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कांता की कामपिपासा

कांता कह भी क्या सकती थी, बस सहमति मे सिर हिला दिया. स्वामी जी ने दीपक जालाया और फिर कांता को पास बिछे हुए कंबल पर बैठने का इशारा किया. जब कांता उनके पास बैठ गयी तो स्वामी जी ने कहा:

स्वामी जी: बेटी कांता..... हम जो ये हवन करने जा रहे ये बिल्कुल विशुद्ध हवन है. वैसे तो इसमे वस्त्र भी तुम्हे बदलना चाहिए मगर मैं तुम्हे इसके लिए फोर्स नही करूँगा. हाँ लेकिन मुझे तुम्हारे हाथ पाँव को शुद्ध जल से धोना होगा. तभी तुम हवन कर पाओगी. ठीक है.

कांता ने हामी भरी. तब स्वामी जी ने एक पत्ते पर कांता के पैर रखवाए और एक पत्ते से उसके पैर पर जल गिराने लगे. फिर कुछ देर बाद वो कांता के पैरो को अपने हाथ से धोने लगे. कांता उनकी छुअन से सिहर सी गयी, मगर बोली कुछ नही,

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कुछ देर बाद स्वामी जी कांता के पैरो के तलवों को धोने के बहाने सहलाने लगे. कांता को अपने पैरो मे एक मीठी गुदगुदी महसूस होने लगी. कुछ देर बाद वो खड़े हो गये और कांता के पीछे आ गये. और कांता को अपने दोनो हाथ आगे करने के लिए बोले. और फिर कांता के पीछे झुक कर वो उसके हाथ पर पानी गिराने लगे. जब उसका हाथ पूरा गीला हो गया तो स्वामी जी अपने पैरो के पंजो के बल बैठते हुए अपने दोनो घुटनो को इस तरह फैलाया कि कांता उनके दोनो पैरो के बीच आ गयी और फिर पीछे से हाथ आगे ले जाकर वो कांता का हाथ अपने हाथ मे लेकर हल्के हल्के मसलने लगे. उन्होने कांता की दोनो हाथो की हथेलिया अपने दोनो हाथो मे लेकर उसे रगार्डने लगे. हाथ रगर्ते वक़्त स्वामी जी की विशाल जांघे कांता के विशाल चुतड़ों से साड़ी के उपर से ही रगड़ खा रही थी. इसे रगड़ा रगड़ी मे कांता का आँचल फिसल कर गिर गया और उसके दोनो कबूतर ब्लाउस नुमा जाल मे फड़फड़ाने लगे.

पीछे से स्वामी जी को उसके ब्लाउज के कबूतरो के दर्शन हो रहे थे. कांता के दोनो हाथ स्वामी जी के हाथ मे थे इसलिए वो पल्लू को उठा भी नही सकती थी. स्वामी जी कांता के जोबन का रस्पान करते हुए कांता के कान के पास अपने कान को ले जाकर फुसफुसा कर बोले

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स्वामी जी: कांता बेटी... भगवान ने तुम्हे बहुत सुन्दर बनाया है. (कांता समझ गयी कि स्वामी जी अभी कहाँ की सुंदरता देख रहे है.)

फिर स्वामी जी ने बात ना बिगड़े ये सोच कर बोले:

स्वामीजी: लेकिन एक बात है बेटी भगवान ने तुम्हे जितना ज़्यादा सुंदर बनाया है उतना ज़्यादा ही दिमाग़ भी दिया है. तुम जितनी सुंदर हो उतनी ही समझदार भी हो. तुम एक गुडवाँन स्त्री हो. इतनी सारी विशेषता बहुत ही कम स्त्रियो मे दिखाई देती है. (ये कहकर स्वामी जी ने कांता का हाथ छोड़ दिया और पानी लेकर कांता के हाथ पर गिराने लगे. हाथ धोने के बाद कांता ने भी बड़ी ही सहजता के साथ अपना पल्लू उठाया और उसे अपने दोनो अनमोल रतनों पर डाल लिया. स्वामी जी भी अपने पूजा के कार्य मे व्यस्त हो गाए.

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स्वामीजी: लेकिन एक बात है बेटी भगवान ने तुम्हे जितना ज़्यादा सुंदर बनाया है उतना ज़्यादा ही दिमाग़ भी दिया है. तुम जितनी सुंदर हो उतनी ही समझदार भी हो. तुम एक गुडवाँन स्त्री हो. इतनी सारी विशेषता बहुत ही कम स्त्रियो मे दिखाई देती है. (ये कहकर स्वामी जी ने कांता का हाथ छोड़ दिया और पानी लेकर कांता के हाथ पर गिराने लगे. हाथ धोने के बाद कांता ने भी बड़ी ही सहजता के साथ अपना पल्लू उठाया और उसे अपने दोनो अनमोल रतनों पर डाल लिया. स्वामी जी भी अपने पूजा के कार्य मे व्यस्त हो गाए.

स्वामी जी ने कुछ अगरबत्तिया निकाली और उन्हे जलाए और फिर उसे कांता को देकर बोले कि वो उसे वहाँ बीच मे गाढ दे. कांता ने ऐसा ही किया. फिर स्वामी जी कुछ मंत्र बुदबुदा कर अपने और कांता के चारो तरफ एक पानी की रेखा खीच दी. फिर कुछ जल अपने उपर छिड़क लिए और कुछ जल कांता के ऊपर. फिर कांता को हाथ जोड़ने के लिए बोले और कुछ मंत्रो का उच्चारण किया. फिर उन्होने रोली लेकर वहाँ पर रखे कलश पर टीका किया. फिर उन्होने ने कांता से कहा:

स्वामी जी: बेटी कांता..... इस हवन मे केवल हम दो ही लोग है. इस हवन की प्रक्रिया कुछ अलग सी होती है. इसमे मैं अपने आपको तिलक नही लगा सकता इसलिए बेटी मेरे माथे पर तुम्हे ही तिलक लगाना होगा. और मैं तुम्हे तिलक ळगाउन्गा.

इतना कहकर स्वामी जी ने पूजा की थाली कांता की तरफ बढ़ाई जिसमे रोली भी रखी हुई थी. कांता ने उसे अपने हाथो मे लिया और खड़ी हो गयी. लेकिन स्वामी जी बैठे हुए थे. इसलिए उनके माथे पर तिलक लगाने के लिए कांता को उनकी ओर झुकना पड़ा और कांता जैसे ही उनकी तरफ झुकी उसका आँचल लुढ़क गया और उसके दो बड़े बड़े संतरे स्वामी जी के सामने खुल गये. स्वामी जी की आँखो मे चमक सी आ गयी. कांता ने स्वामी जी के माथे पर तिलक किया,

फिर स्वामी जी ने उससे कहा:

स्वामी जी: बेटी तुम्हे मेरे दोनो बाजुओ पर भी रोली लगानी है. और अपनी बाह कांता के सामने कर दी. कांता ने अपनी तीनो उंगली मे रोली लगा कर स्वामी जी की बाह पर आधी रेखा खीच दी, और उसके बाद दूसरी बाह पर.

फिर स्वामी जी ने कहा:

स्वामी जी: बेटी अब ऐसा ही निशान अब मेरी पीठ पर भी बना दो.

कांता ने बिना कुछ कहे उनके पीठ पर भी निशान बना दिया. पीठ पर निशान लगाने के बाद स्वामी जी ने कांता से कहा:

स्वामी जी: बेटी अब एक तिलक तुम्हे मेरी नाभि पर भी लगाना है... लेकिन हाँ याद राहे कि जहाँ-जहाँ तुमने टीका लगाया है मुझे भी वहाँ वहाँ तुम्हे टीका लगाना पड़ेगा. अगर तुम अपनी नाभि मे टीका लगवा सकती हो तो ही मेरी नाभि मे टीका लगाना. और अगर तुम्हे इस से एतराज हो तो फिर रहने देना.

कांता स्वामी जी की चालाकी भरी बाते समझ रही थी. स्वामी जी ने गेंद को कांता के पाले मे ही रखा था. अब जो भी करना था कांता को ही करना था. अगर कांता मना करती तो हवन मे रुकावट की बात स्वामी जी कहते. और अगर कांता हाँ भी करती है तो स्वामी जी को और आगे बढ़ने का मौका मिल जाएगा. कांता इसी उधेड़ बुन मे थी कि क्या किया जाए. तभी कांता के कानो मे स्वामी जी की आवाज़ पड़ी:

स्वामी जी: क्या हुआ बेटी........... मैने तो पहले ही कहा था कि ये हवन थोड़ा सा अलग होगा. फिर भी अगर तुम्हे ये ठीक नही लग रहा है तो कोई बात नही हम इस विधि को नही करेंगे. तुम्हारी मर्ज़ी है.

कांता: नहीं स्वामी जी नही..... ऐसी कोई बात नही है. लाइए मैं आपके नाभि मे टीका लगा देती हूँ.

इतना कह कर कांता चुप हो गयी. स्वामी जी ये सुन कर अपने स्थान पर खड़े हो गये और उन्होने अपना अंगोछा उतार कर बगल मे रख दिया जो कि उनके पेट तक लटक रहा था.

 


स्वामीजी= क्या हुआ बेटी, मैने तो पहले ही कहा था कि ये हवन थोड़ा सा अलग होगा. फिर भी अगर तुम्हे ये ठीक नही लग रहा है तो कोई बात नही हम इस विधि को नही करेंगे. तुम्हारी मर्ज़ी है

कांता: नही स्वामी जी नही, ऐसी कोई बात नही है. लाइए मैं आपकी नाभि मे टीका लगा देती हूँ. इतना कह कर कांता चुप हो गयी.

स्वामी जी ये सुनकर अपने स्थान पर खड़े हो गये और उन्होने अपना अंगोछा उतार कर बगल मे रख दिया जो कि उनके पेट तक लटक रहा था.अब स्वामी जी अपनी जगह पर खड़े थे.

कांता को उनकी नाभि मे टीका लगाने के लिए घुटनो के बल स्वामी जी के सामने बैठना पड़ा. उसने अपनी उंगली मे रोली लगाई और स्वामी जी की नाभि मे अपनी लंबी उंगली को डाल दिया.

उफफफफफफफफफफफफफफफफफफफफफफफफफफफफ्फ़, नाभि के छेद मे उंगली की छुवन का एहसास होते ही स्वामी जी का निचला अंग जो कि अभी तक सोया था वो नींद मे ही करवट बदलने लगा. और इस करवट बदलने मे उनकी धोती हिलती हुई लगी जिसे कांता ने भी महसूस किया. अब कांता को भी इस अलग टाइप के हवन मे इंटेरेस्ट आने लगा था. स्वामीजी की नाभि मे टीका लगाने के बाद कांता उठ गयी.

अब स्वामी जी ने रोली वाली थाली उठा ली. और अब वो कांता से बोले:

स्वामी जी: कांता बेटी, अब तुम बैठ जाओ अब लगाने की मेरी बारी है (और कांता की ओर देखकर मुस्करा दिए. प्रत्युत्तर मे कांता मौन ही रही)अब स्वामी जी ने अपनी उंगलिओ मे रोली लगाई और कुछ मन्त्र बुदबुदाने के साथ ही कांता के माथे पर टीका लगा दिया. माथे पर टीका लगाने के बाद स्वाजी ने कांता से आपनी बाँह उपर उठाने के लिए कहा.

कांता ने जैसे ही अपनी बाह उठाई कांता का पल्लू सरक कर उसकी बाह पर आ गया, जिस से उसकी बाह ढक गयी. ये देख स्वामी जी बोले:

स्वामी जी: बेटी, अगर बुरा ना मानो तो एक आग्रह है?

कांता: जी स्वामी जी, आप आग्या दीजिए.

स्वामी जी: बेटी ये साड़ी बार बार परेशान कर रही है. यदि तुम्हे कोई ऐतराज ना हो तो क्या तुम इसे निकाल सकती हो,, वैसे भी हम भगवान की पूजा कर रहे है इसमे किसी प्रकार की झिझक नही होनी चाहिए, अगर तुम्हे आपत्ति ना हो तो ये साड़ी उतार दो.

स्वामी जी की ये बात सुन ने के बाद कांता ने एक पल के लिए कुछ सोचा. फिर वो खड़ी हो गयी. लेकिन फिर उसने एक सवालिया नज़रों से स्वामी जी को देखा.. मानो वो कह रही हो कि आपके सामने कैसे मैं साड़ी उतारू?

स्वामी जी उसके मनोभाव को समझ गये और बोले:

स्वामी जी: अरे बेटी,. मैं तो वैसे भी एक संत आदमी हूँ. मेरे लिए स्त्री का शरीर कोई मायने नही रखता. और मैं वैसे भी तुम्हारे पिताजी की उम्र का हूँ. एक बात और हम दोनो यहाँ भगवान की पूजा कर रहे हैं. हम दोनो बिल्कुल पवित्र है और शुद्ध और वासना से परे है.

ये स्तिथि तुम्हारी झिझक हवन मे रुकावट का काम कर रही है.

 


कांता: (स्वामी जी तरफ देखार अपनी नज़रें नीचे कर लेती है और फिर अपनी साड़ी अपने हाथ से नीचे गिरा देती है. उसका आँचल गिरते ही कांता के दोनो पपीते अपनी नोक उठाए स्वामी जी को घूर्ने लगते है)

स्वामी जी अपनी नज़रों से उन दोनो पपीतों के आकार को नापते है, जो उनकी नज़रों मे भी नही समा पा रहे थे. फिर स्वामी कांता के पीछे आ गये और कांता से बोले:

स्वामी जी: बेटी अपने हाथ थोड़ा सा उठाओ ताकि मैं तुम्हारे हाथों पर ये पवित्र टीका लगा सकूँ (कांता ने अपने दोनो हाथों को हवा मे 45 डिग्री के कोण तक उठा दिया. अब स्वामी जी अपने दोनो हाथों मे अच्छी तरह रोली लगाकर कंधे के कोहनी के ऊपर वाले गुदाज बाँह पर दोनो हाथों मे एक साथ रोली लगाने लगे. रोली क्या लगा रहे थे वो धीरे धीरे अपनी हथेलिओ से उसकी बाँह को सहला रहे थे.

कांता के ठीक पीछे खड़े होने के कारण कांता की बड़ी बड़ी गान्ड उनके औजार से थोड़ी ही दूर पर थी, कांता का ब्लाउज पीछे की तरफ से ऐसा था जिसमे से उसकी चिकनी पीठ पूरी तरह नंगी थी. कोई 2 मिनट तक कांता के हाथ को सहलाने के बाद स्वामी जी ने अपने हाथों की उंगलिओ को फिर से रोली मे भिगोया और कांता को अपने दोनो हाथों को नीचे करने के लिया कहा,

जैसे ही कांता ने हाथ नीचे किया स्वामी जी ने कांता से कहा:

स्वामी जी: बेटी अब मैं अपनी आँख बंद कर रहा हूँ और कुछ मंत्र बोल रहा हूँ जैसे ही ये मंत्र ख़तम हो तुम मेरी उंगली को अपनी नाभि की पर रख देना, और मैं तुम्हारी नाभि पर टीका लगा दूँगा, क्योकि ये विधि आँख खोल के नही की जाती है.

कांता : जी स्वामी जी

दरअसल कांता को भी अपने इस स्पेशल हवन मे मज़ा आ रहा था. ताभी स्वामी जी ने आपनी आँखे बंद की और कुछ मंत्र बुदबुदाने लगाए. क्योकि उनका मुँह कांता के सिर के पास था इसलिए वो उनकी साँस की उष्मा को अपनी गर्दन पे महसूस कर रही थी. उस समय स्वामी जी की साँस भाप की तरह निकल रही थी.

 
स्वामी जी: बेटी अब मैं अपनी आँख बंद कर रहा हूँ और कुछ मंत्र बोल रहा हूँ जैसे ही ये मंत्र ख़तम हो तुम मेरी उंगली को अपनी नाभि की पर रख देना, और मैं तुम्हारी नाभि पर टीका लगा दूँगा, क्योकि ये विधि आँख खोल के नही की जाती है.

कांता : जी स्वामी जी

दरअसल कांता को भी अपने इस स्पेशल हवन मे मज़ा आ रहा था. ताभी स्वामी जी ने आपनी आँखे बंद की और कुछ मंत्र बुदबुदाने लगाए. क्योकि उनका मुँह कांता के सिर के पास था इसलिए वो उनकी साँस की उष्मा को अपनी गर्दन पे महसूस कर रही थी. उस समय स्वामी जी की साँस भाप की तरह निकल रही थी.

कुछ देर बाद स्वामी जी ने मंत्र पढ़ना बंद कर दिया. अब कांता समझ गयी कि उनके हाथ को अपनी नाभि की ओर ले जाया जाए. कांता ने स्वामी जी की कलाई पकड़ी और उसे अपनी नाभि के ऊपर पर रख दिया. कांता स्वामी जी की चालाकी को समझ रही थी और मन ही मन उनकी अकल को दाद दे रही थी कि क्या इंसान है. कैसे मेरी नाभि पर अपने हाथ मेरे हाथ से रखवा लिया. नाभि पर हाथ रखने के बाद कांता ने स्वामी जी की कलाई छोड़ दी. तब स्वामी जी ने कहा:

स्वामी जी: अरे बेटी मेरी उंगली को अपनी नाभि के छेद पर रखो या तुम्हारा छेद मैं खुद ही ढूँढ लूँ.

अब कांता को भी इन द्विअर्थि शब्दो मे बड़ा माजा आने लगा था. तब कांता ने हिम्मत कर के कहा:

कांता: स्वामी जी. अब छेद तो खुद ही ढूंडना पड़ेगा ना, अगर आपको अपनी उंगली डालनी है तो.

स्वामी जी: ठीक है बेटी , तुम कहती हो तो मैं खुद ही तुम्हारा छेद ढूँढ लेता हूँ.

और ये कह कर अपनी पूरी हथेली को कांता के पेट पर फैला दिया और धीरे धीरे उसके पेट को सहलाने लगे. स्वामी जी कांता के पेट पर अपनी दोनो हथेलिओ को घुमा रहे थे और उसके सपाट चिकने पेट को मज़े के साथ सहला रहे थे. स्वामी जी अब कांता से बिल्कुल चिपक के खड़े थे, कांता की गान्ड की छुअन उनके हथियार पर पड़ रही थी.

जब दो मिनट तक स्वामी जी कांता के पेट को सहलाते रहे तो कांता ने उन्हें छेड़ते हुए कहा.

कांता: क्या हुआ स्वामी जी आपको तो मेरा छेद ही नही मिल पा रहा है तो उसमे आप अपनी उंगली कैसे डालेंगे.

स्वामी जी कांता का लाजवाब प्रश्न सुनकर निरुत्त्तर हो गये और अगले ही पल उन्होने अपनी उंगली को नाभि के छेद पर रख दिया और बोले:

स्वामी जी: अरे भाइईईईईईई अगर किसी सपाट चिकने मैदान पर एक छोटा से छेद ढूँढना पड़ेगा तो पूरे मैदान का जायज़ा लेना पड़ता है. ना ,,

(ये कह कर उन्होने धीरे से अपनी उंगली कांता की नाभि मे घुसाने का प्रयास किया.

लेकिन स्वामी जी की उंगली मूडी होने के कारण उसमे नही घुस सकी तो स्वामी जी ने दोबारा प्रयास करते हुए कहा:

स्वामी जी:..बेटी छेद बहुत छोटा है और मेरी उंगली मोटी है इसलिए तुम्हारे छेद मे आराम से नही घुस पा रही है. थोड़ा सा ज़ोर लगाना पड़ेगा घुसाने के लिए. मैं डर रहा था कि कही तुम्हे दर्द ना हो जाए.

स्वामी जी की इस डबल मीनिंग बातों ने कांता को एक मीठे से नशे से भर दिया था. अब धीरे धीरे वो भी खुल रही थी.

कांता: छेद जितना ज़्यादा टाइट होता है घुसाने वाले को उतना ही मज़ा आता है. लेकिन टाइट छेद मे हर कोई नही घुसा पाता है. क्योकि उस मे काफ़ी ज़ोर लगता है. शायद आप से टाइट छेद मे नही घुस पाता होगा अब.

कांता के ये शब्द स्वामी जी के लिए हरी झंडी थी जिसने स्वामी जी को आस्वस्त कर दिया कि अब इस हवन मे आगे कोई रुकावट नही आने वाली है.

कांता भी इसके लिए धीरे धीरे तैयार हो रही थी. कांता के ये शब्द सुनने के बाद स्वामी जी ने कांता पर अपनी पकड़ को और मजबूत करते हुए अपनी उंगली का दबाव उसकी नाभि पर बढ़ा दिया जिससे उनकी उंगली कांता की नाभि मे घुस गयी, और स्वामी जी ने घमंड भरे स्वर मे कांता से पूछा..

स्वामी जी: क्यों बेटी कांता आआ गया ना अंदार्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्ररर..

कांता: (स्वामी जी की बातों का मतलब समझ रही थी, हल्की सी मुस्कान के साथ बोली) ह्ह्ह्ह्ह्हा स्वामी जी आँखिर आप ने डालल्ल्ल्ल्ल ही दिया.

स्वामी जी: दर्द तो नही हुआ ना बेटी ,

कांता: दर्द तो हुआअ पर हवन के लिए तो दर्द सहना ही पड़ेगा.

स्वामी जी: हां बेटी बिल्कुल सही कह रही हो, एक बात कहूँ बेटी अगर बुरा ना मानो तो स्वामी जी ने अपनी उंगली कांता की नाभि मे घुमाते हुए कहा (स्वामी जी ने यूँ ही उसकी राई मान ली)

कांता: हां स्वामी जी कहिए ना क्या कह रहे है,

स्वामी जी: तुम्हारी सूंड़ी (नाभि) तो बहुत उँधी (गहरी है)

कांता: गहराई मे ही तो मज़ा है स्वामी जी,. तभी तो मैं भी इस हवन की गहराई मे जा रही हूँ.

फिर कोई दो मिनट तक स्वामी जी ने उसकी नाभि मे अपनी उंगली को आगे पीछे करते रहे. फिर उन्होने कांता को छोड़ दिया और अपने स्थान पर बैठते हुए कांता को अभी अपने स्थान पर बैठने के लिए बोले. स्वामी जी ने अपने हाथ मे कुछ जल लिया और मंत्र पढ़ कर उसे उस हाल मे चारो तरफ फेंक दिया.

और फिर कांत से बोले:

स्वामी जी: बेटी अब हम पार्वती की पूजा करेंगे, क्यो कि शंकर भगवान सबसे ज़्यादा प्रेम पार्वती से ही करते है.

ये कहकर स्वामी ने कुछ चावल (अक्षत) लेकर कांता के दोनो हाथो मे रख दिए, और कुछ मंत्र पढ़ते हुए उन्होने उसके हाथो पर कुछ जल छिड़का. और फिर कुछ और मंत्र बुद्बुदाये. फिर वहाँ रखे फलो मे से एक केला निकाला और उसे कांता के हाथ मे रख दिया. कुछ देर और मंत्र बोलने के बाद उन्होने उसे सामने रखी हुई वेदी पर रखने का इशारा किया. तत्पश्चात उन्होने कुछ जल लेकर कांता को अपना हाथ सॉफ करने के लिए कहा .

फिर स्वामी जी कांता की ओर देखते हुए बोले :

स्वामी जी: पार्वती की पूजा तो हो गयी है अब हम शिवलिंग की पूजा करेंगे. ये कह कर स्वामी जी ने वहाँ पड़ी पूजा की सामग्री के बीच पड़ी हुई एक पोटली को निकाला और उसमे लगी गाँठ खोलने लगे. जैस ही गाँठ खुली उस से एक विचित्र किस्म का पत्थर जो कि शिवलिंग जैसा भी लग रहा था, उसे वेदी के पास रख दिया. कांता ने उस वस्तु को ध्यान से देखा. कांता ने पाया कि ये कुछ इस प्रकार का था जिसे दो तरह से देखा जा सकता था. एक तरह तो वो शिवलिंग लंग रहा था लेकिन उसकी लंबाई ज़यादा होने के कारण वो शिव का लिंग जैसा प्रतीत हो रहा था. स्वामी जी ने उसपर कुछ जल छिड़का और उसे अपने हाथो से ढोने लगे. फिर उन्होने कांता को इशारे से इसे धोने के लिए कहा. कांता उस शिव लिंग पर अपना हाथ रखी और उसे धोने लगी, वो शिव लिंग कोई 3" मोटा और कोई 10" लंबा था. कांता जब इस शिव लिंग को पकड़ कर उपर नीचे धो रही थी तो उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके हाथो मे शिव लिंग नही शिव का लिंग हो. इस बात का एहसास होते ही कांता के गालो पर हल्की लाली छा गयी.

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स्वामी जी कांता के चेहरे के भावों को देख कर समझ गये कि कांता के मन मे कौन सी बात आ रही है. स्वामी जी ने जिस तरह से कांता को सिड्यूस किया था उस से कांता भी उनके दिमाग़ की कायल हो गयी थी. स्वामी जी किसी उतावलेपन मे मज़ा खराब नही करना चाहते थे. वो पहले कांता के पूरे शरीर को आनंदित करना चाहते थे. फिर धीरे धीरे उसके दिमाग़ पर सेक्स का जाल बिच्छाना चाहते थे. और वो इस मे कामयाब भी हो रहे थे. स्वामी जी ने कांता के मनोभाव को भाँप कर कांता से कहा:

स्वामी जी: कांता बेटी..... तुम क्या सोच रही हो.......... ये शिव लिंग है. भगवान शिव को सुंदर औरतें बहुत पसंद है इसलिए तो जो स्त्री या लड़की भगवान शिव की आराधना करती हो वो शिव लिंग को ही पूजती है. तुम्हारा इस शिव लिंग का स्पर्श करना अर्थात शिव को स्पर्श करना है. इसलिए इस ये समझ लो कि तुम शिव लिंग को नही साक्षात शिव भगवान की पूजा कर रही हो. भगवान शॅंकर बड़े ही भोले होते है, लेकिन क्रोध भी बहुत जल्दी करते है. इसलिए कभी भी शिव लिंग का अपमान मत करना. इस से तुम पर भगवान शिव का प्रकोप बरसेगा. समझी बेटी ..........

कांता: जी स्वामी जी

अब स्वामी जी ने कांता को एक सफेद कपड़े का टुकड़ा दिया और कहा इससे शिव लिंग को पोन्छ दो.

कांता ने वैसे ही किया,

फिर शिव लिंग को स्वामी जी ने वही वेदी के पास स्थापित कर दिया और कुछ मंत्रो का उच्चारण करने लगे

मंत्रो का उच्चारण करते हुए स्वामी जी ने कुछ पुष्प अपने हाथो मे लिए और उसे कांता की तरफ बढ़ाते उसे शिव लिंग पर अर्पित करने के लिए कहा. कुछ और मंत्रो का उच्चारण करने के बाद स्वामी जी ने वहाँ रखे फलो मे से संतरा उठाया और उसे कांता के दोनो हाथो मे रख कर उसे भी शिव लिंग पर अर्पित करने के लिए कहा.

कांता ने उसे भी शिव लिंग के सामने रख दिया. तत्पश्चात स्वामी जी ने दीपक को जलाया और उसे भी भगवान को समर्पित कर दिया. स्वामी जी ये सब कार्य ऐसे कर रहे थे कि एक बार तो कांता को भी ऐसा लगने लगा कि स्वामी जी का उसके प्रति कोई ग़लत विचार नही है. स्वामी जी पूरी तल्लिनता के साथ पूजन के मंत्रो का उच्चारण कर रहे थे. लगभग 5 मिनिट के बाद स्वामी जी ने मंत्रो का उच्चारण बंद किया अपने सिर को भूमि पर शिवलिंग के पास टिका कर उन्हे प्रणाम करने लगे. कोई 2 मिनिट तक स्वामी जी उसी अवस्था मे आगे की ओर अपनी आँखे बंद किए हुए झुके रहे जैसे वो भगवान से कोई बहुत बड़ी विनती कर रहे हो. उसके बाद स्वामी जी अपने स्थान से उठ खड़े हुए. और कांता को अपनी तरफ आने का इशारा करते हुए बोले:

स्वामी जी: बेटी ............ इस तरफ आ जाओ

(जब कांता अपने स्थान उस उठ कर स्वामी जी के स्थान पर चली गयी तो स्वामी जी ने कांता से कहा) अब जैंसे मैने भगवान से विनती की है उसी प्रकार तुम भगवान के सामने हाथ जोड़कर विनती करो कि वो तुम्हे तुम्हारे कार्य मे सफलता प्रदान करे. तुम्हे इस लायक बनाए कि तुम अपने बिज़्नेस को ठीक तरह से संभाल सको.

कांता: जी स्वामी जी (इतना कहकर कांता ने अपनी आखे बंद की और फिर शिवलिंग के सामने अपने सिर को झुका लिया. इस समय कांता के जिस्म पर उसका ब्लाउस और पेटिकोट ही था. कांता के झुके हुए होने के कारण उसके दोनो कूल्हे हवा मे थे. और उसका पेटिकोट बिल्कुल टाइट होकर उसके पिच्छवाड़े से चिपक गया था जिस कारण कांता की पैंटी उसके विशाल चुतड़ों पर अपना निशान बना रहे थे. उसकी पेंटी उसके विशाल कुल्हो को ढक नही पा रही थी. पेटिकोट के उपर से ही कांता की पेंटी की धारियो को ये अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि उसकी पेटीकोत के नीचे छिपा हुआ माल कितना बड़ा और विशाल है.

स्वामी जी कांता की गान्ड को और घूर रहे थे जैसे कोई भूखा कुत्ता किसी माँस के लोतड़े को घूर रहा हो. पर स्वामी जी और कुत्ते मे ये फ़र्क था कि स्वामी जी सब्र का फल बहुत मीठा होता है ये बात वो समझते थे.
 
स्वामी जी कांता की गान्ड को और घूर रहे थे जैसे कोई भूखा कुत्ता किसी माँस के लोतड़े को घूर रहा हो. पर स्वामी जी और कुत्ते मे ये फ़र्क था कि स्वामी जी सब्र का फल बहुत मीठा होता है ये बात वो समझते थे.

कोई 2 मिनट इसी अवस्था मे अपनी गान्ड का स्वामी जी को दर्शन कराने की बाद कांता उठ खड़ी हुई. कांता जैसे ही खड़ी हुई उसके दोनो कूल्हे जो कि झुकने की वजह से दोनो तरफ फैल चुके थे आपस मे फिर एक बार चिपक गये और साथ साथ ही मे उसका पेटिकोट भी उसकी गान्ड की दरार मे घुस गया.

जिसे देखकर स्वामी जी मुस्करा दिए.

कांता ने अपने हाथ को पीछे लेजाकर अपनी गान्ड की दरार मे फसे हुए पेटिकोट को खीच कर बाहर निकाल दिया. ऐसा करते हुए स्वामी जी उसे बड़े ध्यान से देख रहे थे. अब स्वामी जी कांता से बोले:

स्वामी जी: बेटी शंकर की पूजा तो हो गयी है. अब हम इन्हे प्रसन्न करेंगे और यही हमारा हवन होगा. तुम जितनी तन्मयता से इन्हे प्रसन्न करोगी तुम्हारा हवन उतना ही सफल होगा.

कांता: स्वामी जी हम अपनी तरफ से कोई भी कमी नही रहने देंगे.

स्वामी जी: शाबाश बेटी......... भगवान तुमसे ज़रूर प्रसन्न होंगे. बेटी हम ने पूजा तो कर ली है इसलिए हम अब प्रसाद ग्रहण कर सकते है. इस हवन मे प्रसाद ग्रहण करने की अनुमति है.

ये कहकर स्वामी जी ने वहाँ रखे हुए फल मे से एक केला उठाया और उसे कांता की ओर बढ़ा दिया. उस केले का साइज़ कुछ ज़्यादा ही बड़ा और मोटा था.

कांता ने देखा कि स्वामी जी खुद कुछ नही ले रहे तो उसने स्वामी जी से कहा:

कांता: स्वामी जी आप भी तो कुछ लीजिए

स्वामी जी: अरे तुम दोगी तभी तो लूँगा ना .

कांता: (केले उठाकर उनकी ओर बढ़ाती हुई बोली) ये लीजिए स्वामी जी

स्वामी जी: नही बेटी नही........... केला तो तुम्हारे लिए है. मुझे तो संतरे पसंद है. ख़ास तौर से बड़े संतरे. क्योकि उनमे रस ज़यादा होता है. तुम्हे केले पसद है कि नही बेटी .

कांता समझ गयी कि स्वामी जी कौन से केलो की बात कर रहे है. कांता स्वामी जी की डबल मीनिंग बातो का मज़ा लेती हुई बोली.

कांता: मुझे तो केले बहुत पसंद है............ ख़ास तौर से मोटे और लंबे केले:

स्वामी जी: अरे बेटी अभी तुमने मेरे यहाँ के केले देखे ही कहाँ है.... वक़्त मिला तो मैं तुम्हे इस से बड़ा केला भी दिखाउन्गा . और अगर तुम चाहोगी तो मैं तुम्हे खिलाउन्गा भी.

कांता मन ही मन बहुत मस्त हो रही थी स्वामी जी की बातो से. वो जानती थी कि स्वामी जी कौन से स्पेशल केले की बात कर रहे है. कांता को अपने हाथ मे लिया हुआ केला भी एक लंड के जैसे ही लगने लगा.

 


कांता ने केले को छीलने के बाद उस केले को काटने की बजाए मूह मे ऐसे लिया जैसे वो कोई कुलफी चूस रही हो. केला उसके मूह मे आते जाते ऐसा लग रहा था जैसे वो केला ना हो कोई लंड हो. उधर स्वामी जी भी संतरे को छील कर खाने की बजाए उसके उपर से छिलके को थोडा सा हटा कर उसे चूस रहे थे. स्वामी जी को वो संतरा इस वक़्त संतरा नही बल्कि कोई गुदाज स्तन प्रतीत रहा था.

स्वामी जी: (कांता की तरफ देखते हुए) बेटी तुम इस केले को चूस क्यो रही हो? काट के क्यो नही खा रही हो.

कांता: स्वामी जी जो मज़ा केले को चूस्कर रस निकालने मे आता है वो खाने मे कहाँ है.

(स्वामी जी कांता के इस उत्तर से मन ही मन बेहद खुश हुए)

कांता: आप इस संतरे को इस तरह क्यो खा रहे है?

स्वामी जी: मुझे संतरा को दबा दबा कर उसका रस चूसने मे बड़ा आनद आता है.

स्वामी जी की ये बात सुनकर कांता और मस्ती से केले को चूसने लगी.

स्वामी जी ने देखा कि कांता पूरा पूरा केला अपने मूह के अंदर आराम से ले रही थी.

स्वामी जी: बेटी तुम तो पूरा मूह मे डालकर चुस्ती हो... लगता है कि तुमने खूब केले चूसे है?

कांता: (मस्त भरी आवाज़ मे) केले तो मैने बहुत चूसे है स्वाममजिइईईईईईईईईईईईईईईई मगर इतना मोटा और लंबा केला आज तक नही मिला.

स्वामी जी: इसका मतलब तुम्हे मोटे और लंबे केले खूब पसंद है.

कांता: हाँ स्वामी जी

स्वामी जी: ठीक है कांता थोड़ा सब्र रखो तुम्हे मैं इस से भी मोटा और लंबा केला चुसाउन्गा.

फिर स्वामी जी चुप हो गये और बड़ी ही तल्लीनता से संतरे को चूसने मे व्यस्त हो गये.

कांता ने भी अब उस केले को खाना शुरू कर दिया था. कुछ ही देर मे दोनो ने अपने अपने फलो को ख़तम कर दिया. उसके बाद स्वामी जी ने अपना हाथ धोया और वापस अपने आसान पर बैठ गये. कांता भी अपने हाथ सॉफ कर चुकी थी और बिछे हुए दूसरे गद्दे रुपी कंबल पर बैठ गयी. स्वामी जी उसकी ओर मुखातीब होकर बोले:

स्वामी जी: बेटी अब 5 मिनिट के बाद हम भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हवन चालू कर देंगे. तब तक तुम वहाँ से कुछ लकड़िया ले आओ मैं हवन कुंड को प्रज्ज्वल करने का प्रबंध करता हूँ.

ये सुनकर कांता बरामदे के बाहर की तरफ रखी हुई लकड़ियाँ लाने के लिए बाहर चली गयी. और जब लौटी तो उसके हाथ मे कुछ पतली पतली लकड़ी की टहनियाँ थी.

 
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