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कहानी तेरी मेरी

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कहानी तेरी मेरी

“अरे भाई साहब! ये समोसे तो खाइये, सलोनी ने खुद अपने हाथों से बनाये हैं” सलोनी की माँ ने समोसों से भरा प्लेट मेहमानों के सामने किया।

“अरे वाह बहन जी! बहुत ही स्वादिष्ट बने हैं” मिस्टर जोशी ने समोसे के साथ इंसाफ करते हुए कहा।

“लड़की और क्या क्या बनना जानती है” मिसिज़ जोशी ने सलोनी की माँ से पूछा।

“भगवान की दया से मेरी बेटी सब काम जानती है, जो भी आप कहेंगी झट आपके सामने बना कर परोस देगी” सलोनी की माँ ने खुश होते हुए कहा।

“ये तो बहुत अच्छी बात है वरना आज कल की लड़कियां फैशन के आगे घर के कामों को अहमियत ही कहाँ देती हैं” मिसिज़ जोशी ने कहा।

“ज़रा लड़की को तो बुलाइए, हमारे बेटे की नजरें कब से उसे ढूंढ रही हैं” मिस्टर जोशी ने हँसते हुए अपने बेटे को छेड़ा जिस पर वो भी शर्मा कर मुसकुरा दिया।

“जी जी बिल्कुल, जाओ.. सलोनी को बुला लाओ” सलोनी के पिता ने सलोनी की माँ को इशारा किया।

सलोनी की माँ के जाने के बाद वो कंवल की तरफ मुड़े “और सुनाओ बेटा, क्या क्या शौक रखते हो आप”

“बस अंकल कुछ खास नहीं, ऑफिस के काम से इतनी फुरसत ही नहीं मिलती” कंवल ने केवल पूछे गए सवाल का जवाब दिया।

“आप तो जानते ही हैं भाई साहब, अपने बिज़नेस में यही होता है, कमाई ज़्यादा तो काम भी ज़्यादा या यूँ कहिये काम ज़्यादा तो कमाई ज़्यादा.. हा हा हा” मिस्टर जोशी ने हँसते हुए कहा जिस पर सब हँसने लगे।

“हा हा हा ! बिल्कुल सही कहा। लीजिये हमारी बेटी आ गयी” सलोनी की माँ सलोनी को साथ ले आयी।

“आओ बेटा यहां बैठो मेरे पास” कंवल की माँ ने सलोनी के लिए अपने पास जगह बनाई जहां सलोनी सब को नमस्ते करती हुई जा बैठी।

“भई आपकी बेटी तो बहुत सुंदर है” मिसिज़ जोशी ने सलोनी की माँ से कहा फिर बेटे की तरफ मुड़ते हुए बोली “बेटा तुम क्या कहते हो” कंवल जो काँखयों से सलोनी को ही देख रहा था “हाँ” में गर्दन हिला कर माँ को अपनी रज़ामंदी बता दी।

“सलोनी बेटा ये तुम्हारे हाथ पर जलने के निशान कैसे” मिसिज़ जोशी ने सलोनी के बाएं हाथ की पड़े निशान की तरफ इशारा किया।

“वो आंटी..” अचानक इस सवाल पर सलोनी कुछ घबरा गई पर सलोनी की माँ ने बात संभाल ली “अभी कुछ दिन पहले पूरियां तलते समय इसका हाथ गर्म बर्तन पर लग गया था, असल में इन्हें पुरियों का बहुत शौक है, आये दिन बनवाते रहते हैं” सलोनी की माँ ने अपने पति की तरफ इशारा करते है कहा।

“ओह अच्छा..” कंवल की माँ ने कहा।

“अगर आप लोगों को कोई एतराज नहीं हो तो इन दोनों को कुछ वक्त अकेले में बातें करने देते हैं इतने हम बड़े भी कुछ बातें कर लेते हैं” सलोनी के पिता ने मिस्टर जोशी से कहा। बेटी का बाप होने के नाते अब वो कुछ लेन देन की बात करना चाहते थे।

“हमें कोई एतराज नहीं पर अगर आप अकेले में दहेज़ या लेन देन की बात करना चाहते हैं तो हम साफ कह देते हैं.. आपकी बेटी के सिवा हमें सिर्फ आप सब का प्रेम चाहिए। लक्ष्मी माँ की बहुत कृपा है हम पर, हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं” मिस्टर जोशी ने ये शब्द कह कर सलोनी के पिता का बोझ कुछ कम कर दिया।

“धन्य है आप, आपने तो मेरी मुश्किल ही आसान कर दी, वरना एक बेटी का पिता इसी दिन से डर डर कर समय से पहले बूढ़ा हो जाता है” सलोनी के पिता ने मेहमानों के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा।

“अरे बस बस, आप भी कमाल करते हैं। बेटी का बाप कन्या दान करता है, ऊपर से दहेज़ का एक और बोझ डाल देना कहाँ का इंसाफ है” मिस्टर जोशी ने कहा।

“अगर हर बेटे के बाप की आप जैसी सोच हो जाये तो किसी बाप को अपनी बेटी बोझ ना लगे” सलोनी की माँ इतने अच्छे और अमीर रिश्तेदार मिलने पर बहुत खुश थी।

“बेटा आप दोनों एक दूसरे से कुछ पूछना चाहते हो तो पूछ सकते हो” कंवल के पिता ने दोनों से कहा।

“हाँ जाओ सलोनी, कंवल बेटे को अपना कमरा तो दिखा लाओ” सलोनी के पिता सलोनी से बोले। कुछ देर हँसी खुशी बातें होती रही फिर बात पक्की कर के मेहमान अपने घर चले गए।

०००
 
रिश्ता पक्का होते ही दोनों घरों में शादी की रस्में शुरू हो गयी और तयशुदा तारीख पर सात फेरे ले कर सलोनी कंवल की पत्नी बन कर कंवल के साथ रहने लगी। शादी के बाद दो तीन महीने यूँ ही हँसते खेलते, घूमते घूमाते निकल गए। सलोनी की सास सलोनी के खूब लाड़ उठती पर जब मिसिज़ जोशी सलोनी को कोई काम के लिए कहती तो वो कोई बहाना बना देती। घर में नोकरानी थी इसलिए अब तक उसने रसोई में झाँका तक नहीं था। मिसिज़ जोशी ने भी सोचा “कोई बात नहीं, कुछ दिन घूमने फिरने दो दोनो को” पर पूरी रसोई नोकरानी पर कब तक छोड़ी जा सकती थी। आहिस्ता आहिस्ता सलोनी ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था।

“सलोनी, कहाँ जा रही हो बेटा” सोफे पर बैठी मिसिज़ जोशी ने मैगजीन से नज़रें उठा कर चटख मटक कपड़े पहन कर जाती हुई सलोनी से पूछा।

सलोनी को सास का टोकना बुरा लगा इसलिए मुह बना कर बोली “शॉपिंग के लिए जा रही हूं”

“पर बेटा इस तरह के कपड़े सही नहीं है, कोई साड़ी ही डाल लो। कंवल देखेगा तो बहुत गुस्सा होगा, उसे बिल्कुल नहीं पसंद इस तरह के आधे अधूरे कपड़े” सास ने समझते हुए कहा।

“कंवल क्यों देखेगा जब तक आप अपना मुँह बन्द रखोगी” बदतमीज़ी से जवाब देती सलोनी ने आगे कदम बढ़ाये।

“ये किस तरह बात कर रही हो तुम मुझसे” अब मिसिज़ जोशी गुस्से से बोली।

“जिस तरह आपको सूट करता है” सलोनी कह कर दरवाज़े से बाहर निकल गयी और मिसिज़ जोशी हक्का बक्का दरवाज़े को देखती रह गयी। सलोनी अपनी मर्जी करती थी पर उन्हें सलोनी से इतनी बदतमीज़ी की उम्मीद नहीं थी।

०००

शाम को मिसिज़ जोशी ने सलोनी के साथ हुई सारी बातें ज्यों की त्यों अपने पति और बेटे को बताई। जिस पर कंवल गुस्से से चिल्ला कर सलोनी को आवाज़ लगता है “सलोनी.. सलोनी बाहर आओ”

कंवल की आवाज़ सुन कर सलोनी अपने कमरे से निकल कर बाहर आती है “किसे मौत आयी है, क्यों चिल्ला रहे हो” सलोनी भी बाहर आ कर बिना डरे वापिस कंवल पर चिल्लाई।

“ये किस तरह बात कर रही हो और तुमने मेरी माँ के साथ ऐसा सुलूक क्यों किया” कंवल ने गुस्से से सलोनी से पूछा।

“मैंने कुछ गलत नहीं किया, ये बुढ़िया बात बात पर मुझे क्यों टोकती है”

“सलोनी.. अपनी हद में रहो” इस बार कंवल का गुस्सा सातवें आसमान पर था। अपनी माँ के बारे में ऐसे शब्द उसे बिल्कुल अच्छे नहीं लगे।

“मैं हद में रहूँ.. क्या है मेरी हद। रुको! मैं तुम्हे तुम्हारी हद बताती हूँ” गुस्से से दनदनाती सलोनी ने रसोई में जा कर जलती गैस पर पास रखी हुई करछी उठा कर आग पर रख दी।

“ये क्या कर रही हो सलोनी। घर मे ऐसे छोटे मोटे झगड़े तो होते रहते हैं” मिसिज़ जोशी सलोनी को रोकने आगे बढ़ी।

“पीछे रह बुढ़िया, एक कदम भी मेरी तरफ बढ़ाया तो पूरे घर को आग लगा दूंगी” सलोनी आपे से बाहर हो रही थी। मिसिज़ जोशी आगे बढ़ कर उसे रोकती उससे पहले ही उसने आग पर लाल होती करछी को अपनी कलाई पर लगा दिया।

“आह ह ह..” सलोनी दर्द की वजह से ज़ोर से चिल्लाई।

“सलोनी..” कंवल सलोनी की तरफ भाग और उसके हाथ से गर्म करछी ले कर दूर फेंक दी।

“सलोनी, ये क्या किया तुमने” कंवल सलोनी के दर्द को महसूस करता बोला। आगे क्या होने वाला है इस बात से अनजान सलोनी को डॉक्टर के ले जाने को भागा पर सलोनी के शब्द सुन कर ठिठक गया और नफरत से सलोनी को एक तरफ धक्का दे दिया।

“माँ जी, ये क्या किया आपने.. दहेज़ ना दे पाने पर मेरा हाथ जला दिया” सलोनी के कहे शब्द सीसे की तरह तीनों के कानों में पड़े।

“क्या बकवास कर रही हो” इस बार मिस्टर जोशी चिल्लाये और अनजाने ही थप्पड़ मारने को हाथ उठा दिया।

“ना ना.. ऐसा बिल्कुल ना करना पापा जी, अभी तो सिर्फ मेरा हाथ जलाने पर 498A, IPC की धारा लगाउंगी, अगर हाथ उठाया तो जान से मारने के आरोप में 304B, IPC की धारा भी लगवा दूंगी अपने माँ बाप से”

“नहीं.. नहीं। मैंने कुछ नहीं किया” मिसिज़ जोशी आने वाले वक्त से डरती हुई बोली।

“सलोनी तुम्हारा दिमाग तो ठीक है.. ये क्या बातें कर रही हो” माँ को डरा देख कंवल चीखा।

“रुको, मैं अभी तुम्हारे माँ बाप को बुलाता हूँ” इतनी कह कर मिस्टर जोशी ने सलोनी के मायके फोन किया और उन्हें फौरन आने का बोला। आधे धंटे में सलोनी के माँ बाप भी आ पहुँचे।

“हाय मेरी बच्ची का हाथ जला दिया, मैं पुलिस को बुलाऊंगी, तुम सब को जेल करवाऊंगी” सलोनी की माँ ने आते ही हंगामा कर दिया।

“आप लोगों ने खुद ही तो दहेज के लिए मना किया था फिर मेरी बेटी पर ये अत्याचार क्यों किया” अब सलोनी के पिता ने भी चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया।

“देखिये ऐसा कुछ नहीं है। आप गलत समझ रहे हैं। ये तो सलोनी से खुद अपने हाथ पर गर्म करछी लगा ली” कंवल ने उन्हें हो रही गलतफहमी दूर करनी चाही।

“क्या सबूत है कि मैंने खुद अपना हाथ जलाया है” अब सलोनी और उसके माँ बाप मंद मंद मुसकुरा रहे थे जैसे ये सब उनकी पहले से सोची समझी साजिश हो।

“क्या..” कंवल चोंका और मुड़ कर अपने पिता से बोला “पापा ये लोग कोई चाल चल रहे हैं हमें फ़साने की”

“ये सब ड्रामा कर के क्या साबित करना चाहते हो तुम लोग” अब मिस्टर जोशी समझने लगे थे।

“हम तो कुछ नहीं चाहते.. हाँ अगर आप कोई फैसला करना चाहे तो कर सकते हैं” अब सलोनी के पिता बोले।

“मतलब”

“मतलब ये कि दहेज न मिलने पर मेरी बेटी को जला कर मारने की कोशिश में धारा 498A के तहत जुर्माने का साथ 2 साल तक जेल में रहना पसंद करेंगे या 2 लाख रुपये दे कर बात को यहीं रफा दफा करेंगे” सलोनी के पिता अब मतलब की बात पर आ गए थे।

“तुम झूठा इल्ज़ाम लगा रहे हो हम पर। मैं केस करूँगा तुम सब पर, अभी अपने वकील को फोन लगता हूँ” मिस्टर जोशी गुस्से से बोले और जेब से मोबाइल निकाल कर नंबर मिलने लगे पर सलोनी की माँ की बात सुन कर रुक गए।

“जो मर्जी कर लें.. अदालत तफ़तीश के लिए जिस को भी यहां भेजेगी मुजरिम आप ही ठहरेंगे। क्या सबूत है आपके पास की ये हाथ सलोनी ने खुद जलाया है” सलोनी की माँ भी बोली।

“सलोनी तुम अपने अधिकार का गलत प्रयोग कर रही हो” कंवल सलोनी को समझने की नाकाम कोशिश करने लगा।

“अधिकार इस्तेमाल करने के लिए होते हैं, गलत या सही क्या होता है” सलोनी ने एक अदा से आंखों से बहते आँसू साफ किये जो हाथ जलने की वजह से उसकी आँखों मे आये थे।

“सुनो जी, इन्हें 2 लाख रुपये दे दो। बात अदालत तक जायेगी तो बहुत बदनामी होगी हमारी” मिसिज़ जोशी रोते हुए बोली।

“क्या कह रही हो.. कहाँ से लाऊंगा इतनी बड़ी रकम” मिस्टर जोशी बोले।

“पापा! माँ ठीक कहती है। पैसों का इंतज़ाम हम कर लेंगे कहीं ना कहीं से” कंवल ने माँ की हाँ में हाँ मिलाई।

“ठीक है, पर तुम लोग ये सही नहीं कर रहे हो। कमाई का अच्छा तरीका अपनाया है” मिस्टर जोशी पछतावे से बोले।

“सब ठीक है भाई साहब। अपने कर्म अपने साथ। तो आप रकम के साथ साथ डाइवोर्स पेपर भी भेज दीजिये गा। ज़ाहिर है अब इतने बुरे लोगों के साथ आप रिश्ता रखना तो नहीं चाहेंगे” सलोनी की माँ बोली।

“मुझे ज़रूरत नहीं ऐसी बीवी की जिसे औरत कहते हुए भी शर्म आती है” कंवल सलोनी पर घुर्राया जिस पर सलोनी मुसकुरा दी।

मिस्टर जोशी के परिवार ने अपनी इज़्ज़त न उछलते हुए मामला वही खत्म कर दिया और उन धोंकेबाज़ों से पीछा छुड़ा लिया।

०००
 
“हे वरुण..” कंवल मॉल में कुछ ज़रूरी समान लेने आया था जहां उसे अपने कालेज का दोस्त मिला। वरुण से वो 3 साल बाद मिल रहा था।

“अरे कंवल, कैसा है यार” वरुण भी कंवल को देख कर खुश हो गया।

“मैं अच्छा हूँ, तू सुना कैसा है। बड़े टाइम बाद मिल रहा है यार। कहाँ चला गया था कालेज के बाद” कंवल ने ढेर सारे सवाल कर डाले।

“हाँ 3 साल हो गए शायद कालेज कम्पलीट हुए, बस यार पढ़ाई के लिए ही तो आया था यहाँ फिर वापिस अपने शहर अपने घर। और सुना अंकल आंटी कैसे हैं.. शादी वादी करी या अभी भी कुँवारा है” वरुण भी बिछड़े दोस्त से मिल कर बहुत खुश था।

“हाँ शादी भी हुई थी एक साल पहले” कंवल कुछ उदास हो गया पर बिता वक़्त भूल कर वरुण से बोला “मेरी छोड़ अपनी बात, तेरी शादी हुई या नहीं”

“हाँ अभी एक महीना पहले ही हुई है, उन्ही के नाज़ नखरे उठाने यहां आया हूँ”

“मतलब”

“मतलब उसका मायका यहाँ है तो मिलाने लाया था। सोचा उसे उसके घर छोड़ कर कुछ शॉपिंग कर लूँ” वरुण में खुल कर बताया।

“अरे वाह! दिख ज़रा भाभी कैसी है। आज कल तो मोबाइल उन्हीं के फोटो से भरा रहता होगा” कंवल ने छेड़ा।

“हाँ.. ये देख” वरुण ने मोबाइल से एक तस्वीर कंवल को दिखाई जिससे देख कर उसके मुंह से निकला “सलोनी”

“हाँ सलोनी, तू जनता है क्या सलोनी को”

“हाँ जनता हूँ, एक साल पहले इसी से मेरी शादी हुई थी”

“क्या.. ये क्या बकवास है” वरुण नाराज़ होता बोला।

“ये देख” कंवल ने मोबाइल से अपनी शादी की एक तस्वीर निकल कर उसे दिखाई। शायद अभी भी कंवल के दिल में वो मौजूद थी तभी उसका फ़ोटो अब तक मोबाइल में संभाल कर रखा हुआ था।

“ओह नो” वरुण सलोनी का दुल्हन बना फ़ोटो देख कर चकरा गया।

“ये तीनों माँ बाप और बेटी धोखेबाज़ है, इन्होंने हमारे साथ जो किया वही तुम्हारे साथ भी करेंगे, यहीं इन लोगों का धंधा है”

“कैसा धंधा” वरुण ने चौक कर पूछा।

“कुछ देर घर चल, वहां आराम से बैठ कर बात करते हैं” कंवल वरुण को घर ले गया जहां वो उसके माँ पापा से भी मिला। उन लोगों ने वरुण को शुरू से आखिर तक सारी बातें बताई जिससे सुन कर वरुण के कदमों तले ज़मीन खिसक गई।

“देख वरुण, ये सब तेरे साथ भी होने वाला है क्योंकि जहां तक मुझे पता चला है कि सलोनी 3 महीने से ज्यादा किसी के साथ नहीं रहती। जो लोग उनके जुल्म के शिकार हुए हैं उन सभी ने रिपोर्ट नहीं कराई क्योंकि उनके पास कुछ सबूत नहीं होता। मैं भी इसलिए ही चुप रहा पर अब तेरे पास मौका है वरुण” कंवल ने समझते हुए कहा।

“पर ये सब होगा कैसे कंवल”

“दहेज के लिए ससुराल वालों पर इल्जाम लगाने के लिए सलोनी अपना हाथ जलती है”

“हाँ उसके हाथ पर है जलने के निशान” वरुण ने सोचते हुए कहा।

“यस, बस तुम्हें अपने किचन में cctv camera लगाना होगा। ध्यान रहे इस चीज़ का पता सलोनी को नहीं चलना चाहिए। फिर जैसे ही वो अपना ड्रामा शुरू करेगी सब रिकार्ड हो जायेगा” कंवल ने सुझाया।

“सही कहता है तू। इनका धंधा अब खत्म होने का वक़्त आ गया है। मैं चलता हूँ बहुत कुछ तैयारी करनी है अब इन लोगों को पकड़ने के लिए” वरुण फैसला करता उठ खड़ा हुआ।

“थैंक यू वरुण मेरा विश्वास करने के लिए” कंवल ने वरुण को गले लगाते हुए कहा।

०००
 
अपने घर पहुँच कर वरुण ने सलोनी की साजिश को रिकार्ड करने का सारा इंतज़ाम कर दिया। बस अब उसे इंतज़ार था कि सलोनी कब अपना ड्रामा शुरू करती है। वो समय भी जल्द ही आ गया। सलोनी ने ज़रा सी बात को बढ़ा दिया था। उसे अपना मकसद पूरा करने के लिए कुछ न कुछ झगड़ा तो करना ही था। वरुण फोन पर अपनी सहकर्मी से बात कर रहा था जब उसके कानों में डाइनिंग टेबल पर हो रहे झगड़े की आवाज़ आयी।

“मम्मी अपने क्यों मना किया मुझे मायके जाने से” सलोनी सास के बराबर खड़ी चिल्ला रही थी।

“बेटा मैं मना नहीं कर रही, चली जाना पर इतनी जल्दी क्या है.. अभी 10 दिन पहले ही तो तुम मिल कर आई हो। ऐसे रोज़ रोज़ जाना सही नहीं.. अब ये तुम्हारा घर है वो नहीं” वरुण की माँ सलोनी को समझने की कोशिश कर रही थी।

“सलोनी, क्या ड्रामा लगा रखा है तुमने घर में” वरुण रूम से निकल आया। वरुण ने आ कर सलोनी को डाँटा। शायद वो चाहता था कि बात बढ़े और अब ये ड्रामा खत्म हो जाये और उसकी जान छूटे ऐसी धौंके बाज़ लड़की से।

“ड्रामा मैंने लगा रखा है या तुम्हारी माँ ने” सलोनी वरूण पर चिल्लाई।

“तमीज़ से बात करो मेरी माँ से वरना..” अपनी माँ के बारे में उलटा सुन कर वरुण ने सलोनी पर हाथ उठा दिया जो वरुण के छोटे भाई ने सही वक़्त पर आ कर रोक दिया।

“भाई क्या कर रहे हैं आप, आपकी बीवी है ये”

“तुम नहीं जानते ये हमारी माँ के साथ कितनी बत्तमीजी से बात कर रही है”

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझ पर हाथ उठाने की। तुम्हें ये हाथ उठाना बहुत महँगा पड़ेगा वरुण” सलोनी अपनी बेइज़्ज़ती पर गुस्से से दनदनाती रसोई में गयी और वही किया जो कंवल के घर किया था।

“आह.. मम्मी दहेज़ की मांग पूरी नहीं कर पाने की वजह से अपने मेरा हाथ जला दिया” सलोनी ने रटी रटाई लाइन बोली।

“भाभी ये क्या कह रही हो माँ के बारे में, अपने खुद अपना हाथ जलाया है”

“बस बहुत हो गया। रुको मैं तुम्हारे माँ बाप को बुला लुँ, उनके सामने ही अब कोई बात होगी” वरुण ने सलोनी के घर फ़ोन मिला दिया।

सलोनी के माता पिता के आने पर उसने जोर ज़ोर से रोना शुरू कर दिया, साथ ही सलोनी की माँ उन्हें पुलिस में पकड़वाने की धमकियां देने लगी जिस पर वरुण की माँ घबरा गई।

“बहन ये क्या बोल रही हैं आप। यकीन जानिए आपकी बेटी ने खुद गुस्से में अपना हाथ जलाया है”

“नहीं पुलिस का आना ठीक नहीं शरीफों के घर” वरुण वहीं सोफे पर बैठता बोला।

“तो फिर ये ठीक रहेगा कि तुम लोग हमें 3 लाख रुपये दे दो” सलोनी की माँ बोली।

“3 लाख, वो किस बात के” वरुण बोला।

“इस बात के कि दहेज न मिलने पर मेरी बेटी को जला कर मारने की कोशिश की आप लोगों ने तो धारा 498A के तहत जुर्माने का साथ 2 साल तक जेल में रहना पसंद करेंगे या 3 लाख रुपये दे कर बात को यहीं रफा दफा करेंगे” सलोनी के पिता अब मतलब की बात पर आ गए थे।

“ओह, अगर मैं पैसे ना दूँ तो” वरुण बोला।

“तो हम तुम सब को जेल करवा देंगे” सलोनी के पिता बोले।

“जेल क्यों.. हाथ तो सलोनी ने खुद जलाया है”

“हा हा हा! ये तुम जानते हो पुलिस और अदालत नहीं जानती। तुम्हारे खिलाफ रिपोर्ट करने पर तुम ही मुजरिम ठहरोगे” सलोनी ने भी ससुराल वालों की हँसी उड़ाई।

“तो तुमने कंवल और दूसरे ससुराल वालों से भी 3 लाख ही मांगे थे या मुझसे ही ज़्यादा मांग रही हो” वरुण ने कहा जिस पर वहां मौजूद सब के चेहरे वरुण को देखने लगे। सलोनी और उसके माँ बाप के चेहरों के रंग उड़ चुके थे।

“कौन कंवल” सलोनी घबरा कर बोली।

“अरे मुझसे पहले वाला पति.. एक साल में ही भूल गयी क्या”

“फालतू बातें ना करो, मतलब की बात पर आओ” सलोनी के पिता ने वरुण को घुड़का।

“मैं पुलिस को फोन लगता हूँ। वो मतलब की बात करेगी” वरुण ने पुलिस को फ़ोन लगा कर बताये पाते पर फौरन आने को कहा।

“हाँ बुला लो पुलिस को, जब तुम सब जेल जाओगे तब पता चलेगा” सलोनी की माँ बोली।

“जेल हम नहीं तुम तीनों जाओगे, वो देखो कैमरा जिसमें तुम लोगों की सब हरकतें और बातें रिकार्ड हो गयी है। अब जेल जा कर 3 लाख डंडे खाना पुलिस के” वरुण ने उन तीनों के मकसद पर पानी फेर दिया था।

जब तक पुलिस नहीं आ गयी वरुण ने उन लोगों को एक कमरे में बंद रखा। पुलिस के आते ही वरुण ने 498A के शिकारी पुलिस के हवाले कर दिया साथ ही कैमरे की रिकॉर्डिंग भी थमाई। वरुण और उसका परिवार बड़े नुकसान से बच गया था। वरुण ने कंवल को फ़ोन कर ये उस भी ये खुशखबरी सुना दी थी।

(समाप्त)
 
वो अकेली लड़की और रात

मेघना ट्रेन में बैठी सुबक सुबक कर रो रही थी। बगल में बैग दबाये विंडो सीट पर बैठी खिड़की से बाहर रात के फैले साये अपने अंदर उतरता महसूस कर रही थी। बहते आँसू छिपाने की कोशिश में चुपके चुपके साड़ी के पल्लू से आंखें साफ करती आस पास बैठे मुसाफिरों को देख रही थी। कोई ऊपर के बर्थ पर सोने की कोशिश में करवटें बदल रहा था, कोई सीट पर बैठा उँग रहा था तो कोई आपस में बातें करने में मगन था। मेघना ने सब पर नज़र दौड़ाई। उसे लगा जैसे सब उसे ही घूर रहे है। उसके कुछ दूर पर 4-5 लड़के बैठे ज़ोर ज़ोर से हँसी ठिठोली कर रहे थे। एक दूसरे के हाथ पर हाथ मार कर अपनी दुनिया में मस्त थे। मेघना की नज़र उन पर पड़ी तो उनमें से एक लड़के ने मेघना को देखा। उस लड़के ने बाकी लड़कों को इशारा किया तो सब ने मेघना की तरफ मुड़ कर देखा और फिर बातों में लग गए। सब की नज़रों के खोफ से वो कुछ और अपने अंदर सिमट गई। ट्रेन हल्की हल्की सीटी दे कर अपनी पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। अब ट्रेन से नीचे उतरना ना मुमकिन था।

शादी के बाद पहली बाद मेघना अपने पति अमित के साथ अमित के मामा जी के यहां कानपुर जा रही थी। मामा जी ने बहुत प्रेम से बुलाया था दोनों को। अमित में ट्रेन का टिकट कल ही ऑनलाइन बुक कर दिया था। आज घर से निकले तो मेघना ने बताया कि वो पहली बार ट्रेन में बैठने जा रही है। जिस पर अमित खूब हँसा। “अरे बाप रे, ऐसा कैसे हो गया कि तुम कभी ट्रेन में नहीं बैठी” जिस पर मेघना बुरा मान गयी। “तो इसमें हँसने वाली क्या बात है, मैं वाकई नहीं बैठी ट्रेन में”

“अच्छा बाबा ठीक है, नाराज़ क्यों होती हो, आज बैठ जाना” अमित ने मुसकुराते हुए अपनी नई नवेली बीवी को मनाया। स्टेशन पहुंच कर दोनों अपनी बूकिंग की हुई सीट्स पर बैठ गए और बातें करने लगे। तभी मेघना बोली “अमित फलों वाला रेपर तो मैं घर पर ही भूल गयी”

“अरे यार, ध्यान कहाँ था तुम्हारा” अमित कुछ गुस्से में बोला।

“आई एम सॉरी अमित” मेघना रुआ सी हो कर बोली।

“चलो कोई नहीं, मैं देखता हूँ यहां आस पास कुछ मिल जाये तो। ऐसे खाली हाथ जाना अच्छा नहीं लगता” इतना कह कर अमित उठने लगा।

“मैं भी चलती हुँ आपके साथ” मेघना बोली।

“नहीं यार, तुम यहीं बैठो, मैं दो मिनट में आया” अमित के कहने पर मेघना बैठी रही पर उसे अकेले बैठने में डर लग रहा था ओर उसका डर सच बन गया। अमित को गया 15 मिनट से ऊपर हो गए थे। तभी ट्रेन ने सिटी दी। सिटी के साथ हल्के हल्के चलने लगी तो मेघना की नजरें विंडो से बाहर अमित को खोजने लगी। मेघना ने फौरन अपने बैग से मोबाइल निकाला कि अमित को फ़ोन कर सके पर उसकी बेटरी डेड थी। अमित के 2 साला भतीजे ने गेम खेल कर बेटरी खत्म कर दी थी। मेघना ने देखा और सोचा मामा जी के घर जा कर चार्ज कर लुंगी अभी तो कोई ज़रूरत नहीं मोबाइल की पर मोबाइल की कभी भी ज़रूरत पड़ सकती है उसे अब एहसास हुआ। मोबाइल की बेटरी डेड देख कर मेघना और डर गई। भाग कर ट्रेन के दरवाजे तक पहुंची पर ट्रेन ने धीरे धीरे रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी थी जिस कारण उसकी नीचे उतरने की हिम्मत नहीं हो सकती। ट्रेन में पहली बार सफर करने के कारण व घबराहट में उसे चैन खींचने का भी ख्याल नहीं आया। बेचैन होती, रोती अपनी सीट पर आ कर बैठ गयी। यूँ अनजान अजनबियों पर भरोसा भी नहीं कर सकती थी इसलिए चुप बैठे सिसकती रही और ट्रेन शाम ढलते रात के साये में जा घुसी थी। 4 घंटे के सफर के बाद कानपुर आ गया था। ट्रेन अपने मुसाफिरों को रात के काले साये में अकेला छोड़ बाकी मुसाफिरों को उनकी मंज़िल पर पहुंचाने निकल चुकी थी। मेघना भी अपना बैग उठाये स्टेशन पर खड़ी थी। अब उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। अचानक खयाल आया उसके बैग में मामा जी के घर का एड्रेस पड़ा है। उसने जल्दी से बैग टटोला ओर एड्रेस वाला पर्चा निकाला तो उसकी सांस में सांस आयी।

स्टेशन से निकल कर अब उसे ऑटो वाले के पास जा कर बस मामा जी के एड्रेस पर पहुंचना था। उसे लगा अब सब मुश्किल आसान हो गयी और बस वो मामा जी के घर पहुंच ही चुकी है।

स्टेशन से निकली तो कोई ऑटो वाला उस एड्रेस पर जाने को तैयार नहीं था। सब दूर बता कर मना कर रहे थे “अरे मैडम इतनी रात को हम नहीं जायँगे इतनी दूर, आप कोई और ऑटो देख लो” ऑटो वाला ऐसा कह कर दूसरी सवारी बैठा कर चला गया। मेघना की बंधी हिम्मत टूटने लगी थी। गहरी होती रात, अकेली लड़की और अनजान शहर। इधर उधर ऑटो को देखती परेशान हो रही थी तभी उसकी नज़र सामने से आते उन्ही 4-5 लड़कों पर पड़ी जो बार बार उसे ट्रेन में देख रहे थे। मेघना की रही सही हिम्मत भी टूटने लगी। उन्हें सामने से आता देख एक पल में मेघना की आंखों में निर्भया, दामिनी जैसी गैंग रेप की खबरे चलने लगी जो अकसर वो मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर देखती रहती थी। घबराहट में उसके हाथ से बैग छूट गया और उसमें भागना शुरू कर दिया। अब तो आस पास कोई ऑटो या रिक्शा भी नहीं दिख रहा था। एक्का दुक्का आदमी अपनी राह चल रहे थे पर उसकी कौन मदद करेगा.. शायद कोई भी नहीं। सब तमाशा देखते रहेंगे और कल वो भी किसी न्यूज़ चैनल पर दिखाई जा रही होगी। ऐसी ही है दुनिया। कोई किसी की मदद को नहीं आता पर तमाशा सब देखते हैं।

मेघना को भागता देख वो लड़के भी उसके पीछे भागे। “रुको, मैडम रोको” उन लड़कों में से एक ने आवाज़ लगाई। मेघना अनसुनी कर अपनी इज़्ज़त बचाती भागती रही। तभी अचानक साड़ी में पैर फंसा और वो गिर गयी। हाथ सीधे जा कर सड़क पर लगे और हथेलियाँ छिल गयीं। खुद को संभालती फिर उठी और भागने को तैयार थी पर जब तक वो लड़के वहां तक पहुंच चुके थे। तभी उनमें से एक ने मेघना का हाथ पकड़ लिया ताकि वो आगे न भाग सके।

“छोड़ो, छोडो मेरा हाथ, मुझे जाने दो” मेघना रोने लगी।

“क्यों भाग रही हो, हम तुम्हें खा जायँगे क्या” उनमें से एक लड़का गुस्से से चिल्लाया।

“तुम्हारा ये पैसों का पर्स गिर गया था ट्रेन में, वो देना था तुम्हें, तुम ट्रेन में बैठी रो रही थी तो हमें लगा मुसीबत में हो शायद” दूसरे लड़के ने कहा।

मेघना ने छोटा सा पैसों का पर्स ले लिया। घबराहट में मोबाइल निकलते वक्त शायद वहां गिर गया था।

“हर लड़का बुरा नहीं होता.. मैंने टीवी से सीखा है “अकेली लड़की मौका नहीं ज़िम्मेदारी होती है” गुस्से से चिल्लाने वाला लड़का अब नार्मल हो गया था।

मेघना अब भी रो रही थी पर दिल मे डर कुछ कम हो गया था। “कहाँ जाना है तुमको, इतनी रात को अकेली क्यों हो” पर्स देने वाले लड़के ने पूछा,साथ मे वो बैग भी थमाया जो डर से सड़क पर फेंक आयी थी। मेघना ने पूरी कहानी कह डाली और एड्रेस दिखा कर कहा “इस पाते पर जाना है”

एक लड़के ने मोबाइल निकला और ऑनलाइन कैब सर्विस को कॉल लगाई। 5 से 10 मिनट के अंदर कैब आ गयी। मेघना को कैब में बिठा कर बोला “मैडम पेमेंट कर दी है और अब डरने की ज़रूरत नहीं। ये आपको आपके पाते पर पहुंचा देंगे”

“थैंक यू” मेघना बस इतना ही कह पायी। उसे कुछ और कहने के लिए शब्द ही नहीं मिल रहे थे। कैब अपनी मंज़िल को चल दी थी। मेघना को लगा इंसानियत अभी भी बाकी है।

(समाप्त)
 
लिफ्ट

इस कहानी के पात्र व दर्शायी गयी घटनाएं काल्पनिक है। किसी भी प्रकार की वास्तविकता से मेल होना महज़ एक इत्तिफ़ाक़ हो सकता है। इस कहानी के ज़रिए लेखक किसी भी तरह से भूत प्रेत पर विश्वास करने के लिए बाध्य नही करता है, धन्यवाद।

***

“टिक टिक.. टिक टिक.. टिक टिक..” बजते हुए अलार्म क्लॉक के बटन पर गहरी नींद से जागे अनिल ने जोर से हाथ मारा और करवट बदल कर फिर से सो गया। 7 बजे का वक़्त दिखती अलार्म क्लॉक हाथ लगने से टेबल पर औंधी जा गिरी और अपनी किस्मत समझ कर यूँ ही चुप पड़ी रही। रात देर से सोया अनिल नींद में ही अलार्म बंद कर के सो गया था। देर रात तक पूजा से फ़ोन पर झगड़ा होता रहा, रूठना मनाना चलता रहा, और आखिर में अनिल ने पूजा को मना ही लिया था।

“ट्रिन ट्रिन” मोबाइल की घंटी से अनिल की आंखें खुली।

“हेलो”

“आज कम्पनी नहीं आ रहा क्या अनिल” दूसरी तरफ से आवाज़ आयी।

“आऊंगा.. क्यों” अनिल ने लेटे लेटे आंखें बन्द किये जवाब दिया।

“तो कब आएगा यार.. अभी तक सो रहा है क्या, मैं बस में बैठा तेरा इंतज़ार कर रहा हूँ” अनिल की आवाज़ से शायद दूसरी तरफ अंदाज़ा हो गया था कि अनिल अभी अभी नींद से जागा है।

“ओह शिट..” अनिल में घड़ी की तरफ देखा जो सवा 8 बजा रही थी तो आंखों में भरी नींद फौरन धुवा हो गयी और छलांग मार कर उठ खड़ा हुआ “तू फ़ोन रख, मैं बस 15 मिनट में निकल रहा हूँ। अब तो दूसरी बस पकड़नी पड़ेगी” अनिल ने इतना कह कर मोबाइल बेड पर फेंका और बाथरूम में घुस गया। 15 मिनट के बाद वो अपने रूम को चाबी से लॉक कर के लिफ्ट की तरफ जा रहा था। लिफ्ट के पास पहुंच कर बटन दबाया पर लिफ्ट नहीं खुली।

“खुल जा यार.. अब क्या हो गया” अनिल खुद से बोलता बार बार ट्राय कर रहा था।

“लिफ्ट खराब हो गयी है” पास से गुजरते आदमी ने अनिल को बताया जो शायद इसी बिल्डिंग में रहता था।

“ओह.. ओके थैंक्स” अनिल ने सीढ़ियों की तरफ रुख किया। जल्दी जल्दी सीढ़ियां उतरता अनिल घड़ी की तरफ देख रहा था। पांचवीं मंज़िल से बिना लिफ्ट के नीचे जाना उसे थका दे रहा था। अभी तीसरी मंजिल की सीढ़ियों पर था कि उसे किसी के ज़ोर ज़ोर से खाँसने की आवाज़ आयी और सामने से एक 70 साल का बूढ़ा आदमी धीरे धीरे सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ आ रहा था।

“अंकल आप ठीक है” अनिल ने उस बूढ़े से पूछा जिसका खाँस खाँस कर बुरा हाल हो रहा था।

“हाँ बेटा मैं ठीक हूँ” बूढ़े ने थके थके लहज़े में कहा।

“कहाँ जाना है आपको, चलिये मैं आपके साथ चलता हूँ” अनिल उस आदमी की मदद के लिए आगे बढ़ा और ऑफिस भूल कर उसका हाथ पकड़ कर साथ चलने लगा।

“अरे बेटा, तुम कहाँ परेशान हो रहे हो.. बस चौथी मंजिल तक ही जाना है मैं चला जाऊंगा, ये तो रोज़ का काम है मेरा” बूढे आदमी ने चलते चलते कहा।

“आप रोज जाते हैं ?” अनिल ने सवाल किया।

“हाँ, रोज़ सुबह पार्क में बैठने जाता हूँ, इन बन्द घरों में मेरा दम घुटता है इसलिए ताज़ा हवा लेने रोज़ सुबह पार्क चला जाता हूँ, कितनी बार मैंने मिस्टर बंसल से कहा कि बिल्डिंग में लिफ्ट लगवा दें, पांच मंजिला है तो क्या हुआ हम जैसे बूढो को तो 4 सीढ़ी उतारना भी मुश्किल पड़ता है” उस आदमी में बिल्डिंग के मालिक नाम लेते हुए कहा।

“पर अंकल बिल्डिंग में लिफ्ट तो लगी हुई है, अभी 2 महीने पहले ही लगी है” अनिल ने बूढ़े आदमी की जानकारी बढ़ाई।

“लगी हुई है...???” बूढ़े आदमी ने चोंक कर पूछा।

“हाँ, वैसे मुझे आये तो अभी 1 महीना ही हुआ है पर मेरा दोस्त बता रहा था कि 2 महीने पहले ही लगी है लिफ्ट यहां” अनिल ने साथ चलते चलते कहा।

बूढ़ा आदमी अब चुप था और चौथी मंजिल आने पर बोला “शुक्रिया बेटा, मेरा घर आ गया, अब तुम जाओ.. तुम्हें देर हो रही होगी”

“हाँ आज मेरी आँख नही खुल पायी थी पर लेट होने का एक फायदा तो हुआ कि मैं आपसे मिला”

“हा हा हा.. बहुत अच्छा” बूढ़ा आदमी हँसने लगा जिस पर अनिल भी मुसकुरा दिया।

अनिल उस आदमी को उसके फ्लैट के सामने छोड़ कर ऑफिस के लिए निकल गया।

अब रोज़ अनिल कुछ सवेरे निकलता जिससे कि पार्क में उस बूढे आदमी से कुछ पल मिल सके। उस बूढ़े आदमी में अनिल को अपने दादा जी दिखते जो कुछ साल पहले गुज़र गए थे। बातों बातों में पता चला कि उनका नाम सुभाष है जो रिटायर्ड कर्नल है। एक बेटा है जो अपनी फैमिली के साथ अमेरिका में रहता है। बस ये दो बूढ़े पति पत्नी चौथी मंजिल पर अकेले रहते है और एक फुल टाइम काम वाली बाई साथ होती है।

रोज़ मिलते बातें करते 2 हफ्ते गुज़र गए। कर्नल साहब भी अनिल से खूब बातें बनाते और अनिल भी उन्हें अपने घर की और पूजा की बातें बताता और कुछ देर बातें कर के अनिल वक़्त पर ऑफिस के लिए निकल जाता। लिफ्ट ठीक हो जाने के बाद भी वो सीढ़ियों से ही आते जाते थे। जब अनिल लिफ्ट के चलने के लिए बोलता तो चुप हो जाते और चुप चाप सीढ़ियों से जाने लगते। अनिल को कुछ अजीब लगता पर उसने इस बारे में ज़्यादा बात करना सही नहीं समझा।

एक दिन अनिल रोज़ वाले वक्त पर पार्क पहुँचा तो वहां कर्नल साहब नहीं बैठे थे, कुछ देर अनिल ने वहीं बैठ कर इंतज़ार किया कि हो सकता है किसी वजह लेट हो गए हो पर जब आधा घंटा गुज़र गया अनिल से रहा नहीं गया। वो सीधा उनके फ्लोर पर पहुंचा और डोर बैल बजायी “टिंग टोंग” दरवाज़ा एक बूढ़ी औरत ने खोला जो शायद कर्नल साहब की पत्नी थी।

“आंटी, कर्नल अंकल है ?” अनिल ने पूछा।

“बेटा वो...” बूढ़ी औरत कुछ चौकी।

“क्या नए रहने आये हो इस बिल्डिंग में” औरत ने सवाल किया।

“जी” अनिल ने छोटा सा जवाब दिया।

“बेटा.. कर्नल साहब को गुज़रे तो 3 महीने हो गए” बूढ़ी औरत ने दुखी होते हुए कहा।

“क्या.. पर.. ऐसा कैसे हो सकता है” अनिल बहुत ज़्यादा चोंक गया था।

“हाँ, 3 महीने पहले उन्हें हार्ट अटैक आया था जो जानलेवा साबित हुआ। कल उनका श्राद था, भगवान उनकी आत्मा को शांति दे” बूढ़ी औरत ने आंखों से बहते आँसू साफ किये।

“श्राद.. पर आपका बेटा तो अमेरिका में होता है” अनिल ने पूछा।

“कल वो अमेरिका से आया था अपने पिता के श्राद के लिए, अपने पिता की अचानक मौत का सुन कर उसका एक्सीडेंट हो गया था। काफी गहरी चोटें आयी जिसकी वजह से उसे इंडिया आने में 3 महीने लग गये। पर बेटा तुम उन्हें कैसे जानते हो” बूढ़ी औरत ने पूछा।

“मैं..” अनिल को समझ नहीं आ रहा था कि पिछले दो हफ्ते की कहानी बताये या छिपाये।

“वो.. मेरे एक दोस्त ने बताया था कि कर्नल अंकल बहुत अच्छे आदमी है, तो इसलिए..” अनिल ने खोये खोये जवाब दिया।

“मैं चलता हूँ आंटी” अनिल कह कर मुड़ गया। सीढ़ियों से आया अनिल लिफ्ट की तरफ बढ़ रहा था।

उसके दिमाग मे उथल पुथल मची हुई थी। पिछले दो हफ्तों से वो एक भटकती आत्मा से बातें कर रहा था, एक आत्मा से रोज़ मिलता था। अपने दुख सुख बाँटता था पर अब उसे सीढ़ियों की तरफ देखने मे भी ख़ौफ़ आ रहा था। कुछ ही दिनों में उसने वो जगह छोड़ दी और दूसरी जगह जा कर रहने लगा पर जितने भी दिन अनिल इस बिल्डिंग में रहा उसने सीढ़ियों की तरफ कभी रुख नहीं किया।

(समाप्त)
 
लतीफुल्ला की सोने की कटोरी

हमारे मोहल्ले में एक थे मियाँ लतीफुल्ला.. जहाँ भी जाते एक लतीफ़ा सुना डालते। अरे नहीं नहीं... आमाँ आप गलत समझ रहे हैं। वो कोई शौक नहीं रखते लतीफ़ा सुनाने का.. बस अनजाने ही उनकी मुंह से लतीफ़ा निकल जाता और सामने वाला हंस हंस कर लोट पोट हो जाता।

मुझे तो यूँ मालूम होता है की ये उनके नाम का ही आसार होगा.. नाम भी तो उनकी अम्मा ने क्या खूब रखा था "लतीफुल्ला"

दरअसल हुआ यूँ था कि उनके अब्बा मियाँ बहुत गुस्से वाले थे... हर वक़्त गुस्सा नाक पर धरा रहता.. उनकी अम्मा ने सोचा कि कहीं मेरा लाल, मेरा जिगर का टुकड़ा अपने बाप की तरह तेज़ गुस्से का न हो जाये तो उन्होंने अपने जिगर के टुकड़े का नाम लतीफुल्ला ही रख दिया। अब खुदा का करना यूँ हुआ कि वो अपनी हर बात में एक लतीफ़ा सुना डालते।

पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में वो भी किसी शाहजहाँ से कम नहीं लगते थे। घुटनों तक काले रंग की लंगोट बांधे, उसके ऊपर उनकी खूबसूरती को चार चांद लगाता सफ़ेद कुर्ता, चेहरे पर शेख चिल्ली वाली दाड़ी, उसमें छुपे होंठों पर सदा रहने वाली मुस्कान। माशा अल्लाह क्या रंग रूप पाया था कि खुदा ना खस्ता कोई बच्चा उन्हें रात को देख ले तो अपनी माँ से चिपक कर फिर दूर ना होने की कसम खा ले। अरे नहीं मियाँ.. आप तो फिर गलत समझ बेठे... वो कोई सांवली रंगत के नहीं बल्कि दूध सी सफ़ेद रंगत के.. बल्कि यूँ कहो कि आलू को उबाल कर छील दिया गया हो, और उस दूध सी सफ़ेद रंगत पे बड़ी बड़ी आँखों में काजल की पूरी डिबिया लगी हुई। अब अगर अँधेरे में वो किसी बच्चे के पास चले जाये तो सोचो की क्या हश्र होगा उस मासूम से बच्चे का.. खेर छोडिए ये सब बातें।

अभी कल ही मेरी दुकान पर आये तो फट मैंने पूछा “कहो मियाँ! कौन सा पान बना दूँ.. मीठा पान, सोडा पान, इलायची पान या....”

मेरी पान वाली बात वो सिरे से ही अनसुनी करते हुए अपनी ही सोचो में गुम बोले.. “हमीद भाई ! ये सोने की कटोरी कितने में बन जायगी”

"अमाँ तुम्हें क्या सोने की कटोरी की ज़रुरत पढ़ गयी" मैं खासा चौंक गया कि इतनी महंगाई के ज़माने में ये क्यों कर सोने की कटोरी का पूछ रहे हैं।

"अरे भाई! वो मेरी अम्मी है ना.. एक नई ज़िद लग गयी है उन्हें" मियाँ लतिफुल्ला बोले।

"क्या कहती हैं बी अम्मा.. ज़रा बताओ तो" मैं सुनने को बेचैन हुआ।

"कल कह रही थी कि वो अपने पड पोते की कमाई से चौ-मंजिला मकान की छत पर बैठ के सोने की कटोरी में दूध पायेंगी।" मियाँ लतीफुल्ला में सारा रात का वाक़या कह सुनाया।

“क्या ! मियाँ तुमने शादी कब कर ली.. हमें तो दावत भी नहीं दी” मैं ज़ोर से सदमे की हालत में बोला, मुझे सोने की कटोरी से ज़्यादा अपनी दावत का दुःख हुआ कि लो! बे-मौत एक दावत मारी गयी।

"अरे हमीद भाई ! कैसी बात करते हो। भला ऐसा हो सकता है कि मेरी शादी हो और आप को दावत ना मिले। अभी अम्मी लड़की देखना शुरू कर रही हैं” शरमाते हुए मियाँ लतीफुल्ला ने मेरा दुःख कुछ कम किया।

लो भैया.. अभी लड़की मिली नहीं, शादी हुई नहीं और बी अम्मा ख्वाब देख रही हैं पड पोते के। फिर मैंने आगे पूछा "तो तुमने कहीं लड़की वड़की पसन्द तो नहीं कर रखी”

"नहीं जी, मैं तो वहीँ शादी कर लूंगा जहाँ मेरी अम्मी बोलेंगी, पर हमीद भाई मैं सोच रहा था सोने की कटोरी खरीद लूँ" मियाँ लतीफुल्ला को अब भी कटोरी की पड़ी थी।

"पर बी अम्मा तो पड पोते की कमाई से लायी हुई कटोरी में दूध पीना चाहती हैं ना" मैं झुंझला गया।

"मैं अम्मी को बताऊंगा ही नहीं कि मैंने खरीदी है, ओ तेरी!!!! हमीद भाई, वादा करो की आप अम्मी को नहीं बताओगे" मियाँ लतीफुल्ला जैसे किसी कशमकश में मुब्तिला हो गए कि अब क्या होगा, मेरा ये राज़ तो हमीद भाई जान चुके हैं।

"कसम ले लो मियाँ, मैं किसी को नहीं बताऊंगा.. तो कब ले रहे हो सोने की कटोरी" मुझे भी बी अम्मा की ख्वाहिश में कुछ कुछ दिलचस्पी होने लगी।

"बस हमीद भाई! नोकरी ही नहीं मिलती कहीं, मिल जाये तो कुछ पैसा हाथ में आ जाए, अब्बा तो कुछ नहीं देते" मियाँ लतीफुल्ला ने बड़ी बेचारगी से कहा।

मैं एक मिनट को सकते में आ गया। खुद पर बड़ी ज़ोर से गुस्सा आया कि मैं भी किस की बातों में अपना वक़्त बर्बाद कर रहा हूँ, ये तो वही बात हुई की मुर्गी खरीदी नहीं पर उस मुर्गी के अंडे बेच बेच कर महल खड़ा कर लिया।

"मियाँ तुम घर जा कर आराम कर लो। अभी मैं काम जा रहा हूँ। वक़्त मिला तो ज़रूर सोने की कटोरी का देखते हैं क्या करना है।" मैंने जैसे पीछा छुड़ाने की कोशिश की।

मियाँ लतीफुल्ला तो चले गये “खुदा हाफिज” बोल कर पर मैं थोड़ा कंफ्यूज हो गया कि इस सारी गुफ्तगू पर हसूं या अपना सिर पीट लूँ.. जो भी है! एक बात तो साफ़ है मियाँ लतीफुल्ला के आला ख्याल सुन सुन कर तो बीरबल की खिचड़ी भी पाक जाए.. क्यों!! सही कहा ना मैंने....

(समाप्त)
 
काली चान्दनी

“यार शशि... देख वो तुझे देख रहा है” मुस्कान ने शशि को एक तरफ इशारा करते हुए कहा था।

“कौन वो.. इइइइइ!! अरे यार.. उसकी तरफ तो मैं देखना भी पसंद न करूँ। देख तो कितना काला है वो। मुझे नफरत है काले पिले लोगों से” शशि ने बुरा सा मुंह बना कर कहा, शशि की बातों में घमंड झलक रहा था।

“ठीक तो है, देखने में तो स्मार्ट ही लग रहा है” मुस्कान को इसका लहज़ा पसंद नहीं आया था।

“हम्म तेरे टाइप का होगा वो, मेरे टाइप का नही” शशि ने हँसते हुए कहा जो मुस्कान को पसंद नहीं आया उसका इस तरह कहना।

इसी तरह कालेज के हर दूसरे लड़के और लड़की पर शशि कमेंट्स करती जा रही थी।

शशि थी तो बहुत सुंदर, दूध सी सफ़ेद रंगत, काली चमकती आंखें, लहराते लम्बे काले बाल। कुछ यूँ था कि खुदा ने बड़ी फुर्सत से उसे बनाया था और उसकी इस सुंदरता के कारण वो बहुत घमंडी हो गयी थी। अपने आगे किसी को कुछ न समझना, सब को नीची नज़रों से देखना, अपनी तारीफ अपना हक़ समझ कर वसूलना उसकी आदत बन चुकी था।

अगले दिन शशि कालेज में गई तो मुकेश उसके पास आया और बोला “शशि मैं आपसे कुछ बात करना चाहता हूँ”

मुकेश वही लड़का था जो अकसर दूर खड़ा शशि को देखा करता था। आज बहुत हिम्मत कर के वो शशि से बात करने आया था।

“मेरे पास टाइम नहीं है। जल्दी बोलो क्या बात है” शशि ने लिए दिए अंदाज़ में बोला।

“शशि क्या हम दो मिनट बैठ कर बात कर सकते हैं” मुकेश मिन्नतों वाले अंदाज़ में बोला था।

“नो वे... आर यू मैड.. जो बोलना है यहीं बोलो। मेरे पास फालतू टाइम नहीं है”

“शशि”

मुकेश थोड़ा हिचकिचाया।

“असल में.. मैं तुम्हें पसंद करता हूँ”

“रियली..” शशि ने मजाक बनने वाले अंदाज़ में कहा।

“तुमसे शादी करना चाहता हूँ। विल यू मेरी मी” मुकेश ने सारी हिम्मत बटोर के आखिर बोल ही दिया।

“क्या!!!!!!” शशि पर जैसे बम फट पड़ा था।

“तुम्। तुमम। माय फूट। मैं तुमसे शादी करूँगी। दिमाग तो ठीक है तुम्हारा। कभी आईना देखा है तुमने” वो इतना जोर शोर से बोल रही थी कि आस-पास भीड़ जमा हो गयी।

“सुना आप लोगों ने, ये मुझसे शादी के ख्वाब देख रहा है। तुम जैसे को तो मैं देखना भी पसन्द नहीं करूँ और तुम शादी के ख्वाब देख रहे हो.. तुम आसमान छूने की बात करते हो। कहाँ तुम और कहाँ मैं.. हुंह”

शशि के लहजे में इतनी नफरत थी कि मुकेश अपने आपको बहुत हक़ीर, बहुत छोटा और बेइज़्ज़त महसूस कर रहा था। बेइज़्ज़ती की कारण उसकी आँखों में पानी आ गया था।

मुकेश कुछ न बोल सका। वो बस सुनता रहा और पास खड़े लोगों को अपने पर हँसते देखता रहा।

पर उसका दिल रो रहा था। वो बस इतना ही बोल पाया। “तुम बहुत पछताओगी शशि, किसी का दिल दुखा कर कभी कोई खुश नहीं रहता”

मुकेश इतना कह कर चला गया.. फिर कभी शशि ने उसे नहीं देखा कालेज में।

एक बहुत बड़े घर से शशि का रिश्ता आया। उसके माता पिता ने शशि की मर्जी जान कर हाँ कर दी और यूँ शशि की शादी का दिन भी आ पहुंचा।

शशि दुल्हन के रूप में बहुत सुंदर लग रही थी। शशि ऐसा महसूस कर रही थी जैसे वो आसमानों पर उड़ रही हो। उसकी ख्वाहिश जो पूरी हो गयी थी। एक बड़ा घर, खूब सारी दौलत और सब से बढ़ कर उसकी बराबरी का, उसकी सुंदरता का साथ देता उसका पति।

रवी एक बोहोत बड़ा बिज़नेस मेन था व शशि जैसी सुन्दर लड़की को पा कर खुश था पर नहीं जनता था कि शशि ने कितनों के दिल तोड़े हैं। कितने ही लोगों की बद-दुआएं ली है। केवल अपने घमण्ड के कारण।

शशि की शादी को अभी कुछ ही महीने हुए थे कि घर में ख़ुशी की लहर दौड़ थी.. बात ही कुछ एसी थी.. शशि के पांव भरी थे। उनके घर एक नन्हा सा मेहमान आने वाला था, घर में सभी खुश थे।

लेकिन कुछ दिनों से शशि परेशान लग रही थी, उसकी परेशानी की वजह उसकी सास के शब्द थे।

“शशि ! मुझे पोता ही चहिये। मेरा पोता मेरे कुल को रोशन करेगा और बहु पोता भी मेरे रवि जैसा सुन्दर होना चाहिये”

ये शब्द बार बार शशि के कानों में सुनाई दे रहे थे। धीरे धीरे वो वक़्त भी आ गया जिसको सब का इंतज़ार था। रवि शशि को हॉस्पिटल ले कर गया।

डॉक्टर ने रूम से बहार आ कर खुशखबरी सुनायी। “माँ और बच्चा दोनों सही है। आप चाहे तो मिल सकते हैं”

डॉक्टर कह कर चला गया। रवि और रवि की माँ रूम में गए अपने पोते से मिलने, लेकिन रवि और उसकी माँ को पता नहीं था। वो दोनों अंदर गए पोते को देखने पर क्या देखते हैं की वहां पोता नहीं था बल्कि शशि के पास एक छोटी सी कमज़ोर सी लड़की लेती थी जो बिलकुल काली और बदसूरत सी थी या यूँ कहो कि रवि और उसकी माँ को तो कम से कम ऐसा ही लगा था।

जिससे देख कर दोनों का माथा ठिनका था।

“शशि क्या है ये... मुझे बेटी नहीं बेटा चाहिये था ये मेरी औलाद तो नहीं हो सकती। मैं नहीं मानता इसे मेरी बेटी.. इतनी काली और बदसूरत बेटी मेरी हो ही नहीं सकती। दूर हो जाओ मेरी नज़रों से तुम दोनों”

रवी तो जैसे उस मासूम सी बच्ची को देखना भी नहीं चाहता था। इतना कह कर रवि और उसकी माँ उसे अकेला छोड़ कर चले गये।

“नही रवि ! ये हमारी बेटी है। तुम ऐसा नहीं कर सकते मेरे साथ। रवी! मेरी बात सुनो। रवीी” शशि की आवाज़ दूर तक गूंजी।

शशि रो रही थी और उसे मुकेश के कहे शब्द सुनाई दे रहे थे।

"तुम बहुत पछताओगी शशि। किसी का दिल दुखा कर कभी कोई खुश नहीं रहता”

शशि के पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचा था पर अब वक़्त निकल चुका था और शशि खली हाथ रोती हुई रह गयी और बस अपनी काली चांदनी को देख रही थी।

(समाप्त)
 
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