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खानदानी चुदाई का सिलसिला--26
गतान्क से आगे..............
खुले मूह के साथ चेहरे पे बदलते हुए एक्सप्रेशन्स लिए वहीं खड़ी खड़ी सरला सब बातें सुनती रही. 5 मीं के बाद बाबूजी ने सब बात कह के एक पॉज़ लिया. सरला सबको फटी फटी आँखों से देख रही थी. उसे अपने कानो पे यकीन नही हो रहा था. इसी समय राखी की बेटी ने रोना शुरू किया तो राखी ने ब्लाउस खोल के उसे वही दूध पिलाना शुरू कर दिया. बाबूजी और बाकी मर्दों के सामने किए गए उसके आक्षन से सॉफ था कि जो भी बातें सरला ने सुनी सब सच थी.
''पर अब समधन जी मैं फिर से वही कहूँगा जो कह चुका हूँ...कि आपने मर्यादा का उलंघन किया और उसी वजह से मुझे ये फ़ैसला लेना पड़ रहा है.'' बाबूजी ये कह के एक घूँट में अपना ड्रिंक ख़तम कर गए.
'' हां सही कहा आअप्ने समधी जी....मुझे नही पता कब और कैसे पर सच है कि आप सच कह रहे हैं.....इस से जीयादा नही कहना मुझे '' सरला धम्म से वहीं ज़मीन पे बैठ गई. उसका सिर उसके हाथों में था. आँखो में आँसू.
''सरला जी बात ये नही कि आपने मर्यादा तोड़ी....बात ये है कि ये बात घर में सबसे च्छुपाई गई. घर के सदस्य जो कि इस घर के रीत रिवाज जानते थे उन्होने छुपाया. आप घर की हैं पर आपको यहाँ का पूरा नही पता. जिनको पता है उन्होने ग़लत किया. इसलिए मैं दुखी हूँ'' बाबूजी ने स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कही. इस बीच सखी भी अपने बेटे को दूध पिलाने लग गई थी.
''बाबूजी मुझे मांफ कर दीजिए....ये ग़लती मुझ से हुई है. इनका दोष नही था. दोष था तो किस्मत का और हालत का.'' सुजीत बाबूजी के पैरों पे गिर पड़ा और गिड़गिदाने लगा. राखी हैरानी से उसे देख रही थी. उसे उम्मीद नही थी कि ऐसा कुच्छ सुजीत कर सकता है. पर तभी उसे माल वाली सब बातें याद आ गई. उसी ने खुद उस दिन सरला को गरम किया था. अब उसके बाद अगर कुच्छ हो गया तो उसमे सरला और सुजीत का भी पूरा दोष नही था. इसलिए वो चुप रही. सुजीत अगर ये बात बाबूजी को नही बता पाया तो राखी को कैसे कहता.
''सुजीत तुमने मुझे बहुत दुख दिया है...मुझे ये उम्मीद थी कि अगर कुच्छ हुआ भी तो तुम बता दोगे. जैसा कि पहले भी बताया करते थे. पर अभी भी एक और है जो बात को च्छूपा रहा है.'' बाबूजी ने बचे हुए लोगों की तरफ देखा.
''नाहहिईीईईईई कुच्छ मत कहना........मैं मर जाउन्गि.......बस जो हुआ सुजीत और मेरे बीच हुआ.......और कोई नही था....प्लीआससस्स.......'' सरला जैसे नींद से जागी और चिल्लाई. अपने दामाद से सम्बंध बनाने का जो अपराध उसने किया वो सबके सामने आने से वो डर गई.
''मम्मी इसका मतलब आप अभी तक कुच्छ नही समझी....इतना कुच्छ सुना और देखा फिर भी नही......पर मुझे अपनी ग़लती स्वीकार करनी है ....यही सही है और यही प्रय्श्चित भी. बाबूजी वो दूसरा शक्स मैं हूँ.......मैं ही हूँ जिसने इनके साथ सम्बन्ध बनाए. '' संजय अपनी जगह पे खड़ा होके कहने लगा.
सखी के मूह से एक हल्की सी चीख निकली और फिर वो अपने मूह पे हाथ रख के बैठ गई. उसकी आँखें भी फटी की फटी रह गई थी. उधर सरला ये सब सहेन नही कर पाई और वही पे बेहोश हो गई. राजू और संजय ने दौड़ के उसे उठाया और उसके बेडरूम में ले गए. मिन्नी तुरंत अपने बच्चे को सुजीत के पास पकड़ा के सरला को देखने चली गई. संजय और राजू भी वहीं रुक के उसकी मदद करने लगे.
गतान्क से आगे..............
खुले मूह के साथ चेहरे पे बदलते हुए एक्सप्रेशन्स लिए वहीं खड़ी खड़ी सरला सब बातें सुनती रही. 5 मीं के बाद बाबूजी ने सब बात कह के एक पॉज़ लिया. सरला सबको फटी फटी आँखों से देख रही थी. उसे अपने कानो पे यकीन नही हो रहा था. इसी समय राखी की बेटी ने रोना शुरू किया तो राखी ने ब्लाउस खोल के उसे वही दूध पिलाना शुरू कर दिया. बाबूजी और बाकी मर्दों के सामने किए गए उसके आक्षन से सॉफ था कि जो भी बातें सरला ने सुनी सब सच थी.
''पर अब समधन जी मैं फिर से वही कहूँगा जो कह चुका हूँ...कि आपने मर्यादा का उलंघन किया और उसी वजह से मुझे ये फ़ैसला लेना पड़ रहा है.'' बाबूजी ये कह के एक घूँट में अपना ड्रिंक ख़तम कर गए.
'' हां सही कहा आअप्ने समधी जी....मुझे नही पता कब और कैसे पर सच है कि आप सच कह रहे हैं.....इस से जीयादा नही कहना मुझे '' सरला धम्म से वहीं ज़मीन पे बैठ गई. उसका सिर उसके हाथों में था. आँखो में आँसू.
''सरला जी बात ये नही कि आपने मर्यादा तोड़ी....बात ये है कि ये बात घर में सबसे च्छुपाई गई. घर के सदस्य जो कि इस घर के रीत रिवाज जानते थे उन्होने छुपाया. आप घर की हैं पर आपको यहाँ का पूरा नही पता. जिनको पता है उन्होने ग़लत किया. इसलिए मैं दुखी हूँ'' बाबूजी ने स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कही. इस बीच सखी भी अपने बेटे को दूध पिलाने लग गई थी.
''बाबूजी मुझे मांफ कर दीजिए....ये ग़लती मुझ से हुई है. इनका दोष नही था. दोष था तो किस्मत का और हालत का.'' सुजीत बाबूजी के पैरों पे गिर पड़ा और गिड़गिदाने लगा. राखी हैरानी से उसे देख रही थी. उसे उम्मीद नही थी कि ऐसा कुच्छ सुजीत कर सकता है. पर तभी उसे माल वाली सब बातें याद आ गई. उसी ने खुद उस दिन सरला को गरम किया था. अब उसके बाद अगर कुच्छ हो गया तो उसमे सरला और सुजीत का भी पूरा दोष नही था. इसलिए वो चुप रही. सुजीत अगर ये बात बाबूजी को नही बता पाया तो राखी को कैसे कहता.
''सुजीत तुमने मुझे बहुत दुख दिया है...मुझे ये उम्मीद थी कि अगर कुच्छ हुआ भी तो तुम बता दोगे. जैसा कि पहले भी बताया करते थे. पर अभी भी एक और है जो बात को च्छूपा रहा है.'' बाबूजी ने बचे हुए लोगों की तरफ देखा.
''नाहहिईीईईईई कुच्छ मत कहना........मैं मर जाउन्गि.......बस जो हुआ सुजीत और मेरे बीच हुआ.......और कोई नही था....प्लीआससस्स.......'' सरला जैसे नींद से जागी और चिल्लाई. अपने दामाद से सम्बंध बनाने का जो अपराध उसने किया वो सबके सामने आने से वो डर गई.
''मम्मी इसका मतलब आप अभी तक कुच्छ नही समझी....इतना कुच्छ सुना और देखा फिर भी नही......पर मुझे अपनी ग़लती स्वीकार करनी है ....यही सही है और यही प्रय्श्चित भी. बाबूजी वो दूसरा शक्स मैं हूँ.......मैं ही हूँ जिसने इनके साथ सम्बन्ध बनाए. '' संजय अपनी जगह पे खड़ा होके कहने लगा.
सखी के मूह से एक हल्की सी चीख निकली और फिर वो अपने मूह पे हाथ रख के बैठ गई. उसकी आँखें भी फटी की फटी रह गई थी. उधर सरला ये सब सहेन नही कर पाई और वही पे बेहोश हो गई. राजू और संजय ने दौड़ के उसे उठाया और उसके बेडरूम में ले गए. मिन्नी तुरंत अपने बच्चे को सुजीत के पास पकड़ा के सरला को देखने चली गई. संजय और राजू भी वहीं रुक के उसकी मदद करने लगे.