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गीता चाची -Geeta chachi complete

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मन भर कर प्रीति की चूत चूसने के बाद मैं प्रीति को बांहों में लेकर लेट गया और उसकी कड़ी जरा जरासी चूचियां दबाता हुआ उसे चूमने लगा. वह शरमा रही थी पर बड़े प्यार से चुम्मा दे रही थी. चाची हमारे पास आकर बैठ गयीं और हमारा प्रेमालाप देखने लगीं.

प्रीति अब तक काफ़ी गरमा गयी थी और मेरे लंड को हाथ से पकड़कर मुठिया रही थी. उसे मैंने पलंग पर लिटाया और उसके नितंबों के नीचे एक तकिया रखा. वह अब थोड़ा घबरा गयी. "क्या कर रहे हो अनिल भैया?"

चाची ने जब कहा कि अब उसकी चुदाई होगी तो वह नखरा करने लगी. लड़की चुदाना तो चाहती थी पर मेरे तन्नाये लंड को देखकर वह काफ़ी भयभीत थी. चाची के पुचकारने पर आखिर उसने जांघे फैलायीं और मैं उसकी टांगों के बीच अपना लंड सम्हाल कर बैठ गया. मैने चाची को आंख मारी कि समय आ गया है.

चाची समझ गईं और प्रीति के दोनों हाथ कस कर पकड़ लिये और उनपर बैठ गयी. प्रीति घबरा कर रोने लगी. "यह क्या कर रही हो मौसी, छोड़ो मुझे" मैंने अब अपना सुपाड़ा प्रीति की कुंवारी चूत पर रखा और दबाना शुरू किया. चाची बोली "दुखेगा बेटी, तू ज्यादा न छटपटाये इसलिये हाथ पकड़ लिये हैं मैंने. पर घबरा मत, मजा भी आएगा,

और पहली बार चुदाने का मजा तो तभी आता है जब दर्द हो."

मैने अपनी उंगलियों से उसकी चूत चौड़ी की और लंड को कस कर पेला. फ़च्च से सुपाड़ा उसकी कसी बुर के अंदर हो गया और प्रीति दर्द से बिलबिला उठी. चीखने ही वाली थी कि चाची ने अपने हाथ से उसका मुंह दबोच दिया. तड़पती प्रीति की परवाह न करके मैने लंड फ़िर पेला और आधा अंदर कर दिया. प्रीति छटपटाते हुए अपने बंद मुंह से गोंगियाने लगी.

उस कुंवारी मखमली चूत ने मेरे लंड को ऐसे पकड़ रखा था जैसे किसीने मुट्ठी में पकड़ा हो. प्रीति की आंखों में आंसू छलक आये थे. उन्हें देखकर चाची और मैं और उत्तेजित हो उठे और एक दूसरे को चूमने लगे. प्रीति को डराने में मुझे बड़ा मजा आ रहा था इसलिये मैं जान बूझ कर बोला. "चाची, मजा आ गया, प्रीति की चूत तो आज फ़ट जायेगी मेरे मोटे लंड से, पर मैं नहीं छोड़ने वाला इसे, चोद चोद कर फुकला कर दूंगा साली को" ।

वह जब रोने लगी तो मैंने झुककर उसका एक नन्हा निपल मुंह में लिया और चूसने लगा. मैंने सोचा कि अभी ज्यादा डराना ठीक नहीं है क्योंकि उसकी गांड भी मारनी थी. इसलिये उसे तड़पा तड़पा कर चोदने की अपनी इच्छा मैंने उसकी गांड के लिये बचा कर रखी. दूसरे स्तन को चाची प्यार से सहलाने लगीं. धीरे धीरे प्रीति का तड़पना कम हुआ और उसने रोना बंद कर दिया.

 
चाची ने जब उसके मुंह से हाथ हटाया तो लड़की रोने स्वर में बोली. "हाय मौसी, बहुत दर्द होता है, अनिल भैया, प्लीज़ अपना लौड़ा निकाल लो." चाची ने मुझसे कहा "तुम चोदो अनिल, मेरी यह भांजी जरा ज्यादा ही नाजुक है, इसकी परवाह मत करो. बाद में देखना, चुदते हुए कैसे किलकारियां भरेगी"

चाची ने झुककर अपने होंठ प्रीति के मुंह पर जमा दिये और जोर से चूस चूस कर उसका चुंबन लेने लगी. प्रीति अब शांत हो चली थी और उसकी चूत फ़िर गीली होने लगी थी. मैने बचा हुआ लंड धीरे धीरे इंच इंच करके उसकी चूत में पेलना शुरू किया. जब प्रीति तड़पती तो मैं लंड घुसेड़ना बंद कर देता था. आखिर पूरा लंड उस कसी बुर में समा गया और मैने एक सुख की सांस ली. "देख प्रीति, पूरा लंड तेरी चूत में है और खून भी नहीं निकला है. कैसे प्यार से दिया है तेरी चूत में, तू फ़ालतू घबराती थी"

प्रीति ने थोड़ा सिर उठा कर अपनी जांघों के बीच देखा तो हैरान रह गई. फ़िर शरमा कर आंसू भरी आंखों से मेरी ओर देखने लगी. चाची उसे पुचकार कर बोलीं. "शाबास मेरी बहादुर बिटिया, बस दर्द का काम खतम, अब मजा ही मजा है. अनिल, तू चोद, मैं प्रीति से अपनी चूत की सेवा करवाती हूं।

चाची उठ कर प्रीति के मुंह पर अपनी चूत जमाकर बैठ गयीं और धीरे धीरे उसका मुंह चोदने लगीं. मैने अब धीरे धीरे लंड अंदर बाहर करना शुरू किया. पहले तो कसी चूत में लंड बड़ी मुश्किल से खिसक रहा था. मैने प्रीति के क्लिटोरिस को अपनी उंगली से मसलना शुरू कर दिया और वह कमसिन बुर एक ही मिनट में इतनी पसीज गई कि लंड आसानी से फ़िसलने लगा. मैं अब उसे मस्त चोदने लगा.

प्रीति को चोदते चोदते मैने पीछे से चाची की चूचियां पकड़ लीं और दबाने लगा. चुदाई का एक समां सा बंध गया. चाची अपना सिर घुमाकर मुझे चुंबन देते हुए अपनी भांजी के मुंह पर बैठ कर उससे अपनी चूत चुसवा रही थीं और मैं पीछे से चाची के मम्मे दबाता हुआ उनकी चिकनी पीठ को चूमता हुआ हचक हचक कर प्रीति की बुर चोद रहा था.

दोनों चूतें खूब झड़ीं और खुशी की किलकारियां कमरे में गूजने लगीं. आखिर मुझसे न रहा गया और मैने चाची को हटने को कहा. "चाची, मुझसे अब नहीं रहा जाता, मैं प्रीति पर चढ़ कर जोर जोर से चोदूंगा."

चाची हट गईं और हस्तमैथुन करते हुए हमारी कामक्रीड़ा का आखरी भाग देखने लगीं. मैंने प्रीति पर लेट कर उसे बाहों में जकड़ लिया और अपनी जांघों में उसके कोमल तन को दबोचकर उसे चूमता हुआ हचक हचक कर चोदने लगा. कुछ ऐसे ही जैसे चाचाजी ने मुझे चोदा था. प्रीति की गरम सांसें अब जोर से चल रही थीं, वह उत्तेजित कन्या चुदने को बेताब थी. "चोदो भैया, और जोर से चोदो ना, अब नहीं दुखता, मजा आ रहा है, उई ऽ मां ऽ."

 
उसकी जीभ मुंह में लेकर चूसता हुआ मैंने उसे पूरी शक्ति से चोद डाला. सुख से मैं पागल हुआ जा रहा था. कुंवारी बुर में लंड चलने से पाक पाक' की मस्त आवाज आ रही थी. आखिर मैंने एक करारा धक्का लगाया और लंड को प्रीति की बुर में जड़ तक गाड़ कर स्खलित हो गया. प्रीति की बुर अभी भी मेरे लौड़े को पकड़ कर जकड़े हुए थी.

पूरा झड़ने के बाद मैने प्रीति का प्यार से एक चुंबन लिया और उठ कर लंड खींच कर बाहर निकाला. लंड उसकी चूत के पानी से गीला था. चाची तुरंत मेरे पास आईं और उसे मुंह में लेकर चूस डाला. मेरा लंड साफ़ करके मुझे बाजू में हटने को कहते हुए वे खुद प्रीति की जांघों को फैलाते हुए बोलीं. "अब देखें तो, मेरी भांजी की पहली बार चुदी बुर में अपनी मौसी के लिये क्या तोहफ़ा है!" और झुक कर प्रीति की बुर चूसने लगीं. मेरा सारा वीर्य और प्रीति का पानी वे चटखारे ले ले कर निगलने लगीं.

मैने प्रीति से पूछा "तो बहन, चुदा कर मजा आया? मुझे तो बहुत मजा आया मेरी प्यारी प्रीति रानी की टाइट चूत चोदकर." प्रीति शरमाती हुई बोली "बहुत अच्छा लगा अनिल भैया, पर दर्द भी हुआ. तुम्हारा लंड इतना मोटा है कि मुझे लगा कि मेरी बुर फ़ाड़ देगा" मैंने मन ही मन सोचा कि चाचाजी के हलब्बी लंड से चुदेगी तो मर ही जायेगी.

कुछ देर आराम के बाद प्रीति और चाची फ़िर आपस की कामक्रीड़ा में जुट गईं. अगले आधे घंटे तक मैं अब सिर्फ पड़ा पड़ा उन दोनों की रति देखता रहा. प्रीति की दुखती बुर को चाची ने खूब चाटा और चूसा. आखिर जब प्रीति फ़िर गरमा गयी तो बोल पड़ी. "अनिल भैया, आओ मुझे फ़िर चोदो, अब मैं नहीं रोऊंगी." चाची ने भी मुझे आंख मारी और पास बुला लिया. मैं समझ गया कि गांड मारने का समय आ गया है. ।

मैं उठकर प्रीति की टांगों के बीच बैठ गया और अपना लौड़ा सहलाते हुए बोला. "देख क्या मस्त खड़ा किया है तेरे लिये प्रीति." उसने अपनी टांगें फैला दीं और मेरे लंड के अपनी चूत में घुसने का इंतज़ार करने लगी.

प्रीति को बड़ा आश्चर्य हुआ जब उसका एक चुंबन लेकर मैंने उसे उठाकर पट लिटा दिया. उसे लगा कि शायद मैं कुतिया स्टाइल में पीछे से चोदने वाला हूं इसलिये वह अपने घुटनों और कोहनियों पर जमने लगी तो मैंने उसे फ़िर नीचे पट लिटा दिया.

चाची ने उसके हाथ पकड़ लिये और मैंने उसके पैरों को कस के पलंग के कड़े से बांध दिया कि उठ कर भाग न सके. फ़िर मैंने मन भर के उस कमसिन लड़की के नितंब पास से देखे. गोरे चिकने और कसे हुए वे चूतड़ खा जाने को मन होता था. मैंने झुक कर उन्हें मसलते हुए चूमना और चाटना शुरू किया और फ़िर उसके गुदा को चूसने लगा. अपनी जीभ उसमें डाली तो बड़ी मुश्किल से गई; बड़ा ही टाइट होल था. उसके सौंधे स्वाद को मैं अभी चख ही रहा था कि प्रीति बोली. "छोड़ो भैया, छी, यह क्या कर रहे हो? मेरी गांड मत चूसो!"

मैंने कहा, "तुम्हारे उपहार को चूम रहा हूं रानी बहना, आखिर अपना इतना अमूल्य अंग एक लड़की अपने भाई को भोगने को दे रही हो तो उसका स्वाद लेना जरूरी है, चोदने के पहले."

प्रीति घबरा कर बोली. "नहीं नहीं, ऐसा मत करो, मैं मर जाऊंगी, मैंने तो चोदने को कहा था, गांड मारने को नहीं, गांड तो तुम मौसी की मारते हो. मौसी समझाओ ना अनिल भैया को!"

 


चाची बोलीं. "मारने दे उसे. आखिर इतने दिन से हमारे साथ मजा कर रहा है, हमारा हर तरह से मन बहलाता है, तेरा मूत भी पीता है, फ़िर गांड मारना चाहता है तो क्या हर्ज है? मार तू लल्ला, इसके रोने पर मत जा."

सहायता की गुहार करती प्रीति उलटी डांट पड़ने से सकते में आ गयी और डर के मारे खुद को छुड़ाने की कोशिश करते हुए रोने लगी. जब छूटने की सब कोशिशें बेकार हुईं तो सिसकते हुए लस्त पड़ गई. तब तक मैने उसकी गांड के छेद में मक्खन चुपड़ना शुरू कर दिया था. एक ही उंगली अंदर जा रही थी. मैंने दो उंगलियां जबरदस्ती घुसेड़ीं तो दर्द से वह रोने लगी. मुझे बहुत मजा आया. उसे और चिढ़ाता हुआ मैं बोला "सचमुच बड़ी कसी कुंवारी गांड है। तेरी प्रीति, बहुत मजा आयेगा इसे चोदने में."

मेरे लंड को चाची मक्खन लगा रही थीं, उनके मुलायम हाथों के स्पर्श से लंड और फूल गया था. अपना लाल लाल सूजा सुपाड़ा मैंने उस कन्या के गुदा पर रखा और थोड़ा दबाया. फ़िर चाची को इशारा किया. चाची ने प्रीति के मुंह हाथ से दबोच लिया. मैंने तुरंत सुपाड़ा पेलना शुरू किया. वह अटक गया क्योंकि घबराकर प्रीति ने अपनी गांड का छल्ला सिकोड़ लिया था जिससे गांड का मुंह करीब करीब बंद हो गया था.

"गांड खोल बहन, ढीली छोड़ नहीं तो तुझे ही तकलीफ़ होगी." कहकर मैने और दबाया. मेरी शक्ति के आगे उस बेचारी की क्या चलती. गांड को खोलता हुआ मेरा सुपाड़ा आधा धंस गया. प्रीति का शरीर एकदम कड़ा हो गया और वह छटपटाने लगी. चाची की आंखों में वासना से लाल डोरे झलक आये थे. बोली "फ़ट जायेगी लगता है। लड़की की गांड . मैंने कभी किसी की गांड फ़टती नहीं देखी."

मैंने कहा, "हां चाची, आज तो फ़ाड़ ही देता हूं, बड़ा मजा आयेगा. इसे भी तो पता चले गांड मराना क्या होता है। तुम्हारी मैं मारता था तो कैसे मजा ले लेकर देखती थी."

मैंने पेलना बंद करके नीचे देखा. प्रीति का गुदा पूरा तन कर फैला हुआ था और उसमें मेरा सुपाड़ा फंसा हुआ था. मैंने थोड़ा और मक्खन उसपर लगाया और फ़िर से उसे थोड़ा सा अंदर बाहर करने लगा कि लड़की को और दर्द हो तो मजा आये. प्रीति को इतना दर्द हुआ कि वह तड़पने लगी और हाथ पैर फ़टकारने की कोशिश करने लगी. उसकी तड़पते शरीर को देखकर मुझे बड़ा मजा आ रहा था. जब वह बेहोश होने को आ गयी तो मैंने कस कर लंड पेल दिया. पाक्क की आवाज से सुपाड़ा अंदर हो गया.

 


प्रीति दर्द से हाथ पैर पटकने लगी. उसके दबे मुंह से सीत्कार निकल रहे थे. वह ऐसे तड़प रही थी कि मानो पानी के बाहर निकाली मछली हो. उस छोकरी के छटपटाने में भी ऐसा मादकपन था कि चाची भी गरम हो उठीं. मैंने झुक कर चाची को चूम लिया और उनकी चूचियां दबाते हुए प्रीति के शांत होने का इंतजार करने लगा.

"रुक क्यों गया? डाल दे पूरा अंदर" चाची ने कहा.

"ऐसे नहीं चाची, एक बार अंदर जायेगा, तो दर्द कम हो जायेगा. फ़िर क्या मजा आयेगा? अभी देख कैसी पुकपुका रही है इसकी गांड! मैं तो धीरे धीरे डालूंगा. ऐसे ही तड़पा तड़पा कर मारूंगा. पूरा मजा लूंगा." मैंने कहा. चाची हंसने लगीं. "बड़ा दुष्ट है रे तू"

कुछ देर बाद मैंने लंड धीरे धीरे प्रीति की गांड के अंदर घुसेड़ना शुरू किया. कस कर फंसा होने के बाद भी मक्खन के कारण लंड फ़िसल कर प्रीति के चूतड़ों की गहराई में इंच इंच कर जा रहा था. वह जब छटपटाती तो मैं रुक जाता. थोड़ा लंड बाहर खींचता और फ़िर अंदर कर देता जिससे वह फ़िर हाथ पैर पटकने लगती. उसकी आंखों से गंगा जमुना की धारा बह रही थी. बीच बीच में झुक कर मैं उसके गाल चूम लेता. उन खारे आंसुओं से मेरा लंड और तन्ना जाता.

आखिर मुझसे न रहा गया. खेल खतम करके मैंने जड़ तक लंड खोंस दिया. वह ऐसे उचकी जैसे किसी ने गला दबा दिया हो. मैं उसके कोमल बदन के ऊपर सो गया और हाथ उसके शरीर के इर्द गिर्द जकड़ लिये. झुककर देखा तो उसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे और बड़ी दयनीय भावना से वह मेरी ओर देख रही थी. मुझे थोड़ी दया आई पर बहुत मजा भी आया. अपनी गांड पहली बार कैसे मरायी यह उस चुदैल कन्या को हमेशा याद रहेगा ऐसा मैंने मन ही मन सोचा.

पांच मिनट बाद मैंने चाची को कहा कि हाथ अपनी भांजी के मुंह से हटा लें, अब वह नहीं चीखेगी. चाची के हाथ हटाते ही वह सिसक सिसक कर रोने लगी. "मौसी, मैं लुट गई, लगता है गांड फ़ट गई, इतना दर्द हो रहा है जैसे किसी ने पूरा हाथ घूसा बनाकर डाल दिया हो. खून बह रहा होगा, जरा देखो ना. मौसी अनिल भैया से कहो ना मुझे छोड़ दे, अपना लंड निकाल ले नहीं तो मैं मर जाऊंगी."

 


चाची ने बड़ी उत्सुकता से उसके गुदा को टटोल कर देखा. "नहीं बेटी, नहीं फ़टी, खून भी नहीं निकला, तू गांड ढीली क्यों नहीं कर लेती जैसा अनिल कहता है?"

प्रीति की सिसकारियां रोकने के लिये चाची ने अपना एक निपल प्रीति के मुंह में दे दिया और दर्द की मारी प्रीति उसे चूसने लगी कि कुछ तो हो जिससे उसका ध्यान बंटे उसके गुदा में होती पीड़ा से. चाची ने अपनी आधी चूची उसके मुंह में ढूंसकर उसकी बोलती बंद कर दी.

फ़िर चाची ने झुककर अपनी तड़पती भांजी की बुर को सहलाना शुरू कर दिया. मैं उसकी चूचियां पकड़कर उनकी मालिश करने लगा. धीरे धीरे प्रीति कुछ संभली और उसने रोना बंद कर दिया. चाची ने उसकी बुर में से उंगली निकालकर मुझे दिखाई. गीली उंगली देखकर मैं समझ गया कि प्रीति की चूत में से रस निकलना शुरू हो गया है.

प्रीति अब अपनी गांड को किसी तरह ढीला छोड़ने में भी सफ़ल हो गई और उसका दर्द कुछ कम हुआ. चाची ने आंख मारते हुए मुझसे कहा. "तू जरा उठ, मैं नीचे जाती हूं और इसे अपनी बुर चुसवाती हूं."

मैं समझ गया. मैंने जगह बनायी और झट से चाची प्रीति के सिर को अपनी जांघों में ले कर लेट गयीं. फ़िर उसके मुंह को अपनी बुर पर दबा कर जांघेखें बंद करके उसके सिर को कसकर पकड़ लिया और धक्के दे देकर प्रीति का मुंह चोदने लगी. बोली "अब मारो कस कर, अब यह कुछ नहीं कर पायेगी. कितनी देर इसका मुंह पकड़कर बैलूं, मैं भी मजा कर लेती हूं. तू चिंता न कर. मेरी चूत से इसका मुंह बंद है, चूं तक नहीं कर पायेगी"

मैंने झुक कर चाची का मम्मा मुंह मे लिया और हचक हचक कर प्रीति की गांड मारने लगा. जैसे ही मेरा मोटा ताजा तन्नाया हुआ लौड़ा उसकी बुरी तरह से फैले गुदा में अंदर बाहर होने लगा, वह फ़िर दर्द से बिलबिला उठी. दर्द से न चाहकर भी उसकी गांड का छल्ला सिकुड़ने की कोशिश करने लगा जिससे मेरा आनंद दूना हो गया और उसका दर्द और बढ़ गया.

मुझे अब उस नाजुक कन्या के दर्द की कोई परवाह नहीं थी. मैंने अपने हाथों में उसकी कबूतर सी नन्ही नन्ही चूचियां पकड़ लीं और अपनी जांघे उसके कूल्हों के इर्द गिर्द जकड़ कर उछल उछल कर उसकी गांड मारने लगा. अब वह दर्द से बिलखती हुई अपनी मौसी को सहायता के लिये पुकारने की कोशिश कर रही थी पर चाची की चूत में उसकी सिसकारियां दब कर रह गयीं. चाची मस्त हो उठीं. "बहुत अच्छे लल्ला, और कस के मार इसकी गांड . यह चिल्लाने की कोशिश करती है तो बुर में बहुत मजा आता है."

 
प्रीति के इस बिलखने से मेरी वासना और दुगनी हो गई और उस कोमल लड़के की चूचियां बुरी तरह से कुचलते हुए मैंने उसे ऐसा भोगा कि वह हमेशा याद करेगी. चाची ने उसकी एक न सुनी बल्कि वे भी प्रीति की सकरी कुंवारी गांड में निकलते घुसते मेरे लंड को देखकर ऐसी गरमाईं कि और जोर से प्रीति का मुंह चोदने लगीं.

मैंने आधे घंटे प्रीति की गांड मारी और फ़िर अखिर एक जोर की हुमक के साथ झड़ गया. प्रीति अब तक दर्द से बेहोश हो चुकी थी, नहीं तो मेरे उबलते वीर्य से उसकी गांड की जो सिकाई हुई उससे उसे कुछ आराम जरूर मिलता. चाची ने प्रीति का सिर छोड़ा और थोड़ी बाजू में हटकर मुझे अपनी बुर चुसाने लगीं.

उस रात मैने प्रीति की गांड सुबह तक और दो बार मारी. गांड में से लंड सारी रात नहीं निकाला. मन भर कर उसे भोग लिया.

दूसरी बार मारने के लिये अपना लंड खड़ा करने को मैने चाची की चूत के रस का पान किया और प्रीति के होश में आने का इंतजार करने लगा. प्रीति जब होश में आकर रोने लगी तो चाची ने फ़िर से उसका मुंह हाथ से दबोच लिया. "चुप कर नहीं तो मुंह मे पट्टी बांध दूंगी." उन्होंने धमकाया तब वह चुप हुई.

मैं प्रीति को गोद में लेकर कुरसी में बैठ गया. अब भी उसका शरीर उसकी सिसकियों से हिल रहा था जिससे मुझे बड़ा मजा आ रहा था. मेरा लंड उसकी गांड में था ही. इस बार मैने उसकी गांड उसे गोद में बिठाकर नीचे से धक्के देते हुए ही मारी जैसे चाचाजी ने एक बार मेरी मारी थी. इस आसन में चाची हमारे सामने खड़ी होकर उसे चूत चुसवा रही थीं इसलिये प्रीति को कुछ आनंद मिला और गांड के दर्द से उसका ध्यान हटा. बाद में चाची उसके सामने बैठकर उसकी बुर चूसती रहीं. मैं नीचे से ही उचक उचक कर उसकी चूचियां मसलते हुए उसकी गांड मारता रहा.

बीच में वह रो कर बोली. "भैया, इतनी बेरहमी से मत कुचलो मेरे मम्मे, बहुत दुख रहे हैं. चाची, प्लीज़ अनिल भैया को बोलो ना!"

"अरे मसलेगा कुचलेगा तभी तो बड़ी होंगी तेरी चूचियां! जिंदगी भर क्या जरा जरासे नीबू लेकर घूमना है? अनिल मसल मसल कर एक साल में मेरे जैसे पपीते कर देगा इनके. तू दबा अनिल, मेरी तरफ़ से और जोर से मसल. जरा निपल भी खींच." और मैंने वैसा ही किया.

तीसरी बार मैने उस कमसिन कन्या को फ़र्श पर पटककर उसकी गांड मारी. नीचे कड़ा फ़र्श और ऊपर मेरे शरीर का भार होने पर कैसा दर्द होता है यह मैं चाचाजी के साथ की चुदाई में अनुभव कर चुका थ. इसलिये प्रीति के दर्द का मुझे अंदाजा था इसलिये पीड़ा से छटपटाते उसके बदन को बांहों में भरे मैंने खूब आनंद लिया. इस बार हमने उसे रोने दिया. उसके रोने से हम दोनों को बड़ा मजा आ रहा था. गांड में लंड की आदत हो जाने से जब उसका रोना कम हुआ तो मैंने उसकी चूचियां ऐसे बेरहमी से मसलीं कि वह फ़िर छटपटा उठी.

कुछ देर में वह लस्त हो कर ढीली हो गयी. चाची बोलीं. "लगता है फ़िर बेहोश हो गयी. वड़ी नाजुक कन्या है. तू परवाह न कर, मार जोर से मसल मसल कर, उसे कुछ नहीं होगा." और मैंने उसके छोटे स्तन कुचलते हुए उसकी ऐसी बेरहमी से गांड मारी कि जैसे लड़की नहीं, रबर की गुड़िया हो.

झड़ने पर मैं भी बिलकुल लस्त हो गया. सारी वासना ठंडी हो गयी थी और बहुत तृप्ति महसूस हो रही थी. प्रीति के निश्चल शरीर को बिस्तर पर लिटा कर हम भी बिस्तर पर लुढ़क गये. उसका सारा शरीर मसले कुचले गुलाब के फूल जैसा लग रहा था. स्तन तो लाल हो गये थे. थोड़े बड़े भी लग रहे थे. चाची बोलीं. "शाबास लल्ला, कुछ दिन और ऐसे ही मसल मसल कर मारेगा तो इसके मम्मे भी बड़े बड़े हो जायेंगे. फ़िर यह तुझे दुआ देगी."

दूसरे दिन प्रीति की बुरी हालत थी. उसे चलते भी नहीं बन रहा था. गांड बुरी तरह दुख रही थी. वह लगातर रो रही थी. उसके रोने बिलखने से मेरा फ़िर खड़ा हो गया. एक बार मुझे लगा कि फ़िर उसकी मार दूं पर फ़िर चाची के कहने से उसे मैंने छोड़ दिया. एक दो दिन हमने उसे आराम करने दिया.

तीसरी रात उसे हमने फ़िर जबरदस्ती अपने कामकर्म में शामिल किया. वह घबरा कर बिलखने लगी पर मैंने वायदा किया कि अब गांड नहीं मारूगा तब वह तैयार हुई. उस रात हमने उसे बहुत सुख दिया, प्यार से उस्की बुर चूसी और हौले हौले चोदा. मजा आने पर वह थोड़ी संभली. चाची ने उसे समझा दिया कि ऐसा तो होता ही है चुदाई में.

 
हमारी सामूहिक चुदाई अब पूरे जोर में चलने लगी. प्रीति को मैं हर दिन एक बार जरूर चोदता पर उसकी गांड फ़िर नहीं मारी. चाची की मारकर संतोष कर लेता था.

वैसे अगर चाहता तो चाची की सहायता से उस कमसिन युवती को दबोच कर कभी भी उसके चूतड़ों में अपना लंड गाड़ सकता था पर अब मेरे मन में एक बड़ी मादक चाहत थी और वह थी प्रीति की कमसिन कोमल गांड में चाचाजी का मूसल घुसते देखना. जितनी सकरी गांड होगी उतना चाचाजी को मजा आयेगा, यह मुझे मालूम था इसलिये प्रीति की गांड को आराम देकर उसे फ़िर सिकुड़ने का पूरा मौका मैंने दिया.

चाची को भी मैंने मेरा प्लान बता दिया था. वे भी मेरा प्लान सुनकर बहुत खुश हुईं. "अरे मजा आयेगा! तेरे छह इंची लंड ने इसकी यह हालत की तो इनका लंड तो इसको दो में चीर देगा."

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चाचाजी के लौटने के एक दिन पहले धीरे धीरे चाची ने प्रीति को सारी कहानी बता दी. कैसे मैंने उन्हें रिझाया और गे होते हुए भी अपनी पत्नी की ओर फ़िर उनका आकर्षण बढ़ाकर उसे चोदने में उनकी सहायता की और कैसे इसके इनाम स्वरूप चाचाजी को भी आखिर अपने भतीजे की कुंवारी गांड मारने का अवसर प्राप्त हुआ.

चाची ने मेरे नारी रूप और मेरे और चाचाजी के हनीमून के बारे में भी बताया. सुनकर वह चुदैल लड़की तैश में आ गयी. अपनी चूत में उंगली डालकर अंदर बाहर करती हुई पूछने लगी कि अब जब चाचाजी आयेंगे तो क्या हम सब मिलकर एक ग्रूप में चुदाई करेंगे? वह चाचाजी को मेरी गांड मारते हुए देखना चाहती थी. अपनी मस्ती में वह यह भूल गयी थी कि उसका क्या हाल हो सकता है!

चाची ने उसकी बात सुनकर कहा कि हां ऐसा हो सकता है, चाचाजी को प्रीति को भी शामिल करने के लिये तैयार करना पड़ेगा. वैसे हमें मालूम था कि चाचाजी तो इस मिठाई के टूकड़े को देखकर उछल पड़ेंगे.

जब मैंने चाचाजी के लंड की साइज़ बयान की और यह बताया कि गांड मरवाते हुए मेरी क्या हालत हुई थी तब प्रीति घबरा गई. मेरे छह इंची लंड से चुदते और गांड मराते हुए उसकी जो हालत हुई थी वह उसे याद आते ही उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. पर उस मतवाले लंड की कल्पना से उसकी चूत भी पसीज रही थी यह साफ़ था. हमने उसे झूट मूट कह कर समझा दिया कि उसकी गांड नहीं मारी जायेगी.

चाचाजी हफ़्ते भर बाद वापस आये तो प्रीति को घर में देखकर थोड़े हैरान हुए. उसके सामने चुदाई कैसे करेंगे यह सोच रहे होंगे. मेरे ऊपर चढ़ने को वे आतुर थे. फ़िर अकेले में चाचीने उनके कान में कुछ कहा तो बोले. "नहीं नहीं, मैं उस बच्ची को नहीं चोदूंगा. फुकला हो जायेगी उसकी चूत. फ़िर कोई शादी नहीं करेगा. हां उसकी नरम नरम गांड मारने मिले तो क्या बात है."

मेरे और चाचाजी के हनीमून की याद अभी उनके दिमाग में ताजी थी. वे मुझे अकेले में ले जाकर वैसे ही बेरहमी से चोदना चाहते थे पर चाचीने मना कर दिया. बोलीं. "अब तो तुम घर में ही हो महना भर, अनिल कहां भागा जाता है. हां इस बच्ची को चोद लो आज़ उसके फुकला होने की परवाह न करो. उसे कहां बाहर शादी करनी है. बड़ी होने पर मैं तो अनिल से ही उसकी शादी करवा दूंगी, फ़िर माल घर में ही आ जायेगा."

फ़िर उसने चाचाजी को बताया कि कैसे रुला रुला कर मैंने चाची की मदद से प्रीति के दोनों छेद चोदे थे. सुनकर चाचाजी तैश में आ गये. चाची से बोले. "चलो, मैं उसकी गांड मारता हूं. चूत तो अब मैं सिर्फ तुम्हारी चोदूंगा रानी. तुम्हारी गांड भी मारा करूंगा. पर अब तो मैं अनिल की गांड का पुजारी हूं. साथ में इस लड़की की भी मार लिया करूगा. पर अनिल को आज फ़िर वैसे ही लड़की जैसा सजाओ जैसा उस दिन सजाया था. उसे देखकर मेरा ऐसा खड़ा होता है कि कह नहीं सकता. फ़िर उसे लंड से प्रीति की गांड मारूंगा. बड़ा मजा आयेगा उस जवान कन्या का शिकार करने में."

शाम हो गई थी इसलिये थोड़े चुंबनों के अलावा हमने कुछ नहीं किया. चाचाजी भी थक गये थे इसलिये नहाकर सो गये. देर रात चाची ने उन्हें उठाया और फ़िर खाना खाकर हम सब चाची के कमरे में इकठे हुए.

 
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