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गीता चाची -Geeta chachi complete

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चाँदनी में मेरा तन्नाया लंड और उसका सूजा लाल सुपाडा देख कर उनके मुँह से भी एक सिसकारी निकल गयी. उसे हाथ में लेकर पुचकारते हुए वे बोलीं. "हाय कितना प्यारा है, मैं तो निहाल हो गयी मेरे राजा."

और झुक कर उन्होंने मेरा सुपाडा मुँह में ले लिया और चूसने लगीं. उनकी जीभ के स्पर्श से मैं ऐसा तडपा जैसे बिजली छू गयी हो. झुकी हुई चाची की चोली में से उनके मम्मे लटक कर रसीले फलों जैसे मुझे लुभा रहे थे. इतने में चाची ने आवेश में आकर अपना मुँह और खोला और मेरा पूरा लंड जड. तक निगल लिया जैसे गन्ना हो.

"चाची, यहा क्या कर रही हैं? मैं झड. जाऊन्गा आप के मुँह में" कहकर मैंने उनका मुँहा हटाने की कोशिश की तो उन्होंने हल्के से अपने दाँतों से मेरे लंड को काट कर मुझे सावधान किया और आँख मार दी. उनकी नज़र में गजब की वासना थी. फिर मुँह से मेरे लंड को जकड कर उसपर जीभ फिराती हुई वी ज़ोर ज़ोर से मेरा लौडा चूसने लगीं.

दो ही मिनिट में मैंने मचल कर उनके सिर को पकड़. लिया और कसमसा कर झड. गया. मुझे लग रहा था कि वे अब मुँह में से लंड निकाल लेंगी पर वे तो ऐसे चूसने लगीं जैसे गन्ने का रस निकाल रही हों. पूऱा वीर्य निगल कर ही उन्होंने मुझे छोड़ा.

मैं चित पड़ा हान्फता हुआ इस स्वर्गिक स्खलन का मज़ा ले रहा था. मुँह पोंछती हुई चाची फिर मुझ से लिपट गयी और मेरे गालों और होंठों को बेतहाशा चूमने लगीं. "लल्ला, तुम तो एकदम कामदेव हो मेरे लिए, मैं तो धन्य हो गयी तेरा प्रसाद पाकर" "आप को गंदा नहीं लगा चाची?" "अरे बेटे तू नहीं समझेगा, यह तो एकदम गाढी मलाई है मेरे लिए. अब तू देखता जा, इन दो महीनों में तेरी कितनी मलाई निकालती हूँ देख."

मुझे बेतहाशा चूमते हुए वे फिर बोलीं. "तुम बड़े पोंगा पंडित निकले लल्ला. शाम से तुझे रिझा रही हूँ पर तू तो शरमा ही रहा था छोकरियों की तरह." मैंने उनके गाल को चूम कर कहा. "नहीं चाची, मैं तो कब का आपका गुलाम हो गया था. बस डर लगता था कि चाचाजी को पता चल गया क्या सोचेंगे."

वे मुझे प्यार से चपत मार कर बोलीं. "तो इसलिए तू दबा दबा था इतनी देर. मूरख कहीं का, उन्हें सब मालूम है." मेरे आश्चर्य पर वे हँसने लगीं.

"ठीक कहा रही हूँ अनिल. मैं कब से भूखी हूँ. तेरे चाचाजी भले आदमी हैं पर अलग किस्म के हैं. उन्हें ज़रा भी मेरे शरीर में दिलचस्पी नहीं है. इतने दिन मैंने सब्र किया, ऐसे भले आदमी को मैं धोखा नहीं देना चाहती थी. परपुरुष की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखा. पर पिछले महने मैं इनसे खूब झगडी. आख़िर जिंदगी ऐसे कैसे कटेगी. वे भी जानते और समझते हैं. बोले, अच्छा जवान लडका घर में ही है, उसे बुला लिया कर जब मान चाहे. तू उसके साथ कुछ भी कर, मुझे बुरा नहीं लगेगा. इसलिए तो तीन माह से वे तुझे चिठ्ठी लिखकर आने का आग्रह कर रहे हैं. और तू है कि इतने दिनों में आया है."

 


मेरे मन का बोझ उतर गया. मेरा रास्ता सॉफ था. मैंने चाची से पूछा कि आख़िर क्यों राजीव चाचा को उन जैसी सुंदर स्त्री से भी लगाव नहीं हैं. वी हँस कर टाल गयीं. मुझे चूमते हुए बोलीं कि बाद में समय आने पर बताएँगी.

और देर ना करके मैंने कस कर चाची को बाँहों में भर लिया. उनकी वासना अब तक चौगुनी हो गयी थी. झट से अपने ब्लाउज के सामने वाले बटन उन्होंने खोल दिए और उनके मोटे मोटे स्तन उछल कर बाहर आ गये. स्तनों की घुंडियाँ एकदमा तन कर अंगूर जैसी खडी थीं. उन्होंने झुक कर एक स्तन मेरे मुँह में दे दिया और मुझ पर चढ. कर मेरे उपर लेट गयीं. मुझे बाँहों में भींच कर अपनी टाँगों में मेरी कमर जकड.कर वे उपर से धक्के लगाने लगीं मानों काम क्रीडा कर रही हों.

उनका तना मूँगफली जैसा निपल मुँह में पाकर मुझे ऐसी खुशी हुई जैसी एक बच्चे को माँ का निपल चूसते हुए होती है. मैंने भी अपनी बाँहें उनके इर्द गिर्द भींच लीं और निपल चूसता हुआ उनकी चिकनी पीठ और कमर पर हाथ फेरने लगा. फिर उनके नितंब साड़ी के उपर से ही दबाने लगा. वे ऐसी बिचकीं कि जैसे बिच्छू ने डंक मारा हो. मेरे चेहरे को उन्होंने छाती पर और कसकर भींच लिया और आधा स्तन मेरे मुँह में ठूंस दिया.

उसे चूसता हुआ मैं अब सोचने लगा कि चाची चोदने को मिले तो क्या आनंद आए. दस ही मिनिट में मेरा जवान लंड फिर ऐसा खड़ा हो गया था जैसे कभी बैठा ही ना हो. किसी तरह निपल मुँह में से निकाल कर चाची से बोला. "गीता चाची, कपड़े निकाल दीजिए ना, आपका यह बदन देखने को मैं मरा जा रहा हूँ." वे बोलीं. "नहीं लल्ला, कुछ भी हो, हम छत पर हैं, पूरा नंगा होने में कम से कम आज की रात सावधानी करना ठीक है. कल से देखेंगे और दोपहर को तो घर में हम अकेले हैं ही"

 


"तो चाची, प्लीज़ चोदने दीजिए ना, मैं पागल हो जाऊन्गा नहीं तो." वे इतरा कर अपने उरोज मेरे गालों पर रगड़ती हुई बोलीं. "इतनी जल्दी क्या है राजा, और मज़ा नहीं करोगे? बहुत उतावले हो लल्ला तुम, सब्र करना सीखो. तभी स्वर्ग का आनंद पाओगे" कहते हुए उन्होंने अपना दूसरा स्तन मेरे मुँह में दे दिया. मैं उनका निपल चूसने में जुट गया. हमारी सुखी चुदाई फिर शुरू हो गयी. मैं नीचे से और वे उपर से ऐसे धक्के लगा रहे थीं जैसे रति कर रही हों पर बीच में अभी भी कपड़े थे. दस बीस मिनिट मस्ती में गुजर गये. उन्हें भोगने को अब मैं बेताब था.

आख़िर मेरी उत्तेजना देखकर उन्होंने मेरे कान में फुसफुसा कर कहा. "अनिल बेटे, मेरे साथ उनसठ का खेल खेलोगे? तुझे उज्र तो नहीं है?" मैं पहले समझा नहीं फिर एकदम दिमाग़ में बात आ गयी कि चाची सिक्सटी नाइन की बात कर रही हैं. मेरा रोम रोम सिहर उठा. मानों उन्होंने मेरे मन की बात कहा दी थी. किताबों में पढ़ा और चित्रा देखे थे पर अब यह मतवाली रसीली चाची खुद ही यह करने को मुझे कह रही थी.

असल में कल से जब से मुझे उनकी गोरी गोरी बुर के दर्शन हुए थे, उस मुलायम बुर को चोदने को तो मैं आतुर था ही, पर उसके भी पहले मेरे मन में यही बात आई थी कि अगर इस रसीली चूत में मुँह मारने मिले तो क्या बात है. चाची के मुँह से मेरे मन की बात सुन कर मैं चहक उठा. मेरे लंड में आए अचानक उछाल से वे समझ गयीं कि उनका भतीजा भी उनके रस का प्यासा है.

मेरे मुँह से अपना निपल खींच कर वे उलटी तरफ से मेरे सामने लेट गयीं. "तो सिक्सटी नाइन करेगा मेरे साथ मेरा राजा. मैं तो समझती थी कि तुझे शायद अच्छा ना लगे." मैंने उत्सुक स्वर में कहा "क्या बात करती हो चाचीज़ी. मैं तो मरा जा रहा हूँ इस अमृत के लिए. शाम से मुँह में पानी भरा है."

अपनी साड़ी उपर कर के खिलखिलाते हुए उन्होंने अपनी एक टाँग उठाई और मेरे सिर को अपनी जीँघों में खींचते हुए बोलीं. "तो आ जाओ लल्ला, इतना रस पिलाऊन्गि की तृप्त हो जाओगे" उनकी साड़ी अब कमर के उपर थी और मोटी मांसल जांघें एकदम नंगी थीं. उनकी निचली जाँघ को मैं तकिया बनाकर लेट गया और उंगलियों से उनकी रेशमी झान्टे बाजू में कर के उस खजाने को देखने लगा.

धुंधली चाँदनी में बहुत सॉफ तो नहीं दिख रहा था पर फिर भी उस लाल चूत की झलक से मैं ऐसा मस्त हुआ कि सीधा उस निचले मुँह का चुंबन ले लिया. पास से उसकी मादक खुशबू ने मुझे पागल सा कर दिया. जीभ निकालकर मैं चाची की बुर चाटने लगा. वह बिलकुल गीली थी. गाढा छिपचिपा शहद जैसा रस उसमें से टपक रहा था. उस कसैले खट्टे मीठे स्वाद से विभोर होकर मैं बेतहाशा चाची की चूत चाटने और चूसने लगा.

चाची साँस रोककर देख रही थीं कि मैं क्या करता हूँ. मेरे इस अधीरता से चूत चाटना शुरू करने पर वे मस्ती से कराह उठीं. "हाय लल्ला, तू तो जादूगर है, ज़रा भी सिखाना नहीं पड़ा. बस ऐसा कर कि बीच बीच में जीभ भी डाल दिया कर अंदर." और फिर उन्होंने मेरे लंड पर ताव मारना शुरू कर दिया. पहले उसे खूब चूमा, चाटा और फिर मुँह में लेकर चूसने लगीं.

 


आधे घंटे तक हम एक दूसरे के गुप्ताँग को चूसने का मज़ा लेते रहे. चाची तो पाँच मिनिट में ही झड. गयी थीं. उनकी झडती चूत ने मुझे खूब पानी चखाया. बाद में वे दो बार और स्खलित हुईं. बीच में मैंने उनके कहने पर उनकी मखमली चूत में जीभ भी डाल दी और अंदर बाहर कर के उसे जीभ से ही चोदा. चाची ने मुझे खूब देर टंगाया आख़िर असहनीय कामना से जब मैं धक्के लगाकर उनके मुँह को चोदने लगा तभी उन्होंने ज़ोर से चूसकर मुझे स्खलित किया.

हम दोनों बिलकुल तृप्त हो गये थे पर फिर भी नींद से कोसों दूर थे. पेशाब लगी थी इसलिए हमने उठ कर वहीं छत पर बाजू में बनी नाली में मूता. चाची ने भी बेझिझक मेरे सामने ही बैठकर पेशाब किया. उनकी बुर से निकलती मूत्र की तेज रुपहली धार देखकर मेरे मन में एक अजीब रोमांच हो उठा.

वापस बिस्तर पर आकर हम एक दूसरे से चिपट गये और चूमा चाटी करते रहे. चाची मुझसे अब गंदी गंदी बातें करने लगीं. मुझे उत्तेजित करने का यह तरीका था. मैंने भी उनसे पूछा कि उनके जैसी गरमागरम नारी ने अपने उपर इतने साल कैसे संयम रखा. वे हँसने लगीं. "कौन कहता है मैंने संयम रखा? खूब मज़ा लिया मैंने."

मैंने कहा. "चाची आप तो कह रही थीं कि किसीसे आपने संबंध नहीं रखे" मेरे लंड को मुठ्ठी में लेकर दबाती हुई वे बोलीं. "अरे संबंध नहीं रखे तो और भी रास्ते हैं. तू खुद को ही देख . आज तक तूने किसी स्त्री से संबंध नहीं किया ना? पर मज़ा लेता है कि नहीं?" मैं समझ गया कि हस्तमैथुन की बात हो रही है. मेरी उत्तेजना महसूस करके चाची हँसने लगीं. "चल, तुझे भी कभी दिखाऊन्गि औरतें क्या करती हैं खुद के साथ. हमेशा याद रखेगा. अरे गाँव की लडकियाँ तो माहिर होती हैं इस कला में."

मुझे चाची के स्तन दबाने का बहुत मन हो रहा था. जब उनसे कहा तो वे मेरी ओर पीठ करके लेट गयीं. पीछे से उनसे चिपट कर मैंने उनके मम्मे दबाने शुरू कर दिए. बड़ा मज़ा आया. ख़ास कर उनके कड़े निपल मेरे हथेलियों में चुभाते तो बड़ा अच्छा लगता. स्तन मर्दन करते हुए मैं पीछे से उनके नितंबों के बीच के गहरी लकीर में लंड जमा कर रगडने लगा. उन मांसल चूतडो के घर्षण से जल्द ही मेरा फिर से तन्ना कर खड़ा हो गया.

"अब तो चोदने दो चाची" मैं मचल उठा. वे इतरा कर बोलीं. "ठीक है लल्ला, आ जाओ मैदान में, पर देख, मैं कहे देती हूँ, इतने दिनों बाद चुदवाने का मौका मिला है. मन भर कर चुदवाऊन्गि. घंटे भर तक मेहनत करना पड़ेगी बिना झडे. नहीं तो कट्टी. बोलो है मंजूर?" मैंने मान लिया, जबकि मन में लग रहा था कि ऐसी मादक नारी को बिना झडे चोदना तो असंभव है.

चाची साड़ी उपर करके चित लेट गयीं. मेरा तकिया उन्होंने अपने चूतडो के नीचे रख कर अपनी कमर उँची कर ली और टाँगें फैला कर तैयार हो गयीं. उस खुली रिसती बुर को देखकर मुझे नहीं रहा गया और फिर मैं झुक कर उसे चूसने लगा. चाची ने मना नहीं किया बल्कि प्यार से चुसवाती रहीं. "मेरे प्यारे लल्ला, लगता है अपनी चाची की चूत बहुत भा गयी है तुझे. चूस बेटे चूस, मन भर कर चूस, तेरे ही लिए है मेरा सब रस."

एक बार उन्हें झडा कर मैने फिर रस चाटा और आख़िर वासना सहन ना होने से उठ बैठा. उनकी टाँगों के बीच बैठकर अपना सुपाडा उनके योनिद्वार पर रखा और ज़ोर से पेल दिया. चाची की बुर काफ़ी टाइट थी फिर भी इतनी गीली थी कि एक ही बार में पूरा लंड जड. तक चाची की चूत में उतर गया. चाची सुख से सिसक उठीं. "शाब्बास मेरे शेर, अब आया मज़ा. चोद अब मन लगा कर, चढ. जा मुझपर, ढीली कर दे मेरी कमर धक्के मार मार कर, तुझे मेरी कसम लाला."

मैं सपासाप चाची को चोदने लगा. इतना सुख कभी नहीं मिला था. अपनी पहली चुदाई और वह भी ऐसी मस्त औरत के साथ, मैं तो निहाल हो गया.

 


उस रात मैंने सच में एक घंटा नहीं तो फिर भी बीस-एक मिनिट गीता चाची को चोदा. एक तो दो बार झडने से अब मेरे लंड का संयम बढ़. गया था, दूसरे गीता चाची ने भी बार बार दुहाई देकर और धमाका कर मुझे झडने नहीं दिया. जब भी उन्हें लगता कि मैं स्खलित होने वाला हूँ, वे कस कर अपनी टाँगों में मेरी कमर पकड़. कर और मुझे बाँहों में भर कर स्थिर कर देतीं. लंड का मचलना कम होने पर ही छोडती.

छोड़ते हुए मैंने उन्हें खूब चूमा. कई बार ज़ोर से धक्के लगाता हुआ मैं उनके रसीले होंठों को अपने दाँतों में दबाकर चूसता रहता, यहाँ तक कि उनकी साँस रुक सी जाती. बीच बीच में झुक कर उनके निपल मुँह में लेकर चूसता हुआ उन्हें हचक हचक कर चोदता, यहा सब कलाएँ मैंने ब्लू फिल्मों में देखी थीं इसलिए काम आईं. चाची ने बीच में झड. कर तृप्ति से हन्फते हुए कहा भी कि लगता नहीं की यह मेरी पहली चुदाई है पर मैंने उनकी कसम देकर उनको विश्वास दिलाया.

आख़िर जब मैं थक कर चूर हो गया तो चाची से गिडगिडा कर स्खलित होने की इजाज़त माँगी. तीन चार बार झड. कर भी उनकी चुदासी पूरी मिटी नहीं थी पर मेरी दशा देखकर तरस खा कर बोलीं. "ठीक है लल्ला, आज छोड़. देती हूँ, पर कल देख तेरा क्या हाल करती हूँ."

वह आखरी पाँच मिनिट की चुदाई बहुत जोरदार थी. चाची ने भी मुझे खूब उकसाया. "चोद राजा चोद अपनी चाची को, तोड. दे मेरी कमर, फाड़. दे मेरी चूत, और चोद लल्ला, मार धक्का, हचक के मार." मेरे शक्तिशाली धक्कों से खाट भी चरमराने लगी. लगता था कि टूट ना जाए, आस पास वाले सुन ना लें पर अब तो मुझ पर भूत सवार था. उधर चाची भी मेरा साथ देते हुए नीचे से चूतड. उछाल उछाल कर चुदवा रही थीं. उनकी चूड़ियाँ हमारे धक्कों से हिल डुलकर बड़े मीठे अंदाज में खनक रही थीं. उस आवाज़ से मैं पूरा मदहोश हो गया था. इसलिए मैं ऐसा झडा कि मेरे मुँह से चीख निकल जाती अगर चाची ने मेरा मुँह अपने होंठों में पहले ही दबा कर ना रखा होता.

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उस अपूर्व कामतृप्ति के बाद मैं ऐसा सोया कि सुबह सूरज सिर पर आ जाने पर ही नींद खुली. चाची पहले ही उठ कर नीचे चली गयी थीं. जब मुझे जगाने चाय लेकर आईं तो नहा भी चुकी थीं. शायद मंदिर भी हो आई थीं क्योंकि सिंदूर में थोड़ा गुलाल लगा था.

साड़ी नीली साड़ी में लिपटी उस रूपवती नारी को देखकर मैं फिर उनसे लिपटकर चुंबन माँगने ही वाला था कि उन्होंने उंगली मुँह पर लगाकर मना कर दिया. मैं समझ गया कि अब दिन निकल आया है और छत पर ऐसा करना ठीक नहीं. मैं चाय पी रहा था तब चाची ने सामने बैठ कर मुस्कराते हुए पूछा. "तो कैसे कटी रात मेरे प्यारे लल्ला की?"

मैं दबे स्वरों में उनकी आँखों में देखता हुआ कृताग्यता से बोला. "गीता चाची, आपने तो मुझे स्वर्ग पहुँचा दिया. मैं तो आपका गुलाम हो गया, अब आप जो कहेंगी, वही करूँगा." वे प्यार से हँसने लगीं. "ठीक है लल्ला, गुलाम ही बना कर रखूँगी तुझे. देख तुझे क्या क्या नज़ारे दिखाती हूँ. अब नीचे चलो और नहा लो."

मैं नहाकर तैयार हुआ. दोपहर तक बस टाइम पास किया क्योंकि घर में काम करने वाली नौकरानी आ गयी थी और वह खाना बनाने तक और हमारा खाना होकर बर्तन माँजने तक रुकी थी. आख़िर एक बजे वह गयी और चाची ने दरवाजा अंदर से लगा लिया. मैं तो तैयार था ही, बल्कि सुबह से उनके उस मतवाले शरीर के लिए प्यासा था. तुरंत उनसे चिपक गया.

हम वहीं सोफे पर बैठ कर एक दूसरे के चुंबन लेने लगे. "लल्ला, ऐसे नहीं, चुंबन का असली मज़ा लेने को जीभ का प्रयोग ज़रूरी है." कहते हुए चाची ने अपनी जीभ से मेरे होंठों को खोला और उसे मेरे मुँह के अंदर डाल दिया. मैं उस रसीली जीभ को चूसने लगा और उस मीठे मुखरस का खूब मज़ा उठाया. जीभ से जीभ भी लड़ाई गयी और मैंने भी अपनी जीभ चाची के मुँह में डाल कर उनके दाँत, मसूडे, तालू इत्यादि को खूब चाटा.

चूमाचाटी के बाद चाची मुझे उपर अपने कमरे में ले गयीं. अब तक मेरा लौडा तन्ना कर उठ खड़ा हुआ था. चाची ने दरवाजा बंद करके मेरे पास आकर मेरा हाथ पकडकर कहा. "लल्ला, कल तुम मुझे नंगी देखना चाहते थे ना, चलो आज तुम्हें दिखाती हूँ जन्नत का नज़ारा. पर पहले तुम अपने सब कपड़े उतारो.

मैं तुरंत नग्न हो गया. थोड़ी शरम अब भी लग रही थी पर जब मैंने चाची की नज़र की चमक देखी तो शरम पूरी तरह जाती रही. मेरे भरे पूरे नग्न किशोर जवान शरीर को देखकर वे बोलीं. " बड़ा प्यारा है मेरा गुलाम, ऐसा सबको थोड़े ही मिलता है. भरपूर गुलामी कराऊन्गि तुझसे लल्ला." मेरे तन कर खड़े लंड को देख कर वे चाहक पड़ीं. "बहुत मस्त है लल्ला तेरा सोंटा. चल इसे नापते हैं, कितना लंबा है."

मुझे पलंग पर बिठा कर वे एक स्केल ले आईं और मेरा लंड नापा. छह इंच का निकाला. "बड़ा मजबूत है राजा, कितना गोरा भी है, और ये सुपाडा तो देख, लगता है जैसे लाल टमाटर हो, और ये नसें, हाय लल्ला, मैं वारी जाऊ तुझपर. साल भर में अपनी चाची को चोद चोद कर आठ इंच का ना हो जाए तो कहना" कहकर वे उससे खेलने लगीं.

"चाची, अब आप भी नंगी हो जाओ ना प्लीज़." वे मुस्काराकर खडी हो गयीं और साड़ी उतारने लगीं. "एक शर्त पर लल्ला. चुपचाप बैठना और मैं कहूँ वैसा करना. और अपने लंड को बिलकुल हाथ नहीं लगाना. नहीं तो मुठ्ठ मारने लगोगे मेरा माल देखकर."

साड़ी और पेटीकोट निकलते ही मेरा और तन्नाने लगा. क्योंकि अब उनकी गोरी कदलीस्तम्भ जैसी मोटी जांघें नंगी थी. बस एक काली पैंटी उनके गुप्तांगों को छिपाए थी. चोली निकालकर जब उन्होंने फेंकी तो मैंने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ लंड पर जाने से रोका. सिर्फ़ ब्रेसियार और पैंटी में लिपटी अर्धनग्न चाची तो गजब ढा रही थी. उनका शरीर बड़ा मांसल था, थोड़ा और माँस होता तो मोटापा कहलाता पर अभी तो वह जवानी का माल था.

थोड़ी देर गीता चाची ने मुझे तंग किया. इधर उधर घूमी, कमरे में चली, सामान बटोरा और टाइम पास किया; सिर्फ़ मुझे अपने अधनन्गे रूप से और उत्तेजित करने को. आख़िर मैं उठकर उनके सामने घुटने टेक कर बैठ गया और उनकी पैंटी में मुँहा छुपा दिया. उस मादक खुशबू को लेते हुए मैंने उनसे मुझे और तंग ना करने की मिन्नत की. मेरी हालत देखकर हँसते हुए उन्होंने इजाज़त दे दी. "ठीक है लल्ला, लो तुम ही उतारो बाकी के कपड़े."

मैंने खड़े होकर काँपते हाथों से चाची की ब्रा के हुक खोले और उसे उतारकर नीचे डाल दिया. ब्रेसियर से छूटते ही उनके भारी मांसल स्तन स्तन थोड़े लटक कर डोलने लगे. मैंने उन्हें हाथों में लेकर झुक कर बारी बारी से चूमना शुरू कर दिया. "थोड़े लटक गये हैं राजा, दस साल पहले देखते तो कडक सेब थे." "मेरे लिए तो ये स्वर्ग के रसीले फल हैं चाची. काश इनमें दूध होता तो मैं पी डालता."

"दूध भी आ जाएगा बेटे, बस तू ऐसे ही मेरी सेवा करता रह." सुनकर उनकी बात के पीछे का मतलब समझ कर मुझे रोमांच हुआ पर मैं चुप रहा. गोरे उरोजो के बीच लटका काला मंगल सूत्र बड़ा प्यारा लग रहा था. किसी शादीशुदा औरत की वह निशानी हमारे उस कामसंबंध को और नाजायज़ और मसालेदार बना रही थी. मेरी नज़र देख कर चाची ने पूछा. "उतार दूँ बेटे मंगल सूत्र?" मैंने कहा. "नहीं चाची, बहुत प्यारा लगता है तुम्हारे स्तनों के बीच."

 
ठीक है दोस्तो इसे भी कंप्लीट कर देता हूँ
 
"दूध भी आ जायेगा बेटे, बस तू ऐसा ही मेरी सेवा करता रह." सुनकर उनकी बात के पीछे का मतलब समझ कर मुझे रोमांच हुआ पर मैं चुप रहा. गोरे उरोजों के बीच लटका काला मंगल सूत्र बड़ा प्यारा लग रहा था. किसी शादीशुदा औरत की वह निशानी हमारे उस कामसंबंध को और नाजायज और मसालेदार बना रही थी. मेरी नजर देख कर चाची ने पूछा. "उतार दूं बेटे मंगल सूत्र?" मैंने कहा, "नहीं चाची, बहुत प्यारा लगता है तुम्हारे स्तनों के बीच."

फ़िर मैंने जल्दी से चाची की चड्डी उतारी. उनकी फूली बुर और गोल मटोल गोरे नितंब मेरे सामने थे. मैं झट से नीचे बैठ गया और पीछे से अपना चेहरा चाची के नितंबों में छुपा दिया. फ़िर उन्हें चूमने लगा. हाथ चाची के कूल्हों के इर्द गिर्द लपेट कर उनकी बुर सहलायी और बुर की लकीर में उंगली चलाई. बुर चू रही थी.

मेरे नितंब चूमने की क्रिया पर चाची ने मीठा ताना मारा. "लगता है चूतड़ों का पुजारी है तू लल्ला, सम्हल कर रहना पड़ेगा मुझे." मैं कुछ न बोला पर उन गोरे गुदाज चूतड़ों ने मुझे पागल कर दिया था. बस यही आशा थी कि अगले कुछ दिनों में शायद चाची मेहरबान हो जायें और मुझे अपने नितंबों का भोग लेने दें तो क्या बात है.

फ़िलहाल उन्होंने मेरे बाल पकड़कर मेरा सिर उठाया और घूम कर मेरे सामने खड़ी हो गयीं. मेरे सिर को फ़िर अपने पेट पर दबाते हुई बोलीं. "प्यार करना हो तो आगे से करो लल्ला, रस मिलेगा. पीछे क्या रखा है?" मैंने उनकी रेशमी झांटों में मुंह छुपाया और रगड़ने लगा. उन्होंने सिसकी ली और जांघे फैलाकर टांगें पसारकर वे खड़ी हो गयीं.

में उनके सामने ऐसा घुटने टेक कर बैठा था जैसे देवी मां के आगे पुजारी. प्रसाद पाने का मौका अच्छा था इसलिये मैं आगे सरककर मुंह उनकी जांघों के बीच डालकर चूत चूसने लगा. ऐसा रस बह रहा था जैसे नल टपक रहा हो. मैंने ऊपर से नीचे तक बुर चाट चाट कर और योनिद्वार चूस कर चाची की ऐसी सेवा की कि वे निहाल होकर कुछ ही देर में स्खलित हो गयीं. दो चार चम्मच और चिपचिपा पानी मेरे मुंह में उनकी चूत ने फेंका.

"चलो अब पलंग पर चलो लल्ला, वहां ठीक से चूसो. तेरी जीभ तो जादू कर देती है मुझ पर" कहकर चाची मुझे उठाकर खींचती हुई पलंग पर पहुंची और टांगें फैलाकर लेट गयीं. इस बार चाची ने मुझे सिखाया कि चूत को ज्यादा से ज्यादा सुख कैसे दिया जाता है.

"लल्ला, मेरी बुर को ठीक से देखो, क्या दिखता है." उन्होंने मेरे बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा. मैंने जवाब दिया. "चाची, दो मोटे मुलायम होंठ जैसे हैं, और उनके बीच में गीला लाल छेद है. खुल बंद हो रहा है और रस टपक रहा है." "हां बेटे, वे होंठ याने भगोष्ठ हैं, मेरे निचले मुंह के होंठ, और बोल क्या दिखता है." मैंने आगे कहा, "ऊपर भगोष्ठ जहां जुड़े हैं वहां एक बड़ा लाल अनार का दाना जैसा है और उसके नीचे एक जरा सा छेद."

"अब आया असली बात पर तू लल्ला. वह छेद मेरा मूतने का है. और वह दाना मेरा क्लिटोरिस है, मदन मणि, वही तो सारे फ़साद की जड़ है. इतना मीठा कसकता है मुआ, चुदासी वहीं से पैदा होती है. उसे चाटो लल्ला, चूमो, प्यार करो, मैं निहाल हो जाऊंगी."

मैंने अपनी जीभ को उस दाने पर घेरा तो वह थिरकने लगा. जरा और रगड़ा तो चाची ने चिहुक कर मेरा सिर कस कर अपनी चूत पर दबा दिया और धक्के मारने लगी. मैंने खेल खेल में उसके मूतने के छेद पर जीभ लगायी तो वह मानों पागल सी हो गयीं. क्लिट को मैने थोड़ा और रगड़ा और चाची सिसक कर झड़ गयीं. अगले आधे घंटे तक मैंने उनकी खूब चूत चूसी और मदन मणि को चाट चाट कर के चाची को दो बार और झड़ाया.

 
थोड़ा शांत होने पर उनका ध्यान मेरे उफ़नते लंड पर गया. उसे हाथ में लेकर वे बेलन जैसे बेलने लगीं तो मेरे मुंह से उफ़ निकल गयी. ऐसा लगता था कि झड़ जाऊंगा. "अरे राजा, जरा सब्र करना सीखो. ऐसे झड़ोगे तो दिन भर रास लीला कैसे होगी? चलो, अभी चूस देती हूं, पर फ़िर दो तीन घंटे सब्र करना. मैं नहीं चाहती कि तू दिन में तीन चार बार से ज्यादा झड़े"

"चाची, चोदने दो ना! चूस शाम को लेना" मैंने व्याकुल होकर कहा. "नहीं राजा, तू ही सोच, अगर अभी चोद लिया तो फ़िर बाद में मेरी चूत चूस पायेगा? अब तो तू चूत चूसने में माहिर हो गया है. मुझे भी घंटों तुझसे अपनी बुर रानी की सेवा करानी है." उन्होंने मेरी आंखों में आंखें डालकर पूछा. मैं निरुत्तर हो गया क्योंकि बात सच थी. चाची की बुर में झड़ने के बाद उसे चूसने में क्या मजा आता? सारा स्वाद बदल जाता.

चाची ने आगे कहा, "इसलिये दिन भर मुझे चोदना नहीं. रात को सोते समय चोदा कर. जब थोड़ा संभल जायेगा तो दिन में बिना झड़े चोद लिया कर. जब न रहा जाये तो मैं चूस दिया करूंगी." कहते हुए चाची ने मुझे पलंग पर बिठाया. खुद नीचे उतर कर मेरे सामने जमीन पर पलथी मारकर बैठ गयी और मेरी गोद में सिर झुकाकर मेरा लंड चूसने लगी. बहुत देर बड़े प्यार से सता सता कर, मीठी छुरी से हलाल कर उन्होंने मेरा चूसा और आखिर मुझे झड़ाकर अपना इनाम मेरे वीर्य के रूप में वसूल कर लिया.

अगली कामक्रीड़ा के पहले हम सुस्ता रहे थे तब गीता चाची फ़िर खेल खेल में मेरा मुरझाया लंड स्केल से नापने लगीं. "बस अढ़ाई इंच है अभी, कितना प्यारा लगता है ऐसे में भी, बच्चे जैसा." मैंने चाची से कहा. "गीता चाची, मेरा लंड तो नाप रही हैं, अपनी चूत भी तो नाप कर दिखाइये."

मेरी चुनौती को स्वीकर करके चाची उठकर दराज से एक मोमबत्ती निकाल लाईं. करीब एक इंच मोटी और फुट भर लंबी उस मोमबत्ती को हाथ में लेकर वे पलंग पर टांगें ऊपर करके बैठ गयीं और मेरी ओर देखते हुए मुस्कराकर मोमबत्ती अपनी चूत में घुसेड़ दी. आधी से ज्यादा मोमबत्ती अंदर समा गयी. जब मोमबत्ती का अंदर जाना रुक गया तो उंगली से उसे वहां पकड़कर उन्होंने बाहर खींच लिया और बोलीं. "ले नाप लल्ला"

मैंने नापा तो नौ इंच थी. "देखा लल्ला , कितनी गहरी है, अरे मैं तो तुझे अंदर ले लू, तेरे लंड की क्या बात है." शैतानी से वे बोलीं. मैंने कहा, "चाचीजी, लगता है रोज नापती हो तभी तो पलंग के पास दराज में रखी है." वे हंस कर बोलीं. "हां नापती भी हूं और मुठ्ठ भी मारती हूं. है जरा पतली है पर मस्त कड़ी और चिकनी है. बहुत मजा आता है. देखेगा?"

और मेरे जवाब की प्रतीक्षा न करके उन्होंने फ़िर मोमबत्ती अंदर घुसेड़ ली और उसका सिरा पकड़कर अंदर बाहर करने लगीं. "लल्ला देख ठीक से मेरे अंगूठे को." वे बोलीं. मैंने देखा कि मोमबत्ती अंदर बाहर करते हुए वे अंगूठा अपने क्लिटोरिस पर जमा कर उसे दबा और रगड़ रही हैं. लगता था बहुत प्रैक्टिस थी क्योंकि पांच ही मिनिट में उनका शरीर तन सा गया और आंखें चमकने लगीं. उनका शरीर थोड़ा सिहरा और वे झड़ गयीं. हांफ़ते हुए कुछ देर मजा लेने के बाद उन्होंने सावधानी से खींच कर मोमबत्ती बाहर निकाली. बोलीं. "तुझे दिखा रही थी इसलिये जल्दी की, नहीं तो आधा आधा घंटा आराम से मजा लेती हूं."

 
मोमबत्ती पर चिपचिपा पानी लगा था. मुझसे न रहा गया और उनके हाथ से लेकर मैंने उसे चाट लिया. प्यार से चाची हंसने लगीं. मोमबत्ती वापस दराज में रखकर बोलीं. "चूत रस के बड़े शौकीन हो लल्ला. मैं तो यही मानती हूं कि सचमुच के मतवाले मर्द की यह पहचान है. आ जाओ मेरे पास, तुझे और रस पिलाऊं."

अपनी जांघों में मेरा मुंह लेकर वे लेट गयीं और प्यार से अपनी चूत चुसवायी. मैंने मन लगाकर प्यार से बहुत देर उनकी बुर के पानी का स्वाद लिया. इस बार मैंने उनके क्लिट पर खूब ध्यान दिया और उसे बार बार जीभ से रगड़ा. कई बार मुंह में लेकर अंगूर के दाने जैसा दांतों से हल्के काटा और चूसा. उनकी उत्तेजना का यह हाल था कि बार बार हल्के स्वर में चीख देती थीं. आखिर दो चार बार झड़कर वे भी तृप्त हो गयीं.

मेरा लंड उनकी बुर चूस कर फ़िर खड़ा हो गया था. उसकी ओर देखकर बोलीं. "अगर न झड़ने का वादा करते हो। लल्ला तो चोद लो दस मिनिट." मैं तैयार हो गया और उनपर चढ़ कर उन्हें चोदने लगा.

दस मिनिट बाद जब उन्होंने देखा कि मैं बराबर अपने स्खलन पर काबू किये हुए हूं तो वे बोलीं. "शाब्बास बेटे, चल तुझे दूसरा आसान दिखाती हूं. इसमें तुझे कुछ नहीं करना पड़ेगा." मुझे उन्होंने नीचे लिटाया और फ़िर मेरे ऊपर चढ़ कर बैठ गयीं. मेरा लंड अपनी बुर में घुसेड़ लिया और मेरी कमर के दोनों ओर घुटने टेक कर मेरे पेट पर बैठकर उचकते हुए मुझे चोदने लगीं.

उनके उछलते हुए स्तनों और उनके बीच डोलते मंगलसूत्र ने ऐसा जादू किया कि मेरा बुरी तरह तन्ना कर खड़ा हो गया. उनकी मखमली चूत ने भी मुझे कस कर पकड़ रखा था इसलिये चाची को भी मजा आ रहा था. मस्ती में वे खुद ही अपने मम्मे दबाने लगीं. मैंने इस नजारे का खूब मजा लिया और बाद में उन्हें आराम देने के लिये खुद ही उनके स्तन पकड़कर दबाने लगा.

चाची ने दो तीन बार झड़ने तक मुझे खूब चोदा. आखिर में जब मैं छटपटाने लगा तो वे समझ गयीं. तुरंत उतर कर मेरे ऊपर सिक्सटी नाइन के पोज़ में लेट गयीं. यहां मैं उनकी रिसती गीली बुर को चूसने लगा और वहां उन्होंने पहले मेरे पूरे लंड को चाट चाट कर उसपर लगा अपनी बुर का पानी साफ़ किया और फ़िर लंड मुंह में लेकर चूस डाला. वीर्य निकालकर उसे पी कर ही वे रुकीं.

मैंने उन्हें बांहों में लेकर कहा. "चाची, मुझे तो आपका रस अमृत जैसा लगता है. आप को खुद की चूत का पानी चाटना अटपटा नहीं लगता." वे बोलीं. "नहीं रे, बहुत अच्छा लगता है, मैं तो अक्सर उंगलियों से मुठ्ठ मारती हूं और बीच बीच में उन्हें चाट भी लेती हूं. सच में कभी कभी ऐसा लगता है कि मेरे जैसे ही कोई गरम जवान औरत मिल जाये तो एक दूसरे की चूत चूसने में बड़ा मजा आयेगा."

 
चाची के इस मादक चुदैल स्वभाव की मैंने मन ही मन दाद दी. यह भी मनाया कि उनकी यह इच्छा जल्दी पूरी हो. दोपहर हो गयी थी और हम दोनों अब सो गये. सीधा शाम को पांच बजे उठे.

हमारा अब यही क्रम बन गया. दोपहर और रात को मन भर कर मैथुन करते थे. चाची मुझे सिर्फ़ रात को सोने के पहले आखरी चुदाई में अपनी चूत में झड़ने देती थीं. दिन में दो या तीन बार चूस लेती थीं. मैंने भी लंड पर कंट्रोल करके बिना झड़े घंटों चोदना सीख लिया. बड़ा मजा आता था. चुदाई के इतने आसन हमने आजमाये कि कोई गिनती नहीं. खड़े खड़े, गोद में बिठाकर, पीछे से इत्यादि.

उनमें चार आसन हमें बहुत पसंद आते थे. एक तो सीधा सादा मर्द ऊपर औरत नीचे वाली चुदाई का आसन. दूसरा जिसमें मैं नीचे लेटता था और चाची चढ़कर मुझे चोदती थी. तीसरा यह कि मैं कुर्सी में बैठ जाता था और चाची मेरी ओर मुंह करके मेरी गोद में अपनी चूत में मेरा लंड लेकर टांगें फैला कर बैठ जाती थीं और फ़िर ऊपर से मुझे हौले हौले मजा लेकर चोदती थीं. इस आसन की खास बात यह थी कि चाची की छातियां ठीक मेरे सामने रहती थीं और उन्हें मैं मन भर कर चूस सकता था. जब भी निपल चूसने का मन हो, हम यही आसन करते थे. ।

आखरी आसन जो हमें बहुत भा गया था वह था कुत्ते कुतिया या जानवर स्टाइल की पीछे से चुदाई. इसमें चाची कोहनियों और घुटनों को टेककर कुतिया जैसी बिस्तर पर जम जाती थीं. मैं पीछे से पहले उनकी बुर चाटता और फ़िर लंड डालकर उनके नितंब पकड़कर कचाकच धक्के लगाकर पीछे से कुत्ते जैसा उन्हें चोदता. इसमें धक्के बहुत जबरदस्त लगते थे इसलिये बड़ा मजा आता था. कभी कभी झुककर अपनी बांहों में चाची का शरीर भरकर उनपर चढ़ कर मम्मे दबाता हुआ मैं उन्हें चोदता. पांच मिनिट से ज्यादा वे मेरा भार नहीं सह पाती थीं पर इन पांच मिनिटों में हमे स्वर्ग सुख मिल जाता.

इस आसन की एक और खास बात यह थी कि हम अक्सर इसे आइने के सामने करते. आइने में चाची के लटकते स्तन और उनके बीच लटकता मंगलसूत्र बड़े प्यारे दिखते. जब मैं धक्के लगाता तो चाची के स्तन इधर उधर हिलते.

मंगलसूत्र भी चोदने की लय में पेंडुलम जैसा डोलता. कभी कभी तो मैं इतना उत्तेजित हो जाता कि झड़ जाता. फ़िर चाची को बुर धोने जाना पड़ता जिससे फ़िर रात के पहले बाकी समय में मैं उनकी बुर चूस सकें. इसलिये यह आसन हम सम्हाल कर कभी कभी ही करते.

चूत और लंड चूसने के भी हमने खूब तरीके ढूंढ निकाले. लंड चूसना तो किसी भी आसन में मुझे बहुत अच्छा लगता था. कभी लेट कर, कभी कुर्सी में बैठकर, कभी खड़े खड़े. हां कभी कभी चाची मुझे अपने मुंह को चूत जैसा चोदने देती थीं.

 
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