुए। थोड़ी देर के लिए महसूस हुआ था, हमारे बीच समय भी ठहर गया है, हवा दम साधे पड़ी है, पूरी दुनिया गूँगी, बहरी हो गई है। और दामिनी... वह तो एकदम पाषाण हो गई थी। न जाने कितनी देरतक हम इसी तरह एक-दूसरे की तरफ देखते हुए खड़े रह गए थे और फिर अचानक रेचल फिर कमरे में घुस आई थी, हाथ में कॉफी की ट्रे और मिठाई का प्लेट लेकर - लो, मिस दामिनी, मुँह मीठा कर लो, हमारा ऐश फिर बाप बननेवाला है, कल ही इसकी बीवी ने गुड न्यूज भेजा है।
मुझे लगा था, मैं अब सचमुच बेहोश हो जाऊँगा। उसकी बातें सुनकर दामिनी के चेहरे पर एक ही साथ न जाने कितने रंग आए और गए थे। रेचल ने जैसे ही मिठाई का टुकड़ा उसके मुँह की तरफ बढ़ाया था, दामिनी जैसे चौंककर नींद से जागी थी और फिर आँधी की तरह कमरे से बाहर निकल गई थी। मैंने उसे पुकारकर रोकना चाहा था, मगर मेरे गले से जैसे कोई स्वर ही नहीं निकला था।
उसके जाने के बाद कमरे में यकायक मौन पसर गया था। कुछ देर बाद मैंने रेचल की ओर मुड़कर देखा था। वह कमरे से बाहर निकल रही थी, होठों ही होठों में मुस्कराते हुए। मेरा जी चाहा था, बढ़कर उसका गला घोंट दूँ, मगर अपनी जगह से हिल भी नहीं पाया था।
इसके बाद न जाने मैंने कितनी बार दामिनी को फोन किया था, हर बार फोन बंद मिलता। उसके बँगले पर जाकर भी मुझे हर बार निराश ही लौटना पड़ा था। वह किसी भी तरह मुझे नहीं मिल रही थी। इधर शायद मिसेज लोबो के कान में भी मेरे और रेचल की बात पड़ गई थी। कई दिनों तक उनके घर में रिश्तेदारों का ताँता लगा रहा था। सभी आते-जाते मुझे घूरकर देखते। मिसेज लोबो का रवैया भी काफी बदल गया था। रास्ते में मुझे एकदिन गाँव के चर्च के पादरी मिले थे, मगर उन्होंने मुझे सहज ढंग से नजरअंदाज कर दिया था। मेरे अभिवादन का भी जवाब नहीं दिया था। और फिर एकदिन मिसेज लोबो ने मुझे घर खाली करने का नोटिस दे दिया था। कोई कारण भी नहीं बताया था। पूछने पर व्यंग्य से पूछा था - क्यों, तुमको नहीं मालूम मैन? हम तुमको जेंटलमैन समझता था... मैं चुप रह गया था।
ऑफिस में भी माहौल बदला-बदला-सा लग रहा था। जैसे लोग कतरा रहे थे मुझसे। बहुत पूछने पर किसी ने दबी जुबान से बतलाया था, मेरे नाम पर शिकायत हुई है। मैं एकदम से घबरा उठा था। अब मामला गंभीर होता हुआ प्रतीत हो रहा था। मैंने यहाँ के लोगों के स्वच्छंद व्यवहार को कुछ ज्यादा ही गलत ढंग से ले लिया था शायद। आखिर था तो यह भी भारतीय समाज का एक हिस्सा ही। मूलभूत संवेदनाएँ और चरित्र एक ही था। ऊपरी रंग-रोगन ने मुझे भ्रम में डाल दिया था। अब क्या करूँ... मेरा मन डूबने लगा था। एकदम से जैसे मेरी दुनिया बदल गई थी। सब कुछ गलत हो रहा था - एकदम सिरे से, क्या कुछ सँभालूँ और कहाँ से शुरू करूँ, समझ नहीं पा रहा था। हर तरफ तहस-नहस लगा था और बीच में मैं खड़ा था, एकदम चकित और डरा हुआ...
सबसे ज्यादा दामिनी की बेरुखी ने मुझे तोड़ दिया था। वह मुझे गालियाँ देती, मारती, चीखती-चिल्लाती... मगर कुछ नहीं। उसकी चुप्पी, अडोल खामोशी मुझे तड़पा रही थी। मैं स्वयं को बेहद अपमानित महसूस कर रहा था। रह-रहकर मुझे दामिनी की ठंडी आँखें, उनसे निसृत होती वितृष्णा और घृणा याद आती और मैं आहत हो उठता। क्या मुझे वह और एक अवसर भी नहीं देगी! कुछ तो - कुछ तो वह कहे। उसकी ये चुप्पी मुझे मारे डाल रही थी।
एक समय के बाद धूसर नील आकाश में फैले बेतरतीब बादलों के फाहों के बीच नए मौसम का एक टुकड़ा चाँद निकल आया था। मैंने बुझी आँखों से देखा था, आकाश से फीकी, हल्की चाँदनी उतर रही है - पानी की महीन धार की तरह। पेड़ पौधे भीग रहे हैं निरंतर झरती हुई इस तरल सफेदी में। मुझे अब लौटना होगा। बहुत कोशिश करके एक लंबे समय के बाद मैंने सोचा था - जिंदगी की ओर, उजाले की ओर। मगर ये उजाला किस तरफ है...
उस रात दामिनी के कॉटेज में गहरा अँधेरा पसरा हुआ था - ओर-छोर तक... मैं निराश होकर अपने कमरे में लौट आया था। रोशनी वहाँ भी नहीं थी। अपने कमरा खोलकर अँधेरे में टटोलकर मैंने मोमबत्ती जलाने की कोशिश की थी, मगर तभी पसीने से भीगे दो उष्ण हाथों ने मुझे पीछे से रोक लिया था - उँह, उजाला मत करो, ये मौसम अँधेरे का है, मैंने अपने जिस्म पर भी यही ओढ़ रखा है - खालिस अँधेरा! बस, तुम भी इसमें उतर आओ... ये आवाज रेचल की थी - बहकी हुई, गहरी कामुकता में थरथराती हुई... न जाने कब वह यहाँ लौट आई थी।
उसकी देह के नर्म, मखमली अँधेरे में उतरते हुए मैंने अनायास महसूस किया था, मुझे इस समय उसकी कितनी जरूरत थी... गहरे परितोष के अगले क्षणों में मैंने धीरे से उसके कानों में कहा था - थैंक्स रेचल... वह हल्के से रसमसाई थी - यू वेलकम लव, एनी टाइम...
तुम इतना कुछ देती हो मुझे, अपनी कृतज्ञता बोध की गहरी मनःस्थिति में उदारता के साथ पूछा था मैंने - तुम कभी कुछ माँगती क्यों नहीं?
- मैन, ये लव है। इसमें माँगना कुछ नहीं, बस देना ही माँगता है। बोले तो तुम दे भी क्या सकता है। फिर जो चीज माँगने से भी नहीं मिल सकता, उसे माँगने का कोई सेंस भी तो नहीं है। प्यार में बिना किसी को तकलीफ पहुँचाए जीतना खुशी हो सकता है, हो लेने का। बस, और कुछ नहीं। तुम अपना वर्ल्ड में मस्त, हम अपना वर्ल्ड में मस्त... उसके उदार जीवन दर्शन ने मुझे एकबार फिर से चकित किया था, मुग्ध भी। एक समय तक चुप रहने के बाद उसने मुझसे पूछा था - इतना अपसेट सा तुम आज क्यों लगता है मैन?
अपसेट नहीं, बस थोड़ा कनफ्यूज्ड, मैंने उसे बताया था - माइ वाइफ इज प्रेगनेंट अगेन, हमारी दो बेटियाँ हैं। उसे एक बेटा चाहिए। मगर इस उमर में मैं...
अरे ये तो गुड न्यूज है यार, डोंट वरी, गॉड वीलिंग सब अच्छा ही होगा... नाउ स्टाप वरींग एंड लेटस् सेलिब्रेट... उसने थोड़ी देर पहले जलाई मोमबत्ती फिर से फूँक मारकर बुझा दी थी।
सुबह हम बिस्तर में ही थे जब यकायक दरवाजे पर दस्तक हुई थी - बहुत तेज, सुबह के शांत माहौल में दूरतक गूँजती हुई। मैं चौंककर जाग उठा था। मगर रेचल की नींद नहीं टूटी थी। मैंने उसे झकझोरा था, कई बार। तब कहीं उसने कुनमुनाकर आँखें खोली थी - सोने दो न लव, आज भी तो संडे है।
प्लीज, गेट अप... मैंने एक तरह से धकेलकर ही उसे बाथरूम में भेजा था और पजामे पर अपनी शर्ट पहनते हुए दरवाजे की ओर बढ़ा था। दरवाजा अभी तक लगातार खटखटाया जा रहा था। 'होल्ड ऑन' कहते हुए मैंने दरवाजा खोला था और सामने दामिनी को खड़ी देखकर सन्न रह गया था। वह बेहद परेशान दिख रही थी, उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। पैरों में घर के स्लीपर्स, खुले हुए बाल...।
- दामिनी, तुम... मेरी जुबान लड़खड़ा गई थी।
- ओह अशेष, दरवाजा खोलने में तुमने कितनी देर कर दी... कहते हुए वह कमरे के भीतर घुस आई थी।
- क्या हुआ, तुम इतनी परेशान क्यों हो? किसी तरह स्वयं को संयमित करते हुए मैं बोला था।
- कल रात उषा को उसके पति ने शराब पीकर जला दिया, मेडिकल में है - काफी सीरियस, अभी नेलशन ने खबर दी है। प्लीज, जल्दी से तैयार हो लो, हमें अभी निकलना होगा, उसे हमारी जरूरत है, फोन पर बहुत रो रही थी। नेलशन ने ही बात करवाई।
- अरे, ये तो सचमुच बहुत बुरा हुआ... अभी मैं अपनी बात समाप्त भी नहीं कर पाया था कि रेचल बाथरूम से निकल आई थी - गीले बालों में, मेरी बड़ी-सी शर्ट पहने, जाँघ से नीचे पूरी तरह से नंगी। उसकी लंबी, गठी हुई टाँगें काँसे के स्तंभ की तरह चमक रही थीं।
- ओह! दामिनी, हाय, यार मैं तो डर ही गई थी, तुम जिस तरह से दरोगा की तरह दरवाजा पीट रही थी, मुझे लगा ऐश का पत्नी ही आ धमका है... चलो, तुम लोग बात करो, हम कॉफी बनाकर लाता है। फिर मेरी तरफ मुड़ी थी, सॉरी, तुम्हारा शर्ट बॅरो किया, अपने कपड़े तो... बात को बीच में ही छोड़कर वह शरारत से मुस्कराते हुए कमरे से बाहर निकल गई थी - तुम्ही से धुलवाऊँगी, चर्च के बाद आंटी भी अब आती ही होगी... मुझे जल्दी से खिसकना होगा...
उसके कमरे से बाहर जाते ही वहाँ गहरा सन्नाटा छा गया था। दामिनी मेरी तरफ देख रही थी, न जाने किस नजर से। उन्हें पढ़ने-समझने की सामर्थ्य मैं खो चुका था। एकदम शून्य होकर खड़ा था, उसकी तरफ एक न देखती हुई-सी नजर से तकते हुए। थोड़ी देर के लिए महसूस हुआ था, हमारे बीच समय भी ठहर गया है, हवा दम साधे पड़ी है, पूरी दुनिया गूँगी, बहरी हो गई है। और दामिनी... वह तो एकदम पाषाण हो गई थी। न जाने कितनी देरतक हम इसी तरह एक-दूसरे की तरफ देखते हुए खड़े रह गए थे और फिर अचानक रेचल फिर कमरे में घुस आई थी, हाथ में कॉफी की ट्रे और मिठाई का प्लेट लेकर - लो, मिस दामिनी, मुँह मीठा कर लो, हमारा ऐश फिर बाप बननेवाला है, कल ही इसकी बीवी ने गुड न्यूज भेजा है।
मुझे लगा था, मैं अब सचमुच बेहोश हो जाऊँगा। उसकी बातें सुनकर दामिनी के चेहरे पर एक ही साथ न जाने कितने रंग आए और गए थे। रेचल ने जैसे ही मिठाई का टुकड़ा उसके मुँह की तरफ बढ़ाया था, दामिनी जैसे चौंककर नींद से जागी थी और फिर आँधी की तरह कमरे से बाहर निकल गई थी। मैंने उसे पुकारकर रोकना चाहा था, मगर मेरे गले से जैसे कोई स्वर ही नहीं निकला था।
उसके जाने के बाद कमरे में यकायक मौन पसर गया था। कुछ देर बाद मैंने रेचल की ओर मुड़कर देखा था। वह कमरे से बाहर निकल रही थी, होठों ही होठों में मुस्कराते हुए। मेरा जी चाहा था, बढ़कर उसका गला घोंट दूँ, मगर अपनी जगह से हिल भी नहीं पाया था।
इसके बाद न जाने मैंने कितनी बार दामिनी को फोन किया था, हर बार फोन बंद मिलता। उसके बँगले पर जाकर भी मुझे हर बार निराश ही लौटना पड़ा था। वह किसी भी तरह मुझे नहीं मिल रही थी। इधर शायद मिसेज लोबो के कान में भी मेरे और रेचल की बात पड़ गई थी। कई दिनों तक उनके घर में रिश्तेदारों का ताँता लगा रहा था। सभी आते-जाते मुझे घूरकर देखते। मिसेज लोबो का रवैया भी काफी बदल गया था। रास्ते में मुझे एकदिन गाँव के चर्च के पादरी मिले थे, मगर उन्होंने मुझे सहज ढंग से नजरअंदाज कर दिया था। मेरे अभिवादन का भी जवाब नहीं दिया था। और फिर एकदिन मिसेज लोबो ने मुझे घर खाली करने का नोटिस दे दिया था। कोई कारण भी नहीं बताया था। पूछने पर व्यंग्य से पूछा था - क्यों, तुमको नहीं मालूम मैन? हम तुमको जेंटलमैन समझता था... मैं चुप रह गया था।
ऑफिस में भी माहौल बदला-बदला-सा लग रहा था। जैसे लोग कतरा रहे थे मुझसे। बहुत पूछने पर किसी ने दबी जुबान से बतलाया था, मेरे नाम पर शिकायत हुई है। मैं एकदम से घबरा उठा था। अब मामला गंभीर होता हुआ प्रतीत हो रहा था। मैंने यहाँ के लोगों के स्वच्छंद व्यवहार को कुछ ज्यादा ही गलत ढंग से ले लिया था शायद। आखिर था तो यह भी भारतीय समाज का एक हिस्सा ही। मूलभूत संवेदनाएँ और चरित्र एक ही था। ऊपरी रंग-रोगन ने मुझे भ्रम में डाल दिया था। अब क्या करूँ... मेरा मन डूबने लगा था। एकदम से जैसे मेरी दुनिया बदल गई थी। सब कुछ गलत हो रहा था - एकदम सिरे से, क्या कुछ सँभालूँ और कहाँ से शुरू करूँ, समझ नहीं पा रहा था। हर तरफ तहस-नहस लगा था और बीच में मैं खड़ा था, एकदम चकित और डरा हुआ...
सबसे ज्यादा दामिनी की बेरुखी ने मुझे तोड़ दिया था। वह मुझे गालियाँ देती, मारती, चीखती-चिल्लाती... मगर कुछ नहीं। उसकी चुप्पी, अडोल खामोशी मुझे तड़पा रही थी। मैं स्वयं को बेहद अपमानित महसूस कर रहा था। रह-रहकर मुझे दामिनी की ठंडी आँखें, उनसे निसृत होती वितृष्णा और घृणा याद आती और मैं आहत हो उठता। क्या मुझे वह और एक अवसर भी नहीं देगी! कुछ तो - कुछ तो वह कहे। उसकी ये चुप्पी मुझे मारे डाल रही थी।