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कांता की कामपिपासा

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कांता की कामपिपासा



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फ्रेंड्स इस कहानी में एक ऐसी औरत का किरदार है जो पहले पहल बहुत ही शांत और संयत प्रवृत्ति की होती है और जब उसकी कामपिपासा जागृत होती है तो वो अपने साथ क्या क्या बहा ले जाती है

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रामू कार को स्पीड से चलाने लगा, अब गाड़ी मेन सड़क पर आ गयी थी, गाड़ी की एसी की ठंडक की वजह से कांता को नींद आने लगी थी. और कुछ ही देर मे उसकी आँख लग गयी, पास ही बैठे विजय को भी नींद आने लगी थी. जानकी लाल खिड़की से बाहर की ओर देख रहे थे. यही कोई 25 मिनिट बाद गाड़ी हवेली के पोर्च मे रुकी. सभी लोग गाड़ी से नीचे उतरे. नीच उतरने पर कांता ने देखा कि उसकी सास दरवाजे पा हाथो मे आरती की थाली लेकर खड़ी थी. विजय और कांता की आरती उतारने के बाद वो उसे लेकर अंदर आई.

कांता लगभग दो साल बाद हवेली मे आई थी. इसलिए हवेली चारो तरफ सजी हुई थी. कांता की सास ने अपने बेटे और बहू से कहा “तुम लोग बहुत थक गये होगे, नहा कर थोड़ा आराम कर लो.और बहू और बेटे को उनका कमरा दिखाया. विजय अपने कमरे मे जाकर थके होने के कारण बेड पर लेट गया और कांता बाथरूम की ओर बढ़ गयी.

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बाथरूम काफ़ी सुसज्जित और बड़ा था. किसी आलीशान होटेल के बाथरूम की तरह, पानी का बड़ा टब. फव्वारा आदि सब कुछ था बाथरूम मे. कांता शीशे के सामने जाकर अपने आपको शीशे मे देखने लगी, अपने आपको निहारते हुए उसे बड़ी ख़ुसी हो रही थी अपनी खूबसूरती देखकर. फिर उसने ब्लाउस और साड़ी मे लगे हुए पिन को धीरे से निकाला और अपना आँचल लुढ़का दिया. जैस ही उसके नारंगी कलर का आँचल लुढ़का उसका बड़े बड़े स्तन नुमाया हो गये. उसके ब्लाउस का डीप काफ़ी गहरा होने के कारण उसके स्तन ब्लाउस से आधे से अधिक बाहर नुमाया हो रहे थे

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. उसके स्तनों का आकार दो बड़े नारियल के आकार जितना था. फिर कांता ने अपनी साड़ी को अपनी कमर मे से खोलकर अलग कर दिया. अब वो ब्लाउज पेटिकोट मे अपनी शरीर को शीशे मे निहारने लगी. स्तनों के नीचे का हिस्सा काफ़ी सपाट था उसमे उसकी गहरी सी नाभि गजब ढा रही थी नाभि के नीचे हल्के लाल रंग का पेटिकोट था जिसका कपड़ा पतला होने की वजह से उसके अंदर की सुडोल टाँगों को दिखाई देने से नही रोक पा रहा था. उसने धीरे से अपने बालो को समेटे हुए अपने शरीर को फिल्मी अंदाज़ मे पोज़ देकर सीशे मे देखकर मुस्कराने लगी, फिर उसके हाथ अपने ब्लाउस पर आ गये और अपनी बड़ी बड़ी चूचियो को सहलाने लगी. फिर बड़ी ही नज़ाकत से उसने अपने ब्लाउस का एक हुक खोला. उसकी चुचियाँ आधी से अधिक बाहर की ओर झलकने लगी. ऐसा लग रहा था कि छोटे से पिंजरे मे दो बड़े कबूतरों को क़ैद कर दिया गया है. और अब आज़ादी की उम्मीद देखकर उनकी फड़फड़ाहट बढ़ गयी थी. फिर उसने धीरे से दूसरा हुक भी खोल दिया. अब नीचे लाल रंग की ब्रा का हिस्सा नज़र आने लगा था जो उसकी दूधिया गोलाईयों से ऐसे लिपटे हुए थे जैसा चंदन के पेड़ पर साप लिपटा रहता है. उसकी चूचिया बिल्कुल सफेद रंग की थी. फिर उसने अपने ब्लाउस का तीसरा हुक भी खोल दिया.
 


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उफफफ्फ़ क्या नज़ारा था. ऐसा लग रहा था कि जैसे जन्नत का दरवाजा खुल रहा हो. फिर उसने चौथा और फिर पाँचवा और आखरी हुक भी खोल दिया और अपने तन से ब्लाउस को अलग कर दिया. अब वो ब्रा मे थी, उसके स्तन उसकी ब्रा को फाड़कर बाहर निकलने के लिए बेताब हो रहे थे. लाल रंग के ब्रा मे उसका गोरा बदन ऐसा लग रहा जैसे लाल रंग मे कोई क़यामत लिपटी हुई हो. कांता ने फिर अपने आपको कुछ देर शीशे मे निहारा और एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ मुस्करा दिया. अब उसका हाथ उसके कमर पेट था जिसमे लाल रंग का पेटिकोट उसके अंदर के सामान को छुपाने का असफल प्रयास कर रहा था. फिर उसने धीरे से अपने पेटिकॉट का नाडा भी खोल दिया. और पेटिकोट बाथरूम के फर्श पर गिर गया. जैसे ही पेटिकॉट उसके तन से अलग हुआ दो सुडोल टांगे नुमाया हो गयी. उसके जांघे काफ़ी मांसल थी. ऐसा लग रहा था जैसे दो मोटे मोटे केले के पेड़ के तने हों. इतनी चिकनी टांगे थी कांता की. और उसके पाट की चौड़ाई देख कर देखने वाली की आँखो की चौड़ाई भी बढ़ जाए. काफ़ी हस्ट पुष्ट थे उसके मांसल पाट. और फिर पाट के साइड मे उसके दो कूल्हे.

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उफफफफफफफफफ्फ़ क्या कूल्हे थे उसके, ऐसा लगता था कि जैसे किसी किसान ने अपने आस पास के खेतो मे से सबसे बड़े दो तरबूजो को एक साथ रख दिया हो. और उसपर लाल रंग चढ्ढि ऐसे लग रही थी जैसे कि किसी ख़तरनाक चीज़ को इंडिकेट करने के लिए लोग लाल रंग का कपड़ा लगा देते हों.

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वाकई मे उसकी गान्ड थी ही ख़तरनाक अगर कोई उसको एक बार देख ले तो वो उसकी गहराई मे उतरने के लिए कुछ भी कर गुज़रता. ऐसी गान्ड थी कांता की. फिर उसने अपने दोनो कुल्हो पर ऐसे हाथ फिराया जैसे कोई शिकारी अपने सबसे तेज कुत्ते पर प्यार से हाथ फेरता हो. कुछ देर अपने दोनो कुल्हो पर हाथ फिराने के बाद अब वो अपना हाथ पीछे की तरफ अपनी ब्रा के हुक की ओर लेजाकर उन्हे टटोलने लगी. और कुछ देर बाद एक झटके से उसने बार की हुक को खोल दिया. ब्रा का हुक खुलते ही उसमे क़ैद दो बड़े कबूतर जैसे आज़ादी पाकर झूम उठे और ब्रा से उछलकर दोनो खुली हवा मे लंबी लंबी साँस लेने लगे.

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उसकी चूचियो का रंग सफेद था और उसपे खड़े उसके 1 इंच लंबे निपल जिनका रंग भूरे रंग का था ऐसा लग रहे थे जैसे किसी बड़े बॉम्ब मे लगे हुए पिन हो जिन्हे निकालते ही तबाही मच जाएगी. और ये बात सच भी उसके दोनो स्तन थे ही ऐसे जो एक बार देख ले बस उसे चूसने का सपना देखता रहे जिंदगी भर. ब्रा निकालने के बाद कांता ने बाथरूम का फव्वारा चालू किया और अपने शरीर पर पानी की ठंडी बूँदो को महसूस करने लगी. कुछ देर बाद फुहारे मे नहाने के बाद उसके हाथ मे साबुन आ गया और अपने चिकने बदन पर वो चिकना साबुन मलने लगी. उसके अपने हरेक अंग पर साबुन मलने के बाद उसका हाथ अपने पुष्ट कुल्हो पर गया और वहाँ भी उसने खुसबुदार साबुन लगाया. साबुन के झाग मे उसका बदन और आकर्षक लग रहा था.
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फिर उसकी अंगलियाँ अपनी चडढी के किनारे पर रेंगने लगीं. उसके कूल्हे काफ़ी बड़े होने के कारण उसकी चढ़ढी नाम मात्र की थी वो भी उसकी मांसल कमर मे धँसी हुई थी. उसने कमर की तरफ से उंगलियों को ज़ोर देकर उन्हे अपनी चढ़ढी मे घुसाया और फिर चढ़ढी के अंदर ही हाथ डाले डाले अपने हाथ को अपने विशाल पिछवाड़े की ओर लेकर गयी. और फिर बड़ी ही नज़ाकत से अपने शरीर का एक मात्र वस्त्र भी अपने तन से अलग कर दिया. अब सामने थी एक नंग अवस्था मे पानी से भिगती हुई एक शोला बदन, जिसका नाम था कांता – सेक्स की देवी. लगभग शरीर का हर अंग नॉर्मल से बड़ा था उसका. बड़ी हाइट 5’8” बड़े काले बाल, बड़ी बड़ी काली आँखे, बड़े बड़े दूध से भरे हुए स्तन, बड़े कूल्हे और दोनो मांसल जाँघो के बीच की एक दरार जिसकी गहराई दिखाई भले ही ना दे रही हो लेकिन महसूस हो रही थी और उस दरार के अंदर थी एक हल्की सी लालिमा जिस से ये पता चल रहा था कि उस दरार के भीतर कितनी आग है. और इस आग को बुझाने के लिए पानी चाहिए बड़ी मात्रा मे पानी और अलग अलग नल का पानी,

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फ्रेंड्स आजकल एक्टिव यूज़र बहुत कम कमेंट पास कर रहे हैं पता नही यूज़र्स को राइटर्स का साथ देने में क्या परेशानी होती है
 
नहाने के बाद कांता बाथरूम से निकली तो उसके बदन पर एक तौलिया था जिसने बड़ी ही मुश्क़िल से उसके गदराए हुए यौवन के कुछ हिस्से को ढक रखा था

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कांता के दिमाग़ मे जैसे कोई बहुत बड़ा प्लान चल रहा था. वो मन ही मन अपनी किसी योजना मे खो गयी. इसी धुन मे उसे पता ही नही चला कि कब दोपहर के 1 बज गये. तभी नीचे से फुलवा की आवाज़ आई, छोटी मालकिन नीचे आ जाएँ तैयार हो के स्वामी जी आ गये है.

कांता की सास आगे आगे और कांता उसके पीछे-2 चलते हुए स्वामी जी की तरफ बढ़ते है, स्वामी जी लॉन मे लगे हुए एक बड़े से तखत पर (लाइक लकड़ी का दीवान) पैर के आगे लटकाए हुए मसंद का सहारा लेटे हुए आराम से बैठे थे.

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उनकी उमर को 50-55 साल के करीब थी. बाल लगभगे सफेद हो चुके थे जिन्हे उन्होने काफ़ी छोटे-2 कटवा रखे थे. उनकी दाढ़ी के बाल भी सफेद हो चुके थे और उनका साइज़ भी बालो की तरह ही छोटा-2 था. उनका रंग सॉफ था, चेहरे पर लालिमा फैली हुई थी. उनका शरीर काफ़ी हस्ट पुष्ट था. उनकी हाइट लगभग 6'1" की थी. उनका शरीर बिल्कुल विशाल काय था. चेहरे मे एक मुस्कान फैली हुई थी. जब कांता और उसकी सास स्वामी जी के करीब आने वाले थे तो कांता की सास ने कहा सासू माँ: बेटी स्वामी जी के पैर को ज़रूर छूना, अगर वो खुशी से तुम्हे आशीर्वाद दे दिए तो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा:

कांता: जी माँ जी

स्वामी जी के पास पहूचकर सबसे पहले सासू जी ने उनके पैर छुए, फिर कांता ने स्वामी जी की ओर झुकते हुए उन्हे प्रणाम किया झुकते वक़्त उसका दुपट्टा नीचे झूल गया जिससे उसकी कमीज़ ने उसके शरीर का साथ छोड़ दिया जिसके कारण उसके दोनो बड़े अनार स्वामी जी को दिखाई दे गये, स्वामी जी के चेहरे पे भाव तो सहज थे पर उनका मन अचानक उन विशाल अनारो को देख कर थोड़ा विचलित सा हो गया. पर स्वामी जी वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए इस बात का असर अपने चेहरे पर नही होने दिया. तभी जानकीलाल ने कहा.

जानकी लाल: स्वामी जी ये मेरी बहू कांता है, विजय की धरमपत्नी, बहुत शुशील और काफ़ी पढ़ी लिखी है. मैं चाहता हूँ कि मेरे बिज़्नेस मे मेरा साथ दे ताकि मैं बिज़्नेस को ठीक से संभाल सकूँ, आप तो जानते है कि कितना बड़ा बिज़्नेस है हमारा, अकेले संभालने मे काफ़ी दिक्कत होती है. बहू साथ होगी तो काफ़ी सहयोग मिलेगा.

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स्वामी: हाँ हाँ क्यो नही, ये तो बड़ा ही उत्तम विचार है. आख़िर बहू पढ़ी लिखी है और काफ़ी समझदार भी है. ये तो आराम से सभी काम को संभाल सकती है....... क्यो बेटी (स्वामी जी कांता की तरफ देखते हुए मुस्करा कर बोले) कांता ने हल्के से मुस्करा कर अपनी रज़ामंदी दे दी.

 


जानकी लाल: स्वामी जी हम चाहते है कि इस काम की शुरुआत भी आप से ही हो. क्योकि आज तक के सारे शुभ काम आपके ही हाथों से हुए है. अगर आपका आशीर्वाद मिल जाए तो कांता इस बिज़्नेस को नयी बुलंदियो तक लेकर जाएगी.

स्वामी जी: अरे जानकी लाल तुम तो जानते ही हो मैं हमेशा तुम्हारे साथ ही हूँ.... लो आज ही हम इस शुभ काम को शुरू कर देते है... लेकिन हाँ...... अगर ये काम तुम बुधवार यानी परसो के दिन शुरू करो तो बहुत उत्तम समय होगा ये इसके लिए.

जानकी लाल: हाँ तो स्वामी जी कोई बात नही हम ये शुभारंभ परसो के दिन से ही करेंगे, परसो मैं हवन की तैयारी करवा देता हूँ. आप परसो आ जाएँ.

स्वामी जी: अरे जानकी तुम तो जानते ही हो मेरा समय कितना कीमती है मैं परसो के दिन यहाँ पर नही आ पाउन्गा. तुम लोगो को ही मेरे मठ पर आना पड़ेगा, हवन के लिए.

जानकी लाल: कोई बात नही स्वामी जी हम लोग परसो के दिन हम लोग आ जाएँगे मठ पर.

स्वामी जी: ये उत्तम रहेगा क्यो कि वहाँ आबो हवा अनुकूल है हवन के लिए.

जानकी लाल--ठीक है स्वामी जी हम लोग परसो के दिन आपके मठ पर आ रहे है.

उसके बाद जानकी ने अपने नौकरो से कहा कि स्वामी जी के साथ आए हुए सभी लोगो को वो भोजन करा दे. और खुद स्वामी जी से बोले:

जानकी लाल: चलिए स्वामी जी अंदर चलिए, भोजन कर लीजिए.

स्वामी जी स्वीकृति मे सिर हिलाते हुए उठ खड़े हुए और जानकी लाल के साथ हवेली के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चले. हवेली के अंदर पहुच कर उन्होने स्वामी जी को ससम्मान आसान पर बैठाया और खुद अपनी पत्नी से बोले:

जानकी लाल: अरे सुनती हो! बहू को बोलो कि वो स्वामी जी को भोजन खुद अपने हाथो से परोसे.

कांता की सासू: ठीक है (और वो कांता से जाकर बोली, बेटी स्वामी जी को भोजन करा दो, अगर उनका आशीर्वाद मिल गया तो तरक्की ही तरक्की होगी तुम्हारी, बहुत पहुचे हुए है ये स्वामी जी:

(कांता खाने के थाल और खाली प्लेट और कटोरी स्वामी जी के आगे लगा कर उन्हे खाना परोसने लगी. इस वक़्त वो ज़मीन पर बैठी हुई थी क्योकि स्वामी जी केवल भूमि पर बैठ के ही खाना खाते थे) स्वामी जी की नज़रे भोजन परोस रही कांता के गदराए जिस्म का जायज़ा ले रही थी. तभी कांता ने अपने हाथ जोड़ कर आगृह किया:

कांता: भोजन कीजिए स्वामी जी:

स्वामी जी: हां बेटी .. और खाने का पहला नीवाला अपने मूह मे डाला. और सहसा बोले उठे .. वाहह . बड़ा ही स्वादिष्ट भोजन है. कांता की सास के मूह पर एक सतुष्टि की मुस्कान फैल गयी.

 
कुछ देर बाद स्वामी जी ने भोजन कर लिया तो स्वामी जी का हाथ धुलाने को कांता पानी के जग से उनके हाथो पर पानी गिरा रही थी. इस समय स्वामी जी बैठे हुए थे और कांता झुकी हुई थी. जिसके कारण उसका दुपट्टा हवा मे लटक गया था और उसकी कमीज़ से दो सफेद अनार दिखाई देने लगे. इस बार स्वामी जी उन जोबन को आराम से पूरी तन्मयता के साथ अपनी नज़रो से तौल रहे थे. उसके मस्त जोबन को देख कर पानी की बजाय दूध पीने का मन करने लगा. स्वामी जी का हाथ तो धूल चुका था लेकिन मन का मैल बढ़ता ही जा रहा था. स्वामी के नीचे का अंग अब हल्के से अपना सिर उठाने लगा. वो दिमाग़ से बग़ावत कर बैठता अगर स्वामी जी अपनी नज़रो को कांता के क़यामत वाले स्तनों से नही हटाते. हाथ धोने के बाद स्वामी जी को कांता ने नॅपकिन दिया हाथ पोछने के लिए. उसने बाद स्वामी जी ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा:

स्वामी जी: जानकी लाल: अब भोजन तो हो गया, अब हमें मठ चलना चाहिए काफ़ी देर हो गयी है.

जानकी लाल: जी स्वामी जी, हम लोग परसो के दिन आपके दर्शन करने मठ मे आएँगे, वही पर हवन होगा.

स्वामी जी: हां ये सर्वथा उचित रहेगा:

फिर जाते समय जानकी लाल ने स्वामी के पैर छुए, उसके बाद उसकी पत्नी और उसके बाद कांता जैसे ही पैर छूने के लिए झुकी स्वामी जी की नज़रे फिर उन गोलाईयो पर फिसलने लगी इस बार कांता की नज़रे समझ गयी कि वो उसकी चिकनाई युक्त घाटी पर फिसल रहे है.

तभी स्वामी जी ने अपना हाथ कांता के कंधों पर रखा और हल्के से सहलाते हुए उसे उठाया और बोले पुत्रवती भव और मुस्करा कर चल दिए. जानकी लाल स्वामी जी के पीछे-2 उनको बाहर तक छोड़ने के लिए निकल लिए. कांता और उसकी सास उन्हे जाते हुए देख रही थी. तभी कांता की सास ने कहा कि बेटी तुम थक गयी होगी तुम अपने बेडरूम मे आराम करो मैं तुम्हारा खाना उपर ही भिजवा देती हूँ:

कांता ने सहमति मे अपना सिर हिलाया:

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कांता अपने बेडरूम मे पहुच कर चेंज करने लगी, उसने सलवार कमीज़ खोल कर गाउन डाल लिया और बेड पर लेट गई. सिल्क के गाउन मे उसके बदन का कटाव सॉफ झलक रहा था. तभी फूलवा आ गई खाना लेकर.

फूलवा: लीजिए छोटी मालकिन खाना खा लीजिए (कांता उसे खाना पास की मेज पर रखने का इशारा करती है. फूलवा खाना पास के मेज पर रख देती है और जाने के लिए मुड़ती है, तभी उसे कांता रोक लेती है, और वही पर बैठने का इशारा करती है, फूलवा नीचे बिछे हुए कालीन पर बैठ जाती है तो कांता उस से कहती है

कांता: अरे फूलवा नीचे क्यो बैठी हुई हो. उपर कुर्सी पर बैठ जा.

फूलवा: नही मालकिन मैं यही ठीक हूँ.

कांता: मैं कहती हूँ कि चुप चाप कुर्सी पर बैठ जा. (बनावटी गुस्से से देखकर बोली कांता, फूलवा कालीन पर से उठ कर वही पड़ी कुर्सी पर बैठ जाती है, कांता भी अपने बेड पर बैठ कर अपने गोद मे तकिया रख लेती है और फूलवा से पूछती है)

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कांता: ये स्वामी जी का मठ कहाँ है?

फूलवा: यहाँ से कोई 12-15 किमी दूर है. वहाँ पर इनका बहुत बड़ा आश्रम है, जहाँ पर कई साधु, स्वामी जी के शिष्य-शिष्याए रहते है. इनको मिलने बड़े बड़े लोग आते है मठ पर. कई एकड़ मे फैला है स्वामी जी का मठ, मठ के चारो ओर एक उँची सी बाउंड्री बनी हुई है. और एक बड़ा सारा मेन गेट है. जहाँ पर हर वक्त 4-5 साधु रहते है. बिना इज़ाज़त के कोई भी मठ के अंदर नही जा सकता है. (फूलवा ने लगभग पूरा नक्शा खीच दिया मठ का, अपनी बातो से)

कांता: तू कभी गयी है क्या वहाँ पर.

फूलवा: हाँ गयी तो हूँ अभी एक साल पहले वहाँ पर बहुत बड़ा यग्य हुआ था तब गई थी. हज़ारो की संख्या मे लोग रोज आते थे वहाँ. पूरे 7 दिनो तक चला था यग्य. बड़े बड़े मंत्री, पोलीस ऑफीस, नेता लोग भी आए थे उस यग्य मे. पैर रखने की भी जगह नही थी उस समय वहाँ पर. बस फिर उसके बाद नही जा पाई मैं वहाँ. क्योंकि वहाँ बिना स्वामी जी की आग्या के कोई अंदर नही जा सकता है.

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(फूलवा की बात सुनकर कांता समझ गयी कि स्वामी जी काफ़ी बड़े आदमी है, उनकी पहुँच बहुत ऊँची है) फिर कांता ने फूलवा को नीचे भेज दिया और खुद खाना खाने लगी. उसका दिमाग़ किन्ही ख़यालो मे गुम था. ना जाने क्या सोच रही थी वो)

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जब एक दिन के लिए आरएसएस मे सिर्फ़ कुछ घंटो के लिए प्रॉब्लम हुई थी तब पता नही कितने दोस्तो ने कहा कि आरएसएस उनकी सबसे फ़ेवरेट स्टोरी साइट है तो आज क्यों नही वो सभी फ्रेंड्स राइटर्स का साथ देते
 
सलिल भाई , एबीपंजाबी , विराजराज , रिटेल , आर्यन , अभय केके , और भी बहुत से लेखक है जो आपसे दूरियाँ बना रहे है और कुछ बना भी चुके हैं राकेश९९९ , जेम्सबोंड , डॉली आदि और भी हैं जो अब बहुत कम हमारे बीच आते हैं
 
(फूलवा की बात सुनकर कांता समझ गयी कि स्वामी जी काफ़ी बड़े आदमी है, उनकी पहुँच बहुत ऊँची है) फिर कांता ने फूलवा को नीचे भेज दिया और खुद खाना खाने लगी. उसका दिमाग़ किन्ही ख़यालो मे गुम था. ना जाने क्या सोच रही थी वो)

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अगले दिन सुबह जब वो अपने कमरे से नीचे आई तो उसने देखा कि बाबू जी किसी से फोन पर बात कर रहे है.

जानकी लाल: हाँ ... हाँ. ... ठीक है मैं आज ही निकल जाता हूँ ......... हाँ ..... हाँ......... बिल्कुल .......... अरे हाँ भाई............. मैं सब मॅनेज कर लूँगा......... मुझे ये टेंडर लेना है...... कल वही आकर बात करता हूँ... ठीक है

(और फोन रख दिया, तब तक कांता नीचे आ चुकी थी. उसके बाल अभी थोड़े गीले थे शायद नहा कर ही नीचे आई थी वो. उसने हल्के आसमानी रंग की सिल्क की साड़ी पहुँची हुई और उसी के मेचिंग का ब्लाउस भी था. ब्लाउज मे से उसकी ब्रा की झलक सॉफ दिखााई दे रही थी, जो कि क्रीम रंग का था. आते ही उसने झुक कर अपने ससुर के पाँव छुए, जानकी लाल उसको कंधे पकड़ के उठाते हुए बोले)

जानकी लाल: अरे बेटी बस बस.......... जीते रहो, आओ तुम भी नाश्ता कर लो.

और दोनो पास की डाइनिंग टेबल पर बैठ गये, तभी कांता की सासू माँ भी वहाँ आ गयी. तीनो मिल कर नाश्ता करने लगे.)

नास्टा करते हुए जानकी लाल ने कांता से कहा

जानकी लाल: अरे हाँ. बेटी आज मुझे दोपहर बाद दिल्ली के लिए निकलना है. अभी विजय का फोन आया था. वो बता रहा था कि वहाँ पर कोई फॅक्ट्री है जो कि फ्रूट जूस बनाती है. वो अपने आमो के बागान का सालाना कांट्रॅक्ट लेना चाहती है. इसी सिलसिले मे मुझे देल्ही जाना है. अगर ये कांट्रॅक्ट पक्का हो गया तो दो सालो के कांट्रॅक्ट मे बहुत अच्छा मुनाफ़ा हो जाएगा. बस किसी तरह ये कांट्रॅक्ट हमें मिल जाए

कांता: ठीक है ........ तभी कांता की सास बोली

कांता की सास: क्या ठीक है? और तुम भी ........... इतनी जल्दी क्या है जाने की...... कल हवन करवाना है. और तुम हो कि कह रहे हो कि मैं आज देल्ही जा रहा हूँ....

जानकी लाल: अरे तुम्हे तो कुछ समझ ही नही आता! पता है तुम्हे ये करोड़ो का कांट्रॅक्ट है. अगर हमें मिल गया तो पैसो की तो जैसे बरसात ही हो जायगी तुम्हारे उपर. और तुम कह रही हो कि मत जाओ .... अरे बेटी तुम ही समझाओ अपनी सासू माँ को..

कांता: माँ जी ...... बाबू जी ठीक ही तो कह रहे है. आख़िर बिज़्नेस भी तो ज़रूरी है. और रही बात हवन की सो आप तो है ही. हम दोनो साथ चल लेंगे.

जानकी लाल: हाँ......... और क्या. ये ठीक है

सासू माँ: ठीक है जैसा तुम्हे ठीक लगे ......... करो.

(दोपहर के 2 बज रहे है. जानकी लाल का ड्राइवर जानकी लाल का सूट केस कार की डिग्गि मे रख रहा था. जानकी लाल उनकी पत्नी और कांता सभी हवेली के मुख्य द्वार पर खड़े थे. तब तक ड्राइवर जानकी लाल का सूटकेस डिग्गि मे रख चुका था)

जानकी लाल: (अपनी पत्नी के ओर मुखातिब होते हुए) ठीक है मैं चलता हूँ. ड्राइवर मुझे एरपोर्ट छोड़ कर वापस शाम तक आ जाएगा. कल सुबह तुम उसे लेकर स्वामी जी के यहाँ चली जाना.

जानकी लाल की पत्नी ने सहमति मे सिर हिलाते हुए कहा ...... ठीक है...... अपना ख्याल रखिएगा............

(जानकी लाल कार की ओर बढ़ चले. कुछ देर बाद कार हवेली की चार दीवारी के बाहर चली गयी थी. दोनो वापस हवेली के अंदर की तरफ मुड़े. )

सासू माँ: सुनो बहू........ अब मुझे थकान हो रही है मैं अपने ऊपर के कमरे मे जा रही हूँ आराम करने......... तुम भी आराम कर लो शाम की चाई पर मिलते है.

कांता ने हाँ मे सिर हिलाया..... और वो भी अपने बेडरूम की ओर बढ़ चली. वो जैसे ही सीढ़ियों के 4थे पायदान पर पहुँची अचानक उसे धडाम की आवाज़ सुनाई दी, और साथ ही उसे अपनी सास के चीखने की आवाज़ सुना दी. कांता ने तुरंत पलट कर देखा कि उसकी सास सीढ़ी के पास ज़मीन पर गिरी हुई अपने पाँव को पकड़े हुए दर्द से बिलबिला रही है. वो दौड़कर उसके पास पहुचि. चीख सुनकर फूलवा भी वहाँ आ चुकी थी.

सासू माँ: हाइईईईईईई राम ................. मररर्र्र्र्र्र्ररर गयी मैं तो.............. लगता है मेरा पैर ही टूट गय्ाआआ.......

कांता: घबराएँ मत माँ जी मैं अभी डॉक्टर को फोन करके बुलाती हूँ.

कांता दौड़ कर डॉक्टर. को फोन मिलाती है और उसे तुरंत हवेली पर आने को कहती है. फिर फोन रखकर वापस अपनी सास की ओर बढ़ जाती है.

 
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