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कामिनी
मैं आप लोगों के सम्मुख एक कामुक स्त्री कामिनी की जीवन गाथा प्रस्तुत करने जा रही हूं।
यह एक ५५ वर्षीय कामुक विधवा की जीवन गाथा है। नाम है कामिनी देवी, एक प्राईवेट फर्म में उप प्रबंधक। चेहरे मोहरे और अपने सुगठित शरीर के कारण वह आज भी ३५ से ४० की लगती है। लंबा कद ५' ७", रंग गेहुंआ, चेहरा लंबोतरा, पतले रसीले गुलाबी होंठ, नशीली आंखें, घने काले कमर से कुछ ऊपर तक खुले बलखाते रेशमी बाल और ३८", ३०", ४०" नाप के अति उत्तेजक खूबसूरत काया की स्वामिनी। देखने वालों की नजरें उसकी कमनीय काया से शरीर से चिपक कर रह जाती, ऐसी है कामिनी। खुले बांहों वाले लो कट ब्लाऊज उसके उबल पड़ते बड़े बड़े उरोजों को बमुश्किल संभाले हुए से लगते हैं। छोटी इतनी कि उरोजों से नीचे करीब पूरा ही दर्शनीय पेट लोगों की नजरों को अनचाहे ही चिपकने को मजबूर करती हैं, उस पर नाभी से करीब दो इंच नीचे बंधी साड़ी तो पूरा आमंत्रण ही देती प्रतीत होती हैं। जब वह चलती तो उसके भारी नितंब कसी हुई तन से चिपकी साड़ी के कारण निहायत ही उत्तेजक अंदाज में थिरकते हैं। उसने अपने आप को सिर्फ आंखें सेंकने की चीज ही नहीं रहने दिया बल्कि कई पुरुषों की अंकशायिनी बन कर अपने कामोत्तेजक तन का स्वाद भी चखा चुकी है। उम्रदराज पुरुषों पर तो शुरु से ही वह खासी मेहरबान रही है। वैसे उसकी उदारता से थोड़ा बहुत प्रसाद चखने का सौभाग्य कुछ भाग्यशाली युवा लोगों को भी मिलता रहा। अपने यौवन का रस पान कराने में कामिनी नें कभी कोई कंजूसी नहीं बरती और वह भी बिना किसी भेद भाव के। इसके लिए जिम्मेदार है खुद उसका अपने तौर पर जीवन जीने का बिंदास तरीका। उसनें अपने जीवन के १७ वसंत पार करने के बाद न कभी किसी के हस्तक्षेप को अपने जीवन में पसंद किया है न ही किसी को इजाजत दी है। स्वतंत्र आजाद खयाल, खुद के बूते अपने पैरों पर खड़ी, अपने मन मरजी की मालकिन।
अपनी आकर्षक और मदमाती कामुक काया का उसने कई मौकों पर बड़ी होशियारी से इस्तेमाल भी किया और अपने कैरियर को संवारा। कैरियर में तरक्की के लिए कुछ कुरूप, बदशक्ल और बेढब बेडौल सीनियर्स की कुत्सित विकृत कामेच्छा की तृप्ती के लिए अपने तन को परोसने में भी कत्तई परहेज नहीं किया।
एक विधवा होने के बावजूद, उसका रहन सहन, पहनावा ओढ़ावा एक बिंदास स्त्री की भांति था। एक वर्ष तक ही तो विवाहिता की जिंदगी जी सकी थी कि एक सड़क हादसे में उनके पति का स्वर्गवास हो गया, जिसके लिए उसकी सास नें उसे ही अपशकुनी मान कर उस पर कहर ढाना शुरू कर दिया था। उसकी तेज तर्रार, बदमिजाज और बदजुबान सास के सामने उसके ससुर और दादा ससुर की एक नहीं चलती थी अत: वे भी अपनी शांति के लिए उसकी सास के किसी बात का विरोध नहीं करते थे हालांकि उनके मन में कामिनी के लिए सहानुभूति थी, मगर उनकी नपुंसक सहानुभूति उसके किस काम की? उसकी सास की तानें और प्रताड़ना जब अति होने लगी तब उसे विद्रोह करने पर मजबूर होना पड़ा और ससुराल से अलग होकर हमेशा के लिएअपने नाना के घर आ गई, जहां उसके नानाजी नें बड़े प्यार से स्वागत किया। उसके अपने माता पिता का घर तो वह कब का छोड़ चुकी थी। १७ साल की उमर से वह नानाजी के यहां ही रह रही थी जहां उसनें पढ़ाई लिखाई पूरी की और वहीं से नानाजी नें उसकी शादी एक सरकारी दफ्तर के क्लर्क से कर दी थी। विधवा होने के बावजूद नानाजी नें उसे न सिर्फ खुशी खुशी अपनाया बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने में भरपूर सहायता भी की। आज वह एक सफल प्रबंधक के पद पर अपनी जिम्मेदारी को बखूबी अंजाम दे रही है।
परिस्थितियों की मारी और उसके जीवन के कई अच्छी बुरी घटनाओं से दो चार होती हुई आज वो इस मुकाम पर खड़ी थी।
अब मैं इससे आगे की कहानी कामिनी के आत्मकथा के रूप में लिखना चाहूंगी अन्यथा मैं कामिनी के भावनाओं और उसके जीवन में हुए अच्छे बुरे घटनाक्रम को, जिन कारणों से आज वह इस मोड़ पर अपने आप को खड़ी पा रही है, असरदार रूप में व्यक्त नहीं कर पाऊंगी।
हां तो मेरे प्रिय पाठकों, मैं कामिनी अब अपने जीवन के उन घटनाओं से आपको रूबरू कराऊंगी जिन के परिणाम स्वरूप आज मैं इस मोड़ पर खड़ी हूं। दरअसल यह कहानी शुरू होती है मेरे पैदा होने के पहले से। मेरे पैदा होने से पहले ही मेरे माता पिता, जो कहने को तो थे पढ़े लिखे और साधन संपन्न, मगर थे दकियानूसी खयालात के, पता चल गया था कि मैं कन्या हूं। उन्हें तो पुत्र रत्न की चाह थी, अत: गर्भपात कराने का हरसंभव उपाय किया गया, मगर मैं ठहरी एक नंबर की ढीठ। सारी कोशिशों के बावजूद एकदम स्वस्थ और शायद उन गर्भपात हेतु दी गई दवाओं का विपरीत असर था कि मैं रोग निरोधक क्षमताओं से लैस पूर्णतय: निरोग व आवश्यकता से कुछ अधिक ही स्वस्थ पैदा हुई। लेकिन चूंकि मैं अपने माता पिता की अवांछित संतान थी, मुझे बचपन से उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। फिर हमारे परिवार में मेरे पैदा होने के २ साल बाद एक बालक का आगमन हुआ और मेरे माता पिता तो लगभग भूल ही गए कि उनकी एक पुत्री भी है। पुत्र रत्न की प्राप्ति से घर में उत्सव का माहौल बन गया। बधाईयों का तांता लग गया और उस माहौल में मैंने खुद को बिल्कुल अकेली, अलग थलग और उपेक्षित पाया।
समय बीतता गया और मैंने अपने आप को विपरीत परिस्थितियों के बावजूद और मजबूत बनाना शुरू कर दिया। मेरे अंदर के आक्रोश नें भी मेरे हौसले को और मजबूती प्रदान की। पढ़ाई में सदा अव्वल रही, खेल कूद में भी कई ट्रॉफियां और उपलब्धियां हासिल की। स्कूल में कुंगफू कराटे की चैंपियन रही। लेकिन मेरे घर वालों नें बधाई देना तो दूर मेरी तमाम उपलब्धियों की ओर कोई तवज्जो तक नहीं दी। इस के विपरीत मेरा भाई, मां बाप के अत्यधिक लाड़ प्यार से बिगड़ता चला गया। आवारा लड़कों की सोहबत में पड़ कर पढ़ाई लिखाई में फिसड्डी रह गया मगर माता पिता उसकी हर गलतियों को नजरअंदाज करते गये, नतीजतन वह बिल्कुल आवारा निखट्टू और मां बाप का बिगड़ैल कपूत बन कर रह गया।
मैंने एक तरह से अपने परिवार के मामलों से अपने आप को अलग कर लिया और अपने तौर पर जीना शुरू कर दिया।
मैंने जिन्दगी के १६ वसंत पार कर लिया और +२ में दाखिला लिया। मेरे अंदर छुपे आक्रोश नें मुझे सदा मेहनत करने और आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया। इसी दौरान मेरे साथ एक ऐसी घटना घटी जिसने मेरे जीवन को एक नयी ही दिशा दे दी। एक नये, निहायत ही नये और अभूतपूर्व आनंददायक अनुभव से रूबरू कराया। उस घटना नें मेरी जिन्दगी में एक नया अध्याय खोल दिया। अपनी उपेक्षा का दंश झेलते झेलते मैं आजिज आ चुकी थी, मगर उस घटना के बाद मैंने जिल्लत भरी जिन्दगी में खुशी पाने की राह ढूंढ़ ली, भले ही समाज उसे गलत नजर से देखे मेरे ठेंगे से। आज तक मैंने जो उपेक्षा का दर्द झेला है उससे कई गुना ज्यादा खुशी प्राप्त करने का मार्ग मिल गया और संतोष भी। इससे मेरे अंदर का आक्रोश भी काफी हद तक शांत होता चला गया।
जून का महीना था। हमारी गरमियों की छुट्टियां चल रह थीं। हमारे पड़ोस में चाचाजी के यहां मेरी चचेरी बहन का विवाह था। गांव से काफी सारे रिश्तेदार उसमें शरीक होने के लिए आए हुए थे। उनमें से कुछ लोग हमारे यहां भी ठहरे हुए थे। विवाह के दिन सारे घरवाले मुझे घर में अकेली छोड़ शादी वाले घर चले गए। वैसे भी मुझे इन सब समारोहों में जाने में कोई रुचि नहीं रही थी, क्योंकि लोगों के सामने घर वालों की उपेक्षा का पात्र बनना अब मुझे बहुत बुरा लगता था।
संध्या का समय था,, करीब ६:३० बज रहे थे। सड़क के किनारे की बत्तियां जल चुकी थीं। मैं अपने घर के छत पे अकेली खड़ी सड़क की ओर देख रही थी तभी मेरी नजर सड़क किनारे झाड़ी के पास एक कुतिया और ४ - ५ कुत्तों पर पड़ी। एक कुत्ता जो उनमें अधिक बड़ा और ताकतवर लग रहा था, कुतिया के पास आया और उसके पीछे सूंघने लगा। बाकी कुत्ते चुपचाप देख रहे थे। एक दो मिनट सूंघने के पश्चात वह कुत्ता उस कुतिया के पीछे से उसपर सवार हो गया। मेरी उत्सुकता बढ़ गई और मैं फौरन कमरे से दूरबीन ले आई और उसे फोकस किया और पूरी क्रिया को बिल्कुल सामने से पूरी तन्मयता के साथ अपने आस पास से बेखबर देख रही थी। मैं देख रही थी कि कुत्ते नें कुतिया के कमर को अपने अगले दोनों पैरों से जकड़ लिया था और अपने कमर को जुम्बिश देना शुरु किया। कुत्ते का लाल लाल लपलपाता नुकीला लिंग कुछ देर कुतिया के योनी छिद्र के प्रवेश द्वार के आसपास डोलता रह। फिर कुछ ही पलों में मैने कुत्ते के लिंग को कुतिया की योनी में प्रवेश होते देखा। अब कुत्ता पूरे जोश के साथ अपने कमर को मशीनी अंदाज में आगे पीछे कर रहा था। धक्कों की रफ्तार इतना तेज थी कि मैं अवाक हो कर देखती रह गई। इन सब क्रियाओं में मैंने देखा कि कुतिया नें बिल्कुल भी विरोध नहीं किया, ऐसा लग रहा था मानों यह सब कुतिया की रजामंदी से हो रहा हो और अपने साथ हो रहे इस क्रिया से काफी आनन्दित हो। करीब ५ - ६ मिनट के इस धुआंधार क्रिया के पश्चात वह कुत्ता कुतिया के पीछे से उतरा लेकिन यह क्या! कुत्ते का लिंग कुतिया की योनी से निकला ही नहीं, ऐसा लग रहा था मानो किसी अग्यात बंधन से बंध फंस चुका था। दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए खड़े हुए थे और अपनी पूरी लंबी जीभ बाहर निकाले हांफ रहे थे।
यह सब देखते हुए मेरे अंदर अजीब सी खलबली शुरु हो चुकी थी। मेरी पैंटी में मैंने गीलापन महसूस किया और सलवार का नाड़ा खोलकर हाथ लगा कर देखा तो यह सचमुच भीग चुकी थी। मैंने पैंटी के अंदर हाथ लगाया तो पाया कि मेरी योनी से लसीला चिकना तरल द्रव्य निकल कर पैंटी को गीला कर रहा था। छत के मुंडेर से मेरे गरदन से नीचे का हिस्सा छुपा हुआ था, अत: मैंने हौले से अपनी सलवार उतारी फिर पैंटी भी उतार डाली। अब मेरा निचला हिस्सा पूर्णतय: नग्न था। मैं गरम हो चुकी थी, पूर्णतय: उत्तेजित हो चुकी थी, उत्तेजना के मारे मेरे शरीर पर चींटियां सी रेंगने लगी और मेरा पूरा शरीर में तपने लगा। मेरे लिए यह सब बिल्कुल नया अहसास था। मेरे सीने के अर्धविकसित उभार बिल्कुल तन गये, मेरा दायां हाथ स्वत: ही मेरे उभारों को सहलाने लगे, मर्दन करने लगे और अनायास ही मेरा बांया हाथ मेरी योनी को स्वचालित रूप से स्पर्ष करने लगा, सहलाने लगा और शनै: शनै: उंगली से मेरे भगांकुर को रगड़ने लगा। यह सब करते हुए मैं अत्यंत आनंदित हो रही थी, दूसरी ही दुनिया में पहुंच गयी थी। मेरे अंदर पूरी तरह कामाग्नी की ज्वाला सुलग चुका थी और मैं काम वासना के वशीभूत थी, अपने आस पास की स्थिति से बेखबर दूसरी ही दुनिया में।
करीब ५ मिनट के योनी घर्षण से मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया और मेरा सारा शरीर थरथराने लगा, मेरी उंगली लसदार द्रव्य से सन गई और पूरे शरीर में एक तनाव पैदा हुआ और एक चरम आनंद की अनुभूति के साथ निढाल हो गई। मैं छत पर ही धम से बैठ गई। मुझे बाद में पता चला कि यह मेरा प्रथम स्खलन था।
कुछ देर मैं उसी अवस्था में पड़ी रही और फिर खड़ी हो कर दूरबीन संभाला और उन्हीं कुत्तों की ओर देखने लगी। करीब १५ मिनट बाद कुत्ते का लिंग कुतिया की योनी से बाहर आया, बाप रे बाप ! करीब ८" लंबा और ४" मोटा लाल लाल लपलपाता लिंग नीचे झूल रहा था और उससे टप टप रस टपक रहा था। इतना विशाल लिंग कुतिया नें पड़े आराम से अपनी छोटी सी योनी में समा लिया था। अब दूसरा कुत्ता उस पर चढ़ रहा था, उफ्फ्फ क्या दृश्य था, यह सब इतना उत्तेजक था कि मैं बयां नहीं कर पा रही हूं। दूसरे के बाद जब तीसरा चढ़ने लगा, कुतिया भागना चाहती थी किंतु तीसरे कुत्ते नें भी सफलता पूर्वक अपनी इच्छा पूर्ण की और फिर चौथे नें भी फटाफट उसके साथ वही क्रिया दुहराया। अपने लिंग के धुआंधार प्रहार से कुतिया को अपने लिंगपाश में बांध कर अपनी कामेच्छा शांत की। मैं बुत बनी उस काम क्रीड़ा का दीदार कर रही थी और उस दौरान मैं हस्तमैथुन द्वारा तीन बार स्खलित हुई। उस समय करीब ८ बज रह था।
मैं थरथराते पैरों पर किसी तरह खड़ी हुई कि अचानक मेरे नितंब पर किसी कठोर वस्तु के दबाव का अनुभव हुआ। हड़बड़ा कर ज्योंही मैं पीछे मुड़ी, मैं स्तब्ध रह गई। मेरे पीछे न जाने कब से मेरे दादाजी की उमर के करीब ६५ साल के, ६' लंबे तोंदियल काले कलूटे भैंस जैसे, गंजे, झुर्रीदार चेहरा, खैनी खा खा कर काले किए हुए अपने बड़े बड़े आड़े टेढ़े दांत दिखाते हुए मुंह खोल कर बड़े ही भद्दे तरीके से मुस्कुराते हुए ठीक मेरे करीब पीछे से सट कर खड़े थे और धोती कुर्ते में होने के बावजूद उनकी धोती सामने से तंबू का आकार लिए हुए थी। मैं इन्हें अपने दादाजी के साथ देख चुका थी। ये गांव से दादाजी के साथ ही शादी में शरीक होने आए थे। ये दादाजी के साथ हमारे ही घर में ठहरे हुए थे। जब से ये यहां आए थे किसी शिकारी की तरह उसकी कामलोलुप गिद्द नजरें मेरा सदैव पीछा करती रहती थी। आंखों ही आंखों में मानो मेरे वस्त्र हरण कर मेरी उभरती जवानी का दीदार कर रही हो। मैं नादान जरूर थी मगर इतनी भी नहीं कि किसी की गंदी नजर पढ़ न पाऊं। मैं उससे दूर ही दूर रहती थी।
मगर आज की बात कुछ और ही थी। यह बूढ़ा अपनी तबीयत खराब होने का बहाना बना कर घर पर ही रुका हुआ था किसी चालाक भेड़िए की तरह मेरा शिकार करने के लिए उपयुक्त मौके के इंतजार में और मैं इस बात से बेखबर अपने आप को अकेली समझने की भूल कर बैठी। यह तो स्पष्ट था कि मेरी सारी हरकतों को काफी समय से छुप कर देख रहा था। जैसे ही अपने मनोनुकूल स्थिति में मुझे देखा, मौका ताड़ कर मेरे करीब आया, इतने करीब कि उनकी धोती के अंदर से उसका तना हुआ कठोर लिंग मेरे गुदाज नितंब के दरार पर दस्तक दे रहा था। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सन्न खड़ी लाज से दोहरी हुई जा रही थी।
फिर ज्यों ही मैं होश में आई, अपने सलवार और पैंटी की ओर झपटी, किंतु उस खड़ूस बुड्ढे नें मुझे बाज की तरह दबोच लिया और बोला, " घबराव ना बबुनी, अब हम से शरमा के का फायदा। हम तोहरा सब कुछ देखली बानी और तू का का करम करत रहले सब कूछ। अईसे भी हमका पता है कि तोहरा मां बाबूजी तोहरा के पसंद ना करेला, मगर हम तोहरा के बहूत पसंद करीला रे बबुनी। तू तो बहुते सुंदरी है रे। तोहरा मां बाबूजी के तो मति मारी गई है जे ऐसन नीक लईकी के ना पसंद करे
हैं ।" कहते कहते उसका बनमानुस जैसा एक हाथ मेरे सीने के उभारों पर जादुई हरकत करने लगा और अपने कामुक स्पर्श से मुझे कमजोर करने लगा, दूसरे हाथ से वह मेरे कमर से नीचे के नाजुक अंगों को सहलाते हुए काम वासना के तारों को छेड़ने लगा। मेरी विरोध करने की कोशिश धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगी साथ ही मेरी इच्छा शक्ति भी। मैं कुछ देर उसकी गिरफ्त से छूटने की असफल कोशिश का ढोंग करती रही, ढोंग मैं इस लिए कह रही हूं क्योंकि मुझे भी अब यह सब आनंद प्रदान कर रहा था, वरना अगर मैं चाहती तो उस बुड्ढे की हड्डी पसली तोड़ सकती थी, जैसा कि मैं कुछ लफंगे लड़कों का कर चुका थी। कुछ देर पहले जो बूढ़ा कुरूप बदशक्ल और बेढब लग रहा था, अब उसकी ओछी और अश्लील हरकतें मुझे निहायत आनंददायक लगने लगीं। वह खेला खाया बदमाश बूढ़ा मेरी कामोत्तेजना को भड़का कर मुझे पगलाए जा रहा था, मदहोश कर रहा था और मैं नादान पगली उस कामलोलुप बूढ़े के हाथों हौले हौले समर्पित होती जा रही थी। मेरी अवस्था को भांप कर बुड्ढे की कंजी आंखों में चमक आ गई और गंदी सी मुस्कान उनके होंठों नाचने लगी। उस नें आहिस्ते से अपनी धोती ढीली कर दी, नतीजतन पलक झपकते धोती गिर कर धरती चूमने लगी और फिर मैं नें जीवन भर न भूल सकने वाला वो नजारा देखा कि क्या कहूं।
धोती के अंदर अंडरवियर था ही नहीं, सामने एक भयानक काला नाग फन उठाए सर हिला हिला कर मुझे सलामी दे रहा था। उस विकराल लिंग के चारों ओर लंबे लंबे घने सफेद बाल भरे हुए थे। बुड्ढे नें मेरा हाथ पकड़ कर उस डरावने लिंग पर रख दिया और बहुत ही कामुक अंदाज में मुझसे कहा, " ले बबुनी हमार लांड़ पकड़ के खेल, तोहरा के माजा आई", और मैं गनगना उठी। ७" लंबा और ३" मोटा लिंग मेरे हाथों में था, मेरे मुख से सिसकारी निकल पड़ी और मैं मदहोशी के आलम में उस बेलन जैसे जैसे लिंग पर बेसाख्ता हाथ फेरने लगी। कितना गर्म और सख्त।
इधर बूढ़ा मेरी कमीज उतार चुका था, ब्रा खोल चुका था और पूर्णतय: नग्न कर मेरे सीने के उभारों को सहला रहा था, दबा रहा था, मेरी चिकनी योनी में अाहिस्ता आहिस्ता उंगली चला रहा था, मैं पूरी तरह पगला गई थी। पूरी तरह उस बूढ़े के चंगुल में फंस चुकी थी। इस दौरान उन्होंने अपना कुर्ता बनियान भी उतार फेंका था। पूरा शरीर किसी बूढ़े रीछ की तरह सफेद बालों से भरा हुआ था। उन्हें देख कर बूढ़े बनमानुस का आभास हो रहा था।
अचानक बूढ़े नें एक उंगली मेरी योनी में घुसेड़ दी, मैं चिहुंक उठी। "आाााााह, अम्म्मााााा ये ? उंगली निकालिए ना आााााह" मेरे मुख से खोखली आवाज निकली, वस्तुत: मुझे दर्द कम मजा ज्यादा आया।
वह कमीना बूढ़ा किसी अनुभव शिकारी की तरह मुझे जाल में फांस चुका था और बड़े बेसब्रेपन से आनन फानन अब अंतिम प्रहार करने की तैयारी में जुट गया था। उन्होंने अब उंगली मेरी योनी के अंदर बाहर करना शुरू कर दिया, पहले हौले हौले, फिर धीरे धीरे जैसे जैसे मेरी योनी छिद्र का आकार बढ़ने लगा, उसकी उंगली की रफ्तार बढ़ने लगी।
"आााााह, ओोोोोोह उफ्फ्फ्फ आाााााह " मेरी योनी की संकीर्ण छिद्र के दीवारों पर उनके उंगली का घर्षण अद्भुत आनंद के समुंदर डूबने पर मजबूर कर रहा था, मैं मदहोशी के आलम में सिसकारियां भर रही थी। योनी मार्ग मेरी योनी से रिसते चिकने लसदार रस से सराबोर हो चुका था। वो कामलोलुप बूढ़ा अपने लार टपकते मुख से बोल रहा था, "बस बबुनी बस, अब तोहरा चिकन बुर में हमार लौड़ा ढुकावे का टैम आ गया, अब हम तोहरा बूर के अपन लांड़ से चोदब बबुनी"
मुझ नादान को तो मदहोशी के आलम में कुछ होश ही नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। पर जो कुछ भी हो रहा था, उफ्फ्फ्फ, बहुत अच्छा लग रहा था, मैं पूरी तरह से उस धूर्त बूढ़े के वश में आ चुकी थी पूर्णरुपेण समर्पित।
अब वो घड़ी आ चुकी थी, गर्म लोहे पर हथौड़े के अंतिम प्रहार का जिसके लिए वो बूढ़ा न जाने कितने जतन से जाल बिछाए बड़े सब्र से इंतजार कर रहा था।मेरा कौमार्य का भोग लगाने का। आनन फानन उस बूढ़े नें छत पर धोती बिछायी, उसी पूर्ण नग्नावस्था में मुझे चित्त लिटा कर मेरे पैरों को अलग किया और मेरी दोनों जंघाओं के बीच अपने आप को स्थापित किया, पहले से गीली मेरे योनी छिद्र के मुख पर अपने विकराल लिंग का सुपाड़ा टिकाया, मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
"ले बिटिया हमार लौड़ा तोहरा बुर में" कहते ही एक करारा धक्का मारा और मैं चीख पड़ी। "आााााााह " लेकिन वह बूढ़ा तैयार था, उसनें अपने गंदे होंठों से मेरे होंठ बंद कर दिया था। फच्चाक से मेरी गीली चिकनी योनी के संकीर्ण छिद्र को फैलाता हुआ या यों कहिए चीरता हुआ उस कमीने बूढ़े बनमानुष के लिंग का विशाल गोल अग्रभाग प्रविष्ट हो गया। "आााााह" असहनीय दर्द से मेरी आंखों में आंसु आ गए। चंद सेकेंड रुकने के बाद फिर एक धक्का मारा, "ओहहहह मााां मर गईईईई रेेेेेेेेे" बूढ़े नें अपना मुंह मेरे मुंह से हटा कर झट से एक हाथ से मेरा मुह बंद किया और बड़े ही अश्लील लहजे में बोला, "तू चुपचाप शांत रह बबुनी, हम तोके मरे ना देब, तू खाली हमार लौड़े का कमाल देख, अभी ई तोहरा बूर में आधा घूस गईले है। ले एक धक्का और, हुम, अब ई देख कुत्ता मजा आवेगा, हुम,"
"आाााहहहहह," मेरी चीख घुट कर रह गई।
एक और करारा ठाप मार दिया हरामी वहशी जानवर नें।
उफ मांं मेरी आंखें फटी की फटी रह गई।, सांस जैसे रुक सा गया, पूरा लिंग किसी खंजर की तरह मेरी योनी को ककड़ी की तरह चीरता हुआ जड़ तक समा गया था या यों कहिए कि घुप गया था। कुछ पल उसी अवस्था में रुका, मेरा कौमार्य तार तार हो चुका था। बूढ़े नें तो जैसे किला फतह कर लिया था, विजयी भाव से किसी भैंसे की तरह डकारता हुआ हौले से लिंग बाहर निकाला, मुझे पल भर थोड़ा सुकून की सांस लेने का मौका मिला मगर उस तोंदियल खड़ूस वहशी जानवर के मुंह में तो जैसे खून का स्वाद मिल गया था, खून से सना लिंग पूरी ताकत से दुबारा एक ही बार में भच्च से मेरी योनी के अंदर जड़ तक ठोंक दिया।
" देख रे बुरचोदी बिटिया, अब हम तोहरा के हमार लंड से पूरा मजा देब," बोलते बोलते फिर ठोका, अब ठोकने की रफ्तार धीरे धीरे बढ़ाता जा रहा था गंदी गंदी गाली निकाल रहा था,
"आह मेरी रंडी, ओह बुरचोदी, आज तोहरा बुर को भोंसड़ा बना देब,"
मेरे सीने को दबा रहा था, चीप रहा था, निचोड़ रहा था, चूस रहा था,
"चूतमरानी, कुत्ती",
और अब मुझे उसकी इन सब गालियों से, अश्लील हरकतों से, मजा आ रहा था और मुझे अत्यंत रोमांचित कर रहा था। मुझे दर्द की जगह जन्नत का अद्वितीय अनंद मिल रहा था, हर ठाप पर मस्ती से भरती जा रही थी। मैं भी अब बेशरमी पर उतर आई,
" आह बाबा, ओह राजा, आााााााा,हां हाहं, हाय राज्ज्जााााा, आााााह अम्म्मााााा,,,,,," पता नहीं और क्या क्या मेरे मुंह से अनाप शनाप निकल रहा था। मैं भी नीचे से चूतड़ उछाल उछाल कर बेसाख्ता ठाप का जवाब ठाप से देने लगी। नीचे से मेरी कमर चल रही थी, अपनी योनी उछाल रही थी।
मैं समझ गई कि इसे कहते हैं चुदाई और अब मुझे चुदाई का आनंद मिल रहा है। मर्द के लिंग को लंड, लौड़ा या लांड़ कहते हैं और स्त्री की योनी को चूत या बुर कहते हैं। अब मैं बुरचोदी बन गई थी, चूतमरानी बन गई थी,
" चोोोोोोोोोोोद राजाााााााा चोोोोोोोोद,"
मेरे मुंह से भी मस्ती भरी बातों निकल रही थी, मैं पगली की तरह अपने बुर में घपाघप लंड पेलवा रही थी और यह दौर करीब १५ मिनट तक चला कि अचानक मेरा पूरा बदर थरथराने लगा, उधर बूढ़ा भी पूरी रफ्तार और ताकत से मेरी चूत की धमाधम कुटाई किए जा रहा था कि अचानक हम दोनों नें एक दूसरे को कस कर इस तरह जकड़ लिया मानो एक दूसरे में समा ही के दम लेंगे और फिर वह अद्भुत आनंददायक पल, मुझे महसूस होने लगा कि मेरी चूत में गरमा गरम लावा गिर रहा है, मैं भी चरम अनंद में बुड्ढे से चिपक गई, हम दोनों मानो पूरी ताकत से एक दूसरे में आत्मसात हो जाने की जोर आजमाईश में गुत्थमगुत्था थे, छर्र छर्र छरछरा कर मेरा भी स्खलन होने लगा। यह स्थिति करीब १ मिनट तक रहा फिर बूढ़े का विशाल शरीर भी डकारता हुआ निढाल हो गया और इधर मैं भी चरम सुख में आंखें मूंदे निढाल पड़ गई।
"कैसा लगा बिटिया" बूढ़ा पूछ रहा था और मैं बेशरमों की तरह बोल पड़ी, "आाााह मस्त, मेरे प्यारे चोदू बुढ़ऊ " फिर मैं ने खुद ही शरमा कर उनके चौड़े चकले सीने में अपना चेहरा छुपा लिया। बूढ़ा अपनी विजय पर मुस्कुरा उठा और मुझे अपनी बांहों में समेट लिया।
" हमार मेहरारू के मरल दस साल बाद आज पहिला बार कौनो बूर चोदे के मिला बबुनी। इत्ता सुंदर टाईट बूर जिंदगी में पहली बार चोदली बबुनी। मजा आ गईल। तोके भी तो मजा आया ना?" मैं लाज से दोहरी होती हुई उनके चौड़े चकले सीने पर प्यार से सर पटकते हुए अपनी सहमति का प्रदर्शन किया। वह बूढ़ा मेरे इस अंदाज पर निहाल हो उठा।
घर वाले रात भर शादी में व्यस्त रहे और इधर रात भर में चुदक्कड़ बूढ़े नें अपने विशाल लंड से बार बार मुझे अलग अलग तरीके से अच्छी तरह से चोद चोद कर पिछले दस साल की कसर पूरी करने में मशगूल मुझे नादान लड़की से पूर्ण स्त्री और एक स्त्री से छिनाल बनाने पर तुला हुआ था और इस चक्कर में मेरी बूर को पावरोटी की तरह फुला दिया, मेरे सीने के उभारों का ऐसा मर्दन किया कि वह भी नींबू से संतरा बन गए। रात भर में तीन बार हमारे बीच वासना का नंगा तांडव होता रहा, चुदाई की भीषण धींगामुश्ती, रोमांच का अद्भुत सुखदाई खेल तब तक चलता रहा जब तक हम पूरी तरह खल्लास, थक कर चूर निढाल नहीं हो गए। एक ही रात में मैं क्या से क्या बन गई। फिर पूरी तरह उसी स्वर्गीय सुख से तृप्त निर्वस्त्र नंग धड़ंग एकदम जंगली बेशरमों की तरह एक दूसरे से लिपटे हम दोनों छत पर ही सो गए। मेरी दमकती चिकनी काया उस बूढ़े के भालू जैसे शरीर से किसी छिपकिली की तरह चिपकी हुई थी। कितनी बेहया हो गई थी मैं। मेरे अगल बगल मेरे कपड़े छितराए पड़े हुए मुझे मुंह चिढ़ा रहे थे। मेरे कौमार्य की धज्जियां उड़ाने वाले बूढ़े की धोती मेरे खून से लाल हो चुकी थी।
यह तो शुरुआत थी मेरी कामुक यात्रा की।
आगे की घटना अगली कड़ी में। कहानी कैसा लगा अवश्य लिखिएगा।
मैं आप लोगों के सम्मुख एक कामुक स्त्री कामिनी की जीवन गाथा प्रस्तुत करने जा रही हूं।
यह एक ५५ वर्षीय कामुक विधवा की जीवन गाथा है। नाम है कामिनी देवी, एक प्राईवेट फर्म में उप प्रबंधक। चेहरे मोहरे और अपने सुगठित शरीर के कारण वह आज भी ३५ से ४० की लगती है। लंबा कद ५' ७", रंग गेहुंआ, चेहरा लंबोतरा, पतले रसीले गुलाबी होंठ, नशीली आंखें, घने काले कमर से कुछ ऊपर तक खुले बलखाते रेशमी बाल और ३८", ३०", ४०" नाप के अति उत्तेजक खूबसूरत काया की स्वामिनी। देखने वालों की नजरें उसकी कमनीय काया से शरीर से चिपक कर रह जाती, ऐसी है कामिनी। खुले बांहों वाले लो कट ब्लाऊज उसके उबल पड़ते बड़े बड़े उरोजों को बमुश्किल संभाले हुए से लगते हैं। छोटी इतनी कि उरोजों से नीचे करीब पूरा ही दर्शनीय पेट लोगों की नजरों को अनचाहे ही चिपकने को मजबूर करती हैं, उस पर नाभी से करीब दो इंच नीचे बंधी साड़ी तो पूरा आमंत्रण ही देती प्रतीत होती हैं। जब वह चलती तो उसके भारी नितंब कसी हुई तन से चिपकी साड़ी के कारण निहायत ही उत्तेजक अंदाज में थिरकते हैं। उसने अपने आप को सिर्फ आंखें सेंकने की चीज ही नहीं रहने दिया बल्कि कई पुरुषों की अंकशायिनी बन कर अपने कामोत्तेजक तन का स्वाद भी चखा चुकी है। उम्रदराज पुरुषों पर तो शुरु से ही वह खासी मेहरबान रही है। वैसे उसकी उदारता से थोड़ा बहुत प्रसाद चखने का सौभाग्य कुछ भाग्यशाली युवा लोगों को भी मिलता रहा। अपने यौवन का रस पान कराने में कामिनी नें कभी कोई कंजूसी नहीं बरती और वह भी बिना किसी भेद भाव के। इसके लिए जिम्मेदार है खुद उसका अपने तौर पर जीवन जीने का बिंदास तरीका। उसनें अपने जीवन के १७ वसंत पार करने के बाद न कभी किसी के हस्तक्षेप को अपने जीवन में पसंद किया है न ही किसी को इजाजत दी है। स्वतंत्र आजाद खयाल, खुद के बूते अपने पैरों पर खड़ी, अपने मन मरजी की मालकिन।
अपनी आकर्षक और मदमाती कामुक काया का उसने कई मौकों पर बड़ी होशियारी से इस्तेमाल भी किया और अपने कैरियर को संवारा। कैरियर में तरक्की के लिए कुछ कुरूप, बदशक्ल और बेढब बेडौल सीनियर्स की कुत्सित विकृत कामेच्छा की तृप्ती के लिए अपने तन को परोसने में भी कत्तई परहेज नहीं किया।
एक विधवा होने के बावजूद, उसका रहन सहन, पहनावा ओढ़ावा एक बिंदास स्त्री की भांति था। एक वर्ष तक ही तो विवाहिता की जिंदगी जी सकी थी कि एक सड़क हादसे में उनके पति का स्वर्गवास हो गया, जिसके लिए उसकी सास नें उसे ही अपशकुनी मान कर उस पर कहर ढाना शुरू कर दिया था। उसकी तेज तर्रार, बदमिजाज और बदजुबान सास के सामने उसके ससुर और दादा ससुर की एक नहीं चलती थी अत: वे भी अपनी शांति के लिए उसकी सास के किसी बात का विरोध नहीं करते थे हालांकि उनके मन में कामिनी के लिए सहानुभूति थी, मगर उनकी नपुंसक सहानुभूति उसके किस काम की? उसकी सास की तानें और प्रताड़ना जब अति होने लगी तब उसे विद्रोह करने पर मजबूर होना पड़ा और ससुराल से अलग होकर हमेशा के लिएअपने नाना के घर आ गई, जहां उसके नानाजी नें बड़े प्यार से स्वागत किया। उसके अपने माता पिता का घर तो वह कब का छोड़ चुकी थी। १७ साल की उमर से वह नानाजी के यहां ही रह रही थी जहां उसनें पढ़ाई लिखाई पूरी की और वहीं से नानाजी नें उसकी शादी एक सरकारी दफ्तर के क्लर्क से कर दी थी। विधवा होने के बावजूद नानाजी नें उसे न सिर्फ खुशी खुशी अपनाया बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने में भरपूर सहायता भी की। आज वह एक सफल प्रबंधक के पद पर अपनी जिम्मेदारी को बखूबी अंजाम दे रही है।
परिस्थितियों की मारी और उसके जीवन के कई अच्छी बुरी घटनाओं से दो चार होती हुई आज वो इस मुकाम पर खड़ी थी।
अब मैं इससे आगे की कहानी कामिनी के आत्मकथा के रूप में लिखना चाहूंगी अन्यथा मैं कामिनी के भावनाओं और उसके जीवन में हुए अच्छे बुरे घटनाक्रम को, जिन कारणों से आज वह इस मोड़ पर अपने आप को खड़ी पा रही है, असरदार रूप में व्यक्त नहीं कर पाऊंगी।
हां तो मेरे प्रिय पाठकों, मैं कामिनी अब अपने जीवन के उन घटनाओं से आपको रूबरू कराऊंगी जिन के परिणाम स्वरूप आज मैं इस मोड़ पर खड़ी हूं। दरअसल यह कहानी शुरू होती है मेरे पैदा होने के पहले से। मेरे पैदा होने से पहले ही मेरे माता पिता, जो कहने को तो थे पढ़े लिखे और साधन संपन्न, मगर थे दकियानूसी खयालात के, पता चल गया था कि मैं कन्या हूं। उन्हें तो पुत्र रत्न की चाह थी, अत: गर्भपात कराने का हरसंभव उपाय किया गया, मगर मैं ठहरी एक नंबर की ढीठ। सारी कोशिशों के बावजूद एकदम स्वस्थ और शायद उन गर्भपात हेतु दी गई दवाओं का विपरीत असर था कि मैं रोग निरोधक क्षमताओं से लैस पूर्णतय: निरोग व आवश्यकता से कुछ अधिक ही स्वस्थ पैदा हुई। लेकिन चूंकि मैं अपने माता पिता की अवांछित संतान थी, मुझे बचपन से उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। फिर हमारे परिवार में मेरे पैदा होने के २ साल बाद एक बालक का आगमन हुआ और मेरे माता पिता तो लगभग भूल ही गए कि उनकी एक पुत्री भी है। पुत्र रत्न की प्राप्ति से घर में उत्सव का माहौल बन गया। बधाईयों का तांता लग गया और उस माहौल में मैंने खुद को बिल्कुल अकेली, अलग थलग और उपेक्षित पाया।
समय बीतता गया और मैंने अपने आप को विपरीत परिस्थितियों के बावजूद और मजबूत बनाना शुरू कर दिया। मेरे अंदर के आक्रोश नें भी मेरे हौसले को और मजबूती प्रदान की। पढ़ाई में सदा अव्वल रही, खेल कूद में भी कई ट्रॉफियां और उपलब्धियां हासिल की। स्कूल में कुंगफू कराटे की चैंपियन रही। लेकिन मेरे घर वालों नें बधाई देना तो दूर मेरी तमाम उपलब्धियों की ओर कोई तवज्जो तक नहीं दी। इस के विपरीत मेरा भाई, मां बाप के अत्यधिक लाड़ प्यार से बिगड़ता चला गया। आवारा लड़कों की सोहबत में पड़ कर पढ़ाई लिखाई में फिसड्डी रह गया मगर माता पिता उसकी हर गलतियों को नजरअंदाज करते गये, नतीजतन वह बिल्कुल आवारा निखट्टू और मां बाप का बिगड़ैल कपूत बन कर रह गया।
मैंने एक तरह से अपने परिवार के मामलों से अपने आप को अलग कर लिया और अपने तौर पर जीना शुरू कर दिया।
मैंने जिन्दगी के १६ वसंत पार कर लिया और +२ में दाखिला लिया। मेरे अंदर छुपे आक्रोश नें मुझे सदा मेहनत करने और आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया। इसी दौरान मेरे साथ एक ऐसी घटना घटी जिसने मेरे जीवन को एक नयी ही दिशा दे दी। एक नये, निहायत ही नये और अभूतपूर्व आनंददायक अनुभव से रूबरू कराया। उस घटना नें मेरी जिन्दगी में एक नया अध्याय खोल दिया। अपनी उपेक्षा का दंश झेलते झेलते मैं आजिज आ चुकी थी, मगर उस घटना के बाद मैंने जिल्लत भरी जिन्दगी में खुशी पाने की राह ढूंढ़ ली, भले ही समाज उसे गलत नजर से देखे मेरे ठेंगे से। आज तक मैंने जो उपेक्षा का दर्द झेला है उससे कई गुना ज्यादा खुशी प्राप्त करने का मार्ग मिल गया और संतोष भी। इससे मेरे अंदर का आक्रोश भी काफी हद तक शांत होता चला गया।
जून का महीना था। हमारी गरमियों की छुट्टियां चल रह थीं। हमारे पड़ोस में चाचाजी के यहां मेरी चचेरी बहन का विवाह था। गांव से काफी सारे रिश्तेदार उसमें शरीक होने के लिए आए हुए थे। उनमें से कुछ लोग हमारे यहां भी ठहरे हुए थे। विवाह के दिन सारे घरवाले मुझे घर में अकेली छोड़ शादी वाले घर चले गए। वैसे भी मुझे इन सब समारोहों में जाने में कोई रुचि नहीं रही थी, क्योंकि लोगों के सामने घर वालों की उपेक्षा का पात्र बनना अब मुझे बहुत बुरा लगता था।
संध्या का समय था,, करीब ६:३० बज रहे थे। सड़क के किनारे की बत्तियां जल चुकी थीं। मैं अपने घर के छत पे अकेली खड़ी सड़क की ओर देख रही थी तभी मेरी नजर सड़क किनारे झाड़ी के पास एक कुतिया और ४ - ५ कुत्तों पर पड़ी। एक कुत्ता जो उनमें अधिक बड़ा और ताकतवर लग रहा था, कुतिया के पास आया और उसके पीछे सूंघने लगा। बाकी कुत्ते चुपचाप देख रहे थे। एक दो मिनट सूंघने के पश्चात वह कुत्ता उस कुतिया के पीछे से उसपर सवार हो गया। मेरी उत्सुकता बढ़ गई और मैं फौरन कमरे से दूरबीन ले आई और उसे फोकस किया और पूरी क्रिया को बिल्कुल सामने से पूरी तन्मयता के साथ अपने आस पास से बेखबर देख रही थी। मैं देख रही थी कि कुत्ते नें कुतिया के कमर को अपने अगले दोनों पैरों से जकड़ लिया था और अपने कमर को जुम्बिश देना शुरु किया। कुत्ते का लाल लाल लपलपाता नुकीला लिंग कुछ देर कुतिया के योनी छिद्र के प्रवेश द्वार के आसपास डोलता रह। फिर कुछ ही पलों में मैने कुत्ते के लिंग को कुतिया की योनी में प्रवेश होते देखा। अब कुत्ता पूरे जोश के साथ अपने कमर को मशीनी अंदाज में आगे पीछे कर रहा था। धक्कों की रफ्तार इतना तेज थी कि मैं अवाक हो कर देखती रह गई। इन सब क्रियाओं में मैंने देखा कि कुतिया नें बिल्कुल भी विरोध नहीं किया, ऐसा लग रहा था मानों यह सब कुतिया की रजामंदी से हो रहा हो और अपने साथ हो रहे इस क्रिया से काफी आनन्दित हो। करीब ५ - ६ मिनट के इस धुआंधार क्रिया के पश्चात वह कुत्ता कुतिया के पीछे से उतरा लेकिन यह क्या! कुत्ते का लिंग कुतिया की योनी से निकला ही नहीं, ऐसा लग रहा था मानो किसी अग्यात बंधन से बंध फंस चुका था। दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए खड़े हुए थे और अपनी पूरी लंबी जीभ बाहर निकाले हांफ रहे थे।
यह सब देखते हुए मेरे अंदर अजीब सी खलबली शुरु हो चुकी थी। मेरी पैंटी में मैंने गीलापन महसूस किया और सलवार का नाड़ा खोलकर हाथ लगा कर देखा तो यह सचमुच भीग चुकी थी। मैंने पैंटी के अंदर हाथ लगाया तो पाया कि मेरी योनी से लसीला चिकना तरल द्रव्य निकल कर पैंटी को गीला कर रहा था। छत के मुंडेर से मेरे गरदन से नीचे का हिस्सा छुपा हुआ था, अत: मैंने हौले से अपनी सलवार उतारी फिर पैंटी भी उतार डाली। अब मेरा निचला हिस्सा पूर्णतय: नग्न था। मैं गरम हो चुकी थी, पूर्णतय: उत्तेजित हो चुकी थी, उत्तेजना के मारे मेरे शरीर पर चींटियां सी रेंगने लगी और मेरा पूरा शरीर में तपने लगा। मेरे लिए यह सब बिल्कुल नया अहसास था। मेरे सीने के अर्धविकसित उभार बिल्कुल तन गये, मेरा दायां हाथ स्वत: ही मेरे उभारों को सहलाने लगे, मर्दन करने लगे और अनायास ही मेरा बांया हाथ मेरी योनी को स्वचालित रूप से स्पर्ष करने लगा, सहलाने लगा और शनै: शनै: उंगली से मेरे भगांकुर को रगड़ने लगा। यह सब करते हुए मैं अत्यंत आनंदित हो रही थी, दूसरी ही दुनिया में पहुंच गयी थी। मेरे अंदर पूरी तरह कामाग्नी की ज्वाला सुलग चुका थी और मैं काम वासना के वशीभूत थी, अपने आस पास की स्थिति से बेखबर दूसरी ही दुनिया में।
करीब ५ मिनट के योनी घर्षण से मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया और मेरा सारा शरीर थरथराने लगा, मेरी उंगली लसदार द्रव्य से सन गई और पूरे शरीर में एक तनाव पैदा हुआ और एक चरम आनंद की अनुभूति के साथ निढाल हो गई। मैं छत पर ही धम से बैठ गई। मुझे बाद में पता चला कि यह मेरा प्रथम स्खलन था।
कुछ देर मैं उसी अवस्था में पड़ी रही और फिर खड़ी हो कर दूरबीन संभाला और उन्हीं कुत्तों की ओर देखने लगी। करीब १५ मिनट बाद कुत्ते का लिंग कुतिया की योनी से बाहर आया, बाप रे बाप ! करीब ८" लंबा और ४" मोटा लाल लाल लपलपाता लिंग नीचे झूल रहा था और उससे टप टप रस टपक रहा था। इतना विशाल लिंग कुतिया नें पड़े आराम से अपनी छोटी सी योनी में समा लिया था। अब दूसरा कुत्ता उस पर चढ़ रहा था, उफ्फ्फ क्या दृश्य था, यह सब इतना उत्तेजक था कि मैं बयां नहीं कर पा रही हूं। दूसरे के बाद जब तीसरा चढ़ने लगा, कुतिया भागना चाहती थी किंतु तीसरे कुत्ते नें भी सफलता पूर्वक अपनी इच्छा पूर्ण की और फिर चौथे नें भी फटाफट उसके साथ वही क्रिया दुहराया। अपने लिंग के धुआंधार प्रहार से कुतिया को अपने लिंगपाश में बांध कर अपनी कामेच्छा शांत की। मैं बुत बनी उस काम क्रीड़ा का दीदार कर रही थी और उस दौरान मैं हस्तमैथुन द्वारा तीन बार स्खलित हुई। उस समय करीब ८ बज रह था।
मैं थरथराते पैरों पर किसी तरह खड़ी हुई कि अचानक मेरे नितंब पर किसी कठोर वस्तु के दबाव का अनुभव हुआ। हड़बड़ा कर ज्योंही मैं पीछे मुड़ी, मैं स्तब्ध रह गई। मेरे पीछे न जाने कब से मेरे दादाजी की उमर के करीब ६५ साल के, ६' लंबे तोंदियल काले कलूटे भैंस जैसे, गंजे, झुर्रीदार चेहरा, खैनी खा खा कर काले किए हुए अपने बड़े बड़े आड़े टेढ़े दांत दिखाते हुए मुंह खोल कर बड़े ही भद्दे तरीके से मुस्कुराते हुए ठीक मेरे करीब पीछे से सट कर खड़े थे और धोती कुर्ते में होने के बावजूद उनकी धोती सामने से तंबू का आकार लिए हुए थी। मैं इन्हें अपने दादाजी के साथ देख चुका थी। ये गांव से दादाजी के साथ ही शादी में शरीक होने आए थे। ये दादाजी के साथ हमारे ही घर में ठहरे हुए थे। जब से ये यहां आए थे किसी शिकारी की तरह उसकी कामलोलुप गिद्द नजरें मेरा सदैव पीछा करती रहती थी। आंखों ही आंखों में मानो मेरे वस्त्र हरण कर मेरी उभरती जवानी का दीदार कर रही हो। मैं नादान जरूर थी मगर इतनी भी नहीं कि किसी की गंदी नजर पढ़ न पाऊं। मैं उससे दूर ही दूर रहती थी।
मगर आज की बात कुछ और ही थी। यह बूढ़ा अपनी तबीयत खराब होने का बहाना बना कर घर पर ही रुका हुआ था किसी चालाक भेड़िए की तरह मेरा शिकार करने के लिए उपयुक्त मौके के इंतजार में और मैं इस बात से बेखबर अपने आप को अकेली समझने की भूल कर बैठी। यह तो स्पष्ट था कि मेरी सारी हरकतों को काफी समय से छुप कर देख रहा था। जैसे ही अपने मनोनुकूल स्थिति में मुझे देखा, मौका ताड़ कर मेरे करीब आया, इतने करीब कि उनकी धोती के अंदर से उसका तना हुआ कठोर लिंग मेरे गुदाज नितंब के दरार पर दस्तक दे रहा था। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सन्न खड़ी लाज से दोहरी हुई जा रही थी।
फिर ज्यों ही मैं होश में आई, अपने सलवार और पैंटी की ओर झपटी, किंतु उस खड़ूस बुड्ढे नें मुझे बाज की तरह दबोच लिया और बोला, " घबराव ना बबुनी, अब हम से शरमा के का फायदा। हम तोहरा सब कुछ देखली बानी और तू का का करम करत रहले सब कूछ। अईसे भी हमका पता है कि तोहरा मां बाबूजी तोहरा के पसंद ना करेला, मगर हम तोहरा के बहूत पसंद करीला रे बबुनी। तू तो बहुते सुंदरी है रे। तोहरा मां बाबूजी के तो मति मारी गई है जे ऐसन नीक लईकी के ना पसंद करे
हैं ।" कहते कहते उसका बनमानुस जैसा एक हाथ मेरे सीने के उभारों पर जादुई हरकत करने लगा और अपने कामुक स्पर्श से मुझे कमजोर करने लगा, दूसरे हाथ से वह मेरे कमर से नीचे के नाजुक अंगों को सहलाते हुए काम वासना के तारों को छेड़ने लगा। मेरी विरोध करने की कोशिश धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगी साथ ही मेरी इच्छा शक्ति भी। मैं कुछ देर उसकी गिरफ्त से छूटने की असफल कोशिश का ढोंग करती रही, ढोंग मैं इस लिए कह रही हूं क्योंकि मुझे भी अब यह सब आनंद प्रदान कर रहा था, वरना अगर मैं चाहती तो उस बुड्ढे की हड्डी पसली तोड़ सकती थी, जैसा कि मैं कुछ लफंगे लड़कों का कर चुका थी। कुछ देर पहले जो बूढ़ा कुरूप बदशक्ल और बेढब लग रहा था, अब उसकी ओछी और अश्लील हरकतें मुझे निहायत आनंददायक लगने लगीं। वह खेला खाया बदमाश बूढ़ा मेरी कामोत्तेजना को भड़का कर मुझे पगलाए जा रहा था, मदहोश कर रहा था और मैं नादान पगली उस कामलोलुप बूढ़े के हाथों हौले हौले समर्पित होती जा रही थी। मेरी अवस्था को भांप कर बुड्ढे की कंजी आंखों में चमक आ गई और गंदी सी मुस्कान उनके होंठों नाचने लगी। उस नें आहिस्ते से अपनी धोती ढीली कर दी, नतीजतन पलक झपकते धोती गिर कर धरती चूमने लगी और फिर मैं नें जीवन भर न भूल सकने वाला वो नजारा देखा कि क्या कहूं।
धोती के अंदर अंडरवियर था ही नहीं, सामने एक भयानक काला नाग फन उठाए सर हिला हिला कर मुझे सलामी दे रहा था। उस विकराल लिंग के चारों ओर लंबे लंबे घने सफेद बाल भरे हुए थे। बुड्ढे नें मेरा हाथ पकड़ कर उस डरावने लिंग पर रख दिया और बहुत ही कामुक अंदाज में मुझसे कहा, " ले बबुनी हमार लांड़ पकड़ के खेल, तोहरा के माजा आई", और मैं गनगना उठी। ७" लंबा और ३" मोटा लिंग मेरे हाथों में था, मेरे मुख से सिसकारी निकल पड़ी और मैं मदहोशी के आलम में उस बेलन जैसे जैसे लिंग पर बेसाख्ता हाथ फेरने लगी। कितना गर्म और सख्त।
इधर बूढ़ा मेरी कमीज उतार चुका था, ब्रा खोल चुका था और पूर्णतय: नग्न कर मेरे सीने के उभारों को सहला रहा था, दबा रहा था, मेरी चिकनी योनी में अाहिस्ता आहिस्ता उंगली चला रहा था, मैं पूरी तरह पगला गई थी। पूरी तरह उस बूढ़े के चंगुल में फंस चुकी थी। इस दौरान उन्होंने अपना कुर्ता बनियान भी उतार फेंका था। पूरा शरीर किसी बूढ़े रीछ की तरह सफेद बालों से भरा हुआ था। उन्हें देख कर बूढ़े बनमानुस का आभास हो रहा था।
अचानक बूढ़े नें एक उंगली मेरी योनी में घुसेड़ दी, मैं चिहुंक उठी। "आाााााह, अम्म्मााााा ये ? उंगली निकालिए ना आााााह" मेरे मुख से खोखली आवाज निकली, वस्तुत: मुझे दर्द कम मजा ज्यादा आया।
वह कमीना बूढ़ा किसी अनुभव शिकारी की तरह मुझे जाल में फांस चुका था और बड़े बेसब्रेपन से आनन फानन अब अंतिम प्रहार करने की तैयारी में जुट गया था। उन्होंने अब उंगली मेरी योनी के अंदर बाहर करना शुरू कर दिया, पहले हौले हौले, फिर धीरे धीरे जैसे जैसे मेरी योनी छिद्र का आकार बढ़ने लगा, उसकी उंगली की रफ्तार बढ़ने लगी।
"आााााह, ओोोोोोह उफ्फ्फ्फ आाााााह " मेरी योनी की संकीर्ण छिद्र के दीवारों पर उनके उंगली का घर्षण अद्भुत आनंद के समुंदर डूबने पर मजबूर कर रहा था, मैं मदहोशी के आलम में सिसकारियां भर रही थी। योनी मार्ग मेरी योनी से रिसते चिकने लसदार रस से सराबोर हो चुका था। वो कामलोलुप बूढ़ा अपने लार टपकते मुख से बोल रहा था, "बस बबुनी बस, अब तोहरा चिकन बुर में हमार लौड़ा ढुकावे का टैम आ गया, अब हम तोहरा बूर के अपन लांड़ से चोदब बबुनी"
मुझ नादान को तो मदहोशी के आलम में कुछ होश ही नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। पर जो कुछ भी हो रहा था, उफ्फ्फ्फ, बहुत अच्छा लग रहा था, मैं पूरी तरह से उस धूर्त बूढ़े के वश में आ चुकी थी पूर्णरुपेण समर्पित।
अब वो घड़ी आ चुकी थी, गर्म लोहे पर हथौड़े के अंतिम प्रहार का जिसके लिए वो बूढ़ा न जाने कितने जतन से जाल बिछाए बड़े सब्र से इंतजार कर रहा था।मेरा कौमार्य का भोग लगाने का। आनन फानन उस बूढ़े नें छत पर धोती बिछायी, उसी पूर्ण नग्नावस्था में मुझे चित्त लिटा कर मेरे पैरों को अलग किया और मेरी दोनों जंघाओं के बीच अपने आप को स्थापित किया, पहले से गीली मेरे योनी छिद्र के मुख पर अपने विकराल लिंग का सुपाड़ा टिकाया, मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
"ले बिटिया हमार लौड़ा तोहरा बुर में" कहते ही एक करारा धक्का मारा और मैं चीख पड़ी। "आााााााह " लेकिन वह बूढ़ा तैयार था, उसनें अपने गंदे होंठों से मेरे होंठ बंद कर दिया था। फच्चाक से मेरी गीली चिकनी योनी के संकीर्ण छिद्र को फैलाता हुआ या यों कहिए चीरता हुआ उस कमीने बूढ़े बनमानुष के लिंग का विशाल गोल अग्रभाग प्रविष्ट हो गया। "आााााह" असहनीय दर्द से मेरी आंखों में आंसु आ गए। चंद सेकेंड रुकने के बाद फिर एक धक्का मारा, "ओहहहह मााां मर गईईईई रेेेेेेेेे" बूढ़े नें अपना मुंह मेरे मुंह से हटा कर झट से एक हाथ से मेरा मुह बंद किया और बड़े ही अश्लील लहजे में बोला, "तू चुपचाप शांत रह बबुनी, हम तोके मरे ना देब, तू खाली हमार लौड़े का कमाल देख, अभी ई तोहरा बूर में आधा घूस गईले है। ले एक धक्का और, हुम, अब ई देख कुत्ता मजा आवेगा, हुम,"
"आाााहहहहह," मेरी चीख घुट कर रह गई।
एक और करारा ठाप मार दिया हरामी वहशी जानवर नें।
उफ मांं मेरी आंखें फटी की फटी रह गई।, सांस जैसे रुक सा गया, पूरा लिंग किसी खंजर की तरह मेरी योनी को ककड़ी की तरह चीरता हुआ जड़ तक समा गया था या यों कहिए कि घुप गया था। कुछ पल उसी अवस्था में रुका, मेरा कौमार्य तार तार हो चुका था। बूढ़े नें तो जैसे किला फतह कर लिया था, विजयी भाव से किसी भैंसे की तरह डकारता हुआ हौले से लिंग बाहर निकाला, मुझे पल भर थोड़ा सुकून की सांस लेने का मौका मिला मगर उस तोंदियल खड़ूस वहशी जानवर के मुंह में तो जैसे खून का स्वाद मिल गया था, खून से सना लिंग पूरी ताकत से दुबारा एक ही बार में भच्च से मेरी योनी के अंदर जड़ तक ठोंक दिया।
" देख रे बुरचोदी बिटिया, अब हम तोहरा के हमार लंड से पूरा मजा देब," बोलते बोलते फिर ठोका, अब ठोकने की रफ्तार धीरे धीरे बढ़ाता जा रहा था गंदी गंदी गाली निकाल रहा था,
"आह मेरी रंडी, ओह बुरचोदी, आज तोहरा बुर को भोंसड़ा बना देब,"
मेरे सीने को दबा रहा था, चीप रहा था, निचोड़ रहा था, चूस रहा था,
"चूतमरानी, कुत्ती",
और अब मुझे उसकी इन सब गालियों से, अश्लील हरकतों से, मजा आ रहा था और मुझे अत्यंत रोमांचित कर रहा था। मुझे दर्द की जगह जन्नत का अद्वितीय अनंद मिल रहा था, हर ठाप पर मस्ती से भरती जा रही थी। मैं भी अब बेशरमी पर उतर आई,
" आह बाबा, ओह राजा, आााााााा,हां हाहं, हाय राज्ज्जााााा, आााााह अम्म्मााााा,,,,,," पता नहीं और क्या क्या मेरे मुंह से अनाप शनाप निकल रहा था। मैं भी नीचे से चूतड़ उछाल उछाल कर बेसाख्ता ठाप का जवाब ठाप से देने लगी। नीचे से मेरी कमर चल रही थी, अपनी योनी उछाल रही थी।
मैं समझ गई कि इसे कहते हैं चुदाई और अब मुझे चुदाई का आनंद मिल रहा है। मर्द के लिंग को लंड, लौड़ा या लांड़ कहते हैं और स्त्री की योनी को चूत या बुर कहते हैं। अब मैं बुरचोदी बन गई थी, चूतमरानी बन गई थी,
" चोोोोोोोोोोोद राजाााााााा चोोोोोोोोद,"
मेरे मुंह से भी मस्ती भरी बातों निकल रही थी, मैं पगली की तरह अपने बुर में घपाघप लंड पेलवा रही थी और यह दौर करीब १५ मिनट तक चला कि अचानक मेरा पूरा बदर थरथराने लगा, उधर बूढ़ा भी पूरी रफ्तार और ताकत से मेरी चूत की धमाधम कुटाई किए जा रहा था कि अचानक हम दोनों नें एक दूसरे को कस कर इस तरह जकड़ लिया मानो एक दूसरे में समा ही के दम लेंगे और फिर वह अद्भुत आनंददायक पल, मुझे महसूस होने लगा कि मेरी चूत में गरमा गरम लावा गिर रहा है, मैं भी चरम अनंद में बुड्ढे से चिपक गई, हम दोनों मानो पूरी ताकत से एक दूसरे में आत्मसात हो जाने की जोर आजमाईश में गुत्थमगुत्था थे, छर्र छर्र छरछरा कर मेरा भी स्खलन होने लगा। यह स्थिति करीब १ मिनट तक रहा फिर बूढ़े का विशाल शरीर भी डकारता हुआ निढाल हो गया और इधर मैं भी चरम सुख में आंखें मूंदे निढाल पड़ गई।
"कैसा लगा बिटिया" बूढ़ा पूछ रहा था और मैं बेशरमों की तरह बोल पड़ी, "आाााह मस्त, मेरे प्यारे चोदू बुढ़ऊ " फिर मैं ने खुद ही शरमा कर उनके चौड़े चकले सीने में अपना चेहरा छुपा लिया। बूढ़ा अपनी विजय पर मुस्कुरा उठा और मुझे अपनी बांहों में समेट लिया।
" हमार मेहरारू के मरल दस साल बाद आज पहिला बार कौनो बूर चोदे के मिला बबुनी। इत्ता सुंदर टाईट बूर जिंदगी में पहली बार चोदली बबुनी। मजा आ गईल। तोके भी तो मजा आया ना?" मैं लाज से दोहरी होती हुई उनके चौड़े चकले सीने पर प्यार से सर पटकते हुए अपनी सहमति का प्रदर्शन किया। वह बूढ़ा मेरे इस अंदाज पर निहाल हो उठा।
घर वाले रात भर शादी में व्यस्त रहे और इधर रात भर में चुदक्कड़ बूढ़े नें अपने विशाल लंड से बार बार मुझे अलग अलग तरीके से अच्छी तरह से चोद चोद कर पिछले दस साल की कसर पूरी करने में मशगूल मुझे नादान लड़की से पूर्ण स्त्री और एक स्त्री से छिनाल बनाने पर तुला हुआ था और इस चक्कर में मेरी बूर को पावरोटी की तरह फुला दिया, मेरे सीने के उभारों का ऐसा मर्दन किया कि वह भी नींबू से संतरा बन गए। रात भर में तीन बार हमारे बीच वासना का नंगा तांडव होता रहा, चुदाई की भीषण धींगामुश्ती, रोमांच का अद्भुत सुखदाई खेल तब तक चलता रहा जब तक हम पूरी तरह खल्लास, थक कर चूर निढाल नहीं हो गए। एक ही रात में मैं क्या से क्या बन गई। फिर पूरी तरह उसी स्वर्गीय सुख से तृप्त निर्वस्त्र नंग धड़ंग एकदम जंगली बेशरमों की तरह एक दूसरे से लिपटे हम दोनों छत पर ही सो गए। मेरी दमकती चिकनी काया उस बूढ़े के भालू जैसे शरीर से किसी छिपकिली की तरह चिपकी हुई थी। कितनी बेहया हो गई थी मैं। मेरे अगल बगल मेरे कपड़े छितराए पड़े हुए मुझे मुंह चिढ़ा रहे थे। मेरे कौमार्य की धज्जियां उड़ाने वाले बूढ़े की धोती मेरे खून से लाल हो चुकी थी।
यह तो शुरुआत थी मेरी कामुक यात्रा की।
आगे की घटना अगली कड़ी में। कहानी कैसा लगा अवश्य लिखिएगा।